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Hindi Story: आस्तीन का सांप

Hindi Story: रात के 2 बज रहे थे. घर के सभी लोग गहरी नींद में थे. रीमा चुपचाप उठी और बगल वाले कमरे में चली गई. उस कमरे में उस का देवर सूरज सो रहा था. रीमा सूरज के बगल में आ कर लेट गई और उस के बालों में उंगलियां फिराने लगी. उस के लगातार ऐसा करते रहने से सूरज जाग गया और बगल में अपनी भाभी को लेटा देख धीरेधीरे मुसकराने लगा. एकदूसरे को सहलाते और चूमते रहने के बाद देवरभाभी ने जब तक ताकत रही जम कर एकदूसरे के साथ खेले. दोनों को एकदूसरे के साथ लेटे हुए सुबह के 5 बज चुके थे. रीमा जब अपने कमरे में जाने लगी, तो सूरज ने उसे पकड़ कर फिर से घसीट लिया. ‘‘जाने दो न, तुम्हारे भैया जाग गए होंगे,’’ रीमा ने इठलाते हुए कहा. ‘‘अरे भाभी, जाग गए होंगे तो जागने दो न उन्हें. मैं ने तुम्हें पाने के लिए कितनाकुछ किया है. वैसे भी उन को यह सब हमारा प्लान समझ में नहीं आएगा. इतने स्मार्ट नहीं हैं वे,’’ सूरज ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.

सूरज की इस बात पर दोनों ही खिलखिला कर हंसने लगे और रीमा अपनी साड़ी और पल्लू सही कर के अपने कमरे में चली गई, जहां उस का पति बिरज सो रहा था. उस ने एक नजर अपने पति की ओर डाली और उस के माथे को चूम लिया. बिरज ने आंखें खोलीं और कहने लगा, ‘‘रीमा, तुम मुझे कितना प्यार करती हो. रोज मेरे माथे पर चूम कर जगाती हो. मुझे यह बहुत अच्छा लगता है. मैं कितना खुशनसीब हूं, जो मुझे तुम्हारी जैसी पत्नी मिली,’’ यह कह कर बिरज ने रीमा को अपनी बांहों में भर लिया. बिरज और सूरज का कपड़ों का कारोबार था. बिरज बहुत ही सीधा और सज्जन था, जबकि सूरज एक आवारा और गलत संगत में पड़ कर इधरउधर पैसे बरबाद करने वाला लड़का बन गया था. सारा कारोबार बिरज ने ही संभाल रखा था, जबकि सूरज सिर्फ इधरउधर घूमता और दोस्तों पर पैसे लुटाता था. सूरज को एक लड़की से प्यार भी हो गया था, जिस से वह शादी करना चाहता था.

वह लड़की और कोई नहीं, बल्कि बाद में उस की भाभी बन चुकी रीमा ही थी, पर उस समय जब सूरज ने रीमा के घर वालों से अपनी शादी की बात कही तो रीमा के पिताजी ने साफ मना कर दिया था, ‘हम तुम्हारे जैसे आवारा लड़के से अपनी बेटी की शादी नहीं करेंगे.’ पर, सूरज और रीमा के लिए एकदूसरे के बिना रह पाना नामुमकिन था. जब दोनों को अपनी शादी हो पाना मुश्किल लगा, तो दोनों ने आपसी रजामंदी से एक योजना बनाई. हालांकि बिरज और सूरज दोनों सगे भाई थे, पर उन में काफी खुलापन था. लड़कियों को ले कर भी आपस में काफी हंसीमजाक भी चल जाता था. इसी बात का फायदा सूरज ने उठा लिया और अपने मोबाइल फोन में रीमा का फोटो दिखाया. फोटो देखते ही बिरज को रीमा बहुत पसंद आ गई. ‘‘अरे सूरज, यह लड़की तो बहुत खूबसूरत है,’’ बिरज ने उतावला होते हुए कहा. ‘‘हां भैया, खूबसूरत तो है. पसंद हो, तो बात चलाऊं?’’ सूरज ने पांसा फेंका. ‘‘अरे, नहींनहीं. ये सब अच्छी बातें नहीं हैं,’’ बिरज थोड़ा शरमा सा गया. ‘‘अरे भैया, शरमा क्यों रहे हो? यह इस का ह्वाट्सएप नंबर है और चैटिंग शुरू कर दो,’’ सूरज ने एक और दांव फेंका. बिरज सीधासादा लड़का था.

जमाने की हवा उसे लगी नहीं थी, इसलिए उसे सूरज की चाल समझ में नहीं आई. उस ने धीरेधीरे रीमा से फोन पर बातें शुरू कर दीं. रीमा ने भी बिरज को अपने प्रेम में गिरफ्तार कर लिया और जब ऐसा लगने लगा कि वह रीमा के बिना नहीं रह पाएगा, तब उस ने खुद ही अपनी मां से अपने मन की बात कह दी. बिरज के पिता की मौत 4 साल पहले ही हो चुकी थी. बड़े दिनों के बाद बिरज की मां ने उस की आंखों में कोई चमक देखी थी, इसलिए वे बिरज को मना न कर पाईं और शादी के लिए न सिर्फ हां कर दी, बल्कि खुद ही रिश्ता ले कर रीमा के घर पहुंच गईं. रीमा के घर वालों को भी कोई दिक्कत नहीं हुई और जब उन्होंने रीमा का मन टटोला तो उस की भी रजामंदी देख रीमा के घर वालों ने रीमा और बिरज की शादी करा दी. सुहागरात के दिन जब बिरज अपने कमरे में पहुंचा और रीमा का चेहरा देख जब उस ने संबंध बनाना चाहा, तो रीमा ने मना कर दिया. ‘‘क्या आप ने सिर्फ शरीर के लिए मुझ से शादी की है?’’ रीमा ने बिरज से धीरे से पूछा. नई दुलहन से बिरज को ऐसे सवाल की उम्मीद नहीं थी, इसलिए वह एकदम सकपका सा गया. ‘‘नहीं, लेकिन दोस्त कहते हैं कि पहली रात में यह सब जरूरी होता है,’’ बिरज ने शरमाते हुए कहा. ‘‘देखिए, मुझे अभी पढ़ाई करनी है, इसलिए मैं इन सब कामों में नहीं पड़ना चाहती हूं. जब मेरा रिजल्ट आ जाएगा, तभी हमारे बीच में कोई संबंध बन सकेगा,’

’ रीमा ने समझाने वाले अंदाज में कहा. बिरज भोला था. वह रीमा की बातों में आ गया और यही समझता रहा कि रीमा पढ़ाई में बिजी है, इसलिए उस ने फिर संबंध बनाने के लिए जबरदस्ती नहीं की. लेकिन बिरज को क्या पता था कि उस का भाई सूरज ही उस के साथ दुश्मनी कर रहा है. बिरज तो अपने काम में बिजी रहता और रीमा और सूरज जवानी के मजे लूट रहे थे. अब उन लोगों को किसी की परवाह नहीं थी. वैसे भी सूरज और रीमा में भाभीदेवर का रिश्ता था, इसलिए मां को भी शक नहीं हुआ. रीमा कभीकभी डाक्टर को दिखाने को कहती तो बिरज यही कह देता कि आज दुकान पर बहुत काम है. तुम सूरज के साथ चली जाना. फिर क्या था, रीमा और सूरज घर से निकल जाते और किसी होटल में 3-4 घंटे मजे कर के लौट आते. किसी ने सोचा भी न था कि एक प्रेमी जोड़ा अपने प्रेम को कायम रखने के लिए किस कदर गंदे खेल को अंजाम दे सकता है. बिरज और रीमा की शादी को एक साल बीत चुका था,

पर उसे अभी तक रीमा के शरीर का सुख नहीं मिला था. जब बिरज से न रहा गया तो उस ने शरमाते हुए यह बात अपनी मां से बता दी. बिरज की मां को कुछ अजीब सा तो लगा, पर उन्होंने सोचा कि पढ़नेलिखने वाली लड़की है, अभी से बच्चों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती, यह सोच कर उन्होंने उलटे ही बिरज को समझा दिया. एक दिन की बात है. बिरज शाम को दुकान बंद कर के घर लौट रहा था. रीमा के लिए गजरा लेने के लिए वह एक दुकान की तरफ बढ़ा, तभी एक पान की गुमटी के पीछे से सूरज की आवाज आती हुई सुनाई दी, जो अपने दोस्तों के साथ मस्ती कर रहा था. बिरज वहीं रुक कर सूरज की बातें सुनने लगा. एक दोस्त सूरज से कह रहा था, ‘‘अरे भाई सूरज, दिमाग हो तो तेरे जैसा. कैसे अपनी गर्लफ्रैंड को तुम ने अपनी भाभी बना लिया और अब तो जब चाहे जितनी चाहे उतनी बार मौज ले सकता है.’’ ‘‘अरे यार, मैं यह सब नहीं करना चाहता था, पर रीमा का बाप मुझ जैसे आवारा लड़के से अपनी लड़की की शादी करना ही नहीं चाहता था, इसलिए मुझे उस की शादी अपने भैया से करवाने का यह नाटक करना पड़ा,’’ सूरज नशे में सब कहे जा रहा था. बिरज के कानों में मानो किसी ने पिघला सीसा भर दिया था. ‘‘लेकिन… दोस्तो, रीमा भी बड़ी चालाक निकली. उस ने आज तक भैया को अपना शरीर छूने तक नहीं दिया है, पर उसे क्या मालूम कि रीमा के सीने पर मैं कई बार अपनी कलाकारी दिखा चुका हूं और आगे भी दिखाता रहूंगा,’

’ इतना कह कर सूरज जोरजोर से हंसने लगा. अपने खिलाफ इतना बड़ा धोखा होने की उम्मीद बिरज को सपने में भी नहीं थी और जिस तरह से सूरज ने रीमा के लिए गलत बातें कह रखी थीं, उन से बिरज का खून उबाल मारने लगा था. ‘‘बेईमान, कमीने, धोखेबाज, भाई हो कर तू ने भाई को धोखा दिया,’’ चिल्लाते हुए बिरज ने सूरज को एक जोरदार तमाचा मार दिया. अपने दोस्तों के सामने हुई इस बेइज्जती को सूरज सहन नहीं कर पाया और उस ने भी बिरज पर हाथ छोड़ दिया. दोनों भाई आपस में ही लातघूंसे चलाने लगे. सूरज का खून गरम तो था ही, उस पर शराब ने और भी गरमी चढ़ा रखी थी और ये गरमी तब शांत हुई, जब उस ने शराब की टूटी बोतल अपने भाई बिरज के सीने में उतार दी. दर्द से छटपटाता बिरज खून से नहा उठा था और कुछ देर में वह शांत हो गया. उस की मौत हो चुकी थी. सामने भाई बिरज की लाश देख कर सूरज पहले तो घबराया, पर बाद में पुलिस की कार्यवाही और इस झमेले से बचने के लिए उस ने प्लान बनाया. सूरज और उस के दोस्तों ने पुलिस में यह बताया कि कोई लूटने के मकसद से बिरज का खून कर गया है और पर्स, मोबाइल फोन, घड़ी वगैरह भी उन लोगों ने ठिकाने लगा दिया. बिरज अपने हाथ में एक सोने की अंगूठी पहने रहता था, जिस पर सूरज का दिल आ गया,

इसलिए वह अंगूठी सूरज ने पुलिस को न दे कर अपने पास रख ली. पुलिस ने भी सूरज की बात को सच मान लिया और लूट का केस मान कर केस बंद कर दिया. बिरज की मां ने भी अपनी फूटी किस्मत समझ कर आंसू पोंछ लिए. बिरज के मरने के बाद मां एकदम अकेली हो गई थीं और वे रीमा के कमरे में ही सोने लगी थीं. मां के रीमा के साथ में सोने से सूरज और रीमा का बनाबनाया खेल चौपट सा दिखने लगा, क्योंकि अब उन दोनों को जिस्मानी जरूरतें पूरी करने की आजादी नहीं मिल पा रही थी, इसलिए सूरज ने मन ही मन एक दूसरा प्लान बनाया. ‘‘मां, बिरज भैया के जाने के बाद से आप बड़े अशांत रहने लगी हो, आप को शांति मिले, इसलिए चलो, मैं आप को और भाभी को हरिद्वार घुमा लाता हूं. ‘‘कुछ दिन आश्रम में रहेंगे तो मन भी हलका हो जाएगा,’’ सूरज ने मासूमियत भरे लहजे में अपनी मां से कहा. ‘‘अरे बेटा, मैं अब बूढ़ी हड्डियां ले कर कहां जाऊंगी. तुम और रीमा ही हो आओ, मैं यहीं रह कर घर की देखभाल करूंगी,’’ मां ने कहा. अंधे को क्या चाहिए दो आंखें. सूरज और रीमा जो चाहते थे, वही उन को मिल गया. फिर क्या था, दोनों ने खूब रुपयापैसा इकट्ठा किया और निकल पड़े शांति की तलाश में.

पहले तो शहर में जा कर उन्होंने होटल में कमरा लिया और जी भर कर अपने जिस्मों की प्यास बुझाई. इधर सूरज की मां घर में अकेली होने के चलते घर की साफसफाई में लग गईं. सफाई के दौरान उन्हें सूरज के कमरे की अलमारी में बिरज की वह अंगूठी मिली, जो सूरज उस को मारने के बाद ले आया था. अचानक से बिरज को लूट लिया जाना, जबकि बिरज कई सालों से उस रास्ते से आताजाता था और आज अचानक से बिरज की अंगूठी का सूरज की अलमारी में मिलना मां के दिल में शक सा पैदा कर गया. मां ने कमरे को और खंगाला तो पाया कि उस की बहू रीमा की चुन्नी भी सूरज के कपड़ों में मिली. मां समझ गई कि क्या मामला है. लेकिन, वे कर क्या सकती थीं. उन्होंने सूरज के दोस्तों को घर पर बुलाया और बातोंबातों में सारा भेद उगलवा लिया. अब उन के पास एक ही उपाय था, दोनों की शादी कर देना, ताकि देवरभाभी का खेल किसी को पता नहीं चले. मां को मालूम था कि अब रीमा के मातापिता भी कुछ न कहेंगे, क्योंकि वे विधवा बेटी का बोझ क्यों संभालेंगे. Hindi Story

Bihar Election 2025: लीडर फेस की जरूरत क्यों?

Bihar Election 2025: बात लोकसभा चुनाव की हो या फिर विधानसभा चुनाव की, हर बार यह रणनीति बनाई जाती है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का फेस कौन होगा? बिहार चुनाव के पहले राजग और महागठबंधन में इस बात की होड़ लगी थी कि कौन उन का सीएम फेस होगा? भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाले राजग में प्रमुख दल जदयू नेता नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री है. उन की अगुआई में ही बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा जाएगा. भाजपा के नेता, रणनीतिकार और देश के गृहमंत्री अमित शाह ने नीतीश कुमार के सीएम फेस पर कहा कि ‘सीएम फेस का चुनाव बाद में होगा?’

भाजपा और राजग के नेता बारबार यह सवाल उठा रहे थे कि महागठबंधन का सीएम फेस कौन होगा. इस के पीछे की वजह यह जानना नहीं था कि राजद नेता तेजस्वी यादव को कांग्रेस सीएम फेस के रूप में आगे करेगी या नहीं, उन की रणनीति यह थी कि सीएम फेस के बहाने महागठबंधन में झगड़े होने लगें और वह चुनाव न जीत सके. कांग्रेस ने तेजस्वी यादव को सीएम फेस घोषित कर के महागठबंधन को कमजोर होने से बचा लिया. सवाल उठता है कि आखिर सीएम फेस घोषित करने की जरूरत क्यों होती है?

देश में लोकतंत्र है, यहां जनता जिस को चुन कर भेजेगी वही मुख्यमंत्री बनेगा. फिर चुनाव से पहले ही सीएम-पीएम फेस के घोषित करने की जरूरत क्यों पडती है? राजतंत्र में यह होता है कि राजा अपना उत्तराधिकारी चुनता है. लोकतंत्र में धर्म के प्रभाव के चलते हर बार एक चमत्कारी नेता की तलाश होती है. धर्म हमें चमत्कार के बारे में बताता है. वह यह चाहता है कि हमारा चमत्कारों में यकीन बना रहे. रामायण और महाभारत में यही सिखाया गया कि भगवान अवतार लेंगे, वही जनता का भला करेंगे.

धर्म का प्रभाव ऐसा पड़ा कि संविधान से अलग राजनीति में चमत्कारी लीडर की जरूरत होती है. बिना चमत्कारी लीडर के राजनीतिक दल आगे बढ नहीं पाते. देश के आजाद होने के बाद कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू को चमत्कारी नेता के रूप सामने किया. इस के बाद यह व्यवस्था आगे बढती रही. कांग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी चमत्कारी नेता के रूप में सामने पेश किए जिन के बिना कांग्रेस की कल्पना ही नहीं की जा सकती.

दूसरी तरफ भाजपा की कल्पना बिना आरएसएस के नहीं हो सकती. हर चुनाव में इस बात को पुख्ता किया जाता है कि जब तक चुनाव में भाजपा के पीछे आरएसएस यानी संघ की ताकत नहीं लगेगी, पार्टी चुनाव नहीं जीतेगी. भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेई 3 बार देश के प्रधानमंत्री बने. पहली बार 13 दिन, दूसरी बार 13 माह और फिर तीसरी बार 5 साल वे प्रधानमंत्री रहे. इस के बाद भी उन की गिनती चमत्कारी नेता के रूप में नहीं बन पाई.

2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. उस के बाद भाजपा का सारा प्रयास उन को चमत्कारी नेता के रूप में प्रस्तुत करने का रहा. अब चाहे देश का चुनाव हो या प्रदेश का या फिर गांव और महल्ले का, बिना नरेंद्र मोदी के वह पूरा नहीं माना जा रहा. अब प्रदेश के चुनाव में भी वहां ऐसे ही चमत्कारी नेता की तलाश रहती है. यही वजह थी कि बिहार में महागठबंधन को तेजस्वी यादव को अपना सीएम फेस घोषित करना पडा. यह संविधान और समाज दोनों की अवधारणा के खिलाफ है. लोकतंत्र का मतलब होता है सामूहिक जिम्मेदारी, जिस में जनता के चुने प्रतिनिधि ही सरकार चलाने का काम करते हैं. मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री जैसे पद केवल व्ययवस्था चलाने के लिए हैं. वैसे, देखें तो यह केवल मंत्री जैसे ही हैं.

संविधान ने मुख्यमंत्री पद पर क्या कहा?

संविधान में मुख्यमंत्री के फेस को ले कर कोई बडी भूमिका नहीं दी गई है. जो प्रक्रिया प्रधानमंत्री चुने जाने की है वही मुख्यमंत्री की मान ली गई है. संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार राज्यपाल राज्य विधानसभा में बहुमत दल के नेता को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करते हैं. सब से पहले बहुमत प्राप्त करने वाले दल के विधायक अपना नेता चुनते हैं. यह नेता ही मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनता है. अगर किसी एक दल को बहुमत हासिल नहीं होता है तो राज्यपाल अपने विवेक का उपयोग कर के किसी ऐसे नेता को आमंत्रित कर सकते हैं जो सदन में अपना बहुमत साबित कर सके. राज्यपाल बहुमत की पुष्टि होने पर उस नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करते हैं.
चमत्कारी लीडर की तलाश में कई बार राजनीतिक दल उन नेताओं को मुख्यमंत्री घोषित कर देते हैं जो विधानसभा या विधान परिषद दोनों सदनों के सदस्य नहीं रहते हैं. यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ राजनीतिक दलों की चाल जैसी है. संविधान कहता है कि विधायक या सांसद अपना नेता चुनेंगे. ऐसे में राजनीतिक दल उस को मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री कैसे बना सकते हैं जो उन सदनों का सदस्य ही न हो. मुख्यमंत्री के रूप में कई बार यह देखा गया है कि उस नेता को सीएम घोषित किया जाता है जो सदन का सदस्य ही नहीं होता है.

संविधान पर हावी पार्टीतंत्र!

आवश्यक यह होता है कि मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठने वाले को 6 महीने के भीतर राज्य विधानमंडल (विधानसभा या विधान परिषद) का सदस्य बनना आवश्यक होता है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को जब 2017 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया तो वे विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य नहीं थे. यही नहीं, उन के साथ डिप्टी सीएम बने केशव प्रसाद मौर्य और डाक्टर दिनेश शर्मा भी विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य नहीं थे. अब भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनाव जीत कर आए विधायकों में से एक भी ऐसा नहीं मिला जिस को वह मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री बना सके.

योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के सांसद थे. वे लगातार 5वीं बार गोरखपुर से लोकसभा चुनाव जीत रहे थे. विधानसभा चुनाव वे कभी नहीं लडे थे. केशव प्रसाद मौर्य फूलपुर लोकसभा सीट से सांसद थे. डाक्टर दिनेश शर्मा राज्यसभा के सदस्य थे. इन तीनों के लिए यह आवश्यक था कि वे 6 माह के भीतर विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य बनें. पार्टी ने अपने इन तीनों ही नेताओं को उन के सांसद पद से इस्तीफा दिलवा कर व विधान परिषद के सदस्य बना कर मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के पद पर बनाए रखा. पार्टियों ने इस नियम का रास्ता निकाल लिया कि मुख्यमंत्री बनने के लिए नेता को विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य होना चाहिए.

25 जुलाई, 1997 को जब बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में शमिल होने के कारण मुख्यमंत्री की कुरसी छोडनी पडी तो सब से बडा सवाल उठा कि अब बिहार का मुख्यमंत्री कौन होगा? लालू प्रसाद यादव जानते थे कि यदि उन की जगह किसी और ने मुख्यमंत्री की कुरसी संभाली तो वापस सत्ता पाना मुश्किल हो जाएगा और उन की पार्टी बिखर जाएगी. लालू प्रसाद यादव के बच्चे उस समय इस काबिल नहीं थे कि उन को कुरसी सौंपी जा सके. ऐसे में लालू को भी एक चमत्कारी चेहरे की जरूरत थी जो न केवल मुख्यमंत्री की कुरसी बल्कि पार्टी और बिहार को भी संभाल सके.

तब लालू प्रसाद यादव ने अपनी पत्नी राबडी देवी का नाम आगे बढाया. राबडी देवी का राजनीति से कोई लेनादेना नहीं था. न ही वे बिहार में विधानसभा या विधान परिषद की सदस्य थीं. मुख्यमंत्री बनने के बाद राबडी देवी ने विधान परिषद् की सदस्यता ली. इस के बाद वे राघवपुर विधानसभा सीट से चुनाव लडी और विधायक बनीं. झारखंड में भी यही हुआ. 2024 में मनीलौंड्रिंग केस में जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जेल गए तो अपने बेहद करीबी चंपाई सोरेन को झारखंड का मुख्यमंत्री बना दिया. 5 माह बाद जब हेमंत सोरेन जमानत पर बाहर आए तो चंपाई सोरेन ने मुख्यमंत्री की कुरसी छोड दी और हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री बन गए.

संविधान से अलग राजनीतिक दलों ने मुख्यमंत्री बनाने के पीछे उस चेहरे को देखना शुरू किया जो चमत्कारी जीत दिला सके. कई बार जीत दिलाने वालों को भी पार्टीतंत्र मुख्यमंत्री नहीं बनाता. उत्तर प्रदेश में किसी कांग्रेसी नेता ने 5 साल तक मुख्यमंत्री की कुरसी नहीं सभाली. 1980 के दशक में कांग्रेस का मुख्यमंत्री 2 साल से अधिक पद पर रहने नहीं दिया गया. 5 साल मुख्यमंत्री रहने वालों में पहला नाम मायावती, दूसरा नाम अखिलेश यादव और तीसरा नाम योगी आदित्यनाथ का है. 5 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद दूसरे कार्यकाल में बहुमत से सरकार बनाने वालों में योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री हैं.

इस से यह पता चलता है कि मुख्यमंत्री की कुरसी के लिए किसी फेस को रखने की जरूरत नहीं होती है. मुख्यमंत्री भी केवल मंत्री जैसा होता है. महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस कभी मुख्यमंत्री रहे तो कभी डिप्टी सीएम और फिर सीएम. यही एकनाथ शिंदे के साथ दोहराया गया. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चैहान पार्टी को चुनाव जिता कर लाए लेकिन मुख्यमंत्री बन गए मोहन यादव. मुख्यमंत्री की कुरसी पार्टी की मुहताज है. संविधान का कोई दखल नहीं रह गया है.

बिहार का चुनाव नीतीश कुमार ने नाम पर लडा जा रहा लेकिन यह तय नहीं है कि वे मुख्यमंत्री होंगे भी. सपा-बसपा-राजद-टीएमसी जैसे दलों में यह तय है कि अगर वे सरकार बनाते हैं तो मुख्यमंत्री कौन होगा. जनता के मन में हमेशा यह चाहत रहती है कि कोई चमत्कारी नेता आए और वह चुनाव जिता सके. कई साल पहले दिल्ली की जनता ने अरविंद केजरीवाल में यह छवि देखी और उन को चुनाव जिता दिया.

असल में मुख्यमंत्री का काम मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करना होता है. कई मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल की सलाह की जगह अपने फैसले ही चलाते हैं. यह संगठनात्मक रूप से काम करने की शैली नहीं है. मुख्यमंत्री मंत्रिमंडल का मुखिया होता है जो राज्य सरकार का प्रमुख होता है. वह सरकार की नीतियों को लागू करने, कानूनों को बनाए रखने और राज्य के प्रशासन का मार्गदर्शन करने के लिए जिम्मेदार होता है. वह राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है. वह राज्यपाल को विधानसभा का सत्र बुलाने या स्थगित करने की सलाह देता है. किसी भी समय राज्यपाल को विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर सकता है.

मुख्यमंत्री के फेस पर बहस पूरी तरह से बेमानी बात होती है. इस के फेस में चमत्कारी चेहरा देखने की जगह पर उस चेहरे को देखना चाहिए जो सब को साथ ले कर चल सके. केंद्र और प्रदेश के बीच काम कर सके. यह काम कोई भी अनुभवी और अच्छा नेता कर सकता है. ऐसे में चुनाव के पहले सीएम फेस की बहस केवल दूसरे पक्ष को नुकसान पहुंचाने, उन के अंदर फूट डालने के लिए होती है. इस का प्रदेश के विकास और शासन व्यवस्था से कोई बहुत मतलब नहीं होता है. जनता नेताओं से चमत्कार की उम्मीद करती है जिस में उस के हाथ निराशा ही आती है.

Story In Hindi: साग और मेथी वाला टोडा – बीबी की सांस फूल रही थी

Story In Hindi: ‘‘ले भोलू, साग खा ले मेथी वाले टोडे (मक्की की रोटी) के साथ, अपने हाथ से बना कर लाई हूं,’’  मुड़ेतुड़े पुराने अखबार के कागज में मक्की से बनी रोटियां और स्टील के डब्बे में सरसों का साग टेबल पर रखते हुए बीबी बोली. उस की c. चेहरे से वह कुछ परेशान और थकीथकी सी दिख रही थी.

‘‘पैरी पैणा,’’ बीबी के अचानक सामने आते ही वह कुरसी से आदर सहित खड़ा हो गया.

‘‘पैरी पैणा बीबीजी,’’ उस के पास बैठे उस के मित्र ने बीबी को न जानते हुए भी बड़े सत्कार से कहा.

‘‘जीते रहो मेरे बच्चो,’’ बीबी ने भोलू के सिर पर हाथ फेरा, फिर मातृत्व वाले अंदाज में उस का माथा चूम लिया और प्यार से उसे अपने सीने से लगा लिया. फिर उस के समीप बैठे उस के मित्र के सिर पर हाथ फेरा. इतने में औफिस का चपरासी बीबी के लिए कुरसी ले आया. बीबी कुरसी के उग्र भाग पर ऐसे बैठी जैसे अभी उठने वाली हो.

‘‘बीबी, आराम से बैठ जाओ,’’ भोलू ने आग्रहपूर्वक कहा. औफिस का वातावरण एकदम ममताभरी आभा से सराबोर हो उठा. हर चीज जैसे आशीर्वाद के आभामंडल से जगमगा उठी.

‘‘बीबी, और सुनाओ, क्या हालचाल है आप का?’’

‘‘बस, ठीक है पुत्र, तुम सुनाओ अपना, मेरी बहूरानी और बच्चों का क्या हाल है?’’

‘‘बीबी, सब ठीक हैं, बच्चे और तुम्हारी बहूरानी भी.’’

‘‘बड़ा काका अब क्या करता है, बेटा?’’

‘‘बीबी, इंजीनियरिंग कर रहा है.’’

‘‘अच्छा है, और छोटा?’’ बीबी ने बड़ी आत्मीयता से पूछा.

‘‘बीबी, वह अभी 12वीं कर रहा है.’’

‘‘भोलू, तुम्हें मां की तो बहुत याद आती होगी?’’ बीबी ने चेहरे पर संवेदना लाते हुए पूछा.

‘‘हां, बीबी, बहुत याद आती है मां की, मेरी मां बहुत अच्छी थी. उस के जैसा कोई नहीं है, बीबी. मेरा छोटा बेटा भी मां को बहुत याद करता है. बहुत स्नेह था उस का दादी से. अब भी वह अकसर दादी को याद कर के आंख भर लेता है,’’ भोलू ने भावुकता से कहा.

‘‘बहुत अच्छी थी तुम्हारी मां, भोलू. बहुत प्यारसत्कार था उस के पास. बंदे को पहचानने वाली औरत थी. बहुत दूर की नजर रखती थी,’’ बीबी ने अंतहीन दृष्टि से औफिस की दीवार पर लगी घड़ी को ताकते हुए कहा.

‘‘हां बीबी, यह तो आप ने ठीक कहा. जो उस से एक बार मिलता, वह उसे कभी भी न भूल पाता,’’ भोलू लगातार बीबी से बतियाता रहा. पास बैठा उस का मित्र मुंह से कुछ भी ना बोला. बस, उन की बातें सुनता रहा. उसे ऐसी बातों में बहुत आनंद आ रहा था. उस ने ऐसी बातें पहले कभी नहीं सुनी थीं. औफिस का वातावरण कमाल का था. किसी का मन भी वहां से जाने को न था.

‘‘बीबी और सुनाओ, मेहर कैसा है?’’

‘‘ठीक है, पुत्र काम पर जाता है अब.’’

‘‘कहां जाता है काम पर, बीबी?’’

‘‘एक धार्मिक स्थल पर सेवादार का काम करता है. सुबह 8 बजे जाता है और शाम को 6 बजे घर लौटता है.’’

‘‘बीबी, अब तो शराब नहीं पीता होगा, मेहर?’’

‘‘नहीं पुत्र, अब नहीं पीता.’’

‘‘चलो, अच्छा है, अपना घर संभालता है.’’

‘‘हां पुत्र’’ बीबी कुछ देर खामोश रही. फिर थोड़ी देर बाद बोली,‘‘बहुत दुख देखे थे तुम्हारी मां ने बेटा. तुम ने भी बहुत मेहनत की थी अपनी मां के साथ. बच्चे अच्छे हों तो मांबाप का जीवन सफल हो जाता है, बेटा. जीवन ही नहीं, बल्कि उन का मरना भी सार्थक हो जाता है,’’ बीबी भावनाओं के समंदर में डूबती जा रही थी.

‘‘हां बीबी, यह बात तो ठीक है.’’

‘‘चलो, तेरी मां इस बात से तो सुख की सांस ले कर गई है इस दुनिया से, अशके पुत्र अशके तेरे,’’ बीबी ने गर्व से गरदन उठा कर कहा.

‘‘बीबी, बहुत मुश्किल से छुड़वाई थी तुम ने मेहर की शराब, कितना इलाज करवाया था तुम ने उस का.’’

‘‘हां पुत्र, बहुत बुरे दिन देखे हैं. लेकिन हालातों के आगे तो किसी की भी नहीं चलती है न. बेटा, बिना मर्द के इस दुनिया में जीना बहुत कठिन है. उस पर यदि औलाद अच्छी न निकले, तो फिर पूछो मत कि क्या गुजरती है. मैं बता नहीं सकती. मु झे मालूम है कि मैं ने कैसे समय बिताया है. अनपढ़ औरत थी मैं. भरी जवानी में विधवा हो गई. मत पूछो, पुत्र.’’

‘‘हां, यह तो ठीक है, बीबी.’’

‘‘हां पुत्र, लेकिन सफेद लिबासों में भेडि़ए ही फिरते हैं. मैं ने देखा है उन दरिंदों को. ये वो लोग हैं जो इंसानियत के दुश्मन हैं और समाज को खोखला कर रहे हैं. ये वो लोग हैं जो अपने थोड़े से फायदे के लिए लोगों को मौत के मुंह में  झोंक देते हैं.’’

‘‘हां बीबी, यह तो तुम ने ठीक कहा.’’

‘‘यही वे लोग हैं जिन्होंने मेहर को नशे की आदत लगा दी थी. मैंबर तो थे ये धार्मिक स्थल के और मेहर से काम करवाते थे घर का और थोड़ी पिला कर देररात तक काम करवाते रहते. बस वहां लग गई उस को नशे की लत,’’ बीबी व्यथित हृदय से सारी बातें बताती रही और अपना मन हलका करती रही. बीबी की बातों से ऐसा लग रहा था जैसे आज तक किसी ने भी उस का दुख सुना न हो. बातें करतेकरते बीबी की आंखें भर आईं. वह ऐसे बातें कर रही थी जैसे किसी अपने हमदर्द से बातें कर रही हो. भोलू उस की बातें बड़ी आत्मीयता से सुन रहा था.

भोलू को याद है जब वह छोटा सा था तो बीबी उस के घर दूध ले कर आया करती थी क्योंकि मेहर का बाप कुछ वर्ष पहले मर चुका था. मेहर के अलावा उस की 2 लड़कियां भी थीं. एक मेहर से बड़ी और एक छोटी. थोड़ा बड़ा होने पर मेहर दूध ले कर आने लगा था.

भोलू की मां और बीबी के बीच बहुत अच्छा रिश्ता बन गया था. दोनों विधवा थीं. दोनों का दुख एकजैसा ही था. दोनों का परिवार जीवन के बड़े संघर्षों से गुजर रहा था. आहिस्ताआहिस्ता भोलू ने अपने पिता के कारोबार को संभाल लिया और मेहर किसी धार्मिकस्थल में सेवादार के काम पर लग गया. औफिस का वातावरण अभी भी मोहममता की सुगंध से महक रहा था.

‘‘बीबी, बहूरानी के बारे में सुनाओ, ठीक है, सेवा करती है आप की?’’

‘‘बहूरानी तो ठीक है, घर अच्छे से संभालती है, मेरी सेवा भी बहुत करती है पर…?’’

‘‘पर क्या?’’ भोलू ने बीबी के कंठ में रुकी आधीअधूरी बात को निकालने का प्रयत्न करना चाहा.

‘‘क्या बताऊं, बेटा…’’ वह कुछ रुकी, फिर बोली, ‘‘क्या बताऊं, मेरी लड़कियों से नहीं बनती उस की,’’ बीबी यह बोलतेबोलते एकदम दुखी सी हो गई.

‘‘बीबी, फिर क्या हुआ, दुखी मत हो, अपना घर तो संभालती है न, तेरे पोतेपोतियों को तो संभालती है न, तेरे बेटे से तो ठीक है न,’’ भोलू ने बीबी को सांत्वना देते हुए कहा.

‘‘पुत्र, अपने जायो से तो प्यार जानवर भी करते हैं, मजा तो तब है जब दूसरों के लिए कुछ किया जाए,’’ बीबी कर्कश स्वर में बोली.

‘‘चलो बीबी, फिक्र न किया करो.’’

‘‘नहीं पुत्र, उस की मेरी बेटियों से नहीं बनती, यह सोच कर मेरा मन बहुत दुखी होता है, वे कौन सा इस से कुछ मांग रही हैं, कुदरत का दिया सबकुछ तो है उन के पास. दो बोल ही तो बोलने होते हैं मीठे. और क्या चाहिए उन को. सारी जमीनजायदाद तो दे दी उन्होंने लिख कर इन को, फिर भी ऐसा हो तो किसे बुरा न लगेगा, भला?’’ बीबी प्रश्नचिह्न चेहरे पर लाते हुए बोली. उस की आंखों से जैसे नाराजगी के दो मोती छलकने को ही थे.

‘‘बीबी, तू चिंता मत किया कर, तेरी बेटियां अपने घर में सुखी हैं न, और तुम्हें क्या चाहिए?’’

‘‘हां बेटा, छोटा जमाई थोड़ा गुस्से वाला है पर फिर भी ठीक है, रोटी तो कमा कर खिला रहा है न.’’

‘‘चलो बीबी, आहिस्ताआहिस्ता सब ठीक हो जाएगा, चिंता मत किया करो.’’

‘‘पुत्र, घर से बेटियां अगर नाराज हो कर जाएं तो तुम्हें क्या पता कि मां के दिल पर क्या बीतती है,’’ बीबी की आंखों में अटके आंसू आखिर छलक ही पड़े.

‘‘बीबी, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा,’’ भोलू ने बीबी को सांत्वना देते हुए कहा.

‘‘माताजी, चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा, अच्छा बीबी, पैरी पैणा,’’ भोलू के पास बैठे उस के दोस्त से भी जैसे रहा न गया. इतना कह वह वहां से चला गया. उस के बोलने से माहौल में कुछ बदलाव आया.

‘‘भोलू, चल साग और मेथीवाला टोडा (मक्की की रोटी) खा ले अब, मैं खुद अपने हाथों से बना कर लाई हूं. बहूरानी तो काम कर रही थी, मैं ही जल्दीजल्दी बना लाई. सोचा, आज भोलू से मिल कर आती हूं. बहुत मन कर रहा था तुम से मिलने का,’’ बीबी अपनी सारी परेशानियों से बाहर आ कर बोली, ‘‘अच्छा पुत्र, चलती हूं, बहुत देर हो गई, बहूरानी इंतजार करती होगी,’’ बीबी दुपट्टे से अपनी आंखें पोंछती हुई बोली.

‘‘साग टोडा मु झे बहुत स्वादिष्ठ लगता है,’’ भोलू ने टोडे वाले मुड़ेतुड़े अखबार वाले पैकेट और साग वाले डब्बे की सुगंध लेते हुए कहा.

‘‘बेटा, मां के हाथ का है, स्वाद क्यों नहीं होगा?’’

‘‘बीबी, सच बता, मेहर अब कोई नशा तो नहीं करता न?’’

‘‘रहने दे, परदा ही रहने दे, बेटा. क्या बताऊं, अब तुम से क्या छिपाना, पता नहीं कहां से गोलियां ले कर खाता है नशे की. अब मैं क्या करूं?’’ बाहर खड़े मेहर के स्कूटर पर बैठने से पहले बीबी ने भोलू के कान मे पास आ कर कहा. भोलू दूर तक बीबी को स्कूटर पर जाते हुए देखता रहा. भोलू के मस्तिष्क की दूरी में कुछ चलता रहा जिसे भोलू हल करने का प्रयास करता है. पर नशे पर किसी का बस काबू है? जो एक बार फंस गया, निकल ही नहीं पाता. Story In Hindi

Short Hindi Story : बीती को बिसार दे

लेखक – सुनील चंद्र जैन,
Short Hindi Story :  
मेनी ने 200/- रुपए देकर कहा-

अंकल आपके साथ किला देखकर मन को बहुत सुकून और जानकारी मिली। वैसे आप ये गाइड का काम कब से कर रहे हैं?

रमेश जी के चेहरे पर हल्की मुस्कान तैर गई।

रमेश जी ने (बात को टालते हुए) कहा- अगर जिंदगी रही तो फिर किसी किले के इतिहास को कुरेदते हुए मिल जाउंगा। शुभ यात्रा।

इतना कह कर रमेश जी चाय की दूकान की ओर बढ़ गए।

दिन के साढ़े बारह बजने वाले थे। काफी थकान हो गई थी, मजाक-मजाक में गाइड बनने से 1000/-रुपये बुरे नहीं थे।

चाय समाप्त हो चुकी थी। उठने का मन नहीं हो रहा था। यह दिन की दूसरी चाय थी। एक चाय और पीने का मन हो गया।  इतने में भटकंतियों का एक झुंड आ गया और वह भी चाय पीने लगा। जिनको रमेश जी किला दिखाकर आए थे, वे भी वहीं आकर खड़े होकर चाय पीने लगे। मेनी भी उन किला देखने वालों में शामिल थी। रमेश जी को सामने देखकर प्रश्न कर डाला-

अंकल घर नहीं जाना क्या?

रमेश जी ने फिर मुस्कराए! चुप रहना उचित समझा।

लेकिन मेनी चुप नहीं रही।

मेनी ने कहा-अंकल कभी राजस्थान जाओ देखना वहां पर कितने भव्य किले हैं।

इस बार रमेश जी चुप नहीं रह सके।

रमेश जी- हां मैंने अधिकांश किले देखे हैं।

मेनी ने कहा-अगर फुरसत हो तो आमेर के किले के बारे में बताइए ना?

रमेश जी ने टालते हुए कहा- अभी थका हुआ हूं, फिर कभी बताउंगा। अभी भोजन करने की सोच रहा हूं।

इतना कह कर रमेश जी उठ कर चल दिए।

जो नया युवाओं का झुंड आया था, उसमें से एक लड़की ने मेनी से पूछा कौन हैं, ये अंकल?

मेनी ने कहा-गाइड हैं, बहुत बढ़िया एक्सप्रेस करते हैं। अभी हमको पन्हाला का किला दिखाकर लाए हैं।

जिस लड़की ने पूछा था, उसका नाम अनीता था, लेकिन सब उसे मीता कहते थे।

मीता, दौड़कर रमेश जी को पीछे होकर आवाज देने लगी-

अंकल-अंकल रुको….. रमेश जी ठिठक गए।

मीता ने कोई भूमिका नहीं बनाई और बोली मेरा नाम अनिता है सभी प्यार से मुझे मीता पुकारते हैं। मैं इन लोगों के साथ आई हूं। मुझे और इनमें से किसी को मराठी नहीं आती है। आप मेरे साथ आइए एक दो मिनट आपसे बात करना चाहते हैं।

रमेश जी न चाहते हुए वापस चाय वाले की दूकान की कुर्सी पर बैठ गए।

मीता ने अपने सााथियों से कुछ विचार-विमर्श किया और तय करके कहा-

क्या अंकल आप हमें पन्हाला का किला दिखा देंगे? मुझे मालूम है, आप काफी थके हुए हैं, लेकिन हमारी खातिर प्लीज हम आपकी फीस दे देंगे।

मीता देखने में गेंहुआ रंग, बाल कमर तक लहरा रहे थे, नाक नक्श तीखा, लम्बाई करीब साढ़े पांच फुट और वाक पटु इतनी कि चलते आदमी के बाल नोच ले। अपनी वाक पटुता के कारण वह ग्रुप की लीडर बनी हुई थी।

रमेश जी ने काफी सोचा और मीता और उनके साथ वालों के चेहरों के हाअ भाव देखते रहे।

रमेश जी ने कहा-एक शर्त है, मैं पहले खाना खाउंगा उसके बाद आपके साथ चलूंगा। तब तुम पानी की दो-तीन बाटल ले लो। हां एक बोतल मेरे लिए भी रख लेना। मैं बुड्ढा आदमी हूं इसलिए धीरे-धीरे किले पर चढ़ पाउंगा और लौटने में अंधेरा होने की संभावना है।

सभी ने एक स्वर में कहा- ठीक है अंकल आप खाना खाओ तब तक हम अपनी चाय का कोटा पूरा करते हैं। पानी तथा हल्का नाश्ता रख लेते हैं।

रमेश जी कोई पेशेवर गाइड नहीं थे। बल्कि वे स्वयं पर्यटक थे। किले घूमने के शौक ने पचासों किलों का इतिहास पढ़ने पर मजबूर कर दिया था। यही वजह थी कि जब वे कोल्हापुर पन्हाला का किला देखने के लिए निकले तो उसका इतिहास कंठस्थ करके आए थे, जिससे देखने का आनंद दोगुना हो सके। आर्थिक रूप से सम्पन्न, लेकिन आज शौकिया तौर पर गाइड बन गए। उनके परिवार में पत्नी, बेटा, दो बेटियां, नाती-पोते सभी थे। एक अच्छे आॅफिस से रिटायर थे। घूमने का शौक था। पेंशन से घर और घूमने का खर्च आसानी से निकल जाता था। आज मूड ही मूड में गाइड बन गए। बच्चे छोटे हों या बड़े उनके साथ बात करना अच्छा लगता था। इससे मन को असीम शांति मिलती थी, विशेष रूप से उन बच्चों के साथ जिनके मन में कोई लालच या छलकपट न हो। कोई उन्हें मूर्ख न समझे।

इस बार घर वालों ने बड़ी मुश्किल से छोड़ा था। घर में अगले महीने शादी थी, उसमें शामिल होना जरूरी था। लेकिन रमेश जी जब ठान लेते हैं तो उसे पूरा करके ही छोड़ते हैं। इस बार वे खुद जाकर रिजर्वेशन करवाकर आए थे। वैसे ये सारे काम उनका बेटा  करता है।

खाना खाने के बाद वे वापस चाय की दूकान पर पहुंच गए। वे सभी बच्चे उनका इंतजार कर रहे थे। मीता तो कुछ ज्यादा चहक रही थी। वह रमेश जी के बारे में बहुत कुछ जानने को उत्सुक थी। रमेश जी उससे बचने की पूरी कोशिश कर रहे थे। शिवाजी के किले हों और उसमें दुर्गमता न हो ऐसा हो नहीं सकता? रमेश जी उम्र के हिसाब से धीरे-धीरे चल रहे थे। एक दो बार उन्होंने रुकने के लिए कहा। जब मुख्य द्वार पर पहुंचे और वहां किले के बारे में धारा प्रवाह 15 मिनट बोले तो सभी सन्न रह गए। इतना सोचा भी नहीं था, इतनी जानकारी मिलेगी। इन पन्द्रह मिनट में रमेश जी तरोताजा हो गए। आगे बढ़े, लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब उनहोंने मीता के हाथ में अपना हाथ देखा। उन्होंने छुड़ाने की भरसक कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे।

मीता-अंकल मैं हूं ना! आप मेरे साथ, मेरा हाथ पकड़कर चलिए।

रमेश जी शारीरिक रूप से इतने भी कमजोर नहीं थे। मीता ने जो हाथ पकड़ा तो किले हर छोर पर, हर स्थान पर उसने हाथ नहीं छोड़ा। रमेश जी पूरे सफर में असहज ही रहे। मीता ने कई बार उनसे उनके बारे में, उनके अकेलेपन के बारे में, अकेले घूमने के बारे में पूछना चाहा, लेकिन वे हर बार टाल गए। इससे मीता की जिज्ञासा और बढ़ती गई।

आखिरकार किले का सफर पूरा हो गया था। सभी ने रमेश जी को कंट्रीब्यूट करके रुपये दे दिए, लेकिन मीता की उन्हें अलग से और रुपये देने की पेशकश को सभी मान गए। रमेश जी ने साफ कड़े शब्दों में मना कर दिया। सबके अति आग्रह के कारण उन्हें  होटल का नाम और कमरा नम्बर बताना पड़ा। कब तक कोल्हापुर में रुकेंगे यह भी बताना पड़ा।

दूसरे दिन रमेश जी 8 बजे सोकर उठे। अभी गुशल करके बैठे ही थे, दरवाजे पर दस्तक हुई।

रमेश जी ने कहा-ठीक है आ जाओ और पहले चाय का बोल देना।

उनके सामने मीता खड़ी थी।

रमेश जी अकबका गए। साॅरी बोला और अंदर आने के लिए कहा। वे उठकर बेल बजाने वाले ही थे कि मीता ने उन्हें रोक दिया।

मीता ने कहा- मैं चाय और नाश्ते का आर्डर देकर आई हूं। मैं आज आपके साथ यहां पर रंकाला झील, महालक्ष्मी मंदिर और न्यूपेलेस देखना चाहती हूं।

रमेश जी ने पूछा-बाकी सब कहां हैं?

मीता ने कहा- वे सब आज पुणे जा रहे हैं। मेरे साथ कोई साथी नहीं है, मैं आपके साथ ही घूमकर पुणें जाउंगी। तत्काल में सीट बुक करके गुरूग्राम निकल जाउंगी। मैं वहीं जाॅब करती हूं।

रमेश जी की हालत पतली थी। उनका एकांत, उनका चिन्तन-मनन और लेखन धरा का धरा रह जाएगा।

रमेश जी ने टालते हुए कहा-मैं यहां के अलावा दो-तीन जगह और जाउंगा। एक दो मंदिर हैं और कुछ पर्यटन स्थल हैं। ऐसा करो कोल्हापुर घूम कर तुम पुणे निकल जाओ। पुणे के लिए बसों की अच्छी सुविधा है।

मीता ने कुछ नहीं कहा-बस हां में सिर हिला दिया।

शाम तक कोल्हापुर के सभी दर्शनीय स्थान घूम  चुके थे। मीता ने पुणे जाने से साफ इन्कार कर दिया और रमेश जी के साथ पंढरपुर जाने का तय कर लिया।

मीता ने कहा-मैं कहीं नहीं जाउंगी आपके साथ ही पुणे जाउंगी। पुणे में मुझे सिंहगढ़ का किला देखना है। उसकी कमेंटी आपको करनी पड़ेगी।

रमेश जी को सफेद बालों पर खतरा मंडराता नजर आने लगा। आखिरकार मजबूरन पंढरपुर होते हुए पुणे जाने का मन बनना पड़ा। रात करीब 10 बजे पंढरपुर की बस से रवाना हुए। रमेश जी का अकेले आराम से बैठने का सपना चूर-चूर हो गया। वे सीट पर सिमटे से बैठे थे। कुछ ही देर में मीता नींद में और रमेश जी विचारों में।

आखिर ये लड़की कौन है? ये मुझसे क्या चाहती है? कहीं किसी फ्राॅड में फंसाना तो नहीं चाहती? पता नहीं किस गिरोह की है? इन्हीं विचारों में झपकी लग गई। अचानक जोरदार बे्रेक लगने से रमेश जी नींद और विचार तंद्रा टूट गईं। मीता और सटकर बांह पकड़कर गहरी नींद में सो रही थी। एक ढाबे पर बस ड्राइवर चाय पीने के लिए उतरा, रमेश जी भी चाय पीना चाह रहे थे लेकिन मीता की पकड़ ढीली पड़ने का नाम नहीं ले रही थी। एक बार मन हुआ इसे बस में यूं ही छोड़कर अपना सामान लेकर उतर जाएं, लेकिन उसके विश्वास को तोड़ना उचित नहीं समझा और वैसे ही जड़वत बैठे रहे।

सुबह के पांच बज रहे थे। पंढ़रपुर के मंदिर के घंट नाद से कर्ण आनंद विभोर हो गए। मीता अब भी सो रही थी। पता नहीं कितने दिन से सोई नहीं थी। एस टी स्टेण्ड आ गया। मीता को आखिरकार उठाना पड़ा।

अरे अंकल आप सोए नहीं? मुझे तो बहुत गहरी नींद आई।

रमेश जी ने अपना सामान उठाया और मीता से चलने के लिए कहा-

मीता को साथ लेकर एक होटल में कमरा लिया। रमेश जी जल्दी से जल्दी इस मुसीबत से छुटकारा पाना चाहते थे। नहा-धोकर पंढरपुर की चंद्रभागा नदी का मनोरम दृश्य और नौका विहार करते-करते दोपहर के तीन बज चुके थे। एक मराठी भोजनालय में खाना खाया। सुबह नाश्ते में कांदा (प्याज) पोहा और मिसळपाव खाया था। होटल तक पहुंचते-पहुंचते चार बज चुके थे। सामान लेकर पुणे के लिए रवाना होना था। रात को नींद पूरी न होने रमेश जी को थकावट महसूस हो रही थी। एस टी स्टेण्ड पर चाय पीकर पुणे की बस में बैठ गए। पांच घंटे का सफर था। बस में बैठते ही मीता फिर सो गई।

पुणे पहंुचते-पहुंचते रात के नौ बज चुके थे। बस उतरने के बाद पहले खाना खाया फिर इम्पीरियल होटल की तरफ कदम बढ़ा दिए। पिछली बार भी रमेश जी इसी होटल में रुके थे। मैनेजर सीट पर नहीं था। लाउंज में पड़ी कुर्सियों पर रमेश जी और मीता दोनों बैठ गए। रात के साढ़े दस बज चुके थे। मैनेजर शकल से पहचान गया।

मैनेजर ने कहा-अंकल ज्यादा देर तो नहीं हुई?

रमेश जी-नहीं बस 15-20 मिनट हुए हैं। बात को आगे बढ़ाते इतन में मीता भी काउंटर पर आकर खड़ी आ गई। रमेश जी ने दो कमरे बुक करने के लिए कहा, लेकिन मीता ने टोक दिया और कहा-

मीता-अंकल एक ही कमरा ठीक रहेगा। क्यों बिनावजह अतिरिक्त व्यय किया जाए?

मैंनेजर ने मीता की बात का समर्थन किया। रमेश जी की हालत सांप-छछुंदर जैसी थी। मीता को न निगलते बन रहा था, न उगलते। रमेश जी उस घड़ी को कोस रहे थे, जब उन्होंने मजाक-मजाक में गाइड का काम करने के लिए पन्हाला के पर्यटकों को यूं ही कह दिया था। गाईड चाहिए क्या? रमेश जी की आदत थी, रात को सोने से पहले नहाते जरूर थे। वे नहाने चल दिए। जब वे नहाकर बाहर निकले तब तक मीता कपड़े बदल चुकी थी। रमेश जी बिस्तर पर पड़ते ही सो गए। उन्हें पता नहीं चला कब मीता उनके बगल में आकर लेट गई होश तो तब आया जब तूफान और आंधी आकर गुजर गए। आंधी-तूफान के बाद मीता का मेघ आंखों से बरस रहा था। रमेश जी खुद को अपराधी महसूस कर रहे थे। लाइट आॅन करने का काम मीता ने किया। उसके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी। वह संतोष के साथ मुस्करा रही थी।

मीता ने कहा-क्या अंकल काहे का टेंशन लेने का जो होना था, वह हो गया।

रमेश जी को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उन पर घड़ों पानी पड़ गया हो।

मीता की आंखों से नींद गायब थी। रमेश जी प्रश्नवाचक नजरों से मीता को एक टक देखे जा रहे थे।

मीता के आंखों से मेघ फिर बह निकला। रमेश जी ने गले लगा लिया। उसकी हिचकी कुछ कम हुई। वह संयत होकर कहने लगी-

अंकल मैं अनीस से बहुत प्यार करती थी। अनीस हमारे ही आॅफिस में काम करता था। दिखने में सुन्दर। गोरा चिट्टा, कसा हुआ बदन और वाक पटु इतना कि किसी को भी अपनी बातों से प्रभावित कर लेता। मैं भी प्रभावित हो गई थी। मैं अनीस से एकदम सच्चे वाला प्यार करने लगी थी। मैं नहीं जानती थी वह कौन से धरम का है? मैं तो उसे बस चाहती थी। मैं उससे शादी करना चाहती थी। लेकिन धीरे-धीरे मुझे मालूम पड़ा वह मुझसे शादी नहीं बल्कि फिजीकल होने में ज्यादा इन्टरेस्टेड है। जब उसकी मंशा का आभास हुआ तो एक दिन बड़े बाबू से मिलकर उसके बारे जाना।

बड़े बाबू ने बताया-वह विधर्मी है। बस उस दिन के बाद से मैंने दूरिया बनाना शुरू कर दी। उस आॅफिस को छोड़ दिया, फोन नम्बर बदल लिया। सब कुछ छोड़कर गुूरूग्राम में नयी जाॅब करने आ गई। वह निढाल होकर एकदम रमेश जी की बाहों में सिमट गई। रमेश जी उसको वैसे रहने दिया। कुछ देर बाद वह रमेश जी के पास उसी अवस्था में गहरी नींद में खर्राटे ले रहे थे। जैसे तूफान के बाद अथाह शांति का आभास होता है।

पुणे के सिंहगढ़ के किले में वह उसी भाव से अंकल-अंकल कहते हुए हाथ पकड़ कर आगे खींचते हुए चल रही थी। उसी के आग्रह पर रमेश जी दो दिन तक पुणे में उसी होटल में रुके रहे।

रमेश जी दिल्ली आ गए थे। वे मीता को भूलना चाह रहे थे। अचानक एक दिन वे शाम की चाय पी रहे थे कि मीता ने दरवाजे पर दस्तक दी। पत्नी ने बताया मीता आई है। आकर बड़े चहक कर मिली। पत्नी को आंटी कहते हुए गले से लिपट गई। आंटी आप दाल बाटी बहुत बढ़िया बनाती हो मैं कल शाम को जाउंगी, मुझे दालबाटी खाना है।

मीता देर तक आंटी से बातेें करती रही। शाम को पूड़ी सब्जी खाने के बाद बातें करते-करते रात के ग्यारह बज चुके थे। रमेश जी की पत्नी ने व्यंग्यात्मक मुस्कराते हुए मीता से पूछा-

क्यों मीता अंकल के साथ सोएगी क्या? बिस्तर लगा हुआ है?

वह जोर से खिलखिलाकर हंस पड़ी?

मीता ने कहा-नहीं आज मैं आपके पास सोउंगी। बहुत सी बातें करनी हैं।

रमेश जी ने बीच व्यवधान डालते हुए कहा-मीता, मैंने तेरी आंटी को सब कुछ बता दिया है।

मीता-मैं वो आंटी के बिस्तर लगाने और सोने वाली बात से समझ गई थी।

दूसरे दिन मीता दोपहर को चली गई। रमेश जी अपने आपको काफी रिलेक्स महसूस कर रहे थे। उसके बाद मीता महीने में एक दो-बार आती। मीता के आने से रमेश जी को अच्छा लगता। वह घर के सदस्य के रूप में समाहित हो गई थी।

मीता आज आई तो उसके साथ एक लड़का था। उसने बेझिझक घर में घुसते हुए अंकल-अंकल इधर आओ एक सरप्राइज है आपके और आंटी के लिए।

मीता के साथ विनीत नाम का युवक मुस्करा रहा था। हम दोनों पति-पत्नी ड्राइंग रुम में बैठे औपचारिक रूप से बातचीत करने की सोच रहे थे।मीता आदत के अनुसार शुरू हो गई-

मीता-आंटी आपने पूछा नहीं ये कौन है? ये विनीत है। मेरे ही आॅफिस में काम करता है। बड़ा नेक दिल इन्सान है। जानवरों से प्यार करता है शायद इसीलिए मुझसे भी प्यार करने लगा है। हम लोग अगले महीने कोर्टमेरिज करने वाले हैं।

रमेश जी के चेहरे पर हल्के तनाव के भाव उभरे। लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं। विनीत की जेब में हाथ डालकर उसका आधारकार्ड, पेनकार्ड सब कुछ उलटकर टेबल पर रख दिया। मीता एक बार बोलना शुरू कर दे तो चुप कराना मुश्किल होता है। वह कहने लगी। ये उसी दिन से प्यार करने लगा था, जिस दिन मैंने ज्वाइन किया था। इसको अपनी बात कहने में समय लगा और मुझे इसे परखने में। बस इस खुशखबरी को शेयर करने चली आई। हां अंकल-आंटी कोर्ट मेरिज में मेरी ओर से आप दोनों गवाह होंगे। एक बात और इस विनित को मैंने अपना जीवन खोल कर बता दिया है। पन्हाला किले से लेकर इम्पीरियल होटल तक। इससे मैंने कह दिया देख अब भी तू शादी करना चाहे तो कर नहीं तो अनीस की तरह तू भी मेरी जिन्दगी से निकल। मेरी स्पष्टवादिता पर और अधिक मुग्ध हो गया। अब अंकल आप ही बताइए? सही किया न मैंने?

अनीस ने किया वह सही था?

मैंने जो इम्पीरियल होटल में किया वह सही था?

या इस विनीत ने जो किया वह सही है?

रमेश जी और भी सोच रहे हैं क्या सही है?

रमेश जी की पत्नी ने कहा-बीती को बिसार दे आगे की सुध ले। Short Hindi Story

Short Story : बनफूल 

Short Story : अपने बारे में बताने में मुझे क्या आपत्ति हो सकती है? जेलर से आप के बारे में सुना है. 8-10 महिला कैदियों से मुलाकात कर उन के अनुभव आप जमा कर एक किताब प्रकाशित कर रहे हैं न? मैं चाहूं तो आप मेरा नाम पता गोपनीय भी रखेंगे, यही न? मुझे अपना असली नाम व पता बताने में कोई आपत्ति नहीं.

आप शायद सिगरेट पी कर आए हैं. उस की गंध यहां तक आ रही है. नो…नो…माफी किस बात की? मुझे इस की गंध से परहेज नहीं बल्कि मैं पसंद करती हूं. शंकर के पास भी यही गंध रचीबसी रहती थी.

अरे हां, मैं ने बताया ही नहीं कि शंकर कौन है? चलिए, आप को शुरू से अपनी रामकहानी सुनाती हूं. खुली किताब की तरह सबकुछ कहूंगी, तभी तो आप मुझे समझ सकेंगे. मेरे नाम से तो आप परिचित हैं ही सुनयना…जमाने में कई अपवाद…उसी तरह मेरा नाम भी…

बचपन में मेरे गुलाबी गालों पर मां चुंबनों की झड़ी लगा देतीं, मुझे भींच लेतीं. उन के उस प्यार के पीछे छिपे भय, चिंता से मैं तब कितनी अनजान थी.

सुनयना मुझे देख कर पलटती क्यों नहीं है? खिलौनों की तरफ क्यों नहीं देखती? हाथ बढ़ा कर किसी चीज को लेने के लिए क्यों नहीं लपकती? जैसे कई प्रश्न मां के मन में उठे होंगे, जिस का जवाब उन्हें डाक्टर से मिल गया होगा.

‘‘आप की बेटी जन्म से ही दृष्टिहीन है. इस का देख पाना असंभव है.’’

उस दिन मां के चुंबन में पहली वाली मिठास नहीं थीं. वह मिठास जाने कहां रह गई?

‘‘यह क्या हुआ कि बच्ची पेट में थी तो इस के पिता नहीं रहे. फिर इस के जन्म लेते ही इस की आंखे भी चली गईं,’’ यह कह कर मां फूटफूट कर रो पड़ी थीं.

बचपन से मैं देख नहीं पा रही हूं, ऐसा डाक्टर ने कहा था. देखना, मतलब क्या? मैं आज तक उन अनुभवों से वंचित हूं.

मुझे कभी कोई परेशानी आड़े नहीं आई. मां कमरे में हैं या नहीं, मैं जान सकती थी. किस तरफ हैं ये भी झट पहचान सकती थी. आप ही बताइए, मां से कोई शिशु अनजान रह सकता है भला? मैं घुटनों के बल मां के पास पहुंच जाती थी. बड़े होने पर मां ने कई बार मुझ से यह बात कही है. एक बार मां मुझे उठा कर बाहर घुमाने ले आई थीं. अनेक आवाजों को सुन मैं घबरा गई थी. मैं ने मां को कस कर पकड़ लिया था.

अरे, घबरा मत. कुत्ता भौंक रहा है. यह आटो जा रहा है. उस की आवाज है. वह सुन, सड़क पर बस का भोंपू बज रहा है. वहां पक्षियों की चहचहाहट…सुनो, चीक…चीक की आवाज…और कौवे की कांव…कांव…

तब से ध्वनि ने मेरे नेत्रों का स्थान ले लिया था.

चपक…चपक, मामाजी की चप्पल की आवाज. टन…टन घंटी की आवाज. टप…टप नल में पानी…

मेरी एक आंख ध्वनि तो दूसरी उंगलियों के पोर…स्पर्श से वस्तुओं की बनावट पहचानने लगी. अपनी मां को भी छू कर मैं देख पाती. उन के लंबे बाल, उन की भौंहें, उन का ललाट…उन की नाक उन की गरमगरम सांसें…मामाजी की मूंछों से भी उसी तरह परिचित थी. मैं  मामी के कदमों की आहट, उन के जोरजोर से बात करने के अंदाज से समझ जाती कि मामी पास में ही हैं. अक्षरों को भी मैं छू कर पहचान लेती.

मां मुझे रिकशे में बैठा कर स्कूल ले जातीं. स्कूल उत्साह व उमंग का स्थान, मेरे लिए ध्वनि स्थली थी. मैं खुश थी बेहद खुश…दृष्टिहीन को उस के न होने का एहसास आप कैसे दिला सकोगे कहिए?

एक दिन घर के आंगन में अजीब सी आवाजों का जमघट था. उन आवाजों को चीरते हुए मैं भीतर गई. पांव किसी से टकराया तो मैं गिर पड़ी. मैं एक शरीर के ऊपर गिरी थी. हाथ लगते ही पहचान गई.

‘‘मां…मां, आज क्यों कमरे के बीचोंबीच जमीन पर लेटी हैं? मैं आप पर गिर पड़ी. चोट तो नहीं लगी न मां?’’

घबराहट में मैं ने उन के चेहरे पर उंगलियां फेरी, उन का माथा, बंद पलकें, नाक पर वह गरम सांसें जो मैं महसूस करती थी आज न थीं. मेरी उंगलियां वहीं स्थिर हो गईं.

मां…मां. मैं ने उन के गालों को थपथपाया. कान पकड़ कर खींचे. पर मां की तरफ से कोई प्रत्युत्तर न पा कर मैं ने मामी को पुकारा.

मामी मुझे पकड़ कर झकझोरते हुए बोलीं, ‘‘अभागन, मां को भी गंवा

बैठी है.’’

मामाजी ने मुझे गले लगाया और फूटफूट कर रोने लगे.

मैं ने मामाजी से पूछा, ‘‘मां क्यों जमीन पर लेटी थीं? मां को क्या हुआ? उन का चेहरा ठंडा क्यों पड़ गया था? उठ कर उन्होंने मुझे गले क्यों नहीं लगाया?’’

मामाजी की रुलाई फूट पड़ी, ‘‘हे राम, मैं इसे क्या समझाऊं? बेटा, मां मर चुकी हैं.’’

मरना क्या होता है, मैं तब जानती न थी.

दृष्टिहीन ही नहीं, शरीरविहीन हो कर किसी दूसरे लोक का भ्रमण ही मृत्यु कहलाता है, यह मुझे बाद में पला चला.

मैं करीब 12 साल की थी. मेरे शरीर के अंगों में बदलाव होने लगे.

मामी ने एक दिन तीखे स्वर में मामा से कहा, ‘‘वह अब छोटी बच्ची नहीं रही. आप उसे मत नहलाना.’’

मैं स्वयं नहाने लगी. अच्छा लगा. नया अनुभव, पानी का मेरे शरीर को स्पर्श कर पांव की तरफ बहना. उस की ठंडक मुझ में गुदगुदाहट भर देती.

एक दिन मैं कपड़े बदल रही थी. मामाजी के पांव की आहट…वे जल्दी में हैं, यह उन की सांसें बता रही थीं.

‘‘क्या बात है मामाजी?’’

वे मेरे सामने घुटनों के बल बैठे.

‘‘सुनयना,’’ उन की आवाज में घबराहट थी. कंपन था. उन्होंने मेरी छाती पर अपना मुंह टिकाया और मुझे भींच लिया. मेरी पीठ पर उन के हाथ फिर रहे थे. उंगलियों में कंपन था.

‘‘मामाजी क्या बात है?’’ उन के बालों को सहलाते हुए मैं ने पूछा. उन का स्पर्श मुझे भी द्रवित कर रहा था मानो चाशनी हो.

‘‘ओफ, कितनी खूबसूरत हो तुम,’’ कहते हुए उन्होंने मेरे होंठों को चूमा. उन्होंने अनेक बार पहले भी मुझे चूमा था पर न जाने क्यों उन के इस स्पर्श में एक आवेग था.

‘‘हाय…हाय,’’ मामी के चीखने की आवाज सुनाई दी. मामाजी छिटक कर मुझ से दूर हुए. मामी ने मुझे परे ढकेला.

‘‘कितने दिनों से यह सब चल रहा है?’’

‘‘पारो, चीखो मत, मुझे माफ करो. ऐसी हरकत दोबारा नहीं होगी.’’

मामा की आवाज क्यों कांप रही है? अब क्या हुआ जो माफी मांग रहे हैं? मेरी समझ में कुछ नहीं आया था.

‘‘चलो, मेरे साथ,’’ कहते हुए मामी मुझे खींच कर बाहर ले गईं. मुझे उसी दिन मदर मेरी गृह में भेज दिया गया.

खुला मैदान… हवादार कमरे, अकसर प्रार्थनाएं और गीत सुनाई पड़ते थे. फादर तो करुणा की कविता थे. स्नेह…स्नेह और स्नेह… इस के सिवा कुछ जानते ही नहीं थे. वे सिर पर उंगलियों का स्पर्श करते तो लगता फादर के  रूप में मुझे मेरी मां मिल गई हैं.

वहां के कर्म-चारी मेरे कमरे में आते तो कह उठते, ‘‘तुम कितनी खूब-सूरत हो,’’ मैं संकोच से घिर जाती थी.

आप भी शायद मुझे देख यही सोचते होंगे, है न? पर खूबरसूरती तो मेरे लिए आवाज, रोशनी व गहन अंधकार का पर्याय है. ध्वनि खूबसूरत वस्तु है पर सभी कहते हैं पहाड़, झरने, फूल, तितली, पेड़पौधे खूबसूरत होते हैं, उस का मुझे क्या अनुभव हो सकता है भला.

बिना देखे, बिना जाने मुझे खूबसूरत कहना क्या दर्शाता है? स्नेह को…है न?

जरा अपना हाथ तो बढ़ाइए. कस कर हाथ पकड़ने से क्या आप को महसूस नहीं होता कि हम दोनों अलगअलग नहीं एक ही हैं. कुछ प्रवाह सा मेरे शरीर से आप के भीतर व आप के शरीर से मेरे भीतर आता हुआ महसूस होता है न? मेरी आंखों से आंसू बहने लगते हैं. लगता है सांसें थम जाएंगी. देख रहे हैं न मेरी आवाज लड़खड़ा रही है? इस से खूबसूरत और कौन सी चीज हो सकती है मेरे लिए भला?

वहां के शांत और स्नेह भरे वातावरण में पलीबढ़ी मैं. कुछ लड़कियां मेरी खास सहेलियां बन गई थीं. वे अकसर कहतीं, ‘‘ओफ, तू बला की खूबसूरत है, तुम्हारी त्वचा चमकती रहती है, कितनी कोमल हो तुम. और होंठों के पास यह काले तिल…’’ वे सभी मुझे छूछू कर देखतीं और तृप्त होतीं. मेरे पास कुछ है जो इन्हें संतुष्टि प्रदान कर रहा है, इस से बढ़ कर खुशी और क्या हो सकती है?

मैं जिसे अपनी उंगलियों से, ध्वनि, गंध से महसूस नहीं कर पा रही हूं वही दृष्टि नामक किसी चीज से ये जान लेते हैं, यह विचार मुझे तड़पा गया. मैं ने अपनी तड़प का इजहार फादर से किया तो उन्होंने बड़े प्यार से मेरे बालों को सहलाते हुए समझाया, ‘‘माय चाइल्ड, जान लो कि दुनिया में रोशनी से बेहतर अंधेरा ही है. रोशनी में सब अलगथलग होते हैं, गोरी चमड़ी अलग नजर आएगी, इस की चमक अलग से दिखेगी, तिल की सुंदरता अलग, क्या इस में अहंकार नहीं? अंधेरे में सभी एकाकार हो जाते हैं. वहां चेहरा खूबसूरत, गोरी चमड़ी माने नहीं रखती. व्यक्ति का स्नेह ही सबकुछ होता है. सच्चा प्यार भी वैसा ही होता है सुनयना. वह खूबसूरत, चमकदमक का गुलाम नहीं होता. आंखों के होते हुए भी सच्चे प्रेम व प्रीत को लोग देख नहीं पाते, कितने अभागे होंगे वे? तुम्हारी दृष्टिहीनता कुदरत का दिया वरदान है.’’

माफ कीजिएगा, फादर के बारे में कहते समय मैं चाह कर भी अपने आंसू नहीं रोक पाती. उसी दिन समझ सकी स्नेह भेदरहित होता है और ये खुले हाथ बांटने की चीज हैं.

कालिज का आखिरी दिन था. फादर ने मुझे बुला भेजा.

‘‘सुनयना, इन से मिलो. मिस्टर शंकर…’’

शंकर का कद मुझ से अधिक है यह मैं उस की सांसों से पहचान गई. मेरे दोनों हाथों को पकड़ कर उस ने दबाया, उस दबाव में कुछ भिन्नता थी.

‘‘शंकर इलेक्ट्रानिक्स इंजीनियर है सुनयना, इस का बचपन गरीबी व तंगहाली में बीता था. अपनी मेहनत के बलबूते पर वह आज इस मुकाम पर पहुंचा है. उस ने अकसर तुम्हें देखा है. वह तुम्हें पसंद करता है, शादी करना चाहता है,’’ फादर ने बिना लागलपेट के पूरी बात साफसाफ कह दी. शादी अर्थात शंकर मेरा जीवनसाथी बनेगा, जीवन भर मुझे सहारा देगा. मैं ने अभी तक स्नेह लुटाया है…शंकर का पहला स्पर्श कितनी ऊष्णता लिए हुए था. मुझे वह स्पर्श भा गया था.

मैं ने एकांत में शंकर से बातचीत करने की इच्छा जाहिर की. मुझे यह जानने की उत्सुकता थी कि इस ने मुझ दृष्टिहीन को क्यों अपनी जीवनसंगिनी चुना? शंकर की आवाज मधुरता लिए हुए थी. उस ने अपने जीवन का ध्येय बताया. खुद कष्टों को सहने के कारण किसी के काम आना, तकलीफ उठाने वालों की वह मदद करना चाहता था. मैं ने उसे छू कर देखने की इच्छा जाहिर की. उस ने मेरे हाथों को अपने चेहरे पर रख लिया.

शंकर का उन्नत ललाट, घनी भौंहें, लंबी नाक, घनी मूंछें और वे होंठ…मैं इन होंठों को चूम लूं?

शंकर ने मना कर दिया. कहने लगा, ‘‘सभी देख रहे हैं.’’

फादर से मैं ने अपनी सहमति प्रकट की. फादर ने अपनी तरफ से शंकर के बारे में जांचपड़ताल कर ली थी. ‘‘माई चाइल्ड, भले घर का बेटा है. तुम बहुत खुशकिस्मत हो,’’ उन्होंने कहा था.

हमारी शादी फादर के सामने हो गई.

‘‘शंकर, सुनयना बेहद भोली व नादान है. इसे संभालना. इस का ध्यान रखना,’’ फादर ने कहा, फिर मेरी तरफ मुड़ कर मेरे माथे को उन्होंने चूमा. मैं उन के कदमों पर गिर पड़ी. मां के बिछुड़ने पर जिस अवसाद से मैं अनजान थी, उस का अनुभव मुझे हो गया था.

शंकर के साथ मेरी जिंदगी सुचारु रूप से चल रही थी. सांझ ढले एक दिन मैं बिस्तर पर बैठी बुनाई कर रही थी. समीप पदध्वनि… यह शंकर नहीं कोई और है.

‘‘कौन है?’’ चेहरे को उस तरफ घुमा कर मैं ने पूछा.

‘‘सुनयना, मेरा मित्र है जय…जय आओ बैठो न.’’

जय बिस्तर पर मेरे पास आ कर बैठा. उस की सांसें तेजी से चल रही थीं.

‘‘सुनयना, जय का इस दुनिया में कोई नहीं है. मैं इसे अपने साथ ले आया हूं. कुछ समय तुम्हारे पास रहेगा तो अपने अकेलेपन को भूल जाएगा,’’ शंकर ने कहा और मेरा हाथ उठा कर उस के कंधे पर रखा.

मैं ने उस के कंधों को पकड़ा. तभी शंकर यह कह कर बाहर चला गया कि मैं एक जरूरी काम से जा रहा हूं.

जय के चेहरे को मैं ने अपने कंधे पर टिका लिया. उस ने मुझे सहलाया, प्यार पाने की कसक…अकेलेपन की वेदना. बेचारे इस जय का दुनिया में कोई नहीं, दुखी, पीडि़त, उपेक्षित है यह. मैं ने उसे गोदी में डाल सहलाया. कुत्ते व बिल्लियों को गोदी में डाल कर सहलाने में जो तृप्ति मुझे मिलती थी वही तृप्ति मुझे तब भी मिली थी. जय ने चुंबनों की झड़ी लगा दी. जय कैसा दिखता होगा यह जानने की उत्सुकता हुई. मैं ने उस के चेहरे को सहलाया. होंठों को छूते समय मेरी उंगलियों को उस ने धीमे से काट लिया. मेरे उभारों पर उस के हाथ फिसलने लगे.

समीप आ कर उस ने मुझे कस कर भींच लिया. शादी होते ही शंकर ने भी मुझे ऐसे ही भींचा था न. वस्त्रविहीन शरीर पर उस ने हाथ फेरा था. कहा था कि स्नेह जाहिर करने का यह भी एक तरीका है. शायद शंकर की ही तरह जय भी है. सिर से पांव तक एक विद्युत की लहर दौड़ पड़ी. क्या अजीब अनुभव था वह. वह भी मुझ में समा जाने के लिए बेकरार था. शंकर के अलावा किसी और को मैं आज देख सकूंगी, यह विचार काफी रसदायक लगा.

अंधेरे में अहंकार नहीं होता. मैं का स्थान नहीं, सभी एकाकार हो जाते हैं. इन बातों को मैं ने केवल सुना था, अब इस का अनुभव भी प्राप्त हो गया. पहले शंकर से यह अनुभव मिला, अब जय से.

2 घंटे बाद शंकर लौटा.

‘‘मुझ से नाराज हो सुनयना?’’

‘‘नहीं तो, क्यों?’’

‘‘जय आ कर गया.’’

‘‘छी…छी…कैसी बातें करते हैं. मुझे संसार के सभी स्त्रीपुरुषों को देखने की इच्छा है. कितनी खुश हूं जानते हो, आज मैं ने जय को देखा…जाना.’’

फिर शंकर अकसर अपने नएनए मित्रों के साथ आने लगा. हर बार एक नए मित्र से मेरा परिचय होता.

‘तुम कितनी खूबसूरत हो,’ कह कर कुछ जनून भरा स्पर्श भी मैं ने महसूस किया. कुछ स्पर्श शरीर को चुभ जाते. कुत्ते या बिल्ली के साथ खेलते समय एकाध बार उस का पंजा या दांत चुभ ही जाता है न, उसी तरह का अनुभव हर एक बार एक नया अनुभव.

एक दिन मैं वैसा ही कुछ नया अनुभव प्राप्त कर रही थी तब वह घटना घटी. दरवाजे के उस तरफ जूतों की ध्वनि…दरवाजा खटखटाने की आवाज, ‘‘पुलिस,’’ दरवाजा खोलो.

‘‘राजू, जा कर दरवाजा खोलो न, पुलिस आई है,’’ मैं ने अंगरेजी में कहा. वह बंगाली था.

राजू गुस्से में मुझे परे ढकेल कर खड़ा हो गया. मैं ने ही जा कर दरवाजा खोला.

‘‘तुम शंकर की कीप हो न? तुम्हारा पति तुम्हें रख कर धंधा करता है, यह सूचना हमें मिली है. तुम्हें गिरफ्तार किया जाता है.’’

बाद में पता चला शंकर अपनी फैक्टरी का लाइसेंस पाने के लिए, अपने उत्पादों को बड़ीबड़ी कंपनियों में बेचने का आर्डर प्राप्त करने के लिए मेरा इस्तेमाल कर रहा था. लोगों की बातों से मैं ने जाना.

न जाने कौनकौन से सेक्शन मुझ पर लगे. मुझे दोषी करार दिया गया. शंकर ने अपनी गलती स्वीकार कर ली थी यह भी मुझे बाद में मालूम पड़ा.

‘‘भविष्य में सुधर कर इज्जत की जिंदगी बसर करोगी?’’ न्यायाधीश ने पूछा?

‘‘मुझे आजाद करोगे तो फिर से स्नेह को ही खोजूंगी,’’ मेरा उत्तर सुन न्यायाधीश ने अपना निर्णय स्थगित कर रखा है.

नहीं…नहीं जेल के भीतर मुझे कोई कष्ट नहीं. मैं यहां भी खुश हूं. अंधेरे में कहीं भी रहूं क्या फर्क पड़ता है या किसी के साथ भी रहूं क्या फर्क

पड़ता है?

बताइए तो आप मेरे बारे में क्या लिखने वाले हैं? आप का नाम? मैं तो भूल ही गई कुछ अनोखा नाम था आप का…हां, याद आया प्रजनेश…यस…कहिए आप की आवाज क्यों भर्रा रही है? आप की आंखों में आंसू?

प्लीज…मत रोइएगा. रोने के लिए थोड़ी न हम पैदा हुए हैं. आप के आंसुओं को रोकने के लिए मैं क्या करूं? आप

को चूमूं? Short Story

Hindi Story : आराम हराम है

Hindi Story : आज मेरी जो हालत है इस के जिम्मेदार पूरी तरह नेहरूजी हैं. कहना तो मुझे चाचा नेहरू चाहिए था पर क्या है कि जब मैं बच्ची थी तब भी वह मुझे चाचा नहीं लगते थे. वह हमारे दादा की उम्र के थे और हमारे सगे चाचा सजीले नौजवान थे, उन के केश पंडित नेहरू की तरह सफेद न थे.

यहां गौर करने की एक बात यह भी है कि चाचा नेहरू हमें बता गए हैं कि आराम हराम है और हमारे पिताजी ने इसे पत्थर की लकीर समझा. खुद तो सुबह उठते ही हमें भी उठा देते कि उठ जाग मुसाफिर भोर भई. उसी के साथ हमारे सामने वह पोथियां खुल जातीं जिन्हें पढ़ कर कोई पंडित नहीं बनता और जिस ढाई आखर को पढ़ कर इनसान पंडित हो सकता है वह भरे पेट का चोंचला है.

प्रेम के लिए फुरसत होनी चाहिए कि बैठे रहें तसव्वुरएजानां किए हुए. सुबह 4 बजे से रात 11 बजे तक की इस समय सारिणी में प्रेम के लिए हमारे पास कोई घंटा ही न बचा था. पढ़ोलिखो, नौकरीचाकरी, घरगृहस्थी, चौकाचूल्हा, बालबच्चे, और फिर पांव की लंबाई का एडजस्टमेंट, इन सब के साथ लिफाफा चंगा दिखाई दे, यह भी काम बड़ा था. जब तेजतेज गाड़ी हांकतेहांकते यह पता चला कि अब तो सफर खत्म ही हो चला है तो इस में आराम का समय न था, इसलिए आराम का अभ्यास भी न रहा.

जैसे हर कोई प्रेम नहीं कर सकता, एवरेस्ट पर नहीं चढ़ सकता, ऐसे ही हर कोई आराम भी नहीं कर सकता. आराम करना हुनर का काम है. हम चाहें तोे भी आराम नहीं कर सकते. आता ही नहीं है. पिताजी ने सिखाया कि सुबह से रात तक कुछ न कुछ करते ही रहो. अम्मां ने देखा कि लड़की खाली तो नहीं बैठी है, सब काम हो गए तो पुराने स्वेटर को उधेड़ कर फिर से बुन लो. परदे पुराने, बदरंग हो गए तो उन से गद्दे का कवर बना डालो.

दिमाग खाली न था  इसलिए शैतान उस में न रहा और भरा था इसलिए भगवान उस में न समा सके. भगवान का निवास यों भी दिमाग में नहीं दिल में होता है. हमारे यहां दिल वाले आदमी ही होते हैं, औरतें दिलविल की लग्जरी में नहीं पड़तीं. दिल होता नहीं, विल उन की कोई पूछता नहीं. एक दिल वाली ने विल कर दी तो देखा  कैसे कोर्टकचहरी हुई.

जब कहा गया है कि आराम हराम है तो इस का अर्थ है कि सुख न मिलेगा. हाथों में हथकड़ी, पैरों में छाले होंगे, आगे होगा भूख और बेकारी का जीवन, हड़तालें होंगी, अभाव यों बढे़ंगे जैसे दु्रपद सुता का चीर.

मान लीजिए चाचा नेहरू ने काम हराम कहा होता तो मुल्क सुख के हिंडोले में झूलता. किसान काम न करते, मजदूर काम न करते. सब ओर दूध की नदियां बहतीं. अप्सराएं नृत्य करतीं. आप ने कभी स्वर्ग में देवताओं को काम करते सुना है, पढ़ा है. कोई काम करे तो उन के सिंहासन हिलने लगते हैं. वह उत्सवधर्मी हेलीकाप्टरों की तरह  होते हैं जो केवल पुष्पवर्षा करते हैं. उन्हें तो बस अपना गुणगान सुनना अच्छा लगता है और यज्ञ भाग न पहुंचे तो नाराज हो जाते हैं. यह खुशी की बात है कि हमारे अधिकारी देवतुल्य होते हैं. उन्हें भी देवताओं की तरह आराम चाहिए होता है. दोनों ही उसे दारुण दुख देने को तैयार रहते हैं, जो दुष्ट उन की भक्ति नहीं करता. गरीबों को सताने का अपना आनंद जो ठहरा.

आराम हराम है का राग अलापने वाले यह भी जानते हैं कि जितने आदमी उतने ही हरामखोर. आखिर इस धरती पर कौन इतना फरमाबरदार है कि आराम का मौका मिले तो उसे हाथ आए बटेर की तरह छोड़ दे. जनगणना वालों के पास आंकड़े उपलब्ध बेशक न हों लेकिन सब को पता है कि सौ में से 10 काम करते हैं, शेष हरामखोरी कर के ही काम चलाते हैं. पूरे आलम में कुछ नहीं चलता फिर भी शासन प्रशासन चलते हैं, राजधर्म निभते हैं और तख्त भी पलटते हैं. देखा जाए तो यह सब भी एक तरह से काम  ही है. भूख और बाढ़ से मरने वालों को लगता बेशक हो पर यह काम नहीं होता. काम होता है इस की समीक्षा, कारण, दौरे और रिपोर्ट.

जिन्हें आराम करना आता है वे जानते हैं कि कब और कैसे आराम किया जाता है. उस के लिए समय कैसे निकाला जाए, इस की भी एक तकनीक होती है. आप कैसे ‘रिलैक्स’ कर सकते हैं, तनाव से कैसे छुटकारा पा सकते हैं, इस के लिए भी विशेषज्ञ सलाह देते हैं. इधर सुबह की सैर के दौरान जगहजगह ऐसे प्रशिक्षक होते हैं जो नियम के अनुसार 3 बार हंसाते हैं. हंसो, हंसो जोर से हंसो, हंसो हंसो दिलखोल कर हंसो, लोग हंसने में भी शरमाते हैं, सकुचाते हैं, हम कैसे हंसें, हमें तो हंसना ही नहीं आता.

अभी वह समय भी आएगा जब आराम करना सिखाने के लिए भी टें्रड प्रशिक्षक होंगे. आंखें बंद कीजिए, शरीर को ढीला छोडि़ए और गहरी सांस लीजिए.

ऐसे में मेरी जैसी कोई लल्ली पूछेगी, ‘‘एक्सक्यूज मी, यह सांस क्या होती है?’’ Hindi Story

Hindi Kahaniya : बाबा, बाजार और बेचारा करतार

Hindi Kahaniya : ज्यों ही मेरे सिर में अचानक सफेद बाल दिखा, धर्मभीरुओं ने दांव मिलते ही उपदेश देते कहा, ‘‘हे माया के मोह में पड़ अपने परलोक को भूले मेवालाल, खतरे की घंटी बजनी शुरू हो गई है. संभल जा. सिर के बालों में एकाएक सफेद बाल उग आने का मतलब होता है कि…सो, अब मोहमाया की गली के फेरे लगाने छोड़, ईश्वर से नाता जोड़. ऐसा न हो कि यहां का खाया भगवान ऐसे निकाले कि सात जन्म तक खाना ही भूल जाए. चल, अब शाकाहारी हो जा.’’

मैं ने उन्हें समझाते कहा, ‘‘हे भगवान से डरने वालो, अभी मेरे खाने के दिन हैं. देखो, सिर तो सिर, सिर से पांव तक हुए सफेद बाल वाले कितने बैठे हैं जो मोहमाया में अभी भी कैसे फिट हैं? मैं तो जिस कुरसी पर बैठा हूं उस पर सोएसोए भी कमाने के दिन हैं. जनता की जेब तो मैं तब तक काटना बंद नहीं करने वाला जब तक मेरे गले में माला पहना मुझे मेरे औफिस वाले घर नहीं धकिया देते.’’

अचानक, पता नहीं कैसे मेरा हृदय परिवर्तन हो गया और मैं साहब के चरणों को छोड़, भगवान के चरणों की खोज करने लगा. और, मैं सब को गुमराह करने वाला खुद ही गुमराह हो चला.

हमारे दंभी जीवन में एक दौर ऐसा भी आता है जब हम औरों को गुमराह करतेकरते अपने दंभ के परिणामस्वरूप खुद को ही गुमराह करने लग जाते हैं. और हमें पता ही नहीं चलता. दिमाग में पता नहीं कहां से सड़ा विचार बदबू मार गया और मुझे अनदेखे परलोक की चिंता होने लगी. मेरे मायाग्रस्त दिमाग में पता नहीं बिन खादपानी ईश्वर के प्रति आस्था का पौधा कैसे पनपने लगा. वैसे, परलोक की चिंता में धर्म के धंधेबाज रहते हैं और तब ही जानलेवा बीमारी से ग्रसित हो जाते हैं.

जवानी में कोई मौत के बारे में सोचे तो उसे गधे से अधिक कुछ और मत मानिए. जवानी के दिन तो मौज मनाने के दिन होते हैं, मर्यादाओं को अंगूठा दिखाने के दिन होते हैं, भगवान को गच्चा दे अपने को ठगने और औरों को ठगाने के दिन होते हैं.

धर्म की मार्केटिंग इतनी जबरदस्त है कि उस में गच्चा खा कर मैं औफिस के खानपान को छोड़ औफिसटाइम के बीचबीच में भगवान को ढूंढ़ने निकल पड़ता, यह सोच कर कि अगर उस से जरा संवाद हो जाए तो बंदा भवसागर पार हो जाए. भगवान के चक्कर में प्रेमिका के चक्कर से भी अधिक राख छान मारी पर वे निकले ऐसे जैसे हाईकमान किसी रुष्ट नेता से नहीं मिलना चाहता तो नहीं मिलना चाहता. जब भगवान कहीं नहीं मिले तो मैं उदास हो उठा. तब महल्ले के एक नामीगिरामी, पहुंचे हुए विषय वासनाओं से पूर्ण भगवाई बिचौलिए ने बातोंबातों में समझाया, ‘‘हे प्रभु दीवाने, भगवान सीधे किसी से नहीं मिलते. मध्यस्थ की मध्यस्थता बहुत जरूरी है.’’

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‘‘मीडिएटर बोले तो…’’

‘‘बाबाजी.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘भगवान को पाने का हर रास्ता आज भी वैसे ही बाबाओं की गली से हो कर जाता है जैसे आत्मा के स्वर्ग का रास्ता जीव के मरने के बाद पंडों के पिछवाड़े से हो कर जाता है.’’

‘‘तो?’’

‘‘तो क्या, जो भगवान से साक्षात्कार करना चाहते हो तो किसी पहुंचे हुए बाबा से तुरंत संपर्क करो. तुम चाहो, तो मेरी नजर में भगवान से साक्षात्कार करवाने वाला एक बाबा है.’’

‘‘उस का नंबर है आप के पास क्या?’’ मैं ने उन के चरण पकड़े तो वे अदब से बोले, ‘‘यह लो, नोट करो.’’ और मैं उन से बाबा का नंबर ले गदगद हुआ.

बड़ी कोशिश के बाद बाबाजी से संपर्क हुआ, तो वे डकारते बोले, ‘‘क्या बात है वत्स?’’

‘‘सर, आप के माध्यम से भगवान के दर्शन करना चाहता हूं.’’

‘‘भगवान बोले तो?’’

‘‘गौड, अल्लाह, ईश्वर के दर्शन करवा देंगे?’’

‘‘पहले यह लो भगवान का बैंक अकाउंट नंबर. और इस में 5 हजार एक सौ रुपए जमा करवा दो.’’

‘‘भगवान का अकाउंट नंबर? ब्लैक मनी के आने के चक्कर में भगवान ने भी अपना बैंक अकाउंट खुलवा लिया?’’ मैं ने अपनी सोच जाहिर की.

‘‘हां, धन की जरूरत किसे नहीं, भक्त? धन है तो भजन है. धन है तो मन है. धन समस्त सृष्टि का आधार है. धन के बिना जीव निराधार है. धन के बिना भगवान बिन चमत्कार है. धन के बिना हर घरगृहस्थी ही नहीं, सरकार से ले कर बाबा तक बीमार है.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘धन हर सोच का मूल है. धन है तो आग भी कूल है. धन है तो शूल भी फूल है.’’

‘‘तो?’’

‘‘अभी किस का बना माल खाते हो?’’

‘‘मतलब?’’

‘‘स्वदेशी या विदेशी?’’

‘‘विदेशी.’’

‘‘स्वदेशी क्यों नहीं? क्या भारतीय नहीं हो?’’

‘‘विशुद्ध भारतीय ही हूं. पर स्वदेशी का रिस्क लेने से डरता हूं.’’

‘‘पाप, घोर पाप, विदेशी खानेपहनने वाले को हमारे भगवान के घर में कोई जगह नहीं. जाओ, पहले धर्म बदल कर आओ, फिर हम से फोन पर जबान लड़ाओ.’’

‘‘फोन लगाया, बाबा, ऐसा न कहो? हूं तो भारतीय मूल का ही मैं, पर भीगी बिल्ली सा कुछ बना.’’

‘‘तो, जो भगवान पाना चाहते हो, तो पहले हमारी कंपनी के स्वदेशी प्रोडक्ट अपनाओ.’’

‘‘भगवान से मिलवाने के धंधे में कमाई कम हो गई क्या, जो अब आप माल भी बेचने लगे?’’

‘‘हम माल नहीं बेचते. भक्तों का कल्याण बेचते हैं. अपने माल से उन में शुद्ध विचार भरते हैं. ऐसा कर उन्हें करतार यानी भगवान के करीब करते हैं. असल में काफी बोझ के बाद हम ने महसूस किया कि भगवान को पाने का सरल रास्ता हमारे बने प्रोडक्टों से हो कर ही गुजरता है.’’

‘‘मतलब? जो आप के प्रोडक्ट खाएगा, करतार को केवल वही पाएगा?’’

‘‘हां, शतप्रतिशत. हमारे बनाए प्रसादरूपी और्गेनिक प्रोडक्टों के सेवन से दूसरे बाबाओं के खाए प्रोडक्टों की अपेक्षा जल्दी तुम अपने भगवान से साक्षात्कार कर सकते हो, हरि ओम, हरि ओम.’’

‘‘मतलब, आज तभी सब बाबा मठ छोड़, बाजार में डटे हैं?’’

‘‘डटना पड़ता है. यह माया महाठगिनी है. इस के मोहपाश से तो भगवान भी नहीं बच पाए और हम तो…और केवल एक प्रोडक्ट से आज किसी की दुकान चली है भला? हर कस्टमर की मांग के हिसाब से हरेक का भगवान लीगली या इल्लीगली रखना ही पड़ता है. इसलिए, पहले मेरे प्रोडक्ट इस्तेमाल करो, फिर करतार से मिलने की बात करो.’’

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‘‘माफ करना, बाबा, पहले जो बाबा भगवान को कब्जाने के लिए जाने जाते थे, आज क्या वे बाजार को हथियाने की फिराक में नहीं दिखते? बाबा, बाजार और करतार का आपस में यह क्या संबंध है? जबकि बाजार बाजार है और करतार करतार.’’

‘‘बाजार और करतार का आपस में वही संबंध है जो जीव का परमात्मा से है.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘हमारे प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने से तन का मैल साफ हो जाता है, पापी. जिसजिस ने हमारे बने प्रोडक्टों का इस्तेमाल किया वह तन से भगवान के शर्तिया करीब हुआ.’’

‘‘मन से क्यों नहीं?’’

‘‘मन किसी के पास हो, तभी तो वह मन से करतार पाए. अब तन है तो तन से ही काम चलाना पड़ेगा न?’’

‘‘मतलब, आप के प्रोडक्टों के इस्तेमाल के बिना मैं तन से भगवान नहीं पा सकता?’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं. साहस हो तो आजमा कर देख लो. परम सत्य है, असल में जब पैसे वाला जीव भौतिक सुखसाधनों से ऊब जाता है, तब ही वह भगवान के चरणों में जा कर गिड़गिड़ाता है. और रुपैयाछाप भक्त उसे त्यागी कह एक  बार फिर धोखा खा जाते हैं. और बाजार में हम जैसे कुछ और चादर बिछा डालते हैं.’’

‘‘हां, ताकि कम से कम गृहस्थियों का पैसा माया से युक्त बाबाओं के पास रहे और…वे समानांतर व्यवस्था चलाएं, सरकार तक को अपने इशारे पर नचाएं. इसीलिए आज हर बाबा बाजार में कुछ न कुछ पेश कर सुधबुध खोए तुम जैसे नास्तिकों के उद्धार के लिए साबुन से ले कर सीडी तक हाथ में लहराता खड़ा है.’’

‘‘हर किस्म के करतार को पाने का रास्ता बाजार से हो कर ही गुजरता है, पुत्र. इसलिए, पहले मेरी दुकान में आ और उस का द्वार पार कर अपना मनवांछित आराध्य पा. यह ले रिंकलफ्री क्रीम. दिमाग में लगा और दिमाग में मोह से पड़ी सारी झुर्रियां हटा. तभी तेरा आगे का रास्ता साफ होगा. ले मेरी पिंपलफ्री क्रीम. चेहरे पर लगा और करतार को अपना सनशाइन चेहरा दिखा, उस का फेवरिट हो जा.’’

वे यह सब कह ही रहे थे कि तभी मुझे लगा, कहीं और से मेरे जैसा उन का भक्त उन से फोन पर संपर्क करना चाह रहा था. सो, मेरा उन का संपर्क टूटा. करतार के नाम पर एक बंदा फिर ठगने से छूटा कि नहीं, यह तो करतार ही जाने.

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Short story in Hindi : भभूत वाले बाबा

Short story in Hindi : जैसे तितली का फूल से, सावन का पानी से, नेता का वोट से, पुजारी का मंदिर से रिश्ता होता है उसी तरह मेरी सास का रिश्ता उन की इकलौती बेटी से है. मेरी शादी के साथ वे भी अपनी बेटी के साथ हमारे पास आ गईं. हम ने भी दिल पर पत्थर रख कर उन को इसलिए स्वीकार कर लिया कि पीला पत्ता आज नहीं तो कल तो पेड़ से टूटेगा ही.

लेकिन पेड़ ही (यानी हम) पीले पड़ गए मगर पत्ता नहीं टूटा. मरता क्या न करता. उन्हें हम ने स्वीकार कर लिया वरना कौन बीवी की नाराजगी झेलता. पिछले 7-8 महीने से देख रहा था कि अपनी पत्नी को हम जो रुपए खर्च के लिए देते थे वे बचते नहीं थे. हम ने कारण जा?नने के लिए डरतेडरते पत्नी से पूछा तो उस ने बताया, ‘‘आजकल मम्मी की तबीयत खराब चल रही है, इसी कारण डाक्टर को हर माह रुपया देना पड़ रहा है.’’

हम चुप हो गए. कुछ कह कर मरना थोड़े ही था लेकिन आखिर कब तक हम ओवरबजट होते?

एक रविवार हम घर पर बैठ कर टेलीविजन देख रहे थे कि विज्ञापन बे्रक आते ही हमारी पत्नी ने टेलीविजन बंद कर के हमारे सामने अखबार का विज्ञापन खोल कर रख दिया.

‘‘क्या है?’’ हम ने प्रश्न किया.

‘‘पढ़ो तो.’’

हम ने पढ़ना प्रारंभ किया. लिखा था, ‘शहर में कोई भभूत वाले बाबा आए हुए हैं जो भभूत दे कर पुराने रोगों को ठीक कर देते हैं.’ हम ने पढ़ कर अखबार एक ओर रख दिया और आशा भरी नजरों से देखती पत्नी से कहा, ‘‘यह विज्ञापन हमारे किस काम का है?’’

‘‘कैसी बात करते हो? मैं यह विज्ञापन आप को थोड़े ही जाने के लिए पढ़वा रही थी?’’

‘‘फिर?’’ हम ने कुत्ते की तरह सतर्क होते हुए सवाल किया.

‘‘मेरी मम्मी के लिए,’’ हिनहिनाती पत्नी ने जवाब दिया.

‘‘ओह, क्यों नहीं.’’

‘‘लेकिन एक बात है…’’

‘‘क्या बात है?’’ बीच में बात को रोकते हुए कहा.

‘‘कालोनी की एकदो महिलाएं इलाज के लिए गई थीं तो बाबा एवं बाबी ने उन्हें…’’

‘‘बाबा… बाबी…यानी, मैं कुछ समझा नहीं?’’ हम ने घनचक्कर की तरह प्रश्न किया.

‘‘अजी, मास्टर की घरवाली मास्टरनी, डाक्टर की बीवी डाक्टरनी तो बाबा की बीवी बाबी…’’ पत्नी ने अपने सामान्य ज्ञान को हमारे दिमाग में डालते हुए कहा.

हो…हो…कर के हम हंस दिए, फिर हम ने प्रश्न किया, ‘‘तो क्या बाबा व बाबी मिल कर इलाज करते हैं?’’

‘‘जी हां, कालोनी की कुछ महिलाएं उन के पास गई थीं. लौट कर उन्होंने बताया कि बाबा का बड़ा आधुनिक इलाज है.’’

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‘‘यानी?’’

‘‘किसी को भभूत देने के पहले वे उस की ब्लड रिपोर्ट, ब्लडप्रेशर, पेशाब की जांच देख लेते हैं फिर भभूत देते हैं,’’ पत्नी ने हमें बताया तो विश्वास हो गया कि ये निश्चित रूप से वैज्ञानिक आधार वाले बाबाबाबी हैं.

‘‘तो हमें क्या करना होगा?’’

‘‘जी, करना क्या है, मम्मीजी के सारे टेस्ट करवा कर ही हम भभूत लेने चलते हैं,’’ पत्नीजी ने सलाह देते हुए कहा.

‘‘ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा,’’ हम ने कहा और टेलीविजन चालू कर के धारावाहिक देखने लगे.

अगले दिन पत्नी हम से 1 हजार रुपए ले कर अपनी मम्मी के पूरे टेस्ट करवा कर शाम को लौटी. हम से शाम को कहा गया कि अगले दिन की छुट्टी ले लूं ताकि मम्मीजी को भभूत वाले बाबाजी के पास ले जाया जा सके. मन मार कर हम ने कार्यालय से छुट्टी ली और किराए की कार ले कर पूरे खानदान के साथ भभूत वाले बाबा के पास जा पहुंचे. वहां काफी भीड़ लगी थी.

हम ने दान की रसीद कटवाई, जो 501 रुपए की काटी गई थी. हम तीनों प्राणियों का नंबर दोपहर तक आया. अंदर गए तो चेंबर में नीला प्रकाश फैला था. विशेष कुरसी पर बाबाजी बैठे थे. उन के दाईं ओर कुरसी पर मैडम बाबी बैठी थीं. हमारी सास ने औंधे लेट कर उन के चरण स्पर्श किए. बाबाजी के सामने एक भट्ठी जल रही थी. उस ने हमारी सास से आगे बढ़ने को कहा और बोला, ‘‘यूरिन, ब्लड टेस्ट होगा.’’

पत्नीजी मेंढकी की तरह उचक गईं और कहने लगीं, ‘‘हम करवा कर लाए हैं.’’

‘‘उधर दे दो,’’ नाराजगी से बाबा ने देखते हुए कहा.

ब्लड, यूरिन रिपोर्ट मैडम बाबी को दी तो उन्होंने रिपोर्ट देखी, गोलगोल घुमाई और मेरी सास के हाथों में दे दी. बारबार मुझे न जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि बाबा को कहीं देखा है लेकिन वह शायद मेरा भ्रम ही था.

बाबाजी ने सासूजी को पास बुलाया. जाने कितने राख के छोटेछोटे ढेर उन के पास लगे थे. 1 मिनट के लिए प्रकाश बंद हुआ और संगीत गूंज उठा. मेरा दिल धकधक करने लगा था. मैं ने पत्नी का हाथ पकड़ लिया. 1 मिनट बाद रोशनी हुई तो बाबा ने राख में से एक मुट्ठी राख उठा कर कहा, ‘‘इस भभूत से 50 पुडि़या बना लेना और सुबह, दोपहर, शाम श्रद्धा के साथ बाबा कंकड़ेश्वर महाराज की जय बोल कर खा लेना और 10 दिन बाद फिर ब्लडशुगर, यूरिन की जांच यहां से करवा कर लाना.’’

इतना कह कर बाबा ने एक लैबोरेटरी का कार्ड थमा दिया. हम बाहर आए. सुबह ही हमारी सास ने श्रद्धा के साथ कंकड़ेश्वर महाराज की जय कह कर भभूत को फांक लिया. दोपहर में दूसरी बार, जब शाम को हम कार्यालय से लौटे तो हमारी पत्नीजी हम से आ कर लिपट गईं और बोलीं, ‘‘मम्मीजी को बहुत फायदा हुआ है.’’

‘‘सच?’’

‘‘वे अब अच्छे से चलनेफिरने लगी हैं, जय हो बाबा कंकडे़श्वर की,’’ पत्नी ने श्रद्धा के साथ कहा.

हमें भी बड़ा आश्चर्य हुआ. होता होगा चमत्कार. हम ने भी मन ही मन श्रद्धा के साथ विचार किया. पत्नी ने सिक्सर मारते हुए हमारे कानों में धीरे से कहा, ‘‘सुनो, नाराज न हो तो एक बात कहूं?’’

‘‘कहो.’’

‘‘हमारी शादी के 2 साल हो गए हैं. एक पुत्र के लिए हम भी भभूत मांग लें,’’ पत्नी ने शरमातेबलखाते हुए कहा.

‘‘क्या भभूत खाने से बच्चा पैदा हो सकता है?’’ मैं ने प्रश्न किया.

‘‘शायद कोई चमत्कार हो जाए,’’ पत्नी ने पूरी श्रद्धा के साथ कहा.

मैं बिना कुछ कहे घर के अंदर चला आया.

सच भी था. मेरी सास की चाल बदल गई थी. उन की गठिया की बीमारी मानो उड़न छू हो गई थी. मेरे दिल ने भी कहा, ‘क्यों न मैं भी 2-2 किलो राख (भभूत) खा कर शरीर को ठीक कर लूं.’

रात को बिस्तर पर सोया तो फिर भभूत वाले बाबा का चेहरा आंखों के सामने डोल गया. कहां देखा है? लेकिन याद नहीं आया. हम ने मन ही मन विचार किया कि कल, परसों छुट्टी ले कर हम भी भभूत ले आएंगे. पत्नी को भी यह खुशखबरी हम ने दे दी थी. वे?भी सुंदर सपने देखते हुए खर्राटे भरने लगीं.

सुबह हम उठे. हम ने चाय पी और जा कर समाचारपत्र उठाया. अखबार खोलते ही हम चौंक गए, ‘भभूत वाले बाबा गिरफ्तार’ हेडिंग पढ़ते ही घबरा गए कि आखिर क्या बात हो गई? समाचार विस्तार से लिखा था कि भभूत वाला चमत्कारी बाबा किसी कसबे का झोलाछाप डाक्टर था जिस की प्रैक्टिस नहीं चलती थी, जिस के चलते उस ने शहर बदल लिया और बाबा बन गया. ब्लड, यूरिन की रिपोर्ट देख कर भभूत में दवा मिला कर दे देता था जिस से पीडि़त को लाभ मिलता था.

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पिछले दिनों एक ब्लडशुगर के मरीज को उस ने शुगर कम करने की दवा भभूत में मिला कर दे दी. ओवरडोज होने से मरीज सोया का सोया ही रह गया. शिकायत करने पर पुलिस ने भभूत वाले बाबा को गिरफ्तार कर लिया. लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई है. अंत में लिखा था, ‘किसी भी तरह की कोई भभूत का सेवन न करें, उस में स्टेराइड मिला होने से तत्काल कुछ लाभ दिखलाई देता है, लेकिन बाद में बीमारी स्थायी हो जाती है.’ एक ओर बाबा का फोटो छपा था. अचानक हमारी याददाश्त का बल्ब भी जल गया. अरे, यह तो हमारे गांव के पास का व्यक्ति है, जो एक कुशल डाक्टर के यहां पट्टी बांधने का काम करता था और फिर डाक्टर की दवाइयां ले कर लापता हो गया था.

हम बुरी तरह से घबरा गए. हम ने विचार किया, पता नहीं रात को हमारी सास भी स्वर्ग को न चली गई हों. हम अखबार लिए अंदर को दौड़ पड़े. सासू मां किचन में भजिए उड़ा रही थीं और भभूत वाले बाबा के गुणगान गा रही थीं. सासू मां को जीवित अवस्था में देख हम खुश हुए. हमें आया देख कर वे कहने लगीं, ‘‘आओ, दामादजी, मुझे बिटिया ने बता दिया कि तुम भी भभूत वाले बाबा के यहां जा रहे हो… देखना, बाबा कंकड़ेश्वर जरूर गोद हरीभरी करेंगे.’’

हम ने कहा, ‘‘आप की भभूत कहां रखी है?’’

उन्होंने पल्लू में बंधी 40-50 पुडि़यां हमें दे दीं. हम ने वे ले कर गटर में फेंक दीं. पत्नी और उन की एकमात्र मम्मी नाराज हो गईं. हम ने कहा, ‘‘हम अपनी सास को मरते हुए नहीं देखना चाहते.’’

‘‘क्या कह रहे हो?’’ सासजी ने नाराजगी से कहा.

‘‘बिलकुल सच कह रहा हूं, मम्मी,’’ कह कर मैं ने वह अखबार पढ़ने के लिए आगे कर दिया.

दोनों ने पढ़ा और माथा पकड़ लिया. हम ने कहा, ‘‘वह भभूत नहीं बल्कि न जाने कौन सी दवा है जिस के चलते उस के साइड इफेक्ट हो सकते थे. आप जैसी भी हैं, बीमार, पीडि़त, आप हमारे बीच जीवित तो हैं. हम आप को कहीं दूसरे डाक्टर को दिखा देंगे लेकिन इस तरह अपने हाथों से जहर खाने को नहीं दे सकते,’’ कहते- कहते हमारा गला भर आया.

सासूमां और मेरी पत्नी मेरा चेहरा देख रही थीं. सासूमां ने मेरी बलाइयां लेते हुए कहा, ‘‘बेटा, दामाद हो तो ऐसा.’’

हम शरमा गए. सच मानो दोस्तो, घर में बुजुर्ग रूपी वृक्ष की छांव में बड़ी शांति होती है और हम यह छांव हमेशा अपने पर बनाए रखना चाहते हैं. Short story in Hindi

Kahani in Hindi : किराए का घर

Kahani in Hindi : सालों बाद मन की मुराद पूरी हुई थी. जिन्दगी का एक बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया था. लंबे इंतजार के बाद आखिरकार हमें हमारा अपना घर मिल गया था. किराये के छोटे से फ्लैट से अपने बड़े से घर में शिफ्ट होने के बाद से तो मेरे पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. बच्चे भी बड़े उत्साहित थे. पूरे घर में फुदकते-चहकते घूमते थे. दिल्ली के घुटनभरे दो कमरे के पुराने से किराए के मकान से इस बड़े से मकान में आना जैसे जन्नत में आने के बराबर था.

कई सालों के बाद बन कर तैयार हुआ था हमारा यह घर. संजू के दादा के गुजरने के बाद मेरे पति को प्रौपर्टी में काफी हिस्सा मिला था, उसको बेच कर हमें एकमुश्त पैसा मिला तो यह बड़ा घर बन पाया. खुला-खुला दो मंजिला, गाड़ी के लिए पार्किंग स्थल, पोर्टिको, सामने छोटा सा किचेन गार्डन. घर के भीतर खूबसूरत चमकती दीवारें. सुंदर पेंट से रची हुई. खिड़कियों पर मंहगे सुंदर पर्दे. अपना ड्राइंग रूम तो मैंने ऐसा सजाया था कि पूछो मत.

मेरी जो भी सहेली मिलने आती ड्राइंगरूम की सजावट पर ही मर मिटती थी. कई तो जल कर खाक भी हो गयीं. मजे की बात तो यह थी कि इस घर में आते ही हमें ऊपर वाली मंजिल में रहने के लिए बढ़िया अमीर किराएदार भी मिल गये. अच्छा किराया आने लगा. मैं और मेरे पति की खुशी बढ़ गयी कि चलो घर की साज-सज्जा का अतिरिक्त खर्चा किराये से ही निकल आएगा. बच जाएगा सो अलग.

उस दिन मैं अपने ड्राइंग रूम में बैठी टीवी पर अपना मनपसंद सीरियल देख रही थी. अचानक मेरी नजर पीछे दीवार से सटे काउच पर गयी. मैं एक झटके से उठ खड़ी हुई. मेरे बेटे संजू ने पीछे की पूरी दीवार अपने रंगीन क्रेओन्स से रंग डाली थी. कहीं पतंग, कहीं तितली, कहीं फूल, कहीं घर और नदी…. न जाने क्या-क्या बना डाले थे दीवार पर. खूबसूरत दीवार का सत्यानाश कर डाला था उसने.

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मैं गुस्से में उठी और संजू के सारे क्रेओन्स उठा कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिये. दो थप्पड़ लगाये और चीख कर पूछा, ‘तुझे घर की दीवारें गंदी करते शर्म नहीं आयी? दीवार का सारा पेंट खराब कर डाला. कितना गंदा लग रहा है. पापा देखेंगे तो कितना गुस्सा करेंगे…आने दे तेरे पापा को… आज तेरी अच्छी कुटायी करवाती हूं… ’

संजू रोते हुए बोला, ‘पर मम्मी इससे पहले भी तो मैं घर की दीवारों पर लिखता था. तब तो आपने कभी नहीं डांटा. आप भी तो रसोई की दीवार पर दूध वाले का, काम वाली का हिसाब लिखती थीं…?’

मैं चिल्लायी, ‘संजू, वह किराए का घर था, यह हमारा अपना घर है. इसे गंदा नहीं करना चाहिए.’

इसके बाद जो बात संजू ने कही उसको सुन कर मेरी बोलती ही बंद हो गयी.

संजू ने कहा, ‘तो मम्मी, किराए के घर में लिख सकते हैं? फिर तो ऊपर जो किराएदार आये हैं, वह भी दीवारों पर लिख सकते हैं न? उनकी बेटी बहुत अच्छी ड्राइंग बनाती है…मैं कल से ऊपर जाकर उसके साथ ही ड्राइंग करूंगा…. फिर तो आप नाराज नहीं होएंगी न?’ Kahani in Hindi

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Indian Politics: इमल्सिफिकेशन सी होती है गठबंधनीय राजनीति

Indian Politics: बिहार विधानसभा चुनाव जैसेजैसे वक्त गुजरता जा रहा है वैसेवैसे उबाऊ भी होते जा रहे हैं उन का रोमांच झाग की तरह साबित हो रहा है तो इस की एक बड़ी वजह गठबंधन वाली राजनीति भी है जिस में विपरीत विचारधारा वाले दल भी दूध में पानी की तरह मिल गए लगते हैं लेकिन हकीकत में वे इमल्शन हो गए हैं जिन के घटक कभी भी अलग हो जाते हैं और कभी भी घुल मिल जाते हैं.

इमल्सिफिकेशन वह प्रक्रिया है जिस में दो अमिश्रणीय तरल पदार्थ जैसे तेल और पानी को मिला कर एक मिश्रण जिसे इमल्शन कहा जाता है बनाते हैं. यह मिश्रण तब तक स्थिर रहता है जब तक एक इमाल्सिफायर मौजूद हो जो दोनों तरल पदार्थों को एक दूसरे में फैलने और अलग न होने में मदद करता है.

गठबंधनीय राजनीति का हाल भी कुछ ऐसा ही है जिस में दो या उस से ज्यादा दल मिल कर एक इमल्शन यानी गठबंधन बनाते हैं जो तभी तक स्थिर रहता है जब तक कुर्सी या सत्ता नाम का इमाल्सिफायर मौजूद हो. जो दोनों दलों को एक दूसरे में विलय होने और अलग न होने देने में मदद करता है.

एमल्सिफायर एक ऐसा पदार्थ होता है जो तेल और पानी के बीच की सतह के तनाव को कम करता है. इस के अणुओं का एक हिस्सा पानी के प्रति आकर्षित होता है जिसे हाइड्रोफिलिक कहते हैं और दूसरा जिसे हाइड्रोफोबिक कहते हैं तेल के प्रति आकर्षित होता है जिस से दोनों तरल पदार्थ जुड़े रहते हैं.

गठबंधन बनाम इमल्सिफिकेशन

इस रासायनिक क्रिया की एक और दिलचस्प बात यह भी है कि इमल्शन अस्थाई होता है और समय के साथ तेल व पानी अलग हो जाते हैं. इमाल्सिफायर इस अलगाव को रोकता है जिस से मिश्रण स्थिर रहता है. बिहार की राजनीति और विधानसभा चुनाव की केमेस्ट्री के मद्देनजर देखें तो हो यही राजनैतिक क्रिया रही है जिसे दोनों गठबंधनों से सहज समझा जा सकता है. एनडीए में चार दल भाजपा, जदयू, हम और एलजेपी हैं. पिछले चुनाव में एलजेपी ने अपने दम पर चुनाव लड़ा था. अब वह वापस एनडीए में है. तब एनडीए को बहुमत से महज 3 ही ज्यादा यानी 125 सीटें मिली थी.

तब महागठबंधन को 110 सीट मिलीं थीं 8 सीटें इधरउधर बंट गई थी. इस इमल्शन के घटक थे आरजेडी, कांग्रेस और तमाम वामदल जिन्होंने 16 सीट जीतकर सभी को चौंका दिया था इन में से भी 12 सीट अकेले सीपीआई माले के खाते में गई थीं.

अब इस चुनाव में समीकरणथोड़े बदले हैं. पिछले चुनाव में 4 सीट जीतने वाली विकासशील इंसान पार्टी ( वीआईपी ) एनडीए का साथ छोड़ कर महागठबंधन के साथ लड़ रहा है.

यानी साफ है कि गठबंधनों में शामिल दलों का कोई इमान धरम नहीं होता. सभी का मकसद स्वार्थ और मंजिल कुर्सी होती है जिस के लिए वे अपने उसूल बेच भी देते हैं और गांठ में पैसा हो तो दूसरे के खरीद भी लेते हैं. ऐसे में इन से जनता के भले की उम्मीद करना एक बेकार की बात है. बतौर उदहारण या मिसाल देखें तो एनडीए में एलजेपी के चिराग पासवान और हम के जीतन राम माझी की मूल विचारधारा दलित हिमायती और मनुवाद विरोधी रही है. इस के बाद भी वे बनियों और ब्राह्मणों की कही जाने वाली भाजपा की गोद में क्यों बैठे हैं. जाहिर है सत्ता के लिए.

उधर भाजपा के हाल भी जुदा नहीं उसे कुर्सी हासिल करने के लिए दलित वोटों की दरकार रहती है इसलिए वह इन दोनों की मुहताज रहती है.
बिहार के लिहाज से देखें तो इस समीकरण के तहत होता यह है कि चिराग पासवान और जीतनराम माझी के दलित वोट उसे मिल जाते हैं और इन दोनों को सवर्ण वोट उन्हें मिल जाते हैं. जद यू को अपने कोर वोट कुर्मी समुदाय के अलावा छुटपुट वोट मुसलमानों और दलितों के भी मिलते रहते हैं. उसे भी अपनी सीटों पर भाजपा के सवर्ण वोटों का टेका मिल जाता है, एवज में कुर्मी वोट थोक में भाजपा को मिल जाते हैं. इस चुनाव में ऐसा होगा ऐसा लग नहीं रहा क्योंकि मुसलमानों, दलितों और अति पिछड़े समुदायों का मोहभंग नीतिश कुमार से हुआ है. इस से घाटा दोनों दलों का ही होगा.

महागठबंधन इस पैमाने पर कुछ बेहतर स्थिति में है क्योंकि कांग्रेस और आरजेडी का वोट बेंक लगभग एक सा है. यादव, मुसलमान और दलित वोटों की उसे आस है. एक हकीकत यह भी है कि आरजेडी का वोट बैंक कभी कांग्रेस का ही हुआ करता था. वामपंथी दलों को अति पिछड़ों और महादलितों के वोट मिलते रहे हैं जिन्हें कांग्रेस से ज्यादा परहेज नहीं जिस का और आरजेडी का वोट उसे मिलने का ही नतीजा था कि वह 2020 में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन ये दल कर पाए थे.

मूल स्वभाव के साइड इफैक्ट्स

इमल्सिफिकेशन में तेल और पानी यों ही नहीं मिल जाते हैं. इस के लिए तेल और पानी को जोर से हिलाया और फेंटा जाता है जिस से इन दोनों में से किसी एक की बूंदें दूसरे में फैल जाती हैं. लेकिन इन दोनों के गुणधर्म नहीं बदलते मतलब गठबंधनो में शामिल दलों का मूल स्वभाव कायम रहता है. जैसे भाजपा का हिंदुत्व का एजेंडा मनुवाद और मंदिर नीति दलित दलों के साथ चुनाव लड़ने से खत्म नहीं हो जाते हां इन पर बिहार में वह ज्यादा ढिंढोरा नहीं पीटती. इसी तरह जीतनराम माझी और चिराग पासवान भाजपा की इन नीतियों से इत्तफाक न रखते हुए भी महज सत्ता के लिए भाजपा के पिछलग्गू बने रहते हैं.

इन दोनों नेताओं में एक बड़ा फर्क यह है कि चिराग धीरेधीरे भाजपा की संगत के चलते पूजापाठ और सार्वजनिक रूप से कर्मकांड करने लगे हैं. लेकिन कभी वे मनुवाद का समर्थन कर पाएंगे ऐसा लगता नहीं क्योंकि एलजेपी की बुनियाद ही मनुवाद और कर्मकांडों के विरोध की रही है जो कि पार्टी के संस्थापक चिराग के पिता रामविलास पासवान ने राखी थी, अगर चिराग इस से भागेंगे तो उन का वोटर उन से भागने लगेगा.

पिछले चुनाव में ऐसा हुआ भी था जब उन की पार्टी एक सीट पर सिमट गई थी जब कि उस ने 117 पर अपने उम्मीदवार उतारे थे.

जीतनराम माझी खुलेआम भाजपा राम मंदिर और मनुवाद की खिलाफत करते रहे हैं. लेकिन ऐसा वे तभी करते हैं जब सत्ता से बाहर होते हैं. चुनाव आते ही वे चोला बदल लेते हैं जो नरेंद्र मोदी उन्हें मनुवाद के पालक पोषक लगते हैं वे चुनाव आते ही यानी इमल्सिफिकेशन की प्रक्रिया शुरू होते ही उन के सर्वमान्य और पूज्यनीय नेता हो जाते हैं.

इस बार वे 15 सीट मांग रहे थे लेकिन भाजपा ने उन्हें 6 ही दीं. इस पर उन के तेवर उग्र नहीं हुए उलटे ढीले पड़ गए क्योंकि दो सीटों से उन के परिवारजन लड़ रहे हैं. जनता और दलित हितों के मुकाबले उन्हें परिवार का हित दिख रहा है सो उन्होंने नरेन्द्र मोदी में आस्था व्यक्त कर दी. जिस से अपने वोटर को यह समझाया जा सके कि हम ने भाजपा के गुणधर्म यानी उस की विचारधारा नहीं अपना ली है.

पौलिटिकल इम्ल्सीफिकेशन कोलाइडल केमेस्ट्री के वास्तविक इमल्सिफिकेशन की तरह ही अस्थाई होता है. यह पूरे देश सहित कई बार बिहार से भी साबित होता रहा है. 2015 के चुनाव में जद यू, आरजेडी और कांग्रेस एक छतरी के नीचे खड़े भाजपाई बारिश का मुकाबला करने यों ही मजबूर नहीं हो गए थे. उस वक्त में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता सर चढ़कर बोल रही थी जिस से देश में ममता बनर्जी के बाद कोई चिढ़ा हुआ था तो वे नीतिश कुमार थे जो मोदी को पानी पी पीकर कोसते रहते थे.

आरजेडी और कांग्रेस के सहयोग से उन्होंने मोदी की लोकप्रियता के रथ को थाम लिया था. तब इस ग्रांड एलाइंस को 177 सीटें मिली थीं.
इस के बाद नीतिश भी मोदी के मुरीद होते चले गए और अपनी सहूलियत और खुदगर्जी के मुताबिक इधरउधर होते रहे. इस से उन की विश्वसनीयता इतनी घटी कि 2020 के चुनाव में जद यू 43 सीटों पर सिमट गई और भाजपा छलांग लगा कर 74 पर पहुंच गई.

इस की एक वजह यह भी थी कि कुछ नहीं बल्कि कई सीटों पर सवर्ण वोटों ने जद यू को वोट नहीं किया दूसरी तरफ जद यू के वोटर ने ईमानदारी से भाजपा को वोट किया अब जद यू का वोटर इस चुनाव में इस का बदला निकाले तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी.

उबल नहीं रही जनता

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां है जब कि उन की सहयोगी पार्टियां क्षेत्रीय पार्टियां हैं जिन के मुखिया मूलतः वोट शिफ्टिंग का काम करते हैं और उस का कमीशन इन से वसूलते हैं. सौदेबाजी और सियासी माहौल के मुताबिक यह कमीशन कम ज्यादा होता रहता है. इस इमल्सिफिकेशन में हैरत और दिलचस्पी की एक बड़ी बात या सवाल जिस का जवाब अच्छेअच्छे सियासी पंडितों और विश्लेषकों के पास नहीं वह यह है कि आखिर दलित तबका जो दो बड़े वोट शिफ्टर्स पासवान और माझी के पास है भाजपा को आसानी से वोट क्यों कर देता है. यह लगभग 6 फीसदी है जो भाजपा को तकरीबन 40 सीटों पर फायदा पहुंचाता है.

महागठबंधन के वोटर में इतनी ईमानदारी और कमिटमेंट दोनों नहीं दिखते. पिछला नतीजा देख कहा जा सकता है कि कांग्रेस का सवर्ण वोट जो 20 – 25 फीसदी के लगभग है उस ने आरजेडी को वोट नहीं किया क्योंकि लालू यादव भी माझी की तरह मनुवाद के घोर विरोधी हैं इसी तरह आरजेडी के पूरे यादव वोट कांग्रेस को नहीं मिलते दिखते, अगर ऐसा होता तो कांग्रेस 2020 के चुनाव में 19 सीटों पर सिमट कर नहीं रह जाती.

ऐसा इसलिए कि कहीं तेल की मात्रा ज्यादा थी तो कहीं पानी की कई बार वोटर ने इन को ढंग से परखा यानी फेंटा ही नहीं क्योंकि उस की दिलचस्पी चुनावों से खत्म हो चली थी. ऐसा ही इस बार भी होता दिख रहा है तो इस का सीधा सा मतलब है कि जनता किसी भी मुद्दे को ले कर उबल नहीं रही है न राम मंदिर पर और न ही संविधान या हिंदूमुसलिम पर ( इसे जनता ने लोकसभा का विषय मान लिया है ) हां आंशिक असर युवा बेरोजगारी और महंगाई का दिखता है लेकिन उस के चलते कितने फीसदी वोट इधरउधर लुढ़केंगे यह तो 14 नवंबर को पता चलेगा जब नतीजे घोषित हो रहे होंगे जिन से साबित यह भी होगा कि इम्लसिफिकेशन यानी गठबंधन वाली राजनीति का भविष्य क्या है. Indian Politics

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