Download App

Family Responsibilities : मेरे कंधों पर परिवार की सारी जिम्मेदारियां आ गई हैं

Family Responsibilities : मैं 40 वर्षीय पति हूं. नौकरी का तनाव, बच्चों की पढ़ाई का खर्च, घर की जिम्मेदारी, सबकुछ मुझे ही संभालना पड़ता है. पत्नी को लगता है कि मैं उस के लिए समय नहीं निकालता. सच यह है कि मेरे पास खुद के लिए भी समय नहीं है. कभीकभी लगता है कि जिंदगी सिर्फ बोझ बन गई है. मैं क्या करूं?

जवाब : आप की समस्या बिलकुल वास्तविक है. एक पति और पिता के रूप में अकसर आदमी को ‘कमाने वाली मशीन’ मान लिया जाता है. भावनाएं, थकान और तनाव उस के हिस्से में दिखाई ही नहीं देते. लेकिन याद रखिए, आप भी इंसान हैं और आप का मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है.

सब से पहले, अपने तनाव को पत्नी से साझा कीजिए. अकसर पत्नियां यह मान लेती हैं कि पति सिर्फ काम में व्यस्त हैं और भावनाओं को समझना उन का काम नहीं. लेकिन जब आप खुल कर बताएंगे कि नौकरी और जिम्मेदारियों का दबाव आप को कितना थका रहा है तो वे निश्चित ही आप को समझेंगी.

बच्चों और पत्नी के साथ रोजाना थोड़ा समय बिताइए. साथ में खाना खाना या सिर्फ बातचीत करना भी पर्याप्त है. इस से आप के रिश्ते मजबूत होंगे और परिवार को भी लगेगा कि आप सिर्फ कमाने वाले नहीं, बल्कि साथ निभाने वाले भी हैं.

खुद को आराम देना सीखें. हर समय काम और जिम्मेदारी के बोझ तले दबे रहना आप की सेहत के लिए खतरनाक है. सप्ताह में एक दिन सिर्फ परिवार और अपने लिए रखिए.

सब से अहम बात यह समझें कि जिम्मेदारियां कभी खत्म नहीं होंगी. लेकिन अगर आप संतुलन से उन्हें निभाएंगे तो न सिर्फ आप खुश रहेंगे, बल्कि परिवार भी आप की अहमियत को और बेहतर समझेगा. Family Responsibilities

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे. 

Family Conflicts : मेरी सास मुझे घर के काम न करने के चलते ताने मारती है

Family Conflicts : मैं एक नौकरीपेशा महिला (29 वर्ष) हूं. मेरी शादी को 4 साल हो चुके हैं. मेरी सासुमां को लगता है कि मैं घर की जिम्मेदारी नहीं निभा रही हूं. वे आएदिन मुझ पर ताने मारती हैं कि मैं ‘घर की बहू जैसी नहीं हूं’ और ‘घर बरबाद कर रही हूं.’ मैं दिनभर औफिस में मेहनत करती हूं, फिर भी मुझे समझने वाला कोई नहीं है. मेरे पति मुझ से कहते हैं कि मैं मां को नजरअंदाज करूं, पर यह रोजरोज सहना आसान नहीं है.

जवाब : सब से पहले, यह समझना जरूरी है कि पीढि़यों के बीच सोच का अंतर सामान्य है पर इसे संवाद से सुलझाया जा सकता है. आप अपनी सास के साथ एक दिन बैठें और उन से विनम्रता से बात करें. उन्हें बताएं कि आप घर को ले कर लापरवाह नहीं हैं, बल्कि संतुलन बनाने की कोशिश कर रही हैं. एक बार सासुमां से अकेले में शांति से बात करें, उन्हें बताइए कि आप उन की इज्जत करती हैं और घर को भी उतना ही अपना मानती हैं जितना वह.

यह भी पूछें कि उन्हें किस चीज से सब से ज्यादा तकलीफ होती है. शायद वे सिर्फ ध्यान चाहती हैं. अगर संभव हो तो किसी काम में उन्हें शामिल करें, ताकि वे उपयोगी महसूस करें, जैसे घर की रसोई में उन से राय लेना, उन्हें बताना कि आप औफिस में क्या करती हैं आदि.

उन्हें यह महसूस कराइए कि वह बेकार नहीं हो रही हैं. उन की जगह अब भी खास है. पति से भी कहें कि वे सुलह की प्रक्रिया में हिस्सा लें. पति को सिर्फ सुनने वाला नहीं, साथ निभाने वाला बनाएं.

उन से कहिए, ‘तुम मुझे नजरअंदाज नहीं करते, यह मैं जानती हूं लेकिन जब घर में मुझे बारबार नीचा दिखाया जाता है तो तुम्हारी चुप्पी मुझे अकेला कर देती है.’

उन से अनुरोध करें कि वे मां को समझाएं कि आप दोनों मिल कर घर चला रहे हैं. अकेले कोई नहीं. पति को बीच में ‘ढाल’ नहीं बनाना है, बल्कि ‘सेतु’ बनाना है मां और पत्नी के बीच.

आप किसी को जबरन नहीं बदल सकतीं लेकिन रिश्ते में बदलाव लाने का पहला कदम आप जरूर उठा सकती हैं. Family Conflicts

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Donald Trump : मृत अर्थव्यवस्था

Donald Trump : ‘मृत अर्थव्यवस्थाएं’ – ये शब्द भारत और रूस के बारे में अमेरिका के वर्तमान खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हैं. शायद ये सही हैं. भारत का दिखने वाला एकमात्र लक्ष्य ‘हिंदूमुसलिम’ है, रूस का दिखने वाला एकमात्र लक्ष्य यूक्रेन पर विजय पाना है. ऐसी अर्थव्यवस्थाएं जिन का लक्ष्य ही विध्वंस, विनाश, विवाद और विकासहीनता हो उन्हें मरा हुआ ही कहा जा सकता है. भारत कुछ ऐसा ही 1707 और 1947 के बीच में रहा.

जीवित अर्थव्यवस्था वह है जिस का लक्ष्य लोगों को खुश करना, उन की रोजीरोटी का इंतजाम करना, समाज के हर हिस्से को बराबरी व सुरक्षा दिलवाना, सरकारी कारिन्दों को काबू में रखना, लिखनेपढ़ने व समझने की सब को छूट देना हो. हमारी अर्थव्यवस्था में यह कहीं नजर आ रहा है क्या? रूस के शासक व्लादिमीर पुतिन के मुंह से आम रूसी के लिए कुछ कहते सुना जा रहा है क्या?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को सिर्फ इसलिए हिला दिया है क्योंकि वे अमेरिका को अपने हिसाब से महान देखना चाहते हैं. वे नए हथियारों की बात नहीं कर रहे, जमीनें छीनने की बात नहीं कर रहे बल्कि वे अमेरिकियों को काम के नए मौके और उन्हें बेहतर जीवन देने की बात कर रहे हैं. इधर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत का नारा तो दिया पर किया पाखंड का विकास जो गलीगली में पैर पसार रहा है. पुतिन गलीगली से पुरुषों को पकड़ कर यूक्रेन भेज रहे हैं और हम कांवड़ यात्रा पर. डोनाल्ड ट्रंप ये दोनों हरकतें नहीं कर रहे.

डोनाल्ड ट्रंप का राज कोई आदर्श नहीं है. वे मागा गैंग चला रहे हैं, जिसे सिर्फ गोरों का राज चाहिए, चर्च का राज चाहिए. सिवा गैरकानूनी ढंग से घुसे विदेशियों को बाहर निकालने के ट्रंप अपने नागरिकों को परेशान नहीं कर रहे. उन्होंने बहुत सी सोशल सेवाओं में कटौती की है क्योंकि उन का विश्वास है कि लोग मेहनत करें, पैसा कमाएं, पैसा बचाएं. उन्होंने टैरिफ के भिड़ का छत्ता छेड़ दिया है ताकि दूसरे देश अमेरिकी माल पर उतना ही टैक्स लगाएं जितना दूसरे देशों के सामान पर अमेरिका में लगता रहा है. वे बारबार अमेरिका में ज्यादा जौब्स, सस्ता सामान, कारखानों की बात कर रहे हैं. वे पुतिन और मोदी की तरह धर्म और युद्ध में पैसा बरबाद करने की बात नहीं कर रहे.

भारतीय नेता उन के मृत अर्थव्यवस्था बयान से चिढ़े हुए हैं क्योंकि वे जानते हैं कि जो भी भारत की अर्थव्यवस्था में दिख रहा है वह उस पैसों के चलते है जो विदेशों में भारतीय मूल के मजदूर 12-14 घंटे काम कर कमा व अपने भूखे परिवारों को भारत में भेज रहे हैं. हमारी उन्नति तो केवल धर्मस्थलों में दिख रही है जहां भीड़ बढ़ गई है क्योंकि मौजूदा भगवा सरकार भरपूर प्रचार कर लोगों को तीर्थों, मंदिरों, पहाड़ों के मंदिरों, अविश्वसनीय चिकित्सा व्यवस्थाओं की ओर धकेल रही है. यह 1947 से पहले का जमाना है जो लौट रहा है.

वर्ष 1947 से पहले अंगरेजों को सिर्फ भारत से सैनिक चाहिए होते थे जिन का इस्तेमाल वे अपने छोटे से द्वीप और उस के पचासियों उपनिवेशों की रक्षा में करते थे. हमारी अर्थव्यवस्था लगभग मरी हुई थी. आज अगर विदेशों से आए मजदूरों के पसीने के पैसों को छोड़ दें तो हमारी अर्थव्यवस्था मरी हुई ही समझ. हे राम!  Donald Trump

Election Commission Of India : वोट का अधिकार

Election Commission Of India : चुनाव आयोग ने अपनी प्रैस कौन्फ्रैंस में एक ऐसा पैंतरा फेंका जो हर सरकारी कारिन्दा अकसर फेंकता है. यह पैंतरा है अपनी गलती होते हुए भी गलती न मानना बल्कि दूसरे को गलत ठहरा देना. गलत तो हमेशा नागरिक होता है और सरकार ने गलती की भी है तो यह नागरिक का दायित्व है कि वह उसे ठीक कराए, सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे, फौर्म दर फौर्म भरे, दस्तावेज संलग्न करे.

देश के संविधान के मुताबिक, चुनाव आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है कि वह सही ढंग से चुनाव कराए कि देश का कोई वोटर वोट देने से वंचित न रह जाए. लेकिन चुनाव आयोग एक आम टैक्स विभाग और पुलिस विभाग की तरह कहने लगा है कि उस का काम सुविधा देने का नहीं, बस, प्लेटफौर्म बनाने का है. उक्त प्लेटफौर्म में वह मनमाने नियमों के अनुसार नागरिक को जबरन धक्के खाते हुए मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए फोर्स करता है.

17 अगस्त को चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता एक तानाशाह अफसर की तरह प्रैस को संबोधित करते हुए बारबार अपनी गलतियों को स्वीकार न करते हुए उन की जिम्मेदारी नागरिकों पर डालते रहे.

अगर मतदाता सूची चुनाव आयोग के अफसरों ने घरघर जा कर बनाई तो उस में गलती हुई ही क्यों? अगर गलती है तो चुनाव आयोग के अफसर क्यों न सजा पाएं? मतदान के हक को छीनने के अपराध को हत्या के अपराध की तरह क्यों न माना जाए, चाहे वह चुनाव आयोग के अफसर द्वारा छीना गया हो? देश की जमीन, नदियों, संपत्ति, पहाड़ों, पेड़ों, कंपनियों, न्यायालयों, रेलों आदि को चलाने की नीतियां बनाने के लिए उन की मालिक जनता चुनाव के जरिए नेताओं को सिर्फ प्रबंध करने का अवसर सौंपती है. चुनाव आयोग कोई संपत्ति का हस्तांतरण नहीं करता.

लेकिन चुनाव आयोग की प्रैस कौन्फ्रैंस साफ दर्शाती है कि लोकतंत्र की ‘नसबंदी’ किए जाने की पूरी कोशिश की जा रही है और जनता को चुनाव के समय यह सम?ाया जा रहा है कि वोट देना तो केवल मात्र एक टोकन है, वरना जनता तो उतनी ही गुलाम है जितनी 1947 से पहले थी, अंगरेजों व मुगलों के जमाने में थी, रामायण, महाभारत और पुराणों की कहानियों में थी.

जनता का फर्ज चुनने के हक पर आंच न आने देने का है. यह सब से बड़ा हक है. यही हक उस के बाकी हकों की सुरक्षा करता है. जिस दिन यह हक छिन गया उस दिन से जनता की न अपनी संपत्ति का हक बचेगा, न नौकरी का, न शिक्षा का, न स्वास्थ्य का, न घूमनेफिरने का और न ही बोलने का. सरकार की आलोचना करने के हक को तो भूल ही जाएं. अभी इस वोट के हक को चुनाव आयोग छीन रहा है, खुल्लमखुल्लाElection Commission Of India

Hindi Love Stories : सायोनारा – उस दिन क्या हुआ था अंजू और देव के बीच ?

Hindi Love Stories : उन दिनों देव झारखंड के जमशेदपुर स्थित टाटा स्टील में इंजीनियर था. वह पंजाब के मोगा जिले का रहने वाला था. परंतु उस के पिता का जमशेदपुर में बिजनैस था. यहां जमशेदपुर को टाटा भी कहते हैं. स्टेशन का नाम टाटानगर है. शायद संक्षेप में इसीलिए इस शहर को टाटा कहते हैं. टाटा के बिष्टुपुर स्थित शौपिंग कौंप्लैक्स कमानी सैंटर में कपड़ों का शोरूम था.

देव ने वहीं बिष्टुपुर के केएमपीएस स्कूल से पढ़ाई की थी. इंजीनियरिंग की पढ़ाई उस ने झारखंड की राजधानी रांची के बिलकुल निकट बीआईटी मेसरा से की थी. उसी कालेज में कैंपस से ही टाटा स्टील में उसे नौकरी मिल गई थी. वैसे उस के पास और भी औफर थे, पर बचपन से इस औद्योगिक नगर में रहा था. यहां की साफसुथरी कालोनी, दलमा की पहाड़ी, स्वर्णरेखा नदी और जुबली पार्क से उसे बहुत लगाव था और सर्वोपरी मातापिता का सामीप्य.

खरकाई नदी के पार आदित्यपुर में उस के पापा का बड़ा सा था. पर सोनारी की कालोनी में कंपनी ने देव को एक औफिसर्स फ्लैट दे रखा था. आदित्यपुर की तुलना में यह प्लांट के काफी निकट था और उस की शिफ्ट ड्यूटी भी होती थी. महीने में कम से कम 1 सप्ताह तो नाइट शिफ्ट करनी ही पड़ती थी, इसलिए वह इसी फ्लैट में रहता था. बाद में उस के पापामम्मी भी साथ में रहने लगे थे. पापा की दुकान बिष्टुपुर में थी जो यहां से समीप ही था. आदित्यपुर वाले मकान के एक हिस्से को उन्होंने किराए पर दे दिया था.

इसी बीच टाटा स्टील का आधुनिकीकरण प्रोजैक्ट आया था. जापान की निप्पन स्टील की तकनीकी सहायता से टाटा कंपनी अपनी नई कोल्ड रोलिंग मिल और कंटिन्युअस कास्टिंग शौप के निर्माण में लगी थी. देव को भी कंपनी ने शुरू से इसी प्रोजैक्ट में रखा था ताकि निर्माण पूरा होतेहोते नई मशीनों के बारे में पूरी जानकारी हो जाए. निप्पन स्टील ने कुछ टैक्निकल ऐक्सपर्ट्स भी टाटा भेजे थे जो यहां के वर्कर्स और इंजीनियर्स को ट्रेनिंग दे सकें. ऐक्सपर्ट्स के साथ दुभाषिए (इंटरप्रेटर) भी होते थे, जो जापानी भाषा के संवाद को अंगरेजी में अनुवाद करते थे. इन्हीं इंटरप्रेटर्स में एक लड़की थी अंजु. वह लगभग 20 साल की सुंदर युवती थी. उस की नाक आम जापानी की तरह चपटी नहीं थी. अंजु देव की टैक्निकल टीम में ही इंटरप्रेटर थी. वह लगभग 6 महीने टाटा में रही थी. इस बीच देव से उस की अच्छी दोस्ती हो गई थी. कभी वह जापानी व्यंजन देव को खिलाती थी तो कभी देव उसे इंडियन फूड खिलाता था. 6 महीने बाद वह जापान चली गई थी.

देव उसे छोड़ने कोलकाता एअरपोर्ट तक गया था. उस ने विदा होते समय 2 उपहार भी दिए थे. एक संगमरमर का ताजमहल और दूसरा बोधगया के बौद्ध मंदिर का बड़ा सा फोटो. उपहार पा कर वह बहुत खुश थी. जब वह एअरपोर्ट के अंदर प्रवेश करने लगी तब देव ने उस से हाथ मिलाया और कहा, ‘‘बायबाय.’’

अंजु ने कहा, ‘‘सायोनारा,’’ और फिर हंसते हुए हाथ हिलाते हुए सुरक्षा जांच के लिए अंदर चली गई.

कुछ महीनों के बाद नई मशीनों का संचालन सीखने के लिए कंपनी ने देव को जापान स्थित निप्पन स्टील प्लांट भेजा. जापान के ओसाका स्थित प्लांट में उस की ट्रेनिंग थी. उस की भी 6 महीने की ट्रेनिंग थी. इत्तफाक से वहां भी इंटरप्रेटर अंजु ही मिली. वहां दोनों मिल कर काफी खुश थे. वीकेंड में दोनों अकसर मिलते और काफी समय साथ बिताते थे.

देखतेदेखते दोस्ती प्यार में बदलने लगी. देव की ट्रेनिंग खत्म होने में 1 महीना रह गया तो देव ने अंजु से पूछा, ‘‘यहां आसपास कुछ घूमने लायक जगह है तो बताओ.’’

हां, हिरोशिमा ज्यादा दूर नहीं है. बुलेट ट्रेन से 2 घंटे से कम समय में पहुंचा जा सकता है.

‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. मैं वहां जाना चाहूंगा. द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका ने पहला एटम बम वहीं गिराया था.’’

‘‘हां, 6 अगस्त, 1945 के उस मनहूस दिन को कोई जापानी, जापानी क्या पूरी दुनिया नहीं भूल सकती है. दादाजी ने कहा था कि करीब 80 हजार लोग तो उसी क्षण मर गए थे और आने वाले 4 महीनों के अंदर ही यह संख्या लगभग 1 करोड़ 49 लाख हो गई थी.’’

‘‘हां, यह तो बहुत बुरा हुआ था… दुनिया में ऐसा दिन फिर कभी न आए.’’

अंजु बोली, ‘‘ठीक है, मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूं. परसों ही तो 6 अगस्त है. वहां शांति के लिए जापानी लोग इस दिन हिरोशिमा में प्रार्थना करते हैं.’’

2 दिन बाद देव और अंजु हिरोशिमा गए. वहां 2 दिन रुके. 6 अगस्त को मैमोरियल पीस पार्क में जा कर दोनों ने प्रार्थना भी की. फिर दोनों होटल आ गए. लंच में अंजु ने अपने लिए जापानी लेडी ड्रिंक शोचूं और्डर किया तो देव की पसंद भी पूछी.

देव ने कहा, ‘‘आज मैं भी शोचूं ही टेस्ट कर लेता हूं.’’

दोनों खातेपीते सोफे पर बैठे एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि एकदूसरे की सांसें और दिल की धड़कनें भी सुन सकते थे.

अंजु ने ही पहले उसे किस किया और कहा, ‘‘ऐशिते इमासु.’’

देव इस का मतलब नहीं समझ सका था और उस का मुंह देखने लगा था.

तब वह बोली, ‘‘इस का मतलब आई लव यू.’’

इस के बाद तो दोनों दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए थे. दोनों कब 2 से 1 हो गए किसी को होश न था.

जब दोनों अलग हुए तब देव ने कहा, ‘‘अंजु, तुम ने आज मुझे सारे जहां की खुशियां दे दी हैं… मैं तो खुद तुम्हें प्रपोज करने वाला था.’’

‘‘तो अब कर दो न. शर्म तो मुझे करनी थी और शरमा तुम रहे थे.’’

‘‘लो, अभी किए देता हूं. अभी तो मेरे पास यही अंगूठी है, इसी से काम चल जाएगा.’’

इतना कह कर देव अपने दाहिने हाथ की अंगूठी निकालने लगा.

अंजू ने उस का हाथ पकड़ कर रोकते हुए कहा, ‘‘तुम ने कहा और मैं ने मान लिया. मुझे तुम्हारी अंगूठी नहीं चाहिए. इसे अपनी ही उंगली में रहने दो.’’

‘‘ठीक है, बस 1 महीने से भी कम समय बचा है ट्रेनिंग पूरी होने में. इंडिया जा कर मम्मीपापा को सब बताऊंगा और फिर तुम भी वहीं आ जाना. इंडियन रिवाज से ही शादी के फेरे लेंगे,’’ देव बोला.

अंजू बोली, ‘‘मुझे उस दिन का बेसब्री से इंतजार रहेगा.’’

ट्रेनिंग के बाद देव इंडिया लौट आया. इधर उस की गैरहाजिरी में उस के पापा ने उस के लिए एक लड़की पसंद कर ली थी. देव भी उस लड़की को जानता था. उस के पापा के अच्छे दोस्त की लड़की थी. घर में आनाजाना भी था. लड़की का नाम अजिंदर था. वह भी पंजाबिन थी. उस के पिता का भी टाटा में ही बिजनैस था. पर बिजनैस और सट्टा बाजार दोनों में बहुत घाटा होने के कारण उन्होंने आत्महत्या कर ली थी.

अजिंदर अपनी बिरादरी की अच्छी लड़की थी. उस के पिता की मौत के बाद देव के मातापिता ने उस की मां को वचन दिया था कि अजिंदर की शादी अपने बेटे से ही करेंगे. देव के लौटने के बाद जब उसे शादी की बात बताई गई तो उस ने इस रिश्ते से इनकार कर दिया.

उस की मां ने उस से कहा, ‘‘बेटे, अजिंदर की मां को उन की दुख की घड़ी में यह वचन दिया था ताकि बूढ़ी का कुछ बोझ हलका हो जाए. अभी भी उन पर बहुत कर्ज है… और फिर अजिंदर को तो तुम भी अच्छी तरह जानते हो. कितनी अच्छी है. वह ग्रैजुएट भी है.’’

‘‘पर मां, मैं किसी और को पसंद करता हूं… मैं ने अजिंदर को कभी इस नजर से नहीं देखा है.’’

इसी बीच उस के पापा भी वहां आ गए. मां ने पूछा, ‘‘पर हम लोगों को तो अजिंदर में कोई कमी नहीं दिखती है… अच्छा जरा अपनी पसंद तो बता?’’

‘‘मैं उस जापानी लड़की अंजु से प्यार

करता हूं… वह एक बार हमारे घर भी आई थी. याद है न?’’

देव के पिता ने नाराज हो कर कहा, ‘‘देख देव, उस विदेशी से तुम्हारी शादी हमें हरगिज मंजूर नहीं. आखिर अजिंदर में क्या कमी है? अपने देश में लड़कियों की कमी है क्या कि चल दिया विदेशी लड़की खोजने? हम ने उस बेचारी को वचन दे रखा है. बहुत आस लगाए बैठी हैं मांबेटी दोनों.’’

‘‘पर पापा, मैं ने भी…’’

उस के पापा ने बीच में ही उस की बात काटते हुए कहा, ‘‘कोई परवर नहीं सुननी है हमें. अगर अपने मम्मीपापा को जिंदा देखना चाहते हो तो तुम्हें अजिंदर से शादी करनी ही होगी.’’

थोड़ी देर तक सभी खामोश थे. फिर देव के पापा ने आगे कहा, ‘‘देव, तू ठीक से सोच ले वरना मेरी भी मौत अजिंदर के पापा की तरह निश्चित है, और उस के जिम्मेदार सिर्फ तुम होगे.’’

देव की मां बोलीं, ‘‘छि…छि… अच्छा बोलिए.’’

‘‘अब सबकुछ तुम्हारे लाड़ले पर है.’’ कह कर देव के पापा वहां से चले गए.

न चाहते हुए भी देव को अपने पापामम्मी की बात माननी पड़ी थी.

देव ने अपनी पूरी कहानी और मजबूरी अंजु को भी बताई तो अंजु ने कहा था कि ऐसी स्थिति में उसे अजिंदर से शादी कर लेनी चाहिए.

अंजु ने देव को इतनी आसानी से मुक्त तो कर दिया था, पर खुद विषम परिस्थिति में फंस चुकी थी. वह देव के बच्चे की मां बनने वाली थी. अभी तो दूसरा महीना ही चला था. पर देव को उस ने यह बात नहीं बताई थी. उसे लगा था कि यह सुन कर देव कहीं कमजोर न पड़ जाए.

अगले महीने देव की शादी थी. देव ने उसे भी सपरिवार आमंत्रित किया था. लिखा था कि हो सके तो अपने पापामम्मी के साथ आए. अंजु ने लिखा था कि वह आने की पुरजोर कोशिश करेगी. पर उस के पापामम्मी का तो बहुत पहले ही तलाक हो चुका था. वह नानी के यहां पली थी.

देव की शादी में अंजु आई, पर उस ने अपने को पूरी तरह नियंत्रित रखा. चेहरे पर कोई गिला या चिंता न थी. पर देव ने देखा कि अंजु को बारबार उलटियां आ रही थीं.

उस ने अंजु से पूछा, ‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’

अंजु बोली, ‘‘हां तबीयत तो ठीक है… कुछ यात्रा की थकान है और कुछ पार्टी के हैवी रिच फूड के असर से उलटियां आ रही हैं.’’

शादी के बाद उस ने कहा, ‘‘पिछली बार मैं बोधगया नहीं जा सकी थी, इस बार वहां जाना चाहती हूं. मेरे लिए एक कैब बुक करा दो.’’

‘‘ठीक है, मैं एक बड़ी गाड़ी बुक कर लेता हूं. अजिंदर और मैं भी साथ चलते हैं.’’

अगले दिन सुबहसुबह देव, अजिंदर और अंजु तीनों गया के लिए निकल गए. अंजु ने पहले से ही दवा खा ली थी ताकि रास्ते में उलटियां न हों. दोपहर के कुछ पहले ही वे लोग वहां पहुंच गए. रात में होटल में एक ही कमरे में रुके थे तीनों हालांकि अंजु ने बारबार अलग कमरे के लिए कहा था. अजिंदर ने ही मना करते कहा था, ‘‘ऐसा मौका फिर मिले न मिले. हम लोग एक ही रूम में जी भर कर गप्प करेंगे.’’

अंजु गया से ही जापान लौट गई थी. देव और अजिंदर एअरपोर्ट पर विदा करने गए थे. एअरपोर्ट पर देव ने जब बायबाय कहा तो फिर अंजु ने हंस कर कहा, ‘‘सायोनारा, कौंटैक्ट में रहना.’’

समय बीतता गया. अजिंदर को बेटा हुआ था और उस के कुछ महीने पहले अंजु को बेटी हुई थी. उस की बेटी का रंग तो जापानियों जैसा बहुत गोरा था, पर चेहरा देव का डुप्लिकेट. इधर अजिंदर का बेटा भी देखने में देव जैसा ही था. देव, अजिंदर और अंजु का संपर्क इंटरनैट पर बना हुआ था. देव ने अपने बेटे की खबर अंजु को दे रखी थी पर अंजु ने कुछ नहीं बताया था. देव अपने बेटे शिवम का फोटो नैट पर अंजु को भेजता रहता था. अंजु भी शिवम के जन्मदिन पर और अजिंदर एवं देव की ऐनिवर्सरी पर गिफ्ट भेजती थी.

देव जब उस से पूछता कि शादी कब करोगी तो कहती मेरे पसंद का लड़का नहीं मिल रहा या और किसी न किसी बहाने टाल देती थी.

एक बार देव ने अंजु से कहा, ‘‘जल्दी शादी करो, मुझे भी गिफ्ट भेजने का मौका दो. आखिर कब तक वेट करोगी आदर्श पति के लिए?’’

अंजु बोली, ‘‘मैं ने मम्मीपापा की लाइफ से सीख ली है. शादीवादी के झंझट में नहीं पड़ना है, इसलिए सिंगल मदर बनूंगी. एक बच्ची को कुछ साल हुए अपना लिया है.’’

‘‘पर ऐसा क्यों किया? शादी कर अपना बच्चा पा सकती थी?’’

‘‘मैं इस का कोई और कारण नहीं बता सकती, बस यों ही.’’

‘‘अच्छा, तुम जो ठीक समझो. बेबी का नाम बताओ?’’

‘‘किको नाम है उस का. इस का मतलब भी बता देती हूं होप यानी आशा. मेरे जीवन की एकमात्र आशा किको ही है.’’

‘‘ओके उस का फोटो भेजना.’’

‘‘ठीक है, बाद में भेज दूंगी.’’

‘‘समय बीतता रहा. देव और अंजु दोनों के बच्चे करीब 7 साल के हो चुके थे. एक दिन अंजु का ईमेल आया कि वह 2-3 सप्ताह के लिए टाटा आ रही है. वहां प्लांट में निप्पन द्वारा दी मशीन में कुछ तकनीकी खराबी है. उसी की जांच के लिए निप्पन एक ऐक्सपर्ट्स की टीम भेज रही है जिस में वह इंटरप्रेटर है.’’

अंजु टाटा आई थी. देव और अजिंदर से भी मिली थी. शिवम के लिए ढेर सारे गिफ्ट्स लाई थी.

‘‘किको को क्यों नहीं लाई?’’ देव ने पूछा.

‘‘एक तो उतना समय नहीं था कि उस का वीजा लूं, दूसरे उस का स्कूल… उसे होस्टल में छोड़ दिया है… मेरी एक सहेली उस की देखभाल करेगी इस बीच.’’

अंजु की टीम का काम 2 हफ्ते में हो गया. अगले दिन उसे जापान लौटना था. देव ने उसे डिनर पर बुलाया था.

अगली सुबह वह ट्रेन से कोलकाता जा रही थी, तो देव और अजिंदर दोनों स्टेशन पर छोड़ने आए थे. अंजु जब ट्रेन में बैठ गई तो उस ने अपने बैग से बड़ा सा गिफ्ट पैक निकाल कर देव को दिया.

‘‘यह क्या है? आज तो कोई बर्थडे या ऐनिवर्सरी भी नहीं है?’’ देव ने पूछा.

अंजु ने कहा, ‘‘इसे घर जा कर देखना.’’

ट्रेन चली तो अंजु हाथ हिला कर बोली, ‘‘सायोनारा.’’

अजिंदर और देव ने घर जा कर उस पैकेट को खोला. उस में एक बड़ा सा फ्रेम किया किको का फोटो था. फोटो के नीचे लिखा था, ‘‘हिरोशिमा का एक अंश.’’

देव और अजिंदर दोनों कभी फोटो को देखते तो कभी एकदूसरे को प्रश्नवाचक नजरों से. शिवम और किको बिलकुल जुड़वा लग रहे थे. फर्क सिर्फ चेहरे के रंग का था. Hindi Love Stories  

Family Story : वापसी – तृप्ती अमित के पास वापस क्यों लौट आई ?

Family Story : मैं अटैची लिए औटो में बैठ गई. करीब 1 महीने बाद अपने पति अमित के पास लौट रही थी. मुझे विदा करते मम्मीडैडी की आंखों में खुशी के आंसू थे. मैं ने रास्ते में औटो रुकवा कर एक गुलदस्ता और कार्ड खरीदा. कार्ड पर मैं ने अपनी लिखावट बदल कर लिखा, ‘हैपी बर्थडे, सीमा’ और फिर औटो में बैठ घर चल. सीमा मेरा ही नाम है यानी गुलदस्ता मैं ने खुद के पैसे खर्च कर अपने लिए ही खरीदा था. दरअसल, पटरी से उतरी अपने विवाहित जीवन की गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने के लिए इनसान को कभीकभी ऐसी चालाकी भी करनी पड़ती है. पड़ोस में रहने वाली मेरी सहेली कविता की शादी 2 दिन पहले हुई थी. मम्मीपापा का सोचना था कि उसे ससुराल जाते देख कर मैं ने अपने घर अमित के पास लौटने का फैसला किया. उन का यह सोचना पूरी तरह गलत है. सचाई यह है कि मैं अमित के पास परसों रात एक तेज झटका के बाद लौट रही हूं.

मुझे सामने खड़ी देख कर अमित हक्केबक्के रह गए. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं बिना कोई सूचना दिए यों अचानक घर लौट आऊंगी.

मैं मुसकराते हुए उन के गले लग कर बोली, ‘‘इतना प्यार गुलदस्ता भिजवाने के लिए थैंक यू, माई लव.’’

उन के गले लग कर मेरे तनमन में गुदगुदी की तेज लहर दौड़ गई थी. मन एकदम से खिल उठा था. सचमुच, उस पल की सुखद अनुभूति ने मुझे विश्वास दिला दिया कि वापस लौट आने का फैसला कर के मैं ने बिलकुल सही कदम उठाया.

‘‘तुम्हें यह गुलदस्ता मैं ने नहीं भिजवाया है,’’ उन की आवाज में नाराजगी के भाव मौजूद थे.

‘‘अब शरमा क्यों रहे हो? लो, आप से पहले मैं स्वीकार कर लेती हूं कि आज सुबह उठने के बाद से मैं आप को बहुत मिस कर रही थी. वैसे एक सवाल का जवाब दो. अगर मैं यहां न आती तो क्या आप आज के दिन भी मुझ से मिलने नहीं आते? क्या सिर्फ गुलदस्ता भेज कर चुप बैठ जाते?’’

‘‘यार, यह गुलदस्ता मैं ने नहीं भिजवाया है,’’ वे एकदम से चिड़ उठे, ‘‘और रही बात तुम से मिलने आने की तो तुम मुझे नाराज कर के मायके भागी थीं. फिर मैं क्यों तुम से मिलने आता?’’

‘‘चलो, मान लिया कि आप ने यह गुलदस्ता नहीं भेजा है, पर क्या आप को खुशी भी नहीं हुई है मुझे घर आया देख कर? झूठ ही सही, पर कम से कम एक बार तो कह दो कि सीमा, वैलकम बैक.’’

‘‘वैलकम बैक,’’ उन्हें अब अपनी हंसी रोकने में कठिनाई हो रही थी.

‘‘आई लव यू, माई डार्लिंग. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘अगर आप ने नहीं भेजा है, तो फिर यह गुलदस्ता मुझे किस ने गिफ्ट किया है?’’

‘‘यह तो तुम ही बता सकती हो. मुझ से दूर रह कर किस के साथ चक्कर चला रही हो?’’

‘‘मैं आप की तरह अवैध रिश्ता बनाने में विश्वास नहीं रखती हूं. बस, जिंदगी में जिस एक बार दिल दे दिया, सो दे दिया.’’

‘‘अवैध प्रेम करने का शौक मुझे भी नहीं है, पर यह बात तुम्हारे शक्की मन में कभी नहीं घुसेगी,’’ वे एकदम नाराज हो उठे.

‘‘देखोजी, मैं तो इस मुद्दे को ले कर कभी झगड़ा न करने का फैसला कर के लौटी हूं. इसलिए मुझे उकसाने की आप की सारी कोशिशें अब बेकार जाने वाली हैं,’’ उन का गुस्सा कम करने के लिहाज से मैं प्यार भरे अंदाज में मुसकरा उठी.

‘‘तुम तो 1 महीने में ही बहुत समझदार हो गई हो.’’

‘‘यह आप सही कह रहे हो.’’

‘‘मैं क्या सही कह रहा हूं?’’

‘‘यही कि एक महीना आप से दूर रह कर मेरी अक्ल ठिकाने आ गई है.’’

‘‘तुम तो सचमुच बदल गई हो वरना तुम ने कब अपने को कभी गलत माना है,’’ वे सचमुच बहुत हैरान नजर आ रहे थे.

‘‘अब क्या सारा दिन हम ऐसी ही बेकार बातें करते रहेंगे? यह मत भूलिए कि आज आप की जीवनसंगिनी का जन्मदिन है,’’ मैं ने रूठने का अच्छा अभिनय किया.

‘‘तुम कौन सा मुझे बता कर लौटी हो, जो मैं तुम्हारे लिए एक भव्य पार्टी का आयोजन कर के रखता,’’ वे मुझ पर कटाक्ष करने का मौका नहीं चूके.

‘‘पतिदेव, जरा व्यंग्य और दिल दुखाने वाली बातों पर अपनी पकड़ कमजोर करो, प्लीज. आज रविवार की छुट्टी है और मेरा जन्मदिन भी है. आप का क्या बिगड़ जाएगा अगर मुझे आज कुछ मौजमस्ती करा दोगे? साहब, प्यार से कहीं घुमाफिरा लाओ… कोई बढि़या सा गिफ्ट दे दो,’’ मैं भावुक हो उठी थी. कुछ पलों की खामोशी के बाद वे बोले, ‘‘वह सब बाद में होगा. पहले सोच कर यह बताओ कि यह गुलदस्ता तुम्हें किस ने भेजा होगा.’’ मैं ने भी फौरन सोचने की मुद्रा बनाई और फिर कुछ पलों के बाद बोली, ‘‘भेजना आप को चाहिए था, पर आप ने नहीं भेजा है…तो यह काम विकास का हो सकता है.’’

‘‘कौन है यह विकास?’’ वे हैरान से नजर आ रहे थे, क्योंकि उन्हें अंदाजा नहीं था कि मैं किसी व्यक्ति का नाम यों एकदम से ले दूंगी. ‘‘पड़ोस में रहने वाली मेरी सहेली कविता की शादी 2 दिन पहले हुई है. यह विकास उस के बड़े भाई का दोस्त है.’’

‘‘आगे बोलो.’’

‘‘आगे क्या बोलूं? पति से दूर रह रही स्त्री को हर दिलफेंक किस्म का आदमी अपना आसान शिकार मानता है. वह भी मुझ पर लाइन मार रहा था, पर मैं आप की तरह…सौरी… मैं कमजोर चरित्र वाली लड़की नहीं हूं. उस ने ही कोशिश नहीं छोड़ी होगी और मुझे अपने प्रेमजाल में फंसाने को यह गुलदस्ता भेज दिया होगा. मैं अभी इसे बाहर फेंकती हूं,’’ आवेश में आ कर मैं ने अपना चेहरा लाल कर लिया. ‘‘अरे, यों तैश में आ कर इसे बाहर मत फेंको. कोई पक्का थोड़े ही है कि उसी कमीने ने इसे भेजा होगा.’’

‘‘यह भी आप ठीक कह रहे हो. तो एक काम करते हैं,’’ मैं उन की आंखोें में प्यार से देखने लगी थी.

‘‘कौन सा काम?’’

‘‘आप इस से ज्यादा प्यारा और ज्यादा बड़ा एक गुलदस्ता मुझे भेंट कर दो. उसे पा कर मैं खुश भी बहुत हो जाऊंगी और अगर इसे विकास ने ही भेजा होगा, तो इस की अहमियत भी बिलकुल खत्म हो जाएगी.’’

‘‘तुम तो यार सचमुच समझदार बन कर लौटी हो,’’ उन्होंने इस बार ईमानदार लहजे में मेरी तारीफ की.

‘‘सच?’’

‘‘हां, अभी तक तो तुम्हारे अंदर आया बदलाव सच ही लग रहा है.’’

‘‘तो इसी बात पर बाहर लंच करा दो,’’ मैं ने आगे बढ़ कर उन के गले में बांहें डाल दीं.

‘‘नो प्रौब्लम, स्वीटहार्ट. मैं नहा लेता हूं. फिर घूमने चलते हैं.’’ फिर जब कुछ देर बाद मैं उन के मांगने पर तौलिया पकड़ाने गई, तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे गुसलखाने के अंदर खींच लिया. मेरा मन तो चाह ही रहा था कि ऐसा कुछ हो जाए. 1 महीने की दूरी की कड़वाहट को मिटाने का काम सिर्फ बातों से नहीं हो सकता था. अत: उन की बांहों में कैद हो कर मेरा उन के साथ मस्त अंदाज में नहाना हम दोनों की मनमुटाव की कड़वाहट को एक झटके में साफ कर गया था. वे मुझे गोद में उठा कर शयनकक्ष में ले आए… प्यार के क्षण लंबे होते गए, क्योंकि महीने भर की प्यास जो हम दोनों को बुझानी थी. बाद में मैं ने उन से लिपट कर तृप्ति भरी गहरी नींद का आनंद लिया.

जब 2 घंटे बाद मेरी आंखें खुलीं तो मैं खुद को बहुत हलकाफुलका महसूस कर रही थी. मन में पिछले 1 महीने से बसी सारी शिकायतें दूर हो गई थीं. मुझे परसों रात को विकास के साथ घटी वह घटना याद आने लगी जिस के कारण मैं खुद ही अमित के पास लौट आई थी. परसों रात मैं तो विकास के सामने एकदम से कमजोर पड़ गई थी. कविता की शादी में हम दोनों खूब काम कर रहे थे. हमारे बीच होने वाली हर मुलाकात में उस ने मेरी सुंदरता व गुणों की तारीफ करकर के मुझे बहुत खुश कर दिया था. लेकिन मुझे यह एहसास नहीं हुआ था कि अमित से दूर रहने के कारण मेरा परेशान व प्यार को प्यासा मन उस के मीठे शब्दों को सुन कर भटकने को तैयार हो ही गया था. मैं उस रात कविता के घर की छत पर बने कमरे से कुछ लाने गई थी. तब विकास मेरे पीछेपीछे दबे पांव वहां आ गया. दरवाजा बंद होने की आवाज सुन कर मैं मुड़ी तो वह सामने खड़ा नजर आया. उस की आंखों में अपने लिए चाहत के भाव पढ़ कर मैं बुरी तरह घबरा गई. मेरा सारा शरीर थरथर कांपने लगा.

‘‘विकास, तुम मेरे पास मत आना. देखो, मैं शादीशुदा औरत हूं…मेरे हंसनेबोलने का तुम गलत अर्थ लगा रहे हो…मैं वैसी औरत नहीं हूं…’’ उस ने मेरे कहने की रत्ती भर परवाह न कर मुझे अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘प्लीज, मुझे जाने दो…छोड़ो मुझे,’’ मैं उस से ऐसी प्रार्थना जरूर कर रही थी पर इस में भी कोई शक नहीं कि मुझे उस की नाजायज हरकत पर तेज गुस्सा नहीं आया था. उस कमरे के साथ बालकनी न जुड़ी होती तो न जाने उस रात क्या हो जाता. उस बालकनी में 2 किशोर लड़के गपशप कर रहे थे. अगर ऐन वक्त पर उन दोनों की हंसने की आवाजें हमारे कानों तक न आतीं, तो विकास थोड़ी सी जोरजबरदस्ती कर मेरे साथ अपने मन की करने में सफल हो जाता. उस की पकड़ ढीली पड़ते ही मैं कमरे से जान बचा कर भाग निकली थी. मैं सीधी अपने घर पहुंची और बिस्तर पर गिर कर खूब देर तक रोई थी. बाद में कुछ बातें मुझे बड़ी आसानी से समझ में आ गई थीं. मुझे बड़ी गहराई से यह एहसास हुआ कि अमित के साथ और उस से मिलने वाले प्यार की मेरे तनमन को बहुत जरूरत है. वे जरूरतें अगर अमित से नहीं पूरी होंगी तो मेरा प्यासा मन भटक सकता है और किसी स्त्री के यों भटकते मन को सहारा देने वाले आशिकों की आजकल कोई कमी नहीं.

तब मैं ने एक महत्त्वपूर्ण फैसला करने में जरा भी देर नहीं लगाई थी. किसी विकास जैसे इनसान को प्रेमी बना कर अपनी इज्जत को दांव पर लगाने से बेहतर मुझे अमित के पास लौटने का विकल्प लगा. मैं मायके में रहने इसलिए आई थी, क्योंकि मुझे शक था कि औफिस में उस के साथ काम करने वाली रितु के साथ अमित के गलत संबंध हैं. वे हमेशा ऐसा कुछ होने से इनकार करते थे पर जब उन्होंने उस के यहां मेरे बारबार मना करने पर भी जाना चालू रखा, तो मेरा शक यकीन में बदलता चला गया था.उस रात मुझे इस बात का एहसास हुआ कि यों मायके भाग कर अमित से दूर हो जाना तो इस समस्या का कोई हल था ही नहीं. यह काम तो अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने जैसा था. यों दूर रह कर तो मैं अकेले रह रहे अमित को रितु से मिलने के ज्यादा मौके उपलब्ध करा रही थी. तभी मैं ने अमित के पास लौट आने का फैसला कर लिया था और आज सुबह औटो कर के लौट भी आई थी.

कुछ देर तक सो रहे अमित के चेहरे को प्यार से निहारने के बाद मैं ने उन के कान में प्यार से फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मुझे बहुत जोर से भूख लग रही है, जनाब.’’

‘‘तो प्यार करना फिर से शुरू कर देता हूं, जानेमन,’’ नींद से निकलते ही उन के दिलोदिमाग पर मौजमस्ती हावी हो गई.

‘‘अभी तो मेरे पेट में चूहे कूद रहे हैं.’’

‘‘तो बोलो खाना खाने कहां चलें?’’

‘‘मेरा चाइनीज खाने का मन है.’’

‘‘तो चाइनीज खाने ही चलेंगे.’’

‘‘पहले से तो किसी के साथ कहीं जाने का कोई प्रोग्राम नहीं बना रखा है न?’’

‘‘तुम रितु के साथ मेरा कोई प्रोग्राम होने की तरफ इशारा कर रही हो न?’’ वे एकदम गंभीर नजर आने लगे.

‘‘बिलकुल भी नहीं,’’ मैं ने झूठ बोला.

‘‘झूठी,’’ उन्होंने मेरे होंठों पर छोटा सा चुंबन अंकित करने के बाद संजीदा लहजे में कहा, ‘‘मैं तुम्हें आज फिर से बता देता हूं कि रितु के साथ मेरा कोई गलत चक्कर…’’

‘‘मुझे आप पर पूरा विश्वास है,’’ मैं ने उन्हें टोका और हंस कर बोली, ‘‘मैं तो आप को बस यों ही छेड़ रही थी.’’

‘‘तो अब इस जरा सा छेड़ने का परिणाम भी भुगतो,’’ उन्होंने मुझे अपने आगोश में भरने की कोशिश की जरूर, पर मैं ने बहुत फुरती दिखाते हुए खुद को बचाया और कूद कर पलंग से नीचे उतर आई.

‘‘भूखे पेट न भजन होता है, न प्यार, मेरे सरकार. अब फटाफट तैयार हो जाओ न.’’

‘‘ओके, पहले तुम्हारी पेट पूजा कर ही दी जाए नहीं तो प्यार का कार्यक्रम रुकावट के साथ ही चलेगा,’’ मेरी तरफ हवाई चुंबन उछाल कर वे तैयार होने को उठ गए. रितु को ले कर अमित के अडि़यल व्यवहार ने मुझे विकास की तरफ लगभग धकेल ही दिया था. अगर हमारा मनमुटाव मुझे गलत रास्ते पर धकेल सकता है, तो मैं अपने प्यार, सेवा और विश्वास के बल पर उन को अपनी तरफ खींच भी सकती हूं. उन की आंखों में अपने लिए गहरी चाहत और प्यार के भावों को पढ़ कर मुझे लग रहा कि बिना शर्त लौटने का फैसला कर के मैं ने बिलकुल सही कदम उठाया.  Family Story

Social Story : कूल फूल – अपने को स्मार्ट समझने वाले युवक की गुदगुदाती कहानी

Social Story : राजेश, विक्रम, सरिता, पिंकी और रश्मि कालेज के बाहर खड़े बातचीत में व्यस्त थे कि तभी एक बाइक तेजी से आ कर उन के पास रुक गई. वे सब एक तरफ हट गए. इस से पहले वे बाइक सवार को कुछ कहते उस ने हैलमैट उतारते हुए कहा, ‘‘क्यों कैसी रही ’’

वे फक्क रह गए, ‘‘अरे, राजन तुम,’’ सभी एकसाथ बोले.

‘‘बाइक कब ली यार ’’ विक्रम ने पूछा.

‘‘बस, इस बार जन्मदिन पर डैड की ओर से यह तोहफा मिला है,’’ कहते हुए वह सब को बाइक की खासीयतें बताने लगा.

राजन अमीर घर का बिगड़ा हुआ किशोर था. हमेशा अपनी लग्जरीज का घमंड दिखाता और सब पर रोब झाड़ता, लेकिन वे तब भी साथ खातेपीते और उस से घुलेमिले ही रहते. रश्मि को राजन का इस तरह बाइक ला कर बीच में खड़ी करना और रोब झाड़ना बिलकुल अच्छा नहीं लगा. वे सभी कालेज के फर्स्ट ईयर के विद्यार्थी थे. लेकिन रश्मि 12वीं तक स्कूल में राजन के साथ पढ़ी थी इसलिए वह अच्छी तरह उस के स्वभाव से वाकिफ थी. सरिता व पिंकी तो हमेशा उस से खानेपीने के चक्कर में रहतीं, अत: एकदम बोल पड़ीं, ‘‘कब दे रहे हो पार्टी बाइक की ’’

‘‘हांहां, बस, जल्दी ही दूंगा. ऐग्जाम्स खत्म होते ही खाली होने पर करते हैं पार्टी,’’ राजन लापरवाही से बोला और बाइक स्टार्ट कर घरघराता हुआ चला गया. रश्मि सरिता व पिंकी से बोली, ‘‘मुझे तो बिलकुल अच्छा नहीं लगा इस का यह व्यवहार, हमेशा रोब झाड़ता रहता है अपनी अमीरी का. उस पर तुम लोग उस से पार्टी की उम्मीद करते हो. याद है, पिछली बार उस ने फोन की पार्टी देने के नाम पर क्या किया था.’’

‘‘हां…हां, याद है,’’ पास खड़ी सरिता बोली, ‘‘उस ने पार्टी के नाम पर बेवकूफ बनाया था, यही न. लेकिन तुम्हें पता है न अचानक उस के मामा की तबीयत खराब हो गई थी जिस कारण वह पार्टी नहीं दे सका था.’’

दरअसल, राजन का जन्मदिन 20 मार्च को होता था और पिछले वर्ष उसे जन्मदिन पर स्मार्टफोन मिला था. उस ने सब को दिखाया. फिर पार्टी का वादा भी किया, लेकिन आया नहीं. बाद में सब ने पूछा तो कह दिया कि मामाजी की तबीयत खराब हो गई थी, जबकि रश्मि जानती थी कि ऐसा कुछ नहीं था. बस, वह सब को मूर्ख बना रहा था. अब तो बाइक मिलने पर राजन का घमंड और बढ़ गया था. वह तो पहले ही अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता था. अत: राजन ने सब को कह दिया, ‘‘ऐग्जाम्स के बाद मैं सभी को एसएमएस कर के बता दूंगा कि कहां और कब पार्टी दूंगा.’’

शाम को सरिता घर में बैठी अगले दिन के पेपर की तैयारी कर रही थी कि रश्मि का फोन आया. बोली, ‘‘राजन का मैसेज आया है. 1 तारीख को दोपहर 1 बजे शिखाजा रैस्टोरैंट में पार्टी दे रहा है. जाओगी क्या ’’

‘‘हां, यार, मैसेज तो अभीअभी मुझे भी आया है. जाना भी चाहिए. तुम बताओ ’’ सरिता ने जवाब दिया.

‘‘मुझे तो उस पर रत्तीभर भरोसा नहीं है. सुबह वह कह रहा था ऐग्जाम्स के बाद पार्टी देगा और अब यह मैसेज. फिर मैं तो पिछली बार की बात भी नहीं भूली,’’ रश्मि साफ मना करती हुई बोली, ‘‘मैं तो नहीं जाऊंगी.’’

तभी राजेश का भी फोन आया और उस ने भी रश्मि को बताया कि राजन ने उसे व विक्रम को भी मैसेज किया है. सब चलेंगे दावत खाने. रश्मि बोली, ‘‘भई, पहले कन्फर्म कर लो, कहीं अप्रैल फूल तो नहीं बना रहा सब को  मैं तो जाने वाली नहीं.’’

पहली तारीख को सभी इकट्ठे हो रश्मि के घर पहुंच गए और उसे भी चलने को कहने लगे. रश्मि के लाख मना करने के बावजूद वे उसे साथ ले गए. शिखाजा रैस्टोरैंट पहुंच कर सभी राजन का इंतजार करने लगे, लेकिन राजन का कहीं अतापता न था. वेटर 2-3 बार और्डर हेतु पूछ गया था. जब उन्होंने फोन पर राजन से संपर्क किया तो उस का फोन स्विचऔफ आ रहा था. काफी देर इंतजार के बाद उन्होंने रैस्टोरैंट में अपनेअपने हिसाब से और्डर दिया और थोड़ाबहुत खापी कर वापस आ गए. उन्हें न चाहते हुए भी अपनी जेब ढीली करनीपड़ी. जब वे सभी घर पहुंच गए तो राजन का मैसेज सभी के पास आया, ‘‘कैसी रही पार्टी अप्रैल फूल की ’’ सभी अप्रैल फूल बन कर ठगे से रह गए थे. ‘राजन ने हमें अप्रैल फूल बनाया’ सभी सोच रहे थे, ‘और हम लालच में फंस गए.’

रश्मि बारबार उन्हें कोस रही थी, ‘‘मैं तो मना कर रही थी पर तुम ही मुझे ले गए. खुद तो मूर्ख बने मुझे भी बनाया.’’

घर आ कर रश्मि ने अपनी मां को सारी बात बताई और राजन को कोसने लगी. मां ने उस की पूरी बात सुनी और बोलीं, ‘‘कूल रश्मि कूल.’’

‘‘कूल नहीं मां, फूल कहो फूल, हम तो जानतेसमझते मूर्ख बने,’’ रश्मि गुस्से से बोली.

‘‘रश्मि, अगर अप्रैल फूल बने हो तो गुस्सा कैसा  यह दिन तो है ही एकदूसरे को मूर्ख बनाने का. तुम भी तो कई बार झूठमूठ डराती हो मुझे इस दिन. कभी कहती हो तुम्हारी साड़ी पर छिपकली है तो कभी गैस जली छोड़ देने का झूठ. फिर जब मुझे पता चलता है तो तुम गाना गाती हो और मुझे चिढ़ाती हो, ‘अप्रैल फूल बनाया…’

‘‘अगर फूल बन ही गए हो तो कुढ़ने से कुछ होने वाला नहीं. सोचो, कैसे राजन को भी तुम अप्रैल फूल बना सकते हो,’’ मां ने सुझाया. अब रश्मि शांत हो गई और कुछ सोचने लगी. फिर उस ने सभी दोस्तों को फोन कर अपने घर बुलाया और राजन को फूल बनाने की तरकीब सोचने को कहा. सभी राजन को भी मूर्ख बना कर बदला लेना चाहते थे. फिर उन्होंने भी राजन को मूर्ख बनाने की तरकीब सोचनी शुरू की. थोड़ी देर बाद रश्मि ही बोली, ‘‘मेरे दिमाग में एक आइडिया आया है. हम राजन को कूल फूल बनाएंगे. उस ने हमें फोन पर एसएमएस कर मूर्ख बनाया है, हम भी उसे फोन के जरिए मूर्ख बनाएंगे. सुनो…’’ कहते हुए उस ने अपनी योजना बताई.

शाम को राजन घर के अहाते में फोन पर बातचीत कर रहा था. उस की बाइक आंगन में खड़ी थी. तभी रश्मि उस के घर पहुंची. उसे देखते ही राजन बोला, ‘‘आओआओ रश्मि, कैसे आना हुआ ’’ रश्मि सोफे पर बैठते हुए बोली, ‘‘वाह राजन, आज तो तुम ने सभी को अच्छा मूर्ख बनाया. अच्छा हुआ मैं तो गई ही नहीं थी,’’ उस ने झूठ बोला.

‘‘अरे भई, तुम्हारी पार्टी तो ड्यू है ही. यह तो वैसे ही मैं ने मजाक किया था. बैठो, मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को लाता हूं,’’ कह कर राजन घर के अंदर गया. वह अपना फोन मेज पर ही छोड़ गया था. रश्मि तो थी ही मौके की तलाश में. उस ने झट से राजन का फोन उठाया और भाग कर आंगन में जा कर राजन की बाइक का फोटो खींच कर उसी के फोन से ओएलएक्स डौट कौम पर बेचने के लिए डाल दिया. कीमत भी सिर्फ 10 हजार रुपए रखी. फिर वापस वैसे ही फोन रख दिया. राजन रश्मि के लिए खानेपीने को लाया. रश्मि ने 2 बिस्कुट लिए और बोली, ‘‘चलती हूं, तुम्हें फूल डे की कूल शुभकामनाएं. अच्छा है अभी तक तुम्हें किसी ने फूल नहीं बनाया और तुम ने सब दोस्तों को एकसाथ बना दिया,’’ और मुसकराती हुई चल दी.

अभी रश्मि घर के गेट तक ही पहुंची थी कि राजन के मोबाइल की घंटी बज उठी, ‘‘आप अपनी बाइक बेचना चाहते हैं न, मैं खरीदना चाहता हूं क्या अभी आ जाऊं ’’

‘‘क्या ’’ राजू सकपकाता हुआ बोला, ‘‘कौन हैं आप  किस ने कहा कि मैं ने अपनी बाइक बेचनी है. अरे, अभी चार दिन पहले ही तो खरीदी है मैं ने. मैं क्यों बेचूंगा ’’ कहते हुए उस ने फोन काट दिया. रश्मि अपनी योजना सफल होती देख मुसकराई और तेजी से घर की ओर चल दी. गुस्से में राजन ने फोन काटा ही था कि एक एसएमएस आ गया. ‘मैं आप की बाइक खरीदने में इंट्रस्टेड हूं. आप के घर आ जाऊं ’ राजन इस अनजान बात से बहुत आहत हुआ. आखिर थोड़ी ही देर में ऐसा क्या हुआ कि इतने फोन व एसएमएस आने लगे. उस ने तो कुछ भी ओएलएक्स पर नहीं डाला. उस के पास अब लगातार एसएमएस और फोन आ रहे थे. वह अभी एसएमएस के बारे में सोच ही रहा था कि तभी एक एसएमएस आया. वह मैसेज देखना नहीं चाहता था. लेकिन उस ने स्क्रीन पर देखा तो चौंका, मैसेज रश्मि का था.

‘अरे, रश्मि का मैसेज,’ सोच उस ने जल्दी से इनबौक्स में देखा तो पढ़ कर दंग रह गया. लिखा था, ‘क्यों, कैसा रहा हमारा रिटर्न अप्रैल फूल बनाना. तुम ने हमें रैस्टोरैंट में बुला कर फूल बनाया और हम ने तुम्हें तुम्हारे ही घर आ कर.’ राजन का गुस्सा सातवें आसमान पर था. उस ने आननफानन में बाइक उठाई और रश्मि के घर चल दिया. रश्मि के घर पहुंचा तो उस के घर सभी दोस्तों को इकट्ठा देख कर दंग रह गया. फिर तमतमाता हुआ बोला, ‘‘तुम मुझे मूर्ख समझते हो. मुझे फूल बनाते हो.’’

‘‘कूल बच्चे कूल. हम ने तुम्हें फूल बनाया है इसलिए गुस्सा थूक दो और सोचो तुम ने हमें रैस्टोरैंट में एकत्र कर मूर्ख नहीं बनाया क्या. तब हमें कितना गुस्सा आया होगा ’’

‘‘हां, पर तुम ने तो मेरी प्यारी बाइक ही बिकवाने की प्लानिंग कर दी.’’

तभी सभी दोस्त हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और बोले, ‘‘कूल यार कूल… हमारा मकसद तुम्हें गुस्सा दिलाना नहीं था बल्कि तुम्हें एहसास दिलाना था कि तुम ऐसी हरकत न करो. पिछले साल भी तुम ने मूर्ख दिवस पर पार्टी रख हमें मूर्ख बनाया था. तब तो हम तुम्हारा बहाना भी सच मान गए थे पर इस बार फिर तुम ने ऐसा किया… क्या हम हर्ट नहीं होते ’’ ‘‘हां, लेकिन तुम ने यह सब किया कैसे  मैं तो तुम से पूरे दिन मिला भी नहीं,’’ राजन ने दोस्तों से पूछा.

‘‘तुम नहीं मिले तो क्या. रश्मि तो मिली थी तुम्हें तुम्हारे घर पर,’’ सरिता बोली.

फिर रश्मि ने उसे सारी बात बता दी. ‘‘रश्मि तुम…’’ दांत भींचता हुआ राजन अभी बोला ही था कि अंदर से रश्मि की मां पकौडे़ की प्लेट लेती हुई आईं और बोलीं, ‘‘कूल…फूल…कूल. इस तरह झगड़ते नहीं. अगर मजाक करते हो तो मजाक सहना भी सीखो. मुझे रश्मि ने सब बता दिया है. आओ, पकौड़े खाओ. मैं चाय लाती हूं,’’ कहती हुई मां किचन की ओर मुड़ गईं.

‘‘आंटी, आप भी मुझे फूल कह रही हैं,’’ राजन आगे कुछ बोलता इस से पहले ही रश्मि ने उस के मुंह में पकौड़ा ठूंस दिया और बोली, ‘‘कूल यार फूल… कूल.’’ यह देख सब हंसने लगे और ठहाकों के बीच पकौड़े खाते पार्टी का आनंद उठाने लगे. राजन पकौड़े खातेखाते अपने फोन से बाइक का स्टेटस डिलीट करने लगा. Social Story 

Romantic Story In Hindi : मजबूरी – बारिश की उस रात आखिर क्या हुआ था रिहान के साथ ?

Romantic Story In Hindi : आज भी बहुत तेज बारिश हो रही थी. बारिश में भीगने से बचने के लिए रिहान एक घर के नीचे खड़ा हो गया था. बारिश रुकने के बाद रिहान अपने घर की ओर चल दिया. घर पहुंच कर उस ने अपने हाथपैर धो कर कपड़े बदले और खाना खाने लगा. खाना खाने के बाद वह छत पर चला गया और अपनी महबूबा को एक मैसेज किया और उस के जवाब का इंतजार करने लगा.

छत पर चल रही ठंडी हवा ने रिहान को अपने आगोश में ले लिया और वह किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गया. वह अपने प्यार के भविष्य के बारे में सोचने लगा.

रिहान तबस्सुम से बहुत प्यार करता था और उसी से शादी करना चाहता था. तबस्सुम के अलावा वह किसी और के बारे में सोचता भी नहीं था. जब कभी घर में उस के रिश्ते की बात होती थी तो वह शादी करने से साफ मना कर देता था.

रिहान के घर वाले तबस्सुम के बारे में नहीं जानते थे. वे सोचते थे कि अभी यह पढ़ाई कर रहा है इसलिए शादी से मना कर रहा है. पढ़ाई पूरी होने के बाद वह मान जाएगा.

तभी अचानक रिहान के मोबाइल फोन पर तबस्सुम का मैसेज आया. उस का दिल खुशी से झूम उठा. उस ने मैसेज पढ़ा और उस का जवाब दिया. बातें करतेकरते दोनों एकदूसरे में खो गए.

तबस्सुम भी रिहान को बहुत प्यार करती थी और शादी करना चाहती थी. अभी तक उस ने भी अपने घर पर अपने प्यार के बारे में नहीं बताया था. वह रिहान की पढ़ाई खत्म होने का इंतजार कर रही थी.

ऐसा नहीं था कि दोनों में सिर्फ प्यार भरी बातें ही होती थीं, बल्कि दोनों में लड़ाइयां भी होती थीं. कभीकभी तो कईकई दिनों तक बातें बंद हो जाती थीं. लड़ाई के बाद भी वे दोनों एकदूसरे को बहुत याद करते थे और कभी किसी बात पर चिढ़ाने के लिए मैसेज कर देते थे. मसलन, तुम्हारी फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर बहुत बेकार लग रही है. बंदर लग रहे हो तुम. तुम तो बहुत खूबसूरत हो न बंदरिया. और लड़तेलड़ते फिर से बातें शुरू हो जाती थीं.

पिछले 3 सालों से वे दोनों एकदूसरे को प्यार करते थे और अब जा कर शादी करना चाहते थे. रिहान ने सोच लिया था कि इस साल पढ़ाई पूरी होने के बाद कोई अच्छी सी नौकरी कर वह अपने घर वालों को तबस्सुम के बारे में बता देगा. अगर घर वाले मानते हैं तो ठीक, नहीं तो उन की मरजी के खिलाफ शादी कर लेगा. वह किसी भी हाल में तबस्सुम को खोना नहीं चाहता था.

एक दिन रिहान की अम्मी बोलीं, ‘‘तेरे मौसा का फोन आया था. उन्होंने तुझे बुलाया है.’’

‘‘मुझे क्यों बुलाया है? मुझ से क्या काम पड़ गया उन्हें?’’ रिहान ने पूछा.

‘‘अरे, मुझे क्या पता कि क्यों बुलाया है. वह तो हमें वहीं जा कर पता चलेगा,’’ उस की अम्मी ने कहा.

कुछ देर बाद वे दोनों मोटरसाइकिल से मौसा के घर की तरफ चल दिए. रिहान के मौसा पास के शहर में ही रहते थे. एक घंटे में वे दोनों वहां पहुंच गए. वहां पहुंच कर रिहान ने देखा कि घर में बहुत लोग जमा थे. उन में उस के पापा, उस की शादीशुदा बहन और बहनोई भी थे.

यह सब देख कर रिहान ने अपनी अम्मी से पूछा, ‘‘इतने सारे रिश्तेदार क्यों जमा हैं यहां? और पापा यहां क्या कर रहे हैं? वे तो सुबह दुकान पर गए थे?’’

अम्मी बोलीं, ‘‘तू अंदर तो चल. सब पता चल जाएगा.’’ रिहान और उस की अम्मी अंदर गए. वहां सब को सलाम किया और बैठ कर बातें करने लगे.

तभी रिहान के मौसा चिंतित होते हुए बोले, ‘‘आसिफ की हालत बहुत खराब है. वह मरने से पहले अपनी बेटी की शादी करना चाहता है.’’

आसिफ रिहान के मामा का नाम था. कुछ दिन पहले हुईर् तेज बारिश में उन का घर गिर गया था. घर के नीचे दब कर मामा के 2 बच्चों और मामी की मौत हो गई थी. मामा भी घर के नीचे दब गए थे, लेकिन किसी तरह उन्हें निकाल कर अस्पताल में भरती करा दिया गया था. वहां डाक्टर ने कहा था कि वे सिर्फ कुछ ही दिनों के मेहमान हैं. उन का बचना नामुमकिन है.

‘‘फिर क्या किया जाए?’’ रिहान की अम्मी बोलीं.

‘‘आसिफ मरने से पहले अपनी बेटी की शादी रिहान के साथ करा देना चाहता है. यह आसिफ की आखिरी ख्वाहिश है और हमें इसे पूरा करना चाहिए,’’ मौसा की यह बात सुन कर रिहान एकदम चौंक गया. उस के दिल में इतना तेज दर्द हुआ मानो किसी ने उस के दिल पर हजारों तीर एकसाथ छोड़ दिए हों. उस का दिमाग सुन्न हो गया.

‘‘ठीक है, हम आसिफ के सामने इन दोनों की शादी करवा देते हैं,’’ रिहान की अम्मी ने कहा.

रिहान मना करना चाहता था, लेकिन वह मजबूर था. उसी दिन शादी की तैयारी होने लगी और आसिफ को भी अस्पताल से मौसा के घर ले आया गया. शाम को दोनों का निकाह करवा दिया गया.

शादी के बाद रिहान अपनी बीवी और मांबाप के साथ घर आ गया. पूरे रास्ते वह चुप रहा. उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था कि उस के साथ हुआ क्या है.

घर पहुंच कर रिहान कपड़े बदल कर छत पर चला गया. उस ने तबस्सुम को एक मैसेज किया. थोड़ी देर बाद तबस्सुम का फोन आया. रिहान के फोन उठाते ही तबस्सुम गुस्से में बोली, ‘‘कहां थे आज पूरा दिन? एक मैसेज भी नहीं किया तुम ने.’’

तबस्सुम नाराज थी और वह रिहान को डांटने लगी. रिहान चुपचाप सुनता रहा. जब काफी देर तक वह कुछ नहीं बोला तो तबस्सुम बोली, ‘‘अब कुछ बोलोगे भी या चुप ही बैठे रहोगे?’’

‘‘मेरी शादी हो गई है आज,’’ रिहान धीमी आवाज में बोला.

तबस्सुम बोली, ‘‘मैं सुबह से नाराज हू्र्रं और तुम मुझे चिढ़ा रहे हो.’’

‘‘नहीं यार, सच में आज मेरी शादी हो गई है. उसी में बिजी था इसलिए मैं बात नहीं कर पाया तुम से.’’

‘‘क्या सच में तुम्हारी शादी हो गई है?’’ तबस्सुम ने रोंआसी आवाज में पूछा.

‘‘हां, सच में मेरी शादी हो गई है,’’ रिहान ने दबी जबान में कहा. उस की आवाज में उस के टूटे हुए दिल और उस की बेबसी साफ झलक रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे वह जीना ही नहीं चाहता था.

‘‘तुम ने मुझे धोखा दिया है रिहान,’’ तबस्सुम ने रोते हुए कहा.

‘‘मैं कुछ नहीं कर सकता था, मेरी मजबूरी थी,’’ यह कह कर रिहान भी रोने लगा.

‘‘तुम धोखेबाज हो. तुम झूठे हो. आज के बाद मुझे कभी फोन मत करना,’’ कह कर तबस्सुम ने फोन काट दिया. फोन रख कर रिहान रोने लगा. वहां तबस्सुम भी रो रही थी. Romantic Story In Hindi 

Family Story In Hindi : एक घर ऐसा भी

Family Story In Hindi : वृद्धाश्रम के गेट पर कार रुकते ही बहू फूटफूट कर रोने लगी थी,”मांजी, प्लीज आप घर वापस चलो…’’ उस की सिसकियों की आवाज में आगे की बात गुम हो गई थी. मांजी ने अपनी बहू के सिर पर प्यार से हाथ फेरा,”बेटा, तुम उदास मत हो. मैं कोई तुम से रूठ कर थोड़ी न वृद्धाश्रम रहने आई हूं. मुझे यहां अच्छा लगता है.’’

‘‘नहीं मांजी, मैं आप के बगैर वहां कैसे रहूंगी.’’

कुसुम कुछ नहीं बोली. केवल अपनी बहू आरती के सिर को सहलाती रही. कार का दरवाजा विजय ने खोला था. उस ने सहारा दे कर अपने पिताजी को कार से बाहर निकाला फिर पीछे बैठी अपनी मां की ओर देखा. मां उस की पत्नी के सिर पर हाथ फेर रही थीं और आरती बिलखबिलख कर रो रही थी. उस की आंखें नम हो गईं.

‘‘मां, आप यहां कैसे रह पाएंगी. कुछ देर यहां घूम लो फिर हम साथ वापस लौट चलेंगे,’’ विजय ने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया था ताकि उस की मां उस के बहते आंसुओं को न देख सकें. पर पिता की नजरों से उस के आंसू कैसे छिप सकते थे.

‘‘विजय, तुम रो रहे हो? अरे, हम तो यहां रहने आए हैं और कोई दूर भी नहीं है. जब मन करे यहां आ जाया करो. हम साथ में मिल कर यहां रह रहे बजुर्गों की सेवा करेंगे.’’

‘‘पर बाबूजी, आप लोगों के बगैर हमें अपना ही घर काटने को दौड़ेगा. हम आप के बगैर नहीं रह सकते,” विजय अपने पिता के कांधे पर सिर रख कर फूटफूट कर रोने लगा.

कुछ देर शांति छाई रही फिर कुसुम ने अपने पति का हाथ पकड़ा और वृद्धाश्रम के गेट से अंदर हो गई. उन के पीछेपीछे आरती और विजय उन का सामान हाथ में उठाए चल रहे थे.

‘‘आरती, मांबाबूजी का सारा सामान अच्छी तरह से रख दिया था न?’’

‘‘हां, मैं ने मांजी से पूछ कर सामान बैग में जमा दिया था.’’

‘‘और वह मांजी की दवाई?’’

‘‘हां, वह भी कम से कम 2 महीनों के हिसाब से रख दी हैं. फिर जब हम आएंगे तो और लेते आएंगे.’’

मांबाबूजी को वृद्धाश्रम में छोड़ कर लौटने के पहले विजय ने वद्धाश्रम के मैनेजर से बात की थी और उन्हें बाबूजी की देखभाल करते रहने का अनुरोध किया था. वह कुछ पैसे भी उन के पास छोड़ कर आया था, ‘‘कभी जरूरत पड़े तो आप उन्हें दे देना, मेरा नाम बताए बगैर,” मैनेजर विजय को श्रद्धा के भाव से देख रहा था.

‘‘यहां जो भी बुजुर्ग आते हैं वे अपने बेटे और बहू द्वारा सताए हुए होते हैं पर तुम तो बिलकुल अलग ही हो, विजय.’’

‘‘मैं तो चाहता ही नहीं हूं कि मां और पिताजी यहां रहें. उन की ही जिद के कारण उन को यहां लाना पड़ा. मालूम नहीं हम से क्या अपराध हो गया है,” उस की आंखों से आंसू बह निकले.

मैंनेजर बोला, ‘‘तुमलोग जाओ, मैं उन का ध्यान रखूंगा.”

विजय और आरती भारी कदमों से वृद्धाश्रम से बाहर निकले. वे चाहते थे कि लौटते समय उक बार और मांजी से मिल लें पर आरती ने रोक दिया था.

कुसुम और केदार आश्रम की खिड़की के झरोखे से विजय और आरती को लौटते हुए देख रहे थे, ‘‘बहुत उदास हैं दोनों.”

“हां कुसुम, मगर हम ने उन्हें छोड़ कर कोई गलती तो नहीं की?’’ पहली बार केदार के चेहरे पर सिकन दिखाई दी थी. कुसुम ने पलट कर अपने पति की ओर देखा,”नहीं, हम कोई नाराज हो कर थोड़ी न आए हैं. जब हमें लगेगा कि यहां मन नहीं लग रहा है तब हम अपने घर लौट चलेंगे, कुसुम ने साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछते हुए कहा.

केदार कुछ नहीं बोले. वृद्धाश्रम आने का निर्णय उन का ही था. वे ही तो गहेबगाहे इस आश्रम में आतेजाते रहते थे. उन का मित्र रंजीत यहां रह रहा था. रंजीत को तो उन का बेटा ही आश्रम में छोड़ गया था, ‘‘देखो पिताजी, आप हमारे साथ शूट नहीं होते इसलिए आप यहां रहें. जितना खर्चा लगेगा मैं देता रहूंगा…’’ रंजीत आवाक उस की ओर देख रहे थे, ‘‘बेटा इस में शूट नहीं होता का क्या मतलब? मांबाप तो अपने बेटों को पालते ही इसलिए हैं कि वे उन के बुढ़ापे का सहारा बनें.’’

‘‘होता होगा पर हमलोग आप के साथ ऐडजस्ट नहीं कर पा रहे हैं,’’ रंजीत कुछ नहीं बोला और चुपचाप वृद्धाश्रम आने की तैयारी करने लगा. उन्होंने अपने मित्र रंजीत को जरूर बताया था, ‘‘यार, अब हम मिल नहीं पाएंगे.’’

केदार को आश्चर्य हुआ, ‘‘क्यों?’’

‘‘मेरा बेटा मुझे वृद्धाश्रम छोड़ रहा है…’’

‘‘वृद्धाश्रम… पर क्यों?’’ रंजीत कुछ नहीं बोला. केदार ने भी उसे नहीं उकेरा.

‘‘देखो रंजीत, हम तो मिलेंगे ही, यहां नहीं तो मैं वृद्धाश्रम आ कर मिलूंगा,’’अरे नहीं केदार, तुम्हारा बेटा तो हीरा है. तुम उस के साथ ऐंजौय करो.’’

रंजीत की आंखें बरस रहीं थीें. बहुत छिपाने के बाद भी उन की सिसकियां केदार तक चहुंच चुकी थीं. केदार ने रंजीत से मिलने वृद्धाश्राम जाना शुरू कर दिया था. वे दिनभर वहां रहते और रंजीत के दुख को हलका करते. वहां रह रहे और वृद्धजनों से भी मिलते. केदार जब भी वृद्धाश्रम जाते अपने साथ खानेपीने का कुछ न कुछ सामान ले कर जाते. सारे लोगों के साथ बैठ कर खाते और मस्ती करते. केदार को वृद्धाश्रम में अच्छा लगने लगा था. कई बारे वे अपनी पत्नी कुसुम को भी ले कर जाते .

‘‘विजय मुझे कुछ पैसे दोगे?’’

‘‘जी बाबूजी, कितन पैसे दूं?’’

‘‘यही कोई ₹5 लाख,” केदार बोल पङे.

‘‘जी बाबूजी, मैं चेक दे दूं कि नगद दूं?” केदार को इस बात पर जरा सा भी आश्चर्य नहीं हुआ था कि विजय ने उन से यह नहीं पूछा कि इतनी सारी रकम की उन्हें क्या जरूरत आ पड़ी है. विजय कभी भी अपने पिताजी से कोई सवाल करता ही नहीं था. वे जो कह देते उसे उन का आदेश मान कर तत्काल उस की पूर्ति कर देता था.

‘‘चेक दे दो.’’

‘‘जी बाबूजी,” विजय ने तुरंत ही चेक काट कर उन के हाथों में थमा दिया.

‘‘नालायक, यह तो पूछ लिया होता कि मुझे ₹5 क्यों चाहिए…’’

‘‘मैं आप से भला कैसे पूछ सकता हूं…आप को पैसे चाहिए तो कोई अच्छे काम के लिए ही चाहिए होंगे.’’

‘‘हां, वह तो ठीक है पर फिर भी मैं बता देता हूं. वहां एक वृद्धाश्रम है न… मैं वहां एक कमरा बनवा रहा हूं.”

‘‘जी, यह तो अच्छी बात है बाबूजी. और पैसे चाहिए हों तो बता देना…’’
विजय इस से अधिक कुछ और जानना भी नहीं चाहता था.

विजय उन का इकलौता बेटा था. उन्होंने उसे खूब पढ़ायालिखाया और उसे किसी चीज की कभी कमी नहीं होने दी. वे सरकारी अधिकारी थे तो शहरशहर उन का ट्रांसफर होता रहता. पर जब वे रिटायर्ड हुए तो अपनी जन्मभूमि में ही आ कर रहने लगे. विजय को पढ़ाया तो बहुत उसे इंजीनियर भी बना दिया पर उसे नौकरी पर नहीं जाने दिया. उन्होंने उस के लिए बड़ा सा व्यापार खुलवा दिया. व्यापार अच्छा चल रहा था. उस की शादी आरती से हुई. आरती बेटी बन कर ही घर आई. वे और कुसुम भी उसे बेटी की तरह ही प्यार करते और आरती भी उन्हें सासससुर न मान कर मांपिताजी ही मानती. विजय अपनी दुकान चला जाता और कुसुम और आरती अपने में ही उलझे रहते तो केदार अपने रंजीत के साथ अपना टाइम काटते. रात में सभी लोग एकसाथ खाने की टेबल पर बैठ कर खाना खाते और दिनभर की गतिविधियों की चर्चा करते. ऐसा कभीकभार ही होता जब रात में खाने की टेबल पर सभी साथ न हों.

“बाबूजी और अम्मां आप के साथ बैठ कर खाना न खाओ तो पेट ही नहीं भरता.’’

‘‘हां रे… बड़ा हो गया पर अभी भी छोटे बच्चे जैसा करता है. ले एक रोटी और ले…’’ कुसुम का लाड़ टपक पड़ता.

‘‘नहीं अम्मां, अच्छा दे ही दो… नहीं तो आप नाराज हो जाओगी…’’
कुसुम प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरतीं तो वह उन के आंचल से चिपक जाता.

केदार इस मामले में अपनेआप को बहुत खुशकिस्मत मानता कि भले ही उन के एक ही बेटा है पर वह बेटा श्रवण कुमार बन कर उन की सेवा करता है. केदार वृद्धाश्रम में रंजीत के साथ ही अपना ज्यादातर समय काटते. कई बार कुसुम भी उन के साथ वहां जाती. वृद्धाश्रम में उन का मन लगने लगा. केदार ने विजय से पैसे ले कर 2 कमरे बना लिए. एक कमरा तो उस ने रंजीत को रहने के लिए दे दिया पर दूसरा कमरा खाली ही था. उन्होंने वहां रह रहे वृद्धजनों से भी आग्रह किया पर वे अपने कमरों में खुश थे. वह कमरा बंद ही था. इस बंद कमरे को देख कर ही उन के मन में खयाल आया कि क्यों ने वे और कुसुम यहां रहने लगें और जैसे वे यहां रंजीत से मिलने आते हैं वैसे ही वे वहां विजय से मिलने चले जाया करेंगे. उन्होंने अपने विचारों को कुसुम के साथ भी साझा किया.

‘‘हां, यह तो अच्छी बात है पर विजय इस के लिए तैयार नहीं होगा और वह मेरी बेटी आरती…वह तो सारा घर अपने सिर पर उठा लेगी,” कुसुम जानती थी कि आरती उन से दूर नहीं रह सकती. वह आम बहुओं के जैसी थोड़ी न है जिन के लिए सास सिरदर्द होती हैं. केदार भी इस बात को जानते थे कि ऐसा संभव नहीं है पर प्रयास तो करना ही चाहिए.

केदार और कुसुम ने धीरेधीरे वृद्धाश्रम में अपनी उपस्थिति बढ़ा ली थी. कई बार तो वे रात वहीं रह भी जाते थे. विजय और आरती झुंझला जाते पर वे कुछ बोल नहीं पाते थे. विजय और आरती को अपने मातापिता का व्यवहार कुछ अजीब सा लगने लगा था,”आरती, कोई बात तो नहीं हो गई है? मांबाबूजी आजकल वृद्धाश्रम में कुछ ज्यादा ही समय दे रहे हैं…” उस के स्वर में चिंता साफ झलक रही थी.

‘‘नहीं तो, पर यह तो सच है कि वे अब वहां कुछ ज्यादा ही रुकने लगे हैं,’’
आरती का स्वर भी उदास था.

वे अपने मातापिता से कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे. एक दिन उन के पिता ने ही उन से कह दिया था,”विजय, हम लोग सोच रहे हैं कि कुछ दिनों के लिए वृद्धाश्रम रहने चले जाएं,” विजय के साथ ही साथ आरती भी चौंक गई थी.

‘‘अरे बाबूजी, हम से कोई गलती हो गई क्या?’’ उस का चेहरा रुआंसा हो गया था.

‘‘नहीं… तुम तो मेरा बेटा है. तुझ से गलती हो ही नहीं सकती और हो भी जाए तो उस के लिए मेरे हाथ में डंडा है न,” केदारा जानते थे कि वे जब भी इस बात को कहेंगे तब ही विजय की प्रतिक्रया ऐसी ही आएगी.

‘‘फिर बाबूजी, आप वहां क्यों जाना चाहते हैं, अपने बेटे को छोड़ कर?’’

‘‘अपने बेटे को कैसे छोड़ सकते हैं हम. वहां केवल इसलिए जा रहे हैं ताकि हम जैसे लोगों के साथ अपना समय काट सकें. हमें वहां बहुत अच्छा लगता है इस कारण से भी.’’

‘‘यह क्या बात हुई बाबूजी…’’

‘‘तुम नहीं समझोगे, इतना समझ लो कि हम ने तय कर लिया है कि हम वहां जाएंगे.’’

‘‘मां को क्यों ले जा रहे हैं आप?’’

‘‘इस उम्र में मैं अपनी पत्नी से कैसे दूर रह सकता हूं? हम दोनों जाएंगे अब इस पर और कोई बात नहीं होगी,” जानबूझ कर केदार ने जोर से बोला था ताकि वे अपने बेटे के प्रश्नों से बच सकें. उन के पास उन प्रश्नों का कोई उत्तर था भी नहीं.

विजय की आंखों से आंसू बह निकले थे. आरती तो भाग कर अपने कमरे में जा कर सिसक रही थी, उस की सिसकियों की आवाज बाहर तक आ रही थी.

विजय और आरती अपने मातापिता के निर्णय को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे. उन्होंने उन्हें बहुत समझाया भी पर वे नहीं माने तो अंततः उन्हें कुछ दिनों के लिए जा रहे हैं कि संभावनाओं के साथ वृद्धाश्रम छोड़ आए थे. केदार और कुसुम जानते थे कि विजय के लिए ऐसा करना कठिन होगा पर उन के पास और कोई विकल्प था भी नहीं. वे अपने बेटे और बहू के साथ रह तो बहुत अच्छी तरह से रहे थे, बेटा और बहु उन की बहुत ध्यान रखते भी थे पर इस के बाद भी वे एकाकी बने हुए थे. विजय से वे सीमित ही बात कर पाते थे और विजय भी उन से ज्यादा कुछ बोलता नहीं था. अमूमन यही स्थिति कुसुम की भी थी. वृद्धाश्रम में उन का एकाकीपन दूर हो जाता था. यहां वे बहस कर लेते लड़ लेते और मस्ती भी कर लेते थे. उन्होंने अपना सारा जीवन जिस शाही अंदाज में व्यतीत किया था वैसे जीवन से वे निराश हो चुके थे.

केदार और कुसुम को वृद्धाश्रम में रहते हुए 1 साल से अधिक का समय हो गया था. विजय और आरती नियमित उन से मिलने आते थे और कई बार वे फैस्टिवल पर उन्हें घर भी ले जाते थे, ‘‘आप के बिना तीजत्योहार अच्छे नहीं लगते. आप को चलना ही पड़ेगा,’’ आरती की जिद के आगे कुसुम समर्पण कर देती और वे 1-2 दिनों के लिए घर चले जाते पर तुरंत ही लौट कर आश्रम आ जाते. उन का मन आश्रम में अच्छी तरह लग चुका था. वे यहां मुक्तभाव से रहते थे. विजय और आरती ने भी धीरेधीरे अपनेआप को ढाल लिया था. आज ही वृद्धाश्रम के मैनेजर ने बताया था कि आरती बाथरूम में फिसल गई है और उस के पैरों में पलास्टर चढ़ा है. यह सुनते ही कुसुम की आंखों से आंसू बह निकले,‘‘अरे, विजय ने बताया ही नही,” उन की नारजगी अपने बेटे के प्रति बढ़ रही थी.

औटो उन के मकान के सामने आ कर रूक गया था. औटो से सब से पहले केदार उतरे फिर कुसुम. दोनों कुछ देर तक अपने मकान को यों ही देखते रहे. बहुत दिनों के बाद वे अपने घर आए थे. उन के हाथ में केवल एक ही थैला था. गेट को पार कर जैसे ही वे अंदर के कमरे की में पहुंचे उन्हें आरती बैड पर लेटी दिखाई दे गई. कुसुम ने बहू को निहारा. आरती कुछ दुबली लग रही थी. उस के पैर में बंधा पलास्टर दिखाई दे रहा था. कुसुम का वात्सल्य उमड़ आया,”बहू…” उस की आवाज में अपनत्व भरी मिठास थी. आरती को झपकी लग गई थी पर उस ने कदमों की आहट को सुन लिया पर जैसे ही उस के कानों में ‘बहू’ शब्द गूंजा वह हडबड़ा गई, ‘‘यह तो मांजी की आवाज है,” उस ने झट आंखें खोल लीं. मांजी को अपने सामने खड़ा देखा तो उस की आंखें बरस गईं. उस ने उठने की कोशिश की.

‘‘रहने दो बहू, सोई रहो…’’ कुसुम उस के सामने आ कर खड़ी हो गई थी.

‘‘कैसी हो बिटिया…’’ अब की बार केदार ने उसे पुकारा था.

‘‘बाबूजी…’’ आरती की सिसकियों भरी आवाज कमरे में गूंज गई.
विजय शायद अंदर था. वहीं उस ने आरती के सिसकने की आवाज सुनी थी. वह दौड़ कर बाहर आया तो सामने अपने पिताजी और मां को देखा.

‘‘अम्मां…बाबूजी…’’ वह उन से लिपट गया. केदार उसे अपने सीने से लगाए उस के सिर पर हाथ फेर रहे थे और कुसुम आरती के सिर को सहला रही थी.

‘‘अबे नालायक, जब बहू के पैर में फ्रैक्चर हो गया इस की सूचना भी तुम ने मुझे देना जरूरी नहीं समझा…’’ केदार की आवाज में कठोरता थी.

‘‘हां बेटा, तुझे हमें बताना चाहिए था. यह तो तेरी गलती है…’’ कुसुम का स्वर भी नाराजगी भरा था.

‘‘क्या करूं बाबूजी, अब मैं आप को तकलीफ नहीं देना चाहता था. आप को दुख होता यह सोच कर आप को नहीं बताया.’’

‘‘यह तो गलत है बेटा. मैं घर से भले ही दूर चला गया हूं पर तुम तो अपने से ही हमें दूर करने में लगे हो…’’ केदार का स्वर भीग गया था. बहुत देर तक दोनों सुखदुख की बातें करते रहे.

‘‘सुनो बेटा, अब कुसुम जब तक बहू के पैर का प्लास्टर नहीं उतर जाता तब तक यहीं रहेगी और मैं कल सुबह ही आश्रम चला जाऊंगा.’’

‘‘आप भी क्यों नहीं रुकते यहां. वैसे भी आपने बोला था कि आप कुछ दिनों के लिए ही आश्रम जा रहे हैं. अब तो बहुत दिन हो गए. नहीं बाबूजी, अब हम आप लोगों को नहीं जाने देंगे,’’ विजय ने जोर से केदार को जकड़ लिया था.

‘‘देखो बेटा, आश्रम तो हम को जाना ही होगा….हम ने वहां का कमरा थोड़ी न छोड़ा है… वैसे भी वहां रह रहे सभी लोग हमारा इंतजार कर रहे होंगे पर कुसुम अभी कुछ दिन यहीं रहेगी, आरती के स्वस्थ होने तक…’’ विजय कुछ नहीं बोला वह जानता था कि बाबूजी उस की बात नहीं मानेंगे.

सुबह जल्दी ही केदार अपना थैला उठा कर आश्रम की ओर चल दिए थे. जातेजाते कुसुम को बोल गए थे, ‘‘देखो बहू के स्वस्थ होते ही तुम आ जाना. वहां तुम्हारे बगैर मेरा मन नहीं लगेगा.’’

कुसुम के गालों में लालिमा दौड़ गई थी. Family Story In Hindi 

Social Story In Hindi : सीलन – दो सहेलियों की दर्द भरी कहानी

Social Story In Hindi : बचपन से ही वह हमेशा नकाब में रहती थी. स्कूल के किसी बच्चे ने कभी उस का चेहरा नहीं देखा था. हां, मछलियों सी उस की आंखें अकसर चमकती रहती थीं. कभी शरारत से भरी हुई, तो कभी एकदम शांत और मासूम. लेकिन कभीकभी उन आंखों में एक डर भी दिखाई देता था. हम दोनों साथसाथ पढ़ते थे. पढ़ाई में वह बेहद अव्वल थी. जोड़घटाव तो जैसे उस की जबां पर रहता था. मुझे अक्षर ज्ञान में मजा आता था. कहानियां, कविताएं पसंद आती थीं, जबकि गणित के समीकरण, विज्ञान, ये सब उस के पसंदीदा सब्जैक्ट थे.

वह थोड़ी संकोची, किसी नदी सी शांत और मैं एकदम बातूनी. दूर से ही मेरी आवाज उसे सुनाई दे जाती थी, बिलकुल किसी समुद्र की तरह. स्कूल में अकसर ही उसे ले कर कानाफूसी होती थी. हालांकि उस कानाफूसी का हिस्सा मैं कभी नहीं बनता था, लेकिन दोस्तों के मजाक का पात्र जरूर बन जाता था. मैं रिया के परिवार के बारे में कुछ नहीं जानता था. वैसे भी बचपन की दोस्ती घरपरिवार सब से परे होती है. बचपन से ही मुझे उस का नकाब बेहद पसंद था, तब तो मैं नकाब का मतलब भी नहीं जानता था. शक्लसूरत उस की अच्छी थी, फिर भी मुझे वह नकाब में ज्यादा अच्छी लगती थी.

बड़ी क्लास में पहुंचते ही हम दोनों के स्कूल अलग हो गए. उस का दाखिला शहर के एक गर्ल्स स्कूल में हो गया, जबकि मेरा दाखिला लड़कों के स्कूल में करवा दिया गया. अब हम धीरेधीरे अपनीअपनी दिलचस्पी के काम के साथ ही पढ़ाई में भी बिजी हो गए थे, लेकिन हमारी दोस्ती बरकरार रही. पढ़ाईलिखाई से वक्त निकाल कर हम अब भी मिलते थे. वह जब तक मेरे साथ रहती, खुश रहती, खिली रहती. लेकिन उस की आंखों में हर वक्त एक डर दिखता था. मुझे कभी उस डर की वजह समझ नहीं आई. अकसर मुझे उस के परिवार के बारे में जानने की इच्छा होती. मैं उस से पूछता भी, लेकिन वह हंस कर टाल जाती.

हालांकि अब मुझे समझ आने लगा था कि नकाब की वजह कोई धर्म नहीं था, फिर ऐसा क्या था, जो उसे अपना चेहरा छिपाने को मजबूर करता था? मैं अकसर ऐसे सवालों में उलझ जाता. कालेज में भी मेरे अलावा उस की सिर्फ एक ही सहेली थी उमा, जो बचपन से उस के साथ थी. मेरे मन में उसे और उस के परिवार को करीब से जानने के कीड़े ने कुलबुलाना शुरू कर दिया था. शायद दिल के किसी कोने में प्यार के बीज ने भी जन्म ले लिया था. मैं हर मुलाकात में उस के परिवार के बारे में पूछना चाहता था, लेकिन उस की खिलखिलाहट में सब भूल जाता था. अकसर मैं अपनी कहानियों और कविताओं की काल्पनिक दुनिया उस के साथ ही बनाता और सजाता गया.

बड़े होने के साथ ही हम दोनों की मुलाकात में भी कमी आने लगी. वहीं मेरी दोस्ती का दायरा भी बढ़ा. कई नए दोस्त जिंदगी में आए. उन्हें मेरी और रिया की दोस्ती की खबर हुई. एक दिन उन्होंने मुझे उस से दूर रहने की नसीहत दे डाली. मैं ने उन्हें बहुत फटकारा. लेकिन उन के लांछन ने मुझे सकते में डाल दिया था. वे चिल्ला रहे थे, ‘जिस के लिए तू हम से लड़ रहा है. देखना, एक दिन वह तुझे ही दुत्कार कर चली जाएगी. गंदी नाली का कीड़ा है वह.’ मैं कसमसाया सा उन्हें अपने तरीके से लताड़ रहा था. पहली बार उस के लिए दोस्तों से लड़ाई की थी. मैं बचपन से ही अकेला रहा था. मातापिता के पास समय नहीं होता था, जो मेरे साथ बिता सकें. उमा और रिया के अलावा किसी से कोई दोस्ती नहीं. पहली बार किसी से दोस्ती हुई और

वह भी टूट गई. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह एक सर्द दोपहर थी. सूरज की गरमाहट कम पड़ रही थी. कई महीनों बाद हमारी मुलाकात हुई थी. उस दोपहर रिया के घर जाने की जिद मेरे सिर पर सवार थी. कहीं न कहीं दोस्तों की बातें दिल में चुभी हुई थीं.

मैं ने उस से कहा, ‘‘मुझे तुम्हारे मातापिता से मिलना है.’’

‘‘पिता का तो मुझे पता नहीं, लेकिन मेरी बहुत सी मांएं हैं. उन से मिलना है, तो चलो.’’ मैं ने हैरानी से उस के चेहरे की ओर देखा. वह मुसकराते हुए स्कूटी की ओर बढ़ी. मैं भी उस के साथ बढ़ा. उस ने फिर से अपने खूबसूरत चेहरे को बुरके से ढक लिया. शाम ढलने लगी थी. अंधेरा फैल रहा था. मैं स्कूटी पर उस के पीछे बैठ गया. मेन सड़क से होती हुई स्कूटी आगे बढ़ने लगी. उस रोज मेरे दिल की रफ्तार स्कूटी से भी ज्यादा तेज थी. अब स्कूटी बदनाम बस्ती की गलियों में हिचकोले खा रही थी.

मैं ने हड़बड़ा कर पूछा, ‘‘रास्ता भूल गई हो क्या?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं बिलकुल सही रास्ते पर हूं.’’ उस ने वहीं एक घर के किनारे स्कूटी खड़ी कर दी. मेरे लिए वह एक बड़ा झटका था. रिया मेरा हाथ पकड़ कर तकरीबन खींचते हुए एक घर के अंदर ले गई. अब मैं सीढि़यां चढ़ रहा था. हर मंजिल पर औरतें भरी पड़ी थीं, वे भी भद्दे से मेकअप और कपड़ों में सजीधजी. अब तक फिल्मों में जैसा देखता आया था, उस से एकदम अलग… बिना किसी चकाचौंध के… हर तरफ अंधेरा, सीलन और बेहद संकरी सीढि़यां. हर मंजिल से अजीब सी बदबू आ रही थी. जाने कितनी मंजिल पार कर हम लोग सब से ऊपर वाली मंजिल पर पहुंचे. वहां भी कमोबेश वही हालत थी. हर तरफ सीलन और बदबू. बाहर से देखने पर एकदम छोटा सा कमरा, जहां लोगों के होने का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता था. ज्यों ही मैं कमरे के अंदर पहुंचा, वहां ढेर सारी औरतें थीं. ऐसा लग रहा था, मानो वे सब एक ही परिवार की हों.

मुझे रिया के साथ देख कर उन में से कुछ की त्योरियां चढ़ गईं, लेकिन साथ वालियों को शायद रिया ने मेरे बारे में बता रखा था, उन्होंने उन के कान में कुछ कहा और फिर सब सामान्य हो गईं.

एकसाथ हंसनाबोलना, रहना… उन्हें देख कर ऐसा नहीं लग रहा था कि मैं किसी ऐसी जगह पर आ गया हूं, जो अच्छे घर के लोगों के लिए बैन है. वहां छोटेछोटे बच्चे भी थे. वे अपने बच्चों के साथ खेल रही थीं, उन से तोतली बोली में बातें कर रही थीं. घर का माहौल देख कर घबराहट और डर थोड़ा कम हुआ और मैं सहज हो गया. मेरे अंदर का लेखक जागा. उन्हें और जानने की जिज्ञासा से धीरेधीरे मैं ने उन से बातें करना शुरू कीं.

‘‘यहां कैसे आना हुआ?’’

‘‘बस आ गई… मजबूरी थी.’’

‘‘क्या मजबूरी थी?’’

‘‘घर की मजबूरी थी. अपना, अपने बच्चों का, परिवार का पेट पालना था.’’

‘‘क्या घर पर सभी जानते हैं?’’

‘‘नहीं, घर पर तो कोई नहीं जानता. सब यह जानते हैं कि मैं दिल्ली में रहती हूं, नौकरी करती हूं. कहां रहती हूं, क्या करती हूं, ये कोई भी नहीं जानता.’’

मैं ने एक और औरत को बुलाया, जिस की उम्र 45 साल के आसपास रही होगी.

मेरा पहला सवाल वही था, ‘‘कैसे आना हुआ?’’

‘‘मजबूरी.’’

‘‘कैसी?’’

‘‘घर में ससुर नहीं, पति नहीं, सिर्फ बच्चे और सास. तो रोजीरोटी के लिए किसी न किसी को तो घर से बाहर निकलना ही होता.’’

‘‘अब?’’

‘‘अब तो मैं बहुत बीमार रहती हूं. बच्चेदानी खराब हो गई है. सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए गई. डाक्टर का कहना है कि खून चाहिए, वह भी परिवार के किसी सदस्य का. अब कहां से लाएं खून?’’

‘‘क्या परिवार में वापस जाने का मन नहीं करता?’’

‘‘परिवार वाले अब मुझे अपनाएंगे नहीं. वैसे भी जब जिंदगीभर यहां कमायाखाया, तो अब क्यों जाएं वापस?’’

यह सुन कर मैं चुप हो गया… अकसर बाहर से चीजें जैसी दिखती हैं, वैसी होती नहीं हैं. उन लोगों से बातें कर के एहसास हो रहा था कि उन का यहां होना उन की कितनी बड़ी मजबूरी है. रिया दूर से ये सब देख रही थी. मेरे चेहरे के हर भावों से वह वाकिफ थी. उस के चेहरे पर मुसकान तैर रही थी. मैं ने एक और औरत को बुलाया, जो उम्र के आखिरी पड़ाव पर थी. मैं ने कहा, ‘‘आप को यहां कोई परेशानी तो नहीं है?’’

उस ने मेरी ओर देखा और फिर कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘जब तक जवान थी, यहां भीड़ हुआ करती थी. पैसों की कोई कमी नहीं थी. लेकिन अब कोई पूछने वाला नहीं है. अब तो ऐसा होता है कि नीचे से ही दलाल ग्राहकों को भड़का कर, डराधमका कर दूसरी जगह ले जाते हैं. बस ऐसे ही गुजरबसर चल रही है. ‘‘आएदिन यहां किसी न किसी की हत्या हो जाती है या फिर किसी औरत के चेहरे पर ब्लेड मार दिया जाता है. ‘‘अब लगता है कि काश, हमारा भी घर होता. अपना परिवार होता. कम से कम जिंदगी के आखिरी दिन सुकून से तो गुजर पाते,’’ छलछलाई आंखों से चंद बूंदें उस के गालों पर लुढ़क आईं और वह न जाने किस सोच में खो गई.मुझे अचानक वह ककनू पक्षी सी लगने लगी. ऐसा लगने लगा कि मैं ककनू पक्षियों की दुनिया में आ गया हूं. मुझे घबराहट सी होने लगी. धीरेधीरे उस के हाथों की जगह बड़ेबड़े पंख उग आए. ऐसा लगा, मानो इन पंखों से थोड़ी ही देर में आग की लपटें निकलेंगी और वह उसी में जल कर राख हो जाएंगी. क्या मैं ऐसी जगह से आने वाली लड़की को अपना हमसफर बना सकता हूं? दिमाग ऐसे ही सवालों के जाल में फंस गया था.

अचानक ही मुझे बुरके में से झांकतीचमकती सी रिया की उदास डरी हुई आंखें दिखीं. मुझे अपने मातापिता  की भागदौड़ भरी जिंदगी दिख रही थी, जिन के पास मुझ से बात करने का वक्त नहीं था और साथ ही, वे दोस्त भी दिखे, जो अब भी कह रहे थे, ‘निकल जा इस दलदल से, वह तुम्हारी कभी नहीं होगी.’ मेरा वहां दम घुटने लगा. मैं वहां से बाहर भागा. बाहर आते ही रिया की अलमस्त सुबह सी चमकती हंसी ने हर सोच पर ब्रेक लगा दिया. मैं दूर से ही उसे खिलखिलाते देख रहा था. उफ, इतने दमघोंटू माहौल में भी कोई खुश रह सकता है भला क्या?  Social Story In Hindi

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें