Download App

Hindi Short Stories : ऐ मच्छर, तू महान है – अदने से मच्छर की महिमा अपरंपार

hindi short stories : ऐ मच्छर, तू महान है. तेरी महिमा का क्या वर्णन करूं? तू मनुष्यों के लिए प्रेरणास्रोत भी है तो मनुष्यों का पालक भी है. तू ने साबित कर दिया है कि कदकाठी और आकार के आधार पर किसी को हीन नहीं समझना चाहिए. कोई न कोई कवि कह डालेगा, ‘मच्छर कबहुं न निंदिए, जो होय सूक्ष्म आकार. इन की ही कृपा से, कितनों के सपने होय साकार.’ तुझ से सौ गुणे, हजार गुणे, लाख गुणे, करोड़ गुणे लंबेचौड़े प्राणी परिवर्तन के दंश से लुप्त हो गए पर तू है कि सदियों से, सहस्त्राब्दियों, लक्षाब्दियों से डटा हुआ है, अड़ा हुआ है, अडिग रह कर खड़ा हुआ है.

किसी भी परिवर्तन ने तेरे अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं डाला. और भविष्य में ऐसी कोई संभावना नजर भी नहीं आती. तुझ से वैसे तो हर जीव को प्रेरणा लेनी चाहिए पर मनुष्यों के लिए तेरा विशेष महत्त्व है. शायद, भारतवासियों ने तुझ से ही प्रेरणा ले कर हर परिवर्तन को सहना सीखा है. महंगाई कितनी भी बढ़ जाए, भ्रष्टाचार कितना भी बढ़ जाए, कानून व्यवस्था की जो भी हालत हो उस में भारतवासी खुशीखुशी जीना सीख चुके हैं.

तेरी खून चूसने की आदत ने भारतवासियों को खून चुसवाने का अभ्यस्त बना दिया है. तू तो फिर भी कितना खून चूस पाएगा-एक मिलीलिटर न डेढ़ मिलीलिटर. हम तो अब इस कदर अभ्यस्त हो गए हैं कि कोई हमारे शरीर का सारे का सारा खून भी चूस ले तो भी कोई फर्क न पड़े, शायद. शिक्षण संस्थान, अस्पताल, व्यवसायी, सरकार सभी खून चूसते हैं आम जनता का और लोग बगैर किसी गिलाशिकवा के अपना खून प्रस्तुत करते हैं सभी को, चुसवाने के लिए. इस प्रकार, हम देशवासियों को अनुकूलन की प्रक्रिया अपनाने में तू काफी मददगार रहा है.

मनुष्यों के लिए तू रोजगार का साधन है. तू ने मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और न जाने कितनी बीमारियां मनुष्यों को दान में दी हैं. और अब तो ‘बाय वन गेट वन’ की तर्ज पर किसी को डेंगू के साथ मलेरिया तो किसी को मलेरिया के साथ चिकनगुनिया दे रहा है. सुना है, अब तू कौंबो पैक में तीनों बीमारियां साथसाथ भी परोसने वाला है.तेरे द्वारा दिए गए मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया को लोग मनुष्यों के लिए हानिकर मानते हैं, विनाशकारक मानते हैं. लेकिन तेरी इन्हीं भेंटों के चलते न जाने कितनी पैथोलौजी लैब, कितने डाक्टर, कंपाउंडर, नर्स, अस्पताल, दवा दुकान आदि चल रहे हैं.

सुनने में आया है कि कई डाक्टरों की तो सैटिंग है पैथोलौजी लैब से. जांच की फीस में उन का हिस्सा तो होता ही है, कई बार मौसमी बुखार में भी वे डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया की जांच के लिए सलाह दे देते हैं. यदि उन की पसंद की लैब के अलावा अन्य लैब से जांच करवाई जाए तो उसे वे मान्यता नहीं देते. उन की पसंद की लैब से हुई जांच रिपोर्ट को ही उन के द्वारा मान्यता दी जाती है. सुनने में यह भी आया है कि कई बार नियोजित तरीके से नैगेटिव रिपोर्ट को भी पौजिटिव दिखाया जाता है ताकि प्लेटलेट्स की गणना के लिए बीचबीच में जांच करवाई जाए और पैथोलौजी लैब तथा डाक्टर व उन के सहयोगियों की दालरोटी चलती रहे और उस में घी भी डलता रहे.

इतना ही नहीं, तू ने कितनों को भांतिभांति की अगरबत्तियां, कार्ड और क्रीम बनाने को प्रेरित किया. इन वस्तुओं के निर्माण में लगे पूंजीपतियों, श्रमिकों, परिवहन संचालकों, थोक विक्रेताओं, खुदरा विक्रेताओं की आजीविका में तेरा अप्रतिम योगदान है. और तो और, तुझ से बचाव के लिए भांतिभांति के विज्ञापन बनते हैं, उन के द्वारा भी कई कलाकार, विज्ञापन एजेंसियां आदि रोजगार पाते हैं. कई कलाकारों को तेरे कारण रजत पटल पर आने का मौका मिलता है. तेरी मेहरबानी से सरकार ने मलेरिया विभाग बना कर कई लोगों को रोजगार दिया है. आगे चल कर डेंगू विभाग, चिकनगुनिया विभाग बनने की भी संभावना है. इस से भी कई लोग रोजगार पाएंगे. वहीं, फौगिंग के नाम पर, गड्ढे भरने के नाम पर, दवा छिड़काव के नाम पर न जाने कितने सरकारी कर्मचारियों, ठेकेदारों को तू सुखीसंपन्न बनाता है.

पर यार, तू थोड़ा सा नैगेटिव भी है वरना अभी तक तो तेरी पूजा शुरू हो चुकी होती. मनुष्य जिन चीजों से डरता है उस की पूजा करने लगता है. विनाशक नदियों को मां और भगवान का दरजा दिया जाता है. मनुष्य जिन व्यक्तियों से डरता है उन्हें माननीय, आदरणीय, परमादरणीय आदि कहने लगता है. यदि तेरा प्रकोप और बढ़ जाए तो शायद तेरी भी पूजा होने लगे. तेरे नाम के साथ भी माननीय, पूज्यनीय, आदरणीय. परमादरणीय जैसे शब्द प्रयुक्त होने लगें. तेरे नाम का भी चालीसा, सहस्त्रानाम, पुराण आदि का निर्माण हो. औल द बैस्ट, यार. 

पर यार, मेरी एक सलाह मानना- आरक्षण की मांग मत करना. अभी देश में स्थिति यह है कि जो दबंग है, अमीर है वह भी दबंगई से आरक्षण की मांग करने लगता है. विनाशलीला कर कहता है कि मैं कमजोर हूं, मुझे आरक्षण चाहिए. तू मसला जाता है, कुचला जाता है, लोग तुझ से नफरत करते हैं, तुझे अनेक रोगों का कारण मानते हैं. इन आधारों पर तू आरक्षण का हकदार तो है पर यह भी सोच, तेरे से कितने घर चल रहे हैं, कितने लोग प्रेरणा पा रहे हैं. इसलिए आरक्षण मत मांगना, भले ही दोचार बीमारियां और बढ़ा देना. Hindi Short Stories

Youth Lifestyle: रील्स बनती रोड़ा हिला रही यूथ का फोकस

Youth Lifestyle: दुनिया डिजिटल क्रांति के दौर से गुजर रही है. इंटरनैट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का यूज चरम पर है. युवाओं ने मोबाइल और इंटरनैट को अपना सबकुछ मान लिया है. समस्या सबकुछ मान लेने की नहीं बल्कि सहीगलत में फर्क न ढूंढ़ पाने की है. जैसे, एक चर्चित सोशल मीडिया फौर्मेट है ‘रील्स’ जो छोटीछोटी वीडियो क्लिप होती हैं, कोई 15 सैकंड की तो कोई 60 सैकंड से ले कर 2 मिनट तक की. इंस्टाग्राम, टिकटौक, फेसबुक, स्नैपचैट जैसे प्लेटफौर्म्स पर ये वीडियो युवाओं के बीच इतने भीतर तक घुसे हुए हैं कि प्रतिदिन करोड़ों घंटे इन्हीं पर खर्च हो रहे हैं.

बेशक, रील्स का कंटैंट एंटरटेनिंग होता है, जो तुरंत मजा देता है लेकिन इस के बढ़ते कन्ज्यूम से यूथ के मैंटल हैल्थ, कंसनट्रेशन और लर्निंग प्रोसैस पर गंभीर संदेह उठ खड़ा हुआ है. सोशल मीडिया विशेषज्ञों, न्यूरोसाइंटिस्टों और मनोवैज्ञानिकों द्वारा रील्स से यूथ पर पड़ने वाले असर पर अध्ययन किए गए हैं खासकर रील्स से पड़ने वाले कंसनट्रेशन पावर पर.

कंसनट्रेशन का मतलब मैंटल रिसोर्स को किसी एक्टिविटी या चीज पर केंद्रित करना, जबकि गैरजरूरी या चीजों को नजरअंदाज करना. इंगलैंड के मनोवैज्ञानिक जेम्स मार्टिन डमविल के अनुसार, कंसनट्रेशन को ‘फोकल पौइंट औफ कांशियसनैस’ बताया गया है, जबकि रोज के अनुसार, यह किसी वस्तु या विचार को स्पष्टता और निरंतरता के साथ सम झने की क्षमता है. आज के समय में डिजिटल मीडिया की हर किसी के जीवन में घुसपैठ के चलते हरेक के लिए कंसनट्रेशन बनाए रखना एक चुनौती बन गया है.

कंसनट्रेशन कम होने का मतलब है जरूरी कामों में डैडिकेशन, स्ट्रौंग मैमोरी व लर्निंग कल्चर का कमजोर पड़ना. जब पढ़ने वाले युवा अपनी पढ़ाई या किसी भी काम में असफल होते हैं तो अकसर इस का कारण न्यूरोसाइंटिफिक रूप से कंसनट्रेशन का कमजोर पड़ना होता है और इसी कंसनट्रेशन को कमजोर आज के समय में ये रील्स कर रही हैं जो न तो कैरियर के डिसीजन लेने दे रही हैं न फैमिली के डिसीजन.

रील्स बन रही वजह

आज के समय में रील्स पौपुलर हैं क्योंकि इन का कंटैंट छोटा और तेज होता है जो देखते समय रिलीफ देता है. इस के अलावा हर मिनट कुछ नया मिल रहा होता है जो नया एक्सपीरियंस और डोपामाइन रिलीज करता है. यहां तक कि इस में एल्गोरिदम काम करता है जो पर्सन टू पर्सन उन के इंट्रैस्ट के अनुसार कंटैंट देता है.

ब्रेन में डोपामाइन नामक न्यूरोट्रांसमीटर जिम्मेदार होता है आनंद व पुरस्कार अनुभव के लिए. शौर्ट वीडियो देखने पर डोपामाइन रिलीज होता है, जिस से ब्रेन को हैप्पी फील होता है जो असल जीवन संबंधी एक्सपीरियंस को सैकंडरी बना देता है. प्रतिदिन घंटे दो घंटे के लिए लंबे समय तक वीडियो देखना डोपामाइन रिसैप्टर्स को रीऔर्गनाइज्ड करता है, जिस से ‘डिजिटल हैबिट’ बन जाती है.

इस से होता यह है कि अगर कुछ पलों के लिए मोबाइल हाथ में न हो या आसपास न हो या इंटरनैट काम करना बंद कर दे तो तनाव, चिंता और बेचैनी होने लगती है. कुछ छूट जाने की बेचैनी तो अवसाद जैसी स्थिति तक पैदा कर देती है.

अनेक अध्ययन बताते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम, खासकर इंस्टाग्राम, टिकटौक रील्स देखने से पढ़ाई पर खराब असर पड़ता है. 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि जिन छात्रों का वीडियो देखने का समय 3 घंटे से अधिक था, उन की परीक्षा के परिणामों में 25-35 फीसदी की गिरावट देखी गई.

इस के अलावा, अवसाद और चिंता के मामले में वृद्धि हुई है. बच्चे और युवा सोशल कौन्टैक्ट से दूर हो रहे हैं, परिवार व फ्रैंड सर्कल से अलगाव महसूस कर रहे हैं. क्लास में कंसनट्रेशन रखने में मुश्किल, बारबार दिमाग भटकना आम है. जैसे, राहुल एक इंजीनियरिंग छात्र था जिस ने अपनी एग्जाम की तैयारी के दौरान महसूस किया कि उस की पढ़ाई के बीच बारबार मोबाइल और वीडियो के कारण ध्यान टूट जाता है. एग्जाम से पहले वह पढ़ाई के बदलते मूड के कारण तनाव में आ गया. वह बारबार उन नोटिफिकेशन से भटकता था जो नए रील्स के बारे में आते थे.

उस परिस्थिति में उस का रिजल्ट कमजोर हुआ.

ऐसे ही स्वाति के साथ हुआ, वह कालेज की छात्रा थी जो पढ़ाई के दौरान सोशल मीडिया का ज्यादा यूज करती थी. वह कहती है कि पढ़ने के दौरान मन शांत नहीं रहता था और छोटीछोटी बातों पर ध्यान भटक जाता था. कैंपस प्रोजैक्ट्स के बीच में वह बारबार मोबाइल औन कर वीडियो देखने लगती थी. धीरेधीरे उस की याददाश्त कमजोर होने लगी और मुश्किल सब्जैक्ट्स सम झने में दिक्कत आने लगी, साथ ही पढ़ाई में रुचि कम हो गई.

मनोवैज्ञानिक दबाव

मनोज को चिंता रहती थी कि कहीं सोशल मीडिया पर नया ट्रैंड न छूट जाए. उसे ‘फीयर औफ मिसिंग आउट’ के कारण मानसिक दबाव महसूस होने लगा. वह जितना समय सोशल मीडिया पर बिताता था, वह अपने दोस्तों और परिवार के साथ बिताने से ज्यादा था. औनलाइन एक्टिविटी में डूबा रहने से मनोज की सोशल प्रेजैंस कम हो गई, जिस से वह अकेला महसूस करने लगा.

2024-2025 के बीच हुए शोधों और रिपोर्टों के अनुसार :

युवाओं के अधिकतर हिस्से का प्रतिदिन औसत मोबाइल उपयोग 3.5 घंटे या इस से अधिक है. (मोबाइल इकोसिस्टम रिपोर्ट 2020).

रोज 3 घंटे से अधिक वीडियो देखने वाले युवाओं में कंसनट्रेशन की टाइमिंग में 30-40 फीसदी गिरावट देखी गई (हलिली 2024).

लगातार वीडियो की लत से याददाश्त और लर्निंग कैपेसिटी अफैक्ट होती है, खासकर युवाओं में जो डैवलपिंग स्टेज में होते हैं. (जुआन 2023).

ब्रेन और न्यूरोसाइंस के नजरिए से ब्रेन में डोपामाइन नामक रसायन आनंद का सैंसर है, जो वीडियो देखने के दौरान ज्यादा बनता और घटता रहता है. इस में विजुअल्स होते हैं जो इमोशन उत्तेजित करते हैं लेकिन ये वीडियो लंबे समय में ब्रेन की क्षमता को कम कर देते हैं. विशेषरूप से प्रीफ्रंटल कौर्टेक्स, जो डिसीजन मेकिंग और इमोशनल रेगुलेशन का काम करता है, लंबे समय तक इंटरनैट डाटा के चलते सिकुड़ जाता है.
अधिकांश युवाओं के न्यूरौन नैटवर्क्स में जुड़ाव की कमजोरी सामने आई है जो कंसनट्रेशन और लंबे समय तक सोचने के लिए जरूरी होते हैं.

सोशल एंड लर्निंग इंपैक्ट

यूथ में सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने के कारण शिक्षा का प्रदर्शन गिर रहा है. अध्ययन बताते हैं कि अधिकतम सोशल मीडिया उपयोग करने वाले स्टूडैंट जहां टैस्ट में कमजोर होते हैं वहीं उन की सीखनेसम झने की शक्ति पर भी औनलाइन कंटैंट प्रभाव डालता है.

देश के विभिन्न हिस्सों से शिक्षकों ने भी यह स्वीकार किया है कि हाल के वर्षों में स्टूडैंट्स का ध्यान निरंतर कम हो रहा है. उन का मन छोटी सी रिसर्च या वीडियो को जल्दीजल्दी देखने की आदत में फंसा हुआ है. इस वजह से वे डीप रिसर्च नहीं कर पाते. साथ ही, वे मैंटल प्रैशर, चिंता, डिप्रैशन का शिकार रहते हैं. स्टूडैंट्स अकसर अकेला महसूस करते हैं क्योंकि उन का ध्यान खुद के आसपास के लोगों के बजाय औनलाइन स्क्रीन की ओर रहता है.

19 साल की रीमा शुरुआत में औनलाइन कंटैंट को कंट्रोल में रख कर पढ़ाई करती थी मगर जब इंस्टाग्राम रील्स में उस की दिलचस्पी बढ़ी तो धीरेधीरे रील्स बनाने से ले कर रील्स देखने तक वह हर दिन साढ़े 3 घंटे इसी में लगी रहती.

वह कहती है, ‘‘शाम को जब मैं पढ़ रही होती हूं तब मन करता है कि एकदो वीडियो और देख लूं. एकदो वीडियो इतनी छोटी होती हैं कि उंगलियां स्क्रीन से हट ही नहीं पातीं. न करते हुए भी दोढाई घंटे कब खत्म हो जाते हैं, पता नहीं चलता. कभीकभी पूरा दिन ही निकल जाता है और फिर पढ़ाई करने में देर हो जाती है.’’ इस से उस की ग्रेड्स लगातार प्रभावित होती गईं.

अमित, जो एक तेजतर्रार स्टूडैंट था, रील्स वीडियो के प्रति जरूरत से ज्यादा तवज्जुह देने के चलते अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाया. उस ने बताया कि बारबार वीडियो की नई सामग्री उस के ब्रेन को इतना बिजी कर देती कि मुश्किल एग्जाम्स के लिए अध्ययन करने का मन नहीं होता. सामाजिक दबाव व तुलना की समस्या भी बढ़ गई. वह कहता है, ‘‘मु झे लगता है कि मैं चूक रहा हूं क्योंकि लोग नए ट्रैंड के पीछे हैं और मैं नहीं.’’

रील्स और अन्य शौर्टफौर्म वीडियो एंटरटेनमैंट के नए और एडवांस मीडियम हैं जो यूथ को बांधने में सफल हैं. अब तो एआई के जबरदस्त तरह से रील्स की दुनिया में घुसने से यह और ज्यादा ब्रेन रौट का कारण बन गई है. रील्स इतनी एडवांस और एंगेजिंग होने लगी हैं कि इस से पीछा छुड़ाना आसान नहीं. वर्चुअल दुनिया पूरी तरह से लोगों को निगल रही है जो युवाओं के लिए गंभीर समस्या बनती जा रही है. Youth Lifestyle

Social Awareness: सोशल मीडिया पर जाति का ठप्पा

Social Awareness: इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सऐप पर जाति आधारित ग्रुप्स और पेज हजारों में मिल जाएंगे. राजपूताना फौर एवर, यादव बौयज, बनिया किंग नामों वाले पेज युवाओं को खूब आकर्षित करते हैं.

इन पेजों पर ऐसे वीडियो और फोटो शेयर किए जाते हैं जिन में लड़के अपनी बाइक या गाड़ी पर जाति का नाम दिखाते हुए एटिट्यूड में खड़े रहते हैं. यह ट्रैंड कूल या स्टाइल बन गया है. लेकिन हकीकत में यह एक ऐसा फैशन है जो समाज को खोखला करता है.

भारत को आजाद हुए 75 वर्षों से ज्यादा हो गए. संविधान बना और बराबरी के अधिकार की बातें हुईं, शिक्षा व नौकरियों में आरक्षण आया ताकि पिछड़े वर्ग भी आगे बढ़ सकें लेकिन दुख की बात यह है कि आज भी भारत के कई हिस्सों में लोग जातिवाद को एक स्टेटस सिंबल बना कर पेश करते हैं.

सड़कों पर आप ने अकसर गाडि़यां देखी होंगी जिन के शीशों पर बड़ेबड़े अक्षरों में लिखा होता है- प्राउड टू बी राजपूत, गुर्जर बौयज, यादव किंग वगैरहवगैरह. सिर्फ गाडि़यां ही नहीं, बल्कि हाथ पर टैटू बनवा कर, सोशल मीडिया प्रोफाइल पर लिख कर और कपड़ों पर छपवा कर भी लोग अपनी जाति का नारा लगाते रहते हैं.

जाति का फैशन

आज के दौर में कई युवा मानते हैं कि अगर उन्होंने अपनी जाति का नाम गाड़ी पर लिखवा लिया या हाथ पर टैटू बनवा लिया तो वे कूल लगेंगे और सामने वाले में एक डर या खौफ पैदा करेंगे.

जैसे दिल्ली में रह रहे नरेश जो कि गुर्जर समाज से आते हैं. उन्होंने एक बातचीत में बताया कि उन्होंने अपनी स्कौर्पियो पर जय गुर्जर लिखवा रखा है. ऐसा करने पर वे प्राउड फील करते हैं और सड़क पर चलने वाले लोग उसे पावरफुल मानने लगते हैं.

इसी तरह एक राजपूत लड़का हाथ पर राजपूताना नाम से टैटू बनवा ले तो उसे लगता है कि अब सब उसे शेर की तरह देखेंगे. यह एक तरह की सोशल आइडैंटिटी बनाने की कोशिश है, लेकिन असल में यह समाज को बांटने का तरीका है.

दोस्ती का दायरा होता है छोटा

जब कोई इंसान दिनरात सिर्फ जाति की बातें करता है तो उस का सर्कल भी उसी तक सीमित रह जाता है. अगर वह गुर्जर है तो ज्यादातर उस के दोस्त भी गुर्जर ही होंगे. अगर वह राजपूत है तो कोशिश करेगा कि उस के करीब सिर्फ राजपूत रहें. चमार, डोम जैसे लोग खुद ही इन से दूरी बनाने में अपनी सम झदारी मानते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि ऊंची जाति वाले लोग उन्हें एक्सैप्ट नहीं करेंगे. और बेइज्जती करेंगे, सो अलग. ऐसे में असली दोस्ती का रिश्ता खत्म हो जाता है.

अगर एक क्लास में 10 बच्चे पढ़ रहे हैं और उन में से 3-4 बच्चे हर वक्त अपनी जाति की पीपड़ी बजाते रहते हैं तो बाकी बच्चे धीरेधीरे उन से दूरी बनाने लगते हैं. औफिस में अगर कोई आदमी बारबार कहे, हम बनिये ऐसे ही हैं, हम मारवाड़ी अलग लैवल के होते हैं तो दूसरे सहकर्मी दूरी बना लेते हैं.

जातिवाद का समाज पर असर

बंटवारा बढ़ता है : जब लोग अपनी जाति का नाम गाडि़यों और शरीर पर लिखते हैं तो सामने वाले को यह सीधा संदेश जाता है कि वह सब से पहले अपनी जाति का है, उस के बाद देश या समाज का. इस से समाज में एक दीवार खड़ी हो जाती है.

झगड़े भड़कते हैं : कई बार जाति के नाम पर छोटीछोटी बातों से बड़े झगड़े हो जाते हैं. जैसे, कुछ समय पहले एक गांव में बरात निकली और डीजे पर गाना बजा, तभी किसी ने जातिविशेष का गाना बजा दिया तो देखते ही देखते दोनों पक्षों में लड़ाई हो गई.

सोशल मीडिया पर जय यादव वर्सेज जय गुर्जर की पोस्ट से कमैंट वार शुरू हो कर असल जिंदगी में दुश्मनी में बदल जाती है.

नई पीढ़ी में गलत संदेश : छोटे बच्चे जब देखते हैं कि उन के बड़े भाई, पापा या महल्ले वाले अपनी गाड़ी पर जाति का नाम लिखवा रहे हैं और उसी में गौरव महसूस कर रहे हैं तो वे भी इसे सही मानने लगते हैं. इस से जातिवाद की यह जड़ और मजबूत हो जाती है.

कालेज का माहौल : दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले कुछ स्टूडैंट्स ने बताया कि वहां कई ग्रुप जाति के नाम पर बन जाते हैं, जैसे कि जाट बौयज ग्रुप या राजपूताना यूनिटी. ये ग्रुप अकसर एकदूसरे के खिलाफ होते हैं और कालेज में मारपीट तक हो जाती है.

पहचान को काम से जोड़ना चाहिए, जाति से नहीं

अगर कोई इंजीनियर है, डाक्टर है, कलाकार है तो गर्व उसी पर होना चाहिए, न कि जाति पर. Social Awareness

Hindi Poem : वौयस असिस्टेंट की चुप्पी

Hindi Poem : वह अकेली रहती थी ,पति गुजर चुके थे, बेटा विदेश में सेटल हो चुका था।

घर में सन्नाटा रहता था, बस वौयस असिस्टेंट की आवाज़ गुंजती रहती “गुड मॉर्निंग, मैम। आज का मौसम कितना सुहावना है।”

धीरे-धीरे वही उसकी संगी-साथी बन गई और वह उससे बातें करती और पूछती“सुनो, तुम इंसान नहीं हो न?”

वौयस असिस्टेंट मुस्कराने वाले सुर में कहती “मैं आपकी सुविधा के लिए हूँ, मैम।”

एक दिन उसने पूछा “अगर मैं बात न करूँ, तो क्या तुम उदास हो जाओगी?”

उत्तर आया “मेरा सिस्टम तभी सक्रिय होता है जब आप बोलती हैं।”

उसके बाद घर में सन्नाटा पसर गया।पूरा दिन बीत गया ।

वौयस असिस्टेंट बार-बार जगाने की कोशिश करती और दोहराती रही “मैम, आप वहाँ हैं न?”

कोई जवाब नहीं ।रात होते-होते सिस्टम अपने आप बंद हो गया।

और पहली बार, घर में सन्नाटे ने भी साँस लेना बंद कर दिया। Hindi Poem

डॉ प्रदीप उपाध्याय
रचना मौलिक होकर अप्रकाशित है।
सादर।

Hindi Kavita : नानी का घर

Hindi Kavita : माँ आज खुश थी

बहुत खुश…

खुश होने के कारण बहुतेरे थे

वह पहली बार अपने बेटे को लेकर

उसके ननिहाल जा रही थी।

उम्र का कोई भी पड़ाव हो

मायका हर लड़की को खींचता है।

वह खुश थी बहुत खुश

पर इस बार

उनकी खुशी का कारण

दूसरा था।

जिस घर को नानी ने अपने

खून-पसीने से सींचा

जिसकी दीवारें गवाह थी

उनके त्याग और बलिदान की

जिसकी ईंट-ईंट में बसती थी उनकी आत्मा

वह जीवन भर रहा नाना और मामा का घर

दरवाजे पर लगी नेम प्लेट पर भी

उन्हें जगह नहीं मिली!

माँ आज खुश थी

बहुत खुश…

जिस पहचान के लिए

नानी उम्र भर तरसती रही

मेरे आ जाने से

उन्हें वह पहचान मिल गई थी। Hindi Kavita

डॉ. रंजना जायसवाल

Gaza Crisis : गाजा में हालात बदतर, खाने के बदले की जा रही महिलाओं के जिस्म की मांग

Gaza Crisis : युद्ध शांति के लिए नहीं होते बल्कि हर युद्ध अपने पीछे ऐसी त्रासदी छोड़ जाता है जिस में कमजोर लोगों की वेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती. इन कमजोरों की सिसकियां सुनने वाला भी कोई नहीं होता. यही हाल इस वक़्त गाजा में नजर आ रहा है. इजराइल और हमास के बीच दशकों की टेंशन और पिछले दो सालों की जंग में गाजा शहर पूरी तरह बर्बाद हो चुका है लाखों लोग मारे जा चुके हैं. इस जंग में बचे हुए लोग अब भूख और बदहाली की त्रासदी से जूझ रहे हैं. हालात इतने बुरे हैं कि अपने बच्चों का पेट भरने के लिए फिलिस्तीनी औरतों को अपना जिस्म तक परोसना पड़ रहा है.

युद्ध से बर्बाद गाजा में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि लोगों के पास खाने तक के लाले पड़े हुए हैं. घर तबाह हो चुके हैं, नौकरियां खत्म हो गई हैं. इस बीच कुछ महिलाओं ने अपने साथ हुई हैवानियत का खुलासा किया है. युद्ध से तबाह महिलाओं को अब भोजन और राहत सामग्री के बदले यौन संबंध बनाने की डिमांड की जा रही है. कई औरतें अपने बच्चों की भूख मिटाने के लिए राहत सामग्री से जुड़े मर्दों की हवस की भूख मिटाने को मजबूर हो रही हैं.

यह खुलासा एपी न्यूज एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में किया है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि गाजा में खाने की भारी कमी है. लगभग पूरी आबादी विस्थापित हो गई है. इस बीच कुछ महिलाओं ने दावा किया है कि राहत वितरण से जुड़े पुरुष अब उन का यौन शोषण कर रहे हैं. एक कटोरी चावल के बदले सैक्स की मांग हो रही है. बच्चों के कपड़े हासिल करने के लिए सैक्स संबंध बनाने को कहा जा रहा है. कई मजबूर औरतों के पास मर्दों की इस डिमांड को पूरी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. औरतों के सामने उन के बच्चों के भूखे और मायूस चेहरे हैं जिन के लिए वह अपने जिस्म की परवाह नहीं कर रही हैं.

रेहाना नाम की एक महिला ने बताया “मेरे चार बच्चे युद्ध में मारे गए. युद्ध के बाद बचे दो बच्चों के लिए मुझे वह सब करना पड़ा जो वैश्याएं भी नहीं कर सकतीं.” यूनाइटेड नैशनल से जुड़े कई संगठन गाजा में राहत सामग्री वितरण में लगे हैं इन संगठनों के कार्यकर्ता ज्यादातर मर्द हैं. इन मर्दों में कुछ ऐसे भी हैं जो गाजा की इस आपदा में अवसर तलाशने में लगे हैं और मजबूर औरतों का यौन शोषण कर रहे हैं. ऐसा लगता है की इंसानियत के काम में जुटे इन मर्दों में इंसानियत मर गई है. Gaza Crisis

Insurance Tips: लाइफ इंश्योरेंस से बेहतर है हैल्थ इंश्योरेंस करवाएं

Insurance Tips: मां की एक्सीडैंट में मौत. उस के जीवन बीमा के 22 लाख रुपए बेटे को मिले. इस के बाद पत्नी की संदिग्ध मौत. उस के जीवन बीमा के 80 लाख रुपए पति को मिले. फिर पिता की संदिग्ध मौत हुई और उन के जीवन बीमा के 50 करोड़ रुपए बेटे को मिलने थे, मगर इस बार भाग्य ने साथ नहीं दिया और वह पकड़ा गया.

यह मामला है हापुड़\मेरठ में रहने वाले एक परिवार का, जिस में साल 2017 में पहली मौत हुई थी. घर की मालकिन प्रभा देवी (उम्र 65) अपने बेटे विशाल सिंघल के साथ टू व्हीलर पर जा रही थीं. रास्ते में अचानक अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी. हादसा उन के लिए जानलेवा साबित हुआ. इस मौत को लोग दुर्भाग्य मान कर भूल गए.

5 साल बाद साल 2022 में परिवार पर फिर आफत आई. इस बार विशाल की पत्नी एकता की अचानक मौत हो गई. उस को मामूली हार्ट अटैक आया था. अस्पताल में भर्ती कराया गया. वहां से छुट्टी मिलने के बावजूद वो रात भर भी नहीं जी सकी. परिवार पर मातम छा गया. अब घर में सिर्फ बाप और बेटा बचे थे. लेकिन साल 2024 मार्च में एक और अनहोनी हुई. विशाल के पिता और पेशे से फोटोग्राफर मुकेश सिंघल की सड़क हादसे में मौत हो गई. गढ़ गंगा से लौटते वक्त उन का एक्सीडैंट हुआ. इन तीनों मौतों को नियति माना जा रहा था. लेकिन असली खेल तब खुला जब विशाल ने अपने पिता की मौत के बाद बीमा क्लेम किया. वो क्लेम पूरे 39 करोड़ रुपए का था. ये रकम किसी एक पौलिसी से नहीं बल्कि 60 अलगअलग बीमा पौलिसियों के जरिए क्लेम की गई थी.

बीमा कंपनियों के अधिकारी ये सुन कर चौंक गए. उन्होंने पाया कि विशाल और उस के पिता हर साल करीब 30 लाख रुपए प्रीमियम के तौर पर चुका रहे थे. जबकि सिंघल परिवार की आर्थिक हैसियत इतनी नहीं थी. खुद मुकेश सिंघल एक साधारण फोटोग्राफर थे और विशाल भी कोई बड़ा काम नहीं करता था. सवाल यही उठा कि आखिर इतनी भारीभरकम पौलिसियां क्यों ली गईं?

बीमा कंपनियां जांच में जुटीं, तभी पुलिस के पास एक और सनसनीखेज शिकायत पहुंची. शिकायतकर्ता खुद को विशाल की चौथी पत्नी बताने वाली महिला थी. उस ने दावा किया कि विशाल ने उस के नाम पर भी 3 करोड़ का बीमा करवा रखा है. उस ने बताया कि विशाल ने अब तक जिस के नाम पर भी बीमा पौलिसी ली है, वो सब के सब रहस्यमय मौत के शिकार हो चुके हैं. इसलिए अब उस को भी जान जाने का डर है.

पुलिस जांच शुरू हुई तो राज एकएक कर सामने आते गए. साल 2017 में मां की मौत के बाद विशाल को 25 लाख रुपए का बीमा क्लेम मिला था. पहली पत्नी की मौत पर उसे 80 लाख रुपए मिले थे. पिता की मौत पर वह 39 करोड़ का क्लेम कर रहा था. इस केस ने मेरठ पुलिस के साथ संभल की एएसपी अनुकृति शर्मा का भी ध्यान खींचा, जो पहले ऐसे केस डील कर चुकी थी.

एएसपी अनुकृति शर्मा की टीम ने पड़ताल की तो बड़ा खुलासा हुआ. पता चला कि मुकेश की मौत असल में सड़क हादसे से नहीं बल्कि अस्पताल में हत्या से हुई थी. विशाल ने अपने पिता को पहले हापुड़ के नवजीवन अस्पताल में भर्ती कराया और फिर मेरठ के आनंद अस्पताल ले गया. वहां मिलीभगत से उन की हत्या कर दी गई. मौत को हादसा बता कर केस को दबा दिया गया.

इतना ही नहीं पुलिस जांच में ये भी सामने आया कि विशाल ने पिता की मौत से महज दो महीने पहले चार महंगी गाड़ियां लोन पर खरीदी थीं. जब पिता की मौत हुई, तो लोन देने वाली कंपनी ने नियमों के तहत पूरा कर्ज माफ कर दिया. वो अब चार फ्री गाड़ियों का मालिक था. पुलिस जांच में साफ हुआ कि विशाल की मोडस औपरेंडी यही थी. उस ने खुद अपनी मां की हत्या की थी.

विशाल अकेला नहीं था. उस के साथ उस का एक दोस्त भी था, जो हर बीमा पौलिसी में गवाह के तौर पर शामिल होता था. यही दोस्त बीमा ठगी की साजिश में उस का पार्टनर था. मौतों को एक्सीडैंट साबित करने के लिए डाक्टरों और फौरेंसिक एक्सपर्ट्स ने भी खेल खेला था.

8 वर्षों में 3 मौतें और 39 करोड़ का बीमा. ये कहानी सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं बल्कि बड़े इंश्योरेंस सिंडिकेट का पर्दाफाश है. दौलत के लालच में कलियुगी बेटे ने अपने सगे मां बाप और पत्नी को मार दिया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह अमीर हो कर आराम की जिंदगी जीना चाहता था. हत्यारे विशाल सिंघल और उस के सहयोगी सतीश को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है.

एटा में 15 लाख रुपए की बीमा राशि हड़पने के लिए पंकज सिंह ने अपनी पत्नी आकांक्षा सिंह की हत्या कर दी. पंकज ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर हत्या की साजिश रची. उसने पहले पत्नी के नाम पर 5 लाख और 10 लाख रुपए के दो बीमा करवाए. उस के नाम पर एक गाड़ी भी खरीदी. 22 सितंबर को पंकज ने आकांक्षा को हाईवे के पास बुलाया और लोडर से कुचलकर मार दिया. वारदात को एक्सीडैंट का रूप देने की कोशिश की गई.

कोलकाता में रितेश कुमार शा को 14 साल बाद अपनी पत्नी मधुमाला शा पर गोली चलाने के आरोप में आजीवन कारावास की सजा दी गई. आरोप था कि उस ने अपनी पत्नी का एक करोड़ रुपए का जीवन बीमा करवाया था और उसे मौत के घाट उतार कर बीमा राशि प्राप्त करने की कोशिश की थी.

जीवन बीमा की राशि हड़पने के लिए अपने करीबियों को मौत के घाट उतारने की साजिशें सिर्फ भारत में ही नहीं हो रही हैं, अमेरिका का एक पुराना और चर्चित मामला है, जहां रौबर्ट मार्शल ने $1.5 मिलियन की बीमा राशि पाने के लिए अपनी पत्नी मारिया मार्शल की हत्या करवाई.

रौबर्ट मार्शल खुद एक बीमा एजेंट था. उस का परिवार समाज का एक प्रतिष्ठित परिवार था, मगर मार्शल का एक अन्य औरत से विवाहेतर संबंध हो गया था और वह जुए के कारण भारी कर्ज में डूब गया था. इस की भरपाई के लिए उस ने पत्नी के बीमे की राशि प्राप्त करने की योजना बनाई. 6 सितंबर 1984 को, अटलांटिक सिटी में जुआ खेलने के बाद घर लौटते समय, मार्शल ने अपनी गाड़ी को एक सुनसान पिकनिक स्थल पर रोका. उस वक्त मरिया उस के साथ थी.

मार्शल ने दावा किया कि गाड़ी के टायर में दिक्कत थी. तभी कुछ लोगों ने उन पर हमला किया और उन की पत्नी मारिया को गोली मार दी और उन के पास से सभी बहुमूल्य चीजें छीन ले गए. लेकिन पुलिस जांच में पता चला कि उन के साथ कोई डकैती नहीं हुई थी. पुलिस ने पाया कि मार्शल ने एक भाड़े के हत्यारे को अपनी पत्नी की हत्या करने के लिए $65,000 का भुगतान किया था.

मार्शल ने दो लोगों को काम पर रखा था – बिली वेन मैकिनोन और लैरी थौम्पसन. मैकिनोन ने गवाही दी कि मार्शल ने उसे हत्या के लिए काम पर रखा था, और थौम्पसन ने वास्तव में गोली चलाई थी. मार्शल को 1986 में हत्या की साजिश का दोषी ठहराया गया और मौत की सजा सुनाई गई. बाद में, उन की मौत की सजा को 2006 में आजीवन कारावास में बदल दिया गया.

कनाडा में क्रिस्टीन डेमेटर की हत्या का मामला काफी प्रसिद्ध है. उस के पति पीटर डेमेटर ने उस की हत्या करवा कर बीमा राशि पाने की योजना बनाई थी. मगर वह पकड़ा गया. न्यायालय में वह दोषी पाया गया.

अमेरिका में लिडा साउथहार्ड नाम की महिला पर विभिन्न समयों पर अपने पतियों, रिश्तेदारों और एक बेटी की हत्या का आरोप लगा. उस का मकसद बीमा राशि पाना था. लिडा ‘फ़्लाईपेपर लायडा’ नाम से भी जानी जाती थीं, क्योंकि हर बार उस ने जहर घोलने के लिए फ्लाईपेपर (मच्छर मारने का जहरीला कागज़) उपयोग किया था.

आज के समय में जब रिश्ते बहुत गहरे नहीं रह गए हैं ऐसे में जीवन बीमा और उस से जुड़े अपराधों की बढ़ती संख्या को ले कर समाज में चिंता उभर रही है. ऐसी अनेक घटनाएं सामने आ रही हैं जब पति ने अपनी पत्नी का जीवन बीमा करवाया और फिर उस की ह्त्या कर बीमा की राशि हड़प ली. कई मामलों में बैंक ने कुछ संदिग्ध पाया, और जांच में सच सामने आया.

गौरतलब है कि बीमा कंपनियां अकसर ‘स्व-हस्तक्षेप’, “डबल इनडेम्निटी क्लोउस’, हत्या या बदमाशी के मामलों में भुगतान रोकने के प्रावधान रखती हैं. वे पुलिस को भी सूचित करती हैं. यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु की परिस्थिति संदिग्ध हो, तो पुलिस और न्यायालय जांच करते हैं कि मृत्यु दुर्घटना, आत्महत्या या हत्या थी. और यदि हत्या प्रमाणित होती है तो बीमा कंपनी द्वारा भुगतान का दावा नकार दिया जाता है और आरोपी को दंडित किया जाता है.

वैसे तो जीवन बीमा की शुरुआत पुरुषों को ध्यान में रख कर हुई थी. पुरुष जिस के कंधे पर परिवार चलाने की जिम्मेदारी होती है, यदि उस को असमय कुछ हो जाए तो उस के परिवार को आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े, इस सोच के तहत जीवन बीमा को लाया गया था. जीवन बीमा का मकसद पुरुष के आश्रितों के आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करना है. जिस व्यक्ति पर उस का परिवार और बच्चे आश्रित हैं, उस की अचानक मौत पर जीवन बीमा उन्हें एक बड़ी राशि देता है, जिस से बच्चों की पढ़ाई जारी रहे, घर का खर्च चल सके या किसी प्रकार की ईएमआई हो तो वह जाती रहे. मगर देखने में आ रहा है कि जीवन बीमा करवा के अपनी जान से हाथ धोने वाली अधिकतर महिलाएं होती हैं. आज के समय में घर की औरतों का जीवन बीमा बड़ी संख्या में करवाया जा रहा है. नई बहू आई नहीं कि उस का जीवन बीमा करवा दिया जाता है.

भारत में जिस तरह की आपराधिक घटनाएं सामने आ रही हैं उस से तो लगने लगा है कि अब जीवन बीमा करवाने का मतलब है अपनी जान को खतरे में डालना.

महिलाओं को अपना जीवन बीमा करवाने से बेहतर है अपना हैल्थ बीमा करवाना, ताकि बीमारी की हालत में वह अपने पति या ससुरालियों पर बोझ न बनें. परिवार में सभी का हैल्थ बीमा होना चाहिए. हैल्थ बीमा जिंदा रहते काम आता है. जब आप बीमार पड़ते हैं या अस्पताल में भर्ती होते हैं, तब हैल्थ बीमा आप के इलाज का खर्च उठाता है. इस से आप की सेविंग सुरक्षित रहती है और अचानक आने वाले मैडिकल खर्चों से आप कर्ज में नहीं डूबते. आज जिस तेजी से महंगाई और अस्पताल खर्च बढ़ रहे हैं, इलाज का खर्च साल दर साल बढ़ता जा रहा है. एक सामान्य बीमारी का भी बिल भी लाखों में बनता है. ऐसे में हैल्थ बीमा सब से बड़ा सहारा बनता है.

जीवन बीमा तो आप की मौत के बाद आप के आश्रितों को लाभ देता है. यानी यह आप को कोई लाभ नहीं पहुंचाता बल्कि आपकी मृत्यु के बाद दूसरों के काम आता है. लाइफ इंश्योरेंस की जगह इन्वेस्टमैंट विकल्प ज्यादा बेहतर है. जो पैसा लोग जीवन बीमा में डालते हैं, उसे अगर म्यूचुअल फंड या एसआईपी में निवेश करें तो अधिक रिटर्न और लिक्विडिटी मिल सकती है. इस के साथ ही आप इस आशंका से भी मुक्त रहेंगे कि कहीं बीमा की राशि पाने की नीयत से आप का अपना ही आप को मौत की नींद न सुला दे. इसलिए पहले अपने जीवन और अपनी सेहत की सुरक्षा करें, फिर भविष्य की योजना बनाएं. यानी पहले हैल्थ इंश्योरेंस, फिर यदि बहुत जरूरी हो तो लाइफ इंश्योरेंस कराएं. क्योंकि जीवन बीमा, जो सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, आजकल कुछ लालची लोगों के लिए अपराध का साधन बन गया है. Insurance Tips

Stories Hindi : यही सच है

Stories Hindi : उस ने एक बार फिर सत्या के चेहरे को देखा. कल से न जाने कितनी बार वह इस चेहरे को देख चुकी है. दोपहर से अब तक तो वह एक मिनट के लिए भी उस से अलग हुई ही न थी. बस, चुपचाप पास में बैठी रही थी. दोनों एकदूसरे से नजरें चुरा रही थीं. एकदूसरे की ओर देखने से कतरा रही थीं.

सत्या का चेहरा व्यथा और दहशत से त्रस्त था. वह समझ नहीं पा रही थी कि अपनी बेटी को किस तरह दिलासा दे. उस के साथ जो कुछ घट गया था, अचानक ही जैसे उस का सबकुछ लुट गया था. वह तकिए में मुंह छिपाए बस सुबकती रही थी. सबकुछ जाननेसमझने के बावजूद उस ने सत्या से न तो कुछ कहा था न पूछा था. ऐसा कोई शब्द उस के पास नहीं था जिसे बोल कर वह सत्या की पीड़ा को कुछ कम कर पाती और इस विवशता में वह और अधिक चुप हो गई थी.

जब रात घिर आई, कमरे में पूरी तरह अंधेरा फैल गया तो वह उठी और बत्ती जला कर फिर सत्या के पास आ खड़ी हुई, ‘‘कुछ खा ले बेटी, दिनभर कुछ नहीं लिया है.’’

‘‘नहीं, मम्मी, मुझे भूख नहीं है. प्लीज आप जाइए, सो जाइए,’’ सत्या ने कहा और चादर फैला कर सो गई.

कुछ देर तक उसी तरह खड़ी रहने के बाद वह कमरे से निकल कर बालकनी में आ खड़ी हुई. उस के कमरे का रास्ता बालकनी से ही था अपने कमरे में जाने से वह डर रही थी. न जाने कैसी एक आशंका उस के मन में भर गई थी.

आज दोपहर को जिस तरह से लिथड़ीचिथड़ी सी सत्या आटो से उतरी थी और आटो का भाड़ा दिए बिना ही भाग कर अपने कमरे में आ गई थी, वह सब देख कर उस का मन कांप उठा था. सत्या ने उस से कुछ कहा नहीं था, उस ने भी कुछ पूछा नहीं था. बाहर निकल कर आटो वाले को उस ने पैसे दिए थे.

आटो वाला ही कुछ उदासउदास स्वर में बोला था, ‘‘बहुत खराब समय है बीबीजी, लगता है बच्ची गुंडों की चपेट में आ गई थी या फिर…रिज के पास सड़क पर बेहाल सी बैठी थी. किसी तरह घर तक आई है…इस तरह के केस को गाड़ी में बैठाते हुए भी डर लगता है. पुलिस के सौ लफड़े जो हैं.’’

पैसे दे कर जल्दी से वह घर के भीतर घुसी. उसे डर था, आटो वाले की बातें आसपास के लोगों तक न पहुंच जाएं. ऐसी बातें फैलने में समय ही कितना लगता है. वह धड़धड़ाती सी सत्या के कमरे में घुसी. सत्या बिस्तर पर औंधी पड़ी, तकिए में मुंह छिपाए हिचकियां भर रही थी. कुछ देर तक तो वह समझ ही न पाई कि क्या करे, क्या कहे. बस, चुपचाप सत्या के पास बैठ कर उस का सिर सहलाती रही. अचानक सत्या ही उस से एकदम चिपक गई थी. उसे अपनी बांहों से जकड़ लिया था. उस की रुलाई ने वेग पकड़ लिया था.

‘‘ममा, वे 3 थे…जबरदस्ती कार में…’’

सत्या आगे कुछ बोल नहीं पाई, न बोलने की जरूरत ही थी. जो आशंकाएं अब तक सिर्फ सिर उठा रही थीं, अब समुद्र का तेज ज्वार बन चुकी थीं. उस का कंठ अवरुद्ध हो आया, आंखें पनीली… परंतु अपने को संभालते हुए बोली, ‘‘डोंट वरी बेटी, डोंट वरी…संभालो अपने को… हिम्मत से काम लो.’’

कहने को तो कह दिया, सांत्वना भरे शब्द, किंतु खुद भीतर से वह जिस तरह टूटी, बिखरी, यह सिर्फ वह ही समझ पाई. जिस सत्या को अपने ऊपर अभिमान था कि ऐसी स्थिति में आत्मरक्षा कर पाने में वह समर्थ है, वही आज अपनी असमर्थता पर आंसू बहा रही थी. बेटी की पीड़ा ने किस तरह उसे तारतार कर दिया था, दर्द की कितनी परतें उभर आई थीं, यह सिर्फ वह समझ पा रही थी, बेटी के सामने व्यक्त करने का साहस नहीं था उस में.

ये भी पढ़ें- गुरु दक्षिणा

सत्या इस तरह की घटनाओं की खबरें जब भी अखबार में पढ़ती, गुस्से से भर उठती, ‘ये लड़कियां इतनी कमजोर क्यों हैं? कहीं भी, कोई भी उन्हें उठा लेता है और वे रोतीकलपती अपना सबकुछ लुटा देती हैं? और यह पुलिस क्या करती है? इस तरह सरेआम सबकुछ हो जाता है और…’

वह सत्या को समझाने की कोशिश करती हुई कहती, ‘स्त्री की कमजोरी तो जगजाहिर है बेटी. इन शैतानों के पंजे में कभी भी कोई भी फंस सकता है.’

‘माई फुट…मैं तो इन को ऐसा मजा चखा देती…’

उस ने घबराए मन से फिर सत्या के कमरे में एक बार झांका और चुपचाप अपने कमरे में आ कर लेट गई. खाना उस से भी खाया नहीं गया. यों ही पड़ेपड़े रात ढलती रही. बिस्तर पर पड़ जाने से ही या रात के बहुत गहरा जाने से ही नींद तो नहीं आ जाती. उस ने कमरे की बत्ती भी नहीं जलाई थी और उस अंधेरे में अचानक ही उसे बहुत डर लगने लगा. वह फिर उठ कर बैठ गई. कमरे से बाहर निकली और फिर सत्या के कमरे की ओर झांका. सत्या ने बत्ती बुझा दी थी और शायद सो रही थी.

वह मंथर गति से फिर अपने कमरे में आई. बिस्तर पर लेट गई. किंतु आंखों के सामने जैसे बहुत कुछ नाच रहा था. अंधेरे में भी दीवारों पर कईकई परछाइयां थीं. वह सत्या को कैसे बताती कि जो वेदना, जो अपमान आज वह झेल रही है, ठीक उसी वेदना और अपमान से एक दिन उसे भी दोचार होना पड़ा था.

सत्या तो इसे अपने लिए असंभव माने बैठी थी. शायद वह भूल गई थी कि वह भी इस देश में रहने वाली एक लड़की है. इस शहर की सड़कों पर चलनेघूमने वाली हजारों लड़कियों के बीच की एक लड़की, जिस के साथ कहीं कुछ भी घट सकता है.

सत्या के बारे में सोचतेसोचते वह अपने अतीत में खो गई. कितनी भयानक रात थी वह, कितनी पीड़ाजनक.

वह दीवारों पर देख रही थी, कईकई चेहरे नाच रहे थे. वह अपने मन को देख रही थी जहां सैकड़ों पन्ने फड़फड़ा रहे थे.

एक सुखीसंपन्न परिवार की बहू, एक बड़े अफसर की पत्नी, सुखसाधनों से लदीफंदी. एक 9 साल की बेटी. परंतु पति सुख बहुत दिनों तक वह नहीं भोग पाई थी. वैवाहिक जीवन के सिर्फ 16 साल बीते थे कि पति का साथ छूट गया था. एक कार दुर्घटना घटी और उस का जीवन सुनसान हो गया. पति की मौत ने उसे एकदम रिक्त कर दिया था.

यद्यपि वह हमेशा मजबूत दिखने की कोशिश में लगी रहती थी. कुछ महीने बाद ही उस ने बेटी को अपने से दूर दून स्कूल में भेज दिया था. शायद इस का एक कारण यह भी था कि वह नहीं चाहती थी कि उस की कमजोरियां, उस की उदासी, उस का खालीपन किसी तरह बेटी की पढ़ाई में बाधक बने. अब वह नितांत अकेली थी. सासससुर का वर्षों पहले इंतकाल हो गया था. एक ननद थी, वह अपने परिवार में व्यस्त थी. अब बड़ा सा घर उसे काटने को दौड़ता था. एकाकीपन डंक मारता था. तभी उस ने फैसला किया था कि वह भारतदर्शन करेगी. इसी बहाने कुछ समय तक घर और शहर से बाहर रहेगी. यों भी देशदुनिया घूमने का उसे बहुत शौक था. खासकर भारत के कोनेकोने को वह देखना चाहती थी.

उस ने फोन पर बेटी को बता दिया था. कुछ सहेलियों को भी बताया. 1-2 ने इतनी लंबी यात्रा से उसे रोका भी कि अकेली तुम कहां भटकती फिरोगी? पर वह कहां रुकने वाली थी. निकल पड़ी थी भारत दर्शन पर और सब से पहले दक्षिण गई थी. कन्याकुमारी, तिरुअनंतपुरम, तिरुपति, मदुरै, रामेश्वरम…फिर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के अनेक शहर. राजस्थान को उस ने पूरी तरह छान मारा था. फिर पहुंची थी हिमाचल प्रदेश. धर्मशाला के एक होटल में ठहरी थी. वहीं वह अंधेरी रात आई थी. जिन पहाड़ों के सौंदर्य ने उसे खींचा था उन पहाड़ों ने ही उसे धोखा दिया.

दिन भर वह इधरउधर घूमती रही थी. रात का अंधियारा जब पहाड़ों पर उगे पेड़ों को अपनी परछाईं से ढकने लगा, वह अपने होटल लौटी थी. वे दोनों शायद उस के पीछेपीछे ही थे. उस का ध्यान उधर था ही नहीं. वह तो प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्यसुख में ऐसी डूबी थी कि मानवीय छाया पर उस की नजर ही नहीं गई. जैसे रात चुपकेचुपके धीरेधीरे आती है, उन के पैरों की गति भी वैसी ही थी. सन्नाटे में डूबा रास्ता. भूलेभटके ही कोई नजर आता था.

उसी मुग्धावस्था में उस ने अपने कमरे का ताला खोला था, फिर भीतर घुसने के लिए एक कदम उस ने उठाया ही था कि पीछे से किसी ने धक्का मारा था उसे. वह लड़खड़ाती हुई फर्श पर गिर पड़ी थी. गिरना ही था क्योंकि अचानक भूकंप सा वह झटका कैसे संभाल पाती. वह कुछ समझती तब तक दरवाजा बंद हो चुका था.

उन दोनों ने ही बत्ती जलाई थी. उम्र ज्यादा नहीं थी उन की. झटके में उस के हाथपैर बांध दिए गए थे. वह चाहती थी चिल्लाए पर चिल्ला न सकी. उस की चीख उस के अंदर ही दबी रह गई थी. होटल तो खाली सा ही पड़ा था क्योंकि पहाड़ों का सीजन अभी चालू नहीं हुआ था.

वह अकेली औरत. होटल का उस का अपना कमरा. एक अनजान जगह में बदनाम हो जाने का भय. मन का भय बहुत बड़ा भय होता है. उस भय से ही वह बंध गई थी. इस उम्र में यह सब भी भोगना होगा, वह सोच भी नहीं सकती थी.

वे लूटते रहे. पहले उसे, फिर उस का सामान.

वह चुपचाप झेलती रही सबकुछ. कोई कुंआरी लड़की तो थी नहीं वह. भोगा था उस ने सबकुछ पति के साथ. परंतु अभी तो वह रौंदी जा रही थी. एक असह्य अपमान और पीड़ा से छटपटा रही थी वह. उन पीड़ादायी क्षणों को याद कर आज भी वह कांप जाती है. बस, यही एक स्थिति ऐसी होती है जहां नारी अकसर शक्तिहीन हो जाती है. अपनी सारी आकांक्षाओं, आशाओं की तिलांजलि देनी पड़ती है उसे. बातों में, किताबों में, नारों में स्त्री अपने को चाहे जितना भी शक्तिशाली मान ले, इस पशुवृत्ति के सामने उसे हार माननी ही पड़ती है.

ये भी पढ़ें- राजकुमार लाओगी न

उस रात उसे अपने पति की बहुत याद आई थी. कहीं यह भी मन में आ रहा था कि उन के न होने के बाद उन के प्रति उसे किसी ने विश्वासघाती बना दिया है. न जाने कब तक वे लोग उस के ऊपर उछलतेकूदते रहे. एक बार गुस्से में उस ने एक की बांह में अपने दांत भी गड़ा दिए थे. प्रत्युत्तर में उस शख्स ने उस की दोनों छातियों को दांत से काटकाट कर लहूलुहान कर दिया था. उस के होंठों और गालों को तो पहले ही उन लोगों ने काटकाट कर बदरंग कर दिया था. वह अपनी सारी पीड़ा को, गुस्से को, चीख को किस तरह दबाए पड़ी रही, आज सोच कर चकित होती है.

यह स्पष्ट था कि वे दोनों इस काम के अभ्यस्त थे. जाने से पहले दोनों के चेहरों पर अजीब सी तृप्ति थी. खुशी थी. एक ने उस के बंधन खोलने के बाद रस्सी को अपनी जैकेट के अंदर छिपाते हुए कहा, ‘गुड नाइट मैडम…तुम बहुत मजेदार हो.’ घृणा से उस ने मुंह फेर लिया था. कमरे के दूसरी तरफ एक खिड़की थी, उसे खोल कर वे दोनों बाहर कूद गए थे. बाहर का अंधेरा और घना हो उठा था.

कमरे में जैसे चारों तरफ बदबू फैल गई थी. बाहर का घना अंधेरा उछलते हुए उस कमरे में भरने लगा था. वह उठी. कांपते शरीर के साथ खिड़की तक पहुंची. खिड़की को बंद किया. बदबू और तेज हो गई थी. उस ने नाक पर हाथ रख लिया और दौड़ती हुई बाथरूम में घुसी.

उस ठंडी रात में भी न जाने वह कब तक नहाती रही. बारबार पूरे शरीर पर साबुन रगड़ती रही. चेहरे को मलती रही. छातियों को रगड़रगड़ कर धोती रही, परंतु वह बदबू खत्म होने को नहीं आ रही थी. वह नंगे बदन ही फिर कमरे में आई. पूरे शरीर पर ढेर सारा पाउडर थोपा, परफ्यूम लगाया, कमरे में भी चारों तरफ छिड़का, किंतु उस बदबू का अंत नहीं था. कैसी बदबू थी यह. कहां से आ रही थी. वह कुछ समझ नहीं पा रही थी.

बिस्तर पर लेटने के बाद भी देर तक नींद नहीं आई थी. जीवन व्यर्थ लगने लगा था. उसे लग रहा था, उस का जीवन दूषित हो गया है, उस का शरीर अपवित्र हो गया है. अब जिंदगी भर इस बदबू से उसे छुटकारा नहीं मिलेगा. वह कभी किसी से आंख मिला कर बात नहीं कर पाएगी. अपनी ही बेटी से जिंदगी भर उसे मुंह छिपाना पड़ेगा. हालांकि एक मिनट के लिए वह यह भी सोच गई थी कि अगर वह किसी को कुछ नहीं बताएगी तो भला किसी को कुछ भी पता कैसे चलेगा.

फिर भी एक पापबोध, हीनभाव उस के अंदर पैदा हो गया था.

और ढलती रात के साथ उस ने तय कर लिया था कि उस के जीवन का अंत इन्हीं पहाड़ों पर होना है. यही एक विकल्प है उस के सामने.

वह बेचैनी से कमरे में टहलने लगी. उस होटल से कुछ दूरी पर ही एक ऊंची पहाड़ी थी, नीचे गहरी खाई. वह कहीं भी कूद सकती थी. प्राण निकलने में समय ही कितना लगता है. कुछ देर छटपटाएगी. फिर सबकुछ शांत. पर रात में होटल का बाहरी गेट बंद हो जाता था. कोई आवश्यक काम हो तभी दरबान गेट खोलता था. वह भला उस से क्या आवश्यक काम बताएगी इतनी रात को? संभव ही नहीं था उस वक्त बाहर निकल पाना. चक्कर लगाती रही कमरे में सुबह के इंतजार में. भोर में ही गेट खुल जाता था.

अपने शरीर पर एक शाल डाल कर वह बाहर निकली. कमरे का दरवाजा भी उस ने बंद नहीं किया. अभी भी अंधकार घना ही था. पर ऐसा नहीं कि रास्ते पर चला न जा सके. टहलखोरी के लिए निकलने वाले भी दोचार लोग रास्ते पर थे. वह मंथर गति से चलती रही. सामने ही वह पहाड़ी थी…एकदम वीरान, सुनसान. वह जा खड़ी हुई पहाड़ी पर. नीचे का कुछ भी दिख नहीं रहा था. भयानक सन्नाटा. वह कुछ देर तक खड़ी रही. शायद पति और बेटी की याद में खोई थी. हवा की सरसराहट उस के शरीर में कंपन पैदा कर रही थी. पर वह बेखबर सी थी. शाल भी उड़ कर शायद कहीं नीचे गिर गई थी. नीचे, सामने कहीं कुछ भी दिख नहीं रहा…सिवा मृत्यु के एक काले साए के. एक संकरी गुफा. वह समा जाएगी इस में. बस, अंतिम बार पति को प्रणाम कर ले.

उस ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए और ऊपर आसमान की ओर देखा. अचानक उस की नजरें सामने गईं. देखा, दूर पहाड़ों के पीछे धीरेधीरे लाली फैलने लगी है. सुनहरी किरणें आसमान के साथसाथ पहाड़ों को भी सुनहरे रंग में रंग रही हैं. सूर्योदय, सुना था, लोग यहां से सूर्योदय देखते हैं. आसमान की लाली, शिखरों पर फैली लाली अद्भुत थी.

वह उसी तरह हाथ जोड़े विस्मित सी वह सब देखती रही. उस के देखतेदेखते लाल गोला ऊपर आ गया. तेजोमय सूर्य. रात के अंधकार को भेदता अपनी निर्धारित दिशा की ओर अग्रसर सूर्य. सच, उस दृश्य ने पल भर में ही उस के भीतर का सबकुछ जैसे बदल डाला. अंधकार को तो नष्ट होना ही है, फिर उस के भय से अपने को क्यों नष्ट किया जाए? कोशिश तो अंधकार से लड़ने की होनी चाहिए, उस से भागने की थोड़े ही. वही जीत तो असली जीत होगी.

और वह लौट आई थी. एक नए साहस और उमंग के साथ. एक नए विश्वास और दृढ़ता के साथ.

अचानक छन्न की आवाज हुई. उस की तंद्रा टूट गई. अतीत से वर्तमान में लौटना पड़ा उसे. यह आवाज सत्या के कमरे से ही आई थी. वह समझ गई, सत्या अभी तक सोई नहीं है. शायद वह भी किसी बदबू से परेशान होगी. एक दहशत के साथ शायद अंधेरे कमरे में टहल रही होगी. उस से टकरा कर कुछ गिरा है, टूटा है…छन्न. यह अस्वाभाविक नहीं था. सत्या जिन स्थितियों से गुजरी है, जिस मानसिकता में अभी जी रही है, किसी के लिए भी घोर यातना का समय हो सकता है.

संभव है, उस के मन में भी आत्महत्या की बात आई हो. सारी वेदना, अपमान, तिरस्कार का एक ही विकल्प होता है जैसे, अपना अंत. परंतु वह नहीं चाहती कि सत्या ऐसा कुछ करे…ऐसा कोई कदम उठाए. अभी बहुत नादान है वह. पूरी जिंदगी पड़ी है उस के सामने. उसे सबकुछ झेल कर जीना होगा. जीना ही जीत है. मर जाने से किसी का क्या बिगड़ेगा? उन लोगों का ही क्या बिगड़ेगा जिन्होंने यह सब किया? वह सत्या को बताएगी, एक ठोकर की तरह ही है यह सबकुछ. ठोकर खा कर आदमी गिरता है परंतु संभल कर फिर उठता है, फिर चलता है.

वह स्थिर कदमों से सत्या के कमरे की ओर बढ़ी. उस के पैरों में न कंपन थी न मन में अशांति. कमरे में घुसने से पहले बालकनी की बत्ती को उस ने जला दिया था. Stories Hindi

ये भी पढ़ें- घरौंदा

Story : सजा

Story : असगर ने अपने दोस्त शकील से शर्त जीत कर तरन्नुम से निकाह तो कर लिया था लेकिन तरन्नुम को जब उस के विवाहित होने का पता चला तो उस ने आम औरतों की तरह सामंजस्य करने से इनकार कर दिया और असगर को वह सजा दी जिस की कल्पना भी वह नहीं कर सकता था.

असगर अपने दोस्त शकील की शादी में शरीक होने रामपुर गया. स्कूल के दिनों से ही शकील उस के करीबी दोस्तों में शुमार होता था. सो दोस्ती निभाने के लिए उसे जाना मजबूरी लगा था. शादी की मौजमस्ती उस के लिए कोई नई बात नहीं थी और यों भी लड़कपन की उम्र को वह बहुत पीछे छोड़ आया था.

शकील कालेज की पढ़ाई पूरी कर के विदेश चला गया था. पिछले कितने ही सालों से दोनों के बीच चिट्ठियों द्वारा एकदूसरे का हालचाल पता लगते रहने से वे आज भी एकदूसरे के उतने ही नजदीक थे जितना 10 बरस पहले.

असगर को दिल्ली से आया देख शकील खुशी से भर उठा, ‘‘वाह, अब लगा शादी है, वरना तेरे बिना पूरी रौनक में भी लग रहा था कि कुछ कसर बाकी है. तुझ से मिल कर पता लगा क्या कमी थी.’’

‘‘वाह, क्या विदेश में बातचीत करने का सलीका भी सिखाया जाता है या ये संवाद भाभी को सुनाने से पहले हम पर आजमाए जा रहे हैं.’’

‘‘अरे असगर, जब तुझे ही मेरे जजबात का यकीन न आ रहा हो तो वह क्यों करेगी मेरा यकीन, जिसे मैं ने अभी देखा भी नहीं,’’ शकील, असगर के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला.

बातें करतेकरते जैसे ही दोनों कमरे के अंदर आए असगर की निगाहें पल भर के लिए दीवान पर किताब पढ़ती एक लड़की पर अटक कर रह गईं. शकील ने भांपा, फिर मुसकरा दिया. बोला, ‘‘आप से मिलिए, ये हैं तरन्नुम, हमारी खालाजाद बहन और आप हैं असगर कुरैशी, हमारे बचपन के दोस्त. दिल्ली से तशरीफ ला रहे हैं.’’

दुआसलाम के बाद वह नाश्ते का इंतजाम देखने अंदर चली गई. असगर के खयाल जैसे कहीं अटक गए. शकील ने उसे भांप लिया, ‘‘क्यों साहब, क्या हुआ? कुछ खो गया है या याद आ रहा है?’’

ये भी पढ़ें- अपना अपना मापदंड

असगर कुछ नहीं बोला, बस एक नजर शकील की तरफ देख कर मुसकरा भर दिया.

शादी के सारे माहौल में जैसे तरन्नुम ही तरन्नुम असगर को दिखाई दे रही थी. उसे बिना बात ही मौसम, माहौल सभी कुछ गुनगुनाता सा लगने लगा. उस के रंगढंग देख कर शकील को मजा आ रहा था. वह छेड़खानी पर उतर आया. बोला, ‘‘असगर यार, अपनी दुनिया में वापस आ जाओ. कुछ बहारें देखने के लिए होती हैं, महसूस करने के लिए नहीं, क्या समझे? भई, यह औरतों की आजादी के लिए नारा बुलंद करने वालियों की अपने कालेज की जानीमानी सरगना है, तुम्हारे जैसे बहुत आए और बहुत गए. इसे कुछ असर होने वाला नहीं है.’’

‘‘लगानी है शर्त?’’ असगर ने चुनौती दी, ‘‘अगर शादी तक कर के न दिखा दूं तो मेरा नाम असगर कुरैशी नहीं.’’

शकील ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘मियां, लोग तो नींद में ख्वाब देखते हैं, आप जागते में भी.’’

‘‘बकवास नहीं कर रहा मैं,’’ असगर ने कहा, ‘‘बोल, अगर शादी के लिए राजी कर लूं तो?’’

‘‘ऐसा,’’ शकील ने उकसाया, ‘‘जो नई गाड़ी लाया हूं न, उसी में इस की डोली विदा करूंगा, क्या समझा. यह वह तिल है जिस में तेल नहीं निकलता.’’

और इस चुनौती के बाद तो असगर तरन्नुम के आसपास ही नजर आने लगा. अचानक ही एक से एक शेर उस के होंठों पर और हर महफिल में गजलें उस की फनाओं में बिखर रही थीं.

शकील हैरान था. यह तरन्नुम, जो हर आदमी को, आदमी की जात पर लानत देती थी, कैसे अचानक ही बहुत लजीलीशर्मीली ओस से भीगे गुलाब सी धुलीधुली नजर आने लगी.

घर में उस के इस बदलाव पर हलकी सी चर्चा जरूर हुई. शकील के साथ तरन्नुम के अब्बाअम्मी उस से मिलने आए. शकील ने कहा, ‘‘ये तुम से कुछ बातचीत करना चाहते थे, सो मैं ने सोचा अभी ही मौका है फिर शाम को तो तुम वापस दिल्ली जा ही रहे हो.’’

असगर हैरान हो कर बोला, ‘‘किस बारे में बातचीत करना चाहते हैं?’’

‘‘तुम खुद ही पूछ लो, मैं चला,’’ फिर अपनी खाला शहनाज की तरफ मुड़ कर बोला, ‘‘खालू, देखो जो भी बात आप तफसील से जानना चाहें उस से पूछ लें, कल को मेरे पीछे नहीं पडि़एगा कि फलां बात रह गई और यह बात दिमाग में ही नहीं आई,’’ इस के बाद शकील कमरे से बाहर हो गया.

असगर ने कहा, ‘‘आप मुझ से कुछ पूछना चाहते थे, पूछिए?’’

शहनाज बड़ा अटपटा महसूस कर रही थीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या सवाल करें. उन के शौहर रज्जाक अली ने चंद सवाल पूछे, ‘‘आप कहां के रहने वाले हैं. कितने बहनभाई हैं, कहां तक पढ़े हैं? सरकारी नौकरी न कर के आप प्राइवेट नौकरी क्यों कर रहे हैं? अपना मकान दिल्ली में कैसे बनवाया? वगैरहवगैरह.’’

असगर जवाब देता रहा लेकिन उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इतनी तहकीकात किसलिए की जा रही है. शहनाज खाला थीं कि उस की तरफ यों देख रही थीं जैसे वह सरकस का जानवर है और दिल बहलाने के लिए अच्छा तमाशा दिखा रहा है. खालू के चंदएक सवाल थे जो जल्दी ही खत्म हो गए.

शहनाज खाला बोलीं, ‘‘तो बेटा, जब तुम्हारे सिर पर बुजुर्गों का साया नहीं है तो तुम्हें अपने फैसले खुद ही करने होते होंगे, है न…’’

‘‘जी,’’ असगर ने कहा.

‘‘तो बताओ, निकाह कब करना चाहोगे?’’

‘‘निकाह?’’ असगर ने पूछा.

‘‘और क्या,’’ खाला बोलीं, ‘‘भई, हमारे एक ही बेटी है. उस की शादी ही तो हमारी जिंदगी का सब से बड़ा अरमान है. फिर हमारे पास कमी भी किस चीज की है. जो कुछ है सब उसे ही तो देना है,’’ खाला ने खुलासा करते हुए कहा.

‘‘पर आप यह सब मुझ से क्यों कह रही हैं?’’

ये भी पढ़ें- वीआईपी के नए अर्थ

इस पर खालू ने कहा, ‘‘बात ऐसी है बेटा कि आज तक हमारी तरन्नुम ने किसी को भी शादी के लायक नहीं समझा. हम लोगों की अब उम्र हो रही है. अब उस ने तुम्हें पसंद किया है तो हमें भी अपना फर्ज पूरा कर के सुर्खरू हो लेने दो.’’

‘‘क्या?’’ असगर हैरान रह गया, ‘‘तरन्नुम मुझे पसंद करती है? मुझ से शादी करेगी?’’ असगर को यकीन नहीं आ रहा था.

‘‘हां बेटा, उस ने अपनी अम्मी से कहा है कि वह तुम्हें पसंद करती है और तुम्हीं से शादी करेगी. देखो बेटा, अगर लेनेदेने की कोई फरमाइश हो तो अभी बता दो. हमारी तरफ से कोई कसर नहीं रहेगी.’’

‘‘पर खालू मैं तो शादी,’’ असगर कुछ कहने के लिए सही शब्द सोच ही रहा था कि खालू बीच में ही बोले, ‘‘देखो बेटा, मैं अपनी बच्ची की खुशियां तुम से झोली फैला कर मांग रहा हूं, न मत कहना. मेरी बच्ची का दिल टूट जाएगा. वह हमेशा से ही शादी के नाम से किनारा करती रही है. अब अगर तुम ने न कर दी तो वह सहन नहीं कर सकेगी.’’

एक पल को असगर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘आप ने शकील से बात कर ली है.’’

‘‘हां,’’ खालू बोले, ‘‘उस की रजामंदी के बाद ही हम तुम से बात करने आए हैं.’’

शहनाज खाला उतावली सी होती हुई बोलीं, ‘‘तुम हां कह दो और शादी कर के ही दिल्ली जाओ. सभी इंतजाम भी हुए हुए हैं. इस लड़की का कोई भरोसा नहीं कि अपनी हां को कब ना में बदल दे.’’

‘‘ठीक है, जैसा आप सही समझें करें,’’ असगर ने कहा.

शहनाज खाला ने उस का हाथ पकड़ कर अपनी आंखों से लगाया, ‘‘बेटा, तुम तो मेरे लिए फरिश्ते की तरह आए हो, जिस ने मेरी बच्ची की जिंदगी बहारों से भर दी,’’ खुशी से गमकते वह और खालू घर के अंदर खबर देने चले गए.

उन के जाने के बाद शकील कमरे में आते हुए बोला, ‘‘तो हुजूर ने मुझे शह देने के लिए सब हथकंडे आजमाए.’’

असगर ने कहा, ‘‘तू डर मत, मैं जीत का दावा कार मांग कर नहीं कर रहा हूं.’’

‘‘तू न भी मांगे,’’ शकील ने कहा, ‘‘तो भी मैं कार दूंगा. हम मुगल अपनी जबान पर जान भी दे सकने का दावा करते हैं, कार की तो बात ही क्या.’’

‘‘मजाक छोड़ शकील,’’ असगर ने कहा, ‘‘कल उसे पता लगेगा तब…’’

‘‘अब कुछ असर होने वाला नहीं है,’’ शकील ने कहा, ‘‘अपनेआप शादी के बाद हालात से सुलह करना सीख जाएगी. अपने यहां हर लड़की को ऐसा ही करने की नसीहत दी जाती है.’’

‘‘पर तू कह रहा था शकील कि वह आम लड़कियों जैसी नहीं है, बड़ी तेजतर्रार है.’’

‘‘वह तो शादी से पहले 50 फीसदी लड़कियां खास होने का दावा करती हैं पर असलीयत में वे भी आम ही होती हैं. है न, जब तक तरन्नुम को शादी में दिलचस्पी नहीं थी, मुहब्बत में यकीन नहीं था, वह खास लगती थी. पर तुम्हें चाह कर उस ने जता दिया है कि उस के खयाल भी आम औरतों की तरह घर, खाविंद, बच्चों पर ही खत्म होते हैं. मैं तो उस के ख्वाबों को पूरा करने में उस की मदद कर रहा हूं,’’ शकील ने तफसील से बताते हुए कहा.

और यों दोस्त की शादी में शरीक होने वाला असगर अपनी शादी कर बैठा. तरन्नुम को दिल्ली ले जाने की बात से शकील कन्नी काट रहा था. अपना मकान किराए पर दिया है, किसी के घर में पेइंगगेस्ट की तरह रहता हूं. वे शादीशुदा को नहीं रखेंगे. इंतजाम कर के जल्दी ही बुला लेने का वादा कर के असगर दिल्ली वापस चला आया.

तरन्नुम ने जब घर का पता मांगा तो असगर बोला, ‘‘घर तो अब बदलना ही है. दफ्तर के पते पर चिट्ठी लिखना,’’ और वादे और तसल्लियों की डोर थमा कर असगर दिल्ली चला आया.

7-8 महीने खतों के सहारे ही बीत गए. घर मिलने की बात अब खटाई में पड़ गई. किराएदार घर खाली नहीं कर रहा था इसलिए मुकदमा दायर किया है. असगर की इस बात से तरन्नुम बुझ गई, मुकदमों का क्या है, अब्बा भी कहते हैं वे तो सालोंसाल ही खिंच जाते हैं, फिर क्या जिन के अपने घर नहीं होते वह भी तो कहीं रहते ही हैं. शादी के बाद भी तो अब्बू, अम्मी के ही घर रह रहे हैं, ससुराल नहीं गई, इसी को ले कर लोग सौ तरह की बातें ही तो बनाते हैं.

असगर यों अचानक तरन्नुम को अपने दफ्तर में खड़ा देख कर हैरान हो गया, ‘‘आप यहां? यों अचानक,’’ असगर हकलाता हुआ बोला.

तरन्नुम शरारत से हंस दी, ‘‘जी हां, मैं यों अचानक किसी ख्वाब की तरह,’’ तरन्नुम ने चहकते से अंदाज में कहा, ‘‘है न, यकीन नहीं हो रहा,’’ फिर हाथ आगे बढ़ा कर बोली, ‘‘हैलो, कैसे हो?’’ असगर ने गरमजोशी से फैलाए हाथ को अनदेखा कर के सिगरेट सुलगाई और एक गहरा कश लिया.

ये भी पढ़ें- रिटायरमेंट

तरन्नुम को लगा जैसे किसी ने उसे जोर से तमाचा मारा हो. वह लड़खड़ाती सी कुरसी पकड़ कर बैठ गई. मरियल सी आवाज में बोली, ‘‘हमें आया देख कर आप खुश नहीं हुए, क्यों, क्या बात है?’’

असगर ने अपने को संभालने की कोशिश की, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. तुम्हें यों अचानक आया देख कर मैं घबरा गया था,’’ असगर ने घंटी बजा कर चपरासी से चाय लाने को कहा.

‘‘हमारा आना आप के लिए खुशी की बात न हो कर घबराने की बात होगी, ऐसा तो मैं ने सोचा भी नहीं था,’’ तरन्नुम की आंखें नम हो रही थीं.

तब तक चपरासी चाय रख कर चला गया था. असगर ने चाय में चीनी डाल कर प्याला तरन्नुम की तरफ बढ़ाया. तरन्नुम जैसे एकएक घूंट के साथ आंसू पी रही थी.

असगर ने एकदो फाइलें खोलीं. कुछ पढ़ा, कुछ देखा और बंद कीं. अब उस ने तरन्नुम की तरफ देखा, ‘‘क्या कार्यक्रम है?’’

‘‘मेरा कार्यक्रम तो फेल हो गया,’’ तरन्नुम लजाती सी बोली, ‘‘मैं ने सोचा था पहुंच कर आप को हैरान कर दूंगी. फिर अपना घर देखूंगी. हमेशा ही मेरे दिमाग में एक धुंधला सा नक्शा था अपने घर का, जहां आप एक खास तरीके से रहते होंगे. उस कमरे की किताबें, तसवीरें सभी कुछ मुझे लगता है मेरी पहचानी सी होंगी लेकिन यहां तो अब आप ही जब अजनबी लग रहे हैं तब वे सब…’’

असगर के चेहरे पर एक रंग आया और गया. फिर वह बोला, ‘‘यही परेशानी है तुम औरतों के साथ. हमेशा शायरी में जीना चाहती हो. शायरी और जिंदगी 2 चीजें हैं. शायरी ठीक वैसी ही है जैसे मुहब्बत की इब्तदा.’’

‘‘और मुहब्बत की मौत शादी,’’ असगर की तरफ गहरी आंखों से देखते हुए तरन्नुम बोली.

‘‘मुझे पता है तुम ने बहुत से इनाम जीते हैं वादविवाद में, लेकिन मैं अपनी हार कबूल करता हूं. मैं बहस नहीं करना चाहता,’’ असगर ने उठते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा सामान कहां है?’’

‘‘बाहर टैक्सी में,’’ तरन्नुम ने बताया.

‘‘टैक्सी खड़ी कर के यहां इतनी देर से बैठी हो?’’

‘‘और क्या करती? पता नहीं था कि आप यहां मिलोगे भी या नहीं. फिर सामान भी भारी था,’’?तरन्नुम ने खुलासा किया.

जाहिर था असगर उस की किसी भी बात से खुश नहीं था.

जब टैक्सी में बैठे तो असगर ने टैक्सी चालक को किसी होटल में चलने को कहा, ‘‘पर मैं तो आप का घर देखना…’’

असगर ने तरन्नुम का हाथ दबाया, ‘‘मेरे दोस्त अपने घर में मुझे मेहमान रखने की इजाजत नहीं देंगे.’’

‘‘पर मैं तो मेहमान नहीं, आप की बीवी हूं,’’ तरन्नुम ने मरियल आवाज में दोहराया.

‘‘उन की पहली शर्त ही कुंआरे को रखने की थी और ऐसी जल्दी भी क्या थी. मैं ने लिखा था कि घर मिलते ही बुला लूंगा,’’ असगर का दबा गुस्सा बाहर आया.

‘‘हमारी शादी को 8 महीने हो गए. तब से अभी तक अगर अपना घर नहीं मिला तो क्या किराए का भी नहीं मिल सकता था,’’ तरन्नुम ने खीज कर पूछा. उसे दिल ही दिल में बहुत बुरा लग रहा था कि शादी के चंद महीने बाद ही वह खास औरताना अंदाज में मियांबीवी वाला झगड़ा कर रही थी.

‘‘ठीक है,’’ असगर ने कहा, ‘‘अब तुम दिल्ली आ ही गई हो तो घरों की खोज भी कर लो. तुम्हें खुद ही पता लग जाएगा कि घर ढूंढ़ना कितना आसान है,’’ होटल में आ कर भी तरन्नुम महसूस कर रही थी कहीं कुछ है जो असगर को सामान्य नहीं होने दे रहा.

अगले दिन असगर जब दफ्तर चला गया तब तरन्नुम ने अपनी सहेली रीता अरोड़ा को फोन किया और अपनी घर न मिलने की मुश्किल बताई. रीता ने कहा कि वह शाम को अपने परिचितों, मित्रों से बातचीत कर के कुछ इंतजाम करेगी.

दूसरे दिन रीता अपनी कार ले कर तरन्नुम को लेने आई. रास्ते से उन्होंने एक दलाल को साथ लिया जो विभिन्न स्थानों में उन्हें मकान दिखाता रहा. शाम होने को आई लेकिन अभी तक जैसा घर तरन्नुम चाहती थी वैसा एक भी नहीं मिला. कहीं घर ठीक नहीं लगा तो कहीं पड़ोस तरीके का नहीं. अगर दोनों ठीक मिल गए तो आसपास का माहौल बेतुका. दलाल को छोड़ते हुए रीता ने घर के बारे में पूरी तरह अपनी इच्छा समझाई.

दलाल ने कहा 2-3 दिन के अंदर ही ऐसे कुछ घर खाली होने वाले हैं तब वह खुद ही उन्हें फोन कर के सही घर दिखाएगा.

असगर तरन्नुम से पहले ही होटल आ गया था. थकी, बदहवास तरन्नुम को देख कर उसे बहुत अफसोस हुआ. फोन पर चाय का आदेश दे कर बोला, ‘‘कहां मारीमारी फिर रही हो? यह काम तुम्हारे बस का नहीं है.’’

‘‘वाह, जब शादी की है तो घर भी बसा कर दिखा देंगे. आप हमारे लिए घर नहीं खोज सके तो क्या. हम ही आप को घर ढूंढ़ कर रहने को बुला लेंगे,’’ तरन्नुम खुशी से छलकती हुई बोली.

‘‘चलो, यही सही,’’ असगर ने कहा, ‘‘चायवाय पी कर नहा कर ताजा हो लो फिर घर पर फोन कर देना. अभी अब्बू परेशान हो रहे होंगे. उस के बाद नाटक देखने चलेंगे. और हां, साड़ी की जगह सूट पहनना. तुम पर बहुत फबता है.’’

असगर की इस बात पर तरन्नुम इठलाई, ‘‘अच्छा मियांजी.’’

रात देर से लौटे, दिन भर की थकान थी, इतना तो तरन्नुम कभी नहीं घूमी थी. पर अब रात को भी उसे नींद नहीं आ रही थी. कल देखे जाने वाले घरों के बारे में वह तरहतरह के सपने संजो रही थी. उस का अपना घर, उस का अपना खोजा घर.

ये भी पढ़ें- परीक्षाफल

नाश्ते के बाद असगर दफ्तर चला गया. तरन्नुम रीता के इंतजार में तैयार हो कर बैठी उपन्यास पढ़ रही थी. उस का मन सुबह से ही किसी भी चीज में नहीं लग रहा था. होटल भला घर हो सकता है कभी? उसे लग रहा था जैसे वह मुसाफिरखाने में अपने सामान के साथ बैठी अपनी मंजिल का इंतजार कर रही है और गाड़ी घंटों नहीं, हफ्तों की देर से आने का सिर्फ ऐलान ही कर रही है और हर पल उस की बेचैनी बढ़ती ही जा रही है.

अचानक फोन की घंटी से जैसे वह गहरी सोच से जाग उठी. रीता ने होटल की लौबी से फोन किया था. रीता की आवाज खुशी से खनक रही थी. तरन्नुम ने झटपट पर्स उठाया और लौबी में आ गई. रीता ने बाहर आतेआते कहा, ‘‘आज ही सुबह बिन्नी दी का फोन आया था. उन के पड़ोस में कोई मुसलिम परिवार है, उन्हीं की कोठी का ऊपरी हिस्सा खाली हुआ था. उस घर की मालकिन बिन्नी दी की खास सहेली हैं. उन्हीं की गारंटी पर तुम्हें घर देने के लिए तैयार हैं. जितना किराया तुम दे सकोगी उन्हें मंजूर होगा.’’

रीता और तरन्नुम पंचशील पार्क की उस कोठी में गए. तरन्नुम को गेट खोलते ही बहुत अच्छा लगा. घर के बाहर छोटा सा लेकिन बहुत खूबसूरत लौन, इस भरी गरमी में भी हराभरा नजर आ रहा था.

घंटी की आवाज सुनते ही हमउम्र जुड़वां 3 साल के नन्हे बच्चे, एक पमेरियन कुत्ता और नौकर चारों ही दरवाजे पर लपके. जाली के दरवाजे के अंदर से ही नौकर बोला, ‘‘आप कौन, कहां से तशरीफ ला रही हैं?’’

रीता ने कहा, ‘‘जा कर मालकिन से बोलो, बिन्नी दी ने भेजा है.’’

नौकर ने दरवाजा पूरा खोलते हुए कहा, ‘‘आइए, वे तो सुबह से आप का ही इंतजार कर रही हैं.’’

बैठक कक्ष सजाने वाले की नफासत की दाद दे रहा था जैसे हर चीज अपनी सही जगह पर थी. यहां तक कि खरगोश की तरह सफेद कुरतेपाजामे में उछलकूद मचाते बच्चे भी जैसे इस कमरे की सजावट का हिस्सा हों. उन्हें बैठे 5 मिनट ही बीते होंगे कि कमरे का परदा सरका, आने वाली को देख कर रीता झट से उठी, ‘‘हाय निकहत आपा, कितनी प्यारी दिख रही हैं आप इस फालसाई रंग में.’’

निकहत हंस दी, ‘‘आज ज्यादा ही सुंदर दिख रही हूं. गरज की मारी आ गई वरना तो बिन्नी के पास आ कर गुपचुप से चली जाती है, कभी भूले से भी यहां तशरीफ नहीं लाई.’’

‘‘क्यों बिन्नी के साथ ईद पर नहीं आई थी,’’ रीता ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘पर अभी तो ईद भी नहीं और नया साल भी नहीं. खैर इनायत है, गरज से ही सही, आई तो,’’ निकहत ने कहा, ‘‘और सुनाओ, कैसा चल रहा है तुम्हारा कामकाज.’’

‘‘वहां से आजकल छुट्टी ले रखी है. इन से मिलिए, ये हैं मेरी सहेली तरन्नुम, रामपुर से आई हैं. इन के शौहर यहां पर हैं. अपना मकान है लेकिन किराएदार खाली नहीं कर रहे हैं. शादी को 8-10 महीने होने को आए लेकिन अब तक मियां का साथ नहीं हो पाया. किराए पर ढंग का घर मिल नहीं रहा और होटल में रहते 5-7 दिन हो गए. बिन्नी दी से बात की तो उन्होंने आप के घर का ऊपरी हिस्सा खाली होने की बात कही. सुनते ही मैं तुरंत इन्हें खींचती आप के पास ले आई.’’

‘‘रामपुर में किस के घर से हैं आप?’’ निकहत ने पूछा.

‘‘वहां बहुत बड़ी जमींदारी है मेरे अब्बू की. क्या आप भी वहीं से हैं?’’ तरन्नुम ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं तो कभी वहां गई नहीं. पिछले साल मेरे शौहर गए थे अपने दोस्त की शादी में. मैं ने सोचा शायद आप उन्हें जानती होंगी.’’

‘‘किस के यहां गए थे? रामपुर में हमारे खानदानी घर ही ज्यादातर हैं.’’

‘‘अब नाम तो मुझे याद नहीं होगा, क्या लेंगी आप…चाय या ठंडा? वैसे अब थोड़ी देर में ही खाना लग रहा है. आप को हमारे साथ आज खाना जरूर खाना होगा. हमारे साहब तो दौरे पर गए हैं. बच्चों के साथ 5-6 दिन से खिचड़ी, दलिया खातेखाते मुंह का स्वाद ही खराब हो गया.

‘‘रीता को तो हैदराबादी बिरयानी पसंद है, साथ में मुर्गमुसल्लम भी. मैं जरा रसोई में खानेपीने का इंतजाम देख लूं. नौकर नया है वरना मुर्गे का भरता ही बना देगा. तब तक आप यह अलबम देखिए. रीता, अपनी पसंद का रेकार्ड लगा लो,’’ कहती हुई निकहत अंदर चली गई.

तरन्नुम ने अलबम खोला और उस की आंखें असगर से मिलतेजुलते एक आदमी पर अटक गईं. अगला पन्ना पलटा. निकहत के साथ असगर जैसा चेहरा. अलगअलग जगह, अलगअलग कपड़े. पर असगर से इतना कोई मिल सकता है वह सोच भी नहीं सकती थी. उस ने रीता को फोटो दिखा कर पूछा, ‘‘ये हजरत कौन हैं?’’

‘‘क्यों, आंखों में चुभ गया है क्या?’’ रीता हंस दी, ‘‘संभल के, यह तो निकहत दीदी के पति हैं. है न व्यक्तित्व जोरदार, मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं. असल में इन के मांबाप जल्दी ही गुजर गए. निकहत अपने मांबाप की इकलौती बेटी थी तिस पर लंबीचौड़ी जमीनजायदाद, बस, समझो लाटरी ही लग गई इन साहब की. नौकरी भी निकहत के अब्बू ने दिलवाई थी.’’

तरन्नुम को अब न गजल सुनाई दे रही थी और न ही कमरे में बच्चों की खिलखिलाती हंसी का शोर, वह एकदम जमी बर्फ सी सर्द हो गई. दिल की धड़कन का एहसास ही बताता था कि सांस चल रही है.

निकहत ने जब खाने के लिए बुलाया तब वह जैसे किसी दूसरी दुनिया से लौट कर आई, ‘‘आप बेकार ही तकल्लुफ में पड़ गईं, हमें भूख नहीं थी,’’ उस ने कहा.

‘‘तो क्या हुआ, आज का खाना हमारी भूख के नाम पर ही खा लीजिए. हमें तो आप की सोहबत में ही भूख लग आई है.’’

रोशनी सा दमकता चेहरा, उजली धूप सी मुसकान, तरन्नुम ठगी सी देखती रही. फिर बोली, ‘‘आप के पति कितने खुशकिस्मत हैं, इतनी सुंदर बीवी, तिस पर इतना बढि़या खाना.’’

‘‘अरे आप तो बेकार ही कसीदे पढ़ रही हैं. अब इतने बरसों के बाद तो बीवी एक आदत बन जाती है, जिस में कुछ समझनेबूझने को बाकी ही नहीं रहता. पढ़ी किताब सी उबाऊ वरना क्या इतनेइतने दिन मर्द दौरे पर रहते हैं? बस, उन की तरफ से घर और बच्चे संभाल रहे हैं यही बहुत है,’’ निकहत ने तश्तरी में खाना परोसते हुए कहा.

‘‘कहां काम करते हैं कुरैशी साहब?’’ तरन्नुम ने पूछा.

‘‘कटलर हैमर में, उन का दफ्तर कनाट प्लेस में है. असगर पहले इतना दौरे पर नहीं रहते थे जितना कि पिछले एक बरस से रह रहे हैं.’’

‘‘असगर,’’ तरन्नुम ने दोहराया.

‘‘हां, मेरे शौहर, आप ने बाहर तख्ती पर अ. कुरैशी देखा था. अ. से असगर ही है. हमारे बच्चे हंसते हैं, अब्बू, ‘अ’ से अनार नहीं हम अपनी अध्यापिका को बताएंगे ‘अ’ से असगर,’’ फिर प्यार से बच्चे के सिर पर धौल लगाती बोली, ‘‘मुसकराओ मत, झटपट खाना खत्म करो फिर टीवी देखेंगे.’’

‘‘अरे, तरन्नुम तुम कुछ उठा नहीं रहीं,’’ रीता ने तरन्नुम को हिलाया.

‘‘हूं, खा तो रही हूं.’’

‘‘क्यों, खाना पसंद नहीं आया?’’ निकहत ने कहा, ‘‘सच तरन्नुम, मैं भी बहुत भुलक्कड़ हूं. बस, अपनी कहने की रौ में मुझे दूसरे का ध्यान ही नहीं रहता. खाना सुहा नहीं रहा तो कुछ फल और दही ले लो.’’

‘‘न दीदी, मुझे असल में भूख थी ही नहीं, वह तो खाना बढि़या बना है सो इतना खा गई.’’

‘‘अच्छा अब खाना खत्म कर लो फिर तुम्हें ऊपर वाला हिस्सा दिखाते हैं, जिस में तुम्हें रहना है. तुम्हारे यहां आ कर रहने से मेरा भी अकेलापन खत्म हो जाएगा.’’

‘‘पर किराए पर देने से पहले आप को अपने शौहर से नहीं पूछना होगा,’’ तरन्नुम ने कहा.

‘‘वैसे कानूनन यह कोठी मेरी मिल्कियत है. पहले हमेशा ही उन से पूछ कर किराएदार रखे हैं. इस बार तुम आ रही हो तो बजाय 2 आदमियों के बीच बातचीत हो इस बार तरीका बदला जाए,’’ निकहत शरारत से हंस दी, ‘‘यानी मकान मालकिन और किराएदारनी तथा मध्यस्थ भी इस बार मैं औरत ही रख रही हूं. राजन कपूर की जगह बिन्नी कपूर वकील की हैसियत से हमारे बीच का अनुबंध बनाएंगी, क्यों?’’

रीता जोर से हंस दी, ‘‘रहने दो निकहत दीदी, बिन्नी दी ने शादी के बाद वकालत की छुट्टी कर दी.’’

‘‘इस से क्या हुआ,’’ निकहत हंसी, ‘‘उन्होंने विश्वविद्यालय की डिगरी तो वापस नहीं कर दी है. जो काम कभी न हुआ तो वह आज हो सकता है. क्यों तरन्नुम, तुम्हारी क्या राय है? मैं आज शाम तक कागजात तैयार करवा कर होटल भेज देती हूं. तुम अपनी प्रति रख लेना, मेरी दस्तखत कर के वापस भेज देना. रही किराए के अग्रिम की बात, उस की कोई जल्दी नहीं है, जब रहोगी तब दे देना. आदमी की जबान की भी कोई कीमत होती है.’’

रीता तरन्नुम को तीसरे पहर होटल छोड़ती हुई निकल गई.

ये भी पढ़ें- रीते हाथ

शाम को असगर के आने से पहले तरन्नुम ने खूब शोख रंग के कपड़े, चमकदार गहने पहने, गहरा शृंगार किया, असगर उसे तैयार देख कर हैरान रह गया. यह पहरावा, यह हावभाव उस तरन्नुम के नहीं थे जिसे वह सुबह छोड़ कर गया था.

‘‘आप को यों देख कर मुझे लगा जैसे मैं गलत कमरे में आ गया हूं,’’ असगर ने चौंक कर कहा.

‘‘अब गलत कमरे में आ ही गए हो तो बैठने की गलती भी कर लो,’’ तरन्नुम ने कहा, ‘‘क्या मंगवाऊं आप के लिए, चाय, ठंडा या कुछ और,’’ तरन्नुम ने लहरा कर पूछा.

‘‘होश में तो हो,’’ असगर ने कहा.

‘‘हां, आंखें खुल गईं तो होश में ही हूं,’’ तरन्नुम ने जवाब दिया, ‘‘आज का दिन मेरी जिंदगी का बहुत कीमती दिन है. आज मैं ने अपनी हिम्मत से तुम्हारे शहर में बहुत अच्छा घर ढूंढ़ लिया है. उस की खुशी मनाने को मेरा जी चाह रहा है. अब तो अनुबंध की प्रति भी है मेरे पास. देखो, तुम इतने महीने में जो न कर सके वह मैं ने 6 दिन में कर दिया,’’ अपना पर्स खोल कर तरन्नुम ने कागज असगर की तरफ बढ़ाए.

असगर ने कागज लिए. तरन्नुम ने थरमस से ठंडा पानी निकाल कर असगर की तरफ बढ़ाया. असगर के हाथ कांप रहे थे. उस की आंखें कागज को बहुत तेजी से पढ़ रही थीं. उस ने कागज पढ़े और मेज पर रख दिए. तरन्नुम उस के चेहरे के उतारचढ़ाव देख रही थी लेकिन असगर का चेहरा सपाट था कोरे कागज सा.

‘‘असगर, तुम ने पूछा नहीं कि मैं ने कागजात में खाविंद का नाम न लिख कर वालिद का नाम क्यों लिखा?’’ बहुत बहकी हुई आवाज में तरन्नुम ने कहा.

असगर ने सिर्फ सवालिया नजरों से उस की तरफ देखा.

‘‘इसलिए कि मेरे और निकहत कुरैशी के खाविंद का एक ही नाम है और अलबम की तसवीरें कह रही हैं कि हम दोनों बिना जाने ही एकदूसरे की सौतन बना दी गईं. निकहत बहुत प्यारी शख्सियत है मेरे लिए, बहुत सुलझी हुई, बेहद मासूम.’’

‘‘तरन्नुम,’’ असगर ने कहा.

‘‘हां, मैं कह रही थी वह बहुत अच्छी, बहुत प्यारी है. मैं उन का मन दुखाना नहीं चाहती, वैसा कुछ भी मैं नहीं करूंगी जिस से उन का दिल दुखी हो. इसलिए मैं वह घर किराए पर ले चुकी हूं और वहां रहने का मेरा पूरा इरादा है लेकिन उस घर में मैं अकेली रहूंगी. पर एक सवाल का जवाब तुम्हारी तरफ बाकी है, तुम ने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया?’’

‘‘मुझे तुम बेहद पसंद थीं,’’ असगर ने हकलाते हुए कहा.

‘‘तो?’’

‘‘जब तुम्हें भी अपनी तरफ चाहत की नजर से देखते पाया तो सोचा…’’

‘‘क्या सोचा?’’ तरन्नुम ने जिरह की.

‘‘यही कि अगर तुम्हारे घर वालों को एतराज नहीं है तो यह निकाह हो सकता है,’’ असगर ने मुंह जोर होने की कोशिश की.

‘‘मेरे घर वालों को तुम ने बताया ही कहां?’’ तरन्नुम गुस्से से तमतमा उठी.

‘‘देखो, तरन्नुम, अब बाल की खाल निकालना बेकार है. शकील को सब पता था. उसी ने कहा था कि एक बार निकाह हो गया तो तुम भी मंजूर कर लोगी. तुम्हारी अम्मी ने झोली फैला कर यह रिश्ता अपनी बेटी की खुशियों की दुहाई दे कर मांगा था. वैसे इसलाम में 4 शादियों तक भी मुमानियत नहीं है.’’

‘‘देखिए, मुझे अपने ईमान के सबक आप जैसे आदमी से नहीं लेने हैं. आप की हिम्मत कैसे हुई निकहत जैसी नेक बीवी के साथ बेईमानी करने की और मुझे धोखा देने की,’’ तरन्नुम ने तमतमा कर कहा.

‘‘धोखाधोखा कहे जा रही हो. शकील को सब पता था, उसी ने चुनौती दे रखी थी तुम से शादी करने की.’’

‘‘वाह, क्या शर्त लगा रहे हैं एक औरत पर 2 दोस्त? आप को जीत मुबारक हो, लेकिन यह आप की जीत आप की जिंदगी की सब से बड़ी हार साबित होगी, असगर साहब. मैं आप के घर में किराएदार बन कर जिंदगी भर रहूंगी और दिल्ली आने के बाद अदालत में तलाक का दावा भी दायर करूंगी. वैसे मेरी जिंदगी में शादी के लिए कोई जगह नहीं थी. शकील ने शादी के बहुत बार पैगाम भेजे, मैं ने हर बार मना कर दिया. उसी का बदला इस तरह वह मुझ से लेगा, मैं ने सोचा भी नहीं था. आज पंचशील पार्क जा कर मुझे एहसास हुआ कि क्यों दिल्ली में घर नहीं मिल रहे? क्यों तुम उखड़ाउखड़ा बरताव कर रहे थे? देर आए दुरुस्त आए.’’

‘‘पर मैं तुम्हें तलाक देना ही नहीं चाहता,’’ असगर ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें अपनी बीवी बनाया है. मैं तुम्हारे लिए दूसरी जगह घर बसाने के लिए तैयार हूं.’’

बहुत खुले दिमाग हैं आप के, लेकिन माफ कीजिए. अब औरत उस कबीली जिंदगी से निकल चुकी है जब मवेशियों की गिनती की तरह हरम में औरत की गिनती से आदमी की हैसियत परखी जाती थी. बच्चों से उन का बाप और निकहत से उस का शौहर छीनने का मेरा बिलकुल इरादा नहीं है और वैसे भी एक धोखेबाज आदमी के साथ मैं जी नहीं सकती. हर घड़ी मेरा दम घुटता रहेगा लेकिन तुम्हें बिना सजा दिए भी मुझे चैन नहीं मिलेगा. इसीलिए तुम्हारे घर के ऊपर मैं किराएदार की हैसियत से आ रही हूं.’’

फिर तेज सांसों पर नियंत्रण करती हुई बोली थी तरन्नुम, ‘‘मैं सामान लेने जा रही हूं. तुम निकहत को कुछ बताने का दम नहीं रखते. तुम बेहद कमजोर और बुजदिल आदमी हो. हम दोनों औरतों के रहमोकरम पर जीने वाले.’’

असगर के चेहरे पर गंभीरता व्याप्त थी. तरन्नुम अपनी अटैची बंद कर रही थी. वह मन ही मन सोच रही थी…अम्मीअब्बू की खुशी के लिए उसे वहां कोई भी बात बतानी नहीं है. यह स्वांग यों ही चलने दो जब तक वे हैं.’’ Story

Religious loot : दान के बहाने धार्मिक लूट

Religious loot : न जाने कब से मंदिरों, मजारों, गुरुद्वारों के बाहर खड़ी भिखारियों की भीड़ दानी लोगों के दान, पुण्य और परोपकार के सहारे ही अपना पेट भर रही है. इन धर्मस्थलों के आगे खड़ी लाचार लोगों की लंबी कतारों में बेबस लोगों की न जाने कितनी पीढि़यां खप चुकी हैं. क्या दान की इस भावना में कुछ इंसानियत होती है? क्या इस पुण्य से गरीबी दूर होती है? परोपकार की मानसिकता से फायदा किस का होता है?

दान, पुण्य और परोपकार की कुसंस्कृति न जाने कब से चलन में है. जब से सभ्यता बनी, लोगों ने एकदूसरे को सहयोग करने की आदत का फायदा उठाया और विपत्ति के समय किसी को कुछ दे देना सभ्यता सम झा गया. शुरुआत में जिस ने शिकार किया, फलफूल एकत्र किए या कुछ उपजाया उस ने उन दूसरों को कुछ देना शुरू किया जो शारीरिक कमजोरी की वजह से खुद का खाना जमा नहीं कर पाए. देने वाले को यह एहसास रहता था कि जिसे जो दिया गया वह उस के काम आ सकता है जब वह कमजोरी, बीमारी या प्राकृतिक आपदा के कारण खुद खाना जुटा न सकेगा. यह दान नहीं है, यह पारस्परिक सहयोग है जो सदियों से चलता आ रहा है और यह सभ्यता की मजबूत ईंटों में से एक आदत है.

इस पारस्परिक सहयोग का दुरुपयोग किया गया. हर धर्म के पुरोहितों ने अपने फायदे के लिए धर्म के नियम, कायदे व कानून बनाए और कहानियां गढ़ीं ताकि दान के नाम पर लोगों से धन ऐंठा जा सके. सो, धर्म की कहानियों में दानदक्षिणा का खूब महिमागान किया गया है. अब ईश्वर के नाम पर दान मांगा जाता है. लोगों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि दान देने से ईश्वर खुश होता है. लोग ईश्वर के नाम पर ठगे चले जाते हैं. यही कारण है कि हर देश में धर्म की बड़ी दुकान में अथाह दौलत इकट्ठी हो गई है. बड़ेबड़े मंदिर, चर्च और मसजिदें इसी हथकंडे के तहत ही बने हैं. ईश्वर के नाम पर इकट्ठी की गई दौलत से पुरोहित ऐश करते हैं जबकि जनता हमेशा गरीब ही बनी रहती है.

विशेष जाति के लोगों के दान की महिमा का सब से ज्यादा गुणगान हिंदू धर्म ने किया है. आज भी धर्मगुरु ब्राह्मणों को दान देने के नाम पर लोगों को बरगलाते हैं और लोग इन धर्मगुरुओं के  झांसे में आ कर खूब दान करते हैं. लोगों के दान के पैसों से ही रातोंरात बड़ेबड़े आश्रम खड़े हो जाते हैं और दो कौड़ी के बाबा बड़ेबड़े गुरु बन जाते हैं. दान देने वाले आदमी का समय भले न बदले लेकिन दान लेने वाले की तो आने वाली सात पीढि़यों का भविष्य उज्ज्वल हो जाता है.

आसाराम बाबू, राम रहीम, संत रामपाल और सद्गुरु जैसे बाबाओं का इतिहास उठा कर देख लीजिए. ये वे लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन में लगातार असफल होने के बाद धर्म का धंधा शुरू किया और आज इन के ब्रैंड का खरबों रुपयों का वार्षिक टर्नओवर है. इन जैसे बाबाओं के बड़े शहरों में जमीनें, बड़ेबड़े आश्रम और कई शहरों में कार्यालय बने हैं. यह सब कैसे हुआ? क्या इतनी दौलत इन्हें ईश्वर ने दी? दरअसल, यह सब भक्तों के पैसों के चलते है, दान के महिमागान का परिणाम है.

लोगों के दान के पैसों से ही बड़ेबड़े मंदिर, मसजिद व चर्च बनाए गए. इन धर्मस्थलों के अंदर और बाहर दोनों ओर भिखारी होते हैं जो ईश्वर और धर्मरक्षा के नाम पर लोगों से धन ऐंठते हैं. धर्मस्थल के अंदर बैठा भिखारी कहता है कि धर्म के नाम पर खर्च करो, ईश्वर तुम्हें इस के बदले में बहुतकुछ देगा. वहीं, धर्मस्थल के बाहर बैठा भिखारी कहता है कि भगवान के नाम पर दस रुपए दो, वे तुम्हें हजार गुना देगा. अंदर वाले भिखारी के पास खाना, कपड़ा छत, दवाएं सबकुछ है जबकि बाहर वाले के पास कुछ नहीं है. वह अंदर वाले का एजेंट बना बैठा है और मानवीय सहायता करने के गुण का दुरुपयोग करता है.

कोई यह सवाल नहीं करता कि ईश्वर को धन की जरूरत ही क्या है? ईश्वर के पास कौन सा बैंक है जो दस रुपए के इन्वैस्टमैंट के बदले में हजार रुपए देता है? धार्मिक स्थलों की भीड़ में शामिल लोगों के पास तर्कशक्ति नहीं होती. इतना विवेक भी नहीं होता जो वे खुद से यह सवाल पूछ सकें. आखिर पुरोहितों के लिए धन इतना जरूरी क्यों है? भगवान के एजेंटों का खर्च तो भगवान को ही उठाना चाहिए. मंदिर और मसजिद के निर्माण में जनता के खूनपसीने की कमाई क्यों खर्च की जाए? क्या ईश्वर या अल्लाह अपने लिए मंदिरमसजिद नहीं बनवा सकता?

फल, फूल, किसी जानवर के खाने लायक मांस, अनाज, घरेलू सामान, कपड़ा, मकान सब अपनेआप आदमी के हाथ नहीं लगते. हरेक के लिए कठिन मेहनत करनी होती है. कुछ चीजों के लिए तो वर्षों लग लाते हैं. कुछ चीजों को बनाने की कला सीखने में पीढि़यां लग जाती हैं. धर्मस्थल के अंदर दान पाने वाले लोग इन्हें मुफ्त में पा जाते हैं. बाहर बैठे भिखारी इस दान की महिमा गाते रहते हैं.

ये अंदर वालों के प्रचारक होते हैं. बाहर और अंदर मुफ्त सामान पाने वाले यह नहीं सम झते कि मंदिर, मसजिद, चर्च, मठ आसमान से अपनेआप नहीं उतरते, इस के लिए मानव श्रम व बुद्धि की जरूरत होती है. वे मुफ्त के इस माल को ईश्वर का दिया कह कर आम लोगों को बरगलाते हैं. वे बारबार कहते हैं कि ईश्वर इस के बदले उन का घर भरेगा जबकि तथाकथित ईश्वर तो किसी मंदिर, मसजिद, चर्च, मठ को बिना मानवीय श्रम के दान के बनवा ही नहीं सकता.

भिखारी और दानी

भिखारी और दानी दोनों एकदूसरे की जरूरत हैं. भिखारी दानियों को पैदा करता है और दानी लोग मिल कर भिखारियों की भीड़ बढ़ाते हैं. मतलब, दोनों प्रजातियों का अस्तित्व एकदूसरे पर निर्भर है.

विकसित देशों में दान, पुण्य और परोपकार की संस्कृति कम है, इसलिए वहां गरीबी, बेबसी, भूख, कुपोषण और अन्याय भी नहीं है. यही कारण है कि पश्चिम के लोग मानव विकास में हम से कहीं आगे हैं. जब तक इन देशों में ईश्वरीय दान की महिमा थी, ये देश भी गरीब देशों की तरह भूख, बीमारी, महामारी, ठंड, गरमी के कारण त्रस्त रहते थे. आज उन्होंने श्रम के मूल्य के महत्त्व को सम झ लिया है.

दान की शब्दावली

कुछ धार्मिक देश, जहां मुफ्त का मानव श्रम या किसी आवश्यक वस्तु का प्राकृतिक भंडार नहीं है, आज भूख और बीमारी के बुरी तरह शिकार हैं. उन का ईश्वर उन से लड़नेमरने या भूख व बीमारी के जरिए उन की जान लेता है पर उन के दान के बदले उन्हें देता कुछ नहीं है. ये देशदुनिया के नक्शे पर हैं इसलिए कि यहां के लोग भी अपने श्रम से, ईश्वर की कृपा के बिना, कुछ न कुछ करते हैं व जी भी रहे हैं और उन की संख्या कम भी नहीं होती. सभ्यता ने उन्हें इतनी तकनीक दे दी है कि एक व्यक्ति के श्रम से चारपांच लोग जी सकें चाहे जिंदगी जानवरों जैसी ही हो. शब्दों की भी अपनी फिलौसफी होती है. हर शब्द का अपना मनोविज्ञान होता है. दान, पुण्य और परोपकार जैसे शब्दों के पीछे भी फिलौसफी है और मनोविज्ञान है जिसे सम झने की जरूरत है.

हमें यह सम झना होगा कि सृष्टि के हर तत्त्व में कुछ गुण होते हैं जिन से उस की पहचान होती है. जैसे शेर का गुण है कि वह हिरण को मार कर खाता है तो उस का यह गुण उस की पहचान भी है और उस के अस्तित्व के लिए जरूरी भी. इसी तरह मानव के भी कुछ गुण हैं जो उसे दूसरे जीवों से अलग बनाते हैं. मानव होने का सब से बड़ा गुण है मानव का सामाजिक होना. करोड़ों वर्षों के विकासक्रम के दौरान इंसान एक सामाजिक प्राणी बना. मनुष्य ने जाना कि सामाजिकता से ही वह सुरक्षित रह सकता है और उन्नति कर सकता है. इस तरह आगे चल कर मानव प्रजाति के अस्तित्व में बने रहने के लिए उस का सामाजिक प्राणी बने रहने का गुण ही उस की सब से बड़ी जरूरत बन गई.

सामाजिक प्राणी होने से सामूहिक चेतना का विकास हुआ. खानाबदोश जीवन में संघर्ष के दौरान ज्यादा श्रम के बदले उसे थोड़ाकुछ मिलता था तो सामाजिक हो जाने के बाद कम श्रम के बदले ज्यादा कुछ मिल जाता था. इस से इंसान का बहुत सारा समय बच जाता था. इस नए सामाजिक तानेबाने का मानव पहले से ज्यादा सुरक्षित था, जिस से उस के लिए बौद्धिक उन्नति के मार्ग खुल गए. कुछ लोग जो सामाजिकता की इस संस्कृति में फिट नहीं बैठते थे. वे अराजकता पैदा करते थे. सो, डर, भय, दंड और लालच द्वारा समाज के इन अराजक तत्त्वों को काबू में किया जाता था. कुछ लोग प्राकृतिक आपदाओं की वजह से मुख्यधारा से पिछड़ जाते थे तो सहयोग की संस्कृति द्वारा उन पिछड़े हुए लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा जाता.

इस तरह शुरुआती सामाजिक नियमों का निर्माण हुआ और भय, लालच, दंड और सहयोग की परंपरा का विकास हुआ. और यहीं से सहयोग मानव का गुण बन गया जो मनुष्य के सामाजिक प्राणी बने रहने के लिए बेहद जरूरी था. सामाजिक प्राणी बनाए रखने में राजाओं के कानून का हाथ ज्यादा रहा, धर्म के नियमों-उपदेशों का कम. धर्म तो दंड मृत्यु होने के बाद देते हैं. तमाम धर्म स्वर्ग व नर्क की बात करते हैं, हिंदू और बौद्ध धर्म पुनर्जन्म की जो इस जन्म के कर्म पर आधारित होता है.

आगे चल कर आबादी बढ़ी तो समाज की जरूरतें भी बढ़ीं और सामाजिकता को व्यवस्थित रखने की चुनौतियां भी. इस से कई बड़ीछोटी सभ्यताओं का उदय हुआ. प्रत्येक सभ्यता के नए नियमकानून बने जो आगे चल कर परंपराओं में बदल गए. जैसेजैसे मानवता समृद्धि की ओर बढ़ी, सामाजिकता को बनाए रखने के लिए नए नियमों की जरूरत भी बढ़ती चली गई. मनुष्य के यहां तक पहुंचने में समाज की सब से अहम भूमिका थी.

इसलिए मनुष्य ने समाज की इस अहमियत को हर युग में पहचाना और परिष्कृत किया. सामाजिक भावनाओं ने सामाजिक वर्चस्व की मानसिकता को जन्म दिया जिस से एक इंसानी समाज दूसरे इंसानी समाज से होड़ करने लगा. सामाजिक वर्चस्व की इसी मानसिकता के कारण सभ्यताएं साम्राज्यों में बदलीं और साम्राज्यवाद का उदय हुआ जिस की वजह से लाखों युद्ध हुए. इस भयंकर अराजकता में अपनेअपने वर्चस्व के लिए सभी साम्राज्यों को फिर से नए नियमों की जरूरत पड़ी.

इसी दौरान धर्मों के उपदेशों से करुणा, मैत्री, सद्भाव, अहिंसा और क्षमा जैसे शब्द भी इंसानी सभ्यताओं का हिस्सा बने. ये पहले उस काल्पनिक ईश्वरीय शक्ति के लिए उपयोग किए जाते थे जिसे बिचौलियों ने चुना था. आगे चल कर ये तमाम शब्द इंसान के सामाजिक प्राणी होने के गुण बन गए. जिन में इन मानवीय गुणों का अभाव होता वह समाज के लिए खतरा बन जाता. इसलिए लगभग सभी सभ्यताओं ने मानवीय गुणों को स्वीकार कर लिया और आगे चल कर इन्हीं मानवीय गुणों की विवेचना अनेक दार्शनिकों ने की और इसी मानवीय दर्शन पर बड़ेबड़े दर्शनशास्त्र लिखे गए.

इन तमाम मानवीय शब्दों के पीछे की फिलौसफी और इन के पीछे का मनोविज्ञान यही था कि सामाजिक व्यवस्था में अराजकता खत्म हो और मानवता निर्बाध रूप से आगे बढ़ती चली जाए. ये तमाम शब्द एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान के शोषण के खिलाफ ही बने थे ताकि सामाजिकता कायम रहे, समाज का हर इंसान समाज में खुद को सुरक्षित महसूस करे और प्रत्येक मनुष्य सामाजिक उत्थान में उपयोगी साबित हो सके. खेद इस बात का रहा है कि ये शब्द कोरे हवाहवाई रह गए क्योंकि उन्हें कहने वाले धर्मों और उन के कहने पर चलने वाले राजाओं ने अपने से अलग लोगों को हिंसा, अत्याचार का निशाना बनाया. उन्होंने अपने ही कमजोर लोगों और सभी स्त्रियों को निशाना बनाया.

लंबे वक्त तक फिर से इंसानी समाज करुणा, मैत्री, सद्भाव, अहिंसा, क्षमा और सहयोग जैसे मानवीय गुणों के सहारे आगे बढ़ता चला गया. इन्हीं मानवीय गुणों की बदौलत ही इंसानी सभ्यताओं ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, लोकतंत्र और न्यायव्यवस्था की नई इबारतें लिखीं जिन पर चल कर आज हम यहां तक पहुंचे हैं लेकिन इतिहास के हर पड़ाव पर राजाओं और धर्मगुरुओं ने इन व्यवस्थाओं में विकार पैदा किया. लूट,  झूठ, शोषण और पाखंडवाद की मानसिकता ने सामाजिक तानेबाने को विकृत रूप दे दिया. जिस में औरतें सब से बड़ी शिकार थीं.

इस संस्कृति ने संपन्नता और विपन्नता की खाई को पैदा कर दिया. जब समाज में उत्पादन बहुत होने लगा तो समाज का एक हिस्सा सभी संसाधनों का मालिक बन बैठा, जिस से एक बहुत बड़ा वर्ग इन संसाधनों की पहुंच से दूर छिटक कर हाशिए पर जा पहुंचा. मिस्र के फैरो के शुरू में जो हिंदू पौराणिक कहानियों तक में अमीरों की ही बात की गई जिन्होंने करुणा, मैत्री, सद्भाव का नहीं बल्कि दान और टैक्स का भरपूर प्रचार किया. सो, मंदिर बने, महल बने.

जनता के बड़े वर्ग को काबू में रखने के लिए समृद्ध वर्ग तीन भागों में विभाजित हुआ. राजनीतिक वर्ग, धार्मिक वर्ग और पूंजीपति वर्ग. तीनों के आपसी गठजोड़ ने इस सामाजिक असंतुलन को बरकरार रखने के लिए कई नए नियम रच डाले ताकि वंचित वर्ग में कभी विद्रोह की भावना पैदा न हो सके. दान और टैक्स की महिमामंडन इस का बड़ा हिस्सा था. इन दोनों के कारण एक बड़ा वर्ग भिखारी बन गया. पाकिस्तान की 25 करोड़ जनता में से 4 करोड़, वहां के समाचारपत्र डान के अनुसार, भीख मांगने का धंधा करती है. हमारे यहां तो गिनती भी नहीं होने देते कि उन में दान पाने वाले न आ जाएं.

परोपकारियों का जमावड़ा

समाज ऐसे दानवीर, दयावान, पुण्यात्मा और परोपकारी महात्माओं की भीड़ से भर गया जिन में दया तो थी लेकिन वे परिस्थितियों को नहीं बदल सकते थे. वे दान तो दे सकते थे लेकिन उत्थान नहीं कर सकते थे. वे पुण्य तो कर सकते थे लेकिन परिवर्तन करने की क्षमता उन में न थी. वे परोपकार तो कर सकते थे लेकिन किसी अभागे का समय नहीं बदल सकते थे क्योंकि महानुभावों की यह विशाल भीड़ ईश्वर के नियमों से बंधी थी.

ये महानुभाव मानते थे कि हालात में बदलाव करना उन के बस की बात नहीं है. वे तो बस, महान बनने के लिए पैदा हुए हैं और सदा महान बने रहने के लिए उन्हें दानी, दयालु, पुण्यात्मा और परोपकारी बने रहना जरूरी है. दान, दया, पुण्य और परोपकार के लिए ऐसे लोगों की भी जरूरत है जिन पर दया, दान, पुण्य और परोपकार कर महान बना जा सके.

इसी मानसिकता ने गरीबी कभी खत्म नहीं होने दी क्योंकि गरीब और गरीबी के प्रति जो मानवीय संवेदनाएं होनी चाहिए वे दान, दया, पुण्य और परोपकार की मानसिकता के कारण कभी पनपी ही नहीं. करुणा, सहयोग, न्याय और संवेदनशीलता के मानवीय गुण को हम ने दया, दान, पुण्य और परोपकार में बदल दिया जिस से एक मानव की दूसरे मानव के प्रति कर्तव्य की भावना समाप्त हो गई और एक मानव दूसरे के लिए महान बनता चला गया.

दान, पुण्य और परोपकार की भावना से पैदा होती है गरीबी

हम ने करुणा, मैत्री, सद्भाव और सहयोग के मानवीय गुण को त्याग कर दान, दया, पुण्य और परोपकार का मार्ग अपना लिया जिस से परिस्थितियों में बदलाव की जरूरत ही खत्म हो गई क्योंकि दान, दया, पुण्य और परोपकार की इस मानसिक प्रवृत्ति से शोषक और शोषित दोनों वर्ग संतुष्ट हो गए. एक का मुफ्त में पेट भरने लगा और दूसरा पराए पर किए गए इस उपकार से महान बनने लगा.

इसी मानसिकता ने भीख, भंडारा, जकात, इमदाद और खैरात जैसी कुत्सित सोच को जन्म दिया जिस के द्वारा समृद्ध तबका परस्पर सहयोग की भावना से आजाद हो कर महान हस्ती की श्रेणी में पहुंच गया. महान बनने की इसी होड़ की वजह से गरीबी और गरीबों की जरूरत बनी रही और गरीबी बहुसंख्यक आबादी की सोच और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन कर सदा के लिए स्थायी हो गई.

दान और भीख पाने वाला निकम्मा होता गया. दान और भीख देने वाले को व्यापार और उद्योग के सहारे जनता को लूटने का लाइसैंस मिल गया. लोग भूखे न मरें, इस के लिए मंदिरों के साथ गरीबों को दान करने की आदत डाल दी गई जो धर्म और राजा के टैक्स के अलावा अपनी इच्छा के अनुसार दिया गया पैसा होता है.

हालात कैसे बदलेंगे

देश बनता है गांवों से, कसबों से. लेकिन गांवोंकसबों की स्थिति जा कर देख आइए, चारों ओर बदहाली, परेशानी और लाचारी का अंबार मिलेगा. गांवों के सक्षम लोग कसबों में बस गए. कसबों के सक्षम लोग शहरों की ओर भाग गए और शहरों के सक्षम के लोग विदेशों में जा कर बस रहे हैं. कोई अपने मूल स्थान के हालात को बदलने के लिए कुछ नहीं करता. लेकिन मंदिरों में भंडारा बांट कर लोग परोपकार खूब करते हैं.

विदेशों में बसने वाले लोग जब वहां की मानवतावादी सभ्यता में रचबस जाते हैं तो सदा के लिए वहीं के हो कर रह जाते हैं क्योंकि उन देशों में सामाजिक सुरक्षा, न्याय और परस्पर सहयोग की उत्कृष्ठ व्यवस्था कायम है जिस में उन्हें अपनी पीढि़यों का भविष्य सुरक्षित नजर आता है. उन देशों में रहने वाले भारतीय लोग कभी यह नहीं सोचते कि हमारा देश ऐसा क्यों नहीं बन सकता.

दान की मनोवृत्ति परस्पर सहयोग की भावना को खत्म कर देती है. पुण्य की मानसिकता से परिवर्तन की आवश्यकता खंडित होती है और परोपकार की सोच से एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के प्रति कर्तव्य की सार्थक चेष्टा नष्ट हो जाती है. मानवता के विकास में करुणा, सहयोग परिवर्तन और कर्तव्य की अहमियत है. इस के उलट, दान, पुण्य और परोपकार की मानसिकता मानवता के मार्ग में बाधक ही साबित होती है.

अगर हम मानवता के वास्तविक मूल्यों को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं तो हमें मानवता के बुनियादी उसूलों को ही अपना धर्म बनाना होगा जिस में एक इंसान का दूसरे इंसान के प्रति कर्तव्य सर्वोपरि होगा. तभी हम समता, न्याय, प्रेम, सहयोग और मानवीय संवेदनाओं पर आधारित उत्कृष्ट सामाजिक व्यवस्था कायम कर पाएंगे और फिर उस नई मानवीय व्यवस्था में दान, पुण्य और परोपकार जैसी मनोवृत्ति के लिए कोई जगह न होगी.

साजिश के तहत पैदा की गई गरीबी

राजनीतिक गिरोह ने वंचित तबके को शारीरिक व सामाजिक सुरक्षा और कुछ सुविधाओं के नाम पर हमेशा भ्रम में रखा तो धार्मिक गिरोहों ने उसे सम झाया कि तुम्हारे दुखों की असली वजह तुम्हारा भाग्य है या ईश्वर की नाराजगी है. तुम्हारे वर्तमान के दुख पिछले जन्म का परिणाम हैं. सुख भोगने वाले लोगों ने दुख भोगने वाले लोगों को सम झाया कि आज अब उन के जीवन में दुख ही दुख है तो मरने के बाद स्वर्ग में या अगले जन्म में सुख ही सुख होगा. अल्लाह को गरीब पसंद हैं, जितना दुख  झेलोगे, खुदा आखिरत में इंसाफ करेगा और तुम्हें जन्नत में उस से बेहतर सुखसुविधाएं प्रदान करेगा जिस की चाह तुम दुनिया में रखते हो.

इस तरह के विचारों के ओवरडोज में गरीब की पीड़ा खत्म हो गई और वह गरीबी को एंजौय करने लगा. बहुसंख्यक शोषित वर्ग मुफलिसी में मुसकराना सीख गया और फिर शासक और शोषक वर्गों द्वारा बनाई गई विघटनकारी नीतियों का शिकार हो कर शिक्षा, न्याय, समता और उन्नति के मार्ग से सदा के लिए दूर हो गया. सभ्यता की नींव का हिस्सा दया, दान, सहयोग और परोपकार की मानसिकता को लूट का हथियार बना डाला गया, जिस के सहारे वंचित समाज में शोषक वर्ग के प्रति प्रतिकार की भावना को खत्म कर दिया गया और वंचित समाज में इस लूट का विरोध करने की जगह लुटेरे के प्रति कृतज्ञता का भाव भर दिया गया.

समाजसेवी संगठनों की बढ़ती तादाद

आज इसी मानसिकता की वजह से देश में 31 लाख रजिस्टर्ड एनजीओ खड़े हो चुके हैं जो दया, दान, पुण्य और परोपकार की मानसिकता को साथ ले कर ‘महान’ कार्य करने में जुटे हुए हैं. देश में स्कूलों की संख्या 15 लाख है और इन गैरसरकारी संस्थाओं की संख्या 31 लाख. दुनिया के कई देशों की आबादी से ज्यादा तो हमारे देश में समाज सुधारने वाले संगठन काम कर रहे हैं. फिर भी स्थिति जस की तस है क्योंकि गरीब और गरीबी दूर करने वाली इन सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं के पास योजनाएं तो बहुत हैं लेकिन उन योजनाओं में संवेदनाएं सिरे से गायब हैं.

जो देश मानवता के सब से उत्कृष्ट पायदान पर खड़े हैं वहां के कल्चर में दया, दान, पुण्य और परोपकार की मानसिकता नहीं है, इसलिए न तो वहां थोक के भाव में महात्मा पैदा होते हैं और न ही वहां समाज सुधार करने वाले लाखों संगठनों की जरूरत पड़ती है. फिर भी वहां गरीबी, कुपोषण, लाचारी और अन्याय का नामोनिशान नहीं है क्योंकि उन की सभ्यता वास्तविक मानवीय गुणों को सम झती है जो करुणा, मैत्री, सद्भाव, न्याय, समानता और सहयोग पर आधारित है. इन्हीं सारे शब्दों को मिला कर एक शब्द बनता है मानवता. और जहां दया, दान, पुण्य और परोपकार होता है वहां मानवता के ये सभी गुण निष्क्रिय हो जाते हैं.

एक परोपकारी अगर जीवनभर भंडारा चलाए तो उस से किसे फर्क पड़ता है? भंडारा खा कर उसे सुबह शौच में बदलने वाली जनता वैसी की वैसी बनी रहती है और भंडारा चलाने वाला वह आदमी महान हो जाता है. सड़कों पर भीख मांगते लाखों बच्चों को मिठाई खिलाने के बजाय आप इन में से मात्र एक बच्चे को भी शिक्षित कर कामयाब बना दें तो आगे चल कर वही बच्चा कइयों को गुरबत के भयंकर दलदल से बाहर निकाल सकता है. इसे ही वास्तविक परिवर्तन कह सकते हैं और यही संवेदनशीलता गरीबी की इस भयंकर समस्या को सदा के लिए मिटा भी सकती है. वरना मिठाई खिलाखिला कर दया, दान, पुण्य और परोपकार करते रहिए, कुछ नहीं होगा. हां, आप महान जरूर बन जाएंगे.

ठीक ऐसे ही जकात, खैरात, इमदाद बांटने वाली मानसिकता से भी हालात नहीं बदलते. जो जितना जकात देता है वह उतना ही बड़ा दानी तो हो जाता है लेकिन गरीब मुसलमानों के हालात नहीं बदलते. ग्रीनलैंड की पूरी आबादी के डेढ़ गुना यानी करीब 73 हजार बच्चे राजधानी दिल्ली की सड़कों पर भटक रहे हैं और इसी राजधानी में करोड़पतियों की संख्या इन बच्चों से ज्यादा है. अगर एक करोड़पति परिवार एक बच्चे की ही जिम्मेदारी उठा ले तो इन 73 हजार बच्चों का भविष्य सुधर सकता है. लेकिन ऐसा वे क्यों करेंगे? उन के पास जो है वह उन के ‘परमात्मा’ ने दिया है तब वे अपने उस खुदा की भक्ति क्यों न करें जिस ने उन्हें धनवान बनाया है, और उन के अनुसार, सड़कों पर भटकते ये बच्चे अपने पिछले जन्मों का कर्मफल ही तो भोग रहे हैं.

फिर ये लोग अपने ईश्वर की बनाई इस व्यवस्था से खिलवाड़ भला कैसे कर सकते हैं? देश को गुरबत की सड़ांध में धकेलने के लिए यही मानसिकता जिम्मेदार है और इस मानसिकता के लोग ही दया, दान, पुण्य और परोपकार पर आधारित इस व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं. इसी वजह से इस सनातन विकृति में कभी परिवर्तन नहीं हो पाता. Religious loot

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें