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Hindi Family Story: ममा मेरा घर यही है – रिश्ते के नाजुक धागों को क्या बचा पाई पारुल

Hindi Family Story: बेटी पारुल से फोन पर बात खत्म होते ही मेरे मस्तिष्क में अतीत के पन्ने फड़फड़ाने लगे. पति के औफिस से लौटने का समय हो रहा था, इसलिए डिनर भी तैयार करना आवश्यक था. किचन में यंत्रचालित हाथों से खाना बनाने में व्यस्त हो गई. लेकिन दिमाग हाथों का साथ नहीं दे रहा था.

बचपन से ही पारुल स्वतंत्र विचारों वाली, जिद्दी लड़की रही है. एक बार जो सोच लिया, सो सोच लिया. होस्टल में रहते हुए उस ने कभी मुझे अपनी छोटीबड़ी समस्याओं में नहीं उलझाया, उन को मुझे बिना बताए ही स्वयं सुलझा लेती थी. इस के विपरीत, मैं अपने परिचितों को देखती थी कि जबतब उन के बच्चों के फोन आते ही, उन की समस्याओं का समाधान करने के लिए उन के होस्टल पहुंच जाया करते थे.

एक दिन अचानक जब पारुल ने अपना निर्णय सुनाया कि एक लड़का रितेश उसे पसंद करता है और वह भी उस को चाहती है, दोनों विवाह करना चाहते हैं तो मैं सकते में आ गई और सोच में पड़ गई कि जमाना खराब है, किसी ने अपने जाल में उसे फंसा तो नहीं लिया. देखने में सुंदर तो वह है ही, उम्र भी अभी अपरिपक्व है, पूरी 22 वर्ष की तो हुई है अभी. ये सब सोच कर मैं बहुत चिंतित हो गई कि यदि उस ने सही लड़के का चयन नहीं किया होगा और जिद की तो वह पक्की है ही, तो फिर क्या होगा.

कुछ दिनों के सोचविचार के बाद तय हुआ कि रितेश से मिला जाए. पारुल के जन्मदिन पर उस को आमंत्रित किया गया और वह आ भी गया. वह सुदर्शन था, एमबीए की पढ़ाई पूरी कर के किसी नामी कंपनी में सीनियर पोस्ट पर कार्यरत था. पढ़ाई में आरंभ से ही अव्वल रहा. वह हम सब को बहुत भा गया था. केवल विजातीय होने के कारण विरोध करने का कोई औचित्य नहीं लगा. हम ने विवाह की स्वीकृति दे दी. लेकिन रितेश के  मातापिता ने आरंभ में तो रिश्ता करने से साफ इनकार कर दिया था, लेकिन इकलौते बेटे की जिद के कारण उन्हें घुटने टेकने पड़े और विवाह धूमधाम से हो गया. पारुल अनचाही बहू बन कर ससुराल चली गई.

पारुल अपने मधुर स्वभाव के कारण ससुराल में सब की चहेती बन गई. सब के दिल में स्थान बनाने के लिए उसे बहुत संघर्ष करना पड़ा क्योंकि ऐसा करने में उसे रितेश का सहयोग प्राप्त नहीं हुआ. उस ने पाया कि रितेश का अपने परिवार से तालमेल ही नहीं था. बिना लिहाज के अपने मातापिता को कभी भी कुछ भी बोल देता था. पारुल हैरान होती थी कि कोईर् अपने जन्मदाता से ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता था. उसे समझाने की कोशिश करती तो वह और भड़क जाता था.

धीरेधीरे उस को एहसास हुआ कि दोष उस में नहीं, उस की परवरिश में है. उस के अपने मातापिता के विपरीत, रितेश के मातापिता उस की भावनाओं की कभी भी कद्र नहीं करते थे. अब इतना बड़ा हो गया था, फिर भी उस की बात को महत्त्व नहीं देते थे, जिस का परिणाम होता था कि वह आक्रोश में कुछ भी बोल देता था. कभीकभी पारुल असमंजस की स्थिति में आ जाती थी कि किस का साथ दे, मातापिता की गलती देखते हुए भी बड़े होने का लिहाज कर के उन को कुछ भी नहीं बोल पाती थी.

एक दिन मांबेटे में विवाद इतना बढ़ गया कि रितेश ने तुरंत अलग घर लेने का निर्णय ले डाला. पारुल ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह अपने इरादे से टस से मस नहीं हुआ. वह क्या करती, मां ने भी अपने अहं के कारण उसे नहीं रोका. वह दोनों के बीच पिस गई. अंत में उसे पतिधर्म निभाना ही पड़ा.

अपने परिवार से अलग होने के बाद तो रितेश और भी मनमाना हो गया. जो लड़का विवाह के पहले कभी अपनी मां से ही नहीं जुड़ा, वह अपनी पत्नी से क्या जुड़ेगा. विवाह जैसे प्यारभरे बंधन के रेशमी धागे उसे लोहे की जंजीरें लगने लगीं. आरंभ से ही होस्टल में स्वच्छंद रहने वाले रितेश को विवाह एक कैद लगने लगा.

एक दिन अचानक रितेश का फोन मेरे पास आया, बोला, ‘अपनी बेटी को समझाओ, बच्ची नहीं है अब…’ इस से पहले कि वह अपनी बात पूरी करे, पारुल ने उस के हाथ से फोन ले लिया और कहा, ‘ममा, आप बिलकुल परेशान मत होना. ऐसे ही इस ने बिना सोचेसमझे आप को फोन घुमा लिया. छोटेमोटे झगड़े तो होते ही रहते हैं.’ लेकिन रितेश को पहली बार इतनी अशिष्टता से बात करते हुए सुन कर मैं सकते में आ गई, सोचने लगी कि उन की अपनी पसंद का विवाह है, फिर क्या समस्या हो सकती है.

एक बार मैं ने और मेरे पति ने मन बनाया कि पारुल के यहां जा कर उस का घर देखा जाए. उस ने कईर् बार बुलाया भी था. विचार आते ही हम दोनों पुणे पहुंच गए. वे दोनों स्टेशन लेने आए थे. सालभर बाद हम उन से मिल रहे थे. मिलते ही मेरी दृष्टि पारुल के चेहरे पर टिक गई. उस का चेहरा पहले से अधिक कांतिमय लग रहा था. सुंदर तो वह पहले से ही थी, अब अधिक लावण्यमयी लग रही थी. मुझे याद आया कि जब रितेश के मातापिता ने विवाह से इनकार कर दिया था तो उस का चेहरा कितना सूखा और निस्तेज लगता था, तब हम कितना घबरा गए थे. आज उस को देख कर बहुतबहुत तसल्ली हुई थी.

10 किलोमीटर की दूरी पर उन का घर था. वहां पहुंच कर मैं ने पाया कि वह 2 बैडरूम का घर था. पारुल ने अपने घर को बहुत व्यवस्थित ढंग से सजा रखा था. घर के रखरखाव में तो उसे बचपन से ही बहुत रुचि थी. यह देख कर बहुत संतोष हुआ कि सासससुर के साथ रहते हुए, रितेश का उन से तालमेल न होने के कारण रातदिन  जो विवाद होते थे, वे समाप्त हो गए हैं और वे दोनों आपस में बहुत प्रसन्न हैं.

लेकिन मेरा यह भ्रम शीघ्र ही टूट गया. अगले दिन ही सुबह मैं ने देखा कि रितेश पारुल को छोटीछोटी बातों में नीचा दिखाने से नहीं चूकता था, चाहे उस के खाने का, कपड़े पहनने का या खाना बनाने का ढंग हो. वह उस के किसी भी कार्यकलाप से खुश नहीं रहता था. बातबात में उसे ताने देता रहता था कि उस को कुछ नहीं आता, वह कुछ नहीं कर सकती.

पारुल चुपचाप सुनती रहती थी. रितेश की उस से इतनी अधिक अपेक्षाएं रहती थीं कि उन को पूरा करना उस के वश की बात नहीं थी. उस के जिन गुणों, उस का मासूम लुक देता चेहरा, उस की नाजुकता, उस की मीठी आवाज, के कारण विवाह से पहले उस पर रीझा था, वे सब उस के लिए बेमानी हो गए थे.

हम दोनों अवाक उस की बेसिरपैर की बातें सुनते थे. मैं मन ही मन सोचती रहती थी कि क्या यही प्रेमविवाह की परिणति होती है. रितेश ने जिस से विवाह करने के लिए एक बार अपने मातापिता का गृह तक त्याग कर दिया था, आज उसी का व्यंग्यबाणों से कलेजा छलनी कर रहा था. दामाद था इसलिए उसे क्या कहते, लेकिन, आखिर कब तक?

एक दिन मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं पारुल से बोली, ‘चल, अभी हमारे साथ वापस चल. हम ने देख लिया और बहुत झेल लिया तुम लोगों का तमाशा.’ मेरे बोलते ही रितेश उठ कर घर से चला गया.

पारुल बोली, ‘ममा, मुझे उस की तो आदत पड़ गई है. मेरा उस को छोड़ कर आप के साथ जाना ठीक है क्या? ऐसी बातें तो होती रहती हैं. देखना थोड़ी देर में वह सबकुछ भूल जाएगा और सामान्य हो जाएगा.’ मैं अपनी बेटी पारुल की बात सुन कर दंग रह गई. इतनी सहनशील तो वह कभी नहीं थी पर आत्मसम्मान भी तो कोई चीज होती है. मैं ने कहा, ‘बेटा, तूने उस के इस बरताव के बारे में हमें कभी कुछ बताया नहीं.’

‘क्या बताती ममा, शादी भी तो मेरी मरजी से हुई थी, आप सुन कर करतीं भी क्या? लेकिन इस में रितेश की भी गलती नहीं है, ममा. आप को पता है उस की मां ने बचपन में ही उसे होस्टल में डाल दिया था. उस ने कभी जाना ही नहीं परिवार क्या होता है और उस का सुख क्या होता है. कभी उस की इच्छाओं को प्राथमिकता दी ही नहीं गई, न ही कभी कोई कार्य करने पर उसे प्रोत्साहन के दो बोल ही सुनने को मिले. इसलिए ही ऐसा है. वह दिल का बुरा नहीं है. आज उस की बदौलत ही इतनी अच्छी जिंदगी जी रही हूं. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. आप चिंता न करें.’

लेकिन मुझ पर उस के तर्क का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा था. पारुल ने मेरे चेहरे के भाव पढ़ कर रितेश को फोन कर के घर आने के लिए कहा. और वह आ भी गया. दोनों ने एक ओर जा कर कोईर् बात की. उस के बाद रितेश हमारे पास आया और बोला, ‘सौरी ममापापा.’ हम दोनों का मन यह सुन कर थोड़ा हलका हुआ. हमारे लौटने का दिन करीब होने पर हम पारुल के सासससुर से मिलने गए. उस की सास ने कहा, ‘मेरी बहू पारुल तो बहुत स्वीट नेचर की है. मुझे उस से कोई शिकायत नहीं है.’ हमें यह सोच कर बहुत संतोष हुआ कि कम से कम उस की सास तो उस से बहुत प्रसन्न रहती है.

एक दिन पारुल ने जब मुझे मेरे नानी बनने का समाचार दे कर हमें चौंका दिया तो हम खुशी से फूले नहीं समाए. उस का कहना था कि उस की डिलीवरी के समय मुझे ही उस के पास रहना होगा, नहीं तो रितेश और अपनी सास के विवादों से उस समय वह परेशान हो जाएगी.

नियत समय पर मैं उस के पास पहुंच गई. उस ने चांद सी बेटी को जन्म दिया. दोनों ओर के परिवार वालों के साथ रितेश भी बहुत प्रसन्न हुआ. मैं ने मन में सोचा, पारुल के मां बनने के बाद शायद उस का बरताव उस के प्रति बदल जाए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. मैं जब भी पारुल से उस के स्वभाव के बारे में जिक्र करती, उस का कहना होता, ‘ममा, आप उस की अच्छाइयां भी तो देखो, कितना स्वावलंबी और मेहनती है, मेरा कितना खयाल रखता है. थोड़ा जबान का वह कड़वा है, तो होने दो. अब उस की आदत पड़ गई है, जो मुश्किल से ही छूटेगी.’

मैं मां थी, मुझे तो रितेश के रवैये से तकलीफ होनी स्वाभाविक थी. 2 महीने किसी तरह निकाल कर मैं भारी मन से वापस लौट आई.

प्रिशा के जन्म के बाद पारुल ने नौकरी छोड़ दी और उस के लालनपालन में मग्न रहने लगी. लेकिन रितेश उस के इस निर्णय से बहुत क्षुब्ध रहता था. उस का कहना था कि प्रिशा को क्रैच में छोड़ कर भी तो वह नौकरी जारी रख सकती थी. उस के विचारानुसार उस के लिए सुखसुविधाओं के साधन जुटाने मात्र से उन का उस के प्रति कर्तव्यों की पूर्ति हो सकती है.

इस के विपरीत, पारुल सोचती थी कि कोई भी संस्था बच्चे के पालनपोषण में मां का विकल्प हो ही नहीं सकती. वह नहीं चाहती थी कि उस से दूर रहने के कारण वह भी अपने पापा का पर्याय बने. ऐसा कोई आर्थिक कारण भी नहीं था कि उसे मजबूरी में नौकरी करनी पड़े.

पारुल अपनी बेटी प्रिशा की बढ़ती हुई उम्र की एकएक गतिविधि का आनंद उठाना चाहती थी. उस के लालनपालन में वह किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहती थी. उस की तो पूरी दुनिया ही बेटी में सिमट कर आ गई थी. जो भी देखता, उस के पालने के ढंग को देख कर प्रशंसा किए बिना नहीं रहता था. इस का परिणाम बहुत जल्दी प्रिशा की गतिविधियों में झलकने लगा था. प्रिशा अपने हावभाव से सब का मन मोह लेती थी. मुझे भी यह देख कर पारुल पर गर्व होता था. लेकिन रितेश ने तो उस के विरोध में बोलने का जैसे प्रण ले रखा था.

पारुल की सास तो मेरे सामने उस की प्रशंसा करते हुए नहीं थकती थीं. पोती होने के बाद तो वे अकसर पारुल के पास जाती रहती थीं. अपने बेटे के पारुल के प्रति उग्र स्वभाव से वे भी बहुत दुखी रहती थीं. उन्होंने कई बार पारुल से कहा कि वह उन के साथ आ कर रहे, लेकिन उस ने मना कर दिया. उसे लगा कि रितेश के अकेले की गलती तो है नहीं.

मुझे पारुल पर गुस्सा भी आता था कि आखिर स्वाभिमान भी तो कुछ होता है, पढ़ीलिखी है, अकेले रह कर भी नौकरी कर के प्रिशा को पाल सकती है. पहले वाला जमाना तो है नहीं कि विवश हो कर लड़कियां पति के अत्याचार सहते हुए भी उन के साथ रहें. मैं ने उसे कई बार समझाया, ‘वह सुधरने वाला नहीं है. आदमी दिल का कितना भी अच्छा हो, उसे अपनी जबान पर भी तो कंट्रोल होना चाहिए. तू उस से अलग हो जा, हम तुझे पूरा सहयोग देंगे. मैं रितेश से बात करूं क्या?’ तो उस ने आज जो फोन पर उत्तर दिया, उस ने तो मेरी सोच पर पूर्णविराम लगा दिया था.

‘ममा, शादी का निर्णय मेरा था. आप मेरी चिंता बिलकुल न करें. आगे मेरे भविष्य के लिए मुझे ही सोचने दीजिए. मेरे ही जीवन का प्रश्न नहीं है, मुझे प्रिशा के भविष्य के बारे में भी सोचना है. बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए मांबाप दोनों का उस के साथ होना आवश्यक है. फिर रितेश उसे कितना प्यार करता है और उस के पालनपोषण में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ता है.

‘आप जानती हैं, मेरी ससुराल वाले भी मुझे और प्रिशा दोनों को कितना प्यार करते हैं. रितेश से रिश्ता टूटने पर हम दोनों का उन से भी रिश्ता टूट जाएगा. आखिर उन का क्या कुसूर है? प्रिशा को उस के पापा और दादादादी के प्यार से वंचित रखने का मुझे क्या अधिकार है? प्रिशा को थोड़ा बड़ा हो जाने दो. 3 साल की हो गई है. आज के बच्चे पहले की तरह दब्बू नहीं हैं. देखना, वही अपने पापा का सुधार करेगी.

‘शादी एक समझौता है. यह 2 व्यक्तियों का ही नहीं, 2 परिवारों का बंधन है. इस के टूटने से बहुत सारे लोग प्र्रभावित हो सकते हैं. अभी ऐसी स्थिति नहीं है कि मैं रितेश से संबंध तोड़ लूं. आखिर मैं ने उस से प्यार किया है. उस को आदत पड़ गई है छोटीछोटी बातों पर रिऐक्ट करने की, जो, हालांकि, अर्थहीन होती हैं. कभी न कभी उसे समझ आएगी ही, ऐसा मुझे विश्वास है.’

पारुल ने धाराप्रवाह बोल कर मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया. एक बार तो यह लगा कि मैं उस की मां नहीं, वह मेरी मां है. विवाह के बाद कितनी समझदार हो गई है वह. यह तो मैं ने सोचा ही नहीं कभी कि पति से रिश्ता तोड़ने पर पूरे परिवार से संबंध टूट जाते हैं. मुझे अपनी बेटी पर गर्व होने लगा था. Hindi Family Story

Hindi Love Stories : आ अब लौट चलें

Hindi Love Stories : गजब का आकर्षण था उस अजनबी महिला के चेहरे पर. उस से हुई छोटी सी मुलाकात के बाद दोबारा मिलने की चाह उसे तड़पाने लगी थी. लेकिन यह एकतरफा चाह क्या मृगमरीचिका जैसी नहीं थी? बसस्टौप तक पहुंचतेपहुंचते मेरा सारा शरीर पसीने से तरबतर हो गया था. पैंट की जेब से रूमाल निकाल कर गरदन के पीछे आया पसीना पोंछा, फिर अपना ब्रीफकेस बैंच पर रख कर इधरउधर देखने लगा. ऊपर बस नंबर लिखे थे. मुझे किसी भी नंबर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी.

फिर भी अनमने भाव से कोई जानापहचाना सा नंबर ढूंढ़ने लगा, 26, 212, 50… पता नहीं कौन सी बस मेरे औफिस के आसपास उतार दे. तभी अचानक वहां आई एक महिला से कुछ पूछना चाहा. स्लीवलैस ब्लाउज और पीली प्रिंटेड साड़ी में लिपटी वह महिला बहुत ही तटस्थ भाव से काला चश्मा लगाए एक ओर खड़ी हो गई. महिला के सिवा और कोई था भी नहीं. सकुचाते हुए मैं ने पूछा, ‘‘सैक्टर 40 के लिए यहां से कोई बस जाएगी क्या?’’ ‘‘827,’’ उस का संक्षिप्त सा उत्तर था. ‘‘क्या आप भी उस तरफ जा रही हैं?’’ मैं ने पूछा.

हालांकि मुझे उस अनजान महिला से इस तरह कुछ पूछना तो नहीं चाहिए था परंतु देर तक कोई बस न आती दिखाई दी तो चुप्पी तोड़ने के लिए पूछ ही बैठा. ‘‘जी,’’ उस ने फिर संक्षिप्त उत्तर दिया. आधा घंटा और खड़े रहने के बाद भी कोई बस नहीं आई. 10 बजने वाले थे. देर से औफिस पहुंचूंगा तो कैसे चलेगा. एकदम सुनसान था बसस्टौप. ‘‘क्या सचमुच यहां से बसें जाती हैं?’’ मैं ने मुसकरा कर कहा. हालांकि मैं ने कुछ उत्तर सुनने के लिए नहीं कहा था, मगर फिर भी उस महिला ने कहा, ‘‘आज शायद बस लेट हो गई हो.’’ बस का इंतजार करना मेरी मजबूरी बन चुका था. आसपास कहीं औटो या रिकशा होता तो शायद एक क्षण के लिए भी न सोचता. तभी वही बस पहले आई जिस का इंतजार था. मुझे 3 महीने हो गए थे इस छोटे से शहर में. बसस्टौप से थोड़ी ही दूर मेरा फ्लैट था.

स्कूटर अचानक स्टार्ट न होने के कारण आज पहली बार बस में जाना पड़ा. बसस्टौप पर भी पूछतेपूछते पहुंच पाया था. स्टेट बैंक की नौकरी में मेरा यह पहला अवसर ही था जब इस छोटे से शहर में, जो कसबा ज्यादा था, रहना पड़ा. बच्चों की पढ़ाई की मजबूरी न होती तो शायद उन्हें भी यहीं ले आता और पत्नी का बच्चों के साथ रहना तो तय ही था. बड़ी लड़की को 10वीं की परीक्षा देनी थी और शहरों की अपेक्षा यहां इतनी सुविधा भी नहीं थी. 2 कमरों का छोटा सा फ्लैट बैंक की तरफ से ही मिला हुआ था. पिछले मैनेजर की भी यही मजबूरी थी, उसे भी इस फ्लैट में 3 वर्ष तक इसी तरह रहना पड़ा था.

चैक पास करतेकरते उस दिन अचानक कैबिन के दरवाजे की चरमराहट और खनखनाती सी आवाज ने सारा ध्यान तोड़ दिया, ‘‘लौकर के लिए मिलना चाहती हूं,’’ उस महिला ने कैबिन में घुसते ही कहा. मैं ने सिर उठा कर देखा तो देखता ही रह गया. बहुत ही शालीनता से बौबकट बालों को पीछे करती हुई, धूप का चश्मा माथे पर अटकाते हुए उस ने पूछा. ‘‘जी,’’ मैं ने कहा. कोई और होता तो ऊंचे स्वर में 1-2 बातें कर के अपने मैनेजर होने का एहसास जरूर कराता कि देखते नहीं, मैं काम कर रहा हूं. परंतु कुछ कहते न बना. मैं ने एक बार फिर भरपूर नजरों से उसे देखा और उसे सामने वाली कुरसी पर बैठने का इशारा किया. ‘‘लगता है, हम पहले भी मिल चुके हैं,’’ उस महिला का स्पष्ट सा स्वर था, पर स्वर में न कोई महिलासुलभ झिझक थी न ही घबराहट. ‘‘याद आया,’’ मैं ने नाटक सा करते हुए कहा, ‘‘शायद उस दिन बसस्टौप पर…’’ वह मुसकरा पड़ी. मैं फिर बोला, ‘‘अच्छा बताइए, मैं क्या कर सकता हूं आप के लिए?’’ मैं ने सीधेसीधे बिना समय गंवाए पूछा. ‘‘लौकर लेना चाहती हूं इस बैंक में, कोई उपलब्ध हो तो…?’’ ‘‘आप का खाता है क्या यहां?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘जी हां. पिछले 5 साल से हर बार लौकर के लिए प्रार्थनापत्र देती हूं, परंतु कोई फायदा नहीं हुआ. एफडी करने को भी तैयार हूं…’’ ‘‘क्या करती हैं आप?’’ मैं ने पूछा. ‘‘टीचर हूं, यहीं पास के स्कूल में.’’ मुझे लगा, इसे टालना ठीक नहीं. मैं ने उसे एप्लीकेशन फौर्म के साथ कुछ आवश्यक पेपर पूरे कर के कल लाने को कहा. उस असाधारण सी दिखने वाली महिला ने अपने साधारण स्वभाव से ऐसी अमिट छाप छोड़ दी कि मैं प्रभावित हुए बिना न रह सका. इस छोटी सी पहली मुलाकात से हम दोनों चिरपरिचित की तरह विदा हुए. कितने ही लोग आतेजाते मिलते रहते थे, परंतु इस महिला के आगे सब रंग ऐसे फीके पड़ गए कि मानसपटल पर किसी भी काल्पनिक स्वप्नसुंदरी की छवि भी शायद धूमिल पड़ जाए. दूसरे दिन ही मैं ने उसे लौकर उपलब्ध कराने की जैसे ठान ही ली और सारी औपचारिकताएं पूरी कर लीं. 11 बजे के बाद तो लगातार टकटकी बांधे बेसब्री से निगाहें दरवाजे पर अटकी रहीं. पौने 2 बजे उस के बैंक में आने से ही अटकी निगाहों को थोड़ी राहत मिली.

चेहरे के सभी भावों को छिपा कर दूसरे कामों में अनमने भाव से लगा रहा, परंतु तिरछी निगाहें मेरी अपनी कैबिन की चरमराहट पर ही थीं. ‘‘नमस्ते,’’ हर बार की तरह संक्षिप्त शब्दों में उस ने मुसकरा कर कहा और कागजात देती हुई बोली, ‘‘ये लीजिए सारे पेपर्स, राशनकार्ड, फोटो और जो आप ने मंगवाए थे.’’ ‘‘बैठिए, प्लीज,’’ उस के हाथ से पेपर्स ले कर मैं ने पूछा, ‘‘कुछ लेंगी आप?’’ ‘‘नो, थैंक्यू. बच्चे स्कूल से घर आने वाले हैं, स्कूल में ही थोड़ा लेट हो गई थी. पहले सोचा कि कल आऊंगी. फिर लगा, न जाने आप क्या सोचेंगे.’’ थोड़ीबहुत खानापूर्ति कर उसे लौकर दिलवा दिया और अपना ताला लौकर में लगाने को कहा, जैसा कि नियम था. मुसकरा कर वह आभार प्रकट करती चली गई. एक सवेरे जौगिंग करते हुए मैं पार्क में पहुंचा तो वह लंबे कदमों से चक्कर लगाने में लीन थी.

मुझे देख कर एक क्षण के लिए रुकी भी, शायद पहचानने का प्रयत्न कर रही हो, पर शुरुआत मैं ने ही की, बोला, ‘‘मेरा नाम…’’ ‘‘जानती हूं,’’ मेरी बात काटती हुई हाथ जोड़ कर बहुत ही शिष्ट व्यवहार से वह बोली, ‘‘आप को भला मैं कैसे भूल सकती हूं. 5 साल से जो नहीं हो पाया वह 2 ही दिन में आप ने कर दिया.’’ उस के पहने हुए नीले रंग के ट्रैक सूट और महंगे जूते उस की पसंद और छवि को दोगुना कर रहे थे. इस शहर में तो इन वस्तुओं का उपलब्ध होना संभव नहीं था, परंतु इन सब के बावजूद बिना किसी मेकअप के उस के चेहरे में गजब की कशिश थी. कोई भी साहित्यकार मेरी आंखों से देखता तो शायद तारीफ में इतिहास रच डालता. ‘‘यहां कैसे, आप? कहीं पास ही में रहती हैं क्या?’’ मैं ने पूछा. ‘‘जी, सामने वाली सोसाइटी में. घूमतेघूमते इधर निकल आई. रविवार था. कहीं जाने की जल्दी तो थी नहीं.

एक ही पार्क है यहां.’’ बातोंबातों में ही उस ने बताया कि 2 छोटे बेटे हैं, पति आर्मी में मेजर हैं और दूसरी जगह पोस्टेड हैं. छुट्टियों में आते रहते हैं. समय बिताने के लिए उस ने यह सब शौक रखे हैं, वरना नीरस से जीवन में क्या रखा है. न जाने क्यों, पहले दिन से ही उस के प्रति आकर्षण था और उस का प्रत्येक हावभाव मेरे दिमाग पर अजीब सी मीठी कसक छोड़ता रहा. मुझे उस से मिलने का नशा सा हो गया. रविवार का मैं बहुत ही बेसब्री से इंतजार करता रहता और वह भी पार्क में आती रही. हम दोनों पार्क के 2 चक्कर तेजी से लगाते, फिर तीसरी बार में इधरउधर की बातें करते रहते. मैं बैंक की बताता तो वह अपने स्कूल के शरारती बच्चों के बारे में. उस का इस तरह नियमित समय से आना लगभग तय था. चेहरे की मुसकराहट तथा भाव से उस का भी मेरे प्रति झुकना कोई असामान्य नहीं लगा. एक दिन अपना उम्र प्रमाणपत्र सत्यापित कराने बैंक में आई तो उस में लिखी उम्र देख कर मैं हैरान रह गया.

‘‘1964 का जन्म है आप का, लगता नहीं कि आप 38 की होंगी,’’ मैं ने कहा तो वह मुसकरा कर रह गई. ‘‘क्यों?’’ वह सकुचाती सी बोली, ‘‘क्या लगता था आप को?’’ शायद हर नारी की तरह वह भी 20-22 ही सुनना चाहती हो. मैं बोला, ‘‘कुछ भी लगता हो, परंतु आप 38 की नहीं लगतीं.’’ उस के चेहरे की लालिमा मुझ से छिपी नहीं रही. इस लालिमा को देखने के लिए ही तो मैं लालायित था. ‘‘शायद इसीलिए ही लड़कियां अपनी उम्र बताना पसंद नहीं करतीं,’’ मैं बोला. महिला के स्थान पर लड़की शब्द का प्रयोग पता नहीं मैं किस बहाव में कर गया, परंतु उसे अच्छा ही लगा होगा. मैं ने फिर दोहराया, ‘‘परंतु कुछ भी कहिए, मिसेज शर्मा, आप 38 की लगती नहीं हैं,’’ मेरे द्वारा चुटकी लेते हुए कही गई इस बात से उस के सुर्ख चेहरे पर गहराती लालिमा देखते ही बनती थी. ‘‘आप मर्दों को तो छेड़ने का बहाना चाहिए,’’ उस ने सहज लेते हुए दार्शनिक अंदाज में मुसकराते हुए कहा. मुझे लगा वह बुरा मान गई है,

इसलिए मैं ने कहा, ‘‘माफी चाहता हूं, यदि अनजाने में कही यह बात आप को अच्छी न लगी हो.’’ ‘‘नहीं, मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगा. आप को जो ठीक लगा, आप ने कह दिया. मेरे सामने कह कर स्पष्टवादिता का परिचय दिया, पर पीछे से कहते तो मैं क्या कह सकती थी,’’ वह बोली. इतनी गंभीर बात को सहज ढंग से निबटाना सचमुच प्रशंसनीय था. यह सिलसिला जो पार्क से प्रारंभ हुआ था, पार्क में ही समाप्त होता नजर आने लगा, क्योंकि यह क्रम उस दिन के बाद आगे नहीं चल सका. मुझे लगा वह मेरी उस बात का बुरा मान गईर् होगी. अब हर सवेरे मैं उस पार्क में जा कर एक चक्कर लगाता, 1-2 एक्सरसाइज करता और देर तक इधरउधर शरीर हिला कर व्यायाम का नाटक करता. बैंक में कैबिन के बाहर ही गतिविधियों पर पैनी नजरें गड़ाए रहता, परंतु उस से फिर पूरे 2 सप्ताह न बैंक में मुलाकात हो सकी न पार्क में. शाम होती तो सुबह का इंतजार रहता और सैर के बाद तो बैंक में आने का इंतजार.

3 दिन लगातार बसस्टौप पर भी जाता रहा. मेरे मन की स्थिति एकदम पपीहा जैसी हो गई जो सिर्फ बरसात का इंतजार करता रहता है. उस का पता ले कर एक दिन उस के घर जाने का मन भी बनाया पर लगा, यह ठीक नहीं रहेगा. वह स्वयं क्या सोचेगी, उस के बच्चों को क्या कहूंगा. वह क्या कह कर मेरा परिचय कराएगी और कोशिशों के बावजूद नहीं जा पाया. बैंक में उस के पते के साथ फोन नंबर न होने का आज सचमुच मुझे बहुत ही क्षोभ हुआ. कम से कम फोन तो इस मानसिक अंतर्द्वंद्व को कम करता. चपरासी के हाथ अकाउंट स्टेटमैंट के बहाने उस को बैंक में आने का संदेशा भिजवाया. रविवार की इस सुबह ने मुझे बेहद मायूस किया. इस पूरे आवास काल में पहला रविवार था कि घूमने का मन ही नहीं बन सका. दरवाजे पर अचानक बजी घंटी ने दिल के सारे तार झंकृत कर दिए. इतनी सुबह तो कोई नहीं आता. हो न हो मिसेज शर्मा ही होंगी. लगता है कल चपरासी ठीक समय से पहुंच गया होगा,

यही सोचता मैं जल्दी से स्वयं को ठीक कर के जब तक दूसरी बार घंटी बजती, दरवाजे पर पहुंच गया. सामने अपनी पत्नी को पा कर सारा नशा काफूर हो गया. मेरा चेहरा उतर गया. ‘‘क्यों, हैरान हो गए न,’’ वह हांफते हुए बोली, ‘‘बहुत ही मुश्किल से मकान मिला है,’’ वह अपना सूटकेस भीतर रखते हुए बोली. ‘‘अरे, बताया तो होता, कोई फोन, चिट्ठी…’’ मैं ने कहा. ‘‘सोचा, आप को सरप्राइज दूंगी, जनाब क्या करते रहते हैं इस शहर में. अचानक बच्चों की छुट्टियां हुईं तो उन्हें मायके छोड़ सीधी चली आई. बताने का मौका कहां मिला.’’ मेरा मन उस के आने के इस स्वागत के लिए तैयार तो नहीं था परंतु चेहरे के भावों में संयतता बरतते हुए मुझे सामान्य होना ही पड़ा. फिर भी इस स्थिति को पचाते शाम हो ही गई. पत्नी के 3 दिन के इस आवासकाल में मैं ने हरसंभव प्रयास किया कि नपीतुली बातें की जाएं.

जब भी बाहर घूमने के लिए वह कहती तो सिरदर्द का बहाना बना कर टाल जाता. बाहर खाने के नाम पर उस के हाथ का खाना खाने की जिद करता. मुझे भय सा व्याप्त हो चुका था कि कहीं उस के साथ मिसेज शर्मा मिल गईं तो क्या करूंगा. क्या कह कर हमारा परिचय होगा. मेरे मन में अजीब सी शंका ने घर कर रखा था. मेरी पत्नी उस के स्वभाव, रूप को देख कर क्या सोचेगी. इसी भय के कारण मैं ने 3 दिन की छुट्टी ले ली थी. मन का भूत साए की तरह पीछे लगा रहा और यह तब तक सताता रहा जब तक मैं ने अपनी पत्नी को जाते वक्त बस में न बिठा दिया. क्या अच्छा है, क्या बुरा है, यह समझना भी नहीं चाहता था. अगली शाम मन का एकाकीपन दूर करने के लिए मैं टीवी देखता चाय की चुसकियां ले ही रहा था कि दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोला तो सामने मिसेज शर्मा को पाया.

दिल धक से रह गया. इच्छा के अनुकूल चिरपरिचिता को सामने पा कर सभी शब्दों और भावों पर विराम सा लग गया. बहुत ही कठिनाई से पूछा, ‘‘आप…’’ उस के हाथ में रजनीगंधा के फूलों का बना सुंदर सा बुके था. काफी समय बाद उसे देखा था. ‘‘जी,’’ वह भीतर आते हुए बोली, ‘‘कल बैंक गई तो पता चला आप कई दिनों से छुट्टी पर हैं. सोचा, आप से मिलती चलूं,’’ यह कह शालीनता का परिचय देते हुए उस ने मेरे हाथों में बुके पकड़ा दिया. ‘‘वह…क्या है कि…’’ मुझ से कहते न बना, ‘‘आप को मेरा पता कैसे मिला?’’ मैं ने हकलाते हुए बहुत बेहूदा सा प्रश्न पूछा, जिस का उत्तर भी मैं जानता था, ‘‘आइए, मैं ने उस पर भरपूर नजर डालते हुए आगे कहा, ‘‘बैठिए न. कुछ पिएंगी, चाय बनाता हूं. चलिए, थोड़ीथोड़ी पीते हैं.’’ ‘‘नहीं, बस, नीचे मेजर साहब गाड़ी में मेरा इंतजार कर रहे हैं.’’ ‘‘मेजर साहब…’’ मैं ने अचरज से पूछा. ‘‘हां, मेरे पति. उन का तबादला इसी शहर में हो गया है,’’ चेहरे पर बेहद खुशी लाते हुए बोली, ‘‘अब वे यहीं रहेंगे हमारे साथ. पूरा महीना लग गया तबादला कराने में. सुबह से रात तक भागदौड़ में बीत गया,

यहां तक कि सैर, स्कूल सभी को तिलांजलि देनी पड़ी,’’ कह कर वह चली गई. यह देखसुन कर मेरे शरीर का खून निचुड़ गया. स्वयं को संयत करता हुआ सोफे पर जा बैठा. आखिर इतनी तड़प क्यों हो गई थी मन में एक अनजान महिला के प्रति. क्यों इतनी उत्कंठा से टकटकी बांधे इंतजार करता रहा. यह अंतिम आशा भी निर्मूल सिद्ध हुई. क्या है यह सब, मैं पूरी ताकत से लगभग चीखते हुए मन ही मन बुदबुदाया. इतनी मुलाकातें… ढेरों बातें, लगता था वह प्रति पल करीब आती जा रही है. क्यों वह ऐसा करती रही? इतनी शिष्टता और आत्मीयता तो कोई अपने भी नहीं करते.

यदि ऐसे ही छिटक कर दूर होना था तो पास ही क्यों आई? ऐसा संबंध ही क्यों बनाया जिस के लिए मैं अपनी पत्नी से भी ठीक व्यवहार न कर सका तथा जिसे पाने की चाह पत्नी को भेजने की चाह से कहीं अधिक बलवती हो उठी थी? 2-4 बार की चंद मुलाकातों में क्याक्या सपने नहीं बुन डाले. परंतु मुझे लगा यह सब एकतरफा रास्ता था. उस ने कहीं, कुछ ऐसा नहीं किया जो अनैतिक हो, सिर्फ अनैतिकता मेरे विचारों और संवेदनाओं में थी, शायद संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने की. मैं रातभर विरोधाभास के समुद्र में डूबताउतराता रहा और अपने खोए हुए संबंधों को फिर स्थापित करने की दृढ़ इच्छा ने मुझे सवेरे की पहली बस से अपने परिवार के पास भिजवा दिया. Hindi Love Stories 

Romantic Story In Hindi : दिल को धड़कने दो

Romantic Story In Hindi : अपनी आंखों की बड़ीबड़ी पुतलियों को और बड़ा करते हुए सलोनी अपनी मम्मी नूपुर से बोली, “मम्मी, मैं क्या 5 हजार रुपए की यह साड़ी खरीदूंगी? मम्मी, शादी जीवन में एक बार होती है.”

नूपुर शांत स्वर में बोली, “सलोनी, तुम ने कल ही तो बेटा 20-20 हजार रुपए की साड़ियां खरीदी हैं. जरूरी नहीं न हर कपड़ा इतना महंगा ही लो.”

सलोनी गुस्से में बोली, “हां, मेरे कपड़ों और ज्वैलरी की बात आते ही आप को पैसे याद आते हैं. अब मुझे गुस्सा न दिलाइए, मेरा दिल बहुत तेजी से धड़कने लगता है.”

नूपुर को समझ नहीं आ रहा था कि अपनी लाड़ली को कैसे समझाए. सलोनी नूपुर के दिल की धड़कन थी, वह कैसे उस पर गुस्सा कर सकती थी.

22 वर्ष की सलोनी अभी पूरी तरह से विवाह के लिए तैयार नहीं हुई थी. मगर हालात कुछ ऐसे बन गए थे कि नूपुर और सचिन को सलोनी का विवाह इतनी कम उम्र में करना पड़ रहा था.

सलोनी नूपुर और सचिन की इकलौती लाड़ली थी. सचिन और नूपुर के विवाह के 10 वर्षों के बाद सलोनी उन की जिंदगी में आई थी. अपनी परी जैसी बेटी को देख कर नूपुर और सचिन बेहद खुश थे. मगर नूपुर और सचिन की खुशियों को तब ग्रहण लग गया जब डाक्टर ने उन्हें बताया कि उन की बेटी की हार्ट बीट बेहद स्लो है. सलोनी को कंजेनिटल हार्ट डिफैक्ट है. अगर सलोनी के ह्रदय के अंदर पेसमेकर इंप्लांट नहीं किया तो उस की दिल की धड़कन कभी भी रुक सकती है.

बेहद मुश्किलभरे दिन थे सचिन और नूपुर के लिए. आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से पूरे परिवार के सामने ढेर सारे चैलेंजेज थे. मगर फिर भी सचिन और नूपुर ने सलोनी के लिए हर चैलेंज का सामना किया. सलोनी के हार्ट में पेसमेकर इंप्लांट हो गया था. मगर सलोनी की ग्रोथ बाकी बच्चों से थोड़ी स्लो थी. ज्यादा भागदौड़ वाले कार्य शुरू में डाक्टर ने उसे करने से मना कर रखा था.

सलोनी का शहर के सब से महंगे स्कूल में एडमिशन हो गया था. सलोनी की बड़ीबड़ी आंखों का भोला चितवन, गोरा रंग जो सलोनी के अनेमिक होने के कारण अधिक ही गोरा लगता था, घने घुंघराले बाल और जो सलोनी को सब से अधिक आकर्षक बनाते थे वे थे सलोनी के गालों के डिंपल.

धीरेधीरे सलोनी अपने स्कूल में बैटरी डौल के नाम से मशहूर हो गई थी. जब दूसरे बच्चे स्पोर्ट्स के पीरियड में खेलते थे तो सलोनी टुकुरटुकुर बैठ कर देखती रहती थी. जब बच्चे सलोनी से पूछते तो वह भोलेपन से बोल देती, ‘मेरे अंदर बैटरी है न. तुम लोगों जैसी नहीं हूं.”

सलोनी बच्ची थी, मगर सब समझती थी. उसे लगने लगा था कि सहानुभूति बटोर कर उस की जिंदगी आराम से कट जाएगी.

जैसेजैसे सलोनी बड़ी होती गई, स्कूल में सलोनी के बारे में अलगअलग कहानियां प्रचलित होती गईं. इसलिए जब सलोनी 12 वर्ष की हुई तो सचिन और नूपुर ने उस का स्कूल बदल दिया था.

सलोनी अब बड़ी हो रही थी. उसे समझ आने लगा था कि थोड़ा सा ड्रामा कर के जिंदगी आराम से कट जाएगी. इसलिए ड्रामा करतेकरते सलोनी सच में ही मानने लगी थी कि उसे वास्तव में प्रौब्लम है.

वह हमेशा अपने मम्मीपापा से कहती, ‘मैं हमेशा अपनेआप को दूसरों से अलग लगती हूं. हर काम करने से पहले मुझे अपने दिल के बारे में सोचना पड़ता है.” उस के दिल में डर बैठ गया था कि वह औरों से अलग है.

नूपुर और सचिन सलोनी को कितना भी समझाते थे मगर सलोनी को हमेशा प्रकृति से यह शिकायत बनी रही थी. मन ही मन सलोनी ने हार मान ली थी. सलोनी का जो मन करता वह वो करती. अगर सचिन या नूपुर टोकते तो सलोनी अपने दिल का रोना ले कर बैठ जाती. 15 वर्ष की होतेहोते सलोनी के इर्दगिर्द प्रशंसकों की एक लंबी कतार रहती थी.

सलोनी को पता था कि ये लड़के तभी तक उस के आसपास बने रहेंगे जब तक उन्हें उस की असलियत पता नहीं चलेगी. इसलिए सलोनी हर लड़के से दोस्ती करती, उस के साथ घूमतीफिरती और फिर जैसे ही कोई थोड़ा और करीब आने की कोशिश करता, सलोनी झट से अपना बौयफ्रैंड बदल लेती थी.

नूपुर को समझ आ गया था कि सलोनी का ध्यान पढ़ाई से हट कर इधरउधर भटक रहा है.

जब भी सचिन या नूपुर सलोनी को समझाने की कोशिश करते तो सलोनी फौरन बोल उठती, ‘अगर मैं उन्हें सचाई बता दूंगी तो मैं अकेली पड़ जाऊंगी. क्या मुझे खुश रहने का हक नहीं है. खेल नहीं सकती हूं, भागदौड़ नहीं सकती हूं तो क्या घूमफिर भी नहीं सकती. मम्मीपापा, आप की बेटी के अंदर दिल नहीं, बैटरी है और बैटरी में कोई भाव नहीं होते हैं.’

चाह कर भी नूपुर और सचिन अपनी बेटी को रोक नहीं पा रहे थे. सलोनी का परीक्षा परिणाम अकसर निराशाजनक ही रहता था.

सचिन ने सलोनी का पैसों के बल पर एक प्राइवेट कालेज में ऐडमिशन करा दिया था. वहां पर ही सलोनी की जिंदगी में उत्कर्ष आया था. उत्कर्ष उसी कालेज में अंतिम वर्ष का छात्र था. सलोनी उत्कर्ष को भी घुमाती रही और फिर जैसे ही उत्कर्ष ने आगे बढ़ना चाहा, सलोनी ने उसे इग्नोर करना शुरू कर दिया था.

मगर उत्कर्ष पीछे नहीं हटा तो सलोनी ने उत्कर्ष को सब सच बता दिया था. उत्कर्ष को सलोनी दिल से भा गई थी और उसे कालेज के बाद पारिवारिक बिजनैस और विवाह दोनों ही करने थे. उत्कर्ष के परिवार ने उत्कर्ष को बहुत समझाया था मगर आखिर में उन्हें उत्कर्ष की जिद के आगे झुकना पड़ा था.

इधर, सचिन और नूपुर इतनी जल्दी सलोनी के विवाह के पक्ष में नहीं थे. मगर उन्हें पता था कि उत्कर्ष से अच्छा रिश्ता सलोनी को शायद आगे न मिल पाए.

सलोनी की खूबसूरती से सब प्रभावित थे, मगर सब सलोनी की हार्ट प्रौब्लम के कारण डरते थे.

आज सलोनी और उत्कर्ष विवाह के बंधन में बंधने जा रहे थे. सचिन और नूपुर ने विवाह में दिल खोल कर खर्च किया था. उन्हें सपने में भी भान नहीं था कि उन की सलोनी को उत्कर्ष जैसा जीवनसाथी मिल जाएगा.

उधर उत्कर्ष के रिश्तेदारों को यह लग रहा था कि उत्कर्ष के परिवार ने दहेज के लालच में ये सब किया है. पहली रात उत्कर्ष और सलोनी ने बातों में ही काट दी थी. अगले दिन सलोनी जब तैयार हो कर बाहर आई तो महिलाओं में कानाफूसी होने लगी थी.

उत्कर्ष की ताईजी सलोनी को मुंहदिखाई देते हुए बोली, “बहू तो एकदम बैटरी वाली गुड़िया जैसी लग रही है.”

कोई कहता, ‘है तो बहुत खूबसूरत लेकिन एकदम सफेद है जैसे एनिमिक हो.’

सलोनी को सब समझ आ रहा था कि अनजाने में सब लोग उसे सुना रहे हैं. रात को जब उत्कर्ष ने सलोनी के करीब आना चाहा तो सलोनी घबरा गई.

सलोनी बोली, “तुम तो जानते तो हो न कि मेरे हार्ट में पेसमेकर है. मैं ज्यादा एक्सर्ट नहीं कर सकती हूं.”

उत्कर्ष हंसते हुए बोला, “ऐसा कुछ नहीं हैं पगली, तुम एकदम नौर्मल हो और सब कर सकती हो.”

मगर सलोनी तैयार नहीं हो पा रही थी. देखते ही देखते 10 दिन बीत गए थे. मगर उत्कर्ष अब तक भी सलोनी को विश्वास नहीं दिला पा रहा था.

सलोनी को अब छोटेछोटे काम करने पड़ रहे थे. सलोनी की सास उस से कहती, ‘बेटा, धीरेधीरे अगर घर के तौरतरीके समझोगी तो तुम्हें यह घर अपना लगेगा.’

सलोनी की ससुराल वाले चाहते थे कि सलोनी उन का बिजनैस जौइन कर ले. मगर सलोनी कहती, ‘न बाबा न, मैं इतना स्ट्रैस नहीं ले सकती हूं.’

एक रोज घर पर बहुत मेहमान आए हुए थे. कामवाली नहीं आई, तो सलोनी अपनी सास के कहने पर रसोई में मदद करने लगी और फिर एकाएक चक्कर खा कर गिर पड़ी.

पूरे घर में कुहराम मच गया. सलोनी की सास दोषी की तरह खड़ी हुई थी और सलोनी के ससुर अपने बेटे उत्कर्ष से कह रहे थे, ‘इसीलिए मैं इस शादी के खिलाफ था. क्या सारी उम्र तुम इस मूर्ति के साथ गुजार लोगे?’

उत्कर्ष ने अपने पापा की बात का कोई जवाब नहीं दिया. डाक्टर आया और चैकअप कर के बोला, “ऐसी कोई घबराने वाली बात नहीं है.”

“शायद किसी बात को ले कर इन के मन में स्ट्रैस है.”

सलोनी के मम्मीपापा आए और कुछ दिनों के लिए सलोनी को अपने साथ ले कर चले गए.

सालोनी की मम्मी बेहद चिंतित थी और अपने पति से बोली, “इसी कारण मैं सालोनी का विवाह नहीं कराना चाहती थी. जितनी अच्छी देखभाल हम कर सकते हैं, कोई भी नहीं कर सकता है.”

सचिन बोले, “हमारे बाद कौन सालोनी की देखभाल करेगा, यह सोच कर मैं ने सालोनी की जिद मान ली थी. उत्कर्ष वैसे भी बहुत अच्छा लड़का है, ज्यादा सोचो मत.”

घर आ कर सलोनी फिर से चहकने लगी. सारा दिन वह अपने कमरे में आराम करती और फिर शाम को सजधज कर घूमने के लिए निकल जाती थी.

जब भी उत्कर्ष सलोनी को फ़ोन करता, सलोनी एक ही बात कहती, “उत्कर्ष, मैं ने तो पहले भी कहा था कि मैं शादी के लायक नहीं हूं. हम क्या ऐसे ही नहीं रह सकते?”

उत्कर्ष को सलोनी के डर का कारण समझ नहीं आ रहा था.

उधर उत्कर्ष के घरवाले उस पर दबाव डाल रहे थे. उन के अनुसार ऐसे रिश्ते का क्या फायदा जो, बस, एकतरफा हो.

फिर उत्कर्ष ने बहुत सोचसमझ कर एक कार्डियोलौजिस्ट से बात करने की सोची. उत्कर्ष को खुद लगने लगा था कि शायद सलोनी से शादी कर के उस ने गलती कर दी है.

जब उत्कर्ष ने डाक्टर सुबोध को पूरी बात बताई तो डाक्टर हंसने लगे और बोले, “तुम पहले अपनी पत्नी को मेरे पास ले कर आओ.”

“मैं उन्हें समझाऊंगा कि वे एक नौर्मल जिंदगी जी सकती हैं. और एक डाक्टर होने के नाते एक सलाह और दूंगा, उन्हें एक अच्छे काउंसलर की भी जरूरत है. उन की काउंसलिंग करानी जरूरी है.”

उत्कर्ष ने जब यह बात सचिन और नूपुर को बताई तो उन्हें भी लगा कि शायद डाक्टर और काउंसलर की मदद से सलोनी के दिल का डर निकल जाए.

डाक्टर के पास जब सलोनी गई तो बस यह ही बोल रही थी, “मेरा दिल बहुत तेजी से धड़क रहा है. मेरे पेसमेकर लगा हुआ है, मैं दूसरों से अलग हूं.”

डाक्टर ने आराम से पूछा, “तुम से किस ने कहा, सलोनी?”

सलोनी बोली, “अरे मैं बहुत जल्दी थक जाती हूं. मैं तो शादी भी नहीं करना चाहती थी मगर अब लगता है गलती कर दी है.”

डाक्टर ने सलोनी के सारे टैस्ट करवाए, सब नौर्मल थे. जब डाक्टर ने उत्कर्ष और सलोनी को यह बात बताई. सलोनी बोली, “आप को नहीं पता, छोटीछोटी बातों से ही मेरा दिल कितनी तेजी से धड़कता है.”

डाक्टर ने उत्कर्ष को समझाया कि सलोनी के अंदर एक डर बैठ गया है. उसे डाक्टर से ज्यादा काउंसलिंग की जरूरत है.

उत्कर्ष के घर में सब को लगने लगा था कि सलोनी को दिल के साथसाथ दिमाग की भी बीमारी है.

उत्कर्ष अंदर ही अंदर बेहद तनाव महसूस करता था. जिस सलोनी के लिए उस ने अपने परिवार से बगावत की, वह सलोनी ही उत्कर्ष के साथ आने को भी तैयार नहीं थी.

सलोनी को लगने लगा था कि अगर उस ने पतिपत्नी का रिश्ता निभाने की कोशिश की तो उसे हार्ट अटैक हो जाएगा. उत्कर्ष उसे जितना भी समझाता वह उतना ही उलटासीधा बोलने लगती थी. सलोनी इस हद तक चली गई थी कि उसे लगने लगा था कि उत्कर्ष ने केवल फिजिकल रिलेशनशिप के लिए शादी की है.

काउंसलर के पास भी सलोनी जाने को तैयार न थी. उत्कर्ष मगर हार मानने वालों में से नहीं था.

उस ने सलोनी से कहा, “तुम हमेशा अपने घर में ही रहना, मगर एक बार मेरे कहने पर चलो तो सही.”

पहले दिन सलोनी ने काउंसलर से रूखीरूखी बात की. दूसरे दिन भी सलोनी उड़ीउड़ी रही, मगर एक हफ्ते के भीतर काउंसलर से सलोनी खुलने लगी थी.

काउंसलर ने सलोनी को ऐसे कुछ लोगों से मिलवाया जो सलोनी जैसी स्थिति से ही गुजर रहे थे मगर एकदम सामान्य जिंदगी व्यतीत कर रहे थे.

सलोनी उन लोगों से बातें कर के और मिल कर थोड़ी संयत हो गई थी. फिर काउंसलर ने सलोनी के मम्मीपापा को मिलने के लिए बुलाया.

जब नूपुर और सचिन गए तो काउंसलर ने उन्हें आड़ेहाथों लेते हुए कहा, “आप की बेटी की इस हालत के आप ही जिम्मेदार हैं. एक छोटी सी समस्या को इतना बढ़ा दिया गया कि यह प्रौब्लम अब दिल की न हो कर दिमाग की हो गई है.”

“कोई जरूरत नहीं है सलोनी के साथ हमदर्दी दिखाने की. उस के साथ थोड़ी सख्ती कीजिए, तभी वह आगे बढ़ पाएगी.”

काउंसलर के कहे अनुसार अब सचिन और नूपुर ने सलोनी को लाड़ करना कम कर दिया था. अपने छोटेछोटे काम अब सलोनी खुद ही करने लगी थी. शुरूशुरू में सलोनी को वहम होता कि उस का दिल तेजी से धड़क रहा है मगर धीरेधीरे सलोनी काउंसलर की मदद से आत्मनिर्भर होती चली गई.

अब सलोनी को उत्कर्ष का प्यार भी समझ आने लगा था. अंदर से सलोनी का मन था कि उत्कर्ष उसे वापस ले कर जाए मगर सलोनी का अहंकार आड़े आ रहा था. पिछले 14 दिनों से उत्कर्ष का फ़ोन आना भी कम हो गया था. सलोनी ने अपना सामान पैक किया और उत्कर्ष के घर पहुंच गई.

उत्कर्ष के परिवार ने ऊपरी मन से ही सलोनी का स्वागत किया. वे चाहते थे कि उत्कर्ष सलोनी को छोड़ कर आगे बढ़ जाए. मगर रात में उत्कर्ष सलोनी को देख कर खुशी से पागल हो गया. उत्कर्ष सलोनी को चुंबन करतेकरते अचानक से रुक गया.

सलोनी बोली, “क्या हुआ?”

उत्कर्ष झिझकते हुए बोला, “तुम्हारी हार्ट बीट ऊपरनीचे न हो जाए.”

सलोनी उत्कर्ष के गले लगते हुए बोली, “अब तो इस दिल को धड़कने दो. और तुम रहोगे न मेरे साथ मेरी धड़कन संभालने के लिए.” Romantic Story In Hindi 

Social Story : अपहरण – क्या ज्योतिष और पाखंड पर भरोसा करना सही है?

Social Story : ‘‘मुझे पूरा विश्वास था कि हमारा बच्चा जरूर मिलेगा. आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो 10 साल बाद ही सही, लेकिन मिलेगा जरूर. उसे कुछ नहीं हो सकता. वह जिंदा रहेगा और एक न एक दिन हम उसे जरूर पा जाएंगे,” यह किसी पागल का प्रलाप नहीं, एक ऐसे पिता का कहना था, जिस का साढ़े 5 माह का नन्हा अबोध पुत्र लापता हो गया.

नन्हा शिशु जिसे अभी हंसना भी नहीं आया था, उसे कोई क्यों और कहां ले गया, इस की किसी को जानकारी न थी. पुलिस को सूचना दी गई. सीसीटीवी खंगाले गए. यह तो पता चल गया कि उसे कोई गोदी में ले जा रहा है, पर वह कौन है, यह पता नहीं चल पा रहा था.

जैसाकि अकसर होता है, परिस्थितियों से विवश आदमी ज्योतिषियों के चक्कर में उलझ जाता है. यही अबोध शिशु सिद्धार्थ के दुखी मातापिता के साथ भी हुआ. ज्योतिषियों ने उन से खूब पैसा लूटा और किसी ने कहा कि बच्चा फरीदाबाद में मिलेगा, तो किसी ने कहा ग्वालियर में. जिस का जो मन आता वह कह देता और मातापिता वहीं जा पहुंचते, पर निराश हो कर लौट आते. हर व्यक्ति उन के लिए इस समय महत्त्वपूर्ण हो गया था.

दोनों पढ़ेलिखे थे पर इस तरह की घटना के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने बुद्धि, विवेक और धैर्य से काम लेना शुरू किया. टीवी चैनलों और अखबारों के दफ्तरों के चक्कर काटने शुरू किए. पत्रकारों ने उन से बात सहानुभूति से की पर उन के करनेधरने के बावजूद भी कुछ नहीं हुआ. पुलिस उन दिनों विधानसभा चुनावों में लगी थी और इसलिए व्यस्त थी. हर रोज कहीं न कहीं मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की रैली होती थी और सारी फोर्स वहां लग जाती थी.

जिस दिन यह घटना हुई, सुबह 10 बजे पति के दफ्तर चले जाने के बाद सिद्धार्थ की मां निर्मला उसे अंदर सुला कर बाहर कपड़े धो रही थी. इसी दौरान उस के पड़ोस के फ्लैट की लङकी जो लगभग 8 साल की थी, आ कर पूछा, ‘‘आंटी, मैं भैया को उठा लूं गोद में?’’ वह पहले भी यदाकदा उसे उठा कर खिलाया करती थी, सो कोई नई बात नहीं थी.

‘‘हां, जब तक मैं इस का दूध बनाऊं, तुम इसे खिलाओ,’’ यह कह कर निर्मला अंदर चली आई. तभी उन के फ्लैट के सामने आए एक बुजुर्ग से मकानमालिक की एक नौकरानी ने उस बच्ची से कहा, ‘‘लाओ, सिद्धार्थ को मैं घुमा लाऊं.’’

यह नौकरानी 22-23 साला युवती थी, जिसे आए अभी कुल 4-5 दिन ही हुए थे. फ्लैट मालिक भी 2 माह पहले ही आए थे. उन्होंने अभी कुछ पैसा दे दिया पर रजिस्ट्री नहीं कराई थी. देखने में वह नौकरानी नहीं लगती थी. वह कह गए थे कि उस को यहां काम दिलाने में उन के एक दोस्त की सिफारिश थी.

वह स्वयं को अनपढ़, गरीब और अनाथ बतलाती थी और खुद को झारखंड की बताती थी लेकिन न वह गरीब लगती थी और न ही अनपढ़. उसे चोरीचोरी मोबाइल पर कान में लीड लगाए कुछ सुनते हुए देखा गया था. मकानमालिक के साथ भी उस के संबंध नौकरानी जैसे नहीं थे. ऐसा लगता था कि दोनों चोरीछिपे घूमने जाते थे क्योंकि पहले एक निकलता और दूसरा कुछ मिनट बाद.

नौकरानी ने अपना नाम मंजू बताया था और झारखंड के रांची के पास गांव में अपना निवास स्थान. वह भी कई बार सिद्धार्थ को बड़ा लाड़प्यार जता कर गोद में उठा लिया करती थी और निर्मला को बच्चे को ठीक से रखने के तौरतरीके भी बताया करती थी.

सिद्धार्थ की मां से वह कहती, ‘‘तुम इस को नहलाधुला कर साफ रखा करो. पाउडर वगैरा छिङका करो, सुंदरसुंदर कपड़े पहनाया करो. मेरी पिछली मालकिन तो बहुत ज्यादा खयाल रखती थीं.’’

उस दिन भी उस ने बातोंबातों में सिद्धार्थ को गोद में ले लिया और साथ वालों की उस लङकी की उंगली पकड़ कर कहा, ‘‘चलो, तुम्हें बाजार घुमा लाऊं.’’

निर्मला, जो बड़ी सरल स्वभाव की महिला थी, संदेह नहीं हुआ. लेकिन जब कुछ देर बाद पड़ोसी की एक छोटी लङकी दौड़ती हुई आई और कहने लगी कि मंजू और सिद्धार्थ को मैट्रो में चढ़ते देखा है, वह मैट्रो में घुस नहीं पाई. निर्मला मैट्रो स्टेशन लाइन की तरफ भागी और मंजु को आवाजें देदे कर चीखतीचिल्लाती रही. लेकिन उस की आवाज पर किसी ने जवाब नहीं दिया. वह आधे घंटे में रोतीकलपती घर वापस चली आई. इसी चक्कर में उस का मोबाइल सङक पर गिर गया और बुरी तरह टूट गया.

उस के बाद वह अपने होशोहवास खो बैठी. तब तरस खा कर किसी ने उस के मोबाइल का सिम बदल कर अपने फोन में लगा कर पति को सूचित किया. बच्चे के पिता रमन एक बैंक में काम करता है. वे तुरंत घर की ओर स्कूटर से भागे.

घर पहुंच कर उन्होंने सारी बातें सुनीं और तुरंत थाने पहुंचे. वहां पुलिस वालों ने उन की रपट दर्ज नहीं की. शाम 5 बजे बहुत कहनेसुनने के बाद रोजनामचे में रपट (संख्या 521) दर्ज की गई, पर अनापशनाप 6 माह के शिशु को पुलिस वालों ने 6 साल का लिखा. इस बीच नया फ्लैट मालिक भी फ्लैट खाली कर के चला गया. जब पिछला मालिक आया तो पता चला कि उस ने जो ड्राफ्ट दिया था वह नकली था. हां, वह ₹2 लाख कैश जरूर दे गया था. उस का विजिटिंग कार्ड भी नकली था. ऐसी कोई कंपनी थी ही नहीं जिस का वह अपने को सीईओ कह रहा था.

रमन ने बताया कि 13 दिनों तक स्थानीय पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की. 14 जुलाई को पुलिस वालों ने उन्हें जवाब दे दिया तो उन्होंने पुलिस की अपराध शाखा में रिपोर्ट लिखाई. पुलिस ने उन्हें इतना जरूर बताया कि रांची के पास किसी गांव से उस नौकरानी के नाम का कोई नहीं है.

इस के बाद भी सिद्धार्थ के मिलने की जहां भी संभावना थी, वहां पुलिस वालों को साथ ले जा कर वह खाक छानते रहे. सारे सीसीटीवी देखे गए पर सभी में नौकरानी और फ्लैट मालिक के असली चेहरे पूरी तरह नहीं दिख रहे थे. लगता था वह हमेशा कैप पहने रहता था. नौकरानी हर समय सिर पर चुन्नी बांधे रहती थी. उन्होंने सारे सीसीटीवी कैमरे देख लिए थे. पुलिस वालों के खाने और जाने का खर्च स्वयं उठाते रहे.

इस दौरान उन्होंने नन्हें सिद्धार्थ का सुराग देने वाले को ₹1 लाख का पुरस्कार देने की भी घोषणा कर दी.

उन्होंने पुलिस आयुक्त से ले कर उपराज्यपाल, केंद्रीय गृहमंत्री व उप प्रधानमंत्री तक के दरवाजे खटखटाए. लेकिन उन के सारे प्रयास निरर्थक रहे. सब तो चुनावों में लगे थे. इस बात से उन्हें बहुत क्षोभ हुआ कि सिद्धार्थ ने एक साधारण व्यक्ति के घर जन्म लिया. यदि किसी नेता या बड़े आदमी का बेटा खोता तो उस की खोज में पुलिस आकाशपाताल एक कर देती.

पर सिद्धार्थ एक मामूली बैंक क्लर्क की संतान है, उस की परवा किस को होगी. हजारों गरीब बच्चे आएदिन खोते रहते हैं. किसी का कुछ पता नहीं चलता और उन के मांबाप को आखिर सब्र का ही सहारा लेना पड़ता है.

पुलिस लापरवाही दिखा रही थी. रमन ने कहा कि संजय गीता कांड में पुलिस ने अपराधियों को कितनी तत्परता से पकड़ दिखाया था, लेकिन उन की किसी ने मदद नहीं की. वह पुलिस वालों को कोसते, भलाबुरा कहते. पर इस से क्या बनता? चुनावों की धूमधाम में गरीब मातापिता का उन की एकमात्र संतान से विछोह अजीब लग रहा था.

एक दिन रमन ने खुद छानबीन करने का फैसला किया. वे रात को उस फ्लैट में बाहर की खिङकी से घुस गए जहां नया फ्लैट मालिक रहता था. उन्होंने बारीकी से एक चादर, तकिया, पलंग के नीचे का हिस्सा देखना शुरू किया. उन्हें एक जगह कंडोम दिखा यानी यह औरत नौकरानी नहीं थी. या तो प्रेमिका थी या पत्नी. कूङे की बालटी में रमन को एक स्टोर की रसीद मिली. स्टोर से मेकअप का ढेर सारा सामान खरीदा गया था. स्टोर वाराणसी का था. रमन का एक दोस्त वाराणसी में रहता था. रमन ने तुरंत उसे फोन किया.

वह उस स्टोर तक गया और उस की फोटो खींच कर रमन को भेज दी. रमन उसी दिन वाराणसी चले गए. निर्मला भी जाना चाहती थीं पर उसे डर था कि कहीं कोई सूचना मिली तो घर बंद रह जाएगा.

स्टोर मालिक को इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि यह सामान किस ने खरीदा था. उस के पास सीसीटीवी कैमरा था पर उस में केवल 1 सप्ताह का डेटा रिकौर्ड रहता था. स्टोर मालिक ने यह जरूर बताया कि जो हुलिया रमन बता रहे हैं उस जैसा पुलिस वाला एक लङका 2-3 बार आया तो था पर कब और क्यों उसे याद नहीं. रमन को लगा कि उस के बेटे को उठाने वाला कहीं आसपास ही होगा. रमन ने स्टोर के सामने एक कमरा ढूंढ़ा और वहीं रहने लगे. रमन ने 2 मोबाइल और एक सीसीटीवी सैट भी खरीदा. वे घंटों उस स्टोर में आनेजाने वालों की वीडियो देखते रहते.

एक रोज रमन को एक स्वामी आता दिखा. उस की चाल से रमन को संदेह हुआ. वे भागते हुए स्टोर में पहुंचे तो देखा कि वह स्वामी बिल बनवा रहा था. उस बिल में पूजा सामग्री तो थी पर खाने के सामान के साथ बेबी मिल्क पाउडर भी था. रमन ने पूरी कोशिश रखी कि वह स्वामी की आंखों के सामने न पड़े. रमन ने तुरंत अपने दोस्त को फोन पर मैसेज डाल दिया, ‘कम इमीडिएटली…’

दोस्त जब तक आया वह स्वामी जाने की तैयारी में था. दोनों ने स्वामी का पीछा करने का फैसला किया.

स्वामी को एहसास हो गया कि उस का पीछा किया जा रहा है और वह भागने लगा. रमन और दोस्त भी पीछे भागे तो वह एक मकान में घुस गया और दरवाजा बंद कर लिया.

रमन को एक रोज स्कर्ट पहने कटे बाल वाली लङकी स्टोर की तरफ आती दिखी. वह कुछ जानीपहचानी लग रही थी पर नौकरानी तो हो नहीं सकती. यह लङकी वाराणसी के माहौल में भी अलग लग रही थी.

स्टोर वाले के पास जा कर पता किया तो जो बताया गया वह चौंकाने वाला था. उस ने बताया कि वह तो उस की पुरानी ग्राहक है और किसी के साथ लिवइन में रह रही है. वह कंडोम ले कर जाया करती थी पर अब बेबी डायपर भी ले जाती है. रमन का शक बढ़ गया.

अब रमन ने खुद का हुलिया बदल लिया. दाढ़ी बढ़ा ली और हर समय कैप लगाए रहते. जितने टाइम स्टोर खुला रहता वे कमरे में खिङकी से हटते नहीं थे. सारे दिन का खाना भी एकसाथ सुबह ही बना कर आसपास रख लेते. रमन पहले कभी गांव में पहलवानी करते थे और आज भी चुस्त थे इसलिए तुरंत मकान में खिड़कियों को पकड़ कर पहली मंजिल से घुस गए. मकान खाली था पर एक कोने में एक पालने में एक बच्चा लेटा था. यह उन का बेटा ही था.

इतने में दोस्त ने मकान के पीछे से देखना शुरू किया तो उसे कटे बाल वाली एक लङकी छोटी सी खिङकी से निकलती दिखी. उस दोस्त ने तुरंत उसे दबोच लिया. अब तक शोर सुन कर गली में लोग जमा हो गए. पुलिस बुला ली गई.

रोनेधोने के बाद लङकी ने उगल दिया कि वह और स्वामी पतिपत्नी हैं. पर उन के बच्चे नहीं हो सकते क्योंकि वे एक आश्रम से भागे हुए हैं जहां लङके का औपरेशन करा डाला गया था और लङकी का गर्भाशय निकाला जा चुका था ताकि वे कभी मांबाप न बन सकें और जीवनभर आश्रम के लोगों और मेहमानों की सेवा हर तरह से करते रहें.

उन दोनों को प्रेम हो गया और वे आश्रम से भाग आए. बच्चे को चुराने के पीछे वजह थी कि गोद लेने में बहुत कागज चाहिए होते हैं जो उन के पास नहीं था. उन्हें उम्मीद थी कि बच्चे को साथ ले कर वे धीरेधीरे सारे कागज नए नामों से बनवा लेंगे. उन्होंने अपना अलग आश्रम बनाने की भी योजना बना रखी थी पर रमन और उस के दोस्त की वजह से सारा प्लान फेल हो गया.

एक दिन अचानक वाराणसी से लालजीराम के मित्र आ गए. उन्होंने एक खोए हुए बच्चे का हुलिया बयान किसा और बताया कि गन्ने के खेत में 2 कुत्तों की रखवाली में बिलकुल नाटकीय अंदाज में एक नन्हा शिशु पाया गया है जिस की परवरिश अब गांव से दूर मंदिर का एक पुजारी कर रहा है. लालजीराम एक पुलिस इंस्पैक्टर को अपने साथ ले कर उसी रात वाराणसी के लिए रवाना हो गए. राम के साथ गए हुए पुलिस इंस्पैक्टर ने कोई पैसा लेने से इनकार किया.

सिद्धार्थ के वापस आ जाने पर उस के घरपरिवार वाले बहुत खुश हैं. सिद्धार्थ बहुत कमजोर हो कर लौटा है. उस के शरीर पर कुछ निशान पाए गए हैं, जो आग से जले हुए लगते हैं. शायद उस अबोध शिशु को किसी तरह की यातना दी गई है. यद्धपि मातापिता को अपना नन्हा बच्चा मिल गया है, लेकिन सिद्धार्थ का पिता अब भी परेशान है. वह आश्रम की तलाश में है, जहां वह स्वामी व लङकी रहती थी पर वे मुंह नहीं खोल रहे थे. उन का दिन का चैन और रात की नींदें छीन ली थीं. वे अब भी आशंकित रहते हैं कि कहीं ये दोनों जेल से छूटने के बाद उन के बच्चे को न उठा ले जाएं. आश्चर्य की बात यह थी कि उन दोनों अपराधियों को अपनी किसी गलती का पछतावा नहीं  था. Social Story 

Family Story In Hindi : फर्ज – उस्मान ने अपने घर फोन करके क्या बोला ?

Family Story In Hindi : जयपुर शहर के सिटी अस्पताल में उस्मान का इलाज चलते 15 दिन से भी ज्यादा हो गए थे, लेकिन उस की तबीयत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. आईसीयू वार्ड के सामने परेशान उस्मान के अब्बा सरफराज लगातार इधर से उधर चक्कर लगा रहे थे. कभी बेचैनी में आसमान की तरफ दोनों हाथ उठा कर वे बेटे की जिंदगी की भीख मांगते, तो कभी फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लग जाते. उधर अस्पताल के एक कोने में उस्मान की मां फरजाना भी बेटे की सलामती के लिए दुआएं मांग रही  तभी आईसीयू वार्ड से डाक्टर रामानुजम बाहर निकले, तो सरफराज उन के पीछेपीछे दौड़े और उन के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे. ‘‘डाक्टर साहब, मेरे बेटे को बचा लो. आप कुछ भी करो. उस के इलाज में कमी नहीं आनी चाहिए.’’ डाक्टर रामानुजम ने उन्हें उठा कर तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘देखिए अंकल, हम आप के बेटे को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. उस की तबीयत अभी भी गंभीर बनी हुई है. आपरेशन और दवाओं को मिला कर कुल 5 लाख रुपए का खर्चा आएगा.’’

‘‘कैसे भी हो, आप मेरे बेटे को बचा लो डाक्टर साहब. मैं एकदो दिन में पैसों का इंतजाम करता हूं,’’ सरफराज ने हाथ जोड़ कर कहा.

काफी भागदौड़ के बाद भी जब सरफराज से सिर्फ 2 लाख रुपए का इंतजाम हो सका, तो निराश हो कर उन्होंने बेटी नजमा को मदद के लिए दिल्ली फोन मिलाया. उधर से फोन पर दामाद अनवर की आवाज आई, ‘हैलो अब्बू, क्या हुआ? कैसे फोन किया?’

‘‘बेटा अनवर, उस्मान की तबीयत ज्यादा ही खराब है. उस के आपरेशन और इलाज के लिए 5 लाख रुपए की जरूरत थी. हम से 2 लाख रुपए का ही इंतजाम हो सका है. बेटा…’’ और सरफराज का गला भर आया. इस के पहले कि उन की बात पूरी होती, उधर से अनवर ने कहा, ‘अब्बू, आप बिलकुल चिंता न करें. मैं तो आ नहीं पाऊंगा, लेकिन आप की बेटी कल सुबह पैसे ले कर आप के पास पहुंच जाएगी.’ दूसरे दिन नजमा पैसे ले कर जयपुर पहुंच गई. कामयाब आपरेशन के बाद डाक्टरों ने उस्मान को बचा लिया. धीरेधीरे 10 साल गुजर गए. इस बीच सरफराज ने गांव की कुछ जमीन बेच कर उस्मान को इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई और मुंबई एयरपोर्ट पर उस की नौकरी लग गई. उस ने अपने साथ काम करने वाली लड़की रेणू से शादी भी कर ली और ससुराल में ही रहने लगा. इस के बाद उस्मान का मांबाप से मिलने आना बंद हो गया. कई बार वे बीमार हुए. उसे खबर भी दी, फिर भी वह नहीं आया.

एक दिन सुबहसवेरे टैलीफोन की घंटी बजी. सरफराज ने फोन उठा कर सुना, तो उधर से उस्मान बोल रहा था, ‘हैलो अब्बा, कैसे हैं आप सब लोग? अब्बा, मुझे एक परेशानी आ गई है. मुझे 10 लाख रुपए की सख्त जरूरत है. मैं 2-3 दिन में पैसे लेने आ जाता हूं.’

‘‘बेटा, तेरे आपरेशन के वक्त बेटी नजमा से उधार लिए 3 लाख रुपए चुकाना ही मुश्किल हो रहा है. ऐसे में मुझ से 10 लाख रुपए का इंतजाम नहीं हो सकेगा. मैं मजबूर हूं बेटा,’’ सरफराज ने कहा. इस के आगे सरफराज कुछ बोलते, तभी उस्मान गुस्से से उन पर भड़क उठा, ‘अब्बा, मुझे आप से यही उम्मीद थी. मुझे पता था कि आप यही कहेंगे. आप ने जिंदगी में मेरे लिए किया ही क्या है?’ और उस ने फोन काट दिया. अपने बेटे की ऐसी बातें सुन कर सरफराज को गहरा सदमा लगा. वे गुमसुम रहने लगे. सारा दिन घर में पड़ेपड़े वे बड़बड़ाते रहते. एक दिन अचानक शाम को सीने में दर्द के बाद सरफराज लड़खड़ा कर गिर पड़े, तो बीवी फरजाना ने उन्हें पलंग पर लिटा दिया. कुछ देर बाद डाक्टर ने आ कर जांच की और कहा, ‘‘इन की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है. इन्हें बड़े अस्पताल में ले जाना पड़ेगा.’’

कसबे के नजदीक जिला अस्पताल में सारी जांचों और रिपोर्टों को देखने के बाद सीनियर डाक्टर ने फरजाना को अलग बुला कर समझाया और कहा कि वे सरफराज को घर ले जा कर खिदमत करें. डाक्टर साहब की बात सुन कर घबराई फरजाना ने बेटे उस्मान को फोन कर बीमार बाप से मिलने आने की गुजारिश करते हुए आखिरी वक्त में साथ होने की दुहाई भी दी. उधर से फोन पर उस्मान ने अम्मी से काफी भलाबुरा कहा. गुस्से में भरे उस्मान ने यह तक कह दिया, ‘आप लोगों से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं है. आइंदा मुझे फोन भी मत करना.’ बटे की ऐसी बातें सुन कर फरजाना घबरा गईं. उन्होंने नजमा को दिल्ली फोन किया, ‘‘हैलो नजमा बेटी, तेरे अब्बा की तबीयत बहुत खराब है. तू अनवर मियां से इजाजत ले कर कुछ दिनों के लिए यहां आ जा.’’

नजमा ने उधर से फौरन जवाब दिया, ‘अम्मी, आप बिलकुल मत घबराना. मैं आज ही शाम तक आप के दामाद के साथ आप के पास पहुंच जाऊंगी.’ शाम होतेहोते नजमा और अनवर जब घर पर पहुंचे, तो खानदान के लोग सरफराज के पलंग के आसपास बैठे थे. नजमा भाग कर अब्बा से लिपट गई. दोनों बापबेटी बड़ी देर तक रोते रहे.

‘देखो अब्बा, मैं आ गई हूं. आप अब मेरे साथ दिल्ली चलोगे. वहां हम आप का बढि़या इलाज कराएंगे. आप बहुत जल्दी ठीक हो जाएंगे,’’ नजमा ने रोतेरोते कहा. आंखें खोलने की कोशिश करते हुए सरफराज ने बड़ी देर तक नजमा के सिर हाथ फेरा और कहा, ‘‘नजमा बेटी, अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा. अब तू जो आ गई है. मुझे सुकून से मौत आ जाएगी.’’ ‘‘ऐसा मत बोलो अब्बा. आप को कुछ नहीं होगा…’’ उसी दिन अम्मी को बुला कर उस ने कह दिया, ‘‘अम्मी, आप ने खूब खिदमत कर ली. अब मुझे अपना फर्ज अदा करने दो.’’

उस के बाद तो नजमा ने अब्बा की खिदमत में दिनरात एक कर दिया. समय पर दवा, चाय, नाश्ता, खाना, नहलाना और घंटों तक पैर दबाते रहना, सारीसारी रात पलंग पर बैठ कर जागना उस का रोजाना का काम हो गया. कई बार सरफराज ने नजमा से मना भी किया, लेकिन वह हर बार यह कहती, ‘‘अब्बा, आप ने हमारे लिए क्या नहीं किया. आप भी हमें अपने हाथों से खिलाते, नहलाते, स्कूल ले जाते, कंधे पर बैठा कर घुमाते थे. सबकुछ तो किया. अब मेरा फर्ज अदा करने का वक्त है. मुझे मत रोको अब्बा.’’ बेटी की बात सुन कर सरफराज चुप हो गए.नजमा की खिदमत ने करिश्मा कर दिया. सरफराज की सेहत में सुधार होता चला गया.

एक दिन दोपहर के वक्त नजमा अब्बा का सिर गोद में ले कर चम्मच से जूस पिला रही थी, तभी घर के बाहर कार के रुकने की आवाज सुनाई दी. कुछ देर बाद उस्मान एक वकील के साथ अंदर जाने लगा. वकील के हाथ में टाइप किए कुछ कागजात थे. उस्मान दरवाजे पर खड़ी फरजाना से सलाम कर के आगे बढ़ा, तो उन्होंने उस का हाथ पकड़ कर रोक लिया और पूछा, ‘‘कौन हो तुम? कहां जा रहे हो?’’

‘‘अरे अम्मी, मैं हूं आप का बेटा उस्मान,’’ इतना कहते हुए वह सरफराज के पलंग के पास जा कर खड़ा हो गया.

तभी सरफराज ने तकिए का सहारा ले कर पूछा, ‘‘कौन हो तुम? और ये वकील साहब कैसे आए हैं?’’

‘‘अब्बा, मैं आप का उस्मान.’’

‘‘कौन उस्मान? मैं किसी उस्मान को नहीं जानता, न मेरा उस से कोई रिश्ता है. मेरा तो एक ही बेटा है. यह मेरी बेटी नजमा…’’ इतना कह कर उन्होंने मुंह फेर लिया और कहा, ‘‘वकील साहब, शायद आप मेरी जायदाद उस्मान के नाम करवाने के कागजात पर दस्तखत कराने के इरादे से आए हो, लेकिन आप लोगों को बहुत देर हो गई.’’ उन्होंने तकिए के नीचे से कागजात निकाल कर बताते हुए कहा, ‘‘मैं ने बेटे के लिए बहुत किया. अपना सबकुछ दिया, लेकिन सब बेकार चला गया. ‘‘मुझे जिंदगीभर यही अफसोस रहेगा कि मेरे नजमा जैसी और बेटियां क्यों नहीं हुईं? अब मेरा सबकुछ इस का है. यह जिंदगी भी इसी की खिदमत की बदौलत है. आप मेहरबानी कर के चले जाएं. यहां उस्मान नाम का कोई भी नहीं है.’’ यह सुन कर उस्मान के होश उड़ गए और वह मुंह लटका कर वकील के साथ घर से बाहर निकल गया. Family Story In Hindi 

Social Story In Hindi : जिंदगी फिर भी खूबसूरत है

Social Story In Hindi : सलोनी मोबाइल को हाथ मे पकड़े एकटक शून्य में ताक रही थी. अभी अभी औफिस से फोन आया
था कि मार्च माह की सैलरी आधी ही मिलेगी.

आज 5 अप्रैल था और मकान का किराया, मोबाइल का बिल, राशन आदि जरूरी काम वह कैसे कर पाएगी, वह भी मात्र ₹25 हजार में?

घर का किराया ही ₹15 हजार है और अब गरमी के दिनों में तो एअर कंडीशनर न चाहते हुए भी चलाना
पड़ेगा. कैसे कर पाएगी वह?

लौकडाउन के कारण घर भी नहीं जा सकती है. घर से पैसे अवश्य
मंगवा सकती है पर सलोनी को मम्मीपापा के लैक्चर नहीं सुनने थे. अगर वह कुछ हैल्प मांगेगी तो मम्मीपापा कर देंगे पर इतना जलील करेंगे कि सलोनी हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी.

सलोनी 26 वर्षीय युवती थी. वह नजीबाबाद नाम के एक छोटे से कसबे से थी. वह जब आगे की पढ़ाई
करने ग़ाजियाबाद आई तो फिर वह कभी वापिस नहीं जा पाई.

इंजीनियरिंग करने के बाद उसे नौकरी मिल गई थी. उस ने ₹30 हजार से नौकरी की शुरुआत की थी मगर 3 साल के भीतर ही उस की सैलरी ₹50 हजार हो गई थी.

सलोनी ने जल्दी ही नोएडा में एक छोटा सा घर किराए पर ले लिया था. घर क्या बस 1 बैडरूम और 1 किचन था और आगे थी एक बरसाती.
सलोनी को यह बरसाती बेहद प्रिय थी, उस ने वहां तरहतरह के पौधे लगा रखे थे.

सलोनी के मकानमालिक नीचे रहते थे और सलोनी का उन से मतलब न के बराबर था. वे बेहद रूखे स्वभाव के थे. उन का मतलब सलोनी से बस किराए तक ही सीमित न था. मुफ्त का नैतिक ज्ञान भी उसे कभीकभी दे दिया जाता था.

कभी बोलते,”इतनी तेज आवाज में म्यूजिक मत सुनो.”
तो कभी कहते,”कल इतनी देर रात कहां से आई थी?”

वह तो शुक्र था कि सलोनी के घर जाने का रास्ता बाहर से था पर फिर भी नीचे वाले अंकलआंटी की पूछताछ चलती रहती थी.

अभी 14 फरवरी की शाम को संस्कार उस के घर आ गया था. दोनों  ने एकसाथ डिनर किया था. रात के 10 बजे ही थे कि दरवाजे पर खटखटाहट हुई. जैसे ही दरवाजा खोला सामने दोनों पतिपत्नी खड़े थे.
बोल पङे,”अकेली लङकी हो. कल को कोई ऊंचनीच हो गई तो हम क्या करेंगे? अपने दोस्तों को यहां मत बुलाया करो.”

जिस लहजे से बात कही गई थी सलोनी तो शर्म से पानीपानी हो गई थी. संस्कार भी उसी समय निकल गया था.

अगले दिन आंटी ने उसे नीचे बुलाया था. इधरउधर की बात न करते हुए वे सीधे मुद्दे पर आ गईं. बोलीं,”क्या तुम उस लड़के से विवाह करने वाली हो?तुम्हारे मम्मी पापा जानते हैं क्या उसे?

“तुम पढ़ीलिखी खूबसूरत लड़की हो, इसलिए कह रही हूं, ऐसे मत भटको.”

सलोनी ने बस इतना ही कहा,”मैं अपना भलाबुरा समझती हूं.”

उके बाद संस्कार के साथ उस ने 1-2 घर भी देखे पर इतने कम किराए पर उसे कोई ऐसा हवादार घर नहीं मिल पाया. अभी घर देख ही रही थी कि  लौकडाउन हो गया.

सलोनी के एकाउंट में 7 अप्रैल को सैलरी आ गयी थी. ₹25 हजार और बस ₹5 हजार पहले के पड़े हुए थे. सलोनी आजकल के युवाओं की तरह थी जो बस आज में ही जीते हैं. सारे पैसे सलोनी घूमनेफिरने और सैरसपाटे में उड़ा देती थी. कभी ऐसा भी कुछ होगा सलोनी ने सोचा भी न
था.

8 अप्रैल को नीचे सलोनी ने घर का किराया दे दिया था. अंकलआंटी आराम से बैठ कर खाना खा रहे थे. एक बार भी यह नहीं पूछा कि वह कैसी है, उसे कुछ चाहिए तो नहीं. सलोनी डबडबाई आंखे ले कर ऊपर आ गई. अब बस ₹15 हजार बचे हैं और अगले महीने का भी कोई भरोसा नहीं कि सैलरी मिलेगी भी या नहीं.

आज सलोनी को लग रहा था कि मम्मीपापा कुछ गलत नहीं कहते थे कि थोड़ीथोड़ी बचत करा करो, पर तब तो सलोनी को सब ओल्ड फैशन लगता था. हर वीकेंड का मतलब होता था, शराब और डिस्को. हर वीकेंड में बिना सोचसमझे उस के ₹2-3 हजार खर्च हो ही जाते
थे.

सलोनी एक सूची बनाने लगी कि कैसे खर्चों में कटौती करी जाए. दूध 2 दिन में 1 किलो भी बहुत है. फल नहीं खाएगी, सब्जी एक समय बना कर उसी से दोनों समय खा लेगी. नाश्ते में जो मम्मी ने घर से पोहा, चने और दलिया भेजा था, उस से ही काम चला लेगी.

1 हफ्ता बीत गया और सलोनी अपने बजट नियंत्रण से खुश थी. उसे लग रहा था कि अगले महीने भी आधी ही सैलरी मिली तो उस में से वह बचत भी कर लेगी और आराम से काम भी चला लेगी.

अब सलोनी रोज सुबह 6 बजे उठ कर सारा काम करती और 8 बजे लैपटौप के आगे बैठ जाती
थी. दिन कहां निकल जाता था, उसे पता ही नहीं चलता था.

22 अप्रैल को अचानक से सलोनी का लैपटौप हैंग हो गया. सलोनी के तो होश उड़ गए. उस ने
अपनी बौस को फोन कर के समस्या से अवगत कराया तो उन का घिसापिटा जवाब था,”सलोनी कुछ भी कर के काम करो. वैसे भी छटनी आरंभ हो चुकी है, कुछ ऐसा मत करो कि कंपनी को कोई मौका मिल जाए…”

सलोनी ने संस्कार को फोन किया. सलोनी को पूरी उम्मीद थी कि संस्कार अवश्य उस की मदद
करेगा. पर संस्कार ने हाथ खड़े कर दिए थे. एकएक कर के सलोनी ने अपने उन सब दोस्तों को
फोन किया जिन के घर नोएडा में ही थे. लेकिन सभी दोस्तों ने अपनीअपनी मजबूरी बता दी थी.
थकहार कर सलोनी ने अपने घर फोन किया. उसे पूरी उम्मीद थी कि लैक्चर के अलावा और कुछ नहीं मिलेगा. पर हुआ उस के उलटा.

सलोनी के पापा ने बहुत प्यार से बात की, उसे हौसला दिया और कहा,”बेटा मुझे तुम पर नाज है कि ऐसी विषम परिस्थितियों में भी तुम डट कर खड़ी हुई हो.

“अगर कोई समस्या है तो उस का समाधान भी अवश्य होगा, एक बार अपने नीचे वाले अंकलआंटी से बात तो कर के देखो.”

सलोनी को पता था कि कोई फायदा नहीं होगा पर आज पापा की बातों ने उस के अंदर उत्साह भर दिया था. जैसे ही वह नीचे पहुंची तो देखा अंकल लैपटौप पर कुछ काम कर रहे हैं और आंटी कोई पत्रिका पढ़ रही हैं.

उसे देखते ही आंटी बोली,”ओह, सलोनी बेटा तुम तो बेटा एकदम मुरझा गई हो. खातीपीती नहीं हो क्या ठीक से?”

अंकल बोले,”अरे बच्ची सारा दिन अकेले कामों में उलझी रहती है, क्या बनाएगी और खाएगी.”

सलोनी झिझकते हुए बोली,”अंकल, मेरा लैपटौप नहीं चल रहा हैं, क्या कुछ हो सकता है?”

इस से पहले कि अंकल कुछ बोलते, आंटी बोल पड़ी,”अरे सारा दिन तो यह लैपटौप पर खेल ही तो
खेलते हैं, अंकल तुम्हें दे देंगे.”

तब अंकल बोले,”बेटा नीचे आ कर ही काम करो, मैं ऊपर नहीं ले जाने दूंगा.”

सलोनी की समस्या हल हो गई थी. वह भाग कर अपना मोबाइल ले कर नीचे आ गई.

जैसे ही सलोनी अपने मोबाइल के हौटस्पौट से लैपटौप को कनैक्ट करने लगी, अंकल बोल पङे,”बेटा,
क्यों अपने मोबाइल का बिल बढ़ा रही हो, हमारा नैट हमेशा चालू रहता है, तुम्हे पासवर्ड बताता हूं.”

जब दोपहर हो गई तो सलोनी खाना खाने ऊपर जाने लगी. आंटी बोली,”बेटा, हम लोग सादा ही
खाना खाते हैं पर तुम्हारा खाना भी आज मैं ने बना लिया है. यहीं खा लो.”

सलोनी को आज सादा खाना भी अमृत जैसा लग रहा था.

आज का दिन तो ठीक से बीत गया था पर लैपटौप की समस्या अब भी जस की तस थी. अंकल
ने ही पहल कर के कहा,”बेटा, कल मैं ने अपनी जानपहचान का एक लड़का बुलाया है, वह तुम्हारा लैपटौप देख लेगा.”

सलोनी ने राहत की सांस ली. रात को खाना कहते हुए सलोनी सोच रही थी कि वह बेकार में ही
अंकलआंटी को दकियानूसी और न जाने क्याक्या मानती आ रही थी.

सुबह जब सलोनी अपना लैपटौप ले कर पहुंची तो देखा अंकल औनलाइन बिजली का बिल पे करने की कोशिश में लगे हुए हैं. सलोनी ने अंकल को पूरी प्रक्रिया समझाई और 2 मिनट में
काम हो गया.

अंकल खुश हो कर बोले,”सलोनी बेटा, आज भी तुम मेरे लैपटौप से काम कर लो.

“आज शायद दोपहर तक तुम्हारे लैपटौप की समस्या खत्म हो जाएगी.”

दोपहर को लैपटौप चेक कर के वह लड़का बोला,”इस की तो मदरबोर्ड में प्रौब्लम है. ₹5 हजार का खर्च है, आप पैसे पे कर दो, शाम तक लैपटौप आप के पास हाजिर होगा.”

सलोनी का चेहरा रोआंसा सा हो गया. वह सोचने लगी कि अब अगर ₹5 हजार दे दिए तो फिर कैसे ₹10 हजार में आगे काटेगी?

अंकल ने रूखे स्वर में कहा,”इतना समय नहीं है सलोनी, अगर लैपटौप सही करवाना हो तो बोलो यह रुकेगा नहीं. मैं इसे भेज रहा हूं इसे तब…”

सलोनी परेशान स्वर में बोली,”अंकल, आप बस इस माह के लिये मुझे अपने लेपटौप पर काम करने दे दीजिए.”

अंकल बोले,”नहीं बाबा, यह लैपटौप बहुत महंगा है.”

न चाहते हुए भी सलोनी को ₹5 हजार खर्च करने पड़ गए.
उस के बाद सलोनी ने अंकल से कोई बात नहीं की और न ही खाना खाया. दरअसल, गुस्से और चिंता के कारण सलोनी की भूख गायब हो गई थी.

रात को सलोनी का लैपटौप ठीक हो कर आ गया था. जब सलोनी लैपटौप लेने पहुंची तो अंकलआंटी मिल्कशेक  पी रहे थे. अंकल ने सलोनी को बैठने का इशारा किया और फिर आंटी से बोले,”सलोनी के लिए भी शेक ले आओ.”

अंकल बोले,”सलोनी मुझे पता है कि तुम्हें पैसो की तंगी हो रही होगी. अगर आज मैं तुम्हारी मदद कर देता तो तुम फिर हर बार यही सोचती कि अंकल मदद कर देंगे. आशा करता हूं कि इस लौकडाउन में तुम अपने जीवन मूल्यों को लेषकर अच्छे से मनन करोगी.

“मुझे पूरा विश्वास है कि यह लौकडाउन तुम्हें कुछ ऐसी बातें सिखा  कर जाएगा जो तुम
शायद सामान्य हालातों में कभी नहीं सीख पातीं.”

सारी समस्यों से अकेले ही झूझते हुए सलोनी को लग रहा था कि जिंदगी की असली खूबसूरती तो उसे अब समझ आई है.

1 माह और बीत गया था. 7 मई  को सलोनी किराया देने नीचे पहुंच
गई थी.

अंकल ने ₹5 हजार वापस करते हुए  कहा,”जब तक तुम्हारी सैलरी फिर से सामान्य नहीं हो जाती तब तक हम तुम से ₹10 हजार ही किराया लेंगे.”

इस लौकडाउन ने सालोनी को पहले से अधिक जिम्मेदार बना दिया था. उसे समझ आ गया था जिंदगी का मतलब बस सैरसपाटा नही हैं.

दूसरे दिन से शराब की दुकानें खुल रही थीं. सलोनी के सभी दोस्त प्रोग्राम बना रहे थे कि सब सलोनी
के घर मिलेंगे.

सलोनी से संस्कार ने पूछा,”बेबी, तुम्हारे लिए कौन सी ब्रैंड ले कर आनी है?”

सलोनी मुसकराते हुए बोली,”देखो, मेरे पास फालतू खर्चों के लिए पैसे नही हैं. तुम लोग किसी और के घर जाने का प्रोग्राम बना लो.”

संस्कार बोला,”सलोनी डियर, आज में जियो, यह बुजुर्गों जैसी बचत की बातें कर के लाइफ को बोरिंग मत बनाओ.”

सलोनी पूरे आत्मविश्वास से बोली,”संस्कार, मेरी जिंदगी अब बोरिंग नहीं बेहद खूबसूरत हो गई है.”

सलोनी को विश्वास था कि अब चाहे सैलरी और भी कम हो जाएं वह कम में भी आराम से काम चला लेगी. उस के हाथ आत्मनिर्भरता और आत्मअनुशासन की कुंजी जो लग गई है. उस ने आगे से शराब जैसी गंदी चीज को हाथ तक न लगाने की कसम खा ली थी.

अब उस की जिंदगी पहले से ज्यादा खूबसूरत हो गई थी. Social Story In Hindi 

Family Story : वो बांझ औरत – शिखा के बच्चे वर्तिका को क्यों चाहने लगे?

Family Story : ‘‘अरे, ऐसे उदास क्यों बैठी हो?’’ उदास बैठी शिखा के कंधे पर हाथ रखते हुए अभय ने पूछा. अपने मनोभावों को छिपाते हुए शिखा हड़बड़ा कर उठी, ‘‘कुछ नहीं, ऐसे ही बैठी थी. आप के लिए चाय बना दूं?’’

शिखा के माथे पर खिंची लकीरों को देख कर अभय को अंदाजा तो हो गया था कि कोई तो विशेष घटना घटित हुई है. अभय ने रसोईघर में शिखा के पास जा कर प्यार से पूछा, ‘‘शिखा, तुम्हारे चेहरे पर उदासी मुझे अच्छी नहीं लगती. क्या बात है, बताओ न?’’ अभय के प्रेमपूर्ण स्पर्श ने जैसे उस के तपते मन पर बर्फ सी रख दी.

शिखा की आंखें पिघल उठीं, ‘‘क्या मैं इस कलंक से मुक्त नहीं हो सकती, अभय?’’

अभय उस के दिल की बात समझ गया. उसे सोफे पर बैठाया. खुद ही दोनों की चाय कप में पलट कर लाया और फिर प्रेम से पूछा, ‘‘क्या हो गया आज जो तुम्हारा दिल इतना भर आया है? क्या घर से फोन आया था?’’ शिखा ने न में सिर हिला दिया. अभय के बारबार पूछने पर आंखों में रुकी नदी बहने ही लगी, ‘‘शाम को तुम्हारे आने से पहले वर्तिका के घर बच्चों के लिए इडलीसांभर ले कर गई थी…’’

‘‘अच्छा, फिर?’’

‘‘वर्तिका भाईसाहब से कह रही थी कि आज सुबह उस मनहूस बांझ का मुंह देख कर गए थे इसलिए सब काम बिगड़ गया,’’ इतना कहते ही वह अभय से लिपट कर रोने लगी.

‘‘इतनी छोटी बात कर दी भाभीजी ने…’’ अभय भी अब थोड़ा गंभीर

हो चला.

आंसू पोंछते हुए वह आगे बोली, ‘‘सुबह औफिस जाने से पहले मैं ने भाईसाहब के प्रोजैक्ट के बारे में पूछा था. वह बड़ा प्रोजैक्ट उन के हाथों से निकल गया.’’

‘‘ओह, तो इस में तुम्हारा क्या दोष?’’ अभय शिखा को सीने से लगा कर शांत करने का प्रयास करने लगा. आज तक वह खुद को और उस को अपशब्दों की आग से बचाने की कोशिश ही करता रहा है.

‘‘अभय, मैं वापस जा रही थी कि वर्तिका की आवाज आई कि कौन है तो बच्चे धीमे से बोले कि अरे, वही पड़ोस वाली मनहूस आंटी थीं. ये शब्द मुझे भीतर तक छलनी कर गए,’’ फिर पुरानी बातें याद कर के शिखा रोतेरोते ही सो गई.

शिखा की शादी हुए 8 सावन बीत चुके थे लेकिन उस की गोद हरी नहीं हुई थी. संतानसुख पाने के लिए उन्होंने कितने ही जतन किए पर कुदरत की इच्छा के सामने दोनों असहाय हो गए. एक तो पारिवारिक दुख से वैसे ही आदमी अधमरा हो जाता है, उस पर इंसान भी इंसान को दर्द देने में पीछे नहीं रहता है. अपने कसबे की छोटी सोच के तानों से बचने के लिए ही वे दोनों इस अनजान शहर में आ कर बस गए थे. यहां हर समय लोग दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में दखलंदाजी नहीं करते थे.

निजी जीवन में अधिक ताकझांक से मुक्त वे दोनों शांति से जी रहे थे. लेकिन इस घटना ने उन का यह भ्रम भी तोड़ दिया. जाहिर है, इस घटना के बाद से शिखा ने वर्तिका से बोलचाल बंद कर दी. उस के मन में घृणा के अंकुर फूट चुके थे.

ऐसे ही दिन बीत रहे थे कि कोरोना महामारी ने पूरे विश्व में कुहराम मचा दिया. लौकडाउन की जीवनचर्या ने अवसाद को चरम पर पहुंचा दिया था. चारदीवारी के भीतर घुटन के क्षणों से कुछ मुक्ति मिली ही थी कि कोविड की दूसरी लहर ने महाविनाश शुरू कर दिया. बोरियत से बचने के लिए शिखा औनलाइन हौबी क्लास में अपना समय व्यतीत करती थी. उस समय अभय वर्क फ्रौम होम के कारण घर पर ही रहता था.

एक दिन शाम को घर की घंटी बजी.

‘इस समय कौन होगा…’ यह

सोचते हुए अभय ने दरवाजा खोला. बाहर वर्तिका का पति पारस बहुत अधिक परेशान मुद्रा में खड़ा था, ‘‘क्या हुआ भाईसाहब, सब खैरियत?’’ अभय ने उन की परेशानी की रेखाएं पढ़ते हुए पूछा.

‘‘भाईसाहब, वर्तिका का औक्सीजन लैवल बहुत डाउन हो गया है, उसे अस्पताल में भरती कराने जा रहा हूं.’’

‘‘अरे, जल्दी कीजिए. बताइए मैं भी चलूं?’’ अभय ने अपना मास्क ठीक करते हुए कहा.

पारस ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘भाईसाहब घर में दोनों बच्चे अकेले हैं, आप और भाभीजी उन का ध्यान रखिएगा.’’

‘‘जी जरूर, आप निश्ंिचत रहिए. भाभीजी को जल्दी अस्पताल पहुंचाइए.’’

अंदर शिखा दोनों की बातचीत सुन रही थी. पारस के जाते ही उस ने तुरंत अभय को टोका, ‘‘आप भी कितने नासमझ बनते हैं. वर्तिका को कोरोना है. घर के सभी सदस्य संदेह के घेरे में हैं. हम क्या मदद कर सकते हैं?’’

‘‘अरे, ऐसी समस्या आई है, मदद तो करनी ही होगी.’’

‘‘अपने दुनियाभर के रईस रिश्तेदारों का गाना गाते हैं, उन्हीं को बुला लें न.’’

‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो, इस लौकडाउन में कोरोना के डर से कौन रिश्तेदार आ जाएगा?’’

शिखा का तो रत्तीभर मन नहीं था लेकिन अभय की नाराजगी के आगे उस की एक नहीं चली. वह फोन पर पारस से कुशलक्षेम पूछता, वह भी शिखा को बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था.

2 दिन ही बीत पाए थे कि पारस की रिपोर्ट भी कोरोना पौजिटिव आ गई. अब तो स्थिति बहुत खराब हो गई.

कोई रिश्तेदार मदद को आ नहीं पाया. उन के दोनों बच्चों दिव्यांश और सृष्टि की देखरेख की जिम्मेदारी अभय ने ले ली. शिखा को यह सब फूटी आंख नहीं सुहा रहा था. इसी कारण दोनों के बीच तल्खियां भी बढ़ गई थीं.

शिखा जब भी दोनों बच्चों का खाना पैक करती तो उस के घृणास्पद हावभाव से अभय का मन खिन्न हो जाता. वह वर्तिका को निशाना बना कर कुछ न कुछ बड़बड़ाती ही रहती. इसी कारण बच्चों की रिपोर्ट नैगेटिव होने के बावजूद अभय उन को घर नहीं लाया.

अभय ने अगले दिन स्वयं पर नियंत्रण करते हुए शिखा से बच्चों को घर लाने का अनुरोध किया. उस ने उस की मनोदशा समझते हुए प्यार से समझाया, ‘‘देखो शिखा, हमारे कर्म हमारे साथ हैं और दूसरे के उस के साथ. हमें अपने खाते में अच्छी चीजें रखनी हैं या दूसरों की तरह कंकड़पत्थर…’’

शिखा ने अभय की बात का जवाब नहीं दिया. अभय ने मोबाइल में दिव्यांश और सृष्टि का वीडियो दिखाया जिस में वे मम्मीपापा से रोते हुए प्यार जता रहे थे और जल्दी सही होने की मनोकामना कर रहे थे उस वीडियो को देखने के बाद शिखा एकदम चुप हो गई और चुपचाप खाना बनाने लगी. उस रात वह सही से सो नहीं पाई. अंतर्मन के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का आपस में टकराव होता रहा. इसी द्वंद्व में वह कब सो गई, उसे पता ही न चला.

सुबह पता चला कि वर्तिका की सांसें उस का साथ छोड़ चुकी थीं. शिखा को दिल में धक्का सा लगा. वर्तिका और उस के परिवार के सब सदस्यों के चेहरे एकएक कर के सामने आते और उन के अंतस को उद्वेलित कर के चले जाते.

पारस के बड़े भाईसाहब आ चुके थे. दिव्यांश और सृष्टि की रोने की आवाजें बाहर से ही सुनाई देनी शुरू हो गई थीं. शिखा ने बिलखते हुए बच्चों का रुदन देखा तो अंदर तक सिहर गई. 9 साल का दिव्यांश और 4 साल की सृष्टि बिना मां के कैसे रहेंगे… वह सोचती ही रही. काल की क्रूर आंधी यहीं नहीं ठहरी. 2 दिनों बाद ही पारस का भी हृदयगति रुकने से देहांत हो गया. इस खबर के साथ ही शिखा का दिल बैठ गया. अचानक से हुए इस घटनाक्रम में अतीत चलचित्र की भांति उस की आंखों के सामने चलने लगा. वर्तिका और पारस के साथ बिताए स्नेहपूर्ण 3 सालों के दृश्य आंखों के आगे आते और धुआं हो जाते. बस, एक दुर्भावना ने इस सौहार्दपूर्ण संबंध को फीका कर दिया था.

बच्चों को अपने मातापिता से आखिरी समय मिलना भी नसीब न हो सका. संवेदनाओं में डूबी शिखा निकलतेबैठते खिड़की से वर्तिका के घर को ही ताकती रही. शाम को उदासीभरी खामोशी तोड़ते हुए उस ने भरी आंखों से अभय को देखा और कहा, ‘‘अभय, वर्तिका के परिवार पर जो बीती उस ने मेरा मन बहुत झकझोर दिया है.’’

‘‘क्या कर सकते हैं, हम सब बेबस हैं,’’ अभय ने आंखें बंद करते हुए कहा.

‘‘अभय, मैं ने बहुत सोचा तो पाया कि अब उन बच्चों का कोई भविष्य नहीं है.’’

‘‘शिखा, ज्यादा परेशान मत हो. हमारे बस में कुछ नहीं.’’ शिखा चुप हो गई.

‘‘क्या कहना चाहती हो तुम? क्या हम उन दोनों बच्चों को हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख सकते?’’ अभय यह सुन कर अवाक रह गया. शिखा की तरफ से इतने बड़े फैसले पर उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था. कानूनीतौर से हो पाए या नहीं लेकिन मैं उन दोनों बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह से उठाने को तैयार हूं, उन की मां की तरह. आप घर वालों से बात कर के देखिए.

अभय एकटक शिखा का ममताभरा चेहरा देखता ही रह गया. शिखा की आंखों से करुणा का झरना फूट पड़ा था, जो उस के पथरीले विचारों को पूरी तरह भिगो चुका था. आज तो अभय की आंखों में भी पानी की बूंदें उतरने लगीं. समय की गरम आंच में शिखा के मन के सभी बुरे भाव जल चुके थे. अब उस के आंचल में केवल ममता ही ममता भरी थी, जिस ने उसे 2 बच्चों की मां बना दिया था. Family Story 

Nepal Revolution : नेपाल में हुई क्रांति के पीछे कौन?

Nepal Revolution : नेपाल में क्रांति हुई है. कई लोग इसे रूस की क्रांति की झलक बता रहे हैं लेकिन कई लोग इसे एक नेतृत्वविहीन और अनियंत्रित भीड़ का आंदोलन मान रहे हैं. ट्यूनेशिया और बंगलादेश में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. 10-20 हजार लोगों की भीड़ आंदोलन की शक्ल में आती है और सरकारी प्रतिष्ठानों को घेर लेती है. स्थिति से निपटने के लिए सेना सक्रिय होती है और कई युवा मारे जाते हैं. इन मौतों के बाद युवाओं का गुस्सा बढ़ता है और आंदोलन उग्र हो जाता है.

युवाओं की यह भीड़ सत्ताधारियों की तलाश में सबकुछ तबाह करने पर तुल जाती है. सेना इस भीड़ को कंट्रोल नहीं कर पाती. इस बीच बड़े नेताओं के इस्तीफे का सिलसिला शुरू होता है और सेना इन्हें बचा कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा देती है. भीड़ की यह टेंडेंसी बिलकुल वैसी ही है जैसे बंगलादेश और ट्यूनेशिया में देखी गई थी.

पिछले एक दशक में इसी तरह का तख्तापलट श्रीलंका, बंगलादेश, यूक्रेन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार, ट्यूनीशिया, मिस्र, सूडान, माली, नाइजर, जौर्जिया, किर्गिस्तान, बोलीविया, थाईलैंड में भी हुआ.

इन सभी देशों में हुए जनआंदोलनों का परिणाम तख्तापलट के रूप में हुआ और सब से हैरानी की बात यह कि तख्तापलट के बाद जो भी नई सरकार बनी वो पूरी तरह अमेरिका कि पिट्ठू सरकार थी.

श्रीलंका में 2022 में इसी तरह का जन सैलाब उमड़ा और इस जनसैलाब ने तख्तापलट कर दिया. अमेरिका ने आर्थिक संकट से झूझते श्रीलंका की नई सरकार को 5.75 मिलियन डौलर की मानवीय सहायता भेजी. बंगलादेश में 2024 में जन आंदोलन के बाद बनी सरकार को अमेरिका ने समर्थन दिया. यूक्रेन में 2014 में हुए तख्तापलट के बाद अमेरिका ने नई सरकार को समर्थन दिया, जिस में सैन्य सहायता और आर्थिक पैकेज शामिल थे.

ट्यूनीशिया (2011), अमेरिका ने नई सरकार को सहायता दी. मिस्र (2013), अमेरिका ने नई सरकार को आर्थिक सहायता दी. सूडान (2019), अमेरिका ने नई सरकार को सहायता दी. बोलीविया (2019), अमेरिका ने नई सरकार को आर्थिक और सैन्य सहायता दी.

नेपाल में जनआंदोलन के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि नेपाल में केपी शर्मा ओली सरकार ने चीन से नजदीकी बढ़ाया जो अमेरिका को खटक रहा था. अमेरिकी साम्राज्यवादी मीडिया ने ओली सरकार के खिलाफ अफवाहें, फेक न्यूज फैलाना शुरू किया. इस प्रोपगंडा के खिलाफ ओली सरकार ने 4 सितंबर को फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब, व्हाट्सऐप सहित 26 प्लेटफौर्म्स पर नेपाल में प्रतिबंध लगा दिया.

इस के बाद नई युवा पीढ़ी जेनरेशन जी सोशल मीडिया पर लगे प्रतिबंध और भ्रष्टाचार खिलाफ सड़कों पर उतर गई.

नेपाल में जो कुछ हो रहा है वह अमेरिकी सम्राज्यवादी साजिश है या क्रांति. यह आने वाले वक़्त में नेपाली जनता को पता चल जाएगा. Nepal Revolution 

Nepal : जेन-जी ने फोड़ा बारूद

Nepal : नेपाल में जेनजी प्रोटेस्ट ने विद्रोह का रूप ले कर ओली सरकार का तख्ता पलट कर दिया है. यह प्रोटेस्ट 2 दिनों के भीतर इतना भड़का कि नेताओं को देश छोड़ कर भागना पड़ा. ऐसा ही पिछले साल बंगलादेश और श्रीलंका में हुआ. आखिर क्यों दक्षिण एशियाई देशों में जेनजी आंदोलन विद्रोहों में तब्दील हो रहे हैं?

लोकतंत्र अब नेताओं के लिए सिर्फ सत्ता पाने का खेल बन चुका है, लोकतंत्र के असली फायदे आम आदमी को नहीं मिल पा रहे हैं. लोकतांत्रिक देशों में अधिकांश नेता सिर्फ सत्ता का लुत्फ उठा रहे हैं और आम आदमी दो जून की रोटी को तरस रहा है. नेपाल में पिछले दिनों जेन-जी का जो बारूद फटा और जिस तरह नेपाल धूधू कर जला, वह नेताओं के भ्रष्टाचार और लालच का ही नतीजा है.

नेपाल का लोकतंत्र रेत पर बने घर की तरह ढह चुका है. इस से पहले बांग्लादेश और श्रीलंका की भी ऐसी ही हालत हुई थी. मिस्र (इजिप्ट) में भी लोकतांत्रिक सरकार बनने के प्रयास हुए, लेकिन हर बार वह भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग में फंसती रही. सरकार पर भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और तानाशाही के गंभीर आरोप लगे. प्रशासनिक तंत्र आम जनता की बजाय अपने परिवार और चंद विशेष वर्गों को लाभ पहुंचाने में लगा रहा.

इंडोनेशिया और फ्रांस भी जल रहा है क्योंकि वहां भी सत्ता पर भ्रष्टाचार और अपने अपनों को रेवड़ियां बांटे जाने से जनता त्रस्त है. फ्रांस की जनता में काफी रोष है, वे सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर चुकी है और ये सिर्फ सरकार की गलत नीतियों, घोर भ्रष्टाचार, आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता का परिणाम है.

नेपाल में सोशल मीडिया बैन को ले कर शुरू हुए प्रदर्शन की आग आज से नहीं, बल्कि काफी समय से धधक रही थी. सोशल मीडिया तो महज बहाना है, लोगों में आक्रोश दरअसल सरकार की नीतियों और कामकाज को ले कर ही था, जो सोशल मीडिया के माध्यम से उजागर हो रहा था और सरकार को नागवार गुजर रहा था.

नेपाल में सोशल मीडिया पर सरकार की करतूतों को उजागर करने का जिम्मा उठा रखा था जेन-जी ने. जेन-जी, यानी जेनेरशन-जी यानी वह युवा पीड़ी जो मिलेनियल्स के बाद आती है. 1997 से 2012 के बीच जन्में लोग जेन-जी कहे जाते हैं, जिन का बचपन और युवावस्था स्मार्टफोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल टैक्नोलौजी के साथ ही बीता है. यह वह जेनेरशन है जो दुनियाभर की ख़बरों, फैशन, विचारों और ट्रेंड्स से तुरंत जुड़ जाती है. वह जनरेशन जो सामाजिक मुद्दों पर जागरूक है, और सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे विश्व से कनेक्टेड है.

यह वह जेनेरशन है जो आज बढ़ते क्लाइमेट चेंज पर चिंतित है, जिस क्लाइमेट चेंज की कोई चिंता सरकार को नहीं है. यह वह जेनेरशन है जो एलजीबीटीक्यू+ के राइट्स के लिए सड़कों पर उतर पड़ती है. यह वह जेनेरशन है जो समाज में समानता की बात करती है जबकि राजनीतिक पार्टियां सत्ता पाने के लिए समाज में असमानता और विभाजन की गहरी खाईयां खोदती है.

4 सितंबर को जब नेपाल की ओली सरकार ने सोशल मीडिया पर बैन लगाया तो देश भर में हिंसा की आग भड़क उठी. सोशल मीडिया बैन के खिलाफ भड़का गुस्सा बेकाबू हुआ तो प्रदर्शनकारी युवाओं की भीड़ ने राष्ट्रपति भवन और राजनीतिक पार्टियों के दफ्तर फूंक डाले. नेताओं को दौड़ादौड़ा कर कूटा. वित्त मंत्री बिष्णु पौडेल को तो प्रदर्शनकारियों ने नंगा कर पानी में दौड़ादौड़ा कर लातघूसों से पीटने के वीडियो वाइरल हुए. बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने में सेना की कार्रवाई में 20 से ज्यादा युवा मारे गए और 600 से ज्यादा घायल हुए.

इसके बाद तो सत्ता में ओली सरकार का टिका रहना मुश्किल ही था. गृहमंत्री के बाद एकएक कर सभी मंत्रियों ने पद से इस्तीफा दे दिया. प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की हालत पतली हो गई और अंततः उन्हें भी काठमांडू छोड़ कर भागते देखा गया.

दरअसल नेपाल की ओली सरकार युवा वर्ग की अभिव्यक्ति की आजादी छीनने की कोशिश में थी. उस ने सोचा कि सोशल मीडिया पर काबू पा कर वह अपने कारनामे छुपा लेंगे और जेन-जी को काबू में कर लेंगे. मगर जेन जी के लिए सोशल मीडिया उस के खानेपीने और सांस लेने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है. नतीजा युवाओं के आक्रोश ने पूरी सरकार ही ध्वस्त कर दी. संसद और सुप्रीम कोर्ट को आग के हवाले कर लोकतंत्र के परखच्चे उड़ा दिए.

दरअसल जेनेरशन जी की सोच, काम करने का तरीका और मनोरंजन सब कुछ तेज है. ये जेनेरशन ज्यादा प्रेक्टिकल है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहती है. आज इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शौर्ट्स और स्नैपचैट जैसे प्लेटफौर्म पर यही जेनेरशन छाई हुई है. ये लोग दुनियाभर के ट्रेंड्स से जुड़ कर चलना चाहते हैं. चाहे वह कैरियर हो या लाइफस्टाइल. ये अपने फैसले खुद लेते हैं और काफी लिबरल हैं.

जेन जी पारम्परिक सरकारी नौकरी या खेती किसानी से हट कर स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, आईटी, क्रिएटिव इंडस्ट्री की तरफ जा रही है. विदेशों में शिक्षा और नौकरी के अवसर तलाशना भी नेपाल के जेन जी की बड़ी प्रवृत्ति है. नेपाल की लोकतंत्र संघीय व्यवस्था और संविधान की बहस में जेन जी का बड़ा रोल है. युवा मतदाता सोशल मीडिया के जरिये नेताओं को चुनौती देते हैं, ट्रेंड्स बनाते हैं और आंदोलन खड़े करने में आगे रहते हैं.

हाल ही में स्थानीय चुनावों में युवाओं की सक्रियता से नए, युवा और स्वतंत्र उम्मीदवारों को जीत हासिल हुई. गौरतलब है कि नेपाल में इंटरनेट और स्मार्टफोन का प्रसार पिछले एक दशक में बहुत तेजी से हुआ है और यहां का युवा वर्ग इस के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय खुल कर जाहिर करता है. ऐसे में सोशल मीडिया पर बैन लगाकर सरकार ने जलते तवे पर पैर रख दिया.

नेपाल में सरकार और नेताओं के भ्रष्टाचार के खिलाफ जेन जी के विद्रोह का तात्कालिक कारण भले ही सोशल मीडिया पर प्रतिबंध हो, मगर इस के पीछे एक बड़ी वजह रेमिटेंस पर निर्भर अर्थव्यवस्था भी है. नेपाल बहुत हद तक देश से बाहर रह कर काम कर रहे अपने नागरिकों की कमाई पर निर्भर है. यहां न तो युवाओं के लिए नौकरियां हैं और न ही दूसरे अवसर. अपनी आकांक्षाओं की आग में सुलग रहे जेन जी को इंटरनेट मीडिया का बड़ा सहारा है, जिस के माध्यम से उन की कुछ कमाई हो जाती है. यह पीढ़ी इंटरनेट के साथ पढ़ीबढ़ी है. फेसबुक और वाट्सएप जैसे ऐप लोगों के जीवन में बहुत अहम हैं.

ये ऐप युवाओं को रोजगार और आर्थिक अवसरों के अभाव के खिलाफ गुस्सा निकालने का मंच भी मुहैया करते हैं. इस के अलावा नेपाल के बहुत से नागरिक भारत के अलावा खाड़ी देशों और मलेशिया में काम करते हैं. फेसबुक और वाट्सएप के जरिये लोग अपने परिवार से संपर्क में रहते हैं. इस के अलावा इंटरनेट आधारित ऐसे ऐप भी हैं जिन के जरिये नेपाली अपने परिवार को पैसे भेजते हैं. ऐसे में सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर प्रतिबंध ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया.

गौरतलब है कि नेपाल की 8 प्रतिशत से अधिक आबादी दूसरे देशों में काम कर रही है और वहां से वह जो पैसे भेजते हैं, उस का देश की जीडीपी में योगदान 33% से अधिक है. टोंगा, तजाकिस्तान और लेबनान के बाद किसी देश की जीडीपी में रेमिटेंस की यह चौथी बड़ी हिस्सेदारी है. देश में रोजगार के अवसर न होने की वजह से ही लोग बाहर काम कर रहे हैं.

पिछले एक दशक में नेपाली युवाओं का शिक्षा और रोजगार के लिए विदेश में पलायन तेज हुआ है. लगभग 2200 नेपाली प्रतिदिन खाड़ी देश और मलेशिया जा रहे हैं. एक आंकड़े के अनुसार 40 लाख नेपाली नागरिक भारत सहित विदेशों में काम कर रहे हैं. वे बाहर के देशों की चकाचौंध से प्रभावित हैं. और अपने देश की गरीबी का कारण सरकार की गलत नीतियों, कामकाज और भ्रष्टाचार को मानते हैं. सरकार परियोजनाओं का बहाना ले कर अपने खजाने को खाली बताती है जबकि लोगों को जमीन पर सरकार की कोई परियोजना उतरती दिखाई नहीं देती है.

इस के अलावा आक्रोश का एक और कारण है. नेपाल में अभी तीन प्रमुख दल हैं. ये तीनों पार्टियां आपस में तालमेल कर सरकार बना लेती हैं. इस से इन्हीं दलों से जुड़े लोगों को सरकारी टेंडर या योजनाओं का फायदा मिलता है. इन सब चीजों ने तनाव भड़काने में भूमिका निभाई है.

जेन जी के विद्रोह ने यह तो तय कर दिया है कि यह पीढ़ी अन्याय को अपनी नियति के रूप में स्वीकार करने को हरगिज तैयार नहीं है. यह पीढ़ी दुनिया भर में अब खुल कर सरकारों को चुनौती दे रही है. नेपाल से इंडोनेशिया, श्रीलंका से बांग्लादेश तक एशिया के युवा असमानता और अन्याय के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं. जेन जी का गुस्सा अब केवल चिंगारी नहीं बल्कि एक ऐसी आग बन चुका है जो सरकारों को हिला रही है, नेस्तनाबूद कर रही है. फिलहाल नेपाल के युवाओं ने वहां की सरकार को उखाड़ फेंका है. अब वहां नए सवेरे की उम्मीद है. नई सरकार कब बनेगी और कितनी स्थिर होगी यह अभी भविष्य के गर्भ में है. मगर यह तय है कि नई सरकार जेन जी के सहयोग और उसकी राय से बनेगी.

अन्य देशों की बात करें तो सब से बड़े मुसलिम देश इंडोनेशिया में भी हालात बहुत खराब हैं. अगस्त के आखिरी हफ्ते में वहां सांसदों को मिलने वाले भारीभरकम आवास भत्तों के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर आई थी. ये भत्ते न्यूनतम मासिक वेतन से 10 गुना अधिक थे. कमर तोड़ मंहगाई से जूझती जनता के लिए यह अस्वीकार्य था. जनता में आक्रोश था और इस में जबरदस्त विस्फोट तब हुआ जब एक मोटरसाइकिल टैक्सी चालाक पुलिस की गाड़ी से कुचल कर मारा गया.

इस के बाद तो आक्रोशित युवाओं की भीड़ ने शीर्ष सांसदों के घरों में लूटपाट की, कारों को आग लगा दी, सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया. इंडोनेशिया में यह सब से हिंसक प्रदर्शन रहा जिस के बाद राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने सांसदों के बढे हुए भत्तों को वापस लिया और वित्त मंत्री मुल्यानी इंद्रावती को पद से हटा कर युवाओं के गुस्से पर पानी के छींटे मारने का प्रयास किया.

कई देशों में हो रहे इस तरह के प्रदर्शनों और उत्पात के पीछे साझा शिकायतें हैं. इंडोनेशिया की आधी आबादी 30 साल से काम उम्र की है जबकि नेपाल में यह आंकड़ा 56% है. दोनों देशों में बेरोजगारी और बढ़ती आय असमानता युवाओं में गुस्सा पैदा कर रही है. यह प्रदर्शन दर्शाते हैं कि युवाओं की एकजुटता सरकारों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर सकती है.

भारत में भी ऐसे प्रदर्शनों ने मोदी सरकार को कई नए और जनता पर जबरन थोपे गए कानून वापस लेने के लिए बाध्य किया. बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मामले में भारत के नेता-अधिकारी भी पीछे नहीं हैं. दुनिया में सब से बड़े और सबसे ज्यादा घोटाले भी भारत में ही होते हैं. पर अभी तक यहां जेन जी एकजुट नहीं हो पाया है क्योंकि सरकार ने बड़ी चालाकी से उस को हिंदूमुसलिम नफरत के प्रपंच और धार्मिक कर्मकांडों में उलझा रखा है. Nepal

Youth Loneliness : बुजुर्ग ही नहीं युवा भी हैं अकेलेपन का शिकार

Youth Loneliness : कहा जा रहा है कि डिजिटल युग में यूथ के पास बहुत कुछ है अपना समय बिताने के लिए मगर यही आयरनी है कि वे इस के बावजूद अकेले पड़ गए हैं. वर्चुअल दोस्तियों ने उन्हें असल दोस्त बनाने से बहुत दूर कर दिया है और वे अकेले पड़ने लगे हैं.

आज के तकनीकी युग में युवाओं के सामने एक बड़ी समस्या अकेलेपन की है, जो शहरों और महानगरों में बड़ी तेजी से बढ़ रही है. अस्पतालों के मनोरोग विभाग में बढ़ते युवा मरीज इस बात का सबूत हैं कि भारतीय समाज में अकेलापन मानसिक अस्थिरता और अवसाद का बड़ा कारण बन रहा है.

हम बूढ़े लोगों के अकेलेपन के लिए काफी चर्चा और चिंता करते हैं, मगर आज की युवा पीढ़ी जिस अकेलेपन से जूझ रही है उस की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता. आमतौर पर लोग युवाओं से जुड़ी इस समस्या को मजाक में उड़ा देते हैं. अरे भाई, तुम्हें क्या गम है? खाओ पियो मौज करो… तुमको कौन है रोकने टोकने वाला? अपनी मर्जी के मालिक हो. आदिआदि बातों से हम युवाओं के अकेलेपन की गंभीरता और अकेलेपन की समस्याओं को दरकिनार कर देते हैं.

युवाओं में अकेलेपन के कई कारण होते हैं, जिन्हें हम सामाजिक, मानसिक, पारिवारिक और तकनीकी दृष्टिकोण से समझ सकते हैं. आज के प्रतिस्पर्धात्मक जीवन में पढ़ाई, कैरियर और नौकरी की दौड़ में युवा अपने रिश्तों और दोस्ती के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं. उन का बहुत सारा समय किताबों, कम्प्यूटर, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर बीत रहा है. इस वजह से उन के ऐसे दोस्त नहीं बन पाते जिन से वे खुल कर अपनी निजी समस्याएं, भावनाएं और विचार शेयर कर सकें.

इस से पहले वाली पीढ़ी (45 से 65 आयुवर्ग) के पास आज भी ऐसे दोस्त हैं जिन से वे खुल कर बात कर लेते हैं और जिन के पास दोस्त की बात सुनने, समझने और सलाह मश्वरा करने के लिए वक्त भी है. वे एकदूसरे से मिलते हैं. पारिवारिक फंक्शन में एकदूसरे को बुलाते हैं. फोन पर भी घंटों बात कर लेते हैं. मगर आज की युवा पीढ़ी इस तरह की दोस्ती डेवलप नहीं कर पा रही है.

नौकरी और पढ़ाई के लिए अधिकांश युवा आज अपने गांव, शहर और देश छोड़ कर नई जगहों पर जाने रहने के लिए मजबूर हैं. जिस के कारण बचपन के दोस्त छूट जाते हैं और नई जगह पर जानपहचान वाले नहीं होते हैं. अब अनजान लोगों से तो आप अपनी निजी बातें या समस्याएं शेयर नहीं कर सकते हैं. ऐसे में कालेज या औफिस से लौट कर युवा घर के एकांत में खुद को डुबो लेता है. उस का सारा समय कंप्यूटर या मोबाइल फोन पर गुजरता है, जिस का हासिल कुछ नहीं है.

शहरों में बढ़ता फ्लैट कल्चर और खत्म होती महल्लेदारी ने भी आज के युवा को बहुत अकेला कर दिया है. 20 से 25 साल के बीच की आयु बड़ी भावुक मानी जाती है. इस समय युवा हर तरह के सपने देखता है. कैरियर के, पैसा कमाने के, अच्छे जीवनसाथी के, नए प्यार के, सैक्स के सपने वह देखता तो खूब है मगर उन के बारे में किसी से डिस्कस नहीं कर पाता है. पहले युवा लड़कियां महल्ले की भाभियों, दीदियों से अपनी राज की बातें, प्रेम की बातें शेयर कर लेती थीं. लड़के भी महल्ले के दोस्तों से दिल की बात बता लिया करते थे, मगर फ्लैट में रहने वाले युवा अपनी पसंदनापसंद किस को बताएं, उन्हें तो यह तक नहीं मालूम होता है कि उन के सामने वाले फ्लैट में कौन रहता है. बड़े शहरों में पड़ोसी और समाज से जुड़ाव बहुत कम हो गया है.

अब अधिकतर युवा अकेले या छोटे परिवारों में रहते हैं, जहां भावनात्मक सहारा कम मिलता है. यदि मातापिता दोनों वर्किंग हैं तो शाम को घर आने के बाद दोनों के पास इतना वक्त ही नहीं होता कि वे अपने जवान होते बच्चों के पास कुछ देर बैठ सकें और उन से दिन भर की दिनचर्या पर बातचीत कर सकें. कभीकभी तो वे औफिस की टेंशन लेकर घर लौटते हैं और अपनी फ्रस्टेशन एकदूसरे पर या बच्चों पर ही निकालने लगते हैं.

ऐसे में युवा बच्चा अपने मन की बात तो कर ही नहीं पाता है. ऐसे परिवार और उस में रहने वाले युवा एक मशीनी जिंदगी जीते नजर आते हैं. कई बार कैरियर, शादी या लाइफस्टाइल से जुड़ी अपेक्षाएं युवाओं को अपने मातापिता से भी अलगथलग कर देती हैं. आज मातापिता और बच्चों के बीच पीढ़ीगत अंतर के कारण भी बातचीत और भावनात्मक जुड़ाव कम होता जा रहा है.

सोशल मीडिया आज के युवा वर्ग के लिए बहुत बड़ा छलावा है. उन के औनलाइन तो बहुत सारे दोस्त होते हैं, मगर असल जीवन में कोई उन का नहीं होता. डिजिटल कनेक्शन ज्यादा, असली रिश्ते कम – जिस से अकेलेपन की भावना बढ़ती है. युवा वास्तविक समाज से कट कर वर्चुअल दुनिया में जीने लगता है और धीरेधीरे मनोरोगी हो जाता है.

आज का युवा अकेलेपन की स्थिति का सामना इसलिए भी कर रहा है क्योंकि वह खुद को स्वतंत्र रखना चाहता है. मांबाप की रोकटोक उसे पसंद नहीं है. वह खुद को मातापिता से ज्यादा स्मार्ट और इंटेलिजेंट समझता है. लिहाजा वह काफी समय अपने कमरे में बंद हो कर बिताता है. अत्यधिक आत्मनिर्भरता उस पर हावी हो जाती है और धीरेधीरे उस में अकेले रहने की आदत डेवलप होने लगती है, जो आगे चल कर खतरनाक साबित होती है.

देर से शादी या रिलेशनशिप में अस्थिरता भी अकेलेपन का एक बड़ा कारण है. परफैक्ट लाइफ का दबाव, समाज और सोशल मीडिया पर आदर्श जीवन दिखाने की होड़ से अनेक युवा खुद को असफल मानने लगते हैं और अलगथलग महसूस करते हैं. कुल मिला कर, युवाओं में बढ़ता अकेलापन केवल “साथी की कमी” नहीं है, बल्कि सामाजिक संरचना, तकनीकी बदलाव और मानसिक दबाव का मिश्रण है.

अकेले युवा की समस्याएं

अकेले रहने वाले युवा कई तरह की समस्याओं का सामना करते हैं. सब से पहली समस्या खानेपीने को ले कर होती है. अगर उसे खाना बनाना नहीं आता या रोजरोज खाना बनाना नहीं चाहता तो हर दिन बाहर का खाना कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां पैदा करती हैं जिन का मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है.

पेइंग गेस्ट की तरह किसी दूसरे के घर पर रहने में भी कई तरह की पाबंदियां होती हैं. जैसे नौनवेज नहीं खाओ, दोस्तों को कमरे पर मत बुलाओ, देर रात तक बाहर मत रहो, छत पर मत टहलो, आदिआदि. जो युवा कमरा या घर किराए पर ले कर रहते हैं, यदि वे बीमार पड़ जाएं तो कोई उन की देखरेख करने वाला या हहौस्पिटल ले जाने वाला भी नहीं होता है. कोई आर्थिक समस्या सामने आ जाए तो अकेले युवा को कोई उधार पैसे भी नहीं देता है. और घर से पैसे मंगवाना अपराधबोध सा महसूस होता है.

अकेला युवा लड़का पड़ोस में रह रहा हो तो आसपास की आंटियां अपनी लड़कियों को उधर न देखने की ऐसे हिदायतें देती हैं जैसे वहां कोई अछूत रह रहा हो. युवा लड़की कमरा ले कर अकेले रह रही हो तो महल्ले के लड़के बुरी नजर रखने लगते हैं. हर व्यक्ति उससे फ्रैंडली होने लगता है. वह देर रात घर लौटे तो पड़ोस की महिलाओं में खुसुरपुसुर शुरू हो जाती है. वह अपने पतियों बेटों को हिदायतें देने लगती है.

कहने का अर्थ यह कि घर से दूर रहने वाला युवा न सिर्फ आर्थिक और व्यावहारिक कठिनाइयों से गुजरता है, बल्कि उसे मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी बड़ी चुनौतियां झेलनी पड़ती हैं.

अकेलेपन से कैसे बचें

अकेलापन हमेशा कमजोरी नहीं होती, बल्कि यह समय खुद को समझने और अपने भीतर की ताकत को पहचानने का भी होता है. अकेलेपन को यदि सही ढंग से संभाला जाए तो यह आत्म-विकास का अवसर भी बन सकता है. 20 से 25 वर्ष की उम्र भावुकता और प्रेम में बहने की होती है. बहुत सारे युवा अपने एकांत को रचनाकारिता में बदल लेते हैं. गौरतलब है कि बड़ेबड़े शायरों और कवियों ने अपनी सब से रोमांटिक रचनाएं इसी उम्र में रचीं. कमरे के एकांत में भावनाएं जब कोरे कागज पर उतरती हैं तो वह इतिहास भी बन सकती हैं.

इसलिए अकेलेपन का रोना न रोएं बल्कि संगीत, पेंटिंग, लेखन, फोटोग्राफी जैसी रचनात्मक गतिविधियां अपना लें. नई भाषा, नया कोर्स या कोई स्किल सीखना शुरू कर दें. जब आप को कोई रोकनेटोकने वाला ही नहीं है तो खेलकूद या योग जैसी शारीरिक गतिविधियां करें. बौडी बनाएं. किसी क्लब, ग्रुप या औनलाइन कम्युनिटी से जुड़ जाएं, जहां समान रुचियों वाले लोग मिलते हों. परिवार या दोस्तों से फोन या वीडियो कौल पर बात करें. पुराने दोस्तों के नंबर निकालें और उन से फिर से जुड़ें. पूछें कि कौन कहां है और क्या कर रहा है. यकीन मानिए आप को और आप के दोस्त दोनों को अच्छा महसूस होगा.

अजनबी शहर में अकेले रहना हो तो खाली समय में किसी एनजीओ के साथ जुड़ कर समाजसेवा के कार्य में अपना योगदान दिया जा सकता है. किसी वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम में जा कर उन का अकेलापन बांट आएं. अच्छा लगेगा. अकेले हों तो आत्मविश्लेषण करें, लक्ष्य बनाएं और उन्हें प्राप्त करने के रास्ते सोचें. किताबें पढ़ें, डायरी लिखें, या अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए जर्नलिंग करें. शहर के ऐतिहासिक स्थलों को देखने जाएं और उन का इतिहास तलाशें, इस से ज्ञान में भी वृद्धि होगी. हां, सोशल मीडिया पर कम जाएं. इस पर भी अकेलापन खाए तो काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की मदद लेने में देर न लगाएं. Youth Loneliness

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