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Bihar Election Result 2025: देश की जरूरत है पार्टी में ‘नम्बर – 2’ का मजबूत नेता

Bihar Election Result 2025: राजनीतिक दलों में पार्टी उपाध्यक्ष के पद पर कमजोर नेता रखे जाते हैं. उस से मजबूत नेता महासचिव के पद पर होते हैं. पार्टी का संविधान पार्टी उपाध्यक्ष को ही सब से प्रमुख मानता है क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद वह ही सब से प्रमुख होता है. उस की जिम्मेदारी अधिक होती है. ऐसे में पार्टी के संगठन और नंबर दो के नेता का मजबूत होना जरूरी होता है.

 

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का काम देश का प्रबंध संभालना होता है. ऐसे में अगर किसी सत्ताधारी दल में उत्तराधिकार का संकट आता है तो उस का प्रभाव देश की जनता पर पड़ता है. हमारे समाज में एक सामान्य नियम सा है कि पूरा परिवार एक साथ सफर नहीं करता. उस के पीछे का मकसद यह होता है कि अगर कोई दुर्घटना हो तो परिवार को चलाने वाला कोई न कोई व्यक्ति बचा रहे. देश को चलाने का काम राजनीतिक दलों का है. ऐसे में उन के लिए यह नियम बनना चाहिए जिस से पार्टी में कोई संकट न आ सके जिस का प्रभाव देश पर पड़े.

कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जब हत्या हुई तो पार्टी को संभालने के लिए राजीव गांधी को सामने लाया गया. राजीव गांधी की हत्या के बाद जब सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान नहीं संभाली तो पीवी नरसिम्हाराव को सामने लाया गया. भारतीय जनता पार्टी में वर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल एक साल पहले खत्म हो गया है. इस के बाद भी वह पार्टी अध्यक्ष बने हुए हैं. अटल, आडवाणी और जोशी के दौर में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोषी के रूप में उत्तराधिकारी मौजूद थे.

अटल बिहारी वाजपेयी जब पीएम थे तो लालकृशण आडवाणी डिप्टी पीएम थे. आज की भाजपा में यह नहीं है. दुनिया की सब से बड़ी ताकत वाला देश भी इस तरह की व्यवस्था कर के चलता है. इस की वजह यह है कि देश को चलाने का काम सरकार करती है. सरकार को बनाने का काम राजनीतिक दल करते हैं. इन दलों के सामने देश की जनता का प्रबंधन करना होता है. किसी भी सूरत में जनता को अनाथ नहीं छोड़ा जा सकता है. ऐसे में उपाय कर के चलना ही समझदारी होती है. अमेरिका जैसे ताकतवर देश भी इस तरह की व्यवस्था कर के चलते हैं.

 

अमेरिका में क्या होता है ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’

अमेरिका में ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ नाम से एक नेता का चुनाव लंबे समय से होता आ रहा है. वैसे अमेरिका का व्हाइट हाउस कभी भी ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करता. वो उन्हें ‘उपस्थित न होने वाला कैबिनेट सदस्य’ कहता है. इस व्यक्ति को एक सुरक्षित और गुप्त स्थान पर रखा जाता है, जहां से वह आपातकालीन स्थिति में काम कर सके.

डोनाल्ड ट्रंप ने जब 20 जनवरी को संयुक्त राज्य अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली तो उन के नए प्रशासन के सभी लोग वहां मौजूद नहीं थे. शपथ ग्रहण समारोह और स्टेट औफ द यूनियन एड्रेस (सालाना भाषण) जैसे आयोजनों के लिए एक ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ चुना जाता है. यह व्यक्ति, आमतौर पर राष्ट्रपति के मंत्रिमंडल का कोई व्यक्ति होता है, जिसे कार्यक्रम में शामिल न होने के लिए चुना जाता है.

जिस से किसी इमरजैंसी में राष्ट्रपति पद का उत्तराधिकार बरकरार रखा जा सके. यह इसलिए किया जाता है कि राष्ट्रपति की मृत्यु या अक्षम होने की स्थिति में उन का उत्तराधिकारी कौन होगा ? वैसे तो उपराष्ट्रपति और सदन के अध्यक्ष सहित लगभग 20 अधिकारियों की सूची है जो राष्ट्रपति पद के उत्तराधिकारी हो सकते हैं. इस के बाद भी ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ उस स्थिति में राष्ट्रपति के पद पर आ सकता है जब वे सभी लोग किसी भयावह घटना में मारे गए हों.

ऐसे बहुत कम मौके होते हैं जब अमेरिका के शीर्ष नेता एक ही कमरे में इकट्ठा होते हैं. आम तौर पर राष्ट्रपति के स्टेट औफ द यूनियन एड्रेस यानी सालाना भाषण में न केवल राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और कांग्रेस के दोनों सदन बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सभी 9 न्यायाधीश और राष्ट्रपति के मंत्रिमंडल के सदस्य भी शामिल होते हैं. यह कल्पना करना जितना भयानक है इस तरह के आयोजन के दौरान कैपिटल बिल्डिंग पर टारगेटेड परमाणु हमला या आतंकवादी हमला एक झटके में अमेरिकी संघीय सरकार के लगभग पूरे नेतृत्व को मिटा सकता है.

 

कैसे चुना जाता है डेजिग्नेटेड सर्वाइवर

डेजिग्नेटेड सर्वाइवर का चयन राष्ट्रपति और उन के सलाहकारों द्वारा किया जाता है. इस के लिए आमतौर पर कैबिनेट के किसी सदस्य को चुना जाता है, जो संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति पद के लिए पात्र हो. डेजिग्नेटेड सर्वाइवर की पहचान आमतौर पर सार्वजनिक नहीं की जाती है, ताकि उन की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. कुछ मामलों में मीडिया या जनता को इस की जानकारी मिल जाती है.

शपथ ग्रहण समारोह और स्टेट औफ द यूनियन एड्रेस आयोजन के लिए ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ का नाम गुमनाम रखा जाता है. आम तौर पर शपथ ग्रहण के लिए निवर्तमान प्रशासन डेजिग्नेटेड सर्वाइवर को चुनता है. 2021 में जो बाइडन के शपथ ग्रहण समारोह के लिए चुने गए ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ के नाम का कभी खुलासा नहीं किया गया. 2017 में डोनाल्ड ट्रंप के पिछले शपथ ग्रहण समारोह के लिए, दो ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ थे. एक थे रक्षा सचिव जेह जौनसन जिन्हें निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चुना था. दूसरे थे सीनेटर ओरिन हैच जिन्हें ट्रंप ने चुना था.

‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ की परंपरा शीत युद्ध के दौरान शुरू हुई थी, जब परमाणु हमले का खतरा अधिक था. इस का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अगर किसी आपदा या हमले में सरकार के सभी उच्च पदाधिकारी मारे जाएं, तो भी देश का नेतृत्व करने के लिए कोई व्यक्ति मौजूद हो. क्योंकि शीत युद्ध के समय सोवियत संघ के साथ तनाव चरम पर था. उस दौर में यह अकल्पनीय नहीं था कि सोवियत संघ परमाणु हथियार से कैपिटल पर निशाना नहीं साधेगा. माना जाता है कि यह परंपरा कम से कम 1960 के दशक से चली आ रही है.

कांग्रेस ने 1792 में मूल राष्ट्रपति उत्तराधिकार अधिनियम पारित किया, जिस में उपराष्ट्रपति के बाद सीनेट के अस्थायी अध्यक्ष को नोमिनेट किया गया. उस के बाद प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष को नोमिनेट किया गया. इस अधिनियम में 1886 और 1947 में दो बार संशोधन किया गया जब यह उत्तराधिकार के वर्तमान क्रम पर पहुंचा. उपराष्ट्रपति, सदन के अध्यक्ष, सीनेट के अस्थायी अध्यक्ष, उस के बाद राष्ट्रपति के मंत्रिमंडल के सदस्य उसी क्रम में आते हैं जिस क्रम में उन के मंत्रिमंडल के पद बनाए गए थे. जो राज्य सचिव से शुरू हो कर रक्षा सचिव के साथ समाप्त होता है.

2023 में, राष्ट्रपति जो बाइडन के स्टेट औफ द यूनियन एड्रेस के दौरान वाणिज्य सचिव गीना रायमोंडो को ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ चुना गया था. 2016 में, तत्कालीन गृह मंत्री जेह जॉनसन को ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ चुना गया था. यह परंपरा अमेरिकी सरकार की सुरक्षा और उत्तराधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है. व्हाइट हाउस द्वारा स्वीकार किए गए पहले नोमिनेटेड ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ शिक्षा सचिव टेरेल बेल थे, जो राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के 1981 में कांग्रेस के संयुक्त सत्र में दिए गए संबोधन में अनुपस्थित थे, लेकिन काफी समय बाद तक बेल की पहचान नहीं हो पाई थी.

 

मराठा राज रहा प्रभावी:

भारत के इतिहास को देखें तो यह बात आसानी से समझी जा सकती है. जहां सही उत्तराधिकारी नहीं थे वह राज खत्म हो गया. भले ही राजा कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो ? सही उत्तराधिकारी न होने के कारण राज्य खत्म होते देखे गए हैं. इस कारण राजा हमेशा जब बूढ़ा हो जाता था तो अपना उत्तराधिकारी चुन लेता था. जहां सही उत्तराधिकारी नहीं बने वह राज्य खत्म हो गया. मराठा साम्राज्य भी इस का एक उदाहरण है. 17वीं शताब्दी में दक्षिण एशिया के एक बड़े भाग पर मराठों का प्रभाव था. छत्रपति शिवाजी के राज्याभिषेक के बाद अस्तित्व में आया यह राज्य 1761 में पानीपत का तृतीय युद्ध के साथ खत्म होता गया.

17 वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में मराठे प्रमुख हो गए थे. जिन्होंने आदिल शाही वंश के खिलाफ विद्रोह किया और अपनी राजधानी के रूप में रायगढ के साथ एक हिंदवी स्वराज्य का निर्माण किया. शिवाजी के पिता महाबली शहाजी राजे ने उस से पहले तंजावुर पर विजय प्राप्त की थी. जो छत्रपती शिवाजी के सौतेले भाई वेंकोजीराव उर्फ एकोजीराजे को विरासत में मिला था. उस राज्य को तंजावुर मराठा राज्य के रूप में जाना जाता था. बैंगलोर जो 1537 में विजयनगर साम्राज्य के एक जागीरदार, केम्पे गौड़ा द्वारा स्थापित किया गया था, जिस ने विजयनगर साम्राज्य से स्वतंत्रता की घोषणा की थी उसे 1638 में उन के उपसेनापति, शाहजीराजे भोंसले के साथ, रानादुल्ला खान, के नेतृत्व में एक बड़ी आदिल शाही बीजापुर सेना द्वारा कब्जा कर लिया गया था.

मुगल-मराठा युद्धों के दौरान मराठे अपने क्षेत्र को मजबूत करने में सक्षम थे और बाद में मराठा साम्राज्य पूरे भारत में फैल गया. पेशवाओं को मराठा साम्राज्य के प्रधान मंत्री के रूप में काम करने का जब मौका मिला तब मराठा शासन का विस्तार अटक से कटक तक ओर गुजरात से बंगाल दक्षिण से उत्तर से पाकिस्तान पेशावर ध्लाहौर तक फैला हुआ था. छत्रपती ने मुगल सिंहासन को समाप्त करने के लिए सदाशिव राव भाव को दिल्ली भेजा था. 1761 में मराठा सेना ने अफगान दुर्रानी साम्राज्य के अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ पानीपत का तीसरा युद्ध हार गए, जिस से उन का अफगानिस्तान में साम्राज्य विस्तार नहीं हो पाया.

ईस्ट इंडिया कंपनी ने पुणे में पेशवा पद के उत्तराधिकार संघर्ष में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया, जिसके कारण, पहला एंग्लो मराठा युद्ध हुआ. जिसमें मराठे विजयी हुए. दूसरा और तीसरा एंग्लो-मराठा युद्ध (1805 से 1818 तक) में उन की पराजय होने तक, मराठे भारत में शक्ति केन्द्र बने रहे. अंगरेजों के सामाने सही उत्तराधिकारी न होने से मराठों का संघर्ष टिक नहीं पाया. मुगल से ले कर मराठों तक कई ऐसे उदाहरण है जहां सही उत्तराधिकारी न होने से पूरा राज्य खत्म हो गया. दूसरों ने उस पर कब्जा कर लिया.

 

राजनीतिक दलों में बढ़ती जिम्मेदारी

देश के आजाद होने के बाद लोकतंत्र में राजषाही खत्म हो गई तो यह जिम्मा राजनीतिक दलों के उपर आ गया. वह देश की जनता की हिफाजत करें. इस में सब से प्रमुख वह दल होता है जो सत्ता में होता है. उस दल में नम्बर दो की हैसियत हमेशा उस पार्टी के प्रमुख यानि राष्ट्रीय अध्यक्ष की होती है. आज केन्द्र में भाजपा की सरकार है. उस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर सब की निगाह रहती है. भारतीय जनता पार्टी के संविधान के अनुसार प्रत्येक सदस्य को 9 साल के बाद अपनी सदस्यता का नवीनीकरण कराना होता है. इस के तहत प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष को भी अपनी सदस्यता का नवीनीकरण कराना होता है.

राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल 3 साल का होता है. एक व्यक्ति लगातार 2 बार से ज्यादा इस पद पर रह नहीं सकता है. पार्टी के संविधान की धारा 20 के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष को 120 सदस्यों वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन का अधिकार होता है. पार्टी की रणनीति बनाना, चुनावी उम्मीदवारों को चयन करना और संगठन को मजबूत बनाने के लिए काम करने की जिम्मेदारी उस के ही कंधों पर होती है. ऐसे में वह कई बार प्रधानमंत्री के भी ऊपर होता है. जब प्रधानमंत्री उस की पार्टी का हो.

भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल 2022 में खत्म हुआ तो उस को 2024 लोकसभा चुनाव तक बढ़ा दिया गया. लोकसभा चुनाव के बाद जब नरेन्द्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो जेपी नड्डा केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो गए. भाजपा का पार्टी संविधान कहता है कि एक व्यक्ति एक ही पद पर रह सकता है. जेपी नड्डा 2024 जून माह से लगातार दो पदों पर बने हैं. वह केन्द्रीय मंत्री भी हैं और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए दूसरा कोई बेहतर नेता ही नहीं है. इस की वजह यह है कि मोदीशाह की जोड़ी ऐसा राष्ट्रीय अध्यक्ष चाहती है जो उन के अनुसार काम कर सके.

हर पार्टी में प्रमुख नेता अपने आसपास कमजोर नेताओं को रखना चाहते हैं. वैसे यह बात ठीक नहीं होती है. पार्टी में नम्बर दो की हैसियत वाला नेता मजबूत होना चाहिए. जिस से वह इमरजैंसी में देश और पार्टी दोनों को संभाल सके. भारत में पार्टी और सरकार दोनों में ही नम्बर एक पर रहने वाला नेता नम्बर दो पर कमजोर नेता को ही रखना चाहते हैं. इसलिए पार्टी टूटती है. समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में टूट गई इस की वजह यह थी कि मुलायम सिंह यादव ने अपने समय नम्बर दो रहने वाले नेता शिवपाल यादव की जगह पर अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बना दिया.

अपना दल में विभाजन इस लिए हुआ क्योंकि उस की नेता अनुप्रिया पटेल ने अपनी मां या बहन की जगह पर अपने पति को जिम्मेदारियां सौंप दी. इस के बाद अपना दल एस और अपना दल कमेरावादी में बंट गया. जवाहरलाल नेहरू के बाद जब कांग्रेस में इंदिरा गांधी को उत्तराधिकारी बनाया गया तो कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ दी. राजनीतिक दल छोटे हो या बड़े उन को अपना पार्टी तंत्र इस तरह से बनाना चाहिए कि नम्बर दो का नेता किसी भी इमरजैंसी को संभालने की हालत में तैयार रहे.

राजनीतिक दलों में पार्टी उपाध्यक्ष के पद पर कमजोर नेता रखे जाते हैं. उस से मजबूत नेता महासचिव के पद पर होते हैं. पार्टी का संविधान पार्टी उपाध्यक्ष को ही सब से प्रमुख मानता है क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद वह ही सब से प्रमुख होता है. उस की जिम्मेदारी अधिक होती है. ऐसे में पार्टी के संगठन और नंबर दो के नेता का मजबूत होना जरूरी होता है. आज के दौर में कोर्ट का दखल हर जगह बढ़ गया है. किसी विवाद का फैसला वहां होता है. ऐसे में एक चूक भारी पड़ती है, जैसे शिवसेना में उत्तराधिकार का विवाद को कोर्ट गया तो पार्टी के चुनाव चिन्ह पर अधिकार एकनाथ शिंदे को मिला. उद्धव ठाकरे हाथ मलते रह गए. ऐसे में राजनीतिक दलों  को अपने संगठन के चुनाव और पदाधिकारियों को ठीक से रखना चाहिए. नहीं तो परेशानी खड़ी होते देर नहीं लगेगी. Bihar Election Result 2025.

SC News: सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक मामला, जो अदालतों के लिए लैंडमार्क केस बन गया

SC News: अदालतों के इतिहास में कई बार ऐसे मामले सामने आते हैँ जिनमें अदालतों के फैसले अलग अलग होते हैँ. ऐसे कुछ मामलों में जब हाईकोर्ट भी कन्फ्यूज़्ड नजर आता है तब सुप्रीम कोर्ट अदालतों को न्याय का रास्ता दिखाता है. ऐसा ही एक मामला समर घोष और जया घोष का है जिसमें समर घोष ने अपनी पत्नी पर मानसिकता क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर की थी. निचली अदालत और हाई कोर्ट इस मामले पर कन्फ्यूज़्ड थे मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मानसिकता क्रूरता की ऐसी व्याख्या की जो आज भी अदालतों के लिए एक लैंडमार्क है.

क्या है पूरा मामला?

समर घोष एक सरकारी अधिकारी थे और जया घोष एक डॉक्टर थीं. दोनों की शादी 1984 में हुई थी, लेकिन वैवाहिक जीवन में कलह बढ़ती गई. समर घोष ने पत्नी पर मानसिक क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की. ट्रायल कोर्ट ने समर घोष की तलाक याचिका खारिज कर दी. समर घोष हाईकोर्ट गये जहाँ उनकी तलाक याचिका स्वीकार कर ली गई और हाईकोर्ट ने समर घोष के पक्ष में फैसला सुना दिया. हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ जया घोष सुप्रीम कोर्ट गईं. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और समर घोष की तलाक की याचिका ख़ारिज कर दी.

जस्टिस बी.एन. अग्रवाल और पी.पी. नाओते की बेंच ने पाया कि पत्नी के व्यवहार में क्रूरता के सबूत नहीं थे. इस मामले में पत्नी का पति के परिवार से दूरी बनाना या कभी-कभी तीखे शब्द कहना क्रूरता नहीं माना गया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानसिक क्रूरता की अवधारणा समय, संस्कृति और सामाजिक परिवर्तनों के साथ बदलती रहती है. इसे स्थाई रूप से परिभाषित नहीं किया जा सकता.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इरिट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को तलाक का स्वतंत्र आधार मानने से इनकार किया क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने मानसिक क्रूरता को समझाने के लिए 16 उदाहरण दिए.

  1. वैवाहिक दायित्वों से लगातार इनकार (Persistent denial of marital obligations)
  2. लंबे समय तक शारीरिक संबंध से इनकार बिना उचित कारण (Unilateral refusal of physical intimacy without consent)
  3. एकतरफा फैसला लेकर दूसरे को सूचित न करना (Unilateral decision affecting matrimonial home without consent)
  4. झूठे या परेशान करने वाले आरोप लगाना (False and vexatious allegations)
  5. पति/पत्नी को सामाजिक रूप से अपमानित करना (Social humiliation)
  6. लंबे समय का अलगाव (Long periods of separation without reason)
  7. घरेलू हिंसा या धमकी (Threats of violence)
  8. मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार (Conduct causing mental agony)
  9. धार्मिक या सांस्कृतिक विश्वासों का अपमान (Insult to religious beliefs)
  10. आर्थिक शोषण या संपत्ति पर अनुचित दावा (Unreasonable material demands)
  11. बच्चों का उपयोग हथियार के रूप में (Using children as pawns)
  12. नौकरी या करियर में बाधा डालना (Interference in career)
  13. बार-बार तलाक की धमकी (Repeated threats of divorce)
  14. परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार (Ill-treatment of family members)
  15. सामाजिक बहिष्कार (Social ostracism)
  16. अन्य कोई व्यवहार जो विवाह को असहनीय बना दे (Any conduct making cohabitation impossible)

मानसिक क्रूरता को परिभाषित करने में सुप्रीम कोर्ट के ये उदाहरण अदालतों को मार्गदर्शन देते हैं. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार मानसिक क्रूरता परिस्थितियों पर निर्भर करती है. यह केस मानसिक क्रूरता को शारीरिक क्रूरता के समान महत्वपूर्ण मानता है.

समर घोष बनाम जया घोष का यह मामला भारतीय कानून में एक महत्वपूर्ण लैंडमार्क केस बन गया है, जो हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) की व्याख्या करता है. इस केस ने Divorce के मामलों में मानसिक क्रूरता को परिभाषित किया. तलाक के कई मामलों में इस केस को उदाहरण के तौर पर लिया जाता है. SC News.

Hindi Vyangya: व्यंग्य- फर्जी हुई तो क्या हुआ

Hindi Vyangya: हमारे महल्ले के वरिष्ठ नागरिकों के पास एकदूसरे की टांग खींचने के सिवा कोई काम नहीं. दूसरे काम वे कर भी नहीं सकते. सुबह चाय ली और लग गए आज जिस की टांग खींचनी है, उस प्रोजैक्ट पर काम करने. चाय के बाद बैठे तो प्रभु पूजन को परलोक सुधारने के लिए, लेकिन दिमाग में प्रोजैक्ट वही. बैठे हैं प्रभु भजन को, सोचन रहे टांग. वैसे, गीता में कहा भी है कि कर्म ही पूजा है. यहां कुकर्म/सुकर्म कुछ नहीं. सब व्यक्ति सापेक्ष है. जो बलवान है उस के कुकर्म सुकर्मों से भी आगे का फल देते हैं.

फिर लंच किया और दो घड़ी सुस्तातेसुस्ताते भी लगे रहे किसी की टांग खींचने के प्लान को अमली जामा पहनाने, भले ही खुद उस वक्त पाजामा पहना हो या न. रात को डिनर किया और डिनर के बाद बिस्तर पर पड़ेपड़े करते रहे मंथन कि आज जिस की टांग खींची थी, उस में कहां, कैसे, क्या तकनीकी कमी रह गई थी जो टांग खींचने के बदले उस की टांग मरोड़ने के बाद भी मजा नहीं आया ताकि कल जो किसी की टांग खींची जाए तो वह कमी न रहे.

इसी क्रम के उपक्रम में हर रोज आठ पहर चौबीस घंटे अपने महल्ले के कुछ खास वरिष्ठ टाइप के वरिष्ठ चैलेंज देते हुए दूसरों की टांग खींचने का परमानंद लेते हैं तो कुछ दब्बू टाइप के टांगखेंचू या सरेआम जिन में टांग खींचने का दुस्साहस नहीं होता वे परोक्ष में किसी दूसरे की टांग पर अपनी टांग रख दूसरों की टांग खींचने का जौहर दिखाते हैं.

निर्लिप्त भाव के टांग खेंचुओं की सब से बड़ी तमन्ना, बस, यही होती है कि उन्हें बातबेबात किसी की भी टांग खींचने का नियमित जौब मिलता रहे तो वे स्वर्ग (अगर कहीं है तो) में. जबजब उन की यह इच्छा पूरी हो जाए तो वे तब तक उस की टांग खींचने से नहीं छोड़ते जब तक उन्हें कोई अगली टांग खींचने को नहीं मिल जाती. जो ऐसा न हो तो वे गुस्से में अपने समय को कोसते हुए अपनी ही टांग खींच लेते हैं, अपने समय को सौसौ जूते मारते हुए.

तो जनाब! किसी की भी, कभी भी, कहीं भी टांग खींचने के मामले में मेरे और उन के बीच एमओयू साइन हुआ है. इसलिए मैं और वे एकदूसरे के टांगखींची दोस्त हैं. हम दोनों पूरी ईमानदारी व निष्ठा से दूसरों की टांग मिल कर खींचते हैं. जो आज के दौर में मिल कर कोई भी काम करें, उन की जीत पक्की नहीं, बिलकुल पक्की होती है. संघे शक्ति ठगेयुगे! वैसे, चोरीचोरी हम एकदूसरे की टांग भी कभीकभार खींच लेते हैं. ऐसा करने से टांग खींचने की मौक रिहर्सल हो जाती है. कल वे चाय पीने के बहाने मुझे गुप्त सूचना देने आए. आते ही बोले, ‘यार, महल्ले के सीनियरों से सीनियरों का एक धड़ा तुम्हारी डिग्री की टांग खींचने की तैयारी में है. वे कह रहे हैं, ‘तेरी डिग्री फर्जी है.’

‘कहने दो, मैं तो उसी डिग्री के सहारे 30 साल तक सीना तान कर प्रोफैसरी कर के ससम्मान रिटायर भी हो चुका हूं. अब रिटायरमैंट के बाद क्या असली, क्या नकली. कुत्तों को भूंकने से और विपक्ष को हमजैसों पर कीचड़ उछालने से कौन रोक सकता है भला,’ मैं ने अपनी पीठ खुद ही ठोकते हुए कहा.

‘मतलब?’

‘ मतलब यह कि असली यहां आज है ही कौन? यहां न संस्कार असली हैं न चमत्कार असली. ऐसे में पता नहीं इन्हें किसी की डिग्री को चैंलेज करने से मिलता क्या है? अरे, हर डिग्री एक कागज का टुकड़ा ही तो है. चाहे असली हो या नकली. डिग्री फर्जी भी होगी तो मेरी ही है न! उन की तो नहीं है न! जब मैं ही किसी की असली डिग्री को चैलेंज नहीं कर रहा तो वे मेरी डिग्री की असलियत या उस के फर्जीपने को ललकारने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रखते. जिन की असली डिग्रियां हों वे संभाले रहें अपनी असली डिग्रियां, अपनी छाती से लगाएचिपकाए अपने पास और खाते रहें औफिसऔफिस धक्के. देते रहें इस को उस को जस्टिफिकेशन कि साहब, मेरी डिग्री सोलह आने टंच हैं. पर जो सब के पास असली डिग्रियां होने लगें तो देश में असली डिग्रियों वाले कागज की कमी पड़ जाए. असली डिग्रियां छापने को स्याही विदेश से मंगवानी पड़े. विश्वविद्यालयों में उन का रिकौर्ड मेनटेन करने को रजिस्टर कम पड़ जाएं. अच्छा तो एक बात बताओ, यहां असली डिग्रियों से आज तक कौन बड़ा हुआ? असली डिग्री वाले भी कुछ न कुछ सपोर्टिंग अपने पास फर्जी रख ही लेते हैं वक्त पर काम आने के लिए. आदमी डिग्रियों से बड़ा नहीं होता, आदमी बड़ा होता है तो पढ़ेलिखों को उल्लू बनाने से. और वह मैं मजे से बनाता रहा हूं, बनाता रहूंगा. तुम ने मदारी का खेल देखा है क्या?’

‘हां,बचपन में देखा था.’

‘उस के खेल को देख अधिकतर कौन तालियां बजाते हैं?’

‘पढ़ेलिखे ही ज्यादा, पर इस का मतलब…?’

‘मतलब यह कि यहां दुनियादारी की बाजीगरी सिर चढ़ कर बोलती है, असली डिग्री नहीं. सर्वोच्च राजनीतिक पद पर बैठे व्यक्ति के पास असली डिग्री है क्या! इसलिए फर्जी हुई तो क्या हुआ, खाए मोतीचूर. असली को भी छाया दे, फर्जी पर मुझे गरूर,’ मैं ने उपदेशक हो कहा तो उन्होंने मुझ से बड़े होने के बाद भी सादर मेरे पावं छुए और बिन चाय पिए ही वहां से नौ दो बारह हो लिए.

एड़ियां ऊंची करने से कोई ऊंचा थोड़े ही हो जाया करता है, मित्रो! इस के लिए कीचड़ से नींव होना जरूरी होता है. Hindi Vyangya.

Funny Hindi Story: व्यंग्य- चोरी की प्रजातियां और भारतरत्न

Funny Hindi Story: उस प्रदर्शनी में हर देश ने अपनीअपनी कारीगरी दिखाई थी. अमेरिका, जापान आदि तमाम देशों ने अपनेअपने उत्पाद सजाए हुए थे. एक जापानी खिलौने पर सारी दुनिया के लोगों की नजरें थीं जो इलैक्ट्रौनिक तकनीक से बनाया गया था. जापानी अपनी इस सफलता पर गौरवान्वित हो रहे थे कि तभी एक भारतीय ने उस स्टौल पर खड़े 2 जापानियों की नजर बचाते हुए उस पर एक टैग लगा दिया : ‘मेड इन इंडिया’.

लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा और वे जापानी हैरत में पड़ गए कि यह सब एक पल में कैसे हो गया.खैर, उन्होंने भारतीयों के दर्शन पर अध्ययन शुरू किया तो पाया कि जब यहां पहली बार मानव उत्पाद लौंच किया गया था, हमारे ग्रेट ग्रैंड अंकलों ने तभी से यह टैगिंग शुरू कर दी थी. नतीजा यह हुआ कि बहुत कम समय में यहां ढेरों जातियां बनीं जो आज फलफूल कर हजारोंलाखों में पहुंच चुकी हैं.

हद तो यह है कि उन की देखादेखी चोरी और गबन जैसे अपराधों तक की भी तमाम जातियां, प्रजातियां उग आई हैं. चोरी एक अपराध होते हुए भी ऊंची, नीची और सामान्य, तमाम जातियों में विभक्त हो चुकी है. कद्दू, लुटिया, भैंस की चोरियां गंवई मानी जाती हैं. जबकि बाइक, कार, चेन की चोरियां शहरी. मंदिर से प्रसाद की चोरी धार्मिक, अष्टधातु मूर्तियों की चोरी कलात्मक, मरघट पर अर्थियों के शेष बांसों की चोरी आध्यात्मिक मानी जाती है. कफनचोरी बुनकर जाति और पूरे ताबूत की चोरी एक वीआईपी जाति की मानी जाती है. जब कोई गारमैंट चोर कोई गारमैंट मय धारक के चुरा लाता है तो वह संवेदनशील चोरी होती है, जिसे कुछ लोग अपहरण कह कर पुकारते हैं. करचोरी अमीर जाति की मानी जाती है.

नजरें चुराना बगला चोरी कहलाती है, रूपचोरी अत्यंत लोकप्रिय होती है. गुर्दाचोरी डाक्टर जाति की होती है. दिलचोरी हंस जाति की, पर मय दिलदार की चोरी श्रेष्ठतम मानी गई है. वह प्यार और शादी के कीर्तिमान तक स्थापित कर सकती है.कामचोरी की जाति दरिद्र मानी गई है. इस के वाहक परजीवी (पैरासाइट्स) कहलाते हैं. यह सरकारी विभागों में वास करती है, पर इस की कमी दूसरी कर्मठ चोरियां पूरी करती रहती हैं. लिहाजा, सरकारें 60-65 दिनों की हड़तालों के बावजूद सुचारु रूप से चला करती हैं, इस के बावजूद तमाम काम जिस चोरी से चला करते हैं वह डिटैक्टिव चोरी कहलाती है. हाल में एक रिश्वत को चोरी का जामा पहनाने की भी कोशिश की गई है. यह चोरी किस प्रजाति की है, तय नहीं हो पाया है.

शब्दों, विचारों आदि की चोरी सर्वोच्च जाति की मानी गई है. कवि, शायर, लेखक और व्यंग्यकार इसी श्रेणी में आते हैं. चोरी में मिलावटखोरी तो सोने में सुहागे का काम करती है. मजे की बात तो यह है कि रचना की मौलिकता का शपथपत्र लिए वे लाखों लोग लाइन में लगे मिलते हैं जो माल एक, ब्रांड सौ, रैपर हजार और पैकिंग लाख वाली मसल में विश्वास करते हैं, पर इस के बावजूद कुछ लोग विशुद्ध चोरी के उपासक होते हैं. एक बड़े अंगरेजी अंतर्राष्ट्रीय दैनिक के सहसंपादक ने एक दशक पहले इंगलैंड के एक टैब्लौयड का एक आर्टिकल चोरी कर के बिना किसी मिलावट के हूबहू अपने पत्र में छपवा डाला था.

अत: उन को वांछित प्रशस्तिपत्र के साथ जो ससम्मान विदाई दी गई थी, मैं आज तक नहीं भुला सका हूं. ऐसी चोरियां गुरूघंटालों के दिल में वास करती हैं. वैसे आजकल मिलावटी वाली ज्यादा प्रचलन में हैं जिन के पकड़े जाने की संभावनाएं न के बराबर होती हैं. उन पर तमाम इनामों की व्यवस्था अलग से हुआ करती है.मु झे इस धंधे में पड़े लगभग 48 साल हो चुके हैं, पर कभी पकड़ा नहीं गया इसलिए अभी भी शाह ही कहलाता आ रहा हूं. हां, जब कभी इनाम की लालसा की तो दोस्त रूपी दुश्मनों ने और समझाया, हताश किया, ‘उस के लिए दारू, पैलगी, खुशामद और सैटिंग जैसी तमाम औपचारिकताएं तुम्हारे वश की बात    नहीं है.’

हां, कुछ दोस्तों ने यह दिलासा अवश्य दिलाया, ‘संभव है कि पिछले दिनों भारतरत्न पर मची छीछालेदर से आहत कुछ लोग संसद में एक ऐसा प्रस्ताव ले आएं कि हर वरिष्ठ नागरिक की उम्र को ही एक योग्यता मान कर एक भारतरत्न बांटा जाए तो उस दशा में तुम्हारा नंबर  जरूर लग सकता है.’ Funny Hindi Story.

Hindi Satire: व्यंग्य- साधु बने स्वादु

Hindi Satire: फीता कटा, फ्लैशगनें चमकीं, तालियां बजीं. मेजबान ने स्वामीजी के चरण छुए और आशीर्वाद प्राप्त किया. बाद में उन्हें ले कर आभूषणों का अपना आलीशान शोरूम दिखाने लगा.आजकल यह दृश्य आम हो गया है.

अब दुकानों, शोरूमों का उद्घाटन करने के लिए झक सफेद कपड़ों वाले नेता जी या मंत्री जी की जरूरत नहीं रह गई है बल्कि यह काम गेरुए वस्त्रों में लिपटा साधु करता है. दुनिया भर को मोह-माया से दूर रहने के कड़वे उपदेश पिलाने वाले बाबा इन दिनों दुकानों, पार्लरों के फीते काट रहे हैं. हंस-हंस कर फोटो खिंचवा रहे हैं. धनिकों को साधु रखने का शौक होता है.

जैसे चौकीदार रखा, रसोइया रखा, माली रखा उसी तर्ज पर एक स्वामी भी रख लिया. बस, उसे डांटते नहीं हैं, उस पर हुक्म नहीं चलाते. उधर दुनियादारी को त्याग चुका साधु भी इन दुनियादारों के यहां पड़ा रहता है. उन के खर्चे से सैर-सपाटे करता रहता है. आखिर अनमोल प्रवचनों का पारिश्रमिक तो उसे वसूलना ही है. साधु कभी भी गरीबों के यहां निवास नहीं करते. इस की वजह वे बताते हैं कि गरीबों पर आर्थिक बोझ न पड़े इसलिए. पर वे तो साधारण आर्थिक स्थिति वालों के यहां भी नहीं रुकते.

दरअसल, साधारण आदमी उन की फाइव स्टार सेवा नहीं कर सकता. साधुओं का यह माया प्रेम नहीं तो और क्या है?‘‘भक्त का अनुरोध मानना ही पड़ता है,’’ साधुओं का जवाब होता है, ‘‘वह दिन-रात हमारी सेवा करता है, हमारी सुखसुविधा का ख्याल रखता है. क्या हम उस के लिए एक फीता नहीं काट सकते? हमारा काम ही आशीर्वाद देना है.’’‘‘पर आप तो जनता से मोह-माया से मुक्त होने का आह्वान करते हैं.’’‘‘करते हैं ना. तब भी करते हैं जब किसी शोरूम का उद्घाटन करने जाते हैं.’’‘

‘जो भक्त माया इकट्ठी करने में लगा हो उसे आप अपरिग्रह का उपदेश क्यों नहीं देते?’’‘‘देते हैं. जब उस के पास उस की आवश्यकताओं से अधिक धन हो जाए तभी वह अपरिग्रह की ओर मुड़ेगा. हर एक की तृप्ति का स्तर अलग-अलग होता है. जब उस की इच्छाएं तृप्त हो जाएंगी तो वह अपनी सारी दौलत रास्ते में लुटा देगा.’’‘‘और आप की तरह दीक्षा ले लेगा. पर संन्यास लेने से पहले इस तरह का वैभव प्रदर्शन करने के बजाय क्या वह इस धन से कोई स्कूल या अस्पताल नहीं बनवा सकता?’’

साधु के पास इस का जवाब कभी नहीं होता है. जो लोग भूखे को रोटी देने के बजाय कुत्ते को देते हैं वे संन्यास लेने से पहले लोगों को अपने लुटाए हुए हीरे-जवाहरातों पर कुत्तों की तरह टूटते देखकर फूले नहीं समाते. यह मानवता का अपमान नहीं तो क्या है?जब चातुर्मास का मौसम आता है तो मोह-माया से मुक्त ये साधु बैंड-बाजे सहित मोह-माया की दुनिया में आते हैं और तड़क-भड़क भरे हॉल में अपने भक्तों से सांसारिक बंधनों से मुक्त होने का आह्वान करते हैं.

क्या इन बैरागियों को इतना भी नहीं मालूम कि जिन भक्तों को उनके प्रवचनों से लाभ उठाना होगा, वे खुद चल कर उन के आश्रम में आएंगे? हां, इन्हें इतना तो मालूम है कि न तो इन के उपदेशों में ताकत है और न ही इन के भक्त इतने बेवकूफ हैं कि अपनी मोटी कमाई छोड़ कर इन के नीरस प्रवचन सुनें, इसलिए कुआं खुद ही सांसारिक सुखों से तर गले वालों के पास चला आता है. भक्त लोग भी इन के भाषण सिनेमा या नाटक देखने की तर्ज पर सुनने चले आते हैं.  ऐसे ही मोह-माया के संसार में घुसने को छटपटा रहे एक साधु से मैं ने बातचीत की. मैं ने उसे सिर्फ नमस्कार किया, चरण नहीं छुए.

मैं ने देखा कि उस के चेहरे पर नाराजगी के भाव थे. उस के चेले-चपाटे भी खुश नहीं दिखे बातचीत के दौरान मैं ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘आप मेरे अभिवादन के तरीके से खुश नजर नहीं आए?’’‘‘हां, बड़े-बड़े उद्योगपति, राजनेता मेरे पैर छूते हैं और तुम ने ऐसे नमस्कार किया जैसे किसी दोस्त को हैलो-हाय कर रहे हो. यह तो भारतीय परंपरा नहीं है किसी आदरणीय व्यक्ति का अभिवादन करने की.’’‘‘आप तो संन्यासी हैं. आप ने सांसारिक विकृतियों पर विजय पाई है.

आप को क्रोध क्यों आया?’’ मैं ने तड़ाक से सवाल किया जिसे सुन कर उन के चेलों ने मुझे बदतमीज, पापी कहा.‘‘आप जब अपने शिष्यों को क्रोध पर विजय प्राप्त करना नहीं सिखा सके तो दुनिया को क्या सिखा पाएंगे?’’‘‘बदतमीज, इतने बड़े स्वामी जी से बोलने का यह कोई तरीका है? जानता नहीं, बड़े-बड़े लोग इन के पैर छूते हैं?’’ एक शिष्य भड़का.‘‘यानी इन्हें घमंड है कि बड़े-बड़े लोग इन के पैर छूते हैं. इसे ही शायद मद कहते हैं.’’

‘‘पापी, जानता नहीं कि ये सांसारिक मोहमाया से परे हैं? हजारों लोग इन के चरणों में चांदी, सोना, हीरे चढ़ाते हैं, देखा नहीं? चलो हटो, दूसरों को आने दो,’’ और भक्तों ने मुझे चढ़ावे में आया धन बताया.‘‘नहीं, आप के ये स्वामीजी मद, लोभ और क्रोध से मुक्त नहीं हुए हैं. बार-बार ये समाज में लौटते हैं. इस का मतलब यह है कि ये मोह से मुक्त नहीं हुए हैं. क्या जरूरत है इन्हें समाज में आने की, जिसे इन्होंने त्याग दिया है?’’

‘‘आप यहां से चले जाइए वरना किसी ने कुछ कर दिया तो हम जिम्मेदार नहीं होंगे,’’ मुझे चेतावनी दी गई.मैं कहना चाहता था कि जब आप क्रोध, लोभ, मद और मोह से मुक्त नहीं हैं तो काम से भी मुक्त नहीं होंगे. फिर यह साधु का मेकअप क्यों? पर मुझे धक्के मार कर निकाल दिया गया. मेरा विश्वास है कि सब से ज्यादा सांसारिक सुखों में लीन ये साधु स्वामी ही हैं. बिना कुछ किए, सिर्फ गैर व्यावहारिक भाषण झड़ कर ये ऐशो-आराम से रहते हैं. इन के आश्रम सभी सुख सुविधाओं से युक्त रहते हैं.

भोग और संभोग की पूरी व्यवस्था रहती है. इसीलिए तो जिन-जिन आश्रमों पर पुलिस के छापे पड़े हैं, आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई है. एक साधु के आश्रम में शराब, ब्लू फिल्में और लड़कियां मिलने का क्या मतलब है? ये पाखंडी लोग दुनिया की कठिनाइयों से नहीं लड़ सकते और समाज से पलायन कर जाते हैं. पर एकांत में सांसारिक सुख और भी याद आते हैं इसलिए किसी न किसी बहाने ये समाज में लौटते हैं. कभी चातुर्मास के बहाने या किसी दुकान का उद्घाटन करने या किसी भक्त के विवाह में आशीर्वाद देने के बहाने. इन के आश्रम अपराधियों के क्लब होते हैं.

राजनेता, तस्कर, मिलावट- बाज, काला बाजारिए, सट्टेबाज इन के यहां आपस में मिलते हैं और अपने भावी कार्यक्रम तय करते हैं. क्या जरूरत है किसी मंत्री को इन के आश्रम में जाने की और इन का आशीर्वाद पाने की? आम आदमी को तो ये साधु कभी आश्रम में बुला कर आशीर्वाद नहीं देते. इन के आश्रम सिर्फ पूंजीपतियों, राजनेताओं के लिए ही खुले होते हैं.

आम आदमी को ये सिर्फ दर्शन देते हैं. इन के आश्रम में सिर्फ पूंजीपतियों की एयरकंडीशंड कारें तैनात रहती हैं. ये पाखंडी स्वामी यों तो समाज सुधार का ढिंढोरा पीटते रहते हैं पर आज तक कोई साधु किसी समस्याग्रस्त झोपड़पट्टी में नहीं गया है, बाढ़ पीड़ित क्षेत्र में नहीं गया है, महामारी प्रभावित क्षेत्र में कदम तक नहीं रखा है. और तो और इन्होंने कभी किसी मलिन बस्ती में अपना प्रवचन भी नहीं दिया है क्योंकि वहां ग्लैमर नहीं है, प्रसिद्धि नहीं है, माल नहीं है, माया नहीं है जिस के लिए ये मरे जाते हैं. Hindi Satire.

Social Story in Hindi: व्यंग्य- रामदुलारे गए अयोध्या

Social Story in Hindi: रामदुलारे के मन में बड़ी साध थी कि जिंदगी में एक बार ‘गंगा स्नान’ कर आता. कहते हैं कि गंगा स्नान से अगलेपिछले सारे ‘पाप’ धुल जाते हैं. रामदुलारे भी अपने पापों को धोना चाहता था.

तभी उस ने सुना कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर की कारसेवा के लिए जो लोग जाएंगे, उन के टिकट की व्यवस्था एक ट्रस्ट करेगा. रामभक्त कारसेवा में जाने के लिए पहले से नाम लिखवा दें. रामदुलारे को यह खबर मोहन ने दी. उस ने बतलाया, ‘‘रामदुलारे, हो आ लखनऊ, बनारस…रेले में निकल जाएगा.

‘‘फोकट में तीर्थयात्रा का आनंद ले. वहां का खर्चा तो तू निकाल ही लेगा. बड़ा जमघट होगा. थोड़ी हाथ की सफाई दिखाएगा तो पौबारह हो जाएगी. अपना कल्लू तो पार्टी के साथ गया है. वहां महाराष्ट्र के 55 छोकरों की पार्टी है. सब के सब प्रशिक्षित हैं. वहां लखनऊ में दूसरी शाखा के छोकरे मिल कर काम करेंगे.’’

रामदुलारे बोला, ‘‘उन की बात छोड़, उन की पूरी सरकार है, मंत्री हैं, अध्यक्ष है, मंत्रिपरिषद है, प्रशिक्षक है, गुंडे- बदमाश हैं. फिर उन का संविधान है, कायदाकानून है, अनुशासन है. अपना मिजाज उन से नहीं मिलता. 100 कमाओ और 80 सरकार को दो. अपने को यह मगजमारी पसंद नहीं. मोहन, मैं वहां धर्म के नाम पर पाप कम करने जा रहा हूं, रामभक्तों की जेब काट कर पाप बढ़ाने नहीं जा रहा. मेहनतमजदूरी कर लूंगा. गंगाजी में पुराने पापों का बंडल छोड़ दूंगा. फिर कोई अच्छा सा व्यापार करूंगा.’’

मोहन अपनी बात कह कर चला गया. रामदुलारे इस समय ‘पुण्य’ कमाने के चक्कर में था. गांधीजी, गौतमबुद्ध, विवेकानंद की तसवीरें खरीद कर कमरे में टांग चुका था. अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, जैकी श्रौफ, जयश्री टी. की तसवीरों का अग्निदाह कर चुका था. 6 दिन हो गए थे, ठर्रे को हाथ भी नहीं लगाया, न रज्जोबाई के घुंघरू सुनने गया. बहुत दिन से ‘धंधे’ पर भी नहीं निकला था. पुलिस का दीवान आया तो उसे आखिरी ‘हफ्ता’ दे दिया और कह दिया, ‘‘अपन अब रिटायर हुआ दीवानजी, अपना हफ्ता बंद, अब आगे से अपन धंधे पर नहीं निकलेगा.’’

दीवान ने हाथ का डंडा हवा में हिलाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, लेकिन बाद में धंधे पर मिला तो ‘फार्मूला फोर’ फिट कर दूंगा. तू समझता है न…अपना नाम यशवंत भाई हनुमंत भाई मोछड़ है. अपने से ज्यादा होशियारी नहीं दिखाने का.’’

आगापीछा सोच कर आखिर रामदुलारे पार्टी के दफ्तर में जा कर कारसेवकों के पहले जत्थे में ही नाम लिखा आया.

तीसरे दिन स्टेशन पर वह अपना थैला ले कर पहुंच गया. दूसरे कारसेवकों के साथ उसे एक तरफ खड़ा किया गया. फिर शहर के लोगों ने सब को मालाएं पहनाईं, बढि़या गुलाब और सूर्यमुखी की मालाएं. रामदुलारे के गले में माला डालने का यह दूसरा अवसर था. पहले कभी शादी के समय उस की पत्नी ने कनेर के फूलों की माला डाली थी उस के गले में, और फिर उसी के गले से जोंक की तरह चिपट गई.

उस समय रामदुलारे उड़ान पर था. गांव में ‘शहरी बाबू’ कहा जाता था. टैरीकौट की पैंट और नाइलौन की कमीज पहन कर हाथ में ट्रांजिस्टर ले कर घूमता था. कल्लू उस्ताद के स्कूल में प्रशिक्षित हो चुका था. धंधे में लग गया था. बांद्रा में एक झोंपड़पट्टी भी ले ली थी. एक पुरानी साइकिल भी खरीद ली थी. हाथ में घड़ी, जेब में पैन, होंठों पर सिगरेट, देव आनंद की तरह सजीसंवरी जुल्फें, बड़े ठाट थे उन दिनों रामदुलारे के. अपनी गाढ़ी कमाई में से 100-50 रुपए घर भी भेज देता था.

खैर, इस बार माला पहनने वालों को वह जानता था कि ये लोग लीडर हैं. चुनाव जीते हुए नेता हैं. उन्होंने माला पहनाई और हाथ जोड़े. बजरंग दल का एक नेता कह रहा था, ‘‘आप लोगों के खानेपीने का प्रबंध कर दिया है, बड़ौदा स्टेशन पर आप को खाने के पैकेट मिल जाएंगे. मानव बिंदु चैरीटेबल ट्रस्ट, मुंबई के अध्यक्ष गिरधरलाल ने सब कारसेवकों को हाथ-खर्चे के लिए 100-100 रुपए दिए हैं. आप को ये रुपए सूरत में मिल जाएंगे.

‘‘आप शाम को बड़ौदा पहुंचेंगे. वहां के दल वाले आप का स्वागत करेंगे और रात में चलने वाली साबरमती ऐक्सप्रैस में आप को आरक्षित सीट दिलवा देंगे. आप तीसरे दिन लखनऊ पहुंच जाएंगे. फिर वहां की व्यवस्था गुजरात दल करेगा. अच्छा भाइयो, बोलो प्रेम से राजा रामचंद्र की जय.’’

सब ने जयघोष किया. प्लेटफौर्म जयघोष से गूंज उठा. पत्रकार खड़े संवाद लिख रहे थे. फोटोग्राफर फोटो खींच रहे थे. एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति से पूछा, ‘‘काहे का लफड़ा है? हज करने जाता है क्या?’’

‘‘नहीं भाई, ये हिंदू लोग हैं…जैसे दूसरे गांव से गाय, भैंस, बकरा इधर मुंबई में कटने के वास्ते आता है न, ऐसे ही मरने के वास्ते इन को अयोध्या भेजते हैं अपने नेता लोग. ये सब वहां पुलिस और फौज की बंदूकों से अपने प्राण देंगे. इसी वास्ते इन की इतनी खातिर होती है.’’

तभी पास खड़े एक दूसरे सज्जन बीच में ही बोल पड़े, ‘‘काहे को गलत बात बोलता है, ये सब रामभक्त हैं. ‘भगवान’ की सेवा में जाते हैं. तुम वी.पी. सिंह का आदमी मालूम पड़ता है…’’ और अचानक उस ने उस व्यक्ति का गरीबान पकड़ लिया और जोरजोर से चीखने लगा, ‘‘वी.पी. सिंह का मानस है, मारो इस को.’’

एकाएक भीड़ के तेवर बदल गए. सब लोग उस आदमी पर टूट पड़े. प्लेटफौर्म पर होहल्ला मच गया. फिर अचानक भागमभाग मच गई. किसी ने रामपुरी चाकू उस आदमी की पसली में उतार दिया था. उस के पास ही खड़े, उस से बात करने वाले दूसरे आदमी की गरदन पर भी चाकू के 3 वार हो चुके थे. तभी पुलिस के जवान आ गए. प्लेटफौर्म पर सीटियां बजने लगीं. लाठीचार्ज हो गया. रामदुलारे अन्य रामभक्तों के साथ सामने खड़ी रेल में घुस गया. स्वागतसत्कार करने वाले स्वयंसेवकों तथा भाषण देने वाले नेताओं का कहीं पता न था. प्लेटफौर्म पर ढेर सारी मालाएं टूटी पड़ी थीं.

तभी पीछे से 50-60 आदमियों ने नारे लगाए, ‘‘हम सब हिंदू एक हैं…जिंदाबाद, जिंदाबाद. बजरंग दल जिंदाबाद. जिंदाबाद, जिंदाबाद, भवानी दल जिंदाबाद…जिंदाबाद, जिंदाबाद, शिवसेना जिंदाबाद, हिंदू परिषद जिंदाबाद…लाठीगोली खाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, बच्चाबच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का.’’

एक बार तो रामदुलारे के मन में आया कि रेल के डब्बे से उतर कर भाग जाए. फिर मन मजबूत किया. तभी कुछ बाहरी लोगों ने उन के डब्बे पर पथराव कर दिया. सटासट खिड़कियां बंद हो गईं. लोग दरवाजों से सट गए. तभी गाड़ी चल पड़ी.

रामदुलारे का दूसरे साथियों से परिचय हुआ. सभी भक्त और सेवक थे. रामदुलारे की बिरादरी का कोई भी नहीं था. अच्छे परिवारों के खातेपीते लोग थे. जब से गाड़ी चली थी, भजनकीर्तन प्रारंभ हो गया था. सभी भक्तिरस में डूबे हुए थे. हर स्टेशन पर मालाओं से स्वागत हो रहा था. भोजन के पैकेट मिल रहे थे. हाथखर्च भी ईमानदारी से मिल गया था. इतना स्वागत तो रामदुलारे की सात पुश्तों में किसी का नहीं हुआ था. धीरेधीरे वह ‘रामभक्त’ होता जा रहा था.

रतलाम स्टेशन पर उतर कर वह टहलने लगा. तभी सामने से पूरन और लल्लन साथ आते दिखाई दिए. पुराने साथी थे रामदुलारे के. वे सब बड़े जोश में मिले. कोटा, रतलाम डिवीजन का इलाका पूरन और लल्लन का था. अच्छे कलाकार थे. इन के दल में लल्लन तो राष्ट्रीय स्तर का कलाकार था. जब हिंदुस्तान में टीवी आया भी नहीं था तभी इस की तसवीरें दुनिया के टीवी पर आ गई थीं. जब इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई, तब कामराज भारतीय राजनीति के क्षितिज पर सूर्य की तरह चमक रहे थे. वे इंदिरा गांधी के साथ थे. कुछ देर तक वे पत्रकारों से घिरे उन के प्रश्नों के जवाब देते रहे. फिर राष्ट्रपति भवन चले गए. इसी अवधि में लल्लन ने उन की जेब साफ कर दी. अच्छाखासा चमड़े का बटुआ था. लेकिन एकांत में जब लल्लन ने उसे खोला तो अपना माथा ठोक लिया. उस में कागज ही  कागज थे. कुछ अंगरेजी में टाइप किए हुए और कुछ हस्तलिखित. खोदा पहाड़, निकली चुहिया. लल्लन ने वह बटुआ चढ़ती यमुना को अर्पित कर दिया.

उधर, कामराज के बटुए को ले कर बड़ी हायतौबा मची. दिल्ली पुलिस कमिश्नर को बरखास्त कर दिया गया. पुलिस महानिदेशक को सरेआम फटकार खानी पड़ी. कामराज पसीनापसीना हो रहे थे. उस बटुए में बड़े महत्त्वपूर्ण गुप्त कागजात थे. विरोधी पार्टी के हाथों पड़ जाते तो लेने के देने पड़ जाते. संभावित मंत्रियों के विषय में कुछ पूर्व निर्धारित संकेत थे, सलाहमशवरा करने के कुछ मुद्दे थे.

गुप्तचर विभाग सक्रिय हो गया. सारा कार्यक्रम विदेशी पत्रकारों ने कैमरे में कैद किया था. हजारों फोटो उस समय के देखे गए. तभी अचानक रूस के एक फोटो- पत्रकार ने एक फोटो प्रस्तुत कर तहलका मचा दिया. जिस समय कामराज इंदिरा गांधी को बधाई दे रहे थे, उसी समय गले में कैमरा डाले एक आदमी कामराज की जेब में हाथ डाल रहा था.

गुप्तचर विभाग ने अपने ढंग से कार्यवाही कर के दूसरे ही दिन लल्लन को रात में सोते हुए धरदबोचा. फिर तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लल्लन चर्चा का विषय बन गया.

पूरन, लल्लन का पूरा गिरोह चल रहा था. पूछने पर रामदुलारे ने बात एकदम साफ कर दी कि इस समय तो वह कारसेवा में ही जा रहा है, धंधे पर नहीं है.

खैर, तीनों ने एक स्टाल से चाय पी. रामदुलारे ने पैसा देने की जिद की तो पूरन, लल्लन चुप हो गए, लेकिन यह क्या? रामदुलारे के कुरते की जेब कटी हुई थी. 125 रुपए साफ हो चुके थे. उस ने जेब से हाथ नहीं निकाला, कुछ देर सोचता रहा. फिर बोला, ‘‘शायद बटुआ अंदर ट्रेन में है, तुम्हीं दे दो पैसे.’’

लल्लन ने पैसे चुका दिए. कुछ देर बाद गाड़ी में सब सवार हो लिए और कारसेवकों ने एतराज किया कि कोई गैरआदमी अंदर नहीं आ सकता किंतु रामदुलारे के समझाने पर वे मान गए.

लगभग 1 घंटे बाद एक आदमी एक पेटी ले कर आया. उस पर विश्व हिंदू परिषद का नाम अंकित था. वह मंदिर निर्माण के लिए दान ले रहा था. जब वह दूसरे लोगों के पास से हो कर रामदुलारे के पास आया तो रामदुलारे ने अपने कुरते की जेब से नोटों का बंडल निकाला और 1,133 रुपए दान में लिखवा कर दे दिए. बाकी रकम उस ने पूरन, लल्लन के सामने ही गिनी. अब उस के पास 125 रुपए थे.

‘‘क्यों, तुम कुछ दान नहीं करोगे?’’ उस ने लल्लन उस्ताद से पूछा. लल्लन ने अपनी जेब में हाथ नहीं डाला और बोला, ‘‘अब तुम ने दिया तो हम ने दिया, तुम्हारा रुपया भी तो हमारा ही है.’’ दोनों ने एकदूसरे की बात समझी और चुप हो गए. झांसी स्टेशन पर पूरन, लल्लन उतर कर दूसरे डब्बे में चले गए.

रामदुलारे झांसी स्टेशन पर उतरा तो उस ने घोषणा सुनी, ‘‘सभी रामभक्त कारसेवकों को सूचित किया जाता है कि विश्व हिंदू परिषद की ओर से किसी भी प्रकार का आर्थिक सहयोग नहीं लिया जा रहा है. कुछ धोखेबाज लोग इस तरह से पैसा एकत्र कर रहे हैं. यदि ऐसे किसी भी व्यक्ति को देखें तो पुलिस के सिपुर्द कर दें.’’

रामदुलारे समझ गया कि लल्लनपूरन के ही आदमी रहे होंगे. सोचा कि चलो ठीक है, उन की रकम उन तक पहुंच गई.

रामदुलारे शांति से डब्बे में जा कर बैठ गया. किसी रामभक्त ने उसे एक हनुमान चालीसा और तुलसी की माला दे दी. माला उस ने गले में डाल ली और हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा. धीरेधीरे उस के मन में भक्ति सवार हो रही थी.

गाड़ी चलने ही वाली थी कि 5-7 पुलिस के जवान गाड़ी में चढ़ आए. उन्होंने कारसेवकों से प्लेटफौर्म पर उतर जाने को कहा. सभी नीचे उतर आए. गाड़ी फिर रुक गई. कुछ गुप्तचर विभाग वाले कारसेवकों की तलाशी लेने लगे. जैसे ही रामदुलारे का नंबर आया कि एक अफसर बोला, ‘‘अरे, यह तो दसनंबरी रामदुलारे है. गिरफ्तार कर लो इसे. साला पाकेटमार, अयोध्या में धंधा करने जा रहा है.’’

अफसर के संकेत पर रामदुलारे को पकड़ लिया गया. वह गिड़गिड़ाया, ‘‘कसम ले लो साहब, इस समय तो मैं सच्चे दिल से कारसेवा में जा रहा हूं. भगवान की कसम खाता हूं…’’ तभी एक डंडा उस के पृष्ठभाग पर पड़ा, ‘‘हर बार कसम खाता है, कसम खाने के अलावा और है क्या तेरे पास? नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने जा रही है.’’

रामदुलारे वहीं महारानी लक्ष्मीबाई की वीरभूमि में वीरतापूर्वक गिरफ्तार कर लिया गया. एक बात अच्छी रही, उस समय गिरफ्तार व्यक्तियों की पिटाई नहीं हो रही थी. इज्जत से बंद किया जा रहा था. एक पुराने से किलेनुमा विद्यालय में उन्हें नजरबंद कर दिया गया. खानापानी समय पर मिलता रहा. शायद जल्दी में या व्यस्तता के कारण रामदुलारे का अलग से ‘विशेष’ प्रबंध नहीं किया गया था.

वहीं बाबा सत्यनाम दास मिले. उन्होंने 3 दिन के लिए उपवास किया. कई सद्गृहस्थ भक्तों ने उपवास में साथ दिया. रामदुलारे भी उपवास पर उतर गया. जेल के कानून के तहत कोई भी कैदी 24 घंटे से ज्यादा भूखा रहता है तो वह दंडनीय अपराध है. उसे जोरजबरदस्ती से खिलाने का प्रबंध किया जाता है.

उपवास के दूसरे ही दिन पुलिस अधिकारी आ धमके. उपवास करने वालों की सूची बनी. कहासुनी हुई. तभी वह अफसर भी आ गया जिस ने रामदुलारे को गिरफ्तार किया था. वह रामदुलारे को देख कर ही आपा खो बैठा. रामदुलारे की समझ में नहीं आ रहा था कि उस ने कौन उस की भैंस चुरा ली है या उस के बच्चे का अपहरण कर लिया है.

खैर, रामदुलारे को सब से अलग कर दिया गया. कुछ देर बाद उसे कोतवाली ले जाया गया. वहां कुछ सिपाही माथे और हाथों पर पट्टी बांधे बैठे थे. शहर में दंगा हो गया था, वहीं इन लोगों की मरम्मत हुई थी. शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया था. रामदुलारे जेबकतरा है, यह जान कर वे चारों सिपाही उठ खड़े हुए और अंदर का सीखचों वाला कक्ष खोल कर उस में बंद रामदुलारे को बाहर खींच लाए. फिर अपनेअपने लट्ठों से चारों ने मिल कर रामदुलारे की धुनाई की. उन्होंने शहर के दंगाइयों का पूरा बदला रामदुलारे से लिया.

वैसे तो रामदुलारे वीर था. ऐसे अनेक प्रहार वह अनेक बार सह चुका था, पर अब देह थक रही थी. पुराने जख्म भी दर्द करते थे. उन्हीं पर नए जख्म ज्यादा पीड़ा देने लगे, किंतु भीष्मपितामह की तरह वह सारी पीड़ा अंदर ही अंदर पी गया. उफ तक नहीं की बंदे ने. उसे मारमार कर सिपाही थक गए. रामदुलारे की पोरपोर से दर्द उठ रहा था. हड्डीहड्डी हिल गई थी.

रामदुलारे जमीन पर लेट गया और आंखें मूंद लीं. मरणासन्न सा हो गया. रुकरुक कर हिचकी लेने लगा. किसी ने शायद भीतर थानेदार से कहा होगा. थानेदार अभी आया था शहर से हायतौबा करता. उस ने रामदुलारे का यह हाल देखा तो बौखला गया. सिपाहियों पर बुरी तरह गरजा. लाइनहाजिर होने का हुक्म दे दिया गया.

रामदुलारे को सरकारी अस्पताल में दाखिल करवा कर छोड़ देने का हुक्म हुआ. 4 जवान रामदुलारे को अस्पताल ले आए. वहां उसे भरती करवा कर पुलिस वाले चले गए. डाक्टरों से कहा कि शहर के दंगे में चोट खा गया है. तुरंत इलाज चालू हो गया.

3 दिन में रामदुलारे ठीक हो गया. दर्द तो खैर था, लेकिन अब चलफिर सकता था. बाएं हाथ पर प्लास्टर चढ़ गया था. माथे, पैर और पीठ पर पट्टियां बंधी थीं. फिर भी रामदुलारे के लिए यह बहुत परेशानी की बात नहीं थी.

उस दिन वह अपने बिस्तर से उतर कर बाहर टहलने लगा. फिर मुख्यद्वार से हो कर बाहर सड़क तक आ गया. फिर एक रिकशा में बैठ कर सीधा स्टेशन आ गया. उस के पास रिकशा वाले को देने के लिए पैसे नहीं थे. वहां स्टेशन पर कहासुनी होने लगी. रामदुलारे के गले में चांदी की तुलसी के दानों की कंठी थी. उस ने कंठी रिकशा वाले को दे दी. फिर सामने प्लेटफौर्म पर पहुंचा तो बड़ौदा जाने वाली साबरमती ऐक्सप्रैस तैयार खड़ी मिली. यह संयोग की ही बात थी कि वह सकुशल दूसरे दिन सुबह 5 बजे बड़ौदा आ गया.

बड़ौदा स्टेशन पर उतरते ही एक आश्चर्य हुआ. लोगों में होहल्ला हुआ और धीरेधीरे भीड़ रामदुलारे के पास एकत्र हो गई. कुछ कार्यकर्ताओं ने उसे पहचान लिया.

‘‘अरे, रामदुलारे भाई हो न? कारसेवा में गए थे?’’ ‘‘ये तो कारसेवक हैं, बेचारे को कितनी तकलीफ सहनी पड़ी.’’

फिर तो रामदुलारे लोगों की भीड़ का केंद्रबिंदु बन गया. रामदुलारे कुछ कहता इस से पहले ही लोगों ने उस की रामकहानी बना डाली. ‘गोलियां लगी हैं बेचारे को’, ‘सरयू नदी में फेंक दिया था अयोध्या में’, ‘यही चढ़ा था बाबरी मसजिद पर’, ‘बड़ी बेरहमी से पीटा है बेचारे को.’

देखते ही देखते रामदुलारे हीरो हो गया. आननफानन में ही एक जीप में रामदुलारे की सवारी तैयार हो गई. मालाओं से लद गया रामदुलारे. जुबली गार्डन में बजरंग दल वाले उपवास पर बैठे थे. वहीं ले गए रामदुलारे को. धीरेधीरे आसपास के लोग एकत्र होने लगे.

एक नेता बोला, ‘‘रामभक्त रामदुलारे भाई हमारे हिंदू भाइयों के माथे का मुकुट हैं. हम ने जान लिया है कि इन का सबकुछ छीन लिया गया है. इन के शरीर पर 27 घाव हैं.’’

दूसरा आदमी आगे आया और बोला, ‘‘रतन भाई की ओर से रामभक्त रामदुलारे भाई को 1,100 रुपए की मदद दी जाती है.’’

तभी तीसरा आदमी आया और बोला, ‘‘सद्भावना ट्रस्ट की तरफ से इस भाई को 5 हजार रुपए की मदद की जा रही है.’’

फिर धीरेधीरे 27 हजार की रकम वहीं मंच पर आ गई. कुछ स्वयंसेवक झोली फैला कर 2-2, 5-5 रुपए इकट्ठे कर रहे थे.

धीरेधीरे खबर शहर के दूसरे इलाकों में फैल गई कि मसजिद के ऊपर भगवा झंडा फहराने वाला भाई घायल हो कर आ गया है. उसे 8 गोलियां लगी थीं. पुलिस ने भी पीटा है. शायद कुछ और रुपए एकत्र होते, लेकिन तभी कर्फ्यू का अमल कराने सेना आ गई. अश्रु गैस के गोले छूटने लगे. लाठीचार्ज हो गया. रामदुलारे ने सारी रकम झोली में समेटी और भाग कर एक गली में घुस कर गायब हो गया.

शहर में कर्फ्यू का अमल कड़ाई से होने लगा था.

इन्हें भी आजमाइए-

– केक में अंडे की महक न आए इस के लिए 1 चम्मच शहद केक के मिश्रण में मिला कर अच्छी तरह फेंटें.

– डोसा मिश्रण पीसते वक्त साथ में उबले चावल भी पीस लें, डोसे नरम बनेंगे.

– सूप या ग्रेवी में मिलाने के लिए क्रीम न हो तो मक्खन और दूध का मिश्रण बना कर मिला सकते हैं.

– उबले अंडों को 5 मिनट ठंडे पानी में रखें, छिलके आसानी से उतर जाएंगे.

– सांभर पाउडर और रसम पाउडर को डीप फ्रीजर में रखें, खुशबू बरकरार रहेगी.

– प्याज को पहले कम तेल में भून लें, फिर पीसें. कटा कच्चा प्याज जल्दी भुन जाता है जबकि कच्चा पिसा प्याज देर से भुनता है और तेल भी ज्यादा लगता है.

– हरी मिर्चें काटने के बाद उंगलियों में होने वाली जलन को कम करने के लिए ठंडे दूध में थोड़ी चीनी मिला कर उंगलियों को उस में थोड़ी देर रखे रहें.

– इडलियां नरम बनानी हों तो मिश्रण में खमीर उठने के बाद उसे फेंटें नहीं बल्कि बिना फेंटे ही सांचों में डाल दें.

– अंडे उबालते वक्त उस में एक चम्मच सिरका डाल दें. यदि अंडे उबलते समय क्रैक भी हो जाएंगे तो अंडे की जर्दी बाहर नहीं आएगी. Social Story in Hindi.

Hindi Romantic Story: आस्था और खतरा- कैसे हल हुई आदिल चाचा की परेशानी?

Hindi Romantic Story: आदिल खान परेशान थे. कई बार अब्बा के पास आकर अपना दुखड़ा रो चुके थे. परेशानी थी एक पीपल का पेड़, जो उनके घर के ठीक पीछे अपनी जड़ें गहरी कर उनकी पूरी छत पर अपनी टहनियां फैला चुका था. उनके घर के पीछे की जमीन नगर निगम की थी, जहां कोई निर्माणकार्य नहीं हो सकता था, मगर किसी ने पीपल के तने के चारों ओर चबूतरा बना कर भगवान की मूर्ति स्थापित कर दी थी. यह कई बरस पहले की बात है. तब आदिल चाचा जवान हुआ करते थे और पीपल का पेड़ भी तब बच्चा ही था. मगर बीते चालीस बरसों में आदिल खान की जवानी ढलती गई और पीपल का फैलाव बढ़ता गया. अब तो इसके चारों तरफ कुछ दबंग लोगों ने जमीन कब्जा करके खाने पीने के ढाबे बना लिए हैं. पहले ढाबे ऊपर से खुले हुए थे, मगर धीरे-धीरे उन पर छत भी पड़ गई. पहले टिन की और बाद में पक्की ईटों की.

आदिल चाचा ने तमाम शिकायतें नगर निगम के दफ्तर में दर्ज करवाईं कि भई फुटपाथ खत्म कर दिया इन लोगों ने, इन्हें हटाया जाए, पीपल का दरख्त काटा नहीं जा सकता तो कम से कम छंटवाया जाए ताकि हमारा घर सुरक्षित रहे, मगर आस्था का सवाल छाती तान कर खड़ा हो जाता. नगर निगम के अधिकारी आते, मौका-मुआयना करते मगर कार्रवाई कुछ न होती. वन विभाग को भी आदिल चाचा कई चिट्ठियां भेज चुके थे.

दरअसल बात आस्था की नहीं, पैसे की थी. दबंग ढाबा मालिक सबको पैसा खिला कर मामला दबवा देते थे. आस्था की आड़ में उनका अपना धंधा जो चल रहा था. तमाम लोग आते, पीपल पर जल चढ़ाते और फिर वहीं उनके ढाबे पर बैठ कर चाय-नाश्ता करते. ढाबे के बाहर तक पीपल की छांव में कुर्सियां बिछी रहती थी. पीपल कट जाता तो तेज़ धूप में ग्राहक थोड़ी ना बैठते. इसलिए पीपल बढ़ता जाता और साथ में आदिल चाचा की परेशानी भी.

अब तो पीपल की टहनियों ने आदिल चाचा के घर की छत का एक कोना भी तोड़ना शुरू कर दिया था. छत पर उसकी इतनी घनी छांव थी कि धूप का नामोनिशान न मिलता. इस वजह से बरसात के बाद छत पर सीलन और गंदगी का ढेर लग जाता. पीपल की गाद और पत्तियों ने पूरी छत को ढक लिया था. आखिर बुढ़ापे की मार झेल रहे और थोड़ी से पेंशन पर गुजारा कर रहे आदिल चाचा कहां से पैसा लाते कि मजदूर लगा कर आएदिन छत साफ करवा सकें. धीरे-धीरे सीलन पूरे घर में फैल गई थी. सीलन के चलते दीमक और चीटिंयों ने जगह-जगह अपनी बांबियां बना ली थीं. घर जर्जर होने लगा था. उस छत के नीचे अब आदिल चाचा का परिवार हर पल किसी अनहोनी के डर से सहमा रहता था.

मैं काफी दिन बाद अपने घर आया था. उस दिन आदिल चाचा मेरे पापा के पास बैठे अपना यही दुखड़ा रो रहे थे. अचानक मेरे मन में एक विचार कौंधा. मैंने आदिल चाचा को लिया और चिड़ियाघर के डायरेक्टर संजीव चतुर्वेदी से मिलने चल दिया. दरअसल वह मेरा पुराना क्लासमेट था. संजीव को मैंने सारी परेशानी बताई. यह भी कि अगर पेड़ की छंटाई न हुई तो इनके घर को भारी नुकसान हो सकता है. जान जाने का खतरा है. संजीव ने चाचा के कंधे पर प्यार से हाथ रखा और बोला, ‘परेशान न हों, आपकी परेशानी मैं हल करता हूं.’

उसने तुरंत अपने कुछ अधिकारियों को बुलाया. पूछा, ‘चिड़ियाघर के जितने हाथी हैं, महावतों से कहो कि सबको तैयार करके ले चले.’

मैं समझ नहीं पाया कि संजीव करना क्या चाहता है. आदिल चाचा भी असमंजस की हालत में थे. उन्हें भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था. हमें घर जाने को कह कर संजीव हाथियों के जुलूस के साथ चल दिया. जुलूस में लकड़ी काटने वाले भी थे. आदिल चाचा के घर के पिछवाड़े यह जुलूस रुका. सड़क पर कोई दस हाथी एक के पीछे एक खड़े थे.

संजीव ने ढाबा मालिकों से बातचीत की. चंद मिनट बीते होंगे कि हमने पेड़ पर कुछ लकड़हारों को चढ़ कर टहनियां छांटते देखा. एक बड़े से ट्रक में लकड़ियां और पत्तियां जमा करके संजीव कोई चार घंटे में पेड़ छंटवा कर चला गया. घर पर रोशनी छा गई. धूप नजर आने लगी. मैंने संजीव को फोन मिलाया, पूछा, ‘यार, ये क्या जादू किया तुमने?’

संजीव हंस कर बोला, ‘भई, आस्था का मामला था न, मैंने बस इतना कहा कि गणेश जी के परिवार को खाने के लिए पत्तियां और बाड़े के लिए लकड़ियां चाहिएं, कौन मना करता इस बात पर…’ वह कह कर ठठाकर हंस पड़ा. बोला, ‘आगे जब भी पीपल छंटवाना हो, मुझे फोन कर देना.’ Hindi Romantic Story.

Family Story in Hindi: माली- क्या अरुंधती को मिला मां बनने का सुख?

Family Story in Hindi: अरुंधती कभी मां नहीं बन सकती थी और यह बात वह भलीभांति जानती भी थी. अपनी बंजर कोख उसे भीतर से कचोट रही थी और वह कुछ नहीं कर पा रही थी. लेकिन श्यामली के आने के बाद सब बदल गया, कैसे? ‘‘औ… औ… औ…’’ अरुंधती की आंख खुली तो किसी के ओकने की आवाज सुन कर एकाएक विचार मस्तिष्क में कौंधा, ‘क्या श्यामली को उलटियां हो रही हैं.’ तत्काल ही बिस्तर छोड़ वह बाहर की ओर लपकी. बाहर जा कर देखा तो श्यामली पौधों को पानी दे रही थी. ‘‘क्यों रे श्यामली, अभी तू उलटी कर रही थी?’’ श्यामली चौंक कर, ‘‘जी मैडमजी.’’ अरुंधती श्यामली के कुछ और पास आ कर मुसकराई और भौंहें उठा कर शरारती अंदाज में बोली, ‘‘क्या बात है श्यामली, कोई खुशखबरी है क्या?’’ श्यामली कुछ न बोली. दोनों हाथों से मुंह छिपा कर ऐसे खड़ी हो गई मानो शर्म के मारे अभी जमीन में गड़ जाएगी.

अरुंधती को बात सम झते देर न लगी, ‘‘श्यामली, यह तो बहुत ही खुशी की बात है. अब तू सुन, आज से तू कोई भारी काम नहीं करेगी और अपने खानपान पर पूरा ध्यान देगी. और सुन, रमिया कहां है, सो रहा है क्या? बुला उस को. मैं आज उस की खबर लेती हूं. अब सारे काम वही करेगा, तू सिर्फ आराम करेगी, सम झी?’’ अरुंधती के चेहरे पर खुशी, चिंता और उतावलेपन का मिलाजुला भाव था. श्यामली शरमा कर वहां से दौड़ गई. अरुंधती ने हाथ को ऐसे उठाया मानो कह रही हो ‘आराम से, थोड़ा हौलेहौले चल श्यामली, जरा संभल कर.’ शादी के 12 साल बीत चुके थे. अरुंधती की ममता तृषित थी. उस की बगिया में कोई फूल नहीं खिल सका. रहरह कर अतृप्त मातृत्व सूनी कोख में टीस मारता था. सभी कोशिशें कर लीं,

सभी अच्छे से अच्छे डाक्टर, बड़ेबड़े पंडितवैद्य, तांत्रिक और ओ झा से संपर्क किया लेकिन प्रकृति उस की गोद में संतान डालना भूल गई थी. अरुंधती को पौधों से बहुत ही प्यार था. वह पौधों की देखभाल ऐसे करती थी मानो वे उस के अपने बच्चे हों या फिर कह सकते हैं कि, जो ममता, जो वात्सल्य उस में उबलउबल कर बाहर छलकता था वही स्नेह वह इन पौधों पर छिड़क कर अपनी ममता की प्यास शांत करती थी. रमिया उस के यहां माली का काम करता था, बहुत छुटपन से वह अरुंधती के पास था. अरुंधती को उस से बहुत लगाव था. उस ने रमिया के रहने के लिए घर के पीछे एक छोटा सा क्वार्टर बनवा दिया था. रमिया अरुंधती का बहुत ध्यान रखता था और खासकर उस की बगिया का. उसे मालूम था कि इन पौधों में मैडमजी की जान बसती है. सो, वह उन की देखभाल में कोई कसर न छोड़ता था.

पिछले साल ही रमिया गांव से गौना करवा कर श्यामली को ले आया था. श्यामली थी तो सांवली पर उस के नैननक्श गजब के आकर्षक थे. वह बहुत ही कम बोलती थी, अधिकतर बातों का जवाब बस सिर हिला कर देती थी. काम में बहुत ही होशियार थी. सो, अरुंधती के घर के कामों में भी अब श्यामली हाथ बंटा देती थी. खाली समय में श्यामली अरुंधती से लिखना और पढ़ना भी सीखती थी. अरुंधती के स्नेह और अपनेपन की वजह से श्यामली जल्द ही उस से बहुत ही घुलमिल गई और धीरेधीरे दोनों बहुत करीब आ गईं, अपनी हर बात एकदूसरे से बांटने लगीं. तभी आज अचानक श्यामली की उलटियों की आवाज ने अरुंधती को चौंका दिया. श्यामली मां बनने वाली है, इस विचार से ही अरुंधती इतनी रोमांचित हो उठी कि उस के रोमरोम में सिहरन हो उठी मानो उस की स्वयं की कोख में से कोई नन्ही कोंपल प्रस्फुटित होने वाली है. ‘‘शेखर,’’ अरुंधती अपने पति से बोली. ‘‘हां अरु, कहो क्या बात है?’’ शेखर ने पूछा. ‘‘वो अपनी श्यामली है न, वो मां बनने वाली है.’’ ‘‘अरे वाह, यह तो बहुत ही खुशी की बात है,’’ शेखर अरुंधती की ओर देखते हुए बोला. ‘‘हां, बहुत ही खुशी की बात है. कितने वर्षों बाद हमारे आंगन में किलकारियां गूंजेंगी.

नन्हेमुन्हे बहुत ही कोमल रुई जैसे मुलायम प्यारेप्यारे छोटे से बच्चे को गोद में ले कर छाती से चिपकाने का अवसर आया है शेखर, है न? मैं ठीक कह रही हूं न?’’ अरुंधती शेखर से बोल रही थी और शेखर जैसे किसी सोच में पड़ा अरुंधती के इस उतावलेपन का आकलन कर रहा था. शेखर चिंतित था यह सोच कर कि अरुंधती की ममता उसे किस ओर ले जा रही है. इतना उतावलापन, इतना उस बच्चे के बारे में सोचना कहीं अरुंधती के लिए घातक सिद्ध न हो. पर अरुंधती तो बस बोले जा रही थी, ‘‘मैं ने तो श्यामली से कह दिया है कि वह कोई काम न करे, सिर्फ आराम करे और अच्छीअच्छी चीजें खाए. खूब जूस पिए. और हां, दूध बिना भूले दोनों समय पीना बहुत जरूरी है. आखिर पेट में एक नन्ही सी जान पल रही है.’’ वह बोलती जा रही थी और शेखर उस में वात्सल्य का बीज फूटते हुए साफसाफ देख रहा था. अरुंधती का अधिकतर समय अब श्यामली की तीमारदारी में ही निकलता था.

उस को समय से खाना खिलाना, जूस पिलाना, जबरदस्ती दूध पिलाना, समयसमय पर डाक्टर से चैकअप करवाना सब अरुंधती खुद करती थी. रमिया और श्यामली तो जैसे मैडमजी के युगोंयुगों के लिए आभारी हो गए थे. कौन किस के लिए इतना करता है, वह भी घर के एक मामूली से नौकर के लिए. उन्हें तो सम झ ही नहीं आता था कि वे मैडमजी के इन एहसानों का बदला कैसे चुकाएंगे. सौ जन्मों में भी इतने प्यार, विश्वास और अपनेपन का मूल्य नहीं चुकाया जा सकता. आखिर वह समय भी आ गया जिस की सब को प्रतीक्षा थी. श्यामली ने एक फूल से नन्हे पुत्र को जन्म दिया. सब से पहले अरुंधती ने उस को गोद में लिया. उस की आंखों से झर झर आंसू बह रहे थे. बच्चे को उस ने अपनी छाती से चिपका रखा था. उसे महसूस हो रहा था कि उस की छाती से दूध की सहस्त्रों धाराएं फूट पड़ी हैं. ‘

‘लाइए मैडम, बच्चे को उस की मां को दें ताकि वह बच्चे को स्तनपान करवा सके,’’ अचानक नर्स की आवाज से अरुंधती की तंद्रा भंग हुई. ‘‘हां, हां,’’ कह कर अरुंधती ने बच्चे को श्यामली की बगल में लिटा दिया और जैसे किसी स्वप्न से जागने के एहसास ने उस को हिला कर रख दिया. वह बहुत ही भारी मन से लड़खड़ाती हुई कमरे से बाहर निकल आई. शेखर बाहर ही खड़ा था. उसे जिस बात का अंदेशा था वही घटित हुआ. शेखर ने अरुंधती को कमर से पकड़ कर गाड़ी में बैठाया और घर ले आया. अरुंधती शून्य में थी, कुछ बोली नहीं. शेखर ने भी कोई बात नहीं छेड़ी क्योंकि वह भलीभांति जानता था कि इस समय अरुंधती के मन में क्या चल रहा है. 3 दिन गुजर गए. अरुंधती ने स्वयं को संभाल लिया था. वह रोज श्यामली से मिलने अस्पताल जाती. कुछ देर बच्चे के साथ खेलती, प्यार करती और घर आ जाती. कल श्यामली अस्पताल से घर आने वाली थी. अरुंधती ने स्वयं रमिया के यहां सारी व्यवस्थाएं करवाईं ताकि श्यामली और बच्चे को कोई परेशानी न हो. ‘‘उआं…उआं…’’ आवाज कानों में पड़ते ही अरुंधती की नींद खुली. ‘अरे, यह क्या, श्यामली घर आ गई?’ अरुंधती बिस्तर से लगभग भागती हुई उठी और तीर की गति से बाहर निकली. लपक कर रमिया के घर की तरफ दौड़ी. ‘

अरे यहां तो ताला पड़ा है. फिर श्यामली कहां… कहीं घर में तो नहीं वह…’ अपने दरवाजे की ओर लपकी लेकिन उसे फिर बाहर से ही बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी. वह बाहर निकल कर बेचैनी से इधरउधर नजरें दौड़ाने लगी. तभी उसे बगिया में कुछ हरकत सी महसूस हुई. वह तुरंत उस ओर दौड़ी, जा कर देखा तो वहां फूलों के बीच श्यामली का बच्चा लेटा हुआ था. ऐसा लग रहा था मानो अभीअभी एक नन्हा सा नयानया फूल खिला है. अरुंधती ने उस को देखते ही गोद में उठा लिया और बोली, ‘ये रमिया और श्यामली क्या पागल हो गए हैं जो इस नन्ही सी जान को यों जमीन पर लिटा दिया. वह पलट कर आवाज देने ही वाली थी कि बच्चे के हाथ में एक कागज का टुकड़ा देख कर रुक गई और उस कागज के पुर्जे को पढ़ने लगी.’ ‘‘मैडम जी, ‘‘यह आप की बगिया का फूल है, हम तो माली थे. हम ने बीज लगाया था. परंतु इस बीज को प्यार और ममता से सींचा ‘‘आप ने. अब इस फूल पर सिर्फ और सिर्फ आप का अधिकार है. ‘‘आप की, श्यामली.’’ अरुंधती कांप रही थी. उस की आंखें अविरल बह रही थीं. बच्चे को छाती से कस कर चिपटा कर मानो वह पूरे वेग से चिल्लाई, ‘‘शेखर, देखो, मैं बंजर नहीं हूं. यह देखो, फूल खिला है, मेरी बगिया का फूल, श्यामली का फूल.’’ Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: अपारदर्शी सच- तनुजा और मनीष के बीच कैसा खालीपन था?

Family Story in Hindi: रात के 11 बज चुके थे. तनुजा की आंखें नींद और इंतजार से बोझिल हो रही थीं. बच्चे सो चुके थे. मम्मीजी और मनीष लिविंगरूम में बैठे टीवी देख रहे थे. तनुजा का मन हो रहा था कि मनीष को आवाज दे कर बुला ले, लेकिन मम्मी की उपस्थिति के लिहाज के चलते उसे ठीक नहीं लगा. पानी पीने के लिए किचन में जाते हुए उस ने मनीष को देखा पर उन का ध्यान नहीं गया. पानी पी कर भी अतृप्त सी वह वापस कमरे में आ गई.

बिस्तर पर बैठ कर उस ने एक नजर कमरे पर डाली. उस ने और मनीष ने एकदूसरे की पसंदनापसंद का खयाल रख कर इस कमरे को सजाया था.

हलके नीले रंग की दीवारों में से एक पर खूबसूरत पहाड़ी, नदी से गिरते झरने और पेड़ों की पृष्ठभूमि से सजी पूरी दीवार के आकार का वालपेपर. खिड़कियों पर दीवारों से तालमेल बिठाते नैट के परदे, फर्श से छत तक की अलमारियां, तरहतरह के सौंदर्य प्रसाधनों से भरी अंडाकार कांच की ड्रैसिंगटेबल, बिस्तर पर साटन की रौयल ब्लू चादर और टेबल पर सजा महकते रजनीगंधा के फूलों का गुलदस्ता. उसे लगा, सभी मनीष का इंतजार कर रहे हैं.

तनुजा की आंख खुली, तब दिन चढ़ आया था. उस का इंतजार अभी भी बदन में कसमसा रहा था. मनीष दोनों हाथ बांधे बगल में खर्राटे ले कर सो रहे थे. उस का मन हुआ, उन दोनों बांहों को खुद ही खोल कर उन में समा जाए और कसमसाते इंतजार को मंजिल तक पहुंचा दे. लेकिन घड़ी ने इस की इजाजत नहीं दी. फुरफुराते एहसासों को जूड़े में लपेटते वह बाथरूम चली गई.

बेटे ऋषि व बेटी अनु की तैयारी करते, सब का नाश्ताटिफिन तैयार करते, भागतेदौड़ते खुद की औफिस की तैयारी करते हुए भी रहरह कर एहसास कसमसाते रहे. उस ने आंखें बंद कर जज्बातों को जज्ब करने की कोशिश की, तभी सासुमां किचन में आ गईं. वह सकपका गई. उस ने झटके से आंखें खोल लीं और खुद को व्यस्त दिखाने के लिए पास पड़ा चाकू उठा लिया पर सब्जी तो कट चुकी थी, फिर उस ने करछुल उठा लिया और उसे खाली कड़ाही में चलाने लगी. सासुमां ने चश्मे की ओट से उसे ध्यान से देखा.

कड़ाही उस के हाथ से छूट गई और फर्श पर चक्कर काटती खाली कड़ाही जैसे उस के जलते एहसास उस के जेहन में घूमने लगे और वह चाह कर भी उन्हें थाम नहीं पाई.

एक कोमल स्पर्श उस के कंधों पर हुआ. 2 अनुभवी आंखों में उस के लिए संवेदना थी. वह शर्मिंदा हुई उन आंखों से, खुद को नियंत्रित न कर पाने से, अपने यों बिखर जाने से. उस ने होंठ दबा कर अपनी रुलाई रोकी और तेजी से अपने कमरे में चली गई.

बहुत कोशिश करने के बावजूद उस की रुलाई नहीं रुकी, बाथरूम में शायद जी भर रो सके. जातेजाते उस की नजर घड़ी पर पड़ी. समय उस के हाथ में न था रोने का. तैयार होतेहोते तनुजा ने सोते हुए मनीष को देखा. उस की बेचैनी से बेखबर मनीष गहरी नींद में थे.

तैयार हो कर उस ने खुद को शीशे में निहारा और खुद पर ही मुग्ध हो गई. कौन कह सकता है कि वह कालेज में पढ़ने वाले बच्चों की मां है? कसी हुई देह, गोल चेहरे पर छोटी मगर तीखी नाक, लंबी पतली गरदन, सुडौल कमर के गिर्द लिपटी साड़ी से झांकते बल. इक्कादुक्का झांकते सफेद बालों को फैशनेबल अंदाज में हाईलाइट करवा कर करीने से छिपा लिया है उस ने. सब से बढ़ कर है जीवन के इस पड़ाव का आनंद लेती, जीवन के हिलोरों को महसूस करते मन की अंगड़ाइयों को जाहिर करती उस की खूबसूरत आंखें. अब बच्चे बड़े हो कर अपने जीवन की दिशा तय कर चुके हैं और मनीष अपने कैरियर की बुलंदियों पर हैं. वह खुद भी एक मुकाम हासिल कर चुकी है. भविष्य के प्रति एक आश्वस्ति है जो उस के चेहरे, आंखों, चालढाल से छलकती है.

मनीष उठ चुके थे. रात के अधूरे इंतजार के आक्रोश को परे धकेल एक मीठी सी मुसकान के साथ उस ने गुडमौर्निंग कहा. मनीष ने एक मोहक नजर उस पर डाली और उठ कर उसे बांहों में भर लिया. रीढ़ में फुरफुरी सी दौड़ गई. कसमसाती इच्छाएं मजबूत बांहों का सहारा पा कर कुलबुलाने लगीं. मनीष की आंखों में झांकते हुए तपते होंठों को उस के होंठों के पास ले जाते शरारत से उस ने पूछा, ‘‘इरादा क्या है?’’ मनीष जैसे चौंक गए, पकड़ ढीली हुई, उस के माथे पर चुंबन अंकित करते, घड़ी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘इरादा तो नेक ही है, तुम्हारे औफिस का टाइम हो गया है, तुम निकल जाना.’’ और वे बाथरूम की तरफ बढ़ गए.

जलते होंठों की तपन को ठंडा करने के लिए आंसू छलक पड़े तनुजा के. कुछ देर वह ऐसे ही खड़ी रही उपेक्षित, अवांछित. फिर मन की खिन्नता को परे धकेल, चेहरे पर पाउडर की एक और परत चढ़ा, लिपस्टिक की रगड़ से होंठों को धिक्कार कर वह कमरे से बाहर निकल गई.

करीब सालभर पहले तक सब सामान्य था. मनीष और तनुजा जिंदगी के उस मुकाम पर थे जहां हर तरह से इतमीनान था. अपनी जिंदगी में एकदूसरे की अहमियत समझतेमहसूस करते एकदूसरे के प्यार में खोए रहते.

इस निश्चितता में प्यार का उछाह भी अपने चरम पर था. लगता, जैसे दूसरा हनीमून मना रहे हों जिस में अब उत्सुकता की जगह एकदूसरे को संपूर्ण जान लेने की तसल्ली थी. मनीष अपने दम भर उसे प्यार करते और वह पूरी शिद्दत से उन का साथ देती. फिर अचानक यों ही मनीष जल्दी थकने लगे तो उसी ने पूरा चैकअप करवाने पर जोर दिया.

सबकुछ सामान्य था पर कुछ तो असामान्य था जो पकड़ में नहीं आया था. वह उन का और ध्यान रखने लगी. खाना, फल, दूध, मेवे के साथ ही उन की मेहनत तक का. उस की इच्छाएं उफान पर थीं पर मनीष के मूड के अनुसार वह अपने पर काबू रखती. उस की इच्छा देखते मनीष भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते लेकिन वह अतृप्त ही रह जाती.

हालांकि उस ने कभी शब्दों में शिकायत दर्ज नहीं की, लेकिन उस की झुंझलाहट, मुंह फेर कर सो जाना, तकिए में मुंह दबा कर ली गई सिसकियां मनीष को आहत और शर्मिंदा करती गईं. धीरेधीरे वे उन अंतरंग पलों को टालने लगे. तनुजा कमरे में आती तो मनीष कभी तबीयत खराब होने का बहाना बनाते, कभी बिजी होने की बात कर लैपटौप ले कर बैठ जाते.

कुछकुछ समझते हुए भी उसे शक हुआ कि कहीं मनीष का किसी और से कोई चक्कर तो नहीं है? ऐसा कैसे हो सकता है जो व्यक्ति शाम होते ही उस के आसपास मंडराने लगता था वह अचानक उस से दूर कैसे होने लगा? लेकिन उस ने यह भी महसूस किया कि मनीष अब भी उस से प्यार करते हैं. उस की छोटीछोटी खुशियां जैसे सप्ताहांत में सिनेमा, शौपिंग, आउटिंग सबकुछ वैसा ही तो था. किसी और से चक्कर होता तो उसे और बच्चों को इतना समय वे कैसे देते? औफिस से सीधे घर आते हैं, कहीं टूर पर जाते नहीं.

शक का कीड़ा जब कुलबुलाता है तब मन जितना उस के न होने की दलीलें देता है उतना उस के होने की तलाश करता. कभी नजर बचा कर डायरी में लिखे नंबर, तो कभी मोबाइल के मैसेज भी तनुजा ने खंगाल डाले पर शक करने जैसा कुछ नहीं मिला.

उस ने कईकई बार खुद को आईने में निहारा, अंगों की कसावट को जांचा, बातोंबातों में अपनी सहेलियों से खुद के बारे में पड़ताल की और पार्टियों, सोशल गैदरिंग में दूसरे पुरुषों की नजर से भी खुद को परखा. कहीं कोई बदलाव, कोई कमी नजर नहीं आई. आज भी जब पूरी तरह से तैयार होती है तो देखने वालों की नजर एक बार उस की ओर उठती जरूरी है.

हर ऐसे मौकों पर कसौटी पर खरा उतरने का दर्प उसे कुछ और उत्तेजित कर गया. उस की आकांक्षाएं कसमसाने लगीं. वह मनीष से अंतरंगता को बेचैन होने लगी और मनीष उन पलों को टालने के लिए कभी काम में, कभी बच्चों और टीवी में व्यस्त होने लगे.

अधूरेपन की बेचैनी दिनोंदिन घनी होती जा रही थी. उस दिन एक कलीग को अपनी ओर देखता पा कर तनुजा के अंदर कुछ कुलबुलाने लगा, फुरफुरी सी उठने लगी. एक विचार उस के दिलोदिमाग में दौड़ कर उसे कंपकंपा गया. छी, यह क्या सोचने लगी हूं मैं? मैं ऐसा कभी नहीं कर सकती. मेरे मन में यह विचार आया भी कैसे? मनीष और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं, प्यार का मतलब सिर्फ यही तो नहीं है. कितना धिक्कारा था तनुजा ने खुद को लेकिन वह विचार बारबार कौंध जाता, काम करते हाथ ठिठक जाते, मन में उठती हिलोरें पूरे शरीर को उत्तेजित करती रहीं.

अतृप्त इच्छाएं, हर निगाह में खुद के प्रति आकर्षण और उस आकर्षण को किस अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है, वह यह सोचने लगी. संस्कारों के अंकुश और नैसर्गिक प्यास की कशमकश में उलझी वह खोईखोई सी रहने लगी.

उस दिन दोपहर तक बादल घिर आए थे. खाना खा कर वह गुदगुदे कंबल में मनीष के साथ एकदूसरे की बांहों में लिपटे हुए कोई रोमांटिक फिल्म देखना चाहती थी. उस ने मनीष को इशारा भी किया जिसे अनदेखा कर मनीष ने बच्चों के साथ बाहर जाने का प्रोग्राम बना लिया. वे नासमझ बन तनुजा से नजरें चुराते रहे, उस के घुटते दिल को नजरअंदाज करते रहे. वह चिढ़ गई. उस ने जाने से मना कर दिया, खुद को कमरे में बंद कर लिया और सारा दिन अकेले कमरे में रोती रही.

तनुजा ने पत्रपत्रिकाएं, इंटरनैट सब खंगाल डाले. पुरुषों से जुड़ी सैक्स समस्याओं की तमाम जानकारियां पढ़ डालीं. परेशानी कहां है, यह तो समझ आ गया लेकिन समाधान? समाधान निकालने के लिए मनीष से बात करना जरूरी था. बिना उन के सहयोग के कोई समाधान संभव ही नहीं था. बात करना इतना आसान तो नहीं था.

शब्दों को तोलमोल कर बात करना, एक कड़वे सच को प्रकट करना इस तरह कि वह कड़वा न लगे, एक ऐसी सचाई के बारे में बात करना जिसे मनीष पहले से जानते हैं कि तनुजा इसे नहीं जानती और अब उन्हें बताना कि वह भी इसे जानती है, यह सब बताते हुए भी कोई आक्षेप, कोई इलजाम न लगे, दिल तोड़ने वाली बात पर दिल न टूटे, अतिरिक्त प्यारदेखभाल के रैपर में लिपटी शर्मिंदगी को यों सामने रखना कि वह शर्मिंदा न करे, बेहद कठिन काम था.

दिन निकलते गए. कसमसाहटें बढ़ती गईं. अतृप्त प्यास बुझाने के लिए वह रोज नए मौकेरास्ते तलाशती रही. समाज, परिवार और बच्चे उस पर अंकुश लगाते रहे. तनुजा खुद ही सोचती कि क्या इस एक कमी को इस कदर खुद पर हावी होने देना चाहिए? तो कभी खुद ही इस जरूरी जरूरत के बारे में सोचती जिस के पूरा न होने पर बेचैन होना गलत भी तो नहीं. अगर मनीष अतृप्त रहते तो क्या ऐसा संयम रख पाते? नहीं, मनीष उसे कभी धोखा नहीं देते या शायद उसे कभी पता ही नहीं चलने देते.

निशा उस की अच्छी सहेली थी. उस से तनुजा की कशमकश छिपी न रह सकी. तनुजा को दिल का बोझ हलका करने को एक साथी तो मिला जिस से सहानुभूति के रूप में फौरीतौर पर राहत मिल जाती थी. निशा उसे समझाती तो थी पर क्या वह समझना चाहती है, वह खुद भी नहीं समझ पाती थी. उस ने कई बार इशारे में उसे विकल्प तलाशने को कहा तो कई बार इस के खतरे से आगाह भी किया. कई बार तनुजा की जरूरत की अहमितयत बताई तो कई बार समाज, संस्कार के महत्त्व को भी समझाया. तनुजा की बेचैनी ने उस के मन में भी हलचल मचाई और उस ने खुद ही खोजबीन कर के कुछ रास्ते सुझाए.

धड़कते दिल और डगमगाते कदमों से तनुजा ने उस होटल की लौबी में प्रवेश किया था. साड़ी के पल्लू को कस कर लपेटे वह खुद को छिपाना चाह रही थी पर कितनी कामयाब थी, नहीं जानती. रिसैप्शन पर बड़ी मुश्किल से रूम नंबर बता पाई थी. कितनी मुश्किल से अपने दिल को समझा कर वह खुद को यहां तक ले कर आई थी. खुद को लाख मनाने और समझाने पर भी एक व्यक्ति के रूप में खुद को देख पाना एक स्त्री के लिए कितना कठिन होता है, यह जान रही थी.

अपनी इच्छाओं को एक दायरे से बाहर जा कर पूरा करना कितना मुश्किल होता है, लिफ्ट से कमरे तक जाते यही विचार उस के दिमाग को मथ रहे थे. कमरे की घंटी बजा कर दरवाजा खुलने तक 30 सैकंड में 30 बार उस ने भाग जाना चाहा. दिल बुरी तरह धड़क रहा था. दरवाजा खुला, उस ने एक बार आसपास देखा और कमरे के अंदर हो गई. एक अनजबी आवाज में अपना नाम सुनना भी बड़ा अजीब था. फुरफुराते एहसास उस की रीढ़ को झुनझुना रहे थे. बावजूद इस के, सामने देख पाना मुश्किल था. वह कमरे में रखे एक सोफे पर बैठ गई, उसे अपने दिमाग में मनीष का चेहरा दिखाई देने लगा.

क्या वह ठीक कर रही? इस में गलत क्या है? आखिर मैं भी एक इंसान हूं. अपनी इच्छाएं, अपनी जरूरतें पूरी करने का हक है मुझे. मनीष को पता चला तो?

कैसे पता चलेगा, शहर के इस दूसरे कोने में घरऔफिस से दसियों किलोमीटर दूर कुछ हुआ है, इस की भनक तक इतनी दूर नहीं लगेगी. इस के बाद क्या वह खुद से नजरें मिला पाएगी? यह सब सोच कर उस की रीढ़ की वह सनसनाहट ठंडी पड़ गई, उठ कर भाग जाने का मन हुआ. वह इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती. मनीष, मम्मी, बच्चे, जानपहचान वाले, रिश्तेदार सब की नजरों में वह नहीं गिर सकती.

वेटर 2 कौफी रख गया. कौफी की भाप के उस पार 2 आंखें उसे देख रही थीं. उन आंखों की कामुकता में उस के एहसास फिर फुरफुराने लगे. उस ने अपने चेहरे से हो कर गरदन, वक्ष पर घूमती उन निगाहों को महसूस किया. उस के हाथ पर एक स्पर्श उस के सर्वांग को थरथरा गया. उस ने आंखें बंद कर लीं. वह स्पर्श ऊपर और ऊपर चढ़ते बाहों से हो कर गरदन के खुले भाग पर मचलने लगा. उस की अतृप्त कामनाएं सिर उठाने लगीं. अब वह सिर्फ एक स्त्री थी हर दायरे से परे, खुद की कैद से दूर, अपनी जरूरतों को समझने वाली, उन्हें पूरा करने की हिम्मत रखने वाली.

सहीगलत की परिभाषाओं से परे अपनी आदिम इच्छाओं को पूरा करने को तत्पर वह दुनिया के अंतिम कोने तक जा सकने को तैयार, उस में डूब जाने को बेचैन. तभी वह स्पर्श हट गया, अतृप्त खालीपन के झटके से उस ने आंखें खोल दीं. आवाज आई, ‘कौफी पीजिए.’

कामुकता से मुसकराती 2 आंखें देख उसे एक तीव्र वितृष्णा हुई खुद से, खुद के कमजोर होने से और उन 2 आंखों से. होटल के उस कमरे में अकेले उस अपरिचित के साथ यह क्या करने जा रही थी वह? वह झटके से उठी और कमरे से बाहर निकल गई. लगभग दौड़ते हुए वह होटल से बाहर आई और सामने से आती टैक्सी को हाथ दे कर उस में बैठ गई. तनुजा बुरी तरह हांफ रही थी. वह उस रास्ते पर चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई.

दोनों ओर स्थितियां चरम पर थीं. दोनों ही अंदर से टूटने लगे थे. ऐसे ही जिए जाने की कल्पना भयावह थी. उस रात तनुजा की सिसकियां सुन मनीष ने उसे सीने से लगा लिया. उस का गला रुंध गया, आंसू बह निकले. ‘‘मैं तुम्हारा दोषी हूं तनु, मेरे कारण…’’

तनु ने उस के होंठों पर अपनी हथेली रख दी, ‘‘ऐसा मत कहो, लेकिन मैं करूं क्या? बहुत कोशिश करती हूं लेकिन बरदाश्त नहीं कर पाती.’’

‘‘मैं तुम्हारी बेचैनी समझता हूं, तनु,’’ मनीष ने करवट ले कर तनुजा का चेहरा अपने हाथों में ले लिया, ‘‘तुम चाहो तो किसी और के साथ…’’ बाकी के शब्द एक बड़ी हिचकी में घुल गए.

वह बात जो अब तक विचारों में तनुजा को उकसाती थी और जिसे हकीकत में करने की हिम्मत वह जुटा नहीं पाई थी, वह मनीष के मुंह से निकल कर वितृष्णा पैदा कर गई.

तनुजा का मन घिना गया. उस ने खुद ऐसा कैसे सोचा, इस बात से ही नफरत हुई. मनीष उस से इतना प्यार करते हैं, उस की खुशी के लिए इतनी बड़ी बात सोच सकते हैं, कह सकते हैं लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएगी? क्या ऐसा करना ठीक होगा? नहीं, कतई नहीं. उस ने दृढ़ता से खुद से कहा.

जो सच अब तक संकोच और शर्मिंदगी का आवरण ओढ़े अपारदर्शी बन कर उन के बीच खड़ा था, आज वह आवरण फेंक उन के बीच था और दोनों उस के आरपार एकदूसरे की आंखों में देख रहे थे. अब समाधान उन के सामने था. वे उस के बारे में बात कर सकते थे. उन्होंने देर तक एकदूसरे से बातें कीं और अरसे बाद एकदूसरे की बांहों में सो गए एक नई सुबह में उठने के लिए. Family Story in Hindi.

Family Story in Hindi: धूप छांव सी जिंदगी- क्या पूरा हुआ सपना का ख्वाब?

Family Story in Hindi: गांव की कच्ची सड़क पर अकेली चलतीचलती सपना के पैर अचानक रुक गए. उस ने पीछे गांव की ओर जाती टेढ़ीमेढ़ी, ऊबड़खाबड़ सड़क की ओर पलट कर एक नजर भर देखा और मन में एक दृढ़ निश्चय के साथ आगे शहर को जोड़ने वाली उस पक्की सड़क की ओर अपने कदम बढ़ा दिए.

गांव की वह पगडंडीनुमा ऊबड़खाबड़ सड़क आगे जा कर शहर की ओर जाने वाली उस पक्की चौड़ी सड़क में विलीन हो जाती थी. गांव की उस कच्ची सड़क की सीमा पर शहर की ओर जाने वाली पक्की सड़क के ठीक किनारे ईंटसीमेंट से बनी एक छोटी सी पुलिया थी, जो कि  जर्जर अवस्था में थी और जिस का एकमात्र उपयोग बस के लिए प्रतीक्षारत यात्रियों के बैठने के रूप में होता था और जहां शहर की ओर जाने वाली तमाम बसें कुछ मिनट के लिए आ कर रुका करती थीं.

सपना जब उस पुल तक पहुंची, तो सूर्योदय हो चुका था. तकरीबन 1 घंटे से वह उस पुल पर बैठी बस की प्रतीक्षा कर रही थी. सुबह का हलकामीठा लालिमायुक्त प्रकाश अब आहिस्ताआहिस्ता तेज प्रखर रूप धारण कर चुका था. सामने सड़क के दूसरी ओर घने पेड़ों के झुरमुट के बीच से हो कर सूरज की झिलमिलाती तेज किरणें उस के चेहरे के साथ अठखेलियां कर रही थीं, किंतु वह किसी गहरे सोचविचार में डूबी हुई थी.  उस के कानों में रहरह कर उस के बाबू का वह स्वर गूंज उठता था, ’’मुझे तो अब इस लड़की का भी भरोसा नहीं.’’

“सपना… अरे ओ सपना, कहां मर गई छोरी… घंटेभर से आवाज लगा रही हूं तुझे. देख, तेरे बाबू के आने का टैम (टाइम) हो गया है. बित्तर (भीतर) बैठीबैठी ना जाने क्या कर रही है छोरी?‘’

सपना अपने कमरे में गुमसुम बैठी हुई है. मां के शब्द मानो उस के कानों से टकरा कर वापस चले जाते हों. मां की बातों का उस पर कोई असर नहीं हो रहा था. वह अपने कमरे में बैठी खिड़की के बाहर देखे जा रही है, बिलकुल खामोश वह किसी गहरी चिंता में मग्न गुमसुम सी बैठी हुई है.    पिता भी डांटडपट कर सुबह दुकान के लिए जा चुके थे. मां भी कहसुन कर, रोपीट कर रसोई के काम में जुट गई थी. सारे दिन अकेली घर का सारा काम संभालतेसंभालते अब उस का गुस्सा भी सातवें आसमान पर जा पहुंचा था.

सपना की मां ने कमरे के पास आ कर फिर आवाज लगाई, ‘’अरे ओ छोरी, घणा बेर (बहुत देर) से आवाज लगा रही हूं, सुनती क्यों नहीं? घर के लुगाइयों वाली चाल नहीं सीखेगी, ससुराल जा कर नाक कटाएगी के. इस के कारण आदमी की गालियां सुनो, लेकिन छोरी है कि जिद पकड़े बैठी है.‘’

‘’अरे, जाण दे उसन (जाने दो उसे),’’ तभी सपना के बाबू का क्रोधपूर्ण शब्द सपना के कानों में गूंजा, ‘’दो दिन में इस की अक्ल ठिकाने आ जाएगी, भूख लगेगी तो खुद ही कमरे के बाहर आ जाएगी, तुम क्यों बेकार में अपना खून जला रही है?”

“अरे, देखना तुम यह भी वही सब करेगी, जो इस की  बड़ी बहन ने किया था. मुझे तो इस का भी भरोसा नहीं,’’ पिता की आवाज सुन सपना अपने पलंग से उतर आई और दरवाजे से कान सटा कर मांबापू की बातें सुनने की कोशिश करती है.

उस का बापू उस की मां से कहता है, ‘’सुनीता का पता चल गया है, वह शहर में है. उसी लड़के के साथ… दोनों ने शादी कर ली है. आज ही कन्हैया बाबू का लड़का शहर से आया है. उसी ने उन दोनों को वहां पर देखा. अब यह भी कोई गलत कदम उठाए, उस से पहले इस की शादी करा देना ही उचित होगा.

“सच कहता हूं कि मुझे अब इस का भी भरोसा नहीं. आगे पढ़ने  की जिद किए बैठी है. कहां से लाऊंगा मैं इतना पैसा? शहर जा कर पढ़ना चाहती है, शहर की पढ़ाई में जानती भी है… कितना खर्चा आता है.”

“जितना जल्दी हो सके, इस के हाथ पीले करा दें तो ही जा कर अपने मन को शांति मिलेगी, नहीं तो हर वक्त यही डर बना रहेगा कि जो कांड इस की बड़ी बहन ने किया वही सबकुछ यह भी न कर ले…’’

‘’तुम ठीक ही कहते हो सपना के बापू… जवान छोरी के मांबापू के कलेजे में तो डर हमेशा बना रहता है….‘’ सपना की मां ने भी उस के पिता का ही समर्थन किया.

अपने पिता के द्वारा कही गई ये बातें सपना के सीने में तीर की भांति लगती हैं, उस की नजर में उस वक्त अपने  ही मांबापू किसी दुश्मन से कम नहीं लग रहे थे. बहुत देर तक उदास बैठी वह जाने क्याक्या मन ही मन सोचती रही, और फिर अचानक उस ने अपने मन में एक दृढ़ निश्चय किया. उस ने तय किया कि अब वह अकेली ही शहर के लिए निकल जाएगी और  लौट कर वापस कभी नहीं आएगी. जिस घर में उस के मांबापू को ही उस पर भरोसा नहीं है, वह उस घर में कभी वापस नहीं आएगी. कम से कम वह तब तक वापस नहीं आएगी, जब तक वह योग्य नहीं बन जाती. और फिर अगले दिन ही सुबहसुबह वह अपने घर को छोड़ कर निकल पड़ती है. अपने गांव से तकरीबन 3 किलोमीटर की दूरी पैदल चलती हुई वह शहर की ओर जाने वाली इस पक्की सड़क तक आ पहुंचती है.

सड़क के किनारे बने उस छोटे से पुल पर बैठी हुई सपना अपनी ही धुन में खोई हुई थी. उस के चेहरे पर हलकी सी उदासी उभर आई थी, चिंता की कई परतें उस के मानसपटल पर उभर आती और फिर मिट जाती.

दिल्ली, दिल्ली की आवाज ने उसे जैसे  नींद से जगा दिया. वह एकदम से उठी और सामने खड़ी बस में जा बैठी. बस की ज्यादातर सीटें खाली थीं. वह खिड़की के किनारे वाली एक सीट पर जा बैठती है, बस चल पड़ती है.

‘’हैलो, हां, मैं पहुंच रही हूं, तुम मुझे लेने आ जाओगे ना,‘’ सपना ने अपने मोबाइल से किसी को फोन किया.

“हां, मैं आ जाऊंगा, तुम दिल्ली पहुंचने के एक घंटे पहले मुझे फोन कर देना. मैं वक्त पर पहुंच जाऊंगा,‘’ फोन की दूसरी तरफ से किसी ने जवाब दिया.

‘’और मेरे रहने का इंतजाम…’’

‘’वह भी हो जाएगा… तुम चिंता मत करो.‘’

सपना जब दिल्ली पहुंची, तो जितेंद्र उस के इंतजार में उसे खड़ा मिला. उस ने उसे देखते ही दूर से हाथ हिलाया और पास आ कर उस का सामान उठा कर  बाइक पर रख लिया और उस के साथ गर्ल्स होस्टल की ओर चल दिया.

‘’तो, आखिर तुम ने हिम्मत दिखा ही दी…’’ बाइक चलातेचलाते जितेंद्र ने सपना की ओर पीछे पलट कर देखा.

सपना चुप रही. उस ने खामोशी से बस पलकें उठा कर उस की ओर देख भर लिया.

‘’घर छोड़ने का निर्णय लेते वक्त तुम्हें डर नहीं लगा?

‘निर्णय लेना पड़ा… वरना बापू मेरी शादी करा देता,’’ तेज हवा के कारण दुपट्टे का एक सिरा सपना के चेहरे से आ चिपका था, जिसे चेहरे से हटाते हुए सपना ने जवाब दिया.

‘’मानना पड़ेगा तुम्हे… तुम्हें अपने बापू का भी डर नहीं लगा?”

“डर…? डर किस बात का…? मैं कोई गलत काम थोड़े ही करने जा रही हूं… कुछ बनने का उद्देश्य ले कर निकली हूं,” और बेफिक्री में सपना ने अपने कंधे को झटका दिया.

‘’तुम अपनी बताओ. तुम्हारा इस बार का रिजल्ट क्या आया?‘’ सपना ने अचानक ही विषय को बदलते हुए पूछ लिया.

‘’मैं इस बार भी असफल रहा…’’ जितेंद्र लापरवाही के साथ हंस पड़ा.

‘’इस बार भी, ऐसा कैसे?‘’ सपना ने आश्चर्यपूर्वक पूछा.

‘’तुम तो पिछले कई वर्षों से आईएएस की तैयारी कर रहे हो न….” और सपना की विस्मय से आंखें फैल गईं.

‘’अरे, मैं तो आईएएस की तैयारी बड़े जीजान से, कड़ी मेहनत के साथ हर साल करता हूं, परंतु हर बार ये यूपीएससी वाले क्वेश्चन ही कठिन सेट कर देते हैं…  दरअसल, मैं असफल नहीं होता, बल्कि यूपीएससी के क्वेश्चन ही कठिन पूछे जाते हैं,‘’ और दोनों हंस पड़ते हैं.

‘’ऐसे ही हंसती रहा करो… उदास अच्छी नहीं लगती,” जितेंद्र ने गर्ल्स होस्टल के गेट के बाहर बाइक खड़ी करते हुए कहा.

‘’सपना, ये रहा तुम्हारा कमरा. फिलहाल तो मैं ने किसी तरह जुगाड़ कर के 15 दिन के पैसे एडवांस में दे दिए हैं. आगे तुम्हें खुद ही इंतजाम करना होगा…’’ और फिर थोड़ा रुक कर जितेंद्र कहता है, ’’मैं तुम्हारे लिए पार्ट टाइम जौब खोजने में तुम्हारी मदद करूंगा.‘’

‘’थैंक यू जितेंद्र, तुम ने मेरी बहुत मदद की है सच में. मैं तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं भूलूंगी,’’ सपना ने कृतज्ञता भरे स्वर में कहा.

‘’कैसी बात कर रही हो? मैं तो खुद शर्मिंदा हूं कि मैं तुम्हारे लिए बस इतना ही कर पाया और दोस्ती के  बीच में यह अहसान जैसे शब्द कहां से आ गए?’’ जितेंद्र ने अधिकारपूर्वक डांट लगाई, तो सपना ने गंभीर होते हुए नजरें जमीन पर गड़ा दी.

‘’और फिर हम दोनों एक ही गांव से हैं. तो इस अनजान शहर में हम ही एकदूसरे के काम आएंगे ना…’’ जितेंद्र ने उसे समझाते हुए कहा.

सपना ने कोई जवाब नहीं दिया, बस चुपचाप खामोशी से जितेंद्र की ओर देखती रही.

जितेंद्र जब सपना को होस्टल के कमरे में छोड़ कर चलने को हुआ, तो सपना से बोला, ’’मैं चलता हूं अभी. कोचिंग की क्लास का समय हो रहा है. वैसे भी  तुम्हारे लिए यह शहर नया तो है नहीं. तुम पहले भी यहां आ चुकी हो. तुम्हारे लिए तो सबकुछ देखासमझा हुआ है. मेरे खयाल से तुम्हें कुछ खास परेशानी नहीं होनी चाहिए. और कुछ जरूरत पड़े तो मुझे फोन करना. वैसे, मेरा नंबर तो तुम्हारे पास है ही.’’

सपना ने सहमति में बस सिर हिला दिया.

जितेंद्र जब चला गया, तो वह सोच में पड़ गई. जितेंद्र ने अपनी सामर्थ्य से बढ़ कर उस की मदद की है… अब वह और उस से मदद नहीं लेगी… क्या वह बिना उस की सहायता के कभी कुछ नहीं कर सकती? कम से कम वह अपने लिए इतनी कोशिश तो अवश्य करेगी कि पैसे के लिए अब और उस की मदद न लेनी पड़े, दिल्ली तो वह आ गई है, और अब उसे बस आगे का रास्ता तलाशना है. क्यों न वह अपने लिए कोई पार्ट टाइम जौब ही ढूंढ़ ले? लौट कर घर वापस जाने का तो अब वह सोच भी नहीं सकती. अकेली बैठेबैठे उसे और भी चिंता होने लगी.

होस्टल के उस कमरे में उस के अतिरिक्त और 2 लड़कियां रह रही थीं- प्रीति और नीलू. वैसे तो दोनों अकसर गायब ही रहती थीं. रात के ढाईढाई, तीनतीन बजे तक जाने कहांकहां  भटकती रहती और कभीकभी जब वे लौटती तो उन के साथ कोई न कोई लड़का जरूर होता. दोनों ही ड्रिंक लेती, सिगरेट पीती.

सपना को यहां रहते हुए 10 दिन का समय बीत चुका था. अभी तक अपने लिए वह कोई काम नहीं खोज पाई थी. उसे अब अपने भविष्य को ले कर चिंता सताने लगी थी. गांव से जिस उद्देश्य को ले कर वह निकली थी, उस के लिए हौसले के साथसाथ पैसों की भी जरूरत थी. हौसला तो उस के पास था, पर जरूरत थी तो उस के अपने  खर्चों के लिए पैसों का जुगाड़ करना, जो कि बहुत मुश्किल होता जा रहा था. इस बीच उस के मन में कई दफा नीलू और प्रीति से मदद लेने के विचार भी उत्पन्न हुए, लेकिन कोई ठोस आलंबन न पा कर सूखी पंखुड़ियों के समान झड़ गए. उसे हर बार लगता  कि जिंदगी में जिन ऊंचाइयों को छूने का ख्वाब ले कर वह घर से निकली है, उस का रास्ता इतना समतल और सपाट तो नहीं हो सकता…

सामने चेयर पर बैठी नीलू एक के बाद एक सिगरेट सुलगाती जा रही थी. वह कुछ परेशान सी दिख रही थी. सपना बिस्तर पर बैठी हुई किसी किताब में नजरें जमाए हुई थी. किंतु बीचबीच में वह एकाध बार नजरें उठा कर नीलू को देख भर लेती, परंतु कुछ पूछने का साहस नहीं जुटा पाती. प्रीति अभी तक लौट कर नहीं आई थी.

सपना ने घड़ी देखी, रात के 12 बज रहे थे. सपना कुछ पूछना चाहती है, किंतु फिर भी चुप रह जाती है, क्योंकि वह जानती है कि इस वक्त उस से कुछ भी पूछना निरर्थक है. उस से कुछ भी  पूछने का मतलब है किसी न किसी विवाद की शुरुआत. तो बेहतर है कि चुप ही रह जाए.

कुछ देर तक पन्ने पलटने के बाद वह किताब को अपने पास की टेबल पर रख देती है और बिस्तर पर आंखें मूंद कर चुपचाप लेट जाती है.

‘’हेल विद हिम…‘’ सपना के कानों में जब नीलू की झुंझलाहट भरी यह तेज आवाज पड़ी, तो वह अचानक बिस्तर से उठ बैठी. सामने देखा तो नीलू और प्रीति में किसी बात पर जोरदार बहस चल रही थी.

प्रीति कब कमरे में आई, उसे पता ही नहीं लगा. शायद उस वक्त वह काफी गहरी नींद में थी.

‘’नाराज मत हो यार. मैं तो बस इतना पूछ रही थी कि रोहित के साथ तेरा अफेयर कैसा चल रहा है? देख, वह  लड़का अपने बहुत काम का है. ले चल छोड़, नहीं पूछती अब,‘’ और फिर दोनों लड़कियां खुद ही खामोश हो जाती हैं. दोनों के बीच बहुत देर तक चुप्पी छाई रहती है.

सपना ने  देखा कि टेबल पर दोनों के ड्रिंक का गिलास पड़ा हुआ है और बोतल आधी खाली पड़ी हुई है.

‘अभी इन दोनों के बीच बोलने का कोई फायदा नहीं है… ये दोनों ऐसे ही लड़तीझगड़ती हैं, चीखतीचिल्लाती हैं, खुद ब खुद शांत हो जाएंगी…’ सपना ने सोचा और अपने कानों को दोनों हथेलियों से ढक कर पुनः सोने की चेष्टा करने लगी.

‘’जस्ट शटअप प्रीति, डोंट बी सिली यार.‘’

‘’बस इतनी सी तो बात है.‘’

‘’बस, इतनी सी बात लगती है तुझे.‘’

‘’हां. और नहीं तो क्या?‘’

सपना बिस्तर पर लेटेलेटे ही आंखें खोल कर उन दोनों लड़कियों की ओर देखती है, ‘’जाने कौन सी बात पर ये दोनों रात के तीसरी पहर पंचायत किए बैठी हैं…’’ सपना ने यह बात बेहद धीमी आवाज में अपनेआप से कही थी, क्योंकि उस के द्वारा कहे गए ये शब्द उस के दोनों होंठों के बीच ही कहीं दब कर रह गए थे.

अगले दिन दोपहर को जब सपना लंच कर के कमरे में लौटी तो देखा कि दोनों ही लड़कियां प्रीति और नीलू बेसुध सोई पड़ी थीं, और कुछ समय बाद एकदम से उठी और तैयार हो कर कहीं बाहर जाने के लिए निकल पड़ी.

सपना के मन में आया कि क्यों ना आज जितेंद्र से अपने लिए कहीं काम खोजने की वह बात करे. आज तो उस की छुट्टी भी होगी. उस के पास जो भी पैसे थे, अब एकएक कर खर्च हो गए थे. उस के लिए अभी कोई भी छोटामोटा काम चलेगा.

उस ने जितेंद्र के नंबर पर फोन किया. नंबर बिजी आ रहा था. सपना चेयर पर बैठी कुछ सोचती रही और फिर पास के टेबल से 2 दिन पुराने अखबार को उठा कर उस के पेज पलटने लगती है. उस की नजर अखबार में छपे एक कौलम पर ठहर गई, ‘’वृद्धाश्रम के लिए एक महिला अटेंडेंट की जरूरत है… इच्छुक इस पते पर संपर्क करें.‘’ नीचे फोन नंबर और पता दिया हुआ था.

सपना ने मोबाइल में सर्च किया दिया हुआ पता उस गर्ल्स होस्टल से 40 मिनट की दूरी पर था. उस ने नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया.

अचानक कमरे के दरवाजे के खटखटाने की आवाज सुन वह दरवाजे की ओर बढ़ी. सपना ने जैसे ही दरवाजा खोला, एक छरहरे  बदन का सांवला सा लड़का कमरे के अंदर दाखिल हो गया. लड़के ने अंदर आने से पहले सपना की इजाजत लेनी जरूरी नहीं समझी. बड़े ही बेबाकी के साथ सामने की कुरसी खींच कर वह  बैठ जाता है.

सपना उस युवक से कुछ पूछती, उस से पहले ही वह युवक स्वयं ही अपना परिचय देने लगा, ‘’मैं, तेजप्रताप, प्रीति का दोस्त. और आप…?” सपना अचकचा कर उस युवक का चेहरा देखने लग जाती है.

युवक ने सपना के जवाब का कोई इंतजार नहीं किया. वह खुद ही बोल पड़ता है, ‘’आप नई आई हैं.” और सिगरेट सुलगाते हुए पुनः वह युवक सवाल करता है, ‘’कब तक आएगी? कुछ बता कर गई है प्रीति?”

“नहीं, मुझे कुछ नहीं पता.”

“खैर, कोई नहीं. मैं यहीं उस का इंतजार कर लूंगा, जब तक कि वह आ नहीं जाती.”

वह युवक खुद ही सवाल करता और खुद ही उस का उत्तर भी देता जाता…  उस के लिए सपना की उपस्थिति, अनुपस्थिति, सहमति, असहमति मानो जैसे इन सब का कोई मतलब ही ना हो.

अचानक कमरे में दाखिल हुए इस घुसपैठिए की उपस्थिति अब सपना के लिए बेहद असहज हो रही थी, ’’आप प्रीति को फोन कर के पूछ क्यों नहीं लेते कि वह कब तक आएगी?” सपना ने नाराजगी प्रकट की.

उस युवक ने सपना के सवाल का कोई जवाब नहीं दिया और वहीं बैठेबैठे सिगरेट का धुआं हवा में उड़ेलता रहा… उस ने अब अपनी दृष्टि सपना के चेहरे पर टिका दी थी.

सपना के लिए यह सब बहुत ही असहज हो रहा था. वह उठ कर उस कमरे से बाहर जाने के लिए उठ खड़ी होती है कि तभी प्रीति कमरे में दाखिल होती है.

प्रीति ने सपना को कमरे से बाहर जाते देखा तो उस के कंधे पर अपना हाथ रख उसे रोकते हुए कहा, ‘’तुम बाहर कहां जा रही हो? ‘’

‘’तेज, मीट दिस प्रिटी गर्ल सपना.”

‘’सपना, मीट माय फ्रेंड तेजप्रताप.‘’

‘’वैरी प्लीज्ड टु मीट यू,‘’ सपना ने तेजप्रताप के बढ़े हुए हाथ से हाथ मिलाया और अनिच्छापूर्वक मुसकराने की कोशिश में होंठ फैला दिए…

‘’सपना, यह यहां के एक बहुत बड़े बिजनैसमैन के इकलौते बेटे हैं. इन की करोड़ों की प्रोपर्टी है. ये तुम्हारे बहुत काम आ सकते हैं.‘’

‘’माफ कीजिएगा, मुझे एक जरूरी फोन करना है,” सपना दरवाजे की ओर बढ़ जाती है.

‘’अरे, आप क्यों जा रही हैं, बैठिए ना प्लीज,‘’ तेजप्रताप ने सपना के कंधे को अपने हाथों से दबाते हुए कहा, तो सपना ने बड़ी ही बेरुखी के साथ अपने कंधे पर रखे गए हाथ को झटक दिया.

सपना कमरे से बाहर निकल आती है. सपना के कमरे से बाहर जाते ही वह युवक प्रीति को अपनी  बांहों में भर लेता है, और बड़ी बेसब्री के साथ उस के माथे, गालों और होंठों पर चुंबन की बौछार लगा देता है.

लेकिन प्रीति ने उसे मना करने के बजाय उस के गले में अपनी बांहें डाल दीं और उसे उतने ही प्यार से प्यार के लिए उकसाने लगती है.

सपना के बाहर जाते ही उस युवक ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और प्रेमोन्मत्त हो कर दोनों एकदूसरे को आगोश में भर लेते हैं…

सपना होस्टल के बाहर लगे गार्डन की बेंच पर आ कर बैठ जाती है, तभी उसे जितेंद्र का फोन आता है.

‘’हैलो, तुम ने फोन किया था मुझे…‘’

‘’हां, किया था.‘’

‘’सौरी, तुम्हारा फोन उठा नहीं सका.”

‘’हां, कहो, क्या बात है? कहीं कोई किसी तरह की परेशानी तो नहीं है?‘’

‘’नहीं, लेकिन क्या कल तुम मेरे साथ एक जगह चल सकोगे?‘’

‘’कहां चलना है…’’

‘’मैं ने अपने लिए एक नौकरी तलाश की है. वहीं चलना है. मैं तुम्हें वहां का एड्रेस व्हाट्सप्प पर भेज रही हूं.‘’

‘’अरे, यह तो कोई वृद्धाश्रम है.‘’

‘’मालूम है.’’

‘’क्या तुम कर पाओगी यह सब?‘’

‘’क्यों नहीं, किसी बुजुर्ग की सेवा ही तो करनी है. तुम चिंता मत करो. मुझे कोई परेशानी नहीं होगी. मुझे तुम्हारी बस इतनी मदद चाहिए कि तुम मुझे वहां तक पहुंचा दो और वहां से होस्टल छोड़ जाने का काम कर दो. इतना कर सको, तो बहुत मेहरबानी.”

‘’कैसी बातें करती हो? इस में मेहरबानी जैसी कोई बात नहीं. मैं तुम्हारे लिए इतना तो कर ही सकता हूं. ओके. तो कल मिलते हैं ना?’’

‘’ठीक है तब, कल मैं समय पर आ जाऊंगा.‘’

‘’ओके.‘’

जितेंद्र से फोन पर बातें करने के बाद जब सपना कमरे की ओर जाती है, तो कमरे का दरवाजा अंदर से बंद पाती है. उस ने दरवाजा बाहर से खटखटाया, तो करीब 5-10 मिनट बाद तेजप्रताप अपनी कमीज के बटन ठीक करते हुए दरवाजा खोलता है. उसे ऐसी अवस्था में देख कर सपना अपने पैर दरवाजे से पीछे की ओर खींच लेती है.

तेजप्रताप के वहां से चले जाने के बाद वह कमरे में दाखिल होती है. बिस्तर पर चादर ओढ़ प्रीति अर्धनग्न अवस्था में नशे की हालत में पड़ी हुई थी. उसे ऐसी अवस्था में देख सपना का मन उस के प्रति घृणा से भर जाता है.

वह मन ही मन  सोचती है कि इस समाज में कितनी ही ऐसी लड़कियां हैं, जो अपनी इज्जत, अपनी प्रतिष्ठा, अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ती हैं. उन्हें इतनी स्वतंत्रता नहीं मिलती कि वह अपने जीवन में किसी लक्ष्य को हासिल कर सकें, तो वहीं दूसरी ओर ऐसी भी लड़कियां हैं, जो अपने परिवार द्वारा दिए गए स्वतंत्रता का दुरुपयोग करती हैं. अपनी इज्जत का सरेआम व्यापार करती हैं. पता नहीं, इन के मांबाप पर इन के ऐसे कृत्यों का क्या प्रभाव पड़ता होगा?

सपना एक बेहद घृणापूर्ण दृष्टि उस की ओर डालती है, और अपना चेहरा दूसरी ओर दीवार की तरफ कर बिस्तर पर लेट जाती है, आंखें मूंद कर वह सोने का प्रयत्न करती है.

वह वृद्धाश्रम शहर की भीड़भाड़ वाले इलाके में तन्हा, बेबस, लाचार और अपने ही बच्चों के द्वारा ठुकराए गए मांबाप के लिए बना था, जो कि अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित सभी तरह की औलादों के मांबाप का एकमात्र आश्रय स्थल था. ये बुजुर्ग अपने जीवन के तमाम अनुभवों से गुजर कर जीवन के अंतिम पड़ाव में अब जीवन की कठोरतम और क्रूरतम सचाई से रूबरू हो रहे थे. यहां पर वे, ‘’जीवन का एकमात्र सत्य दुख है,’’ इस कथन से साक्षात्कार हो रहे थे…

सपना को वहां काम करते हुए अब एक महीने से भी अधिक समय बीत चुका था. सपना उस आश्रम की साफसफाई से ले कर वृद्ध महिलाओं को नहलानेधुलाने का सारा काम बड़े ही लगन से करती. धीरेधीरे वह यहां रहने वाले प्रायः सभी बुज़ुर्गों की चहेती बन गई थी. सभी उस से बेहद प्यार करते. उन बुजुर्गों में तो कुछ ऐसे भी थे, जो कि सिर्फ सपना के हाथों से ही खाना पसंद करते.

सपना को इस काम से मिलने वाले पैसे इतने अधिक तो नहीं थे, परंतु इतना कम भी नहीं था कि उस का गुजारा ना हो सके. वह जितनी मेहनत से वहां के काम करती, उतनी ही लगन से अपनी पढ़ाई भी कर रही थी. आश्रम में भी वह थोड़ाबहुत समय अपने पढ़ने के लिए निकाल लेती. उसी आश्रम में एक और वृद्ध महिला थी, जो कि अकसर खामोश रहती. सपना ने कई बार उन से बातें करने की कोशिश की, लेकिन वह ज्यादा किसी से बात नहीं करती थी.

काम के बीच जब भी थोड़ा समय मिलता, सपना उन के पास वाले कोने में बैठ कर पढ़ने  लगती, क्योंकि वही एक ऐसा कोना था, जो उसे पढ़ने के लिए उपयुक्त लगता.

एक दिन सपना वहां बैठी कुछ पढ़ रही थी, कुछ याद करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बीच में कहीं अटक जाती, तभी उस के कानों में कुछ शब्द किसी के सुनाई पड़े, ‘’ए डिस्ट्रिब्युशन   इज सेड़ टु बी स्क्यूड… ‘’ सपना ने पलट कर देखा, तो वह वृद्ध महिला उसी की ओर देख रही थी.

“आप यह सब जानती हैं?” सपना ने आश्चर्यपूर्वक पूछा.

‘’हां, मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी मे हेड औफ द डिपार्टमेंट रही हूं, कितनों को मैं ने पीएचडी कराया है?” उस वृद्ध महिला की आंखें यह कहते हुए छलछला आई थीं. उन की आंखों में आंसू भर आए थे.

उन्होंने आगे अपनी कहानी सपना को बताई, ‘’मेरा बेटा और बहू लंदन में जा कर बस गए. बेटी की मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में हो गई. पति की मृत्यु के बाद बच्चों ने भी मेरा हाल नहीं पूछा.  अब किसी तरह जीवन का अंतिम समय इस वृद्धाश्रम में काट रही हूं. जीवन की कितनी सांसें बची हुई हैं, किसे पता?”

सपना को पता चला कि वह वृद्ध महिला, जिन का नाम शकुंतला है, नहीं, अब वह उस के लिए डाक्टर शकुंतला मैम थीं. वे कैंसर से पीड़ित हैं, लास्ट स्टेज में हैं.

सपना मन ही मन सोचती है, ये जिंदगी भी अजीब खेल खेलती है. सपना का मन उस वृद्ध महिला के प्रति अपार श्रद्धा और करुणा से भर आया था. बहुत दिल लगा कर वह उन की सेवा करती. वह उस के लिए शकुंतला मैम बन चुकी थीं, जो उस की पढ़ाई में भी मदद करती. पढ़ते वक्त उसे जहां कहीं भी कठिनाई होती, उस की शकुंतला मैम  उस की मदद कर देती. अकसर उसे होस्टल लौटने में देरी हो जाती, क्योंकि काम के बाद वह शकुंतला मैम से पढ़ाई में भी थोड़ी मदद ले लेती. होस्टल से बिलकुल सुबह वह निकल आती.

इधर नीलू होस्टल छोड़ कर जा चुकी थी और प्रीति किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो चुकी थी. उसे अकसर ही बुखार रहता. सपना ने नोटिस किया कि प्रीति अकसर थकीथकी सी रहती है और कभीकभी उसे खांसी भी आती.

एक दिन सुबहसुबह जब वह आश्रम के लिए निकल रही थी, तो उस ने देखा कि वह बारबार खांसे जा रही थी. उस के पूछने पर उस ने कहा कि वह किसी डाक्टर से अपना इलाज करा रही है. दवा भी ले रही है. उसी दिन दोपहर में उसे मालूम हुआ कि प्रीति को अस्पताल में एडमिट किया गया है.

सपना ने सोचा, वृद्धाश्रम से शाम को लौटते वक्त वह प्रीति से मिलने अस्पताल जाएगी, लेकिन उस दिन उस की शकुंतला मैम की तबीयत भी काफी खराब थी और वह उन्हें ऐसी हालत में बिलकुल भी अकेली नहीं छोड़ सकती थी.

वह पूरे समय शकुंतला मैम की सेवा करती रही. जरा देर के लिए भी यदि उस की आंखें लगती, वह  फौरन उठ कर बैठ जाती. कभी उन के पैर दबाती, तो कभी उन के माथे को बड़े प्यार से सहलाती. डाक्टर ने भी कह रखा था कि अब उन का अंतिम समय चल रहा है.

सपना का मन उस दिन बहुत दुखी था. उस की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे. अचानक उस ने अपनी हथेलियों पर प्यार भरे स्पर्श को महसूस किया. उस ने भीगी पलकों से उस ओर देखा, तो शकुंतला मैम उसे बड़े प्यार से देख रही थीं. उन्होंने उसे अपने तकिए के नीचे से चाबी निकाल कर थमाई और कहा कि सामने वह उन की अलमीरा है. उस में एक छोटा सा बौक्स है. कपड़े में लपेट कर रखा हुआ है. वह उसे ला कर दे.

सपना ने सवाल भरी नजरों से उन की ओर देखा. तब वे धीमे से मुसकराते हुए बेहद प्यार से उस के चेहरे को छू कर बोलीं, “तुम लाओ तो सही, एक बेहद जरूरी काम रह गया है.”

सपना उठी और वह बौक्स ला कर उन के पास रख दिया. उन्होंने कहा, “इसे खोलो.”

सपना ने बौक्स खोल कर उन के आगे बढ़ाया, तो वो तकिए के सहारे बैठ गईं और कांपते हुए हाथों से 10 लाख रुपए का एक चेक साइन कर सपना की हथेली पर रखते हुए बोलीं, “तुम ने मेरी सगी औलाद से भी बढ़ कर सेवा की है, यह मेरे पूरे जीवन की जमापूंजी है, इसे तुम मेरा प्यार और आशीर्वाद समझ कर रख लेना. खूब मन लगा कर पढ़ना. मेरा आशीर्वाद, मेरा प्यार हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा…” और उन्होनें अपनी आंखें मूंद लीं.

सपना ने महसूस किया कि उस की शकुंतला मैम की हथेली अचानक काफी ठंडी हो गई है. उस ने गीली पलकों से उन के चेहरे की ओर देखा. उन का चेहरा बिलकुल शांत तकिए पर पड़ा हुआ था.

सपना की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा और उस का सिर उन के प्रति अपार श्रद्धा में झुक गया. Family Story in Hindi.

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