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Social Media : ब्लूस्क्रीन से आएं बाहर लें वास्तविक दुनिया का आनंद

Social Media :  आजकल मोबाइल, इंटरनैट के बढ़ते उपयोग के कारण हमारा और बच्चों का शरीर बीमारियों, जैसे अनिद्रा, अवसाद, मोटापे से घिरता जा रहा है, हम आलसी होते जा रहे हैं और तनाव महसूस कर रहे हैं. इस समय सब से ज्यादा आवश्यकता है डिजिटल दुनिया से दूर रहने की. बढ़ते स्क्रीनटाइम की वजह से बच्चों और बड़ों के बीच आपसी बातचीत कम होती जा रही है, जिस से उन में भावनात्मक जुड़ाव भी कम होता जा रहा है. इस के लिए आवश्यक है कि काम खत्म करने के बाद परिवार के साथ समय बिताएं या दोस्तों से मिलने चले जाएं या ऐसी जगह चले जाएं जहां डिजिटल स्क्रीन की दुनिया से दूरी बनाना मुमकिन हो, ताकि आप खुद को अपनी मनपसंद एक्टिविटी, जैसे खेलने, किताबें पढ़ने, कुकिंग करने, गार्डनिंग करने, संगीत सुनने, ड्राइंग करने, पेंटिंग करने इत्यादि में व्यस्त रखें और अपनी सोच को सकारात्मक रख सकें.

सोशल मीडिया पर टाइम को करें कम : सोशल मीडिया भी हमारे स्क्रीनटाइम को बढ़ाने में काफी हद तक जिम्मेदार है. हमारी सक्रियता सोशल मीडिया, जैसे ट्विटर, इंस्टाग्राम,फेसबुक, व्हाट्सऐप, यूट्यूब आदि पर कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है. इन पर हर पल आते नोटिफिकेशन, कमैंट और पोस्ट हम को दिनभर मोबाइल की स्क्रीन को स्क्रौल करते रहने के लिए मजबूर करते हैं.

ऐसे में जरूरी है कि स्क्रीनटाइम को कम करें. इस के लिए सोशल मीडिया के अनचाहे कमैंट्स को काबू करें यानी इन को नियंत्रण में रखें. इस के लिए सोशल मीडिया, जैसे फेसबुक आदि पर कुछ भी जानकारी शेयर करने से पहले उस की प्राइवेसी सैटिंग्स को चैक कर लें. यदि वह पब्लिक है तो उसे कोई भी देख सकता है, इसलिए कोई भी जानकारी शेयर करने से पहले सुनिश्चित कर लें कि उसे किस मोड में रखना है- पब्लिक, फ्रैंड्स या प्राइवेट ताकि केवल वही लोग आप की पोस्ट देख सकें जिन के साथ आप शेयर करना चाहते हैं. सोशल मीडिया पर कम से कम समय बिताने के लिए आप ऐप्स की मदद ले सकते हैं.

स्क्रीन के साथ स्वस्थ रहें

सोशल मीडिया पर आते मीम्स या मैसेज आप के चेहरे पर कुछ देर के लिए मुसकराहट तो ला सकते हैं लेकिन आप की सेहत पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं, इसलिए स्क्रीन के साथ स्वस्थ रहें.

टैक्स्ट नेक सिंड्रोम

यदि हम ध्यान देंगे तो पाएंगे कि मोबाइल फोन के इस्तेमाल में ज्यादातर समय हम गरदन ?ाका कर नीचे देखते हैं. इस से गरदन की मांसपेशियों में खिंचाव हो सकता है और ये अकड़ सकती हैं. यह छोटी सी गलती कई बार आप के कमर और कंधों तक या उस के भी नीचे पहुंच जाती है. इसी बीमारी को टैक्स्ट नेक सिंड्रोम कहते हैं. इस से बचने के लिए आप लंबे समय तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं तो कम से कम 20 मिनट में एक बार आंखों को स्क्रीन से हटा कर शरीर को थोड़ा सा स्ट्रैच कर सकते हैं ताकि इस समस्या से बच सकें.

कई गंभीर बीमारियां भी हो सकती हैं

मोबाइल आप को डायबिटीज, मोटापा और दिल की कई गंभीर बीमारियां दे सकता है क्योंकि लाइटिंग स्क्रीन वाले गैजेट्स का देररात तक इस्तेमाल करने से आप की आंखों पर इस का असर पड़ता है और आप की नींद भी प्रभावित होती है. इस से आप को दिल की बीमारियों के साथसाथ मोटापे की समस्या भी हो सकती है. इस से आंखों को ग्लूकोमा या लो नाइट विजन की समस्या हो सकती है. रिसर्च के मुताबिक, आंखों के लिए स्मार्टफोन की ब्लू लाइट हानिकारक होती है.

रियल वर्ल्ड से जुड़ें, आनंद लें

भावनाओं को व्यक्त करें शब्दों की मदद से : आजकल हम अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों के बजाय इमोजी और शौर्ट में शब्दों का उपयोग कर रहे हैं. इस के लिए कोशिश करें कि रात का खाना एकसाथ टेबल पर बैठ कर खाएं ताकि एकदूसरे से संवाद कर सकें, अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त कर सकें और मन की बातें एकदूसरे से शेयर कर सकें ताकि यदि कोई समस्या है तो उसे सुल?ाने में एकदूसरे की मदद मिल सके और अवसाद व तनाव से दूर हो सकें.

सहेजें रिश्तों को : पहले के दौर में जब मोबाइल नहीं था तो लोगों का आपस में काफी मिलनाजुलना होता था, बातचीत का सिलसिला चलता रहता था, लोग एकदूसरे की परेशानी व भावना को सम?ाते थे. साथ ही, समस्याओं को सुल?ाने के लिए प्रयास करते थे. लेकिन जब से मोबाइल आया है, बच्चे हों या बड़े, ज्यादातर समय मोबाइल की दुनिया में ही व्यस्त रहते हैं. इस से आपसी संवाद कम होता जा रहा है.

सोशल मीडिया के जरिए बातें तो काफी हो रही हैं लेकिन दिलों के बीच की दूरियां बढ़ती जा रही हैं. लोगों के बीच उचित संवाद नहीं हो पा रहा है. व्यक्तिगत समस्याओं का जाल बढ़ रहा है और रिश्तों की बुनियाद कमजोर पड़ती जा रही है. ऐसे में रिश्ते बन कम रहे हैं, टूट ज्यादा रहे हैं.

आजकल लोग वर्चुअल दुनिया में ज्यादा जीने लगे हैं जिस के कारण परिवार में आजकल आमनेसामने बैठ कर बातें करना भी कम हो गया है जिस का रिश्तों पर नकारात्मक असर पड़ रहा है और कई बार यही रिश्ते के टूटने की वजह बन रहा है.

इस स्थिति का शिकार बनने से बचने के लिए स्मार्टफोन या सोशल मीडिया पर बने दोस्तों के साथसाथ अपने आसपास के दोस्तों के लिए भी समय निकालें और दोनों में संतुलन बनाए रखें.

एक तरफ जहां मोबाइल या स्मार्टफोन आप को दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से कनैक्ट करने का मौका देते हैं तो वहीं दूसरी ओर इस का बहुत ज्यादा इस्तेमाल आसपास के लोगों से डिसकनैक्ट होने का कारण बन रहा है.

रहें कनैक्ट रियल वर्ल्ड से : तकनीक के इस युग में हम इंटरनैट और मोबाइल की वजह से सारी दुनिया से कनैक्ट रहते हैं लेकिन अपने आसपास, परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों आदि सभी से डिसकनैक्ट बने रहते हैं, ठीक इसी तरह सोशल मीडिया पर पूरे समय ऐक्टिव बने रहते हैं क्योंकि इस पर हर पल आते अलर्ट नोटिफिकेशंस, मैसेजेस हम को बिजी बनाए रखते हैं लेकिन सोशल लाइफ से डिसकनैक्ट रहते हैं.

आपस में मिलनाजुलना, बातचीत करना पसंद नहीं करते जिस का असर हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है. सोशल मीडिया पर आते मीम्स या मैसेज आप के चेहरे पर कुछ देर के लिए मुसकराहट तो ला सकते हैं लेकिन आप की सेहत पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं. सो, खुद को इस ब्लूस्क्रीन से आजाद करें और स्वस्थ रहें. रियल वर्ल्ड में रह कर असली चीजों का मजा लें.

रियल वर्ल्ड से कनैक्ट रहने के लिए स्मार्टफोन के इस्तेमाल का समय कम कर के लोगों से सीधे कनैक्ट होने की ज्यादा से ज्यादा कोशिश करें, वास्तविक दुनिया का आनंद लें और टैक स्ट्रैस से खुद को दूर रखें. Social Media

Hindi Best Story : कोर्ट मार्शल

Hindi Best Story : रोहित एक वतनपरस्त सैन्य अफसर था. अपने ऊपर गद्दार होने का कलंक कैसे सह सकता था. हालात में फंसा रोहित क्या खुद को बेगुनाह साबित कर पाया?

कर्नल शंकर को अचानक आते देख कर मेजर रोहित चकित हो गया और सोच में पड़ गया- न कोई खबर, न वायरलैस, न संदेश. जरूर ही दुश्मन की तरफ से कोई गतिविधि देखी गई होगी, उस पर आवश्यक चर्चा करनी होगी या मंत्रालय से कोई आदेश होगा जो कर्नल साहब को एडवांस पोस्ट तक खुद आना पड़ा.

‘‘जयहिंद, सर,’’ मेजर रोहित ने जल्दी से एडि़यां जोड़ कर सैल्यूट किया, ‘‘सौरी सर, मु?ो आप के आने की इत्तला नहीं थी वरना मैं आप से बेस पर मिल लेता.’’

कर्नल शंकर ने सिर हिला कर मानो रोहित की बात को कोई तवज्जुह नहीं दी, ‘‘एक जरूरी काम है, मेजर रोहित. मिनिस्ट्री की सिफारिश पर टीवी चैनल के 2 संवाददाता फौरवर्ड पोस्ट पर एक स्टोरी बनाने के लिए आ रहे हैं. आप उन्हें साथ ले जा कर अपने औपरेशन और मुस्तैदी के बारे में शूट करने देना और साथ ही, उन को पूरी सुरक्षा देना.’’

मेजर रोहित की निराशा उस के चेहरे के भावों तक आ गई, ‘‘हम यहां अपना काम करते हैं, सर. देश की रक्षा करते हैं, कोई जलसा या प्रदर्शनी आयोजित नहीं करते कि लोग हमें देखने आएं और हम पर स्टोरी बनाएं.’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं, मेजर साहब. मगर देश जानना चाहता है कि हम काम क्या करते हैं, कैसे करते हैं, हमारी तकलीफें क्या हैं, दिक्कतें क्या हैं, कैसीकैसी परिस्थितियों में हम दुश्मनों से जू?ाते हैं आदि, तो इस में बुराई क्या है?’’

‘‘दूसरे शब्दों में, वे हमारी निष्ठा का सुबूत चाहते हैं, हमारे कामों पर सच्चाई की मोहर लगा कर उस पर अपना सर्टिफिकेट जारी करना चाहते हैं ताकि उन लोगों का मुंह बंद हो जाए जो ऐसे सवाल उठाते हैं. याद नहीं है सर, इन संवाददाताओं ने अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए मुंबई धमाकों में हमारे एकएक कदम का लाइव टैलीकास्ट कर के दुश्मनों तक हमारी सारी योजनाएं पहुंचा दी थीं जिस का खमियाजा कमांडो दल ने और नतीजा देश ने भुगता.’’

‘‘अब जो भी हो, मेजर रोहित, और्डर का पालन तो करना ही है. वैसे, आप ने पूछा नहीं कि ये संवाददाता कौन हैं, इन के नाम क्या हैं.’’

‘‘फायदा क्या है सर, नाम पूछ कर.’’

‘‘उन के टीम लीडर को आप चौबीसों घंटे अपने पास रख सकते हैं अगर चाहें तो, उन्हें इन वादियों की सैर करवा सकते हैं.’’

कर्नल शंकर के चौबीसों शब्द पर जोर दे कर मेजर रोहित ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘चौबीसों, मैं कुछ सम?ा नहीं, सर?’’

‘‘देखो उधर, जीप से कौन उतर रहा है,’’ कर्नल साहब ने इशारा करते हुए कहा. मेजर रोहित अचंभित हो गया, ‘‘रितु और यहां!’’ रोहित अविश्वास से उस ओर ताकते जा रहा था जिधर से

2 महिलाएं पहाड़ों की चढ़ाई चढ़ कर उन तक पहुंचने का प्रयास कर रही थीं.

‘‘क्या बात है बरखुरदार, अपनी पत्नी को पहचानने में इतना वक्त लगा रहे हो, जाओ, अरे भाग कर उसे रिसीव करो, कितनी दूर से आई है बेचारी.’’

‘‘यस सर,’’ मेजर रोहित को कुछ सम?ा नहीं आ रहा था. रितु जब मेजर रोहित और कर्नल शंकर तक पहुंची तो बुरी तरह थक चुकी थी. ‘‘यों अचानक यहां और वह भी टीवी चैनल के जरिए, मैं कुछ सम?ा नहीं, कब जौइन किया इस चैनल को? तुम तो अच्छीभली समाचारपत्र के पेज काले करती थीं.’’

‘‘बस यों सम?ा कि कल ही जौइन किया और आज ही अपने पहले मिशन पर निकली हूं. तुम्हें बताने तक का समय नहीं मिला,’’ रितु ने गहरी सांस ले कर सहज होते हुए कहा, ‘‘मेरे साथ में है वर्षा, मेरी कैमरापर्सन, जानीमानी एंकर और संपादक.’’

वर्षा ने आगे बढ़ कर हाथ मिलाया और शरारतभरे अंदाज से कहा, ‘‘अब यहीं सारी बातें कर लेंगे या कुछ खिलाएंगेपिलाएंगे भी, आप के मेहमान हैं हम?’’

रोहित इस बात पर ?ोंप गया और उस ने आवाज दे कर हवलदार सुमेर सिंह को बुलाया. ‘‘सुमेर सिंह, ये हमारे मेहमान हैं, दिल्ली से आई हैं, ये दोनों ही देश के एक नामचीन टैलीविजन चैनल के लिए काम करती हैं.’’

‘‘मैं सम?ा गया कि ये हमारी मैडम है,’’ सुमेर सिंह ने रितु की तरफ इशारा करते हुए कहा.

‘‘सही सम?ो, और सुमेर सिंह, अब तुम इन के लिए…’’ रोहित कुछ कहना चाह रहा था कि सुमेर सिंह ने उस की बात को काटते हुए कहा, ‘‘सरजी, मेरा भी परिचय दे दो.’’

‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ रोहित ने कहा, ‘‘ये सुमेर सिंह हैं, बहुत ही बहादुर, जांबाज और बांके सिपाही हैं. इन की बहादुरी की जितनी भी चर्चा की जाए, कम है. ये न तो दुश्मनों की गोलियों से डरते हैं न ही टैंक या तोपों के गोलों से.’’

‘‘सरजी, आप ने वो वाली बात तो बताई नहीं, सर, मेरी कुड़माई वाली बात.’’

‘‘हांहां, मैं तो भूल ही गया,’’ रोहित ने सुमेर सिंह के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘सुमेर सिंहजी की सगाई की बात लगभग तय हो चुकी है और इन की होने वाली धर्मपत्नी स्कूल में शिक्षिका हैं.’’

‘‘सरजी, वह स्कूल में हैडमिस्ट्रेस है. एक और बात, वह बहुत सुंदर है,’’ सुमेर सिंह ने थोड़ा शरमाते हुए कहा.

‘‘हां, जरूर होंगी, आप भी तो कम स्मार्ट नहीं हैं. वैसे, मुलाकात तो होती रहती होगी कभीकभी अपनी होने वाली पत्नी से?’’ रितु ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘मैं मिला नहीं हूं लेकिन मैं ने सुना है की वह मिस फगवाड़ा रह चुकी है. इस बार छूट्टियों में जाऊंगा तो सगाई की रस्म पूरी करूंगा लेकिन कोई टैंशन नहीं है, जबान दे चुके हैं और ले चुके हैं. बात अडिग है.’’

रितु सुमेर सिंह के भोलेपन और मासूमियत से हतप्रभ थी. आश्चर्यचकित हो कर वह कभी सुमेर सिंह तो कभी रोहित को देख रही थी कि रोहित ने विषय बदलते हुए कहा, ‘‘चलिए सुमेर सिंहजी, इन की कुछ आवभगत की जाए. क्या खयाल है आप का?’’

‘‘यस सर, मैं अभी इंतजाम करता हूं,’’ सुमेर सिंह ने सैल्यूट करते हुए कहा.

अगले 2-3 दिन मेजर रोहित अपने दोनों मेहमानों को सीमा के करीब की पोस्ट और सीमावर्ती गांव की सैर करवाते रहे. टीवी चैनल के दोनों महिला आगंतुकों के लिए वहां घूमना और मनोरम दृश्यों को कैमरे में कैद करना एक सुखद अनुभव था. देश के रणबांकुरे कितनी विषम स्थितियों में देश की रक्षा करते हैं, इस की अच्छीखासी रिपोर्ट तैयार हो रही थी. रितु अपनी इस उपलब्धि पर प्रसन्न थी और साथ ही, रोहित का साथ उस की खुशियों को दोगुना कर रहा था. उसे मानो मनमांगी मुराद मिल गई थी और तोहफे में मिले एकएक पल को वह जीभर कर जीना चाह रही थी.

उस शाम जब वे तीनों सीमारेखा से सटे एक गांव की तरफ जा रहे थे तो अचानक दुश्मन की ओर से गोलाबारी शुरू हो गई. सैनिक सचेत थे और अफसर मुस्तैद. फायरिंग का जवाब दिया जाने लगा और देखते ही देखते सारा इलाका आग, धुएं और धूल के गुबार से पट गया. रोहित ने एक सिपाही को दोनों महिलाओं को वहां से दूर किसी सुरक्षित जगह में ले जा कर पनाह लेने के लिए कहा लेकिन उन दोनों ने ही उस जगह को छोड़ने से इनकार कर दिया. बारीबारी से कैमरे को कंधे पर लाद कर वे उन दृश्यों को कैद करती रहीं और बीचबीच में डायरी निकाल कर नोट्स भी बनाती रहीं. रोहित के लिए एकएक पल मुश्किल से भरा हुआ था- एक ओर दुश्मन की अंधाधुंध गोलाबारी का जवाब देने के लिए सिपाहियों को और्डर देना और दूसरी ओर अपने सिपाहियों के साथ दोनों लड़कियों की भी हिफाजत करना. ‘विषमता भी परीक्षा लेती है’ रोहित को ट्रेनिंग के दौरान मिले इस पाठ की सच्चाई का उस शाम एहसास हो रहा था. लगभग 2 घंटे बाद दोनों ओर की बंदूकें शांत हुईं और वातावरण में थोड़ी नीरवता छाई.

‘‘आप सब लोग ठीक हैं?’’ रोहित ने ऊंची आवाज में पूछा तो एकसाथ ‘यस सर’ जवाब आया, ‘‘नो कैजुअल्टी, नो इंजुरी, सर,’’ सूबेदार की आवाज सुन कर मेजर रोहित की जान में जान आई.

‘‘आप दोनों ठीक हैं?’’ रोहित ने रितु और वर्षा से पूछा.

दोनों सहमी हुई थीं और धीमी आवाज में बोलीं, ‘‘हम ठीक हैं.’’

अगले दिन सुबह मानो रोहित ने हुक्म सुना दिया, ‘‘आप लोग वापस अपने घर चली जाइए, बहुत मसाला मिल गया आप के चैनल को.’’

रितु की जाने की इच्छा नहीं थी. कुछ दिन और रुक जाते तो हमारा काम पूरा हो जाता, वर्षा ने कहना चाहा.

‘‘मु?ो नहीं मालूम कि आप का उद्देश्य और मिशन क्या है, मगर मेरा खयाल है कि अब बहुत हो गया. आप ने बहुतकुछ जान लिया, अपने ज्ञान में बढ़ोतरी कर ली. अब जा कर ऊंची आवाज में अपने दर्शकों तक सारे पकवान परोस देना. आप के चैनल की टीआरपी जरूर बढ़ेगी.’’

मेजर रोहित ने कर्नल शंकर से बात कर दोनों मेहमानों की वापसी के लिए हैलिकौप्टर भेजने का आग्रह किया. दूसरी ओर से हामी होते ही रोहित ने उन्हें सामान पैक करने का आदेश दे दिया. पहाड़ों के मौसम और खासतौर पर इतनी ऊंचाई पर मौसम पलपल बदलता है, ऐसा ही कुछ वहां भी हुआ. देखते ही देखते मौसम ने करवट बदली और चारों ओर बर्फ पड़नी शुरू हो गई. कुछ ही पल में चारों ओर बर्फ का साम्राज्य अपनी हर हद को पार कर चुका था. तभी मेजर रोहित के वायरलैस की घंटी बजी. रोहित ने लपक कर फोन उठाया तो दूसरी ओर कर्नल साहब थे, ‘‘मौसम बहुत खराब हो रहा है, मेजर. तूफान का अंदेशा है. ऐसे में हैलिकौप्टर भेज पाना मुमकिन न होगा.’’

‘‘कोई बात नहीं, सर. हम कोई और तरीका ढूंढ़ते हैं,’’ मेजर रोहित ने जवाब दिया.

कर्नल शंकर दो पल के लिए रुके और फिर उन्होंने आदेश दिया, ‘‘मेजर, तुम अपनी टीम के साथ डोडा की पहाडि़यों के पीछे एक गांव की तरफ फौरन रवाना हो जाओ. यह एक खतरनाक मिशन है और टौप सीक्रेट भी. सही लोकेशन मैं तुम्हें थोड़ी देर में भेज रहा हूं. याद रहे, टारगेट है असलम.’’

‘‘असलम,’’ मेजर रोहित कुछ सोच में पड़ गया.

‘‘तुम ठीक सोच रहे हो, मेजर रोहित. यह वही असलम हैजिस ने पिछले

3 सालों में कई हिंदुस्तानी ठिकानों को अपना निशाना बनाया है. पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाला असलम जेल से भागा हुआ एक खतरनाक मुजरिम है. इस पर कई केस अलगअलग पुलिस स्टेशनों में भी दर्ज हैं. तुम्हें इसे जिंदा  पकड़ना है ताकि कई जानकारियां उस से मिल सकें जो हमारे लिए बहुत ही काम की साबित हो सकती हैं.’’

‘‘यस सर,’’ मेजर रोहित ने जवाब दिया, ‘‘मैं अभी फौरन मिशन पर निकलता हूं. मगर सर, टीवी चैनल के दोनों नुमाइंदों को न मैं यहां छोड़ सकता हूं और न ही औपरेशन में साथ ले जा सकता हूं. इन दोनों महिलाओं के लिए मु?ो क्या आदेश है?’’

कर्नल शंकर कुछ पल रुके, फिर कुछ सोच कर कहा, ‘‘इन्हें आप अपने साथ ले जाइए और नूर घाटी के पास किसी गांव में महफूज जगह पर छोड़ दीजिएगा. आप अपनी जीप भी वहीं छोड़ कर आगे का रास्ता पैदल ही तय कीजिएगा. वापसी में इन्हें अपने साथ ले आइएगा.’’

मेजर रोहित ने हामी भरी और अपने सिपाहियों को कूच करने का आदेश दिया. ऊंचेनीचे रास्ते पर जीप चलाते हुए रोहित तिरछी निगाह से रितु को भी देख लेता जो कभीकभी उस का हाथ थाम लेती.

‘‘मैडमजी,’’ यह सुमेर सिंह की आवाज थी जो पीछे सीट पर बैठा था, ‘‘आप कभी फगवाड़ा गई हैं?’’

‘‘नहीं. वहां जाना नहीं हुआ, सुमेर.’’

‘‘जाओ, तो किसी से भी पूछ लेना चंद्रवती का नाम. हैडमास्टर कह देना, कोई भी ले जाएगा. फिर भी न सम?ा में आए तो कहना मिस फगवाड़ा से मिलना है. कोई भी आप को ले जाएगा. और, वह तो दूर से ही अलग से दिख जाएगी.’’

रितु बड़ी मुश्किल से अपनी मुसकान छिपा पाई, ‘‘मु?ा से भी ज्यादा सुंदर है क्या आप की चंद्रवती?’’

जवाब में सुमेर ?ोंप गया, बोला, ‘‘आप ही देख लेना, मैडम. मु?ा से पहले आप ही देखना और मु?ो बता देना कौन ज्यादा सुंदर है.’’

लगभग 2 घंटे की ड्राइव के बाद काफिला नूर घाटी के पास पहुंच गया. जीप से उतर, थोड़ा सुस्ता कर सभी सिपाही एक कतार में खड़े हो गए.

‘‘जयहिंद सर,’’ सूबेदार अजीब सिंह ने रिपोर्ट दी, ‘‘हैड काउंट में एक कम है, सरजी.’’

मेजर रोहित अचंभे में था कि रितु घबरा कर बोल पड़ी, ‘‘वर्षा?’’

रोहित ने सूबेदार को पीछे जा कर देखने का हुक्म दिया कि वर्षा नजर आ गई, ‘‘कहां रह गई थीं आप?’’

‘‘सौरी मेजर, मैं यहीं थी, बस, अपने बेटे से बात कर रही थी.’’

रोहित को तनिक आश्चर्य हुआ, ‘‘आप के फोन में सिग्नल आ रहे हैं, कमाल है. मगर इस तरह बिना बताए जीप से उतरते ही आप नदारद हो गईं, आप किसी पार्क में नहीं घूम रही हैं.’’

‘‘इस के बेटे की तबीयत खराब है, रोहित. यह चिंतित रहती है, आइंदा इस तरह गायब नहीं होगी,’’ रितु ने स्थिति संभालते हुए कहा.

अपने वाहन वहीं छोड़ कर लगभग 2 किलोमीटर चलने के बाद उन्हें बाईं ओर एक गांव नजर आया. मेजर रोहित ने दोनों लड़कियों को वहीं छोड़ने का फैसला किया. मगर उन के आश्चर्य की सीमा न रही जब देखा कि गांव में एक अजीब सी शांति थी. न कोई चहलपहल थी न ही सामान्य सा शोर. चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था. उन्हें सम?ाने में देर नहीं लगी कि गांव वाले उस रोज खराब मौसम की वजह से कम ऊंचाई वाले स्थान पर जा चुके थे.

मेजर रोहित पसोपेश में पड़ गया. उसे सम?ा नहीं आ रहा था कि वह उन दोनों का क्या करे. तभी कर्नल साहब का एक वायरलैस मैसेज आना शुरू हुआ. उन्होंने असलम के ठिकाने के बारे में बताया और यह भी कहा कि इस लोकेशन के बारे में किसी और से जिक्र न करें. इसी बीच मेजर रोहित ने कर्नल साहब को बताया कि गांव वाले पलायन कर चुके हैं और उन दोनों महिलाओं को गांव में छोड़ने का विकल्प अब खुला नहीं है. मामले की नाजुकता देख कर दोनों इसी नतीजे पर पहुंचे कि इन दोनों महिलाओं को भी अपने साथ ही रखना होगा और यह खतरा उन्हें हर हाल में उठाना ही होगा.

मेजर रोहित ने अपनी बुलेटप्रूफ जैकेट निकाली और वर्षा को सौंप दी और कहा, ‘‘हम सब के पास अपनी जैकेट हैं मगर मेहमानों के लिए फिलहाल नहीं हैं, इसलिए इसे आप पहन लीजिए. आगे खतरा होगा.’’

मेजर रोहित को अपनी बुलेटप्रूफ जैकेट वर्षा को सौंपते हुए देख कर हवलदार सुमेर सिंह ने भी अपनी जैकेट निकाली और रितु को सौंप दी, ‘‘हमें कोई खतरा नहीं है, मैडम. लेकिन आप को सुरक्षित वापस पहुंचाना हमारा पहला कर्तव्य है. और फिर, यह लुकाछिपी का खेल तो हमारे लिए रोज का तमाशा है.’’

रितु सुमेर सिंह की इस दिलेरी और त्याग से हतप्रभ रह गई. उसे सम?ा ही नहीं आ रहा था कि वह सुमेर सिंह को इनकार करे, धन्यवाद दे या उस की सलामती की इच्छा जाहिर करे. एक चोटी पर पहुंचते ही रोहित ने अपनी दूरबीन निकाली और देखा तो उसे एक खंडित मंदिर से सटा वह घर नजर आया जैसा कर्नल साहब ने बताया था. रोहित ने इधरउधर नजर दौड़ाई तो एक भेड़ों की टोली नजर आई. रोहित सम?ा गया कि साथ में गड़ेरिया जरूर होगा. उस ने सूबेदार महतो को बुलाया और कहा, ‘‘आप इन की भाषा थोड़ीबहुत सम?ाते हैं, गड़ेरिए को बुलाइए और उसे यहां रुकने को कहें. जब तक हम औपरेशन से वापस न आएं.

थोड़ी ही देर में गड़ेरिया सामने था. ‘‘सब लोग चले गए. ऐसे मौसम में यह यहां क्या कर रहा है?’’ जवाब में सूबेदार महतो ने बताया कि वह रास्ता भूल गया था और अब अपने गांव जा रहा है. रोहित ने रितु और वर्षा को वहीं गड़ेरिए के पास रुकने को कहा और एक सिपाही को वहां छोड़ कर आगे मिशन पर निकल पड़ा. 3 अलगअलग टोलियां 3 अलगअलग दिशाओं से दबेपांव उस घर की ओर चल पड़ीं. सब से सामने की टोली का नेतृत्व खुद मेजर रोहित कर रहा था और कुछ ही पलों में उन्होंने वहां खड़े 2 गार्डों को शांतिपूर्ण मौत दे दी और अहाते में प्रवेश करने ही वाले थे कि तभी अचानक वायरलैस पर कर्नल साहब ने संपर्क साधा और पूछा, ‘‘लोकेशन?’’

‘‘टारगेट के पास, सर.’’

‘‘मिशन लीक हो गया है, मेजर. तुम जल्दी से बाहर निकलो. उन की सहायता के लिए उन की फोर्स आ रही है. औपरेशन अबैन्डन कर दो.’’

‘‘सर, हम लोग टारगेट के बिलकुल पास हैं. बस, कुछ ही मिनटों की बात है.’’

‘‘औफिसर, सम?ाने की कोशिश करो. तुम लोग सिर्फ 20 हो, साथ में 2 प्रैस रिपोर्टर भी हैं जिन की हिफाजत का जिम्मा हमारा है. आतंकवादियों की रीइन्फोर्समैंट सैकड़ों की तादाद में आ रही है. तुम लोग सहीसलामत वापस नहीं आ पाओगे.’’

‘‘लेकिन सर.’’

‘‘इट्स एन और्डर, मेजर.’’

‘‘सौरी सर, टारगेट मेरी नजरों में है. बस, एक कदम बढ़ने दीजिए और टारगेट मेरी मुट्ठी में होगा. मैं लौट नहीं सकता.’’

‘‘मेजर, तुम इनसबौर्डिनेशन कर रहे हो. जानते हो इस की सजा क्या है?’’

‘‘कोर्ट मार्शल, सर. मैं कोर्ट मार्शल के लिए तैयार हूं मगर हाथ आए दुश्मन को छोड़ने को नहीं.’’

रोहित ने हवलदार सुमेर सिंह को टीम के साथ बाहर रुकने को कहा और खुद 2 साथियों के साथ दबेपांव अहाते के अंदर पहुंच गया.

सामने असलम खान जमीन पर तख्ता लगा कर बड़ी सी थाली में जानवरों की तरह मांस खा रहा था.

‘जमील, जरा गोश्त का पतीला पकड़ाना,’ असलम ने आवाज दी.

रोहित ने खानसामे के हाथ से पतीला लिया. हिंदुस्तानी सिपाही को देख कर खानसामे का मुंह सूख गया.

रोहित ने उसे खामोश रहने को कहा. उस के हाथ से गोश्त का पतीला लिया और असलम के सामने खड़ा हो गया, ‘‘लीजिए जनाब, नोश फरमाइए.’’

आवाज सुन कर असलम ने हाथ आगे बढ़ा दिया और साथ ही, चौंक कर गरदन उठाई. असलम की नजर जब रोहित से मिली तो उस के होश फाख्ता हो गए, ‘‘कौन हो तुम?’’ असलम अपनी बंदूक टटोलने लगा.

‘‘कोई फायदा नहीं, असलम मियां. हम हिंदुस्तानी खाना खाते हुए इंसान पर वार नहीं करते. गोश्त खत्म कीजिए और हमारे साथ चलिए. क्या जाने आप को ऐसा खाना दोबारा न मिल पाए.’’

असलम को काटो तो खून नहीं. कुछ ही पलों में उसे सारा माजरा सम?ा आ गया. ‘‘बिरयानी तो आप भी खिलाएंगे हमें मेजर साहब अगर पकड़ पाए तो.‘‘

‘‘बिरयानी वाले दिन कब के लद गए, मियां असलम. लगता है अनपढ़ हो, अखबार वगैरह पढ़ते नहीं हो?’’

तभी असलम के रेडियो सैट से आती आवाज से मेजर रोहित और अन्य सिपाही चौंक गए, ‘असलम साहब, आप की मदद के लिए एक बड़ी टोली आप तक पहुंचने वाली है, तब तक अगर कोई काफिर आता है तो उसे उल?ा कर रखिए.’

‘‘उन से कहिए कि हजूरे आला ने आतेआते बड़ी देर कर दी, परिंदे अब कभी उड़ नहीं पाएंगे,’’ यह कह कर मेजर ने असलम की आंखों पर पट्टी बांधी और उसे घसीटते हुए बाहर ले गया. बाहर सामने से आतंकवादियों की टोली ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी थी जिस का मुकाबला सुमेर सिंह कर रहा था. तभी एक गोली हवलदार सुमेर सिंह को लगी और वह वहीं गिर पड़ा. दोनों ओर से बंदूकें आग उगल रही थीं. रोहित की टीम ऊंचे टीले पर होने का भरपूर फायदा उठा रही थी. इसी बीच, असलम ने अपनी गिरफ्त ढीली की और चौकड़ी मार कूद कर भागने में कामयाब हो गया.

रोहित ने भागते हुए असलम को ऊंची आवाज में रुकने को कहा. मगर असलम नहीं रुका. कोई और चारा न पा कर रोहित ने भागते हुए असलम पर एक के बाद एक कई गोलियां दाग दीं. असलम ढेर हो गया और लुढ़कता हुआ नीचे एक पेड़ के तने के पास जा कर रुक गया. रोहित ने वायरलैस थामे आतंकवादी की ओर बंदूक दाग दी, ‘‘जीना चाहते हो तो अपने आकाओं को मैसेज दो कि हिंदुस्तानी जा चुके हैं और फोर्स वापस लौट जाए. अब उन की जरूरत नहीं है.’’ वायरलैस वाले ने अक्षरश: सारी बात दोहरा दी और दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘हम जा रहे हैं, असलम भाई को आदाब कहना और कहना, जब भी जरूरत हो, हमें इत्तला कर दें.’’

रोहित और उस की टुकड़ी जब वापस बेस पर पहुंची तो उन का पूरे जोश के साथ स्वागत हुआ. पहुंचते ही फौरन हवलदार सुमेर का इलाज शुरू हुआ और उसे श्रीनगर के सैन्य अस्पताल में भेज दिया गया, साथ ही, टैलीविजन चैनल के दोनों नुमाइंदों को भी वापस भेजने की तैयारी शुरू हो गई. ‘‘क्या मैं कुछ दिन और रुक नहीं सकती?’’ रितु ने प्रश्न किया.

‘‘क्यों रुकना चाहती हो, क्या मेरे कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया अपने चैनल पर लाइव दिखा कर टीआरपी में इजाफा करना चाहती हो?’’

रितु को कोई जवाब नहीं सू?ा, उस ने स्फुटित स्वर में सिर्फ इतना कहा, ‘‘क्या तुम्हारी इस स्थिति के लिए मैं जिम्मेदार हूं?’’

‘‘हां, क्योंकि कर्नल शंकर के मुताबिक मेरा इनसबौर्डिनेशन नजरअंदाज किया जा सकता है मगर जो मिशन के बारे में खबर लीक हुई उस को फौज गंभीरता से लेती है और यह खबर सिर्फ तुम्हारे जरिए ही बाहर निकली है और उस के लिए मैं न तुम्हें माफ कर सकता हूं न अपनेआप को.’’

कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू हुई और अभियुक्त मेजर रोहित को आरोप और आक्षेपों की लिस्ट पकड़ा दी गई और अपने बचाव में साक्ष्य या गवाह प्रस्तुत करने को कहा गया.

मेजर रोहित ने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा और खबर बाहर जाने की बात को अपनी कमी माना. सैन्य अदालत ने रोहित को दोषी माना लेकिन उस के पिछले रिकौर्ड, बहादुरी व दिलेरी और कर्तव्यपरायणता को देखते हुए उसे महज पदावनति की सजा सुनाई. इस डिमोशन के तहत उसे अपनी ही बटालियन में और उसी लोकेशन पर मेजर की जगह कप्तान बन कर अपनी ड्यूटी पर लौटना था. यह डिमोशन रोहित की साख और इज्जत पर एक गहरा दाग था.

इस सजा ने उसे न सिर्फ अपनी यूनिट के सिपाहियों की नजरों में गिरा दिया बल्कि वह अपने स्वयं की नजरों में भी गिर गया. साथियों ने उसे सजा के खिलाफ ऊंची सैन्य अदालत में अपील करने को कहा लेकिन रोहित नहीं माना और सजा सुनते ही छुट्टी का आवेदन किया व दिल्ली लौट आया.

रोहित को देख कर रितु आश्चर्यचकित थी, ‘‘तुम, अचानक, कोई फोन या मैसेज नहीं?’’

‘‘क्यों, क्या सरप्राइज देने का जिम्मा तुम टीवी वालों ने ही ले रखा है?’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं.’’ रितु कुछ कहना चाह रही थी मगर रोहित ने इशारे से रोक दिया, ‘‘मेजर रोहित चंद महीने पहले यहां से गया था और कप्तान रोहित बन कर लौटा है.’’

‘‘क्या?’’ रितु यह सुन कर अवाक रह गई. ‘‘तुम मेजर नहीं रहे,’’ रितु ने एक नजर उस की वरदी पर डालते

हुए कहा.

‘‘हां, यह सजा मु?ो मिली है उस जुर्म की जो मैं ने किया ही नहीं और इस की जिम्मेदार तुम हो. पूरे मिशन की जानकारी तुम्हारे जरिए ही दुश्मन तक पहुंची है.’’

‘‘तुम मु?ा पर अपने देश से गद्दारी करने का आरोप लगा रहे हो, यह सरासर गलत है. मत भूलो कि मैं भी अपने देश से उतना ही प्यार करती हूं जितना तुम या कोई और सैनिक करता है.’’

रितु कुछ और कहना चाह रही थी कि रोहित के फोन की घंटी बज उठी. दूसरी ओर सुमेर सिंह था जो अपनी सगाई के मौके पर उन दोनों को आमंत्रित कर रहा था. रोहित ने लाख टालने की कोशिश की मगर सुमेर नहीं माना और अगले दिन रोहित और रितु को सुमेर के पास पहुंचना पड़ा.

‘‘मैं तुम्हारा गुनाहगार हूं, सुमेर. मेरी ही पत्नी के जरिए शायद यह खबर दुश्मनों तक पहुंची और तुम्हारा यह हाल हुआ.’’

‘‘क्या बात कर रहे हो, साहबजी, मैडम ऐसी हो ही नहीं सकतीं. मु?ो उन पर पूरा यकीन है. वतनपरस्ती और ईमानदारी उन के चेहरे पर नूर बन कर छलकती है लेकिन आप उन्हें ले कर नहीं आए?’’

रोहित स्तब्ध रह गया. ‘‘सुमेर, रितु मेरे पास खड़ी है और तुम कह रहे हो कि…’’

सुमेर सिंह ने चश्मा उतार कर रख दिया, ‘‘मैं देख नहीं सकता, सरजी. उस छर्रे ने आंखों को भेद दिया था. कमबख्त कुछ दिन रुक जाता तो मैं अपनी चंद्रवती को तो देख लेता.’’

रितु और रोहित दोनों खामोश हो गए, धीरे से बोले, ‘‘मेरे दुष्कर्म की सजा तुम्हें मिली, सुमेर. मु?ो माफ कर देना.’’

‘‘नहीं साहबजी, ऐसी कोई बात नहीं है. मेम साहब से एक अपील है अगर मान सकें तो.’’

‘‘कहो सुमेर सिंह, मैं तुम्हारे क्या काम आ सकती हूं?’’

‘‘याद है मैडम, एक बार मैं ने कहा था कि मु?ा से पहले आप मेरी चंद्रवती को  देखेंगी और मु?ो बताएंगी कि वह कितनी सुंदर है. हंसीमजाक में कही बात सच हो गई, मैडमजी. देख कर सचसच कहिएगा कि चंद्रवती आप से ज्यादा सुंदर है या कम.’’

रितु चुप हो गई. आंखों से 2 बूंदें आंसुओं की बह निकलीं और उस ने पास खड़ी चंद्रवती का चेहरा अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘इतनी सुंदर है तुम्हारी   चंद्रवती कि चंदा भी शरमा जाए. मु?ा से कहीं ज्यादा सुंदर है तुम्हारी चंद्रवती और जितना इस का चेहरा सुंदर है उस से कहीं ज्यादा इस का दिल सुंदर है.’’

‘‘वह तो है, मैडमजी. वरना मु?ा अंधे का साथ देने की इस की कोई मजबूरी नहीं थी.’’

‘‘अपनेआप को अंधा न कहोजी,’’ चंद्रवती ने हलके स्वर में कहा, ‘‘मेरे होते हुए आप बिना आंखों के नहीं हैं. और फिर, मैं तो खुशनसीब हूं कि एक देशभक्त सिपाही की पत्नी बनने जा रही हूं.’’ यह कहने के साथ चंद्रवती रो पड़ी.

वापसी में सारे रास्ते दोनों खामोश रहे. रितु के मन में भी द्वंद्व चल रहा था और रोहित के मस्तिष्क में भी खयाल आ रहे थे जा रहे थे. सारी घटना का जिम्मेदार वह रितु को सम?ा रहा था और उस ने मानो रितु को तलाक देने का फैसला कर लिया था.

उधर, रितु सोच रही थी कि कैसे वह खुद को बेगुनाह साबित करे और अपने पति का खोया हुआ आत्मसम्मान उसे दिलवा सके, विचार आ रहे थे जा रहे थे. जब औपरेशन के बारे में उस ने कोई सूचना भेजी ही नहीं तो बात कहां से बाहर गई, कौन जरिया बना इस खबर को दुश्मनों तक पहुंचाने का. अचानक उस के होंठों से एक स्वर फूटा, ‘‘वर्षा.’’

वर्षा का नाम सुन कर रोहित चौंक गया. ‘‘हां रोहित, मु?ो अपनी और तुम्हारी बेगुनाही साबित करने का एक मौका और अपना साथ दो.’’

‘‘लेकिन वर्षा तो तुम्हारे चैनल की एक बहुत पुरानी एंकर है. उस की दर्शकों में लोकप्रियता है, फैनफौलोइंग है, उस पर शक करना…’’

‘‘और कौन हो सकता है, रोहित. तुम नहीं, मैं नहीं. अपनी पलटन के हरेक सिपाही पर तुम्हें अपनेआप से ज्यादा भरोसा है. तो फिर, कौन बचा? अगर वर्षा गुनाहगार है तो उसे पकड़ने में ज्यादा वक्त और मेहनत नहीं लगेगी क्योंकि वह खुद को ले कर बिलकुल निश्ंिचत और आश्वस्त है. बस, थोड़ी सी कोशिश तुम्हारे चेहरे की कालिख और मेरे मन पर पड़ी काली छाया को मिटा सकती है. मैं आज से ही उस पर नजर रखती हूं. तुम अपने डिपार्टमैंट को आगाह कर दो, प्लीज.’’ रितु ने आग्रह किया तो रोहित टाल नहीं पाया.

‘‘वर्षा, कैसी हो?’’ दफ्तर में प्रवेश करते ही सामने वर्षा नजर आई.

‘‘अच्छी हूं मगर रोहित के बारे में सुन कर बेहद अफसोस हुआ.’’

‘‘कोई बात नहीं, वर्षा. जानती हो, रोहित मु?ो तलाक दे रहा है. सच्चाई स्वीकार करने के बजाय उस ने अपना दिमाग खराब कर लिया है. बस, दिनरात पीता रहता है. ऐसे में एकएक दिन मु?ा पर भारी पड़ रहा है लेकिन फिर डरती हूं कि अनजान शहर, अनजान लोग. न कोई दोस्त, न कोई रिश्तेदार. कैसे तय होगा आगे का सफर?’’

‘‘तुम चिंता न करो, रितु. मैं हूं न. तुम मु?ा पर यकीन कर सकती हो.’’

‘‘तुम्हारा बहुतबहुत धन्यवाद लेकिन यकीन, दोस्ती, आपस का प्रेम मेरे घर का किराया नहीं दे सकता. मु?ो शानदार जिंदगी नहीं दे सकता जिस की मैं हकदार हूं.’’

‘‘कुछ न कुछ जरूर होगा, रितु. दोस्ती और भरोसे में बहुत ताकत होती है.’’

रितु ने दफ्तर से वर्षा के बारे में खोजखबर ली, उस का पता लिया और उस की गतिविधियों पर नजर रखना शुरू कर दिया. उस की मित्रता प्रगाढ़ होती गई. वर्षा उसे रोज नएनए होटलों में ले जाती, घुमातीफिराती.’’

‘‘इतना पैसा कहां से आता है वर्षा तुम्हारे पास?’’

‘‘पता चल जाएगा, रितु डियर. उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है. कभी किसी बड़े बिजनेसमैन को गिरफ्त में ले कर उसे टीवी चैनल तक घसीट कर ले जाने की धमकी तो कभी अपने पास आई खबर को किसी को पहुंचा कर.’’

‘‘क्या मु?ो भी ऐसा मिलेगा, वर्षा? क्या मैं भी हजारोंलाखों में खेलूंगी कभी?’’

‘‘क्यों नहीं, रितु. फिलहाल तुम अपने डिवोर्स पर ध्यान दो. रोहित के खिलाफ इलजामों की लिस्ट बनाओ और मेरे बताए वकील अमर कुमार के संपर्क में रहो.’’

‘‘तुम ठीक कह रही हो, वर्षा. लेकिन रहरह कर फिक्र सताए जाती है कि रोहित के बिना कैसे कटेगी आगे की जिंदगी. यहां की तनख्वाह से तो घरखर्च चलाना मुश्किल है,’’ रितु ने चिंतित मुद्रा में कहा.

‘‘चिंता मत करो, रितु. मैं ने कहा न, एक रास्ता बंद होता है तो दस खुल जाते हैं. मेरे साथ रहो और मेरा साथ दो तो कमाई के कई बड़ेबड़े जरिए खुद ही खुलते चले जाएंगे. वह दिन जल्द ही आएगा जब मैं अपने जीवन और डायरी का हरेक पेज तुम्हें पढ़ाऊंगी और तुम्हारी आंखें खुली की खुली रह जाएंगी.’’

रितु और रोहित ने वर्षा के बताए वकील अमर से संपर्क किया और उस को सारी वस्तुस्थिति से अवगत करवाया और उस से राष्ट्रहित में सहयोग देने की प्रार्थना की. अमर को सिर्फ यही कहना था कि रितु के तलाक की प्रक्रिया जोरशोर से चल रही है.

अमर एक सुल?ा हुआ इंसान और देशभक्त वकील था. वह फौरन तैयार हो गया और समयसमय पर वर्षा को केस की प्रगति के बारे में बताने की हामी भर दी. एक ऐसा केस जो वास्तविकता में था ही नहीं. अमर के फोन से वर्षा रितु के प्रति और भी आश्वस्त हो गई और अपने घर व दिल के दरवाजे रितु के लिए खोल दिए.

एक शाम रितु वर्षा के बताए पते पर बिना इत्तला पहुंची तो पता चला कि वर्षा के घर में कोई बच्चा नहीं था. उस की शादी भी नहीं हुई थी और उस के घर में लटका ताला बता रहा था कि उस के घर में और कोई सदस्य नहीं था. आसपास के लोगों से उस की बोलचाल भी नहीं थी और कोई उसे या उस के बारे में ठीक तरह से जानता भी नहीं था. रितु ने वहीं से वर्षा को फोन मिलाया और बताया, ‘‘मैं तुम्हारे घर के पास एक मौल में आई हुई हूं, सोचा, तुम से भी मिल लूं.’’

वर्षा ने रितु को कुछ समय रुकने के लिए कहा. थोड़ी देर में वर्षा घर पहुंची और बड़ी ही आत्मीयता से रितु को अपने घर में ले गई और सोफे पर बैठने का आग्रह किया. उस ने गाड़ी की चाबी और अपनी डायरी टेबल पर रखी और अंदर चाय बनाने चली गई. मौका देख कर रितु ने घर की तसवीरें अपने मोबाइल में कैद कीं और डायरी उठा कर अपने बैग में डाल ली तथा चाय की औपचारिकताएं शीघ्रता से समाप्त कर के लंबेलंबे डग भरते हुए लौट गई. उसे यकीन हो गया था कि वर्षा का संबंध बाहरी लोगों से था और जो उस की कमाई का साधन भी था.

बिना समय गंवाए रितु और रोहित सेना इंटैलीजैंस और पुलिस की स्पैशल सैल से संपर्क किया और उन के सामने पूरा घटनाक्रम व डायरी रख दी, जिस में कई नाम और अन्य विवरण लिखे थे. सेना पुलिस और स्पैशल सैल दोनों ने ही  लोकल पुलिस से संपर्क साधा और मामले की नाजुकता के बारे में विस्तार से बात की.

‘‘बाकी का काम आप हम पर छोड़ दीजिए. हमें पहले से ही एक गिरोह पर शक था जिस में वर्षा एक सक्रिय सदस्य है. पुलिस की पूछताछ सच्चाई उगलवा लेगी.’’ उसी रात पुलिस की एक टीम ने वर्षा के घर पर रेड डाली और उसे उठा कर थाने ले आई. ‘‘इस का रोजनामचा सुबह बनाना क्योंकि मैडम जानती है कि रात को किसी महिला को उठाना कानूनी अपराध है तब तक इस की इतनी खातिर करो कि यह सुबह होने का इंतजार करे और बयान देने की जल्दी हम से ज्यादा इसे हो.’’

रोहित ने कर्नल शंकर को फोन कर सारी बात बताई. रोहित ने उच्च सेना कोर्ट में अपील की और नए साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई आरंभ हुई. अदालत ने गौर किया कि वर्षा और रितु को बौर्डर एरिया तक भेजने में रोहित का कोई रोल नहीं था बल्कि उस ने तो इस बात का विरोध भी किया था. अदालत ने लंबी जिरह के बाद रोहित की दलील और साक्ष्यों को माना और उसे हर आरोप से बरी कर दिया तथा सैन्य अदालत के फैसले को पलटते हुए उसे सजामुक्त कर दिया.

मेजर रोहित को सेना ने वह सम्मान दिया जिस का वह सही मानो में हकदार था और उसे पदोन्नति दे कर लैफ्टिनैंट कर्नल बना दिया. खोई हुई प्रतिष्ठा, मान और सम्मान वापस प्राप्त होने से जहां उसे प्रसन्नता थी वहीं ट्रांसफर और्डर देख कर उदासी का एक ?ांका उसे छू कर आगे चला गया. यूनिट के तमाम सिपाहियों और अफसरों ने भरे गले और भावुक हृदय से अपने चहेते मेजर रोहित को विदाई दी जिस की छाती पर लैफ्टिनैंट कर्नल बनने के बाद फीते बढ़ चुके थे और मैडल और भी अधिक चमक रहे थे. Hindi Best Story

Motivation : आज को जियो कल का भरोसा नहीं

Motivation : हम में से अधिकतर लोग जीवन को कल पर टालते रहते हैं, सोचते हैं कि किसी और दिन जिएंगे, जब समय मिलेगा, जब मूड अच्छा होगा जबकि हकीकत यह है कि सब से कीमती पल वही होता है जो इस वक्त हमारे पास है, यानी आज.

हम इंसान अकसर भविष्य की चिंता में वर्तमान को भूल जाते हैं. हम सोचते हैं कि जब सबकुछ सही होगा, तब जिएंगे, तब खुशी मनाएंगे, तब खुद के लिए समय निकालेंगे. लेकिन क्या कभी सोचा है कि ‘सबकुछ सही’ वाला दिन कभी आएगा भी या नहीं? हमारे पास अलमारी में सुंदर कपड़े होते हैं, जिन का इंतजार रहता है कि किसी खास मौके पर पहनेंगे. लेकिन वह मौका या तो आता नहीं या जब आता है, तब हम उन्हें पहनने के बजाय फिर कोई नया बहाना ढूंढ़ लेते हैं. ठीक वैसे ही, हम अपने जीवन के बहुमूल्य पल भी ‘किसी खास समय’ के लिए बचा कर रखते हैं और वह समय अकसर कभी आता ही नहीं.

आज को खास बनाइए

हर दिन, हर सुबह अपने साथ एक नया मौका ले कर आती है. यह मौका है खुद को सम?ाने का, अपनों के साथ समय बिताने का और जिंदगी को महसूस करने का. लेकिन हम उस मौके को पहचान ही नहीं पाते. हम मशीनों की तरह काम करते जाते हैं और यह सोचते जाते हैं कि एक दिन आराम मिलेगा, एक दिन सब ठीक होगा, एक दिन पूरी तरह जी लेंगे. पर वह ‘एक दिन’ किसी कैलेंडर पर नहीं लिखा होता, उसे हमें ‘आज’ में ही ढूंढ़ना है. बचपन से ले कर अब तक, हम सिर्फ दौड़ते आ रहे हैं. बचपन में सोचा, बड़े होंगे तो आजादी मिलेगी. बड़े हुए तो कहा, नौकरी लगेगी तो चैन मिलेगा. नौकरी लगी तो कहा, अब परिवार और जिम्मेदारियां हैं, बाद में जिएंगे. और जब समय मिला, तब शरीर थक चुका होता है, मन बो?िल हो चुका होता है और तब तक जीवन के कई खूबसूरत पल निकल चुके होते हैं.

‘कल’ को बेहतर बनाने का सब से अच्छा तरीका यही है कि हम ‘आज’ को पूरी सच्चाई और संजीदगी से जिएं. खुशियां तब नहीं मिलेंगी जब सबकुछ हमारे हिसाब से होगा, बल्कि तब मिलेंगी जब हम हर स्थिति में कुछ अच्छा ढूंढ़ना शुरू करेंगे. हर दिन को एक तोहफे की तरह देखें. छोटी बातों में भी खुशी ढूंढें़. खुद के लिए जिएं. क्योंकि, यह जिंदगी आप की है और हर बीता पल कभी लौट कर नहीं आता.

खुशियां बाहर नहीं, हमारे रोजमर्रा के लमहों में

हम सोचते हैं कि खुश रहने के लिए कुछ बड़ा होना चाहिए. बड़ी गाड़ी, बड़ा घर, बड़ी सफलता. लेकिन सच्चाई यह है कि खुशियां कहीं बाहर नहीं होतीं, वह हमारे रोजमर्रा के छोटेछोटे लमहों में होती हैं जैसे बच्चों की मुसकान में, किसी दोस्त की यादभरी कौल में, मां के हाथ के खाने में, किसी पुराने गाने को सुनते हुए बहती हुई भावनाओं में आदि. हमें इन लमहों को पहचानने और जीने की आदत डालनी होगी. छोटीछोटी बातों में जीवन की सच्ची खुशियां छिपी होती हैं. बस, हमें उन्हें जीना आना चाहिए.

परफैक्ट पल की प्रतीक्षा मत करो

जिंदगी परफैक्ट नहीं होती, न ही कोई पल पूरी तरह परफैक्ट होता है पर जब हम किसी भी क्षण को खुल कर जीते हैं वह पल खुदबखुद खास बन जाता है. इसलिए अपने अच्छे कपड़े आज पहनिए, अपनी पसंदीदा चाय आज पीजिए, दोस्तों से आज बात कर लीजिए और अपनों को आज गले लगाइए क्योंकि हो सकता है कि कल हमारे पास न हो. सब से दुखद बात यह होती है कि जब हम सम?ाते हैं, तब बहुत देर हो चुकी होती है.

 

 

Story In Hindi: भ्रम – आखिर क्या वजह थी प्रभाकर के इनकार की

Story In Hindi: ‘हां, मैं तुम से प्यार करता हूं, सुकेशी, इसीलिए तुम से विवाह नहीं कर सकता.’ मैं अपने बंगले की वाटिका में एकांत में बैठी डा. प्रभाकर की इस बात के मर्म को समझने का प्रयास कर रही थी, ‘वे मुझ से प्यार भी करते हैं और विवाह के प्रस्ताव को इनकार भी करते हैं.’

उन्होंने जिस दृढ़ता से ये शब्द कहे थे, उस के बाद उन के कमरे में बैठे रहने का मेरा साहस समाप्त हो चुका था. मैं कितनी मूर्ख हूं, उन के सामने भावना में बह कर इतना बड़ा प्रस्ताव रख दिया. हालांकि, वे मेरे इतने निकट आ चुके थे कि यह प्रस्ताव बड़ा होते हुए भी उतना बड़ा नहीं रह गया था.

गत वर्ष के सत्र में मैं उन की कक्षाओं में कई महीने तक सामान्य छात्रा की भांति ही रही थी, किंतु जब उन्होंने मेरी रुचियों को जाना तो…

कालेज के उद्यान में पहुंच कर जब वे विभिन्न फूलों को बीच से चीर कर उस की कायिक प्रक्रिया को बताते तो हम सब विस्मय से नर और मादा फूलों के अंतर को समझने का प्रयास करते.

वह शायद मेरी धृष्टता थी कि एक दिन प्रभाकरजी से उद्यान में ही प्रश्न कर दिया था कि क्या गोभी के फूल में भी नर व मादा का अंतर आंका जा सकता है?

उन्होंने उस बात को उस समय अनसुना कर दिया था, किंतु उसी दिन जब कृषि विद्यालय बंद हुआ तो उन्होंने मुझे गेट पर रोक लिया. मैं उन के पीछेपीछे अध्यापक कक्ष में चली गई थी. उन्होंने मुझे कुरसी पर बिठाते हुए प्रश्न किया था, ‘क्या तुम्हारे यहां गोभी के फूल उगाए जाते हैं?’

‘हां, हमारे बंगले के चारों ओर लंबीचौड़ी जमीन है. मेरे पिता उस के एक भाग में सब्जियां उगाते हैं. कुछ भाग में गोभी भी लगी है.’

‘तुम्हारे पिता क्या करते हैं?’

‘अधिवक्ता हैं, एडवोकेट.’

‘क्या उन्हें फूल, पौधे लगाने का शौक है?’

‘हमारे यहां फूलों के बहुत गमले हैं. एक माली है, जो सप्ताह में 2 दिन हमारी फुलवारी को देखने आता है.’

‘कहां है तुम्हारा बंगला?’

‘जौर्ज टाउन में, पीली कोठी हमारी ही है.’

‘मैं तुम्हारी बगिया देखने कभी आऊंगा.’

‘अवश्य आइए.’

उन्होंने स्वयं से मुझे रोका था. उन्होंने स्वयं ही मेरे घर आने की बात कही थी और दूसरे ही दिन आ भी गए थे. उन के आगमन के बाद ही तो मैं उन की विशिष्ट छात्रा बन गई थी.

मैं गत दिनों के संपूर्ण घटनाक्रम के बारे में सोचती चली जा रही थी. गतवर्ष गरमी की छुट्टियों में जब वे अपने गांव जाने लगे थे तो बातबात में बताया था कि उन के घर में खेती होती है. बड़े भाई खेती का काम देखते हैं.

उस के बाद तो वे बिना बुलाए मेरे घर आने लगे. क्या यह मेरे प्रति उन का आकर्षण नहीं था? मैं ने अपनी दृष्टि वाटिका के चारों ओर फेरी तो हर फूल और पौधे के विन्यास के पीछे डा. प्रभाकर के योगदान की झलक नजर आई. लौन में जो मखमली घास उगाई गई थी, वह प्रभाकरजी की मंत्रणा का ही फल था. उन्होंने जंगली घास को उखाड़ कर, नए बीज और उर्वरक के प्रयोग से बेरमूडा लगवाई. उन्होंने ही बैडमिंटन कोर्ट के चारों ओर कंबरलैंड टर्फ लगवाई.

प्रभाकरजी ने जब से रुचि लेनी शुरू की थी, हमारी बगिया में गंधराज गमक उठा, हरसिंगार झरने लगा, रजनीगंधा महकने लगी. यह सब उन के प्यार को दर्शाने के लिए क्या पर्याप्त नहीं था? हम अंगरेजी फूलों के बारे में अधिक नहीं जानते थे, स्वीट पी और एलाईसम की गंध से परिचय उन के द्वारा ही हुआ. केवल 8 महीने में प्रभाकरजी ने हमारे इस रूखेसूखे मैदान का हुलिया बदल कर रख दिया था.

मैं अपनी वाटिका के सौंदर्य के परिप्रेक्ष्य में डा. प्रभाकर को याद करते हुए उन के साथ बीते हुए उन क्षणों को भी याद करने लगी, जिन्होंने मेरे अंदर यह भाव जगा दिया था कि डा. प्रभाकर भी शायद अपने जीवन में मेरे साहचर्य की आकांक्षा रखते हैं. इधर, मैं तो उन के संपूर्ण व्यक्तित्व से प्रभावित हो गई थी.

मेरी टूटीफूटी कविताओं की प्रशंसा और कभीकभार रेखाचित्रों की अनुशंसा अथवा जलरंगों से निर्मित लैंडस्केप के प्रयास क्या सचमुच उन के हृदय को नहीं छू रहे थे. उन्होंने ही तो कहा था, ‘सुकेशी, तुम्हारी बहुआयामी प्रतिभा किसी न किसी रूप में यश के सोपानों को चढ़ते हुए शिखर पर पहुंचेगी.’

एक दिन बातोंबातों में मैं ने उन से यह भी बता दिया था कि मैं इस संपूर्ण बंगले की अकेली उत्तराधिकारी हूं, फिर भी मेरे प्रस्ताव को उन्होंने ठुकरा दिया? क्या मैं कुरूप हूं? लेकिन ऐसा तो कुछ नहीं.

उन के एक कमरे के फ्लैट में मैं कई बार गई थी. उन्होंने अनेक फूलों की एक मिश्रित वाटिका की पेंटिंग अपने प्रवेशद्वार पर ही लगा रखी थी, जो कि उन्हीं की बनाई हुई थी. यह बात उन्होंने जानबूझ कर मुझे बताई थी. आखिर इस बात का क्या अभिप्राय था? मेरी वाहवाह पर मुसकराए थे और मेरी परख की प्रशंसा में उन्होंने मेरे मस्तक पर एक चुंबन दिया था. और मैं बाहर से अंदर तक झंकृत हो उठी थी.

उस दिन एकांत के क्षणों में जो प्रस्ताव मैं ने उन के सामने रख दिया था, शायद उस चुंबन द्वारा ही प्रेरित था. उन्हें मेरा प्रस्ताव अस्वीकृत नहीं करना चाहिए था. किंतु उन्होंने तो मुझ से आंखें बचा कर कहा, ‘मैं तुम से प्यार करता हूं, इसीलिए तुम से विवाह नहीं कर सकता.’

मुझे प्रभाकरजी की बात से एक झटका सा लगा था. मैं ने कृषि विद्यालय जाना छोड़ दिया था और अंदर ही अंदर मुरझाने लगी थी.

सप्ताह में एक बार अवश्य ही आने वाले प्रभाकरजी जब 16 दिनों तक नहीं आए तो मैं बीते दिनों की संपूर्ण घटनाओं का निरूपण करने के बाद सोचने लगी, ‘मुझ से कौन सी भूल हुई? प्रभाकरजी नाराज हो गए क्या… लेकिन क्यों?’

आज ठीक 16 दिनों बाद अचानक संध्या समय प्रभाकरजी पधारे. मैं बाहर के कमरे में अकेले ही बैठी थी. मैं ने तिरछी दृष्टि से उन्हें देखा और एक मुसकान बिखेर कर स्वागत किया.

‘‘क्या बिलकुल अकेली हो?’’ उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा.

‘‘हां.’’

‘‘बाबूजी?’’

‘‘वे अभी कोर्ट से नहीं आए, शायद किसी के यहां रुक गए हैं.’’

‘‘और अम्माजी?’’

‘‘वे पड़ोस में गई हैं. आप कहां रहे इतने दिन?’’

‘‘मैं तो मात्र एक सप्ताह के लिए अपने गांव गया था. तुम ने विद्यालय जाना क्यों छोड़ दिया? पिछले सोमवार से तुम मुझे अपनी क्लास में दिखाई नहीं दीं. तुम्हारी सहेली सुरभि से पूछने पर ज्ञात हुआ कि तुम कई दिनों से विद्यालय नहीं जा रही हो, शायद जब से मैं छुट्टी पर गया?’’

लेकिन मैं ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘बोलो, चुप क्यों हो?’’ वे हौले से बोले.

‘‘सच बताऊं? मैं तो दर से मुरझा गई हूं. कोई उल्लास ही नहीं रह गया. आप ने उस दिन इतना रूखा उत्तर दिया कि…’’

‘‘रूखा उत्तर नहीं, गुरु और शिष्य के बीच जो संबंध होने चाहिए, वही यदि रहें तो…’’

‘‘आप इतने दकियानूसी हैं. आज के युग में…’’

‘‘दुनिया में जाने क्याक्या होता है, किंतु मैं जिसे जीवन की सफलता की ऊंचाइयों पर देखना चाहता हूं, उसे धोखा नहीं दे सकता.’’

‘‘धोखा, कैसा धोखा?’’

‘‘तुम शायद अभी तक भ्रम में थीं कि मैं कुंआरा हूं, लेकिन मैं विवाहित हूं. मेरे 2 बच्चे हैं. अभी दूसरे बच्चे के जन्म पर ही गांव गया था.’’

यह बात सुन कर मेरी गरदन झुक गई. किंतु साहस बटोर कर प्रश्न कर बैठी, ‘‘यह कोई गढ़ी हुई कहानी तो नहीं? आप इतना अच्छा वेतन पाते हैं. यदि विवाहित हैं तो परिवार को अपने साथ क्यों नहीं रखते?’’

प्रभाकरजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘मैं अपने गांव से उखड़ कर शहर में रहना नहीं चाहता. यहां छोटा सा फ्लैट है, जो मेरे लिए पर्याप्त है. पौधों के शौक मैं जिस विपुलता से अपने गांव में पूरा कर लेता हूं, यहां 5 हजार रुपए मासिक पर भी वैसी जमीन नहीं मिल सकती.’’

उन के इस उत्तर के बाद कुछ देर को सन्नाटा छा गया. मैं समझ ही न सकी कि अब क्या बोलूं.

प्रभाकरजी कुछ समय तक मेरी मुखमुद्रा को पढ़ते रहे, फिर बोले, ‘‘मेरे गांव का विकास हो गया है-नहर आ गई है, अस्पताल है, समाज कल्याण कार्यालय है, बच्चों को इंटर तक पढ़ाने के लिए कालेज है. एक पक्की सड़क है. मैं अपने घरपरिवार को गांव से उखाड़ कर शहर में रोपना नहीं चाहता.’’

यह सब सुन कर मैं थोड़ी देर को चुप हो गई, किंतु फिर धीरे से बोली, ‘‘आप ने जिस अनौपचारिक रूप से मेरे घर आना शुरू कर दिया था, मैं ने उसे आप का आकर्षण मान लिया था.’’

मेरी बात सुन कर प्रभाकरजी ने कहा, ‘‘हां, मैं यह भूल गया था कि तुम ऐसा भी सोच सकती हो. दरअसल, तुम्हारे यहां निरंतर आने का कारण तो तुम्हारे बंगले से जुड़ा हुआ यह मैदान है, जो अब एक सुंदर वाटिका में बदल गया है. यहां मैं अपनी योजनाओं का प्रैक्टिकल प्रयोग कर सकता था. मैं ने तो सोचा भी नहीं था कि एक दिन तुम विवाह का प्रस्ताव भी…’’

मैं एक बार फिर चुप हो गई. पूर्व इस के कि मैं फिर कोई प्रश्न करती, प्रभाकरजी वहां से अचानक लौट पड़े.

प्रभाकर के मस्तिष्क में सुकेशी के प्रस्ताव की बात घुमड़ती रही और उन्हें अपने उस चुंबन की बात याद आई, जो उन्होंने सुकेशी के मस्तक पर दिया था. शायद उस चुंबन ने ही प्रेरित कर दिया था कि वह ऐसा प्रस्ताव रख गई थी. उसे पता नहीं, मस्तक के चुंबनों में और कपोलों अथवा होंठों के चुंबन में क्या अंतर होता है. काश, वह भारतीय परंपराओं से अवगत होती. Story In Hindi

Story In Hindi: बेचारी दिव्यांशी – क्यों ठगा महसूस कर रहे थे मोहल्ले वाले

Story In Hindi: मोहल्ले के कई लोग अचरज भरी निगाहों से उस कमरे को देख रहे थे जहां पर कोई नया किराएदार रहने आ रहा था और जिस का सामान उस छोटे से कमरे में उतर रहा था. सामान इतना ही था कि एक सवारी वाले आटोरिशा में पूरी तरह से आ गया था. सब यही सोच रहे थे और आपस में इसी तरह की बातें कर रहे थे कि तभी एक साइकिल रिक्शा से एक लड़की उतरी जो अपने पैरों से चल नहीं सकती थी, इसीलिए बैसाखियों के सहारे चल कर उस कमरे की तरफ जा रही थी.

अब महल्ले की औरतें आपस में कानाफूसी करने लगीं… ‘क्या इस घर में यह अकेले रहेगी?’, ‘कौन है यह?’, ‘कहां से आई है?’ वगैरह. कुछ समय बाद उस लड़की ने उन सवालों के जवाब खुद ही दे दिए, जब वह अपने पड़ोस में रहने वाली एक औरत से एक जग पानी देने की गुजारिश करने उस के घर गई.

घर में घुसते ही शिष्टाचार के साथ उस ने नमस्ते की और अपना परिचय देते हुए बोली, ‘‘मेरा नाम दिव्यांशी है और मैं पास के कमरे में रहने आई हूं. क्या मुझे पीने के लिए एक जग पानी मिल सकता है? वैसे, नल में पानी कब आता है? मैं उस हिसाब से अपना पानी भर लूंगी.’’

‘‘अरे आओआओ दिव्यांशी, मेरा नाम सुमित्रा है और पानी शाम को 5 बजे और सुबह 6 बजे आता है. कहां से आई हो और यहां क्या करती हो?’’ पानी देते हुए सुमित्रा ने पूछा. ‘‘आंटी, आप मेरे कमरे पर आइए, तब हम आराम से बैठ कर बातें करेंगे. अभी मुझे बड़ी जोरों की भूख लगी है. वैसे, मैं शहर के नामी होटल रामभरोसे में रिसैप्शनिस्ट का काम करती हूं, जहां मेरा ड्यूटी का समय सुबह 6 बजे से है. मेरा काम दोहपर के 3 बजे तक खत्म हो जाता है.’’

बातचीत में सुमित्रा को दिव्यांशी अच्छी लगी और उस के परिवार के बारे में ज्यादा जानने की उत्सुकता में शाम को पानी आने की सूचना ले कर वह दिव्यांशी के कमरे पर पहुंच गई. दिव्यांशी अब अपने बारे में बताने लगी, ‘‘आज से तकरीबन 16 साल पहले मैं अपने मातापिता के साथ मोटरसाइकिल से कहीं जा रही थी कि तभी एक ट्रक से भीषण टक्कर होने से मेरे मातापिता मौके पर ही मर गए थे.

‘‘चूंकि मैं दूर छिटक गई थी इसलिए जान तो बच गई, पर पास से तेज रफ्तार से गुजरती बाइक मेरे दोनों पैरों पर से गुजर गई और मेरे दोनों पैर काटने पड़े. तभी से चाचाचाची ने अपने पास रखा और पढ़ायालिखाया.

‘‘उन के कोई बच्चा नहीं है. इस वजह से भी वे मुझ से बहुत स्नेह रखते हैं. चाचा की माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं है, फिर भी वे मेरी नौकरी करने के खिलाफ हैं, पर मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं, इसीलिए शहर आ कर मैं ने इस नौकरी को स्वीकार कर लिया.

‘‘इस होटल की नौकरी के साथसाथ मैं सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा लेती हूं ताकि कोई सरकारी नौकरी लग जाए. मैं अपनी योग्यता पर विश्वास रखती हूं इसी कारण किसी तरह की कोचिंग नहीं लेती हूं, बल्कि 3 बजे होटल से आ कर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हूं. इस से मेरी प्रतियोगिता की तैयारी भी हो जाती है और कुछ कमाई भी.

‘‘इस महल्ले में कोई बच्चा अगर ट्यूशन लेना चाहता हो तो उन्हें मेरे पास भेजिए न भाभी,’’ दिव्यांशी ने अपनेपन से सुमित्रा से कहा. ‘‘जरूर. मैं अपने सभी मिलने वालों से कहूंगी…’’ सुमित्रा ने पूछा, ‘‘और तुम अपने खाने का क्या करती हो?’’ ‘‘सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना तो मैं होटल की पैंट्री में ही खा लेती हूं और शाम को इस आटोमैटिक हौट प्लेट पर दालचावल या खिचड़ी जैसी चीजें पका लेती हूं.’’

यह सुन कर सुमित्रा मन ही मन दिव्यांशी की हिम्मत की तारीफ कर रही थी. तकरीबन आधा घंटे तक दिव्यांशी के साथ बैठने के बाद वह अपने घर वापस आ गई. सुबह साढ़े 5 बजे वही साइकिल रिक्शा वाला जो दिव्यांशी को छोड़ने आया था, लेने आ गया. साफ था, दिव्यांशी ने उस का महीना बांध कर लाने व छोड़ने के लिए लगा लिया था.

सुमित्रा ने भी अपना काम बखूबी निभाया और महल्ले में सभी को दिव्यांशी के बारे में बताया. तकरीबन सभी ने उस की हिम्मत की तारीफ की. हर कोई चाहता था कि कैसे न कैसे कर के उस की मदद की जाए.

कई घरों के बच्चे दिव्यांशी के पास ट्यूशन के लिए आने लगे थे. दिव्यांशी को इस महल्ले में आए अभी पूरा एक महीना होने में 2-3 दिन बचे थे कि एक दिन महल्ले वालों ने देखा कि दिव्यांशी किसी लड़के के साथ मोटरसाइकिल पर आ रही है.

सभी को यह जानने की इच्छा हुई कि वह लड़का कौन है. पूछने पर पता चला कि उस का नाम रामाधार है और उसी के होटल में कुक है और आज ही उस ने यह सैकंड हैंड बाइक खरीदी है. 1-2 दिन के बाद ट्यूशन खत्म होने पर दिव्यांशी ने एक बच्चे को भेज कर महल्ले की 4-5 औरतों को अपने कमरे में बुलवा लिया और कहने लगी, ‘‘मैं इतने दिनों से आप लोगों के साथ रह रही हूं इसलिए आप लोगों के साथ एक बात करना चाहती हूं.

रामाधार हमारे होटल में कुक है और वह चाहता है कि मैं रोज उस के साथ औफिस जाऊं. ‘‘वैसे भी रिक्शे वाला 2,000 रुपए महीना लेता है. अगर आप लोगों को कोई एतराज न हो तो मैं उस के साथ आनाजाना कर लूं?’’

‘‘जब तुम पूछ कर सभी के सामने आनाजाना कर रही हो तो हमें क्या दिक्कत हो सकती है और पिछले एक महीने में इतना तो हम तुम्हें समझ ही गए हैं कि तुम कोई गलत काम कर ही नहीं सकती. तुम निश्चिंत हो कर रामाधार के साथ आजा सकती हो, ‘‘सुमित्रा बाकी सब औरतों की तरफ देख कर बोली. सभी औरतों ने अपनी सहमति दे दी.

रामाधार 26-27 साल का नौजवान था. उस की कदकाठी अच्छी थी. फूड और टैक्नोलौजी का कोर्स करने के बाद दिव्यांशी के होटल में ही वह कुक का काम करता था. वह दिव्यांशी को लेने व छोड़ने जरूर आता था, पर कभी भी दिव्यांशी के कमरे के अंदर नहीं गया था.

अब तक 3 महीने गुजर चुके थे. ट्यूशन पढ़ रहे सभी बच्चों के मासिक टैस्ट हो चुके थे और तकरीबन सभी बच्चों ने कहीं न कहीं प्रगति की थी. इस कारण दिव्यांशी का सम्मान और ज्यादा बढ़ गया था. एक दिन अचानक दिव्यांशी ने फिर से सभी औरतों को अपने घर बुलवा लिया. इस बार मामला कुछ गंभीर लग रहा था.

सुमित्रा की तरफ देख कर दिव्यांशी बोली, ‘‘मैं ने आप सभी में अपना परिवार देखा है, आप लोगों से जो प्यार और इज्जत मिली है, उसी के आधार पर मैं आप लोगों से एक बात की इजाजत और चाहती हूं. मैं और रामाधार शादी करना चाहते हैं. ‘‘दरअसल, रामाधार को दुबई में दूसरी नौकरी मिल गई है और उसे अगले 3 महीनों में कागजी कार्यवाही कर के वहां नौकरी जौइन करनी है. वहां जाने के बाद वह वहां पर मेरे लिए भी जौब की जुगाड़ कर लेगा.

जाने से पहले वह शादी कर के जाना चाहता है, ताकि पतिपत्नी के रूप में हमें एक ही संस्थान में काम मिल जाए. ‘‘मैं ने अपने चाचा को भी बता दिया है. वे भी इस रिश्ते से सहमत हैं, पर यहां आने में नाकाम हैं, क्योंकि उन के साले का गंभीर ऐक्सिडैंट हो गया है.’’

सभी औरतें एकदूसरे की तरफ देखने लगीं. 16 नंबर मकान में रहने वाली कमला ताई दिव्यांशी की हमदर्द बन गई थीं. उन की आंखों में सवाल देख दिव्यांशी बोली, ‘‘ताईजी, रामाधार की कहानी भी मेरे ही जैसी है. उस के मातापिता की मौत बचपन में ही हो गई थी. कोई और रिश्तेदार न होने के कारण पड़ोसियों ने उसे अनाथ आश्रम में दे दिया था. वहीं पर रह कर उस ने पढ़ाई की और आज इस लायक बना.’’

अब तो सभी के मन में रामाधार के प्रति हमदर्दी के भाव उमड़ पड़े. ‘‘शादी कब करने की सोच रहे हो,’’ 10 नंबर वाली कल्पना भाभी ने पूछा. ‘‘इसी हफ्ते शादी हो जाएगी तो अच्छा होगा और कागजी कार्यवाही करने में भी आसानी होगी.’

‘‘इतनी जल्दी तैयारी कैसे होगी?’’ सुमित्रा ने सवाल किया. ‘‘तैयारी क्या करनी है, हम ने सोचा है कि हम आर्य समाज मंदिर में शादी करेंगे और शाम का खाना रामभरोसे होटल में रख कर आशीर्वाद समारोह आयोजित कर लेंगे.

दूसरे दिन सुबह रामाधार अपनी कागजी कार्यवाही के लिए दिल्ली चला जाएगा और 10-12 दिन बाद जब वापस आएगा तो मैं उस के घर चली जाऊंगी. ‘‘मैं आप लोगों से अनुरोध करूंगी कि आप मुझे ट्यूशन की फीस अगले 3 महीने की एडवांस में दे दें.

सामान के बदले में मुझे कैश ही दें क्योंकि सामान तो मैं साथ ले जा नहीं पाऊंगी.’’ सभी को दिव्यांशी की भविष्य के प्रति गंभीरता पसंद आई. 11 नंबर मकान में रहने वाली चंदा चाची उत्सुकतावश बोली, ‘‘बिना जेवर के दुलहन अच्छी नहीं लगती इसलिए शादी के दिन मैं अपना नया वाला सोने का सैट, जो अपनी बेटी की शादी के लिए बनवाया है, उस दिन दिव्यांशी को पहना दूंगी.’’

‘‘जी चाचीजी, रिसैप्शन के बाद मैं वापस कर दूंगी,’’ दिव्यांशी बोली. अब तो होड़ मच गई. कोई अंगूठी, तो कोई पायल, कोई चैन, तो कोई कंगन दिव्यांशी को देने को तैयार हो गया. सुधा चाची ने अपनी लड़की का नया लहंगा दे दिया. कुल 50-55 घरों वाले इस महल्ले में कन्यादान करने वालों की भी होड़ लग गई.

कोई 5,000 रुपए दे रहा था, तो कोई 2,100 रुपए. शादी के दिन महल्ले में उत्सव जैसा माहौल था. सभी छुट्टी ले कर घर पर ही थे. अपनेअपने वादे के मुताबिक सभी ने अपने गहनेकपड़े दिव्यांशी को दे दिए थे.

शादी दोपहर 12 बजे होनी थी. इसी वजह से दिव्यांशी को सुबह 9 बजे ब्यूटीपार्लर पहुंचना था और वहीं से आर्य समाज मंदिर. लेकिन सब से बड़ा सवाल यह था कि दिव्यांशी को ब्यूटीपार्लर ले कर जाएगा कौन?

इतनी सुबह उस के साथ जाने का मतलब था कि खुद को बिना तैयार किए शादी में जाना, इसलिए यह निश्चित हुआ कि सुमित्रा के पति दिव्यांशी को अपने साथ ले कर जाएंगे और ब्यूटीपार्लर की जगह पर छोड़ देंगे. जैसे ही पार्लर का काम पूरा हो जाएगा, दिव्यांशी फोन कर के उन्हें बुलवा लेगी और वहीं से सभी आर्य समाज मंदिर चले जाएंगे.

तय समय के मुताबिक ही सारा कार्यक्रम शुरू हो गया. सुबह साढ़े 8 बजे सुमित्रा के पति अपनी कार ले कर दिव्यांशी के दरवाजे पर पहुंच गए और उस के बताए ब्यूटीपार्लर पर सारे सामान के साथ ले गए.

पार्लर अभीअभी खुला ही था. वह उसे पार्लर पर छोड़ कर चले गए. अब सभी तैयार होने लगे. चूंकि रिसैप्शन शाम को होना था इसीलिए तकरीबन सभी घरों में या तो सिर्फ नाश्ता बना या खिचड़ी. तकरीबन साढ़े 11 बजे सुमित्रा सपरिवार दिव्यांशी को लेने के लिए पार्लर पहुंची, पर दिव्यांशी तो वहां थी ही नहीं.

ज्यादा जानकारी लेने पर पता चला कि पार्लर तो साढ़े 10 बजे खुलता है. 9 बजे तो सफाई वाला आता है जो पार्लर के कर्मचारियों के आने के बाद चला जाता है. आज सुबह 9 बजे किसी का भी किसी तरह का अपौइंटमैंट नहीं था.

सुमित्रा को चक्कर आने लगे. वह किसी तरह चल कर कार तक पहुंची और पति को सारी बात बताई. पति तुरंत पार्लर के अंदर गए और उन के अनुरोध पर उस सफाई वाले को बुलवाया गया, ताकि कुछ पता चल सके. सफाई वाले ने जो बताया, उसे सुन कर सभी के होश उड़ गए.

उस ने बताया, ‘‘सुबह जो लड़की पार्लर में आई थी, उस ने बताया था कि वह एक नाटक में एक विकलांग भिखारी का रोल कर रही है. उसे हेयर कट और मेकअप कराना है. ‘‘तब मैं ने बताया कि पार्लर तो सुबह साढ़े 10 बजे खुलेगा, तो वह कहने लगी कि तब तक मेरा पैर फालतू ही मुड़ा रहेगा, मैं वाशरूम में जा कर पैरों में लगी इलास्टिक को निकाल लूं क्या? जब तक पार्लर खुलेगा, मैं नाश्ता कर के आ जाऊंगी.

‘‘मैं ने कहा ठीक है. देखिए, इस कोने में उस की बैसाखियां और निकला हुआ इलास्टिक रखा है.’’ सभी ने देखा, बैसाखियों के साथ एक छोटी सी थैली रखी थी. इस में चौड़े वाले 2 इलास्टिक और दिव्यांशी के फोन का सिम कार्ड रखा हुआ था. आर्य समाज मंदिर में सभी लोग अपनेआप को ठगा सा महसूस करते हुए एकदूसरे की तरफ देख रहे थे. Story In Hindi

Hindi Story: ठगनी – किस सच से अनजान था वो?

Hindi Story: घर के बगीचे में बैठा मैं अपने मोबाइल फोन के बटनों पर उंगलियां फेर रहा था. चलचित्र की तरह एकएक कर नंबरों समेत नाम आते और ऊपर की ओर सरकते जाते. उन में से एक नाम पर मेरी उंगली ठहर गई. वह नंबर परेश का था. मेरा पुराना जिगरी दोस्त. आज से तकरीबन 10 साल पहले आदर्श कालोनी में परेश अपने मातापिता व भाईबहनों के साथ किराए के मकान में रहता था. ठीक उस से सटा हुआ मेरा घर था. हम लोग एकसाथ परिवार की तरह रहते थे. फिर मेरी शादी हो गई. अचानक पिता की मौत के बाद मैं अपने आदर्श नगर वाला मकान छोड़ कर पिताजी द्वारा दूसरी जगह खरीदे हुए मकान में रहने चला गया.

कुछ दिनों के बाद मैं एक दिन परेश से मिला था, तो मेरे घर वालों का हालचाल जानने के बाद उस ने बताया था कि वे लोग भी आदर्श नगर वाला किराए का मकान छोड़ कर किसी दूसरी जगह रहने लगे हैं.काम ज्यादा होने के चलते फिर हम लोगों की मुलाकातें बंद हो गईं. हमें मिले कई साल गुजर गए. बचपन की वे पुरानी बातें याद आने लगीं. हालचाल पूछने के लिए सोचा कि फोन लगाता हूं. फोन का बटन उस नंबर पर दबते ही घंटी बजनी शुरू हो गई.मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा कि चलो, फोन तो लग गया, क्योंकि इन दिनों क्या बूढ़े, क्या जवान, सभी में एक फैशन सा हो गया है सिम कार्ड बदल देने का. आज कुछ नंबर रहता है, तो कल कुछ.

थड़ी देर बाद ही उधर से किसी औरत की आवाज सुनाई दी, ‘हैलो… कौन बोल रहा है? देखिए, यहां लाउडस्पीकर बज रहा है. कुछ भी ठीक से सुनाई नहीं पड़ रहा है.’ मैं ने अंदाजा लगाया, शायद परेश की भी शादी हो गई है. हो न हो, यह उसी की पत्नी है. मैं फोन पर जरा ऊंची आवाज में बोला, ‘‘हैलो, मैं मयंक बोल रहा हूं… हैलो… सुनाई दे रहा है न… परेश ने मुझे यह नंबर दिया था. यह उसी का ही नंबर है न… मुझे उसी से बात करनी है. वह मेरे बचपन का दोस्त है. आदर्श नगर में हम लोग एकसाथ रहते थे.’’ उधर से फिर आवाज आई, ‘देखिए, कुछ सुनाई नहीं दे रहा है, आप…’ मैं ने फोन काट दिया. मैं हैरान सा था. पक्का करने के लिए दोबारा फोन लगाया कि सही में वह औरत परेश की पत्नी ही है या कोई और, मगर साफ आवाज न मिल पाने के चलते दिक्कत हो रही थी. वैसे, यह नंबर खुद परेश ने मुझे एक बार दिया था. जब वह बाजार में मिला था. यह औरत यकीनन उस की पत्नी ही होगी. आवाज से ऐसा लग रहा था, जैसे वह मेरा परिचय जानने की कोशिश कर रही थी.

रात के 8 बजे मैं खापी कर कुछ लिखनेपढ़ने के खयाल से बैठ ही रहा था कि मेरे मोबाइल फोन पर एक फोन आया. किसी मर्द की आवाज थी, जिसे मैं पहचान नहीं पा रहा था. फोन पर उस ने मेरा नाम पूछा. मैं ने जैसे ही अपना नाम बताया, तो वह तपाक से बोल पड़ा, ‘हैलो, मयंक भैया. आप का फोन था? सवेरे आप ने ही फोन किया था?’

मैं ने कहा, ‘‘हां.’’

उधर से फिर आवाज आई, ‘अरे भैया, मैं परेश बोल रहा हूं. देखिए न, मैं जैसे ही घर आया, तो मेरी पत्नी ने बताया कि किसी मयंक का फोन आया था. मैं ने सोचा कि कौन हो सकता है? यही सोचतेसोचते फोन लगा दिया. ‘और भैया, कैसे हैं? आप तो आते ही नहीं हैं. आइए, घर पर और अपनी भाभी से भी मिल लीजिएगा. बहुत मजा आएगा मिल कर.’

‘‘सचमुच…’’

‘एक बार आ कर तो देखिए.’

मैं ने कहा कि जरूर आऊंगा और फोन कट गया. बहुत दिनों से छूटी दोस्ती अचानक उफान मारने लगी. बहुत सारी बातें थीं, जो फोन पर नहीं हो सकती थीं. बचपन के वे दिन जब हम परेश के भाईबहनों के साथ उस के घर में बैठ कर खेलते थे. उस की मां मुझे बहुत मानती थीं. मैं उन्हें ‘काकी’ कहता था. एक बार वे बहुत बीमार पड़ गई थीं. मैं अपने मामा की शादी में गांव चला गया था. वहां से महीनों बाद आया, तो पता चला कि काकी अस्पताल में भरती थीं. उन्हें आईसीयू में रखा गया था. वे किसी को पहचान नहीं पा रही थीं. आईसीयू से निकलते वक्त मैं उन के सामने खड़ा था. जब सिस्टर ने पूछा कि आप इन्हें पहचानते हैं, तो उन्होंने तपाक से मेरा नाम बता दिया था. उन के परिवार में खुशियां छा गई थीं. बचपन के वे दिन चलचित्र की तरह याद आ रहे थे. मैं परेश और उस के परिवार से मिलना चाहता था, खासकर परेश की पत्नी से. वह दिखने में कैसी होगी? मिलने पर खूब बातें करेंगे.

एक दिन सचमुच मैं ने उस के घर जाने का मन बना लिया. घर के पास पहुंच कर मैं ने फोन लगाया. फोन उस की पत्नी ने उठाया था. इस बार आवाज दोनों तरफ से साफ आ रही थी. उस की आवाज मेरे कानों में पड़ते ही मेरी सांसें जोरजोर से चलने लगीं. शरीर हलका होने लगा. आवाज कांपने और हकलाने लगी. पानी गटकने की जरूरत महसूस होने लगी. मैं ने फोन पर अपनेआप को ठीक करते हुए कहा, ‘‘हैलो, मैं मयंक…’’

उधर से परेश की पत्नी की आवाज आई, ‘अरे आप, हांहां पहचान गई, कहिए, कैसे हैं?’ मेरे मुंह से आवाज निकलने का नाम ही नहीं ले रही थी. किसी तरह गले को थूक से थोड़ा गीला किया और कहा, ‘‘हां, मैं मयंक. इधर ही आया था एक दोस्त के घर. सोचा, आया हूं तो मिलता चलूं. आप को भी देखना है कि कैसी लगती हैं?’’ मैं ने एक ही सांस में अपनी इच्छा जाहिर कर दी. उस ने तुरंत कहा, ‘हांहां, आप ठीक जगह पर हैं. मैदान के बगल में सड़क है, जो नदी तक जाती है. उसी पर आगे बढि़एगा. सामने एक मकान दिखेगा, उस में एक नारियल का पेड़ है. याद रखिएगा. आइए.’ ऐसा लग रहा था, जैसे मैं हवा में उड़ता जा रहा हूं और उड़ते हुए उस का घर खोज रहा हूं, जिस में एक नारियल का पेड़ है. जल्द ही घर मिल गया.

मैं ने घर के सामने पहुंच कर दरवाजा खटखटाया. एक खूबसूरत औरत बाहर निकली. मेरा स्वागत करते हुए वह मुझे घर के अंदर ले गई. थोड़ी औपचारिकता के बाद मैं ने इधरउधर गरदन हिलाई और पूछा, ‘‘परेश कहीं दिख नहीं रहा है… और काकी?’’

‘‘परेश आता ही होगा, काकी गांव गई हैं,’’ यह कहते हुए वह मेरे बगल में ही थोड़ा सट कर बैठ गई. इतना करीब कि हम दोनों की जांघें उस के जरा से हिलने से सटने लगी थीं.

मैं रोमांचित होने लगा. यहां आने से थोड़ी देर पहले मैं उसे ले कर जो सोच रहा था, वह सब हकीकत लगने लगा था. मैं उस से हंसहंस कर बातें कर रहा था कि इतने में दरवाजे पर दस्तक हुई. मैं जलभुन गया कि अचानक यह कबाब में हड्डी बनने कहां से आ गया. दरवाजा खुलते ही सामने एक अजनबी आदमी दिखा. चेहरे से दिखने में खुरदरा, उस के तेवर अच्छे नहीं लग रहे थे. मैं ने परेश की पत्नी की तरफ देखते हुए उस आदमी के बारे में पूछा, तो उस ने सपाट सा जवाब दिया, ‘‘यही तो है परेश,’’ और उस की एक कुटिल हंसी हवा में तैर गई.

मैं सकपका गया. यह परेश तो नहीं है. क्या मैं किसी अजनबी औरत के पास…

अभी मन ही मन सोच ही रहा था कि वह आदमी मेरे सामने आ गया और कमर से एक देशी कट्टा निकाल कर उस से खेलने लगा. फिर मुझे धमकाते हुए बोला, ‘‘तुम्हारी हर हरकत मेरे मोबाइल फोन में कैद हो गई है. अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि बदनामी से पिंड छुड़ाना चाहते हो, तो तुम्हें 50 हजार रुपए देने होंगे. ‘‘तुम्हें कल तक के लिए मुहलत दी जाती है, वरना परसों ये तसवीरें तुम्हारे घर के आसपास बांट दी जाएंगी.’’

मुझे काटो तो खून नहीं. मैं ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘मगर, यह तो परेश का घर है और यह उस की पत्नी है.’’ वे दोनों एकसाथ हंस पड़े. उस आदमी ने कहा, ‘‘गलत नंबर पर पड़ गए बरखुरदार. होगा तुम्हारे किसी दोस्त का नंबर, लेकिन अब यह नंबर मेरे पास है. यह मेरी पार्टनर लीना है और हम दोनों का यही धंधा है.’’ वह औरत जो अब तक मुझ से सट कर बैठी थी, मुझ से छिटक कर उस के बगल में जा खड़ी हुई. वह मुझे धमकाते हुए बोली, ‘‘किसी से कहना नहीं, चल फटाफट निकल यहां से और जल्दी से पैसों का इंतजाम कर.’’ मैं सहमा सा उस खूबसूरत ठगनी का मुंह देखता रह गया. Hindi Story

Political News : अस्पताल निर्माण घोटाले की जांच या पीएम डिग्री विवाद से ध्यान भटकाना

जबजब आवाज उठाई जाएगी, तबतब उसे कानूनी पेचीदगियों में उलझा दिया जाएगा, यह बात अब हर राजनीतिक पार्टी को समझ लेनी चाहिए. फिर भी जाने क्यों सब अपनी ही फजीहत कराने पर आमादा हो जाते हैं. आज की हकीकत यही है कि जो भी सत्ता पक्ष से सवाल करेगा, वह खुद घिर जाएगा. जहां प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री दिखाने का मुद्दा उठा, वहीं विपक्ष का ध्यान भटकाने के लिए अस्पताल निर्माण घोटाले में छापेमारी शुरू कर दी गई और असली मुद्दा दब गया. अकसर जब भी ईडी छापेमारी के मूड में आती है, तो समझ लेना चाहिए कि देश में कहीं न कहीं सत्ता पक्ष से विपक्ष ने सवालजवाब करने की हिम्मत की होगी, जिस की कीमत विपक्ष को ही चुकानी पड़ती है. लेकिन अब सवाल उठाने पर छापेमारी या जेल भेजना, जनता की नजर में धीरेधीरे बचकाना लगने लगा है.

अस्पताल निर्माण घोटाले में छापेमारी

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दिल्ली के पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज सहित 13 ठिकानों पर छापेमारी की. आरोप है कि 2018-19 में 5,590 करोड़ रुपए की 24 अस्पताल निर्माण परियोजनाओं में भारी अनियमितताएं हुईं. कई ठेकेदारों और अधिकारियों के यहां भी जांच की गई.

ध्यान भटकाने की साजिश

आम आदमी पार्टी ने इसे फर्जी मामला बताया और आरोप लगाया कि यह कार्रवाई प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री विवाद से जनता का ध्यान हटाने के लिए की गई. पार्टी नेताओं का कहना है कि अस्पताल घोटाले का आरोप निराधार है. उन का तर्क है कि पहले भी सत्येंद्र जैन को 3 साल जेल में रखने के बाद आखिरकार सीबीआई/ईडी को क्लोज़र रिपोर्ट देनी पड़ी थी.

पंजाब सीएम का बयान

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि “जिस दिन पीएम मोदी की डिग्री चर्चा में आई, उसी दिन यह रेड डाली गई.” उन्होंने इसे राजनीति से प्रेरित कदम करार दिया.

भाजपा का पक्ष

भाजपा का कहना है कि ईडी की कार्रवाई पूरी तरह मनी लौंन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार की जांच का हिस्सा है, और इस का राजनीति से कोई संबंध नहीं है. Pilitical News

Bihar News : दलितपिछड़ों की सोच नहीं बदल पाए चिराग और मायावती

Bihar News : बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है. 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी बीएसपी ने 230 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. रामगढ़ और चैनपुर सीटों पर उसे जीत भी मिली थी. 2020 के चुनाव में बीएसपी ने गठबंधन किया था. लेकिन 2015 में अकेले ही 228 सीटों पर चुनाव लड़ा था, कामयाबी बिलकुल नहीं मिल पाई थी.

2025 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने कहा है कि बसपा बिहार चुनाव में किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी और अकेले ही चुनाव मैदान में उतरेगी. चुनाव की जिम्मेदारी बिहार प्रदेश यूनिट के साथसाथ नैशनल कोऔर्डिनेटर रामजी गौतम को सौंपी गई है, जिस का सुपरविजन बीएसपी के राष्ट्रीय संयोजक बने मायावती के भतीजे आकाश आनंद के जिम्मे होगा. सवाल यह है कि इस से बसपा या मायावती को हासिल क्या होगा?  क्या चुनाव चुनावी फायदे के लिए लड़े जाते हैं या दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए? राजनीतिक फायदा तो दूसरों को नुकसान पहुंचा कर भी उठाए जाते हैं. मायावती का मुख्य राजनीतिक आधार उत्तर प्रदेश में ही रहा है. बसपा के संस्थापक कांशीराम ने उत्तर प्रदेश के हालात देख कर ही यहां पहल की थी. उन की दूरदृष्टि सच भी साबित हुई.

सपा 1993 से ले कर 2012 तक प्रदेश में अपना जनाधार बनाने में सफल हुई थी. उस दौर में 4 बार बसपा नेता मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं. बसपा और समाजवादी पार्टी के नेताओं कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने दलित और पिछडा गठजोड़ बनाने का काम किया था. मायावती के अपने फैसलों ने इस गठजोड़ को सफल नहीं होने दिया. जिस के चलते यह साफ हो गया कि कांशीराम और मुलायम की सोच और मेहनत मायावती ने डूबो दी. राजनीति को समझने वाले मानते हैं कि जिस तरह से मायावती ने भाजपा को लाभ पहुंचाने वाले फैसले उत्तर प्रदेश में किए वैसे ही फैसले वे बिहार में करने जा रही हैं. वैसे देखें तो बिहार में मायावती के पहले लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान यह काम कर रहे हैं. जो काम मायावती ने उत्तर प्रदेश में जाटव समाज के लिए किया वही काम बिहार में पासवान बिरादरी के लिए राम विलास पासवान ने किया. उन की विरासत संभाल रहे चिराग पासवान भी मायावती वाली गलती कर के उन के ही पदचिन्हों पर चल रहे हैं.

क्या है बिहार में जातीय समीकरण

बिहार के जातीय समीकरण को देखें तो वहां पर सामान्य वर्ग 15.52 फीसदी, पिछड़ा वर्ग 27.12 फीसदी, अत्यंत पिछड़ा 36 फीसदी, अनुसूचित जाति (दलित) 19 फीसदी, अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) 1.68 फीसदी हैं. एनडीए गठबंधन के पक्ष में करीब 48 फीसदी वोट रहता है. भाजपा का दावा है कि इस के अलावा दूसरे छोटे समूह की अति पिछड़ी जातियां एनडीए के साथ जुड़ती हैं, जिस से उस की संख्या 55 फीसदी हो जाती है.

इंडिया गठबंधन के पक्ष में यादव, मुसलिम, हरिजन (मोची, रविदास और चर्मकार), पासी और मल्लाह प्रमुख रूप से रहते हैं. लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी का दावा है कि इन जातियों का लगभग 40.81 फीसदी वोटर इंडिया गठबंधन के साथ है. वोट अधिकार यात्रा के बाद इंडिया गठबंधन के साथ 47 से 50 फीसदी वोट जुड़ रहा है. इंडिया गठबंधन ने रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस को साथ ले कर एनडीए के वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश की है. चूंकि पासवान वोटरों की जनसंख्या 5.31 फीसदी है और इस पर चिराग पासवान की मजबूत पकड़ मानी जाती है, लिहाजा, पशुपति पारस को अपने गठबंधन में शामिल कर इंडिया गठबंधन ने एक बड़े वोटबैंक में सेंधमारी की कोशिश की है.

 

क्या कमाल दिखाएगी लोजपा

लोक जनशक्ति पार्टी की स्थापना वर्ष 2000 में हुई थी. तब से अब तक पार्टी ने कभी भी बिहार विधानसभा चुनाव जदयू के साथ नहीं लड़ा. 2025 का विधानसभा चुनाव पहली बार जदयू और लोक जनशक्ति पार्टी दोनों लिए ऐतिहासिक होगा. रामविलास पासवान के बाद लोक जनशक्ति पार्टी को विभाजन का संकट भी झेलना पड़ा. इस के बाद चिराग पासवान ने पार्टी को संभाला जो रामविलास पासवान के बेटे हैं. पार्टी का एक गुट रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस के साथ इंडिया ब्लौक के साथ है. 800 से ज्यादा भोजपुरी फिल्मों में 1,000 से अधिक गानों पर आइटम डांस कर चुकी सीमा सिंह ने राजनीति में कदम रखे हैं. वे लोक जनशक्ति पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव हैं. इन के पति सौरव कुमार इन का साथ दे रहे हैं. वे बरबीघा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. वहां पर भूमिहार करीब 20 फीसदी हैं. ऐसे में सीमा सिंह खुद को मजबूत मान रही हैं. चुनाव में उन की आइटम डांसर की छवि, व्यवहार मदद कर रहा है.

वे कहती हैं, ‘चिराग पासवान के नेतृत्व में पार्टी लगातार मजबूत हुई है. इस का लाभ पूरे गठबंधन को मिलेगा.‘ पहली बार चिराग पासवान के कंधे पर दबाव अधिक है. दूसरी तरफ बसपा में भी आकाश आनंद भी अपना पार्टी का प्रचार देख रहे हैं. इस चुनाव में बसपा और लोजपा दोनों के युवा नेता कमान संभाले हुए हैं.

बिहार में दलित-पिछड़े साथ क्यों नहीं आते

उत्तर प्रदेश में मुलायम और कांशीराम ने पिछड़ा और दलित को एक मंच पर लाने का काम किया था. बिहार में यह काम नहीं हो पाया. इस कारण 85 फीसदी सवर्ण ही बिहार का राज चलाते रहे. लालू यादव ने यह प्रयास किया लेकिन जब चारा घोटाले में वे फंस गए तो वह काम भी रुक गया. बिहार में कई लोकगीत प्रचलित हैं जिन में यह सुनाया जाता है कि पिछड़ी और दलित जातियों को सम्मान लालू राज में मिला. जो काम कांशीराम ने उत्तर प्रदेश के दलितों के बीच किया वह काम रामविलास पासवान बिहार में नहीं कर पाए. वे कभी नीतीश तो कभी भाजपा के पिछलग्गू बने रहे. यही काम अब चिराग पासवान भी कर रहे हैं. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हनुमान बन कर खुश हैं. बिहार में दलित पिछड़ों से अधिक परेशान रहता है. ऐसे में बसपा और लोक जनशक्ति पार्टी कुछ नया करेंगी, इस में संदेह है.

ऊंची जातियों और उन के बल पर राज करने वाली पार्टियों की सोच वही पुरानी है. वे दलित नेताओं को लालच में फंसा कर पूरी बिरादरी का नुकसान करती हैं. उन के लिए दलित व पिछड़े गुलामों जैसे हैं. यह बात और है कि मुगलों और अंगरेजों ने जो अधिकार और सम्मान दलित व पिछड़ों को दिए वे आजादी के बाद देश के नेताओं ने नहीं दिए. उन को पूजापाठ में फंसा दिया तो उन के नेताओं को लालच या फिर अपराध में फंसा कर खत्म कर दिया. लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में फंसा दिया तो रामविलास पासवान और मायावती जैसे नेताओं को सत्ता का लालच दे कर फंसा लिया. दलित व पिछड़ों के नेता सत्ता तो पा सकते हैं पर ऊंची जातियों के आदेश मानने और उन के बताए रास्ते पर चलने को मजबूर होते हैं. यह बात इन जातियों के लोगों की समझ में नहीं आएगी. इन की आजादी किसी मकसद की नहीं है. रामविलास पासवान, मायावती, चिराग पासवान जैसे नेता कांशीराम जैसा बदलाव नहीं कर पाए. ये ऊंची जातियों की पार्टियों में गुलामी के अलावा दलित व पिछड़ों की तरक्की का कोई जरिया नहीं बन सकते.

Hindi Story: जाग सके तो जाग – साध्वी माला को कैसे मिली असली शिक्षा

Hindi Story: घर के ठीक सामने वाले मंदिर में कोई साध्वी आई हुई थीं. माइक पर उन के प्रवचन की आवाज मेरे घर तक पहुंच रही थी. बीचबीच में ‘श्रीराम…श्रीराम…’ की धुन पर वे भजन भी गाती जा रही थीं. महिलाओं का समूह उन की आवाज में आवाज मिला रहा था.

अकसर दोपहर में महल्ले की औरतें हनुमान मंदिर में एकत्र होती थीं. मंदिर में भजन या प्रवचन की मंडली आई ही रहती थी. कई साध्वियां अपने प्रवचनों में गीता के श्लोकों का भी अर्थ समझाती रहती थीं.

मैं सरकारी नौकरी में होने की वजह से कभी भी दोपहर में मंदिर नहीं जा पाती थी. यहां तक कि जिस दिन पूरा भारत गणेशजी की मूर्ति को दूध पिला रहा था, उस दिन भी मैं ने मंदिर में पांव नहीं रखा था. उस दिन भी तो गांधीजी की यह बात पूरी तरह सच साबित हो गई थी कि भीड़ मूर्खों की होती है.

एक दिन मंदिर में कोई साध्वी आई हुई थीं. उन की आवाज में गजब का जादू था. मैं आंगन में ही कुरसी डाल उन का प्रवचन सुनने लगी. वे गीता के एक श्लोक का अर्थ समझा रही थीं…

‘इस प्रकार मनुष्य की शुद्ध चेतना उस के नित्य वैरी, इस काम से ढकी हुई है, जो सदा अतृप्त अग्नि के समान प्रचंड रहता है. मनुस्मृति में उल्लेख है कि कितना भी विषय भोग क्यों न किया जाए, पर काम की तृप्ति नहीं होती.’

थोड़ी देर बाद प्रवचन समाप्त हो गया और साध्वीजी वातानुकूलित कार में बैठ कर चली गईं.

दूसरे दिन घर के काम निबटा, मैं बैठी ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी, मन में आया कि कहला दूं कि घर पर नहीं हूं. पर न जाने क्यों, दूसरी घंटी पर मैं ने खुद ही दरवाजा खोल दिया.

बाहर एक खूबसूरत युवती और मेरे महल्ले की 2 महिलाएं नजर आईं. उस खूबसूरत लड़की पर मेरी निगाहें टिकी की टिकी रह गईं, लंबे कद और इकहरे बदन की वह लड़की गेरुए रंग की साड़ी पहने हुए थी.

उस ने मोहक आवाज में पूछा, ‘‘आप मंदिर नहीं आतीं, प्रवचन सुनने?’’

मैं ने सोचा, यह बात उसे मेरी पड़ोसिन ने ही बताई होगी, वरना उसे कैसे पता चलता.

मैं ने कहा, ‘‘मेरा घर ही मंदिर है. सारा दिन घर के लोगों के प्रवचनों में ही उलझी रहती हूं. नौकरी, घर, बच्चे, मेरे पति… अभी तो इन्हीं से फुरसत नहीं मिलती. दरअसल, मेरा कर्मयोग तो यही है.’’

वह बोली, ‘‘समय निकालिए, कभी अकेले में बैठ कर सोचिए कि आप ने प्रभु की भक्ति के लिए कितना समय दिया है क्योंकि प्रभु के नाम के सिवा आप के साथ कुछ नहीं जाएगा.’’

मैं ने कहा, ‘‘साध्वीजी, मैं तो साधारण गृहस्थ जीवनयापन कर रही हूं क्योंकि मुझे बचपन से ही सृष्टि के इसी नियम के बारे में सिखाया गया है.’’

मालूम नहीं, साध्वी को मेरी बातें अच्छी लगीं या नहीं, वे मेरे साथ चलतेचलते बैठक में आ कर सोफे पर बैठ गईं.

तभी एक महिला ने मुझ से कहा, ‘‘साध्वीजी के चरण स्पर्श कीजिए और मंदिरनिर्माण के लिए कुछ धन भी दीजिए. आप का समय अच्छा है कि साध्वी माला देवी स्वयं आप के घर आई हैं. इन के दर्शनों से तो आप का जीवन बदल जाएगा.’’

मुझे उस की बात बड़ी बेतुकी लगी. मैं ने साध्वी के पैर नहीं छुए क्योंकि सिवा अपने प्रियजनों और गुरुजनों के मैं ने किसी के पांव नहीं छुए थे.

धर्म के नाम पर चलाए गए हथकंडों से मैं भलीभांति परिचित थी. इस से पहले कि साध्वी मुझ से कुछ पूछतीं, मैं ने ही उन से सवाल किया, ‘‘आप ने संन्यास क्यों और कब लिया?’’

साध्वी ने शायद ऐसे प्रश्न की कभी आशा नहीं की थी. वे तो सिर्फ बोलती थीं और लोग उन्हें सुना करते थे. इसलिए मेरे प्रश्न के उत्तर में वे खामोश रहीं, साथ आई महिलाओं में से एक ने कहा, ‘‘साध्वीजी ने 15 बरस की उम्र में संन्यास ले लिया था.’’

‘‘अब इन की उम्र क्या होगी?’’ मेरी जिज्ञासा बराबर बनी हुई थी, इसीलिए मैं ने दूसरा सवाल किया था.

‘‘साध्वीजी अभी कुल 22 बरस की हैं,’’ दूसरी महिला ने प्रवचन देने के अंदाज में कहा.

मैं सोच में पड़ गई कि भला 15 बरस की उम्र में साध्वी बनने का क्या प्रयोजन हो सकता है? मन को ढेरों सवालों ने घेर लिया कि जैसे, इन के साथ कोई अमानुषिक कृत्य तो नहीं हुआ, जिस से इन्हें समाज से घृणा हो गई या धर्म के ठेकेदारों का कोई प्रपंच तो नहीं.

कुछ माह पहले ही हमारे स्कूल की एक सिस्टर (नन) ने विवाह कर लिया था. कुछ सालों में उस का साध्वी होने का मोहभंग हो गया था और वह गृहस्थ हो गई थी. एक जैन साध्वी का एक दूध वाले के साथ भाग जाने का स्कैंडल मैं ने अखबारों में पढ़ा था.

‘जिंदगी के अनुभवों से अनजान इन नादान लड़कियों के दिलोदिमाग में संन्यास की बात कौन भरता है?’ मैं अभी यह सोच ही रही थी कि साध्वी उठ खड़ी हुईं, उन्होंने मुझ से दानस्वरूप कुछ राशि देने के लिए कहा.

मैं ने 100 रुपए दे दिए.

थोड़ी सी राशि देख कर, साध्वी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम में तो इतनी सामर्थ्य है, चाहे तो अकेले मंदिर बनवा सकती हो.’’

मैं ने कहा, ‘‘साध्वीजी, मैं नौकरीपेशा हूं. मेरी और मेरे पति की कमाई से यह घर चलता है. मुझे अपने बेटे का दाखिला इंजीनियरिंग कालेज में करवाना है. वहां मुझे 3 लाख रुपए देने हैं. यह प्रतियोगिता का जमाना है. यदि मेरा बेटा कुछ न कर पाया तो गंदी राजनीति में चला जाएगा और धर्म के नाम पर मंदिर, मसजिदों की ईंटें बजाता रहेगा.’’

तभी मेरी सहेली का बेटा उमेश घर में दाखिल हुआ. साध्वी को देखते ही उस ने उन के चरणों का स्पर्श किया.

साध्वी के जाने के बाद मैं ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘बेशर्म, उन के पैर क्यों छू रहा था?’’

‘‘अरे मौसी, तुम पैरों की बात करती हो, मेरा बस चलता तो मैं उस का…अच्छा, एक बात बताओ, जब भक्त इन साध्वियों के पैर छूते होंगे तो इन्हें मर्दाना स्पर्श से कोई झनझनाहट नहीं होती होगी?’’

मैं उमेश की बात का क्या जवाब देती, सच ही तो कह रहा था. जब मेरे पति ने पहली बार मेरा स्पर्श किया था तो मैं कैसी छुईमुई हो गई थी. फिर इन साध्वियों को तो हर आम और खास के बीच में प्रवचन देना होता है. अपने भाषणों से तो ये बड़ेबड़े नेताओं के सिंहासन हिला देती हैं, सारे राजनीतिक हथकंडे इन्हें आते हैं. भीड़ के साथ चलती हैं तो क्या मर्दाना स्पर्श नहीं होता होगा? मैं उमेश की बात पर बहुत देर तक बैठी सोचती रही.

रात को कोई 8 बजे साध्वी माला देवी का फोन आया. वे मुझ से मिलना चाहती थीं. मैं उन के चक्कर में फंसना नहीं चाहती थी, इसलिए बहाना बना, टाल दिया. पर कोई आधे घंटे बाद वे मेरे घर पर आ गईं, उन्हीं गेरुए वस्त्रों में. उन का शांत चेहरा मुझे बरबस उन की तरफ खींच रहा था. सोफे पर बैठते ही उन्होंने उच्च स्वर में रामराम का आलाप छेड़ा, फिर कहने लगीं, ‘‘कितनी व्यस्त हो सांसारिक झमेलों में… क्या इन्हें छोड़ कर संन्यास लेने का मन नहीं होता?’’

मैं ने कहा, ‘‘माला देवी, बिलकुल नहीं, आप तो संसार से डर कर भागी हैं, लेकिन मैं जीवन को जीना चाहती हूं. आप के लिए जीवन खौफ है, पर मेरे लिए आनंद है. संसार के सारे नियम भी प्रकृति के ही बनाए हुए हैं. बच्चे के जन्म से ले कर मृत्यु, दुख, आनंद, पीड़ा, माया, क्रोध…यह सब तो संसार में होता रहेगा, छोटी सी उम्र में ही जिंदगी से घबरा गईं, संन्यास ले लिया… दुनिया इतनी बुरी तो नहीं. मेरी समझ में आप अज्ञानवश या किसी के छल या बहकावे के कारण साध्वी बनी हैं?’’

वे कुछ देर खामोशी रहीं. जो हमेशा प्रवचन देती थीं, अब मूक श्रोता बन गई थीं. वे समझ गई थीं कि उन के सामने बैठी औरत उन भेड़ों की तरह नहीं है जो सिर नीचा किए हुए अगली भेड़ों के साथ चलती हैं और खाई में गिर जाती हैं.

मेरे भीतर जैसे एक तूफान सा उठ रहा था. मैं साध्वी को जाने क्याक्या कहती चली गई. मैं ने उन से पूछा, ‘‘सच कहना, यह जो आप साध्वी बनने का नाटक कर रही हैं, क्या आप सच में भीतर से साध्वी हो गई हैं? क्या मन कभी बेलगाम घोड़े की तरह नहीं दौड़ता? क्या कभी इच्छा नहीं होती कि आप का भी कोई अपना घर हो, पति हो, बच्चे हों, क्या इस सब के लिए आप का मन अंदर से लालायित नहीं होता?’’

मेरी बातों का जाने क्या असर हुआ कि साध्वी रोने लगीं. मैं ने भीतर से पानी ला कर उन्हें पीने को दिया, जब वे कुछ संभलीं तो कहने लगीं, ‘‘कितनी पागल है यह दुनिया…साध्वी के प्रवचन सुनने के लिए घर छोड़ कर आती है और अपने भीतर को कभी नहीं खोज पाती. तुम पहली महिला हो, जिस ने गृहस्थ हो कर कर्मयोग का संन्यास लिया है, बाहर की दुनिया तो छलावा है, ढोंग है. सच, मेरे प्रवचन तो उन लोगों के लिए होते हैं, जो घरों से सताए हुए होते हैं या जो बहुत धन कमा लेने के बाद शांति की तलाश में निकलते हैं. इन नवधनाढ्य परिवारों में ही हमारा जादू चलता है. तुम ने तो देखा होगा, हमारी संतमंडली तो रुकती ही धनाढ्य परिवारों में है. लेकिन तुम तो मुझ से भी बड़ी साध्वी हो, तुम्हारे प्रवचनों में सचाई है क्योंकि तुम्हारा धर्म तुम्हारे आंगन तक ही सीमित है.’’

एकाएक जाने क्या हुआ, साध्वी ने मेरे चरणों को स्पर्श करते हुए कहा, ‘‘मैं लोगों को संन्यास लेने की शिक्षा देती हूं, पर तुम से अपने दिल की बात कह रही हूं, मैं संसारी होना चाहती हूं.’’

उन की यह बात सुन कर मैं सुखद आश्चर्य में डूब गई. Hindi Story

Story In Hindi: आखिरी योजना – लालू को कौन से काम में महारथ हासिल थी

Story In Hindi: कानून के रखवालों और जुर्म की दुनिया में लाल मोहम्मद को लालू के नाम से जाना जाता था. लालू एक फ्रौड, ब्लैकमेलर और लुटेरा था. वह पैसों के लिए हर तरह के गैरकानूनी काम करता था. लूटमार और धोखेबाजी उस के मुख्य काम थे. लेकिन वह किसी भी हालत में खूनखराबा नहीं करता था. वह एक सोचीसमझी योजन के तहत काम करता था, जिस से उसे किसी तरह का कोई खतरा नहीं उठाना पड़ता था.

यही वजह थी कि वह कभी पकड़ा नहीं गया था. वह कोई भी काम शम्सुद्दीन उर्फ शम्सू के साथ मिल कर करता था. जहां भी उसे खतरा महसूस होता था, वह शम्सू को आगे कर देता था. क्योंकि वह हर वक्त खतरा मोल लेने को तैयार रहता था. इसीलिए मिले माल में वह आधे से ज्यादा हिस्सा लेता था.

लालू योजना बनाने में होशियार था. वह शिकार को तलाश कर बढि़या योजना बनाता था. उस के बाद दोनों मिल कर उस योजना पर अमल करते थे.

लालू का काम बढि़या चल रहा था. एक लूट में 2 दिन पहले ही उस के हाथ एक लाख 20 हजार रुपए लगे थे. लेकिन इस में उसे 40 हजार रुपए ही मिले थे. 80 हजार रुपए शम्सू ने ले लिए थे. इस की वजह यह थी कि लालू ने सिर्फ लूट की योजना बनाई थी बाकी का सारा काम शम्सू ने अकेले किया था. ज्यादातर कामों में लालू परदे के पीछे ही रहता था.

इस लूट के बाद लालू अपने कमरे में लेटा शम्सू के बारे में सोच रहा था. पिछले कई महीनों से वह काफी परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर इस तरह वह कब तक शिकार खोज कर योजना बनाता रहेगा. सारी तैयारी वह करता है, जबकि हिस्सा ज्यादा शम्सू ले लेता है, ऐसा कर के कहीं वह गलती तो नहीं कर रहा?

इस लूट को ले कर वह काफी परेशान था. क्योंकि एक लाख 20 हजार में उसे सिर्फ 40 हजार रुपए ही मिले थे. शम्सू ने 80 हजार रुपए रख लिए थे. वह इस काम से ऊब गया था, लेकिन उस के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह ईमानदारी वाला कोई दूसरा काम कर लेता.

इस धंधे में खतरे बहुत थे. पुलिस आए दिन किसी न किसी मामले को ले कर परेशान करती रहती थी. यह अलग बात थी कि सबूत न होने की वजह से वह बच जाता था. वह एक रेस्टोरेंट खोलना चाहता था. लेकिन उस के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह अपना रेस्टोरेंट खोल लेता. पर शम्सू के पास काफी पैसे थे. अगर उस के पैसे उसे मिल जाते तो वह आसानी से रेस्टोरेंट खोल सकता था.

लालू का सोचना था कि अगर वह एक बार हिम्मत कर ले तो जिंदगी की गाड़ी बड़े आाम से चलने लगेगी. इस के बाद उसे कोई खतरा भी नहीं उठाना पड़ेगा. लेकिन इस के लिए शम्सू को रास्ते से हटाना होगा, तभी उसे उस के पैसे मिल सकेंगे. आखिर उस ने शम्सू को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. यह उस की आखिरी योजना थी, जिस में वह पहली और आखिरी बार हत्या करने जा रहा था.

अगले ही दिन लालू सुपर अपार्टमेंट जा पहुंचा, जहां मिस आलिया रहती थीं. लालू आलिया के यहां अकसर आता रहता था. कभीकभार शम्सू भी वहां पहुंच जाता था. लालू को देख कर आलिया ने दिलफरेबी अंदाज में उस का स्वागत किया. वह लालू और शम्सू के धंधे से पूरी तरह वाकिफ थी. वह लालू के लिए जाम और नमकीन ला कर उस के पास बैठ गई. फिर उस का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘इस बार तो बहुत दिनों बाद आए हो.’’

‘‘बहुत दिनों बाद आया हूं, लेकिन खुश कर के जाऊंगा.’’ लालू ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अच्छा!’’ मिस आलिया की आंखें चमक उठीं.

‘‘अगर तुम्हें बिना कुछ किए 20 हजार रुपए मिल जाएं तो..?’’ लालू ने कहा.

आलिया ने होंठों पर जबान फेर कर कहा, ‘‘खयाल तो बहुत हसीन है, मगर इस की वजह…?’’

‘‘कोई खास नहीं?’’ लालू ने कहा, ‘‘मैं कल रात यहां आ रहा हूं. मैं चाहता हूं कि ऐसा जाहिर हो कि मैं यहां तुम्हारे साथ इसी कमरे में था. यही कोई रात 8 बजे से रात 2 बजे तक.’’

‘‘बहुत खूब.’’ आलिया ने अपनी भौंहें उचकाते हुए अर्थपूर्ण अंदाज में कहा, ‘‘इस के अलावा…’’

‘‘इस के अलावा दूसरा छोटा सा काम यह है कि…’’

लालू अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि आलिया ने कहा, ‘‘तुम रात 8 बजे से रात 2 बजे के बीच कहां और क्या करने जा रहे हो?’’

‘‘दूसरा काम यही हे कि तुम इस बारे में कोई सवाल नहीं करोगी. लेकिन तुम्हारे लिए कोई खतरा नहीं है. कई गवाह होंगे, जो यह साबित कर देंगे कि इस दौरान मैं ने तुम्हारे यहां तुम्हारे साथ समय बिताया है. लेकिन सब से बड़ी गवाह तुम होगी. संभव है, इस की नौबत ही न आए. ओके.’’

‘‘बात तो ठीक लगती है,’’ मिस आलिया ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘लेकिन रुपए कब मिलेंगे?’’

‘‘10 हजार अभी और 10 हजार काम के बाद.’’ लालू ने कहा.

‘‘इतने से काम के लिए 20 हजार रुपए… कोई बड़ा हाथ मारने जा रहे हो क्या?’’

‘‘कोई सवाल नहीं, मैं पहले ही कह चुका हूं.’’

‘‘ठीक है, मैं तैयार हूं. निकालो 10 हजार रुपए.’’

‘‘तुम अपनी तरफ से भी 1-2 गवाह बना लो तो अच्छी बात है. जैसे तुम किसी बहाने से अपनी किसी सहेली के कान में यह बात डाल दो कि कल रात तुम ने मुझे कंपनी दी थी.’’

‘‘तुम यह तीसरा काम बता रहे हो.’’

‘‘हां, लेकिन इस तरह तुम खुद को अधिक सुरक्षित अनुभव करोगी. चलो, बोनस के रूप में 5 हजार अलग से.’’

अगली सुबह लालू ने जो कपडे़ पहने थे वे दूसरों से अलग नजर आ रहे थे. खाकी रंग की डर्बी कैप भी उस ने सिर पर रख ली थी. खुद को अलग दिखाना उस की योजना का एक हिस्सा था, जिस से देखने वालों को यह बात याद रहे.

घटनास्थल से काफी दूर दिखाई देना अपराधी के लिए लाभदायक साबित होता है. योजना बनाने वाला तो वह था ही, अपराध करने पहली बार जा रह था. अपनी योजना के तहत लालू गेलार्ड होटल पहुंचा. उस ने होटल गेलार्ड में एक कमरा बुक कराया और वहां दोपहर का खाना खा कर बाहर निकल गया.

शाम को 4 बजे वह वापस लौटा और लौबी से गुजरता हुआ औफिस डेस्क पर रूम क्लर्क के पास जा कर बोला, ‘‘हैदराबाद से एक फोन आने वाला है. इस फोन के अलावा जो भी फोन आए, कह देना कि मैं ने होटल छोड़ दिया है. लेकिन हैदराबाद से फोन आए तो उसे बताना कि मैं मिस आलिया के साथ उस के अपार्टमेंट में हूं.’’

उस ने बेतकल्लुफी से रूम क्लर्क को आंख मारी और सौ रुपए का एक नोट उस के आगे खिसकाते हुए बोला, ‘‘अच्छा होगा कि मेरी बात लिख लो, कहीं भूल न जाना.’’

‘‘भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता.’’ रूम क्लर्क ने अपनी बत्तीसी दिखाते हुए कहा.

घंटे भर बाद लालू फूलों की दुकान पर था. वहां से उस ने लाल गुलाबों का गुलदस्ता बनवाया.

‘‘एक सुंदर कार्ड फूलों के साथ लगा दीजिए और उस पर लिखिए-मिस आलिया की मोहब्बत के लिए. हस्ताक्षर की जगह मेरा नाम लाल मोहम्मद लिख दें.’’ लालू ने उस में अपना पूरा पता भी लिखवाया.

वहां से संतुष्ट हो कर लालू ने टैक्सी पकड़ी. टैक्सी ड्राइवर ने उस के विचित्र कपड़ों और कैप पर नजर डाली. उस के बाद फूलों की तरफ देखा. लालू रोमांटिक स्वर में बोला, ‘‘ये फूल मेरी प्रेमिका मिस आलिया के लिए हैं. तुम ने सुपर अपार्टमेंट की इमारत देखी है न?’’

‘‘जी सर.’’

‘‘बस, वहीं ले चलो. मेरी प्रेमिका वहीं रहती है.’’ लालू ने कहा.

टैक्सी ड्राइवर ने मुसकराते हुए टैक्सी आगे बढ़ा दी. टैक्सी सुपर अपार्टमेंट पहुंची तो किराए के अलावा लालू ने टैक्सी ड्राइवर को सौ रुपए टिप में भी दिए. ताकि वह उसे याद रखे. लालू के पैसे खर्च तो हो रहे थे, लेकिन सौदा बुरा नहीं था. रूम क्लर्क, फूल वाला और टैक्सी ड्राइवर… अब तक उस ने घटनास्थल से दूर अपनी उपस्थिति के 3 गवाह बना लिए थे.

थोड़ी देर बाद लालू मिस आलिया को महकते गुलाबों का गुलदस्ता पेश करते हुए बोला, ‘‘मेरी आलिया के लिए.’’

‘‘ओह लालू, यह मेरे लिए?’’ आलिया ने पूछा.

‘‘हां, इस में कोई शक.’’

‘‘ओह लालू, सो स्वीट यू.’’

इस के बाद खानेपीने का दौर चला. लालू ने अपनी ब्रांड के कई सिगरेट पिए और उन के टोटे इधरउधर डाल दिए. उस ने अपनी जेबी कंघी बाथरूम में छोड़ दी. कई जगहों पर लालू से स्वयं अपनी अंगुलियों के निशान छाप दिए. यह सब देख कर आलिया मुसकराते हुए बोली, ‘‘तुम पहले से ज्यादा होशियार हो गए हो.’’

‘‘वक्त आदमी को सब कुछ सिखा देता है.’’ लालू ने कहा, ‘‘और अब ध्यान से सुनो, तुम्हें सिर्फ यह अदाकारी करनी है कि तुम मेरे साथ हो. इस के अलावा किसी से कुछ नहीं कहना. नीचे गार्ड ने देख लिया है कि मैं तुम्हारे पास आया हूं. मैं ने उस से कुछ अर्थपूर्ण बातें भी की थीं. अब मैं खिड़की के रास्ते फायर एस्केप के द्वारा जा रहा हूं. मैं ने अपनी कार यहां से थोड़ी दूरी पर दोपहर में ही खड़ी कर दी थी. अब मैं रात 2 बजे इसी रास्ते से अंदर आऊंगा. खिड़की खुली रखना.’’

डेढ़ घंटे बाद लालू शम्सू के फ्लैट में बैठा था. उस ने वहां की किसी भी चीज को हाथ नहीं लगाया. उस ने खानेपीने से भी इनकार कर दिया था. इस से क्रौकरी पर उस की अंगुलियों के निशान पड़ सकते थे. शम्सू लालू को उस समय देख कर हैरान था. लेकिन जब लालू ने यह कहा कि वह अगले ‘एक्शन’ के लिए योजना बना कर आया है तो शम्सू सामान्य हो गया. उस ने कहा कि उस की हर योजना कारगर होती है तो लालू ने कहा, ‘‘हां, यह बात तो है. चलो, इसी बात पर मुझे 5 हजार रुपए दे दो. कल मैं बैंक से निकाल कर तुम्हें दे दूंगा.’’

‘‘ओके बौस.’’ शम्सू एक छोटी अलमारी की तरफ बढ़ा. लालू को पता था कि शम्सू अपने रुपए कहां रखता है. शम्सू ने अलमारी खोली. दाईं ओर कपड़ों के पीछे एक गुप्त लौकरनुमा खाना था. उस में ढेर सारे नोट रखे थे. शम्सू ने 5 हजार गिन कर अलग किए.

इधर लालू दबेपांव उठा. उस के हाथ में रिवौल्वर था. इस से पहले कि रुपए ले कर शम्सू पलटता, उस के सिर पर भयंकर विस्फोट हुआ. लालू ने फायर नहीं किया था, बल्कि रिवौल्वर का वजनी दस्ता उस के सिर पर जोरों से दे मारा था.

शम्सू की खोपड़ी चटक गई और खून का फव्वारा फूट पड़ा. लेकिन लालू ने खुद को खून के छींटों से बचाए रखा. शम्सू के जमीन पर गिरतेगिरते उस ने 5 वार उस के सिर पर कर दिए. शम्सू की बेनूर आंखें उस की मौत की घोषणा कर रही थीं. शीघ्र ही लालू रात के सन्नाटे में बाहर निकला. उस ने रिवौल्वर को थोड़ी दूर चल कर गंदे नाले में फेंक दिया.

इस के बाद फ्लैटों के पास बने स्विमिंग पूल के पानी से उस ने हाथमुंह तथा अपनी कमीज की आस्तीन धोई और आस्तीनें नीचे गिरा कर बटन लगा दिए. इस के बाद वह शम्सू के फ्लैट में दोबारा गया. उस ने अपने कपड़ों का बारीकी से निरीक्षण किया. फिर छोटी अलमारी का गुप्त लौकर खोल कर उस ने सारे रुपए निकाल लिए. रुपए निकालने और गुप्त लौकर को खोलने से पहले उस ने दस्ताने पहन लिए थे. रुपयों को जेबों में भरने के बाद वह वहां से चल पड़ा. रास्ते में उस ने दस्तानों में बडे़ पत्थर डाल कर उन्हें भी गंदे नाले में उछाल दिया.

लालू अपनी कार में बैठा अपने दिलोदिमाग को सामान्य कर रहा था. यह उस का पहला कत्ल था, इसलिए उस ने सभी पहलुओं पर गौर किया कि कहीं कोई गलती तो नहीं रह गई. रुपयों को उस ने एक सुनसान स्थान पर गड्ढा खोद कर गाड़ दिया था, जहां सरकारी पोल लगा था. मगर बल्ब नहीं जल रहा था.

2 बजे से पहले वह मिस आलिया के अपार्टमेंट से कुछ दूरी पर ही था कि पुलिस की गश्ती टीम उस की कार के पीछे लग गई. उसे लगा कि शायद कार को तेज रफ्तार से चलाने के कारण पुलिस वाले उस के पीछे लग गए हैं. लालू शांत भाव से कार को तेजी से चलाता रहा.

लेकिन पुलिस की गश्ती टीम ने अपने वैन लालू की कार से आगे निकाल कर रोक दी. लालू ने सोचा कि वह अच्छे शहरी की तरह चालान भर कर अपने रास्ते चला जाएगा. लेकिन यहां तो कुछ अलग ही बात थी.

‘‘चलिए जनाब, नीचे उतर कर हमारी वैन में बैठ जाइए. हम आप को बहुत देर से ढूंढ रहे थे.’’ एक पुलिस वाले ने कहा, ‘‘आप को दारोगाजी ने बुलाया है.’’

‘‘यह क्या बकवास है? ऐसा क्या कर दिया है मैं ने जो मुझे पुलिस स्टेशन पर बुलाया गया है.’’ लालू ने कहा.

थोड़ी देर बाद लालू थाने में दारोगा के सामने खड़ा था. उस ने पूछा, ‘‘मुझे यहां क्यों लाया गया है?’’

‘‘तुम रात 10 बजे के बाद कहां थे?’’ दारोगा ने घूरते हुए पूछा.

‘‘मैं अपनी प्रेमिका मिस आलिया से मिलने गया था. लेकिन बात क्या है?’’ लालू ने सब कुछ जानते हुए पूछा.

‘‘तुम ठीक कह रहे हो, लेकिन यह कत्ल का मामला है, जिस में तुम पूरी तरह फंस चुके हो.’’ दारोगा ने कहा.

‘‘कत्ल… किस का कत्ल? मैं ने तो किसी का कत्ल नहीं किया. तुम मुझ पर झूठा आरोप नहीं लगा सकते. अगर रात में किसी का कत्ल हुआ है तो तुम जानते हो कि मैं कहां था. मैं गवाह भी पेश कर सकता हूं.’’ लालू नाराज हो कर बोला.

‘‘गवाह मुझे सब मिल गए हैं, गवाहों की वजह से ही तो हमें कोई परेशानी नहीं हुई.’’ दारोगा ने कहा, ‘‘हम तुम्हें मिस आलिया के कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार कर रहे हैं. रात में आलिया का कत्ल कर के उस का अपार्टमेंट लूटा गया है.’’

यह सुन कर लालू के दिमाग में बम जैसा धमाका हुआ और उस की निगाहों के सामने अंधेरा फैल गया. Story In Hindi

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