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तीन तलाक प्रधानमंत्री से तीन सवाल!

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी और उनकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए 30 जुलाई 2019 का दिन नि:संदेह ऐतिहासिक रहा. जो काम कभी नहीं हुआ, वह भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार ने अंततः करके दिखा दिया है. तीन तलाक के नए कानून को लोकसभा के पश्चात राज्यसभा में भी पास कर दिया गया है.

मुस्लिम यह मानते हैं कि शरीयत उनके लिए खुदा का पैगाम है. और सैकड़ों सालों से मुस्लिम समाज शरीयत के मुताबिक अपना जीवन यापन करते चले आ रहे हैं . मुसलमान  दूसरा कोई कानून नहीं मानते. यही वजह है कि कुछ खूबियों, खामियों के साथ मुस्लिम जगत अपना आम परिवारिक, सामाजिक जीवन अपने प्राचीन विनियमों से संचालित करते रहे  हैं. भारत-पाक विभाजन के पश्चात आजाद हिंदुस्तान में मुस्लिमों को अपने कानूनों के साथ स्वच्छंद और शांति से जीने का माहौल भारत सरकार ने दिया . मगर अब गंगा जमुनी तहजीब का देश कहे जाने वाले भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार है जो इतिहास बनाने में यकीन करती है और प्रधानमंत्री ने कहा भी तीन तलाक पास हो गया आज ” ऐतिहासिक” दिन है. राज्यसभा में 84 मतों के मुकाबले 99 मतों से यह कानून पास हो गया.

तीन तलाक मोदी सरकार का एक बहुचर्चित और वृद विवादित मसला रहा है आज हम इस रिपोर्ट में कुछ नए तथ्यों पर प्रकाश डालने और मोदी सरकार से जवाब की अपेक्षा रखते हैं.

मुस्लिम थाट पर करारा प्रहार

भाजपा मूलतः हिंदुओं की पार्टी कहीं और मानी जाती है और है और है भी इसमें स्वयं भाजपा और उसके नेताओं को कोई गुरेज नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी 2014 में अपनी सरकार के शपथ के पश्चात आज तक अपने हिंदू समाज की कुरीतियों, खामियों, कमियों पर कौन सा कानून बनाया है ?

यह पहला प्रश्न है. क्या हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के पास इसका कोई जवाब है. यह सरकार जिस शिद्दत से मुस्लिम महिलाओं के लिए चिंतित है क्या हिंदू महिलाओं के प्रति चिंतित है ? यह यक्ष प्रश्न है जिस पर आज चिंतन का वक्त है लंबी लंबी डींगे हाकने और स्पीच देने से कुछ नहीं होता । सरकार जो मूलतः हिंदू वोट से निर्वाचित होकर शासन कर रही है हिंदू महिलाओं के दु:ख पीड़ा से कोई वास्ता नहीं रखना चाहती मगर मुस्लिमों और मुस्लिम महिलाओं के प्रति क्या हद से ज्यादा आगे नहीं बढ़ रही है.

तीन तलाक से त्रासदी है. पीड़ा है. मगर ऐसा कौन सा कानून विधान और समाज नहीं है जहां यह नहीं होगा.

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आम मुसलमान खुश नहीं है

तीन तलाक पर दूसरा प्रश्न है क्या तीन तलाक कानून से आम मुस्लिम खुश है .क्या ऐसा नहीं लगता की यह सारी कवायद बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना सृदश्य नहीं जान पड़ती.

समाज, सरकार और कानून के जानकार जानते हैं कि कानून वही सफल होते हैं जिन्हें लोग आम लोग समाज के हित में मानकर खुशी-खुशी स्वीकार करें. कानून आप जवाबदारी किसी कौम पर लाद नहीं सकते. हमारा देश महात्मा गांधी का देश है, नरेंद्र मोदी, अमित शाह स्वयं गांधी जी के गृह प्रदेश से हैं और गांधीजी के बड़े प्रशंसक भी हैं महात्मा गांधी की 150वीं जयंती की बातें जितना कांग्रेस नहीं करती आप करते हैं. तो गांधी जी ने क्या किया था ? क्या कहा था ? उन्होंने कहा था- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है और देखिए उन्होंने जो कानून जन हित और समाज हित का महसूस नहीं किया उसका प्रखर विरोध किया और उस कानून के ड्राफ्ट को आग लगा लाठियां खायी .क्या मुस्लिम समाज से भी आप यही अपेक्षा रखते हैं ? मुसलमान कौम के दिग्गज विचारक, आपके साथ तीन तलाक मसले पर क्यों नहीं है ?

उद्देश्य सिर्फ चोटिल करना क्यों ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तीसरा अंतिम सवाल है,-आपकी सरकार सैकड़ों सालों से भारत देश की माटी में जीने -मरने और समृद्धि मैं भागीदार मुस्लिम कौम को क्या चोटिल करना उद्देश्य नहीं है .

हम अपने पड़ोसी की खुशी से खुश नहीं होते .यह हमारी फितरत है. हम अपने पड़ोसी से प्यार नहीं करते. मन ही मन नफरत करते हैं. आम जन जीवन में यही सत्य है. जब हमारी सोच छोटी होगी तो हम पड़ोसी को देख जलेंगे भुनेगें. आज देश मे क्या यही नहीं हो रहा है  हम अपना घर देखें… हिंदू महिलाओं की दुर्दशा को क्यों नजरअंदाज किया गया… सबसे पहले हम अपना घर सुधारें और जब पड़ोसी आकर साफ दिल से अपनी बात कहें तब पड़ोसी की नब्ज पर हाथ रखा जाना चाहिए.

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बहीखाता युग में बजट

भारत सरकार का नया बजट अपनेआप में कुछ नया नहीं कहता. भगवा आश्वासनों की तरह इस में भी ‘वत्स तेरा भला होगा, तुझे ऊपर वाला सुखी रखेगा, जप तप, दान, पुण्य करो, भगवान (सरकार) खुश होगा’ जैसे वाक्यों को प्रवचनकर्ता निर्मला सीतारमन (वित्त मंत्री) ने संसद में जम कर कहे और भक्तों (भाजपाई सांसदों) ने सिर झुमाझुमा कर तालियां बजाईं.

हर धर्म जब भक्तों को आकर्षित करता है तो अमीरों को 2-4 गालियां अवश्य सुनाता है. निर्मला सीतारमन ने भी अमीरों पर अतिरिक्त कर लगाया है जिस से 13 हजार करोड़ रुपए की आय होने की उम्मीद है.

5 वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन हो जाएगी जैसे वाक्य बोले गए जो असल में निरर्थक हैं क्योंकि असल में इन ट्रिलियनों (जो भी इस का मतलब हो) से गरीबों का पेट नहीं भरेगा, बेरोजगारों को रोजी नहीं मिलेगी, किसानों के खेतों में अतिरिक्त फसल पैदा नहीं होगी.

सरकारी बहीखाता असल में पुरानी चाल पर है, कुछ कर लगा दिए गए, कुछ कम कर दिए गए. आम बजट का हर कदम मुंह में जीरे के समान है. एक जीरा अगर दांतों में अड़ जाए तो घंटों तंग करता है. ऐसे बहुत से जीरे इस बजट में हैं जो किसी न किसी को परेशान करेंगे. राहत देने वाली कोई बात कहीं नहीं है.

देश की माली हालत अच्छी नहीं है. भाजपा हिंदुत्व के नाम पर जीत तो गई है पर जैसे पेशवाई युगों में सुखसमृद्धि नहीं आई थी वैसे ही इस युग में सरकारी बजट अनुष्ठान से देशवासियों का कोई कल्याण नहीं होगा.

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बहुमत से जीत कर सत्ता में आई भाजपा निश्चित है कि वह चाहे जो कदम उठा ले, कोई उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकता. कांग्रेस ही नहीं, दूसरे सभी विपक्षी दल लगभग कोमा में हैं और भाजपाई डाक्टर लगातार उन्हें कार्बन डाईऔक्साइड के सिलिंडर सप्लाई कर रहे हैं ताकि वे कोमा से बाहर निकल ही न पाएं.

बजट के बाद दोचार दिन वैसा ही होहल्ला मचा जैसा होने वाले कुंभों पर मचता है, फिर पुरानी दुर्दशा चालू हो गई. अब तो जय, यह जय, वह जय और जय बजट देवा बोलिए.

अफीमी मुहिम

भाजपा ने राष्ट्रवाद, देशभक्ति, जयश्रीराम, पूजापाठ की आड़ में देश की सब से बड़ी बीमारी जातिगत ऊंचनीच को छिपा कर चुनाव जीत ही नहीं लिया, बल्कि औरतों, गरीबों, पिछड़ों व निचलों को यह संदेश दे दिया कि वह बराबरी को कोई महत्त्व नहीं देती. ग्लोबल जैंडर गैप रिपोर्ट 2018 में भारत को 148वां स्थान मिला है जबकि पड़ोसी बंगलादेश 48वें स्थान पर है. वहीं, काफी पिछड़ा फिलीपींस 8वें स्थान पर है.

पूजापाठ की जो अफीम पिछले दशकों में देश को खिलाई गई है उस के खिलाफ न विचारक खड़े हुए, न संगठन बने और न राजनीतिक दलों ने इस संवेदनशील मामले को छुआ है. लोग पूजापाठ में अपना समय व पैसा बरबाद करें, यह एक हद तक उन की मरजी है, पर जब भगवा अंगोछा डाल कर वे सड़कों पर आ जाएं और साफ हवा को विषैली बनाने लगें, तो चिंता की बात है.

पूजापाठ अब निजी मामला नहीं है, सरकारी मामला है. हर सरकारी कार्यक्रम में दीप जला कर अग्निदेव की पूजा की जाती है. धार्मिक वैमनस्य को बढ़ाने वाले नाटक आनंदमठ के गीत वंदेमातरम को गाने पर मजबूर किया जा रहा है. स्कूलों, कालेजों का नाम देवीदेवताओं पर रखा जा रहा है.

अगर यह पागलपन क्रिकेट प्रेम या डाइट फ्रीक की तरह का होता तो बात दूसरी थी. यहां तो हरेक को जबरन इस पागलपन को अपनाने को कहा जा रहा है और इसे देशप्रेम के सिक्के की दूसरी तरफ का भाग घोषित कर दिया गया है.

पूजापाठ भी गैरबराबरी वाला है. सब धर्मों ने न केवल औरतों के साथ भेदभाव किया है बल्कि उन्होंने कमजोरों को ताकतवरों का गुलाम भी बनाया है. हर धर्म पुरातनवादी रहा है.

हर धर्म ने जनता का बड़ा पैसा सरकार के हाथों या खुद जनता के हाथों पूजा स्थलों पर बरबाद कराया है. हर धर्म ने अपने दुकानदारों को एक कल्पित के नाम पर अपार शक्तियां दी हैं. और इन दुकानदारों ने शक्तियों का दुरुपयोग अपने ही धर्म के लोगों को बांटने व दूसरे धर्म के लोगों को दुश्मन घोषित करने में किया है.

देश की समस्याएं तब तक समाप्त नहीं हो सकतीं जब तक औरतों, दलितों, पिछड़ों, गरीबों को बराबरी का एहसास न हो और वे देश की प्रगति में अपना हिस्सा बांटने का अवसर न पा सकें.

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस आदि पार्टियों के एजेंडों में बराबरी अब हाशिए के भी नीचे चली गई है. वे चुनाव इसीलिए हारीं क्योंकि वे धार्मिक चाल का भंडाफोड़ नहीं कर सकीं. नतीजा है कि चाहे धर्म जीत गया हो, लेकिन लोग हार गए हैं. जैंडर गैप, हैप्पी इंडैक्स आदि इस के सुबूत हैं.

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फिल्म समीक्षा: खानदानी शफाखाना

रेटिंगः डेढ़ स्टार

अवधिः दो घंटे 17 मिनट

निर्माताः भूषण कुमार, महावीर जैन, मृगदीप सिंह लांबा, दिव्या खोसला कुमार व कृष्ण कुमार

निर्देशकः शिल्पी दास गुप्ता

लेखकः गौतम मेहरा

संगीतकारः तनिश्क बागची, रोचक कोहली, बादशाह व पायल देव

कलाकारः सोनाक्षी सिन्हा, वरूण शर्मा, नादिरा बब्बर, प्रियांशु जोरा,  कुलभूषण खरबंदा, अन्नू कपूर, परेश आहुजा व अन्य.

औरतों के प्रति दकियानूसी सोच रखने वाले भारत देश में एक पंजाबी लड़की अपने मामा के पुश्तैनी सेक्स क्लीनिक ‘‘खानदानी शफाखाना’’ की बागडोर संभालने पर दकियानूसी समाज के पुरूष व औरतें किस तरह की बातें करती हैं, उन सब को लेकर यह एक हास्यप्रद नाटकीय फिल्म है. जिसमें सेक्स पर खुलकर बात होनी चाहिए और सेक्स शिक्षा की जरुरत को हास्य के साथ बहुत ही सतही तौर पर पेश किया गया है.

कहानीः

फिल्म ‘‘खानदानी शफाखाना’’ की शुरूआत होती है होशियारपुर में रहने वाली पंजाबी लड़की बबिता उर्फ बेबी बेदी से, जो कि पंजाब के एक शहर में एक दवा बनाने वाली कंपनी की एमआर यानी कि मेडिकल सेल्स रिप्रजेंटेटिव के रूप में कार्यरत है. पर वह एक हर्बल कंपनी की दवाएं भी अलग से बेच रही है. तो वहीं बेबी बेदी के मामा हकीम ताराचंद (कुलभूषण खरबंदा) मशहूर खानदानी शफाखाना के मालिक हैं और ‘‘हिंदुस्तानी यूनानी चिकित्सा व रिसर्च सेंटर’’ के सदस्य हैं. पर ताराचंद जिस तरह से सेक्स की कमजोरी दूर कर सफल वैवाहिक जीवन जीने की वकालत करते हुए टीवी पर विज्ञापन देतें हैं, उससे ‘‘हिंदुस्तानी चिकित्सा रिसर्च सेंटर’’ उनकी सदस्यता खत्म कर देता है. इधर ताराचंद की बहन श्रीमती बेदी (नादिरा बब्बर) यानी कि बेबी बेदी की मां भी अपने भाई से संबंध नहीं रखती. बेबी बेदी की छोटी बहन स्वीटी की शादी बेबी बेदी के चाचा ने कर्ज देकर किया था और अब वह अपनी रकम वापस पाने के लिए बेबी बेदी की कहीं भी शादी करवा देना चाहते हैं. बेबी बेदी के मना करने पर उनके चाचा तीन माह के अंदर रकम न देने पर घर पर कब्जा कर लेने की धमकी देते हैं. बेबी बेदी का भाई भूसित बेदी (वरूण शर्मा) बेरोजगार है, वह काम करना ही नही चाहता. बेबी बेदी की कमाई से ही घर का खर्च चल रहा है.

उधर ‘हिदुस्तान यूनानी चिकित्सा व रिसर्च सेंटर’द्वारा हकीम ताराचंद की सदस्यता खत्म करने के बावजूद ताराचंद अपना काम करते रहते हैं. वह खुद दवाएं तैयार करते हैं और सेक्स के तमाम मरीजों को ठीक करते रहते हैं. एक दिन सेक्स कमजोरी का शिकार इंसान ताराचंद की दवा से इस कदर ठीक हो जाता है कि वह अपनी पत्नी के अलावा कुछ दूसरी औरतों से भी सेक्स संबंध रखने लगता है, इससे पारिवारिक कलह बढ़ती है, तब वह शख्स इसके लिए ताराचंद को दोषी मानकर उनकी हत्या कर देता है. ताराचंद का वकील तागरा (अन्नू कपूर) ताराचंद की बहन श्रीमती बेदी, बेबी बेदी और भूसित बेदी को बुलाकर ताराचंद की वसीयत सौंपते हुए कहते हैं कि ताराचंद ने ‘खानदानी शफाखाना’ और उससे जुड़ी संपत्ति का वारिस बेबी बेदी को बनाया है. बेबी बेदी इसे उनकी मौत के छह माह बाद बेंच सकती हैं. पर छह माह तक उन्हें उनके सेक्स क्लीनिक ‘‘खानदानी शफाखाना’’ को चलाते हुए मरीजों को दवाएं देनी होंगी. इसी के चलते बेबी बेदी बिना मां को बताए अपने मामा ताराचंद की सेक्स क्लीनिक ‘‘खानदानी शफाखना’’ में जाना शुरू करती है. उसकी निगरानी के लिए वकील ने लेमन ब्वाय के रूप में मशहूर युवक (प्रियांशु जोरा) को लगा रखा है, जिसकी सेक्स क्लीनिक के नीचे अपनी दुकान है. मगर बेबी बेदी को परिवार व समाज से घृणा व विरोध का सामना करना पड़ता है. पता चलता है कि मरीज दवा के बदले पैसे नहीं, बल्कि घी वगैरह दे जाते हैं, जबकि बेबी बेदी को चाचा का कर्ज चुकाने के लिए पैसा चाहिए. एक दिन बेबी बेदी से मशहूर गायक गबरू घातक (बादशाह) संपर्क करके अपनी दवा मांगता है. जिसके बदले में वह मोटी रकम देता है, इसके बाद बेबी बेदी अपने मामा के लिखे हुए दवा के नुस्खे पढ़कर दवा बनाकर मरीजों इलाज करने लगती है. फिर ‘खानदानी शफाखाना’ के प्रचार के लिए कई तरीके अपनाती है. जब बेबी बेदी सेक्स, शीघ्रपतन, स्तंभन,  स्खलन, गुप्त रोग, सेक्स की कमजोरी पर खुलकर बात करती है और लोगों के बीच परचे बंटवाती है कि ‘बात करो’ तो स्वाभाविक तौर पर समाज में उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है, पर लेमन ब्वाय हर जगह उसके साथ खड़ा नजर आता है. अंततः ‘हिंदुस्तानी यूनानी चिकित्सा व रिसर्च सेंटर’  बेबी बेदी को अदालत में घसीटता है, जहां बोबी बेदी की जीत होती है. उसके बाद बेबी बेदी की मां व बहन स्वीटी भी खुश हो जाती हैं.

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लेखनः

पटकथा लेखन में तमाम कमियां हैं. लेखक ने ताराचंद के हत्यारे द्वारा टीवी पर आकर उनकी हत्या करने की बात कुबूल करता है. अब इस इंसान के साथ कानून ने क्या किया, कहीं कुछ नहीं कहा गया. फिल्म की पटकथा की कमजोरी के चलते फिल्म की गति बहुत धीमी है. फिल्म में असरदार हास्य संवादों का घोर अभाव है.

निर्देशनः

सहायक निर्देशक के रूप में कई फिल्में कर चुकी शिल्पी दास गुप्ता ने स्वतंत्र निर्देशक रूप में अपनी इस फिल्म में बोल्ड और समाज में टैबू समझे जाने वाले सेक्स जैसे मुद्दे को उठाया है. इसके लिए उन्होंने कौमेडी का सहारा लिया है, मगर फिल्म पर उनकी पकड़ कायम नहीं रहती. समाज को संदेश देने की उनकी कोशिश सराहनीय है, पर काश वह एक बेहतर फिल्म बना पाती. उनका निर्देशन बहुत कमजोर है. फिल्म में भावनाओं की भी कमी है. फिल्म कई बार हमें आयुष्मान खुराना की फिल्म ‘‘विक्की डोनर’’ की याद दिला जाती है. ‘खानदानी शफाखना’ सेक्स जैसे टब्बू पर बेहतरीन फिल्म बन सकती थी, पर अनुभव की कमी ने फिल्म को डुबो दिया. फिल्म की अति सुस्त गति के लिए निर्देशन काफी हद तक जिम्मेदार है. फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावहीन है.

अभिनयः

बेबी बेदी के किरदार में सोनाक्षी सिन्हा ने काफी मेहनत की है, पर वह कई जगह लड़खड़ा गयी हैं. अपरंपरागत किरदार में वह अद्भुत हैं, मगर लंबे समय तक वह दर्शकों को बांध नही पाती. इसके लिए कुछ हद तक लेखक व निर्देशक भी जिम्मेदार है, जिन्होंने बेबी बेदी का चरित्र सही ढंग से विकसित नहीं किया. अपने चाचा के सेक क्लीनिक को बेमन संभालने के बाद मरीजों के प्रति लापरवाही के कई दृश्य बहुत ही ज्यादा अवास्तविक नजर आते हैं. पंजाबन के तौर पर उनकी संवाद अदायगी गड़बड है. लेमन ब्वाय यानी कि बेदी के प्रेमी के छोटे किरदार में प्रियांशु जोरा बहुत क्यूट लगे हैं. रैप स्टार बादशाह ने पहली बार अभिनय किया है, वह अपने छोटे किरदार में प्रभाव छोड़ जाते हैं. वरूण शर्मा ने तो निराश ही किया है. उन्हें इस तरह के किरदार करने से बचना चाहिए. वैसे भी फिल्म में उनका किरदार जबरन जोड़ा हुआ नजर आता है. वकील के किरदार में अन्नू कपूर प्रभाव डाल जाते हैं.

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मसूरी: पहाड़ों की रानी

पहाड़ों की रानी कही जाने वाली मसूरी उत्तराखंड का बहुत ही खूबसूरत शहर है. यह राज्य की राजधानी देहरादून के मुख्य पर्यटन स्थलों में से एक है. गढ़वाल पर्वत श्रृंखला पर समुद्रतल से 2,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मसूरी में एक ओर विशाल हिमालय की चमचमाती बर्फीली शृंखलाओं का सुंदर नजारा दिखता है, वहीं दूसरी ओर इस घाटी में बिखरी प्रकृति की अद्भुत सुंदरता के दीदार होते हैं. मसूरी में देवदार के वृक्षों के घने जंगलों से घिरे जलप्रपात हैं जो पर्यटकों को खूब आकर्षित करते हैं.

आप ने तपती गरमी से बचने के लिए मसूरी की हसीन वादियों में जाने का प्लान बनाया हुआ है तो पहले वहां अपने ठहरने की व्यवस्था सुनिश्चित कर लें. मसूरी जाने पर अनेक होटल व रिजौर्ट्स मिलेंगे लेकिन यहां के मसूरी गेटवे रिजौर्ट की बात ही कुछ अलग है. उक्त रिजौर्ट में ठहर कर प्रकृति के भरपूर दर्शन किए जा सकते हैं. मसूरी की हसीन वादियों को देखते हुए आप मसूरी गेटवे को अनदेखा न करें क्योंकि इस रिजौर्ट में आप को वे सारी सुविधाएं मिल जाएंगी जिन की आप को जरूरत है. मसूरी गेटवे माल रोड से 400 मीटर की दूरी पर लाइबे्ररी बस स्टैंड के पास स्थित है. यहां पर पर्यटकों की सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा गया है. रिजौर्ट से आप प्राकृतिक घाटियों का नजारा देख सकते हैं. अन्य दर्शनीय स्थलों को देखना है तो इस रिजौर्ट से टैक्सी बुक कर लें और घूमने का आनंद उठाएं.

धनोल्टी

मसूरी से लगभग 25 किलोमीटर दूर मसूरी– टिहरी रोड पर स्थित शांत सी जगह है धनोल्टी. इस के मार्ग में चीड़ और देवदार के जंगलों के बीच बुरानखांडा से हिमालय का शानदार दृश्य देखा जा सकता है. यहां पर पर्यटकों के रहने के लिए बंगलों की भी व्यवस्था है. शहर की भीड़ से दूर यहां के पर्यटक बंगले में समय बिताना अपनेआप में एक अलग तरह का अनुभव होगा. आप चाहें तो मसूरी के फौरेस्ट हाउस में समय बिता सकते हैं. यमुना ब्रिज, चंबा व लखामंडल यहां के कुछ दर्शनीय स्थल हैं.

कैम्पटी फौल : ऊंचे पहाड़ों से गिरता यह जलप्रपात इस वादी का खास आकर्षण है. यह जगह मसूरी से 15 किलोमीटर दूर स्थित है. यहां उपलब्ध नौकायन और टौयट्रेन की सुविधा बच्चोंको खास लुभाती है. यही नहीं, यह स्थल पिकनिक मनाने के इच्छुक लोगों में बहुत लोकप्रिय है. यह झरना 5 अलगअलग धाराओं में बहता है. यह स्थल समुद्रतल से 4,500 फुट की ऊंचाई पर है.

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गन हिल : मसूरी की दूसरी सब से ऊंची चोटी तक पहुंचने का सफर आप रोपवे के जरिए कर सकते हैं. 20 मिनट का यह रोमांचकारी सफर आप जिंदगी भर नहीं भूलेंगे. यहां से आप विभिन्न शृंखलाओं, जैसे बदरपूंछ, श्रीकंठ, पीठवारा व गंगोतरी ग्रुप के अनुपम सौंदर्य को भी जी भर कर निहार सकते हैं. यहां से पूरा मसूरी शहर नजर आता है.

सर जौर्ज एवरेस्ट हाउस : मसूरी से 6 किलोमीटर की दूरी पर भारत के प्रथम सर्वेयर जनरल सर जौर्ज एवरेस्ट की ‘दि पार्क एस्टेट’ है. उन का आवास और कार्यालय यहीं था. यहां सड़कमार्ग से पहुंचा जा सकता है. विश्व की सब से ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट का नाम इन्हीं के नाम पर रखा गया है.

मसूरी झील : मसूरी-देहरादून रोड पर यह एक नया पिकनिक स्पौट है. यह मसूरी से लगभग 6 किलोमीटर दूर है. यहां पैडल बोट उपलब्ध रहती है. यहां से दून घाटी और आसपास के गांवों का सुंदर दृश्य दिखाई देता है.

वाम चेतना केंद्र : टिहरी बाईपास रोड पर लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर विकसित किया गया यह एक पिकनिक स्पौट है. इस के आसपास पार्क हैं जो देवदार के जंगलों और फूलों की झाडि़यों से घिरे हैं. यहां तक पैदल या टैक्सी से पहुंचा जा सकता है. पार्क में वन्यप्राणी, जैसे घुरार, हिमालयी मोर, मोनल आदि मुख्य आकर्षण हैं.

क्लाउड एंड : वर्ष 1838 में एक ब्रिटिश मेजर द्वारा बनवाया गया यह पुराना बंगला अब होटल में परिवर्तित हो चुका है. चारों तरफ घने जंगलों से घिरे इस बंगले से आप को बर्फ की चादर ओढ़े हिमालय पर्वतमाला व यमुना नदी का मनोरम दृश्य दिखाई देगा.

झड़ीपानी फौल : यह फौल मसूरी-झड़ीपानी रोड पर मसूरी से 8.5 किलोमीटर दूर स्थित है. पर्यटक झड़ीपानी तक 7 किलोमीटर की दूरी बस या कार द्वारा तय कर के यहां से 3 किलोमीटर दूरी को पैदल तय कर झरने तक पहुंच सकते हैं.

भट्टा फौल : यह फौल मसूरी-देहरादून रोड पर मसूरी से 7 किलोमीटर दूर स्थित है. पर्यटक बस या कार द्वारा यहां पहुंच कर आगे की 3 किलोमीटर दूरी पैदल तय कर के झरने तक पहुंच सकते हैं.

चाइल्डर्स लौज : लाल टिब्बा के निकट यह मसूरी की सब से ऊंची चोटी है. टूरिस्ट कार्यालय से यह 5 किलोमीटर दूर है. यहां तक घोड़े पर या पैदल पहुंचा जा सकता है. यहां से बर्फ के दृश्य देखना बहुत रोमांचक लगता है.

कैमल बैक रोड : 3 किलोमीटर लंबा यह रोड रिंक हौल के समीप कुलरी बाजार से आरंभ होता है जो लाइबे्ररी बाजार पर जा कर समाप्त होता है. इस सड़क पर पैदल चलना या घुड़सवारी करना अच्छा लगता है. सूर्यास्त का दृश्य यहां से सुंदर दिखाई पड़ता है.

म्युनिसिपल गार्डन : मसूरी का वर्तमान कंपनी गार्डन या म्युनिसिपल गार्डन आजादी से पहले तक बोटैनिकल गार्डन कहलाता था. कंपनी गार्डन के निर्माता विश्वविख्यात भू वैज्ञानिक डा. एच फाकगार लोगी थे. 1842 के आसपास उन्होंने इस क्षेत्र को सुंदर उद्यान में बदल दिया था.

शौपिंग : आप गांधी चौक, कलरी बाजार व लैनड्योर बाजार से छडि़यां, हाथ के बुने आकर्षक डिजाइनों के स्वैटर व कार्डिगन खरीद सकते हैं. यहां आने पर ट्रेक हिमालयन औफिस के पास स्थित दुकानों से एंटिक सामान खरीदना न भूलिए. ब्रिटिशकाल के फर्नीचर व अन्य दुर्लभ वस्तुएं यहां उचित दामों पर मिलती हैं

कब जाएं

मसूरी में साल के हर महीने में मौसम बेहद खुशनुमा रहता है जो हर साल भारी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है. यह हिल स्टेशन हर मौसम में सुंदर लगता है. हालांकि मसूरी घूमने का आदर्श समय मार्च से जून और सितंबर से नवंबर के बीच होता है.

कैसे पहुंचें

मसूरी आसानी से भारत के अन्य भागों से हवाई, रेल और सड़क मार्गों से जुड़ा हुआ है. इस गंतव्य का सब से नजदीकी एअरबेस जौली ग्रांट एअरपोर्ट है जो देहरादून में बना हुआ है. इस एअरपोर्ट की मसूरी से दूरी 60 किलोमीटर है. देहरादून रेलवेस्टेशन इसे गंतव्य स्थल का सब से नजदीकी रेल हेड है. वैसे दिल्ली के अतिरिक्त सहारनपुर, वाराणसी, हावड़ा व अमृतसर से भी यहां के लिए ट्रेनें उपलब्ध हैं. आगे का सफर आप टैक्सी या बस द्वारा आसानी से तय कर सकते हैं.

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यहां हर किसान है करोड़पति

भारत एक कृषि प्रधान देश है. यहां एक ओर किसान आत्महत्या करते हैं तो वही दूसरी ओर कुछ किसान आधुनिक कृषि प्रणाली का इस्तेमाल कर करोड़पति भी हैं. जी हां, आपको एक ऐसे गांव के बारे में बताएंगे, जहां के किसान करोड़पति हैं.

महाराष्ट्र के बारे में आप तो जानते ही होंगे. भले ही यह सूखा प्रभावित राज्य है लेकिन यहां पर एक ऐसा भी गांव है जहां के लोग करोड़पति हैं. यहां की आबादी 300 लोगों से ज्यादा है, जिसमें से 80 से ज्यादा लोग करोड़पति हैं.

महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले का हिवरे बाजार गांव है. यहां के किसान आत्महत्या नहीं करते बल्कि अच्छी और उन्नत खेती कर करोड़पति है. हिवरे बाजार गांव के किसानों के करोड़पति होने के पीछे भी एक रोचक कहानी है.

दरअसल 1990 में यहां 90 फीसदी परिवार गरीब थे. हिवरे बाजार 80-90 के दशक में भयंकर सूखे से जूझ रहे थे. गांव में महज 93 कुएं ही थे. पीने तक के लिए पानी नहीं बचा. कुछ लोग अपने परिवारों के साथ दूसरी जगहों पर चले गए. पानी का स्तर भी 82-110 फीट नीचे पहुंच गया था. फिर लोगों ने खुद को बचाने की कवायद शुरू की.

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खिड़की के पार

पता नहीं अस्पताल के इस बिस्तर पर अब कितने दिन पड़े रहना पड़ेगा. कितने समय तक दोस्तों से नहीं मिल पाऊंगी. स्कूल का कितना काम पिछड़ जाएगा. बाल दिवस भी आने वाला था. स्कूल की रेस में भी नाम लिखाया था, अब वह भी नहीं कर पाऊंगी. पांव ही तुड़वा बैठी थी. डौक्टर अब्बा से कहते थे कि शायद महीना भर लग जाएगा हड्डी जुड़ने में. कूल्हे की हड्डी है, प्लास्टर नहीं लग सकता, महीने भर बिस्तर पर सीधे लेटे रहना होगा. अस्पताल के इस बिस्तर पर जब मेरी आंख खुली थी तो अम्मा ने बताया था कि डौक्टर ने औपरेशन करके स्क्रू कसा है. करवट नहीं लेना है बस सीधे पड़े रहना है, तभी हड्डी जुड़ेगी. अब कब तक सीधे लेटूं. सीधे लेटे-लेटे पीठ जलने लगी. करवट लेने का मन किया तो अम्मा ने डांट पिलाती कि अब ज्यादा कुनमुना मत, करवट नहीं दिला सकती. डौक्टर ने मना की है. फिर उनकी हाय-हाय शुरू हो गयी कि और चढ़ी रह छत पर. नाक में दम कर रखा है. घर के भीतर तो तुझसे बैठा नहीं जाता. पढ़ना-लिखना खाक नहीं बस दिन भर आवारा लड़कों के साथ घूमना और शाम भर पतंग उड़ाना…. लड़कियों वाला कोई शऊर नहीं…. लंगड़ी हो गयी तो कोई ब्याहने भी नहीं आएगा… अम्मा बड़बड़ाती रहीं.

मैं चुपचाप आंख बंद करके उनका बड़बड़ाना सुनती रही और उस वक्त को कोसती रही जब पतंग उड़ाने के चक्कर में छत की मुंडेर से नीचे आ गिरी थी. अम्मा कितनी देर से चिल्ला रही थीं कि नीचे आ जा, नीचे आ जा, अंधेरा हो रहा है…. और मैं थी कि पतंग और ऊंचे और ऊंचे बढ़ाए जा रही थी. आज हवा भी कितने सलीके से चल रही थी, फिर पीछे वाले घर के शम्भू की पतंग भी तो तनी हुई थी, जब तक उसको काट कर नीचे न गिरा दूं, तब तक अपनी कैसे उतारूं. बगल वाली छत से रकबर भी अपनी चांद-तारा ताने हुए था. वह इस चक्कर में था कि मैं शम्भू की पतंग काटूं तो वह चिमटा ले. शम्भू की पतंग पर उसका दिल ललचाया हुआ था और मैं रकबर को मायूस नहीं करना चाहती थी. आखिर वो मेरा खास दोस्त जो था. हम दोनों सातवीं क्लास में साथ-साथ थे. अम्मा बात तो समझती नहीं, बस चिल्लाती ही रहती हैं. मेरी एक नजर पतंग पर टंगी थी और दूसरी नीचे आंगन में, कि अब्बा दफ्तर से न आ जाएं. इतने में नीचे आंगन का दरवाजा खुलने की आवाज आयी. इधर शम्भू की पतंग मेरी पतंग में उलझी ही थी कि अब्बा साइकिल लिए अंदर घुसे. उनकी नजर सीधे छत की ओर उठी, जहां मैं बिल्कुल मुंडेर पर पैर जमाए पतंग खींचने में जुटी थी. इधर अब्बा दहाड़े उधर शम्भू की पतंग कटी. हर्ष और डर का ऐसा करेंट शरीर में दौड़ा कि मैं मुंडेर से सीधे नीचे आंगन के पक्के फर्श पर धड़ाम से आ गिरी. फिर मुझे नहीं पता कि क्या हुआ. सीधे अस्पताल में ही आंख खुली.

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कई दिन बीत गये थे. शुरू के तीन-चार दिन तो सीधे लेटना बवाले-जान हो गया. जब तक सोती रहती थी पता नहीं चलता था, मगर आंख खुलते ही करवट लेने का दिल होता था. लगता कि पूरा शरीर दर्द कर रहा है. जोड़-जोड़ दुख रहा है. पतंग उड़ाने की अच्छी सजा मिल रही थी. लेटे लेटे ही खाओ-पियो और नित्यक्रम भी बिस्तर पर ही करो. बेचारी अम्मा रात-दिन मुझे पकड़ कर बैठी रहती थी कि कहीं नींद में मैं करवट न ले लूं. अब्बा सुबह-शाम खाने का टिफिन लेकर आते थे और अम्मा को जरूरी हिदायतें देकर दफ्तर चले जाते थे. डौक्टर सिर्फ शाम को एक चक्कर लगाते थे. तभी नर्स भी आती थी, जो दो-तीन सुईयां ठोंक कर और अम्मा को दवा की खुराक थमा कर चल देती थी. सरकारी अस्पताल था. मनोरंजन का कोई साधन वहां न था. चार पलंग का छोटा सा वॉर्ड था. मेरे अगल-बगल के पलंग खाली पड़े थे. कोई होता तो कम से कम उनसे बातचीत करके अम्मा का ही दिल बहल जाता. बेचारी मेरे साथ-साथ बैठी बोर होती रहती है.

आठवें दिन मेरे बगल वाले बिस्तर पर एक बुड्ढे बाबा आ गये. सीने तक सफेद दाढ़ी. सफेद भौंहे. सफेद बाल. सफेद धोती-कुरता. अगर सिर पर लाल टोपी पहना दो तो बिल्कुल फादर क्रिस्मस लगें. वो मुझे बिल्कुल मेरे दादाजी जैसे लगे. उनके भी ऐसे ही सफेद दाढ़ी थी. मगर वह सिर पर सफेद टोपी लगाते थे. अब तो वो रहे नहीं. इन बाबाजी के आने से वार्ड में कुछ रौनक लगी. अम्मा अब मेरे और उनके पलंग के बीच में स्टूल डाल कर बैठने लगीं. बाबा जी को पानी या चाय चाहिए होती तो वो उनके थर्मस से निकाल कर दे देती थीं. बाबाजी बड़े हंसमुख स्वभाव के थे. खूब बातें करते थे. चुप ही नहीं होते थे. अम्मा को भी उनकी बातें सुन कर बड़ी हंसी आती थी. वह मेरे साथ-साथ उनका भी ख्याल रखने लगी थीं. बूढ़े बाबा को उनका नाती एडमिट करा कर गया था. खाने का सामान और फल वगैरह लेकर रोज शाम को आता था. कहीं नौकरी करता था इसलिए दिन भर साथ नहीं रुक सकता था. उसने ही अम्मा से कहा था कि उसके नाना का भी ख्याल कर लिया करें. उसकी बात से अम्मा को पता चला कि बाबा जी को पेट की कोई बड़ी बीमारी है. उम्र भी काफी है. यही कोई अस्सी बरस, इसलिए ऑपरेशन नहीं हो सकता है. उनको दो-तीन दिन पर कुछ दवाएं चढ़ती थीं.

दो चार दिन में ही मैं बाबा जी से खूब हिल-मिल गयी. जब तक मैं जागती रहती बाबा जी से बातें करती रहती थी. अम्मा भी अब बाबा जी को यह हिदायत देकर कि वह कुछ देर मुझे देखे रहें, वॉर्ड के बाहर तक घूम आती थीं. मेरे पलंग के ऊपर खिड़की नहीं थी मगर बाबा जी के पलंग के ऊपर खिड़की थी, जिससे ठंडी हवा आती थी. बाबा जी कभी-कभी खिड़की की ओर मुंह करके बैठ जाते थे और बड़ी देर तक बाहर निहारते रहते थे. उस दिन अम्मा बाहर टहल रही थीं और बाबा जी अपने पलंग पर खिड़की की तरफ मुंह करके बैठे थे. तब मैंने बाबा जी से पूछा कि बाहर क्या-क्या दिख रहा है? उन्होंने थोड़ा उचक कर खिड़की से बाहर झांका और मुस्कुरा कर बोले, ‘बाहर सड़क है, सड़क के पार एक पार्क है, जहां ढेरों बच्चे फुटबॉल खेल रहे हैं, उछल-कूद मची है, खूब खुश दिख रहे हैं.’

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मैं यह सुनकर बड़ी उत्साहित हुई. इतने दिनों बाद बाहर की कोई खबर मिली थी. अम्मा तो कुछ बताती ही न थी. मैंने बड़ी उत्सुकता से बाबा जी से पूछा, और क्या क्या हो रहा है बाहर? बताइये न. कितने दिन हो गये इस बिस्तर पर पड़े-पड़े. मुझे तो सिर्फ सिर पर घूमता ये पंखा ही दिखता है. बाबा जी मुस्कुरा कर बोले, अच्छा तो बिटिया रानी लेटे-लेटे बोर हो गयी है. अच्छा चलो मैं तुम्हें बाहर देख कर बताता हूं कि क्या-क्या हो रहा है.

उस दिन के बाद वह अक्सर खिड़की की तरफ मुंह करके बैठ जाते और बाहर का नजारा देख-देख कर मुझे बताते जाते. एक दिन बोले कि दो बुड्ढियां सड़क पर झोला लिए जा रही हैं, और उनके पीछे एक कुत्ता लगा हुआ है. बुढ़ियां बातों में मगन हैं और उनको पता ही नहीं चल रहा कि कुत्ता उनके झोले में मुंह डाल रहा है. ये बता कर वह जोर-जोर से हंसने लगे. मैं भी खूब हंसी और साथ में अम्मा भी.

कभी कहते एक हैंडसम लड़का साइकिल पर तेजी से भागा जा रहा है, शायद कॉलेज को लेट हो गया है. आज तो जरूरी टीचर की डांट खाएगा. सड़क से गुजरने वाली गाय, भैंस, कुत्ता, बकरी हरेक के बारे में बाबा जी कमेंट्री करते थे. मुझे भी बाहर का नजारा जानने की खूब उत्सुकता रहती थी. खासतौर पर पार्क में खेलने वाले बच्चों के बारे में सुन कर मैं खूब खुश होती थी. कभी बच्चे फुटबॉल खेलते थे, कभी बैडमिंटन. बाबा जी एक-एक के बारे में विस्तार से बताते थे. कौन गिरा, कौन लड़ा, किसने गोल मारा, किसने बेइमानी की, सब तफ्सील से सुनाते थे. मुझे बड़ा मजा आता था. बोरियत तो कहीं दूर छूमंतर हो गयी थी. अब बिस्तर पर पड़े रहना उतना बुरा नहीं लग रहा था. सुबह जैसे ही बाबा जी उठते मैं कहती, ‘देखो, बाबा जी बाहर क्या चल रहा है?’ और वह बैठ कर बाहर की कमेंट्री शुरू कर देते.

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एक रोज बाबा जी बड़ी देर तक नहीं उठे. नर्स आयी. उन्हें हिलाया. थोड़ी देर में दो-तीन डौक्टर भी आये. बाबा जी की नब्ज देखी. मगर बाबा जी अब वहां नहीं थे. अम्मा ने बताया कि बाबा जी अल्लाह मियां के घर चले गये. उनके निर्जीव शरीर पर सफेद चादर डाल दी गयी. कुछ देर में उनके घरवाले आये और बाबा जी को ले गये. उस दिन मैं अपने बिस्तर पर पड़ी दिन भर सुबकती रही. मेरा फादर क्रिस्मस चला गया था. मैं फिर अकेली हो गयी थी. अम्मा भी बाबा जी के जाने से बड़ी उदास थीं. यह उदासी हम दोनों पर दो-तीन दिन तक तारी रही. उस दिन शाम को डौक्टर आये तो अम्मा से बोले कि महीना पूरा होने को है, हड्डी जुड़ गयी होगी, आज इसको खड़ा करने की कोशिश करेंगे. दो नर्सों ने मुझे सहारा देकर खड़ा किया. इतने दिनों बाद जब मैं बिस्तर से उठी तो खड़े होते वक्त मेरा सिर घूम गया. मगर जल्दी ही मैंने खुद पर काबू पा लिया. अम्मा पीछे से मुझे सहारा दिये हुए थीं. डौक्टर ने मुझे दोनों पैरों पर वजन देकर खड़े होने की हिदायत दी. मैं खड़ी हो गयी. फिर दूसरे दिन भी यही क्रम दोहराया गया. तीसरे दिन डॉक्टर ने मुझे दो-तीन कदम चलने को कहा तो मैं अम्मा का सहारा लेकर बाबा जी के पलंग की ओर बढ़ी. दरअसल मैं खिड़की से बाहर झांकना चाहती थी. खिड़की के पास आते ही ठंडी हवा का झोंका मेरे चेहरे से टकराया. बड़ा सुकून महसूस हुआ. मैंने थोड़ा उचक कर खिड़की के पार देखा तो सन्न रह गयी क्योंकि खिड़की के सामने थोड़ी सी जगह छोड़ कर एक ऊंची दीवार उठी हुई थी. न तो सामने कोई सड़क थी और न ही कोई पार्क, जहां आते-जाते लोगों और खेलते बच्चों की कहानियां बाबा जी मुझे सुनाते थे और मेरा मनोरंजन करते थे. मैंने पलट कर अम्मा की ओर सवालिया आंखों से देखा तो अम्मा मुस्कुरा दीं. उन्हें भी पता था कि खिड़की के पार कुछ नहीं है.

शादी के बिना भी सैटल और हैप्पी रह सकती हैं आप

उस मातापिता के जीवन को असफल माना जाता है जो अपनी आखि‍री जिम्‍मेदारी यानी बेटी की विदाई निभाने में असफल रहे ? जिन्होंने अखबारों में वर चाहिए के विज्ञापन नहीं दिए या मेट्रीमोनियल साइट्स पर बेटी की खूबसूरती और अपनी सम्पन्नता का बखान न किया, पंडितों की जेबें न भरी या अपनी मांगलिक बेटी की शादी पेड़ों और कुत्तों से न कराई हो .

जीवन में किसी पुरुष का न होना

जीवन में आदमी की कमी को लड़की के लिए हमेशा असफलता के रूप में देखा जाता है जैसे कि लड़कियों का जन्म अपने साथी को पाने की इस अंधी दौड़ का हिस्सा बनने के लिए हुआ हो. इस से पहले कि उन का शरीर ढीला पड़ जाये ,पीरियड्स आने बंद हो जाए, माँ बनने की उम्मीद कम हो जाए और यौनेक्षा घट जाए उसे एक पुरुष के हाथों अपनी जिंदगी की डोर सौंप देनी चाहिए. भले ही वह उस के योग्य हो न हो, उसे प्यार करता हो या न करता हो.

रूढ़िवादी समाज हर तरह से उसे डराता है. कोौस्मेटिक कंपनियां यौवन की रक्षा के उपाय बताते नहीं थकती. जल्दी ऐसे मचाई जाती है जैसे उस के स्त्रीत्व और यौवन की एक्सपायरी डेट आ जाएगी तो गजब हो जाएगा, बिना पति उस का जीवन बेकार न हो जाएगा, वह अधूरी रह जायेगी.

कई महिलाओं की जिंदगी में ऐसा भी होता है जिन के पति शादी के 7-8 साल बाद उन की तरफ नजर भर कर देखना भी छोड़ चुके होते हैं. घर में रोज लड़ाईझगड़े मचे होते हैं, बच्चा अलग रोरो कर घर सर पर उठाये घूमता है, सास के ताने ख़त्म नहीं होते, शरीर कमजोरी से उठाया नहीं जाता पर यही महिलाएं अपनी अविवाहित सहेलियों को यह सलाह देने से नहीं चूकती कि यार शादी कर ले. शादी के बिना भी औरतों की भला कोई जिंदगी होती है?

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क्या कहता है सर्वे

अमेरिकन टाइम यूज सर्वे द्वारा किए गए एक अध्ययन ने विवाहित, अविवाहित, विधवा और तलाकशुदा व्यक्तियों के सुख और दुख के स्तरों की तुलना की. दिलचस्प बात यह है कि इस सर्वे ने बताया कि विवाहित लोगों से खुशियों की सूचना तभी मिली जब उन्हें अपने साथी की उपस्थिति में यह प्रश्न पूछा गया. जब कि अविवाहित लोगों के पास विवाहित लोगों की तुलना में कम दुख है.

लंदन स्कूल औफ इकोनौमिक्स में व्यवहार विज्ञान के प्रोफेसर और ‘हैप्पी एवर आफ्टर’ पुस्तक के लेखक पौल डोलन के मुताबिक़ शादी से पुरुषों को फायदा होता है और महिलाएं शादी से पहले अधिक खुश रहती हैं. डोलन इसी अध्ययन में बताते हैं कि पुरुष शादी करने के बाद ‘शांत हो जाते हैं’ और लंबे समय तक जीते हैं.

वहीं महिलाओं के मामले में विवाह उन के स्वास्थ्य पर दबाव डालता है और यदि वे शादी नहीं करती हैं तो वे स्वस्थ और खुशहाल रहती हैं. मार्केटिंग इंटेलिजेंस कंपनी मिंटेल द्वारा किए गए एक अन्य अध्ययन में एकल महिलाओं का साक्षात्कार किया गया और निष्कर्ष निकाला गया कि इन में से 61 प्रतिशत महिलाएं खुश हैं. यही नहीं 75 फीसदी महिलाएं साथी की तलाश तक नहीं करतीं.

सिंगल स्टेटस के लोचे

कई लोगों की नजरों में अविवाहिताएं बेचारी होती हैं , ऐसी बेचारी जो सेक्स और मस्ती के लिए ईजिली अवेलेबल हों, टाइम पास के लिए ऐसा औप्शन हों जिन के साथ कोई फालतू के टंटे नहीं होते.

यही नहीं दूसरी विवाहित महिलाएं इस खौफ में जीती है कि कहीं अविवाहित फ्रेंड उन के पति पर जादू चला कर चक्कर न चला लें. पति हाथ से न निकल जाए. यानी लड़की का सिंगल स्टेटस बाकी सभी विवाहिताओं के लिए खतरा बन जाती हैं. जाहिर है रिश्ते में बध कर भी जब कोई आप का नहीं तो फिर रिश्तों की दुहाइयाँ दे कर शादी के लिए अफरातफरी क्यों ?

सामान्यतया जो लड़कियां शादी नहीं करती लोग उन्हें बड़ी असमंजस और प्रश्नवाचक नजरों से देखते हैं. लोगों को लगता है कि इस उम्र में आ कर भी वे सैटल नहीं हो सकी. पर 40 की उम्र के बाद भी आप ने शादी नहीं की मगर जौब कर रही है तो इस का मतलब आप जीवन में अच्छी तरह से सैटल हैं और आगे भी ज्यादा खुशहाल जिंदगी बिता सकेंगी. आप के पास आजादी अधिक और जिम्मेदारियां कम होंगी. आप अपनी मर्जी से जी सकेंगी, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ अधिक समय बिता सकेंगी बजाय कि उन के जिन्होंने शादी की और जिन के बच्चे हैं.

ज्यादातर लड़कियां इतना हौसला नहीं जुटा पातीं कि अपने पेरेंट्स या घरवालों से यह बात कह सकें कि वे शादी करना नहीं चाहतीं. उन्हें बचपन से ही इस तरह की शिक्षा और संस्कार दिए जाते हैं कि शादी कर घर बसाना और बच्चे पैदा करना उन के जीवन का पहला मकसद और स्त्री धर्म भी है. पेरेंट्स बेटी की शादी का काम एक जिम्मेदारी के रूप में लेते हैं और बेटियां भी सर झुका कर उन का कहा मान लेती हैं. भले ही उन का मन आगे पढ़ने और करियर बंनाने का ही क्यों न हो.

समस्या यह है कि पसंद न होने पर भी महज सामाजिक दवाब की वजह से लड़कियां किसी के भी साथ शादी के बंधन में बंधने को तैयार हो जाती हैं. इस चक्कर में कई बार लड़कियां बुरी शादी में भी फंस जाती हैं ? ऐसी शादी जिस में वह पलपल मर रही हों, घुट रही हों. मानसिक संताप और जिल्लत सह रही हों. मगर वह उफ्फ तक नहीं करतीं.

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वैसे भी शादी केवल एक साथी से नहीं होती बल्कि पूरे परिवार से होती है. उन के साथ हजार तरह की जिम्मेदारियां आती है. हर बात में आज्ञा लेना. पैसे खर्च करने है तो भी पति या सास से पूछना ,कहीं जाना है तो घरवालों को राजी करना . पति के साथ सासससुर, देवरननद की फरमाइशें पूरी करना. बच्चों को संभालना, रिश्तेदारी निभाना जैसे कामों के बीच उस का अपने लिए समय निकाल पाना कठिन हो जाता है.

सब के लिए खुशी का मतलब अलग होता है. यदि किसी लड़की को शादी के बजाय करियर या किसी और चीज में ख़ुशी हासिल होती है तो उसे ऐसा करने से रोका क्यों जाता है? उसे समाज का डर क्यों दिखाया जाता है ? क्यों नहीं उसे अकेले रहने के लिए तैयार होने दिया जाता? क्यों नहीं उसे हौसला दिया जाता कि वह खुद को मजबूत साबित कर सके?

ब्रेकफास्ट में बनाएं पैनकेक डिप ट्रैंगल्स

आप ब्रेकफास्ट में पैनकेक डिप ट्रैंगल्स बना सकते हैं. इसे बनाना भी बेहद आसान है.  आटा, पनीर, अदरक के मिश्रण से बनाया जाता है.

सामग्री

1 कप आटा

1 कप दही

1/2 कप मटर

50 ग्राम पनीर

1 बड़ा चम्मच

अदरक लहसुन व हरीमिर्च की पेस्ट

1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती,

3 बड़े चम्मच तेल

नमक स्वादानुसार.

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बनाने की विधि

दही में मटर, पनीर, अदरकलहसुन व मिर्च पेस्ट, धनियापत्ती व नमक मिला लें.

आटे में नमक डाल कर पानी के साथ घोल बना लें.

गरम तवे पर इस की पैनकेक यानी चीले बना लें.

चीले के ऊपर ये डिप लगा कर एक के ऊपर एक परत लगा लें.

इसके ऊपर डिप की परत लगा लें फिर सीजनिंग करें व परोसें.

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पीठ पीछे

आज कालोनी के पार्क में उन से भेंट हो गई. उन्होंने अपना परिचय दिया और दिनेश ने अपना. उन का नाम हरपाल सिंह था. वे पुलिस में डीएसपी थे और दिनेश कालेज में प्रोफैसर.

वे दोनों इधरउधर की बात करते हुए आगे बढ़ रहे थे कि तभी सामने से आते एक शख्स को देख कर हरपाल सिंह रुक गए. दिनेश को भी रुकना पड़ा.

हरपाल सिंह ने उस आदमी के पैर छुए. उस आदमी ने उन्हें गले से लगा लिया.

हरपाल सिंह ने दिनेश से कहा,‘‘मैं आप का परिचय करवाता हूं. ये हैं रामप्रसाद मिश्रा. बहुत ही नेक, ईमानदार और सज्जन इनसान हैं. ऐसे आदमी आज के जमाने में मिलना मुश्किल हैं.

‘‘ये मेरे गुरु हैं. ये मेरे साथ काम कर चुके हैं. इन्होंने अपनी जिंदगी ईमानदारी से जी है. रिश्वत का एक पैसा भी नहीं लिया. चाहते तो लाखोंकरोड़ों रुपए कमा सकते थे.’’

अपनी तारीफ सुन कर रामप्रसाद मिश्रा ने हाथ जोड़ लिए. वे गर्व से चौड़े नहीं हो रहे थे, बल्कि लज्जा से सिकुड़ रहे थे.

दिनेश ने देखा कि उन के पैरों में साधारण सी चप्पल और पैंटशर्ट भी सस्ते किस्म की थीं.

हरपाल सिंह काफी देर तक उन की तारीफ करते रहे और दिनेश सुनता रहा. उसे खुशी हुई कि आज के जमाने में भी ऐसे लोग हैं.

कुछ समय बाद रामप्रसाद मिश्रा ने कहा, ‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं.’’

उन के जाने के बाद दिनेश ने पूछा, ‘‘क्या काम करते हैं ये सज्जन?’’

‘‘एक समय इंस्पैक्टर थे. उस समय मैं सबइंस्पैक्टर था. इन के मातहत काम किया था मैं ने. लेकिन ऐसा बेवकूफ आदमी मैं ने आज तक नहीं देखा. चाहता तो आज बहुत बड़ा पुलिस अफसर होता लेकिन अपनी ईमानदारी के चलते इस ने एक पैसा न खाया और न किसी को खाने दिया.’’

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‘‘लेकिन अभी तो आप उन के सामने उन की तारीफ कर रहे थे. आप ने उन के पैर भी छुए थे,’’ दिनेश ने हैरान हो कर कहा.

‘‘मेरे सीनियर थे. मुझे काम सिखाया था, सो गुरु हुए. इस वजह से पैर छूना तो बनता है. फिर सच बात सामने तो नहीं कही जा सकती. पीठ पीछे ही कहना पड़ता है.

‘‘मुझे क्या पता था कि इसी शहर में रहते हैं. अचानक मिल गए तो बात करनी पड़ी,’’ हरपाल सिंह ने बताया.

‘‘क्या अब ये पुलिस में नहीं हैं?’’ दिनेश ने पूछा.

‘‘ऐसे लोगों को महकमा कहां बरदाश्त कर पाता है. मैं ने बताया न कि न किसी को घूस खाने देते थे, न खुद खाते थे. पुलिस में आरक्षकों की भरती निकली थी. इन्होंने एक रुपया नहीं लिया और किसी को लेने भी नहीं दिया. ऊपर के सारे अफसर नाराज हो गए.

‘‘इस के बाद एक वाकिआ हुआ. इन्होंने एक मंत्रीजी की गाड़ी रोक कर तलाशी ली. मंत्रीजी ने पुलिस के सारे बड़े अफसरों को फोन कर दिया. सब के फोन आए कि मंत्रीजी की गाड़ी है, बिना तलाशी लिए जाने दिया जाए, पर इन पर तो फर्ज निभाने का भूत सवार था. ये नहीं माने. तलाशी ले ली.

‘‘गाड़ी में से कोकीन निकली, जो मंत्रीजी खुद इस्तेमाल करते थे. ये मंत्रीजी को थाने ले गए, केस बना दिया. मंत्रीजी की तो जमानत हो गई, लेकिन उस के बाद मंत्रीजी और पूरा पुलिस महकमा इन से चिढ़ गया.

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‘‘मंत्री से टकराना कोई मामूली बात नहीं थी. महकमे के सारे अफसर भी बदला लेने की फिराक में थे कि इस आदमी को कैसे सबक सिखाया जाए? कैसे इस से छुटकारा पाया जाए?

‘‘कुछ समय बाद हवालात में एक आदमी की पूछताछ के दौरान मौत हो गई. सारा आरोप रामप्रसाद मिश्रा यानी इन पर लगा दिया गया. महकमे ने इन्हें सस्पैंड कर दिया.

‘‘केस तो खैर ये जीत गए. फिर अपनी शानदार नौकरी पर आ सकते थे, लेकिन इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी ये आदमी नहीं सुधरा. दूसरे दिन अपने बड़े अफसर से मिल कर कहा कि मैं आप की भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन सकता. न ही मैं यह चाहता हूं कि मुझे फंसाने के लिए महकमे को किसी की हत्या का पाप ढोना पड़े. सो मैं अपना इस्तीफा आप को सौंपता हूं.’’

हरपाल सिंह की बात सुन कर रामप्रसाद के प्रति दिनेश के मन में इज्जत बढ़ गई. उस ने पूछा, ‘‘आजकल क्या कर रहे हैं रामप्रसादजी?’’

हरपाल सिंह ने हंसते हुए कहा,

‘‘4 हजार रुपए महीने में एक प्राइवेट स्कूल में समाजशास्त्र के टीचर हैं. इतना नालायक, बेवकूफ आदमी मैं ने आज तक नहीं देखा. इस की इन बेवकूफाना हरकतों से एक बेटे को इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छोड़ कर आना पड़ा. अब बेचारा आईटीआई में फिटर का कोर्स कर रहा है.

‘‘दहेज न दे पाने के चलते बेटी की शादी टूट गई. बीवी आएदिन झगड़ती रहती है. इन की ईमानदारी पर अकसर लानत बरसाती है. इस आदमी की वजह से पहले महकमा परेशान रहा और अब परिवार.’’

‘‘आप ने इन्हें समझाया नहीं. और हवालात में जिस आदमी की हत्या कर इन्हें फंसाया गया था, आप ने कोशिश नहीं की जानने की कि वह आदमी कौन था?’’

हरपाल सिंह ने कहा, ‘‘जिस आदमी की हत्या हुई थी, उस में मंत्रीजी समेत पूरा महकमा शामिल था. मैं भी था. रही बात समझाने की तो ऐसे आदमी में समझ होती कहां है दुनियादारी की? इन्हें तो बस अपने फर्ज और अपनी ईमानदारी का घमंड होता है.’’

‘‘आप क्या सोचते हैं इन के बारे में?’’

‘‘लानत बरसाता हूं. अक्ल का अंधा, बेवकूफ, नालायक, जिद्दी आदमी.’’

‘‘आप ने उन के सामने क्यों नहीं कहा यह सब? अब तो कह सकते थे जबकि इस समय वे एक प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं और आप डीएसपी.’’

‘‘बुराई करो या सच कहो, एक ही बात है. और दोनों बातें पीठ पीछे ही कही जाती हैं. सब के सामने कहने वाला जाहिल कहलाता है, जो मैं नहीं हूं.

‘‘जैसे मुझे आप की बुराई करनी होगी तो आप के सामने कहूंगा तो आप नाराज हो सकते हैं. झगड़ा भी कर सकते हैं. मैं ऐसी बेवकूफी क्यों करूंगा? मैं रामप्रसाद की तरह पागल तो हूं नहीं.’’

दिनेश ने उसी दिन तय किया कि आज के बाद वह हरपाल सिंह जैसे आदमी से दूरी बना कर रखेगा. हां, कभी हरपाल सिंह दिख जाता तो वह अपना रास्ता इस तरह बदल लेता जैसे उसे देखा ही न हो.

प्रसाद

लेखक: राघबेंद्र कुमार

रधिया जब अपने सपनों के राजकुमार के बारे में सोचने लगती, तो वह खिल जाती और आईने में अपना चेहरा देखने लगती.

अब रधिया को न तो दिन को चैन था और न रात को नींद. उस के मन में एक नई उमंग, शरीर में गुदगुदी और दिल में हलचल मची रहती थी.

दिन कटते गए. लड़की देखने का दिन तय हुआ. रधिया को देखने आज उस का राजकुमार आने वाला था. वह सजसंवर कर तैयार हो रही थी. पिताजी स्वागत की तैयारी में लगे थे.

‘मेहमानों की खातिरदारी में कोई कमी न रह जाए, बात आज ही पक्की हो जाए,’ ये सब बातें सोच कर दीनदयाल परेशान थे.

दरअसल बात यह थी कि इस से पहले भी 2 लड़के रधिया को देख कर चले गए थे, पर बात नहीं बनी थी.

रधिया को देखने शाम को तकरीबन 5 बजे सभी मेहमान आ गए थे और रधिया के परिवार वाले उन के स्वागत में जुट गए थे.

रधिया की मां मन ही मन बेटी की मंगनी खुशीखुशी होने के लिए दुआ मांग रही थीं.

रधिया मेहमानों के पास चाय ले कर पहुंची. एक ही नजर में रधिया को लड़का पसंद आ गया. जैसा वह सोचती थी, वैसा ही था उस के सपनों का राजकुमार.

रमेश खूबसूरत और एक गंभीर नौजवान था. उसे भी रधिया बहुत अच्छी लगी. रधिया के कसे बदन और नशीली आंखों ने जैसे रमेश को घायल कर दिया.

अब क्या था. बात बन गई. सबकुछ तय हो गया. शादी का मुहूर्त निकाला गया. शादी 10 दिन बाद थी. लड़के वाले चले गए.

आज दीनदयाल बहुत खुश थे. इतने खुश कि जैसे बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो. रधिया की मां फूली नहीं समा रही थीं.

रधिया का तो हाल ही कुछ और था. जब से उस ने अपने सपनों के राजकुमार को देखा था, तब से वह सपनों में खो गई थी. हर तरफ वही नजर आ रहा था.

जब रधिया की सहेलियां उसे छेड़तीं तो उस का मन और मचल जाता. वह अपनी खिली जवानी को आईने में देख कर मुसकरा जाती और आने वाले दिनों के सपनों में खो जाती.

किसी तरह 10 दिन बीत गए. आखिर वह दिन भी आ गया, जिस का रधिया को बेताबी से इंतजार था.

सुबह के 8 बजे थे कि मां ने आवाज लगाई, ‘‘बेटी, मेहंदी लगाने के लिए तुम्हारी सहेली शबनम आई है. जा, मेहंदी लगवा ले या यों ही खोईखोई रहेगी.’’

मेहंदी, हलदीचंदन लगाने और सजनेसंवरने के बाद रधिया किसी परी से कम नहीं लग रही थी.

शाम को धूमधाम से बरात आई. शादी की सारी रस्में पूरी हुईं. विदाई का समय आया. चारों तरफ उदासी का माहौल छा गया. दीनदयाल बेटी की विदाई पर फफक पड़े.

ससुराल पहुंचने के बाद सब ने रधिया की खूब तारीफ की. रमेश की मां ने बहू को रूप और गुण दोनों से भरा पाया और वे उसे बहू की जगह लक्ष्मी कह कर पुकारने लगीं.

रमेश तो रधिया को रानी कह कर पुकारता था. रधिया के आने से चारों तरफ खुशियां छा गईं.

5 साल बीत गए. रधिया और रमेश का प्यार वैसा ही बना रहा, जैसा कि शादी के शुरुआती दिनों में था. मगर सास की नजर में रधिया खटकने लगी थी, क्योंकि वे अब एक पोता चाहती थीं.

इसी तरह 2 साल और गुजर गए. औलाद न होने की वजह से रमेश की मां परेशान हो कर रमेश से बोलीं, ‘‘क्यों बेटा, हमें तुम पोता नहीं दोगे? तुम्हारे बाबूजी बोल रहे थे कि शादी को 7 साल हो गए, मगर बहू के पैर भारी नहीं हुए. क्या बात है?’’

रमेश ने कहा, ‘‘मां, तुम क्यों घबराती हो? अगर ऐसी बात है तो मैं डाक्टर से सलाह लूंगा और इलाज…’’

रमेश की बात काटते हुए मां बोलीं, ‘‘अभी तक तो पड़ोसनें ही कहती हैं, अब पूरी बिरादरी को क्यों बताना चाहते हो. बेटा, हमारी बात मानो तो तुम दूसरी शादी कर लो.’’

रमेश को इस बात से बड़ी तकलीफ हुई. वह बोला, ‘‘मां, तुम ऐसी बात क्यों बोल रही हो? तुम्हारी बहू अगर सुनेगी तो जीतेजी मर जाएगी. हम लोग डाक्टर से मिल कर सही सलाह लेंगे. हो सकता है, मुझ में ही कोई कमी हो.’’

इस बात पर मां बोलीं, ‘‘तुम तो हट्टेकट्टे हो. हमें यकीन है कि हमारे बेटे में कोई खोट नहीं है. खोट है तो उसी में. जरूर उस पर किसी का साया है, जो हमारी खुशियों में आग लगा रहा है.

‘‘तुम ऐसा करो कि किसी अच्छे तांत्रिक का पता लगाओ. हो सकता है, उस से मिलने पर इस मसले का कोई हल मिल जाए और हमारे मन की मुराद पूरी हो जाए.’’

मां के आगे रमेश लाचार हो गया. उस ने तांत्रिक के बारे में पता लगाना शुरू कर दिया. कुछ भागदौड़ करने के बाद पता चला कि उन के घर से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर रामपुर

गांव में एक तांत्रिक आया है, जो ऐसे कामों के लिए जाना जाता है.

रमेश तांत्रिक से मिला. उस तांत्रिक ने कहा, ‘‘अभी मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता, तुम परसों दिन में आओ तो इस के बारे में सोच कर बताऊंगा कि इस के लिए सही समय कब होगा.’’

रमेश फिर तांत्रिक के पास गया. तांत्रिक ने रमेश को चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की पहली रात को सारा इंतजाम करने को कहा और जरूरी सामान का लंबा सा परचा उस के हाथ में थमा दिया, जिस में खुशबूदार तेल, तिल, चंदन वगैरह थे.

पूजा की सारी तैयारियां हो गई थीं. तांत्रिक महाराज बताए गए समय पर रमेश के घर आ पहुंचे. चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की पहली रात को उन की पूजा शुरू हुई.

पहली रात की पूजा में रधिया को घंटों धुएं की धूनी दी गई. फिर तांत्रिक ने एक हाथ पकड़ कर पूरे हाथ पर खुशबूदार तेल की मालिश की.

रधिया को गैर मर्द का छूना बहुत खराब लगा, मगर वह मजबूर थी. वह उसे रोक भी नहीं सकती थी.

इस तरह लगातार 8 रातों तक बारीबारी से वह तांत्रिक धूप दिखा कर खुशबूदार तेल से अलगअलग अंगों की रगड़ कर मालिश करता रहा.

9वीं रात थी. हमेशा की तरह 9 बजे पूजा शुरू हुई, आज रधिया के पूरे शरीर से कपड़े उतार कर धूप दिखाने और खुशबूदार तेल से मालिश करने के बाद पूजा पूरी होनी थी.

आज भी रधिया कुछ न बोल सकी. तांत्रिक के कहने पर उस ने सारे कपड़े उतार दिए. वह साधु के सामने ऐसे खड़ी थी जैसे कोई भोग किसी के लिए परोसा गया हो.

साधु रधिया की मालिश करने लगा. थोड़ी देर के बाद उस ने अपनेआप को साधु के हवाले कर दिया. उस के पास और कोई चारा भी तो नहीं था. ससुराल वाले साधु के पक्ष में जो थे. साधु जी भर कर भूखे भेडि़ए की तरह रधिया को सारी रात नोचता रहा.

सुबह साधु की विदाई बड़ी इज्जत के साथ की गई. रधिया को पूजा का फल मिल चुका था. समय पूरा होने पर उस की सास को तांत्रिक महाराज की मेहरबानी से चांद जैसा सुंदर और फूल जैसा प्यारा पोता मिला. सभी खुश थे.

घर में घी के दीए जलाए गए. सास बहू को फिर से लक्ष्मी कह कर पुकारने लगीं, मगर रधिया का हाल ऐसा था, जैसे काटो तो खून नहीं.

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