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उन्नाव रेप कांड: बलात्कार के बाद बदतर होती जिदंगी

बलात्कार के बाद की कानूनी लड़ाई पीड़ित के लिये सरल नहीं होती. उन्नाव रेप कांड इसका सबसे बड़ा गवाह है. दूसरी तरफ यह भी सच है कि जब कोई पीड़ित अपने हक की लड़ाई लड़ता है तो अंत में उसकी जीत होती है. मधुमिता हत्याकांड के बाद उसकी बहन निधि ने मजबूती से लड़ाई लड़ी तो बाहुबलि नेता अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी मधुमणि को जेल के अंदर ही जिदंगी तमाम काटनी पड़ रही है. रेप कांड में फंसे उन्नाव के बाहुबलि विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने रेप के मामले में पीड़ित को कमजोर करने के लिय हर दांव आजमा लिया पर उसकी एक नहीं चली. आज पूरा देश एक सूर में विधायक कुलदीप सेंगर के लिये सजा की मांग करते हुये पीड़ित के साथ खड़ा है. समाजवादी पार्टी ने मांग की है कि जब तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तर प्रदेश पुलिस के प्रमुख ओपी सिंह को नहीं हटाया जाता पीड़ित को न्याय नहीं मिलेगा.

28 जुलाई को रायबरेली के गुरूबक्शगंज थाना क्षेत्र में रेप पीड़ित अपने परिवार और रायबरेली जेल में रेप पीड़ित के चाचा से मिलने जा रही थी. इसी दौरान उसकी कार और एक ट्रक का सड़क हादसा हो गया. इसमें पीड़ित और उसका वकील महेन्द्र सिंह बुरी तरह से घायल हो गये और पीड़ित की चाची और मौसी की मौत हो गई. सडक दुर्घटना के मामले में पीड़ित लडकी के परिवारजनों ने यह मुकदमा लिखाया कि विधायक कुलदीप सेंगर ने यह हादसा कराया है. कुलदीप सेंगर का नाम सामने आते ही राजनीति तेज हो गई. संसद से सड़क तक हंगामा शुरू हो गया. केन्द्र और प्रदेश में सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी पर यह आरोप लगा कि भाजपा अपने विधायक को बचाने का प्रयास कर रही है. सरकार के संरक्षण में विधायक कुलदीप सेंगर अपने खिलाफ बलात्कार के मुकदमे के सबूत मिटाने के लिये सड़क हादसे की साजिश रचे थे.

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भाजपा ने इस मामले के बाद कुलदीप सेंगर केा पार्टी से बर्खास्त कर दिया है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कहा कि वह पीड़ित परिवार को 25 लाख रूपये का मुआवजा दे. सड़क हादसे की जांच भी सीबीआई करे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूरा मुकदमा दिल्ली ट्रांसफर किया जाये. इसके साथ ही साथ पीड़ित को उत्तर प्रदेश पुलिस की जगह पर सीआरपीएफ की सुरक्षा दी जाये. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से कहा कि दुर्घटना मामले की जांच 7 दिन में पूरी करे. इसके साथ ही साथ सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 45 दिन में केस को खत्म किया जाये. पीड़ित के चाचा ने कहा कि अब वह पूरे परिवार के साथ दिल्ली चले जाएंगे वहीं से विधायक को संजा दिलाने का पूरा प्रयास करेंगे. रेप पीड़ित लड़की लखनऊ के मेडिकल कालेज में वेटीलेंटर पर जिंदगी की लड़ाई लड़ रही है. उसे और उसके वकील को भी बेहतर इलाज के लिये दिल्ली एम्स ले जाने का विचार चल रहा है.

क्या है पूरी घटना:

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 56 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के माखी गांव का मामला कुछ ऐसा ही था कविता (बदला हुआ नाम) के पिता और दोनो चाचा 15 साल पहले कुलदीप सेंगर के करीबी हुआ करते थे. एक ही जाति के होने के कारण आपसी तालमेल भी बेहतर था. एक दूसरे के सुखदुख में साझीदार होते थे. इनकी आपस में गहरी दोस्ती थी. दोनों ही परिवार माखी गांव के सराय थोक के रहने वाले थे. कविता के ताऊ सबसे दबंग होते थे. कुलदीप सेंगर ने कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू की. चुनावी सफर में कांग्रेस का सिक्का कमजोर था तो वह विधानसभा का पहला चुनाव बसपा यानि बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़े और 2002 में पहली बार उन्नाव की सदर विधानसभा सीट से विधायक बने.

कुलदीप के विधायक बनने के बाद कविता के परिवारजनों के साथ कुलदीप का व्यवहार बदलने लगा. जहां पूरा समाज कुलदीप को ‘विधायक जी’ कहने लगा था वहीं कविता के ताऊ कुलदीप को उनके नाम से बुलाते थे. कुलदीप अपनी छवि को बचाने के लिये इस परिवार से दूरी बनानी शुरू की. कविता के पिता और उनके दोनो भाइयों को यह लगा कि कुलदीप के भाव बढ़ गये है. वह किसी न किसी तरह से उनको नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहे यह मनमुटाव बढ़ता गया. एक तरफ जहां कविता का परिवार कुलदीप का विरोध कर रहा था वहीं कुलदीप अपना राजनीतिक सफर बढ़ाते गये.

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कविता के ताऊ पर करीब एक दर्जन मुकदमें माखी और दूसरे थाना क्षेत्र में कायम थे. करीब 10 साल पहले उन्नाव शहर में भीड़ ने ईंट पत्थरों से हमला करके कविता के ताऊ को मार दिया कविता के परिवार के लोगों ने इस घटना का जिम्मेदार विधायक कुलदीप को ही माना था कविता के ताऊ की मौत के बाद उसके चाचा उन्नाव छोड़ कर दिल्ली चले गये. वहां उन्होंने अपना इलेक्ट्रिक वायर का बिजनेस शुरू किया. उनके उपर करीब 10 मुकदमें थे, कविता के पिता अकेले रह गये. उनके उपर भी दो दर्जन मुकदमें कायम थे नशा और मुकदमों का बोझ उनको बेहाल कर चुका था.

कुलदीप ने 2007 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर बांगरमऊ विधानसभा से जीता और 2012 में भगवंत नगर विधानसभा से चुनाव जीता. 2017 के विधानसभा में कुलदीप ने भाजपा का साथ लिया और बांगरमऊ से विधायक बन गये. विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के परिवार कविता के परिवार की रंजिश बनी रही. उन्नाव जिले की पहचान दबंगों वाली है. अपराधी प्रवृति के लोगों की बहुतायत है. माखी गांव बाकी गांवों से सम्पन्न माना जाता है यहां कारोबार भी दूसरों के अपेक्षा अच्छा चलता है.

कविता से बलात्कार:

कविता के साथ हुये बलात्कार के मसले पर जो जानकारी सामने आई उसके अनुसार जून 2017 में राखी (बदला हुआ नाम) नामक महिला कविता को लेकर विधायक कुलदीप के पास गई यहां विधायक ने उसे बंधक बना लिया उसके साथ बलात्कार किया गया. बलात्कार का आरोप विधायक के भाई और साथियों पर लगा. घटना के 8 दिन के बाद कविता औरया जिले के पास मिली कविता और उसके पिता ने इस बात की शिकायत थाने में कि तब पुलिस ने 3 आरोपी युवको को जेल भेज दिया. घटना में विधायक को नाम शामिल नहीं हुआ कविता और उसका परिवार विधायक के नाम को भी मुकदमें में शामिल कराना चाहते थे.

एक साल तक कविता और उसका परिवार विधायक के खिलाफ गैंगरेप का मुकदमा लिखाने के लिये उत्तर प्रदेश के गृहविभाग से लेकर उन्नाव के एसपी तक भटकता रहा. इसके बाद भी विधायक के खिलाफ एफआईआर नहीं हुई. विधायक के खिलाफ मुकदमा न लिखे जाने के कारण कविता और उसके परिवार के लोगों ने सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत कोर्ट से मुकदमा लिखे जाने की अपील की कविता का इतना प्रयास करना उस पर भारी पड़ गया. विधायक के लोगों ने उस पर मुकदमा वापस लेने का दवाब बनाना शुरू किया. ऐसा न करने पर खामियाजा भुगतने को तैयार रहने की धमकी मिली.

मारपीट, जेल और हिरासत में मौत:

 3 अप्रैल 2018 को विधायक के छोटे भाई ने कविता के पिता के साथ मारपीट की और मुकदमा वापस लिये जाने के लिये कहा. कविता और उसके परिवारजनों ने पुलिस में मुकदमा लिखाया. इसके साथ ही साथ विधायक के लोगों की तरफ से भी मुकदमा लिखाया गया. पुलिस ने क्रास एफआईआर लिखा पर केवल कविता के पिता को ही जेल भेज दिया कविता का आरोप है कि जेल में विधायक के लोगों ने उसके पिता की खूब पिटाई की. 8 अप्रैल को कविता अपने परिवार जनों के साथ राजधानी लखनऊ आई और सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास कालीदास मार्ग पहुंच गई यहां उसने आत्मदाह करने की कोशिश की. पुलिस ने उसको पकड़ लिया गौतमपल्ली थाने में कविता को रखा गया.

वहां से पूरे मामलें की जांच के लिये एसपी उन्नाव को कहा गया. इस बीच जेल में ही कविता के पिता की मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पिटाई और घाव में सेप्टिक हो जाने से मौत हुई. किसी लड़की के लिये इससे दर्दनाक क्या हो सकता है कि जिस समय वह न्याय की मांग लेकर मुख्यमंत्री से मिले उसी समय उसका पिता मौत के मुंह में चला जाये. सरकार की तेजी के बाद कविता के पिता पर एक तरफा कार्रवाई करते हुये जेल भेजने के दोषी माखी थाने के एसओ अशोक सिंह भदौरिया सहित छह पुलिस वालों को सस्पेंड कर दिया गया. मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई. उन्नाव की एसपी पुष्पाजंलि ने बताया कि 3 अप्रैल को कविता के पिता के साथ की गई मारपीट में शामिल सभी 4 आरोपियों को जेल भेज दिया.

3 अप्रैल की मारपीट की घटना में जिस तरह से पुलिस ने केवल कविता के पिता को जेल भेजा उसी तरह से अगर विरोधी पक्ष के नामजद 4 लोगों को जेल भेज दिया होता तो मामला इतना गंभीर नहीं होता. इससे साफ पता चलता है कि पुलिस पद और पैसे के दवाब में काम करती है. कविता के पिता के साथ दूसरे लोगों को जेल भेजा गया होता तो शायद उनकी मौत नहीं होती. कविता का आरोप है कि कोर्ट के द्वारा कायम गैंगरेप के मुकदमें में विधायक का नाम आने के बाद उन पर मुकदमा वापस लिए जाने का दवाब बनाया गया जिसकी वजह से यह घटना घटी. सड़क दुर्घटना में पीड़ित की चाची और मौसी की मौत के बाद अब मामला नये मोड़ पर पहुंच चुका है.

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करन जौहर की विवादित पार्टी पर कंगना की बहन ने दिया ये रिएक्शन

बौलीवुड अदाकारा कंगना रनौत की बहन रंगोली ने करण जौहर की विवादित पार्टी पर ट्विट के माध्यम से अपना रिएक्शन दिया है. इस रिएक्शन के कारण फिर से रंगोली चर्चा का विषय बन गईं है.आपको बता दें, करण जौहर की विवादित पार्टी के कारण ही रणबीर कपूर, दीपिका पादुकोण, अर्जुन कपूर, और मलाइका अरोड़ा  जैसे बड़े-बड़े सितारे ट्रोल किए जा रहे हैं.

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कंगना रनौत की बहन रंगोली ने इसी पार्टी के कारण बौलीवुड फिल्म इंडस्ट्री के सभी ए-लिस्टर्स पर निशाना साझा और एक जबरदस्ट शेर ट्विटर पर ट्विट किया है. रंगोली ने लिखा है, ‘हर इक जिस्म घायल, हर इक रूह प्यासी, निगाहो मे उलझन, दिलों में उदासी, ये दुनिया है या आलमे-बदहवासी, ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है…

कंगना रनौत की वर्क फ्रंट की बात करे तो हाल ही में कलाकार राजकुमार राव  के साथ अपनी नई फिल्म“जजमेंटल है क्या’ लेकर आई थीं, जिसको बौक्स ऑफिस पर काफी अच्छा रिस्पांस मिल रहा है.

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मनमोहक म्यूनिख

पश्चिमी जरमनी का राज्य बावेरिया विश्व में समृद्ध कलासंस्कृति के लिए प्रसिद्ध है. संगीतप्रेमियों के लिए यह स्वर्ग है तो नन्हेमुन्नों के लिए ग्रीम ब्रदर्स की परिकथाओं का देश. यहां बड़ेबड़े देहात हैं, खेत हैं और चारागाह हैं. बावेरियावासी अत्यधिक स्वाभिमानी हैं. दुनिया की सब से महंगी और शानदार कार बीएमडब्ल्यू अर्थात बावेरियन मोटर वर्क्स, यहीं पर बनती है. बड़ी मोटरकारों से ले कर कंप्यूटर और मशीनें सब यहीं बनती हैं. बावेरिया राज्य का अत्याधुनिक महानगर है म्यूनिख. यह बावेरिया की राजधानी भी है. यहां की प्राचीन बावेरियन परंपराएं, विश्वप्रसिद्ध ओपेरा, बीयर गार्डन और आर्ट गैलेरियों में संगृहीत अमूल्य कलाकृतियों का भंडार इस को बावेरिया के अन्य महानगरों की तुलना में विशिष्टता प्रदान करता है. प्रख्यात शास्त्रीय संगीतज्ञों बाथ, बीठवन, ब्रेहमस, हैंडल, स्ट्रास की कर्मस्थली है यह. यहां पत्थरों से निर्मित दीवारों में भी संगीत की मधुर स्वरलहरियों की अनुगूंज सुनाई देती है.

म्यूनिख रैजीडैंस

पुराने म्यूनिख शहर की सैर पैदल ही की जा सकती है. वसंतऋतु के आगमन के साथसाथ अखरोट के पेड़ों पर खिले गुलाबी फूल, पगडंडियों, चौराहों पर ट्यूलिप के रंगबिरंगे फूलों की अनुपम छटा देख कर मन खुश हो जाता है. बावेरिया के विटेलवैंस वंश के सम्राटों का भव्य राजप्रासाद ‘म्यूनिख रैजीडैंस’ यहीं पर है. इस का निर्माण 1385 में हुआ था तथा यह यूरोप के भव्य राजप्रासादों में से एक है. अब यह म्यूजियम के रूप में सार्वजनिक स्थल बना दिया गया है. इस म्यूजियम में अमूल्य कलाकृतियों का असीम भंडार दर्शनीय है.

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मेरियन प्लाजा

म्यूजियम के समीप ही हैं अनेक पुरातन अलंकृत भवन व चर्च. मेरियन प्लाजा में स्थित है वर्जिन मेरी की सुंदर प्रतिमा. यहां पर हर समय खूब चहलपहल रहती है. किंगप्लेस चर्च में है एक अनूठी घड़ी. ठीक 11 बजे घड़ी में भाले चलने लगते हैं. घोड़े दौड़ने लगते हैं. ये 11 बार आवाज करते हैं. इस विचित्र दृश्य को देखने के लिए यहां पर 11 बजे दर्शकों की भीड़ जमा हो जाती है. इसी स्क्वायर में है नूतन गोथिक शैली में निर्मित टाउनहौल.

वार पिलर

म्यूनिख में दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र ‘वार पिलर’ अर्थात युद्ध स्मारक है. कहते हैं कि 33 हजार सैनिक युद्ध में गए थे. केवल 3 हजार वापस लौटे, बाकी युद्ध में मारे गए. यह स्मारक युद्ध के प्रति घृणा का प्रतीक है.

डच म्यूजियम

म्यूनिख में सब से अद्भुत दर्शनीय स्थल है ‘डच म्यूजियम’. दुनिया में यह अपने ढंग का अद्वितीय म्यूजियम है. इस में रखी हुई हैं विश्व की सब से पहली मोटरगाड़ी से ले कर 20वीं सदी तक की कारें. इसी तरह सब से पहले रेलवे इंजन और विमान से ले कर आधुनिकतम इंजन और विमान सुरक्षित हैं. जहाज भी हैं और भारत की पहली बैलगाड़ी भी. इस संग्रहालय में कोयला, लोहा, नमक और पोटैशियम की विशाल खदानें बनाई गई हैं. पांचमंजिला यह संग्रहालय इतना विशिष्ट है कि दुनिया की हर वस्तु को यहां देखा जा सकता है. केवल इस को देखने के लिए 10 दिन चाहिए.

1468-1488 में निर्मित ‘चर्च औफ अवर लेडी’ एक सुंदर अलंकृत गुंबद वाला चर्च है. द्वितीय विश्व युद्ध में संघीय शक्तियों के हवाई हमले में इस को काफी क्षति पहुंची थी. बाद में पुनर्निर्माण कर दिया गया. बावेरिया के सम्राट लुडविग की कब्र यहीं है. उसी के आसपास हैं शाही परिवार के अन्य सदस्यों व सामंतों की कब्रें. चर्च के बाहरभीतर का शांत, सौम्य वातावरण सुखद अनुभूति प्रदान करता है. टावर पर से शहर का तथा सामने ईसार नदी का मनोरम दृश्य दिखाई देता है. ईसार नदी पर बने लकड़ी के पुल के साथसाथ मैपल, साइप्रस, अखरोट के पेड़ अतीव सुंदर व चित्ताकर्षक हैं. इस अलौकिक सौंदर्य का आनंद पैदल अथवा साइकिल पर भी लिया जा सकता है.

एलाएंज एरीना

खेलकूद की दुनिया में भी म्यूनिख का विशिष्ट स्थान है. इस का साक्षी है यहां का विशाल स्टेडियम एलाएंज एरीना. पहली नजर में यह आकाश में झूलते हुए एक बड़े रैडियल टायर की तरह दिखाई देता है. इस का डिजाइन स्विस वास्तुकारों हर्जो तथा द मयूरोन ने किया था. भीतर 66 हजार दर्शकों के बैठने की व्यवस्था है. इस का निर्माण करते समय छोटीछोटी सुविधाओं का भी ध्यान रखा गया है. बसों, कारों को पार्क करने की समुचित व्यवस्था, विशाल एलसीडी स्क्रीन यहां की विशिष्टता है.

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आर्ट गैलरी

आल्टर पीनकोटेक अर्थात प्राचीन आर्ट गैलरी में यूरोपीय चित्रकारों, कलाकारों की 800 से अधिक कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं. न्यूपींकोथेक-नूतन आर्ट गैलरी में रखी हैं 18वीं तथा 19वीं शताब्दी की पेंटिंग्स व मूर्तियां. विश्वविख्यात शास्त्रीय संगीतकारों की जन्मस्थली, कर्मस्थली बावेरिया का प्रमुख नगर म्यूनिख नृत्य, संगीत के इस जनून से भला कैसे वंचित रह पाता. यह नगर 3 पुरातन समृद्ध ओपेराओं, और्केस्ट्राओं के प्रख्यात संगीत निर्देशकों : मोजार्ट, बीथोवन, स्ट्रास, हैंडल के साथसाथ जेम्स लेविन, मेरिस जौनसन व जुबिन मेहता की जन्मस्थली व कर्मस्थली है.

ये सभी अपनेअपने क्षेत्र में विश्वविख्यात हैं. म्यूनिख फिल्हार्मोनिक, बावेरियन रेडियो, सिंफनी और्केस्ट्रा तथा बावेरियन स्टेट और्केस्ट्रा की गणना विश्व के सर्वोत्कृष्ट और्केस्ट्राओं में होती है. ये सब हर महीने अलगअलग संगीत कार्यक्रम आयोजित करते हैं.

फ्यूजन

एल्पस पर्वत शृंखला के दक्षिणी छोर पर टायरोल की सीमा पर बसा है बावेरिया का सब से ऊंचा शहर ‘फ्यूजन’. म्यूनिख से यहां पर 2 घंटे में पहुंचा जा सकता है. यहां मध्यकालीन पुरातन कलाकृतियों, भावी स्मारकों का भंडार है. ग्रीम बंधुओं की परीकथाओं का देश है यह. सम्राट लुडविग द्वितीय का न्यूवैंस्टाइन किला देख कर दर्शक चित्रलिखित रह जाते हैं. इस की चित्ताकर्षक पेंटिंग्स तथा भव्य मीनाकारी देखते ही बनती है. यहां के प्रसिद्ध थिएटर में ओपेरा, नृत्यसंगीत कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है. ‘गर्मिश पार्टंकिर्शन’ का प्राकृतिक सौंदर्य, मनोरम दृश्यावली मंत्रमुग्ध कर देते हैं. समीप के शहर रोथेनबर्ग में ‘डौल्स ऐंड टौयज’ म्यूजियम को देख कर बच्चे खुशी से उछल पड़ते हैं. क्रिसमस विलेज में बच्चों का स्वागत करने, तोहफे देने के लिए सांता क्लौस हमेशा मौजूद रहते हैं.

जगस्पिट्ज

जरमनी के सर्वोच्च हिमाच्छादित पर्वत शिखर ‘जगस्प्ट्जि’ पर गए बिना म्यूनिख की यात्रा अधूरी ही रहेगी. इस का अद्वितीय सौंदर्य देख कर मनप्राण कल्पनालोक में विचरण करने लगते हैं. 2,962 मीटर ऊंचाई पर स्थित यह पर्वत एल्पस की वेटरसटीन पर्वत शृंखला में है. इस के मध्य से गुजरती है आस्ट्रिया तथा जरमनी की सीमारेखा. सूर्य के प्रकाश में जगमगाते हिमाच्छादित पर्वत शिखर पर्यटकों को आमंत्रित करते हैं. यहां पर म्यूनिख से केवल 1 घंटे में पहुंचा जा सकता है. पर्वत शिखर से 4 देशों – जरमनी, आस्ट्रिया, इटली, स्विट्जरलैंड का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है. आसमान साफ होने पर काग व्हीलट्रेन अथवा केबल कार से यहां पर सुविधापूर्वक पहुंचा जा सकता है. यहां की सम्मोहक दृश्यावली का आनंद लेने के बाद ग्लेशियर ट्रेन से नीचे उतर कर ग्लेश गार्टन रैस्टोरैंट में बैठ कर स्वादिष्ठ भोजन से अपनी क्षुधा शांत करें. इस रैस्टोरैंट में एशिया के अनेक स्वादिष्ठ व्यंजन उपलब्ध हैं. बहुत सी दुकानें हैं जहां से स्मृतिचिह्न व अन्य मनपसंद सामान खरीदा जा सकता है. अक्तूबर से मई के बीचयहां स्कीइंग व सनोबोर्ड की सुविधा रहती है. पैराग्लाइडिंग की भी समुचित व्यवस्था है.

भ्रमण खरीदारी

भाषा अथवा किसी अन्य कारण से अकेले जाने में असुविधा हो तो गाइडयुक्त टूर पैकेज का प्रबंध है. म्यूनिख शहर में घूमनेफिरने के लिए सड़कों के किनारे पैदल चलने तथा साइकिल के लिए रास्ते बने हुए हैं. सार्वजनिक परिवहन प्रणाली बस, ट्राम एवं भूतल परिवहन के साथ आरामदेह व सुव्यवस्थित है. 2 व्यक्तियों के लिए पूरे दिन का पास खरीदने पर आप शहर में ट्रेन, बस, ट्राम से कहीं भी कितनी ही बार बिना रोकटोक जा सकते हैं. म्यूनिख शहर खरीदारों की पसंदीदा जगह मानी जाती है. ‘मेरियान प्लाज स्क्वायर’ से शुरू करें खरीदारी. मैक्समिलन स्ट्रास में महंगा, डिजाइनर सामान मिलता है. म्यूनिख के स्वाबिन उपनगर में अनगिनत छोटेबड़े स्टोर, बुटीक, एंटिक शौप्स के साथसाथ बार व रैस्टोरैंट भी हैं. बजट के अनुरूप म्यूनिख में आवास स्थान के अनेक विकल्प हैं. ट्रैवल एजेंट से विस्तृत जानकारी ले सकते हैं. यह विश्व के सभी देशों के साथ हवाईमार्ग से जुड़ा है. यहां की भाषा जरमन है.जब म्यूनिख जाना हो तो स्वेटर, जैकेट इत्यादि गरम कपड़े ले जाने जरूरी हैं. कैप, सनग्लास, छतरी तथा आरामदेह मजबूत जूते भी साथ रखें. वहां का मौसम ठंडा व सुहावना रहता है.

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अगस्त के पहले रविवार को ही क्यों मनाया जाता है फ्रेंडशिप डे, जानें यहां

दोस्तों के बिना जिंदगी कितनी बोरिंग लगती है. ये दोस्त ही तो हैं, जिनसे आप अपने मन की बात शेयर कर सकते हैं. समय समय पर आप दोस्तों का मजाक भी बनाते हैं, उनके दिल की भी सुनते हैं और आप अपने मन की भी कहते हैं.. लेकिन क्या आप फ्रेडशिप डे का इतिहास जानते हैं, इसे अगस्त के पहले रविवार को मनाने का क्या कारण है. तो आइए जानते हैं, फ्रेडशिप डे का इतिहास क्या है.

  • फ्रेडशिप डे की शुरुआत साल 1919 में हौलमार्क कार्ड के संस्थापक जोस हौल के सुझाव से हुई थी.
  • पहली बार 1935 में यूनाइटेड स्टेट्स कांग्रेस ने अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाने की घोषणा की थी. सबसे पहले अमेरिका में मनाया गया था.
  • 1997 में कार्टून किरदार विन्नी द पूह को संयुक्त राष्ट्र ने दोस्ती का अंतराष्ट्रीय दूत चुना.
  • भारत के साथ-साथ और कई देशों में फ्रेंडशिप डे अगस्त के पहले रविवार को ही मनाया जाता है, लेकिन दक्षिण अमेरिकी देशों में जुलाई महीने के अंत में फ्रेंडशिप डे मनाया जाता है. यूनाइटेड नेशंस भी इस दिन पर अपनी मुहर लगा चुका है.

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लड़कियों की मदद के लिए प्रीति सूद निकली ‘कारगिल’ मिशन पर

‘‘फ्राड सैंया, ‘‘रिवाल्वर रानी’’ सहित कई फिल्मों में अभिनय कर चुकी अभिनेत्री प्रीति सूद हमेशा लड़कियों के लिए काम करती रहती हैं. प्रीति सूद का मानना है कि लड़कियों को शिक्षित करके समाज की तमाम बुराइयों पर अंकुश लगाया जा सकता है. उनका मानना है कि शिक्षा तो हम सभी का मूलभूत अधिकार है. इसी सोच के साथ प्रति सूद ने एक फिल्म ‘‘अंटू की अम्मा’’ का निर्माण व निर्देशन किया है. और अब वह अपनी इस फिल्म के साथ 30 जुलाई को कारगिल और कश्मीर की पहाड़ियों पर यात्रा पर निकली हैं. वह अपनी इस यात्रा के दौरान कारगिल और कश्मीर की तमाम लड़कियों से न सिर्फ मिलेंगी,  बल्कि गांव गांव जाकर लड़कियों को अपनी यह फिल्म दिखाकर उनसे बातचीत करेंगी. इसके पीछे प्रीति का मकसद इन लड़कियों को विश्व स्तर की शिक्षा व अनुभव प्राप्त करने में मदद करना चाहती हैं.

कारगिल रवाना होने से पहले खुद प्रीति सूद ने कहा था- ‘‘मैं कारगिल व कश्मीर जैसे दुर्गम स्थलों में बसे गांवों में रह रही लड़कियों से मिलने और उनके साथ मिलकर कछ बेहतर काम करने के लिए कारगिल की यात्रा पर जा रही हूं. मैं सीमा के नजदीक के सरकारी स्कूल की लड़कियों से भी मिलूंगी. मैं वहां के बच्चों के साथ कुछ कार्यशालाएं /वर्कशौप करना चाहती हूं, जिससे उन्हें कुछ बेहतर शिक्षा मिल सके.

मैं अपनी फिल्म दिखाने के बाद इन बच्चों के साथ सवाल जवाब भी करुंगी, जिससे मुझे इस बात का अंदाजा मिलेगा कि किस तरह सर्वश्रेष्ठ ढंग से इन बच्चों की मदद की जा सकती है. यह मेरी जिंदगी का निजी अनुभव का हिस्सा होगा. साथ ही मेरी हर संभव कोशिश रहेगी कि मैं इनकी मदद कर सकूं. मैं अपने साथ कुछ किताबें, कापीयां/नोट बुक्स, स्टेशनरी, शिक्षा देने वाली कुछ वस्तुएं वगैरह लेकर जा रही हूं, जिससे उन लड़कियो को देकर मैं उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए उनका हौसला बढ़ाना चाहूंगी.’’

मूलतः शिमला निवासी प्रीति सूद पहली बार लड़कियों के लिए कुछ करने जा रही हो, ऐसा भी नहीं है. वह लड़कियों की मदद के लिए कई तरह के काम करती रहती हैं. प्रीति सूद ने पिछले वर्ष मुंबई के वर्सोवा इलाके में देह व्यापार के लिए जबरन अमरीका भेजी जा रही 11 और 17 वर्ष की लड़कियों को पुलिस की मदद से छुड़वाते हुए ‘ह्यूमन ट्रैफकिंग/सेक्स रैकेट का भंडा फोड़कर छह लोगों को गिरफ्तार करवाया था.

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बेले, सालसा, लम्बाड़ा,  जैज,  सम्बा व कत्थक नृत्य करने में महारत हासिल कर चुकी प्रीति सूद एक म्यूजिक वीडियो ‘‘बैड गर्ल’’ भी कर चुकी हैं.

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तोड़ो मन की सलाखें

लेखिका: राधा श्रीवास्तव 

सलाखें सिर्फ जेल की ही नहीं होतीं, सलाखें हमारे मन में भी हैं. जेल की सलाखें बेशक लोहे की हों, और कई बार रजतपट पर हम ने उन्हें टूटते हुए भी देखा होगा, पर मन की सलाखें तोड़ते हुए हम ने किसी को नहीं देखा. वह इसलिए क्योंकि मन की सलाखें दिखाई नहीं देतीं. परंतु, मन की सलाखों को जो पहचान जाता है, महसूस कर लेता है, वह उन सलाखों को तोड़ कर बाहर निकल आता है. जेल की सलाखें टूटने का तो पता चल जाता है, पर जरूरी नहीं कि मन की सलाखें टूटने की आवाज आए. अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है.

आप जब भी किसी को तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी सफलता के सोपान तय करते देखें तो समझ जाना कि उस ने मन की कई सलाखों को तोड़ा होगा. इन सलाखों को जो नहीं तोड़ता या तोड़ पाता है वह खुद में ही कैद हो कर रह जाता है और समय निकलने के बाद पछताता है.

देखना होगा कि ये सलाखें आप ने खुद तो नहीं खड़ी कर रखी हैं. यह भी देखना होगा कि ये सलाखें यदि आप ने नहीं, तो किस ने खड़ी कर रखी हैं. इन सलाखों को तोड़ने के लिए आप को अतिरिक्त मेहनत करनी होगी. आप को सब से पहले तो अदृश्य सलाखों को पहचानना होगा. पहचानना होगा कि सलाखों के पीछे आखिर कौन है. हो सकता है आप अकेले इन सलाखों को न तोड़ पाएं, इस के लिए देश और समाजहित में आप को एकजुट भी होना पड़ सकता है.

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सचाई को स्वीकारें

यह अवश्य है कि संसार में सब के लिए मन की सलाखें अलगअलग आकारप्रकार की हो सकती हैं. कोई रूढि़वादिता या अंधविश्वास की सलाखों में कैद है तो कोई जाति, भाषा और क्षेत्रवाद की सलाखों में बंद सिसक रहा है. कोई शक नहीं कि ये सलाखें लोभ, लालच, भ्रम, असमंजस और क्रोध की सलाखें भी हो सकती हैं, जिन में व्यक्ति हमेशा के लिए कैद हो कर रह जाता है और अपनी जिंदगी तबाह कर लेता है.

हमें सलाखों की सचाई को स्वीकार करना होगा, तभी इन की मजबूती को महसूस कर के तोड़ने की योजना बनाई जा सकेगी. कुछ महिलाओं ने अपने साहस से इन सलाखों को न केवल पहचाना, बल्कि तोड़ कर समाज के सामने अपनी जैसी महिलाओं के लिए प्रेरणा का कार्य भी किया है. महिला सशक्तीकरण के दौर में भी अधिकांश महिलाएं इन न दिखाई देने वाली सलाखों में इसलिए घुट रही हैं क्योंकि इन सलाखों को या वे समझ नहीं पा रही हैं.

कुछ महिलाएं गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, छेड़छाड़, पितृसत्ता की उद्दंडता, विषमता, छुआछूत, जातिवाद, भाषावाद और क्षेत्रवाद को परंपरा मान कर अपनी नियति समझ कर निभाने की भूल कर रही हैं. वे इन्हीं सलाखों में कैद रह कर अपने को अनुकूल बनाने के प्रयास में जुटी रहती हैं और चाहती हैं कि उन के जैसी अन्य महिलाएं भी इन्हीं सलाखों में खुद को स्वस्थ, सुरक्षित और सुखी समझें.

वे अपने मन को मारती हैं, अपनी इच्छाओं का गला घोंटती हैं और चाहती हैं कोई आ कर उन्हें इस मुश्किल से उबारे. सारी जिंदगी शिकायत, ईर्ष्या और बुराई में बिताने से अच्छा होगा, मन की सलाखों से मुक्त हुआ जाए. आप चाहे समाज की बुराइयों से लड़ना चाहें, परिवार की ताकत बनना चाहें या फिर समाज को जागरूक करना चाहें, लेकिन सलाखें तोड़े बिना काम नहीं चलने वाला.

किसी के कुछ कह देने पर अपनी राय बना लेना भी ऐसी सलाखें हैं जिन में हम अपने विवेक का उपयोग नहीं करते. ऐसी भी सलाखें हैं जब हम सहीगलत का निर्णय न करते हुए अपनी ही जिद पर अड़ जाते हैं, और चाहते हैं कि कोई हस्तक्षेप न करे. ऐसी भी सलाखें हैं जिन में हम सकारात्मक सोचना तो चाहते हैं पर कदम सकारात्मक नहीं उठा पाते.

अपने ही मन से कोई भी धारणा बना लेना, अपने ही मन से सवाल खड़े कर लेना, अपने ही मन से सोच बना लेना कि हम ऐसा करेंगे तो कोई क्या कहेगा? समाज क्या सोचेगा? यदि हम ने कोई कदम घर की मरजी के बगैर उठा लिया तो क्या होगा?  खुद को किसी घटना विशेष के लिए दोषी मानने लगना, आत्मग्लानि से भर जाना, उदास हो जाना और यह सोच कर सांसों से समझौता कर लेना कि हम कुछ नहीं कर सकते, ऐसे ही जीना होगा, या हम से ऐसा नहीं होगा, आदि सब निराशाएं या खुद को कमतर आंकने की प्रवृत्तियां ही वे सलाखें हैं जो कई महिलाओं को कदम पीछे खींच लेने और चारदीवारी में कैद रहने को मजबूर कर देती हैं.

इन्हीं सलाखों को तोड़ने के लिए ही तो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर ध्यान देने की बात बारबार कही जा रही है, ताकि बुराई का विरोध तो कम से कम किया ही जा सके. लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है.

ग्लोबल स्तर पर हो काम

सलाखों को तोड़ने का काम सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं होना चाहिए, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इस की गूंज सुनाई देनी चाहिए. अपने देश में अधिकारों के लिए मांग उठाना, संघर्ष करना तो जरूरी  है ही, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय महिलाओं की ताकत दिखाईर् देनी चाहिए. क्या यह जरूरी नहीं कि हम दुनियाभर की बहनों को सम्मान देने के लिए रक्षाबंधन के पर्व को अंतर्राष्ट्रीय सिस्टर्स दिवस के रूप में मनाने की पेशकश करें.

ऐसा किया जा सकता है यदि हम अपनी सोच के दायरे को बढ़ाएं. परंतु इस के लिए जरूरी होगा कि हम खुद को किसी दूसरे की तरह पेश करने से बचें और खुद के भीतर झांकें. नईनई कल्पनाओं की उड़ान भरें.

सलाखें तोड़ने का मतलब एकदम से बगावत कर देना या अनुशासनहीनता करना नहीं है, न ही किसी का बुरा कर के आगे बढ़ना है, न ही किसी की देखादेखी नकल करना है, बल्कि धैर्यपूर्वक दिल की आवाज से निर्णय लेना है जहां हमारी प्रगति बाधित न हो, हमारे सम्मान को ठेस न पहुंचे, हमारी भावनाएं आहत न हों और हम भी स्वाभिमानपूर्वक जीविकोपार्जन कर सकें. हम तन से ही नहीं, मन से भी स्वस्थ हों. हम अपनी योग्यता बढ़ा सकें.

जब मन की सलाखों को तोड़ देंगे तो मस्तिष्क भी खुलेगा. तब आप किसी विशेष रुकावटी दायरे से बंधे नहीं होंगे. आप के सामने विस्तृत आकाश होगा और आप उन्मुक्त उड़ान भर सकेंगे.

ऐसी उड़ान जिस में ऊहापोह वाली स्थिति नहीं, बल्कि बिलकुल स्पष्टता होगी और सुधार की एक पूरी प्रक्रिया प्रारंभ हो सकेगी, जो अपने साथसाथ अपने से जुड़े लोगों और चीजों को भी बदलेगी. तब बदलेगी यह व्यवस्था विशेषकर इस की खामियां. तब यह समाज महिलाओं, खासतौर से बहू, बहन, बेटियों यानी लड़कियों के लिए पूरी तरह से अनुकूल बन सकेगा. बेटाबेटी का भेदभाव मिट सकेगा. दकियानूसी विचारों की सलाखें सिर्फ महिलाएं ही न तोड़ें, पुरुष भी तोड़ें और दूसरों को भी सलाखें तोड़ने में सहयोग करें.

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खुशहाली में जीने के लिए

दुखी रहने या हमेशा शिकायत करते रहने की आदत, विफलता का भय, नकारात्मक नजरिया और आलस्य की सलाखों को जब तक तोड़ा नहीं जाएगा, तब तक नवाचार, रचनात्मकता या आविष्कार करना कठिन होगा. आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति से मन की इन अदृश्य सलाखों को तोड़ना इसलिए भी जरूरी होगा क्योंकि खुशहाली में जीना, आगे बढ़ना, उन्नति करना और अच्छाईसचाई को आत्मसात कर शिखर पर पहुंचना आप का अधिकार है.

अपने अधिकारों की लड़ाई में उन सलाखों को तोड़ना जरूरी होगा जो आप के मार्ग में बाधक हैं, जो आप को रोक रही हैं, जो स्पीडब्रेकर का काम कर रही हैं. अपनेआप में इन सलाखों को तोड़ कर आप बदलाव को महसूस कीजिए. यह परिवर्तन आप में न केवल काम की नई स्फूर्ति और नई ऊर्जा ले कर आएगा, बल्कि आप को उत्साहित भी करेगा. आप का यह उत्साह परिवार, समाज और देशहित में कारगर होगा. इस के लिए किसी प्रकार की पूंजी खर्च करने की जरूरत नहीं है. थोड़े से अभ्यास से, ध्यान से, एकाग्रता से व एकजुटता से यह किया जा सकता है.

काश

कभीकभी व्यक्ति समय के हाथों इतना मजबूर हो जाता है कि चाहते हुए भी वह कुछ नहीं कर पाता. वह हजारों लड़ाइयां लड़ सकता है परंतु अपनेआप से लड़ना सब से ज्यादा कठिन होता है. सच तो यह है कि हम अपने ही दिल के हाथों मजबूर हो जाते हैं. कदम स्वयं ही ऐसी राह पर चलने लगते हैं जिन्हें हम ने नहीं चुना. लेकिन राहें हमें वहां तक पहुंचा देती हैं जहां नियति पहुंचाना चाहती है.

मैं सोफे पर बैठी विचार कर रही थी कि मैं ने क्या खोया क्या पाया. खोने के नाम पर अपना सारा बचपन, सभी रिश्तेनाते, सखीसहेलियां अपना यौवन और पाने के नाम पर एक 9 साल का बेटा और दूसरे पति. पति तो सदा अपनेआप में ही खोए रहते. कहने को वे एक मल्टीनैशनल कंपनी में उच्चाधिकारी थे पर एक सूखी सी नीरस जिंदगी के आदी हो चुके थे. जिन की अपनी जिंदगी ही रंगहीन हो वे भला मुझे क्या सुख देते. लगता है प्रकृति मेरे हाथ में सुख की रेखा बनाना ही भूल गई थी. उस से जरूर कोई भूल हुई है और अब खुद को भुलाना ही मेरी नियति बन चुकी है.

शाम को खाने की टेबल साफ कर मैं ने उन को और बेटे को बुलाया. यंत्रचालित से हम सब खाना खाने लगे. आज तक न कभी किसी खाने की तारीफ, न शिकवा, न शिकायत, भले ही मीठा कम हो या नमक तेज. चुप्पी तोड़ते हुए बेटा बोला, ‘‘पापा, कल बुकफेयर का आखिरी दिन है और आप की छुट्टी भी है. मुझे बुकफेयर जाना है.’’ पति ने खामोशी से स्वीकृति दे दी.

सारा दिन फेयर में घूमतेघूमते मैं अब थक चुकी थी. पति और बेटा तो हर स्टौल पर ऐसे खो जाते जैसे मेरा कोई वजूद ही न हो. मैं ने इधरउधर निगाहें घुमा कर देखा. इस समय मुझे कौफी पीने की तीव्र इच्छा हो रही थी. थोड़ी देर बाद गेट के पास मैं ने कौफी का स्टौल देखा. मैं एक कौफी ले कर पास रखे सोफे पर बैठ गई.

मेरी निगाहें आसपास घूम रहे लोगों पर लगी रहीं. तभी एक चिरपरिचित सा चेहरा देख कर मैं सोच में पड़ गई. उस का मेरे पास से गुजरना और मेरा सोफे से उठना लगभग एकसाथ हुआ. उस ने उड़ती नजर से एक पल के लिए मुझे देखा. मैं एकदम चौंक गई.

‘‘राहुल,’’ मैं ने बहुत धीरे से कहा.

‘‘प्राची,’’ कह कर वह भी एकदम चौंक गया, ‘‘आज तुम यहां कैसे? कैसी हो? लगता है किताबों का शौक अभी तक नहीं गया,’’ एक मधुर सी चिरपरिचित आवाज मेरे कानों में पड़ने लगी.

मैं एकदम खामोश थी. मेरा मन अभी भी मानने को तैयार नहीं था कि उस से दोबारा मुलाकात भी हो  पाएगी.

‘‘अच्छा, मैं भी कौफी ले कर आता हूं,’’ कह कर वह वहां से चलने लगा तो मैं ने कहा, ‘‘रुको, मेरे पति सामने स्टौल पर हैं. मैं ज्यादा देर तक बैठ नहीं पाऊंगी. अपनी सुनाओ, कैसे हो तुम, कहां हो?’’

‘‘मैं कहां जाऊंगा दिल्ली छोड़ कर. तुम को तो शायद पता होगा शुरू से ही मेरा रुझान जर्नलिज्म में था. पहले कई साल अखबारों में काम करता रहा. अब टीवी सीरियल बनाता हूं. ठीकठाक जिंदगी चल रही है, पर ऐसी नहीं जैसी मैं चाहता था.’’

उस का आखिरी वाक्य भेदभरा था. तिरछी नजरों से उस ने मेरी तरफ देखा. कभीकभी आंखों की भाषा भी अपनी जबान कह देती है. हमारे बीच एक लंबा मौन पसर गया. मेरे चेहरे पर कई रंग आनेजाने लगे. उन में से एक रंग मजबूरी का भी था.

‘‘तुम कैसी हो?’’ उस ने चुप्पी तोड़ते हुए गमगीन होते माहौल को सामान्य करते हुए पूछा, ‘‘क्या कर रही हो?’’

‘‘हम औरतों का क्या है. किसी खूंटे पर तो बंधना ही है. खूंटा काठ का हो या सोने का, क्या फर्क पड़ता है.’’ मैं यह सब अचानक कैसे कह गई, मुझे खुद को भी पता नहीं. मैं रोंआसी हो गई. वह देर तक मेरी आंखों में देखता रहा जैसे कुछ पढ़ लेना चाहता हो.

‘‘सुना था औरतें कुछ घटनाएं अपने भीतर कई तहों में छिपा लेती हैं. किसी को इस की हवा तक लगने नहीं देतीं और मरने के बाद ये सब बातें भी दफन हो जाती हैं. पर…’’

‘‘पर ऐसा होता कहां है,’’ मैं ने उस का वाक्य पूरा होने से पहले ही कहा, ‘‘जिंदगी कैसी भी हो, उसे जीना पड़ता ही है.’’

‘‘ऐसा क्या हो गया कि तुम अचानक ही टूट सी गई हो. कालेज में मैं ने तुम जैसी मजबूत लड़की और नहीं देखी थी. दृढ़विश्वास और इरादे तुम्हारी पहचान थे. और फिर मैं ने तो सुना था तुम्हारे पति एक बड़ी कंपनी में डायरैक्टर हैं. समाज में मानसम्मान, सब सुविधाओं से युक्त घर…’’

‘‘सुना था तो आ कर देख भी लेते. क्या मैं बहुत दूर चली गई थी,’’ मैं भावुक हो गई. राहुल, तुम क्यों चले गए मुझे छोड़ कर. एक बार कह कर देख तो लेते, मैं कहना चाहती थी पर रिश्तों की मर्यादा और माथे का सिंदूर सामने आ गया.

मेरी आवाज में अनकही करुणा और कमजोरी के भावों को पढ़ते हुए उस ने बड़ी शालीनता से अपना कार्ड दिया और वहां से नजरें चुरा कर चला गया. आखिर, जिंदगी के कुछ हसीन पल हम ने साथसाथ जिए थे. मेरा मन कसैला सा हो उठा. पति और बेटे के आते ही मैं अनमने मन से उन के साथ वापस लौट आई. उस रात दुनिया मुझे बहुत छोटी लगने लगी.

सुबह दोनों को विदा कर के मैं देर तक पुरानी यादों में खोई रही. मैं जितना उन यादों को पीछे धकेलती, यादें उतनी ही प्रबल हो जातीं.

बीए में हमारा अंतिम वर्ष था. उसी वर्ष राहुल ने हमारी क्लास में ऐडमिशन लिया था. नया सा चेहरा क्लास में पा कर कोई हैरानी नहीं हुई. परंतु न चाहते हुए भी नजर उस की ओर चली जाती. मैं चोरी से उस को देखती और जब भी उस से नजरें मिलतीं, मैं शर्म से आंखें नीचे कर लेती, जैसे मेरी चोरी पकड़ी गई हो. खड़े हो कर जब भी वह किसी प्रश्न का उत्तर धीरे से देता, तो उसे देखने का कोई मौका नहीं छोड़ती. एक नशा सा छा गया था उसे देखने का और यह नशा मैं किसी से बांटना नहीं चाहती थी.

एकसाथ पढ़ते हुए हमारी औपचारिक मुलाकातें होती रहतीं. वह मुझे देख कर मुसकरा देता. उस की यह मीठी मुसकराहट दिल के तारों को भीतर तक झंकृत कर देती. एक दिन मेरे सब्र का बांध टूट गया. मैं सारी लाज, संकोच छोड़ कर उस के पास आ कर बोली, ‘‘राहुल, कोई अच्छा ट्यूटर हो तो बताना. मैं इकोनौमिक्स में बहुत कमजोर हूं. आखिरी वर्ष है. कुछ ऊंचानीचा हो गया तो सारी उम्र रोती रहूंगी.’’

‘‘मैं तो कभी ट्यूशन नहीं पढ़ता. परंतु कोई प्रौब्लम हो तो बताओ,’’ उस का स्वर सहज था. मेरी आशाओं और उमंगों की कपोलें खिलने लगीं. बस, मुझे तो उस से मिलने का बहाना मिल गया. मैं अपनेआप में बेहद मजबूत थी पर उस के सामने आते ही एकदम सुधबुध खो बैठती. शुरू से मैं चंचल प्रकृति की थी. मुझे अपनी सुंदरता व ऊपर से बौबकट बालों पर बेहद नाज था, जो लड़कों को दीवानगी की हदों को पार करने में सक्षम थे. कैंटीन हो या प्लेग्राउंड, कोई फ्री पीरियड हो या कोई असेंबली, मेरे पास आने के लिए लड़केलड़कियां मचलते थे. परंतु राहुल की छवि तो न जाने कैसे मन में बस गई. वह आंखों के रास्ते कब दिल में उतर गया, पता ही नहीं चला.

फिर तो यह क्रम ही बन गया. इधर 3 बजते, उधर मैं लाइब्रेरी में उस के पास पहुंच जाती. किंतु आंखों की भाषा कभी जबान पर न आ सकी. घंटे दिनों में बदल गए, दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में. संकोच की एक दीवार हमेशा खड़ी रही. एक बार मैं दबेपांव उस से मिलने लाइब्रेरी में पहुंची और चुटकी लेते हुए बोली, ‘इस बार यूनिवर्सिटी टौप करने का इरादा है क्या?’

‘तुम करने दो तब न,’ कह कर उस ने मेरी ओर भरपूर निगाहों से देखा, जैसे कोई रहस्य पढ़ लिया हो.

मैं काठ की मूरत के समान एकदम जड़ हो गई. मैं ने सारी हिम्मत बटोर कर कहा, ‘मैं तुम से कुछ कहना चाहती हूं. क्या हम कहीं बाहर मिल सकते हैं?’

‘तुम कुछ मत कहो,’ कह कर उस ने मुझे देखा. उस का चेहरा और शब्द उम्र से कहीं ज्यादा गंभीर हो गए. उस ने मेरे मुंह पर ताला लगा दिया. वह बोला, ‘जो तुम कहना चाहती हो, मैं जानता हूं. मेरे ऊपर बहुत सारी जिम्मेदारियां हैं इसलिए…’

उस की बात सुने बिना मैं वहां से चली गई. काश, मैं उस दिन वहां से ऐसे न गईर् होती…

जैसेजैसे परीक्षाएं नजदीक आती गईं, मेरा मन भारी होने लगा. मैं चाहती थी कि वह मुझ से बात करे. मुझे कहीं मिलने के लिए बुलाए पर ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ. मैं चाह कर भी अपने मन की बात उस से नहीं कह पाई. परीक्षाओं के बाद वही हुआ जो होना था. हमारे रास्ते अलगअलग हो गए. मैं पथरीली आंखों से घर के पास वाली मार्केट में उस का चेहरा ढूंढ़ती रही. शायद वह कहीं से आ जाए. उस का कोई ठिकाना होता तो ढूंढ़ती. पर वह तो कालेज के होस्टल में रहता था. हार कर मुझे ही अपनी कामनाओं के पंख समेटने पड़े. हमारा प्रेम परवान चढ़ने से पहले ही टूट गया. काश, उन दिनों मोबाइल और व्हाट्सऐप होते तो यह हालत न होती.

रिजल्ट आने के बाद मम्मीपापा ने घरवर देखना शुरू कर दिया. मैं ने बहुत जिद की कि मैं आगे पढ़ना चाहती हूं पर पापा चाहते थे कि रिटायरमैंट से पहले हम दोनों बहनों की शादी हो जाए.

मेरी नुमाइश शुरू हो गई. मैं शिकायत करती भी तो किस से. मेरी अंतर्वेदना सुनने वाला अब कोई नहीं था. न राहुल, न मेरे घरवाले. न सूई चली न नश्तर. न तीर चला न तलवार. माला बनने से पहले ही बिखर गई. पापा की कठोर आज्ञा और शास्त्रों के विधान के अनुसार मन के घावों को वक्त पर छोड़ कर मैं ससुराल चली आई.

शादी के बाद यथार्थ की भूमि पर पांव रखते ही मेरे सपनों का महल चरमरा कर गिर गया. मैं ने पाया की जिंदगी वैसी नहीं है जैसी मैं उस को समझती थी. पहले दिन से ही सास ने सारे गहने उतरवा लिए और कई नियमकानून कठोर शब्दों में समझा दिए. उन के दुर्व्यवहार से मुझे धीरेधीरे एहसास हो गया कि मेरा स्थान इस घर में दासी से अधिक कुछ नहीं.

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मेरी मम्मी ने भी मेरी शिकायतों पर कोईर् प्रतिक्रिया नहीं की. बस, समझाती रहीं- ‘धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’ और यह भी समझा दिया कि जब तक पति खाना न खा लें, औरतें कैसे खाना खा सकती हैं. नतीजतन, मुझे हर रात भूखा ही सोना पड़ता. प्रकृति ने हम औरतों के साथ पक्षपात किया है. बराबर का शारीरिक बल होता तो जानती. मैं हर रात पति के जुल्मों का शिकार होती. वह मुझे भूखे भेडि़ए की तरह कुचलता, मसलता और मैं उफ तक न कर पाती.

शादी के कुछ महीनों बाद अगर मेरा पांव भारी न होता तो मैं ने शायद कब की अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली होती. मुझे लगा अपने लिए न सही, आने वाली संतान के लिए जी लूंगी. लेकिन प्रकृति को तो कुछ और ही मंजूर था. 6 महीने का गर्भ लिए मैं सफेद कपड़ों में मायके पहुंचा दी गई. जहरीली शराब पीने से पति की मृत्यु हो गई. इस का सारा दोष मेरे माथे पर मढ़ते हुए मुझे ससुराल से निकाल दिया गया.

मैं औरत के बदले पत्थर पैदा होती तो प्रकृति का क्या जाता. मैं ने मृत बच्चे को जन्म दिया.

वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता रहा. धीरेधीरे मैं भी यह जीवन जीने की आदी हो चुकी थी. जल्दी ही मुझे एक औफिस में नौकरी मिल गई. मैं ने घर की वह दहलीज हमेशा के लिए पार कर दी जहां कभी मेरा बचपन बीता था. तब मैं ने यह जाना कि यह मैन्स वर्ल्ड है यानी पुरुषों का संसार, जहां आज भी औरतों को भोगने और मनोरंजन की वस्तु समझा जाता है.

औफिस में आसपास की कुटिल निगाहों से बचने के लिए मैं ने एक विधुर से विवाह करना मंजूर कर लिया जिस का एक बेटा था. मेरा यह दर्द एक ऐसा दर्र्द था जो किसी से बांटा नहीं जा सकता था.

महरी की कई घंटियों से मेरी तंद्रा टूटी. मैं अतीत से वर्तमान में आ गई जहां अब भी बहुत अंधेरा था. मैं ने अनमने मन से दरवाजा खोला. आज मेरा कुछ भी करने को मन नहीं हो रहा था. प्रेम, फासलों और वक्त का मुहताज नहीं है, यह मैं ने आज जाना था.

मैं ने उस का कार्ड निकाला. कई बार पढ़ा. भूलीबिसरी यादें फिर से जीवंत हो उठीं. पता नहीं कैसे मन की परतों में छिपी चिनगारी फिर से भभक उठी. मैं उसे जितना भुलाने का प्रयास करती, पछाड़ खाता समय उतना ही समीप आ बैठता. मैं ने जितनी बार उसे फोन करने के लिए फोन उठाया, मन तेजी से धड़कने लगता और फिर मैं फोन रख देती. किंतु एक दिन मैं स्वयं को रोक नहीं पाई और फोन कर दिया.

‘‘कैसे हो राहुल?’’ मैं ने धीरे से पूछा.

‘‘यह तो अपने दिल से पूछो. तुम ने तो अपना फोन नंबर दिया नहीं था. फिर फोन करने की बारी तो तुम्हारी थी,’’ वह सीधीसरल बातें करने का आदी था.

‘‘कहां हो आजकल? कभी इस तरफ आओ, तो मिलना,’’ मैं ने कहा.

‘‘कभी क्यों, तुम कहो तो कल ही आ जाता हूं. अपना पता एसएमएस कर देना. तुम को बुरा तो नहीं लगेगा?’’

‘‘मैं इंतजार करूंगी,’’ कह कर मैं ने फोन काट दिया.

और वह सचमुच दोपहर को मेरे सामने खड़ा था. मैं बेहद खुशी से उसे भीतर ले आई. उस के चेहरे पर कईर् रंग प्रसन्नता और विस्मयता के थे.

‘‘तुम तो सचमुच आ गए,’’ मैं ने कहा. मेरा मन बहुरंगी फुहारों से भर उठा.

‘‘क्यों, तुम को विश्वास नहीं था कि मैं यहां आऊंगा?’’

‘‘नहीं, मुझे पूरा विश्वास था कि…’’ कहतेकहते मैं रुक गई, ‘‘अच्छा, मैं कुछ ठंडा ले कर आती हूं,’’ कह कर मैं वहां से चली गई.

बातोंबातों में उस ने बताया कि उस का सेलैक्शन बैंक में हो गया था. एक महीने की ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद जाना पड़ा. ‘‘सोचा था कि आते ही तुम से मिलूंगा और जब तक तुम को ढूंढ़ता, तुम्हारी शादी हो चुकी थी. अब मिलता भी तो किस से? फिर पता चला कि किन्हीं कारणों से तुम वापस अपने पापा के पास आ गईर् हो. इसी दौरान मैं ने बैंक की नौकरी छोड़ दी और जेएनयू में जर्नलिजम में मास्टर्स में दाखिला ले लिया. वही मेरा पैशन था,’’ राहुल ने कहा.

‘‘और मेरे बारे में तुम्हें कौन बताता रहा?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘तुम मुझ से सीधा भी तो मिल सकते थे?’’

‘‘हां, मिल सकता था. मेरा मन ही जानता है मैं तुम से मिलने के लिए कितना विचलित था. और कहांकहां से तुम्हारे बारे में पूछता रहा. बस, एक संकोच सा था कि तुम कैसे रिऐक्ट करोगी. मैं ने कोई सीधेमुंह जवाब भी तो नहीं दिया था. मेरी सारी आरजुएं मजबूरी में तबदील हो गईं. मैं कहां जानता था कि वही हमारी आखिरी मुलाकात होगी,’’ कह कर उस ने नजरें फेर लीं.

‘‘और घरपरिवार?’’ मैं ने जैसे उस की किसी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो.

‘‘तुम्हारे बाद फिर कभी कोई मन को नहीं भाया. हो सके तो मुझे माफ कर देना. मैं ही तुम्हारी इस हालत का कारण हूं,’’ वह चुप हो गया.

आंसुओं को आंखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता मिल गया. पलकें झपकाझपका कर उस ने बड़ी सफाई से आसुंओं को रोक लिया. हमारे बीच एक अभेद्य सी दीवार खड़ी हो गई. वातावरण एकदम मातमी सा हो गया था जैसे कोई मर गया हो. एक लंबा गहरा सन्नाटा सा पसर गया.

सहसा दीवार की घड़ी ने 2 का घंटा बजाया तो वह बोला, ‘‘अच्छा प्राची, अब मैं चलूंगा. यहां बैठा रहा तो सैलाब उमड़ पड़ेगा.’’

‘‘खाना खा कर जाना, राहुल, मैं झटपट कुछ बना लाती हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘नहींनहीं, अब बहुत देर हो चुकी है, मुझे अब जाना ही होगा.’’

‘‘मेरे घर से इस तरह मत जाओ राहुल,’’ मैं रोंआसी सी हो गई.

‘‘मेरा खाना तुम पर उधार रहा. मैं वादा करता हूं,’’ कह कर वह उठ गया.

मैं देर तक उसे गली के कोने में देखती रही. मेरा मन फिर से बैठ गया. मन के भीतर के जिन उफनते विचारों के ज्वालामुखी को मैं शांत करना चाहती थी, वे तो और भी भड़क गए.

हमारी बातों का सिलसिला जारी रहा. दिन पखेरू की तरह उड़ने लगे. हमारी मुलाकातें बढ़ती गईं. मैं सपनों में तैरने लगी. मेरी खुशी सातवें आसमान पर थी. प्रकृति के मन में क्या था, यह तो वह जाने, किंतु मेरा वही चुलबुलापन फिर से लौट आया. वह अपने नए सीरियल के बारे में बातें करता, हम बहस करते और आगे बढ़ते जाते.

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उस दिन राहुल ने बड़े चहकते हुए फोन किया, ‘‘आज मैं बहुत खुश हूं. तुम को पार्र्टी देना चाहता हूं. चलो न कहीं चलते हैं.’’

‘‘ऐसा क्या हो गया,’’ मैं ने बाजार में शौपिंग करते हुए पूछा.

‘‘बस, मिलने पर ही बताऊंगा. मैं थोड़ी देर में आ रहा हूं,’’ कह कर उस ने फोन काट दिया. मैं न नहीं कर पाई. वही मेरी प्राथमिकता थी. मैं झट से घर गई. अपना लकी सूट पहना जिस में मैं उस को पहले दिन मिली थी. मैंचिंग चप्पल, होंठों पर हलकी डबल टोन लिपस्टिक, लाख की रंगबिरंगी चूडि़यां और कश्मीरी टुपट्टा, जो उस ने कुछ दिनों पहले ही दिया था.

उस ने कार थोड़ी दूर पर पार्क की और टैक्सी बुला ली. मैं ने पूछा, ‘‘ऐसा क्या हो गया राहुल, आज अचानक?’’

‘‘मेरा सीरियल दूरदर्शन ने पास कर लिया है. मैं बहुत खुश हूं आज. प्राची, जब से तुम मुझे मिली हो, मेरे सब काम बनते जा रहे हैं.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है,’’ मैं ने कहा. उस ने अपना हाथ मेरे हाथ के ऊपर रख दिया. उस के स्पर्श में कितना अपनापन था. मैं बोली, ‘‘तुम खुश हो, इसलिए सब कामों में मन लग रहा है. यही तुम्हारी कामयाबी का राज है.’’

‘‘मेरी खुशी भी तो तुम से ही है,’’ उस ने बड़ी संजीदगी से कहा. वह मेरे इतने करीब बैठा था कि उस की सांसों को मैं महसूस कर सकती थी. मैं यह भी भूल गईर् थी कि मैं एक सम्मानित व्यक्ति की पत्नी हूं.

उस दिन देर तक हम बेमकसद कनाट प्लेस के गलियारों में घूमते रहे. उस की निगाहें मुझ पर टिकी थीं, जिस का सामना करने का साहस शायद मुझ में नहीं था. मैं ने निगाहें फेर लीं.

‘‘पिज्जाहट चलोगी?’’ उस ने पूछा. मैं ने भीड़ का बहाना बना कर टाल दिया. सच तो यह था कि हमारी कालोनी की कई किट्टी पार्टीज यहां चला करती थीं.

‘‘कौफी होम कैसा रहेगा?’’ मैं ने कहा, ‘‘मुझे 4 बजे तक घर भी पहुंचना है. बेटा आता होगा.’’

‘‘ट्रीट के लिए बड़ा चीप लगता है,’’ उस ने कहा, ‘‘चलो, तुम कहती हो तो वहीं चलते हैं.’’ फिर मेरी तरफ देख कर बोला, ‘‘मैं तो भूल ही गया था तुम्हारा एक बेटा भी है.’’

‘‘राहुल, प्लीज मेरी दुखती रग पर हाथ न रखो. शादी की है तो निभाना तो पड़ेगा ही.’’

‘‘तुम वे रिश्ते निभा रही हो जो तुम्हारे अपने नहीं हैं. तो मेरे साथ तुम्हारा यों घूमना…मैं तो समझता था कि…’’ वह बहुत धीरे से बोला.

‘‘आगे कुछ मत कहो, राहुल,’’ मैं ने बात काट कर कहा. उस के इस अप्रत्याशित व्यवहार के लिए मैं बिलकुल तैयार नहीं थी.

‘‘प्लीज, मुझे घर छोड़ दो, कौफी फिर कभी सही,’’ मैं ने कहा, ‘‘जिंदगी में किसी अपने को न पाने की तड़प और टूटन कितनी तकलीफदेह होती है, यह तुम क्या जानो.’’

उस ने आगे कुछ नहीं कहा. चुपचाप उस ने मुझे मेरे गेट पर छोड़ दिया. मैं ने सोचा, शायद वह कुछ कहेगा. और फिर मैं भी उस से अपने कठोर शब्दों के लिए माफी मांग लूंगी. मगर विदाई के लिए न उस के होंठ हिले न हाथ उठे. लगा, जैसे कोई टीस उस के मन को भेद रही है. मैं बड़े भरे मन से अपने घर में आ गई. मैं फूटफूट कर रोने लगी.

थोड़ी देर में उस का एक मैसेज आया, ‘प्राची, सचमुच मुझ से बहुत बड़ा गुनाह हो गया. तुम्हें चाहने का गुनाह. जैसेजैसे हमारी मुलाकातें बढ़ती गईं, मेरा मन तुम से मिलने को बेचैन रहने लगा. मैं यह भी भूल गया था कि तुम एक विवाहिता हो.

‘तुम्हारा भी अपना एक सामाजिक दायरा होगा. मेरा अब तुम से न मिलना ही ठीक रहेगा. बस, इतना याद रखना कि किसी आदमी ने चुपकेचुपके तुम से प्यार किया था. मैं आज तुम्हें मांग भी लूं, तुम शायद मेरी हो भी जाओ, पर जो दूसरे की है वह मेरी कैसे हो सकती है.’

कोई औरत जिंदगी में जितना रो सकती है, मैं रोई. दांपत्य का विकल्प तो संभव है पर प्रेम का नहीं. नाव को पानी में खेने के लिए किनारा छोड़ना ही पड़ता है. न जाने कैसा समय अपने नाम लिखवा कर आई हूं. मैं अकेली रहने के लिए ही जन्मी हूं.

काश, वह दोबारा न मिलता, काश…

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8 हजार करोड़ का आदर्श फ्राड

लेखक: निखिल अग्रवाल

सारधा, पर्ल आदि कंपनियां अच्छा ब्याज और मोटे रिटर्न का लालच दे कर निवेशकों के अरबों रुपए का घोटाला कर चुकी हैं. इस के बावजूद लोगों का लालच कम नहीं हुआ. इसी का नतीजा है कि हाल में ही आदर्श क्रेडिट सोसायटी ने 20 लाख लोगों के 8 हजार करोड़ रुपए डकार लिए. आखिर कब तक…

राजस्थान पुलिस के स्पैशल औपरेशन गु्रप ‘एसओजी’ के जयपुर मुख्यालय पर अगस्त 2018 में एक शिकायत मिली थी. शिकायत में कहा गया था कि आदर्श क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसायटी अहमदाबाद की ओर से निवेशकों का पैसा नहीं लौटाया जा रहा है.

कंपनी की देश के 28 राज्यों और 4 केंद्रशासित प्रदेशों में करीब 800 से ज्यादा शाखाएं हैं. इन में 309 शाखाएं अकेले राजस्थान में हैं. राजस्थान में कंपनी ने करीब 20 लाख सदस्य बनाए थे. इन में लगभग 10 लाख निवेशक सदस्य शामिल हैं. इन से करीब 8 हजार करोड़ रुपए का निवेश करवाया गया. यह राशि आदर्श क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसायटी ने अपनी शैल यानी फरजी कंपनियों में निवेश कर निवेशकों की राशि का दुरुपयोग किया है.

शिकायत में बताया गया कि पहले यह कंपनी राजस्थान के सिरोही शहर में पंजीकृत थी. कुछ साल पहले कंपनी ने अहमदाबाद में मुख्यालय बना लिया था. मल्टीस्टेट कंपनी हो जाने के कारण यह राजस्थान के कोऔपरेटिव रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो गई थी.

मामला गंभीर था. एसओजी के महानिदेशक ने पूरे मामले की जांचपड़ताल कराई. इस बीच, राजस्थान के कोऔपरेटिव रजिस्ट्रार आईएएस अधिकारी नीरज के. पवन ने भी एसओजी को शासकीय पत्र लिख कर आदर्श क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसायटी के घोटाले की जानकारी दी.

उन्होंने पत्र के साथ करीब 200 पेज की एक जांच रिपोर्ट भी एसओजी को सौंपी. जांच रिपोर्ट में कहा गया था कि इस कंपनी ने निवेशकों का पैसा ले कर वापस नहीं लौटाया. कंपनी ने निवेशकों का पैसा रियल एस्टेट और फरजी कंपनियों में लगा दिया है.

इस संबंध में कोऔपरेटिव विभाग को कई शिकायतें मिली थीं. इस पर कोऔपरेटिव रजिस्ट्रार कार्यालय के अधिकारियों ने कंपनी के अधिकारियों को तलब कर उन्हें निवेशकों का पैसा लौटाने को कहा था. इस के बावजूद कंपनी ने निवेशकों का पैसा वापस नहीं लौटाया.

एसओजी की प्रारंभिक जांचपड़ताल में आदर्श क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसायटी की ओर से फरजीवाड़ा कर निवेशकों का पैसा हड़पने की पुष्टि हो गई. इस पर जयपुर में एसओजी थाने में 28 दिसंबर, 2018 को कंपनी के खिलाफ भादंवि की धारा 406, 409, 420, 467, 468, 471, 477ए और 120बी में मामला दर्ज कर लिया गया.

रिपोर्ट दर्ज किए जाने के बाद एसओजी के अधिकारियों ने इस मामले में पूरी तरह जांचपड़ताल प्रारंभ की. चूंकि कंपनी का कारोबार 28 राज्यों और 4 केंद्रशासित प्रदेशों में फैला हुआ था, इसलिए जांच का काम कई महीने तक चलता रहा.

व्यापक जांचपड़ताल के बाद इसी साल 25 मई को एसओजी के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक डा. भूपेंद्र यादव ने इस फरजीवाड़े का खुलासा कर दिया.

उन्होंने बताया कि कंपनी ने मोटा मुनाफा देने के नाम पर करीब 20 लाख सदस्य बनाए. इन सदस्यों की ओर से निवेश की गई करीब 8 हजार करोड़ रुपए की राशि कंपनी के पदाधिकारियों ने 187 फरजी कंपनियों में लगा दी. जांच में सामने आया कि आदर्श सोसायटी को अपने निवेशकों के करीब 14 हजार 682 करोड़ रुपए लौटाने हैं.

एसओजी ने इस घोटाले में 25 मई को आदर्श कंपनी के 11 मौजूदा और पूर्व पदाधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया. इन में सिरोही निवासी कंपनी के पूर्व चेयरमैन वीरेंद्र मोदी और कमलेश चौधरी, चेयरमैन ईश्वर सिंह, मुंबई निवासी पूर्व मैनेजिंग डायरैक्टर प्रियंका मोदी व सीनियर वाइस प्रेसीडेंट वैभव लोढ़ा, अहमदाबाद निवासी चीफ फाइनैंस औफिसर समीर मोदी, जयपुर निवासी असिस्टेंट मैनेजिंग डायरैक्टर रोहित मोदी, सिरोही निवासी पूर्व मैनेजिंग डायरैक्टर ललिता राजपुरोहित, आदित्य प्रोजैक्ट के निदेशक भारत मोदी, टैक्टोनिक इंफ्रा के निदेशक भारत दास और 6 कंपनियों के डायरैक्टर विवेक पुरोहित शामिल थे.

एसओजी को जांच में यह भी पता चला कि सोसायटी के संस्थापक मुकेश मोदी और उन का भतीजा राहुल मोदी पहले ही आर्थिक अपराध के मामले में दिल्ली में गिरफ्तार हैं. इन दोनों को सीरियस फ्रौड इनवैस्टीगेशन सेल एसएफ.आईओ ने दिल्ली में कुछ माह पहले गिरफ्तार किया था.

कंपनी के 11 पदाधिकारियों की गिरफ्तारी के दूसरे दिन 26 मई को एसओजी ने एक और आरोपी राजेश्वर सिंह को गिरफ्तार कर लिया. जयपुर में वैशाली नगर के हनुमान नगर में रहने वाले राजेश्वर सिंह के पिता महावीर सिंह रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं. राजेश्वर सिंह एक अन्य कंपनी का डायरैक्टर है.

इस बीच, सोसायटी के संस्थापक मुकेश मोदी के भाई पूर्व चेयरमैन वीरेंद्र मोदी ने एसओजी की गिरफ्त में सीने में दर्द की शिकायत की. उसे जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के कार्डियक आईसीयू में भरती कराया गया.

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वीरेंद्र मोदी को 26 मई को अदालत में पेश किया जाना था, लेकिन अस्पताल में भरती होने के कारण वह अदालत नहीं पहुंचा, तो उस के बीमार होने की सच्चाई जानने के लिए न्यायाधीश अरविंद जांगिड़ अदालत से चल कर खुद अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने डाक्टरों से वीरेंद्र मोदी के स्वास्थ्य की जानकारी लेने के बाद उसे एक दिन के रिमांड पर एसओजी को सौंप दिया.

गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ और एसओजी की जांचपड़ताल में आदर्श घोटाले की जो कहानी उभर कर सामने आई, उस से पता चलता है कि हमारे देश में लोगों को मोटे मुनाफे का लालच दे कर किस तरह लूटा जा रहा है.

एक बाबू और उस के टैक्सी ड्राइवर भाई ने अपने दिमाग से खेल रच कर लोगों को बेवकूफ बनाया. वह महज 34 साल में अरबों रुपए के मालिक बन गए. मुकेश मोदी ने अपने भाइयों, बेटेबेटी और दामाद सहित परिवार के लोगों के अलावा दोस्तों को भी कंपनी में शामिल कर अथाह पैसों के सागर में डुबकी लगवाई.

कहानी की शुरुआत करीब 34 साल पहले वर्ष 1985 में हुई थी. सिरोही में प्रकाशराज मोदी रहते थे. वह ग्रामसेवक की सरकारी नौकरी से रिटायर थे. वह रिटायरमेंट के बाद भारतीय किसान संघ से जुड़ गए और उन्हें सिरोही का जिला संयोजक बना दिया गया.

प्रकाशराज मोदी के 3 बेटे हैं, मुकेश मोदी, वीरेंद्र मोदी और भारत मोदी. मुकेश मोदी पहले उद्योग केंद्र में बाबू था. बाद में वह लाइफ और जनरल इंश्योरेंस कंपनियों में बीमा एजेंट के रूप में लंबे समय तक जुड़ा रहा. कहा जाता है कि उस समय मुकेश मोदी मवेशियों की फरजी पोस्टमार्टम रिपोर्ट पेश कर बीमा क्लेम दिलवाने के मामले में मास्टरमाइंड था. बीमा के इस फरजी खेल में उसे अच्छाखासा कमीशन मिलता था.

सन 1985 में मुकेश मोदी और उस के भाइयों ने आदर्श प्रिंटर्स एंड स्टेशनरी कोऔपरेटिव सोसायटी लिमिटेड की शुरुआत की थी. इस सोसायटी में मुकेश मोदी ने खुद को दस्तावेज लेखक और बाइंडर बताया था.

भारत मोदी इस सोसायटी में मशीनमैन, इन का ड्राइवर ईश्वर सिंह भी मशीनमैन और मां सुशीला मोदी बाइंडर थी. इस सोसायटी में उस समय 18 सदस्य बनाए गए. खास बात यह है कि अधिकांश सदस्य बाद में आदर्श क्रेडिट सोसायटी से जुड़ गए.

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जब इस सोसायटी का गठन हुआ था, उस समय प्रकाशराज मोदी का एक बेटा वीरेंद्र मोदी कैसेट रिकौर्डर का काम करता था. कैसेट रिकौर्डर का काम बंद हो गया, तो उस ने स्टेशनरी की दुकान खोल ली. इस के बाद वह टैक्सी चलाने लगा.

बाद में आदर्श प्रिंटर्स एंड स्टेशनरी कोऔपरेटिव सोसायटी पर करोड़ों रुपए की स्टेशनरी बिना टैंडर सप्लाई करने के आरोप लगे. एक बार हुई औडिट में सामने आया था कि यह सोसायटी स्टेशनरी कहीं और से खरीद कर बिल अपने पेश करती है. कहा जाता है कि इस सोसायटी के कामकाज से ही मोदी परिवार के दिन बदलने शुरू हो गए थे.

इस दौरान प्रकाशराज मोदी वर्ष 1989 से 1993 तक सिरोही अरबन कौमर्शियल बैंक के चेयरमैन रहे. उन का बेटा वीरेंद्र मोदी निदेशक था. प्रकाशराज की मौत के बाद मुकेश मोदी पहले प्रबंध समिति का सदस्य बना. फिर वह बैंक का चेयरमैन बन गया. इस बीच मोदी परिवार ने वर्ष 1999 में आदर्श क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसायटी की शुरुआत की.

उस समय इस की 50 शाखाएं खोली गईं. उस समय निवेशकों का करीब 7-8 करोड़ रुपया जमा हुआ था. कुछ कारणों से करीब 9 महीने बाद ही इसे बंद कर दिया गया और निवेशकों के पैसे लौटा दिए गए.

बाद में इन्होंने रिजर्व बैंक को अरजी दे कर सिरोही अरबन कौमर्शियल बैंक का नाम बदल कर माधव नागरिक सहकारी बैंक रख लिया. यह नाम आरएसएस के दूसरे सरसंघ चालक माधव सदाशिव गोलवलकर के नाम पर रखा गया था. मुकेश मोदी के इस कदम ने उसे आरएसएस के नजदीक खड़ा कर दिया.

सहकारी संस्थाओं की कमान संभालने और राजनीतिक संरक्षण हासिल होने से मुकेश मोदी और उस के भाई वीरेंद्र मोदी का सिरोही क्षेत्र में लगातार रुतबा बढ़ता गया. वे करोड़ों रुपए में खेलने लगे. सहकारिता के क्षेत्र में प्रभाव बढ़ने और अनापशनाप पैसा आने से वीरेंद्र मोदी की राजनीतिक इच्छाएं जागृत होने लगीं.

वह सन 1999 में सिरोही नगर पालिका का चेयरमैन बन गया. बाद में सन 2003 में सिरोही नगर पालिका चेयरमैन का पद एससी कैटेगरी के लिए आरक्षित हो गया, तो वीरेंद्र मोदी ने अपने चपरासी सुखदेव को नगरपालिका का चेयरमैन बनवा दिया.

इस बीच सन 2002 में केंद्र सरकार ने एक से ज्यादा राज्यों में चल रहे सहकारी बैंकों के लिए बने कानूनों में बदलाव कर दिया. इसे मल्टीस्टेट कोऔपरेटिव सोसायटी एक्ट-2002 नाम दिया गया. अब तक माधव नागरिक सहकारी बैंक पर मोदी परिवार का एकाधिकार हो चुका था. वीरेंद्र मोदी भी इस में शामिल हो गया था.

सन 2005 में इन्होंने पूरी प्लानिंग के साथ आदर्श क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसायटी को फिर से शुरू किया तो इन के वारेन्यारे होने लगे. आदर्श सोसायटी को मल्टीस्टेट कोऔपरेटिव सोसायटी एक्ट में पंजीकृत करा कर इस का मुख्यालय सिरोही से अहमदाबाद बना दिया गया.

यह वह समय था, जब गांवों और दूरदराज के इलाकों में बैंकिंग व्यवस्था कमजोर थी. आदर्श क्रेडिट सोसायटी ने बैंकिंग व्यवस्था का विकल्प दिया. उन्होंने पौंजी स्कीम के जरिए अपने पैर जमा कर सरकारी और निजी बैंकों की तुलना में लोगों को ज्यादा ब्याज देने का लालच दिया.

इस का नतीजा यह हुआ कि मध्यम वर्ग और कालेधन के लेनदेन से जुड़े लोगों ने सोसायटी की योजना में अरबोंखरबों रुपए का निवेश किया.

साल 2009 में आदर्श सोसायटी ने गुजरात के घाटे में चल रहे 2 सहकारी बैंकों का अधिग्रहण कर लिया. इन में डीसा नागरिक सहकारी बैंक और सुरेंद्रनगर का मर्केंटाइल सहकारी बैंक शामिल था. इस से आदर्श सोसायटी ने गुजरात में अपने पैर जमा लिए.

कहते हैं कि इंसान के पास जब पैसा और प्रभाव हो, तो वह अपराध करने में भी नहीं झिझकता. वीरेंद्र मोदी के खिलाफ सिरोही में 12 से ज्यादा मामले दर्ज हैं. सिरोही में वीरेंद्र मोदी की पहचान वीरू मोदी के रूप में थी. वीरेंद्र का पहली पत्नी शकुंतला से तलाक हो चुका है. शकुंतला से उस के 2 बेटे हैं. बाद में वीरेंद्र मोदी ने बक्षा नाम की महिला से शादी कर ली. उस से एक बेटा है.

सिरोही के आदर्श नगर में वीरेंद्र मोदी का 10 हजार वर्गफीट एरिया में फैला आलीशान बंगला है. इस में स्विमिंग पूल, गार्डन सहित सभी सुखसुविधाएं हैं. वहां हाईमास्ट लाइट भी लगी हैं. इस लाइटों के बिल का भुगतान पहले नगर पालिका अदा करती थी.

वीरेंद्र के पास काले रंग की रेंज रोवर सहित कई लग्जरी कारें हैं. वह कछुए सहित कई पालतू जानवर रखने का भी शौकीन है. बंगले पर गनमैन तैनात रहता है. घोटाला उजागर होने पर वन विभाग ने वीरेंद्र मोदी के सिरोही स्थित बंगले से दुर्लभ प्रजाति के 21 स्टार कछुए बरामद किए. वन विभाग ने वीरेंद्र के खिलाफ केस भी दर्ज कर लिया था.

आदर्श क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसायटी का पूरा काम मुकेश मोदी संभालता था, जबकि रियल एस्टेट का काम वीरेंद्र मोदी देखता था. मुकेश मोदी ने अपनी बेटी प्रियंका मोदी और दामाद वैभव लोढ़ा के अलावा भाईभतीजों और निकटस्थ लोगों को इस सोसायटी में पदाधिकारी बना रखा था.

राजस्थान में 2017 में उजागर हुए जम्मूकश्मीर के फरजी हथियार लाइसैंस मामले में भी मुकेश मोदी और उस का बेटा राहुल मोदी आरोपी हैं. दोनों को एटीएस मुख्यालय जयपुर बुला कर फरजी हथियार लाइसैंस मामले में पूछताछ की गई थी. बाद में इन्होंने अग्रिम जमानत करा ली थी.

दिल्ली में मुकेश मोदी और उन के बेटे की गिरफ्तारी के बाद से वीरेंद्र मोदी ही सोसायटी का मुख्य कर्ताधर्ता था. एसओजी की ओर से गिरफ्तार किया गया आदर्श क्रेडिट सोसायटी का चेयरमैन ईश्वर सिंह पहले कभी वीरेंद्र मोदी के साथ ही टैक्सी चलाता था.

पहली जून को एसओजी ने 4 आरोपियों को अदालत से 5 दिन के रिमांड पर दोबारा लिया. इन में वीरेंद्र मोदी, रोहित मोदी, विवेक पुरोहित और भरत वैष्णव शामिल थे. एक आरोपी ईश्वर सिंह को अदालत ने न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया था. इस से एक दिन पहले वैभव लोढ़ा को भी अदालत से पुलिस रिमांड पर लिया गया.

रिमांड के दौरान एसओजी की टीम वीरेंद्र मोदी और भरत वैष्णव को ले कर सिरोही पहुंची. इन के आवासों की तलाशी में जमीनों और निवेश से जुड़े दस्तावेज जब्त किए गए. वीरेंद्र मोदी के बंगले से करीब डेढ़ हजार प्लौटों के पट्टे मिले. ये पट्टे अलगअलग नाम से थे और सिरोही व आसपास के इलाकों में काटी गई कालोनियों के थे. इन पट्टों की कीमत करीब 300 करोड़ रुपए के आसपास आंकी गई.

एसओजी की जांच में यह भी पता चला कि आदर्श क्रेडिट कोऔपरेटिव सोसायटी के संचालक की बेटी प्रियंका मोदी और दामाद वैभव मोदी का हर महीने वेतन डेढ़ करोड़ रुपए था. शादी होने से पहले प्रियंका मोदी 5 साल के दौरान करीब 75 करोड़ रुपए तो वेतन के एवज में ही ले चुकी थी.

शादी के बाद प्रियंका के पति वैभव मोदी को डेढ़ करोड़ रुपए महीने के हिसाब से वेतन दिया जा रहा था. वह करीब 45 करोड़ रुपए सैलरी ले चुका था. प्रियंका और वैभव मुंबई में रहते थे, लेकिन उन्हें गुरुग्राम स्थित कंपनी में काम करना बता रखा था.

दरअसल, आदर्श सोसायटी के देश भर में विस्तार के बाद इस के संचालकों ने निवेशकों के पैसे का घोटाला करने के लिए शैल कंपनियां यानी फरजी कंपनियां बना लीं. गुड़गांव के सुशांत लोक फेज-1 की एक बिल्डिंग में मुकेश मोदी, उस के परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के नाम पर कुल 33 कंपनियां रजिस्टर्ड हैं.

असल में इस पते पर 12×15 की एक छोटी सी दुकान है. एसओजी ने जब इस पते पर छापा मारा तो यहां बंगाल का रहने वाला मोती उल मलिक मिला. उस ने बताया कि वह सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक यहां बैठता है. वह इस पते पर आने वाली सारी डाक एकत्र कर गुड़गांव में ही दूसरे औफिस पर पहुंचा देता है. एसओजी को जांच में पता चला कि इस दुकान की मालिक मुकेश मोदी की बेटी प्रियंका मोदी है.

जांच में यह भी पता चला कि मुकेश मोदी महावीर कंसलटेंसी नामक कंपनी में नौकरी कर एक करोड़ रुपए मासिक वेतन लेता था. महावीर कंसलटेंसी को आदर्श सोसायटी ने कंसलटेंसी का काम सौंप रखा था. इस कंसलटेंसी कंपनी में मुकेश मोदी की पत्नी मीनाक्षी मोदी और दामाद वैभव लोढ़ा साझीदार थे.

आदर्श सोसायटी की बैलेंसशीट के मुताबिक सोसायटी ने महावीर कंसलटेंसी को 3 साल के दौरान ही 6 अरब 60 करोड़ 73 लाख 68 हजार 938 रुपए का भुगतान किया था. इस में वर्ष 2015-16 में 59 करोड़ 36 लाख रुपए, वर्ष 2016-17 में एक अरब 94 करोड़ रुपए और वर्ष 2017-18 में 4 अरब 6 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया.

इस कंपनी का रजिस्ट्रेशन वर्ष 2013-14 में कराया गया था. उस समय इस कंपनी का टर्नओवर शून्य था. यानी एक रुपए का भी व्यापार नहीं हुआ था, लेकिन 3 साल बाद ही सन 2017 में इस कंपनी का टर्नओवर 500 करोड़ रुपए पहुंच गया.

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नोटबंदी के दौरान मोदी परिवार ने 223 करोड़ 77 लाख रुपए कैश इन हैंड बताए थे. इस राशि को खपाने के लिए भी कई फरजीवाड़े किए गए. इस में परिचितों व परिवार के लोगों को फरजी कंपनियों के शेयर होल्डर बना कर उन के खातों में आरटीजीएस के माध्यम से लेनदेन किया गया. बाद में इस राशि से कपड़ों की खरीदारी बताई गई. यह कपड़ा कहां से आया और कहां गया, इस की कोई जानकारी एसओजी को नहीं मिली.

इस के अलावा मोदी बंधुओं ने सोसायटी में बिना किसी मोर्टगेज (गिरवी/रेहन) प्रक्रिया के लोन के नाम पर अपने रिश्तेदारों और जानकारों को अरबों रुपए बांट दिए. गिरवी के नाम पर कोई चलअचल संपत्ति के दस्तावेज नहीं होने से लोन लेने वालों ने यह राशि सोसायटी को नहीं लौटाई.

पुलिस रिमांड पर चल रहे आदर्श सोसायटी घोटाले के पांचों आरोपियों वीरेंद्र मोदी, वैभव लोढ़ा, रोहित मोदी, विवेक पुरोहित और भरत वैष्णव को एसओजी ने 5 जून को जयपुर में अदालत में पेश किया. अदालत ने इन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया. इस से पहले इस मामले में गिरफ्तार अन्य 7 आरोपियों को भी जेल भेजा जा चुका था.

इस के बाद एसओजी ने आदर्श सोसायटी घोटाले के मुख्य सूत्रधार मुकेश मोदी और उस के भतीजे राहुल मोदी पर शिकंजा कसा. इन दोनों को सीरियस फ्राड इनवैस्टीगेशन सेल (एसएफ.आईओ) ने दिल्ली में दिसंबर 2018 में गिरफ्तार किया था.

एसएफआईओ ने मुकेश और राहुल मोदी के अलावा इन के सहयोगी को आदर्श सोसायटी में गड़बडि़यां कर निवेशकों से करोड़ों रुपए की धोखाधड़ी करने तथा फरजी कंपनियां बना कर उन को ऋण दे कर हेराफेरी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. बाद में एक बार छूटने के बाद इन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया. ये दोनों हरियाणा की गुड़गांव जेल में बंद थे.

एसओजी 10 जून को मुकेश और राहुल मोदी को प्रोडक्शन वारंट पर गिरफ्तार कर जयपुर ले आई. इन्हें अगले दिन जयपुर की अदालत में पेश कर 5 दिन के रिमांड पर लिया गया. मुकेश मोदी ही आदर्श सोसायटी का संस्थापक अध्यक्ष है.

मुकेश और राहुल मोदी से एसओजी ने 5 दिन तक पूछताछ की, लेकिन घोटाले और निवेशकों की रकम के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिल सकी. इस पर एसओजी ने इन्हें दोबारा रिमांड पर लिया.

इस दौरान उन्हें जयपुर से अहमदाबाद भी ले जाया गया. रास्ते में पाली जिले के बर चौराहे पर एसओजी के पुलिसकर्मियों ने दोनों आरोपियों की खातिरदारी भी की. सड़क पर कराए गए चायनाश्ते की तसवीरें वायरल होने पर एसओजी को बदनामी भी झेलनी पड़ी थी. अहमदाबाद में आदर्श सोसायटी के मुख्यालय पर दस्तावेजों की जांच की गई.

रिमांड अवधि पूरी होने पर एसओजी ने मुकेश और राहुल मोदी को 22 जून, 2019 को जयपुर में अदालत में पेश किया. अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

एसओजी अभी इस मामले की जांचपड़ताल में जुटी हुई है. आदर्श सोसायटी के खिलाफ  राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के पीडि़त निवेशकों ने 50 से अधिक एफआईआर दर्ज कराई है. इस के अलावा इसी सोसायटी के खिलाफ  दायर करीब 300 परिवादों की जांच की जा रही है. गुजरात व मध्य प्रदेश में भी इस सोसायटी के खिलाफ पुलिस में मामले दर्ज हुए हैं.

आदर्श सोसायटी का घोटाला सामने आने के बाद मुकेश मोदी के भतीजे राहुल मोदी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक फोटो भी खूब वायरल हो रही है. इस फोटो में राहुल प्रधानमंत्री से बातचीत करते नजर आ रहा है. फोटो महाराष्ट्र के नासिक की है. इस में प्रधानमंत्री मोदी आदर्श सोसायटी की नासिक शाखा पर मौजूद हैं. प्रधानमंत्री के साथ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी दिखाई दे रहे हैं.

आदर्श सोसायटी के जरिए अरबों रुपए में खेलने वाले मुकेश मोदी और उन के भाई वीरेंद्र मोदी की महत्त्वाकांक्षा राजनीति में आने की भी रही है. सन 2004 के लोकसभा चुनाव में मुकेश मोदी ने सिरोही से भाजपा टिकट हासिल करने के प्रयास किए थे, लेकिन तब उन के विरोधियों ने माधव सहकारी नागरिक बैंक में वित्तीय गड़बडि़यों का पुलिंदा भाजपा आलाकमान तक पहुंचा दिया था. इस से मुकेश मोदी हाथ मलता रह गया था.

बाद में 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सिरोही में मुकेश मोदी के पोस्टर और होर्डिंग लगाए गए थे. उस समय मुकेश ने भाजपा से लोकसभा टिकट हासिल करने की पूरी कोशिशें की थीं, लेकिन विरोधियों ने इस बार भी कई तरह के दस्तावेज आलाकमान को भेज कर उन के अरमानों पर पानी फेर दिया था.

आयकर विभाग 2009-10 और 2018 में आदर्श सोसायटी के ठिकानों पर छापे मार कर काररवाई कर चुका है. आयकर विभाग को पहली बार के छापे में यह लग गया था कि सोसायटी में कालेधन के लेनदेन को ले कर गलत तरीके से निवेश हो रहा है. उस समय आदर्श सोसायटी के अनेक लौकर्स से भारी मात्रा में कालाधन बरामद किया गया था.

जून 2018 में आदर्श सोसायटी के अहमदाबाद, जोधपुर, सिरोही सहित 15 ठिकानों पर 100 से ज्यादा अफसरों ने करीब 10 दिन तक छापे की काररवाई की थी. एसओजी ने भले ही आदर्श सोसायटी के घोटाले का भंडाफोड़ कर इन के कर्ताधर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है, लेकिन सोसायटी में अपनी मेहनत की जमापूंजी लगाने वाले निवेशकों को उन का पैसा वापस मिलता नजर नहीं आ रहा है. इस का कारण कानून की कमियां हैं.

आयकर विभाग ने भी मोदी बंधुओं की काफी संपत्तियां जब्त कर रखी हैं. आदर्श सोसायटी के 187 ऋण खातों में 31 मार्च 2019 को 146 अरब 82 करोड़ 24 लाख 42 हजार 239 रुपए बकाया चल रहे थे.

मानसिक तनाव को दूर भगाएं ये 6 खास उपाय

हर कोई अपने जीवन में मानसिक तनाव से जूझता रहता है. हालांकि मानसिक तनाव को रोकना किसी के बस की बात नहीं है. लेकिन आप अपने तनाव को कंट्रोल कर सकते हैं. आप कुछ खास उपायों से अपने मानसिक तनाव को कम कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं आप कैसे अपने मानसिक तनाव को कम करें.

तनावपूर्ण रिश्ते से बचें

ऐसे रिश्ते में रहने से बचें, जहां आपके पार्टनर को आपकी कोई फिक्र ही ना हो. जो समय- समय पर आपको बेइज्जत करे. क्योंकि ऐसा रिश्ता आपको खुश करने के बजाए तनाव में डाल सकता है.

सीधे होकर चलें

एक शोध में यह बात साबित हो चुकी है कि अपने सिर को ऊंचा रखकर सीधे चलने से मूड अच्छा होता है. साथ ही कंधों को झुका कर चलने से व्यक्ति के अंदर नेगेटिव विचार आते हैं. इसलिए जितना हो सके सीधे होकर ही चलें.

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 एक्सरसाइज करें

एक शोध के अनुसार हफ्ते में कम से कम 3 बार एक्सरसाइज करने से मानसिक तनाव 19 फीसदी तक कम होता है. शोधकर्ताओं की मानें तो एक्सरसाइज करने वालों को कम तनाव होता है, जबकि बहुत तनाव में रहने वाले लोग वो होते हैं जो एक्सरसाइज ही नहीं करते.

समय पर सोएं

नींद पूरी ना होने के कारण भी व्यक्ति तनाव में आ जाता है. क्योंकि अगर आप सही नींद नहीं लेते तो आपका दिमाग ठीक से काम नहीं करता. जिस कारण आप तनाव के शिकार हो जाते हैं. इसलिए तनाव से दूर रहने के लिए जरूरी है कि आप सही नींद लें.

एक समय पर एक ही काम करें

भाग दौड़ भरे जीवन में समय की बचत के लिए अकसर लोग एक समय पर कई सारे काम करने लगते हैं. एक साथ कई चीजों पर ध्यान देने की वजह से उनका कोई काम ठीक से नहीं हो पाता है. जो लोगों में तनाव का कारण बन जाता है. इसलिए जितना हो सके एक समय पर एक ही काम करें और तनाव से खुद को दूर रखें.

खुद के लिए समय निकलें

फैमिली, फ्रेंड्स और काम में लोग अकसर इतना बिजी हो जाते हैं कि वो खुद को समय ही नहीं दे पाते. जिस कारण भी लोग धीरे-धीरे तनाव में आने लग जाते हैं. इसलिए जरूरी है कि अपनी बिजी लाइफ में आप अपने लिए कुछ समय जरूर निकालें और उस समय में वो काम करें जिससे आपको खुशी महसूस होती है.

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छा रहा है फैशन का मौनसून

बारिश के मौसम यानी मौनसून में दिल का मयूर रहरह कर नाच उठता है. इस मौसम में कुछ अलग अंदाज के फैशनेबल कपड़े पहनने का मजा ही कुछ और होता है.

आशिमा एस कुटोर की संस्थापक और फैशन डिजाइनर आशिमा शर्मा बता रही हैं कि मौनसून के अनुरूप आप के वार्डरोब में किस तरह की ड्रैसेज होनी चाहिए. ये ड्रैसेज स्टाइलिश लुक देने के साथसाथ कंफर्टेबल भी रहेंगी:

बैल स्लीव ड्रैस: बैल स्लीव ड्रैस फेमिनिन और सैक्सी लुक प्रदान करती है. आप शौर्ट्स या रफ्ड जींस के साथ इसे आराम से पहन सकती हैं. इस मौनसून आप ढीले व सिल्हूट कपड़े पहनें, क्योंकि ये बारिश के मौसम के लिए सब से ज्यादा आरामदायक होते हैं.

बौडीकोन ड्रैस: बौडीकोन ड्रैस पहन कर आप सैक्सी और गुडि़या सी नजर आएंगी. महिलाएं आमतौर पर इसे पार्टी और रात की डेट पर पहनना पसंद करती हैं. आप बौडीकोन पहन कर उस पर कमर के चारों तरफ शर्ट को बांध लें. यह पहनावा आप को 90 के दशक का लुक देगा. आप इस के साथ स्नीकर्स पहन कर लुक पूरा कर सकती हैं. ग्राफिक बौडीकोन के ऊपर टीशर्ट भी आजमा सकती हैं. बस टीशर्ट के एक तरफ से गांठ बांध लें ताकि यह ढीला व अजीब लुक न दे. आप इसे सफेद स्नीकर्स के साथ भी लंबे समय तक पहन सकती हैं.

वनपीस शर्ट ड्रैस: ओवर साइज ड्रैस मौनसून के लिए बिलकुल सही विकल्प है. यह काफी ढीलीढाली व लचीली होती है और आप को आकर्षक व फंकी लुक देती है. कौटन शर्ट के साथ सफेद स्नीकर्स पहनें.

कुलोट्स: यह आजकल काफी ट्रैंड में है. यह कंफर्टेबल होने के साथसाथ प्रोफैशल लुक भी देता है. आप इसे पहन आराम से मीटिंग में जा सकती हैं. कुलोट्स में बहुत वैराइटीज उपलब्ध हैं. आप इसे लिनेन क्रौप टौप के साथसाथ डैनिम जैकेट के साथ भी पहन सकती हैं. यह आप को गरमी से भी बचाएगा.

टैसल व फ्रिंज वाले कपड़े: 60 के दशक में फ्रिंज काफी चलन में था. लेकिन यह ट्रैंड कुछ बदलाव के साथ अब वापस आ गया है. आजकल बाजुओं में और कपड़े के नीचे फ्रिंज ड्रैस पहन कर आप पार्टी में भी जा सकती हैं. इसे लंबे बूटों व मैचिंग ज्वैलरी के साथ पहनें.

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मौनसून के मौसम में आप अपनी पर्सनैलिटी में किस तरह फैशनेबल ट्विस्ट ला सकते हैं, यह बता रहे हैं रंगरीति के एमडी, सिद्धार्थ बिंद्रा:

गोल्ड फौयल प्रिंट: मौनसून में हलके मैटीरियल और पेस्टल शेड्स खूब जंचते हैं. अगर आप अपनी पेस्टल कुरती को गोल्ड फौयल प्रिंट के साथ हलका सा शिमर टच दे दें तो इस मौसम में आप की खूबसूरती में चार चांद लग जाएंगे. यह इस मौसम में खूबसूरत दिखने का सब से अच्छा तरीका है. हलके चंदेरी कौटन जैसे मैटीरियल पर गोल्ड फौयल प्रिंट्स इस मौसम में बहुत अच्छे लगते हैं. आप टर्क्वाइश डस्ट पिंक, टील ब्लू और ब्राइट पिंक जैसे रंगों का चुनाव भी कर सकती हैं.

चमकदार रंग: जब आप का वार्डरोब बेसिक ब्लैक जैसे रंगों से भरा होगा तो आप को तैयार होने में मजा नहीं आएगा. चमकदार रंगों से अपने वार्डरोब को फैशनेबल बनाएं. मौनसून में मैटेलिक और लैदर से बचना चाहिए.

लेयरिंग: मौनसून में लेयर्स के लिए श्रग्स जैसे कई विकल्प हैं, जो आप की खूबसूरती बढ़ा सकते हैं. मौनसून में लेयरिंग का एक अच्छा तरीका है ऐथनिक क्विल्टेड जैकेट. बाजार में इन के बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं. यह क्विल्टेड ऐथनिक जैकेट जहां आप को चिक लुक देती है, वहीं हवा से भी सुरक्षित रखती है.

कोलाज/मिक्स ऐंड मैच प्रिंट: थोड़ा सा मिक्स ऐंड मैच आप की खूबसूरती को कई गुना बढ़ा देता है. मौनसून में अलगअलग रंगों एवं प्रिंट्स को मिक्स ऐंड मैच करें. मौनसून स्लिम पैंट को ब्लैक इंडी टौप के साथ मैच करें और साथ में ऐथनिक प्रिंट क्विल्टेड जैकेट पहन दिखाएं अपना स्टाइल.

फुटवियर भी हो खास

लिबर्टी के अनुपम बंसल के मुताबिक, मौनसून के लिए आप के फुटवियर का कलैक्शन आकर्षक होने के साथसाथ ऐसा होना चाहिए जो बारिश के लिए भी अनुकूल हो-

बूट: बूट मौनसून सीन में फैशनेबल और कंफर्टेबल रहते हैं. बूटों की कई तरह की वैराइटी बाजार में उपलब्ध है जैसे प्रिंटेड, लेस्ड या बकल्ड. रबड़ सोल के बूट मौनसून में अच्छे रहते हैं.

फ्लिपफ्लौप: इस मौसम में सड़कें कीचड़ और धूलमिट्टी से भरी रहती हैं. ऐसे में फ्लिपफ्लौप बेहद आरामदायक होते हैं. आजकल सभी रंगों में फैंसी फ्लिपफ्लौप उपलब्ध हैं. ये डैनिम के साथ भी बहुत जंचते हैं और टिकाऊ भी होते हैं.

फ्लोटर सैंडल: फ्लोटर सैंडल मौनसून में बेहद आरामदायक होते हैं खासतौर पर तब जब आप को परिवहन के सार्वजनिक साधनों का इस्तेमाल करना हो. इन्हें आप जींस या सेमीफौर्मल परिधान के साथ पहन कर स्मार्ट दिख सकती हैं.

क्लोग: इस मौनसून अपने पैरों को दीजिए क्लोग का आराम. यह मौनसून के लिए सब से कूल फुटवियर है. इस की सब से अच्छी बात यह है कि बारिश के मौसम में इस में किसी तरह की दुर्गंध नहीं आती. इस मौसम का लुत्फ उठाने के लिए क्लोग्स सब से आरामदायक फुटवियर है.

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लोफर्स: इस मौसम में शर्ट और शौर्ट्स सब से कैजुअल परिधान हैं. इन के साथ लोफर्स मैच कर बारिश के मौसम में भी कूल और स्मार्ट दिखें.

हील: मौनसून में भी आप हील पहन कर स्मार्ट और खूबसूरत दिख सकती हैं. अगर आप को पार्टी में जाना है तो टिकाऊ पीवीसी सोल या जैली स्ट्रैप्स के साथ हील पहनें.

वैज: हील हमेशा आरामदायक नहीं होती. ऐसे में अगर आप आरामदायक हील पहनना चाहती हैं तो वैज हील चुनें. यह जींस टाइट्स, जैगिंग्स आदि सभी परिधानों के साथ जंचती है.

गम बूट: इस मौसम में चारों ओर पानी भरा रहता है. ऐसे में गम बूट आप के पैरों को सुरक्षित रखते हैं. इन का रबड़ पानी को भीतर नहीं आने देता और इन्हें आसानी से पोंछ कर साफ किया जा सकता है.

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