भारत सरकार का नया बजट अपनेआप में कुछ नया नहीं कहता. भगवा आश्वासनों की तरह इस में भी ‘वत्स तेरा भला होगा, तुझे ऊपर वाला सुखी रखेगा, जप तप, दान, पुण्य करो, भगवान (सरकार) खुश होगा’ जैसे वाक्यों को प्रवचनकर्ता निर्मला सीतारमन (वित्त मंत्री) ने संसद में जम कर कहे और भक्तों (भाजपाई सांसदों) ने सिर झुमाझुमा कर तालियां बजाईं.

हर धर्म जब भक्तों को आकर्षित करता है तो अमीरों को 2-4 गालियां अवश्य सुनाता है. निर्मला सीतारमन ने भी अमीरों पर अतिरिक्त कर लगाया है जिस से 13 हजार करोड़ रुपए की आय होने की उम्मीद है.

5 वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन हो जाएगी जैसे वाक्य बोले गए जो असल में निरर्थक हैं क्योंकि असल में इन ट्रिलियनों (जो भी इस का मतलब हो) से गरीबों का पेट नहीं भरेगा, बेरोजगारों को रोजी नहीं मिलेगी, किसानों के खेतों में अतिरिक्त फसल पैदा नहीं होगी.

सरकारी बहीखाता असल में पुरानी चाल पर है, कुछ कर लगा दिए गए, कुछ कम कर दिए गए. आम बजट का हर कदम मुंह में जीरे के समान है. एक जीरा अगर दांतों में अड़ जाए तो घंटों तंग करता है. ऐसे बहुत से जीरे इस बजट में हैं जो किसी न किसी को परेशान करेंगे. राहत देने वाली कोई बात कहीं नहीं है.

देश की माली हालत अच्छी नहीं है. भाजपा हिंदुत्व के नाम पर जीत तो गई है पर जैसे पेशवाई युगों में सुखसमृद्धि नहीं आई थी वैसे ही इस युग में सरकारी बजट अनुष्ठान से देशवासियों का कोई कल्याण नहीं होगा.

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