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मैं अपनी पत्नी के साथ फिजिकल रिलेशन बनाना चाहता हूं, पर उसे अच्छा नहीं लगता. मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 29 साल का हूं. मेरे 7 और 5 साल के 2 बच्चे भी हैं. मैं बीवी के साथ रोजाना सेक्स करना चाहता हूं, पर उसे अच्छा नहीं लगता. मैं क्या करूं?

जवाब

बच्चे होने के बाद अकसर औरतें सैक्स से बेजार हो जाती हैं. आप बीवी को प्यार से समझाएं कि हमबिस्तरी करना आप का हक है और दोनों के लिए अच्छा भी है. इस से बीवी की सोच बदल जाएगी.

आमतौर पर शादी के कुछ समय बाद तक तो कपल्स की सेक्स लाइफ मस्‍त रहती है. लेकिन, बच्‍चा होने के बाद उनकी सेक्‍स लाइफ को ब्रेक सा लग जाता है. उनके सेक्‍स एंड रिलेशनशिप पर बच्‍चे के बाद काफी असर पड़ता है. ऐसे कपल्स कम ही होते हैं, जिनके रिलेशन में बच्‍चा होने के बाद भी उतनी ही मस्‍ती बरकरार रहती है. जाहिर सी बात है कि बच्चा होने के बाद पैरंट्स बने कपल्‍स की जिम्‍मेदारियां भी बढ़ जाती है. उनका काफी समय बच्‍चे की देखभाल करने में चला जाता है. ऐसे में हसबेंड-वाइफ एक-दूसरे के लिए वक्त नहीं निकाल पाते है.

दूसरी तरफ मां बनने के बाद किसी भी महिला की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, बच्चे की सेहत का खयाल रखना किसी भी मां की प्राथमिकता होती है. यही वजह है कि वे सेक्स लाइफ पर इतना ध्यान नहीं दे पाती. कुछ लोगों को यह लगता है कि बच्चे हो जाने के बाद सेक्स लाइफ रूचिकर नहीं रहती. ऐसा होता भी है, कई बार प्रेग्नेसी के बाद कुछ वक्त के लिए महिलाओं की सेक्स में रुचि कम हो जाती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप बच्चे की वजह से अपनी सेक्स लाइफ का आनंद न उठाएं.

शोध बताते हैं कि बच्चों के जन्म के बाद नर्व एडिंग ज्यादा सेंसिटिव हो जाते है और क्लाइमेक्स की तीव्रता बढ़ जाती है. बच्चे के जन्म के बाद कुछ टिप्स अपनाकर आप अपनी सेक्स लाइफ को दोबारा ट्रैक पर ला सकते हैं-

लौट आएगी बहार

आमतौर पर जब बच्चा कुछ महीने का हो जाता है, तो औरतों में दोबारा से मासिक धर्म होने लगता है और उनके भीतर सेक्स करने की इच्छा दोबारा होने लगती है. उनकी सेक्स लाइफ दोबारा से एक्टिव हो जाती है. कई बार महिलाओं को लगता है कि सेक्स का मकसद सिर्फ मां बनना है, लेकिन यह बात बिल्‍कुल भूल जायें, क्‍योंकि सेक्‍स का असल मकसद शादीशुदा जिंदगी में ताजगी बनाए रखना है.

बनाए रखें रोमांस 

आपका रिश्‍ता सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि भावनात्‍मक रूप से मजबूत होना चाहिए. इससे प्रेग्नेसी जैसे वक्त में रिश्तों की गर्मी बरकरार रखने में मदद मिलती है. बच्चा होने के बाद पैरंट्स की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, लेकिन बावजूद इसके उन्हें साथ में कुछ क्वॉलिटी टाइम बिताने की कोशिश करनी चाहिए. बच्चे की जन्‍म के तुरंत बाद आप बिना रिलेशन बनाए सिर्फ फोरप्ले से ही अपना सेक्स रिलेशन जवां बनाए रख सकते हैं. चाहें तो बेडरूम में म्यूजिक चलाकर और फ्लावर लगाकर रोमांटिक माहौल बना सकते हैं. इस तरह थोड़े समय बाद जब आपकी पत्‍नी के हॉर्मोन में चेंज आएगा, तो आपकी सेक्स लाइफ आसानी से पटरी पर लौट आएगी.

एक्सरसाइज करें

बच्चे के जन्म के बाद कई महिलाओं को वैजाइना में ढीलेपन की शिकायत हो जाती है. ऐसे में एक्सरसाइज या योगा की मदद से आप अपनी मसल्स को दोबारा से चुस्त कर सकती हैं. कुछ हफ्तों की एक्सरसाइज या योगा प्रैक्टिस के बाद आपकी सेक्स लाइफ दोबारा पहले जैसी ही होगी.

सावधानी बरतें

कई बार बच्चे के जन्म को आसान बनाने के लिए डिलिवरी के वक्त एप्सिटॉमी नाम की छोटी सी सर्जरी की जाती है. कई बार इस ऑपरेशन की वजह से इंटरकोर्स करते वक्त परेशानी या दर्द होता है. ऐसे में आप सावधानी जरूर बरतें, वैसे 6 से 8 हफ्ते में इस सर्जरी का असर खत्म हो जाता है और वैजाइना अपनी पुरानी शेप में लौट आती है.

अपनी पसंद का काम करें

सेक्सुअल ऐक्टिविटी के लिए ‘ एड्रनेलिन ‘ केमिकल बहुत जरूरी होता है. शरीर में इसकी मात्रा बढ़ाने की कोशिश कीजिए. अगर आप थके हुए या तनावग्रस्त हैं, तो अपनी पसंद का कोई काम कीजिए. मनपसंद मूवी देखिए या कॉफी का कप लेकर रिलैक्स कीजिए.

रिलेशनशिप के बारे में बात करें

अक्सर यह देखा जाता है कि अगर आप अपनी रिलेशनशिप के बारे में बात नहीं करते, तो यह जल्दी ही बोझिल रिश्ते में बदल जाता है. इसलिए एक-दूसरे से इस विषय पर बात कीजिए. यह तरीका आजमाने पर आपको जल्द चेंज नजर आएंगे.

क्रेजी बनें

कई पैरंट्स बच्चा होने के बाद सेक्स नहीं कर पाते. ऐसे में आपको इसे लेकर क्रेजी होना पड़ेगा. माना कि बच्चे के सामने सेक्स के कम मौके मिलते हैं, लेकिन समझदार पैरंट्स बच्चे के झपकी लेते वक्त भी एक-दूसरे को प्यार कर लेते हैं.

मानसिकता को समझें

एक-दूसरे की मानसिकता को समझें व उसी तरह परस्पर व्यवहार करें, क्योंकि शारीरिक आनंद तभी प्राप्त होगा जब मन प्रसन्न होगा. कई बार हसबेंड भी बच्चे के जन्म के तुरंत बाद अपनी वाइफ पर सेक्स करने के लिए प्रेशर डालने लगते हैं. ऐसा ना करें, इससे आपकी पत्‍नी को परेशानी हो सकती है, या सेक्स के प्रति अरुचि भी हो सकती है.

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परिवार: बच्चे को और्गनाइज्ड करें कुछ इस तरह

पूजा अपनी 6 साल की बेटी मीठी से बहुत परेशान रहती क्योंकि वह घर हो या बाहर ऐसी हरकतें कर देती जिससे पूजा को सब के सामने शर्मिंदा होना पड़ता. फिर उसके पास कहने को यही होता कि ये तो मेरा कहना ही नही मानती क्या करूं? क्या आपको भी अपने बच्चों की हरकतों के लिए शर्मिंदा होना पड़ता है? अगर ऐसा है तो इसमें गलती आपके बच्चे की नहीं बल्कि आपकी है. क्योंकि की एक पेरेंट्स के तौर पर उसे बचपन से ही हर काम में परफेक्ट बनाना आपका ही काम है. सभी पैरेंट्स चाहतें है कि उनका बच्चा और्गनाइज्ड रहे बड़ो का कहना माने उनकी इज्जत करें लेकिन इसे साकार कुछ ही पेरेंट्स कर पाते हैं. आज की बिजी लाइफ में  हर पेरेंट्स के लिए अपने बच्चे को अच्छे संस्कार देने के लिए बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ती है पर समय न होने के कारण ऐसा मुश्किल हो जाता हैं.

परवरिश का दायरा सीमित न हो– बच्चों की देखभाल करना बहुत मुश्किल है इसे किसी सीमित दायरे में नही बांधा जा सकता.  जहां पेरेंट्स के प्यार और समय की कमी उनमे उपेक्षा का अहसास भर देती है वहीं जरूरत से ज्यादा प्रोटेक्शन, प्यार उन्हें जिद्दी भी बना सकता है ऐसे में यह तय करना बहुत मुश्किल होता है कि बच्चों को कितने छूट दी जाए और कहां कड़ा रुख अपनाया जाए क्योंकि पेरेंट्स की थोड़ी सी चूक  बच्चे का रवैया बदल देती है. ऐसे में बच्चे को कैसे और्गेनाइज्ड बनाये ये बात रही है  साथी आल फौर पार्टनर शिप की साइकोलौजिस्ट प्रांजलि मल्होत्रा.

बुनियाद हो खास–  बच्चे  में बचपन से अच्छी आदतें डाले और नियम बनाये क्योंकि बचपन की सही परवरिश ही बच्चे  का भविष्य तय करती है, उम्र का ये ही पड़ाव अच्छी आदतों को सीखने का होता है. बचपन से जैसी शिक्षा आप बच्चे को देंगे वो आगे चल कर वैसा ही बनेगा इसलिए कुछ बुनियादी रूल्स बनाये.
 
मस्त माहौल के साथ बेस्ट रूटीन– घर में बच्चे के सामने पैरेंट्स कभी भी एक दूसरे से ऊंची आवाज में बात न करे न ही झगड़ा करे. घर के माहौल को हैप्पी एक्टिविटीज से खुशनुमा बनाये.  बच्चे का सुबह से शाम तक का एक रूटीन बनाये. सोने, खाने पीने, खेलने का शेड्यूल बनाये ये रूटीन ही उसे और्गनाइज करेंगे.

टाइम टेबल रिव्यू करें – समय-समय पर टाइम टेबल रिव्यू बहुत जरूरी है. सिर्फ नियम बना देना ही ठीक नही होगा बच्चा उस पर कितना अमल कर रहा है ये देखना भी पैरेंट्स का काम है. अगर पिछली बार टाइम टेबल में कुछ कमी आयी है तो उन्हें दूर करने का प्रयास करे इस काम में बच्चे को भी शामिल करेगे तो उसे भी टाइम मैनेजमेंट के महत्व का पता चलेगा.

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सोशल साइट्स से  दूरी– बचपन से ही बच्चों में मोबाइल फोन, इंटरनेट टीवी की आदत न डाले. बहुत से पैरेंट्स अपनी सुविधा के लिए बच्चे को मोबाइल य टीवी देखने को दे देते है जो  उनकी आंखों पर तो बुरा प्रभाव डालता ही है साथ ही इनकी आदतें भी बुरी हो जाती है.

बच्चे को दें वक्त– आज के टाइम में वर्किंग पैरेंट्स के पास बच्चे के लिए टाइम नही होता है लेकिन वर्किंग आवर के बाद जो भी समय है वो बच्चे को दे उसके साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड करे . वीकेंड्स पर बच्चे के लिए खास कार्यक्रम बनाये उस पर पूरा ध्यान दे.

संस्कारो की नींव– घर बच्चे की प्रथम पाठशाला होती है यहां से मिले अच्छे-बुरे संस्कारोऔर आदतो के आधार पर ही उनके भविष्य की नींव पड़ती है. नैतिक मूल्यों से भरे-पूरे संस्कारों में बीता बचपन हो तो वह अनुशासित रहता है.

जिद्द को कहे बाय बाय– अगर बच्चा जिद्दी होता जा रहा है या उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है तो उसे इस बात का एहसास दिलाना जरूरी है कि जिद करके ही वह अपनी हर जायज-नाजायज मांग पूरी नही करवा सकता है.

स्वयं बने उदाहरण–  बच्चे का पहला आदर्श उसके पैरंट्स ही होते है. इसलिए आप जो भी गुण उसमे देखना चाहते है, वह उपदेश देकर नही बल्कि स्वयं  उदाहरण बन कर दे.

स्वस्थ आदतें–  बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य के लिए उसे बाहर के बजाय घर के खाने पर ज्यादा ध्यान दे. घर का हेल्दी और  स्वच्छ  खाने की आदत डालें. जंक फूड से दूर रखें.

इन सब बातों का ख्याल रखेंगी तो आप का बच्चा भी बनेगा  और्गेनाइज्ड.

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टेलीफोन बूथ बन गए म्यूजियम

जब से स्मार्टफोन प्रचलित हुआ हैं, तब से लोगों ने टेलीफोन का इस्तेमाल करना ही बंद कर दिया है. अब धीरे-धीरे टेलीफोन भी खत्म होने के कगार पर है. पहले जमाने में लोग टेलीफोन बूथ के आगे घंटों लाइन लगाकर अपनी बारी का इंतजार करते थे लेकिन अब यह बूथ भी धीरे-धीरे विलुप्त होने लगी है.

लेकिन आज भी एक ऐसी जगह है जहां पर बूथ को बचाने के लिए एक अनोखा प्रयास किया गया है जो बिल्कुल अलग है जिसके कारण इन टेलीफोन बूथों को देखने के लिए लोगों को लाइन लगती है.

दरअसल ब्रिटेन में ये टेलीफोन बूथ संग्रहालय में बदल गए हैं. इन्हें म्यूजियम में बदलने का आइडिया वारले कम्यूनिटी एसोसिएशन नामक संस्था इन्हें म्यूजियम में बदला है. जब ब्रिटेन में 43 टेलीफोन बूथ को हटाने का फैसला लिया गया तो संस्था ने उसे बचाने के लिए एक सफल प्रयास किया. उन्होंने साल 2008 में इन बूथों को म्यूजियम में बदलने की ठानी.

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सावधान! डिजिटल जीवन से उपज रहीं गंभीर बीमारियां

आने वाले दशक में दुनिया में कनैक्टेड आबादी की बहुतायत होगी. यानी, ऐसे लोग जो लगातार अपने स्मार्टफोन जैसे डिवाइसों के जरिए इंटरनैट से जुड़े हैं. स्मार्ट सिटीज और इंटरनैट औफ थिंग्स का जमाना आ चुका है जिस में आप तो इंटरनैट से जुडे़ होंगे ही, साथ ही, आप के कपड़ेलत्ते, उपकरण, रोजमर्रा के काम आने वाली तमाम वस्तुएं, यहां तक कि घर भी इंटरनैट से जुड़ा होगा. आप का कनैक्ट रहना अपरिहार्य हो जाएगा. आप संन्यस्त जीवन जीने जैसा कड़ा फैसला ले कर ही इस से अलग हो सकते हैं वरना अरबों लोग चाहेअनचाहे कनैक्टेड होंगे ही होंगे.

सभी बनें स्मार्ट

उधर, डिजिटल इंडिया का लक्ष्य देश में डिजिटल क्रांति लाने का है ताकि सभी देशवासी स्मार्ट बन सकें, सूचना और संचार से जुड़ कर उस का लाभ उठा सकें. दूसरी तरफ व्यावसायिक लाभ की एक गहरी चाल के तहत फेसबुक द्वारा चलाए जा रहे फ्री बेसिक अभियान का अर्थ भी यही है कि हर देशवासी को डिजिटल तकनीक या कहें इंटरनैट से जुड़ी तकनीकी सुविधाओं के बारे में प्रायोगिक जानकारी सुलभ हो. इस के लिए उस को कुछ मूलभूत स्रोतों तक पहुंच मुफ्त हो.

आरोग्य भारत 2025 का लक्ष्य है कि देश और देशवासियों को स्वस्थ और सबल बनाया जाए. सच तो यह है कि डिजिटल इंडिया और आरोग्य भारत के बीच एक गहरा रिश्ता है. आरोग्य भारत का लक्ष्य पाने में डिजिटल इंडिया बहुत सहायक है पर इस का एक दूसरा पहलू भी है. डिजिटलीकरण का हद से ज्यादा बढ़ना खुद एक अस्वस्थकारी परिघटना है, यह एक रोग साबित हो चुका है.

नोमोफोबिया के शिकार

आप अपने स्मार्टफोन या टेबलेट को बिस्तर के बगल में रख कर सोते हैं, नींद खुलने के बाद जागते ही अपना मेल, फेसबुक पेज, इंस्टाग्राम चैक करते हैं, ताजा खबरें देखते हैं. बहुत देर तक लैपटौप या किसी तरह की बोर्ड या स्क्रीन न दिखे, कोई आप को आप के फोन से अलग कर दे तो आप तनावग्रस्त, निराश तथा बेचैन होने लगते हैं. फोन से दूर हटते ही बेचैनी की शिकायत है तो आप को नोमोफोबिया नामक रोग हो चुका है.

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आप में विद्ड्रौल सिम्प्टम्स दिखने लगते हैं या आप के परिवार वाले इस बात का उलाहना देते हैं कि आप उन से ज्यादा अपने फोन को समय देते हैं, यह सब है तो आप को डिजिटल डिटौक्स की जरूरत है. आप पर डिजिटल प्रदूषण के जहर का गहरा असर हो चुका है. कहने का लब्बोलुआब यह है कि दशकभर पहले जिसे इंटरनैट एडिक्शन डिस्और्डर के तौर पर महज एक असामान्य व्यवहार समझा जाता था, अब एक बीमारी की शक्ल ले चुका है.

2 वर्षों पहले स्वेंस्का और मिलान विश्वविद्यालय के एक अध्ययन ने यह साबित किया था और महज 2 वर्षों बाद ही इस रोग ने इतनी बुरी तरह पैर पसार लिया है कि इस के इलाज को व्यावसायिक दिशा मिल गई है. इस डिजिटल प्रदूषण के जहर से मुक्ति दिलाने के प्रयासों की खोज में लगे एक वैज्ञानिक कहते हैं, ‘‘मैं नहीं चाहता कि लोग पंख वाली कलम या हल की तरफ वापस लौटें, पर इतना चाहता हूं कि लोग तकनीक से स्वस्थ संबंध रखें.’’

आज हमारा दिमाग लगातार व्यस्त रह रहा है. हम स्थिर रहना तो भूल ही गए हैं. कर्मचारी काम पर केंद्रित नहीं हैं. बच्चे पढ़ाई से अलग हट रहे हैं और लोग, लोगों से दूर हो रहे हैं. लोग अब कहने लगे हैं कि वे नहीं चाहते कि उन के बच्चे इस तरह विकसित हों. वे मानने लगे हैं कि उन्हें समयसमय पर अनप्लग होना चाहिए. वे उस अनप्लग्ड जीवन को फिर से पाना चाहते हैं जब वे इस तरह कनैक्टेड नहीं थे, डिजिटल दुनिया और इंटरनैट से दूर थे. पहले के समय में मानवीय समूह के बीच लोगों का संचारसंवाद बेहतर और स्वस्थ था.

डिजिटल जीवनशैली

इलैक्ट्रौनिक मीडिया या डिजिटल माध्यम से जुड़ने के बाद हम मल्टीटास्ंिकग से नहीं बच सकते. हम एक ही वक्त में कई और भिन्न तरह के काम करते हैं. लगातार मल्टीटास्किंग से हमारी सोच उथली पड़ जाती है, एकाग्रता कमजोर होती है, रचनात्मकता घटती है और तनाव कई गुना बढ़ा रहता है.

डिजिटल जहर हमारे शरीर और दिमाग को किस तरह प्रभावित कर रहा है, इस पर गहन शोध चल रहा है. लंदन और न्यूयौर्क में दर्जनों वैज्ञानिकों की टीम, जिस में मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक, न्यूरोसाइंटिस्ट, मानव व्यवहार विज्ञानी, दार्शनिक और समाजशास्त्री शामिल हैं, शोध में जुटी है. तकनीक का यह पक्ष मानवीय व्यवहार को कैसे बदल रहा है और कितना? अभी इस की जानकारी अंश मात्र ही है, पर वह भी बहुत नकारात्मक है.

इस दौरान दुनियाभर में जनसंचार और सच्चे सकारात्मक जनजुड़ाव की ताकत पर बहस चलनी शुरू हो गई है. लोगों को लग रहा है कि डिजिटलीकरण या डिजिटल जीवनशैली मनुष्य को जोड़ने के बजाय एकाकी बना रही है. स्मार्टफोन आपसी संवाद का संघाती है, हत्यारा है. सोशल मीडिया लोगों में नार्सिसिज्म या आत्ममुग्धता बढ़ा रहा है, अनिद्रा दे रहा है और बच्चे असंवेदनशील बनते जा रहे हैं.

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डिजिटल डिटौक्स

एक शोध के तहत तंत्रिका तंत्र वैज्ञानिकों ने मोरक्को के रेगिस्तान में 35 लोगों को बिना उन के स्मार्टफोन इत्यादि उपकरणों के छोड़ दिया. कुछ ही समय बाद उन की जिंदगी बदल गई. विकसित देशों की कंपनियां डिजिटल डिटौक्स या डिजिटल विषाक्तता को दूर करने के लाइलाज का कारोबार कर रही हैं. फेसबुक संस्थापक मार्क जुकरबर्ग की बहन रैंडी जुकरबर्ग भी डिजिटल डिटौक्स के बिजनैस में हैं. इन का कारोबार बढ़ रहा है. जाहिर है, इस के मरीज भी मिल रहे हैं.

इलाज यानी डिजिटल डिटौक्स करने वाली कंपनियां व्यक्ति को सारे डिवाइसों से मुक्त कर देती हैं. फिर बातचीत के जरिए डिजिटल डिटौक्स की मात्रा और प्रकृति की पहचान या रोग का निदान किया जाता है. फिर उस के अनुरूप इलाज की व्यवस्था शुरू होती है. लोगों को एक समूह में सुरम्य स्थान पर रखते हैं जहां खेलकूद, पढ़ने, मसाज और म्यूजिक, स्पा, जिम और बाइक चलाने इत्यादि की व्यवस्था होती है. वहां आप को अपने डिवाइस से अनप्लग्ड रहने और एकांत में रह कर खुद से जुड़ने की व्यवस्था की जाती है. यह एक दिन से ले कर एक हफ्ते तक का कोर्स हो सकता है जो पर्यटन कंपनियां और बड़े होटल इत्यादि करवा रहे हैं.

डिजिटल व्याधि के इलाज, दूसरे उस की प्रक्रिया और उस से जुड़े तमाम तकनीकी व क्रियाकलाप अभी महज प्रायोगिक, फैशनेबल और शैशवावस्था में ही हैं. इस दिशा में चल रहे वर्तमान शोध और कामकाज की दशादिशा देख कर आकलन किया जा सकता है कि आने वाले एक दशक में यह रोग और जटिल होगा. तब इस के इलाज की कई नई वैज्ञानिक विधियां विकसित होंगी और यह एक भरेपूरे व्यवसाय में तबदील होगा. एक दशक बीततेबीतते यह विकसित देशों से भारत जैसे विकासशील देशों तक पहुंच जाएगा.

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बेवफाई का बदला

दिल्ली के पुल प्रह्लादपुर में रहने वाली विवाहिता गीता के नाजायज संबंध पड़ोसी कालूचरण से हो गए थे, जिस की वजह से उस ने अपने पति घनश्याम से भी दूरी बना ली थी. इसी दौरान ऐसा क्या हुआ कि कालूचरण ने गीता को सबक सिखाने के लिए उस की 6 साल की बेटी गुनीषा की हत्या कर दी…

समय- रात साढ़े 3 बजे

दिन-29 मई, बुधवार

स्थान- राजस्थान का कोटा शहर

कोटा के तुल्लापुर स्थित पुरानी रेलवे कालोनी के सेक्टर-3 के क्वार्टर नंबर 169 से गुनीषा नाम की 6 साल की बच्ची गायब हो गई. यह क्वार्टर श्रीकिशन कोली का था जो रेलवे कर्मचारी था.

6 वर्षीय गुनीषा श्रीकिशन की बेटी गीता की बेटी थी. रात को जब परिवार के सभी सदस्य गहरी नींद में थे, तभी कोई गुनीषा को उठा ले गया था. बच्ची के गायब होने से सभी हैरान थे, क्योंकि गीता अपनी बेटी गुनीषा के साथ दालान में सो रही थी. क्वार्टर का मुख्य दरवाजा बंद था. किसी के भी अंदर आने की संभावना नहीं थी.

श्रीकिशन के क्वार्टर में शोरशराबा हुआ तो अड़ोसपड़ोस के सब लोग एकत्र हो गए. पता चला घर में 9 सदस्य थे, जिन में गुनीषा गायब थी. जिस दालान में ये लोग सो रहे थे, उस के 3 कोनों में कूलर लगे थे. रात में करीब एक बजे गीता की मां पुष्पा पानी पीने उठी तो उस ने गुनीषा को सिकुड़ कर सोते देखा. कूलरों की वजह से उसे ठंड लग रही होगी, यह सोच कर पुष्पा ने उसे चादर ओढ़ा दी और जा कर अपने बिस्तर पर सो गई.

रात को साढ़े 3 बजे गीता जब बाथरूम जाने के लिए उठी तो बगल में लेटी गुनीषा को गायब देख चौंकी. उस ने मम्मीपापा को उठाया. उन का शोर सुन कर बाकी लोग भी उठ गए. गुनीषा को घर के कोनेकोने में ढूंढ लिया गया, लेकिन वह नहीं मिली. उन लोगों के रोनेचीखने की आवाजें सुन कर पासपड़ोस के लोग भी आ गए.

मासूम बच्चियों के साथ हो रही दरिंदगी की सोच कर लोगों ने श्रीकिशन कोली को सलाह दी कि हमें तुरंत पुलिस के पास जाना चाहिए.

पड़ोसियों और घर वालों के साथ श्रीकिशन कोली जब रेलवे कालोनी थाने पहुंचा, तब तक सुबह के 4 बज चुके थे. गुनीषा की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी अनीस अहमद ने इस की सूचना एसपी सुधीर भार्गव को दी और श्रीकिशन के साथ पुलिस की एक टीम घटनास्थल की छानबीन के लिए भेज दी.

अनीस अहमद ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना देते हुए अलर्ट भी जारी करवा दिया. मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने पूरे मकान को खंगाला. पुलिस टीम को श्रीकिशन की इस बात पर नहीं हुआ कि मकान का मुख्य दरवाजा भीतर से बंद रहते कोई अंदर नहीं आ सकता. लेकिन जब पुलिस की नजर पिछले दरवाजे पर पड़ी तो उन की धारणा बदल गई.

पिछले दरवाजे की कुंडी टूटी हुई थी. दरवाजा तकरीबन आधा खुला हुआ था. 3 कमरों वाले उस क्वार्टर में एक रसोई के अलावा बीच में दालान था. मकान की छत भी करीब 10 फीट से ज्यादा ऊंची नहीं थी. पूरे मकान का मुआयना करते हुए एसआई मुकेश की निगाहें बारबार पिछले दरवाजे पर ही अटक जाती थीं.

इसी बीच एक पुलिसकर्मी रामतीरथ का ध्यान छत की तरफ गया तो उस ने श्रीकिशन से छत पर जाने का रास्ता पूछा. लेकिन उस ने यह कह कर इनकार कर दिया कि ऊपर जाने के लिए सीढि़यां नहीं हैं.

आखिर पुलिसकर्मी कुरसी लगा कर छत पर पहुंचा तो उसे पानी की टंकी नजर आई. उस ने उत्सुकतावश टंकी का ढक्कन उठा कर देखा तो उस के होश उड़ गए. रस्सियों से बंधा बच्ची का शव टंकी के पानी में तैर रहा था.

बच्ची की लाश देख कर पुलिसकर्मी रामतीरथ वहीं से चिल्लाया, ‘‘सर, बच्ची की लाश टंकी में पड़ी है.’’

रामतीरथ की बात सुन कर सन्नाटे में आए एसआई मुकेश तुरंत छत पर पहुंच गए. यह रहस्योद्घाटन पूरे परिवार के लिए बम विस्फोट जैसा था. बालिका की हत्या और शव की बरामदगी की सूचना मिली तो थानाप्रभारी अनीस अहमद भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने देखा कि बच्ची का गला किसी बनियाननुमा कपड़े से बुरी तरह कसा हुआ था. गुनीषा की हत्या ने घर में हाहाकार मचा दिया.

यह खबर कालोनी में आग की तरह फैली. पुलिस टीम ने गुनीषा के शव को कब्जे में कर तत्काल रेलवे हौस्पिटल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. बच्ची की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद पुलिस ने यह मामला धारा 302 में दर्ज कर लिया.

एडिशनल एसपी राजेश मील और डीएसपी भगवत सिंह हिंगड़ भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस ने मौके पर पहुंचे अपराध विशेषज्ञों तथा डौग स्क्वायड टीम की भी सहायता ली. लेकिन ये प्रयास निरर्थक रहे. न तो अपराध विशेषज्ञ घटनास्थल से कोई फिंगरप्रिंट ही उठा सके और न ही खोजी कुत्ते कोई सुराग ढूंढ सके.

लेकिन एडिशनल एसपी राजेश मील को 3 बातें चौंकाने वाली लग रही थीं, पहली यह कि जब घर में पालतू कुत्ता था तो वह भौंका क्यों नहीं. इस का मतलब बच्ची का अपहर्त्ता परिवार के लिए कोई अजनबी नहीं था.

दूसरी बात यह थी कि गीता का अपने पति घनश्याम यानी गुनीषा के पिता से तलाक का केस चल रहा था. कहीं इस वारदात के पीछे घनश्याम ही तो नहीं था. श्रीकिशन कोली ने भी घनश्याम पर ही शक जताया. उस ने मौके से 3 मोबाइल फोन के गायब होने की बात बताई. राजेश मील यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर उन मोबाइलों में क्या राज छिपा था कि किसी ने उन्हें गायब कर दिया.

गुरुवार 30 मई को पोस्टमार्टम के बाद बच्ची का शव घर वालों को सौंप दिया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बच्ची का गला घोंटा जाना ही मृत्यु का मुख्य कारण बताया गया.

जिस निर्ममता से बच्चों की हत्या की गई थी, उस का सीधा मतलब था कि किसी पारिवारिक रंजिश के चलते ही उस की हत्या की गई थी. पुलिस अधिकारियों के साथ विचारविमर्श के बाद एसपी सुधीर भार्गव ने एडिशनल एसपी राजेश मील के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में डीएसपी भगवत सिंह हिंगड़, रोहिताश्व कुमार और सीआई अनीस अहमद को शामिल किया गया.

पूरे घटनाक्रम का अध्ययन करने के बाद एएसपी राजेश मील ने हर कोण से जांच करने के लिए पहले श्रीकिशन के उन नातेरिश्तेदारों को छांटा, जो परिवार के किसी भलेबुरे को प्रभावित कर सकते थे. साथ ही इलाके के ऐसे बदमाशों की लिस्ट भी तैयार की, जिन की वजह से परिवार के साथ कुछ अच्छाबुरा हो सकता था.

पुलिस ने गीता से उस के पति  घनश्याम से चल रहे विवाद के बारे में पूछा तो वह सुबकते हुए बोली, ‘‘वह शराब पी कर मुझ से मारपीट करता था. इसलिए मुझे उस से नफरत हो गई थी. मैं तलाक दे कर उस से अपना रिश्ता खत्म कर लेना चाहती थी.’’

उस का कहना था कि उस की वजह से मैं पहले ही अपनी एक औलाद खो चुकी हूं. यह बात संदेह जताने वाली थी, इसलिए डीएसपी भगवत सिंह हिंगड़ ने फौरन पूछा, ‘‘क्या घनश्याम पहले भी तुम्हारे बच्चे की हत्या कर चुका है?’’

गीता ने जवाब दिया तो हिंगड़ हैरान हुए बिना नहीं रहे. उस ने बताया, ‘‘साहबजी, उस के साथ लड़ाईझगड़े के दौरान मेरा गर्भपात हो गया था.’’

पुलिस संभवत: इस विवाद की छानबीन कर चुकी थी, इसलिए हिंगड़ ने पूछा कि तुम ने तो घनश्याम के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज करा रखा है.

गीता जवाब देने के बजाए इधरउधर देखने लगी तो हिंगड़ को लगा कि कुछ न कुछ ऐसा है, जिसे छिपाया जा रहा है.

थाने में चली लगातार 12 घंटे की पुलिस पूछताछ में श्रीकिशन यह तो नहीं बता पाया कि गुनीषा के गले में कसा पाया गया बनियान किस का था, लेकिन 2 बातें पुलिस के लिए काफी अहम थीं. पहली, जब आरोपी गुनीषा को उठा कर ले जा रहा था तो उस ने चीखनेचिल्लाने की कोशिश की होगी. लेकिन उस की आवाज किसी को सुनाई क्यों नहीं दी?

इस सवाल पर श्रीकिशन सोचते हुए बोला, ‘‘साहबजी, आवाज तो जरूर हुई होगी, लेकिन अपहरण करने वाले ने बच्ची का मुंह दबा दिया होगा. यह भी संभव है कि हलकीफुलकी चीख निकली भी होगी, तो 3 कूलरों की आवाज में सुनाई नहीं दी होगी.’’

पुलिस ने श्रीकिशन से पूछा कि मौके से जो 3 मोबाइल गायब हुए, वे किसकिस के थे. इस बात पर श्रीकिशन ने भी हैरानी जताई. फिर उस ने बताया कि उस का, गीता का और उस के बेटे राजकुमार के मोबाइल गायब थे.

पुलिस अधिकारियों ने घटना के समय घर में मौजूद सभी परिजनों के अलावा अन्य नातेरिश्तेदारों, इलाके में नामजद अपराधियों सहित करीब 100 लोगों से पूछताछ की, लेकिन कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई.

संदेह के घेरे में आए गीता के पति घनश्याम की टोह लेने के लिए थानाप्रभारी अनीस अहमद गुरुवार 30 मई को तड़के उडि़या बस्ती स्थित उस के घर जा पहुंचे. उस का पता भी श्रीकिशन कोली ने ही बताया था. पुलिस जब घनश्याम तक पहुंची तो वह अपने घर में सो रहा था.

इतनी सुबह आधीअधूरी नींद से जगाए जाने और एकाएक सिर पर खड़े पुलिस दस्ते को देख कर घनश्याम के होश फाख्ता हो गए. अजीबोगरीब स्थिति से हक्काबक्का घनश्याम बुरी तरह सन्नाटे में आ गया. उस के घर वाले भी जाग गए. घनश्याम के पिता मच्छूलाल और परिवार के लोगों ने ही पूछने का साहस जुटाया, ‘‘साहब, आखिर हुआ क्या? क्या कर दिया घनश्याम ने?’’

उसे जवाब देने के बजाए थानाप्रभारी अनीस अहमद ने उसे डांट दिया. मच्छूलाल ने एक बार अपने रोआंसे बेटे की तरफ देखा, फिर हिम्मत कर के बोला, ‘‘साहब, आप बताओ तभी तो पता चलेगा?’’

‘‘गुनीषा बेटी है न घनश्याम की?’’ थानाप्रभारी ने कड़कते स्वर में कहा, ‘‘तुम्हारा बेटा सुबह 3 बजे उस की हत्या कर के यहां आ कर सो गया.’’

मच्छूलाल तड़प कर बोला, ‘‘क्या कहते हो साहब, घनश्याम तो रात एक बजे ही दिल्ली से आया है. वहीं नौकरी करता है. खानेपीने के बाद हमारे साथ बातें करते हुए सुबह 4 बजे सोया था.’’

थानाप्रभारी अनीस अहमद के चेहरे पर असमंजस के भाव तैरने लगे. लेकिन उन का शक नहीं गया. उन्होंने घनश्याम को थाने चलने को कहा. घनश्याम के साथ तमाम लोग थाने आए.

भीड़ में उन्हें दिलीप नामक शख्स ऐतबार के काबिल लगा. उस का कहना था, ‘‘साहब, खूनखराबा घनश्याम के बस का नहीं है. यह तो अपनी बेटी से इतना प्यार करता था कि उस के बारे में बुरा करना तो दूर, सोच भी नहीं सकता. वैसे भी यह दिल्ली रेलवे में नौकरी करता है. कल रात ही तो आया था. नहीं साहब, किसी ने आप को गलत सूचना दी है.’’

घनश्याम के पक्ष की बातें सुन कर अनीस अहमद को उस की डोर ढीली छोड़ना ही बेहतर लगा. उन्होंने उसे अगले दिन सुबह आने को कह कर जाने दिया.

शुक्रवार 31 मई को घनश्याम नियत समय पर थाने पहुंच गया. इस से पहले कि पुलिस उस से कुछ पूछती, उस की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘साहब, गीता से तो मेरी नहीं पटी पर अपनी बेटी गुनीषा से मुझे बहुत प्यार था. मुझे गीता से अलग होने का कोई दुख नहीं था लेकिन मुझे बेटी गुनीषा की बहुत याद आती थी. इतना घिनौना काम तो मैं…’’

‘‘तुम्हारे बीच अलगाव कैसे हुआ?’’ पूछने पर घनश्याम कुछ देर जमीन पर नजरें गड़ाए रहा. उस ने डबडबाई आंखों को छिपाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘सर, छोटी तनख्वाह में बड़े अरमान कैसे पूरे हो सकते हैं?’’

कोटा शहर में रेलवे कर्मचारियों के लिए बनाए गए आवास 2 कालोनियों में बंटे हुए हैं. अधिकारी और उन के मातहत कर्मचारी नई कालोनी में रहते हैं. यह कालोनी कोटा रेलवे जंक्शन से सटी हुई है. नई कालोनी करीब 2 रकबों में फैली है. जबकि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को नजदीक की तुल्लापुर इलाके में आवास आवंटित किए गए हैं.

रेलवे स्टेडियम के निकट बनी इस कालोनी को पुरानी रेलवे कालोनी के नाम से जाना जाता है. लगभग 300 क्वार्टरों वाली इस कालोनी में क्वार्टर नंबर 169 में श्रीकिशन रह रहा था. श्रीकिशन की पत्नी का नाम पुष्पा था.

इस दंपति के गीता और मीनाक्षी 2 बेटियों के अलावा 2 बेटे राजकुमार और राहुल थे. श्रीकिशन की संगीता और जैमा नाम की 2 बहनें भी थीं. दोनों बहनें विवाहित थीं. लेकिन घटना के दिन श्रीकिशन के घर आई हुई थीं.

लगभग 25 साल की सब से बड़ी बेटी गीता विवाहित थी. लापता हुई 6 वर्षीया गुनीषा उसी की बेटी थी. करीब 7 साल पहले गीता का विवाह तुल्लापुरा के निकट ही उडि़या बस्ती में रहने वाले मच्छूलाल के बेटे घनश्याम से हुआ था.

घनश्याम दिल्ली स्थित तुगलकाबाद रेलवे स्टेशन पर नौकरी कर रहा था. घनश्याम और गीता का दांपत्य जीवन करीब 4 साल ही ठीकठाक चला. बाद में उन के बीच झगड़े शुरू हो गए. पतिपत्नी के रिश्ते इतने तनावपूर्ण हो गए थे कि नौबत तलाक तक आ पहुंची.

गीता पिछले 3 सालों से अपने पिता के पास कोटा में ही रह रही थी. तलाक का मामला कोटा अदालत में विचाराधीन था. गीता ने कोटा के महिला थाने में घनश्याम के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला भी दर्ज करा रखा था.

छानबीन के इस दौर में पुलिस के सामने 3 बातें आईं. इन गुत्थियों को सुलझा कर ही  हत्यारे तक पहुंचा जा सकता था. पहली यह कि आरोपी जो भी था, घर के चप्पेचप्पे से वाकिफ था. ऐसा कोई परिवार का सदस्य भी हो सकता था और परिवार से बेहद घुलामिला व्यक्ति भी, जिस निर्दयता से मासूम बच्ची की हत्या की गई थी, निश्चित रूप से वह गीता से गहरी नफरत करता होगा.

गीता ज्यादा कुछ बोलनेबताने की स्थिति में नहीं थी. वह सदमे में थी और बारबार बेहोश हो रही थी. वैवाहिक विवाद की स्थिति में घनश्याम सब से ज्यादा संदेहास्पद पात्र था. पुलिस ने हर कोण और हर तरह से उस से पूछताछ की लेकिन वह कहीं से भी अपराधी नहीं लगा. आखिर उसे इस हिदायत के साथ जाने दिया गया कि वह पुलिस को बताए बिना कोटा से बाहर न जाए.

राजेश मील को यह बात बारबार कचोट रही थी कि गीता जवान है, कमोबेश खूबसूरत भी है. लेकिन ऐसा क्या था कि अपनी बसीबसाई गृहस्थी छोड़ कर पिता के पास रह रही थी. पति घनश्याम के बारे में जो जानकारी पुलिस ने जुटाई थी, उस से उस का हत्या का कोई ताल्लुक नहीं दिखाई दे रहा था.

इस बीच पुलिस को यह भी पता चल चुका था कि वह सीधासादा नेकनीयत का आदमी था. इतना सीधा कि उसे कोई भी घुड़की दे कर डराधमका सकता था.

सवाल यह था कि दिल्ली जैसे शहर में रहते हुए क्या पतिपत्नी के बीच कोई तीसरा भी था? ऐसे किस्से की तसदीक तो मोबाइल ही हो सकती है. लिहाजा राजेश मील ने फौरन सीआई को हिदायत देते हुए कहा, ‘‘अनीस, गीता के गायब हुए मोबाइल का नंबर है न तुम्हारे पास? फौरन उस की काल डिटेल्स ट्रैस करने का बंदोबस्त करो.’’

अनीस अहमद फौरन इस काम पर लग गए. काल ट्रैसिंग के नतीजे वाकई चौंकाने वाले थे. अनीस अहमद ने जो कुछ बताया, उस ने एसपी राजेश मील की आंखों में चमक पैदा कर दी. गीता के मोबाइल की मौजूदगी दिल्ली के तुगलकाबाद में होने की तसदीक कर रही था. साफ मतलब था कि आरोपी दिल्ली के तुगलकाबाद में मौजूद था.

सीआई अनीस अहमद के नेतृत्व में दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने जो जानकारी जुटाई, उस के मुताबिक आरोपी का नाम कालूचरण बेहरा था. कालूचरण को पुलिस ने घनश्याम के पुल प्रह्लादपुर स्थित घर के पास वाले मकान से धर दबोचा.

कालूचरण घनश्याम का पड़ोसी निकला. गीता के दिल्ली में रहते हुए कालूचरण से प्रेमिल संबंध बन गए थे. घनश्याम और गीता के बीच अलगाव की बड़ी वजह यह भी थी. दिल्ली गई पुलिस टीम ने घनश्याम के मकान सहित अन्य जगहों से कई महत्त्वपूर्ण सुराग एकत्र किए. कालूचरण दिल्ली स्थित कानकोर में औपरेटर था.

पुलिस कालूचरण बेहरा को दिल्ली से हिरासत में ले कर सोमवार 3 जून को कोटा पहुंची. यहां शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की गिरफ्तारी दिखा कर मंगलवार 4 जून को न्यायालय में पेश कर 3 दिन के रिमांड पर ले लिया. पुलिस की शुरुआती पूछताछ में मासूम गुनीषा की हत्या को ले कर कालूचरण ने जो खुलासा किया, वह चौंकाने वाला था.

दक्षिणपूर्वी दिल्ली के पुल प्रह्लादपुर में घनश्याम के पड़ोस में रहने के दौरान ही कालूचरण के घनश्याम की पत्नी गीता से प्रेमिल संबंध बन गए थे. गीता के कोटा चले जाने के बाद भी कालू कोटा आ कर गीता से मिलताजुलता रहा. लेकिन पिछले कुछ दिनों से गीता के किसी अन्य युवक से संबंध बन गए थे. नतीजतन उस ने कालू से कन्नी काटनी शुरू कर दी थी.

कालू ने जब उसे समझाने की कोशिश की तो उस ने उसे बुरी तरह दुत्कार दिया था. बेवफाई और अपमान की आग में सुलगते कालू ने गीता को सबक सिखाने की ठान ली. इस रंजिश की बलि चढ़ी मासूम गुनीषा.

पड़ोसी होने के नाते घनश्याम और कालू के बीच अच्छा दोस्ताना था. पतिपत्नी के बीच अकसर होने वाले झगड़े में कालू गीता का पक्ष लेता था. नतीजतन गीता का झुकाव कालू की तरफ होने लगा. गीता का रंगरूप बेशक गेहुआं था, लेकिन भरे हुए बदन की गीता के नैननक्श काफी कटीले थे.

कालू से निकटता बढ़ी तो गीता पति की अनुपस्थिति में कालू के कमरे पर भी आने लगी. यहीं दोनों के बीच अनैतिक संबंध बने. अनैतिक संबंध बनाने के लिए कालू ने उसे अपने प्यार का भरोसा दिलाते हुए कहा था कि वह शादी नहीं करेगा और सिर्फ उसी का हो कर रहेगा.

दिल्ली में पतिपत्नी के बीच झगड़े इस कदर बढे़ कि गीता ने घनश्याम को छोड़ने का फैसला कर लिया और बेटी गुनीषा को ले कर कोटा आ गई.

पिता के लिए बेटी का साझा दुख था. इसलिए उस ने भी बेटी का साथ दिया. यह 3 साल पहले की बात है. इस बीच गीता ने घनश्याम पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए तलाक का मुकदमा दायर कर दिया था. यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है.

गीता के कोटा आ जाने के बावजूद कालू के साथ उस के संबंध बने रहे. कालू अकसर कोटा आता रहता था और 4-5 दिन गीता के घर पर ही रुकता था. कालू ने गीता को खुश रखने के लिए पैसे लुटाने में कोई कसर नहीं रखी थी.

पिछले करीब 6 महीने से कालू को अपने और गीता के रिश्तों में कुछ असहजता महसूस होने लगी. दिन में 10 बार फोन करने वाली गीता न सिर्फ उस का फोन काटने लगी थी, बल्कि अपने फोन को व्यस्त भी दिखाने लगी थी. कालू ने गीता की बेरुखी का सबब जानने की जुगत लगाई तो पता चला कि उस की माशूका किसी और के हाथों में खेल रही है. उस ने अपने रसूखों से इस बात की तसदीक भी कर ली.

हालात भांपने के लिए जब वह कोटा पहुंचा तो गीता में पहले जैसा जोश नहीं था. उस ने कालू को यहां तक कह दिया कि अब वह यहां न आया करे. गुस्से में उबलता हुआ कालू दिल्ली लौटा तो इसी उधेड़बुन में जुट गया कि गीता को कैसे उस की बेवफाई का ताजिंदगी याद रखने वाला सबक सिखाए. उस ने गीता की बेटी और पूरे परिवार की चहेती गुनीषा को मारने का तानाबाना बुन लिया.

अपनी योजना को अंजाम देने के लिए वह 29 मई की रात को ट्रेन से कोटा आया. घर का चप्पाचप्पा उस का देखाभाला था.  30 मई की देर रात वह करीब 2 बजे पीछे के रास्ते से घर में घुसा और सब से पहले उस ने तख्त पर पड़े तीनों मोबाइल कब्जे में किए. फिर गीता के पास सोई गुनीषा को चद्दर समेत ही उठा लिया.

नींद में गाफिल गुनीषा कुनमुनाई भी, लेकिन कालू ने उस का मुंह बंद कर दिया. कूलरों के शोर में वैसे भी गुनीषा की कुनमुनाहट दब गई. गुनीषा का गला घोंट कर टंकी में डालने की योजना वह पहले ही बना चुका था. छत पर जाने का रास्ता भी उसे पता था.

गुनीषा को दबोचे हुए वह छत पर पहुंचा. अलगनी से उठाई गई बनियान से उस का गला घोंट कर कालू ने उसे पानी की टंकी में डाल दिया फिर वह जिस खामोशी से आया था, उसी खामोशी से बाहर निकल गया. मोबाइल इस मंशा से उठाए थे, ताकि इस बात की तह तक पहुंचा जा सके कि गीता के आजकल किस से संबंध थे. लेकिन मोबाइल ही उस की गिरफ्तारी का कारण बन गए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कहानी सौजन्य: मनोहर कहानी

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लुक मिस्टर द्रोण

हद है भाई भतीजावाद की. बेचारे द्रोणाचार्य, धनुर्विद्या में पारंगत, उन्हें शकुनी, जिस की उन के आगे कोई औकात नहीं, के चलते अपने रूल बदलने पड़े. अब आप ही बताएं, आज के शिक्षातंत्र में शकुनी जैसे तथाकथित धुरंधर बैठे हैं. किस में दम है सुधार करने का…

द्रोणाचार्य ने अपने 105 शिष्यों की निशानेबाजी की परीक्षा ली थी जिस में उन को पंछी की आंख को निशाना बनाना था. केवल अर्जुन पास हुआ, बाकी फेल हो गए. महाभारतकार अर्थात व्यास ने आगे की कथा द्रोण के प्रति अपनी मैत्री के कारण नहीं बताई. हुआ यह कि कौरवों के फेल होने की खबर द्रोणाचार्य के किसी स्टाफ ने महाराज धृतराष्ट्र को दे दी. उन्होंने शकुनी साहब के साथ विचारविमर्श किया और द्रोणाचार्य को तलब किया. गुप्तकक्ष में मंत्रणा की गई.

महाराज के पीए शकुनी ने कहा, ‘लुक मिस्टर द्रोण, वी नो दैट, आप के द्वारा ली गई पंछी परीक्षा में केवल अर्जुन पास हुआ. यानी कि 104 स्टुडैंट्स फेल हो गए? आप राज्य से ग्रांट लेते हैं. आप का विद्यालय राज्य की मदद से चलता है. आप से सौ प्रतिशत रिजल्ट देने के लिए कहा गया. आप ने राज्य से मिली आर्थिक मदद का गलत इस्तेमाल किया है. हम ने आप को परशुराम के शिष्य होने के नाते रखा था. आप के हवाले 105 राजकुमार कर दिए और आप ने केवल एक बच्चे को ही उचित शिक्षा दी.’

‘लेकिन सर, मैं ने शिक्षा देने में कोई लापरवाही नहीं की. नियमित रूप से सैद्धांतिक और व्यावहारिक विषयों के प्रशिक्षण बालकों को दिए गए. यह धनुष विद्या की परीक्षा थी. इस में अर्जुन अद्वितीय है. वह संसार का सब से बड़ा धनुर्धारी होगा. गदा में भीम और दुर्योधन भी बड़े योद्धा हैं. नकुल और सहदेव तलवारबाजी में…’

द्रोणाचार्य ने सफाई पेश की. उन को पता था कि पीए को किसी भी युद्ध का कोई अनुभव नहीं है. जुआ खेलना और लोगों को लड़ाना उस के मुख्य काम हैं. उसे तो गुरु के आश्रम से केवल इसलिए भगा दिया गया था क्योंकि उस ने गुरु का बकरा मार कर दोस्तों को पार्टी दी थी. वह तो धनुष पर बाण भी नहीं चढ़ा सकता. राजा का रिश्तेदार होने के नाते उन के साथ रहता है. उन का पीए बना फिरता है.

यह भी सचाईर् थी कि व्यावहारिक रूप से द्रोणाचार्य की औकात उस के सामने मच्छर की भी नहीं थी. वह जब चाहे विद्यालय बंद करवा सकता है. ग्रांट बंद करवा सकता है. कम से कम दूसरे टीचर की व्यवस्था तो करा ही सकता है. मजबूरी थी द्रोणाचार्य की, मिमिया रहे थे. महाराज चुप थे, गंभीर मुखमंडल बना कर बैठे थे.

‘लुक मिस्टर द्रोण, नाऊ व्हाट? मुझे नहीं लगता कि आप अपने कैरियर के प्रति गंभीर हैं. आप को न्यू टैक्नोलौजी की मदद से बच्चों को तीरकमान की ट्रेनिंग देनी चाहिए.

‘आप अभी आईटी की मदद नहीं लेते. मुझे आप के बारे में खुफिया जानकारी मिली है. आप कभी भी वही पुरानी तकनीक अपनाते हैं. बच्चों को मैदान में ले जाते हैं, पेड़ पर पंछी बिठा कर उस की आंख को निशाना बनाने के लिए कहते हैं. लुक मिस्टर द्रोण, इट इज टू मच. आप एनिमेशन टैक्नोलौजी से बच्चों को तीर चलाना सिखा सकते हैं. स्लो मोशन में तीर जाएगा और पंछी की आंख में लग जाएगा. इस से बच्चों में उत्साह बढ़ेगा. आप जानते हैं उत्साह से ही विद्या आती है. आप के आश्रम में तो कोई नई तकनीक है ही नहीं. आप राज्य के फंड को बरबाद कर रहे हैं. फैसला तो महाराज को लेना है. मैं तो काफी चिंतित हूं,’ शकुनी ने चेतावनी दी.

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द्रोणाचार्य को उन के गुरु परशुराम ने सिखाया था कि शिक्षक जब नौकरी करता है तो वह केवल नौकर होता है, शिक्षक नहीं. उस की अपनी विवेकशक्ति बंधक पड़ी रहती है. वह राजा को खुश करने के लिए नौकरी करता है, बच्चों के विकास के लिए नहीं.

द्रोण की मजबूरी थी कि उन्होंने नौकरी की. रोजीरोटी का दूसरा माध्यम नहीं था उन के पास. जाते कहां? उन्होंने सिर झुकाए ही कहा, ‘मैं ने तो अपनी पूरी क्षमता से प्रयास किया है. यदि यह पर्याप्त नहीं है तो आप जो आदेश करें, मैं मानूंगा. एक  बार फिर प्रयास करता हूं कि सभी बच्चे एकसमान धनुर्धर हो सकें.’

धृतराष्ट्र बोले, ‘आचार्य, हमें आप की योग्यता या प्रयासों पर जरा भी संदेह नहीं है, किंतु हम यह चाहते हैं कि सभी बालक सभी शिक्षाओं में निपुण हों. आप हमारा आशय समझें. 105 बच्चों में से कम से कम 60 बच्चों ने यदि पंछी की आंख में तीर मारा होता तो हम आप की बातों पर भरोसा कर लेते. यहां तो केवल एक ही बालक है. वह भी…आप की तकनीक में दोष है.

‘मुझे शकुनी ने बताया था कि चीन और जापान में कोई नई तकनीक आ गई है जिस से कक्षा के सभी बच्चे पास हो जाते हैं. उस से उन का मनोबल बढ़ता है. जीवन की हर परीक्षा में उसी तरह वे सफल होते चले जाते हैं. आप यदि चाहें तो शकुनी से वह तकनीक सीख सकते हैं. उन के अनुभव का लाभ उठाइए.’

द्रोणाचार्य चुप रहे. उन के हां या नहीं कहने का कोई अर्थ नहीं था. अंत में काफी विचारविमर्श के बाद यह तय हुआ कि द्रोणाचार्य को एक सिलेबस बना कर दे दिया जाए. उसी के अनुसार उन को बच्चों की शिक्षादीक्षा करानी होगी. यदि किसी भी परीक्षा में बच्चा फेल हो गया तो द्रोणाचार्य का इन्क्रीमैंट रोक दिया जाएगा. डीए रैगुलर तब मिलेगा जब उन के आश्रम में बच्चों का रिजल्ट 90 प्रतिशत रहेगा. यह नहीं कि एक धनुर्धारी और 2 गदाधारी के बल पर महीने की मोटी तनख्वाह द्रोणाचार्य उठाते रहेंगे.

द्रोण आश्रम में सिलेबस कैसा हो, यह तय करने के लिए एक समिति बैठी जिस के अध्यक्ष शकुनी थे. शकुनी आयोग ने सिफारिश की कि बच्चे की सैद्धांतिक परीक्षा में 50 अंकों के प्रश्न पूछे जाएं. मूल्यांकन के बाद उत्तरपत्रिकाएं सीधे हस्तिनापुर भेजी जाएं. कम से कम यह तो सुनिश्चित हो सके कि द्रोणाचार्र्य अपने आश्रम में बच्चों को क्या सिखा रहे हैं. सैद्धांतिक परीक्षा के अंकों में प्रोजैक्ट, असाइनमैंट तथा मौखिकी के 30 अंक होंगे. शेष 20 अंकों के लिए प्रश्न पूछे जाएं. हर वर्ष द्रोणाचार्य की शिक्षा देने की प्रगति की जांच होगी. समिति की सिफारिश के आधार पर ही द्रोणाचार्य के प्रमोशन वगैरह पर विचार किया जाएगा.

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द्रोणाचार्य आश्रम में आ तो गए लेकिन उन का मन अब व्रिदोह करने लगा था. यह तो शिक्षा और शिक्षकों का अपमान है. यदि विश्वास नहीं हो, तो उन्हें इस पद से मुक्त कर दिया जाए. इस प्रकार नकली शिक्षा व्यवस्था से तो राज्य का अनर्थ हो जाएगा. उन के अंदर वह नैतिक साहस नहीं था. या हो सकता है कि उन की मजबूरी रही हो. उन्होंने पद नहीं छोड़ा लेकिन अब पहले की तरह उन का मन आश्रम में लग नहीं रहा था. अगले महीने हस्तिनापुर से एक प्रश्नपत्र बन कर आया.

अर्द्धवार्षिक परीक्षा

अंक-100               समय-2 घंटे

विषय – धनुर्विद्या    कक्षा-प्रथम वर्ष

किन्हीं 5 प्रश्नों के उत्तर दें. प्रश्न संख्या 10 अनिवार्य है.

  1. धनुर्विद्या सीखना क्यों आवश्यक है? उत्तर की पुष्टि के लिए उचित उदाहरण दें.
  2. धनुष और गदा में क्या मौलिक अंतर है? 100 शब्दों में उत्तर दें.
  3. अच्छे धनुष की किन्हीं 10 विशेषताओं पर प्रकाश डालें.
  4. यदि आप को चिडि़या की आंख पर निशाना लगाना हो तो सब से पहले आप क्या देखेंगे? अपने उत्तर के पक्ष या विपक्ष में तर्क दें.
  5. क्या आप इस बात से सहमत हैं कि एक अच्छे धनुर्धारी को नियमित अभ्यास करना चाहिए? पक्ष या विपक्ष में उत्तर दें.
  6. यदि आप दुश्मनों से घिर गए हों और आप के पास धनुषबाण नहीं हो, तो आप क्या करेंगे?
  7. युवराज होने के लिए एक अच्छा धनुर्धारी होना क्यों आवश्यक है?
  8. किन्हीं 2 पर टिप्पणी लिखें –

. परशुराम ख. भीष्म ग. कर्ण

  1. युद्ध के 5 नियम लिखें.
  2. आप बड़े हो कर क्या बनना चाहते हैं? 100 शब्दों में उत्तर दें.

द्रोणाचार्य ने प्रश्नपत्र देखा, तो माथा ठोक लिया. इन प्रश्नों के उत्तर तो वह भी दे सकता है जो कभी मैदान में नहीं गया हो. धनुर्विद्या पर जिस ने एक भी किताब नहीं पढ़ी वह भी इस में अच्छे अंक ला सकता है. ऐसे में एक सच्चे योद्धा की पहचान कैसे होगी. उन्होंने तुरंत एक हरकारा महाराज के पास भेजा. अपनी संवेदनाओं से अवगत कराया. उधर से शकुनी का ही पत्र आया.

‘हमें एक योद्धा की पहचान नहीं करनी. हमें सभी बच्चों का कल्याण करना है. प्रश्न आसान होना चाहिए ताकि बच्चों पर किसी प्रकार का मानसिक दबाव न पड़े. आप परीक्षा संचालित करें और उत्तरपत्रिकाएं राजधानी भेज दें.’

द्रोण आश्रम में परीक्षाएं संचालित की गईं. बच्चे अच्छे अंकों से पास हो गए. आश्रम का औसत 80 प्रतिशत रहा. महाराज ने एक प्रशस्तिपत्र द्रोणाचार्य के नाम भेजा. आश्रम में टौप करने वाले बच्चों को महाराज ने रंगशाला में आयोजित एक समारोह में सम्मानित किया. उन के वजीफों की घोषणा की गई. द्रोणाचार्य का वेतन बढ़ा दिया गया. वह दिन है और आज का दिन है, हमारी शिक्षा व्यवस्था ने कभी पलट कर पीछे नहीं देखा.

मैं एक लड़के से प्रेम करती हूं, लेकिन वह मुझसे सिर्फ फिजिकल रिलेशन चाहता है. मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 20 वर्षीय युवती अपनी ही कक्षा के एक छात्र से प्रेम करती हूं, लेकिन वह मुझ से सैक्सुअल चाहत ही रखता है. मौडर्न होने के कारण मैं हर तरह की ड्रैसेज पहनती हूं. जब भी मैं शौर्ट स्कर्ट, निकर या खुली पोशाक पहनती हूं तो एकांत मिलते ही वह मेरी जांघ, पीठ आदि पर हाथ फेरने लगता है जबकि मैं उस से प्रेमभरी बातें करना चाहती हूं. मना करने पर वह कहता है कि तुम मुझ से प्यार नहीं करती. क्या करूं?

जवाब

आप दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं तो जाहिर है सिर्फ प्रेममयी बातों तक ही प्यार सीमित नहीं रहेगा. हां, कुछ वक्त व जरूरत का खयाल रखना होगा. लेकिन उस के द्वारा आप के शरीर को छेड़ने की कोशिश व न मानने पर प्रेम का वास्ता देने की बात से जाहिर है कि वह आप से शारीरिक संबंध बनाने को उतावला है. साथ ही उस का ध्यान आप की यौन सुंदरता पर है, दिल पर नहीं.

सब से पहले तो यह जान लें कि भूल कर भी उस से संबंध बनाने की गलती न करें, ‘आप प्यार नहीं करती’ जैसी बातों में आ कर भी उसे शरीर न सौंपें वरना पछतावा ही हाथ लगेगा.

उसे समझाएं कि सैक्स शादी के बाद ही ठीक रहता है. अभी तो प्यार चाहिए. अगर न माने तो उस से थोड़ी दूरी बनाएं. जब उसे अपनी गलती का एहसास होगा, अपनेआप ही चला आएगा.

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रेप के बाद

मानसी की घनिष्ठ सहेली तनवी की इकलौती बेटी रिया का पुणे में विवाह था. तनवी ने सब दोस्तों को इकट्ठा करने के लिए सब के फोन नंबर ढूंढ़ कर व्हाट्सऐप गु्रप बनाया था. सालों बाद सब एकदूसरे का अतापता जान कर चहक उठे थे. सब अब व्यस्त गृहस्थ थे पर सब कालेज के दिनों की मस्ती को याद कर जैसे युवा बन गए थे. अब दिनभर व्हाट्सऐप गु्रप, जिस का नाम तनवी ने ‘हैप्पीनैस’ रख दिया था, पर मौका मिलते ही सब हंसीमजाक करते रहते थे.

तनवी का मैसेज था, ‘अब सब रिया के विवाह में आने की तैयारी करो, विवाह को रियूनियन समझ कर मस्ती करने सब आ जाओ. अभी इतने ही दोस्तों का पता चल पाया है, बाकी को भी फेसबुक पर ढूंढ़ ही लेंगे. मैं सब का इंतजार करूंगी.’

हमेशा से हंसमुख, मेधावी तनवी ने सब को जोड़ कर एक बड़ा काम कर दिया था.

मुंबई में बसी मानसी तनवी से कई बार फोन पर बातें भी कर चुकी थी. पर मानसी अब पसोपेश में थी. रिया के विवाह में जा कर सब दोस्तों से मिलने की इच्छा भी थी. उस के पति रजत और बेटी वन्या ने खुशीखुशी कह दिया था, ‘जाओ, एंजौय करो. दोस्तों के साथ खूब मस्ती कर के आओ. हम गए तो मस्ती में कमी न आ जाए.’

मानसी मुसकरा दी थी. वन्या ने कहा था, ‘मुझे वैसे भी छुट्टी नहीं मिलेगी, नई जौब है. पर आप जरूर जाओ, मौम.’ रजत की सेल्स क्लोजिंग थी. पर मानसी अपना दुख, परेशानी किसी को बता भी तो नहीं सकती थी.

‘हैप्पीनैस’ पर अखिल का नाम भी तो था. इस नाम पर नजर पड़ते ही मानसी के तनमन में कड़वाहट भरती चली जाती थी, क्रोध का लावा सा फूट पड़ता था. मानसी ने रजत और वन्या को जब ‘हैप्पीनैस’ के बारे में बताया था तो वन्या ने तो कह भी दिया था, ‘मौम, ‘हैप्पीनैस’ से आप जरा भी हैप्पी नहीं लगतीं. यह गु्रप बनने के बाद तो आप मुझे और भी उदास, दुखी लगती हैं.’

मानसी ने झूठी हंसी हंस कर उस का वहम कह कर बात टाल दी थी. पर सच यही था. बाकी दोस्तों के कारण वह गु्रप छोड़ भी नहीं सकती थी और अखिल का अस्तित्व उस की बरदाश्त के बाहर था. अतीत में घटी घटना मानसी के तनमन के घावों को कुरेद जाती थी, जिस से वह आज तक अपराधबोध से ग्रसित थी. यह अपराधबोध कि उस ने रजत जैसे प्यार करने वाले पति को धोखा दिया है, उसे कभी यह बताया ही नहीं कि विवाह से कुछ महीने पहले ही अखिल ने उस का रेप किया था.

अखिल, उस का सहपाठी, उस का अच्छा दोस्त, बचपन का दोस्त जिस पर वह आंख बंद कर यकीन करती थी. मानसी का विवाह रजत से तय हुआ तो सब दोस्तों ने उस की सगाई में जम कर मस्ती की थी. रजत बनारस का था. सब दोस्तों ने इलाहाबाद की सभी मशहूर जगहें रजत को दिखाई थीं.

अखिल इलाहाबाद के नैनी इलाके में ही मानसी के घर से कुछ दूर ही रहता था. विवाह कुछ महीने बाद होना तय हुआ था. अखिल की बड़ी बहन मीनल भी मानसी की बहुत अच्छी दोस्त थी. मानसी अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. उसे जब भी विवाह की कोई शौपिंग या काम होता, मीनल उस का साथ देती थी. सगाई के थोड़े दिनों बाद ही मानसी किसी काम से मीनल से मिलने गई थी. तब मोबाइल तो होता नहीं था, तो वह अखिल के घर गई. वह हमेशा की तरह अंदर चली गई और जा कर ड्राइंगरूम में बैठ भी गई.

उस ने पूछा, ‘अखिल, दीदी कहां हैं?’

‘तुम बैठो, थोड़ी देर में आ जाएंगी.’

‘आंटी, अंकल?’

‘बाहर गए हैं.’

‘ठीक है, मैं बाद में आती हूं,’ कह कर मानसी उठने लगी थी तो अखिल ने उसे जबरदस्ती बैठा लिया था, ‘बैठो न, मैं हूं न.’

मानसी फिर बैठी तो अखिल उस के पास ही बैठ गया था, ‘जब से तुम्हारी सगाई हुई है, सुंदर लगने लगी हो.’

वह हंस पड़ी थी, ‘थैंक्स.’ पता नहीं उस दिन क्या हुआ था, मानसी आज तक समझ नहीं पाई कि इतनी साफसुथरी दोस्ती पर यह जीवनभर का कलंक अखिल ने क्यों लगा दिया.

अखिल ने घर का दरवाजा अंदर से बंद किया और मानसी पर टूट पड़ा. मानसी रोती, चीखती, चिल्लाती रह गई थी. होश में आने के बाद अखिल सिर पकड़ कर बैठ गया था. मानसी उस पर थप्पड़ों की बरसात कर रोती हुई घर आ गई थी.

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घर आ कर मम्मी और पापा को सब बताया तो घर में मातम छा गया था. वह रजत को सब बताना चाहती थी पर मातापिता का सख्त आदेश था कि इस बारे में कभी किसी के सामने मुंह नहीं खोलना है. मम्मीपापा ने उसे हर तरह से संभाला था. पर मानसी के घाव आज भी ताजा थे. वह आज तक इस अपराधबोध से उबर नहीं पाई थी कि उस ने अपने पति से अपने साथ हुई इतनी बड़ी घटना छिपा रखी है. उस ने रजत के साथ अंतरंग पलों में मानसिक कष्ट भोगा है, उस रेप की काली छाया उस के सामने आ कर उसे जबतब तड़पाती रही है. तन के घाव तो दिख भी जाते हैं लेकिन उस के मन पर लगा यह घाव कहां कोई देख पाया है.

फिर तनवी का फोन आ गया, ‘‘मानसी, विवाह में 2 दिन रह गए हैं, इतने पास हो कर भी पहले नहीं आ रही है?’’

‘‘तनवी, मेरा आना थोड़ा मुश्किल…’’

उस की बात पूरी होने से पहले ही तनवी ने साधिकार डपटा, ‘‘मैं कुछ नहीं सुनूंगी. अपने ग्रुप के कुछ लोग कल आ रहे हैं. चुपचाप तू भी जल्दी पहुंच.’’

‘‘अच्छा, कोशिश करूंगी.’’

‘‘कोशिश नहीं, जल्दी आ.’’

‘‘ठीक है, कल आती हूं.’’ मानसी ने ठंडी सांस ले कर ‘हैप्पीनैस’ के मैसेज पढ़े. चैक किया, कल कौनकौन आ रहा है. लखनऊ से कोमल, दिल्ली से शीतल, रीमा, विनीत, सुभाष, इलाहाबाद से अंजलि, कोलकाता से विपिन. अखिल का नाम नहीं था. उस ने चैन की सांस ली.

सब के हंसतेमुसकराते चेहरे मानसी की आंखों के आगे घूम गए. वह सब को याद कर मुसकराई. अखिल का तो चेहरा भी वह नहीं देखना चाहती थी, इसलिए वह गु्रप पर ऐक्टिव भी नहीं रहती. उस ने नोट किया है अखिल भी बस बहुत जरूरी बात का ही जवाब देता है. वह किसी जोक, हंसीमजाक में भाग नहीं लेता.

रजत और वन्या ने उस की तैयारियों में पूरा सहयोग दिया था. वह 2 दिनों के लिए पुणे रवाना हो गई. सब दोस्त आ चुके थे. वही सब से लेट आई थी. अचानक अखिल पर नजर पड़ गई तो उस के अंदर क्रोध की एक तेज लहर दौड़ी चली गई, मन कसैला हो गया. एक बार नफरतभरी नजर उस पर डालने के बाद मानसी ने उस की तरफ मुंह भी नहीं किया.

मुंबई से पुणे सब से बाद में आने पर उस की खूब खिंचाईर् हुई. सब दोस्त एकदूसरे के गले लग गए थे. समय ने अपना प्रभाव सब पर छोड़ा था. पर दृश्य इस समय कालेज के दिनों में मस्त, निश्ंिचत दोस्तों की मंडली का सा था. बस, अखिल सब से ज्यादा शांत, अकेला सा अलगअलग ही था.

तनवी के पति विकास और रिया ने सब का भरपूर स्वागत किया था. सब दोस्तों के रहने का इंतजाम होटल में था. सब रूम शेयर कर रहे थे. अखिल को छोड़ सब एक के रूम में डेरा जमा कर बैठे थे. कितनी बातें थीं, कितने किस्से थे. अखिल नहीं दिखा तो विनीत ने पूछा, ‘‘कहां गया यह अखिल, बड़ा सीरियस रहने लगा यह तो.’’

मीना ने कहा, ‘‘हां, काफी चेंज हो गया है. बहुत चुप, गंभीर है. अखिल आसपास नहीं था तो मानसी सब के साथ सहज व खुश थी. डिनर से थोड़ा पहले पवन अखिल को पकड़ कर लाया, ‘‘कहां घूम रहा था, चल, बैठ सब के साथ यहां.’’ अखिल फीकी सी हंसी हंसता हुआ सब के साथ आ कर बैठ तो गया पर उस की गंभीरता देख सब उस से कई तरह के सवाल करने लगे तो मानसी वहां से उठ कर ‘अभी आई,’ कहते हुए बाहर निकल गई.

वह सीधे टैरेस पर जा कर खुली हवा में गहरीगहरी सांसें लेने लगी. आज फिर आंखों से आंसू बहते गए. इतने में अपने पीछे कुछ आहट सुन कर वह चौंकी, देखा, अखिल था. गुस्से और नफरत की एक तेज लहर मानसी के दिल में उभरती चली गई. वह वहां से जाने लगी तो अखिल ने हाथ जोड़ कर उस का रास्ता रोक लिया, ‘‘मानसी, प्लीज मुझे माफ कर दो.’’

अखिल के रुंधे गले से निकली इस कांपती आवाज से मानसी ठिठक गई. अखिल ने बहुत ही गंभीर, उदास आवाज में कहा, ‘‘तुम से माफी मांगने के लिए सालों से तरस रहा हूं. मेरा गुनाह मुझे चैन से जीने नहीं देता. ‘हैप्पीनैस’ पर भी पहले अपने आने के बारे में सूचना नहीं दी कि कहीं तुम मेरे कारण यहां न आओ. आज मेरी बात सुन लो, प्लीज,’’

मानसी रेलिंग से टेक लगाए हैरान सी खड़ी थी. इक्कादुक्का लोग फोन पर बातें करते इधरउधर घूम रहे थे. अखिल के चेहरे पर पश्चात्ताप और दुख था. उस की आंखें कभी भी बरसने के लिए तैयार थीं.

अखिल ने आगे कहा, ‘‘बहुत बड़ा गुनाह किया था मैं ने. पता नहीं क्यों मैं बहका. एक पल में मैं कितना गिर गया. तुम्हारे जैसी दोस्त खो दी. मैं कभी खुश नहीं रह पाया मानसी. आज तक तुम्हारी चीख, तुम्हारे आंसू, तुम्हारी वेदना मुझे हर पल जलाती रही है. जब मेरा पहला विवाह हुआ तब यह अपराधबोध मेरे मन पर इतना हावी था कि मैं सामान्य जीवन बिता ही नहीं पाया और मेरा तलाक हो गया.

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‘‘घरवालों के जोर देने पर मैं ने दूसरा विवाह किया. दूसरी पत्नी के साथ भी यह अपराधबोध हावी रहा. हर समय तुम्हारे साथ की गई हरकत मुझे बेचैन रखती. इस गुनाह की बड़ी सजा भुगती मैं ने, मानसी. इस अपराधबोध ने दूसरी बार भी मेरा घर नहीं बसने दिया. उस से भी मेरा तलाक हो गया.

‘‘मातापिता रहे नहीं, दीदी विदेश में हैं. बिलकुल अकेला हूं. मैं ने गुनाह किया था, काफी सजा भुगत चुका हूं. अब तुम मुझे माफ कर दो. सालों से पश्चात्ताप की आग में जल रहा हूं.’’ झरझर आंसू बहते चले गए अखिल की आंखों से, उस ने नजर उठा कर हैरान खड़ी मानसी को देखा, फिर जाने के लिए मुड़ गया.

थके हुए, सुस्त कदमों से अखिल को जाते देख मानसी को बड़ा झटका लगा था, क्या पुरुष को भी इतना अपराधबोध हो सकता है? क्या कोई पुरुष भी यह अपराध कर सालोंसाल पलपल सुलगता है? पलभर का बहकना क्या पुरुष को भी जीवनभर इस तरह कचोट सकता है? रेप करने के बाद यह अपराधबोध क्या पुरुष के जीवन पर भी प्रभाव डाल उस का जीवन नष्ट कर सकता है? वह अवाक थी, हतप्रभ भी, कुछ समझ नहीं आ रहा था.

सीमेंट से घर पर बनाएं शानदार सजावट का सामान

जैसा कि आप जानते हैं, सीमेंट घर बनाने के काम में प्रयोग किया जाता है. पर सीमेंट से आप अपने घर के लिए सजावट का सामान भी बना सकते हैं, वैसे इस सजावट को देखकर आपके मेहमान बेहद प्रभावित होंगे. आइए आपको बताते है, सीमेंट से आप किस प्रकार सजावट की चीजें बना सकते हैं.

  • सबसे पहले एक बर्तन में सीमेंट और पानी मिलाकर इसका घोल तैयार करें, अब इस घोल में रुमाल डुबोकर हल्का निचोड़ लें. इसके बाद सीमेंट लगे रुमाल को पेपर ग्लास पर फैला दें, फिर 24 घंटे बाद रुमाल और ग्लास को अलग करें और रुमाल को उलटकर रख दें. तैयार है आपका शानदार शो-पीस इसमें कैंडल रखकर सजा सकती हैं.

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  • बच्चों को काउंटिंग सिखाने वाले प्लास्टिक के खिलौने लें और उसमें वैसलीन लगा दें. इसके बाद सीमेंट और पानी का घोल भर दें. इनमें से किसी एक खिलौने के ऊपर स्टील की तीली लगा दें जिसमें तस्वीर सजाई जा सके. 24 घंटे बाद सख्त हो चुके सीमेंट को खिलौने के सांचे से निकाल लें. सारे अक्षर को जोड़ें और फिर देखें इसका कमाल.
  • एक बर्तन में सीमेंट और पानी मिलाकर घोल तैयार करें. रबड़ के दो ग्लव्ज लें और दोनों में सीमेंट का घोल भर दें. एक कटोरी में अगल-बगल इन ग्लवज को रखें और अन्य छोटी कटोरी से इसे दबा दें. 24 घंटे बाद ग्लवज और सीमेंट को अलग कर दें. अब इन दोनों हाथों को जोड़ दें. आपका गमला तैयार है.

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सोशल मीडिया से बढ़ा आत्मविश्वास: अनन्या पांडे

बौलिवुड एक्टर अनन्या पांडे ने कहा कि सोशल मीडिया एक ऐसी जगह है, जहां मुझे बहुत प्यार मिलता है और अधिकतर लोग मुझे इसी कारण जानते हैं. अगर यह नहीं होता तो उनमें यहां आने और बोलने का आत्मविश्वास नहीं होता.

आपको बता दें, अनन्या गुरुवार को राजधानी लखनऊ के एक आईटी कौलेज में  पहुंचीं थी. इस दौरान उन्होंने ‘सो पौजिटिव’ विषय पर छात्राओं से चर्चा की. अनन्या की एक झलक पाने को छात्रों की भीड़ उमड़ पड़ी थी. इस दौरान अनन्या ने कहा, “सोशल मीडिया ने मुझे बहुत कुछ दिया है. इसी के कारण मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है. यह मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट है. इससे मुझे जो प्रतिक्रिया मिल रही है, उससे मैं काफी खुश हूं. वह डिजिटल सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत अपनी पहल ‘सो पौजिटिव’ को बढ़ावा देने वाली सबसे कम उम्र की इंफ्लुएंसर हैं.

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उन्होंने कहा, सोशल मीडिया एक बहुत अच्छी जगह है. मैं नहीं चाहती कि आप में से कोई भी यह महसूस करे कि हमें सोशल मीडिया पर नहीं होना चाहिए, क्योंकि हमें बुली किया जाएगा. यह बेहद अन्यायपूर्ण बात है कि आप इंस्टाग्राम पर नहीं हो सकते, सिर्फ इसलिए क्योंकि एक व्यक्ति आपसे नफरत कर रहा है.

अन्नया ने कहा मुझे सोशल मीडिया पर बहुत से अच्छे लोगों से जीवन में विश्वास मिला है. मैं बस इन्हीं जैसे अन्य अच्छे लोगों को सामने लाना चाहती हूं. सोशल मीडिया में ज्यादा से ज्यादा प्राइवेसी रखने की जरूरत है. आप लोगों को सोशल मीडिया पर परेशान करने वालों को अनदेखा करना होगा. इसके बाद तंग आकर वे खुद ही परेशान करना छोड़ देंगे.

अनन्या पांडेय इन दिनों लखनऊ में अपनी फिल्म ‘पति पत्नी और वो’ की शूटिंग भी कर रही हैं. एक्ट्रेस ने इसी बीच समय निकालकर कौलेज की सभी लड़कियों से खास मुलाकात की.

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