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क्या दक्षिण भारत की राजनीति में कमल खिलाने के लिए तमिल वेशभूषा में नजर आए पीएम मोदी

भारत और चीन के बीच ये दूसरी इन्फौर्मल समिट हो रही है. समिट में हिस्सा लेने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग चेन्नई पहुंचें फिर उनका ग्रांड वेलकम किया गया. तमिलनाडु के सबसे प्राचीन शहर महाबलीपुरम में पीएम मोदी ने जिनपिंग की खूब आवभगत की. इस दौरान एक चीज पर सबकी निगाहें टिक गई. वो था पीएम मोदी का परिधान. हालांकि पीएम मोदी को हर एक अवसर पर आपने हमने सूट कुर्ता पैजामा में देखा है लेकिन यहां पीएम मोदी ने तमिल परिधान पहने हुए थे. लोगों के बीच ये एक चर्चा का विषय बन चुका था. क्योंकि पीएम मोदी को ऐसे पहली बार देखा जा रहा था. शुक्रवार सुबह से ही ट्विटर पर #gobackmodi ट्रेंड कर रहा था. ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब भी पीएम मोदी साउथ का दौरा करते हैं तो वहां उनके खिलाफ विरोध के स्वर फूटते हैं. दक्षिण भारतीय मानते हैं कि राजनीति में उत्तर भारत का वर्चस्व है और वो अपने ही कायदे कानून हम पर थोपना चाहते हैं. हिंदी दिवस के दिन गृहमंत्री अमित शाह के भाषा पर दिए बयान के बाद काफी उबाल मचा था.

शाम करीब पांच बजे चीनी राष्ट्रपति का स्वागत करने जब पीएम मोदी कार से उतरे तो वह तमिल संस्कृति से सराबोर थे. उन्होंने तमिलनाडु की पारंपरिक ‘करायी वेष्टि’ (हरे रंग के किनारे वाली धोती), अंगवस्त्रम और आधे बाजू की सफेद कमीज पहनी थी. पीएम की इस पहल की प्रशंसा पट्टाली मक्कल कच्ची और अन्य ने भी की. यह सीधे तौर पर उन लोगों को जवाब था जो बीजेपी और पीएम मोदी पर आरोप लगाते रहते हैं कि वह उत्तर भारतीय भाषा और संस्कृति को तमिल प्राइड पर थोपते हैं.

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अनौपचारिक मुलाकात के कारण चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भी पूरे बाजू की कमीज और काले रंग का पैंट पहना था. पट्टाली मक्कल कच्ची के संस्थापक एस रामदास ने कहा कि प्रधानमंत्री को तमिलों के पारंपरिक परिधान वेष्टि में देखना हर्ष का विषय है. उन्होंने ट्वीट किया, ‘दुनिया को तमिल संस्कृति को जानने दो.’ कर्नाटक के संस्कृति और पर्यटन मंत्री सीटी रवि ने ट्वीट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां की संस्कृति और परंपरा का सम्मान किया है. वह तमिल लोगों की वेशभूषा में टहलते हुए बहुत ही सहज दिख रहे थे.

आपको बता दें कि तमिलनाडु में मई 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं. माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की नजर अपने गठबंधन सहयोगी एआईएडीएमके के जरिए बीजेपी के लिए इस ‘अभेद्य किले’ में पैठ जमाने की होगी. तमिलनाडु बीजेपी की प्राथमिकता सूची में शामिल है क्योंकि हालिया चुनाव में दक्षिण के इस सूबे में मोदी मैजिक काम नहीं कर पाया. भाजपा दक्षिण में भी अपनी पैठ बनाना चाहती है ताकि अगर कहीं और नुकसान हो तो उसकी भरापाई की जा सके. पीएम मोदी ने तमिल संस्कृति के हिसाब से जो किया उससे वहां की जनता को एक मैसेज तो गया कि पीएम हमारी संस्कृति से वाकिफ है. जिस वक्त पीएम मोदी लुंगी पहने हुए घूम रहे थे तो कहीं से भी असहज नहीं लग रहे थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि

बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव पी. मुरलीधर राव के मुताबिक, शिखर वार्ता के लिए तमिलनाडु का चुनाव बीजेपी के लिए भी बेहद मुफीद है. उन्होंने कहा, ‘बीजेपी के बारे में धारणा है कि यह एक हिंदी पार्टी है. मोदी के तमिलनाडु दौरे में इजाफा से यह समझ बढ़ेगी कि सूबा हमारे लिए राजनीतिक तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है.’ ऐसे में पीएम मोदी के वेष्टि पहनने को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

दूसरी ओर, पारंपरिक नजरिए से देखें तो तमिलनाडु में वेष्टि या एक विशेष प्रकार की धोती पुरुषों के मुख्य परिधानों में से एक है. तमिलनाडु के लोगों का वेष्टि के साथ भावनात्मक संबंध है. ऐसे में ऐतिहासिक नगर महाबलीपुरम में हो रही मुलाकात के मौके पर प्रधानमंत्री ने स्थानीय कल्चर को ध्यान में रखते हुए ही इस परिधान को चुना है.

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पीएम मोदी ने जिनपिंग को तोहफे में तंजावुर की एक पेंटिंग और एक नचियारकोइल दीप दिया. पेंटिंग में देवी सरस्वती को वीणा बजाते हुए देखा जा सकता है. इस दीप को नचियारकोइल ब्रांच का अन्नम दीप कहा जाता है. इसे आठ मशहूर कलाकारों ने मिलकर तैयार किया है. छह फीट ऊंचे और 108 किलोग्राम वजन के इस दीप को पीतल से बनाया गया है, जिस पर सोने की परत चढ़ी है. इसे बनाने में कुल 12 दिन का समय लगा. सबसे पहले इसे पैथर समुदाय के लोगों ने बनाया था. ये लोग 1857 में पहले नागरकोइल से त्रावणकोर आए थे फिर वहां से नचियारकोइल आकर बस गए.

विवेक ओबेरौय : “मुंबई आर्ट फेयर कला को अभिजात्य नही तो अधिक प्रवेश के योग्य सुलभ बनाता है

मुंबई आर्ट फेयर के दूसरे संस्करण का ११ से १३ अक्टूबर तक नेहरू सेंटर, वर्ली में भव्य पैमाने पर आयोजित किया गया है. २०१९ के इस संस्करण प्रतिष्ठित मेले में  ३२५ युवा, आगामी और वरिष्ठ, सभी कलाकारों अपने कला का प्रदर्शन एक छत के नीचे प्रदर्शित करने का मौका मिला. लगभग १३० वातानुकूलित बूथों में चित्रों, मूर्तियों, तस्वीरों, सिरेमिक और मूल प्रिंट सहित ३,००० से अधिक कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया.

इस कलापूर्ण कला मेले में मुख्य अतिथि के तौर पर फिल्म अभिनेता विवेक ओबेरौय और गेस्ट औफ औनर पूजा बेदी, गायिका मधुश्री और फिल्ममेकर कुणाल कोहली आदि अन्य नामचीन हस्तियां भी शामिल हुयी थी. इस समारोह में मुंबई आर्ट फेयर के डायरेक्टर राजेंद्र पाटिल समेत कलाकार गौतम पाटोले, प्रकाश बाल जोशी, पृथ्वी सोनी, रूपाली मदान, रीना नाइक, विश्व साहनी, सोनू गुप्ता सहित कई अन्य सहभागी हुए थे.

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कला के शौक़ीन अभिनेता विवेक ओबेरौय सहभागी कई कलाकारों के साथ बातचीत करते हुए, उनके कार्यों की बारीकियों पर चर्चा करते हुए देखा गया, जबकि इस कला मेले में उन्होंने चारकोल मास्टर गौतम पाटोले की कलाकृतियां भी खरीदीं.

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“मुंबई जैसे शहर में इतनी सारी कलाकृतियों का प्रदर्शन करना वास्तव में सराहनीय है जहां आप मुश्किल से ही रहने के लिए जगह पा सकते हैं. कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने और कला से प्रेरणा लेने का मौका मिलना चाहिए. मुझे लगता है कि मुंबई आर्ट फेयर टीम कलाकारों के लिए एक महान सेवा कर रही है और मुझे उनकी यही चीज काफ़ी पसंद आयी. इतना ही नहीं तो मुझे यह भी पसंद आया कि वो कला को अधिक सुलभ बना रहे हैं, ना की संभ्रांतवादी को. मैंने देखा कि यहां  युवा और युवा जोड़े हैं जो एक बजट सोचकर आये है और अभी भी सुंदर कलाकृति खरीद सकते हैं. मैंने गौतम पाटोले के कामों का विशेष रूप से आनंद लिया.

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चारकोल कलाकृति की बात की जाये तो वह एक उत्तम कलाकार  कलाकार है और इस तरह, चारकोल पेंटिंग एक अत्यंत मुश्किल काम है. सफेद परिभाषा है और आपको बीच में काले रंग को भरना होगा. मेरे लिए यह वास्तव में एक शानदार अनुभव रहा है! ”

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मुंबई आर्ट फेयर, यह प्रतिष्ठित कला मेला अन्य कला प्रेमियों के लिए  १३ अक्टूबर तक सुबह ११ बजह से शाम ७:३० बजे तक नेहरू आर्ट गैलरी खुला रहेगा.

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राजस्थान में टैक्स फ्री हुई “सांड की आंख”

बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘सांड की आंख’ के मेकर्स की ख़ुशी का अब दुगनी हो गयी है. ऐसा इसलिए क्योंकि, भारत के सबसे पुराने शार्पशूटर चंद्रो तोमर और प्रकाशी तोमर के जीवन पर आधारित इस फिल्म को राजस्थान में टैक्स फ्री घोषित कर दिया गया है.

तुषार हीरानंदानी द्वारा निर्देशित फिल्म, अभिनेता तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर मुख्य भूमिकाओं में हैं. फिल्म के टैक्स फ्री होने की आधिकारिक घोषणा राजस्थान के मुख्यमंत्री, अशोक गहलोत के औफिशियल आईडी पर की गई थी.

पोस्ट में लिखा गया है, “मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने राज्य में मल्टीप्लेक्स और सिनेमाघरों पर महिला सशक्तिकरण और खेल पर आधारित फिल्म ‘सांड की आंख’ की स्क्रीनिंग से एसजीएसटी को छूट देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.”

चंद्रो तोमर ने सीएम को धन्यवाद दिया और पोस्ट किया, “राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत का धन्यवाद.”

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वैसे राजस्थान सरकार ने ये बड़ा कदम उठाया है ताकि फिल्म की कहानी ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके ऐसे में उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश में भी ये फिल्म टैक्स फ्री हो जाए क्योंकि शूटर दादियों की ये साहसी कहानी उत्तर प्रदेश के जौहरी गांव की है.

रिलायंस एंटरटेनमेंट द्वारा प्रस्तुत फिल्म ‘सांड की आंख’, अनुराग कश्यप, निधि परमार, चौक एंड चीज फिल्म्स और रिलायंस एंटरटेनमेंट द्वारा प्रोड्यूस किया गया है. फिल्म दिवाली पर रिलीज हो रही है.

आपको बता दें, कुछ दिन पहले ही इस फिल्म को लेकर काफी विवाद हुआ था क्योंकि नीना गुप्ता और सोनी राजदान जैसी सीनियर एक्ट्रेसेस ने फिल्म में कम एज एक्ट्रेस के होने पर सवाल उठाए थे और कहा था कि कम से कम हमारे उम्र के रोल तो हमे औफर करने चाहिए. जिसके बाद काफी कंट्रोवर्सी हुई थी.

इस मामले में तापसी ने एक इंटरव्यू में अपनी बात रखी थी- मैंने जो भी बात कही अपने बारें में कही है, किसी के बारें में कुछ भी नहीं कहा है. मुझे अगर कुछ गलत लगता है तो उसे मैं सहन नहीं कर सकती. ये मुझे अपने परिवार की परवरिश से ही मिला है. मैं घर पर भी सबसे अधिक बात करती हूं और कभी किसी गलत बात को सपोर्ट नहीं करती. जब नीना गुप्ता ने मेरे बारें में कही थी तो मैंने अपने व्यूज सोशल मीडिया पर डाले थे, क्योंकि ऐसा करके वे एक कलाकार को दायरे में बाधने की कोशिश कर रही है. मैं हर फिल्म में एक ही तरह के अभिनय नहीं कर सकती. मुझे भी एक्सपेरिमेंट पसंद है और वह मैं करती रहूंगी.

‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’: क्या कायरव की कस्टडी केस वापस लेगा कार्तिक?

छोटे पर्दे का मशहूर सीरियल “ये रिश्ता क्या कहलाता है” में लगातार धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिल रहे है. इस सीरियल की कहानी कस्टडी केस के इर्द गिर्द घुम रही है.  आखिर कायरव की कस्टडी केस किसे मिलेगी या कार्तिक कस्टडी केस वापस ले लेगा. इस सीरियल में बहुत कुछ सस्पेंस बना हुआ है. जी हां, हाल ही में आपने देखा कि कार्तिक नायरा नशे की हालत में शादी करते हैं और बाद में उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता.

फिलहाल इस शो के पिछले एपिसोड में आपने देखा कि नायरा और कार्तिक कोर्ट के बाहर एक दूसरे से मिलते हैं. एक बार फिर से कार्तिक नायरा से पूछता है कि क्या उसे रात के बारे में कुछ भी याद आया.

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नायरा कहती है कि रात गई और बात गई. हम सिर्फ कायरव के मम्मा-पापा हैं, इससे ज्यादा हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं है. और यही सच है कि हम एक-दूसरे के खिलाफ कोर्ट में केस लड़ रहे हैं.

नायरा अपने भाई नक्ष को कौल करती है लेकिन वो उठाता नहीं, नायरा, कार्तिक से कहती है तुम थोड़ी देर यहीं रुको मैं एटीएम से होकर आती हूं अगर ड्राइवर गाड़ी लेकर आए तो बताना कि मैं अभी आ रही हूं.

नायरा एटीएम के पास जाती है वहां उसे वेदिका रोते हुए मिलती है. नायरा उससे पूछती है कि क्या हुआ?  वेदिका उसे सुनाने लगती है कि आपने केबिन में कहा था कि आपने शादी कर ली है और मुझसे कह रही हैं कि कुछ याद नहीं. मुझे आप पर भरोसा नहीं है और ना ही किसी और पर. वेदिका वहां से रोते हुए चली जाती है नायरा उसे रोकने और समझाने की कोशिश करती है पर वो नहीं रूकती. वेदिका के जाने के बाद नायरा रोते हुए वापस आती है और वहां कार्तिक उससे कहता है कि बच्चे और ड्राइवर कबसे वेट कर रहे हैं, लेकिन नायरा उससे लड़ झगड़कर चली जाती है वो कुछ समझ नहीं पाता लेकिन उसे वेदिका रोते हुए दिख जाती है.

कार्तिक वहां कुदाल लेकर जमीन खोदने लगता है, तभी वहां उसकी मां आ जाती है, वो उससे कारण पूछती है परेशान होने का तो वो बताता है कि उसकी वजह से सब दुखी हैं. नायरा दुखी है, वेदिका दुखी है.

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नायरा के बिना मैं रह नहीं पाता और वेदिका मेरी वजह से दुखी होती रहती है, वो दोस्त है मेरी उसे मैं झूठी तसल्ली भी नहीं दे सकता कि सब कुछ ठीक हो जाएगा. कार्तिक, वेदिका के लिए बहुत दुखी होता है और कहता है कि नायरा कुछ दिन पहले क्यों नहीं आई?

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कार्तिक की मां कार्तिक को केस वापस लेने के लिए समझाती है, कार्तिक कहता है कि अगर नायरा उसके बच्चे को लेकर कहीं ना जाए तो वो केस वापस ले लेगा. इसके बाद कार्तिक की मां, नायरा के पास आती है.

वो उसे समझाती है कि वो केस वापस ले ले लेकिन नायरा कहती है कि उसे कायरव की सोलो कस्टडी ही चाहिए. नायरा सोचती है कि अगर वो कायरव की सोलो कस्टडी लेकर यहां से नहीं गई तो वेदिका की लाइफ खराब हो जाएगी.

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कहीं भार न बन जाए प्यार

कुछ लोग अपने प्यार को किसी के साथ भी बंटता हुआ नहीं देख सकते. यहां तक कि वे अपने गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड को अपने दोस्तों से भी बातें करता देख इनसिक्योर फील करने लगते हैं, शक करने लगते हैं और इस बात पर उन के बीच झगड़े होने लगते हैं.

जाहिर सी बात है कि किसी से प्यार करने का अर्थ यह तो नहीं कि इंसान अपने दोस्तों से नाता तोड़ ले. यदि गर्लफ्रैंड किसी और लड़की से बात करने पर अपने बौयफ्रैंड से नाराज हो जाती है तो बौयफ्रैंड के पास एक ही औप्शन बचता है, और वह है झूठ बोलना, वह छिप कर दोस्तों से बातें करेगा और फोन से बातचीत का सारा रिकौर्ड डिलीट कर देगा.

यही नहीं, बाकी जो भी बातें उस की गर्लफ्रैंड को बुरी लगती हैं. उन सब को छिपाने लगेगा. एक समय आएगा जब झूठ बोलतेबोलते वह आजिज आ जाएगा. हर वक्त उसे अपनी आजादी छिनती हुई नजर आएगी. वह बंधा हुआ महसूस करने लगेगा और एक दिन उस के सब्र का बांध टूट जाएगा और तब प्यार के रिश्ते में जज्बातों का दम घुट जाएगा. प्यार भार बन जाएगा और व्यक्ति अपने प्यार से पीछा छुड़ाने के बहाने ढूंढ़ने लगेगा.

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तीसरे का वजूद

पतिपत्नी हों या गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड, जब भी दो के बीच किसी तीसरे के आने की सुगबुगाहट होती है तो रिश्तों में खटास आने लगती है. शक का कीड़ा अच्छेखासे रिश्तों की भी नींव खोदने में वक्त नहीं लगाता. जहां विश्वास नहीं वहां शक तुरंत अपनी जड़ जमा लेता है. तीसरे की उपस्थिति अकसर रिश्तों के टूटने की वजह बनती है. किसी तीसरे के आने से सिर्फ रिश्ता ही नहीं टूटता, कई दफा नतीजे बेहद खतरनाक भी निकलते हैं. तीसरे को रास्ते से हटाने के लिए व्यक्ति किसी भी सीमा तक जा सकता है.

अपने अनुसार ढालने का प्रयास

प्यार का अर्थ है जो जैसा है उसे उसी रूप में पंसद करना. यदि बदलने का प्रयास किया जाए तो वह प्यार नहीं, समझौता होता है. जब प्यार का दंभ भरते व्यक्ति सामने वाले की कमियां निकालने लगता है और उसे बदलने को प्रेरित करता है तो वहां जज्बात फीके पड़ने लगते हैं और प्यार भार लगने लगता है.

बातबात पर चिढ़ना

प्यार में रूठनेमनाने की परंपरा बहुत पुरानी है. मगर जब कोई बातबात पर मुंह बनाने लगे या भलाबुरा सुनाने लगे तो स्वाभाविक है कि सामने वाले के सब्र का बांध टूट जाएगा. इंसान किसी की नाराजगियां एक हद तक सहन कर सकता है. मगर जब यह रोज की आदत बन जाए तो प्यार जी का जंजाल लगने लगता है.

तालमेल की कमी

प्यार में इंसान को काफी तालमेल बिठाने होते हैं. दो बिलकुल अलगअलग व्यक्ति जब एकदूसरे के बनना चाहते हैं तो बहुत सी बातों में समझौते करने होते हैं. खानपान, बातचीत, पहनावा, रहनसहन हर तरह से एकदूसरे की परवाह करनी होती है. तालमेल की कमी रिश्ते में खटास ला सकती है.

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सेक्सोफोन का अनोखा आकर्षण

सेक्सोफोन का जिस तरह फिल्मों में उपयोग हुआ और संगीत की तान गूंज उठी तो जनता जनार्दन  उसकी दीवानी हो गई फिल्मी दुनिया के महान संगीतकार सचिन देव बर्मन यानी एसडी बर्मन ने सेक्सोफोन का अपने संगीत में अनेक  फिल्म मे उपयोग किया और लोगों ने उसका लोहा माना. इन छत्तीसगढ़ में शहर दर शहर सैक्सोफोन के विराट कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं जिसके पीछे पत्रकार राजकुमार सोनी का अहम योगदान है. सबसे बड़ी बात यह है कि राजधानी रायपुर एवं दुर्ग के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल स्वयं उपस्थित होकर सेक्सोफोन की स्वर लहरियों का आनंद लेने से नहीं चूके. प्रस्तुत है सेक्सोफोन की अजब गजब कहानियों से बुनी हुई एक रिपोर्ट-

सेक्सोफोन की दुनिया यूं ही मुरीद नहीं है. इस  मदहोश करने वाले वाद्ययंत्र में दुनिया के बड़े से बड़े तानाशाह की हुकूमत को चुनौती देने की ताकत शायद  आज भी  बरकरार है. अगर आप यह जानने के इच्छुक है कि यह हिम्मत और ताकत इस जिद्दी वाद्ययंत्र को बजाने वालों ने कैसे जुटाई थी तो  आगामी  रविवार 13 अक्टूबर 2019 की शाम ठीक साढ़े पांच बजे कला मंदिर सिविक सेंटर भिलाई में आप इस आयोजन के साक्षी अवश्य बनिए. यहां यह बताना जरूरी है कि यह साज़ एक साथ कई एक्सप्रेशन की ताकत रखता है. इसके स्वर में कोमलता, उत्तेजना, उन्मुक्तता, जुनून और स्व्छंदता है…तो आंसू, उदासी और विद्रोह का जबरदस्त तेज भी मौजूद है.अपना मोर्चा डौट कौम और संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित सेक्सोफोन की दुनिया कार्यक्रम इसके पहले छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हो चुका है और जबरदस्त ढंग से सफल भी रहा है. इस कार्यक्रम की अब गूंज विदेशों तक जा पहुंची है. इस बार भिलाई में होने वाले खास आयोजन के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री  भूपेश बघेल होंगे. सेक्सोफोनिस्ट विजेंद्र धवनकर पिंटू, लीलेश कुमार और सुनील कुमार जानदार और शानदार गीतों की धुन पर धमाल मचाएंगे.फिल्म समीक्षक अनिल चौबे पर्दे पर छोटी-छोटी क्लिपिंग के जरिए यह जानकारी देंगे कि फिल्मों में सेक्सोफोन की उपयोगिता क्यों और किसलिए है ?

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सेक्सोफोन के अंदाज बयां कुछ और है

इस आकर्षक साज को बेल्जियम के एडोल्फ सेक्स ने बनाया था उनके पिता  वाद्य यंत्रों के निर्माता थे. सेक्स का बचपन बहुत  नारकीय स्थितियों में बीता , जब वह पांच साल का था तो दूसरी मंजिल से गिर गया. इस हादसे में उसका पैर टूट गया फिर बीमार  हुआ. लंबे समय तक वह कमजोरी का शिकार रहा. एक बार उसकी मां ने यह तक कह दिया कि वह सिर्फ नाकामियों के लिए ही पैदा हुआ है. इस बात से दुखी होकर एडोल्फ सेक्स ने सल्फरिक एसिड के साथ खुद को जहर दे दिया. फिर कोमा में कुछ दिन गुजारे. जब वह कुछ उबरा तो उसने सेक्सोफोन बनाना प्रारंभ किया. सेक्सोफोन बन तो गया, लेकिन इस साज़ को किसी भी तरह के आर्केस्ट्रा या सिंफनी में जगह नहीं मिली. अभिजात्य वर्ग ने उसे ठुकरा दिया, लेकिन सेक्सोफोन बजाने वालों ने उसे नहीं ठुकराया. धीरे-धीरे ही सही  यह वाद्य लोगों के दिलों में अपना असर छोड़ता चला गया . यह वाद्य जितना विदेश में लोकप्रिय हुआ उतना ही भारत में भी मशहूर हुआ.

सेक्सोफोन की फिल्मी दुनिया में धूम

किसी समय तो इस वाद्ययंत्र की लहरियां हिंदी फिल्म के हर दूसरे गाने में सुनाई देती थीं, सचिन देव बर्मन जैसे महान संगीतकार ने इसका अपने संगीत में इस्तेमाल किया. लेकिन सिथेंसाइजर व अन्य इलेक्ट्रानिक वाद्ययंत्रों की धमक के चलते बड़े से बड़े संगीतकार सेक्सोफोन बजाने वालों को हिकारत की नजर से देखने लगे. उनसे किनारा करने लगे. इधर एक बार फिर जब दुनिया ओरिजनल की तरफ लौट रही है तब लोगों का प्यार इस वाद्ययंत्र पर उमड़ रहा है. ऐसा इसलिए संभव हो पा रहा है क्योंकि बाजार के इस युग में अब भी सेक्सोफोन को एक अनिवार्य वाद्य यंत्र मानने वाले लोग मौजूद है.अब भी संगीत के बहुत से जानकार यह मानते हैं कि दर्द और विषाद से भरे अंधेरे समय को चीरने के लिए सेक्सोफोन और उसकी धुन का होना बेहद अनिवार्य है. बेदर्दी बालमां तुझको… मेरा मन याद करता है… है दुनिया उसकी जमाना उसी का… गाता रहे मेरा दिल…हंसिनी ओ हंसिनी… सहित सैकड़ों गाने आज भी इसलिए गूंज रहे हैं क्योंकि इनमें किसी सेक्सोफोनिस्ट ने अपनी सांसे रख छोड़ी है. छत्तीसगढ़ में भी चंद कलाकार ऐसे हैं जिन्होंने इस वाद्ययंत्र की सांसों को थाम रखा है.

सेक्सोफोन पर लग चुका है प्रतिबंध

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले  के निवासी  ( अब नागपुर ) कथाकार मनोज रुपड़ा ने सेक्सोफोन को केंद्र पर रखकर साज-नासाज नामक  कहानी  लिखी हैं. इस बहुचर्चित  कहानी पर दूरदर्शन ने  फिल्म भी बनाई है.

एक समय लेटिन अमेरिका के एक देश में जन विरोधी सरकार के खिलाफ लाखों लोगों का एक मार्च निकला था. सेक्सोफोन बजाने वालों की अगुवाई में लाखों लोगों की भीड़ जब आगे बढ़ी तो तहलका मच गया. अभिजात्य वर्ग को सेक्सोफोन की असली ताकत तब समझ में आई. फिर तो ये सिलसिला बन गया. हर विरोध प्रदर्शन में जन आक्रोश को स्वर देने और उसकी रहनुमाई करने की जिम्मेदारी को सेक्सोफोन ने बखूबी निभाया.

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संगीत मे अद्भुत ताकत!

उन्नीसवी सदी के प्रारंभ में जैज संगीत आया. जैज संगीत अफ्रीकी–अमेरिकी समुदायों के बीच से निकला था और उसकी जड़ें नीग्रो ब्लूज़ से जुड़ी हुई थी. जैज ने भी सेक्सोफोन को तहेदिल से अपनाया क्योंकि सेक्सोफोन चर्च की प्रार्थनाओं में ढल जाने वाला वाद्य नहीं था. उसकी आवाज में दहला देने की ताकत थी. खुद जैज अपने आप में एक विस्फोटक कला-रूप था. उसने अपनी शुरूआत से ही उग्र रूप अपनाया था. उसने थोपी हुई नैतिकता और बुर्जुआ समाज के खोखले आडंबरों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. बहुत जल्द वो समय आ गया जब सत्ता और जैज आमने–सामने आ गए .सत्ता का दमन शुरू हो गया तो यूएसएआर में 1948 में सेक्सोफोन और जैज म्यूजिक पर प्रतिबंध लगा दिया गया. उसके ऊपर अभद्र असामाजिकऔर अराजक होने का आरोप था.

ठीक उसी तरह हिटलर के युग में जर्मनी में भी सेक्सोफोन और जैज पर  प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन हर तरह के दमन और अपमान जनक बेदखलियों के बावजूद सेक्सोफोन ने अपनी जिद नहीं छोड़ी क्योंकि वह एक बहुत हठीला जनवाद्य यंत्र है. उसी समय की एक बात है. घूरी रंगया के जंगल में एक बार एक गुप्त कंसर्ट चल  रही थी. इस बात की भनक पुलिस को लग गई और वे दलबल के साथ जंगल की तरफ बढ़े लेकिन  वहां हजारों की तादाद में संगीत सुनने वाले मौजूद थे. पुलिस को यह उम्मीद नहीं थी कि शहर से इतनी दूर जंगल में लोग इतनी बड़ी तादाद में संगीत सुनने जाते होंगे. संगीत की लहरों में झूमते हुए लोगों पर हवाई फायर का भी जब कोई असर नहीं हुआ तो उन्हें बल प्रयोग करना पड़ा. भीड़ तितर-बितर हो गई.संगीत भी बजना बंद हो गया लेकिन तभी एक सेक्सोफोन बजाने वाला एक बहुत ऊंचे पेड़ पर चढ़ गयाऔर वहां पेड़ के ऊपर सेक्सोफोन बजाने लगा. उसके इस बुलंद हौसले को देखकर पूरा जनसमूह फिर से जोश में आ गया. पुलिस ने भले ही पुलिस की वर्दी पहन रखी थी, लेकिन आखिरकार वे भी तो इंसान थे.  तो हुआ ये कि उस धुन ने  पुलिस वालों  के दिलों को  भी अपने वश में कर लिया में  कर लिया और वे भी भाव विभोर हो गए.

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हृदय को स्पर्श करने वाली स्वर लहरियां

अब यहां एक सवाल ये हो सकता है कि  इन साजिंदों के वादन में ऐसी क्या खास बात थी जो सत्ता को नागवार लगती थी ? न तो ये संगीतकार किसी जन आंदोलन से जुड़े थे न ही उनकी कोई राजनैतिक विचारधारा थी. वे तो सिर्फ ऐसी धुनें रचते थे जो लोगों के दिलों पर छा जाती थी. प्रत्यक्ष रूप से वे किसी भी राजसत्ता का विरोध नहीं कर रहे थे , या उन्होने ये सोचकर संगीत नहीं रचा था कि किसी का विरोध करना है. दरअसल उनकी धुनों में ही कुछ ऐसी बात थी कि लोग दूसरी तमाम बातों को भुलाकर उनकी तरफ़ खींचे चले आते थे. अब जरा सोचिए कि  हिटलर पूरे  पूरे जोश-खरोश के साथ कहीं भाषण दे रहा है और लोग उसकी बातों से प्रभावित होकर हिटलर-हिटलर का जयकारा  कर रहे हैं और अचानक कहीं सेक्सोफोन बजने लगे और लोगों का ध्यान हिटलर से हटकर सेक्सोफोन की तरफ़ चला जाए तब क्या होगा .

घर और घाट : भाग 1

मूर्खतापूर्ण धारणाओं तथा पति के धनदौलत के नशे में चूर हो कर रीता ने अपने सगेसंबंधियों को खुद से बहुत दूर कर दिया था. लेकिन आकाश की मृत्यु के बाद उसे अपना यह कदम कितना महंगा पड़ा? ससुराल वालों को अपमानित करती बहू की कहानी पूर्णिमा गुप्ता द्वारा.

मेरे पति आकाश का देहांत हो गया था. उम्र 35 की भी नहीं हुई थी. उन्हें कोई लंबी बीमारी नहीं थी. बस, अचानक दिल का दौरा पड़ा और उन की मृत्यु हो गई. अभी तक तो मित्रगण आते रहे थे, लेकिन पति के देहांत के बाद कोई नहीं आया. इस में उन का भी दोष नहीं. वहां की जिंदगी थी ही इतनी व्यस्त.

पहली 3 रातें मेरे साथ किरण सोई थी. अब से रातें अकेले ही गुजारनी थीं. शायद हफ्ता गुजरने तक दिन भी अकेले बिताने होंगे. क्या करूंगी, कहां रहूंगी, कुछ सोचा नहीं था.

यों तो कहने को मेरी ननद भी अमेरिका में ही रहती थीं लेकिन वह ऐसे मौके पर भी नहीं आई थीं. साल भर पहले कुछ देर के लिए आई थीं. तब मुझ से कह गई थीं, ‘रीता, आकाश बचपन से बड़ा विनोदप्रिय किस्म का है. तुम्हें दोष नहीं देती, लेकिन आकाश को कुछ हो गया तो भुगतोगी तुम ही. तुम लोगों की शादी को 10 बरस हो गए. देखती हूं पहले आकाश की हंसी जाती रही. फिर माथे पर अकसर बल पड़े रहने लगे. साथ ही वह चुप भी रहने लगा. 5 बरस से सिगरेट और शराब का सहारा भी लेने लगा है. रक्तचाप से शुरुआत हुई तनाव की. उस का कोलेस्ट्राल का स्तर ज्यादा है…’

मुझे तो लगता है उन को और कुछ नहीं था, बस, दीदी ही की टोकाटाकी खा गई थी. उन से मेरा सुख नहीं देखा गया था.

रहरह कर अतीत मेरे दिमाग में घूमने लगा. मैं ने दशकों से बहुओं के ऊपर होते हुए अत्याचारों को देखतेसुनते मन में ठान ली थी कि मैं कभी अपने ऊपर किसी की ज्यादती नहीं होने दूंगी. अगर आप जुल्म न सहें तो कोई कर ही कैसे सकता है. इस तरह समस्या जड़ से ही उखड़ जाएगी.

लेकिन मैं जैसी शरीर की बेडौल हूं वैसी अक्ल की भी मोटी हूं. मेरी लंबाई कम और चौड़ाई ज्यादा है. जहां तक खूबसूरती का सवाल है, कहीं न कहीं, कुछ न कुछ होगी ही वरना क्यों आकाश जैसा खूबसूरत नौजवान, वह भी अमेरिका में बसा हुआ सफल इंजीनियर, मुझ 18 बरस की अल्हड़ को एक ही बार देख पसंद कर लिया था. ऊपर से उन्होंने न तो दहेज की मांग की थी, न ही खर्च की नोकझोंक हुई थी.

मेरे मांबाप भी होशियार निकले थे. उन्होंने एक बार की ‘हां’ के बाद आकाश और उस के कितने रिश्तेदारों के कहने पर भी उन्हें एक और झलक न मिलने दी थी. मां ने कह दिया था, ‘शादी के बाद सुबहशाम अपनी दुलहन को बैठा कर निहारना.’

डर तो था ही कि कहीं लेने के देने न पड़ जाएं. मां ने शादी के वक्त भी अपारदर्शी साड़ी में मुझ को नख से शिख तक छिपाए रखा था. क्या मालूम बरात ही न लौट जाए. खैर, जैसेतैसे शादी हो गई और मैं सजीधजी ससुराल पहुंच गई.

अभी तक तो घूंघट में कट गई. मरफी का सिद्धांत है कि यदि कुछ गलत होने की गुंजाइश है तो अवश्य हो कर रहेगा. मैं कमरे में आ कर बैठी ही थी कि ननद ने पीछे से आ कर घूंघट सरका दिया. मैं बुराभला सब सुनने को तैयार थी. मगर किसी ने कुछ कहा ही नहीं. मुंह दिखाई के नाम पर कुछ चीजें और रुपए मिलने अवश्य शुरू हो गए. दीदी तो अमेरिका से आई थीं. उन्होंने वहीं का बना खूबसूरत सैट मुझे मुंह दिखाई में दिया. बाकी रिश्तेदार और अड़ोसीपड़ोसी भी आते रहे.

इतने में ददिया सास आईं. दीदी झट बोलीं, ‘लता, जरा आगे बढ़ कर दादीजी के पैर छू लो.’

मैं ने वहीं बैठेबैठे जवाब दे दिया, ‘पैर छुआने का इतना ही शौक था तो ले आतीं गांव की गंवार. मैं तो बी.ए. पास शहरी लड़की हूं.’

दीदी को ऐसा चुप किया कि वह उलटे पांव लौट गईं. कुछ देर बाद एक कमरे के पास से गुजर रही थी तो खुसरफुसर सुनाई पड़ी, ‘इस को इतना गुमान है बी.ए. करने का. एक आकाश की मां एम.ए. पास आई थी, जिस के मुंह से आज तक भी कोई ऐसीवैसी बात नहीं सुनी.’

अब आप ही बताइए, सास के एम.ए. करने का मेरे पैर छूने से क्या सरोकार था? खैर, मुझे क्या पड़ी थी जो उन लोगों के मुंह लगती. मुझे कल मायके चले जाना था, उस के 4 दिन बाद आकाश के संग अमेरिका. वहां दीदी जरूर मेरी जान की मुसीबत बन कर 4 घंटे की दूरी (200 किलोमीटर) पर रहेंगी. मैं पहले दिन से ही संभल कर रहूंगी तो वह मेरा क्या बिगाड़ लेंगी. अनचाहे ही मुझे किसी कवि की लिखी पंक्ति याद आ गई, ‘क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात.’

लेकिन देखूंगी, दीदी की क्षमा कब तक चलेगी मेरे उत्पात के सामने. बड़ी आई थीं मेरे से दादीजी के पैर छुआने. डाक्टर होंगी तो अपने लिए, मेरे लिए तो बस, एक सठियाई हुई रूढि़वादी ननद थीं.

सच पूछिए तो पिछले 4 दिन में मैं एक बार भी उन को याद नहीं आई थी. मैं पिछले दिनों अपनी एक सहेली के यहां गई थी. पूरा 1 महीना उस की देवरानी उस के घर रह कर गई थी. एक मेरी ननद थीं, जिन के चेहरे पर जवान भाई के मरने पर शिकन तक नहीं आई थी.

जब मैं 10 बरस पहले आकाश के साथ इस घर में घुसी थी तो गुलाब के फूलों का गुलदस्ता हमारे लिए पहले से इंतजार कर रहा था. उसे ननद ने भेजा था. आकाश ने मुझ को घर की चाबी थमा दी थी, लेकिन मुझे ताला खोलते हुए लगा था जैसे ननद वहां पहले से ही विराजमान हों.

घर क्या था, जैसे किसी राजकुमार की स्वप्न नगरी थी. मुझ को तो सबकुछ विरासत में ही मिला था. भले ही वह सब आकाश की 4 साल की कड़ी मेहनत का इनाम था. मैं इतनी खुश थी कि मेरे पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. मेरे सब संबंधियों में इतना अच्छा घरबार उन के खयाल से भी दूर की चीज थी.

मैं ने गुलाब के फूल बैठक में सजा लिए. मगर दीदी का शुक्रिया तो क्या अदा करती, उन की रसीद तक नहीं पहुंचाई. दोचार दिन बाद उन का फोन आया तो कह दिया, ‘हां, मिल तो गए थे.’

उंची उड़ान: भाग 2

उंची उड़ान: भाग 1

आखिरी भाग

आखिरकार रोजरोज की किचकिच से तंग आ कर जय के परिवार वालों ने तृप्ति जो चाहती थी, वही कर दिया. उन्होंने उसे चिखली के साईं अपार्टमेंट घरकुल सोसायटी में एक किराए का फ्लैट ले कर दे दिया. अब तृप्ति पूरी तरह से आजाद थी. उस के मन में जो आता, वह करती थी. अनापशनाप खर्चा, पार्टी और सहेलियों दोस्तों के साथ कंपीटिशन करना उस की आदत में शुमार हो गया.

इस बीच वह एक बच्चे की मां भी बन गई थी. फिर भी उस की आदतों में कोई सुधार नहीं आया था. वह जब तृप्ति को समझाने की कोशिश करता तो वह यह कह कर उसे चुप करा देती कि भगवान ने जिंदगी दी है तो ऐश करो.

तृप्ति का मन घर के कामों के बजाए सोशल मीडिया पर अधिक लगता था. वह फेसबुक, वाट्सऐप पर अपने नएपुराने मित्रों के साथ चैटिंग में लगी रहती थी.

पति से नईनई फरमाइश करती थी. नहीं मिलने पर उस से झगड़ा करती थी. लाचार जय किसी तरह उस की मांगें पूरी करता. पैसे न होने पर वह दोस्तों से पैसे उधार लेता. इस के लिए कर्जदार भी हो गया. लाखों रुपए का कर्जदार होने के बावजूद भी तृप्ति के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया था.

हर रोज नएनए फैशनपरस्त कपड़े पहन कर वह अलगअलग ऐंगल से फोटो खींच कर उन्हें फेसबुक और वाट्सऐप पर डालती और यह दिखाने की कोशिश करती कि वह भी किसी से कम नहीं है.

इस के लिए जब पति मना करता तो वह जय से झगड़ा कर के मारपीट पर उतर आती थी. इतना ही नहीं, वह पति पर व्यंग्य कसते हुए कहती, ‘‘तुम्हारी तरह मेरे दोस्त और सहेलियां भिखारी नहीं हैं. वे सब मेरे फोटो लाइक करते हैं. मुझ से फेसबुक और वाट्सऐप पर बातें करते हैं. देशविदेश की सैर करते हैं. वहां के खूबसूरत फोटो भेजते हैं. तुम ने आज तक मेरे लिए क्या किया है? देशविदेश तो छोड़ो, कभी पुणे तक में नहीं घुमाया. पता नहीं मेरे मांबाप ने तुम में क्या देखा था. मेरी तो किस्मत ही फूट गई है. तुम में मेरे शौक पूरे कराने की भी हैसियत नहीं है.’’

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‘‘तृप्ति जब तुम यह सब जानती हो तो हैसियत से बड़े सपने क्यों देखती हो? हमारी आर्थिक स्थिति तुम्हारे दोस्तों जैसी नहीं है. मैं एक मामूली इंसान हूं. तुम्हारे लिए मैं लाखों रुपए का कर्ज तो पहले ही ले चुका हूं. अब और कर्ज नहीं ले सकता.’’ जय तेलवानी बोला.

इस बात पर तृप्ति को इतना गुस्सा आया कि उस ने अपने पति के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया और कहा, ‘‘चुपचाप रहो, मूर्ख इंसान. तुम क्या जानो सपना क्या होता है?’’

तृप्ति के इस व्यवहार से जय सन्न रह गया. उसे तृप्ति से ऐसी आशा नहीं थी. उसे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन कड़वा घूंट समझ कर पी गया. उस ने सोचा बात बढ़ाने से क्या फायदा, बदनामी उस की ही होगी.

लेकिन उस की इस चुप्पी से तृप्ति का हौसले बुलंद हो गए. वह आए दिन जय से छोटीछोटी बातों को ले कर उलझ जाती थी. इतना ही नहीं, वह सोशल मीडिया पर अपने पति की बुराई कर सहानुभूति बटोरती थी.

उस ने और ज्यादा सहानुभूति पाने के लिए अपना टिकटौक एकाउंट खोला और उस पर नईनई वीडियो बना कर अपलोड करने लगी. बिना यह सोचे कि आगे चल कर इस का क्या नतीजा निकलेगा.

तृप्ति का सोशल मीडिया पर इतना ज्यादा एक्टिव होना जय और उस के परिवार वालों को बुरा लगता था. तृप्ति पति पर बुरी तरह हावी थी. ऊपर से सोशल मीडिया में जय की जो बदनामी हो रही थी, वह अलग बात थी. जय ने जबजब पत्नी को समझाने की कोशिश की, तबतब वह भड़क जाती थी. कहती थी कि क्या अच्छा है, क्या बुरा मैं सब समझती हूं. मैं जो कर रही हूं करने दो. तुम लोग हमारे बीच में मत पड़ो. नहीं तो मैं कुछ कर लूंगी तो पछताओगे.

तृप्ति की आत्महत्या करने की धमकी से जय और उस का पूरा परिवार डर गया था. तृप्ति अपने दोस्तों के साथ नएनए वीडियो तैयार करती और सोशल मीडिया पर अपलोड कर देती. इस से उसे सहानुभूति तो मिलती ही थी, एकाउंट में अच्छाखासा पैसा भी आ जाता था. जिन्हें वह अपने शौक और यारदोस्तों के साथ पार्टियों में खर्च करती थी.

घर और परिवार की बदनामी से तृप्ति का कोई लेनादेना नहीं था. हद तो तब हो गई जब एक दिन तृप्ति ने जय से बड़ी रकम की मांग कर दी. उस ने पैसे देने में असमर्थता जताई तो तृप्ति ने योजना बना कर अपने पति पर एक वीडियो बनाई.

उस वीडियो में उस ने पति को ब्लड कैंसर का मरीज बताया. फिर उस वीडियो में उस ने किसी दूसरे की आवाज डाल कर के सोशल मीडिया पर डाल दिया. साथ ही उस ने आर्थिक मदद करने का भी अनुरोध किया.

इस से तृप्ति को ढेर सारी सहानुभूति तो मिली ही, साथ ही उस के एकाउंट में काफी पैसा भी आया. लेकिन इस से जय को जिस मानसिक तनाव से गुजरना पड़ा, उसे वह बरदाश्त नहीं कर पाया. उस की सारे दोस्तों और नातेरिश्तेदारों में काफी बदनामी हुई.

पत्नी के इस कृत्य से वह अपनों से नजरें नहीं मिला पा रहा था, क्योंकि अब वह लोगों की नजरों में कैंसर का ऐसा मरीज बन गया था, जो लोगों से इलाज के लिए पैसे मांग रहा था. लोग उसे सहानुभूति की नजरों से देखते और धीरज बंधाते थे.

वह उस बीमारी को ले कर जी रहा था, जिस का उसे पता ही नहीं था. वह तृप्ति के व्यवहार से बुरी तरह टूट गया था. अंतत: उस ने एक दिन दिल दहला देने वाला निर्णय ले लिया. अपने मांबाप से फोन पर बात करने के बाद जय ने मौत को गले लगा लिया.

जय तेलवानी के परिवार वालों की शिकायत और सोशल मीडिया की जांचपड़ताल कर एसआई रत्ना सावंत ने तृप्ति से पूछताछ कर उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. उस के विरुद्ध भादंवि की धारा 306 के तहत मामला दर्ज कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे यरवदा जेल भेज दिया गया.

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कुल्हाड़ी से खड़ी कर दीं ये इमारतें

शाहजहां ने अपनी प्रिय बेगम मुमताज महल की याद में ताजमहल बनवाया था, जो न केवल दुनिया के 7 अजूबों में शामिल है, बल्कि इसे देखने के लिए हर साल देशविदेश के लाखों पर्यटक आते हैं. झूठ सच तो पता नहीं लेकिन कहा जाता है कि शाहजहां ने ताजमहल का निर्माण कार्य पूरा होने के बाद इसे बनाने वाले कारीगरों के हाथ कटवा दिए थे ताकि वे ऐसी कोई दूसरी इमारत न बना सकें.

इसी तरह की कहानी रूस की ओनेत्रा झील में स्थित एक द्वीप पर बने किझी पोगोस्त  की भी है. यह रूस की परंपरागत काष्ठकला का अनुपम नमूना है. इस द्वीप पर विशेष तरह के स्कौट देवदार की लकड़ी से 2 चर्च और एक घंटाघर बनाए गए हैं.

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17वीं शताब्दी में 37 मीटर ऊंचे इन चर्चों में एक में 22 और दूसरे में 9 गुंबद हैं. पिछले 300 सालों से खड़ी लकड़ी की इन इमारतों को बनाने के लिए एक खास तरह की कुल्हाड़ी के अलावा कोई भी किसी तरह का औजार इस्तेमाल नहीं किया गया.

इतना ही नहीं, इन्हें जोड़ने में भी कील का इस्तेमाल भी नहीं हुआ. इन्हें बनाने वाले का नाम किसी को भी मालूम नहीं है, लेकिन बताया जाता है कि ऐसी इमारत कोई और न बना सके, इस के लिए उस ने जिस कुल्हाड़ी से इसे बनाया था, उसे झील में फेंक दिया था.

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 खाली खेत में केला उगाने में पाई कामयाबी

सरकारें खेती और खेती से जुड़े दूसरे कामों को भले ही उद्योगों का दर्जा दे पाने में नाकाम रही हों, लेकिन जिन किसानों ने खेती को उद्योग के नजरिए से अपनी आजीविका का साधन बनाने की कोशिश की है, उस में उन्होंने निश्चित ही कामयाबी पाई है. उस कामयाबी के पीछे कड़ी मेहनत, खेती के प्रति उन का समर्पण रहा है.

ऐसे किसान उन्नत खाद, बीज व उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल कर के दूसरे किसानों के लिए नजीर पेश करते हैं. ऐसे ही एक युवा किसान हैं, अशोक कुमार त्रिपाठी, जो बस्ती जनपद हर्रैया नगर पंचायत के अंबेडकर नगर वार्ड के रहने वाले?हैं. उन के 20 बीघा खेत में केले की उन्नत प्रजातियां लहलहा रही हैं. यह सब है, खेती में किए गए उन के द्वारा उन्नत प्रयोगों के चलते संभव हुआ.

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अनुपजाऊ जमीन पर खेती

अशोक कुमार त्रिपाठी द्वारा केले की खेती को नकदी फसल लिए जाने के पीछे की वजह उन की अनुपजाऊ जमीन रही है, क्योंकि उन के 20 बीघा खेत, जो पूरी तरह से बलुई मिट्टी से युक्त हैं, पर खरीफ की फसल लेना संभव नहीं रहता था. ऐसी दशा में वे सालभर में बड़ी मुश्किल से महज एक बार ही पारंपरिक फसलें ले पाते थे, जबकि बाकी समय खेत खाली पड़ा रहता था.

चूंकि अशोक कुमार त्रिपाठी के इन खेतों की मिट्टी पूरी तरह से बलुई थी, इसलिए फसल में लागत भी ज्यादा आती थी. वे अपने खेतों से कम लागत में सालभर की फसल लेने के प्रयास में लगे रहते?थे. इस के लिए वे अकसर तमाम कृषि संस्थानों व कृषि विशेषज्ञों से संपर्क कर फसलों की जानकारी लेते रहते थे. इसी दौरान उन्हें किसी ने बताया कि अगर इस जमीन पर केले की उन्नतशील प्रजातियों की खेती की जाए तो कम लागत में भारी मुनाफा लिया जा सकता है.

किसान अशोक कुमार त्रिपाठी के मन में यह बात बैठ गई और बलुई मिट्टी वाले 20 बीघा खेत में केले की खेती शुरू किए जाने का पक्का मन बना लिया. इस के लिए उन्होंने जरूरी जानकारी हासिल कर 20 बीघा खेत में महाराष्ट्र के जलगांव से केले की जी 9 प्रजाति के 6,200 पौधों को रोपने के लिए मंगाया.

अपने खेत की अच्छी तरह जुताई करा कर उन्होंने उस में सड़ी हुई गोबर की खाद व फसल में कीटों और दीमक से पौधों को बचाव के लिए कीटनाशक को मिट्टी में मिला कर खेत की तैयारी की.

संतुलित खादउर्वरक का इस्तेमाल

किसान अशोक कुमार त्रिपाठी ने केले की खेती में मिट्टी जांच के आधार पर संस्तुत मात्रा में खादउर्वरक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. नतीजा यह रहा कि उन की फसल का विकास सही ढंग से हुआ. साथ ही, खाद के अंधाधुंध प्रयोग में कमी आने से खाद व उर्वरक के ऊपर आने वाले खर्च से भी नजात मिल गई.

अशोक कुमार त्रिपाठी का कहना है कि वे अपनी फसल में उतनी ही खादउर्वरक का प्रयोग करते हैं, जितनी फसल को जरूरत होती है. इस के लिए वे तकनीकी प्रबंधन पर खासा ध्यान देते हैं. फसल में डीएपी, यूरिया, पोटाश, सिंगल सुपर फास्फेट, माइक्रोन्यूट्रिएंस व सागरिका का प्रयोग करते हैं. वे एक पौधे में एक बार में 250 ग्राम खादउर्वरक का इस्तेमाल करते हैं.

अशोक कुमार त्रिपाठी बताते हैं कि पूरी फसल के दौरान कुल 6 बार उर्वरक व खाद देने की जरूरत होती है. फल में खादबीज के संतुलित प्रयोग से उन के केले की खेती में भरपूर फसल आई है.

लाइलाज बीमारी पर नियंत्रण

किसान अशोक कुमार त्रिपाठी एक समय बहुत घबरा गए?थे?क्योंकि उन के द्वारा ली गई केले की फसल में एक ऐसी बीमारी लग गई थी जिस से सिर्फ वही नहीं, बल्कि जिले के बाकी किसान भी परेशान थे, क्योंकि इन के केले की फसल सही देखभाल के चलते बड़ी तेजी से विकास कर रही?थी.

बीते ठंड के मौसम में अशोक कुमार त्रिपाठी के केले की पौधों की पत्तियां गल कर नष्ट होने लगीं, जिस से उन्हें लगा कि कहीं उन की पूरी फसल इस रोग से खराब न हो जाए. इस के लिए उन्होंने कई दवाओं का प्रयोग किया, लेकिन उन की फसल लगातार खराब होती जा रही थी. ऐसे में उन्हें लाखों रुपए डूबने का डर भी सता रहा था.

फिर भी अशोक कुमार त्रिपाठी ने हार नहीं मानी और तमाम संस्थानों और कृषि विशेषज्ञों के बताए अनुसार केले की फसल में कौपर औक्सीक्लोराइड नामक दवा का प्रयोग शुरू किया. इस का असर यह रहा कि उन की फसल में लगे रोग का प्रभाव धीरेधीरे कम होना शुरू हो गया. उन की सक्रियता और फसल में समय से दवाओं के चलते केले में आई बीमारी से जो पौधे खराब होने लगे थे, वह सही होने लगे और फिर धीरेधीरे उन की फसल को पूरी तरह से बीमारी से नजात मिल गई.

सही प्रबंधन से आई लागत में कमी

किसान अशोक कुमार त्रिपाठी ने केले की फसल को पूरी तरह से आधुनिक मौडल को आधार बना कर उगाया. नतीजा यह रहा है कि दूसरे किसानों की अपेक्षा उन के उत्पादन के हिसाब से लागत में काफी कमी आई है.

उन्होंने बताया कि अगर छोटे किसान केले की खेती को उन्नत तरीकों के आधार पर करें तो उन्हें दूसरी पारंपरिक खेती की अपेक्षा ज्यादा मुनाफा हासिल होगा. इस के आधार पर किसान कम समय में अपनी माली हालत को न केवल सुधार सकते हैं, बल्कि अपनी शोहरत में भी काफी इजाफा कर सकते?हैं.

उन के मुताबिक, एक बीघा खेत में 25,000 से 30,000 रुपए की लागत आती है. फसल अच्छी  होने पर 1 लाख रुपए की खालिस आमदनी होने की संभावना रहती है. उन्होंने बताया कि अगर फसल की बढ़वार अच्छी है, तो केले की घार का औसत वजन 25 किलोग्राम से 40 किलोग्राम के बीच होता है.

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जंगली जानवरों से बचाएं फसल

किसान अशोक कुमार त्रिपाठी द्वारा लगाए गए केले की फसल को जंगली सूअर, साही और नीलगाय ने नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया तो उन्होंने फसल की सुरक्षा को ले कर तमाम उपाय अपनाए लेकिन इन जानवरों के चलते उन की फसल को नुकसान पहुंच रहा था. उन्होंने इस से बचाव के लिए अपने खेतों के चारों तरफ सुरक्षा बाड़ लगाने का निश्चय किया और आरसीसी के खंभे व कंटीले तार वाली जाली से उन्होंने खेतों की फैंसिंग कराई जिस से उन के केले की फसल पूरी तरह से महफूज है.

अशोक कुमार त्रिपाठी से सीख ले कर अगर दूसरे किसान भी ऐसी ही नकदी फसलों की खेती वैज्ञानिक तरीके से कृषि विशेषज्ञों द्वारा सुझाए अनुसार करें तो न केवल उन की खेती की लागत में कमी आएगी, बल्कि उन्हें मार्केटिंग व कीमतें तय करने की समस्या से नजात मिलेगी, क्योंकि नकदी फसलों की खरीदारी अकसर आढ़ती और लोकल दुकानदार खेतों से ही करते हैं.

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