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किसके पास है महाराष्ट्र संकट का हल

बात हंसी ठिठोली के अंदाज में शुरू हुई थी जो वाकई अब गंभीर संकट की शक्ल लेती जा रही है, इस बार अभी तक तो न शिवसेना झुकने के मूड में दिख रही और न ही भाजपा जिससे यह रहस्य रोमांच गहराता जा रहा है कि महाराष्ट्र में आखिरकार सरकार कौन बनाएगा और कैसे बनाएगा क्योंकि किसी एक दल के पास 145 का आंकड़ा नहीं है. 24 अक्टूबर को जब विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे तब ऐसा लग रहा था कि थोड़ी सी नोकझोंक और कलह के बाद भाजपा शिवसेना गठबंधन सरकार बना ले जाएगा लेकिन एक हफ्ते से भी ज्यादा का  वक्त गुजरने के बाद भी कोई फैसला होता नहीं दिखाई दे रहा तो देश भर में उत्सुकता का माहौल है कि अब क्या होगा.

24 अक्टूबर के नतीजों में 288 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में भाजपा को सबसे ज्यादा 105 शिवसेना को 56 एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं. 29 सीटें निर्दलीय और दूसरे छोटे दलों के खाते में गईं थीं. बहुमत हालांकि गठबंधन को मिला था लेकिन पेंच तब फंसा जब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भाजपा को यह वादा याद दिलाया कि सौदा 50-50 का हुआ था और भाजपा को इसे पूरा करना चाहिए.

दीवाली तक तो भाजपा यही समझती और मानती रही कि उद्धव हमेशा की तरह धौंस दे रहे हैं और कोई दूसरा रास्ता निकलते न देख कुछ शर्तों पर सरकार बनाने राजी हो जाएंगे पर उद्धव ने कड़ा रुख दिखाया तो भाजपा भी झल्ला उठी कि किस किस की सुने और कहां कैसे सरकार बनाए. गौरतलब है कि हरियाणा में भी उसे महज 40 सीटों से तसल्ली कर नई नवेली जननायक जनता पार्टी से हाथ मिलना पड़ा था जो पहली बार में ही 10 सीटें ले गई थी . हरियाणा की गुत्थी तो जेजेपी के दुष्यंत चौटाला को उप मुख्यमंत्री पद देने से सुलझ गई लेकिन महाराष्ट्र का पेंच इस बार कुछ ऐसा फंसा कि किसी भी तरीके से नहीं सुलझ रहा.

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पवार का रोल अहम

अब जब भाजपा भी अपनी जिद पर अड़ गई है कि उद्धव ठाकरे की धौंस धपट में नहीं आएगी तो एनसीपी मुखिया शरद पवार का रोल अहम हो चला है. जो आदतन खामोश हैं और अपने पत्ते नहीं खोल रहे. 50-50 फार्मूले के तहत शिवसेना ढाई साल के लिए अपना मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल में भी आधी हिस्सेदारी मांग रही है. वह भाजपा को अपना वादा याद दिलाने राम की भी दुहाई दे रही है लेकिन भाजपा कह रही है कि उसने ऐसा  कोई वादा नहीं किया था तो यह तय कर पाना भी मुश्किल हो रहा है कि असल में बेवफा कौन है.

दोनों खेमों से तरह तरह के आरोप प्रत्यारोप लग रहे हैं जिससे संकट और गहराता जा रहा है. लाख दावों के बाद भी भाजपा 145 तक नहीं पहुंचती दिखाई दे रही तो शिवसेना का तो उसके आसपास फटकना ही नामुमकिन है. अब सभी की निगाहें शरद पवार पर जा टिकी हैं कि वे क्या करेंगे. खामोशी से कलह का आनंद उठाते रहेंगे या 8 नवंबर के ठीक पहले लोकतन्त्र की दुहाई देते किसी एक खेमे को अंदर या बाहर से समर्थन देने की घोषणा कर असल हीरो बनकर उभरेंगे.

हालांकि हीरो तो वे तभी बन गए थे जब एनसीपी ने 54 का आंकड़ा छुआ था और सतारा लोकसभा का प्रतिष्ठापूर्ण चुनाव जीतते भाजपा के राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व, मंदिर निर्माण और कश्मीर से धारा 370 हटाने जैसे जज्बाती मुद्दों की हवा निकालकर रख दी थी. उनकी बदौलत कांग्रेस को भी उम्मीद से ज्यादा सीटें मिल गईं जो हाल फिलहाल महाराष्ट्र संकट पर भाजपा और शिवसेना की तरह ही उनका मुंह ताक रही है कि क्या करना है .

विकल्प कई हैं लेकिन सभी दल दूर की भी देख रहे हैं कि ये कितने टिकाऊ होंगे और कौन किसका कितना साथ दे पाएगा. सबसे आसान रास्ता तो यह है कि शरद पवार भाजपा का साथ बाहर से ही सही दे दें. जिससे सारा संकट एक झटके में दूर हो जाए लेकिन सैद्धान्तिक रूप से यह उनके लिए संभव नहीं क्योंकि यह वही भाजपा है जो चुनाव से पहले उन्हें घोटालेबाज बताकर गिरफ्तार करने तक मन बना चुकी थी और दूसरे वे अगर भाजपा का साथ किसी भी तरीके से देते हैं तो उनकी इमेज और साख पर एक स्थायी बट्टा लग जाएगा कि उन्होंने गिरफ्तारी से बचने उसूलों को ताक पर रख दिया.

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दूसरा रास्ता थोड़ा कठिन है कि शरद पवार शिवसेना को समर्थन दे दें जिसमे सैद्धान्तिक अड़चने अपेक्षाकृत कम हैं क्योंकि उद्धव ठाकरे साफ्ट कार्नर न केवल उनके प्रति बल्कि कांग्रेस के लिए भी दिखाते रहे हैं. उन्होंने कई बार सोनिया और राहुल गांधी की भी तारीफ कर भाजपा को खूब चिढ़ाया है. अगर शरद पवार कहेंगे तो सोनिया गांधी भी शिवसेना को समर्थन देने से हिचकिचाएंगी नहीं क्योंकि उनका मकसद भी भाजपा को कमजोर करना है.

ऐसा होना नामुमकिन नहीं है और यह बात भाजपा भी समझ रही है. लेकिन वह जिद्दी उद्धव ठाकरे के टूटने का इंतजार कर रही है और यही उद्धव भी कर रहे हैं कि भाजपा इस समीकरण से घबराकर उनकी बात मान ले.

एक तीसरा रास्ता जो हाल फिलहाल असंभव सा लगता है. वह, यह है कि कोई रास्ता न निकलते देख खुद उद्धव एनसीपी को मुख्यमंत्री पद की कुर्सी की पेशकश कर भाजपा को वाकई वादा खिलाफी का सबक सिखा दें जिससे सनद रहे. इसमें एकलौती अड़चन मंदिर मुद्दे पर मतभेद की है तो उद्धव कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सभी को मान्य होगा इसलिए इस पर अब राजनीति के कोई माने नहीं रह गए हैं.

कोई चौथा पांचवा रास्ता किसी को नजर भी नहीं आ रहा सिवाय इसके कि भाजपा शिवसेना में से कोई एक झुकते कांग्रेस और शरद पवार को और मजबूत होने से रोके ये दोनों ही दल अब अपने विधायकों को लेकर भी आशंकित हो चले हैं कि कहीं कुर्सी के लालच में वे थोक में दूसरे पाले में न चले जाएं.  अब देखना दिलचस्प होगा कि किसकी सब्र पहले टूटती है, अंदाजा भाजपा की सब्र टूटने का ज्यादा है क्योंकि सबसे बड़ा दल होने के बाद भी वह सरकार नहीं बना पाई तो उसे भविष्य में सौदेबाजी में हर जगह नुकसान उठाना पड़ेगा.

फिल्म रिव्यू : ‘‘उजड़ा चमन”

रेटिंगः एक स्टार

निर्माताः मंगत कुमार पाठक

निर्देशकः: अभिषेक पाठक

कलाकार: सनी सिंह, मानवी गगरू, सौरभ शुक्ला, ग्रुशा  कपूर, ऐश्वर्या सखूजा, करिश्मा शर्मा, अतुल कुमार

अवधि: दो घंटे

हीन ग्रथि से उबरने के साथ साथ इंसान की असली सुंदरता उसके लुक/शारीरिक बनावट पर नही बल्कि उसके अंतर्मन में निहित होती है, उसके स्वभाव में होती है. इस मुद्दे पर एक हीन ग्रथि के शिकार  तीस वर्षीय प्रोफेसर, जिसके सिर पर बहुत कम बाल है, की कहानी को हास्य के साथ पेश करने वाली फिल्म ‘‘उजड़ा चमन’’ फिल्मकार अभिषेक पाठक लेकर आए हैं. मगर वह बुरी तरह से असफल रहे हैं. फिल्म दस मिनट के लिए भी दर्शक को बांधकर नहीं रखती.

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कहानीः

2017 की सफल कन्नड़ फिल्म ‘‘ओंडू मोट्टेया कठे’’ की हिंदी रीमेक ‘उजड़ा चमन‘ की कहानी दिल्ली युनिवर्सिटी के हंसराज कौलेज में लेक्चरर/प्रोफेसर के रूप में कार्यरत 30 वर्षीय चमन कोहली (सनी सिंह) की दुःखद दास्तान है, जो कि सिर पर बहुत कम बाल यानी कि गंजा होने के कारण हर किसी के हंसी का पात्र बनते हैं. उनके विद्यार्थी भी कक्षा में उन्हें ‘उजड़ा चमन’ कह कर मजाक उड़ाते हैं. इसी समस्या के चलते उनकी शादी नहीं हो रही है, इससे चमन के पिता (अतुल कुमार) और माता (ग्रुशा कपूर) बहुत परेशान हैं. यह परेशानी तब और अधिक बढ़ जाती है जब एक ज्योतिषी गुरू जी (सौरभ शुक्ला) भविष्यवाणी कर देते हैं कि यदि 31 की उम्र से पहले चमन की शादी न हुई, तो वह संन्यासी हो जाएंगे. इसलिए चमन शादी के लिए लड़की तलाशने के लिए कई जुगाड़ लगाते हैं. टिंडर पर दोस्ती करना शुरू करते हैं. दूसरों की शादी में जाकर लड़कियों के आगे पीछे मंडराते हैं. अपने गंजेपन को छिपाने के लिए विग लगाने से लेकर ट्रांसप्लांट तक की सोचते हैं, लेकिन बात नहीं बनती. अचानक टिंडर के कारण उनकी मुलाकात एक मोटी लड़की अप्सरा (मानवी गगरू) से होती है. पर जब दोनो सामने आते हैं, तो कहानी किस तरह हिचकोले लेती है, वह तो फिल्म देखकर ही पता चलेगा.

लेखन:

फिल्मकार ने एक बेहतरीन विषय को चुना, मगर पटकथा व संवाद लेखक दानिश खान ‘बाल नहीं,  तो लड़की नहीं ‘पर ही दो घंटे तक इस तरह चिपके रहे कि दर्शक कहने लगा ‘कहा फंसाओ नाथ. ’इंटरवल से पहले गंजेपन के चलते मजाक के ही दृश्य हैं, जो कि जबरन ठूंसे गए नजर आते है. हंसराज हंस कालेज के अंदर के दृश्य, खासकर प्रिंसिपल के आफिस के अंदर का दृश्य इस कदर अविश्वसनीय और फूहड़ लगता है कि आम दर्शक को भी लेखक की सोच पर तरस आने लगता है. लेखक चमन के किरदार को भी सही ढंग से नहीं गढ़ पाए. वह कभी सभ्य व संवेदनशील लगते हैं, तो कभी बहुत गंदे नजर आते हैं. पिता व पुत्र के बीच के रिश्ते व संवाद भी फूहड़ता की सारी सीमाएं तोड़ते हैं. चमन के पिता ‘लड़का प्योर है’ व ‘वर्जिन है’ कई बार दोहराते हैं. जिसके कोई मायने नहीं.

निर्देशनः

कुछ वर्ष पहले अभिषेक पाठक ने पानी पर एक बेहतरीन डाक्यूमेंटरी फिल्म बनायी थी, जिसके के लिए उन्हे पुरस्कृत भी किया गया था. उस वक्त वह एक संजीदा निर्देशक रूप में उभरे थे. मगर ‘उजड़ा चमन’ देखकर यह अहसास नही होता उन्ही अभिषेक पाठक ने इसका निर्देशन किया है. निर्देशन में भी खामियां हैं. निर्देशकीय व लेखक की कमजोरी के चलते पूरी फिल्म में हीनग्रंथि की बात उभरकर आती ही नही है.

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अभिनयः

सनी सिंह की यह पहली फिल्म नहीं है. मगर पूरी फिल्म में वह एकदम सपाट चेहरा लिए ऐसे इंसान नजर आते हैं, जिसके अंदर किसी तरह की कोई भावना नही होती. वह इस फिल्म में सोलो हीरो बनकर आए हैं, पर वह इसका फायदा उठाते हुए बेहतरीन अदाकारी दिखाने का मौका खो बैठे. जबकि छोटे किरदार में मानवी गगरू अपनी छाप छोड़ जाती हैं. अतुल कुमार, ग्रुशा कपूर, गौरव अरोड़ा, करिश्मा शर्मा, ऐश्वर्या सखूजा, शारिब हाशमी ने ठीक ठाक काम किया है.

फेस्टिवल स्पेशल: ऐसे बनाएं पोटैटो पैनकेक

आज आपको पोटैटो पेनकेक बनाने की रेसिपी बता रहे हैं. इसे बनाना काफी आसान है. यह रेसिपि सबको पसंद आएगी. तो देर किस बात की झट से बताते हैं आपको पोटैटो पैनकेक की रेसिपी.

सामग्री

-2 कच्चे आलू

-1 उबला आलू

-1 प्याज कटा

-1-2 हरीमिर्चें कटी

-1/2 कप मैदा

-1/4 छोटा चम्मच बेकिंग पाउडर

– 2-3 बड़े चम्मच तेल

-नमक स्वादानुसार.

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बनाने की विधि

कच्चे आलुओं को छील कर कस लें. उबला आलू छील कर कस लें. एक बाउल में कसे आलू, मैदा, मिर्च व प्याज डाल कर पानी के साथ गाढ़ा बैटर बना लें. इस में नमक व बेकिंग पाउडर मिला कर फेंट लें. गरम तवे पर एक बड़े चम्मच से बैटर डाल कर फैला लें. दोनों तरफ तेल डाल कर सेंक लें. सौस के साथ गरमगरम परोसें.

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गलती पर गलती

जानकारी

गलतियां इंसान से ही होती हैं और वही उन गलतियों को सुधारता भी है. अगर उसे गलतियों को सुधारने का मौका ही न दिया जाए तो खामियाजा गलती करने वाले को ही भुगतना पड़ता है. बैंक या फाइनैंस कंपनियों में लेनदेन से संबंधित गलतियां होती रहती हैं. समय रहते उन गलतियों को सुधार भी लिया जाता है और अगर सुधार न हो पाए तो खामियाजा गलती करने वाले को अथवा बैंक को भोगना पड़ता है. बात चूंकि पैसे से जुड़ी होती है, इसलिए इस का असर भी व्यापक होता है.

ऐसी गलतियां हमारे देश में ही नहीं, विदेशों में भी होती हैं. हाल ही में अमेरिका के पेंसिलवेनिया में एक अलग तरह का मामला  सामने आया. हुआ यह कि बैंक की गलती से पेंसिलवेनिया के मोंटूर्सविले में रहने वाले रौबर्ट और टिफनी विलियम्स के खाते में 86.29 लाख रुपए (1,20,000 डौलर) ट्रांसफर हो गए.

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मजे की बात यह कि खाताधारकों ने अपने खाते से निकाल कर 77 लाख रुपए (1,07,000 डौलर) खर्च भी कर दिए. बैंक ने जब दंपति को गड़बड़ी की सूचना दी तो उन्होंने पैसे नहीं लौटाए. मजबूरी में बैंक को कोर्ट जाना पड़ा.

लिकमिंग मजिस्ट्रैट जिला कोर्ट में इस दंपति के खिलाफ चोरी का केस चल रहा है. केस की पहली सुनवाई बीते 9 सितंबर को हुई. सुनवाई में पतिपत्नी ने स्वीकार किया कि जो पैसा उन के खाते में आया, वह उन का नहीं था. पर वे उस में से 90 प्रतिशत खर्च कर चुके हैं.

टिफनी ने बताया कि खाते में आए पैसे से उन लोगों ने एक एसयूवी कार, एक कैंपर, और एक कार ट्रेलर खरीद लिया है. बाकी पैसा अन्य चीजों के बिल चुकाने में खर्च हो गया. उन्होंने एक दोस्त को 15000 डौलर उधार भी दिए.

टिफनी ने यह भी बताया कि जब बैंक ने उन्हें गड़बड़ी की बात बताई तो वे बैंक से रिपेमेंट एग्रीमेंट साइन करने को तैयार हो गईं. लेकिन बैंक ने उन से दोबारा संपर्क नहीं किया. पतिपत्नी ने कहा कि वे अभी पैसा लौटाने की स्थिति में नहीं हैं.

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मोक्ष : भाग 2

पुत्र के लिए व्याकुल गोमती उसे खोजते हुए डेरे पर लौट आईं. चादर बिछा कर लेट गईं लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी. कहां चला गया श्रवण? इस कुंभ नगरी में कहांकहां ढूंढ़ेंगी? यहां उन का अपना है कौन? यदि श्रवण न लौटा तो अकेली घर कैसे लौटेंगी? बहू का सामना कैसे करेंगी? खुद को ही कोसने लगीं, व्यर्थ ही कुंभ नहाने की जिद कर बैठी. टिकट ही तो लाया था श्रवण, यदि मना कर देती तो टिकट वापस भी हो जाते. ऐसी फजीहत तो न होती.

फिर गोमती को खयाल आया कि कोई श्रवण को बहलाफुसला कर तो नहीं ले गया. वह है भी सीधा. आसानी से दूसरों की बातों में आ जाता है. किसी ने कुछ सुंघा कर बेहोश ही कर दिया हो और सारे पैसे व घड़ीअंगूठी छीन ली हो. मन में उठने वाली शंकाकुशंकाओं का अंत न था.

दिन निकला. वह नहानाधोना सब भूल कर, सीधी पुलिस चौकी पहुंच गईं. एक ही दिन में पुलिस चौकी वाले उन्हें पहचान गए थे. देखते ही बोले, ‘‘मांजी, तुम्हारा बेटा नहीं लौटा.’’

रोने लगीं गोमती, ‘‘कहां ढूंढू़ं, तुम्हीं बताओ. किसी ने मारकाट कर कहीं डाल दिया हो तो. तुम्हीं ढूंढ़ कर लाओ,’’ गोमती का रोतेरोते बुरा हाल हो गया.

‘‘अम्मां, धीरज धरो. हम जरूर कुछ करेंगे. सभी डेरों पर एनाउंस कराएंगे. आप का बेटा मेले में कहीं भी होगा, जरूर आप तक पहुंचेगा. आप अपना नाम और पता लिखा दो. अब जाओ, स्नानध्यान करो,’’ पुलिस वालों को भी गोमती से हमदर्दी हो गई थी.

गोमती डेरे पर लौट आईं. गिरतीपड़ती गंगा भी नहा लीं और मन ही मन प्रार्थना की कि हे गंगा मैया, मेरा श्रवण जहां कहीं भी हो कुशल से हो, और वहीं घाट पर बैठ कर हर आनेजाने वाले को गौर से देखने लगीं. उन की निगाहें दूरदूर तक आनेजाने वालों का पीछा करतीं. कहीं श्रवण आता दीख जाए. गंगाघाट पर बैठे सुबह से दोपहर हो गई. कल शाम से पेट में पानी की बूंद भी न गई थी. ऐंठन सी होने लगी. उन्हें ध्यान आया, यदि यहां स्वयं ही बीमार पड़ गईं तो अपने  श्रवण को कैसे ढूंढ़ेंगी? उसे ढूंढ़ना है तो स्वयं को ठीक रखना होगा. यहां कौन है जो उन्हें मनुहार  कर खिलाएगा.

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गोमती ने आलू की सब्जी के साथ 4 पूरियां खाईं. गंगाजल पिया तो थोड़ी शांति मिली.  4 पूरियां शाम के लिए यह सोच कर बंधवा लीं कि यहां तक न आ सकीं तो डेरे में ही खा लेंगी या भूखा श्रवण लौटेगा तो उसे खिला देंगी. श्रवण का ध्यान आते ही उन्होंने कुछ केले भी खरीद लिए. ढूंढ़तीढूंढ़ती अपने डेरे पर पहुंच गईं. पुलिस चौकी में भी झांक आईं.

देखते ही देखते 8 दिन निकल गए. मेला उखड़ने लगा. श्रवण भी नहीं लौटा. अब पुलिस वालों ने सलाह दी, ‘‘अम्मां, अपने घर लौट जाओ. लगता है आप का बेटा अब नहीं लौटेगा.’’

‘‘मैं इतनी दूर अपने घर कैसे जाऊंगी. मैं तो अकेली कहीं आईगई नहीं,’’ वह फिर रोने लगीं.

‘‘अच्छा अम्मां, अपने घर का फोन नंबर बताओ. घर से कोई आ कर ले जाएगा,’’ पुलिस वालों ने पूछा.

‘‘घर से मुझे लेने कौन आएगा? अकेली बहू, बच्चों को छोड़ कर कैसे आएगी.’’

‘‘बहू किसी नातेरिश्तेदार को भेज कर बुलवा लेगी. आप किसी का भी नंबर बताओ.’’

गोमती ने अपने दिमाग पर लाख जोर दिया, लेकिन हड़बड़ाहट में किसी का नंबर याद नहीं आया. दुख और परेशानी के चलते दिमाग में सभी गड्डमड्ड हो गए. वह अपनी बेबसी  पर फिर रोेने लगीं. बुढ़ापे में याददाश्त भी कमजोर हो जाती है.

पुलिस चौकी में उन्हें रोता देख राह चलता एक यात्री ठिठका और पुलिस वालों से उन के रोने का कारण पूछने लगा. पुलिस वालों से सारी बात सुन कर वह यात्री बोला, ‘‘आप इस वृद्धा को मेरे साथ भेज दीजिए. मैं भी उधर का ही रहने वाला हूं. आज शाम 4 बजे टे्रन से जाऊंगा. इन्हें ट्रेन से उतार बस में बिठा दूंगा. यह आराम से अपने गांव पीपला पहुंच जाएंगी.’’

सिपाहियों ने गोमती को उस अनजान व्यक्ति के साथ कर दिया. उस का पता और फोन नंबर अपनी डायरी में लिख लिया. गोमती उस के साथ चल तो रही थीं पर मन ही मन डर भी रही थीं कि कहीं यह कोई ठग न हो. पर कहीं न कहीं किसी पर तो भरोसा करना ही पड़ेगा, वरना इस निर्जन में वह कब तक रहेंगी.

‘‘मांजी, आप डरें नहीं, मेरा नाम बिट्ठन लाल है. लोग मुझे बिट्ठू कह कर पुकारते हैं. राजकोट में बिट्ठन लाल हलवाई के नाम से मेरी दुकान है. आप अपने गांव पहुंच कर किसी से भी पूछ लेना. भरोसा रखो आप मुझ पर. यदि आप कहेंगी तो घर तक छोड़ आऊंगा. यह संसार एकदूसरे का हाथ पकड़ कर ही तो चल रहा है.’’

अब मुंह खोला गोमती ने, ‘‘भैया, विश्वास के सहारे ही तो तुम्हारे साथ आई हूं. इतना उपकार ही क्या कम है कि तुम मुझे अपने साथ लाए हो. तुम मुझे बस में बिठा दोगे तो पीपला पहुंच जाऊंगी. पर बेटे के न मिलने का गम मुझे खाए जा रहा है.’’

अगले दिन लगभग 1 बजे गोमती बस से अपने गांव के स्टैंड पर उतरीं और पैदल ही अपने घर की ओर चल दीं. उन के पैर मनमन भर के हो रहे थे. उन्हें यह समझ में न आ रहा था कि बहू से कैसे मिलेंगी. इसी सोचविचार में वह अपने घर के द्वार तक पहुंच गईं. वहां खूब चहलपहल थी. घर के आगे कनात लगी थीं और खाना चल रहा था. एक बार तो उन्हें लगा कि वह गलत जगह आ गई हैं. तभी पोते तन्मय की नजर उन पर पड़ी और वह आश्चर्य और खुशी से चिल्लाया, ‘‘पापा, दादी मां लौट आईं. दादी मां जिंदा हैं.’’

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उस के चिल्लाने की आवाज सुन कर सब दौड़ कर बाहर आए. शोर मच गया, ‘अम्मां आ गईं,’ ‘गोमती आ गई.’ श्रवण भी दौड़ कर आ गया और मां से लिपट कर बोला, ‘‘तुम कहां चली गई थीं, मां. मैं तुम्हें ढूंढ़ कर थक गया.’’

बहू श्वेता भी दौड़ कर गोमती से लिपट गई और बोली, ‘‘हाय, हम ने सोचा था कि मांजी…’’

‘‘नहीं रहीं. यही न बहू,’’ गोमती के जैसे ज्ञान चक्षु खुल गए, ‘‘इसीलिए आज अपनी सास की तेरहवीं कर रही हो और तू श्रवण, मुझे छोड़ कर यहां चला आया. मैं तो पगला गई थी. घाटघाट तुझे ढूंढ़ती रही. तू  सकुशल है… तुझे देख कर मेरी जान लौट आई.’’

मांबेटे दोनों की निगाहें टकराईं और नीचे झुक गईं.

‘‘अब यह दावत मां के लौट आने की खुशी के उपलक्ष्य में है. सब खुशीखुशी खाओ. मेरी मां वापस आ गई हैं,’’ खुशी से नाचने लगा श्रवण.

औरतों में कानाफूसी होने लगी, लेकिन फिर भी सब श्वेता और श्रवण को बधाई देने लगे.

वे सभी रिश्तेदार जो गोमती की गमी में शामिल होने आए थे, गोमती के पांव छूने लगे. कोई बाजे वालों को बुला लाया. बाजे बजने लगे. बच्चे नाचनेकूदने लगे. माहौल एकदम बदल गया. श्रवण को देख कर गोमती सब भूल गईं.

शाम होतेहोते सारे रिश्तेदार खापी कर विदा हो गए. रात को थक कर सब अपनेअपने कमरों में जा कर सो गए. गोमती को भी काफी दिन बाद निश्ंिचतता की नींद आई.

अचानक रात में मांजी की आंखें खुल गईं, वह पानी पीने उठीं. श्रवण के कमरे की बत्ती जल रही थी और धीरेधीरे बोलने की आवाज आ रही थी. बातों के बीच ‘मां’ सुन कर वह सट कर श्रवण के कमरे के बाहर कान लगा कर सुनने लगीं. श्वेता कह रही थी, ‘तुम तो मां को मोक्ष दिलाने गए थे. मां तो वापस आ गईं.’

‘मैं तो मां को डेरे में छोड़ कर आ गया था. मुझे क्या पता कि मां लौट आएंगी. मां का हाथ गंगा में छोड़ नहीं पाया. पिछले 8 दिन से मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही थी. मैं ने मां को मारने या त्यागने का पाप किया था. मैं सारा दिन यही सोचता कि भूखीप्यासी मेरी मां पता नहीं कहांकहां भटक रही होंगी. मां ने मुझ पर विश्वास किया और मैं ने मां के साथ विश्वासघात किया. मां को इस प्रकार गंगा घाट पर छोड़ कर आने का अपराध जीवन भर दुख पहुंचाता रहेगा. अच्छा हुआ कि मां लौट आईं और मैं मां की मृत्यु का कारण बनतेबनते बच गया.’

बेटे की बातें सुन कर गोमती के पैरों तले जमीन कांपने लगी. सारा दृश्य उन की आंखों के आगे सजीव हो उठा. वह इन 8 दिनों में लगभग सारा मेला क्षेत्र घूम लीं. उन्होंने बेटे के नाम की जगह- जगह घोषणा कराई पर अपने नाम की घोषणा कहीं नहीं सुनी. इतना बड़ा झूठ बोला श्रवण ने मुझ से? मुझ से मुक्त होने के लिए ही मुझे इलाहाबाद ले कर गया था. मैं इतना भार बन गई हूं कि मेरे अपने ही मुझे जीतेजी मारना चाहते हैं.

वह खुद को संभाल पातीं कि धड़ाम से वहीं गिर पड़ीं. सब झेल गईं पर यह सदमा न झेल सकीं.

डिजिटल मार्केटिंग में बनाए करियर

आज के इस दौर में डिजिटल मार्केटिंग का खूब बोल बाला है. इस डिजिटाइजेशन के युग में सब कुछ डिजिटल हो गया है हर कोई यही सोचता है कि जब घर बैठे सामान आ सकता है तो मार्किट कि किल्लत  कौन झेले. ऐसे में औनलाइन/ डिजिटल मार्केटिंग का कारोबार धड़ल्ले से बढ़ रहा है. ऐसे में इस डिजिटल युग में आप भी अपना करियर बना सकते हैं. डिजिटल मार्केटिंग आज एक ऐसा क्षेत्र बन गया है, जहां आप लाखों की कमाई कर सकते हैं. ज्यादातर सभी कंपनियां अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग  को बढ़ाने के लिये न्यूजपेपर, टीवी, मैगजीन आदि में विज्ञापन देते हैं. ठीक इसी तरह औनलाइन मीडिया में भी कंपनी अपनी इमेज बनाने के लिए डिजिटल  मार्केटिंग का सहारा लेती हैं.

डिजिटल मार्केटिंग है क्या

डिजिटल मार्केटिंग का अर्थ है किसी प्रोडक्ट या कम्पनी के बड़े डाटा को एक जगह पर समाना तथा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक उस डाटा को पहुंचाना या किसी भी चीज को औनलाइन बेचना ही डिजिटल मार्केटिंग कहलाता है.

डिजिटल मार्केटिंग एक आसान तरीका है जल्दी से जल्दी फेमस होने का. क्योंकि आज के समय को देखते हुए हर कोई कम से कम 2 घंटे इंटरनेट का प्रयोग करता हैं. ऐसे में अगर आप अपना रोजगार बढ़ाना चाहते हैं तो डिजिटल मार्केटिंग एक दम स्टिक आईडिया है कारोबार को बढ़ाने का. इसके लिये आप फेसबुक ,व्हाट्सएप, गूगल यूट्यूब पर अपने प्रोडक्ट की जानकारी दे सकते हैं और प्रोडक्ट को प्रमोट कर सकते हैं.

कैसे करता है काम

जब हम यूट्यूब चलते है तो वीडियो शुरू होने से पहले ही एड आते हैं या आप गेम खेल रहे हैं तो बीच बीच में एड आते रहते है किसी प्रोडक्ट का फीचर या कीमत शो करते हैं. यही एड डिजिटल मार्केटिंग का हिस्सा होते है. इन प्रोडक्ट्स के कम्पनी ने डायरेक्ट गूगल पर अपना एड दिया होता है. जिस के जरिये ये एड किसी भी वेबसाइट, फेसबुक या गेम कम्पनी अपनी साइट पर शो करती हैं. गूगल या किसी और सर्च इंजन पर हम सर्च करते हैं तो एक बार सर्च करने के बाद थोड़ी ही देर में उस शब्द से संबंधित प्रोडक्ट्स की जनकारी दिखने लगेगी.

योग्यता

जरूरी है कि उम्मीदवार की कम्युनिकेशन स्किल अच्छा हो. मास कम्युनिकेशन या अन्य स्ट्रीम्स के ग्रेजुएट भी इस फील्ड  में एंट्री ले सकते हैं. डिजिटल मार्केटिंग की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए विभिन्न संस्थानों में डिस्प्ले एडवरटाइजिंग, सर्च इंजन मार्केटिंग (SEM) और सर्च इंजन औप्टिमाइजेशन (SEO),  सोशल  मीडिया मार्केटिंग, ईमेल  मार्केटिंग, मोबाइल  मार्केटिंग आदि जैसे फील्ड के लिए कोर्स करवाए जा रहे है. इसमें आने के लिये जरूरी है कि सोशल मीडिया की जानकारी अवश्य हो.

डिजिटल मार्केटिंग के फायदे

डिजिटल मार्किट में सिर्फ एक ही क्षत्र नहीं है बल्कि इसमें कई मौके है अपना करियर बनाने के. जिसका चयन उमीदवार को अपनी क्वालिफिकेशन व प्रतिभा के अनुसार करना चाहिये. इसकी मार्किट डिमांड को देखते हुए कह सकते हैं की इसमें बनाया हुआ करियर सफलता की बुलंदियों तक ले जा सकता है. और इसमें वेतन भी अच्छा मिलता है.

शेखपुरा की डीएम इनायत खान 

आईएएस या आईपीएस अधिकारी बनने के बाद ज्यादातर अधिकारियों की सोच और रुतबा ही नहीं बदलता, उन के परिवार के लोगों तक में अहंकार की भावना आ जाती है. लेकिन गिनेचुने अधिकारी ऐसे भी होते हैं, जो अपनी परवरिश को ध्यान में रखते हुए जमीन से जुड़े रहते हैं. इनायत खान उन्हीं अधिकारियों में से हैं…

नींद में देखे गए सपने और खुली आंखों से सपने देखना अलगअलग बातें हैं. क्योंकि नींद में दिखने वाले सपने कोई जरूरी नहीं कि सुबह तक याद रह जाएं. और अगर याद रह भी जाएं तो उन का कोई महत्त्व नहीं होता. जबकि खुली आंखों से दिखने वाले सपनों का वजूद कल्पनाओं की कमजोर टांगों पर टिका होता है.

कहने का अभिप्राय यह कि कल्पना की कडि़यों को जोड़ कर बुने गए सपने हानिकारक भले ही न हों, लेकिन उन का वजूद बुलबुले की तरह होता है, जो हवा के जरा से झोंके में नेस्तनाबूद हो जाता है.

एक और कहावत है सपनों के पीछे भागना. हर पढ़ालिखा समझदार इंसान अपने भविष्य के लिए एक राह चुनता है और उसी पर चलने की कोशिश करता है. मेहनत और लगन से मनचाही राह पर चल कर कई लोग अपनी मंजिल तक पहुंच भी जाते हैं. इसी को कहते हैं सपनों के पीछे भागना. लेकिन इस में कोई दो राय नहीं कि सपनों के पीछे भागने वालों में से कम ही लोगों को सफलता मिल पाती है.

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हां, जो सफल होते हैं, उन में से कुछ दूसरों की बनाई घिसीपिटी राह पर चलते हैं और कुछ अपने लिए नया मुकाम तय करते हैं. ऐसे ही लोगों में हैं इनायत खान, जिन्होंने हाल ही में बिहार के जिला शेखपुरा के जिलाधिकारी की जिम्मेदारी संभाली है.

आगरा के एक मध्यमवर्गीय परिवार की इनायत खान ने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रैट की कुरसी तक पहुंचने के लिए कम मेहनत नहीं की. वह पूरी लगन और मेहनत से अपने सपनों के पीछे भागती रहीं और अंतत: उन्हें 2011 में सफलता मिल ही गई.

इनायत खान ने उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले आनंद इंजीनियरिंग कालेज से 2007 में इलैक्ट्रौनिक्स में बी.टेक किया था. इस के बाद उन्होंने एक साल तक एक प्रसिद्ध सौफ्टवेयर कंपनी में नौकरी की. लेकिन वहां उन का मन नहीं लगा, इस की वजह उन का आईएएस बनने का सपना भी था, जिस के पीछे वह भाग रही थीं.

अपने सपने को सच करने के लिए उन्होंने 2009 में पहली बार सिविल सेवा परीक्षा दी. इस में वह प्री में तो निकल गईं, लेकिन फाइनल में नहीं निकल पाईं. इसी बीच इनायत का चयन ग्रामीण बैंक में हो गया. लेकिन मेहनती इनायत को इस तरह की नौकरी नहीं चाहिए थी. इसलिए वह आगरा से दिल्ली आ गईं और मुखर्जीनगर के पास गांधी विहार में किराए का एक कमरा ले कर आईएएस की तैयारी में जुट गईं.

2011 में इनायत ने फिर से सिविल सेवा की परीक्षा दी. इस बार वह सफल रहीं. उन का नंबर था 176. उन्हें कैडर मिला बिहार. इनायत की पहली पोस्टिंग नालंदा में हुई, जहां उन्हें असिस्टेंट कलेक्टर बनाया गया. इस के बाद उन्हें एसडीओ बना कर राजगीर भेज दिया गया.

अब तक इनायत खान बहुत कुछ सीखसमझ चुकी थीं. मसलन अपने अधीनस्थों से कैसे काम लेना है. उन के खुद के काम क्या हैं और अधिकार क्या. राजगीर के बाद इनायत की पोस्टिंग भोजपुर में हुई. वहां उन्होंने बतौर डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट कमिश्नर (डीडीसी) का पद संभाला. यहीं से इनायत खान की अलग पहचान बननी शुरू हुई, एकदम कड़क अफसर की इमेज. भोजपुर आ कर उन्हें पता चला कि डेवलपमेंट कमेटी का औफिस बाबुओं के बूते पर चलता है.

बाबुओं और छोटे अफसरों पर शिकंजा कसने के लिए इनायत खान ने सब से पहले प्रखंड के प्रत्येक औफिस में सीसीटीवी कैमरा और अटेंडेंस के लिए बायोमीट्रिक मशीनें लगवाई ताकि सभी समय पर आएंजाएं और कैमरों की जद में रहें.

इतना ही नहीं, वह कार्यालय परिसर में कुरसी लगवा कर बैठ जाती थीं. वहां ऐसे कई लोग थे जो रोज पटना आतेजाते थे. इनायत ने इन सब की क्लास ली और भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दी. इस से मनमौजी अफसरों की गतिविधियों पर अंकुश लग गया.

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कई बार इनायत जिले में चल रहे कामों का औचक निरीक्षण करने के लिए जाती तो गाड़ी दूर खड़ी करा देतीं और पैदल ही कार्यस्थल पहुंच जातीं. इस से काम कराने वालों के मन में डर रहता था कि कहीं इनायत न आ जाएं. वहां के अफसर और बाबू चाहते थे कि  इनायत का जल्दी से जल्दी ट्रांसफर हो जाए.

जल्दी ही उन का तबादला हो भी गया. उन्हें पर्यटन विभाग का संयुक्त सचिन बनाया गया. इस के साथ ही उन्हें बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया. यहां से इनायत खान को शेखपुरा का 21वां जिलाधिकारी बना कर भेजा गया, जहां वह बखूबी अपना काम कर रही हैं.

इनायत खान तेजतर्रार अधिकारी तो हैं ही, साथ ही सामाजिक कार्यों से भी गहराई से जुड़ी रहती हैं. उन में दूसरों का दर्द समझने का भी माद्दा है. 14 फरवरी, 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों से भरी बस पर आतंकी हमला हुआ और 40 जवान शहीद हो गए. शहीद होने वालों में बिहार के भी 2 जवान रतन कुमार ठाकुर और संजय सिन्हा शामिल थे.

इनायत खान ने आगे बढ़ कर रतन कुमार और संजय सिन्हा की एकएक बेटी को गोद लेने का ऐलान किया. इन दोनों बच्चियां की पढ़ाई और उन की परवरिश पर होने वाला खर्च वह आजीवन उठाएंगी. इतना ही नहीं, उन्होंने अपना एक दिन का वेतन भी शहीदों के परिवारों को दिया और अपने स्टाफ से भी ऐसा करने को कहा.

अच्छे संबंध और खुशी का क्या है कनैक्शन

अनुभव को नयानया मैनेजर बनाया गया था. अब उस की जिंदगी में एक ही चीज महत्त्वपूर्ण रह गई थी और वह था काम. इस के सिवा वह कहीं अपना वक्त जाया नहीं करता. यहां तक कि रिश्तों को संभालने या दोस्तों के साथ हंसीमजाक भी नहीं. वह  सुबह औफिस चला जाता और पूरा दिन फाइलों में गुम रहता. देर रात घर लौटता. तब तक उस के बच्चे सो चुके होते. पत्नी से भी केवल काम की बातें करता. बाकी समय अपने मोबाइल या लैपटौप में बिजी रहता. समय के साथ उस के जीवन में हर तरफ से उदासीनता पसरती चली गई. औफिस कुलीग्स भी उस से कटने लगे. पत्नी से झगड़े बढ़ने लगे. खुद बहुत चिडि़चिड़ा रहने लगा. इतना चिड़चिड़ा रहने लगा कि बच्चों का मस्ती करते हुए चीखनाचिल्लाना भी बरदाश्त नहीं कर पाता और उन पर हाथ उठा देता. अकसर बीमार भी रहने लगा.

एक दिन अनुभव के एक डाक्टर दोस्त ने उसे अच्छे संबंधों की आवश्यकता और मानसिक खुशी के सेहत पर पड़ने वाले असर के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उसे जीवन जीने का सही तरीका सिखाया. तब अनुभव को भी समझ में आ गया कि रिश्तों से कट कर वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता, समयसमय पर पौधों की तरह रिश्तों को प्यार और विश्वास के पानी से सींचते रहना जरूरी है.

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इन बातों को ध्यान में रखेंगे तो रिश्ते और जिंदगी में प्यार बना रहेगा:

जिंदगी को बहुत सीरियसली न लें

कुछ लोग जिंदगी को इतना सीरियसली ले लेते हैं कि वे जीवन में छोटेमोटे उतारचढ़ाव को भी स्वीकार नहीं कर पाते और डिप्रैशन में चले जाते हैं, जबकि व्यक्ति का व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए कि बड़ी से बड़ी आंधी भी मन को विचलित न कर सके. लोगों से उलझने के बजाय बातों को हंसी में टालना सीखना चाहिए. इस से रिश्तों में कभी गांठ नहीं पड़ती और आप के अंदर की प्रसन्नता भी कायम रहती है.

थैंकफुलनैस जरूरी

अध्ययनों के मुताबिक आप जिन बातों के लिए दूसरों के शुक्रगुजार हैं उन्हें एक डायरी या मोबाइल में लिख लेने से मन में अलग सी खुशी पैदा होती है. ऐसा करना आपसी रिश्तों के साथसाथ सेहत के लिए भी काफी लाभकारी होता है. कई दफा हम किसी शख्स की उन बातों पर फोकस करने लगते हैं जब उस ने हमारे साथ बुरा किया. इस से हमारा व्यवहार भी उस के प्रति कठोर हो जाता है. इस से रिश्ते में कड़वाहट आने की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे में लिखी उन पुरानी बातों को पढ़ें जब उस ने आप की मदद की थी, कुछ अच्छा किया था. इस से आप के दिमाग को बहुत सुकून मिलेगा और आप ज्यादा संतुलित और मैच्योर तरीके से उस परिस्थिति से निबट पाएंगे.

‘पर्सनल रिलेशनशिप’ नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक वैसे कपल्स जो अपनी रिलेशनशिप में एकदूसरे के प्रति थैंकफुलनैस कायम रखते हैं उन में तलाक कम होते हैं.

गहरे रिश्ते जरूरी

जब आप किसी के साथ बिना किसी छलकपट के दिल से जुड़े होते हैं, उस के सुखदुख को अपना महसूस करते हैं और अपने दिल की हर बात उस से शेयर करते हैं, तो आप का मन बहुत हलका रहता है. खुश रहने के लिए इस तरह के गहरे रिश्ते बनाने जरूरी हैं, क्योंकि जब आप कुछ लोगों के साथ गहराई से जुड़े होते हैं तो वे आप के गम को आधा और खुशियों को दोगुना कर देते हैं. ऐसे रिश्ते में औपचारिकता नहीं वरन अपनापन होता है.

सोशल मीडिया का बढ़ता हस्तक्षेप

काम में व्यस्त रहने के साथसाथ आजकल रिश्तों में आती दूरियों की खास वजह लोगों के जीवन में सोशल मीडिया का बढ़ता हस्तक्षेप भी है. आजकल लोग गैजेट्स की दुनिया में कुछ इस कदर व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने आसपास बैठे लोगों की भी परवाह नहीं रहती. आजकल काल्पनिक दुनिया के रिश्ते वास्तविक रिश्तों पर भारी पड़ने लगे हैं. वे इस तरह व्यस्त तो हैं, मगर प्रसन्न नहीं. वास्तविक प्रसन्नता और सेहत के राज जानने के लिए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अब तक का सब से विस्तृत और लंबा शोध किया.

‘हार्वर्ड स्टडी औफ एडल्ट डैवलपमैंट’ नाम का यह अध्ययन 1938 में शुरू हुआ, जिस में 800 से ज्यादा लोगों के जीवन के हर पहलू का व्यापक अध्ययन किया गया. करीब 8 दशक चले इस अध्ययन में 3 समूहों के लोगों को जोड़ा गया. पहले समूह में 268 उच्च शिक्षित हार्वर्ड ग्रैजुएट्स थे, दूसरा समूह 456 लोगों का था जो बोस्टन के करीबी इलाके के लड़कों का था. ये विपरीत परिस्थितियों में रह रहे थे. तीसरे समूह में 90 महिलाओं को लिया गया. सालों तक इन के जीवन के व्यापक अध्ययन के बाद जो निष्कर्ष सामने आया वह था, अच्छे संबंध हमें खुश और सेहतमंद रखते हैं.

यहां अच्छे संबंधों का तात्पर्य गहरे और मजबूत रिश्तों से है. अकेलापन हमारे गम और डिप्रैशन को बढ़ाता है, जबकि रिश्तों की मिठास गमों को कम करने में मददगार होती है. रिश्ते बहुत सारे हों यह जरूरी नहीं, मगर जो भी रिश्ता हो वह मजबूत और गहरा हो. भले ही आप रिश्तेदारों से जुड़े हों या दोस्तों से, मगर रिश्तों की नींव मजबूत होनी चाहिए.

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आइए, जानते हैं कैसे रिश्तों को मजबूत बनाया जा सकता है:

माफ करना सीखें

बेवजह किसी के प्रति दिल में कड़वाहट रखने की आदत न सिर्फ रिश्तों को कमजोर बनाती है, वरन आप की अपनी मानसिक सेहत के लिए भी खतनाक होती है. ऐसे में बेहतर है कि आप सारे गिलेशिकवे भूल कर दिल से लोगों को माफ करना सीखें. इस से मन में सुकून और जीवन में उमंग कायम रहती है.

धोखा न दें

रिश्तों के बीच रुपएपैसे, शक की गुंजाइश आदि न आने दें. प्यार बहुत मुश्किल से होता है. रिश्ते बहुत धीरेधीरे मजबूत होते हैं. यदि आप सामने वाले के साथ कुछ रुपयों के लिए बेईमानी कर जाएं, उस के विश्वास को तोड़ दें, तो फिर उस के साथ आप के रिश्ते में मधुरता नहीं रह जाती. आप उस व्यक्ति को खो बैठते हैं. खुद आप को भी कभी न कभी इस बात का एहसास जरूर होता है कि आप ने उस के साथ गलत किया है. तब आप को अफसोस होगा और आप जीवन की वास्तविक खुशियों से दूर होते चले जाएंगे.

मदद करना सीखें

जिंदगी ने आप को जो भी दिया है उस का प्रयोग लोगों की मदद करने में करें. खुद आगे आएं. और जितना संभव हो उतना दूसरों की मदद करें. इस से आप के मन को प्रसन्नता मिलती है. कभी अपने किए काम का राग न अलापें, किसी की मदद कर भूल जाएं. ऐसे व्यक्ति से सभी रिश्ता बनाए रखना चाहते हैं.

अपने अहं को आड़े न आने दें

रिश्तों के बंधन को अपने इगो के हाथों टूटने न दें. रिश्तों में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता. किसी के आगे झुकने से यदि रिश्ता टूटने से बच जाता है तो इस में कोई बुराई नहीं, क्योंकि रुपएपैसों से ज्यादा कीमती रिश्ते होते हैं. किसी की सफलता पर खुश होने के बजाय आप चिढ़ने लगेंगे, उसे नीचा दिखाने का प्रयास करेंगे, तो समझ लीजिए कि आप जीवन की सब से महत्त्वपूर्ण संपत्ति यानी उस रिश्ते को खोने वाले हैं.

अपेक्षाएं कम रखें

अकसर हम अपने करीबी लोगों से जरूरत से ज्यादा अपेक्षाएं रखने लगते हैं. मगर जब वे पूरी न हों तो दिल में खटास पैदा हो जाती है. तब हम रिश्तों को कायदे से नहीं जी पाते. अपेक्षाएं हमें दुखी करती हैं और रिश्तों में खटास लाती हैं. इसलिए बेहतर है कि हम अपनी तरफ से किसी भी रिश्ते को अपना संपूर्ण दें, मगर सामने वाले से किसी बदले की इच्छा न रखें.

इन सभी बातों के साथसाथ अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोड़ा समय अपनों के लिए जरूर निकालें. इस से जहां रिश्तों में जान बनी रहती है वहीं मन भी खुश रहता है और तब आप अपना काम दोगुने उत्साह से कर पाते हैं.

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फेस्टिवल स्पेशल 2019: सेल्फी लेने से पहले ऐसे करें मेकअप

आज कल हर किसी पर सेल्‍फी का भूत सवार है. लेकिन हर सेल्‍फी में आप खूबसूरत दिखे ये जरुरी तो नहीं. आप इस बात को तो जानती ही होंगी कि सेल्‍फी तभी अच्‍छी आती है जब आपका मेकअप सही ढंग से अवसर के अनुरूप किया गया हो.

अगर सेल्‍फी लेने के बाद आपकी हर वक्‍त यही शिकायत रहती है कि इस सेल्‍फी में आपकी फोटो अच्‍छी नहीं आई तो यदि आप हमारे बताए गए तरीके से मेकअप करेंगी तो यकीन मानिये कि अगली बार आप खुद के चेहरे को फोटोजनिक मानेंगी.

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कैसा हो मेकअप

सेल्‍फी किस जगह पर और किस अवसर के लिये खींच रही हैं उस बात का ध्‍यान रखें. जैसे अगर आप कौलेज में हैं तो न्‍यूड मेकअप रखें यानी की त्‍वचा के रंग से मिलता जुलता मेकअप.

BB क्रीम का प्रयोग

अपने चेहरे को स्‍मूथ और डेलिकेट लुक देने के लिये आप चाहें तो बीबी क्रीम या फिर टिंटिड मौइस्‍चराइजर का प्रयोग कर सकती हैं. इससे आपका चेहरा नेचुरल लगेगा.

आईब्रो करें डार्क

एक शेड डार्क आई ब्रो पेंसिल का इस्‍तमाल करें. क्‍योंकि ज्‍यादातर कैमरे के फ्लैश से आई ब्रो हल्‍की दिखने लगती हैं तो ऐसे में अगर वो गहरी और सेट रहेंगी तो अच्‍छा रहेगा.

बाहर के लिये मेकअप

अगर आप प्राकृतिक लाइट में सेल्‍फी ले रही हैं तो मेकअप हल्‍का रखें. आंखों पर काजल और मस्‍कारा लगाएं और चेहरे से मेल खाता फाउन्‍डेशन लगाएं. इसके बाद ट्रान्‍सुलेट पावडर और पिंक कलर का ब्‍लशर हल्‍का लगाएं.

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बदहाली के शिखर पर खेती और किसान

साल 1991 में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अपनाते समय देश के लोगों को यह विश्वास दिलाया गया था कि यह देशहित में होगा. आज 29 साल बाद पूंजीवाद के प्रभावों की दोबारा से समीक्षा की जानी चाहिए. उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों से इस देश में सब से ज्यादा प्रभावित तबका किसान और मजदूर तबका रहा है.

दरअसल, जिस की ज्यादा जरूरत होती?है, उस के लिए इस देश में नारे गढ़ लिए जाते हैं. 1965 में युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने  ‘जय जवान’ का नारा दिया था. भुखमरी की कगार पर खड़े देश को किसानों की याद आई और हरित क्रांति के लिए ‘जय किसान’ का नारा दे दिया गया. परमाणु परीक्षण के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘जय विज्ञान’ का नारा दिया.

क्या जिस तरह बातों में जवान, किसान और विज्ञान को महत्त्व दिया गया?है, हकीकत में उस के हिसाब से इन को सहूलियतें दी गई हैं? आज हर तरफ नजर दौड़ा कर देख लीजिए, तीनों तबके परेशान नजर आएंगे.

सरकारें चाहे किसी की भी रही हों, लेकिन दिखावी नारों के बीच हमें गौर करना होगा कि आज किसान कहां खड़ा है?

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आजादी के समय जीडीपी में खेती का योगदान तकरीबन 53 फीसदी था और आज यह योगदान घट कर 12 फीसदी हो गया है. वाजपेयी मिशन 20-20 के हिसाब से साल 2020 तक इसे 76 फीसदी तक लाना है.

दिनोंदिन बढ़ रही आबादी, औद्योगीकरण और नगरीकरण की अंधाधुंध नीतियों तले किसानों की परेशानी और खेती की उपयोगिता को सरकारों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया. उद्योगों को बंजर भूमि के बजाय खेती की जमीनों पर लगा दिया गया. शहरी प्राधिकरणों ने खेती वाली जमीन का अधिग्रहण कर नगरीकरण को अंधाधुंध बढ़ावा दिया. औद्योगिक केंद्रों के विकेंद्रीकरण के अभाव में चंद बड़े शहरों में मानव के अधिभार में बेतहाशा बढ़ोतरी के कारण इन शहरों के आसपास की खेती वाली जमीन आवासीय कालोनियों में तबदील हो गई.

खेती वाली जमीन का विस्तार कर के सिंचाई की सुविधा उपलब्ध न कराने के चलते पहले से स्थापित खेती की जमीन पर उत्पादन बढ़ाने का बोझ आ गया, जिस के चलते कैमिकल खादों व दवाओं का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाने लगा और वह जमीन भी बंजर बनने लग गई. कुलमिला कर हम खेती की जमीन को विस्तार देने के बजाय उपलब्ध जमीन को समेटते रहे.

आज हमारे सामने दुष्प्रभावों की झड़ी लगी है तो गलत नीतियों की समीक्षा करने के बजाय नजरअंदाज करने के मूड में है. किसान आत्महत्या हमारी गलत नीतियों का नतीजा है, न किसी व्यक्ति विशेष की कार्यप्रणाली का.

हां, हर जिम्मेदार व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वे ईमानदारी के साथ गलत नीतियों और दुष्प्रभावों का अध्ययन कर के नई व बेहतर नीतियां लागू करे, लेकिन आज भी लीपापोती ही हो रही है. सरकारी संस्थाएं गलतियों को उजागर करने के बजाय आंकड़ों की हेराफेरी में लग जाएं तो वंचितों में मायूसी छाएगी और वह मायूसी आक्रोश के गुबार के रूप में सामने आती है.

एनसीआरबी के आंकड़े बताते?हैं कि साल 2013 में 11,772 किसानों ने आत्महत्या की थी, वहीं साल 2014 में 5,660 किसानों ने आत्महत्या की थी.

इन के आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और बिहार में साल 2014 में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की.

बता दें कि एनसीआरबी पुलिस व सरकारी महकमों में रिकौर्ड आत्महत्याओं का डाटा जमा कर के पेश करता है. जब हंगामा मचने के बाद भी पूरी सरकारी मशीनरी किसान की आत्महत्या को कर्ज से संबंधित होने से इनकार कर देती है तो हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि हर किसान की मौत का आंकड़ा दर्ज होता होगा.

बात इतनी भर नहीं है. एनसीआरबी ने हेराफेरी के लिए किसानों को 2 कैटीगरी में बांट रखा है. जमीन वाले किसान और भूमिहीन किसान. भूमिहीन किसानों को खेतिहर मजदूर मान कर मजदूरों की कैटीगरी में शिफ्ट कर दिया गया. आंकड़े जारी करते वक्त 2 नई श्रेणी में ये जारी किए जाते?हैं, स्वरोजगार खेती, स्वरोजगार अन्य.

भूमिहीन किसानों को खेतिहर मजदूर मान कर इन की आत्महत्या को स्वरोजगार अन्य में जारी कर दिया गया. इस के चलते स्वरोजगार खेती में तो आत्महत्या के आंकड़े घट गए, लेकिन स्वरोजगार अन्य में आत्महत्याओं के आंकड़े बढ़ गए. इस तरह किसान आत्महत्या को कम कर के दिखाया जाता है.

इस तरह की शिफ्टिंग छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सामने आई है. मध्य प्रदेश में किसान आत्महत्या के 82 मामले घटे, लेकिन स्वरोजगार अन्य में 236 मामले बढ़ गए.

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इस तरह की हेराफेरी दर्शाती?है कि नीति बनाने वालों की मंशा ही समस्या को स्वीकार करने की नहीं?है तो सुधार कैसे होगा.

छिपाने की तमाम कोशिशों के बावजूद भी आंकड़े बढ़ते ही जा रहे?हैं. साल 2012 तक हर साल किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा 12,000 था, जो 2015 तक आतेआते 42 फीसदी बढ़ोतरी तक जा पहुंचा.

इस की मुख्य वजह यही?है कि एक तरफ तो बढ़ी हुई आबादी, औद्योगीकरण और नगरीकरण के चलते कृषि जोत में कमी आई है, लेकिन उस अनुपात में कृषि पर मानव के अधिभार को कम नहीं कर पाए. खेती पर निर्भर लोगों को दूसरी जगह रोजगार उपलब्ध करवाने में नाकाम रहे.

आज हालात ये?हैं कि 5 बीघा जमीन पर 10 लोग निर्भर?हैं. इस उत्पादन और आमदनी से उन का भरणभोषण करने में नाकाम है. हम ने जीडीपी में कृषि के योगदान को 53 से 13 फीसदी तक ला कर छोड़ दिया, लेकिन खेती पर निर्भर 80 फीसदी आबादी को अभी तक 70 फीसदी से नीचे नहीं ला पाए. आज भी 13 फीसदी आमदनी पर 70 फीसदी आबादी गुजारा ही नहीं कर रही, बल्कि बाकी 30 फीसदी आबादी को भी सस्ता खाना मुहैया करा रही?है.

उद्योगों को मैनपावर मुहैया कराने के लिए हम ने पूरा शिक्षा बजट ही झोंक रखा है. आईटीआई, आईआईटी, इंजीनियरिंग के साथसाथ प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के जरीए कुशल श्रमिक मुहैया करवाने के लिए हजारों करोड़ रुपए फूंके जा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ कृषि शिक्षा की कहीं चर्चा ही नहीं हो रही?है.

कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विकास केंद्रों, जिला व तहसील कृषि केंद्रों के क्या हाल?हैं, वे भी किसी से छिपे नहीं हैं. किसान के स्नातक बच्चे को भी नहीं पता है कि नजदीकी कृषि केंद्र कहां हैं. सूने पड़े कृषि संस्थान भूतिया खंडहरों के रूप में पड़े हैं. इस की वजह यह है कि खेतीकिसानी की जानकारी रखने वाले अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के खादबीज बेच रहे?हैं तो जिन की 7 पुश्तों ने खेत नहीं देखे, वे कृषि प्रबंधन का काम देख रहे हैं.

ऐसे में आप अंदाजा लगा लीजिए कि प्रबंधन किस तरह का होता है. जो बचाखुचा बजट आता?है, वो कार्यालय के रखरखाव और यातायात की लौग बुक भर कर हड़प लेते?हैं. जमीन व फसल प्रबंधन की कहीं बात ही नजर नहीं आती.

देश के अंदर कृषि जींसों की कितनी खपत है? कौन सी फसल कितनी पैदा की जाए कि सही कीमत मिलने में समस्या न हो? निर्यात कब व कितनी मात्रा में किया जाए? जब तक किसानों को सही कीमत न मिल जाए, तब तक आयात न किया जाए. भविष्य के लिए कितने भंडारण की जरूरत है? किस फसल का कितना उत्पादन किया जाए, ताकि कीमतों में संतुलन बना रहे? वगैरह.

इस तरह के तमाम सवालों पर न सोच है और न सोचने की कूवत. सवाल नीति का ही नहीं, बल्कि नीयत का भी है. एक तरफ दालों का उत्पादन खपत से ज्यादा होता है. तो वहीं दूसरी तरफ कालाबाजारी से भाव बढ़ा कर अफ्रीकी देशों से दाल मंगा ली जाती?है. फिर कालाबाजारी और आयातित दालें एकदम बाजार में आ जाती हैं और दालों के भाव धड़ाम से नीचे गिर जाते हैं.

अब सरकार मूंग व तुअर की दाल खरीदने में आनाकानी कर रही?है. एक तरफ 100 रुपए किलोग्राम दाल आयात करते हुए कोई परेशानी नहीं हुई, लेकिन किसानों से 50 रुपए किलोग्राम खरीदने में पसीना छूट रहा है. यह विसंगतियों का नतीजा है, जिस में तुरंत सुधार की जरूरत?है.

सरकार को अगर वाकई किसानों की दुर्दशा में बदलाव लाना है तो जमीन अधिग्रहण बिल में सुधार करे. साहूकारों पर लगाम लगाने के उपाय खोजे. वितीय संस्थानों द्वारा कर्ज बांटने में किसानों के लिए एक निश्चित हिस्सा तय करे.?

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बैंक किसानों को कर्ज देने में आनाकानी करते हैं. भ्रष्ट बैंकिंग सिस्टम में पारदर्शिता लाने का प्रयास करे. किसानों की साख व्यवस्था पर नकारात्मकता फैलाने वाले लोगों के मुंह पर लगाम लगाए. किसानी फसलों के लिए सही क्रयविक्रय की व्यवस्था करे.

कृषि मंडियां आढ़तियों और दलालों के लूट के अड्डे बन चुके हैं. महाराष्ट्र में किसानों द्वारा सड़कों पर प्याज फेंकी जाती?है तो पश्चिम बंगाल में लोग प्याज की कमी से जूझ रहे होते हैं.

इस के निदान के लिए सरकार सप्लाई चैन व परिवहन व्यवस्था का इंतजाम करे. ब्लैक लैवल पर भंडारण की व्यवस्था करे. कृषि आधारित उद्योगिधंधों को बढ़ावा दे. ग्रेडिंग, ब्रांडिंग, पैकेजिंग और अंतर्राष्ट्रीय लैवल पर कृषि उत्पादों की मार्केटिंग में किसानों का सहयोग करे.

आज देश सरकार के गलत फैसलों की वजह से माली संकट से जूझ रहा?है. खेती पर निर्भर मानव का अधिभार ही मजदूर के रूप में बड़े नगरों में आता है. किसी उद्योगपति का बेटा मजदूर नहीं बनता है. किसी बड़े कारोबारी या नेता का बेटा मजदूर नहीं बनता है.

विडंबना यह है कि खेती छोड़ कर मजदूर बनने पर भी मजदूरी नहीं मिलती.

एक तरफ तो क्रोनी कैपिटलिज्म के कंधों पर सैंसेक्स, जीडीपी वगैरह आंकड़ों को उठा कर घूम रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ बहुसंख्य आबादी हैरानपरेशान घूम रही है. नौजवान तबका रोजगार की कमी में अपराध की तरफ बढ़ रहा?है तो अब तक शांत व अहिंसक समझे जाने वाले किसान सड़कों पर उतर कर मजबूरी में हिंसा अपनाने की तरफ बढ़ रहे?हैं.

आज विज्ञान शहरी सुविधाभोगी तबके की सुविधा में इजाफा करने तक सिमटा है तो सेना का जवान रोज होती शहादतों के बीच बेचैनी अनुभव कर रहा?है. ‘जय जवान’, ‘जय किसान’, ‘जय विज्ञान’ के नारे को इंडिया गेट पर टांग कर जमीनी लैवल पर काम करने की सख्त जरूरत है.

कृषि प्रधान देश का प्रधान तबका ही जब आंदोलन की राह पर निकल चुका हो तो पीछे कुछ बचता नहीं. देशद्रोही, उपद्रवी, वामपंथी, नक्सली का तमगा देने मात्र से देश के हालात सुधरने वाले नहीं हैं.

देश अराजकता की तरफ तेजी से बढ़ रहा है. विभिन्न गुटों में बंटे हित समूहों के आपसी तालमेल में कमी के चलते संपूर्ण क्रांति तो असंभव सी प्रतीत होती है, लेकिन गृह युद्ध के मोड़ पर जरूर पहुंचा सकती है.

कामों में इतना विरोधाभास है कि गरीबों के घरों पर पीले बोर्ड बना कर लिखा जा रहा?है, ‘मैं गरीब हूं, इसलिए बीपीएल मान कर 10 किलो गेहूं दिया जाए’ जबकि अमीर लोगों के घरों के बाहर लिखा जाना चाहिए था, ‘मैं किसानों द्वारा उत्पादित गेहूं जो सरकारी नियंत्रण में गरीबों को मुहैया करवाना था, लेकिन गरीबों का हक मार कर मैं खा रहा हूं.’

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