आईएएस या आईपीएस अधिकारी बनने के बाद ज्यादातर अधिकारियों की सोच और रुतबा ही नहीं बदलता, उन के परिवार के लोगों तक में अहंकार की भावना आ जाती है. लेकिन गिनेचुने अधिकारी ऐसे भी होते हैं, जो अपनी परवरिश को ध्यान में रखते हुए जमीन से जुड़े रहते हैं. इनायत खान उन्हीं अधिकारियों में से हैं...

नींद में देखे गए सपने और खुली आंखों से सपने देखना अलगअलग बातें हैं. क्योंकि नींद में दिखने वाले सपने कोई जरूरी नहीं कि सुबह तक याद रह जाएं. और अगर याद रह भी जाएं तो उन का कोई महत्त्व नहीं होता. जबकि खुली आंखों से दिखने वाले सपनों का वजूद कल्पनाओं की कमजोर टांगों पर टिका होता है.

कहने का अभिप्राय यह कि कल्पना की कडि़यों को जोड़ कर बुने गए सपने हानिकारक भले ही न हों, लेकिन उन का वजूद बुलबुले की तरह होता है, जो हवा के जरा से झोंके में नेस्तनाबूद हो जाता है.

एक और कहावत है सपनों के पीछे भागना. हर पढ़ालिखा समझदार इंसान अपने भविष्य के लिए एक राह चुनता है और उसी पर चलने की कोशिश करता है. मेहनत और लगन से मनचाही राह पर चल कर कई लोग अपनी मंजिल तक पहुंच भी जाते हैं. इसी को कहते हैं सपनों के पीछे भागना. लेकिन इस में कोई दो राय नहीं कि सपनों के पीछे भागने वालों में से कम ही लोगों को सफलता मिल पाती है.

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हां, जो सफल होते हैं, उन में से कुछ दूसरों की बनाई घिसीपिटी राह पर चलते हैं और कुछ अपने लिए नया मुकाम तय करते हैं. ऐसे ही लोगों में हैं इनायत खान, जिन्होंने हाल ही में बिहार के जिला शेखपुरा के जिलाधिकारी की जिम्मेदारी संभाली है.

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