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नौसेना में महिलाएं भी बना सकती हैं उज्जवल भविष्य

देश की तीनो सेनाएं वायु सेना, नौसेना, थल सेना हम भारतीयों की शान हैं. इन सभी बलों के अधिकारी न केवल समाज में सर्वोच्च सम्मान का आनंद लेते हैं,  बल्कि कार्यस्थल पर साहसिक और चुनौतीपूर्ण कार्य भी करते हैं. अपने देश की सुरक्षा के लिये हंसते हंसते अपने प्राण तक न्यौछावर कर देते हैं. जब भी हम इन सेनाओं के बारे में सोचते हैं तो एक वर्दी धारी पुरुष की छवि ही सामने आती हैं न की महिलाओं की.. लेकिन अब महिलाएं भी इस क्षेत्र मे पीछे नहीं हैं और धीरे धीरे वो भी भारतीय सेनाओं मे अपना परचंप लहरा रही हैं. चाहे वायु सेना की पहली पायलट भावना कांत हों. हाल ही में सब लेफ्टिनेंट शिवांगी भारतीय नौसेना की बनी पहली महिला पायलट. सभी अपने देश और अपने माता पिता का नाम रोशन कर रही हैं. जिन महिलाओं को समुन्दर से लगाव और सफेद वर्दी से हो प्यार तो वो अपना उज्वल भविष्य नौसेना में बेझिझक बना सकती हैं. इसमें शामिल होने के लिए अनिवार्य है कि उम्मीदवार के पास इनमें से कोई भी डिग्री हासिल हो और साथ ही सेना में शामिल होने के लिए महिला अविवाहित हो .

योग्यता

नौसेना में जाने के लिए साइंस से 12 वीं पास होना  आवश्यक हैं. वर्तमान में भारतीय नौसेना शार्ट सर्विस कमीशन प्रवेश परीक्षा के अंतर्गत महिला उम्मीदवारों को शामिल करती है. उनकी एसएससी अवधि पूर्ण होने पर महिला नौसैनिक अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया जाता है, जो कि रिक्तियों की संख्या, मेरिट और उनके व्यक्तिगत प्रदर्शन पर आधारित होता है. भारत सरकार ने ला, एजुकेशन और नेवल आर्किटेक्चर कैडर में महिलाओं को आकर्षक करियर बनाने का मौका देती है.

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आब्जर्वर

आब्जर्वर पद के लिये महिला की उम्र 19 से 25 वर्ष होनी चाहिए. शैक्षिक योग्यता के अंतर्गत कम से कम 55 %अंकों के साथ किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से किसी भी एक विषय में मैकेनिकल इंजीनियरिंग / इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग / कंप्यूटर साइंस / टेक्नोलौजी में स्नातकोत्तर की डिग्री हो या भौतिक विज्ञान या गणित में किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से द्वितीय श्रेणी के मास्टर की डिग्री प्राप्त हो.

नेवल आर्कीटेक्चर – जिन महिलाओं को चमत्कारों को निर्मित करने का जुनून हो उनके लिये बिल्कुल सटिक प्रोफेशन है. इसमें शामिल होने के लिये महिला की उम्र 21 से 25 वर्ष के समहू में आना जरूरी है. मैकेनिकल, सिविल, एरोनौटिकल, मेटालर्जीकल, एरोस्पेस इंजीनियरिंग में बी.टेक/बी.ई में कम से कम 60 % अंकों से उत्तीर्ण किया होना चाहिए है. भारतीय नौसेना में महिला इंजीनियर एसएससी/यूनिवर्सिटी एण्ट्री स्कीम द्वारा ली जाती हैं.

ला

जो उम्मीदवार नौसेना में ला के पद में अपना करियर बनाना चाहते हैं उनकी जानकारी के लिए बता दें कि ला के उम्मीदवारों की कम से कम 22 से 27  वर्ष होनी चाहिए. 55 % अंकों के साथ ला की डिग्री प्राप्त होनी चाहिए .

पायलट जनरल

जो उम्मीदवार पायलट जनरल के पद में  के लिए महिलाओं की न्यूनतम आयु सीमा 19 से 24 वर्ष है. उम्मीदवारों को 12 वीं कक्षा में भौतिकी और गणित के साथ किसी भी विषय में बीई / बीटेक की डिग्री होनी चाहिए.

एजुकेशन – शिक्षा शाखा में भी महिलाएं अपना करियर बना सकती हैं. इसके लिए उम्र सीमा 21-25 वर्ष होनी चाहिए और न्यूनतम 50 प्रतिशत अंकों के साथ कम्प्यूटर सांइस, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रौनिक्स, मेकेनिकल में बी.टेक/बी.ई पूर्ण किया होना चाहिए या गणित,  भौतिक शास्त्र, कम्प्यूटर एप्लीकेशन एवं अन्य में एमएससी होनी  चाहिए.

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लौजिस्टिक्स और वर्क

इसके लिए आवश्यक आयु 19 से 25 वर्ष है उम्मीदवारों को किसी भी विषय में बीई / बी टेक / एमबीए / बी एससी / बी काम / बी एससी (आईटी) प्रथम श्रेणी में होना चाहिए. प्रथम श्रेणी के साथ पीजी डिप्लोमा में फाइनेंस / लौजिस्टिक्स / सप्लाई चेन मैनेजमेंट / मटेरियल मैनेजमेंट या एमसीए / एम एससी (आईटी) की ड्रिगी प्राप्त होनी चाहिए.

वर्क्स के लिए: बीई / बी टेक (सिविल) / बी आर्किटेक्ट की डिग्री प्राप्त होनी चाहिए.

खानपान के लिए : एम एससी (एचएम) / एमबीए (एचएम) / बी एससी या बीए प्रथम श्रेणी के साथ और एचएम में पीजी डिप्लोमा प्राप्त होना चाहिए .

एटीसी

जो उम्मीदवार एटीसी में अपना करियर बनाना चाहते हैं तो उनकी जानकारी के लिए बता दें कि इस पद के लिए महिलाओं की न्यूनतम आयु 19 से 25  वर्ष के समहू में हो. शैक्षणिक आवश्यकता के लिए, उम्मीदवार द्वारा अनिवार्य रूप से विज्ञान संकाय अर्थात भौतिक शास्त्र/गणित/इलैकट्रोनिक्स में स्नातक या स्नातकोत्तर होना अनिवार्य है .

महाराष्ट्र के बाद झारखंड को गंवाना नहीं चाहती भाजपा, क्या रघुवर दास तोड़ पाएंगे ये मिथक ?

हिंदुस्तान के किसी न किसी कोने में लोकतंत्र का त्योहार होता ही रहता है. कुछ महीनों पहले हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव हुए. इन दोनों की प्रदेशों में भाजपा को करारा झटका लगा. हरियाणा में तो भाजपा ने जुगाड़ कर सरकार बना ली लेकिन महाराष्ट्र में सियासी नाटक के बाद बीजेपी से सत्ता छीन गई. बीजेपी ने खूब कोशिश की लेकिन बात नहीं बन सकी. अब झारखंड में चुनाव हो रहे हैं. पहले चरण का मतदान हो गया है. दूसरे चरण का मतदान के लिए 20 सीटों पर सात दिसंबर को मतदान होगा. इसमें 13 सीटें कोल्हान और सात सीटें दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल की हैं. इन सीटों पर 2014 के चुनाव में भाजपा और झामुमो बराबरी पर रहे थे. इस बार भाजपा को अपना जनाधार बढ़ाने की तो झामुमो को अपने गढ़ बचाने की चुनौती है.

इस चुनाव में सबसे ‘हौट सीट’ जमशेदपुर (पूर्वी) विधानसभा क्षेत्र बनी हुई है, जहां से मुख्यमंत्री रघुवर दास चुनाव मैदान में उतरे हैं. मिथक है कि राज्य में जितने भी मुख्यमंत्री बने हैं, उन्हें चुनाव में हार का स्वाद चखना पड़ा है. इसलिए सबके मन में यह सवाल आ रहा है कि क्या दास इस मिथक को तोड़ पाएंगे?

दास की पहचान झारखंड में पांच साल तक मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की है. बिहार से अलग होकर झारखंड बने 19 साल हो गए है परंतु रघुवर दास ही ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने लगातार पांच साल तक मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे. यही कारण है कि मुख्यमंत्री पर हार का मिथक तोड़ने को लेकर भी लोगों की दिलचस्पी बनी हुई है.

झारखंड के गठन के बाद वर्ष 2000 में भाजपा सरकार में राज्य में पहले मुख्यमंत्री के रूप में बाबूलाल मरांडी ने कुर्सी संभाली थी. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने वर्ष 2014 में भाजपा से अलग होकर अपनी पार्टी झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) बना ली और गिरिडीह और धनवाद विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन दोनों सीटों पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

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धनवाद विधानसभाा क्षेत्र में भाकपा (माले) के राजकुमार यादव ने मरांडी को करीब 11,000 मतों से पराजित कर दिया, जबकि गिरिडीह में उन्हें तीसरे स्थान से संतोश करना पड़ा. भाजपा के अर्जुन मुंडा भी राज्य की बागडोर संभाली, लेकिन उन्हें भी मतदाताओं की नाराजगी झेलनी पड़ी. राज्य में तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके अर्जुन मुंडा 2014 में खरसावां से चुनाव हार गए. उन्हें झामुमो के दशरथ गगराई ने करीब 12 हजार मतों से हराया. दशरथ गगराई को 72002 मत मिले, जबकि अर्जुन मुंडा को 60036 मत ही प्राप्त हो सके.

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से मुख्यमंत्री बने नेताओं को भी देर-सबेर हार का मुंह देखना पड़ा है. झारखंड के दिग्गज नेता शिबू सोरेन राज्य की तीन बार बागडोर संभाल चुके हैं, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री रहते तमाड़ विधानसभा उपचुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक गंवानी पड़ी.

मधु कोड़ा के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वर्ष 2008 में शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन वह उस समय विधानसभा के सदस्य नहीं थे. वर्ष 2009 में उन्होंने तमाड़ विधानसभा सीट से किस्मत आजमाई, लेकिन जीत नहीं सके. उन्हें झारखंड पार्टी के प्रत्याशी राजा पीटर ने आठ हजार से अधिक मतों से पराजित कर दिया.

शिबू सोरेन के पुत्र और झामुमो के नेता हेमंत सोरेन भी झारखंड के मुख्यमंत्री जरूर रहे, लेकिन उन्हें भी हार का स्वाद चखना पड़ा है. वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में हेमंत दो विधानसभा सीटों बरहेट और दुमका से चुनावी मैदान में उतरे, मगर उन्हें दुमका में हार का सामना करना पड़ा. बरहेट से जीतकर हालांकि उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा बचा ली.

निर्दलीय चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनने वाले मधु कोड़ा को भी 2014 में मंझगांव विधानसभा सीट से हार का सामना करना पड़ा है.

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इस चुनाव में झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास एक बार फिर जमशेदपुर (पूर्वी) से चुनावी मैदान में हैं. उनके सामने उनके ही मंत्रिमंडल में रहे सरयू राय बतौर निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरे हैं. ऐसे में इस सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है. अब सबकी दिलचस्पी इस बात को लेकर है कि ‘झारखंड में मुख्यमंत्री हार जाते हैं’ के मिथक को दास तोड़ पाएंगे? हार-जीत का फैसला 23 दिसंबर को होना है.

फिलहाल खनिज प्रधान इस प्रदेश की चुनावी खबरें इतनी ज्यादा न दिखाई दे रहीं हों लेकिन यहां का पारा गर्म है. महाराष्ट्र के बाद भाजपा इस प्रदेश को गंवाना नहीं चाहती. यही वजह है कि पीएम मोदी से  लेकर तमाम बीजेपी के हाई प्रोफाइल नेता वहां की जनता को रिझाने की कोई कसर नहीं छोड़ रहे.

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आज की जीवनशैली में घर और औफिस की बढ़ती जिम्मेदारियों को निभाना यों तो आसान लगता है किंतु वास्तव में आसान है नहीं. स्वस्थ मानसिकता के अभाव में इस रिश्ते को निभाने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. आइए, उन बातों का अध्ययन करें जो कमजोर पड़ते रिश्तों को और अधिक कमजोर बनाती हैं.

विवाह के बाद के पहले 5 वर्ष

  1. पतिपत्नी के लिए पहले 5 वर्ष बहुत अहमियत रखते हैं. शुरू के 5 वर्षों में जो गलतियां करते हैं वे हैं:
  2. खुद को बदलने की जगह पार्टनर से बदलने की चाह रखना.
  3. लाइफपार्टनर से जरूरत से ज्यादा अपेक्षाएं रखना.
  4. छोटीछोटी बातों को मुद्दा बना कर लड़ाईझगड़ा करना. न खुद चैन से रहना, न दूसरे को चैन से रहने देना.
  5. एकदूसरे के दोषों को ढूंढ़ढूंढ़ कर आलोचना और ताने मारने की प्रवृत्ति रखना.

इन कारणों से पतिपत्नी में दूरी बढ़ती जाती है और वक्त रहते अगर सूझबूझ से अपनी समस्याओं का समाधान पतिपत्नी नहीं कर पाते हैं तो अलगाव होना और फिर तलाक की संभावना बढ़ जाती है. अत: दोनों को इस बात का आभास होना चाहिए कि रिश्ते बहुत नाजुक होते हैं. इन्हें अथक प्रयास द्वारा, स्वस्थ मानसिकता के साथ संभालना बहुत जरूरी होता है.

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गलतियों को मानें

सब से विचित्र बात यह है कि पतिपत्नी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं कर पाते जबकि जीवन से संबंधित ये गलतियां जीवन को अधिक सीमा तक प्रभावित करती हैं. इन्हें छोटी गलतियां मानना ही मूलरूप से गलत है. रिश्ते को हर हाल में टूटने से बचाने की जिम्मेदारी पति और पत्नी दोनों की होती है. मुश्किलें पतिपत्नी की हैं, तो समाधान भी उन के द्वारा ही ढूंढ़ा जाना चाहिए.

दिल खोल कर प्रशंसा करें

रिलेशनशिप ऐक्सपर्ट मानते हैं कि एकदूसरे के प्रति तारीफ के शब्द न केवल पार्टनर्स को एकदूसरे के नजदीक लाते हैं, बल्कि टूटने के कगार पर आ गए रिश्तों में ताजगी भरने की भी संभावना रखते हैं. वैवाहिक जीवन की कामयाबी बहुत सीमा तक इस बात पर निर्भर करती है कि पतिपत्नी एकदूसरे की प्रशंसा कर के जीवन को आनंदपूर्ण बनाए रखें.

रिलेशनशिप टिप्स

  1. ऐक्सपर्ट स्टीव कपूर ने अपनी पुस्तक में हैल्दी रिलेशनशिप के निम्न टिप्स दिए हैं:
  2. पतिपत्नी को सैंस औफ ह्यूमर रखना चाहिए. चीजों और समस्याओं को गंभीरता से लेना चाहिए, जब यह स्थिति और समस्या की मांग हो.
  3. पतिपत्नी को एकदूसरे की ड्रैस सैंस की तारीफ करनी चाहिए. अच्छी बातों के लिए तारीफ करने में कंजूसी बिलकुल नहीं करनी चाहिए.
  4. एकदूसरे को कौंप्लिमैंट दें. विश्वास के आधार पर रिश्ते में मिठास भरें.
  5. यदि पतिपत्नी में से कोई एकदूसरे की बात मानने को तैयार नहीं है तो इस के कारण को जानने की कोशिश करें न कि उस के साथ विवाद कर उसे परेशान करें और खुद भी परेशान हों.
  6. सरे की भावनाओं से खिलवाड़ ठीक नहीं होता है. एकदूसरे को ब्लैकमेल करने से या उस की कमजोरी पर फोकस करने की आदत आत्मघाती होती है. भावनात्मक स्तर पर एकदूसरे के साथ जुड़ाव के लिए वक्त निकाल कर घूमने अवश्य जाएं. भूल कर भी अपने प्यार का प्रदर्शन लोगों के सामने न करें.
  7. बहसबाजी अच्छी आदत नहीं है. जब भी ऐसा अवसर आए अपने संवाद को कट शौर्ट कर के सुखद मोड़ देते हुए अपने रिश्ते को बचाएं और संवारें.

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रिलेशनशिप की समस्याओं की पृष्ठभूमि

आइए, रिलेशनशिप की समस्याओं को नीतिपूर्वक तरीके से निबटने के बारे में जानें:

  1. आप अपने पार्टनर को बेहद प्यार करते हैं, लेकिन जब बात आती है इगो को बैलेंस करने की तो चुपचाप सहन करते हुए कभी खुल कर एकदूसरे के सामने नहीं आ पाते हैं. चुप रहना एक बहुत बड़ी कमजोरी बन जाती है. बेहतर होगा कि अपनी तरफ से आप स्पष्ट रूप से पार्टनर का सहयोग कर विवाहित जीवन को बेहतर बनाने के बारे में सोचें.
  2. रिलेशनशिप का सारा दारोमदार क्रिया और प्रतिक्रिया का है. अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करने में जल्दबाजी न करें. सोचसमझ कर व सूझबूझ के साथ सही प्रतिक्रिया दें. एक सिंगल वार्तालाप से हमेशा समस्या सुलझ जाने की आशा न करें.
  3. अपनी रिलेशनशिप को बेहतर बनाए रखने के लिए एकदूसरे से सुझाव मांगें और अध्ययन करने के बाद उन सुझावों को अमल में लाएं जो रिलेशनशिप के लिए कारगर और उपयोगी हैं. यह काम धैर्यपूर्वक समस्या को खुले दिल से स्वीकार करने के बाद ही हो सकता है.
  4. बेकार का वादविवाद न करें और न ही दूसरे लोगों को उस का हिस्सा बनाएं. कम से कम शब्दों में समस्या को परिभाषित करें. एकदूसरे को उचित समय दें. ऐसा माहौल बनाएं जिस में आप खुले दिल और दिमाग से समस्या का निवारण करने की जिम्मेदारी पूरी लगन और सचाई के साथ कर सकें.
  5. हर समस्या के समाधान पर एकदूसरे को पार्टी, लंच, डिनर दे कर यह एहसास कराएं कि जो कुछ हुआ बहुत अच्छा हुआ.

ऐसे निकालें समस्याओं के हल

पतिपत्नी का रिश्ता जब विवाह के बाद प्रारंभिक चरण में होता है तो सब रिश्तेदारों की अपेक्षाएं वास्तविक आधार पर नहीं होतीं. संबंधी नई बहू से आशा करते हैं कि वह हर रिश्ते को दिल से सम्मान दे. अपनी सुविधा को नजरअंदाज कर वह रिश्ते का निर्वाह इस तरह करे जैसे वह उन्हें बरसों से जानती है. अधिकतर पत्नियां जन्मदिन या शादी की वर्षगांठ पर यह उम्मीद रखती हैं कि पति उपहार में डायमंड या गोल्ड के आभूषण, डिजाइनर वस्त्र आदि उसे गिफ्ट करे. दोनों पार्टनर जीवन के लिए प्रैक्टिकल अप्रोच अपनाएं तो वे जीवन को क्रोध, तानों और दोषारोपण की मौजूदगी में भी उत्तम तरीके से बिता सकते हैं. मनोवैज्ञानिक जौन गोटमैन का सुझाव है कि पतिपत्नी का महत्त्वपूर्ण कर्तव्य है कि वे एकदूसरे पर कीचड़ न उछालें. एकदूसरे के प्रशंसक बनें. एकदूसरे के लिए चिंता तो करें, लेकिन रचनात्मक सोच के साथ. उन का हर फैसला सहयोग के आधार पर होना चाहिए.

हर विवाह की स्थिति ऐसी होती है कि अगर आप खूबियां ढूंढ़ेंगे तो आप को सब कुछ अच्छा नजर आएगा. अगर एकदूसरे की कमियों पर फोकस करना चाहेंगे तो बहुत कमियां नजर आएंगी. इसलिए बेहतर होगा कि अच्छाई पर फोकस रखें व पौजिटिव नजरिया अपनाएं. आप में वे सब गुण और काबिलीयत हैं, जो आप को ‘विन विन’ स्थिति में रख कर विजयी घोषित कर सकते हैं. प्यार मांगने से नहीं मिलता है. प्यार के लिए डिजर्व करना पड़ता है. जीवन का हर लमहा आनंद से सराबोर होना चाहिए. यह पतिपत्नी का जन्मसिद्ध अधिकार है.

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इन कारणों से नहीं पतले होते आप, बढ़ता है वजन

लोगों के लिए वजन का कम होना किसी चुनौती से कम नहीं होता. शरीर की चर्बी को कम कर उसे सही शेप में लाना एक बड़ी चुनौती होती है. शरीर की चर्बी कम करने के लिए लोग तरह तरह के एक्सरसाइजेज करते हैं, जिम जाते हैं, डाइटिंग करते हैं पर लोगों को बहुत फायदा नहीं मिलता. इस खबर में हम आपको बताएंगे कि अगर लाख कोशिशों के बाद भी अगर आप अपना वजन कम नहीं कर पा रहें तो उसके कारण कौन से हो सकते हैं.

अधिक तनाव लेने से

तनाव और मोटापे का गहरा संबांध होता है. कई शोधों में ये बात साबित भी हो चुकी है. जब व्यक्ति तनाव में रहता है तो उसके शरीर से कोर्टिसोल हार्मोन्स प्रोड्यूस होने लगते हैं. इससे ब्लड शुगर का स्तर काफी बढ़ जाता है और फैट जमा होने लगता है. इसके अलावा बहुत से लोग तनाव में अधिक खाने लगते हैं जिससे उनका वजन बढ़ने लगता है.

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नींद में कमी

सेहतमंद रहने के लिए जरूरी शर्त है कि आपकी नींद पूरी रहे. सही ढंग से और पूरी नींद नहीं लेने से आप मोटापे के चपेट में आ सकते हैं. कई स्टडीज में इस बात की पुष्टि हुई है कि नींद पूरी ना रहने से मोटापा बढ़ता है.

हो सकता है थायरौयड

अगर आपकी लाख कोशिशों के बावजूद आपका वजम कम नहीं हो पा रहा है तो आपको थायरौयड की की बीमारी हो सकती है. आपको बता दें कि आपके गले में मौजूद छोटी ग्रंथियां थायरौयड हार्मोन बनाती हैं. खाने के माध्यम से जो आयोडीन शरीर को मिलता है उससे थायरौयड दो तरह के हार्मोन्स बनाते हैं. जब थायरौयड ग्लैंड कम मात्रा में हार्मोन्स बनाने लगता है तो इससे आपका वजन बढ़ने लगता है.

इंसुलीन में रुकावट

हम जो भी खाते हैं वो ग्लूकोज में टूट जाता है. इससे ब्लड शुगर का स्तर अधिक हो जाता है. पैंक्रियाज शरीर में ग्लूकोज से मिलने पर इंसुलीन बनाता है. इंसुलीन का काम ग्लूकोज को शरीर के जरूरी भागों तक पहुंचाने का है, लेकिन अगर आप इंसुलिन प्रतिरोधी हैं, तो आपके इंसुलिन रिसेप्टर्स इंसुलिन को पहचान नहीं पाते हैं. इस कारण शरीर की एनर्जी मोटापे के रूप में जमा हो जाती है, जिससे वजन बढ़ता है.

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बिहाइंड द बार्स : भाग 1

‘आह… आह… आह… आह… ओ गौड… सेव मी…. आह… सेव मी गौड…’ नोरा की चीखों से काल कोठरी गूंज रही थी. दर्द अपनी हदें पार कर रहा था. वह जमीन पर पड़ी बिन पानी की मछली की तरह तड़प रही थी. मृणालिनी और कुसुम जैसे-तैसे उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन दर्द था कि बढ़ता ही जा रहा था. नोरा की चीखों और कराहों से जेल की दीवारें थरथरा रही थीं. आसपास की कोठरियों की महिला कैदियों की आंखों से नींद उड़ चुकी थी. तमाम औरतें अपनी बैरकों के जंगले पकड़ कर खड़ी थीं. सभी गहरे दर्द और दहशत में थीं. हरेक के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें थीं कि पता नहीं अगले क्षण क्या होने वाला है. किसी ने चीख कर कहा, ‘उसके पेट को नीचे की ओर सहलाओ… उससे कहो जोर लगाए…’ तभी दूसरी आवाज उभरी, ‘पानी गर्म कर लो… ये रोटियां झोंक कर आग जला ले…ले रोटियां ले… ले… और ले…’

सामने की सलाखों में बंद औरतें निशाना साध-साध कर अपनी पोटलियों में चुरा कर छिपायी गयीं सूखी रोटियां निकाल-निकाल कर नोरा की सेल की तरफ फेंकने लगीं. कुसुम जमीन पर तड़पती नोरा को छोड़कर अपने सेल की सलाखों से हाथ निकाल कर बाहर जमीन पर पड़ी रोटियां इकट्ठा करने लगी. कैदी औरतें दोपहर और रात के वक्त खाने में ज्यादा रोटियां ले लेती थीं और उन्हें अपनी बैरकों में छिपा कर रख लेती थीं. ये रोटियां सूख कर कड़ी लकड़ी की भांति हो जाती थीं. कुछ दबंग अपराधिनें तालाबंदी के दौरान अपनी बैरकों में इन्हें जला कर चाय वगैरह भी बना लेती थीं, लेकिन ज्यादातर औरतें तो इसलिए रोटियों का ढेर लगाती थीं ताकि जाड़ों की सर्द रातों में इन्हें जला कर आग तापी जा सके. कड़कड़ाते जाड़े की रातें एक-एक कंबल के सहारे काटना मुश्किल लगता था.

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नोरा का चीखना-चिल्लाना बढ़ता ही जा रहा था. मृणालिनी तेजी से अपने सामान में कुछ ढूंढ रही थी. जल्दी ही उसे अपने कपड़ों की पोटली में वह चीज मिल गयी, जिसकी उसे तलाश थी. वह प्लास्टिक की बड़ी कंघी थी. मृणालिनी जल्दी-जल्दी कंघी के दांतों को जमीन पर दबा-दबा कर तोड़ने लगी. ऐसा करने में उसके हाथ घायल हुए जा रहे थे, मगर उसे उस वक्त अपने लहूलुहान हो रहे हाथों की जरा भी परवाह नहीं थी. वह जल्दी से जल्दी उस कंघी के सारे दांतों को तोड़कर उसे चाकू जैसा धारदार बनाना चाह रही थी. पाखाने के चबूतरे के किनारे बैठ कर उसने खुरदरी जमीन पर कंघी को एक तरफ से तेजी से घिसना शुरू कर दिया. वह पूरा जोर लगाकर कंघी जमीन पर घिस रही थी. उसकी सांस धौकनी की तरह चल रही थी. नोरा का रुदन उसे व्याकुल कर रहा था. घबराहट के मारे उसका पूरा शरीर कांप रहा था, लेकिन इस वक्त न जाने कहां से उसके हाथों में गजब की ताकत आ गयी थी. कंघी को घिस-घिस कर उसने पंद्रह-बीस मिनट में एक ओर से इतना धारदार बना डाला कि अब उससे बच्चे की नाल आसानी से काटी जा सकती थी.

उधर कुसुम ने सूखी रोटियों को पाखाने के होल में डाल कर उसमें आग लगा दी. उसके ऊपर उसने पानी से भरा वह छोटा ड्रम रख दिया, जिसमें पाखाने के लिए पानी भर कर रखा जाता था. कैदियों की बैरक में ज्यादा चीजें नहीं होती हैं. मगर जरूरत का कुछ सामान रखने की इजाजत औरतों को होती है और कुछ चीज़ें वो चुरा चुरा कर जमा कर लेती हैं. आज इन थोड़े से संसाधनों के सहारे ही इस अंधेरी रात में एक नया जीव सलाखों के बीच अपनी आंखें खोलने वाला था. नोरा का तड़पना और चीखना-चिल्लाना चरम पर था. पानी को गर्म होने के लिए छोड़ कर कुसुम जमीन पर उसके पास बैठी उसका पेट दबा और सहला रही थी.

वह उसके सिर पर हाथ फेर-फेर कर दर्द को बर्दाश्त करने की ताकत देते हुए बोली, ‘नीचे की ओर जोर लगा बिटिया… लंबी सांस ले… नीचे जोर लगा… देख अभी बाहर आ जाएगा…’ नोरा का पूरा जिस्म पसीने से तर-ब-तर था. वह बार-बार थक कर बेहोश होने को हो जाती थी… कुसुम उसके गालों पर जोर-जोर से थपकी देने लगी. नोरा बेहोश न हो जाए इस घबराहट में एक बार तो उसने उसके गाल पर जोर का तमाचा भी जड़ दिया. काफी समय हो गया था नोरा को दर्द में तड़पते हुए. रात के डेढ़ बजे होंगे जब उसको दर्द उठना शुरू हुआ था. जेल के घड़ियाल ने तीन का घंटा बजाया ही था कि अचानक नोरा की एक जोरदार चीख सुनायी दी और इस चीख के साथ बच्चा बाहर आ गया. जमीन पर चारों तरफ खून ही खून फैल गया. कुसुम के हाथों में खून में लिथड़ा बच्चा देखकर मृणालिनी ने जल्दी से जमीन पर बैठ कर उसकी नाल काटी. कुसुम ने बच्चे को थोड़ा ऊपर उठाया तो वह चीख मार कर रो पड़ा. नई जिन्दगी ने अपने सही सलामत आने का पैगाम दे दिया था. लड़का हुआ था. मां का चेहरा खिल उठा. मासूम के रुदन का दूसरी  बैरकों में बंद औरतों ने हर्ष मिश्रित स्वरों में स्वागत किया. कुसुम ने मृणालिनी की ओर देखा और फिर पलट कर नोरा का चेहरा देखने लगी. तीनों के चेहरों पर विजयी मुस्कान थी.

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धुंधली रोशनी में नोरा का पसीने से नहाया चेहरा चांद सा चमक रहा था. दर्द गुजर चुका था मगर थकान ने उसे निढाल कर रखा था. उसमें हिलने तक की ताकत नहीं बची थी. वह ज्यों की त्यों ज़मीन पर पड़ी रही. कुसुम और मृणालिनी ने मां और बच्चे को साफ किया और पुरानी धोती में लपेट कर मासूम को नोरा के बगल में लिटा दिया. नोरा ने बेटे को छाती से चिपका लिया. उसकी आंखों के कोरों से आंसू की बूंदें टपकने लगीं. जेल की कालकोठरी में उसके एडबर्ड का जन्म होगा, यह तो उसने कभी नहीं सोचा था. एडबर्ड – हां, यही नाम रखा उसने अपने मासूम बेटे का.

एडबर्ड का पिता यानी उसका पति फ्रेडरिक कहां है, नोरा को कुछ पता नहीं. पिछले सात महीने से वह इस जेल में ड्रग तस्करी के आरोप में बंद है और इन सात महीनों में फ्रेडरिक एक बार भी उसका हालचाल लेने नहीं आया. पता नहीं वह कहां है? जिंदा भी है या नहीं? कहीं वह भी उसकी तरह किसी कैदखाने में बंद न हो? कहीं वह देश छोड़कर भाग न गया हो? अनेक सवाल नोरा के जेहन में उभरने लगे.

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मृणालिनी ने अपनी धोती फाड़ कर उसके कई टुकड़े किये. फिर कुसुम के साथ मिल कर उसने बैरक के फर्श पर बिखरा खून साफ कर डाला. पाखाने में पानी डाल कर जली हुई रोटियों की राख बहायी. सुबह होने में कुछ वक्त है. शायद पांच बज रहे हैं. बाहर अभी अंधेरा है. जाड़ों की शुरुआत हो चुकी है. रातें लंबी होने लगी हैं. छह बजे तक ही रोशनी होती है. सात बजे बैरकों के ताले खुलेंगे और कैदी औरतें अपने नित्य के कामों में जुट जाएंगी. आज इन तीनों को ही नहीं बल्कि आस पास की बैरकों में बंद सभी औरतों को बड़ी शिद्दत से सुबह होने का इंतज़ार था.

प्यार पर भारी पड़ा धर्म

मंजू पूरी रात अपने बेटे संजय के घर लौटने का इंतजार करती रही, लेकिन वह नहीं लौटा. सुबह होने पर मंजू ने संजय के दोस्तों से बेटे के बारे में पता किया तो उन्होंने बताया कि उस के 3-4 दोस्त उसे अपने साथ ले कर कहीं गए थे. मंजू ने उन दोस्तों के बारे में पता लगाना शुरू किया तो जो बात मालूम हुई, उसे सुन कर वह परेशान हो उठी.

उसे जानकारी मिली कि वहीदा का भाई सलीम संजय को शराब पिलाने की पार्टी में शामिल होने के लिए अपने साथ ले गया था. सलीम के साथ और भी युवक थे. वह संजय के ऊपर यह सोच कर झुंझला रही थी कि जब जाना ही था तो क्या उसे साथ जाने के लिए सलीम ही मिला था. क्योंकि सलीम की बहन वहीदा को ले कर संजय की उस से दुश्मनी चल रही थी. अब मंजू का मन तरहतरह की आशंकाओं से घिरने लगा. उसे बेटे के गायब होने के पीछे किसी साजिश की बू आने लगी.

सलीम अपने अब्बा फजरुद्दीन, मां मदीना और बहन वहीदा के साथ हरियाणा के जिला फरीदाबाद की नेहरु कालोनी में मंजू के पड़ोस में ही रहता था. मंजू का मन नहीं माना तो देर शाम वह सलीम के घर पहुंच गई. उस ने सलीम से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह संजय को अपने साथ ले कर तो जरूर गया था, मगर पार्टी खत्म होने के बाद घर जाने की बात कह कर संजय कहां चला गया, यह उसे नहीं मालूम.

जब संजय के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो 19 अगस्त को मंजू थकहार कर बेटे की गुमशुदगी दर्ज कराने थाना डबुआ कालोनी पहुंची.

पुलिस ने जब उस से किसी पर शक होने के बारे में पूछा तो उस ने शक जाहिर किया कि उस के बेटे को गायब करने में पड़ोस में रहने वाले सलीम और उस के पिता फजरुद्दीन का हाथ हो सकता है. फजरुद्दीन उस की इसलिए हत्या करना चाहता था, क्योंकि संजय ने उस की मरजी के खिलाफ उस की बेटी वहीदा से लव मैरिज कर ली थी.

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मंजू की शिकायत पर उसी दिन डबुआ थाने में भादंवि की धारा 346 के तहत मुकदमा दर्ज कर संजय की तलाश शुरू कर दी. संजय 16 अगस्त, 2018 से गायब था. उसे गायब हुए 3 दिन गुजर चुके थे. पुलिस ने संजय के सभी दोस्तों से पूछताछ की लेकिन उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

थानाप्रभारी ने यह सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी. तब अपर पुलिस उपायुक्त (एनआईटी) निकिता अग्रवाल ने इस हत्याकांड के रहस्य से परदा उठाने के लिए एक टीम का गठन किया, जिस में एसआई ब्रह्मप्रकाश, ओमप्रकाश, एएसआई कप्तान सिंह, हैडकांस्टेबल ईश्वर सिंह, कांस्टेबल संदीप, रविंद्र, अनिल कुमार, बिजेंद्र, संजय आदि शामिल थे.

इस टीम का नेतृत्व इंसपेक्टर नवीन पाराशर कर रहे थे. उन्होंने मृतक संजय की मां मंजू तथा घर वालों से घटनाक्रम के बारे में पूछताछ की, तब उन्हें पता चला कि संजय ने अपने पड़ोस में रहने वाली दूसरे समुदाय की लड़की वहीदा से उस के परिजनों की मरजी के खिलाफ घर से भाग कर शादी कर ली थी.

इसी वजह से लड़की के भाई और अब्बा उस की जान के दुश्मन बने हुए थे. पुलिस आयुक्त अमिताभ ढिल्लो ने क्राइम ब्रांच (डीएलएफ) को भी थाना पुलिस के साथ जांच में लगा दिया.

मुकदमा दर्ज होने के तीसरे दिन 21 अगस्त को पता चला कि किसी युवक की लाश सैनिक कालोनी से थोड़ी दूर झाडि़यों में पड़ी है. यह जानकारी मिलने पर पुलिस टीम सैनिक कालोनी के पास उस जगह पर पहुंची, जहां लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी. पुलिस को वहां एक युवक की सड़ीगली लाश मिली. लाश काफी विकृत अवस्था में थी. वह 3 टुकड़ों में थी.

लाश देख कर लग रहा था कि उस की हत्या कई दिन पहले हुई होगी. इस सड़ीगली लाश की शिनाख्त मंजू ने अपने गुमशुदा बेटे संजय के रूप में की. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए रोहतक पीजीआई भेज दी और एफआईआर में आईपीसी की धारा 302 जोड़ दी गई.

लाश बरामद होने के बाद पुलिस ने आरोपी फजरुद्दीन और उस के बेटे की तलाश शुरू कर दी. उसी दिन पुलिस को सलीम के बारे में एक गुप्त सूचना मिली, जिस के आधार पर पुलिस ने सलीम को गिरफ्तार कर लिया. उसे उसी दिन कोर्ट में पेश कर पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

सलीम से की गई पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन उस के पिता फजरुद्दीन उर्फ फजरू तथा सुमित उर्फ सोनी को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

सभी आरोपियों से सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने संजय की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. संजय की हत्या के पीछे की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली.

मंजू अपने 2 बेटों संजय और अजय के साथ फरीदाबाद की नेहरू कालोनी में किराए के मकान में रहती थी. उस के पति रूप सिंह की कई साल पहले मौत हो चुकी थी. उस के पड़ोस में फजरुद्दीन अपने परिवार के साथ रहता था.

दोनों परिवार अलगअलग समुदाय के थे लेकिन उन के बीच काफी अपनापन था. त्यौहारों के मौकों पर वे एकदूसरे की खुशी में जरूर शरीर होते थे.

पारिवारिक संबंध होने की वजह से दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. फजरू की बेटी वहीदा बला की हसीन होने के साथसाथ बालिग हो चुकी थी. उधर मंजू का बेटा संजय भी 23 साल का हो चुका था. दोनों ही एकदूसरे को जीजान से प्यार करने लगे थे.

दोनों का प्यार गुपचुप तरीके से काफी दिनों से चल रहा था. फजरुद्दीन और उस की बेगम मदीना को बेटी के प्रेम प्रसंग की जानकारी नहीं थी. वे समझते थे कि दोनों बच्चे यूं ही आपस में कभीकभार मिलने पर हंसीठिठोली कर लेते हैं. उन्होंने कभी भी इन संबंधों के बारे में ध्यान नहीं दिया था.

सब कुछ ठीक ही चल रहा था. इधर वहीदा और संजय का प्यार और गहराता जा रहा था. उन्होंने आपस में शादी करने का फैसला कर लिया था लेकिन उन की शादी के बीच धर्म और समाज की अदृश्य दीवार सामने आ रही थी, जिसे किसी भी हालत में गिराना असंभव ही नहीं बल्कि एकदम से नामुमकिन था. इसलिए संजय का वहीदा ने आपस में सोचविचार कर अपने घरों से भाग कर कहीं बाहर शादी करने की योजना तैयार कर ली.

फिर योजना के अनुसार, वे पहली सितंबर, 2017 को किसी काम के बहाने अपनेअपने घरों से बाहर निकले. कालोनी से काफी दूर जा कर वहीदा संजय से लिपटते हुए बोली, ‘‘संजय, मुझे अपने साथ एक ऐसी दुनिया में ले चलो जहां हमारे प्यार के बीच कोई दीवार न बन सके.’’

संजय ने उसे विश्वास दिलाते हुए कहा, ‘‘वहीदा, तुम चिंता मत करो. अब दुनिया की कोई ताकत हमें जुदा नहीं कर सकती.’’

वहीदा को अपने प्यार पर खुद से बढ़ कर भरोसा था, इसलिए उस ने खुद को अपने प्रेमी संजय के भरोसे छोड़ दिया. संजय उसे ले कर राजस्थान स्थित अपने पैतृक गांव पहुंचा. वहां कुछ दिन रुकने के बाद उस ने वहीदा से कोर्टमैरिज कर ली.

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शादी के अगले दिन वहीदा घर की अन्य औरतों के परिधान के अनुसार अपनी गोरी कलाई में चूड़ा, मांग में सिंदूर, हाथ में मेहंदी लगा कर संजय के सामने पहुंची तो इस रूप में देख कर उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. वह दुलहन के शृंगार में और भी ज्यादा खूबसूरत दिख रही थी.

संजय वहीदा को अपनी पत्नी बना कर अपने आप को दुनिया का सब से भाग्यशाली समझने लगा. दोनों वहीं रहने लगे. चूंकि उस ने घर से भाग कर शादी की थी, इसलिए घर से बाहर कम ही निकलती थी.

उस का डर बेवजह नहीं था. उधर वहीदा के घर नहीं लौटने पर मदीना और उस के शौहर फजरुद्दीन को जैसे सांप सूंघ गया. उन्हें यह भी पता लग गया कि संजय भी घर से गायब है. अब उन के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि जरूर संजय की वहीदा को भगा कर ले गया होगा.

किसी तरह उन लोगों ने संजय के राजस्थान स्थित पैतृक गांव की भी जानकारी हासिल कर ली. फिर फजरू ने अपने जानकार लोगों को राजस्थान भेजा लेकिन काफी कोशिश के बाद भी वे वहीदा का पता नहीं लगा सके. आखिर निराश हो कर वे घर लौट आए.

वहीदा अपनी अम्मी मदीना को बहुत प्यार करती थी. कुछ महीने गुजरने के बाद वहीदा को जब अम्मी की याद आई तो उस ने अम्मी के फोन पर संपर्क कर बताया कि वह इस संजय के साथ है और यहां बेहद खुश है. इसलिए वह उस की जरा भी चिंता न करें.

मंजू को भी बेटे ने फोन कर पूरी घटना के बारे में जानकारी दे दी थी. मंजू वहीदा को बहू के रूप में स्वीकार कर लिया था. जब संजय ने बताया कि करवाचौथ पर उस ने उस के लिए व्रत रखा और चांद निकलने पर पानी का घूंट हलक के नीचे उतारा तो बेटे के प्रति बहू के मन में प्रेम देख कर मंजू की खुशी के मारे आंखें भर आईं.

उस ने फोन पर वहीदा से काफी देर तक बातें कीं और उसे सदा सुहागिन रहने का आशीर्वाद दिया. इस के बाद मंजू की अपने बेटेबहू से अकसर बातचीत होती रहती थी.

कुछ दिनों के बाद वहीदा के पांव भारी हो गए तो संजय के लिए उस की देखभाल करना कठिन हो गया. एक दिन वह वहीदा को ले कर फरीदाबाद लौट गया ताकि घर पर मां उस की ठीक से देखभाल करती रहे.

संजय और वहीदा के घर में आने की बात सुन कर वहीदा के अम्मीअब्बू संजय के घर आ कर अपनी बेटी और संजय से मिले. संजय उन का अपराधी था, इसलिए वह उन की हर शर्त माने के लिए तत्पर था. फजरू और उस की बेगम मदीना ने आपस में बातें करने के बाद संजय से कहा कि अगर उसे वहीदा के संग जीवन गुजारना है तो वह इसलाम धर्म अपना ले.

संजय के ऊपर वहीदा की मोहब्बत का नशा इस कदर चढ़ा था कि वह उस के लिए धर्म परिवर्तन के लिए तैयार हो गया. लेकिन इस में पेंच तक फंस गया जब संजय के मामा और चाचा ने इस का जम कर विरोध किया.

उन के विरोध के कारण संजय का धर्म परिवर्तन नहीं हो सका. इसी घटनाक्रम के बीच मदीना ने जबरन वहीदा का गर्भपात करवा दिया. इन बातों से दुखी और परेशान हो कर संजय का परिवार दूसरी जगह शिफ्ट हो गया.

दूसरी जगह जाने के बाद भी दोनों परिवारों के बीच उपजा तनाव कम नहीं हुआ. कुछ दिनों के बाद वहीदा को फिर गर्भ ठहर गया. इस का पता चलते ही फजरू ने वहीदा और संजय को अलग होने का फैसला सुना दिया.

संजय की हत्या होने से 2 महीने पहले एक दिन फजरू और उस के दोनों बेटे संजय और वहीदा को ले कर उन के बीच तलाक कराने कोर्ट गए लेकिन संजय ने वहीदा को तलाक देने से इनकार कर दिया. अलबत्ता अपने अम्मीअब्बा के द्वारा संजय की हत्या कर दिए जाने की धमकी से डर कर वहीदा संजय के घर से अपने घर लौट गई.

वहीदा के चले जाने के बाद संजय की दुनिया एकदम वीरान हो गई. बुरी तरह हताश और निराश हो कर संजय फरीदाबाद को छोड़ कर राजस्थान चला गया, जबकि उस की मां, भाई और बहन ने नेहरू कालोनी में रहना जारी रखा.

15 अगस्त, 2018 को वहीदा के भाई सलीम ने राजस्थान में रह रहे संजय को फोन कर के बताया कि मामला अब शांत हो गया है, इसलिए बात को खत्म करने के लिए फरीदाबाद लौट आओ.

अगले दिन संजय यह सोच कर फरीदाबाद आ गया कि जल्दी से यह मामला निपट जाए तो वहीदा और वह दोनों शांति के साथ अपना जीवन गुजार सकेंगे. उसे क्या मालूम था कि सलीम और उस का बाप उस की हत्या के लिए उसे मामला खत्म करने का सुनहरा ख्वाब दिखा रहे थे.

संजय उन की चाल में बुरी तरह फंस गया. उसी दिन सलीम संजय को अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर शराब पार्टी में शामिल होने की बात कह कर अपने साथ ले गया. सलीम संजय को 3 नंबर पहाड़ी की सुनसान जगह पर ले गया, जहां पर उस का पिता फजरू, दोस्त सुमित और मोहम्मद अली उन के आने का इंतजार कर रहे थे.

सुमित उर्फ सोनी और मोहम्मद अली सलीम के दोस्त थे. चारों ने पहले तो मीठीमीठी बातों में फंसा कर उसे इतनी अधिक शराब पिला दी कि वह अपनी सुधबुध खो बैठा. इस के बाद सभी ने संजय की इतनी पिटाई की कि वह अधमरा हो गया.

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पिटतेपिटते संजय जब बेहोश हो गया तो सलीम ने चाकू से गोद कर उसे मौत के घाट उतार दिया. झाडि़यों में डाल दिए. फिर सभी वहां से फरार हो गए.

पुलिस ने सलीम, फजरुद्दीन उर्फ फजरू और सुमित उर्फ सोनी से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. इस के 2 दिन बाद ही पुलिस ने चौथे आरोपी मोहम्मद अली को भी गिरफ्तार कर उस से पूछताछ की. उस ने भी अपना अपराध कबूल कर लिया. पुलिस ने उसे भी कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया. कथा लिखने तक चारों आरोपी जेल में बंद थे. ??

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, कथा में वहीदा परिवर्तित नाम है.

आंखों की शेप के अनुसार ऐसे लगाएं आईलाइनर

हर किसी की पसंद कजरारी आंखें होती है. चेहरे की खूबसूरती का केन्द्र आंखे ही होती है. हर लड़की आंखों में काजल लगाना को पसंद होता है. काजल के साथ अगर आप आईलाइनर भी लगा लेती हैं तो पूरी तरह से आपके चेहरे का लुक बदल जाता है. लेकिन कई बार ऐसा होता है कि लाइनर लगाने के बाद भी आंखों और हमारे चेहरे को सूट नहीं करता. तो आइए आपको बताते है, ऐस क्यों होता है?

ऐसा इसलिए होता है क्‍योंकि अधिकतर लड़कियों पता नहीं होता कि आंखों में लाइनर आंखों की शेप के अनुसार लगना चाहिए.

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आंखों की शेप के अनुसार लगाएं आईलाइनर

उभरी हुई आंखें

ऐसे आंखों का आकार थोडा़ उभरा होता है और पलकों का साइज भी काफी बड़ा होता है. आप अपनी आंखों पर स्‍टार्टिंग लाइन से लेकर एंड कौर्नर तक मोटा या पतला एक जैसा लाइनर लगा सकती हैं.

राउंड शेप्‍ड आईज

राउंड शेप्‍ड आंखें बड़ी और चौड़ी होती हैं और ऐसी आंखों पर विंग्‍ड आईलाइनर बहुत अच्‍छा लगता है.

 स्‍मौल आईज

स्‍मौल आईज हैं तो कभी भी अपनी आंखों की बौटम लाइन पर डार्क लाइनर लगाने से बचें. लाइनर को टौप लैश लाइन से पतली लाइन के साथ स्‍टार्ट करें और एंड पर आकर इसे हल्‍का मोटा कर दें.

बड़ी आंखें

अगर आपकी आंखें बड़ी-बड़ी हैं तो आप खुद को लकी फील करा सकती हैं क्‍योंकि आपको ज्‍यादा रूल फौलो करने की जरूरत नहीं है. आप कैट आईलाइनर और विंग्‍ड स्‍टाइल दोनों को कभी भी बेहिचक लगा सकती हैं.

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नेतागिरी के नशे में अपहरण : क्या सफल हो पाया यह कुचक्र

40  वर्षीय दीपकमणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र के देवरिया खास (नगर) मोहल्ले का रहने वाला था. देवरिया खास में उस की अपनी आलीशान कोठी है. फिर भी वह भटनी में किराए का कमरा ले कर अकेला रहता था. उस के परिवार में बड़ी बहन डा. शालिनी शुक्ला के अलावा कोई नहीं है. दीपक ने शादी नहीं की थी.

सालों पहले दीपक के पिता मंगलेश्वरमणि त्रिपाठी का उस समय रहस्यमय तरीके से कत्ल कर दिया गया था, जब वह घर में अकेले सो रहे थे. अपनी जांच के बाद पुलिस ने दीपक को पिता की हत्या का आरोपी बनाया था. पिता की हत्या के आरोप में वह कई साल तक जेल में रहा. इन दिनों वह जमानत पर जेल से बाहर था. कहा जाता है कि दीपक को दांवपेंच खेल कर एक गहरी साजिश के तहत पिता की हत्या के आरोप फंसाया गया था.

शादीशुदा डा. शालिनी की ससुराल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में है. वह अपनी ससुराल में परिवार के साथ रहती हैं. उन्हें दीपक की चिंता रहती है. वैसे भी बहन के अलावा दीपक का कोई और सहारा नहीं था. इसलिए कोई भी बात होती थी तो वह बहन और बहनोई को बता देता था.

20 मार्च, 2018 को मुकदमे की तारीख थी. दीपक को तारीख पर पेश होना था. उधर उस की एमएसटी टिकट की तारीख भी बढ़वानी थी. उस ने सोचा एमएसटी की डेट बढ़वा कर कचहरी चला जाएगा. इसलिए सुबह उठ कर वह सभी कामों से फारिग हो कर करीब 10 बजे एमएसटी की तारीख बढ़वाने भटनी स्टेशन चला गया.

एमएसटी बनवा कर दीपक वहीं से सलेमपुर कचहरी पहुंच गया. भटनी से सलेमपुर कुल 20-22 किलोमीटर दूर है. सलेमपुर पहुंचने में उसे कुल आधे घंटे का समय लगा होगा. सलेमपुर जाते समय उस ने बहन शालिनी को फोन कर के बता दिया था कि वह मुकदमे की तारीख पर पेश होने सलेमपुर जा रहा है. कचहरी से लौटने के बाद मुकदमे की स्थिति बताएगा.

धीरेधीरे शाम ढलने को आ गई. शालिनी भाई के फोन का इंतजार कर रही थी. जब उस का फोन नहीं आया तो उन्होंने खुद ही भाई के नंबर पर काल की. लेकिन दीपक का मोबाइल स्विच्ड औफ था.

शालिनी ने 3-4 बार दीपक के फोन पर काल की. हर बार उन्हें एक ही जवाब मिल रहा था, ‘उपभोक्ता के जिस नंबर पर आप काल कर रहे हैं वो अभी बंद है.’ शालिनी ने सोचा कि हो सकता है, दीपक के फोन की बैटरी डिस्चार्ज हो गई हो इसलिए फोन बंद है. रात में फिर से फोन कर के बात कर लेंगी.

रात में 10 साढ़े 10 बजे के करीब शालिनी ने फिर दीपक के मोबाइल पर काल की. लेकिन तब भी उस का फोन स्विच्ड औफ था. यह बात शालिनी को कुछ अटपटी सी लगी, क्योंकि दीपक अपना फोन इतनी देर तक कभी बंद नहीं रखता था. उस ने यह बात जब अपने पति को बताई तो वह भी चौंके. दीपक को ले कर किसी अनहोनी की आशंका से दोनों चिंता में पड़ गए.

रात काफी गहरा चुकी थी. शालिनी ने सोचा कि इतनी रात में किसी से बात करने से कोई फायदा नहीं होगा. अगले दिन ही कुछ हो सकता था. अगले दिन सुबह होते ही शालिनी ने अपने नातेरिश्तेदारों के यहां फोन कर के दीपक के बारे में पता किया, लेकिन दीपक का कहीं कुछ पता नहीं चला.

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वैसे भी वह किसी नातेरिश्तेदार के यहां जाना पसंद नहीं करता था, सिवाय शालिनी को छोड़ कर. शालिनी की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि दीपक गया तो गया कहां? कहीं उस के साथ कोई दुर्घटना तो नहीं घट गई, यह सोच कर शालिनी परेशान हो रही थीं.

धीरेधीरे एक सप्ताह बीत गया लेकिन दीपक का कहीं कोई पता नहीं चला. अपने स्तर पर शालिनी ने भाई का हर जगह पता लगा लिया था, उन्हें हर जगह से निराशा ही मिली थी.

दीपक करोड़ों की संपत्ति का इकलौता वारिस था. सालों से बदमाश उसे जान से मारने की धमकी दे रहे थे. इसीलिए वह गांव की कोठी छोड़ कर भटनी कस्बे में किराए का कमरा ले कर रहता था ताकि चैन और सुकून से जी सके. लेकिन बदमाशों ने यहां भी उस का पीछा नहीं छोड़ा था.

यह बात डाक्टर शालिनी शुक्ला भी जानती थीं, इसीलिए वह भाई के लिए फिक्रमंद थीं. शहर के कुछ नामचीन बदमाश और भूमाफिया उस की करोड़ों की संपत्ति को हथियाने की कोशिश में लगे हुए थे.

10 दिन बीत जाने के बाद भी जब दीपक का कहीं कोई पता नहीं चला तो डाक्टर शालिनी सक्रिय हुईं. शालिनी ने 10 अप्रैल, 2018 को बिलासपुर से ही भाई के अपहरण की शिकायत पुलिस अधीक्षक रोहन पी. कनय और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को रजिस्टर्ड डाक व ईमेल के माध्यम से भेज दीं. दीपक की गुमशुदगी की सूचना मिलते ही पुलिस महकमे में खलबली मच गई.

दीपक करोड़ों की संपत्ति का इकलौता वारिस था. उसे गायब हुए करीब 20 दिन बीत चुके थे. उस के गायब होने के बारे में पुलिस को भनक तक नहीं लगी थी. डा. शालिनी शुक्ला की शिकायत पर सदर कोतवाली में भादंवि की धारा 365 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

खैर, एक सप्ताह बाद भी कोई काररवाई न होने पर 17 अप्रैल, 2018 को उन्होंने फिर शिकायत की. 17 अप्रैल को ही पुलिस अधीक्षक रोहन पी. कनय को एक चौंका देने वाली सूचना मिली. सूचना यह थी कि नियमों को दरकिनार कर के गायब हुए व्यक्ति से एक ही दिन में कई बैनामे कराए गए थे.

इस में 2 बैनामे जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव उर्फ बबलू के नाम से, तीसरा उस की मां मेवाती देवी, चौथा भाई अमित कुमार यादव और 5वीं रजिस्ट्री मधु देवी पत्नी ब्रह्मानंद चौहान निवासी खोराराम के नाम से हुई थी.

बैनामे के साथ ही बड़े पैमाने पर स्टांप की भी चोरी हुई थी. पुलिस अधीक्षक रोहन सकते में आ गए और उन्होंने तत्काल पूरे मामले से जिलाधिकारी को अवगत करा दिया. बैनामा किसी और के द्वारा नहीं बल्कि कई दिनों से लापता दीपकमणि त्रिपाठी के द्वारा कराया गया था.

इस का मतलब था कि दीपकमणि त्रिपाठी जिंदा था और बदमाशों के कब्जे में था. बदमाशों ने दीपक को कहां छिपा रखा था, ये कोई नहीं जानता था. एसपी रोहन ने दीपक को बदमाशों के चंगुल के सहीसलामत छुड़ाने के लिए कमर कस ली. उन्होंने सीओ सदर सीताराम के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया.

इस टीम में सीओ सदर के अलावा सदर कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक प्रभतेश श्रीवास्तव, प्रभारी स्वाट टीम सीआईयू सर्विलांस अनिल यादव, स्वाट टीम के कांस्टेबल घनश्याम सिंह, अरुण खरवार, धनंजय श्रीवास्तव, प्रशांत शर्मा, मेराज खान, सर्विलांस सेल के राहुल सिंह, विमलेश, प्रद्युम्न जायसवाल, कांस्टेबल सूबेदार विश्वकर्मा, रमेश सिंह और सौरभ त्रिपाठी शामिल थे.

उधर डा. शालिनी ने तीसरी बार 23 अप्रैल को मुख्यमंत्री के जन सुनवाई पोर्टल पर शिकायत की. उन्हें पता चला था कि मुख्यमंत्री के वाट्सऐप नंबर पर शिकायत करने के 3-4 घंटे के भीतर काररवाई हो जाती है.

उन की यह सोच सही साबित हुई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक शिकायत पहुंचने के बाद जिले की पुलिस सक्रिय हो गई और एसपी रोहन पी. कनय मामले में विशेष रुचि लेने लगे.

इधर बदमाशों की सुरागरसी में सीओ सदर सीताराम ने मुखबिर लगा दिए थे. इस बीच पुलिस को जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव और उस के भाई अमित यादव का मोबाइल नंबर मिल गया था. दोनों नंबरों को पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया.

आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई. 2 मई, 2018 को पुलिस को पता चल गया कि बदमाशों ने अपहृत दीपकमणि त्रिपाठी को देवरिया शहर के निकट अमेठी मंदिर, स्थित पूर्व सांसद व सपा के राष्ट्रीय महासचिव रमाशंकर विद्यार्थी के कटरे में रखा था.

सूचना पक्की थी. सीओ सदर सीताराम ने कुछ चुनिंदा पुलिसकर्मियों की टीम बनाई और इस मिशन को गोपनीय रखा ताकि मिशन कामयाब रहे. वे बदमाशों को किसी भी तरह  भागने का मौका नहीं देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने पूरी तैयारी के साथ सपा नेता रमाशंकर विद्यार्थी के अमेठी आवास स्थित कटरे पर दबिश दी.

पुलिस टीम ने कटरे को चारों ओर से घेर लिया. उसी कटरे के एक कमरे में बदमाशों ने दीपकमणि त्रिपाठी को हाथपैर बांध कर रख रखा था. उस वक्त वह अर्द्धविक्षिप्तावस्था में था. बदमाशों ने उसे काबू में रखने के लिए नशे का इंजेक्शन लगा रखा था.

पुलिस ने दीपकमणि त्रिपाठी को बदमाशों के चंगुल से सकुशल मुक्त करा लिया. पुलिस ने दबिश के दौरान मौके से 4 बदमाशों को गिरफ्तार किया. पूछताछ में चारों बदमाशों ने अपना नाम अमित यादव, धर्मेंद्र गौड़, मुन्ना चौहान और ब्रह्मानंद बताए.

पुलिस चारों बदमाशों और उन के कब्जे से मुक्त कराए गए दीपकमणि त्रिपाठी को ले कर सदर कोतवाली लौट आई. सूचना  पा कर पुलिस अधीक्षक रोहन पी. कनय बदमाशों से पूछताछ करने कोतवाली पहुंच गए. इस पूछताछ में पता चला कि दीपक अपहरणकांड का मास्टरमाइंड कोई और नहीं, जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव था.

दीपक का अपहरण 10 करोड़ की जमीन का बैनामा कराने के लिए किया गया था. बदमाशों ने शहर में स्थित दीपकमणि की 40 करोड़ से अधिक की बची हुई जमीन का बैनामा बाद में कराने की योजना बनाई थी. लेकिन पुलिस ने उन की योजना पर पानी फेर दिया.

बदमाशों से पूछताछ में पता चला कि अमित यादव इस मामले के मास्टरमाइंड रामप्रवेश का सगा भाई था. धर्मेंद्र गौड़ जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश का वाहन चालक था. मुन्ना चौहान और ब्रह्मानंद रामप्रवेश यादव के गांव के रहने वाले थे और उस के सहयोगियों में से थे. खैर, बदमाशों के पकड़े जाते ही जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव भूमिगत हो गया.

दीपकमणि त्रिपाठी को सकुशल बरामद करने के बाद एसपी रोहन पी. कनय ने पुलिस लाइंस में एक पत्रकार वार्ता का आयोजन किया. उन्होंने पत्रकारों के सामने दीपक को पेश किया. दीपक ने अपहरण की पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी कि उस के साथ क्याक्या हुआ था?

बाद में पुलिस ने चारों अभियुक्तों अमित यादव, धर्मेंद्र गौड़, मुन्ना चौहान और ब्रह्मानंद को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. अभियुक्तों के बयान के आधार पर पुलिस ने इस केस में धारा 365 के साथ धारा 467, 471, 472 व 120 बी भी जोड़ दीं. भगोड़े नेता रामप्रवेश यादव पर 10 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया.

पुलिस ने दीपक अपहरणकांड की जांच आगे बढ़ाई तो कई और चौंकाने वाले तथ्य खुल कर सामने आए. जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि दीपकमणि से जमीन का बैनामा करवाने में आरोपी रामप्रवेश यादव का साथ रजिस्ट्री विभाग के फूलचंद यादव निवासी अब्दोपुर, थाना चिरैयाकोट, जनपद मऊ (उप निबंधन अधिकारी), रामशरन सिंह निवासी अंसारी रोड, थाना कोतवाली, देवरिया (वरिष्ठ सहायक निबंधन अधिकारी) ने भी दिया था.

इन के अलावा बैनामा कराने में शोभनाथ राव निवासी राघवनगर, चंदेल भवन, थाना कोतवाली, देवरिया (वरिष्ठ सहायक निबंधन अधिकारी), शोएब चिश्ती निवासी करैली, थाना करैली, इलाहाबाद (कंप्यूटर आपरेटर), कौशलकिशोर निवासी रामगुलाम टोला, थाना कोतवाली, देवरिया और विनोद तिवारी उर्फ मंटू तिवारी निवासी विशुनपुर, थाना भटनी, देवरिया ने भी पूरा सहयोग दिया था.

पुलिस ने रजिस्ट्री विभाग के उक्त 6 कर्मियों को भी कानून के शिकंजे में जकड़ लिया. 5 मई, 2018 को इन 6 आरोपियों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. अब तक कुल 10 आरोपी गिरफ्तार किए जा चुके थे. लेकिन रामप्रवेश का कहीं पता नहीं चल पा रहा था. इस बीच पुलिस ने उस पर ईनाम बढ़ा कर 25 हजार कर दिया था. पुलिस रामप्रवेश यादव की तलाश में दिनरात एक किए हुए थी.

आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई, उसे रामप्रवेश के मोबाइल नंबर की लोकेशन मिल गई. सर्विलांस के जरिए पता चला कि वह नेपाल में था.

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इधर यादव की गिरफ्तारी के लिए पुलिस पर भारी दबाव बनने लगा था. शासन के आदेश के बाद आईजी जोन निलाब्जा चौधरी ने रामप्रवेश यादव का ईनाम बढ़ा कर 50 हजार रुपए कर दिया.

ईनाम बढ़ने के साथसाथ पुलिस की जिम्मेदारी भी बढ़ गई थी. जब से पुलिस को रामप्रवेश के नेपाल में छिपे होने की बात पता चली थी, पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए बेचैन थी. चूंकि मामला दूसरे देश से जुड़ा था, इसलिए उसे नेपाल में गिरफ्तार करना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था.

पुलिस ने भारतनेपाल के सोनौली बौर्डर पर अपने मुखबिरों का जाल बिछा दिया था. ऐसा इसलिए कि रामप्रवेश यादव जैसे ही नेपाल से निकल कर भारत की सीमा सोनौली में प्रवेश करे, मुखबिर सूचित कर दें.

आखिरकार 25 मई, 2018 को पुलिस को बड़ी सफलता मिल ही गई. मुखबिर की सूचना पर रामप्रवेश यादव को देवरिया पुलिस ने भारतनेपाल बौर्डर के सोनौली से गिरफ्तार कर लिया. वहां से उसे कोतवाली सदर थाना लाया गया.

पूछताछ में रामप्रवेश ने खुद को बचाते हुए पैतरा चला. उस ने पुलिस के सामने कबूल किया कि दीपकमणि त्रिपाठी से उस के वर्षों से घरेलू संबंध रहे हैं. दीपक का उस के घर खानेपीने से ले कर परेशानी के समय दवा तक का इंतजाम होता था. उस पर अपहरण का आरोप लगाया जाना विपक्षियों की चाल है. उसे किसी ने फंसाने के लिए जानबूझ कर जाल बिछाया है.

लेकिन पुलिस के सामने उस की दाल नहीं गली, उसे झुकना ही पड़ा. रामप्रवेश ने अपना जुर्म कबूल करते हुए बताया कि दीपकमणि त्रिपाठी अपहरण कांड के पीछे असल हाथ उसी का था. उसी ने लालच में उस के अपहरण की पटकथा लिखी थी.

रामप्रवेश यादव के इकबालिया बयान के बाद पुलिस ने उसे अदालत के सामने पेश किया. अदालत ने रामप्रवेश यादव को न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया. उसे हिरासत में ले कर देवरिया जेल भेज दिया गया. आरोपियों से की गई गहन पूछताछ और अपहृत दीपकमणि त्रिपाठी के बयान से अपहरण की पूरी कहानी सामने आ गई—

यूं तो दीपकमणि त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के देवरिया खास का रहने वाला था. उस के पास पैसे की खूब रेलमपेल थी, लेकिन वह अकेला था. शहर की अलगअलग जगहों पर उस की 50 करोड़ से अधिक की संपत्ति थी. इस के साथ ही गांव में भी उस की काफी जमीन थी.

पिता की हत्या के बाद वह सारी जायदाद का एकलौता वारिस था. कुछ लोगों ने दीपक से शहर के सीसी रोड और चीनी मिल के पीछे की जमीन वर्षों पहले खरीद ली थी. इस के बाद भी शहर के राघव नगर, सीसी रोड, परशुराम चौराहा, देवरिया खास, सुगर मिल के पास उस की करोड़ों की संपत्ति थी. इस के साथ ही गांव रघवापुर, लिलमोहना समेत कई जगहों पर उस की जमीनें थीं.

पिता मंगलेश्वरमणि त्रिपाठी की हत्या के बाद से दीपक अकेला रह रहा था. उस की एकमात्र बहन डाक्टर शालिनी शुक्ला छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रहती थी. वह बराबर फोन कर के भाई का हालचाल लेती रहती थी. वह जानती थी कि इस जमाने में सीधेसादे लोगों का जीना आसान नहीं है, वह तो वैसे भी करोडों की संपत्ति का मालिक था. यह करोड़ों की संपत्ति ही दीपक की जान के लिए आफत बनी हुई थी.

उस की संपत्ति को ले कर कुछ लोग पहले ही दीपक पर जानलेवा हमला कर चुके थे. इसलिए वह शहर को छोड़ कर भटनी कस्बे में किराए पर कमरा ले कर रहता था. वहीं से वह पिता की हत्या के मुकदमे की पैरवी करता था. उस की संपत्ति पर 2011 से रामप्रवेश यादव की भी नजर गड़ी हुई थी.

40 वर्षीय रामप्रवेश यादव देवरिया जिले के रजला गांव का रहने वाला था. 2 भाइयों में वह बड़ा था. उस के छोटे भाई का नाम अमित यादव था. रामप्रवेश शादीशुदा था. रजला गांव में उस की बडे़ रसूख वालों में गिनती होती थी. रामप्रवेश का ईंट भट्ठे की व्यवसाय था.

भट्ठे की कमाई से पैसा आया तो वह राजनीति की गलियों में पहुंच कर बड़ा नेता बनने का ख्वाब देखने लगा. रामप्रवेश यादव ने गंवई राजनीति से अपनी राजनीतिक पारी खेलनी शुरू की. एक नेता के जरिए उस ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ले ली.

समाजवादी पार्टी की राजनीति करने के साथ ही वह जिला पंचायत सदस्य के लिए चुनाव में कूद पड़ा और जिला पंचायत सदस्य की कुर्सी हासिल कर ली. जिला पंचायत सदस्य बनने के बाद उस के सपा मुखिया अखिलेश यादव व मुलायम सिंह यादव से अच्छे संबंध बन गए.

अखिलेश यादव से संबंधों के चलते उसे पार्टी की ओर से जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में टिकट मिल गया. इस में वह जीता और जिला पंचायत अध्यक्ष बन गया.

जिला पंचायत अध्यक्ष बनते ही रामप्रवेश यादव की गिनती बड़े नेताआें में होने लगी. पार्टी के बडे़बड़े नेताओं के बीच उठतेबैठते उस के पैर जमीन पर नहीं टिकते थे. कुछ ही दिनों में आगे का सफर तय करते हुए उस ने लोगों के बीच अपनी अच्छी छवि बना ली.

सपा पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने के बाद 2011 से ही रामप्रवेश की निगाह दीपकमणि त्रिपाठी की करोड़ों की संपत्ति पर जम गई थी. उसे हथियाने के लिए वह साम दाम दंड भेद सभी तरीके अपनाने के लिए तैयार था, लेकिन दीपक तक उस की पकड़ नहीं बन पा रही थी. दीपक को अपने चंगुल में फांसने के लिए उस ने अपने खास सिपहसालार ब्रह्मानंद चौहान को उस के पीछे लगा दिया.

ब्रह्मानंद चौहान के जरिए दीपक को वह अपने नजदीक लाने में कामयाब रहा. रामप्रवेश यादव जानता था कि दीपक अकेला है. उस के आगेपीछे कोई नहीं है. वह जैसा चाहेगा, उसे अपनी धारा में मोड़ लेगा. सीधासादा दीपक रामप्रवेश के मन क्या चल रहा है, नहीं समझ पाया और उस की राजनीतिक यारी का कायल हो कर रह गया.

दीपक की एक बड़ी संपत्ति कुछ दबंगों के हाथों में चली गई थी, जहां वह कुछ नहीं कर पा रहा था. यह बात रामप्रवेश को पता थी. वह इसी बात का फायदा उठा कर दीपक के दिल में जगह बनाना चाहता था और उस ने ऐसा ही किया भी.

दीपक की जमीन से कब्जा हटवा कर रामप्रवेश ने उस के दिल में जगह बना ली. रामप्रवेश यादव दीपक से इस एहसान का बदला उस की बेनामी संपत्तियों को अपने नाम बैनामा करवा कर लेना चाहता था. उस ने अपनी मंशा दीपक के सामने रख भी दी थी कि वह कुछ संपत्ति का उस के नाम बैनामा कर दे. फिर उस की ओर आंख उठा कर देखने की किसी की हिम्मत नहीं होगी.

यह रामप्रवेश के तरकश का पहला तीर था. उस का तर्क था कि एक बार दीपक थोड़ी सी जमीन उस के नाम बैनामा कर दे तो बाकी संपत्ति को वह धीरेधीरे हथिया लेगा. इसलिए वह दीपक का खास ख्याल रखता था. इसी गरज से उस ने दीपक को अपने यहां पनाह दी थी. उस का खूब सेवासत्कार किया था.

देखने में दीपक भले ही सीधासादा था, पर कम चालाक नहीं था. वह रामप्रवेश की मंशा भांप गया था. एक दिन बातोंबातों में रामप्रवेश ने उस के सामने प्रस्ताव रखा कि वह अपनी कुछ जमीन का बैनामा उस के नाम कर दे, बदले में वह उस की देखभाल करता रहेगा. लेकिन दीपक इस के लिए तैयार नहीं हुआ.

उसे लगा कि रामप्रवेश ताकतवर राजनेता है. वो उस की जमीन का बैनामा करा लेगा. उस के बाद से दीपक ने रामप्रवेश का साथ छोड़ दिया. यही नहीं अपनी जानमाल की सुरक्षा के दृष्टिकोण से उस ने देवरिया की धरती ही छोड़ दी और भटनी में जा कर किराए का कमरा ले कर रहने लगा.

रामप्रवेश यादव की मंशा पर दीपक ने पानी फेर दिया था. उसे यह बात गंवारा नहीं थी कि कमजोर सा दिखने वाला दीपक उसे हरा दे. उस के इनकार कर देने से रामप्रवेश यादव तिलमिला कर रह गया. लेकिन वह बैकफुट पर जाने के लिए तैयार नहीं था.

जब उस ने देखा कि अब सीधी अंगुली से घी नहीं निकलने वाला तो उस ने अंगुली टेढ़ी कर दी. रामप्रवेश ने दीपक का अपहरण करने और जबरन बैनामा करने की योजना बनाई.

इस योजना में उस ने अपने छोटे भाई अमित यादव सहित ड्राइवर धर्मेंद्र गौड़, मुन्ना चौहान और ब्रह्मानंद चौहान को शामिल कर लिया. रामप्रवेश यादव को सुरक्षा में एक सरकारी गनर मिला हुआ था. अपहरण की योजना को अंजाम देने से 2 दिन पहले उस ने गनर को यह कह कर वापस भेज दिया था कि अभी उसे उस की जरूरत नहीं है. आवश्यकता पड़ने पर वह खुद ही उसे वापस बुला लेगा.

इस की जानकारी उस ने कप्तान रोहन पी. कनय को दे दी थी ताकि कोई बात हो तो वह खुद को सुरक्षित बचा सके. ऐसा उस ने इसलिए किया था, ताकि उस की योजना विफल न हो जाए. गनर के साथ रहते हुए वह योजना को अंजाम नहीं दे सकता था.

दीपक के क्रियाकलापों से रामप्रवेश यादव वाकिफ था. 20 मार्च, 2018 को मुकदमे की तारीख थी. मुकदमे की पेशी के लिए दीपक भटनी से सलेमपुर कोर्ट पहुंचा. रामप्रवेश को ये बात पता थी. उस ने दीपक का अपहरण करने के लिए अमित, धर्मेंद्र, मुन्ना और ब्रह्मानंद को उस के पीछे लगा दिया.

कोर्ट जाते समय इन चारों को मौका नहीं मिला, लेकिन शाम ढलने के बाद अदालत से घर लौटते समय इन लोगों ने दीपक को सलेमपुर चौराहे पर हथियारों के बल पर घेर लिया और कार में बैठा कर फरार हो गए.

40 दिनों तक जिला पंचायत अध्यक्ष रामप्रवेश यादव दीपकमणि त्रिपाठी को शहर के विभिन्न स्थानों पर रखे रहा. इस दौरान बदमाश उसे नशीला इंजेक्शन लगा कर काबू में करते रहे, उसे शारीरिक यातनाएं देते रहे. साथ ही दबाव बनाने के लिए उसे मारतेपीटते भी रहे.

उस से कहा गया कि अगर वह शहर की 50 करोड़ की संपत्ति नेताजी के नाम पर बैनामा कर दे तो उसे जिंदा छोड़ दिया जाएगा. नहीं तो ऐसे ही यातना दी जाएगी. दीपक अपनी बात पर अडिग रहा कि उसे चाहे जो सजा दे दो, लेकिन वह संपत्ति का बैनामा नहीं करेगा.

जमीन का बैनामा कराने से पहले ही रामप्रवेश ने दीपक के ओरियंटल बैंक के खाते में साढ़े 4 लाख रुपए का आरटीजीएस भी किया था. बाद में 17 अप्रैल को जमीन का बैनामा कराने के बाद उस ने उस रुपए को निकालने के लिए दीपक से उस के चेक पर हस्ताक्षर करा कर बैंक भिजवाया. लेकिन दीपक ने खाता खोलने के दिन से ही शाखा प्रबंधक से कह दिया था कि कभी भी बिना उस की जानकारी के कोई बड़ी रकम उस के खाते से नहीं निकाली जानी चाहिए.

इसलिए वह उस के खाते से रुपए नहीं निकल पाया. ये मात्र साढ़े 4 लाख रुपए जिला पंचायत अध्यक्ष ने जमीन के लिए दिए थे और फिर दिए गए रुपए को वह साजिश रच कर वापस पाना चाहता था. लेकिन उस का इरादा कामयाब नहीं हुआ. पुलिस ने रामप्रवेश के कब्जे से वह चैक भी बरामद कर लिया.

रामप्रवेश यादव ने आस्तीन का सांप बन कर दीपक को डंसा. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि रामप्रवेश उस के साथ ऐसी घिनौनी हरकत करेगा. नेताजी के कुकृत्यों में साथ दे कर रजिस्ट्री विभाग के कर्मचारियों ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली और नाहक जेल की हवा खानी पड़ी.

नेता रामप्रवेश यादव कभी डीएम और एसपी की कुर्सी के बीच बैठ कर शेखी बघारता था. लेकिन जब पुलिस ने उसे हथकड़ी पहनाई तो उस की सारी हेकड़ी धरी रह गई. कथा लिखे जाने तक सभी 11 आरोपी जेल में बंद थे. बुरी तरह डरा हुआ दीपक कुछ दिनों के लिए अपनी बहन शालिनी के पास छत्तीसगढ़ चला गया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

छोटी सरदारनी: गिल फैमिली पर फूटेगा ‘मेहर’ की मां का गुस्सा, ‘सरब’ को कहेंगी कातिल

कलर्स के शो छोटी सरदारनी में इन दिनों सरब और मेहर की जिंदगी में उथल-पुथल चल रही है. दरअसल, मेहर के खून के इल्जाम में सरब जेल चला गया है. जिससे सभी लोग परेशान है. दूसरी तरफ मेहर, सरब की बेगुनाही साबित करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है.

वहीं अब शो में गिल फैमिली में मेहर की मां कुलवंत बड़ा धमाका करती हुई नजर आने वाली हैं. आइए आपको बताते हैं क्या होगा गिल फैमिली में आने वाला ट्विस्ट…

गिल फैमिली पर फूटेगा कुलवंत का गुस्सा…

आज की एपिसोड में आप देखेंगे कि बेटी की मौत से दुखी कुलवंत कौर सरबजीत को ही कातिल मान रही है इसलिए जब गिल फैमिली उनके घर पहुंचेगी तो कुलवंत सबके सामने उनकी बेइज्जती करेगी.

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परम का सीक्रेट…

इस बीच परम, जग्गा को एक ऐसा सीक्रेट बताएगा जिसे सुनकर वो हैरान हो जाएगा. जाहिर परम कोई ऐसी बात जानता है जो उसकी मेहर मम्मा से जुड़ी हुई है.

इंडिया पहुंचेगी मेहर…

सर्बियाई पुलिस मेहर को बताएगी कि जब वो इंडिया पहुंचेगी तो उसकी कस्टडी इंडियन पुलिस को सौंप दी जाएगी और उसके बाद उसे रिहा कर दिया जाएगा. मेहर, सरब की हालत के लिए खुद को ही दोषी मानेगी. उसे एहसास होगा कि उसकी वजह से ही सरबजीत मुसीबत में फंस गया है.

छोटी सरदारनी

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क्यों चुप है सरब…

छोटी सरदारनी

कुलवंत कौर के घर पर, सरब के लोग कुलवंत से पूछेंगे कि अगर वह सरबजीत के खिलाफ है तो फिर सरब उनकी पार्टी का पीआरओ क्यों है. कुलवंत ये बात सुनकर आपा खो देगी और अपने घर में लगी नेम प्लेट से सरब का नाम मिटाने की कोशिश करेगी. कुलवंत कहेगी कि सरबजीत कातिल है और उसने ही मेरी बेटी को मारा है.

छोटी सरदारनी

सवालों से घिरा सरब…

सरब जब कोर्ट पहुंचेगा तो मीडिया उसे घेर लेगी और मेहर के बारे में पूछेगी लेकिन सरब कुछ भी नहीं कह पाएगा. यहां हरलीन, सरब से कहेगी कि वो आज कोर्ट में अपनी बेगुनाही के बारे में कहे. दरअसल, सरब नहीं चाहता है कि मेहर का सच सबके सामने आए इसलिए वो जानबूझकर चुप्पी साधे हुए है.

छोटी सरदारनी

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अब देखना है कि क्या मेहर, सरब को सजा से बचा पाएगी. क्या वो सही वक्त पर कोर्ट पहुंच पाएगी? जानने के लिए देखिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, शाम 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

छोटी सरदारनी: क्या सरब को सजा से बचा पाएगी मेहर?

कलर्स के पौपुलर सीरियल में से एक छोटी सरदारनी आजकल फैंस को काफी एंटरटेन कर रहा है. शो में इन दिनों मेहर, सरब और परम का हनीमून स्पैशल एपिसोड फैंस को काफी पसंद आ रहा है. वहीं अब आने वाले एपिसोड में कई बड़े ट्विस्ट एंड टर्न्स फैंस को हैरान करने वाले हैं. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आने वाला ट्विस्ट…

हनीमून स्पेशल में आएगा ये ट्विस्ट

शो में आपको देखने को मिल रहा है कि मेहर, सरब और परम हनीमून पर जाते हैं. जहां सरब, मेहर और उसके होने वाले बच्चे को हैप्पी लाइफ देने के लिए सरबिया छोड़ने का फैसला करता है और वापस इंडिया आकर ये कहता है कि मेहर की कार एक्सीडेंट में मौत हो गई है, लेकिन सरब का प्लान उस पर ही उल्टा पड़ जाता है जब मेहर किडनैप हो जाती है और पुलिस उसे ही मेहर के खून के इल्जाम में पकड़ लेती है.

क्या किडनैपर से बच पाएगी मेहर

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दूसरी तरफ आप देखेंगे कि मेहर किसी तरह गुंडों से बचकर सरब को फोन करने की कोशिश करेगी, लेकिन रौबी फोन उठा लेगा और गुंडो को उसे पकड़ने के लिए भेजेगा जो उसे जान से मारने की कोशिश करेंगे.

परम से झूठ बोलेगा सरब

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इसी बीच परम जेल में सरब से मिलने जाएगा और मेहर को लेकर सवाल करेगा, जिसका जवाब न देते हुए सरब बहाना बनाकर परम से झूठ बोलता हुआ नजर आएगा.

बता दें, ‘छोटी सरदारनी’ कहानी है मेहर की जो जिंदगी की मुश्किलों से गुजरते हुए अपने बच्चे को जन्म देने के लिए अपनी मां और परिवार से लड़ती है. यह शो इस बात को साबित करता है कि एक मां से बड़ा कोई योद्धा नहीं है.

मानव मेहर का पहला प्यार है और वो उसके बच्चे की मां बनने वाली है, लेकिन मेहर की मां कुलवंत कौर मानव पसंद नहीं करती, इसलिए वो उसका खून कर देती है और अपने फायदे के लिए मेहर की शादी सरबजीत से करवा देती है. सरबजीत की ये दूसरी शादी है. पहली शादी से उसका एक बेटा परम है, जिससे वो बेहद प्यार करता है और उसी की खातिर सरबजीत ने ये शादी की है. लेकिन शादी की पहली रात ही मेहर अपने और मानव के रिश्ते में उसे बता देती है और ये भी कहती है कि वो उसके बच्चे की मां बनने वाली है. जिसके बाद सरबजीत ये फैसला करता है कि वो मेहर को एक नई जिंदगी देगा और उसे किसी दूसरे देश में सेटल कर देगा. लेकिन इसी दौरान परम और मेहर के बीच ममता की डोर मजबूत हो जाती है. अब देखना ये है कि क्या मेहर और परम एक दूसरे के बिना रह पाएंगे. शो के ऐसे ही नए ट्विस्ट एंड टर्न्स जानने के लिए देखिए सोमवार से शनिवार, रात 7.30 बजे सिर्फ कलर्स पर.

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