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अंकिता लोखंडे ने फैंस के साथ शेयर किया अपना ग्लैमरस लुक

टीवी की मशहूर अभिनेत्री अंकिता लोखंडे काफी टाइम से छोटे पर्दे से दूर है. उन्होंने फिल्मी करियर की शुरूआत ‘मणिकर्णिका : द क्वीन्स औफ झांसी’ से की है. वैसे तो ये फिल्म रिलीज हुए काफी वक्त हो गए. लेकिन अंकिता लोखंडे  सोशल मीडिया पर अपने फैंस के लिए एक्टिव रहती है.

हाल ही में एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया पर अपनी बेहद ही खूबसूरत तस्वीर शेयर की है. इन तस्वीरों में अंकिता का ग्लैमरस लुक देखने को मिल रहा है. इंस्टाग्राम पर अंकिता इन तस्वीरों के जरिए कहर ढ़ा रही है.

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इन तस्वीर में अंकिता पीच कलर के ड्रेस में नजर आ रही हैं. फैंस भी अंकिता के इस खूबसूरत अंदाज को खूब पसंद कर रहे हैं.  अंकिता के काम की बात करे तो अब टाइगर श्रौफ और श्रद्धा कपूर स्टारर  बागी 3′ में नजर आने वाली है.

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एक रिपोर्ट के अनुसार अंकिता ने कहा, ‘मणिकर्णिका’ के बाद मैं एक कमर्शियल फिल्म करना चाहती थी और बागी एक सक्सेजफुल फ्रेंचाइजी है. अहमद सर, टाइगर और श्रद्धा के साथ काम करना बहुत अच्छा अनुभव होगा.

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उन्होंने अपने किरदार के बारे में बात करते हुए कहा,  यह मेरे लिए काफी चुनौतीपूर्ण होगा लेकिन मैं आश्वस्त हूं कि मेरा कैरेक्टर दर्शकों को खुद से जोड़ लेगा. ‘बागी 3’ फिल्म पिछली दो फिल्मों से अलग है. इसमें फैमिली बौन्डिंग पर फोकस किया गया है. मैंने इसमें एक फन लविंग गर्ल का किरदार निभाया है जो श्रद्धा कपूर की बहन है.

‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ : कायरव ने चुनी नायरा कार्तिक की शादी की अंगूठी

स्टार प्लस का मशहूर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में दर्शकों को लगातार धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिल रहे हैं. जिससे दर्शकों को भरपूर मनोरंजन हो रहा है. फिलहाल इस शो की कहानी एक नया मोड़ ले चुकी है. शो में नायरा और कार्तिक की शादी की तैयारी जोरों शोरों पर है. तो चलिए जानते हैं क्या होने वाला है अपकमिंग एपिसोड में.

पिछले एपिसोड में आपने देखा कि नायरा और कार्तिक की शादी को लेकर पूरे घरवाले खुश है, लेकिन सबसे ज्यादा खुश तो कायरव है…  कायरव अपने मम्मी पापा की शादी को लेकर कुछ ज्यादा ही एक्साइटेड है. जी हां, कायरव को अपने मम्मी पापा की शादी में शामिल होने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहा है. हालांकि इससे पहले कायरव ने अपने मम्मी पापा की शादी में आमंत्रित नहीं करने के लिए शिकायत की थी.

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कायरव अपने मम्मी पापा की शादी की अंगूठी भी चुनने के लिए पूरी तरह से तैयार है. तो वही आपको जल्द ही मजेदार पल देखने को मिलने वाला है. जब स्वर्णा नायरा से कहती है, केवल वही कायरव को संभाल सकते है. क्योंकि वो किसी और की सुनता ही नहीं है. स्वर्णा ये भी उन्हें बताती है, कायरव इस बात पर भी अड़ा है कि केवल वो ही अपने मम्मी पापा की शादी के लिए अंगूठी चुनेगा. तो उधर कार्तिक नायारा कायरव के कमरे में झांकते है कि वो क्या कर रहा है, जहां वो देखते है कि वीडीयो कौल पर कायरव वंश से बात कर रहा है और अपनी पसंद की हुई अंगूठी, जो कि खिलौने की तरह है. वो दिखा रहा होता है.

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कायरव की अंगूठी देखकर नायरा और कार्तिक आश्चर्यचकित हो जाते हैं और ये सोचते है अगर उन्होंने कायरव की बात मान ली तो उन्हें पूरी लाइफ इस खिलौने वाली रिंग को पहनकर घुमना पड़ेगा. बता दें कि कहानी के इस ट्रैक से फैंस काफी खुश है. क्योंकि कार्तिक नायरा का मिलन जो होने वाला है लेकिन अब ये देखना दिलचस्प होगा कि कार्तिक नायरा का मिलन इस बार पूरा होगा या फिर अधूरा ही रहा जाएगा.

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छोटी सरदारनी : रियल लाइफ में ऐसे ‘परम’ का होमवर्क कराती हैं ‘मेहर मम्मा’

कलर्स के शो ‘छोटी सरदारनी’ में ‘परम’ की मां ‘मेहर’ के रोल में नजर आने वाली निमृत कौर सीरियल में ‘परम’ को कितना प्यार करती हैं ये सभी को दिखता है, लेकिन रियल लाइफ में भी ‘मेहर’ ‘परम’ का ख्याल रखने का कोई मौका नही छोड़तीं, जिसका सबूत ये फोटो है. आइए आपको दिखाते हैं किस तरह औफस्क्रीन मां ‘मेहर’ ‘परम’ का ख्याल रखती हैं.

औन स्क्रीन मां के साथ वक्त बिताता है परम

निमृत कौर और ‘परम’ सीरियल में मां बेटे का रोल निभाते-निभाते इतने करीब आ गए हैं कि दोनों सेट पर शूटिंग के दौरान काफी समय बिताते हुए नजर आते हैं, इसलिए उनका रिश्ता समय के साथ काफी मजबूत हो गया है.

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‘परम’ का होमवर्क करवातीं हैं औनस्क्रीन मां ‘मेहर’

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हाल ही में ब्रेक टाइम के दौरान निमृत को ‘परम’ का डेली होमवर्क कराते और पढ़ाई में मदद कराते हुए देखा गया था, जिसका सबूत ये फोटो है. एक इंटरव्यू में निमृत ने कहा था,- “पर्सनली, मुझे बच्चे बहुत पसंद है और ‘परम’ के आसपास रहना मेरे लिए एक एंजायमेंट है. ‘परम’ एक स्मार्ट बच्चा है और मुझे खुशी है कि मैं उसे पढ़ाई और होमवर्क में मदद कर रही हूं. ज्यादा समय तक शूटिंग होने के बावजूद मुझे ‘परम’ के साथ थकान महसूस नही होती.”

 

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शो में इन दिनों दिखा रहे हैं कि कितनी मुश्किलों से गुजर के आखिरकार मेहर वापस आ गई है. वहीं दूसरी तरफ सरब पर लगाया हुआ मेहर के मर्डर का आरोप रद्द हो गया है. पूरा परिवार मेहर को जिंदा देखकर बेहद खुश है. अब देखना ये है कि क्या मेहर, सरब और परम फिर से साथ रहेंगे. क्या होगा जानने के लिए देखना न भूलें ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, शाम 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

अपने ही परिवार का दुश्मन

17जून, 2019 की सुबह हरवंत सिंह लगभग हांफते हुए थाना झंजेर पहुंचा. उस ने थाना  इंचार्ज एसआई जुगराज सिंह को बताया कि बीती रात उस की पत्नी, बेटी और दो बेटों सहित परिवार के 4 सदस्य लापता हो गए हैं. जल्द काररवाई कर उन्हें ढूंढा जाए.

हरवंत सिंह की गिनती गांव में बड़े किसानों में होती थी और उन का परिवार शिक्षित परिवार के रूप में जाना जाता था. इसलिए पुलिस ने हरवंत सिंह की शिकायत दर्ज कर तेजी से काररवाई शुरू कर दी.

हरवंत सिंह का परिवार अजनाला अमृतसर के देहाती इलाके के थाना झंजेर क्षेत्र में पड़ने वाले गांव तेडा खुर्द में रहता था. करीब 30 साल पहले हरवंत की शादी अजनाला के ही गांव पंधेर कंभोज निवासी मंगल की बेटी दविंदरपाल कौर से हुई थी. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 28 वर्षीय बेटी शरणजीत कौर, 26 वर्षीय ओंकार सिंह और 24 वर्षीय लवरूप सिंह उर्फ लवी नाम के 2 बेटे थे.

तीनों बच्चे उच्चशिक्षा प्राप्त थे और अविवाहित थे. वे अपने कैरियर को ले कर गंभीर थे. ओंकार सिंह इन दिनों जौब के लिए आस्ट्रेलिया जाने की तैयारी कर रहा था.

16 जून की रात पूरा परिवार खाना खाने के बाद जल्दी सो गया था. अगली सुबह जब हरवंत सिंह अपने पशुओं को चारा डालने के लिए उठा तो यह देख कर हैरान रह गया कि परिवार के सभी सदस्य घर से लापता हैं. उस ने काफी देर तक अपने बीवीबच्चों को ढूंढा और उन के न मिलने पर पुलिस में सूचना दर्ज करवा दी.

गांव वालों के साथ पुलिस की समझ में भी यह बात नहीं आ रही थी कि सोतेसोते पूरा परिवार अचानक कैसे गायब हो गया. वे कहां हैं, इस के बारे में न तो हरवंत के रिश्तेदारों को कोई जानकारी थी और न ही गांव के सरपंच को. पुलिस ने गांव तेडा खुर्द जा कर पूछताछ की तो उन्हें घर के मुखिया हरवंत सिंह के बारे में कई चौंका देने वाली बातें पता चलीं.

पुलिस इस मामले में अभी और जानकारी हासिल कर ही रही थी कि 19 जून को हरवंत सिंह के साले मेजर सिंह ने झंजेर थाने पहुंच कर अपने जीजा हरवंत सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाते हुए बताया कि उस की बहन और भांजेभांजी का अपहरण हरवंत सिंह ने ही किया है. मेजर सिंह ने उन के अपहरण की कई वजह भी पुलिस को बताईं.

थाना इंचार्ज को मेजर सिंह के बयान में सच्चाई नजर आई. पुलिस ने उसी समय मेजर सिंह की तहरीर के आधार पर हरवंत सिंह, उस के भांजे कुलदीप सिंह तथा 2 और अज्ञात व्यक्तियों को नामजद करते हुए हरवंत सिंह की पत्नी दविंदरपाल कौर, बेटी शरणजीत कौर, बेटे ओंकार सिंह और लवरूप सिंह उर्फ लवी के अपहरण का मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी.

पुलिस पूछताछ करने जब गांव पहुंची तो हरवंत घर से लापता मिला. थाना इंचार्ज जुगराज सिंह ने इस घटना की सूचना एसपी (देहात) विक्रमजीत सिंह, एसपी (तफ्तीश) हरपाल सिंह और डीएसपी (अजनाला) हरप्रीत सिंह को भी दे दी थी.

बड़े अधिकारियों के निर्देश पर 2 पुलिस टीमें बनाई गईं. एक टीम हरवंत की तलाश में जुट गई और दूसरी टीम ने परिवार के बाकी सदस्यों को ढूंढना शुरू कर दिया.

एक गुप्त सूचना के आधार पर पुलिस ने 20 तारीख को हरवंत सिंह और उस के 2 साथियों सोनू सिंह और रछपाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया. तीनों आरोपियों को उसी दिन अदालत में पेश कर 26 तारीख तक पुलिस रिमांड पर ले लिया गया.

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रिमांड के दौरान हरवंत ने अपना अपराध कबूल करते हुए बताया कि उसी ने अपने भांजे कुलदीप और 2 साथियों सोनू व रछपाल के साथ मिल कर अपने परिवार के चारों सदस्यों की हत्या कर उन की लाशें नहर में बहा दी थीं.

हरवंत का चौंका देने वाला बयान सुन कर पुलिस अधिकारी सकते में आ गए. वे इस बात पर यकीन करने को तैयार ही नहीं थे कि गबरू जवान 2 बेटों, पत्नी और बेटी की हत्या करने के बाद कोई उन्हें वहां से ले जा कर नहर में फेंक सकता है.

बहरहाल पुलिस ने हरवंत की निशानदेही पर जगदेव कलां की लाहौर नहर से दविंदरपाल कौर की लाश बरामद कर ली, जिस की शिनाख्त उस के भाई मेजर सिंह ने कर दी.

दविंदर की लाश एक बोरी में बंद थी और बोरी में ईंटें भरी हुई थीं. उस की लाश बरामद होने के बाद पुलिस को पूरा विश्वास हो गया था कि हरवंत ने अपने बयान में जो कहा है, वह सच ही होगा. उस ने वास्तव में अपने पूरे परिवार की हत्या कर दी है.

एसडीएम हरफूल सिंह गिल की देखरेख में पुलिस ने बीएसएफ के गोताखोरों की सहायता से बाकी लाशों के लिए पूरी नहर को खंगालना शुरू कर दिया. 2 दिनों की तलाश के बाद 24 जून को अलगअलग जगहों से शरणजीत कौर, ओंकार सिंह और लवरूप सिंह उर्फ लवी की लाशें भी बरामद हो गईं. पुलिस ने चारों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया.

दरअसल, पुलिस को शुरू से ही हरवंत सिंह पर संदेह था. पुलिस ने जब मामले की गहनता से जांच की तो पाया कि हरवंत के घर में बनी पशुओं के चारा खाने वाली खुरली (हौदी) की काफी ईंटें उखाड़ी हुई थीं. यह देख पुलिस को शक हुआ कि यहां कुछ न कुछ तो जरूर हुआ था, पर पुलिस के पास कोई पुख्ता सबूत नहीं था और ईंटों का गायब होना महज एक इत्तफाक भी हो सकता था.

पुलिस रिमांड के दौरान हरवंत द्वारा अपनी पत्नी, बेटी और 2 बेटों की हत्या करने की जो कहानी प्रकाश में आई, वह अय्याशी में डूबे एक ऐसे बाप की कहानी थी, जिस ने अपनी अय्याशी में रोड़ा बन रहे पूरे परिवार को ही मौत के घाट उतार दिया था.

इस जघन्य और घिनौने अपराध को अंजाम देने के लिए हरवंत सिंह की प्रेमिका व उस के भांजे कुलदीप ने भी उस का साथ दिया था.

हरवंत सिंह जवानी से ही अय्याश किस्म का था. उस के अपने गांव के अलावा आसपास के गांवों की कई औरतों के साथ नाजायज संबंध थे. शराब और शबाब उस के पसंदीदा शौक थे. जब तक उस के बच्चे छोटे थे, तब तक उसे इस सब से कोई फर्क नहीं पड़ा था. रोकने वाली केवल उस की पत्नी दविंदरपाल थी, जिसे वह डराधमका कर चुप करा दिया करता था.

लेकिन जब उस के तीनों बच्चे बड़े हुए और उन्होंने लोगों से अपने पिता की करतूतें सुनीं तो उन्होंने हरवंत को टोकना शुरू कर दिया. अपने पिता की हरकतों पर लगाम कसने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. पंचायत से ले कर रिश्तेदारों तक को बीच में डाला, पर कोई फायदा नहीं हुआ.

हरवंत सिंह को अपने भांजे कुलदीप सिंह से बड़ा लगाव था. कुलदीप अधिकांशत: अपने मामा हरवंत के पास ही रहता था. जब कुलदीप जवान हुआ तो वह भी अपने मामा के नक्शेकदम पर चलने लगा. हरवंत को इस की बड़ी खुशी हुई कि कोई तो उस का साथ देने वाला है.

अब मामाभांजे दोनों मिल कर अय्याशी करने लगे थे. हरवंत और कुलदीप की इन हरकतों ने उस के परिवार को कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा था. जगहजगह उन की बदनामी होती थी. इसी कारण बच्चों के कहीं से रिश्ते भी नहीं आ रहे थे. जिस घर में अय्याश बाप हो, वहां कौन अपनी बेटी ब्याहना चाहेगा.

पिता की हरकतों से तंग आ कर पूरे परिवार ने उस का जम कर विरोध करना शुरू कर दिया. रोजरोज की किचकिच से गुस्साए हरवंत ने अपने भांजे कुलदीप के साथ मिल कर पूरे परिवार को ही मिटाने की योजना बना डाली. उस ने अपने 2 दोस्तों सोनू और रछपाल को भी अपनी योजना में शामिल कर लिया.

हत्याकांड को अंजाम देने के लिए उन्होंने सफेदा (यूकेलिप्टस) के पेड़ की टहनियां तोड़ीं और उन के आगे वाले हिस्से को नुकीला कर के उसे हथियार के रूप में प्रयोग किया. हरवंत सहित सभी हत्यारों के पास लकड़ी का बनाया एकएक हथियार था. इस के अलावा उन्होंने अपने साथ .32 बोर और .315 बोर की पिस्तौलें भी ले ली थीं. अपनी योजना के अनुसार 16 जून, 2019 को हरवंत ने रात के खाने की दाल में नशे की गोलियां मिला दी थीं.

16 जून की रात खाना खाने के बाद जब पूरा परिवार बेहोशी की हालत में सोया हुआ था, तब हरवंत ने कुलदीप, सोनू और रछपाल को अपने घर बुला लिया. परिवार के सभी लोग सोए हुए थे. सभी सदस्यों के सिरहाने एकएक आरोपी मोर्चा संभाल कर खड़ा हो गया.

फिर चारों ने एक साथ सब पर हमला बोल दिया. सब से पहले हरवंत ने एक ही कमरे में सोए दोनों बेटों लवरूप सिंह और ओंकार सिंह के सिर पर लकड़ी के नुकीले हथियार से हमला किया. इसी दौरान कुलदीप सिंह और अन्य ने उस की पत्नी दविंदर कौर व बेटी सिमरनजीत पर प्रहार किया.

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जब चारों की मौत हो गई तो हरवंत ने कुलदीप और अपने 2 साथियों की मदद से सब से पहले खून के दागों को धोया. फिर पशुओं के चारे की खुरली से ईंटें उखाड़ कर उन की लाशों से ईंटें बांध दीं. फिर लाशों को बोरी में डाल कर जिप्सी में लादा और ले जा कर नहर में फेंक आए. लाशों के साथ ईंटें इसलिए बांधी गईं कि वे कभी ऊपर न आ सकें.

हरवंत सिंह, कुलदीप सिंह, सोनू सिंह और रछपाल सिंह की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल किए गए लकड़ी के 4 नुकीले डंडे, 2 पिस्तौल और 8 कारतूस बरामद किए गए.

हत्या के लिए बनाए गए लकड़ी के हथियार काफी वजनी थे. वहीं हरवंत की कथित प्रेमिका और एक अन्य साथी इस हत्याकांड में सीधे रूप जुड़े थे या नहीं, इस की जांच चल रही थी.

पुलिस ने हरवंत व उस के साथियों को घटनास्थल पर ले जा कर क्राइम सीन क्रिएट कर के भी जांच की थी. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद इस हत्याकांड से जुड़े आरोपियों को अदालत में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया.

जब घर में ही औफिस बनाना हो

आजकल कुछ कंपनियां वर्क फ्रौम होम यानी घर से काम करने की सुविधा प्रदान करती हैं. इस के अतिरिक्त कुछ लोग अपनी निजी कंपनियां भी घर से चलाते हैं या घर से पार्टटाइम काम करते हैं या कोई विद्यार्थी जो पढ़ाई के साथ कुछ कमाना चाहता हो. ऐसे में अपने घर में ही एक जगह औफिस बनाना होता है जहां शांति से बैठ कर सुविधा के साथ काम कर सकें. खासकर महिलाओं के लिए वर्क फ्रौम होम एक सुनहरा मौका देता है. न दफ्तर के लिए ट्रैफिक का सामना करना है और न ही कौन सी ड्रैस आज पहननी है कि टैंशन. मेकअप की भी कोई चिंता नहीं होती. आइए, घर में ही अपना औफिस बनाने के कुछ विकल्प पर गौर करते हैं.

औफिस किसे और किसलिए : सब से पहले यह सुनिश्चित करना है कि औफिस किसे और किसलिए चाहिए. अगर किसी विद्यार्थी के लिए हो तो उसे कुछ ज्यादा जगह और बड़ी डैस्क चाहिए ताकि वह अपनी किताबें आदि रख सकें. यदि आर्किटैक्ट या ड्राइंग से संबंधित काम करना हो तो ड्राइंगबोर्ड रखने के लिए और वहां बैठ कर या खड़े हो कर काम करने की जगह होनी चाहिए. इस के अतिरिक्त फोन और कंप्यूटर के लिए डैस्क और कुरसी की जगह होनी चाहिए. अगर वीडियो कौन्फ्रैंसिंग करनी हो तो आप के औफिस का कुछ प्रोफैशनल लुक भी होना चाहिए. आजकल वर्क फ्रौम होम का मतलब कंप्यूटर होना जरूरी है, तो आप को डैस्कटौप कंप्यूटर चाहिए या लैपटौप या क्रोमबुक. आप का औफिस कहां और कितना बड़ा हो, इन सब बातों पर निर्भर करता है.

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अगर आप को बिलकुल शांत वातावरण चाहिए तो आप को एक अलग कमरा चाहिए जिस में दरवाजा हो.

क्लोजेट में औफिस : अगर आप को बड़े औफिस की जरूरत नहीं हो तो किसी स्पेयर स्पेस में – गैस्टरूम की क्लोजेट या किसी बड़े क्लोजेट के एक हिस्से में औफिस बना सकते हैं. क्लोजेट के गैरजरूरी शेल्व्ज या रैक्स, उन के रौड्स, हैंगर्स और दरवाजे निकाल कर सफेद या हलके रंग से रंग दें. डार्क कलर से जगह छोटी दिखती है और रोशनी भी कम लगती है.

गैराज में औफिस : अपने गैराज के एक हिस्से में कुछ मामूली बदलाव ला कर उसे रीमौडल कर अपना प्राइवेट औफिस बनाया जा सकता है, जहां आप को शांति भी मिलेगी.

एंट्री वे पर औफिस : एक स्लिम या अर्द्धचंद्राकार आकार का साइडटेबल और एक छोटी वर्किंग चेयर एंट्री वे में रख कर छोटा और साफसुथरा औफिस बनाया जा सकता है. चेयर बैकलैस हो तो उसे डैस्क के अंदर रख सकते हैं. साइड में वर्किंग डैस्क के नीचे छोटामोटा सामान भी रख सकते हैं.

फैमिली या लिविंगरूम औफिस : लिविंगरूम के किसी कोने में एक एल शेप की डैस्क और उस के कुछ ऊपर तक दीवारों में कैबिनेट बना कर आप अपना औफिस बना सकते हैं. यहां डैस्क के नीचे में ताले वाले ड्रौअर बनवा सकते हैं. जब आप को थकान महसूस हो, यहां आप के आराम के लिए सोफे या काउच भी होंगे. अगर लिविंगरूम बड़ा हो तो एक फोल्डेबल डिवाइडिंग डोर या स्क्रीन भी लगा सकते हैं.

किसी भी कोने में आरामदायक औफिस : कुछ घरों के अंदर कोने में नुक्कड़नुमा पौपआउट होते हैं. किचन के ब्रेकफास्ट नुक्कड़ में आप छोटा औफिस बना सकते हैं. यहां से महिलाएं किचन के कुछ काम भी देख सकती हैं. दीवार के कोने में फोल्डेबल बिल्ट इन डैस्क लगा कर औफिस बनाया जा सकता है.

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पोर्टेबल औफिस : अगर आप के क्लोजेट, गैराज या लिविंगरूम में कोई स्पेयर जगह नहीं है तो चिंता न करें. आप एक छोटा पोर्टेबल औफिस बना सकते हैं. अपने किसी स्पेयर कौकटेल टेबल या अन्य किसी छोटे टेबल, जिन में रौलर्स लगे हों, पर अपना वर्किंग स्पेस बना सकते हैं. इस में ग्लासहोल्डर ग्रूव बनें हों तो और भी अच्छा है. इस पर पेन स्टैंड, एक कौपी, और लैपटौप रख कर कहीं से भी आसानी से काम कर सकते हैं.

ऐसे बनाएं अचारी परवल की सब्जी

आज आपको बताते है, अचारी परवल बनाने की रेसिपी. ये खाने में बहुत टेस्टी है और आप इसे आसानी से बना भी सकते है, वो भी बहुत कम टाइम में.. तो  आइए बताते हैं कैसे बनाएं अचारी परवल की सब्जी.

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सामग्री

400 ग्राम परवल

3 आलू

1 प्याज

1 टमाटर

2 बड़े चम्मच सरसों का तेल

1/2 छोटा चम्मच कलौंजी के बीज

1/2 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर

1/2 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर

नमक स्वादानुसार

1 छोटा चम्मच मसाले के लिए धनिए के बीज

1/2 छोटा चम्मच जीरा

1/2 छोटा चम्मच सौंफ

1/2 छोटा चम्मचकलौंजी के बीज

1/4 छोटा चम्मच मेथीदाना

3 साबुत लाल मिर्च

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बनाने की वि​धि

सबसे पहले परवल, आलू और टमाटर को पतला और सीधा काट लें और इसके साथ ही प्याज को भी बारीक काट लें.

फिर अचारी मसाला बनाने के लिए मीडियम आंच पर तवा गर्म करें और सभी साबुत मसाले व लाल मिर्च डालकर इसे भून लें. भूनने के बाद इसे ग्राइंडर में डालकर पीस लें.

अब एक कड़ाही में सरसों का तेल गर्म करें और इसमें कलौंजी डालें. फिर इसमें प्याज डालें और गोल्डन होने तक इसे पका लें.

इसके बाद इसमें पहले से काटकर रखे आलू, परवल और टमाटर डालें और इसे 4 से 5 मिनट के लिए पका लें.

अब इसमें नमक, हल्दी, पिसा हुआ मसाला, अमचूर डालें और सबको मिला ले.

थोड़ा पानी डालें, कड़ाही को 5 मिनट के लिए ढककर रख दें.

मां, पराई हुई देहरी तेरी : भाग 1

कमरे में पैर रखते ही पता नहीं क्यों दिल धक से रह जाता है. मां के घर के मेरे कमरे में इतनी जल्दी सब- कुछ बदल सकता है मैं सोच भी नहीं सकती थी. कमरे में मेरी पसंद के क्रीम कलर की जगह आसमानी रंग हो गया है. परदे भी हरे रंग की जगह नीले रंग के लगा दिए गए हैं, जिन पर बड़ेबड़े गुलाबी फूल बने हुए हैं.

मैं अपना पलंग दरवाजे के सामने वाली दीवार की तरफ रखना पसंद करती थी. अब भैयाभाभी का दोहरा पलंग कुछ इस तरह रखा गया है कि वह दरवाजे से दिखाई न दे. पलंग पर भाभी लेटी हुई हैं. जिधर मेरी पत्रिकाओं का रैक रखा रहता था, अब उसे हटा कर वहां झूला रख दिया गया?है, जिस में वह सफेद मखमली सा शिशु किलकारियां ले रहा है, जिस के लिए मैं भैया की शादी के 10 महीने बाद बनारस से भागी चली आ रही हूं.

‘‘आइए दीदी, आप की आवाज से तो घर चहक रहा था, किंतु आप को तो पता ही है कि हमारी तो इस बिस्तर पर कैद ही हो गई है,’’ भाभी के चेहरे पर नवजात मातृत्व की कमनीय आभा है. वह तकिए का सहारा ले कर बैठ जाती हैं, ‘‘आप पलंग पर मेरे पास ही बैठ जाइए.’’

मुझे कुछ अटपटा सा लगता है. मेरी मां के घर में मेरे कमरे में कोई बैठा मुझे ही एक पराए मेहमान की तरह आग्रह से बैठा रहा है.

‘‘पहले यह बताइए कि अब आप कैसी हैं?’’ मैं सहज बनने की कोशिश करती हूं.

‘‘यह तो हमें देख कर बताइए. आप चाहे उम्र में छोटी सही, लेकिन अब तो हमें आप के भतीजे को पालने के लिए आप के निर्देश चाहिए. हम ने तो आप को ननद के साथ गुरु  भी बना लिया है. सुना है, तनुजी ‘बेबी शो’ में प्रथम आए?थे.’’

मैं थोड़ा सकुचा जाती हूं. भैया मुझ से 3 वर्ष ही तो बड़े थे, लेकिन उन्हीं की जिद थी कि पहले मीनू की शादी होगी, तभी वह शादी करेंगे. मेरी शादी भी पहले हो गई और बच्चा भी.

भाभी अपनी ही रौ में बताए जा रही हैं कि किस तरह अंतिम क्षणों में उन की हालत खराब हो गई थी. आपरेशन द्वारा प्रसव हुआ.

‘‘आप तो लिखती थीं कि सबकुछ सामान्य चल रहा है फिर आपरेशन क्यों हुआ?’’ कहते हुए मेरी नजर अलमारी पर फिसल जाती है, जहां मेरी अर्थशास्त्र की मोटीमोटी किताबें रखी रहती थीं. वहां एक खाने में मुन्ने के कपड़े, दूसरे में झुनझुने व छोटेमोटे खिलौने. ऊपर वाला खाना गुलदस्तों से सजा हुआ है.

‘‘सबकुछ सामान्य ही था लेकिन आजकल ये प्राइवेट नर्सिंग होम वाले कुछ इस तरह ‘गंभीर अवस्था’ का खाका खींचते हैं कि बच्चे की धड़कन कम हो रही है और अगर आधे घंटे में बच्चा नहीं हुआ तो मांबच्चे दोनों की जान को खतरा है. घर वालों को तो घबरा कर आपरेशन के लिए ‘हां’ कहनी ही पड़ती है.’’

‘‘अब तो जिस से सुनो, उस के ही आपरेशन से बच्चा हो रहा है. हमारे जमाने में तो इक्कादुक्का बच्चे ही आपरेशन से होते थे,’’ मां शायद रसोई में हमारी बात सुन रही हैं, वहीं से हमारी बातों में दखल देती हैं.

मेरी टटोलती निगाह उन क्षणों को छूना चाह रही है जो मैं ने अपनी मां के घर के इस कमरे में गुजारे हैं. परीक्षा की तैयारी करनी है तो यही कमरा. बाहर जाने के लिए तैयार होना है तो शृंगार मेज के सामने घूमघूम कर अपनेआप को निखारने के लिए यही कमरा. मां या पिताजी से कोई अपनी जिद मनवानी हो तो पलंग पर उलटे लेट कर रूठने के लिए यही कमरा या किसी बात पर रोना हो तो सुबकने के लिए इसी कमरे का कोना. मेरा क्या कुछ नहीं जुड़ा था इस कमरे से. अब यही इतना बेगाना लग रहा है कि यह अपनी उछलतीकूदती मीनू को पहचान नहीं पा रहा.

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‘‘तू यहीं छिपी बैठी है. मैं तुझे कब से ढूंढ़ रहा हूं,’’ भैया आते ही एक चपत मेरे सिर पर लगाते हैं. भाभी के हाथ में कुछ पैकेट थमा कर कहते हैं, ‘‘लीजिए, बंदा आप के लिए शक्तिवर्धक दवाएं व फल ले आया है.’’ फिर मुन्ने को गोद में उठा कर अपना गाल उस के गाल से सटाते हुए कहते हैं, ‘‘देखा तू ने इसे. मां कह रही थीं बचपन में तू बिलकुल ऐसी ही लगती थी. अगर यह तुझ पर ही गया तो इस के नखरे उठातेउठाते हमारी मुसीबत ही आ जाएगी.’’

‘‘मारूंगी, ऐसे कहा तो,’’ मैं तुनक कर जवाब देती हूं. मुझे यह दृश्य भला सा लग रहा है. अपने संपूर्ण पुरुषत्व की पराकाष्ठा पर पहुंचा पितृत्व के गर्व से दीप्त मुन्ने के गाल से सटा भैया का चेहरा. सबकुछ बेहद अच्छा लगने पर भी, इतनी खुश होते हुए भी एक कतरा उदासी चुपके से आ कर मेरे पास बैठ जाती है. मैं भैया की शादी में भी कितनी मस्त थी. भैया की शादी की तैयारी करवाने 15 दिन पहले ही चली आई थी. मैं ने और मां ने बहुत चाव से ढूंढ़ढूंढ़ कर शादी का सामान चुना था. अपने लिए शादी के दिन के लिए लहंगा व स्वागत समारोह के लिए तनछोई की साड़ी चुनी थी. बरात में भी देर तक नाचती रही थी.

मां व मैं घर पर सारी खुशियां समेट कर भाभी का स्वागत करने के लिए खड़ी थीं. भैया भाभी के आंचल से अपने फेंटे की गांठ बांधे धीरेधीरे दरवाजे पर आ रहे थे.

‘‘अंदर आने का कर लगेगा, भैया.’’ मैं ने अपना हाथ फैला दिया था.

‘‘पराए घर की छोकरी मुझ से कर मांग रही है, चल हट रास्ते से,’’ भैया मुझे खिजाने के लिए आगे बढ़ते आए थे.

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‘‘मैं तो नहीं हटूंगी,’’ मैं भी अड़ गई थी.

‘‘कमल, झिकझिक न कर, नेग तो देना ही होगा,’’ मां और एक बुजुर्ग महिला ने बीचबचाव किया था.

‘‘तुम्हीं बताओ, इसे कितनी बख्शीश दें?’’ भैया ने स्नेहिल दृष्टि से भाभी को देखते हुए पूछा था.

भाभी तो संकोच से आधे घूंघट में और भी सिमट गई थीं. किंतु मुझे कुछ बुरा लगा था. मुझे कुछ देने के लिए भैया को अब किसी से पूछने की जरूरत महसूस होने लगी है.

ऐसे करें डैंड्रफ की समस्या का इलाज

आपकी पर्सनैलिटी कितनी खूबसूरत होगी, इसमें बालों का काफी योगदान होता है. आपके बालों से आपकी सुंदरता तय होती है. पर सोचिए बढ़ती उम्र के साथ जब आपके सिर से बाल कम होने लगें तो कैसा लगेगा. जब आपके बाल कम होने लगते हैं तो आपका आत्मविश्वास कम होने लगता है.

आप सार्वजनिक जगहों में जाने से कतराती हैं. खुद पर से आपका कौंफिडेंस कम होने लगता है. इस लिए जरूरी है कि आप अपने बालों की देखभाल करें. इस खबर में हम आपको हेयरकेयर से जुड़ी खास बाते बताएंगे.

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बालों के झड़ने के कारण

बालों के झड़ने के कई कारण होते हैं. इसमें डैंड्रफ, गलत रहन-सहन, बालों में मशीनों का बार-बार प्रयोग करना, तनाव जैसे अन्य वजहों से बाल झड़ते हैं. वहीं कई लोगों में ये शिकायत अनुवांशिक तौर पर होती है. इसमें पोषण की कमी भी महत्वपूर्ण है.

आम तौर पर जिन भी कारणों से हेयरफौल होती है उनमें डैंड्रफ प्रमुख है. तो आइए जाने कि इस समस्या को कैसे दूर करें.

ऐसे करें डैंड्रफ दूर

सबसे पहले चिरौंजी, मुलेठी, कूठ, उड़द और सेंधा नमक पीस कर रख लें. रोज सुबह इस पाउडर में शहद मिलाकर सिर पर लगाएं. आधे घंटे तक इसे सिर पर रहने दें. फिर बाल धो लें. कुछ ही दिनों में आपको काफी अंतर दिखेगा.

इस परेशानी में नीलकमल, नागकेसर, मुलेठी जैसे तत्व भी काफी असरदार होते हैं. इन्हें काले तिल और आंवला में मिलाकर पीस लें और रोज पानी में मिलाकर सिर पर लगाएं. आधे घंटे के इस बाद धो लें. इस उपाय से भी डैंड्रफ की समस्या समाप्त हो जाएगी.

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चश्मे से स्क्रैच हटाने के 5 उपाय

आज हम आपको चश्‍में पर पड़े स्‍क्रैच को हटाने के कुछ टिप्स बताएंगे जिनसे आप अपने चश्‍में पर पड़े स्‍क्रैच को आसानी से मिटा सकती हैं. चलिए जानते हैं.

1.आप जिससे अपनी कार के शीशे को साफ करते हैं, यानी की विंडशीट वाटर रैपेलेंट के दा्रा स्‍क्रैच को  साफ कर सकती हैं. इसके अलावा मेटल पौलिश से भी यह कार्य बड़ी आसानी से किया जा सकता है.

2. घर में आपका टूथपेस्‍ट इस कार्य को आसानी से कर सकता है. एक कपड़े से टूथपेस्‍ट ले कर चश्‍में के स्‍क्रैच वाले स्‍थान पर धीरे धीरे रगड़िए और देखिए कि निशान हल्‍का हो चुका होगा.

3. प्लास्टिक आई रिपेयर के लिए, नारियल का जमा हुआ तेल या फिर मोम काम आ सकता है. इनको लगाने के बाद चश्‍में को कपड़े से पोंछ दीजिए.

4. कभी कभी रेफ्रिजरेटर में अपने चश्मे को रखने से और उस पर बर्फ के थक्‍को को हटाने पर भी खरोंच कम हो जाती है. इसको जरुर आजमाएं.

5. थोड़ा सा बेकिंग सोड़ा और पानी लेकर पेस्‍ट तैयार करें और उसे स्‍क्रैच वाले स्‍थान पर लगा दें. इससे आपके चश्‍में बिल्‍कुल ब्रैंड न्‍यू लगने लगेगें.

लाली : भाग 1

नेत्रहीन लाली और रोशन बचपन के साथी थे. लाली रोशन की आंखों से दुनिया देखती थी. दोनों साथसाथ खातेपीते, मस्ती करते. आखिर दोनों ही तो एकदूसरे का सहारा थे. इतनी नजदीकियों के बावजूद न जाने क्यों दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगी थीं.

वह दीवार के सहारे बैठा था. उस के चेहरे पर बढ़ी दाढ़ी को देख कर लगता था कि उसे महीने से नहीं छुआ गया हो. दाढ़ी के काले बालों के बीच झांकते कुछ सफेद बाल उस की उम्र की चुगली कर रहे थे. जिंदगी की कड़वी यादें और अनुभव के बोझ ने उस की कमर को भी झुका दिया था.

रात का दूसरा पहर और सड़क के किनारे अंधेरे में बैठा वह अपनी यादों में खोया था. यादें सड़क से गुजरने वाले वाहनों की रोशनी की तरह ही तो थीं, जो थोड़ी देर के लिए अंधेरी दुनिया को रोशन कर जाती थीं, लेकिन आज क्षणभंगुर रोशनी का भी आखिरी दिन था. आज लाली की शादी जो हो रही थी, उसी चारदीवारी के अंदर जिस के सहारे वह बैठा था. वह अपने 12 साल पुराने अतीत में चला गया.

रेल के डब्बे के पायदान पर बैठा वह बहुत खुश था. उम्र करीब 14 साल रही होगी. उस दिन बड़ी तन्मयता के साथ वह अपनी कमाई गिन रहा था.

2…4…10…15… वाह, आज पूरे 15 रुपए की कमाई हुई है. अब देखता हूं उस लाली की बच्ची को…कैसे मुझ से ज्यादा पैसे लाती है. हर बार मुझ से ज्यादा पैसे ला कर खुद को बहुत होशियार समझती है. आज आने दो उसे…आज तो वह मुझ से जीत ही नहीं सकती. 15 रुपए तो उस ने एकसाथ देखे भी नहीं होंगे. जो टे्रन की रफ्तार के साथ भाग रहे थे.

‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम…’ भजन के स्वर कान में पड़ते ही वह अपने खयालों से बाहर आ गया. यह लाली की आवाज ही थी, जैसे दूर किसी मंदिर में घंटी बज रही हो.

उस ने पीछे मुड़ कर देखा तो लाली खड़ी थी. उम्र करीब 12 वर्ष, आंखों में चमक मगर रोशनी नहीं, दाएं हाथ में 2 संगमरमर के छोटेछोटे टुकड़े जो साज का काम करते थे, सिर के बाल पीछे की ओर गुंथे हुए.

‘लाली, मैं यहां हूं. तू इधर आ. कब से तेरा इंतजार कर रहा हूं. स्टेशन आने वाला है. आज कितने पैसे हुए?’

‘रोशन, तू यहां है,’ लाली बोली और अपने दोनों हाथों को आगे की ओर उठा कर आवाज आने की दिशा की ओर मुड़ गई. इन 12 सालों में लाली ने हाथों से ही आंखों का काम लिया था. रोशन ने उसे अपने साथ पायदान पर बिठा लिया.

‘रोशन, जरा मेरे पैसे गिन दे.’

‘अभी तू इन्हें अपने पास रख. स्टेशन आने वाला है. उतरने के बाद पार्क में बैठ कर इन पैसों को गिनेंगे.’

स्टेशन आते ही दोनों टे्रन से उतर कर पार्क की ओर चल दिए.

पार्क की बेंच पर बैठते ही लाली ने अपने सभी पैसे रोशन को पकड़ा दिए.

रोशन के चेहरे पर विजयी मुसकान आ गई, आज तो उस की जीत होनी ही थी. उस ने पैसे लिए और गिनने लगा.

‘2…4…10…12…15…20…22, ओह, आज फिर हार गया और अब फिर से इस के ताने सुनने होंगे.’ रोशन ने मन ही मन सोचा और चिढ़ कर सारे पैसे लाली के हाथ में पटक दिए.

‘बता न कितने हैं?’

‘मैं क्यों बताऊं, तू खुद क्यों नहीं गिनती, मैं क्या तेरा नौकर हूं.’

‘समझ गई,’ लाली हंसते हुए बोली.

‘तू क्या समझ गई.’

‘आज फिर मेरे पैसे तुझ से ज्यादा हैं, तू मुझ से जल रहा है.’

‘अरे, जले मेरी जूती,’ रोशन ने बौखलाते हुए कहा.

‘तेरे पास तो जूते भी नहीं हैं जलाने को, देख खाली पैर बैठा है,’ लाली यह कह कर हंसने लगी. लाली की इस बात ने जैसे आग में घी डाल दिया. रोशन गुस्से में बोला, ‘अरे, तू अंधी है तभी तुझ पर तरस खा कर लोग पैसे दे देते हैं, वरना तेरे गाने को सुन कर तो जिंदा आदमी भी मर जाए और मरे आदमी का भूत भाग जाए.’

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यह सुन कर लाली जड़ हो गई और उस की आंखों से आंसू निकल पड़े. लाली के आंसुओं ने रोशन के गुस्से को धो डाला. वह पछताने लगा मगर माफी मांगे तो कैसे?

‘लाली, माफ कर दे मुझे, मैं तो पागल हूं. किसी पागल की बात का बुरा नहीं मानते.’

लाली ने दूसरी तरफ मुंह मोड़ लिया.

‘अरे, लाली, मैं ने तुझ से अच्छा गाने वाला आज तक नहीं सुना. मैं सच बोल रहा हूं. तुझ से अच्छा कोई गा ही नहीं सकता.’

वह सच बोल रहा था. काश, लाली उस की आंखों में देख पाती तो जरूर विश्वास कर लेती. लाली के चेहरे पर अविश्वास की झलक साफ पढ़ी जा सकती थी.

‘लाली, मैं सच कह रहा हूं…बाबा की कसम. देख तुझे पता है मैं बाबा की झूठी कसम नहीं खाता. अब तू चुप हो जा.’

लाली के चेहरे पर अब मुसकान लौटने लगी थी.

‘अब मैं कभी तुझे अंधी नहीं बोलूंगा, तुझे आंखों की जरूरत ही नहीं है, ये रोशन तेरी आंखों की रोशनी है,’ अब लाली के चेहरे पर मुसकान लौट आई थी.

कमरे में खाट पर जर्जर काया लेटी हुई थी. टूटी हुई छत से झांकते हुए धूप के टुकड़ों ने कमरे में कुछ रोशनी कर रखी थी.

माखन खाट पर लेटा रोशन के आने का इंतजार कर रहा था. ‘आज इतनी देर हो गई रोशन आया नहीं है.’

माखन की उम्र करीब 65 वर्ष होगी. खाट पर लेटे हुए वह अपने अंतिम दिनों को गिन रहा था. लोगों की घृणा भरी नजरें और अपने शरीर को गलता देख माखन में जीने की चाह खत्म हो गई थी पर मौत भी शायद उस के साथ आंखमिचौली का खेल खेल रही थी.

दिल की इच्छा थी कि रोशन पढ़लिख कर साहब बने. उस ने वादा भी किया था रोशन से कि जिस दिन वह मैट्रिक पास कर लेगा उस दिन वह उसे अपने रिकशे में साहब की तरह बिठा कर पूरा शहर घुमाएगा. लेकिन गरीब का सपना पूरा कहां होता है.

4 साल पहले कोढ़ ने उसे रिकशा चलाने लायक भी नहीं छोड़ा और वह बोझ बन गया रोशन पर. रोशन को स्कूल छोड़ना पड़ा. गरीब की जिंदगी में बचपन नहीं होता, गरीबी और जिम्मेदारी ने रोशन को उम्र से पहले ही बड़ा कर दिया. कलम की जगह झाड़ू ने ले ली, स्कूल की जगह रेलगाड़ी ने और शिक्षक की प्यार भरी डांटफटकार की जगह लोगों के कटु वचनों और गाली ने ले ली.

‘अरे, तू आ गया रोशन. कहां था अब तक और यह तेरे हाथ में क्या है?’

‘बाबा, यह लो अपनी दवाई, तुम्हें जलेबी पसंद है न. लो, खाओ और यह भी लो,’ यह कहते हुए उस ने देसी शराब की बोतल माखन की ओर बढ़ा दी.

‘अरे, बेटा, इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी.’

रोशन के चेहरे पर मुसकान आ गई. उस ने बाबा की आंखों की चमक को पढ़ लिया था. उसे पता था कि बाबा को रोज शराब की तलब होती है, लेकिन पैसों की तंगी के कारण कई महीने बाद बाबा के लिए वह बोतल ला पाया था.

रोशन हर दिन की तरह उस दिन भी टे्रन के पायदान पर लाली के साथ बैठा था.

‘वह देख लाली, इंद्रधनुष, कितना खूबसूरत है,’ टे्रन के पायदान पर बैठे रोशन ने इंद्रधनुष की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘इंद्रधनुष कैसा होता है, कहां रहता है?’

‘अरे, तुझे इतना भी नहीं पता. इंद्रधनुष 7 रंगों से बना होता है. उस में लाल रंग सब से सुंदर होता है और पता है यह आसमान में लटका रहता है.’

स्कूल में सीखे हुए इंद्रधनुष के सारे तथ्य उस ने लाली को बता दिए लेकिन उसे खुद इन बातों में भरोसा नहीं था. जैसे इंद्रधनुष के 7 रंग.

उस ने 5 रंग बैगनी, नीला, हरा, पीला और लाल से ज्यादा रंग कभी इंद्रधनुष में नहीं देखे थे. और भी मास्टरजी की कई बातों पर उसे भरोसा नहीं होता था जैसे धरती गोल है, सूरज हमारी धरती से बड़ा है…इन सारी बातों पर कोई पागल ही भरोसा करेगा.

लेकिन दूसरे बच्चों पर अपनी धौंस जमाने के लिए ये बातें वह अकसर बोला करता था.

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अपनी आंखों के सामने अंधेरा छाता देख माखन समझ गया अब उस का अंतिम समय आ गया है. रोशन को अंतिम बार देखने के लिए उस ने अपनी सांसें रोक रखी थीं, उस ने अपनी आंखें दरवाजे पर टिका रखी थीं. लेकिन जितनी सांसें उस के जीवन की थीं शायद सारी खत्म हो चुकी थीं. आत्मा ने शरीर का साथ छोड़ दिया था. बस, बचा रह गया था उस का ठंडा शरीर और इंतजार करती दरवाजे की ओर देखती आंखें.

बाबा को गुजरे 1 साल हो गया था. रोशन ने टे्रन की सफाई के साथसाथ घर भी छोड़ दिया था. जब भी वह घर जाता उसे लगता बाबा का भूत सामने खड़ा है और बारबार उसे बारूद के कारखाने में काम करने से मना कर रहा है. टे्रन का काम रोशन को कभी पसंद नहीं था लेकिन बाबा के दबाव में वह कारखाने में काम नहीं कर पाया था. बाबा ने उस से वादा भी किया था कि उन के मरने के बाद रोशन बारूद के कारखाने में काम नहीं करेगा, लेकिन वह उस वादे को निभा नहीं पाया.

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