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विंटर टिप्स : ड्राई स्किन को ऐसे बनाएं सौफ्ट

सर्दियों में ड्राई स्किन की सम्स्या आम बात है. ऐसे में स्किन में खिंचाव, सूखापन आदि की सम्स्या होने लगती है. इसलिए इस मौसम में आपको ज्यादा ख्याल रखना पड़ता है. तो आइए जानते हैं, इस मौसम में आप ड्राई स्किन की समस्या से कैसे राहत पा सकते हैं.

  • सबसे पहले बहुत गर्म पानी से न नहाकर गुनगुने पानी से नहाएं. गर्म पानी स्किन के नेचुरल औयल्स हटा देता है जिसकी वजह से स्किन बहुत ड्राई हो जाती है. अगर आपकी स्किन ड्राई ही है तो चेहरे और शरीर पर साबुन का इस्तेमाल कम करें.

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  • फेस वाश या बौडी वाश का पीएच (पोटेंशियल औफ हाइड्रोजन) आपकी स्किन के पी.एच के समान होता है जिसके इस्तेमाल से ड्रायनेस काम होती है.
  • अगर आपको चेहरे पर काफी ड्रायनेस हो तो चेहरे को साबुन या फेसवाश की जगह क्लींजिंग मिल्क से साफ करें,  इसके बाद एक अल्कोहल फ्री टोनर और मौश्चराइजर का भी इस्तेमाल करें.
  • अगर आपकी स्किन ड्राई है तो शरीर के लिए एक अच्छा बौडी लोशन या बौडी बटर का इस्तेमाल करें और चेहरे के लिए एक अच्छा मौइस्चराइजर पास रखें.

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  • एक अच्छा मौइस्चराइजर या बौडी लोशन खरीदते समय याद रखें कि उसमें शीया बटर या कोकोआ बटर, अच्छे नेचुरल औयल्स जैसे बादाम, जैतून और ग्लिसरीन हों.

जरूरी है बच्चों की रिस्पैक्ट का ध्यान रखना

बच्चे कच्ची मिट्टी समान होते हैं. उन्हें क्या रूप देना है यह आप पर निर्भर करता है. बड़ा हो कर बच्चा अच्छे व्यक्तित्व का स्वामी बने, उन्नति करे और आप का नाम रोशन करे यह चाह हर मांबाप को होती है. मगर ऐसा मुमकिन तभी होगा जब आप शुरू से बच्चे की अच्छी परवरिश पर ध्यान देंगे. अच्छी परवरिश के लिए दूसरी बातों के साथसाथ यह बात भी काफी अहम है जिसे अकसर मातापिता नजरअंदाज कर जाते हैं और वह है बच्चों को रिस्पैक्ट देना.

बच्चे को कभी उस के छोटे भाई या बहन के सामने न डांटें: यदि आप के बच्चे ने कोई काम आप के मनमुताबिक नहीं किया या उस ने कोई शरारत की, नंबर अच्छे नहीं आए या फिर उस के झूठ बोलने पर आप को गुस्सा आया हो, तो बात कितनी भी बड़ी हो पर बच्चे को कभी उस के छोटे भाईबहनों के सामने अपमानित न करें, क्योंकि छोटा भाई या बहन जो बड़े को आप से डांटमार खाता देख रहा है, समय आने पर वह भी बड़े की कद्र करना छोड़ देगा. छोटे भाई या बहन की नजर में बड़े का सम्मान घट जाएगा. वह बड़े भाई या बहन का मजाक उड़ाएगा जिस से बड़े के मन में कुंठा बैठती जाएगी. इसलिए यदि बड़े बच्चे को कुछ कहना है तो छोटे के सामने नहीं, बल्कि अकेले में कहें.

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दूसरों के आगे आपा न खोएं: मान लीजिए बच्चे ने आप की कोई चीज खो दी या कोई बड़ी गलती कर दी जिस के बारे में आप को किसी और से पता चलता है, तो खबर मिलते ही एकदम बच्चे पर चीखनेचिल्लाने लगें यह उचित नहीं. लोगों के बीच बच्चे को कभी अपमानित न करें. अकेले में उस से बात करें. एकदम आपा खोने के बजाय बच्चे को उस के द्वारा की गई गलती के बारे में बताएं और फिर उस का जवाब सुनें. हो सकता है परिस्थितिवश ऐसा हुआ हो. उसे अपने बचाव का मौका दें. उस का पक्ष सुनने के बाद फैसला लें कि बच्चे की गलती है या नहीं. यदि उस की गलती है भी तो उस से मारपीट करने के बजाय उसे तार्किक तरीके से समझाएं. उसे अपनी गलती का एहसास कराएं और वादा लें कि वह आगे ऐसा नहीं करेगा. प्यार से समझाई गई बात का असर बहुत गहरा पड़ता है, जबकि मारपीट कर समझाई गई बात बच्चे में क्षोभ और विद्रोह के भाव पैदा करती है या फिर वह डिप्रैस्ड रहने लगता है.

बच्चे की कमियां न गिनाएं: हर समय बच्चे को नाकारा, आलसी, बेवकूफ, जाहिल जैसे शब्दों से न नवाजें. आप उसे जितना ज्यादा झिड़केंगे या उस की कमियां गिनाते रहेंगे उस के उतना ही ज्यादा गलत रास्ते पर जाने की संभावना बढ़ती जाएगी. कई घरों में मांबाप हर समय बच्चे को कोसते रहते हैं. बाहर वालों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों के आगे भी उस की कमियों का बखान करते रहते हैं. इस से बच्चे के अंदर नकारात्मक सोच विकसित होती है. इस के विपरीत यदि मांबाप बच्चे की छोटीबड़ी उपलब्धियों का जश्न मनाएं, दूसरों के आगे उस की तारीफ करें, उस के अंदर की खूबियों को बढ़ाचढ़ा कर बताएं तो बच्चे के अंदर सकारात्मकता बढ़ती है. उस के अंदर और अच्छा काम कर अधिक तारीफ पाने की लालसा जगती है, उस के मन में क्षोभ, ग्लानि या प्रतिस्पर्धा के बजाय उत्साह, लगन और स्वस्थ प्रतियोगिता की भावना प्रबल होती है.

बच्चे की इच्छा को मान दें: हर बच्चा दूसरे से अलग होता है. हर बच्चे में अलगअलग खूबियां होती हैं, अलगअलग हुनर होते हैं. बच्चे में जो हुनर है, उसे जो करना पसंद है, उस की भविष्य में जो बनने की इच्छा है उसे तरजीह दें. उसे वही बनने दें जो वह बनना चाहता है. कई घरों में बच्चे की इच्छा यह कह कर दबा दी जाती है कि वह छोटा है. उसे भलेबुरे का ज्ञान नहीं. पर ऐसी प्रवृत्ति सही नहीं. बच्चे की जिंदगी पर अपना अधिकार न जमाएं. उसे पूरे सम्मान के साथ अपनी जिंदगी और जिंदगी से जुड़े फैसले लेने दें ताकि उम्र बढ़ने के बाद उस के अंदर घुटन, छटपटाहट, फ्रस्ट्रेशन और गुस्से की ज्वाला नहीं, बल्कि संतुष्टि, खुशी, अपनत्व और प्रेम की धारा बहे. वह आप को भी प्रेम दे और दूसरों को भी.

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बच्चे का नाम न बिगाड़ें: अकसर मातापिता या रिश्तेदार बच्चे के नाम को बिगाड़ कर पुकारते हैं जैसे चंद्र को चंदर, देव को देवू, मीनल को मिनुआ आदि. उन की किसी बाहरी कमी के आधार पर भी उस नाम से पुकारने लगते हैं जैसे- बच्चा काला है तो कालू, मोटा है तो मोटू, छोटा है तो छोटू वगैरह. अत: भूल कर भी कभी बच्चे को ऐसे नामों से न पुकारें उलटा यदि कोई परिचित या रिश्तेदार ऐसा करता है तो उसे तुरंत ऐसा करने को मना कर दें. बिगड़े नाम के साथ बच्चे का व्यक्तित्व भी बिगड़ सकता है. हमेशा बच्चे को उसी नाम से पुकारें जैसा आप उसे देखना चाहते हैं जैसे हर्ष, आशा, निहाल, प्रथम जैसे अच्छे अर्थ वाले नाम बच्चे के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं.

बच्चे को आप कह कर पुकारें: अकसर हम देखते हैं कि कुछ संभ्रांत परिवार के लोग अपने बच्चे को शुरू से ही आप कह कर पुकारते हैं जैसे आप ने क्या खाया, आप कहां गए, क्या सीखा आप ने वगैरहवगैरह. इस से बच्चे के अंदर शिष्ट और सभ्य व्यवहार की नींव पड़ती है. आप बच्चे से तूतड़ाक कह कर बात करेंगे तो कल को वह दूसरों से और हो सकता है कि आप से भी इसी लहजे में बात करने लगे. इस से खुद आप को दूसरों के आगे लज्जित होना पड़ सकता है.

अक्षम्य अपराध : भाग 1

16 सितंबर, 2019 की बात है. फिरोजाबाद जिले के गांव लालपुर की रहने वाली शशि यादव घर के कामों में व्यस्त थी. शाम 5 बजे जब उसे अपने बच्चों की याद आई तो वह उन्हें खोजने लगी. उस का 4 साल का बड़ा बेटा कान्हा तो घर में ही खेल रहा था, लेकिन 2 साल का छोटा बेटा लौकिक उर्फ कृष्णा कहीं नजर नहीं आ रहा था.

शशि ने पहले घर में ही कृष्णा की खोज की, फिर पासपड़ोस के घरों में जा कर देखा. लेकिन वह वहां भी नहीं था. शशि की जेठानी नीतू पड़ोस में ही दूसरे घर में रहती थी. शशि ने सोचा कि कृष्णा कहीं अपनी ताई के घर खेलने

न चला गया हो. अत: वह जेठानी के घर जा पहुंची. नीतू उसे घर के बाहर ही मिल गई. शशि ने उस से पूछा, ‘‘दीदी, कृष्णा क्या आप के यहां खेल रहा है?’’

‘‘नहीं तो,’’ नीतू हड़बड़ा कर बोली, ‘‘कृष्णा, हमारे घर नहीं आया.’’

‘‘फिर भी दीदी, एक बार देख लो. शायद कहीं छिप कर बैठा हो.’’ शशि ने आग्रह किया.

‘‘तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं तो खुद आ कर देख लो.’’ नीतू तुनक कर बोली.

‘‘दीदी, मेरा तो कलेजा फटा जा रहा है और आप भरोसे की बात कर रही हैं.’’ कहते हुए शशि ने जेठानी के साथ उस के मकान के भूतल का कोनाकोना छान मारा, लेकिन कृष्णा का कुछ भी पता नहीं चला.

कृष्णा को ढूंढतेढूंढते एक घंटे से ज्यादा बीत गया, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल पाया, जिस से शशि के मन में घबराहट होने लगी. बेटे के लापता होने की खबर उस ने अपने पति सत्येंद्र यादव को दे दी.

सत्येंद्र उस समय अपने भाई महेश के शराब के ठेके पर बैठा था. वहां वह सेल्समैन था. उस का छोटा भाई कुलदीप भी यही काम करता था. सत्येंद्र ने अपने दोनों भाइयों को कृष्णा के लापता होने की सूचना दी तो वे तीनों ठेका बंद कर घर आ गए.

इस के बाद सत्येंद्र अपने भाइयों कुलदीप तथा महेश के साथ कृष्णा को खोजने लगा. तीनों भाइयों ने गांव का एकएक घर छान मारा, लेकिन कृष्णा के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. फिर उन के दिमाग में विचार आया कि कहीं कोई बाबा या तांत्रिक कृष्णा का अपहरण कर के तो नहीं ले गया.

उन्होंने परिवार के कुछ अन्य लोगों को साथ लिया और रेलवे स्टेशन, बसअड्डा तथा टैंपो स्टैंड पर जा कर खोजबीन की. उन्होंने संदिग्ध दिखने वाले बाबाओं को रोक कर भी पूछताछ की तथा उन की झोली की तलाशी ली. तंत्रमंत्र करने वालों के यहां जा कर भी तलाशी ली. लेकिन कृष्णा का कुछ भी पता नहीं चला.

कृष्णा के लापता होने की खबर पूरे गांव में फैल चुकी थी. इसलिए गांव के तमाम पुरुष और महिलाएं सत्येंद्र के घर पर जुटने लगे. सब की जुबान पर एक ही बात थी, आखिर 2 साल का बच्चा कृष्णा कहां चला गया. ऐसे में सत्येंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने बच्चे को कहां ढूंढे.

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अगले दिन 17 सितंबर की सुबह 10 बजे सत्येंद्र अपने भाइयों के साथ थाना रसूलपुर जा पहुंचा. थाने में उस समय थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय मौजूद थे. सत्येंद्र ने थानाप्रभारी को अपना परिचय देते हुए अपने 2 साल के बेटे लौकिक उर्फ कृष्णा के लापता होने की जानकारी दी.

2 साल के बच्चे के गायब होने की बात सुन कर पांडेय भी दंग रह गए, क्योंकि इतना छोटा बच्चा अकेला कहीं दूर नहीं जा सकता था. उन्होंने सत्येंद्र से पूछा, ‘‘तुम्हें किसी पर कोई शक है या किसी से कोई रंजिश वगैरह है तो बताओ.’’

सत्येंद्र कुछ बोलता, उस से पहले ही उस के साथ आए भाई कुलदीप व महेश बोल पड़े, ‘‘नहीं सर, हम लोगों का किसी से कोई झगड़ा नहीं है. जरूर किसी ने बच्चे का अपहरण किया है.’’

थानाप्रभारी ने सत्येंद्र यादव की तरफ से अज्ञात के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कर लिया तथा सत्येंद्र व उस के भाइयों को आश्वासन दिया कि वह बच्चे की खोज में कोई कसर न छोड़ेंगे. आश्वासन पा कर सत्येंद्र अपने भाइयों के साथ वापस घर चला गया.

उन लोगों के जाने के बाद थानाप्रभारी के मन में एक सवाल बारबार कौंध रहा था कि आखिर 2 साल के बच्चे का अपहरण कोई क्यों करेगा. इस की 2 ही वजह दिखाई दे रही थीं, पहली दुश्मनी और दूसरी फिरौती. इधर बड़ा लालपुर गांव और आसपास के गांवों में तरहतरह की चर्चाएं होने लगी थीं.

कोई बच्चों के गायब करने वाले गिरोह की गांव में सक्रियता बढ़ने का अंदेशा जता रहा था, तो कोई तांत्रिकों आदि पर शक जता रहा था. कुछ लोगों को यह शक हो रहा था कि कहीं कोई ऐसी महिला तो बच्चे का अपहरण कर के नहीं ले गई, जिस की गोद सूनी हो.

बहरहाल, जितने मुंह उतनी बातें होने लगी थीं. थानाप्रभारी ने इस मामले से उच्चाधिकारियों को भी अवगत करा दिया था.

थानाप्रभारी भी बच्चे की खोज में जुटे थे. उन्होंने परिवार के लोगों से हर छोटीबड़ी जानकारी एकत्र की, लेकिन उन्हें ऐसी कोई जानकारी नहीं मिल पाई, जिस के आधार पर कोई क्लू मिल सके.

उन्होंने अपने खास मुखबिरों को भी लगा रखा था. लेकिन उन से भी कोई जानकारी नहीं मिल पाई थी. जैसेजेसे समय बीतता जा रहा था, वैसेवैसे गांव के लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा था. गांव के लोग एसएसपी औफिस के बाहर धरनाप्रदर्शन की तैयारी में जुट गए थे.

पुलिस को आशंका थी कि हो न हो कृष्णा का किसी ने फिरौती के लिए अपहरण कर लिया हो. लेकिन पुलिस की यह आशंका भी बेकार साबित हुई, क्योंकि 48 घंटे बीतने के बाद भी कृष्णा के घर वालों के पास फिरौती का फोन नहीं आया था. पुलिस ने क्षेत्र के आधा दरजन से अधिक आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को हिरासत में ले कर उन से कड़ाई से पूछताछ तो की, लेकिन पुलिस के हाथ खाली के खाली ही रहे.

19 सितंबर, 2019 की सुबह करीब 5 बजे बड़ा लालपुर गांव का अंशु अपने साथियों के साथ फुटबाल खेलने जा रहा था. दुर्गामाता मंदिर के पास पहुंचने पर उसे बदबू महसूस हुई. वह बदबू आने वाली दिशा की ओर बढ़ा तो कुछ दूरी पर उसे लगा कि मिट्टी में कुछ दबा हुआ है. बनियान मिट्टी से बाहर दिख रही थी. दुर्गंध वहीं से आ रही थी.

अंशु ने शोर मचाया तो भीड़ जुट गई. सत्येंद्र तथा उस की पत्नी शशि यादव भी आ गए. सत्येंद्र के भाई महेश, कुलदीप तथा अन्य परिजन भी वहां आ गए. सभी दबी जुबान से चर्चा करने लगे कि मिट्टी में कहीं कृष्णा तो दफन नहीं है. गांव के कुछ लोगों का मानना था कि पुलिस के आने के बाद ही यहां की मिट्टी हटाई जाए, लेकिन सत्येंद्र और उस के घर वालों को भला तसल्ली कहां थी.

उन्होंने गांव वालों की उपस्थिति में मिट्टी हटाई तो अंदर उन के बेटे कृष्णा की ही लाश निकली. लाश देखते ही वे लोग भी आश्चर्य में पड़ गए.

कुछ देर बाद सत्येंद्र ने थाना रसूलपुर पुलिस को अपने लापता बच्चे की लाश पाए जाने की सूचना दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय एसआई सविता सेंगर, कांस्टेबल कन्हैयालाल, अक्षय कुमार, वंदना कुमारी व रचना को साथ ले कर गांव बड़ा लालपुर के लिए रवाना हो गए. रवाना होने से पहले उन्होंने इस संबंध में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी अवगत करा दिया था.

जिस समय थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय बड़ा लालपुर दुर्गामाता मंदिर के पास पहुंचे, उस समय वहां लोगों की भारी भीड़ जुटी थी. वह उस जगह पहुंचे, जहां मासूम बालक लौकिक उर्फ कृष्णा का शव पड़ा था.

बच्चे का शव देख कर उन्हें आशंका हुई कि उस की हत्या गला दबा कर की गई होगी. शव से बदबू आ रही थी, जिस से लग रहा था कि उस की हत्या 2 दिन पहले ही कर दी गई थी. यानी जिस दिन कृष्णा का अपहरण किया गया उसी दिन उसे मार दिया गया. शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं थे, जिस से स्पष्ट था कि उस की हत्या तंत्रमंत्र के चलते नहीं की गई थी.

थानाप्रभारी अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसएसपी सचींद्र पटेल, एसपी (ग्रामीण) राजेश कुमार, एसपी (सिटी) प्रबल प्रताप सिंह तथा सीओ (सिटी) इंदुप्रभा घटनास्थल पर आ गईं. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने मृत बच्चे के मातापिता से भी बात की और उन्हें धैर्य बंधाया कि जल्द ही हत्यारा पुलिस की गिरफ्त में होगा.

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निरीक्षण के दौरान एसपी (सिटी) प्रबल प्रताप सिंह ने पाया कि जिस जगह बच्चे का शव दफन था, उसी के पास एक 2 मंजिला मकान था. उन के मन में शक पैदा हुआ तो उन्होंने उस मकान के बारे में पूछताछ की. पता चला कि वह मकान कृष्णा के ताऊ महेश कुमार का ही है.

डौग स्क्वायड टीम ने भी जांच शुरू की. खोजी कुतिया को घटनास्थल पर छोड़ा गया तो वह कृष्णा के शव को सूंघ कर महेश के मकान की ओर भागी. मकान की दूसरी मंजिल पर पहुंच कर कुतिया एक कमरे में जा कर भौंकने लगी.

टीम के सदस्यों ने कमरे की जांच की तो वहां उन्हें मानव सड़ांध महसूस हुई. टीम के सदस्यों को समझते देर नहीं लगी कि बालक कृष्णा की हत्या इसी कमरे में की गई फिर जब लाश से बदबू आने लगी तो लाश दफन कर दी गई.

डौग स्क्वायड टीम ने अपनी जांच से पुलिस अधिकारियों को अवगत कराया तो वे चौंके. एसपी (सिटी) प्रबल प्रताप सिंह व सीओ इंदुप्रभा ने मकान मालिक महेश यादव से पूछताछ की तो उस ने बताया कि मकान में वह अपनी पत्नी नीतू यादव तथा बेटे भानु के साथ रहता है.

उस की 10 वर्षीय बेटी गार्गी की 3 सितंबर को संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी. बड़ी बेटी रितु हरिद्वार में पढ़ती है. जमालपुर में हमारा शराब ठेका है. उसी ठेके पर हम तीनों भाई काम करते हैं. महेश कुछ देर मौन रहा फिर बोला, ‘‘सर, आप लोग मुझ से यह सब क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘इसलिए कि तुम्हारे भतीजे कृष्णा की हत्या तुम्हारे मकान में ही की गई थी.’’ एसपी (सिटी) ने कहा.

‘‘सर, यह आप क्या कह रहे हैं?’’ महेश बुरी तरह चौंका.

‘‘हम बिलकुल सही कह रहे हैं, इसलिए तुम्हें और तुम्हारी पत्नी नीतू को थाने चलना होगा. वहां सब स्पष्ट हो जाएगा.’’

इस के बाद पुलिस ने महेश व उस की पत्नी नीतू को हिरासत में ले लिया और महेश के मकान को सील बंद कर दिया ताकि कोई सबूतों से छेड़छाड़ न कर सके.

पुलिस ने कृष्णा के शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. उपद्रव की आशंका को देखते हुए अधिकारियों ने गांव में फोर्स भी तैनात कर दी.

पुलिस ने महेश तथा उस की पत्नी नीतू से दिन भर पूछताछ की लेकिन दोनों टस से मस नहीं हुए. महेश ने बताया कि कृष्णा उस का भतीजा था. वह उसे बेहद प्यार करता था. उसे कंधों पर बिठा कर खूब घुमाया था. उस की हत्या के बाबत वह सपने में भी नहीं सोच सकता.

मैं उस रोज ठेके पर ही था. साथ में सत्येंद्र और कुलदीप भी थे. आप उन दोनों से ही पूछ लीजिए. कृष्णा के लापता होने की खबर मिलने के बाद हम तीनों घर आ गए थे.

महेश के बयान से पुलिस अधिकारियों को लगा कि यदि वह सच बोल रहा है तो कातिल उस की पत्नी नीतू है. सीओ इंदुप्रभा ने नीतू से सख्ती से पूछताछ की.

कड़ी पूछताछ में नीतू टूट गई और उस ने मासूम बच्चे लौकिक उर्फ कृष्णा की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि देवरानी शशि द्वारा ताने मारे जाने से वह गुस्से से भर गई थी, फिर गुस्से में ही उस ने कृष्णा की हत्या कर दी थी. हत्या की जानकारी उस के पति महेश को नहीं थी. नीतू द्वारा जुर्म स्वीकार करने के बाद पुलिस ने महेश को थाने से घर भेज दिया.

क्रमश:

अंधआस्था पर मुहर

मशहूर खगोलविद, गणितज्ञ और दार्शनिक गैलीलियो पर रोमन कैथोलिक चर्च ने एक मुकदमा  दायर किया था जिस का फैसला 1633 में सुनाया गया था. गैलीलियो का दोष था कि उन्होंने ईसाइयों के पवित्र ग्रंथ में वर्णित धार्मिक मान्यता के चीथड़े न केवल उड़ा कर रख दिए थे बल्कि अपने कहे को तथ्यों से साबित भी कर दिखाया था कि सूर्य पृथ्वी के नहीं, बल्कि पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगाती है. इस गलती या गुस्ताखी पर उन्हें मौत की सजा होना तय थी. लेकिन, गैलीलियो बेवक्त इसलिए नहीं मरना चाहते थे क्योंकि वे अपने वैज्ञानिक शोध जारी रखना चाहते थे.

सो, अपने एक पादरी दोस्त की सलाह पर उन्होंने धार्मिक अदालत से सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली थी. इस से वे मृत्युदंड से तो बच गए थे लेकिन उन्हें अपने ही घर में आजीवन नजरबंद रहने की सजा भुगतनी पड़ी थी. उन की सजा में यह भी शामिल था कि वे 3 वर्षों तक हर हफ्ते पश्चात्तापसूचक भजन गाएंगे.

अब से कोई 400-500 वर्षों पहले धार्मिक कट्टरपंथ, पोंगापंथ, रूढि़वादिता और हर हाल में ईश्वर व धर्मग्रंथों को मानने, पालन करने की बाध्यता एक तरह से कानूनी हुआ करती थी. जो इसे नकारता था, तर्क दे कर इन मान्यताओं को खंडित करता था, उस का हश्र धर्म के ठेकेदारों द्वारा गैलीलियो जैसा कर दिया जाता था.

उस धार्मिक दबाव और छटपटाहट की देन थी एक वैज्ञानिक क्रांति जिस के केंद्र में गैलीलियो प्रमुखता से थे. उन्होंने जो खोजें और आविष्कार किए वे आज वैज्ञानिक तथ्यों के रूप में मान्य और स्थापित हैं. दुनिया का हर छात्र प्राथमिक कक्षाओं में ही यह पढ़ लेता है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है. यह, हालांकि, वैज्ञानिक निकोलस कौपरनिकस की थ्योरी थी लेकिन इसे साबित गैलीलियो ने किया था.

फिर लगभग 360 वर्षों बाद 1992 में पोप जौन पौल द्वितीय के समय में वैटिकन के अधिकारियों ने इस फैसले में चर्च की गलती स्वीकार की थी.

इस मामले से साबित यह हुआ था कि अगर कोई भी वैज्ञानिक तर्कों और आविष्कारों के आधार पर भी धार्मिक मान्यताओं या धर्मग्रंथों को गलत साबित करेगा तो धर्म के ठेकेदार उसे बख्शेंगे नहीं. भले ही बोलने वाला सच क्यों न बोल रहा हो. यह रिवाज या मानसिकता आज भी कायम है कि अगर आप धर्म के खिलाफ कुछ भी बोलेंगे तो नास्तिक, अधर्मी करार देते बहिष्कृत कर दिए जाएंगे. इस के बाद भी, जो लोग अंजाम की परवा किए बगैर बोलते हैं, दरअसल, वही विकास, प्रकाश और वास्तविकता से धर्मांध लोगों को परिचित कराते हैं.

ऐसा नहीं होता तो यह दुनिया पूरी तरह धर्म के ठेकेदारों के हाथों की कठपुतली बनी होती. यह स्थिति हालांकि आज भी है पर बहुतकुछ बदला भी है और काफीकुछ बदलना अभी बाकी है. इस के लिए जरूरी शर्त यह है कि लोग वास्तविकता पहचानें और अंधश्रद्धा के सहारे जिंदगी न गुजारें, जिस के चलते दुनियाभर में सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत पिछड़ापन भी है.

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भिन्न नहीं यह फैसला

9 नवंबर, 2019 को देश की सर्वोच्च अदालत ने अयोध्या मामले पर जो फैसला सुनाया वह गैलीलियो के मामले से बहुत ज्यादा भिन्न नहीं है. गैलीलियो के मामले में फैसला सुनाने वाली अदालत में 8 धार्मिक जज थे जबकि अयोध्या के मामले में फैसला करने में 5 लोकतांत्रिक जज थे. इन की और उन की आस्था में केवल शब्दों का अंतर है. चूंकि मुकदमे के स्वभाव अलग हैं, इसलिए भिन्नता दिखती है, वरना फैसले का आधार तो दोनों में यह आस्था ही है कि चूंकि रामायण में लिखा है और बहुसंख्यक हिंदू मानते हैं कि राम का जन्म अयोध्या में ही हुआ था और वहां बाद में मुगल शासक बाबर के काल में मसजिद बनाई गई थी, इसलिए मुसलिम पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला कर दिया कि हिंदू पक्ष सही कह रहा है.

बात आस्था के मसले तक सिमटी नहीं रही, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह 3 महीने के भीतर एक ट्रस्ट बना कर मंदिर निर्माण कराए.

निश्चितरूप से अपनी गरिमा बनाए रखने की कोशिश या गरज ही इसे कहा जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह जोर दे कर कहा कि उस ने यह फैसला आस्था के नहीं, बल्कि सुबूतों के आधार पर लिया है. क्या यह कहना ही अदालत की ग्लानि या अपराधबोध को नहीं दर्शाता है? सुप्रीम कोर्ट का अपराधबोध तो इस बात से भी  झलकता है कि उस ने आदेश दिया कि अवैध रूप से मसजिद को गिराए जाने के मुआवजे के रूप में सरकार मसजिद निर्माण के लिए मुसलमानों को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन भी दे.

गैलीलियो को कैथोलिक चर्च ने मौत की सजा से इसलिए भी बख्श दिया था कि वे एक कैथोलिक ईसाई थे और उन्होंने पवित्र ग्रंथ की गलत थ्योरी अपनी किताब ‘गैलीलियो गैलिलो का संवाद’ में स्वीकार ली थी जिसे बाद में चर्च ने प्रतिबंधित कर दिया था.

अयोध्या मामले में विवाद या  झगड़ा सूर्य और पृथ्वी की परिक्रमा का नहीं, बल्कि अयोध्या की 2.77 एकड़ जमीन पर आधिपत्य का था, जिसे ले कर दोनों पक्षों ने तरहतरह के तर्क रखे, धर्मग्रंथों का हवाला दिया और गवाह भी पेश किए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उस के फैसले का आधार पुरातात्विक प्रमाण और विदेशियों के यात्रा वृत्तांत हैं.

चूंकि यह विवाद या मुकदमा सालों से लंबित था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को कोई न कोई फैसला सुनाना ही था, वह भी इस तरीके से कि उस पर पक्षपात, किसी धर्मविशेष के प्रति पूर्वाग्रह या आस्था का आरोप न लगे. सो, उस ने फैसला सुना दिया.

फैसला वैसा ही आया जिस की उम्मीद बहुसंख्यक हिंदू कर रहे थे और कह भी रहे थे कि फैसला हिंदुओं के पक्ष में ही आएगा. 5 अक्तूबर को गोरखपुर में आयोजित एक रामकथा में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो साफतौर पर कह भी दिया था कि जल्द ही खुशखबरी मिलेगी. यही बात समयसमय पर कई हिंदूवादी नेताओं ने कही थी.

क्या है विवाद और क्या है फैसला और क्या होंगे इस के तात्कालिक व दीर्घकालिक प्रभाव, ये बातें अब फैसले से ज्यादा अहम हो चली हैं. फैसले से हिंदुओं का धार्मिक अहं तो तुष्ट हुआ है लेकिन इस से या इस के एवज में उन्हें व्यावहारिक तौर पर मिल क्या रहा है और छिन क्याक्या रहा है, इन बातों पर हालफिलहाल कोई गौर नहीं कर रहा. दरअसल, धर्म और आस्था की यही खासीयत होती है कि वह अपनी मान्यताओं की बाबत सहमति चाह कर ही संतुष्ट होता है.

यकीन मानें, अगर देश आजाद हुआ होता पर संविधान न बना होता और लोकतंत्र की स्थापना न हुई होती तो फैसला सुप्रीम कोर्ट के जज नहीं, बल्कि पादरियों की तर्ज पर मठाधीश, चारों पीठों के शंकराचार्य कर रहे होते और वे भी वही कहते जो अदालत ने कहा. ऐसा ईरान में हो भी रहा है. फेरबदल और फर्क सिर्फ भाषा का होता, वरना तो भाव आस्था के ही होते.

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आस्था पर विरोधाभास

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेहद बारीकी से देखने के बाद यह आभास होता है कि आस्था को ले कर वह खुद विरोधाभास का शिकार है, इसे उस के ही फैसले के कई बिंदुओं से सम झा जा सकता है. कुछ बिंदु ये हैं-

१.     ढहाए गए ढांचे के नीचे एक मंदिर था, इस तथ्य की पुष्टि आर्कियोलौजिकल सर्वे औफ इंडिया यानी एएसआई कर चुका है. पुरातात्विक प्रमाणों को महज ओपिनियन करार देना एएसआई का अपमान होगा. हालांकि, एएसआई ने यह तथ्य स्थापित नहीं किया है कि मंदिर को गिरा कर मसजिद बनाई गई.

२.     एएसआई के साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि मसजिद को खाली जगह पर नहीं, किसी दूसरे निर्माण की जगह बनाया गया था. मसजिद के नीचे जो ढांचा था वह इसलामिक नहीं था.

३.     हिंदू विवादित स्थान को भगवान राम का जन्मस्थान मानते हैं, यहां तक कि मुसलिम भी विवादित जगह के बारे में यही कहते हैं.

४.     सुबूत मिले हैं कि अंगरेजों के शासनकाल से पहले राम चबूतरा और सीता रसोई पर हिंदू पूजा करते थे.

५.     प्राचीन यात्रियों द्वारा लिखी गई किताबें और प्राचीन ग्रंथ इस बात को दर्शाते हैं कि अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि रही है. इतिहास से भी संकेत मिलते हैं कि हिंदुओं की आस्था में अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि रही है.

६.     जमीन पर विराजमान रामलला का अधिकार है, लेकिन जमीन सरकार को दी जाएगी. वह 3 महीने में एक ट्रस्ट बनाए और फिर मंदिर बनवाए.

इन बिंदुओं को छोड़ कर अदालती फैसले में कहीं कोई शंका या  झं झट नहीं है, मसलन शिया वक्फ बोर्ड यह साबित नहीं कर पाया कि जमीन पर उस का मालिकाना हक था और निर्माेही अखाड़ा भी मालिकाना हक की बाबत पुख्ता सुबूत नहीं दे पाया.

बिंदु क्रमांक 2 और 3 में तो अदालत पुरातात्विक साक्ष्यों की बात कह रही है लेकिन 3, 4 और 5 में सिर्फ आस्था की बात कर रही है. फिर फैसले का आधार आस्था नहीं, सुबूत को बता रही है. ऐसे में शक होना स्वाभाविक है कि क्यों उसे बारबार आस्था का जिक्र करना पड़ा.

ऐसा नहीं है कि इस फैसले का तार्किक विरोध न हो रहा हो. जानेमाने इतिहासकार डी एन  झा फैसले को निराशाजनक बताते कहते हैं कि फैसले में हिंदुओं की आस्था को अहमियत दी गई है और फैसले का आधार ‘दोषपूर्ण पुरातत्व विज्ञान’ को बनाया गया है. डी एन  झा का कहना इसलिए भी माने रखता है कि वे उन 4 इतिहासकारों की टीम में से एक हैं जिन्होंने ‘रामजन्म भूमि बाबरी मसजिद ए हिस्टौरियंस रिपोर्ट टू द नेशन’ को तैयार कर सरकार को सौंपा था. उस रिपोर्ट में साफतौर पर उस मान्यता को खारिज कर दिया गया था जिस के तहत यह कहा जाता है कि बाबरी मसजिद के नीचे एक हिंदू मंदिर था.

लेकिन साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी मान लिया है कि यह कोर्ट संवैधानिक आधार पर आधारित है और इसे धार्मिक अवधारणाओं की व्याख्या या उन पर प्रश्नचिह्न उठाने के लिए प्रेरित करना धर्मावलंबियों की आस्थाओं पर सवाल उठाना होगा जो अनुच्छेद 25 के विरुद्ध होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धार्मिक आस्थाएं धर्म को मानने वाले के व्यक्तिगत क्षेत्र में आती हैं और सुप्रीम कोर्ट का धर्मविवेचना में पड़ना गलत होगा, यानी, आस्था को अब सुप्रीम कोर्ट की पूरी स्वीकृति मिल गई है. सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि अदालतें एक व्यक्ति के (अंध) विश्वास का परीक्षण नहीं कर सकतीं.

रिमोट से संचालित होते लोग

मुकदमे की सुनवाई खत्म होने से पहले ही हिंदूवादी नेताओं और धर्मगुरुओं ने आम लोगों  से यह अपील करनी शुरू कर दी थी कि फैसला जो भी आए वे शांति, सद्भाव और भाईचारा बनाए रखें और सोशल मीडिया पर द्वेष फैलाने वाली पोस्ट न तो डालें और न ही वायरल करें. 7 नवंबर को जब यह तय सा हो गया कि फैसला 9 नवंबर को आएगा तो इन अपीलों की तादाद बढ़ गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी आशय की अपील की.

इस अपील का चमत्कारिक असर हुआ और लोग खुद सोशल मीडिया पर एकदूसरे को सम झाते नजर आए कि किसी की जीतहार नहीं होनी है, हमें सांप्रदायिक सद्भाव, भाईचारा बनाए रखना है. इकलौती सुखद बात यह रही कि वाकई कोई अप्रिय घटना नहीं हुई. देश के चप्पेचप्पे पर खासतौर से उत्तर प्रदेश और अयोध्या में पुलिस तैनात रही.

लोगों ने अपनी तरफ से सब्र दिखाते ऐसा कुछ नहीं किया तो सहज लगा कि जनता अब रिमोट से कंट्रोल होने लगी है. कहने का मतलब यह नहीं कि कोई उपद्रव होना ही चाहिए था, बल्कि यह है कि लोगों ने खासतौर से नरेंद्र मोदी की बात उसी तरह मानी जैसे 15वीं सदी में इटली और यूरोप में पोप की बात ईश्वरीय आदेश मानी जाती थी. ऐसा ही नोटबंदी के दौरान हुआ था कि नरेंद्र मोदी को सार्वजनिक मंच से रोते देख लोगों ने विरोध छोड़ कर बैंकों की लाइन में लग कर नोट बदलने का फैसला लिया था. जीएसटी लागू होने के बाद व्यापारियों ने भी उम्मीद के मुताबिक विरोध नहीं किया, फिर भले ही आज तक वे जीएसटी को रोते झींकते रहते हैं.

अपने आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जन्मस्थली को कानूनी मान्यता मिलने के बाद भी हिंदुओं ने जश्न नहीं मनाया, आतिशबाजी नहीं छुड़ाई और न ही मुसलमानों पर कटाक्ष किए. तो साफ है कि लोगों की चेतना एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह हो गई है. कल्पना ही की जा सकती है कि अगर फैसला हिंदुओं के पक्ष में नहीं आता, तो वे क्या करते? क्या खामोशी से इसे स्वीकार लेते या फिर से सड़कों पर हाहाकार करते नजर आते?

दिख यह भी रहा है कि लोग अपने विवेक से कुछ नहीं सोच पा रहे हैं. बातबात पर तर्क करने वाले कट्टरपंथी हिंदुओं की हिम्मत यह पूछने की नहीं हुई कि हम क्यों जश्न न मनाएं और जरूरी नहीं कि जश्न के माने दंगे या हिंसा ही होते हों. निश्चितरूप से हिंदुओं को यह संदेशा दिया गया था कि फैसला तो हमारे ही हक में है, जिस का जश्न मनाने के लिए तो जिंदगी पड़ी है. इसलिए यह आरोप अपने पर न लिया जाए कि यह धर्म की जीत है, आस्था का सम्मान है और हिंदू राष्ट्र निर्माण की छत पर पहुंचने की एक और सीढ़ी है.

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शांति, भाईचारे और सद्भाव की शाकाहारी अपीलों से मुसलमान जरूर दहशत में आ गए और यही हिंदूवादियों की जिद भी थी कि वे कुछ न बोलें. इस के बाद भी व्हाट्सऐप पर कुछेक पोस्ट इस आशय से वायरल हुईं जो आज नहीं तो कल बड़े फसाद की वजह बन सकती हैं.

बड़ी संख्या में लोग अगर अपनेआप को जब्त किए रहे तो यह नरेंद्र मोदी के आदेश का पालन ही था जिस की मियाद खत्म होते ही कट्टर हिंदूवादी ऐसी पोस्टें इफरात से डालेंगे. नरेंद्र मोदी का डर या लिहाज, कुछ भी कह लें, उन्हें ज्यादा दिनों तक चुप नहीं रख पाएगा.

चिंता की दूसरी बात नरेंद्र मोदी का वह सम्मोहन है जो लोगों को बोलने से रोकता है. यह एक नए किस्म की इमरजैंसी है जिस में लोग वही बोलते और करते हैं जैसा कि उन का शासक चाहता है और इस के अपने अलग माने भी होते हैं. यह सिनैरियो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से तो मेल खाता कतई नहीं लगता.

अयोध्या फैसले पर शांति और चुप्पी स्वागतयोग्य है, लेकिन इस शर्त और सूरत पर कि आगे कभी धार्मिक हिंसा का दोहराव न हो. लेकिन हिंदू ऐसा कर पाएंगे, इस में शक है. क्योंकि बात आखिरकार धर्म की है, जो खामोश रहने को कम कहता है, चिल्लाने और मारकाट के लिए ज्यादा उकसाता है.

क्या बौखलाई हुई है भाजपा

इत्तफाक से यह वह वक्त था जब महाराष्ट्र में सरकार के गठन पर भाजपा और शिवसेना में घमासान मचा हुआ था. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे न तो भाजपा का लिहाज कर रहे थे और न ही मोदीशाह की जोड़ी का. रामलक्ष्मण का हनुमान रूठ कर दूसरे पाले में जा बैठा था.

हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में भाजपा को उम्मीद के मुताबिक सीटें नहीं मिली थीं जबकि माना यह जा रहा था कि मई के लोकसभा वाले नतीजों का दोहराव इन राज्यों में होगा. कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को बेहद कमजोर कर दिए जाने का फायदा इन राज्यों मेें मिलने की उम्मीद भाजपा को स्वभाविक रूप से थी, जो नहीं मिली.

यह एक चौंका देने वाली बात भगवा खेमे के लिहाज से है कि क्यों कश्मीर का दांव अपना असर नहीं दिखा पाया. दरअसल, लोग अब सरकार के धार्मिक फैसलों से चुनावी इत्तफाक कम रख रहे हैं यानी उन्हें अपनी समस्याएं और नरेंद्र मोदी के किए दूसरे वादे याद आने लगे हैं. इस लिहाज से भाजपा को  झारखंड और दिल्ली विधानसभा के चुनावों में भी अयोध्या फैसले का फायदा मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही. इस फैसले के आने के बाद भी शिवसेना के उद्धव ठाकरे के भाजपा के प्रति नाराजगीभरे तेवर कम नहीं हुए.

लोगों ने नरेंद्र मोदी के कहने पर कोर्ट के फैसले पर तो चुप्पी रखी लेकिन जिस तरह हरियाणा और महाराष्ट्र में अपील के मुताबिक वोट और सीटें नहीं दीं, यही ट्रैंड अगर आगे भी कायम रहा तो भाजपा को लेने के देने पड़ जाएंगे.

7 नवंबर को नरेंद्र मोदी सिखों के लिए पाकिस्तान द्वारा खोले गए करतारपुर कौरिडोर का उद्घाटन कर रहे थे और 9 नवंबर को अयोध्या फैसले पर अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे. ये दोनों ही धर्म से जुड़े काम हैं.

पर अधिसंख्य लोग धर्मकर्म की राजनीति से ऊबने लगे हैं. उन्हें न तो तीन तलाक और अनुच्छेद 370 से ज्यादा सरोकार रह गया है और न ही अयोध्या फैसले से है. जाहिर है इस की वजह लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी और लोगों की दीगर समस्याएं हैं जिन्हें सुल झाने की जिम्मेदारी उन्होंने सरकार को दी है. यह और बात है कि लोगों को इस का एहसास 6 साल बाद हो रहा है.

ताबड़तोड़ तरीके से धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करना भाजपा की घबराहट को ही दर्शाता है. इसलिए वह बारबार फिर धर्म में इस का हल ढूंढ़ने की गलती दोहरा रही है. ठीक वैसे ही जैसे वैदिक काल में राजेमहाराजे राज्य पर कोई संकट आते ही ऋषिमुनियों की शरण में भागते थे कि महाराज, कुछ करो.

वे ऋषिमुनि तब के राजा को हिम्मत बंधाते थे कि वत्स फलां यज्ञ कर डालो, इस के प्रताप से तुम्हारा और राज्य का संकट दूर हो जाएगा. होता यह था कि राजा पूरे ताम झाम और  झांकी के साथ यज्ञहवन कर लेता था और प्रजा भी उस में आहुतियां डालने के लिए शामिल हो जाती थी. इस से संकट दूर नहीं होता था, मगर लोग संकट को भूल जरूर जाते थे.

अब ऐसा नहीं हो पा रहा. तो सरकार घबराई है कि क्या करे. जिस करिश्माई तरीके से अयोध्या का फैसला आया है वह भी लोगों को कायल नहीं कर सका कि इस का फायदा भाजपा 2024 के चुनाव में उठा पाएगी या फिर उस के हिंदूवादी एजेंडे में कुछ और भी है. अगर नहीं है तो तय है कि 2024 के आम चुनाव हरियाणा और महाराष्ट्र की तर्ज पर होंगे जिन में मूल्यांकन सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर होगा और इस बाबत सरकार के पास ऐसा कुछ नहीं है जिसे गिना कर वह फिर सत्ता में वापसी कर सके.

2014 में नरेंद्र मोदी ने लोगों से वादा किया था कि हरेक के खाते में 15-15 लाख रुपए आएंगे. हर साल 2 करोड़ बेरोजगारों को रोजगार की व्यवस्था की जाएगी और किसानों को उन की उपज का वाजिब दाम मिलेगा और राममंदिर का निर्माण भी होगा.

मंदिरनिर्माण का वादा तो फैसले के साथ पूरा हो गया जिस से किसी को कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं हो रहा है. अब लोग सोच और पूछ रहे हैं कि रोजगार के मुद्दे पर क्या, खेतीकिसानी को मुनाफे का धंधा बनाने के वादे का क्या…

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इन सवालों, जो तेजी से बड़े पैमाने पर पूछे जाने वाले हैं, से नरेंद्र मोदी की घबराहट अयोध्या के फैसले के बाद भी व्यक्त हुई थी कि अब राष्ट्रनिर्माण होगा. यानी, क्या 6 साल धर्मनिर्माण होता रहा? उसे ले कर संतुष्ट होना तो दूर की बात है, लोग सरकार की नीतियांरीतियां देखते कतई आश्वस्त नहीं हैं कि रोजरोज पूजापाठ, गंगा आरती, खर्चीली मूर्तियों की स्थापना, गौपूजा और दूसरे धार्मिक कार्यों से यह संभव हो पाएगा.

और जो कुछ लोग यानी भक्तगण नरेंद्र मोदी से खुश हैं उन की संख्या नाराज लोगों के मुकाबले इतनी नहीं है. दूसरी बार गद्दी पर बैठने की बड़ी वजह बालाकोट एयरस्ट्राइक और मायावती के प्रधानमंत्री बन जाने की संभावना थी. लेकिन, काठ की हांडी तो हर बार कांग्रेस की भी नहीं चढ़ी थी, तो भाजपा की चढ़ेगी, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं.

अनिष्ट करती आस्था

हकीकत तो यह है कि देश का माहौल ही आस्थामय हो रहा है. हर कहीं भजनकीर्तन, पूजापाठ, यज्ञहवन और तरहतरह के कर्मकांड होते दिखना रोजमर्रा की बात है. इस प्रभाव से न तो विदेशी यात्री अछूते रहे थे और न ही कोई अदालत रह सकती थी और इस में उस की गलती भी नहीं क्योंकि आस्था नाम की यह चीज औक्सीजन जैसी हो गई है.

यही आस्था जब धार्मिक होती है तो अनुयायियों की जिंदगी तरहतरह से दुश्वार कर देती है. लोग  झूठ को सच मानते गले से लगाए रहते हैं. पीढ़ीदरपीढ़ी यह आस्था स्थानांतरित होती रहती है और जब टूटती है तो लोग सकपका उठते हैं कि अब क्या करें. हम जिसे मुद्दत से सच मान रहे थे वह तो  झूठ निकला. नतीजतन, अधिकतर लोग तो उसी  झूठ यानी धार्मिक फरेब में जीना पसंद करते हैं.

यही लोग, दरअसल, खुलेपन और खुलेदिमाग से घबराते हैं. इस से सब से बड़ा नुकसान यह होता है कि कुछ विशेष जाति के लोग धर्म के नाम पर दुकान चला रहे हैं. इन की रोजीरोटी यही सामूहिक अंधआस्था है और राम का जन्म अयोध्या में ही हुआ था, यह जिद इसी के दायरे में आती है.

अगर राम का जन्म कानूनीतौर से अयोध्या में हुआ माना गया तो धर्मग्रंथों से जुड़ी हर बात अपनेआप

ही स्वीकार्य हो जाएगी, मसलन वर्णव्यवस्था, पिछले जन्म के पाप, पुण्य, भूत, प्रेत, पिशाच, गंधर्व और जाने क्याक्या जिन्हें बेहूदी, बकवास, आज के वैज्ञानिक युग में, कहने से कोई परहेज या लिहाज किए जाने की कोई वजह सम झ नहीं आती.

मान यह भी लेना चाहिए कि ‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी ये सब ताड़न के अधिकारी’ वाला दोहा भी सच है. हिंदुओं को इसे फिर से जीवन में चरितार्थ करना चाहिए (हालांकि यह अभी भी बहुतायत से होता है, इस बाबत आस्थावान लोग किसी अदालत के मुहताज नहीं हैं).

जानेअनजाने सुप्रीम कोर्ट या कानून, कुछ भी कह लें, इन कामों में भागीदार बन गया है, वरना सुप्रीम कोर्ट के पास फैसले की बाबत और भी विकल्प थे. मसलन, वह यह कहते भी मुकदमे का फैसला दे सकता था कि विवादित स्थल हिंदुओं का ही है, मुसलमानों का नहीं.

निश्चितरूप से इस से भी मंदिरमसजिद विवाद खत्म हो जाता जो हिंसा और फसाद की असल वजह और जड़ रहा है. यह बात सोची जानी जरूरी है कि क्या लोकतंत्र में अदालतों को धर्मस्थल बनाने का निर्देश या आदेश सरकार को देना चाहिए? क्या सरकार के पास करने को कुछ और नहीं?

पूजापाठ को बढ़ावा

कोई शक नहीं है कि आजादी के बाद तमाम सरकारों ने जम कर पूजापाठ किया है. लेकिन भाजपा राज में यह बेतहाशा बढ़ा है. सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण कांग्रेस युग में हुआ था. सरकार की पंडापुरोहितवाद को बढ़ाने की मंशा किसी सुबूत की मुहताज नहीं. उलटे, यह तो उस की पहचान बन चुकी है.

अब शायद कुछ लोगों को एहसास हो रहा है कि सरकार और हालात गलत दिशा में जा रहे हैं. मुमकिन है कि कल को और भी लोगों को यह लगे. लेकिन तब तक देश का काफी नुकसान हो चुका होगा.

राष्ट्रनिर्माण अगर देवीदेवताओं, मूर्तियों, जन्मभूमि, मंदिरों से होता तो हिंदू हजारों साल गुलामी ढोने को मजबूर नहीं होते. कड़वा सच तो यह है कि हिंदुओं की सब से बड़ी कमजोरी उस में पसरी वर्णव्यवस्था है जो लोगों को आपस में बांटती रही है. संविधान निर्माण के समय इस को किनारे करने की कोशिश की गई थी लेकिन अब वैदिककालीन व्यवस्थाएं फिर सिर उठाती दिख रही हैं. लगता है कि एक ज्वालामुखी फिर से धधकना शुरू हो गया है, जो जिस दिन फटेगा तो न जाने क्या होगा.

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अयोध्या में भव्य राममंदिर बनेगा, लेकिन यह मंदिर अघोषित तौर पर ब्राह्मणों और क्षत्रियों के लिए होगा. वैश्य समुदाय के संपन्न लोगों को भी यहां आने दिया जाएगा क्योंकि वे भारीभरकम चढ़ावा चढ़ा सकते हैं.

ऐसा बड़े षड््यंत्रपूर्वक तरीके से किया जाएगा कि निरुत्साहित दलित, पिछड़े अपनी बदहाली को नियति मानते उन देवीदेवताओं की जयजयकार करते रहें जो जाति की श्रेष्ठता के मुताबिक उन के हाथ में पकड़ा दिए गए हैं. तिरुपति बालाजी का मंदिर ट्रस्ट बेवजह अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए एक करोड़ रुपए नहीं दे

रहा है, बल्कि यह वैष्णव संप्रदाय के प्रचारप्रसार के लिए है जो राममंदिर से ही संभव है. तिरुपति के मंदिर में दलित, पिछड़े न के बराबर जाते हैं क्योंकि उन की हिम्मत ही इस ओर, इस तरह के भव्य मंदिरों में जाने की नहीं होती. जहां दर्शन करने के लिए मोटा शुल्क देना पड़ता है.

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ब्लड प्रेसर को रखना हो ठीक तो अपनाएं ये टिप्स

आजकल हमारा लाइफस्टाइल ऐसा हो गया है कि हम खुद का भी ध्यान नहीं रख पाते हैं, ऐसे में हमारी लापरवाही कई बीमारियों को बुलावा देती है. ब्लड प्रेसर भी ऐसी ही एक आम बीमारी बनती जा रही है, किसी को हाई तो किसी को लो ब्लड प्रेसर की परेशानी आम बात है. इससे बचने के लिये जरूरी है कि हमें अपने खानपान का ध्यान रखते हुए हम ऐसी बीमारियों से खुद को बचा सकें क्योंकि ये बीमारियां सुनने में तो कौमन लगती हैं लेकिन इनके जरिये हम जानलेवा बिमारियों के शिकार जल्दी हो जाते हैं.

उच्च रक्तचाप क्या है

अगर आपका ब्लड प्रेशर 140/90 mmHg या उससे अधिक रहता है तो आप हाई ब्लड प्रेशर के मरीज हैं. हाई ब्लड प्रेशर का समय पर न ईलाज किया जाएं तो यह दिल की बीमारी, किडनी प्रौब्लम आदि गंभीर समस्याओं को पैदा कर देता है. इससे बचने के लिए पोटैशियम, मैग्नीशियम और कैल्शियम से भरपूर खाद्य पदार्थो का सेवन करना बहुत जरूरी हैय

कैसे क रें हाई ब्लड प्रेसर को कन्ट्रोल

चकुंदर का सेवन जरूर करें. क्योंकि इसमें विटामिन सी, फाइबर तथा पोटाशियम पोषक तत्व पाए जाते हैं. इसे सलाद, सूप और जूस के रूप में भोजन में शामिल करें.

ओट्स में फाइबर काफी मात्रा में होता है जो ब्लड प्रेशर और खराब कोलस्ट्राल को कम करता है.

लहसुन हाई ब्लड प्रेसर को कम करता है इसे अपने भोजन में अवश्य शामिल करें.

डार्क चौकलेट में मैग्नीशियम अधिक मात्रा में होता है जो कि हाई ब्लड प्रेसर को कनट्रोल करने में मदद करता है.

अलसी के बीज के सेवन से हाई ब्लड प्रेसर की समस्या में तो आराम मिलता ही है साथ ही ह्रदय रोगों से भी बचता है.

हाई ब्लड प्रेसर के मरीजों को नमक का सेवन बहुत कम करना चाहिए.

शराब धम्रपान या अधिक कौफी  का सेवन हाई ब्लड प्रेसर के मरीज को नहीं करना चाहिए.

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लो ब्लड प्रेसर

लो ब्लड प्रेशर को हाइपोटेंशन भी कहा जाता है. जब रक्तचाप 90 /60 mmHg से कम होता है तो उसे लो बी पी कहा जाता है. ह्रदय, मस्तिष्क और शरीर के अन्य भागों में पर्याप्त रक्त न पहुंच  पाने के कारण ही बी पी लो होता है. चककर  आना, घबराहट होना व पैरों का लड़खड़ाना इसके सामन्य लक्षण हैं.

कैसे करें लो ब्लड प्रेसर को नार्मल 

संतुलित आहार है बेहद जरूरी. अपनी डाइट में कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटैशियम को लेना न भूलें.

बी पी लो होने पर ब्लैक कौफी पिएं, उससे बी पी नार्मल हो सकता है.

ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थ लें जैसे नारियल पानी, आम पन्ना, आनार का जूस और बेल के शरबत का  सेवन करें व् दिन में कम से कम 8 गिलास पानी अवश्य पियें.

ऐसे में निर्जलीकरण,पोषण तत्वों की कमी, ह्रदय की समस्या, रक्त की कमी, एंडोक्राइन विकार और न्यूरोलौजिकल संबंधित बीमारियां हो सकती हैं.

इस तरह के मरीजों को थोड़ा थोड़ा कर के खाना चाहिये एक साथ ज्यादा खा लेने से आपके शरीर को भोजन पचाना आसान नहीं होता.

ज्यादा देर आउटडोर एक्सरसाइज करने से बचें.

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मध्यांतर भी नहीं हुआ अभी : भाग 1

कब के बिछड़े हुए सोम और चंद्रा ऐसे मिलेंगे, दोनों ने कभी सोचा भी नहीं था. स्थितियां कितनी बदल गई थीं. लेकिन सोम का दिल आज भी वही महसूस कर रहा था जो बरसों पहले चंद्रा के लिए महसूस करता था.

‘‘आप का परिवार कहां है, सोम? अब तो बच्चे बड़े  हो गए होंगे. मैं ने तो सोचा भी नहीं था, इस तरह अचानक हमारा मिलना हो जाएगा.’’

‘‘सब के सामने आप यह कैसा सवाल पूछने लगी हैं, चंद्राजी. कहां के बच्चे… कैसे बच्चे…अभी तो हमारी उम्र खेलनेखाने की है.’’

चंद्रा के चेहरे की मुसकान फैलतेफैलते रुक गई. उस ने आगेपीछे देखा मानो जो सुना उसी पर अविश्वास करने के लिए किसी का समर्थन चाहती हो. उस ने गौर से मेरा चेहरा देखा और बोली, ‘‘अरे भई, बाल काले कर लेना कोई बड़ी बात नहीं. उम्र छिपा कर दिखाओ तो मानें. आंखों का बढ़ता नंबर और चाल में आए ठहराव को छिपाया नहीं जा सकता. हां, अगर अपना नाम ही बदल लो तो मैं मान लूंगी कि पहचानने में मैं ही भूल कर गई हूं. आप सोम नहीं हैं न?’’

चंद्रा के शब्दों का तर्क आज भी वही है जो बरसों पहले था. वह आज भी उतनी ही सौम्य है जितनी बरसों पहले थी. बल्कि उम्र के साथ पहले से भी कहीं ज्यादा गरिमामय लग रहा है चंद्रा का स्वरूप. मुसकरा पड़ा मैं. हाथ बढ़ा कर चंद्रा का सर थपथपा दिया.

‘‘याद है तुम मुझे क्या कहा करती थीं जब हम पीएच.डी. कर रहे थे. वह आदत आज भी बदली नहीं. निहायत निजी बातें तुम सब के सामने पूछने लगती हो…’’

‘‘पहचान लिया है मैं ने. आज भी मेरे पापा की तरह सर थपथपा रहे हो. तब भी तुम मुझे मेरे पापा जैसे लगते थे…आज भी वैसे ही हो…तुम जरा भी नहीं बदले हो, सोम.’’

20-22 साल पुरानी दोस्ती और सौहार्द्र आंखों में नमी बन कर तैरने लगा था. सुबह से सेमिनार में व्यस्त था. पहचान तो बहुत लोगों से थी लेकिन कोई अपना सा पा कर यों लगने लगा है जैसे बुझते दिए में किसी ने तेल डाल दिया हो.

‘‘तुम कहां ठहरी हो, चंद्रा?’’

‘‘यहीं होस्टल में ही हमारा इंतजाम किया गया है.’’

‘‘भूख नहीं लगी तुम्हें, 7 बज रहे हैं. आओ, चलो मेरे साथ…कुछ खा कर आते हैं.’’

मैं ने कहा तो साथ चल पड़ी चंद्रा. हम ने टैक्सी पकड़ी और 5-10 मिनट बाद ही हम उसी जगह पर खडे़ थे जहां अकसर 20-22 साल पहले हमारा गु्रप खानेपीने आया करता था.

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‘‘क्या खाओगी, चंद्रा, बोलो?’’

‘‘कुछ भी हलकाफुलका मंगवा लो. भारी खाना मुझे पचता नहीं है.’’

‘‘मैं भी मीठा नहीं ले पाऊंगा, शुगर का मरीज हूं. इसीलिए भूख सह नहीं पाता. मुझे घबराहट होने लगती है.’’

डोसा और इडली मंगवा लिया चंद्रा ने. कुछ पेट में गया तो शरीर की झनझनाहट कम हुई.

‘‘तुम्हें खाने की कोई चीज पास रखनी चाहिए थी, सोम.’’

‘‘क्या पास रखनी चाहिए थी? यह देखो, है न पास में. अब क्या इन से पेट भर सकता है?’’

जेब से मीठीनमकीन टाफियां निकाल सामने रख दीं मैं ने. दोपहर में खाना खाया था. उस के बाद सेमिनार इतना लंबा ख्ंिच गया कि शाम के 7 बज गए. 6 घटे में क्या मेरी तबीयत खराब नहीं हो जाती.

मुसकरा पड़ी चंद्रा, ‘‘इस का मतलब है अब हम बूढे़ हो गए हैं. तुम्हें शुगर है, मेरा जिगर ठीक से काम नहीं करता. लगता है हमारी एक्सपायरी डेट पास आ रही है.’’

‘‘नहीं तो, ऐसा क्यों सोचती हो. हम बूढे़ नहीं हो रहे बडे़ हो रहे हैं, ऐसा सोचो. जीवन का सार हमारे सामने है. बीता कल अपना अनुभव लिए है जिस का उपयोग हम भविष्य को सुधारने में लगा सकते हैं.’’

पुरानी बातों का सिलसिला चला और खूब चला. चंद्रा के साथ विश्वविद्यालय के भव्य पार्क में हम रात 10 बजे तक बैठे रहे.

‘‘अच्छा समय था वह भी. बहुत याद आता है वह एकएक पल,’’ ठंडी सांस ली थी चंद्रा ने.

‘‘क्या बीता समय लौटाया नहीं जा सकता?’’

‘‘हमारे बच्चे हमारा बीता कल ही तो हैं, जो हमें नहीं मिला वह बच्चों को दिला कर हम अपनी इच्छा की पूर्ति कर सकते हैं. जीवन इसी का नाम है…पुराना गया नया आया.’’

मुझे होटल तक पहुंचतेपहुंचते साढ़े 10 बज गए. मैं थक गया हूं फिर भी मन प्रफुल्लित है. अपनी सहपाठी से जो मिला हूं इतने बरसों बाद. बहुत अच्छी दोस्ती थी मेरी चंद्रा के साथ. अच्छे इनसान अकसर कम होते हैं और इन्हीं कम लोगों में अकसर मैं चंद्रा की गिनती  किया करता था. कभीकभी हमारे बीच झगड़ा भी हो जाया करता था जिस की वजह हमारी निजी कमी नहीं होती थी. उसूलों की धनी थी चंद्रा और यही उसूल अकसर टकरा जाते थे.

मैं कभी चंद्रा को झुकने को कह देता तो उस का जवाब होता था, ‘‘मैं केंचुआ बन कर नहीं जी सकती. प्रकृति ने मुझे रीढ़ की हड्डी दी है न. मैं वैसी ही हूं जैसी मुझ से प्रकृति उम्मीद करती है.’’

‘‘तुम्हारी फिलासफी मेरी समझ में नहीं आती.’’

‘‘तो मत समझो, तुम जैसे हो रहो न वैसे. मैं ने कब कहा मुझे समझो.’’

7-8 लड़केलड़कियों का गु्रप था हमारा जिस में हर स्वभाव का इंसान था… बस, चंद्रा ही थी जो अपनी सीमाओं, अपनी दलीलों में बंधी थी.

मैं चंद्रा की नसनस से वाकिफ था. उस के चरित्र और बातों में गजब की पारदर्शिता थी, न कहीं कोई लागलपट न हेरफेर. कभी कोई गोलमोल बात करने लगता तो वह झुंझला जाती.

‘‘यह जलेबी क्यों पका रहे हो? सीधी तरह मुद्दे की बात पर क्यों नहीं आते…साफसाफ कहो क्या कहना चाहते हो?’’

‘‘कोई भी बात कभीकभी इतनी सीधी सरल नहीं न होती चंद्रा जिसे हम झट से कह दें…कुछ बातें छिपानी भी पड़ती हैं.’’

‘‘तो छिपाओ उन्हें, आधीअधूरी भी क्यों बतानी. तुम्हें अगर लगता है बात छिपाने वाली है तो सब के सामने उस का उल्लेख भी क्यों करना. पूरी तरह छिपा लो न.’’

मुझे आज भी याद है जब हम आखिरी बार मिले थे तब भी झगड़ कर ही अलग हुए थे. वह दिल्ली लौट गई थी और मैं आगरा. उस के बाद कभी नहीं मिले थे. उस की शादी की खबर मिली थी जिस पर इक्कादुक्का मित्र ही पहुंच पाए थे.

दूसरे दिन विश्वविद्यालय पहुंचे तो नजरें चंद्रा को ही खोजती रहीं. कहने को तो ढेर सारी बातें कल हम ने की थीं लेकिन अपनी निजी एक भी बात हम नहीं कर पाए थे.

‘‘किसे खोज रहे हैं, वर्माजी? किसी का इंतजार है क्या?’’

मेरी नजरों को भांप गए थे मेरे एक सहयोगी.

‘‘हां, वह मेरी सहपाठी मिल गई थीं कल मुझे. आज भी उन्हीं को खोज रहा हूं.’’

‘‘लंचब्रेक में ढूंढ़ लीजिएगा. अभी जरा इन की बातें सुनिए. इन की बातों का मैं सदा ही कायल रहता हूं. मिसेज गोयल की फिलासफी कमाल की होती है. कभी इन के लेख नहीं पढे़ आप ने…कमाल की सोच है.’’

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चंद्रा खड़ी थी सामने. तो क्या श्रीमती गोयल अपनी चंद्रा ही हैं जिस के लेख अकसर देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपते हैं?

‘‘जरा किस्मत देखो, पति शादी के 5 साल बाद अपने से आधी उम्र की लड़की के साथ भाग गया. औलाद कोई है नहीं. अफसोस होता है मुझे श्रीमती गोयल के लिए.’’

काटो तो रक्त नहीं रहा मेरी शिराओं में. आंखें फाड़फाड़ कर मैं अपने सहयोगी का चेहरा देखने लगा जो बड़बड़ा भी रहा था और बड़ी रुचि ले कर चंद्रा को सुन भी रहा था. इस सत्य का इतना बड़ा धक्का लगेगा मुझे मैं नहीं जानता था. ब्लड प्रेशर का मरीज तो हूं ही मैं, उसी का दबाव इतना बढ़ गया कि लंच बे्रेक तक पहुंच ही नहीं पाया मैं. तबीयत इतनी ज्यादा खराब हो गई कि अस्पताल में जा कर ही मेरी आंख खुली.

‘‘सोम, क्या हो गया तुम्हें? क्या सुबह कुछ परेशानी थी?’’

चंद्रा ही तो थी मेरे पास. इतने लोगों की भीड़ में बस चंद्रा. शायद 22 वर्ष पुरानी दोस्ती का ही नाता था जिस का प्रभाव चंद्रा की आंखों में था. माथे पर उस का हाथ और शब्दों में ढेर सारी चिंता.

‘‘अब कैसे हो, सोम?’’

50 के आसपास पहुंच चुका हूं मैं. वर्माजी, वर्मा साहब सुनसुन कर कान इतने पथरा गए हैं कि अपना नाम याद ही नहीं था मुझे. मांबाप अब जिंदा नहीं हैं और छोटी बहन भाई कह कर पुकारती है. बरसों बाद कोई नाम से पुकार रहा है. कल से यही आवाज है जो कानों में रस घोल रही है और आज भी यही आवाज है जो संजीवनी सी घुल रही है कानों में.

‘‘सोम, क्या हुआ? तुम्हारे घर में सब ठीक तो हैं न…क्या परेशानी है…मुझ से बात करो.’’

क्या बात करूं मैं चंद्रा से? समझ नहीं पा रहा हूं क्या कहूं. डाक्टर ने आ कर मेरी पूरी जांच की और बताया… अभी भी मैं पूरी तरह सामान्य नहीं हूं. सुबह तक यहीं रुकना होगा.

‘‘तुम्हारे घर से बुला लूं किसी को, तुम्हारी पत्नी को, बच्चों को, अपने घर का नंबर दो.’’

अधिकार के साथ आज भी चंद्रा ने मेरा सामान टटोला और मेरा कार्ड निकाल कर घर का नंबर मिलाया. एक बार 2 बार, 10 बार.

‘‘कोई फोन नहीं उठा रहा. घर पर कोई नहीं है क्या?’’

मैं ने इशारे से चंद्रा को पास बुलाया. बड़ी हिम्मत की मुसकराने में.

‘‘ऐसा कुछ नहीं है. सब ठीक है…’’

‘‘तो कोई फोन क्यों नहीं उठाता. तुम भी परेशान हो और मुझ से कुछ छिपा रहे हो?’’

‘‘हमारे पास छिपाने को है ही क्या, चंद्रा? तुम भी खाली हाथ हो और मैं भी. मेरे घर पर जब कोई है ही नहीं तो फोन का रिसीवर कौन उठाएगा.’’

क्रमश:

अगले हफ्ते पढ़ें कहानी का दूसरा भाग

वो जलता है मुझ से : भाग 1

विजय का जब मन चाहा अपने बरसों पुराने मित्र को बुला लिया अपनी दौलत की नुमाइश दिखाने के लिए इस बार भी बुलाया था अपने बच्चे के जन्मदिन पर. पर मित्र के न आने पर विजय को तकलीफ क्यों होने लगी थी.

‘‘सुपीरियरिटी कांप्लेक्स जैसी  कोई भी भावना नहीं होती.

वास्तव में जो इनसान इनफीरियरिटी कांप्लेक्स से पीडि़त है उसी को सुपीरियरिटी कांप्लेक्स भी होता है. अंदर से वह हीनभावना को ही दबा रहा होता है और यही दिखाने के लिए कि उसे हीनभावना तंग नहीं कर रही, वह सब के सामने बड़ा होने का नाटक करता है.

‘‘उच्च और हीन ये दोनों मनोगंथियां अलगअलग हैं. उच्च मनोग्रंथि वाला इनसान इसी खुशफहमी में जीता है कि सारी दुनिया उसी की जूती के नीचे है. वही सब से श्रेष्ठ है, वही देता है तो सामने वाले का पेट भरता है. वह सोचता है कि यह आकाश उसी के सिर का सहारा ले कर टिका है और वह सहारा छीन ले तो शायद धरती ही रसातल में चली जाए. किसी को अपने बराबर खड़ा देख उसे आग लग जाती है. इसे कहते हैं उच्च मनोगं्रथि यानी सुपीरियरिटी कांप्लेक्स.

‘‘इस में भला हीन मनोगं्रथि कहां है. जैसे 2 शब्द हैं न, खुशफहमी और गलतफहमी. दोनों का मतलब एक हो कर भी एक नहीं है. खुशफहमी का अर्थ होता है बेकार ही किसी भावना में खुश रहना, मिथ्या भ्रम पालना और उसी को सच मान कर उसी में मगन रहना जबकि गलतफहमी में इनसान खुश भी रह सकता है और दुखी भी.’’

‘‘तुम्हारी बातें बड़ी विचित्र होती हैं जो मेरे सिर के ऊपर से निकल जाती हैं. सच पूछो तो आज तक मैं समझ ही नहीं पाया कि तुम कहना क्या चाहते हो.’’

‘‘कुछ भी खास नहीं. तुम अपने मित्र के बारे में बता रहे थे न. 20 साल पहले तुम पड़ोसी थे. साथसाथ कालिज जाते थे सो अच्छा प्यार था तुम दोनों में. पढ़ाई के बाद तुम पिता के साथ उन के व्यवसाय से जुड़ गए और अच्छेखासे अमीर आदमी बन गए. पिता की जमा पूंजी से जमीन खरीदी और बैंक से खूब सारा लोन ले कर यह आलीशान कोठी बना ली.

‘‘उधर 20 साल में तुम्हारे मित्र ने अपनी नौकरी में ही अच्छी इज्जत पा ली, उच्च पद तक पहुंच गया और संयोग से इसी शहर में स्थानांतरित हो कर आ गया. अपने आफिस के ही दिए गए छोटे से घर में रहता है. तुम से बहुत प्यार भी करता है और इन 20 सालों में वह जब भी इस शहर में आता रहा तुम से मिलता रहा. तुम्हारे हर सुखदुख में उस ने तुम से संपर्क रखा. हां, यह अलग बात है कि तुम कभी ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि आज की ही तरह तुम सदा व्यस्त रहे. अब जब वह इस शहर में पुन: आ गया है, तुम से मिलनेजुलने लगा है तो सहसा तुम्हें लगने लगा है कि उस का स्तर तुम्हारे स्तर से नीचा है, वह तुम्हारे बराबर नहीं है.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है.’’

‘‘ऐसा ही है. अगर ऐसा न होता तो उस के बारबार बुलाने पर भी क्या तुम उस के घर नहीं जाते? ऐसा तो नहीं कि तुम कहीं आतेजाते ही नहीं हो. 4-5 तो किटी पार्टीज हैं जिन में तुम जाते हो. लेकिन वह जब भी बुलाता है तुम काम का बहाना बना देते हो.

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‘साल भर हो गया है उसे इस शहर में आए. क्या एक दिन भी तुम उस के घर पर पहले जितनी तड़प और ललक लिए गए हो जितनी तड़प और ललक लिए वह तुम्हारे घर आता रहता था और अभी तक आता रहा? तुम्हारा मन किया दोस्तों से मिलने का तो तुम ने एक पार्टी का आयोजन कर लिया. सब को बुला लिया, उसे भी बुला लिया. वह भी हर बार आता रहा. जबजब तुम ने चाहा और जिस दिन उस ने कहा आओ, थोड़ी देर बैठ कर पुरानी यादें ताजा करें तो तुम ने बड़ी ठसक से मना कर दिया. धीरेधीरे उस ने तुम से पल्ला झाड़ लिया. तुम्हारी समस्या जब यह है कि तुम ने अपने बेटे के जन्मदिन पर उसे बुलाया और पहली बार उस ने कह दिया कि बच्चों के जन्मदिन पर भला उस का क्या काम?’’

‘‘मुझे बहुत तकलीफ हो रही है राघव…वह मेरा बड़ा प्यारा मित्र था और उसी ने साफसाफ इनकार कर दिया. वह तो ऐसा नहीं था.’’

‘‘तो क्या अब तुम वही रह गए हो? तुम भी तो यही सोच रहे हो न कि वह तुम्हारी सुखसुविधा से जलता है तभी तुम्हारे घर पर आने से कतरा गया. सच तो यह है कि तुम उसे अपने घर अपनी अमीरी दिखाने को बुलाते रहे हो, अचेतन में तुम्हारा अहम संतुष्ट होता है उसे अपने घर पर बुला कर. तुम उस के सामने यह प्रमाणित करना चाहते हो कि देखो, आज तुम कहां हो और मैं कहां हूं जबकि हम दोनों साथसाथ चले थे.’’

‘‘नहीं तो…ऐसा तो नहीं सोचता मैं.’’

‘‘कम से कम मेरे सामने तो सच बोलो. मैं तुम्हारे इस दोस्त से तुम्हारे ही घर पर मिल चुका हूं. जब वह पहली बार तुम से मिलने आया था. तुम ने घूमघूम कर अपना महल उसे दिखाया था और उस के चेहरे पर भी तुम्हारा घर देखते हुए बड़ा संतोष झलक रहा था और तुम कहते हो वह जलता है तुम्हारा वैभव देख कर. तुम्हारे चेहरे पर भी तब कोई ऐसा ही दंभ था…मैं बराबर देख रहा था. उस ने कहा था, ‘भई वाह, मेरा घर तो बहुत सुंदर और आलीशान है. दिल चाह रहा है यहीं क्यों न आ जाऊं…क्या जरूरत है आफिस के घर में रहने की.’

‘‘तब उस ने यह सब जलन में नहीं कहा था, अपना घर कहा था तुम्हारे घर को. तुम्हारे बच्चों के जन्मदिन पर भागा चला आता था और आज उसी ने मना कर दिया. उस ने भी पल्ला खींचना शुरू कर दिया, आखिर क्यों. हीन ग्रंथि क्या उस में है? अरे, तुम व्यस्त रहते हो इसलिए उस के घर तक नहीं जाते और वह क्या बेकार है जो अपने आफिस में से समय निकाल कर भी चला आता है. प्यार करता था तभी तो आता था. क्या एक कप चाय और समोसा खाने चला आता था?

‘‘जिस नौकरी में तुम्हारा वह दोस्त है न वहां लाखों कमा कर तुम से भी बड़ा महल बना सकता था लेकिन वह ईमानदार है तभी अभी तक अपना घर नहीं बना पाया. तुम्हारी अमीरी उस के लिए कोई माने नहीं रखती, क्योंकि उस ने कभी धनसंपदा को रिश्तों से अधिक महत्त्व नहीं दिया. दोस्ती और प्यार का मारा आता था. तुम्हारा व्यवहार उसे चुभ गया होगा इसलिए उस ने भी हाथ खींच लिया.’’

‘‘तुम्हें क्या लगता है…मुझ में उच्च गं्रथि का विकास होने लगा है या हीन ग्रंथि हावी हो रही है?’’

‘‘दोनों हैं. एक तरफ तुम सोचने लगे हो कि तुम इतने अमीर हो गए हो कि किसी को भी खड़ेखडे़ खरीद सकते हो. तुम उंगली भर हिला दोगे तो कोई भी भागा चला आएगा. यह मित्र भी आता रहा, तो तुम और ज्यादा इतराने लगे. दोस्तों के सामने इस सत्य का दंभ भी भरने लगे कि फलां कुरसी पर जो अधिकारी बैठा है न, वह हमारा लंगोटिया यार है.

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‘‘दूसरी तरफ तुम में यह ग्रंथि भी काम करने लगी है कि साथसाथ चले थे पर वह मेज के उस पार चला गया, कहां का कहां पहुंच गया और तुम सिर्फ 4 से 8 और 8 से 16 ही बनाते रह गए. अफसोस होता है तुम्हें और अपनी हार से मुक्ति पाने का सरल उपाय था तुम्हारे पास उसे बुला कर अपना प्रभाव डालना. अपने को छोटा महसूस करते हो उस के सामने तुम. यानी हीन ग्रंथि.

‘‘सत्य तो यह है कि तुम उसे कम वैभव में भी खुश देख कर जलते हो. वह तुम जितना अमीर नहीं फिर भी संतोष हर पल उस के चेहरे पर झलकता है…इसी बात पर तुम्हें तकलीफ होती है. तुम चाहते हो वह दुम हिलाता तुम्हारे घर आए…तुम उस पर अपना मनचाहा प्रभाव जमा कर अपना अहम संतुष्ट करो. तुम्हें क्या लगता है कि वह कुछ समझ नहीं पाता होगा? जिस कुरसी पर वह बैठा है तुम जैसे हजारों से वह निबटता होगा हर रोज. नजर पहचानना और बदल गया व्यवहार भांप लेना क्या उसे नहीं आता होगा. क्या उसे पता नहीं चलता होगा कि अब तुम वह नहीं रहे जो पहले थे. प्रेम और स्नेह का पात्र अब रीत गया है, क्या उस की समझ में नहीं आता होगा?

पारिवारिक सुगंध : भाग 1

रिश्तों की सुगंध ही जीवन में सुखशांति लाती है. लेकिन राजीव अपनी धनदौलत के घमंड में डूबा रहता. रिश्तों की अहमियत उस के लिए कोई माने नहीं रखती थी. परिवार, सगेसंबंधी होते हुए भी वह खाली हाथ था. साथ था तो केवल एक दोस्त.

अपने दोस्त राजीव चोपड़ा को दिल का दौरा पड़ने की खबर सुन कर मेरे मन में पहला विचार उभरा कि अपनी जिंदगी में हमेशा अव्वल आने की दौड़ में बेतहाशा भाग रहा मेरा यार आखिर जबरदस्त ठोकर खा ही गया.

रात को क्लिनिक कुछ जल्दी बंद कर के मैं उस से मिलने नर्सिंग होम पहुंच गया. ड्यूटी पर उपस्थित डाक्टर से यह जान कर कि वह खतरे से बाहर है, मेरे दिल ने बड़ी राहत महसूस की थी.

मुझे देख कर चोपड़ा मुसकराया और छेड़ता हुआ बोला, ‘‘अच्छा किया जो मुझ से मिलने आ गया पर तुझे तो इस मुलाकात की कोई फीस नहीं दूंगा, डाक्टर.’’

‘‘लगता है खूब चूना लगा रहे हैं मेरे करोड़पति यार को ये नर्सिंग होम वाले,’’ मैं ने उस का हाथ प्यार से थामा और पास पड़े स्टूल पर बैठ गया.

‘‘इस नर्सिंग होम के मालिक डाक्टर जैन को यह जमीन मैं ने ही दिलाई थी. इस ने तब जो कमीशन दिया था, वह लगता है अब सूद समेत वसूल कर के रहेगा.’’

‘‘यार, कुएं से 1 बालटी पानी कम हो जाने की क्यों चिंता कर रहा है?’’

‘‘जरा सा दर्द उठा था छाती में और ये लोग 20-30 हजार का बिल कम से कम बना कर रहेंगे. पर मैं भी कम नहीं हूं. मेरी देखभाल में जरा सी कमी हुई नहीं कि मैं इन पर चढ़ जाता हूं. मुझ से सारा स्टाफ डरता है…’’

दिल का दौरा पड़ जाने के बावजूद चोपड़ा के व्यवहार में खास बदलाव नहीं आया था. वह अब भी गुस्सैल और अहंकारी इनसान ही था. अपने दिल के दौरे की चर्चा भी वह इस अंदाज में कर रहा था मानो उसे कोई मैडल मिला हो.

कुछ देर के बाद मैं ने पूछा, ‘‘नवीन और शिखा कब आए थे?’’

अपने बेटेबहू का नाम सुन कर चोपड़ा चिढ़े से अंदाज में बोला, ‘‘नवीन सुबहशाम चक्कर लगा जाता है. शिखा को मैं ने ही यहां आने से मना किया है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘अरे, उसे देख कर मेरा ब्लड प्रेशर जो गड़बड़ा जाता है.’’

‘‘अब तो सब भुला कर उसे अपना ले, यार. गुस्सा, चिढ़, नाराजगी, नफरत और शिकायतें…ये सब दिल को नुकसान पहुंचाने वाली भावनाएं हैं.’’

‘‘ये सब छोड़…और कोई दूसरी बात कर,’’ उस की आवाज रूखी और कठोर हो गई.

कुछ पलों तक खामोश रहने के बाद मैं ने उसे याद दिलाया, ‘‘तेरे भतीजे विवेक की शादी में बस 2 सप्ताह रह गए हैं. जल्दी से ठीक हो जा मेरा हाथ बंटाने के लिए.’’

‘‘जिंदा बचा रहा तो जरूर शामिल हूंगा तेरे बेटे की शादी में,’’ यह डायलाग बोलते हुए यों तो वह मुसकरा रहा था, पर उस क्षण मैं ने उस की आंखों में डर, चिंता और दयनीयता के भाव पढ़े थे.

नर्सिंग होम से लौटते हुए रास्ते भर मैं उसी के बारे में सोचता रहा था.

हम दोनों का बचपन एक ही महल्ले में साथ गुजरा था. स्कूल में 12वीं तक की शिक्षा भी  साथ ली थी. फिर मैं मेडिकल कालिज में प्रवेश पा गया और वह बी.एससी. करने लगा.

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पढ़ाई से ज्यादा उस का मन कालिज की राजनीति में लगता. विश्वविद्यालय के चुनावों में हर बार वह किसी न किसी महत्त्वपूर्ण पद पर रहा. अपनी छात्र राजनीति में दिलचस्पी के चलते उस ने एलएल.बी. भी की.

‘लोग कहते हैं कि कोई अस्पताल या कोर्ट के चक्कर में कभी न फंसे. देख, तू डाक्टर बन गया है और मैं वकील. भविष्य में मैं तुझ से ज्यादा अमीर बन कर दिखाऊंगा, डाक्टर. क्योंकि दौलत पढ़ाई के बल पर नहीं बल्कि चतुराई से कमाई जाती है,’ उस की इस तरह की डींगें मैं हमेशा सुनता आया था.

उस की वकालत ठीक नहीं चली तो वह प्रापर्टी डीलर बन गया. इस लाइन में उस ने सचमुच तगड़ी कमाई की. मैं साधारण सा जनरल प्रेक्टिशनर था. मुझ से बहुत पहले उस के पास कार और बंगला हो गए.

हमारी दोस्ती की नींव मजबूत थी इसलिए दिलों का प्यार तो बना रहा पर मिलनाजुलना काफी कम हो गया. उस का जिन लोगों के साथ उठनाबैठना था, वे सब खानेपीने वाले लोग थे. उस तरह की सोहबत को मैं ठीक नहीं मानता था और इसीलिए हम कम मिलते.

हम दोनों की शादी साथसाथ हुई और इत्तफाक से पहले बेटी और फिर बेटा भी हम दोनों के घर कुछ ही आगेपीछे जन्मे.

चोपड़ा ने 3 साल पहले अपनी बेटी की शादी एक बड़े उद्योगपति खानदान में अपनी दौलत के बल पर की. मेरी बेटी ने अपने सहयोगी डाक्टर के साथ प्रेम विवाह किया. उस की शादी में मैं ने चोपड़ा की बेटी की शादी में आए खर्चे का शायद 10वां हिस्सा ही लगाया होगा.

रुपए को अपना भगवान मानने वाले चोपड़ा का बेटा नवीन कालिज में आने तक एक बिगड़ा हुआ नौजवान बन गया था. उस की मेरे बेटे विवेक से अच्छी दोस्ती थी क्योंकि उस की मां सविता मेरी पत्नी मीनाक्षी की सब से अच्छी सहेली थी. इन दोनों नौजवानों की दोस्ती की मजबूत नींव भी बचपन में ही पड़ गई थी.

‘नवीन गलत राह पर चल रहा है,’ मेरी ऐसी सलाह पर चोपड़ा ने कभी ध्यान नहीं दिया था.

‘बाप की दौलत पर बेटा क्यों न ऐश करे? तू भी विवेक के साथ दिनरात की टोकाटाकी वाला व्यवहार मत किया कर, डाक्टर. अगर वह पढ़ाई में पिछड़ भी गया तो कोई फिक्र नहीं. उसे कोई अच्छा बिजनेस मैं शुरू करा दूंगा,’’ अपनी ऐसी दलीलों से वह मुझे खीज कर चुप हो जाने को मजबूर कर देता.

आज इस करोड़पति इनसान का इकलौता बेटा 2 कमरों के एक साधारण से किराए वाले फ्लैट में अपनी पत्नी शिखा के साथ रह रहा था. नर्सिंग होम से सीधे घर न जा कर मैं उसी के फ्लैट पर पहुंचा.

नवीन और शिखा दोनों मेरी बहुत इज्जत करते थे. इन दोनों ने प्रेम विवाह किया था. साधारण से घर की बेटी को चोपड़ा ने अपनी बहू बनाने से साफ मना कर दिया, तो इन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली थी.

चोपड़ा की नाराजगी को नजरअंदाज करते हुए मैं ने इन दोनों का साथ दिया था. इसी कारण ये दोनों मुझे भरपूर सम्मान देते थे.

चोपड़ा को दिल का दौरा पड़ने की चर्चा शुरू हुई, तो नवीन उत्तेजित लहजे में बोला, ‘‘चाचाजी, यह तो होना ही था.’’ रोजरोज की शराब और दौलत कमाने के जनून के चलते उन्हें दिल का दौरा कैसे न पड़ता?

‘‘और इस बीमार हालत में भी उन का घमंडी व्यवहार जरा भी नहीं बदला है. शिखा उन से मिलने पहुंची तो उसे डांट कर कमरे से बाहर निकाल दिया. उन के जैसा खुंदकी और अकड़ू इनसान शायद ही दूसरा हो.’’

‘‘बेटे, बड़ों की बातों का बुरा नहीं मानते और ऐसे कठिन समय में तो उन्हें अकेलापन मत महसूस होने दो. वह दिल का बुरा नहीं है,’’ मैं उन्हें देर तक ऐसी बातें समझाने के बाद जब वहां से उठा तो मन बड़ा भारी सा हो रहा था.

चोपड़ा ने यों तो नवीन को पूरी स्वतंत्रता से ऐश करने की छूट हमेशा दी, पर जब दोनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हुई तो बाप ने बेटे को दबा कर अपनी चलानी चाही थी.

जिस घटना ने नवीन के जीवन की दिशा को बदला, वह लगभग 3 साल पहले घटी थी.

उस दिन मेरे बेटे विवेक का जन्मदिन था. नवीन उसे नए मोबाइल फोन का उपहार देने के लिए अपने साथ बाजार ले गया.

वहां दौलत की अकड़ से बिगडे़ नवीन की 1 फोन पर नीयत खराब हो गई. विवेक के लिए फोन खरीदने के बाद जब दोनों बाहर निकलने के लिए आए तो शोरूम के सुरक्षा अधिकारी ने उसे रंगेहाथों पकड़ जेब से चोरी का मोबाइल बरामद कर लिया.

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‘गलती से फोन जेब में रह गया है. मैं ऐसे 10 फोन खरीद सकता हूं. मुझे चोर कहने की तुम सब हिम्मत कैसे कर रहे हो,’ गुस्से से भरे नवीन ने ऐसा आक्रामक रुख अपनाया, पर वे लोग डरे नहीं.

मामला तब ज्यादा गंभीर हो गया जब नवीन ने सुरक्षा अधिकारी पर तैश में आ कर हाथ छोड़ दिया.

उन लोगों ने पहले जम कर नवीन की पिटाई की और फिर पुलिस बुला ली. बीचबचाव करने का प्रयास कर रहे विवेक की कमीज भी इस हाथापाई में फट गई थी.

पुलिस दोनों को थाने ले आई. वहीं पर चोपड़ा और मैं भी पहुंचे. मैं सारा मामला रफादफा करना चाहता था क्योंकि विवेक ने सारी सचाई मुझ से अकेले में बता दी थी, लेकिन चोपड़ा गुस्से से पागल हो रहा था. उस के मुंह से निकल रही गालियों व धमकियों के चलते मामला बिगड़ता जा रहा था.

उस शोरूम का मालिक भी रुतबेदार आदमी था. वह चोपड़ा की अमीरी से प्रभावित हुए बिना पुलिस केस बनाने पर तुल गया.

एक अच्छी बात यह थी कि थाने का इंचार्ज मुझे जानता था. उस के परिवार के लोग मेरे दवाखाने पर छोटीबड़ी बीमारियों का इलाज कराने आते थे.

उस की आंखों में मेरे लिए शर्मलिहाज के भाव न होते तो उस दिन बात बिगड़ती ही चली जाती. वह चोपड़ा जैसे घमंडी और बदतमीज इनसान को सही सबक सिखाने के लिए शोरूम के मालिक का साथ जरूर देता, पर मेरे कारण उस ने दोनों पक्षों को समझौता करने के लिए मजबूर कर दिया.

हां, इतना उस ने जरूर किया कि उस के इशारे पर 2 सिपाहियों ने अकेले में नवीन की पिटाई जरूर की.

‘बाप की दौलत का तुझे ऐसा घमंड है कि पुलिस का खौफ भी तेरे मन से उठ गया है. आज चोरी की है, कल रेप और मर्डर करेगा. कम से कम इतना तो पुलिस की आवभगत का स्वाद इस बार चख जा कि कल को ज्यादा बड़ा अपराध करने से पहले तू दो बार जरूर सोचे.’

मेरे बेटे की मौजूदगी में उन 2 पुलिस वालों ने नवीन के मन में पुलिस का डर पैदा करने के लिए उस की अच्छीखासी धुनाई की थी.

उस घटना के बाद नवीन एकाएक उदास और सुस्त सा हो गया था. हम सब उसे खूब समझाते, पर वह अपने पुराने रूप में नहीं लौट पाया था.

फिर एक दिन उस ने घोषणा की, ‘मैं एम.बी.ए. करने जा रहा हूं. मुझे प्रापर्टी डीलर नहीं बनना है.’

यह सुन कर चोपड़ा आगबबूला हो उठा और बोला, ‘क्या करेगा एम.बी.ए. कर के? 10-20 हजार की नौकरी?’

‘इज्जत से कमाए गए इतने रुपए भी जिंदगी चलाने को बहुत होते हैं.’

‘क्या मतलब है तेरा? क्या मैं डाका डालता हूं? धोखाधड़ी कर के दौलत कमा रहा हूं?’

‘मुझे आप के साथ काम नहीं करना है,’ यों जिद पकड़ कर नवीन ने अपने पिता की कोई दलील नहीं सुनी थी.

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बाद में मुझ से अकेले में उस ने अपने दिल के भावों को बताया था, ‘चाचाजी, उस दिन थाने में पुलिस वालों के हाथों बेइज्जत होने से मुझे मेरे पिताजी की दौलत नहीं बचा पाई थी. एक प्रापर्टी डीलर का बेटा होने के कारण उलटे वे मुझे बदमाश ही मान बैठे थे और मुझ पर हाथ उठाने में उन्हें जरा भी हिचक नहीं हो रही थी.

‘दूसरी तरफ आप के बेटे विवेक के साथ उन्होंने न गालीगलौज की, न मारपीट. क्यों उस के साथ भिन्न व्यवहार किया गया? सिर्फ आप के अच्छे नाम और इज्जत ने उस की रक्षा की थी.

उन्नाव कांड : प्रेम कहानी की आड़ में वीभत्सता दबाने की कोशिश

उत्तर प्रदेश राजधानी से 60 किलोमीटर दूर उन्नाव जिला फिर चर्चा में है. एक बार फिर चर्चा बलात्कार यानि रेप है. भाजपा के विधायक कुलदीप सेंगर के समय मामला राजनीतिक था. अब दूसरी घटना में लड़की को जलाने के बाद  मामला राजनीतिक कम सामाजिक अधिक बन गया है. अब लोकसभा में हंगामा होकर मांग की जा रही है कि महिला सुरक्षा दिवस मनाया जाये. उत्तर प्रदेश की विधानसभा के बाहर प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव धरने पर बैठे. कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी लखनऊ के दो दिन के दौरे से समय निकाल कर उन्नाव लड़की के घर वालों से मिलने गई. देश में एक बार फिर रेप की घटना चर्चा में है. उत्तर प्रदेश सरकार को बचाने में लगे लोग पूरे मामले में लड़की जलाने की वीभत्स घटना की चर्चा करने के बजाय प्रेम प्रंसग की चर्चा करके मामले को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं.

इस बार रेप कांड सामाजिक है. उन्नाव जिले की पुलिस पूरे मामले में घटना को प्रेमप्रसंग मानकर दरकिनार कर रही थी लड़की की मौत के बाद भी वह इसे प्रेम प्रंसग मान कर हैदराबाद वाली घटना जितना गंभीर नहीं मान रही है. लड़का लड़की दोनों ही गांव के रहने वाले थे. आपस में करीबी थे. दोनों का आपस में घरो में आना जाना था. अंतर था कि लड़की गरीब परिवार से थी. लड़के का परिवार गांव के प्रधान का करीबी परिवार था.

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. जहां प्रेम को रोकने के लिये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के द्वारा शपथ ग्रहण करते ही ‘एंटी रोमियो दल’ का गठन किया गया था. मामला एक ही धर्म के लोगों का था ऐसे में ‘एंटी रोमियो दल’ और पुलिस के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं थी. धर्म आधारित सत्ता तो रामायण और महाभारत काल से ही छले जाने पर औरत को ही दोषी मानती थी. अहिल्या का पत्थर बना दिया जाना, सीता का घर से निकाला जाना और कुंती का पुत्र को त्याग करने जैसी बहुत सी घटनायें उदाहरण है. ऐसे में उन्नाव के हिन्दूपुर गांव की लड़की को भी गलत ही माना जाना था.

पुलिस और समाज दोनों ही अपराध की गंभीरता की जगह पर सेक्स के औचित्य पर बहस कर रहे है. यहां यह भूल जाते है कि कानून बिना सहमति के पत्नी के साथ सेक्स संबंधों को भी अपराध मानती है. कानून लालच और लाचारी में बने सहमति के सेक्स संबंधों को भी बलात्कार मानता है. कानून की परवाह हैदराबाद से लेकर उन्नाव तक पुलिस में नजर नहीं आती. वह आदमी देखकर कानून का पालन करती है. यही वजह है हैदराबाद का बलात्कार और उन्नाव का बलात्कार उसे फर्क फर्क लगता है.

प्रेम प्रसंग की आड़ में छिपाया जा रहा गुनाह

उन्नाव कांड में लड़की का गुनाह प्रेम प्रसंग था. मामला प्रेम प्रंसग का था. इसी कारण पुलिस ने लड़की की शिकायत करने के बाद भी उसकी शिकायत पर रेप करने का मुकदमा नहीं लिखा. सामान्यतौर पर पुलिस प्रेम प्रसंग के मामलों में पुलिस का रवैया यही होता है. लड़की के गांव नाम हिन्दूपुर है. यह उन्नाव जिले से करीब 50 किलोमीटर दूर पर स्थित है. यह गांव उन्नाव के बिहार थाना क्षेत्र में आता है. लड़की का परिवार गांव के गरीब परिवार में आता है. लड़की पांच बहनों और दो भाइयों में सबसे छोटी थी. गांव के अंदर इनका कच्चे घर बना है. लड़की घर के कामकाज से अकेले ही घर से बाहर आती जाती रहती थी.

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हिन्दूपुर गांव की प्रधान महिला है. पीड़ित लडकी का प्रधान के घर आना जाना था. प्रधान के कारण ही लड़की के परिवार को सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिल जाता था. इस कारण से लड़की का परिवार प्रधान के परिवार के दबाव में भी रहता था. लड़की के घर से कुछ दूरी पर ही लडके शिवम त्रिवेदी का भी घर है. इन लोगों की आपस में पहले जानपहचान हुई फिर मामला प्रेम प्रंसग में बदल गया. लड़की का आरोप है कि लड़का 2018 में उसको रायबरेली लेकर गया और वहां एक कमरा लेकर रहने लगा. वहां शारीरिक संबंधों के बाद जब लड़की ने शादी करने का दबाव डाला तो लड़का उसको शादी का झांसा देकर मंदिर ले गया. यहां उसने अपने दोस्तों के साथ गैंगरेप किया.

दिसम्बर 2018 में इस घटना की रिपोर्ट दर्ज कराने लब लड़की ने पुलिस के पास गई तो वहां मुकदमा दर्ज नही हुआ. तब लड़की ने कोर्ट का सहारा लेकर अपने गैंगरेप का मुकदमा लिखाया. इसी प्रकरण में आरोपी शिवम त्रिवेदी जेल गया. प्रेम प्रंसग के बाद ही उपजे इन हालातों की वजह से परिवारों में आपस में मनमुटाव शुरू हो गया. दोस्ती दुश्मनी में बदल गई. लड़के के परिवार के लोगों का मानना है कि लड़की ने रेप, गैंगरेप की बात झूठी बोली और मुकदमा लिखाया. मार्च 2019 में शिवम के जेल जाने के बाद वह जमानत पर छूटकर आया.

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रेप के मुकदमें का बदला

घटना के दिन गुरूवार 3 दिसम्बर 2019 को लड़की अपने केस की पैरवी के लिये वकील से मिलने रायबरेली जाने वाली थी. गांव से 2 किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन जा रही थी जहां 5 बजे ट्रेन आने का समय होता था. गांव से स्टेशन तक के रास्ते का कुछ हिस्सा दिन में सूनसान रहता था. सुबह 4 बजे तो वहां लोग होते ही नहीं थे. इसी वजह से लड़की को खुद को बचाने के लिये कुछ दूर दौड़ना पड़ा था. जली हालत में लड़की खुद को बचाने के लिये दौड़ी तो आग और भड़क गई और उसके कपडे जल कर जिस्म से चिपक गये थे. लड़की के कहने पर रास्ते में रहने वालों ने डायल 112 को जानकारी दी तब पुलिस वहां पहुंची.

लड़की ने जली हालत में पुलिस और प्रशासन को अपने उपर मिट्टी का तेल डालकर जलाने वालों के नाम बताये. 90 फीसदी जली हालत में लड़की को पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और फिर देश की राजधानी दिल्ली इलाज के लिये ले जायी गई. जिंदगी और मौत के बीच 3 दिन संघर्ष करने के बाद दम तोड़ दिया. लड़की के पिता को दुख है कि घटना के दिन वह लेकर छोड़ने स्टेशन तक नहीं गये. लड़की खुद अपनी लड़ाई लड़ रही थी. इस कारण वह आत्मविश्वास में थे. इसके पहले वह लड़की को छोड़ने स्टेशन तक जाते थे.

आरोपियों के परिवार के लोग कहते है कि गुनाह उनके घर वालों ने नहीं किया उनको साजिश के तहत फंसाया जा रहा है. साजिश का पर्दाफाश करने के लिये सीबीआई जांच की जरूरत है. परिवार के लोग कहते हैं कि लड़की को जलाने की घटना जिस समय ही है उस समय उनके लड़के घरो में सो रहे थे. पुलिस ने उनको सोते समय घर से पकड़ा है. अगर उन्होंने अपराध किया होता तो आराम से घर में सो नहीं रहे होते. कानून मानता है कि मरते समय का दिया गया बयान सत्य माना जाता है. ऐसे में कौन सच है यह जांच का विषय हो सकता है. अगर लड़की को जलाते किसी ने लड़कों को उन्नाव में नहीं देखा तो हैदराबाद में भी लड़कों को कुकर्म करते किसी ने नहीं देखा था.

सवाल उठाता है उन्नाव कांड में लड़की ने जली अवस्था में लड़कों के नाम क्यों बताये ? उस समय तक लड़की यह समझ चुकी थी कि उसकी मौत तय है. वह सबसे पहले अपने साथ हुई घटना की गवाही देना चाहती थी. जिसकी वजह से उसने पुलिस और प्रशासन के लोगों को बयान दिया.

पहली युद्ध विरोधी फिल्म “बंकर” में रेखा भारद्वाज का ये शानदार गीत “लौट के घर जाना”

फिल्मकार जुगल राजा पहली युद्ध विरोधी फिल्म ‘‘बंकर’’ लेकर आ रहे हैं, जिसमें कश्मीर के पुंछ में सीमा पर तैनात लेफ्टिनेंट विक्रम सिंह के जीव की कथा है. जो सीजफायर (युद्धविराम) उल्लंघन के दौरान एक गुप्त बंकर में मोर्टार शेल से गंभीर रुप से जख्मी होने के बावजूद अकेले जिंदा रहते हैं. देश की सुरक्षा में सीमा पर तैनात जवानों से प्रेरित इस फिल्म को विभिन्न फिल्म फेस्टिवल में व्यापक तौर पर सराहा जा चुका है.

यह फिल्म कई महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाती है. मसलन सैनिकों के परिवारों की मानसिक दशा, उनके आपसी रिश्ते और किस तरह सीमा पर तनाव की सबसे बड़ी कीमत एक जवान और उसके परिवार को चुकानी पड़ती है.

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‘‘वैगिंग टेल एंटरटेनमेंट’’ द्वारा प्रस्तुत और ‘‘फाल्कन पिक्चर्स प्रोडक्शन’’ द्वारा निर्मित फिल्म ‘‘बंकर’’ के एक गीत “लौट के घर जाना है” को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित गायिका रेखा भारद्वाज ने अपनी दिल छू लेनेवाली आवाज में गाया है.

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भारतीय सेना और उनके परिवारों को समर्पित 2020 के सबसे ज्यादा दिल को छू लेनेवाले इस शांति गीत का लोकार्पण करते हुए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित गायिका रेखा भारद्वाज ने कहा- ‘‘गीत लौट के घर जाना है’ से बेहतर कोई गाना मैं चुन ही नहीं सकती थी. क्योंकि मैंने पहली बार एक ऐसा गाना गाया है, जिसमें एक राष्ट्रवाद की भावना झलकती है.इसके साथ ही इस फिल्म ‘बंकर’ को बनाने के लिए कई बेहतरीन लोग एक साथ आए हैं.” इस गाने के बोल शकील आजमी ने लिखे हैं और इसके लिए संगीत तैयार किया है कौशल महावीर ने.

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फिल्म की चर्चा करते हुए फिल्म के लेखक निर्देशक जुगल राजा ने कहते हैं- ‘‘जंग में किसी की भी जीत नही होती है. फिर चाहे वह हमारी तरफ का सैनिक हो या दूसरे देश का, हमेशा जवान का परिवार ही नुकसान सहता है. यह फिल्म और गाना सैन्य जीवन की इस वेदना पर प्रकाश डालते हैं.यह गाना फिल्म का अभिन्न अंग है और हमें यह भी लगता है कि रेखाजी केवल एक गायिका नही, बल्कि इस फिल्म का वह एक महत्वपूर्ण पात्र हैं. फिल्म का 95 फीसदी हिस्सा 12 बाय 8 फीट के बंकर में शूट किया गया है. सैनिक के दिमाग के लिए बंकर को प्रतीक के तौर पर इस फिल्म में इस्तेमाल किया गया है, जो हमेशा अपने देश के प्रति कर्तव्य और अपने परिवार के प्रति कर्तव्य को लेकर संघर्ष की स्थिति में रहता है. इस फिल्म के लिए मैंने काफी शोध किया. लेह से लेकर उत्तर पूर्व में तवांग तक यात्रा के दौरान सैनिकों से मिलकर उनसे बातचीत कर मैंने महसूस किया कि उनके परिवार भी अपनी ही तरह से जंग लड़ रहे थे और किसी भी तरह वो एक सैनिक से कम नहीं हैं.”

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फिल्म में लेफ्टिनेंट विक्रम सिंह की प्रमुख भूमिका निभाने वाले अभिजीत सिंह कहते हैं-‘‘फिल्म ‘बंकर’ उन सैनिकों की जीवनी है, जिनका नाम आपने जीवन में कभी नहीं सुना होगा. यह उन सभी लोगों की कहानी है जो एक में पराकाष्ठा तक पहुंचती है. इस बेहतरीन स्क्रिप्ट के लिए दो माह तक मैंने तैयारियां की. यह मौलिक कथा है.’’

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