डा. मधुकर एस भट्ट 

वर्षों बाद अचानक उसे अपने दवाखाने में एक रोगी के रूप में देख कर न तो मैं उसे पहचान पाया और न ही वह मुझे. लेकिन रोग के बारे में सुनने और जांच के दौरान मैं ने उसे पहचान लिया. चिकोटी काटते हुए पूछा, ‘‘क्यों रे, रहीम, पहचाना नहीं? और तुम्हारा मोटापा कहां चला गया?’’ तब तक उस ने भी मुझे पहचान लिया था और चेहरे पर फीकी मुसकराहट लाते हुए बोल पड़ा, ‘‘मेरा मोटापा तुम्हारे ऊपर चढ़ गया, बैलेंस बराबर रखना है न.’’ फिर तो हम दोनों डाक्टर और रोगी के रिश्ते को भूल कर एकदूसरे से लिपट गए और पुराने दिनों की याद में खो गए.

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