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तुम मेरी हो : भाग 1

सारांश का स्थानांतरण अचानक ही चमोली में हो गया. यहां आ कर उसे नया अनुभव हो रहा था. एक तो पहाड़ी इलाका, उस पर जानपहचान का कोई भी नहीं. पहाड़ी इलाकों में मकान दूरदूर होते हैं. दिल्ली जैसे शहर में रह कर सारांश को ट्रैफिक का शोर, गानों की आवाजें और लोगों की बातचीत के तेज स्वर सुनने की आदत सी पड़ गई थी. किंतु यहां तो किसी को देखने के लिए भी वह तरस जाता था. जिस किराए के मकान में वह रह रहा था, वह दोमंजिला था. ऊपर के घर से कभीकभी एक बच्चे की मीठी सी आवाज कानों में पड़ जाती थी. पर कभी आतेजाते किसी से सामना नहीं हुआ था उस का.

उस दिन रविवार को नाश्ता कर के वह बाहर लौन में कुरसी पर आ कर बैठ गया. पास ही मेज पर उस ने लैपटौप रखा हुआ था. कौफी के घूंट भरते हुए वह औफिस का काम निबटा रहा था, तभी अचानक मेज पर रखे कौफी के मग में ‘छपाक’ की आवाज आई. सारांश ने एक तरफ जा कर कौफी घास पर उड़ेल दी. इतनी देर में ही पीछे से एक बच्चे की प्यारी सी आवाज सुनाई दी, ‘‘अंकल, मेरा मोबाइल.’’

सारांश ने मुड़ कर बच्चे की ओर देखा और मुसकराते हुए पास रखे टिशू पेपर से कौफी में गिरे हुए फोन को साफ करने लगा.

‘‘लाइए अंकल, मैं कर लूंगा,’’ कहते हुए बच्चे ने अपना नन्हा हाथ आगे बढ़ा दिया.

किंतु फोन सारांश ने साफ कर दिया और बच्चे को थमा दिया. बच्चा जल्दी से फोन को औन करने लगा. लेकिन कईर् बार कोशिश करने के बाद भी वह औन नहीं हुआ. बच्चे का मासूम चेहरा रोंआसा हो गया.

उस की उदासी दूर करने के लिए सारांश बोला. ‘‘अरे, वाह, तुम्हारा फोन तो छलांग मार कर मेरी कौफी में कूद गया था. अभी स्विमिंग पूल से निकला है, थोड़ा आराम करने दो, फिर औन कर के देख लेना. चलो, थोड़ी देर मेरे पास बैठो, नाम बताओ अपना.’’

‘‘अंकल, मेरा नाम प्रियांश है,’’ पास रखी दूसरी कुरसी पर बैठता हुआ वह बोला, ‘‘पर यह मोबाइल औन क्यों नहीं हो रहा, खराब हो गया है क्या?’’ चिंतित हो कर वह सारांश की ओर देखने लगा.

‘‘शायद, पर कोई बात नहीं. मैं तुम्हारे पापा से कह दूंगा कि इस में तुम्हारी कोई गलती नहीं है, अपनेआप छूट गया था न फोन तुम्हारे हाथ से?’’

‘‘हां अंकल, मैं हाथ में फोन को पकड़ कर ऊपर से आप को देख रहा था,’’ भोलेपन से उस ने कहा.

‘‘फिर तो पापा जरूर नया फोन दिला देंगे तुम्हें. हां, एक बात और, तुम इतने प्यारे हो कि मैं तुम्हें चुनमुन नाम से बुलाऊंगा, ठीक है?’’ सारांश ने स्नेह से प्रियांश की ओर देखते हुए कहा.

‘‘बुला लेना चुनमुन कह कर, मम्मी भी कभीकभी मुनमुन कह देती हैं मु झे. पर मेरे पापा तो बहुत दूर रहते हैं. मु झ से कभी मिलने भी नहीं आते. अब मैं नानी से फोन पर बात कैसे करूंगा?’’ कहते हुए चुनमुन की आंखें डबडबा गईं.

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सारांश को चुनमुन पर तरस आ गया. प्यार से उस के गालों को थपथपाता हुआ वह बोला, ‘‘चलो, हम दोनों बाजार चलते हैं, मैं दिला दूंगा तुम को मोबाइल फोन.’’

‘‘पर अंकल, मेरी मम्मी नहीं मानेंगी न,’’ चुनमुन ने नाक चढ़ाते हुए ऊपर अपने घर की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘अरे, आप की मम्मी को मैं मना लूंगा. हम दोनों तो दोस्त बन गए न, तुम्हारा नाम प्रियांश और मेरा सारांश. चलो, तुम्हारे घर चलते हैं,’’ कहते हुए सारांश ने चुनमुन का हाथ थाम लिया और सीढि़यों पर चढ़ना शुरू कर दिया.

दरवाजे पर नाइटी पहने खड़ी गौरवर्ण की आकर्षक महिला शायद चुनमुन का इंतजार कर रही थी. सारांश को देख कर वह एक बार थोड़ी सकपकाई, फिर मुसकरा कर अंदर आने को कहती हुई आगेआगे चलने लगी. भीतर आ कर सारांश ने अपना परिचय दिया.

उस के बारे में वह केवल इतना ही जान पाया कि उस का नाम शीतल है और पास के ही एक विद्यालय में अध्यापिका है. चुनमुन ने मोबाइल की घटना एक सांस में बता दी शीतल को, और साथ ही यह भी कि अंकल ने उस का नाम चुनमुन रखा है, इसलिए शीतल भी उसे इसी नाम से बुलाया करे, मुनमुन तो किसी लड़की के नाम जैसा लगता है.

शीतल रसोई में चली गई और सारांश चुनमुन से बातें करने लगा. तब तक शीतल फू्रट जूस ले कर आ गई. सारांश ने शाम को बाजार जाने का कार्यक्रम बना लिया. शीतल को भी बाजार में कुछ काम था. पहले तो वह साथ जाने में थोड़ी  िझ झक रही थी, पर सारांश के आग्रह को वह टाल न सकी.

तीनों शाम को सारांश की कार में बाजार गए और रात को बाहर से ही खाना खा कर घर लौटे. बाजार में चुनमुन सारांश की उंगली पकड़े ही रहा. सारांश भी कई दिनों से अकेलेपन से जू झ रहा था. इसलिए उसे भी उन दोनों के साथ एक अपनत्व का एहसास हो रहा था. शीतल के चेहरे पर आई चमक को सारांश साफसाफ देख पा रहा था. वह खुश था कि पड़ोसी एकदूसरे के साथ किस प्रकार एक परिवार की तरह जु

उस दिन के बाद चुनमुन अकसर सारांश के पास आ जाया करता था, सारांश भी कभीकभी उन के घर जा कर बैठ जाता था. सारांश को शीतल ने बताया कि उस के मातापिता हिमाचल प्रदेश में रहते हैं. ससुराल पक्ष के विषय में उस ने कभी कुछ नहीं बताया. सारांश भी अकसर उन को अपने मातापिता व छोटी बहन सुरभि के विषय में बताता रहता था. पिता दिल्ली में एक व्यापारी थे जबकि छोटी बहन एक साल से मिस्र में अपने पति के साथ रह रही थी.

उस दिन सारांश औफिस में बाहर से आए हुए कुछ व्यक्तियों के साथ व्यस्त था. एक महत्त्वपूर्ण बैठक चल रही थी. उस के फोन पर बारबार चुनमुन का फोन आ रहा था. सारांश ने 3-4 बार फोन काट दिया पर चुनमुन लगातार फोन किए जा रहा था. बैठक के बीच में ही बाहर जा कर सारांश ने उस से बात की.

चुनमुन को तेज बुखार था. शीतल ने डाक्टर को दिखा कर दवाई दिलवा दी थी और लगातार उस के पास ही बैठी थी. पर चुनमुन तो जैसे सारांश को ही अपनी पीड़ा बताना चाहता था. सारांश के दुलार से मिला अपनापन वह अपने नन्हे से मन में थाम कर रखना चाहता था.

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सारांश ने बैठक में जा कर सब से क्षमा मांगी और अपने स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति को बैठा कर औफिस से सीधा चुनमुन के पास आ गया. उसे देखते ही चुनमुन खिल उठा. शीतल भी मन ही मन राहत महसूस कर रही थी. चुनमुन ने सारांश को अपने घर कपड़े बदलने भी तभी जाने दिया जब उस ने रात को चुनमुन के घर ठहरने का वादा किया. शीतल के आग्रह पर सारांश रात का खाना उन के साथ ही खाने को तैयार हो गया.

तेज बुखार के कारण चुनमुन की नींद बारबार खुल रही थी, इसलिए शीतल और सारांश उस के पास ही बैठे थे. अपनेपन की एक डोर दोनों को बांध रही थी. अपने जीवन के पिछले दिन दोनों एकदूसरे के साथ सा झा कर रहे थे. सारांश का जीवन तो कमोबेश सामान्य ही बीता था, पर शीतल एक भयंकर तूफान से गुजर चुकी थी.

कुछ वर्षों पहले वह अपनी दादी के घर हिमाचल के सुदूर गांव में गई थी. उन का गांव मैक्लोडगंज के पास पड़ता था जहां अकसर सैलानी आतेजाते रहते हैं. एक रात वह ठंडी हवा का आनंद लेती हुई कच्ची सड़क पर मस्ती से चली जा रही थी. अचानक एक कार उस के पास आ कर रुकी. पीछे से किसी ने उस का मुंह दबोच लिया और उसे स्त्री जन्म लेने की सजा मिल गई.

अंधेरे में वह उस दानव का चेहरा भी न देख पाई और वह तो अपने पुरुषत्त्व का दंभ भरते हुए चलता बना. उसे तो पता भी नहीं कि एक नन्हा अंकुर वह वहीं छोड़ कर जा रहा है. शीतल का नन्हा चुनमुन. मातापिता ने शीतल पर चुनमुन को अनाथाश्रम में छोड़ कर विवाह करने का दबाव बनाया पर वह नहीं मानी. लोग तरहतरह की बातें कर के उस के मातापिता को तंग न करें, इसलिए उस ने घर से दूर आ कर रहने का निर्णय कर लिया. चुनमुन उस के लिए अपनी जान से बढ़ कर था.

बालों के लिए बेहद फायदेमंद है स्टीम लेना

स्‍टीम चेहरे के लिए जितना फायदेमंद है ठीक उतना ही फायदेमंद बालों के लिये भी है. आप चाहें तो ब्‍यूटी पार्लर जा कर या फिर अपने घर में ही तौलिये को गरम पानी में डुबो कर बालों को स्‍टीम दे सकती हैं. आइये जानते हैं बालों पर स्‍टीम दिये जाने से क्‍या लाभ होते हैं.

हेयर पोर खुलते हैं

बालों में तेल लगाने से पहले अपने बालों को स्‍टीम करें, इससे बालों के पोर खुल जाते हैं. अगर बालों के पोर्स बंद रहेंगे तो उसमें तेल अंदर तक नहीं जा पाएगा और आपके बालों को सही पोषण नहीं मिल पाएगा. स्‍टीम से जड़े मजबूत बनती हैं.

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स्‍कैल्‍प की सफाई

अपने स्‍कैल्‍प को रोजाना साफ करने के लिये स्‍टीम लीजिये. वैसे तो, बालों को शैंपू से धोने पर भी स्‍कैल्‍प साफ हो जाती है, लेकिन इतना ही काफी नहीं होता. अगर आप अपने स्‍कैल्‍प को पास से देखेंगी तो पाएंगी की वह गंदी है और इस गंदगी को बिल्‍कुल साफ करने के लिये स्‍टीम की जरुरत पड़ती है.

बाल बढ़ते हैं

अगर आपके बालों की ग्रोथ अच्‍छी नहीं है, तो स्‍टीम लेना शुरु कर दें. इससे जहां कहीं पर भी बाल कम होंगे वह स्‍टीम दा्रा निकलने लगेंगे.

हेयर स्‍टाइल

गीले बालों में हेयरस्‍टाइल बनाना बहुत मुश्‍किल काम होता है. लेकिन अगर आप भाप ले कर अपने बालों में स्‍टाइल बनाएंगी तो आपको आसानी होगी. इससे बाल बिल्‍कुल भी गीले नहीं होते बल्कि इससे बाल उतने ही गीले होते हैं, जितनी आपको जरुरत होती है.

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मिलावट : भाग 1

कमलाजी के दोगलेपन को देख कर बीना चिढ़ उठती थी. वह उन के इस व्यवहार के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक तथ्य तक पहुंचना चाहती थी. और जिस दिन उसे वजह पता चली तो उस पर विश्वास करना बीना के लिए मुश्किल हो रहा था.

‘‘वाह बीनाजी, आज तो आप कमाल की सुंदर लग रही हैं. यह नीला सूट और सफेद शौल आप पर इतना फब रहा है कि क्या बताऊं. मेरे साहब को भी नीला रंग बहुत पसंद है. जब भी खरीदारी करने जाओ, यही नीला रंग सामने रखवा लेंगे.’’

कमलाजी के जानेपहचाने अंदाज पर उस दिन बीना न मुसकरा पाई और न ही अपनी प्रशंसा सुन कर पुलकित ही हो पाई. सदा की तरह हर बात के साथ अपने पति को जोड़ने की उन की इस अनोखी अदा पर भी उस दिन वह न तो चिढ़ पाई और न ही तुनक पाई.

‘‘कमलाजी हर बात में अपने पति को क्यों खींच लाती हैं?’’ बीना ने सुमन से पूछा.

‘‘अरे भई, बहुत प्यार होगा न उन्हें अपने पति से,’’ सुमन ने उत्तर दिया.

‘‘फिर भी, कालेज के स्टाफरूम में बैठ कर हर समय अपनी अति निजी बातों का पिटारा खोलना क्या ठीक है?’’ बीना ने एक दिन सुमन के आगे बात खोली, तब हंस पड़ी थी सुमन.

‘‘कई लोगों को अपने प्यार की नुमाइश करना अच्छा लगता है. लोगों में बैठ कर बारबार पति का नाम, उस की पसंदनापसंद का बखान करना भाता है. भई, अपनाअपना स्वभाव है. अब तुम्हीं को देखो, तुम तो पति का नाम ही नहीं लेती हो.’’

‘‘अरे, जरूरी है क्या यह सब?’’

बीना की बात सुन कर सुमन खिलखिला कर हंसने लगी थी. फिर उस के बदले तेवर देख कर सुमन ने उस का हाथ थपथपा कर पुचकार दिया था, ‘‘चलो, छोड़ो, प्रकृति ने अनेक तरह के प्राणी बनाए हैं. उन में एक कमलाजी भी हैं, सुन कर  झाड़ दिया करो, दिल से क्यों लगाती हो?’’

‘‘अरे, मैं भला दिल से क्यों लगाऊंगी. इतनी गंभीर नहीं हूं मैं, और न ही मेरा दिल इतना…’’

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बीना की बात को बीच में ही काटते हुए सुमन बोली, ‘‘चलो, छोड़ो भी. लो, समोसा खाओ.’’

मस्त स्वभाव की सुमन स्थिति को सदा हलकाफुलका बना कर देखती थी. बीना को कालेज में आए अभी कुछ ही समय हुआ था और इस बीच सुमन से उस का दिल अच्छा मिल गया था.

कभीकभी उसे सुमन बड़ी रहस्यमयी लगती थी. ऐसा लगता था जैसे बहुतकुछ अपने भीतर वह छिपाए हुए है. सुमन किसी भी स्थिति की समीक्षा  झट से कर के दूध पानी अलगअलग कर सारा  झं झट ही समाप्त कर देती है.

‘‘देखो बीना, किसी बात को अधिक गंभीरता से सोचने की जरूरत नहीं है. रात गई बात गई, बस. समाप्त हुआ न सारा  झमेला,’’ सुमन ने बीना को सम झाया. वह बात को  झट से एक सुखद मोड़ दे देती, मानो कहीं कुछ घटा ही नहीं.

‘‘अरे, वाह नीमाजी, आज तो आप बहुत सुंदर लग रही हैं.’’

एक सुबह बीना के सामने ही कमलाजी ने उस की एक सहयोगी नीमा की जी खोल कर तारीफ की थी, मगर जैसे ही वह क्लास लेने गई, पीछे से मुंह बिचका कर यह कह कर हंसने लगीं, ‘‘कैसी गंदी लग रही है नीमा. एक तो कालीकलूटी सूरत और ऊपर से ऐसा रंग, मु झे तो मितली आने लगी थी.’’

कमलाजी के इस दोगले आचरण को देख कर बीना अवाक रह गई. एक पढ़ीलिखी, कालेज की प्रोफैसर से उसे इस तरह के आचरण की आशा न थी.

‘‘मेरे पति को भी इस तरह के चटक रंग पसंद नहीं हैं. शादी में मेरी मां की ओर से ऐसी साड़ी मिली थी, पर उन्होंने कभी मु झे पहनने ही नहीं दी. मैं तो कभी पति की नापसंद का रंग नहीं पहनती. क्या करें, जिस के साथ जीना हो उस की खुशी का खयाल तो रखना ही पड़ता है,’’ कमलाजी के मुंह से इस तरह की बातों को सुन कर तब बीना को अपनी प्रशंसा में कहे गए कमला के शब्द  झूठे लगे थे. उसे लगा था कि उस की तारीफ में कमलाजी जो कुछ कहती हैं उस का दूसरा रूप यही होता होगा जो उस ने अभीअभी नीमा के संदर्भ में देखा है. उस के बाद तो बीना कभी भी कमलाजी के शब्दों पर विश्वास कर ही नहीं पाई.

कमलाजी के शब्दों पर सदा  झल्ला ही पड़ती थी. एक दिन बोल पड़ी थी, ‘‘हांहां, कमलाजी, आते समय मैं ने भी शीशा देखा था. वास्तव में सुंदर लग रही थी.’’

‘‘आप को आतेआते शीशा देखना याद रहता है क्या? मु झे तो समय ही नहीं मिलता. सुबहसुबह कितना काम रहता है. सुबह के बाद कहीं देररात जा कर चारपाई नसीब होती है. दिनभर काम करतेकरते कमर टूट जाती है. ऊपर से पतिदेव का कहना न मानो, तो मुसीबत. हम औरतों की भी क्या जिंदगी है. मैं तो सोच रही हूं कि नौकरी छोड़ दूं. फिर मेरे पति भी कहते हैं कि यह क्या, 3 हजार रुपए की नौकरी के पीछे तुम मेरा घर भी बरबाद कर रही हो.’’

‘‘तो छोड़ दीजिए नौकरी. आप के पति की आमदनी अच्छी है और आप शाम तक इतना थक भी जाती हैं, तो जरूरत भी क्या है?’’ बीना ने तुनक कर उत्तर दिया था.

‘‘बीना, चलो, तुम्हारी क्लास है,’’ सुमन उस की बांह पकड़ कर उसे बाहर ले आई थी, ‘‘क्यों सुबहसुबह कमलाजी से उल झ रही हो?’’

‘‘मु झे ऐसे दोगले इंसान दोमुंहे सांप जैसे लगते हैं, सुमनजी. मुंह पर कुछ और पीठपीछे कुछ. और जब देखो, अपनी राय दूसरों को देती रहती हैं.’’

‘‘बीना, तुम वही कमजोरी दिखा रही हो. मैं ने कहा न, इस तरह के लोगों को सुनाअनसुना कर देना चाहिए.’’

‘‘सुमनजी, आप भी बस…’’

‘‘देखो बीना, यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि मनुष्य अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए उसी कमजोरी के न होने का ढोंग बड़े जोरशोर से करता है. मन में किसी तरह की कोई कुंठा हो तो दूसरों का मजाक उड़ा कर उस कुंठा को शांत करता है. ऐसे लोग दया के पात्र होते हैं. उन पर हमें क्रोध नहीं करना चाहिए.’’

‘‘क्या कमजोरी है कमलाजी को? अच्छीखासी सुंदर हैं. अमीर घर से संबंध रखती हैं. पति उन पर जान छिड़कता है. इन के मन में क्या कुंठा है?’’

‘‘कोई तो होगी. हमें क्या लेनादेना. हम यहां नौकरी करने आते हैं, किसी की कुंडली जानने नहीं.’’

चुप रह गई थी बीना. सुमन उस से उम्र में बड़ी थी, इसलिए आगे बहस करना उसे अच्छा न लगा था.

एक शाम बीना परिवार समेत सुमन के घर गई थी. तब सुमन ने बड़े प्यार से, बड़ी बहन की तरह उसे सिरआंखों पर बिठाया था.

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‘‘मेरे बेटे से मिलो. ये देखो, मेरे बच्चे के जीते हुए पुरस्कार,’’ फिर बेटे की तरफ देख कर बोली, ‘‘बेटे, ये बीना मौसी हैं. मेरे साथ कालेज में पढ़ाती हैं.’’

कालेज में शांत और संयम से रहने वाली सुमन बीना को कुछ दिखावा सा करती प्रतीत हुई थी. बारबार अपने बेटे की प्रशंसा और उस की उपलब्धियों का बखान करती हुई, उस के द्वारा जीते गए कप व अन्य पुरस्कार ही दिखाती रही.

इंडिया वॉइस फेस्ट 2019 के पुरस्कार से सम्मानित हुए दिग्गज गायक सुदेश भोसले

ज्येष्ठ पार्श्व गायक और प्रशंसित आवाज के अभिनेता सुदेश भोसले का संगीत की दुनिया में योगदान अज्ञात नहीं है. हालांकि, कम ही लोग जानते हैं कि उनकी आवाज में अभिनय से उन्हें महारत हासिल है और उन्हें इंडस्ट्री में सराहना मिली है.

हाल ही में सुदेश भोसले को वॉयस एक्टिंग के शिल्प में उनके अनुकरणीय योगदान के लिए इंडिया वॉयस फेस्ट 2019 से सम्मानित किया गया. बांद्रा में रंग शारदा ऑडिटोरियम में आयोजित इसके दूसरे संस्करण में इंडिया वॉयस फेस्ट 2019 को अखिल भारतीय आवाज कलाकारों, रेडियो के डबिंग कलाकारों, फिल्मों या टीवी द्वारा जो पर्दे के पीछे से मदद करते हैं उन्हे समर्पित था.

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“अक्सर, कुछ अभिनेता अपनी खुद की डबिंग नहीं करते हैं. हम अभिनेताओं को आवाज देते हैं, “सुदेश भोसले कहते हैं,” अमोल सेन, हरीश भीमनी जूरी का हिस्सा थे जिन्होंने मुझे इस साल डबिंग और वॉयस कलात्मकता की दुनिया में मेरे योगदान के लिए इस पुरस्कार के लिये मेरा चुनाव किया. ”

यह सम्मान पाने पर सुदेश भोसले ने साझा किया, “यह वास्तव में अच्छा लगा. इस दौरान मेरी वरिष्ठ कलाकारों के साथ-साथ युवा पीढ़ी के कलाकारों से भी मुलाकात हुई. ”उनकी सलाह चाहने वाले मौजूद युवा को सलाह देते हुए उन्होंने कहा, “बस पर्दे के पीछे काम करने पर ना अड़े, सामने की तरफ आकर अपनी कला उजागर करने की कोशिश करें और हमेशा कैमरे के पीछे न रहें. आप अपना नाम, शोहरत कमाने के साथ-साथ और पैसा कमाएंगे.”

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हर कोई नहीं जानता की दिग्गज अभिनेता संजीव कुमार के आकस्मिक निधन के बाद, यह सुदेश भोसले थे जो उनकी आवाज बने, उन्होंने दिवंगत अभिनेता की 5 फिल्मों को उनकी आवाज में डब किया. इतना ही नहीं उन्होंने तेजाब में अनिल कपूर की आवाज़ को भी डब किया. संजीव कुमार और अनिल कपूर के अलावा, बहुमुखी गायक ने अक्सर क्षेत्रीय भाषाओं में महानायक अमिताभ बच्चन के लिए डब करते हैं

जेएनयू में एबीवीपी और वाम छात्रों के बीच हुआ टकराव, स्टूडेंट और टीचर हुए घायल

जेएनयू विश्वविद्यालय का जिक्र हमेशा उस वक्त होता था, जब वहां से निकला कोई छात्र या छात्रा दुनिया में हिंदुस्तान का परचम लहराता था. लेकिन अब इस विश्वविद्यालय की आत्मा को बार-बार झकझोरने की कोशिशें हो रही हैं. इस विश्वविद्यालय की रूह को जख्मी करने के लिए कभी पुलिस तो कभी विपरीत विचारधारा वाले लोग आगे रहते हैं. रविवार को शाम भी कुछ ऐसा ही हुआ.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) परिसर में रविवार शाम अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के छात्र नेताओं और वामपंथी छात्रों के बीच हुई हिंसक झड़प में जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आइशी घोष सहित कई अन्य विद्यार्थी बुरी तरह से घायल हो गए. वीडियो में घोष के शरीर से खून निकलता देखा जा सकता है. जानकारी के मुताबिक लोहे की रोड से उसकी आंख पर हमला किया गया. प्राथमिक उपचार के लिए उसे पास के अस्पताल ले जाया गया है.

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लाठियों-डंडों के साथ कैंपस में दाखिल हुए थी भीड़…

महासचिव सतीश चंद्र भी इस दौरान घायल हो गए और कथित तौर पर कुछ शिक्षकों पर भी हमला किया गया. घटनास्थल से मिली खबरों के अनुसार, मुनिरका इलाके से कुछ बाहरी लोग लाठियों-डंडों के साथ कैंपस में दाखिल हुई थी. घटना के बाद बदमाश कथित तौर पर फरार हो गए.

एबीवीपी के छात्र नेताओं ने लगाया था ये आरोप 

इससे पहले एबीवीपी के छात्र नेताओं ने कथित तौर पर आरोप लगाया कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पेरियार छात्रावास के छात्रों के साथ वामपंथी छात्रों ने मारपीट कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया.

एबीवीपी की जेएनयू यूनिट के अध्यक्ष दुर्गेश ने कहा, “करीब चार से पांच सौ वाम सदस्य पेरियार छात्रावास में इकट्ठा हुए, यहां तोड़फोड़ कर जबरन घुसपैठ की और अंदर बैठे एबीवीपी के कार्यकर्ताओं को पीटा.” एबीवीपी ने दावा किया कि उसके अध्यक्ष पद के उम्मीदवार मनीष जांगिड़ को बुरी तरह से घायल किया गया है और शायद मारपीट के बाद उसका हाथ टूट गया है.

दुर्गेश ने आगे कहा कि छात्रों पर पत्थर फेंके गए, जिसके चलते कुछ के सिरों पर चोटें आई हैं। उन्होंने कहा, “अंदर मौजूद छात्रों पर उन्होंने पत्थर और डंडे बरसाए.” हालांकि, वामपंथी छात्रों के नेतृत्व वाले जेएनयूएसयू ने इस दावे को तुरंत खारिज करते हुए कहा कि एबीवीपी और प्रशासन झूठी कहानी फैलाने में लगे हुए हैं.

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जेएनयूएसयू के महासचिव सतीश चंद्र के मुताबिक एबीवीपी और प्रशासन बढ़ी हुई फीस को लेकर छात्रों के प्रदर्शन को निशाना बना रहे हैं. यह और कुछ नहीं छात्रों और समाज को गुमराह करने के लिए लगाए जा रहे झूठे आरोप हैं.” इस बीच दक्षिणपंथी संगठन एबीवीपी ने कहा है कि उन्होंने फैसला किया है कि जैसे ही घायल हुए उनके साथी प्राथमिक उपचार के बाद लौटेंगे वह इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराएंगे.

छोटी सरदारनी में होगा 2 महीने का लीप, क्या नया मोड़ लेगी मेहर और परम की जिंदगी?

शो ‘छोटी सरदारनी’ में धीरे-धीरे मेहर की जिंदगी में परेशानियां कम हो रही है. और आज के एपिसोड में दिखेगा लीप. मेहर, सरब और परम की जिंदगी में आने वाला ये लीप शो में नया मोड़ लाने वाला है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…

मेहर पहुंची अस्पताल

अब तक आपने देखा कि सरब मेहर को ढूंढता है, लेकिन वह उसे नहीं मिलती. दूसरी तरफ मेहर अबौर्शन के लिए अस्पताल पहुंच जाती है. जहां डौक्टर अबौर्शन की तैयारी करते हुए मेहर को बेहोशी का इंजेक्शन लगा देते हैं.

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मेहर और उसके बच्चे को बचाती है हरलीन

मेहर के औपरेशन शुरू होने से पहले ही हरलीन आकर डौक्टर को रोक देती है. वहीं सरब भी पहुंच जाता है और मेहर और उसका बच्चा बिल्कुल सही सलामत रहते हैं.

लीप के बाद दिखेगा ये नया ट्विस्ट

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मेहर और सरब का परिवार परम के दस्तरबंदी का फंक्शन मनाते हुए नजर आएंगे. दस्तरबंदी सेलिब्रेशन के लिए सरब पूरे घर को डेकोरेट करेगा. वहीं मेहर और परम सेलिब्रेशन के लिए तैयार होते हुए नजर आएंगे. दस्तरबंदी सेलिब्रेशन के वक्त भी मेहर और हरलीन के बीच कड़वाहट देखने को मिलेगी.

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अब देखना ये है कि लीप के बाद कहीं गिल फैमिली की खुशियों को किसी की नजर तो नही लग जाएगी? जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवार, रात 7:30 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध की आशंका से भारत के व्यापार पर संकट

इस वक्त ईरान और अमेरिका के बीच तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थित बनी हुई है और ऐसे में कई ऐसे देश हैं जिनपर संकट के बादल मंडरा रहे हैं क्योंकि इसके कारण सिर्फ ईरान और अमेरिका ही नहीं बल्कि कई देश प्रभावित होगें साथ ही भारत भी प्रभावित होगा क्योंकि ईरान भारत का मुख्य चाय उद्योग का आयात करने वाला देश है और युद्ध की स्थिति में वो चाय का आयात बंद हो सकता है तो उसपर तो खतरा मंडरा ही रहा है. साथ ही बासमती चावल के आयत पर भी रोक लगा दी है.

आपको बता दें कि ईरान और अमेरिका के ऐसे हालात को देखते हुए ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स असोसिएशन(AIREA) ने कहा है कि जब तक हालात काबू में ना हो जाए अर्थात सामान्य ना हो जाए तब तक बासमती चावल का निर्यात रोक दें. अब आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि इससे व्यापार पर कितना असर पड़ेगा साथ ही घरेलू कीमतों पर भी असर पड़ेगा.  ईरान भारत को कच्चे तेल,उर्वरक और केमिकल्स का मुख्य़ रूप से आयात करता है और भारत से चाय,कॉफी,बासमती चावल,मोटे अनाज,मसाले इनका मुख्य रुप से आयात करता है. तो लाजमी है कि इसका असर तो पड़ेगा ही.

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फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सर्पोट आर्गेनाइजेशन(FIEO) जो कि निर्यातकों का प्रमुऱ संगठन है उसने भी अपनी आशंका जताई है. आपको बता दूं कि ईरान और अमेरिका के बीच ये युद्ध जैसी स्थिति इसलिए पैदा हुई है क्योंकि शुक्रवार को अमेरिका के ड्रोन हमले में ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की मौत हो गई और ईरान ने अगली सुबह ही वहां जामकरन मस्जिद पर लाल झंडा फहराकर अमेरिका को युद्ध के लिए ललकार दिया.

ईरान की उस मस्जिद पर लाल झंडा फहराने का मतलब यही होता है कि अपने देश के लोगों को ये सूचना दे रहा कि युद्ध की स्थिति पैदा हो रही है आप सब तैयार रहें. ये मस्जिद ईरान का बहुत ही पवित्र मस्जिद माना जाता है. हालांकि जनरल सुलेमानी की मौत के बाद ईरान ने भी अमेरिका को जवाब दिया है लेकिन फिर भी स्थिति सामान्य बनती नहीं दिख रही है और दोनो ही देशों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है. ऐसे में कई देशों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.

ईरान के इस युद्ध जैसे हालात के बाद अमेरिका भी कड़ा टक्कर देने को तैयार है हालांकि अमेरिका ने दावा किया है कि सुलेमानी भारत के खिलाफ आतंकी हमले कि साजिश में शामिल था लेकिन क्या सच है और क्या झूठ ये कोई नहीं जानता. और अगर यहां पर हम सिर्फ व्यापार की बात करें तो इस पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता हुआ नजर आ रहा है.

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आप ईरान औऱ अमेरिका की इन धमकियों से अंदाजा लगा सकते हैं कि परिणाम कितना खतरनाक हो सकता है? ईरान ने अमेरिका को सख्त धमकी दी है और साथ ही अमेरिका ने भी ईरान को धमकी दे डाली की यदि ईरान ने हमला किया तो अमेरिका ईरान की 52 खास जगहों पर हमला करेगा और चुप तो बिल्कुल नहीं बैठेगा. हालांकि अब स्थिति क्या बनेगी ये तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन व्यापार पर इसका खास असर पड़ता दिख रहा है.

आखिर क्यों होती है छोटी जात की बहू से बदसलूकी

अंजलि अपने कुलीग सौमित्र से कोर्ट मैरिज करके उसके घर तो आ गयी, मगर उसे वहां कोई अपनापन महसूस नहीं होता है. उस घर की चीजों को हाथ लगाने में उसे संकोच होता है. पता नहीं कौन किस बात पर उसे टोक दे. खासतौर पर किचेन और घर के मंदिर में रखी चीजों को छूने पर उसकी सास बहुत रोक-टोक करती है. अंजलि और सौमित्र ने लव मैरिज की है. उनकी शादी पर दोनों परिवारों की ओर से किसी ने एतराज तो नहीं किया, लेकिन शादी कोई ज्यादा धूमधाम से नहीं हुई. कोर्ट में शादी रजिस्टर करने के बाद कुछ करीबी दोस्तों और कुछ नजदीकी रिश्तेदारों को छोटा सा रिसेप्शन ही दिया गया था. सौमित्र का कहना था कि वह बेवजह का दिखावा और खर्चा नहीं करना चाहता है, इसलिए सिम्पल तरीके से शादी होगी. यहां तक कि उसने अंजलि से कोई दान-दहेज भी नहीं लिया. तब अंजलि को उसकी सोच पर काफी गर्व और खुशी महसूस हुई थी. उसे लगा कि सौमित्र उच्च विचारों वाला, दकियानूसी सोच और दिखावे से दूर रहने वाला व्यक्ति है, मगर उसके घर आने के बाद असलियत कुछ और ही निकली. अंजलि सुन्दर-सुशील है, काम करने में माहिर है, अच्छी तनख्वाह पाती है, सौमित्र उससे प्यार तो करता है, मगर यह प्यार नि:स्वार्थ भाव से किया गया प्यार हरगिज नहीं है. यह बातें अंजलि के सामने धीरे-धीरे खुली हैं. सौमित्र के पिता ने अपने डूबते बिजनेस को संभालने के लिए काफी लोन लिया था, जिसके कारण सौमित्र के ऊपर काफी आर्थिक बोझ था. अंजलि से शादी के बाद जब उसकी भी तनख्वाह परिवार में आने लगी तो इससे सौमित्र को काफी राहत मिली. शादी के बाद सौमित्र, उसके पिता और अंजली के ज्वाइंट एकाउंट में तीनों की कमाई जाती है, जिससे घर का खर्चा, लोन की किश्त, सौमित्र के छोटे भाईयों के हॉस्टल और पढ़ाई का खर्च, रिश्तेदारी में लेनदेन आदि होता है.

सौमित्र और अंजलि एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में इंजीनियर हैं. वहीं साथ काम करते हुए दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया और उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया. अंजलि सुन्दर, सुशील और हार्डवर्किंग लड़की है. वह नीच जाति में जरूर पैदा हुई है मगर उसके परिवार का आर्थिक स्टेटस ठीक-ठाक है. उसके पिता भी अच्छी सरकारी नौकरी में हैं. वहीं सौमित्र ऊंची जाति से ताल्लुक रखता है. उसके माता-पिता में ऊंची जाति का दम्भ है. सौमित्र के पिता का तालों का बिजनेस लगभग बर्बाद होने की कगार पर था, जब लोन लेकर उसे थोड़ा दुरुस्त किया गया. पर अभी भी वह पूरी तरह पटरी पर नहीं आया है. ऐसे में सौमित्र की तनख्वाह से ही परिवार का खर्च मुश्किल से चल रहा था. सौमित्र के दो छोटे भाई जो हॉस्टल में रह कर पढ़ रहे हैं, उनका खर्चा भी सौमित्र को वहन करना होता है. अंजलि से शादी के बाद जब उसकी तनख्वाह भी हासिल होने लगी तो सौमित्र को काफी राहत महसूस हुई. सौमित्र ने अंजलि से शादी तो कर ली मगर अपने परिवार में उसको वह मान-सम्मान नहीं दिला पाया, जो अपनी ऊंची जाति की बहू को यहां मिलता. यहां तक कि सौमित्र अंजलि के साथ अपनी मां के गलत व्यवहार के प्रति विरोध भी दर्ज नहीं कर पाता है. वह अपनी पत्नी को समझा-बुझा कर मां से थोड़ी दूरी बनाये रखने का ही सुझाव देता रहता है. वह अंजलि से कहता है कि मां बूढ़ी हैं, उनकी बातों पर गौर मत किया करो, घर की शांति के लिए उनकी हरकतें नजरअंदाज कर दो, उन्हें कितने दिन जीवित रहना है – ज्यादा से ज्यादा पांच साल या दस साल, तुम उनकी तरफ ध्यान मत दिया करो. दरअसल ऐसी बातें वह इसलिए करता है क्योंकि उसे डर बना रहता है कि कहीं मां की किसी बात से आहत होकर अंजलि अपने मायके न चली जाये, अथवा उससे सम्बन्ध विच्छेद करने जैसा कदम न उठा ले. अब इतने सालों में अंजलि ने भी सास की उल्टी-सीधी बातों को इग्नोर करना सीख लिया है, मगर भेदभाव का दंश उसके कोमल मन को यदा-कदा भेदता ही रहता है. नीच होने का दंश जो उसे पहले ही दिन से दिया जा रहा है. पहले ही दिन से उसे यह बात अच्छी तरह बता दी गयी कि तुम्हारा स्थान घर में जरूर है, मगर दिल में नहीं.

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शादी के बाद अंजलि ने जब अपना सूटकेस खोला था, तो कपड़ों पर सबसे ऊपर भगवान की तस्वीर एक लाल कपड़े में लिपटी रखी थी. अंजलि ने श्रद्धापूर्वक उस तस्वीर को निकाल कर घर के मंदिर में अन्य मूर्तियों और तस्वीरों के साथ सजा दी थी. अगले दिन सुबह जब वह नहा-धो कर मंदिर में सिर झुकाने गयी तो देखा कि उसकी लगायी तस्वीर मंदिर से निकाल कर वहीं अलग कुछ दूरी पर रख दी गयी है. उसने जब इस बारे में अपनी सास से पूछा तो उन्होंने कहा कि इसे अपने कमरे में ही लगा लो और वहीं पूजा कर लिया करो. अंजलि को बड़ा धक्का लगा. भगवान को लेकर भेदभाव! उसने अपने पति सौमित्र से इस बात की शिकायत की तो सौमित्र ने उसे प्यार से समझाते हुए अपने बेडरूम के एक कोने में ही उसके भगवान की तस्वीर को स्थापित कर दिया और वहीं उसके लिए पूजा का इंतजाम कर दिया. अंजलि साफ समझ गयी कि इस घर में उसके साथ भेदभाव होगा क्योंकि वह नीच जाति से है. फिर चाहे सौमित्र ने क्यों न उससे प्रेम-विवाह किया हो, मगर ऊंची जाति के अहंकार में ग्रस्त उसकी सास कभी भी उसे अपने मंदिर में पूजा करने की अनुमति नहीं देगी. उसने अपनी इस हरकत से ही अंजलि को बता दिया है कि उसके दिल में अंजलि के लिए कोई जगह नहीं है क्योंकि वह नीच जाति की है.

आज अंजलि की शादी को छह साल हो चुके हैं मगर आज भी अंजलि को लगता है जैसे वह सौमित्र के घर में कोई पेइंग गेस्ट है. जिसकी हर हरकत पर मकान मालकिन की नजर रहती है. वह उसे इसलिए उस घर में रहने दे रही हैं क्योंकि अंजलि अच्छी नौकरी में अच्छा पैसा कमा रही है. घर का खर्चा उसकी कमाई से चल रहा है. सुख-सुविधा की चीजें उसके पैसे से मोल ली जा रही हैं. परिवार का बैंक-बैलेंस बढ़ रहा है. अब अंजलि सोचती है कि शायद सौमित्र ने उससे शादी भी इसलिए की क्योंकि वह नौकरीपेशा है और अच्छी कमाई करती है. हालांकि सौमित्र उससे प्यार करने का पूरा दावा करता है. वह अपनी मां के क्रोध से भी उसे बचा-बचा कर रखता है. उसको साथ लेकर घूमने-फिरने जाता है, उसको शॉपिंग करवाता है, फिल्में दिखाता है, मगर रिश्तेदारों के वहां नहीं ले जाता है. अंजलि के सास-ससुर भी उसकी आमदनी पर तो पूरा हक जमाते हैं, मगर रिश्तेदारों में उसे उठने-बैठने नहीं देते और गाहे-बगाहे अपने व्यवहार से यह बात भी जाहिर कर ही देते हैं कि वह छोटी जाति से है. तीज-त्योहारों पर यह भेदभाव कुछ ज्यादा मुखर हो जाता है. त्योहारों पर भगवान का घर हमेशा उसकी सास ही साफ करती है. वही भगवान को नहलाती-धुलाती है, नये कपड़े पहनाती है, उनका श्रृंगार करती है. वही पूरे मंदिर स्थल को गंगाजल और दूध से धोती-पोंछती है. वही दिया-बत्ती करती है. पूजा-आरती करती है. अंजलि तो बस दूर से ही हाथ बढ़ा कर प्रसाद ले लेती है. त्योहारों पर बनने वाले पकवानों में अंजलि की सास उससे पूरी मदद लेती है, मगर भगवान को चढ़ाए जाने वाले भोग-प्रसाद में उसे हाथ नहीं लगाने देती.

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दूसरों के घर से शादी-ब्याह के न्यौते आते हैं तो अंजलि के सास-ससुर ही शगुन डालने जाते हैं. कभी सौमित्र और अंजलि नहीं जाते. सौमित्र तो हमेशा अपने काम और अपने थके होने का बहाना बना देता है. अब उसके बिना अंजलि अकेले तो कहीं जाने से रही. अंजलि को याद है कि जब उसके मायके में कोई निमंत्रण पत्र आता था तो अंजलि सजधज कर अपने माता-पिता के साथ जाती थी, शगुन चढ़ाती थी, फोटो खिंचवाती थी, फ्लोर पर डांस करती थी, दावत इन्जॉय करती थी, मगर यहां तो कोई उसे साथ ले जाने के लिए पूछता भी नहीं है. अंजलि चाहती है कि वह भी बनाव-श्रृंगार करके सौमित्र के रिश्तेदारों की शादी या बर्थडे पार्टियों में जाए, उनसे जान-पहचान बढ़ाए, लेकिन आजतक उसे कहीं नहीं ले जाया गया. हैरानी तो उसे तब सबसे ज्यादा हुई जब उसकी चचिया सास की बेटी की शादी तय हुई और किसी भी रस्म में उसे आमंत्रित नहीं किया गया. सारे रिश्तेदार वहां इकट्ठा हुए. तरह-तरह की रस्में हुईं. सबने खूब इन्जॉय किया. वाट्सऐप और फेसबुक पर खूब फोटोज शेयर हुईं. फोटोज में सौमित्र के दूर-दराज के रिश्तेदार भी नजर आये, मगर उनमें अंजलि कहीं नहीं थी. वह बस घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक की अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रही थी.

दरअसल अंजलि की सास नहीं चाहती कि उनका कोई रिश्तेदार अंजलि के परिवार, उसके पिता के नाम आदि की पड़ताल करने लग जाए. अब अंजलि किसी से मिलेगी तो उसके माता-पिता के बारे में भी सवाल-जवाब होंगे. लोग उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाहेंगे. अभी तो कई रिश्तेदारों को उसकी जात का पता भी नहीं है. मगर उसके पिता के नाम से उसकी जात का पता चल जाएगा. लोग तरह-तरह की बातें करेंगे. भले वह कितनी खूबसूरत हो, कितनी पढ़ी-लिखी हो, साफ्टवेयर इंजीनियर हो, पति के बराबर तनख्वाह पाती हो, मगर जैसे ही पता चलेगा कि वह नीच जाति की है, लोग नाक-भौं सिकोड़ेंगे, पीठ पीछे बातें करेंगे. इसी सोच के तहत अंजलि की सास उसे रिश्तेदारों से दूर ही रखती है. कोई कभी पूछता भी है कि बहू को साथ नहीं लायी तो वह बहाना बना देती है कि उसे तो ऑफिस से छुट्टी ही नहीं मिलती, या उसकी तबियत ठीक नहीं थी या कुछ और बहाना.

आधुनिकता और रूढ़िवादिता के पाटों के बीच फंसी अंजलि की सास न खुद चैन से जी पा रही है और न अंजलि को जीने दे रही है. इन दोनों के बीच सौमित्र भी पिस रहा है. वह आग और फूस को अलग-अलग रख कर दोनों को खुश रखने की कवायदों में लगा रहता है. इसमें उसका बहुत सारा समय और ऊर्जा बर्बाद होती है. बेटे की कमाई पर आधारित सौमित्र के मां-बाप उसे नीच जाति की लड़की से शादी करने से नहीं रोक पाये क्योंकि तब उनको बहू की कमाई नजर आ रही थी. उनको लगा कि यह लड़की आ गयी तो घर की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी, इसलिए उन्होंने अंजलि को घर में तो जगह दे दी, मगर रूढ़िता से ग्रस्त अपने दिल में नहीं दे पाये. यही वजह है कि अंजलि आज तक सौमित्र के घर को अपना घर नहीं मान पायी. वह न तो अपने सास-ससुर को माता-पिता का दर्जा दे पायी और न अपने पति सौमित्र के प्रेम पर पूरा विश्वास कर पायी. उसे हमेशा यही लगता है कि जब तक वह कमा कर इस घर को दे रही है, तब तक ही वह यहां रह सकती है, जिस दिन उसने कमाना बंद कर दिया, उसे दूध की मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक दिया जाएगा क्योंकि वह नीच जाति की है.

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अंजलि का जीवन बहुत सुखद हो जाता अगर उसके सास-ससुर जाति-धर्म की दकियानूसी सोच से आगे बढ़ कर उसे सच्चे दिल से अपना लेते. तब पढ़ी-लिखी और संवेदनशील अंजलि भी उन्हें अपने माता-पिता से कहीं ज्यादा प्यार और सम्मान देती, और उसके पति सौमित्र को भी इस डर से मुक्ति मिल जाती कि कहीं अंजलि उसे छोड़ कर न चली जाए. यह कहानी सिर्फ एक अंजलि और सौमित्र की नहीं है, बल्कि शहरों और महानगरों में ऐसे बहुतेरे परिवार हैं जहां बुजुर्ग आधुनिकता की चादर के भीतर रूढ़िवादिता को ही पोस रहे हैं. आज की पढ़ीलिखी पीढ़ी पुरातन सोच से मुक्त होना चाहती है. वह शिक्षा और करियर पर विशेष ध्यान दे रही है. इसलिए जाति-धर्म की दीवारें भी ढह रही हैं. कई ऐसे कपल हैं जो माता-पिता की इसी दकियानूसी सोच के चलते ही परिवार से अलग होकर अपना अलग आशियाना बना लेते हैं.

तुम से मिल कर : भाग 2

इतने सारे लोगों के बीच रीना अपने समय का चीथड़ा खोलना नहीं चाहती थी. ऊपर से अनंत, अच्छाखासा, देखनेभालने में तरोताजा इंसान उसे ही एकटक अपनी नजरों से निगलता जा रहा था. रीना ने मां को इशारों से रोकना चाहा लेकिन वे अनंत को पुत्रसम मान आंखों से बहते आसुंओं को पोंछपोंछ कर बताती ही जा रही थीं.

‘‘और है ही कौन मेरा? एक बेटा, वह भी अमेरिका जा कर बस गया. उस ने अमेरिकी लड़की से शादी कर ली और वहीं की नागरिकता भी ले ली. 3 साल में एक बार दर्शन देता है. बेचारी मेरी यह रीना होम साइंस के फाइनल ईयर में अच्छे रैंक से पास हुई, साथ में डेढ़ साल के बेटे को संभालती हुई. बस, सब खत्म हो गया. ऐक्सिडैंट में दामाद की मौत के साथ ही इस की जिंदगी सूनी हो गई. देवर ने शादी की, देवरानी ने इतने जाल रचे कि अब इस का वहां टिकना मुश्किल हो गया है.’’

रीना के रोके न रुक रही थी उस की मां. कई लोग कभी ध्यान देते, कभी अनसुना करते. लेकिन कई मानो में परखा गया कि आत्मकेंद्रित अनंत रीना की मां की बात बड़े ध्यान से सुन रहा था. रीना की मां को भी अरसे बाद कोई अच्छा श्रोता मिला था. वे कहती गईं.

‘‘मैं ही ले आई इसे, वहां क्यों जान खपाए. टीटो भी पल जाएगा हमारे साथ.’’

वे अनंत की ओर उम्मीद से देख रही थीं कि उन्होंने सही ही किया हो, इस पर एक राय मिल जाए.

अनंत उन की बातों में खो चुका था. अचानक जैसे होश आ गया हो, बोला, ‘‘हां, हां, ठीक ही तो किया.’’

इधर शाम होतेहोते अब इक्केदुक्के लोग ही चढ़उतर रहे थे. बल्कि, उतरने वाले ही अधिक थे.

रात के 8 बज रहे थे. लोग डिनर लेना शुरू कर चुके थे. रीना अपने बेटे टीटो को खाना खिलाने की तैयारी करने लगी थी. इतने में रूही को दर्द महसूस हुआ. वह बर्थ पर निढाल हो गई. धीरेधीरे दर्द बढ़ने लगा. भाई से पानी की बोतल मांगी. गरमी ने पानी की बोतल खाली करवा दी थी. रात में अब पानी वाले विके्रता आने वाले नहीं थे और भोर में 5 बजे के बाद ट्रेन पटना पहुंचने वाली थी.

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रूही की हालत धीरेधीरे नाजुक होने लगी. अनंत असहाय सा इधरउधर देखता रहा. ट्रेन में कहां डाक्टर… रीना जल्द अपने गिलास में पानी भर रूही के पास आई. उस की ओर जैसे ही उस ने पानी बढ़ाया, दर्द से ऐंठती रूही ने धीरे से पूछा, ‘‘आप लोग किस जात से हो?’’

रीना की सोच अलग थी. जाति जब इंसान के आपस के प्रेम में दीवारें खड़ी करे, वह त्याज्य हो जाती है, ऐसा मानना था रीना का. वह तिलमिला गई. उस ने पानी का गिलास उस की तरफ बढ़ाए रखा और कहा, ‘‘पहले पानी पी लो, फिर जाति बता देंगे.’’

रूही ने पानी नहीं लिया. रीना की मां ने उस का आशय सम झ रीना से कहा, ‘‘रहने दे, रीना.’’ फिर रूही से मुखातिब होते हुए बोलीं, ‘‘बेटी, हम जाटव हैं, आप लोग… अच्छा, सम झ गई, मिश्रा, चार्ट में देखा तो था.’’

रीना को आरक्षण के कारण अच्छे स्कूल में दाखिला मिल गया था. उस का पति भी विदेश में नौकरी कर चुका था और अब उस का व्यक्तित्व निखर चुका था. रीना कहीं से निम्न जाति की नहीं लगती थी. हां, मां में पुरानापन साफ  झलकता था.

‘‘अब कैसे प्यास बु झेगी, बेटी?’’

अब तक रूही दर्द से छटपटाने लगी थी. रीना वैसे तो कम बोलने वालों में से थी, लेकिन जब बोलने पर आ जाती है तो अच्छेअच्छों की बोलती बंद कर देती है. वह बुत बने खड़े अनंत की ओर देखती हुई बोली, ‘‘पानी जब शरीर के अंदर प्रवेश करता है तो उस का हाइजीन इफैक्ट देखा जाता है, गंदा पानी तो नहीं, विषैला तो नहीं. यह कहां का फंडा पाल रखा है आप लोगों ने, इस जात का पानी और उस जात का पानी. बहन से कहिए कि पानी पी ले, बाद में पीने को तरसेगी क्योंकि दर्द के मारे पी नहीं पाएगी.’’

अनंत था तो बड़ा हट्टाकट्टा, रोबीला सा नौजवान मगर ठेठ लकीर का फकीर. पटना का विशुद्ध ब्राह्मण. बचपन का देखा, सुना, सीखा ही उस की लकीर थी. उस से आगे बढ़ने की न तो उस की मंशा थी और न ही हिम्मत.

‘‘कैसे पिला दें, जी. वह खुद ही नहीं पिएगी. अपना धर्म पहले है.’’

अपनी पंडिताई का सुर बरकरार था उस के अंदाज में.

‘‘कमाल की सोचते हैं, आप लोग. एक नहीं, 2-2 जिंदगियां साथ लिए जा रहे हैं, आप. उन्हें बचाना धर्म नहीं?  कहां पर रहता है आप का धर्म?’’

‘‘आप से बात ही नहीं करनी मु झे,’’ अक्खड़ की तरह वह रीना से मुंह मोड़ बैठ गया.

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हताश सी रीना रूही की स्थिति पर परेशान होने लगी. वह होम साइंस की छात्रा थी. ऐसी स्थिति में प्राथमिक व्यवस्था कर लेने का उसे ज्ञान था. उसे एहसास हो गया था कि गरमी, थकान और अंतिम दिनों में ज्यादा हिलनेडुलने की स्थिति बच्चे के अचानक आगमन का कारण बन सकती है.

इधरउधर से कई चीजों का उस ने जुगाड़ कर लिया. अपने टीटो के दूध बनाने के लिए वह साथ में जार ले जा रही थी और एक फ्लास्क गरम पानी तो उस के पास ही मौजूद था. तत्काल उस ने उसी क्षेत्र में रेलवे में खलासी पद पर कार्यरत अपने मामा को फोन लगाया. वस्तुस्थिति की जानकारी अपनी प्रिय भांजी से पा कर मामा ने तुरंत अगले स्टेशन पर एक डाक्टर को भिजवा दिया. इसी जद्दोजेहद में रूही की छोटी सी बच्ची इस दुनिया में आ चुकी थी. रीना पूरी तरह उन दोनों के लिए जैसे समर्पित हो गई थी.

अनंत साहब ‘मिश्रा’ होने का लबादा ओढ़े, लाचार और अवाक से देखते रहे और रीना उस की ही आंखों के सामने एक यज्ञ को पूर्णाहुति तक पहुंचाने में कामयाब हो गई.

अचानक टिकट बनवाने की वजह से उन्हें इतनी तकलीफ में स्लीपर क्लास में जाना पड़ रहा है. आज रूही की जो स्थिति थी, अगर सब लोग सिर्फ अपने में ही सिमटे रहते, रीना अगर अपने साथ हुए व्यवहार का बुरा मान आगे नहीं आती, तो रूही और बच्चे का तो आज बड़ा बुरा अंजाम होता.

रीना के प्रति अनंत कृतज्ञता कैसे जाहिर करे. अचानक उस ने रीना से पानी मांगा. अवाक सी उसे देखते हुए रीना ने पानी दे दिया. अनंत ने रूही को दिखा कर पूरा पानी पी लिया और रूही से कहा, ‘‘जा, बता देना घर में, अब से मैं जाटव के हाथ का ही पानी पिऊंगा.’’

तुम से मिल कर : भाग 1

नी पिएगी?’’ अनंत ने रूही से पूछा.

ट्रेन शोर के साथ दौड़ती जा रही थी. रूही अपने 8 महीने के पेट के साथ निढाल दिख रही थी.

अप्रैल का आखिरी हफ्ता, गरम हवा के थपेड़े और ट्रेन में बैठे पसीने की मार से तरबतर लोग. रिजर्र्वेशन के बावजूद डब्बा दिन में पैसेंजर्स से ठसाठस भरा था.

पटना की ओर रुख था अनंत और रूही का. अनंत अपनी बहन रूही को डिलिवरी के लिए मायके ले जा रहा था. यह सबकुछ आखिरी वक्त में तय हुआ, वरना ससुराल वाले रूही की डिलिवरी अपने पास भोपाल में ही कराना चाहते थे. दरअसल, ऐन वक्त पर रूही की ननद के बेटे का गिर कर हाथ टूट जाना, ननद का नौकरी में होना, उस की सास का अपनी बेटी के पास चले जाना आदि तय कार्यक्रम में हेरफेर का कारण बने.

ट्रेन बढ़ती जा रही थी, हां, यात्री उस से कहीं ज्यादा स्पीड में डब्बे में आते जा रहे थे. गरमी की छुट्टी भी एक वजह थी यात्रियों की अधिकता की. लोग रूही की स्थिति देख आपस में चिपक कर बैठे थे. दोपहर की गरमी से परेशान रूही बारबार पानी मांग रही थी. खिड़की बंद करने के बावजूद ट्रेन की ढीली खिड़कियां ऊपर की ओर चढ़ जातीं और बाहर की बहुत ही गरम हवा अंदर आ कर मुंह सुखा जाती. खीरे वाले ने इसी बीच उपस्थिति दर्ज कराई तो कई पैंसेंजरों की सूखी जीभें तर हुईं.

यात्रियों के सिर के ऊपर पंखा चल रहा था या उन पर हंस रहा था, यह जानने के लिए बारबार वे पंखे की ओर देखते और अपने पास मौजूद अखबार या गमछे को हिलाहिला कर हवा को महसूस करते. चल तो रहा था पंखा मगर सिर्फ तसल्ली के लिए, बहुत ही धीमेधीमे.

अगले स्टेशन पर पानी के लिए अनंत उतरा. खाली सीट देखते ही नए आए सज्जन वहां बैठने लगे. अपने में ही सिमटी रूही ने अब मुंह खोला, ‘‘मेरा भाई है यहां, पानी लेने गया है.’’

‘‘जब आएगा देखा जाएगा, बहनजी.’’

‘‘यह सीट रिजर्व है, हमारी है.’’

‘‘अरे बहनजी, इतनी भीड़ में कहां कोई रिजर्व. रात में सोते वक्त ही अब खाली होगी. उस से पहले नहीं.’’

सामने की बर्थ पर रीना बैठी थी. वह रूही को देखे जा रही थी. उस की बर्थ पर भी नए आए यात्रियों की जोरआजमाइश कम नहीं थी.

रीना की बर्थ ऊपर की थी. उस पर 3 लोग आसन जमाए थे. मिडिल बर्थ खोली नहीं जा सकी थी, वरना वह भी… नीचे वाली बर्थ उस की मां की थी. उस पर भी 5 लोग बैठे थे और छठे के लिए रहरह कर गुंजाइश बनाने की कोशिश जारी थी.

रूही की स्थिति पर मन ही मन व्यथित होती हुई रीना उस के मामले में खुद को दखल देने से नहीं रोक पाई. उस सज्जननुमा दुर्जन से पंगा लेते हुए रूही के शब्दों को आगे बढ़ाते बोली, ‘‘इन का भाई अभी आता ही होगा, क्यों परेशान कर रहे हैं इन्हें, इन को बहुत तकलीफ है, दिखता नहीं?’’

‘‘तकलीफ है तो एसी क्लास का टिकट क्यों नहीं लिया?’’ सज्जन अपनी सज्जनता छोड़ते जा रहे थे.

रीना सोच में पड़ गई. कैसेकैसे लोग होते हैं. अभी वह कुछ बोलती, इस से पहले ही वे सज्जन फिर बोल पड़े, ‘‘और आप कौन होती हैं बीच में बोलने वाली?’’

रीना के दिमाग में कई शोर बज उठे. भाईभतीजावाद के इस जमाने में सब को अपने में ही मरनेखपने दो. एक तो आप किसी को परेशान देख आगे बढ़ जाओ क्योंकि सभी को यही स्वाभाविक लगता है, दूसरे आप किस के कौन से भाईभतीजा हो, इस का प्रमाण दो. बिना किसी रिश्ते के आप किसी के लिए खड़े होंगे, यह तो हो ही नहीं सकता न. रूही का उस से पीछा छुड़ाने को रीना कह पड़ी, ‘‘यह मेरी ननद है, सम झे.’’

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रूही ने रीना को आश्चर्य से देखा. और उन सज्जन के सीट से हट जाने पर मुसीबत से मुक्ति का आनंदलाभ लेती वह भाई अनंत का इंतजार करने लगी. रीना के प्रति उस ने एक छोटा सा धन्यवाद भी नहीं दिया, रीना ने उम्मीद भी नहीं की.

अनंत पानी और नाश्ता ले कर रूही के पास आया और सीट पर बैठ गया. रूही भाई से अपने साथ हुई घटना का ज्योंज्यों जिक्र करती, वह रीना की ओर देखदेख कर जाने क्याक्या सोचता. इतने में एक वृद्धा ने अनंत से अपना भारी सूटकेस बर्थ के नीचे ढकेलने का आग्रह किया. रीना को काफी आश्चर्य हुआ कि अनंत और रूही दोनों ही ऐसे बैठे रहे जैसे उन्होंने कुछ सुना ही न हो. रीना ने उठ कर वृद्धा के कहेनुसार सूटकेस को सीट के नीचे सरका दिया.

अब शाम होने को आई थी. लोगबाग, जो अपनी गोलाईभर की सीट को जन्मजन्मांतर का कब्जा सम झ बैठे थे, आने वाले स्टेशनों पर उतरते चले गए. ट्रेन का डब्बा अब कुछ सांस लेने लायक हो गया था.

रीना का 3 साल का बेटा टीटो सो कर उठ चुका था और अपनी मासूम शरारतों से सहयात्रियों का ध्यान खींच रहा था. वह कई बार दौड़दौड़ कर अनंत और रूही के पास भी गया. वे दोनों नाश्ता करने में व्यस्त थे. रीना के बच्चे को भी अनदेखा करते रहे.

अब तक रीना की मां मुखर हो चुकी थीं. उन्होंने अनंत से पूछा, ‘‘इन के पति क्या करते हैं?’’

‘‘सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं,’’ अनंत ने न चाहते हुए भी सब के सामने जवाब देने की मजबूरी के चलते कहा.

रूही की तरफ देख कर उन्होंने पूछा,  ‘‘पहला है?’’

‘‘जी,’’ शरमा कर रूही ने जवाब दिया तो रीना की आंखें अनजाने ही नम होने लगीं. शायद कोई पिघलता सा एहसास था, जिस ने उस का आंचल पकड़ कर खींचा था.

रूही ने स्त्रीसुलभ जिज्ञासावश रीना की ओर देख पूछ लिया, ‘‘भैया क्या करते हैं?’’

रीना की मां इस सवाल के लिए जैसे तैयार ही बैठी थीं. दर्द था, अपराधबोध था, या बेटी के सामने अपना दिल खोलना चाहती थीं जो अब तक हो न सका था, कहा, ‘‘कहां रहे वे. विदेश जा रहे थे, प्लेन क्रैश में 40 लोगों की मौत हुई थी. हमारी रीना का भविष्य खत्म हो गया. मेरी ही गलती थी शायद, मैं ने ही इस रिश्ते के लिए जोर दिया था.’’

‘अब से मैं जाटव के हाथ का ही पानी पिऊंगा,’ रूही के दिमाग में यह वाक्य जैसे जोर से फटा. कम बोलने वाला लड़का, यह क्या कह गया. 29 वर्ष का अनंत वैसे तो रूही से 3 साल ही उम्र में बड़ा था, लेकिन उस के सीधेपन की वजह से रूही उस पर हमेशा अपना हुक्म चलाती आई है. आज इस हाल में वह कुछ कह नहीं पाई, वरना इस सत्यानाश के लिए वह भैया को कभी छोड़ती नहीं. इतना बड़ा अनर्थ कर दिया अनंत ने.

मिश्रा परिवार में 3 बार पूजाअर्चना होती है नियम से. अन्य जाति के लोग द्वार पर आ कर रुक जाते हैं. घर में चायपानी के लिए उन का अलग बरतन होता है. हाथों से छू कर अम्मा उन्हें कभी कुछ नहीं परोसतीं. सब बाइयां ही करती हैं.

बाई के घर में घुसते ही अम्मा अपने यहां रखी साड़ी देती हैं पहनने को. उस के माथे पर गंगाजल छिड़कती हैं. तब जा कर वह इस घर का काम शुरू करती है. तब भी अम्मा इन कामवालियों के पीछे दौड़ती ही रहती हैं. एकबार ये बरतन धो देती हैं तो अम्मा फिर उन्हें दोबारा धोती हैं. मंदिर का सारा काम बेटी और अम्मा के हाथ में. और यहां एक पल में इस महामूर्ख ने सब करम तमाम कर डाला.

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यह लड़की तो जाटव है, कामवाली बाइयों के लिए भी अछूत. पर देखो, पढ़लिख कर कमाऊ हो कर क्या शान से खुद को प्रस्तुत कर रही है.

मारे क्रोध के रूही ने मुंह फेर लिया. तब तक स्टेशन आ चुका था, जहां रीना के मामा की सूचना पर एक असिस्टैंट नर्स के साथ डाक्टर मौजूद था. बहन को ले कर यहां उतरते समय अनंत ने एक छोटी सी दृष्टि रीना पर डाली और दो शब्दों के जरिए उस से उस का फोन नंबर ले लिया.

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