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नागरिकता के हवनकुंड में विकास की आहुति

देश में हिंदूमुसलिम विभाजन और हिंदुओं के ध्रुवीकरण का गंदा खेल शुरू हो चुका है. मोदी सरकार के नागरिकता कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के कारण पूरे देश में आग लगी हुई है. नोटबंदी और जीएसटी के बाद एक बार फिर जनता हलकान व परेशान है. इस से हो यह रहा है कि जनता की रोजीरोटी से जुड़े सवाल नेपथ्य में चले गए हैं.

अब तक भारत में केवल कश्मीर को ही सब से ज्यादा समस्याग्रस्त क्षेत्र माना जाता था, लेकिन आज पूरा पूर्वोत्तर तो सुलग ही रहा है, आग धीरेधीरे पूरे देश में भी फैल रही है और इस आग को भड़काने में पाकिस्तान या अलगाववादियों का हाथ नहीं है. इस का श्रेय सिर्फ और सिर्फ हमारी केंद्र सरकार और उस की अगुवाई करने वाली मोदीशाह की भाजपा को जाता है.

आज दुनियाभर के देशों की सरकारें अपने देश, समाज और जनता की बेहतरी के लिए काम कर रही हैं. वे जनता के कल्याण और उन्हें अधिक से अधिक सुविधाएं प्रदान करने में जुटी हैं. वे राजामहाराजाओं और तानाशाहों की तरह लोगों का सुखचैन नहीं छीन रही हैं, उन्हें परेशान नहीं कर रही हैं, उन्हें किसी समस्या में नहीं उल झा रही हैं. लेकिन भारत की वर्तमान निर्वाचित केंद्र सरकार ने अपने देश की जनता को उत्पीडि़त करने में रिकौर्ड कायम कर डाला है. नागरिकों का कल्याण करने के बजाय मोदी सरकार लगातार उसे बेहाल, बेचैन और बेबस करने में जुटी है.

2016 में इस सरकार ने देश की जनता पर नोटबंदी थोप कर उस पर बेपनाह जुल्म ढाए. मात्र 10 दिनों के अंदर बैंकों के आगे लगी लंबीलंबी लाइनों में 100 से ज्यादा लोग मर गए. जीएसटी के बाद देश की अर्थव्यवस्था तहसनहस हो चुकी है. महंगाई आसमान छू रही है. प्याज के दाम पैट्रोल के दाम से ऊपर उड़ रहे हैं. रुपए की कीमत लगातार गिर रही है. देश के विश्वविद्यालयों में हाहाकार मचा हुआ है.

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गांवकस्बों के प्राइमरी स्कूल बंद हो रहे हैं. अस्पतालों में डाक्टर नहीं हैं, दवाएं नहीं हैं, सबकुछ प्राइवेट हाथों को बेचा जा रहा है. देश हत्याओं और बलात्कारों से सहमा हुआ है. अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे महिलाओं का सरेआम रेप कर उन्हें आग के हवाले कर रहे हैं. पूरा समाज सिहरा हुआ है और ऐसे भयावह दौर में मोदी सरकार जनता को एक और भयावह फंदे में उल झाने जा रही है और यह फंदा है नागरिकता संशोधन विधेयक कानून यानी कैब.

मोदी सरकार का कैब लोकसभा और राज्यसभा में पास होने के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हस्ताक्षर के बाद अंतत: कानून के तौर पर देश को भेंट कर दिया गया है. लेकिन यह भेंट जनता को मंजूर नहीं है. इस कानून से पूर्वोत्तर के लोग जहां सामाजिक और सांस्कृतिक असुरक्षा महसूस कर रहे हैं, वहीं धर्म आधारित यह कानून देश के 18 फीसदी नागरिकों के भीतर भय पैदा करने की कोशिश करता जान पड़ रहा है. लिहाजा, इस नए कानून के खिलाफ देशभर में आंदोलन हो रहे हैं.

पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्यों में भारी आगजनी, तोड़फोड़, नारेबाजी और गोलीबारी हो रही है. कई आंदोलनकारी पुलिस की गोलियों से मारे जा चुके हैं. असम में तो रेलवे स्टेशन तक फूंक दिया गया. सरकारी दफ्तरों में आग लगा दी गई. भाजपा विधायकों के घरों पर तोड़फोड़ हुई. हवाई उड़ानें रोक दी गईं. इंटरनैट और फोन सेवाएं ठप रहीं. कई जगह कर्फ्यू लग गया. जनता के जबरदस्त विरोधप्रदर्शन के बीच भारतजापान के बीच होने वाली शिखर बैठक तक टालने की नौबत आ गई.

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने भारत आने से मना कर दिया. अमेरिका ने अपने नागरिकों को चेताया कि भारत में पूर्वोत्तर की यात्रा पर न जाएं. यह देश के लिए कितने शर्म की बात है.

इन सब बातों से भी ज्यादा शर्म की बात 15 दिसंबर को देश की राजधानी दिल्ली के जामिया नगर इलाके से सामने आई. इस दिन रविवार था और कैब का विरोध करने के लिए लोग सुबह से ही मथुरा रोड और सराय जुलेना में इकट्ठे होने लगे थे. दोपहर तक विरोधप्रदर्शन सामान्य और शांतिपूर्ण रहा, लेकिन सूरज ढलतेढलते तेजी से खबर उड़ी कि प्रदर्शनकारियों ने न्यू फ्रैंड्स कालोनी में डीटीसी की 3 बसों सहित कई और वाहनों को आग लगा दी.

खबर मिलते ही बड़ी तादाद में अर्धसैनिक बल और पुलिस बल मौके पर जा पहुंचे. लेकिन असल बवंडर तब मचा जब हिंसा की यह आग जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कैंपस के भीतर तक जा पहुंची. इस दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज भी किया, लेकिन पुलिसिया बर्बरता की हद तब पार हो गई जब वे यूनिवर्सिटी कैंपस में जा घुसे और लाइब्रेरी में पढ़ रहे छात्रों पर कहर ढाना शुरू कर दिया. छात्रों को जम कर धुना गया. यहां तक कि उन्हें वाशरूम में भी नहीं बख्शा गया. पुलिसिया कहर के चलते दर्जनों छात्र जिन में कुछ लड़कियां भी शामिल थीं, बुरी तरह घायल हो गए.

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इस पर गुस्साए छात्रों ने पुलिस हैडक्वार्टर पहुंच कर विरोध जताया और देखते ही देखते आम लोग भी छात्रों के साथ आ कर खड़े हो गए. जामिया के छात्रों से ज्यादती की खबर न्यूज चैनल्स के जरिए आग की तरह देशभर में फैली और जगहजगह लोग इकट्ठा होने लगे. अलीगढ़, मेरठ और सहारनपुर में भी प्रदर्शन हुए लेकिन कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ तो यह युवाओं की सम झदारी ही कही जाएगी जिन की यह दलील काबिलेगौर थी कि हमें संविधान ने किसी भी ज्यादती के खिलाफ विरोध करने का हक दिया है, लेकिन पुलिस को मनमानी करने का हक किस ने दिया?

दूसरे दिन देशभर के छात्रों ने जामिया विश्वविद्यालय में हुई ज्यादती के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया जिस में बीएचयू का नाम खासतौर से उल्लेखनीय है. छात्रों ने साबित कर दिया कि उन के लिए धर्म और जाति से ऊपर उन की एकता, जागरूकता और वह संविधान है जिस की धज्जियां खुलेआम 6 महीने से उड़ रही हैं. 17 दिसंबर को दिल्ली के मुसलिम बहुल इलाके जाफराबाद, सीलमपुर इलाके में नागरिकता कानून के विरोध में हिंसा हुई. 19 दिसंबर को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया और आगजनी भी हुई.

इन घटनाओं में मीडिया का भी दोहरापन उजागर हुआ. हिंसा का ठीकरा प्रदर्शनकारियों पर फोड़ने की भक्त चैनलों की कोशिश साफसाफ दिखी तो कुछ चैनलों ने सीधे दिखाया कि दिल्ली पुलिस हैडक्वार्टर के सामने विरोध जता रहे सभी छात्र मुसलमान नहीं थे बल्कि हिंदू छात्र भी उन के साथ थे. ये सभी छात्र मोदीशाह की जोड़ी को कोसते पूछ रहे थे कि उन के राज में यह क्या हो रहा है मगर जो हो रहा था और हो चुका था वह 15 दिसंबर की देर रात देखने वालों ने न्यूज चैनल्स पर देखा कि केवल पश्चिम बंगाल, असम या पूर्वोत्तर राज्यों में ही नहीं बल्कि दिल्ली और उत्तर भारत में भी कैब का दांव उल्टा पड़ा है.

नाराज पड़ोसी

नागरिकता कानून को ले कर देश में ही बवाल नहीं मच रहा है, भारत के पड़ोसी देशों ने भी मोदी सरकार की कारगुजारी और मंशा पर अपना रोष प्रकट किया है. पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा, ‘हम इस नए संशोधित कानून की निंदा करते हैं. यह प्रतिगामी और भेदभावपूर्ण है और सभी संबद्ध अंतर्राष्ट्रीय संधियों और मानदंडों का उल्लंघन करता है. यह पड़ोसी देशों में दखल का भारत का दुर्भावनापूर्ण प्रयास है.’

अफगानिस्तान ने भी इस कानून पर कड़ी आपत्ति जाहिर करते हुए कहा, ‘हमारा देश ऐसा नहीं है जहां सरकार अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करती हो. हम अपने अल्पसंख्यक भाइयों का पूरा सम्मान करते हैं. संसद में उन के लिए सीटें भी रिजर्व हैं.’

वहीं बंगलादेश की बात करें तो वहां की अर्थव्यवस्था आज हम से दोगुनी बेहतर है. रोजीरोटी की तलाश में जो बंगलादेशी भागभाग कर भारत आते थे, वे अपने देश की समृद्ध हालत को देख कर वापस जा चुके हैं. वर्ष 1971 में बंगलादेश दुनिया के सामने एक छोटे से मुल्क के रूप में आया था और आज यह रेडीमेड गारमैंट्स निर्यात के क्षेत्र में चीन के बाद दूसरे पायदान पर खड़ा है तथा भारतीय रेडीमेड गारमैंट इंडस्ट्री को कड़ी टक्कर दे रहा है.

बंगलादेश को रेडीमेड गारमैंट्स निर्यात से सालाना 30 अरब डौलर से ज्यादा मिलते हैं, जबकि इस की तुलना में भारत से रेडीमेड गारमैंट्स का निर्यात 17 अरब डौलर का है. बंगलादेश की करीब 80 प्रतिशत निर्यात की आमदनी इस उद्योग से होती है. बंगलादेश में टैक्सटाइल और रेडीमेड गारमैंट्स 2 सब से बड़े निर्यातक और रोजगार प्रदान करने वाले सैक्टर हैं. इस में करीब 40 लाख लोगों को रोजगार मिला है. बंगलादेश को अपने उद्योग के लिए और ज्यादा श्रमिकों की आवश्यकता है. 4 माह पूर्व बंगलादेश ने अपने श्रमिकों के वेतनमान में 51 प्रतिशत की वृद्धि भी की है. ऐसे में जब बंगलादेश में रोजगार के इतने उन्नत अवसर मौजूद हैं, तो वहां से भाग कर भारत कौन आएगा?

हिंदुओं के ध्रुवीकरण की कोशिश

गौरतलब है कि मोदी सरकार ने नागरिकता कानून में 3 देशों-पाकिस्तान, बंगलादेश, अफगानिस्तान में हिंसा और उत्पीड़न का शिकार हो कर भारत आने वाले 6 धर्मों – हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई और पारसी शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने की बात कही है, जिन्हें अभी तक अवैध शरणार्थी माना जाता था. उस ने मुसलिम शरणार्थियों को नागरिकता देने की बात नहीं कही. मोदी सरकार कहती है कि इन देशों में हिंदू सताए जा रहे हैं. फिर इन देशों से कूटनीतिक संबंध क्यों हैं यह सवाल भी उठता है.

उल्लेखनीय है कि जिन 6 धर्मों के लोगों को नागरिकता दी जाएगी, उन में वे सभी लोग शामिल होंगे जो वैध दस्तावेज के बिना भारत आए हैं या जिन के दस्तावेजों की समयसीमा समाप्त हो गई है.

अगर कोई व्यक्ति इन 3 देशों में से आया है और उस के पास अपने मातापिता का जन्म प्रमाणपत्र भी नहीं है, तब भी 6 साल के निवास के बाद उसे भारत की नागरिकता मिल जाएगी, जबकि अभी तक भारतीय नागरिकता लेने के लिए 11 साल भारत में रहना अनिवार्य था. लेकिन अब उपरोक्त धर्मों के ऐसे लोग जिन्होंने 31 दिसंबर, 2014 की निर्णायक तारीख तक भारत में प्रवेश कर लिया है, वे सब भारतीय नागरिकता के लिए सरकार के पास आवेदन कर सकेंगे और उन्हें आसानी से नागरिकता हासिल हो जाएगी.

यह भी व्यवस्था की गई है कि उन के विस्थापन या देश में अवैध निवास को ले कर उन पर पहले से चल रही कोई भी कानूनी कार्रवाई स्थायी नागरिकता के लिए उन की पात्रता को प्रभावित नहीं करेगी.

जाहिर है ऐसा कर के मोदी सरकार समाज में विभाजन का बेहद गंदा खेल खेल रही है. मुसलमानों को छोड़ कर अन्य धर्मों के लोगों को नागरिकता दे कर मोदी सरकार हिंदू मतों का ध्रुवीकरण कर के अपने वोटबैंक में इजाफा करना चाहती है. जिन लोगों को नागरिकता दी जाएगी, जाहिर है कि उन के दिल भाजपा सरकार के प्रति एहसान से भर जाएंगे और उन के वोट भाजपा की  झोली में ही गिरेंगे. वहीं देश के हिंदू मोदी सरकार की इस दयालुता के कायल हो कर उस के और भक्त हो जाएंगे.

अयोध्या के राममंदिर प्रकरण, कश्मीर में अनुच्छेद 370 का खात्मा, तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने से मुसलमान भाजपा से खिन्न हैं. उन के वोट भाजपा की  झोली में हरगिज नहीं जाएंगे. यहां तक कि मुसलिम औरतों के लिए तीन तलाक का खात्मा कर के भाजपा ने अपने सिर जो सेहरा सजाया था, उस के फूल भी अब बदबू मारने लगे हैं. ‘सब का साथ सब का विकास’ जैसे लौलीपौप के सहारे अन्य पार्टियों के हिंदू भी, जिन का  झुकाव भाजपा की तरफ हुआ था, उन में से भी काफी लोग बीते 6 सालों में मोदी सरकार की कारगुजारियों को देख कर बिदके हुए हैं.

अब 2024 के आम चुनाव में इस की भरपाई कैसे हो? लिहाजा, अब कैब और एनआरसी जैसे कानूनों से भाजपा हिंदुओं को आकर्षित करने और हिंदुत्व की भावना व हिंदू राष्ट्र के प्रचार से डैमेज कंट्रोल करेगी. पर यह पक्का नहीं है. हमारे देश में यह आम है कि जब प्राकृतिक, सरकारी या पारिवारिक आपदा आती है तो नीबूमिर्च लटकाने जैसे टोटके किए जाते हैं.

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यह अवश्य है कि संघ और सरकार जानते हैं कि मुसलमानों में भय पैदा करने से हिंदुओं में उत्साह पैदा होता है, फिर यह उत्साह भाजपा के लिए वोट का रूप ले लेता है. मोदी सरकार की इस ‘फूट डालो राज करो’ की कुटिल चाल से विपक्षी पार्टियां भी हलकान हैं और बुद्धिजीवी वर्ग में भी खासी चिंता व्याप्त है. देशभर में इन नए कानूनों को ले कर चर्चाओं का चक्र जारी है.

नागरिकता कानून का राष्ट्रव्यापी विरोध हो रहा है. संविधान विरोधी और एक धर्म विशेष के प्रति घोर उपेक्षा, नफरत और अपमान को प्रदर्शित करने वाले इस कानून के खिलाफ अदालतों में कई याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं.

कानूनविदों का कहना है कि यह कानून संविधान की धारा 14, 15, 21, 25, 26 का खुला उल्लंघन है. हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है, इसलिए धर्म के आधार पर किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता प्रदान करना संविधान का उल्लंघन है, लेकिन संघ और भाजपा सत्ता में कायम रहने की लोलुपता में हिंदुओं को रि झाए रखना चाहते हैं. उन की यह सोच है कि मुसलमानों के प्रति नफरतभरा रवैया अपना कर ही वे बहुसंख्यक हिंदुओं को लुभा सकते हैं और इस के लिए संविधान को ताक पर रखना पड़े तो उन्हें कोई गुरेज नहीं है. जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ रहा है और जो रुख राममंदिर के मामले में अपनाया गया है उस से यह पक्का नहीं कि संविधान की भावना की सुरक्षा हो ही.

सनातनी संस्कारों पर सत्ता हावी

संघ और भाजपा यह भूल गई है कि वसुधैव कुटुम्बकम् सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है, जो महाउपनिषद सहित कई ग्रंथों में लिपिबद्ध है और जिस का अर्थ है-धरती ही परिवार है (वसुधा एव कुटुम्बकम्). यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है. तो क्या ऐसी विचारधारा को सदियों से पोसने वाला भारत अपने घर आने वाले परेशान, हताश और विवश लोगों को धर्म के आधार पर एंट्री देगा?

सवाल यह है कि क्या सिर्फ 3 देशों – पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंगलादेश में ही हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई प्रताडि़त हो रहे हैं? और कहीं नहीं? क्या अमेरिका से प्रताडि़त हो कर शरण लेने आए व्यक्ति को भारत की नागरिकता नहीं मिलेगी? क्या मालदीव और श्रीलंका में वहां के अल्पसंख्यक तमिल हिंदू प्रताडि़त नहीं हैं? अगर वे भारत में शरण लिए हुए हैं या यहां शरण लेना चाहेंगे तो क्या उन्हें खदेड़ दिया जाएगा? श्रीलंका में तमिलों के प्रति होने वाली क्रूरता से मोदी सरकार अनभिज्ञ कैसे है?

हजारों की संख्या में तमिल श्रीलंका से भाग कर दक्षिण भारत में रह रहे हैं, उन्हें भारत की नागरिकता क्यों नहीं मिलनी चाहिए? आखिर वे भी तो हिंदू या ईसाई धर्म को मानने वाले हैं.

उबल रहा है असम

नागरिकता कानून के विरोध में पूरा असम सड़क पर है. लोगों ने चक्का जाम कर दिया है. जगहजगह भयंकर आगजनी और गोलीबारी हो रही है. कई प्रदर्शनकारी पुलिस की गोलियों से मारे जा चुके हैं,

लेकिन केंद्र सरकार के दबाव के चलते मीडिया हाउसेज के भीतर से खबरें सैंसर हो कर चलाई जा रही हैं.

पूर्वोत्तर के लोगों को यह डर सता रहा है कि नागरिकता कानून के तहत जब पिछले कुछ दशकों में अन्य देशों से आए हिंदूबंगाली लोगों को भारत की नागरिकता दे दी जाएगी तो वे पूर्वोत्तर राज्यों के मूल निवासियों के जल, जंगल, जमीन, व्यापार, संसाधनों, नौकरियों आदि सब पर कब्जा करने लगेंगे. असम के लोगों का यह डर बिलकुल वैसा ही है जैसा कि महाराष्ट्र के लोगों को उत्तर प्रदेश और बिहार से रोजगार की तलाश में आए लोगों से रहा है, जिन के लिए कहा जाता रहा है कि उन्होंने वहां मराठी लोगों से रोजगार और व्यवसाय के अवसर छीन लिए हैं.

इसी को ले कर महाराष्ट्र भर में शिवसेना तांडव मचाती रही है. उत्तर प्रदेश, बिहार के गरीब दिहाड़ी मजदूरों से बदसलूकी करती रही है. उन्हें सरेआम दौड़ादौड़ा कर डंडों से पीटती रही है. और आज जब नागरिकता संशोधन विधेयक कानून से वैसी ही समस्या और असुरक्षा असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के लोग महसूस कर के आंदोलनरत हैं तो शिवसेना में चुप्पी पसरी हुई है. यहां तक कि जब लोकसभा के पटल पर विधेयक रखा गया तब विपक्ष में खड़े होने और बिल का विरोध करने की जगह शिवसेना ने सदन से वौकआउट कर भाजपा को ही आधा सहयोग प्रदान किया.

सास अच्छी तो बहू भी अच्छी

साल 1980 में प्रदर्शित फिल्म ‘सौ दिन सास के’ में ललिता पवार द्वारा निभाया गया भवानी देवी का किरदार हिंदी फिल्मों की सासों का प्रतिनिधित्व किरदार था. ललिता पवार एक नहीं बल्कि कई फिल्मों में क्रूर सास की भूमिका में दिखी थीं.

एक दौर में तो वे क्रूर सास का पर्याय बन गई थीं और आज भी जिस किसी बहू को अपनी सास की बुराई करनी होती है, वह ये पांच शब्द कह कर अपनी भड़ास निकाल लेती है ‘वह तो पूरी ललिता पवार है.’

60 साल बाद भी यह फिल्म प्रासंगिक है तो महज इस वजह के चलते कि पहली बार एक क्रूर सास को सबक सिखा कर सही रास्ते पर लाने वाली बहू मिली थी. ललिता पवार अपनी बड़ी बहू आशा पारेख पर बेइंतहा अत्याचार करती रहती है.

क्योंकि वह गरीब घर की थी और बिना दहेज के आई थी. छोटी बहू बन कर रीना राय घर आती है तो उस से जेठानी पर हो रहे अत्याचार बरदाश्त नहीं होते और वह क्रूरता का बदला क्रूरता से लेती है.

फिल्म पूरी तरह पारिवारिक मामलों से लबरेज थी जिस में ललिता पवार बहुओं को प्रताडि़त करने के लिए बेटी दामाद को भी मिला लेती है. नीलू फुले इस फिल्म में एक धूर्त और अय्याश दामाद के रोल में थे, जो ललिता पवार को बहलाफुसला कर उन की सारी जायदाद अपने नाम करवा कर उन्हें ही गोदाम में बंद कर देते हैं.

चूंकि हिंदी फिल्म थी, इसलिए अंत सुखद ही हुआ. सास को अक्ल आ गई, अच्छेबुरे की भी पहचान हो गई और क्रूर सास को बहुओं ने मांजी मांजी कहते माफ कर दिया.

लेकिन अब ऐसा नहीं होता. आज की बहू सास की क्रूरता और प्रताड़ना को न तो भूलती है और न ही उसे माफ करती है. बदले दौर में सासें भी हालांकि समझदार हो चली हैं और जो ललिता पवार छाप हैं, उन्हें समझदार हो जाना चाहिए नहीं तो बुढ़ापे में या अशक्तता में बहू कोई रहम न कर के अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का सूद समेत बदला लेने से नहीं चूकेगी.

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ऐसा ही एक दिलचस्प मामला इंदौर का है, जिस में सासबहू की लड़ाई थाने तक जा पहुंची. रिटायर्ड सीएसपी प्रभा चौहान का अपनी सबइंसपेक्टर बहू श्रद्धा सिंह से विवाद हो गया. सास ने थाने में रिपोर्ट लिखाई तो बहू ने अपनी बहन और मां के साथ एक दिन देर रात घर में आ कर उन्हें पीटा और हाथ में काटा भी.

अब बहू भी भला क्यों खामोश रहती, उस ने भी सास के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी कि सास ने अपने बेटे यानी उस के पति और ननद के साथ मिल कर उस की मां और बहन को घर में घेर कर मारापीटा.

बकौल श्रद्धा घटना की रात जैसे ही वह घर में दाखिल हुई तो सास के गालियां देने पर विवाद हुआ. मैं ने उन्हें शालीलता से बात करने को कहा तो विवाद घर की दहलीज पार कर थाने तक जा पहुंचा. बात सिर्फ आज की नहीं है बल्कि सास शादी के बाद से ही उसे प्रताडि़त करती थी.

इस मामले में दिलचस्पी वाली एकलौती बात यही है कि बहू ने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार पर सास को माफ नहीं किया.

मुमकिन है कि कुछ गलती उस की भी रही हो, लेकिन इंदौर की ही एक काउंसलर की मानें तो आजकल की बहुएं आशा पारेख और रीना राय की तरह सास को माफ नहीं करतीं बल्कि ऐसे टोनेटोटकों से परेशान कर देती हैं कि उसे छठी का दूध याद आ जाता है. उसे पछतावा होता है कि काश शुरू में बहू को परेशान न किया होता तो आज ये दिन नहीं देखने पड़ते और बुढ़ापा चैन से कट रहा होता.

भोपाल की एक प्रोफेसर सविता शर्मा (बदला नाम) की मानें तो उन की शादी कोई 25 साल पहले हुई थी. शादी के बाद सास का व्यवहार ललिता पवार जैसा ही रहा. वह बातबात पर टोकती थी और हर काम में मीनमेख निकालती थी.

पति के प्यार और उन के मां से लगाव होने के कारण वह अलग नहीं हो पाई और सास के बर्ताव से समझौता कर लिया लेकिन शुरुआती दिनों के दुर्व्यवहार को वे भूल नहीं पाईं.

सविता के मुताबिक मैं ने उस की (उन की नहीं) हर ज्यादती बरदाश्त की लेकिन जब वह मेरे मम्मीपापा को भलाबुरा कहतीं तो मेरा खून खौलता कि जो कुछ कहना है मुझ से कहो, मांबाप को तो बीच में मत घसीटो.

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अब हालत यह है कि उन की सास पैरालिसिस के चलते बिस्तर में पड़ी कराहती रहती हैं और चायपानी तक के लिए उन की मोहताज रहती हैं. सविता कहती हैं, ‘उन की इस हालत को देख कर मुझे खुशी भी होती है और कभीकभी दुख भी होता है. मैं चाह कर भी उन की वैसी सेवा नहीं कर पाती जैसी कि एक बहू को करनी चाहिए.’

यूं पति ने मां की सेवा के लिए नौकरानी रखी है लेकिन वह चौबीसों घंटे तो नहीं रह सकती. जब वे मुझ से चाय मांगती हैं तो मुझे शादी के बाद के वे शुरुआती दिन याद हो आते हैं, जब मैं खुद की चाय बनाने के लिए उन की इजाजत की मोहताज रहती थी.

कई बार तो बिना चाय पिए ही कालेज चली जाती थी. अब जब वे 4-5 बार आवाज लगा कर चाय मांगती हैं तब कहीं जा कर उन के पलंग के पास स्टूल पर चाय रख कर पांव पटक कर चली आती हूं, ताकि उन्हें अपना किया याद आए. मैं समझ नहीं पा रही कि ऐसा करने से सुख क्यों मिलता है और मैं बीती बातों को भुला क्यों नहीं पा रही.

यानी सविता वही कर रही हैं जो सास ने उन के साथ किया था. इस से साफ लगता है कि वे अभी तक आहत हैं और सास को अपने किए की सजा नहीं दे रहीं तो अहसास तो करा ही रही हैं कि जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे.

सविता के बेटे की भी 2-3 साल में शादी हो जाएगी. वे कहती हैं मैं ने अभी से तय कर लिया है कि अपनी बहू के साथ वैसा व्यवहार नहीं करूंगी जो मेरी सास ने मेरे साथ किया था. जाहिर है सविता अपनी सास की हालत को देख कर कहीं न कहीं दुखी भी हैं कि अगर वे कांटे बोएंगी तो उन्हें भी कांटों का ही गुलदस्ता मिलेगा.

समाजशास्त्र की प्रोफेसर सविता मानती हैं कि आजकल की बहुएं ज्यादा बंदिशें बरदाश्त नहीं करतीं. वे आजाद खयालों की होती हैं. बहू चाहेगी तो उसे मैं जींसटौप पहनने दूंगी. बेटे के साथ घूमनेफिरने जाने देने से रोकूंगी नहीं, क्योंकि यह उस का हक भी है और इच्छा भी.

भावुक होते वे कहती हैं कि मैं उसे इतना प्यार दूंगी कि अगर कभी मुझे पैरालिसिस का अटैक आ जाए तो मांगने के पहले वह खुद चाय दे और कुछ देर मेरे पास बैठ कर बतियाए भी.

इंदौर की प्रभा और श्रद्धा की तरह आए दिन सासबहू के विवाद कलह और मारापीटी के मामले हर थाने में दर्ज होते हैं जिन की असल वजह अधिकतर मामलों में सास का वह व्यवहार होता है जो उस ने शादी के बाद बहू से किया होता है.

इसलिए सविता जैसी सास बनने जा रही महिलाओं ने अच्छी बात यह सीख ली है कि उन्हें अपनी बहू के साथ वह व्यवहार नहीं करना है, जिस से बुढ़ापे में उन्हें बहू की प्रताड़नाएं झेलनी पड़ें.

जाहिर है अच्छी सास बनने के लिए आप को बहू का खयाल रखना पड़ेगा. बहू जब शादी कर घर में आती है तो उस के जेहन में सास की इमेज ललिता पवार या शशिकला जैसी होती है, जबकि वह चाहती है कि निरुपा राय, कामिनी कौशल, उर्मिला भट्ट और सुलोना जैसी सास जो हर कदम पर बहू का खयाल रखते हुए उस का साथ दें.

इसलिए अगर बुढ़ापा सुकून से काटना है तो बहू को सुकून से रखना ही बेहतर भविष्य सुखशांति और सेवा की गारंटी है. वैसे भी आजकल एकल होते परिवारों में सास का एकलौता सहारा आखिर में बहू ही बचती है. अगर उस से भी संबंध शुरू से ही खटास भरे होंगे तो उन का अंत हिंदी फिल्मों जैसा सुखद तो कतई नहीं होगा.

इस में कोई शक नहीं कि सासें अब बदल रही हैं. क्योंकि उन्हें अपने बुढ़ापे की चिंता है और यह भी मालूम है कि बहू ही वह एकलौता सहारा होगी जो उसे सुख आराम दे पाएगी. तो फिर खामख्वाह क्यों ललिता पवार जैसा सयानापन दिखाते हुए बेवजह का पंगा लिया जाए.

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यानी बहू बुढ़ापे और अशक्तता के दिनों के लिए एक ऐसा इंश्योरेंस है, जिस में प्रीमियम प्यार और अपनेपन के अलावा आत्मीयता का भरना है, इस से रिटर्न अच्छा मिलेगा. हालांकि हर मामले में ऐसा होना जरूरी नहीं लेकिन बहू से अच्छा व्यवहार करना कोई हर्ज की बात नहीं. यह वक्त की मांग भी है जिस से घर में सुखशांति बनी रहती है और बेटा भी खुश और बेफिक्र रहता है. शादी के बाद के शुरुआती दिन बहू के लिए तनाव भरे होते हैं, वह सास के व्यवहार को ले कर स्वभावत: आशंकित रहती है.

ऐसे में अगर आप उसे सहयोग और प्यार दें तो वह यह भी नहीं भूलती कि सास कितनी भली है, लिहाजा बुढ़ापे में वह पैर भले ही न दबाए, लेकिन पैर तोड़ेगी नहीं, इस की जरूर गारंटी है.

प्रभा सिंह और सविता की सास ने अगर शुरू में बहू को अच्छे से रखा होता तो आज वे एक सुखद जिंदगी जी रही होतीं, प्यार दिया होता तो प्यार ही मिलता.

राजनीति की तरह घर की सत्ता भी पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है लेकिन जो सासें इमरजेंसी लगा कर तानाशाही दिखाती हैं, उन्हें जेल की सी ही जिंदगी जीना पड़ती है इसलिए जरूरी है कि परिवार में भी लोकतंत्र हो, आजादी हो, अधिकारों पर अतिक्रमण न हो और कमजोर पर अत्याचार न हों.

क्योंकि जो बहू आज कमजोर है कल को सत्ता हाथ में आते ही ताकतवर हो जाएगी और बदला तो लेगी ही. इसलिए अभी से संभल जाइए और बहू को बजाए क्रूरता के प्यार से अपने वश में रखिए.

यह इनवैस्टमेंट अच्छे दिनों की गारंटी है खासतौर से उस वक्त की जब आप अशक्त, असहाय बीमार और अकेली पड़ जाती हैं, तब वह बहू ही है जो उसी तरह आप का ध्यान रखेगी जैसा शादी के बाद आप ने उस का रखा था.

कामयाब : भाग 2

हर समस्या का समाधान पा कर रमा संतुष्ट हो जाती. शिवम और सुहासिनी को तो मानो कोई खिलौना मिल गया, स्कूल से आ कर जब तक वे उस से मिल नहीं लेते तब तक खाना ही नहीं खाते थे. वह भी उन्हें देखते ही ऐसे उछलता मानो उन का ही इंतजार कर रहा हो. कभी वे अपने हाथों से उसे दूध पिलाते तो कभी उसे प्रैम में बिठा कर पार्क में घुमाने ले जाते. रमा भी शिवम और सुहासिनी के हाथों उसे सौंप कर निश्ंिचत हो जाती.

धीरेधीरे रमा का बेटा चित्रा से इतना हिलमिल गया कि अगर रमा उसे किसी बात पर डांटती तो मौसीमौसी कहते हुए उस के पास आ कर मां की ढेरों शिकायत कर डालता और वह भी उस की मासूमियत पर निहाल हो जाती. उस का यह प्यार और विश्वास अभी तक कायम था. शायद यही कारण था कि अपनी हर छोटीबड़ी खुशी वह उस के साथ शेयर करना नहीं भूलता था.

पर पिछले कुछ महीनों से वह उस में आए परिवर्तन को नोटिस तो कर रही थी पर यह सोच कर ध्यान नहीं दिया कि शायद काम की वजह से वह उस से मिलने नहीं आ पाता होगा. वैसे भी एक निश्चित उम्र के बाद बच्चे अपनी ही दुनिया में रम जाते हैं तथा अपनी समस्याओं के हल स्वयं ही खोजने लगते हैं, इस में कुछ गलत भी नहीं है पर रमा की बातें सुन कर आश्चर्यचकित रह गई. इतने जहीन और मेरीटोरियस स्टूडेंट के दिलोदिमाग में यह फितूर कहां से समा गया?

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बेटी सुहासिनी की डिलीवरी के कारण 1 महीने घर से बाहर रहने के चलते ऐसा पहली बार हुआ था कि वह रमा और अभिनव से इतने लंबे समय तक मिल नहीं पाई थी. एक दिन अभिनव से बात करने के इरादे से उस के घर गई पर जो अभिनव उसे देखते ही बातों का पिटारा खोल कर बैठ जाता था, उसे देख कर नमस्ते कर अंदर चला गया, उस के मन की बात मन में ही रह गई.

वह अभिनव में आए इस परिवर्तन को देख कर दंग रह गई. चेहरे पर बेतरतीब बढ़े बालों ने उसे अलग ही लुक दे दिया था. पुराना अभिनव जहां आशाओं से ओतप्रोत जिंदादिल युवक था वहीं यह एक हताश, निराश युवक लग रहा था जिस के लिए जिंदगी बोझ बन चली थी.

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समझ में नहीं आ रहा था कि हमेशा हंसता, खिलखिलाता रहने वाला तथा दूसरों को अपनी बातों से हंसाते रहने वाला लड़का अचानक इतना चुप कैसे हो गया. औरों से बात न करे तो ठीक पर उस से, जिसे वह मौसी कह कर न सिर्फ बुलाता था बल्कि मान भी देता था, से भी मुंह चुराना उस के मन में चलती उथलपुथल का अंदेशा तो दे ही गया था. पर वह भी क्या करती. उस की चुप्पी ने उसे विवश कर दिया था. रमा को दिलासा दे कर दुखी मन से वह लौट आई.

उस के बाद के कुछ दिन बेहद व्यस्तता में बीते. स्कूल में समयसमय पर किसी नामी हस्ती को बुला कर विविध विषयों पर व्याख्यान आयोजित होते रहते थे जिस से बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके. इस बार का विषय था ‘व्यक्तित्व को आकर्षक और खूबसूरत कैसे बनाएं.’ विचार व्यक्त करने के लिए एक जानीमानी हस्ती आ रही थी.

आयोजन को सफल बनाने की जिम्मेदारी मुख्याध्यापिका ने चित्रा को सौंप दी. हाल को सुनियोजित करना, नाश्तापानी की व्यवस्था के साथ हर क्लास को इस आयोजन की जानकारी देना, सब उसे ही संभालना था. यह सब वह सदा करती आई थी पर इस बार न जाने क्यों वह असहज महसूस कर रही थी. ज्यादा सोचने की आदत उस की कभी नहीं रही. जिस काम को करना होता था, उसे पूरा करने के लिए पूरे मनोयोग से जुट जाती थी और पूरा कर के ही दम लेती थी पर इस बार स्वयं में वैसी एकाग्रता नहीं ला पा रही थी. शायद अभिनव और रमा उस के दिलोदिमाग में ऐसे छा गए थे कि  वह चाह कर भी न उन की समस्या का समाधान कर पा रही थी और न ही इस बात को दिलोदिमाग से निकाल पा रही थी.

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आखिर वह दिन आ ही गया. नीरा कौशल ने अपना व्याख्यान शुरू किया. व्यक्तित्व की खूबसूरती न केवल सुंदरता बल्कि चालढाल, वेशभूषा, वाक्शैली के साथ मानसिक विकास तथा उस की अवस्था पर भी निर्भर होती है. चालढाल, वेशभूषा और वाक्शैली के द्वारा व्यक्ति अपने बाहरी आवरण को खूबसूरत और आकर्षक बना सकता है पर सच कहें तो व्यक्ति के व्यक्तित्व का सौंदर्य उस का मस्तिष्क है. अगर मस्तिष्क स्वस्थ नहीं है, सोच सकारात्मक नहीं है तो ऊपरी विकास सतही ही होगा. ऐसा व्यक्ति सदा कुंठित रहेगा तथा उस की कुंठा बातबात पर निकलेगी. या तो वह जीवन से निराश हो कर बैठ जाएगा या स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने के लिए कभी वह किसी का अनादर करेगा तो कभी अपशब्द बोलेगा. ऐसा व्यक्ति चाहे कितने ही आकर्षक शरीर का मालिक क्यों न हो पर कभी खूबसूरत नहीं हो सकता, क्योंकि उस के चेहरे पर संतुष्टि नहीं, सदा असंतुष्टि ही झलकेगी और यह असंतुष्टि उस के अच्छेभले चेहरे को कुरूप बना देगी.

अगले भाग में पढ़ें- क्या अभिनव के मन का फितूर निकल पाया ?

कामयाब : भाग 3

मान लीजिए, किसी व्यक्ति के मन में यह विचार आ गया कि उस का समय ठीक नहीं है तो वह चाहे कितने ही प्रयत्न कर ले सफल नहीं हो पाएगा. वह अपनी सफलता की कामना के लिए कभी मंदिर, मसजिद दौड़ेगा तो कभी किसी पंडित या पुजारी से अपनी जन्मकुंडली जंचवाएगा.

मेरे कहने का अर्थ है कि वह प्रयत्न तो कर रहा है पर उस की ऊर्जा अपने काम के प्रति नहीं, अपने मन के उस भ्रम के लिए है…जिस के तहत उस ने मान रखा है कि वह सफल नहीं हो सकता.

अब इस तसवीर का दूसरा पहलू देखिए. ऐसे समय अगर उसे कोई ग्रहनक्षत्रों का हवाला देते हुए हीरा, पन्ना, पुखराज आदि रत्नों की अंगूठी या लाकेट पहनने के लिए दे दे तथा उसे सफलता मिलने लगे तो स्वाभाविक रूप से उसे लगेगा कि यह सफलता उसे अंगूठी या लाकेट पहनने के कारण मिली पर ऐसा कुछ भी नहीं होता.

वस्तुत: यह सफलता उसे उस अंगूठी या लाकेट पहनने के कारण नहीं मिली बल्कि उस की सोच का नजरिया बदलने के कारण मिली है. वास्तव में उस की जो मानसिक ऊर्जा अन्य कामों में लगती थी अब उस के काम में लगने लगी. उस का एक्शन, उस की परफारमेंस में गुणात्मक परिवर्तन ला देता है. उस की अच्छी परफारमेंस से उसे सफलता मिलने लगती है. सफलता उस के आत्मविश्वास को बढ़ा देती है तथा बढ़ा आत्मविश्वास उस के पूरे व्यक्तित्व को ही बदल डालता है जिस के कारण हमेशा बुझाबुझा रहने वाला उस का चेहरा अब अनोखे आत्मविश्वास से भर जाता है और वह जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता जाता है. अगर वह अंगूठी या लाकेट पहनने के बावजूद अपनी सोच में परिवर्तन नहीं ला पाता तो वह कभी सफल नहीं हो पाएगा.

इस के आगे व्याख्याता नीरा कौशल ने क्या कहा, कुछ नहीं पता…एकाएक चित्रा के मन में एक योजना आकार लेने लगी. न जाने उसे ऐसा क्यों लगने लगा कि उसे एक ऐसा सूत्र मिल गया है जिस के सहारे वह अपने मन में चलते द्वंद्व से मुक्ति पा सकती है, एक नई दिशा दे सकती है जो शायद किसी के काम आ जाए.

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दूसरे दिन वह रमा के पास गई तथा बिना किसी लागलपेट के उस ने अपने मन की बात कह दी. उस की बात सुन कर वह बोली, ‘‘लेकिन अभिजीत इन बातों को बिलकुल नहीं मानने वाले. वह तो वैसे ही कहते रहते हैं. न जाने क्या फितूर समा गया है इस लड़के के दिमाग में… काम की हर जगह पूछ है, काम अच्छा करेगा तो सफलता तो स्वयं मिलती जाएगी.’’

‘‘मैं भी कहां मानती हूं इन सब बातों को. पर अभिनव के मन का फितूर तो निकालना ही होगा. बस, इसी के लिए एक छोटा सा प्रयास करना चाहती हूं.’’

‘‘तो क्या करना होगा?’’

‘‘मेरी जानपहचान के एक पंडित हैं, मैं उन को बुला लेती हूं. तुम बस अभिनव और उस की कुंडली ले कर आ जाना. बाकी मैं संभाल लूंगी.’’

नियत समय पर रमा अभिनव के साथ आ गई. पंडित ने उस की कुंडली देख कर कहा, ‘‘कुंडली तो बहुत अच्छी है, इस कुंडली का जाचक बहुत यशस्वी तथा उच्चप्रतिष्ठित होगा. हां, मंगल ग्रह अवश्य कुछ रुकावट डाल रहा है पर परेशान होने की बात नहीं है. इस का भी समाधान है. खर्च के रूप में 501 रुपए लगेंगे. सब ठीक हो जाएगा. आप ऐसा करें, इस बच्चे के हाथ से मुझे 501 का दान करा दें.’’

प्रयोग चल निकला. एक दिन रमा बोली, ‘‘चित्रा, तुम्हारी योजना कामयाब रही. अभिनव में आश्चर्यजनक परिवर्तन आ गया. जहां कुछ समय पूर्व हमेशा निराशा में डूबा बुझीबुझी बातें करता रहता था, अब वही संतुष्ट लगने लगा है. अभी कल ही कह रहा था कि ममा, विपिन सर कह रहे थे कि तुम्हें डिवीजन का हैड बना रहा हूं, अगर काम अच्छा किया तो शीघ्र प्रमोशन मिल जाएगा.’’

रमा के चेहरे पर छाई संतुष्टि जहां चित्रा को सुकून पहुंचा रही थी वहीं इस बात का एहसास भी करा रही थी, कि व्यक्ति की खुशी और दुख उस की मानसिक अवस्था पर निर्भर होते हैं. ग्रहनक्षत्रों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. अब वह उस से कुछ छिपाना नहीं चाहती थी. आखिर मन का बोझ वह कब तक मन में छिपाए रहती.

‘‘रमा, मैं ने तुझ से एक बात छिपाई पर क्या करती, इस के अलावा मेरे पास कोई अन्य उपाय नहीं था,’’ मन कड़ा कर के चित्रा ने कहा.

‘‘क्या कह रही है तू…कौन सी बात छिपाई, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.’’

‘‘दरअसल उस दिन तथाकथित पंडित ने जो तेरे और अभिनव के सामने कहा, वह मेरे निर्देश पर कहा था. वह कुंडली बांचने वाला पंडित नहीं बल्कि मेरे स्कूल का ही एक अध्यापक था, जिसे सारी बातें बता कर, मैं ने मदद मांगी थी तथा वह भी सारी घटना का पता लगने पर मेरा साथ देने को तैयार हो गया था,’’ चित्रा ने रमा को सब सचसच बता कर झूठ के लिए क्षमा मांग ली और अंदर से ला कर उस के दिए 501 रुपए उसे लौटा दिए.

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‘‘मैं नहीं जानती झूठसच क्या है. बस, इतना जानती हूं कि तू ने जो किया अभिनव की भलाई के लिए किया. वही किसी की बातों में आ कर भटक गया था. तू ने तो उसे राह दिखाई है फिर यह ग्लानि और दुख कैसा?’’

‘‘जो कार्य एक भूलेभटके इनसान को सही राह दिखा दे वह रास्ता कभी गलत हो ही नहीं सकता. दूसरे चाहे जो भी कहें या मानें पर मैं ऐसा ही मानती हूं और तुझे विश्वास दिलाती हूं कि यह बात एक न एक दिन अभिनव को भी बता दूंगी, जिस से कि वह कभी भविष्य में ऐसे किसी चक्कर में न पड़े,’’ रमा ने उस की बातें सुन कर उसे गले से लगाते हुए कहा.

रमा की बात सुन कर चित्रा के दिल से एक भारी बोझ उठ गया. दुखसुख, सफलताअसफलता तो हर इनसान के हिस्से में आते हैं पर जो जीवन में आए कठिन समय को हिम्मत से झेल लेता है वही सफल हो पाता है. भले ही सही रास्ता दिखाने के लिए उसे झूठ का सहारा लेना पड़ा पर उसे इस बात की संतुष्टि थी कि वह अपने मकसद में कामयाब रही.

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जनवरी माह में खेती के ये हैं खास काम

साल का सब से ठंडा महीना जनवरी का होता है. इस महीने लोहड़ी व मकर संक्रांति जैसे पारंपरिक तीजत्योहार भी होते हैं. जनवरी के महीने में तापमान बहुत ज्यादा गिर जाने की वजह से पाला पड़ने लगता है, जिस का असर फसलों पर भी पड़ता है. पाले के नुकसान से बचने के लिए शाम के समय खेतों के आसपास आग जला कर धुआं करें.  इस से तापमान बढ़ जाता है और पाले का असर कम पड़ता है.

* गेहूं इस मौसम की खास फसल है. उस का खास ध्यान रखना होता है. 25 से 30 दिन के अंतर पर गेहूं में सिंचाई करते रहें. इस समय सिंचाई अच्छी पैदावार के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि इस माह गेहूं के पौधों में शिखर जडें़ और कल्ले फूटते हैं. जनवरी के आखिरी सप्ताह तक हलकी मिट्टी वाली जमीन में यूरिया भी दे सकते हैं.

* दीमक का प्रकोप बारानी इलाकों में होने की संभावना बनी रहती है. ऐसी स्थिति में क्लोरोपाइरीफास को 2 लिटर पानी में 20 किलोग्राम रेत के साथ मिलाएं और गेहूं की खड़ी फसल में बुरकाव कर के सिंचाई कर दें. जौ में भी दीमक और पाले से बचाव के लिए गेहूं की तरह ही उपाय करें.

* इस माह सरसों की फसल में फलियां बनने लगती हैं, इसलिए खेत में नमी जरूरी है. नमी बनाए रखने के लिए एक सिंचाई जरूर करें. इस से दाने मोटे और ज्यादा लगेंगे. सरसों की फसल में इस समय चेंपा का भी प्रकोप होता है. इस की उचित तरीके से रोकथाम करें.

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* चने की फसल में भी इस माह फूल आने की अवस्था होती है, इसलिए समय पर एक सिंचाई देने से अच्छा मोटा दाना बनेगा और पैदावार में बढ़ोतरी होगी. कईर् दफा जस्ते की कमी होने पर फसल में पुरानी पत्तियां पीली और बाद में जली सी हो जाती हैं. जिंक सल्फेट का स्प्रे से उपचार करें. कटवा सूंड़ी उगते पौधों के तनों को या शाखाओं को काट कर नुकसान पहुंचाते हैं. उस की रोकथाम करें. पत्तों, फूलों व फलियों को खा जाने वाली सूंड़ी से रोकथाम के लिए 400 मिलीलिटर इंडोसल्फान 35 ईसी को 100 लिटर पानी में घोल कर छिड़कें और 15 दिन बाद फिर छिड़काव करें. अगर फसल बोने से पहले बीजोपचार किया है, तो बहुत सी बीमारियों की रोकथाम अपनेआप हो जाती है.

* मटर में भी सिंचाई जरूरत के मुताबिक देते रहें. वहीं मसूर की खेती में निराईगुड़ाई करें. मुमकिन हो तो ह्वील हैंड हो से खोद कर खरपतवार निकाल दें. इस से फसल पैदावार में बढ़ोतरी होगी. जरूरत के मुताबिक सिंचाई भी करें.

* चारा फसल बरसीम, रिजका व जई की हर कटाई के बाद सिंचाई करते रहें. इस से बढ़वार अच्छी होगी और उम्दा किस्म का चारा मिलता रहेगा. जई में कटाई के बाद आधा बोरा यूरिया भी डालें.

* तिलहनी फसल सूरजमुखी की बीजाई जनवरी माह में भी हो सकती है. दिसंबर माह में बोई गई सूरजमुखी की फसल में नाइट्रोजन की दूसरी व अंतिम किस्त डालें व एक बोरा यूरिया बीजाई के महीनेभर बाद दें और पहली सिंचाई भी करें. फसल उगने के 15 से 20 दिन बाद गुड़ाई कर के खरपतवार निकाल दें.

* शरदकालीन गन्ने में एकतिहाई नाइट्रोजन की तीसरी किस्त दें व आखिरी बार यूरिया डाल दें. जस्ते की कमी नजर आए, तो 0.5 फीसदी जिंक सल्फेट और 2.5 फीसदी यूरिया का घोल छिड़कें. खरपतवार की स्थिति में गुड़ाई व सिंचाई करें. दीमक लगने पर 2.5 लिटर क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी 600 लिटर पानी में घोल कर स्प्रे करें.

* नवंबर माह में लगाई टमाटर की नर्सरी जनवरी माह में रोपी जा सकती है. टमाटर के खेत में खरपतवार बिलकुल नहीं होने चाहिए. इन्हें समयसमय पर निकालते रहें. पुरानी फसल में अगर फली छेदक कीट का हमला हो जाए, तो खराब फलों को तुरंत तोड़ कर नष्ट कर दें.

* अगर आम के पास पहले लगाई मिर्च की पौध तैयार है, तो मिर्च की नर्सरी जनवरी माह में रोपी जा सकती है. लाइनों व पौधों में 18 इंच का फासला रखें. फैलने वाली किस्मों में पौधों  से पौधों के बीच की दूरी अधिक रखें.

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* मटर में हलकी सिंचाई 10-15 दिन बाद करते रहें. इस से फूल, फलियां और कोंपलें भी पाले से बची रहेंगी. कीट नियंत्रण के लिए 0.1 फीसदी मैलाथियान या 0.1 फीसदी इंडोसल्फान का स्पे्र 15 दिन बाद करते रहें. पाउडरी मिल्ड्यू के लिए 0.3 फीसदी यानी 3 ग्राम प्रति लिटर पानी में घुलनशील सल्फर का स्प्रे 7 दिन के अंतर पर करें.

* मैदानी इलाकों में जनवरी माह के अंत तक फै्रचबीन बोई जा सकती है. झाड़ीनुमा किस्म जैसे पूसा सरवती के 35 किलोग्राम बीज को 2 फुट लाइनों में और 8 इंच पौधों में दूरी पर लगाएं. लंबी ऊंची किस्म हेमलता के 15 किलोग्राम बीज को 3 फुट लाइनों में और 1 फुट पौधे में दूरी पर लगाएं. बेल चढ़ने के लिए लकड़ी या लोहे के खंभे लगाएं. बीजाई से पहले खेत में उचित मात्रा में उर्वरकों का इस्तेमाल करें.

* पालक व मैथी की हर 15-20 दिन बाद कटाई करते रहें. इस तरह पत्तेदार सब्जियों की फसल में कीट नियंत्रण के लिए दवा का प्रयोग कम से कम करें.

* आलू की फसल में जब पत्तियां व तने पीले पड़ने लगें तो समझ लें कि आलू की फसल तैयार हो गई है. उस की खुदाई कर सकते हैं. कुछ दिन बाद मिट्टी खोद कर आलू निकाल लें. यह काम आप मजदूरों द्वारा भी करा सकते हैं. इस के अलावा आलू खुदाई मशीन पौटेटो डिगर से भी आलू की खुदाई कर सकते हैं. इस के बाद आलू की ग्रेडिंग भी कर सकते हैं. आलू के ढेर को पुआल वगैरह से ढक कर रखना चाहिए, वरना हवापानी के संपर्क में आने पर आलू हरा हो जाता है.

* बागों में साफसफाई का खास ध्यान रखें. गुड़ाई, काटछांट, खाद वगैरह देने का काम जनवरी माह में कर सकते हैं. कटाईछंटाई में पुरानी बीमार व सूखी टहनियां निकाल दें और फफूंदनाशक दवा 0.3 फीसदी कौपर औक्सीक्लोराइड का स्पे्र करें. पौधों के थालों यानी थमलों की भी साफसफाई व मरम्मत करें.

* जनवरी माह में अंगूर, आड़ू, अलुचा, अनार व नाशपाती के पेड़ लगाने के लिए अच्छा समय है. पेड़ लगाने के समय दीमक नियंत्रण जरूर करें.

* फूलगोभी, पत्तागोभी व गांठगोभी इस समय तैयार हो चुकी होती है, अच्छी तरह से कटाईछंटाई कर के मंडी में भेजें व आगे के लिए बीज बनाने के लिए सेहतमंद पौधों का चुनाव करें. इन के आसपास से खरपतवार हटा दें.

* इस समय प्याज रोपाई का भी अच्छा समय है. प्याज रोपने के बाद उस की सिंचाई करें. लहसुन की फसल की भी उचित निराईगुड़ाई व सिंचाई करें.

* जनवरी माह में अधिक ठंड होने के चलते पशुओं की भी देखभाल जरूरी है. उन्हें सूखी जगह पर रखें और ठंड से बचाव करें व नियमित रूप से संतुलित आहार दें. पशुओं को कृमिनाशक दवाएं देना न भूलें. इस मौसम में पशुओं को गुड़ भी खिलाते रहें.

* मुरगियों को ठंड से बचाने के लिए खास ध्यान दें. मुरगीघरों में बिछावन को गीला न होने दें. अधिक ठंड के समय बिजली के बल्बों को जला कर रखें.

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* इस के अलावा अगर पशुओं में कोई समस्या दिखे तो पशु विशेषज्ञ डाक्टर से उचित सलाह लें.

* वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए उचित तापमान 28 डिगरी सैंटीग्रेड है, लेकिन इसे पूरे साल बनाए रखा जा सकता है. सर्दियों में जब खेत पर काम कम होता है और पशुशाला का कूड़ाकरकट व गोबर काफी मात्रा में उपलब्ध रहता है, तो केंचुओं की मदद से उच्च गुणवत्ता का वर्मी कंपोस्ट बना सकते हैं. इस से मिट्टी की सेहत सुधरेगी व पैदावार में बढ़ोतरी होगी.

सेहत का खजाना है लहसुन

क्या आप जानते हैं, दाल  और सब्जी में तड़का लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाला लहसुन कई गुणों का खान है. खाने में स्वाद लाने के साथ-साथ यह बीमारियों को दूर भगाने का काम भी करता है. लहसुन से होने वाले लाभ और इसके चिकित्सीय गुणों की चर्चा सदियों से होते आ रही हैं. कई शोध और अध्ययन से पत्ता चलता हैं कि हमारे देश में लहसुन का इस्तेमाल आज से करीब 5000 वर्ष पहले से होते आ रही हैं, आर्युवेद में भी लहसुन से उपचार के बातों का उल्लेख मिलता है. कहा जाता हैं कि लहसुन  रसोई में उपस्थित होने के साथ-साथ दवाखाने में भी उपस्थित रहता हैं. कई लोग जानकारी के अभाव में केवल इसके गंध के कारण इस से परहेज करते है. इसके नियमित उपयोग से कई बीमारिया और परेशानियां पल में दूर हो जाती हैं. तो आईए जानते हैं, कि लहसुन अपने किन औषधीय गुणों के सेहत का खजाना है.

  • लहसुन की एक कली का प्रतिदिन सेवन से मानव शरीर को विटामिन ए, बी और सी के साथ आयोडीन, आयरन, पोटेशियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे कई पोषक तत्व एक साथ मिलते हैं.
  • सर्दी के मौसम में होने वाले सर्दी, जुकाम और कफ बनने की समस्या से राहत पाने के लिए नियमित रूप से लहसुन का सेवन फायदेमंद माना गया है.

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  • उच्च रक्तचाप वालो के लिए लहसुन काफी उपयोगी होता है. लहसुन में पाया जाने वाला सल्फाइड्स रक्तचाप को कम करने में मदद करता है. वे सल्फाइड्स लहसुन को पकाने के दौरान भी नष्ट नहीं होते हैं.
  • वायरस और बैक्टीरिया से बचने के लिए ताजा लहसुन खाना ही फायदेमंद होता है. इसके एंटीबैक्टीरियल गुण इन्फेक्शन से लडने में मदद करते हैं.
  • कैंसर के उपचारऔर बचाव में लहसुन की महत्वपूर्ण भूमिका है. कई चिकित्सीय  शोध में बताया गाया हैं कि जो लोग नियमित लहसुन का सेवन करते है उन्हे कैंसर होने की आशंका बेहद कम होती है.

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  • कौलेस्ट्रोल की समस्या से पीडि़त लोगों के लिए लहसुन का नियमित सेवन अमृत साबित हो सकता है. षोधो में यह पुष्टि हो चुका है कि लगातार चार हफ्ते तक लहसुन खाने से कौलेस्ट्रोल का स्तर 12 प्रतिशत तक कम हो जाता है.
  • आंखों की रोशनी के लिए भी लहसुन लाभदायक माना जाता है.
  • हृदय संबंधी विकारों को कम करने के लिए लहसुन को भोजन में शामिल करना जरूरी माना जाता है.

निखरी त्‍वचा पाने के लिए अपनाएं ये 4 खास टिप्स

आप निखरी त्‍वचा पाने के लिए बहुत सारे क्रीम, लोशन और कई तरह के चीजों का इस्तेमाल करती हैं. पर क्या आप जानती हैं कि त्वचा को सुंदर और कोमल बनाने के लिए खान-पान की चीजों पर भी ध्यान देना जरूरी है. तो चलिए जानते  हैं आप निखरी त्वचा पाने के लिए क्या करें.

त्‍वचा को निखारने के उपाय

डार्क चौकलेट – चौकलेट में फ्लैवलाएड्स नाम के एंटी-एजिंग और एंटीऔक्सिडेंट्स पाए जाते हैं जो फ्री-रैडिकल्स से लड़कर आपकी त्वचा को अल्ट्रावायलेट  किरणों से होने वाले नुकसान से बचाते हैं. साथ ही ये झुर्रियों, और स्किन डिसकलरेशन को रोकती है. तो आप निखरी त्वचा पाने के लिए डार्क चौकलेट भी खा सकती हैं.

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पालक: पालक में प्रचुर मात्रा में बीटा कैरोटीन, विटामिन B, C, E, पोटैशियम, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और ओमेगा-3 फैटी ऐसिड्स पाए जाते हैं जो बढ़ती उम्र की परेशानियों को कम करने में मदद करते हैं. इसमें मौजूद फैटी एसिड्स बालों की चमक को भी बनाए रखते हैं.

दही: दही में गुड बैक्टीरिया पाए जाते हैं जो एक्ने से छुटकारा दिलाते हैं, झाइयां और दाग-धब्बे कम करने में मदद करता है.

अखरोट: अखरोट में भारी मात्रा में ओमेगा-3 फैटी एसिड्स पाए जाते हैं जो त्वचा को हेल्दी रखता है.

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ऐसे बनाएं कौर्न पुलाव

कौर्न पुलाव एक बहुत ही आसान रेसिपी है,  यह ए​क कम्पलीट ​मील है. बासमती चावल में कौर्न के दाने और मसाले डालकर इसे बनाया जाता है.

सामग्री

बासमती चावल (250 ग्राम)

कौर्न के दाने (80 ग्राम)

जैतून का तेल (2 टी स्पून)

प्याज (1)

अदरक लहसुन का पेस्ट (1 टी स्पून)

नमक (1 टी स्पून)

हरी मिर्च (4)

जीरा (5 ग्राम)

तेजपत्ता (1)

कालीमिर्च (1/2 टी स्पून)

लौंग (8)

गर्म पानी (2 कप)

हरा धनिया, टुकड़ों में कटा हुआ (3 टेबल स्पून)

नींबू का रस (2 टेबल स्पून)

शिमला मिर्च ( टुकड़ों में कटा हुआ)

नारियल, (कद्दूकस)

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बनाने की वि​धि

बासमती चावल को धोकर 15 से 20 मिनट के लिए पानी में भिगो दें.

नारियल में हरी मिर्च, हरा धनिया डालकर पीस लें और एक पेस्ट बना लें.

एक पैन लें और इसमें जैतून का तेल डालें.

एक बार जब तेल गर्म हो जाएं तो इसमें जीरा, लौंग, तेजपत्ता, कालीमिर्च, प्याज, लम्बाई में कटी हरी मिर्च, अदरक लहसुन का पेस्ट और नारियल पेस्ट डालें.

इसे अच्छे से भूनें और इसमें कौर्न के दाने डालें.

चावल का पानी निकाल लें और इन्हें पैन में डालकर लगातार चलाएं.

इसमें गर्म पानी डालें, थोड़ा सा नमक डालकर 15 मिनट के लिए पकाएं.

एक बार जब चावल 3/4 तक पक जाए तो इसमें नींबू का रस डालें.

इसे भुनी हुई पीली शिमला मिर्च, कददूकस किए हुए नारियल और हरा धनिए से गार्निश करें.

इसे खीरे के रायते के साथ सर्व करें.

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कामयाब : भाग 1

हमेशा जिंदादिल और खुशमिजाज रमा को अंदर आ कर चुपचाप बैठे देख चित्रा से रहा नहीं गया, पूछ बैठी, ‘‘क्या बात है, रमा…?’’

‘‘अभिनव की वजह से परेशान हूं.’’

‘‘क्या हुआ है अभिनव को?’’

‘‘वह डिपे्रशन का शिकार होता जा रहा है.’’

‘‘पर क्यों और कैसे?’’

‘‘उसे किसी ने बता दिया है कि अगले 2 वर्ष उस के लिए अच्छे नहीं रहेंगे.’’

‘‘भला कोई भी पंडित या ज्योतिषी यह सब इतने विश्वास से कैसे कह सकता है. सब बेकार की बातें हैं, मन का भ्रम है.’’

‘‘यही तो मैं उस से कहती हूं पर वह मानता ही नहीं. कहता है, अगर यह सब सच नहीं होता तो आर्थिक मंदी अभी ही क्यों आती… कहां तो वह सोच रहा था कि कुछ महीने बाद दूसरी कंपनी ज्वाइन कर लेगा, अनुभव के आधार पर अच्छी पोस्ट और पैकेज मिल जाएगा पर अब दूसरी कंपनी ज्वाइन करना तो दूर, इसी कंपनी में सिर पर तलवार लटकी रहती है कि कहीं छटनी न हो जाए.’’

‘‘यह तो जीवन की अस्थायी अवस्था है जिस से कभी न कभी सब को गुजरना पड़ता है, फिर इस में इतनी हताशा और निराशा क्यों? हताश और निराश व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता. जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए सोच भी सकारात्मक होनी चाहिए.’’

‘‘मैं और अभिजीत तो उसे समझासमझा कर हार गए,’’ रमा बोली, ‘‘तेरे पास एक आस ले कर आई हूं, तुझे मानता भी बहुत है…हो सकता है तेरी बात मान कर शायद मन में पाली गं्रथि को निकाल बाहर फेंके.’’

‘‘तू चिंता मत कर,’’ चित्रा बोली, ‘‘सब ठीक हो जाएगा… मैं सोचती हूं कि कैसे क्या कर सकती हूं.’’

घर आने पर रमा द्वारा कही बातें चित्रा ने विकास को बताईं तो वह बोले, ‘‘आजकल के बच्चे जराजरा सी बात को दिल से लगा बैठते हैं. इस में दोष बच्चों का भी नहीं है, दरअसल आजकल मीडिया या पत्रपत्रिकाएं भी इन अंधविश्वासों को बढ़ाने में पीछे नहीं हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो विभिन्न चैनलों पर गुरुमंत्र, आप के तारे, तेज तारे, ग्रहनक्षत्र जैसे कार्यक्रम प्रसारित न होते तथा पत्रपत्रिकाओं के कालम ज्योतिषीय घटनाओं तथा उन का विभिन्न राशियों पर प्रभाव से भरे नहीं रहते.’’

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विकास तो अपनी बात कह कर अपने काम में लग गए पर चित्रा का किसी काम में मन नहीं लग रहा था. बारबार रमा की बातें उस के दिलोदिमाग में घूम रही थीं. वह सोच नहीं पा रही थी कि अपनी अभिन्न सखी की समस्या का समाधान कैसे करे. बच्चों के दिमाग में एक बात घुस जाती है तो उसे निकालना इतना आसान नहीं होता.

उन की मित्रता आज की नहीं 25 वर्ष पुरानी थी. चित्रा को वह दिन याद आया जब वह इस कालोनी में लिए अपने नए घर में आई थी. एक अच्छे पड़ोसी की तरह रमा ने चायनाश्ते से ले कर खाने तक का इंतजाम कर के उस का काम आसान कर दिया था. उस के मना करने पर बोली, ‘दीदी, अब तो हमें सदा साथसाथ रहना है. यह बात अक्षरश: सही है कि एक अच्छा पड़ोसी सब रिश्तों से बढ़ कर है. मैं तो बस इस नए रिश्ते को एक आकार देने की कोशिश कर रही हूं.’

और सच, रमा के व्यवहार के कारण कुछ ही समय में उस से चित्रा की गहरी आत्मीयता कायम हो गई. उस के बच्चे शिवम और सुहासिनी तो रमा के आगेपीछे घूमते रहते थे और वह भी उन की हर इच्छा पूरी करती. यहां तक कि उस के स्कूल से लौट कर आने तक वह उन्हें अपने पास ही रखती.

रमा के कारण वह बच्चों की तरफ से निश्ंिचत हो गई थी वरना इस घर में शिफ्ट करने से पहले उसे यही लगता था कि कहीं इस नई जगह में उस की नौकरी की वजह से बच्चों को परेशानी न हो.

विवाह के 11 वर्ष बाद जब रमा गर्भवती हुई तो उस की खुशी की सीमा न रही. सब से पहले यह खुशखबरी चित्रा को देते हुए उस की आंखों में आंसू आ गए. बोली, ‘दीदी, न जाने कितने प्रयत्नों के बाद मेरे जीवन में यह खुशनुमा पल आया है. हर तरह का इलाज करा लिया, डाक्टर भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे क्योंकि हर जांच सामान्य ही निकलती… हम निराश हो गए थे. मेरी सास तो इन पर दूसरे विवाह के लिए जोर डालने लगी थीं पर इन्होंने किसी की बात नहीं मानी. इन का कहना था कि अगर बच्चे का सुख जीवन में लिखा है तो हो जाएगा, नहीं तो हम दोनों ऐसे ही ठीक हैं. वह जो नाराज हो कर गईं, तो दोबारा लौट कर नहीं आईं.’

आंख के आंसू पोंछ कर वह दोबारा बोली, ‘दीदी, आप विश्वास नहीं करेंगी, कहने को तो यह पढ़ेलिखे लोगों की कालोनी है पर मैं इन सब के लिए अशुभ हो चली थी. किसी के घर बच्चा होता या कोई शुभ काम होता तो मुझे बुलाते ही नहीं थे. एक आप ही हैं जिन्होंने अपने बच्चों के साथ मुझे समय गुजारने दिया. मैं कृतज्ञ हूं आप की. शायद शिवम और सुहासिनी के कारण ही मुझे यह तोहफा मिलने जा रहा है. अगर वे दोनों मेरी जिंदगी में नहीं आते तो शायद मैं इस खुशी से वंचित ही रहती.’

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उस के बाद तो रमा का सारा समय अपने बच्चे के बारे में सोचने में ही बीतता. अगर कुछ ऐसावैसा महसूस होता तो वह चित्रा से शेयर करती और डाक्टर की हर सलाह मानती.

धीरेधीरे वह समय भी आ गया जब रमा को लेबर पेन शुरू हुआ तो अभिजीत ने उस का ही दरवाजा खटखटाया था. यहां तक कि पूरे समय साथ रहने के कारण नर्स ने भी सब से पहले अभिनव को चित्रा की ही गोदी में डाला था. वह भी जबतब अभिनव को यह कहते हुए उस की गोद में डाल जाती, ‘दीदी, मुझ से यह संभाला ही नहीं जाता, जब देखो तब रोता रहता है, कहीं इस के पेट में तो दर्द नहीं हो रहा है या बहुत शैतान हो गया है. अब आप ही संभालिए. या तो यह दूध ही नहीं पीता है, थोड़ाबहुत पीता है तो वह भी उलट देता है, अब क्या करूं?’

अगले भाग में पढ़ें- अभिनव में क्यों बदलाव आया ?

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