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4 फरवरी को अंकित सिवाच अपनी प्रेमिका नुपुर भाटिया संग जिम कार्बेट में लेंगे सात फेरे

‘रिश्तो का चक्रव्यूह’’, ‘‘इश्कबाज’’, ‘‘लाल इश्क’’ और ‘‘मनमोहिनी’’जैसे सीरियलों में अभिनय कर चुके टीवी कलाकार अंकित सिवाच अपनी प्रेमिका नुपुर भाटिया के साथ 4 फरवरी को शादी करने जा रहे हैं.सूत्रों के अनुसार अंकित सिवाच और नुपुर भाटिया बचपन से एक दूसरे के साथ हैं. पहले दोनों अच्छे दोस्त थे और फिर इनके बीच प्रेम पनपा. अंकित सिवाच की प्रेमिका और होने वाली पत्नी नुपुर भाटिया एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर मार्केटिंग मैनेजर हैं. सूत्रों के अनुसार शादी और शादी से जुडे़ सभी रीति रिवाज जिम कार्बेट में पारिवारिक सदस्यों की मौजूदगी में संपन्न होंगे. उसके बाद अंकित सिवाच और नुपुर अपने दोस्तों के लिए पार्टी का आयोजन मेरठ के अलावा मुंबई में करेंगे.

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शादी की खबर को लेकर जब हमने अंकित सिवाच से बात की, तो अंकित ने अपनी प्रेमिका नुपुर सहित शादी का लेकर कहा- ‘‘नुपुर और मैं किंडरगार्डेन से एक साथ पढ़ते रहे हैं. हम सहपाठी हैं और कम से कम पिछले बीस साल से अच्छे दोस्त हैं .हमने एक साथ काफी लंबा समय बिताया है. हम दोनों के कैरियर में बीच में काफी उतार भी आया. पर जिंदगी के उतर चढ़ाव झेलते हुए एक दूसरे के साथ खड़े रहे हैं,एक दूसरे की कमियों व अच्छाइयों को समझा है. हर परिस्थिति में हम दोनों ने एक दूसरे को अपनाया. बीच में ऐसा भी वक्त आया,जब हम दोनों अलग अलग शहर ही नहीं अलग अलग देश में भी रहे, पर हमारे बीच जुड़ाव बना रहा. अब हम खुश हैं कि हम अपने संबंध को एक नए रिश्ते में बांधने जा रहे हैं. मैं नुपुर के साथ 4 फरवरी को शादी करने के फैसले से बहुत खुश और उत्साहित हूं.’’

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हर रिश्ते की ही तरह अंकित सिवाच और नुपुर भाटिया के रिश्ते में भी कई तरह की दरारें आयीं. पर हर बार यह दोनो और इनका रिश्ता समय की कसौटी पर खरा उतरते हुए मजबूत बनकर सामने आया. खुद अंकित कहते हैं-‘‘एक समय था निजी स्तर पर  हम अपने अपने व्यवसायों के कारण बड़े बदलावों से गुजरे थे. जिस तरह से हमने जीवन को देखा, वह बिलकुल अलग था. हमारे दृष्टिकोण अलग थे. मेरा मानना है कि हर कोई जीवन में उस निम्न चरण को हिट करता है, जो धीरे-धीरे गुजरता है. यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि आप इससे कैसे बाहर निकलते हैं. पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि हमने जिन उथल-पुथल का सामना किया है, उससे हमारे रिश्ते और मजबूत हुए हैं.”

क्या होता है डोप ?

बीता हुआ साल में डोप एक बार फिर चर्चा में उस समय आ गया जब पूर्व एशियाई रजत पदक विजेता मुक्केबाज सुमित सांगवान पर डोप टेस्ट में नाकाम रहने के कारण राष्ट्रीय डोपिंग निरोधक एजेंसी (नाडा) ने एक साल का प्रतिबंध लगा दिया. उन्हें ओलंपिक क्वालीफायर ट्रायल खेलना था लेकिन उन पर प्रतिबंध तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है. आईए जानते हैं क्या होता है डोप ?

डोप यानी वह शक्तिव‌र्द्धक पदार्थ जिसके जरिए खिलाड़ी अपनी मूल शारीरिक क्षमता में इजाफा कर मैदान पर प्रतिद्वंदियों को पीछे छोड़ने का शौर्टकट रास्ता अपनाते हैं. जाहिर है, यह तरीका खेल के मूल सिद्धांत के विपरीत है. लिहाजा, इसे दुनिया के खेल नियामकों ने अवैध ठहराया है. इसके दोषियों को दो साल से लेकर आजीवन प्रतिबंध तक की सजा का प्रावधान किया गया है.

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आधुनिक तौर-तरीकों और प्रक्रियाओं से डोपिंग करने वाले खिलाड़ियों का पकड़ा जाना आसान हो गया है, लेकिन खेलों में डोपिंग कोई नई बात नहीं है. पीछे देखें तो 1904 के ओलंपिक खेलों में इसका पहला मामला सामने आया था, जब पता चला कि मैराथन धावक थौमस हिक ने रेस जीतने के लिए कच्चे अंडे, सिंथेटिक इंजेक्शन और ब्रांडी का शक्तिव‌र्द्धन के लिए इस्तेमाल किया. तब हालांकि इसे लेकर कोई नियम नहीं था, लेकिन 1920 में खेलों में इस तरह की युक्ति पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में कड़े कदम उठाए गए. खेल संस्थाओं की बात करें तो अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स महासंघ पहली अंतरराष्ट्रीय खेल संस्था थी, जिसने 1928 में डोपिंग पर नियम बनाए और इस पर प्रतिबंध लगाया. 1966 में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आइओसी) ने एक मेडिकल काउंसिल की स्थापना की. इसका काम डोप टेस्ट करना था. 1968 के ओलंपिक खेलों में पहली बार डोप टेस्ट अमल में आए. आगे समस्या यह आई कि जैसे-जैसे ‘डोप एलीमेंट्स’ को चिन्हित किया जाने लगा, खिलाड़ियों ने नए-नए डोप एलीमेंट्स अपनाने शुरू कर दिए. लिहाजा, टेस्ट के तरीकों को भी अपडेट करना पड़ा और 1974 तक डोप टेस्ट का बेहद सटीक और प्रमाणिक तरीका अस्तित्व में आ गया. तब तक प्रतिबंधित तत्वों की सूची भी काफी लंबी हो चुकी थी और ऐसे तमाम तत्व इस सूची में दर्ज किए जा चुके थे, जो डोपिंग के अंतर्गत आते हैं. डोप टेस्ट प्रयोगशालाएं भी आधुनिक होती चली गईं और टेस्ट के तरीके भी. 1988 के सियोल ओलंपिक में 100 मीटर दौड़ के चैंपियन बेन जौनसन को जब प्रतिबंधित तत्व (स्टेनोजोलोल एनाबॉलिक स्टेरौयड) के सेवन का दोषी पाया गया, तब दुनिया का ध्यान पहली बार सख्त हो चुकी एंटी-डोपिंग मुहिम की ओर गया.

खेलों में डोपिंग कोई नई बात नहीं है. पीछे देखें तो 1904 के ओलंपिक खेलों में इसका पहला मामला सामने आया था, जब पता चला कि मैराथन धावक थॉमस हिक ने रेस जीतने के लिए कच्चे अंडे, सिंथेटिक इंजेक्शन और ब्रांडी का शक्तिव‌र्द्धन के लिए इस्तेमाल किया. तब हालांकि इसे लेकर कोई नियम नहीं था, लेकिन 1920 में खेलों में इस तरह की युक्ति पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में कड़े कदम उठाए गए.

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किसी भी खिलाड़ी का कभी भी डोप टेस्ट किया जा सकता है. इसके लिए संबंधित खेल संघों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है. किसी प्रतियोगिता से पहले या प्रशिक्षण शिविर के दौरान डोप टेस्ट अक्सर किए जाते हैं. ये टेस्ट नाडा या फिर वाडा, दोनों की ओर से कराए जा सकते हैं. इसके लिए टेस्ट सैंपल लेने वाली टीम फील्ड वर्क करती है. वह खिलाड़ियों के मूत्र के नमूने वाडा-नाडा की विशेष प्रयोगशाला में पहुंचा देती है. नाडा की प्रयोगशाला दिल्ली में स्थित है. यह भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित एकमात्र डोप टेस्ट प्रयोगशाला है. नमूना एक बार ही लिया जाता है जबकि टेस्ट दो चरण में होते हैं. पहले चरण को ए और दूसरे को बी कहते हैं. ए टेस्ट में पॉजीटिव पाए जाने पर खिलाड़ी को निलंबित (खेल गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध) कर दिया जाता है. तब यदि खिलाड़ी चाहे तो बी टेस्ट के लिए एंटी डोपिंग अपील पैनल में अपील कर सकता है. उसकी अपील के बाद उसके उसी नमूने की दोबारा जांच होती है. यदि बी टेस्ट भी पॉजीटिव आ जाए तो अनुशासन पैनल खिलाड़ी पर प्रतिबंध लगा देता है

‘अंधाधुंध’ फेम की अभिनेत्री, रश्मि अगड़ेकर अपने लेटेस्ट शो में रित्विक सहोरे के साथ रोमांस करेंगी

बौलीवुड एवं डिजिटल दुनिया के लिए नया चेहरा, रश्मि औनस्क्रीन दी गई अपनी बेहतरीन परफौर्मेंस से लोगों का दिल जीत चुकी हैं. वो अनेक वेब सीरीज और टीवी कमर्शियल्स का हिस्सा रह चुकी हैं. टीएसपी की लेटेस्ट सीरीज में वो अनन्या का किरदार निभा रही हैं. यह युवा एवं दृढ़निश्चित लड़की सीरीज के मुख्य पुरुष किरदार के साथ रिलेशनशिप में है. एक दूसरे की टांग खींचने से लेकर अजीबोगरीब स्थितियों से बचने और बेबाक बातचीत करने तक यह जेन जैड युगल अपनी बेहतरीन आन-स्क्रीन केमिस्ट्री से इंटरनेट की दुनिया में हलचल मचा रहा है.

अपने लेटेस्ट शो के बारे में रश्मि ने बताया कि अपने को-स्टार रित्विक सहोरे के साथ काम करने का उनका अनुभव कैसा रहा. बहुआयामी प्रतिभा वाले रित्विक के साथ काम करने के बारे में रश्मि ने कहा, ‘‘टीवीएफ की पूरी टीम के साथ शूटिंग का अनुभव बहुत सुगम था. हर दृश्य बहुत मजेदार था. रित्विक और मैं शो से पहले से ही एक दूसरे को जानते थे. इसलिए हमारे किरदारों को निभाना अजीब नहीं लगा. बल्कि इशान एवं अनन्या के बीच की केमिस्ट्री बाहर लाने के लिए हमें अजीब अभिनय करना पड़ा. उसके साथ काम करने का अनुभव बहुत अच्छा था. वह बहुत धैर्यशाली और सौहार्द्रपूर्ण है. हमारे बीच बेहतरीन बौन्ड है, जिसके कारण व्यक्तिगत एवं व्यवसायिक स्तर पर बातचीत करना काफी आसान है.’’

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बेहतरीन केमिस्ट्री के साथ यह निराला युगल टीएसपी की अजीब बातचीत द्वारा उन विलक्षण स्थितियों को दिखा रहा है, जिनसे जेन जैड युगल गुजरते हैं. इस शो की शानदार कास्ट में आकाशदीप अरोड़ा, सिमरन नाटेकर, सुनाक्षी ग्रोवर, प्रणति राय प्रकाश आदि हैं.

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एक मुलाकात ऐसी भी : भाग 1

मौल में पहुंचे ही थे कि मिशिका को उस के फ्रेंडस सामने दिख गए और वह मुझे तेजी से बायबाय कह कर उन के साथ हो ली. वह नोएडा के एमिटी कालिज से इंजीनियरिंग कर रही है. उस के सभी मित्रों को अच्छी कैंपस प्लेसमेंट मिल गई थी सो इसी खुशी में उस के ग्रुप के सभी साथी यहां पिज्जा हट में खुशियां मना रहे थे.

नोएडा का यह मशहूर जीआईपी यानी ‘गे्रट इंडिया प्लेस’ मौल युवाओं का पसंदीदा स्थान है. हम गाजियाबाद में रहते हैं. मिशिका अकेले ही रोज गाजियाबाद से कालिज आती है मगर इस तरह पार्टी आदि में जाना हो तो मैं या उस के पापा साथ आते हैं. यों अकेले तैयार हो कर बेटी को घूमनेफिरने जाने देने की हिम्मत नहीं होती. एक तो उस के पापा का जिला जज होना, पता नहीं कितने दुश्मन, कितने दोस्त, दूसरे आएदिन होने वाले हादसे, मैं तो डरी सी ही रहती हूं. क्या करूं? आखिर मां हूं न…

बच्चे अपने मातापिता की भावनाओं को कहां समझ पाते हैं. उन्हें तो यही लगता है कि हम उन की आजादी पर रोक लगा रहे हैं. कई बार मिशिका भी बड़ी हाइपर हुई है इस बात को ले कर कि ममा, आप ने तो मुझे अभी तक बिलकुल बच्चा बना कर रखा है. अब मैं बड़ी हो गई हूं. अपना ध्यान रख सकती हूं. अब उस नादान को क्या समझाएं कि मातापिता के लिए तो बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं. चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हो जाएं.

हां, मेरी तरह शायद जज साहब से वह इतना कुछ नहीं कह पाती. उन की लाडली, सिर चढ़ी जो है. जो बात मनवानी होती है, मनवा ही लेती है. बात तो शायद मैं भी उस की मान ही लेती हूं लेकिन उसे बहुत कुछ समझाबुझा कर, जिस से वह मुझ से खीझ सी जाती है.

अब क्या करूं, जब मुझे इस तरह के आधुनिक तौरतरीके पसंद नहीं आते तो. मैं तो हर बार इसे ही तरजीह देती हूं कि वह अपने पापा के संग ही आए. दोनों बापबेटी के शौकमिजाज एक से हैं. कितनी ही देर मौल में घुमवा लो, दोनों में से कोई पहल नहीं करता घर चलने की. मैं भी कभीकभी बस फंस ही जाती हूं. जैसे आज वह नहीं वक्त निकाल पाए. कोर्ट में कुछ जरूरी काम था.

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मैं थोड़ी देर तक यों ही एक दुकान से दूसरी दुकान में टहलती रही. खरीदारी तो वैसे भी मुझे कुछ यहां करनी नहीं होती है. वह तो मैं हमेशा अपने शहर की कुछ चुनिंदा दुकानों से ही करती हूं. सरकारी गाड़ी में अर्दलियों और सिपाहियों के संग रौब से जाओ और बस, रौब से वापस आ जाओ. सामान में कोई कमी हो तो चाहे महीने भर बाद दुकान पर पटक आओ. यहां मौल में, इतनी भीड़ में किस को किस की परवा है, कौन पहचान रहा है कि जज की बीवी शौपिंग कर रही है या कोई और. शायद इतने सालों से इसी माहौल की आदी हो गई हूं और कुछ अच्छा ही नहीं लगता.

खैर समय तो गुजारना ही था. यों ही बेमतलब घूमते रहने से थकान सी भी होने लगी थी. घड़ी पर नजर डाली तो बस, आधा घंटा ही बीता था. सोचतेविचरते मैं मैकडोनाल्ड की तरफ आ गई. कार्य दिवस होने के बावजूद वहां इतनी भीड़ थी कि बस, लगा कालिज बंक कर के सब बच्चे यहीं आ गए हों. माहौल को देख कर मिशिका का खयाल फिर दिलोदिमाग पर छा गया कि पता नहीं, यह क्या मौलवौल में पार्टी करने का प्रचलन हो गया है. अरे, तसल्ली से घर में मित्रों को बुलाओ, खूब खिलाओपिलाओ, मौजमस्ती करो, कोई मनाही थोड़े ही है.

थोड़ी देर में ही सही, मेरा भी कौफी का नंबर आ ही गया था. कौफी और फ्रेंचफ्राइज ले कर भीड़ से बचतेबचाते मैं एक खाली सीट पर जा कर बैठ गई और अपने चारों तरफ देखती कौफी का सिप भरती जा रही थी.

तभी मेरे पास एक बड़ी स्मार्ट सी महिला आईं और खाली पड़ी सीट की ओर इशारा कर बोलीं, ‘‘क्या मैं यहां बैठ सकती हूं?’’

‘‘हांहां. क्यों नहीं…आप चाहें तो यहां बैठ सकती हैं,’’ इतना कहने के साथ ही मेरी इधरउधर की सोच पर वर्तमान ने बे्रक लगा दिया.

मैं उस संभ्रांत महिला को कौफी पीतेपीते देखती रही. उस ने कांजीवरम की भारी सी साड़ी पहन रखी थी. उसी से मेल खाता खूबसूरत सा कोई नैकलेस डाल रखा था. पर्स भी उस के हाथ में बहुत सुंदर सा था. कुल मिला कर वह हाइसोसाइटी की दिख रही थी.

मुझ से रहा नहीं गया. अटपटा सा लग रहा था कि उस के सामने मैं फे्रंचफ्राइज का मजा अकेले ही ले रही थी और वह सिर्फ कौफी ले कर बैठी थी. संकोच छोड़ मैं ने अपने चिप्स उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अकेले ही शौपिंग हो रही है…’’

अपने होंठों पर हलकी सी हंसी ला कर वह बोलीं, ‘‘शौपिंग नहीं, आज तो अपने बेटे के संग आई हूं. दरअसल, आज बच्चों की गेटटूगेदर है. मेरे पति रिटायर्ड आई.ए.एस. हैं. यहीं सेक्टर 30 में हमारा छोटा सा घर है. पति तो अपनी ताशमंडली में व्यस्त रहते हैं और मैं बस, कभी क्लब, कभी किटी और कभी समाज- सेवा…रिटायर होने के बाद कहीं न कहीं तो अपने को व्यस्त रखना ही पड़ता है न.’’

‘‘आज मेरा छोटा बेटा समर्थ बोला कि ममा, मेरे संग मौल चलिए, आप को अच्छा लगेगा. सो आज यहां का कार्यक्रम बना लिया,’’ उस ने दोचार फ्रेंचफ्राइज बिना किसी झिझक के उठाते हुए बताया.

हम समझ गए थे कि हमारे बच्चे एक ही ग्रुप में हैं. थोड़ी देर में ही हम सहज हो क र बातें करने लगे. कुछ अपने परिवार के बारे में वह बता रही थीं और कुछ मैं. बीचबीच में हम खानेपीने की चीजें भी मंगाते जा रहे थे. अब किसी के संग रहने से अच्छा लगने लगा था. बातोंबातों में ही पता चला कि उन के 2 बेटे थे. छोटा समर्थ, मिशिका के संग पढ़ रहा था और बड़ा पार्थ इंजीनियरिंग के बाद पिछले साल सिविल सर्विस में सिलेक्ट हो गया था. इस समय लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी, मसूरी में उस की टे्रनिंग चल रही थी.

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मैं ने सोचा कि बापबेटा दोनों आईएएस. शुरू में ही मुझे लग गया था कि मेरी तरह यह महिला कोई ऊंची हस्ती है.

उन का बेटा आईएएस है और जल्दी ही वह उस की शादी करने की इच्छुक हैं, यह जान कर तो मेरी रुचि उन में और भी बढ़ गई. मैं तो खुद मिशिका के लिए अच्छा वर ढूंढ़ने की कोशिश में थी और एक आईएएस लड़के को अपना दामाद बनाना तो जैसे मेरे ख्वाबों में ही था.

पार्थ के बारे में जान कर मुझे सबकुछ अच्छा लगा था, लेकिन एक अड़चन थी कि वे कायस्थ थे, हमारी तरह ब्राह्मण नहीं थे जो मेरे लिए तो जमीं और आसमान को मिलाने वाली बात थी. अपनी इकलौती बेटी की गैर जाति में शादी करना मेरी सोच में कहीं दूरदूर तक नहीं था. एक तरह से तो मैं इस तरह के विवाह के बिलकुल खिलाफ थी.

अगले भाग में पढ़ें- अंतरा अपनी बुआ से क्यों गुस्सा थी ?

एक मुलाकात ऐसी भी : भाग 2

मेरा मानना था कि अपनी जाति, अपने धर्म के लोगों के बीच ही शादीब्याह जैसे रिश्ते करने चाहिए ताकि दोनों एकदूसरे से, परिवारों से, आपसी समझ और तालमेल बैठा सकें और सुखी संसार बसा सकें. मुझे हमेशा से ही यह अनुभव होता था कि इस के विपरीत शादियां कभी सुखद और सफल नहीं होतीं. शुरूशुरू में तो सब ठीकठाक चलता है, पर कुछ समय बाद कहीं तलाक होता है, तो कहीं जबरदस्ती रिश्तों को ढोया जाता है. यहां तक कि अपने परिवारों में होने वाली कई इस तरह की शादियों में मैं ने अपना पूरा विरोध जाहिर किया था.

ऐसा नहीं है कि जातिबिरादरी में शादियां कर के किसी तरह की टेंशन नहीं होती है या इस तरह की शादियां टूटती नहीं हैं, फिर भी काफी हद तक इन झमेलों से बचा जा सकता है और मेरे अनुभवों ने मुझे यही सिखाया है कि जब एक हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं तो यह तो समाज की सोच है जो न कभी एक हुई है और न ही होगी.

इन सभी बातों में जज साहब और मेरे विचार एक से नहीं हैं तो औरों की क्या कहूं. कई बार उन्होंने अपनी बातों से मुझे भी समझाने की कोशिश की है, मगर मैं कभी इतने बड़े दिल की हो नहीं पाई.

पिछले साल मैं ने अपना यह विरोध अपने भैया पर थोप दिया था. जब उन्होंने बताया कि वह अंतरा यानी मेरी भतीजी की शादी एक ईसाई लड़के से तय कर रहे हैं. दोनों एकदूसरे को जहां बहुत चाहते हैं, वहीं लड़का और उस का परिवार सबकुछ बहुत बढि़या है. हम लोगों को बच्चों की खुशी के अलावा और क्या चाहिए.

तब भैया की बात सुन कर मैं ने बवंडर मचा दिया था. ‘आप ने तो भैया हद ही कर दी. बच्चों की जिदें क्या यों ही आंखें मूंद कर पूरी की जाती हैं? ईसाई लड़के से विवाह करोगे अपनी अंतरा का? चार दिन भी नहीं निभा पाएगी वह इस अलग जाति और धर्म के लड़के के संग… और फिर कर लो जो आप की मर्जी हो, मैं तो इस गलत शादी में आने से रही.’ मेरी बातों के आक्रोश ने भैया को भयभीत कर दिया और उन्होंने यह कह कर उस रिश्ते को टाल दिया कि इकलौती छोटी बहन ही शादी में शरीक नहीं होगी तो दुनिया क्या कहेगी?

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उस दिन के बाद से अंतरा  अपने पापा से बात कर रही है और न मुझ से. एक दिन गुस्से में आ कर वह अपनी भड़ास निकाल गई थी, ‘‘बूआ, आप ने मेरा प्यार, मेरी जिंदगी मुझ से छीन ली. हम सब ने हमेशा आप को इतना प्यारसम्मान और स्नेह दिया, उस का यह सिला दिया आप ने. कल को आप को अपनी मिशिका की ऐसे ही किसी लड़के से शादी करनी पड़ी तब मैं देखूंगी कि कैसे आप जाति और धर्म का भेदभाव कर उस का दिल तोड़ पाती हैं.’’

उस की आंखों में भरे हुए आंसू और अपने लिए नफरत, आज भी मुझे विचलित कर देते हैं. मुझे इस बात का एहसास बाद में हुआ कि वह उस लड़के के प्यार में इतनी दीवानी है कि उस के बिना किसी और से शादी नहीं करेगी. कभीकभी खुद पर भी बहुत गुस्सा आता है कि मैं ने इस कदर क्यों अपनी इच्छा, अपने विचार भैया पर थोपे, फिर सोचती हूं तो लगता है कि आखिर मैं ने गलत ही क्या किया. वह मेरे अपने थे, अगर अपनों को उन की गलती का एहसास करा दिया तो क्या गलत किया? अंतरा मेरी कोई दुश्मन थोड़े ही थी. खुद भैया को भी पता था कि मैं अंतरा से कितना प्यार करती हूं, पर मुझे उस समय जो सही लगा मैं ने वही किया. अब वही बातें मेरे जेहन में आ रही थीं.

मैकडोनाल्ड की उस मुलाकात ने थोड़े ही समय में दोनों मांओं के बीच एक दोस्ती का सा रिश्ता बना दिया था. अपने- अपने मोबाइल नंबर और अतेपते दे कर हम ने विदा ली थी.

रास्ते भर मैं मिशिका से अपनी इस नई बनी दोस्त की बातें करती रही और वह भी अपनी तरहतरह की बातें मुझे बताती रही. उस के दोस्त की मम्मी के संग मैं आज सारे दिन रही और बोर नहीं हुई, इस से मेरी बेटी बहुत संतुष्ट थी. बोली, ‘‘ममा, आज आप बोर नहीं हुईं. नहीं तो पिछली बार की तरह मुझे सारे रास्ते आप के भाषण सुनने पड़ते. चलो, आगे से जब भी ऐसी कोई पार्टी होगी तो मैं आंटी से कहूंगी कि वह भी आप को कंपनी देने आ जाएं. तब तो ठीक रहेगा न मम्मी. मुझे भी टेंशन नहीं रहेगी कि ममा इतनी देर क्या करेंगी.’’ उस की बात सुन कर मैं मुसकरा पड़ी थी.

घर आने के बाद तरोताजा हो कर मैं बैठी ही थी कि मेरा मोबाइल बज उठा. नंबर देखा तो आज की बनी फें्रड मिसेज सक्सेना का ही था. तुरंत रिसीव किया. ‘‘आप घर पहुंच गईं क्या, मुझे तो आप की बड़ी याद आ रही है. सोच रही हूं कि जल्दी ही किसी रोज गाजियाबाद आ कर आप से मिलूं. आप से मिल कर बातें कर के बहुत अच्छा लगा.’’

‘‘हां, मैं भी बस, आप के बारे में ही सोच रही थी. कभीकभी किसी से अचानक मिलने पर भी ऐसा नहीं लगता कि हम जिंदगी में पहली बार मिले हैं.’’ मैं ने भी उन की बात का जवाब उन्हीं के अंदाज में दे दिया.

थोड़ी देर तक इसी तरह इधरउधर की बातें होती रहीं. फिर पता नहीं मुझे क्या हुआ कि उन्हें अपने घर अगले सप्ताह होने वाली पार्टी के लिए आमंत्रित कर दिया. मौल में श्रीमती सक्सेना से इसीलिए पार्टी में आने को नहीं कहा था कि जज साहब से पूछ कर कहूंगी पर अब जब उन्होंने यह बताया कि मसूरी से इस रविवार को 5 दिन के लिए पार्थ भी आ रहा है, तो बस, उसे देखने की इच्छा दिल में जाग उठी और बोल बैठी, ‘‘अरे, तो आप सब लोग इस रविवार को हमारे घर आइए न. एक छोटी सी पार्टी रखी है. जज साहब को अच्छा लगेगा.’’

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वह भी तुरंत तैयार हो गईं. जैसे आने के लिए बिलकुल तैयार बैठी हों.

शाम को जज साहब कोर्ट से लौटे तो चाय के दौरान मैं ने सबकुछ उन्हें बता दिया और अपने दिल की चाहत भी कह बैठी, ‘‘इतना अच्छा लड़का है. आईएएस है. परिवार भी समझदार और हैसियत वाला है. कायस्थ हैं, क्या ही अच्छा होता कि हमारी तरह वह भी ब्राह्मण होते तो हाथ जोड़ कर उन से मिशिका के लिए उन का पार्थ मांग लेती.’’

मेरे स्वभाव से परिचित जज साहब ने इस बात को जरा भी तूल नहीं दिया. सामान्य भाव से बोले, ‘‘अरे, निशि, जिस रास्ते जाना नहीं, उस बारे में क्या सोचना. जब हम मिशिका के लिए लड़का ढूंढ़ने निकलेंगे तो देखना लड़कों की कोई कमी नहीं आएगी. अभी तो हमारी बेटी का इंजीनियरिंग का ही एक साल बचा है फिर उसे एमबीए भी करना है. अभी कई साल हैं उस की शादी में.’’

मैं ने भी सोचा कि जज साहब सही तो कह रहे हैं. अपनी जाति में भी लड़कों की कोई कमी थोड़े ही है. अभी ऐसी जल्दी भी क्या है. अंतरा की तरह मिशिका का किसी गैर जाति में अफेयर थोड़े ही है, जो मैं इस विषय में सोचूं.

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एक मुलाकात ऐसी भी : भाग 3

देखते ही देखते हफ्ता निकल गया. पार्टी का दिन भी आ गया. लौन में ही पार्टी का इंतजाम किया था. पहली बार मिशिका ने पार्टी का जिम्मा अपने सिर पर लिया था. बोली, ‘‘ममा, अभी परीक्षा की कोई टेंशन नहीं है, इस बार मैं देखूंगी सारा इंतजाम.’’

सुन कर पहली बार एहसास हुआ कि बेटी बड़ी हो गई है. पार्थ का खयाल एक बार फिर दिमाग में आ गया. मगर मेरी मजबूरी थी कि मैं चाह कर भी यह रिश्ता नहीं कर सकती थी. मुझे इस समय अपनी भतीजी के गुस्से में कहे शब्द याद आ रहे थे.

घर में मेहमान आने शुरू हो गए थे. मैं ने अपनी सोच को दरकिनार करने की कोशिश की और मेहमानों की आवभगत में लग गई. जज साहब के कुछ करीबी जल्दी ही आ गए थे. अत: वह उन्हें पीने व पिलाने में व्यस्त हो गए. मैं और मिशिका मेहमानों के स्वागत में लगे थे. बेटी पर बारबार नजरें जा कर ठहर जातीं क्योंकि आज वाकई वह बहुत सुंदर लग रही थी. अचानक दिल में खयाल आया कि अगर आज की पार्टी में पार्थ उसे देख ले और पसंद कर ले या उस की मम्मी ही मिशिका को अपने बेटे के लिए मांग लें तो…

अचानक ही वह परिवार आंखों के सामने आ गया. श्रीमती सक्सेना अपने पति व दोनों बेटों के साथ चेहरे पर मुसकान लिए आती दिखाई दीं. समर्थ को तो उस दिन मौल में ही देख लिया था पर पार्थ तो उस से भी चार कदम आगे था. यह लड़का इतना हैंडसम होगा यह तो मैं ने सोचा भी नहीं था. उस पर आईएएस भी. मुझे फिर लगा कि मेरी चाहत मेरी सोच पर हावी हो गई है. फिर से मेरी चाहत जोर पकड़ने लगी कि यह लड़का तो बस, मेरा दामाद हो जाए. तभी नजदीक आ कर दोनों भाइयों ने मेरे और जज साहब के पैर छुए. मन कहीं अंदर तक उन्हें अपना मान गया.

सक्सेना दंपती तो हम बड़ों के ग्रुप में शामिल हो गए और दोनों भाई, मिशिका के फें्रड्स गु्रप में.

पार्टी खूब मजेदार चली. खाना खाने के बाद सभी लोग एकएक कर जाने लगे थे. मगर सक्सेना परिवार अभी जमा हुआ था. मुझे भी उन के जाने की कहां जल्दी थी. मिशिका पार्थ के संग खड़ी कितनी अच्छी लग रही थी. मन में सचमुच ही बहुत मलाल था कि वे कायस्थ हैं.

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अब तक करीब सभी मेहमान जा चुके थे. रात के 11 बज चुके थे. 30 अक्तूबर की रात, शरीर में ठंडीठंडी हवा की सिहरन सी हो उठी थी कि मिसेज सक्सेना ने, ‘‘एक कप कौफी हो जाए फिर हम भी चलेंगे,’’ कह कर अभी थोड़ा और रुकने का संकेत दिया.

‘‘अरे, क्यों नहीं, क्यों नहीं,’’ कहते हुए वेटर को 4 कप कौफी लाने का आर्डर दे दिया.

मिशिका दोनों भाइयों को अभीअभी अंदर ले गई थी. शायद अपना शानदार कमरा दिखा रही हो. लड़कियों को अपना कमरा दिखाने का बहुत क्रेज होता है.

कौफी आ गई थी. हम चारों हंसी मजाक के साथ कौफी का मजा ले रहे थे कि वह हो गया, जो मेरी सोच में तो निरंतर चल रहा था मगर हकीकत में उस का कोई अनुमान नहीं था.

सक्सेना साहब ने विनम्रता से अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘अगर आप लोग हमें दे सकें तो अपनी मिशिका को हमारे पार्थ के लिए दे दीजिए.’’ उन के कहने के साथ ही मिसेज सक्सेना ने भी अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.

मैं तो स्तब्ध, भौचक्की, किंकर्तव्य- विमूढ़ सी रह गई. जज साहब ने मेरी तरफ देखा. दोचार पल यों ही खामोशी में निकल गए फिर जज साहब ने कहा, ‘‘हमें यह रिश्ता मंजूर है. पार्थ हमें भी बहुत पसंद आया है और फिर आप से अच्छा और कौन मिलेगा हमें.’’

जज साहब की हां सुन कर मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में अब मैं क्या करूं? न हां करने की स्थिति में थी और न ही ना करने की. फिर कुछ सोचती सी बोली, ‘‘अरे, मिशिका से भी तो पूछना होगा न…उस की भी राय जानना जरूरी है. आप को तो पता ही है कि आजकल के बच्चे…’’

मुझे लगा कि चलो, इस बहाने कुछ तो वक्त मिलेगा सोचने का. फिर कुछ सोच कर मना कर देंगे. सही बताऊं तो भैयाभाभी, अंतरा किसी का भी सामना करने की मुझ में हिम्मत नहीं थी.

मेरी इस बात को सुन कर मिसेज सक्सेना के साथ जज साहब और सक्सेना साहब दोनों हंस पड़े. इस के पहले कि मैं कुछ कह पाती, मिसेज सक्सेना अपनी हंसी रोकती हुई बोलीं, ‘‘अच्छा, पहले यह तो बताइए, आप तो राजी हैं न…’’

‘‘मैं…मैं तो…हां, और क्या. मुझे तो बहुत खुशी होगी आप से जुड़ कर,’’ मैं इस के अलावा और क्या कह सकती थी. जब जज साहब ने इस की स्वीकृति दे दी. ‘‘मगर मिशिका…’’ मैं ने फिर इस से बचने की कोशिश की.

‘‘अरे, निशिजी, मुझे तो बस, आप की ही इजाजत चाहिए थी. बाकी सब की इजाजत तो पहले से ही है,’’ इस बार सक्सेना साहब ने जिस अंदाज में कहा, मेरा चौंकना लाजिमी था. असमंजस में पड़ी बोली, ‘‘मतलब?’’

‘‘अरे, निशि, तुम्हारी और मिसेज सक्सेना की मुलाकात मौल में इसीलिए तो कराई थी कि आप दोनों में दोस्ती हो जाए, वरना तो मैं भी जा सकता था उस दिन. मैं ने तो कोर्ट में व्यस्त होने का बहाना किया था. हम लोग काफी दिनों से योजना बना रहे थे कि तुम दोनों को कैसे मिलाया जाए. सो इत्तफाक से मिशिका की गेटटूगेदर निकल आई. हालांकि मौल में मिलवाना मुश्किल था, लेकिन बच्चों ने सब मैनेज कर लिया.’’

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जज साहब बोलते जा रहे थे और मैं आंखें फाड़े उन्हें सुने जा रही थी.

‘‘निशि, जब मौल से लौट कर तुम ने पार्थ के बारे में अपनी चाहत बताई तो मुझे लगा कि हमारा तीर निशाने पर लगा है. प्रकट में मैं ने तुम्हारी बात को तूल नहीं दिया था.

‘‘निशि, तुम्हें याद होगा कि 4 साल पहले मैं जब एक सेमिनार में अमेरिका गया था तो वहां उस में सक्सेना साहब भी मिले थे. भारत से जो खास लोग उस सेमिनार में भेजे गए थे, उन को एक ही होटल में ठहराया गया था और सक्सेना साहब का कमरा मेरे बगल में ही था.’’

आखिर क्या हुआ अंतरा और नीशि के बीच ?

एक मुलाकात ऐसी भी : भाग 4

दोस्ती होना तो लाजिमी ही था न. देखो, तुम्हारी और मिसेज सक्सेना की दोस्ती तो चंद घंटों में ही हो गई, जबकि हम तो पूरे 15 दिन साथ रहे थे. इसी दौरान एक बार मेरी तबीयत भी बिगड़ गई थी तो सक्सेना साहब ने ही मुझे संभाला था और वे सारी बातें यहां आने पर मैं ने तुम को बताई थीं.

‘‘हांहां, मुझे सब याद है,’’ मैं कुछ खोईखोई सी बोली.

‘‘उन्हीं दिनों हम दोनों, एकदूसरे के बेहद करीब आ गए थे. दोस्ती के उन्हीं लम्हों में हम ने आपस में एक वचन लिया कि समय आने पर मिशिका और पार्थ की शादी कर देंगे. आज पार्थ आई.ए.एस. हो गया है. मगर दोस्ती में किए गए वादे में कहीं कोई कमी नहीं आई है. सक्सेनाजी के पास तो अब कितने अच्छेअच्छे आफर आ रहे होंगे जबकि यह जानते हैं कि मैं ने तो जिंदगी भर शोहरत और इज्जत के अलावा कुछ नहीं कमाया. मेरे पास अपनी मिशिका को उन्हें सौंपने के अलावा और कुछ देने को नहीं है.’’

सक्सेना साहब ने जज साहब का हाथ अपने हाथों में ले लिया था और भावविह्वल हो कर बोले, ‘‘ऐसीवैसी कोई बात मत कीजिए जज साहब, नहीं तो मैं उठ कर चला जाऊंगा. जिंदगी में सबकुछ मिल जाता है, मगर दोस्ती, अच्छे लोग, अच्छा परिवार बहुत कम लोगों को मिल पाता है और हम लोग उन्हीं में से एक हैं कि हमें आप मिले हैं.’’

‘‘सुन रही हो निशि. तुम जाति- बिरादरी की बातें करती रहती हो, क्या इन से अच्छा तुम्हें मिशिका के लिए कुछ मिल पाएगा. अच्छे लोग, अच्छे रिश्ते, अच्छे परिवार इन सब से बढ़ कर न धर्म है न जाति है और न ही कुछ और. आज मैं ने बिना तुम्हारी इच्छा जाने इस रिश्ते को हां कर दी है क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं सही काम कर रहा हूं और अदालत में आएदिन परिवारों के टूटनेबिखरने के मामले मैं ने सुने और निबटाए हैं, उन में रिश्ते टूटने की वजह यह शायद ही हो कि उन की जाति अलग थी या धर्म. मुझे माफ करना निशि, तुम्हारी बेसिरपैर की बातों के लिए मैं इतना अच्छा रिश्ता नहीं ठुकरा सकता. अच्छा लड़का सोच कर ही पार्थ से मिशिका की शादी की बात खुद तुम्हारे दिमाग में आए इस के लिए ही वह मुलाकात करवाई गई और अब यह पार्टी भी रखी गई ताकि इस ड्रामे का सुखद अंत कर दिया जाए.’’

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पत्नी को काफी कुछ कह कर अंत में जज साहब ने उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मेरे खयाल से अब तुम्हें भी समझ जाना चाहिए कि तुम्हारी सोच बहुत संकीर्ण थी. वक्त और जमाने से हट कर थी. तुम्हारे भैया तुम्हारी बात सुन कर अपनी बेटी का जीवन बिगाड़ सकते हैं, पर मैं नहीं.’’

सभी अपनीअपनी बात कह चुके थे. मिशिका और पार्थ भी अपनी स्वीकृति दे चुके थे. अब मेरी बारी थी सो मैं ने भी हाथ जोड़ कर इस रिश्ते को अपनी स्वीकृति दे दी. मिसेज सक्सेना ने उठ कर मुझे गले लगाते हुए कहा, ‘‘बधाई हो निशिजी. सबकुछ कितनी जल्दी हो गया न. अभीअभी तो हम दोस्त बने थे और अभीअभी समधिनें. उन्होंने अपने गले में पहना एक जड़ाऊ हार उतार कर तुरंत मिशिका को पहनाते हुए कहा, ‘‘आज से तुम्हारी एक नहीं, दोदो मांएं हैं.’’

सबकुछ बहुत अच्छा लग रहा था मगर दिल में कहीं एक डर और चिंता थी, जो मुझे खुल कर खुश नहीं होने दे रही थी. क्या करूंगी, कैसे जाऊंगी भैयाभाभी के सामने. यह सोचसोच कर ही मेरी जान सूखी जा रही थी. सभी थक कर सो गए थे, मगर मेरे मन का डर और अपराधभाव मुझे सोने ही नहीं दे रहा था.

अगली सुबह काफी देर से आंखें खुल पाईं. पता नहीं कितने बजे नींद आई थी. घड़ी पर नजर पड़ी तो पूरे 10 बज रहे थे. जज साहब के कोर्ट जाने की बात दिमाग में आते ही मैं तेजी से उठी कि भाभी ने चाय के प्याले के साथ कमरे में प्रवेश किया और हंसती हुई बोलीं, ‘‘क्या निशि, इतनी बड़ी खुशखबरी है और तुम सो रही हो अब तक?’’

जिस बात के लिए मैं अब तक इतनी परेशान थी, वह इतनी आसानी से सुलझ जाएगी, मैं ने सोचा भी न था. मुझे तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था.

मुझे हैरान देख भाभी बोलीं, ‘‘सुबहसुबह ही ननदोईजी का फोन आ गया और फोन पर उन्होंने जब रिश्ता तय होने की बात बताई तो हम से रहा नहीं गया और आप की खुशी में खुशी मनाने चले आए. अपने जीजाजी को देखने के लिए अंतरा भी बेचैन हो रही है, शाम को वह भी यहीं आएगी. सक्सेना परिवार को भी बुला लिया है, आज का डिनर मामामामी की तरफ से शहर के सब से अच्छे होटल में…’’ भाभी बोले जा रही थीं.

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मैं हैरत में पड़ी भाभी का चेहरा पढ़ने में लगी थी. मगर वहां स्नेह व प्यार के अलावा और कुछ भी नहीं था. मेरे इतना बड़ा दुख देने के बावजूद भाभी का यह व्यवहार…कुछ समझ में नहीं आया तो मैं भाभी से लिपट कर जोरजोर से रो पड़ी.

‘‘भाभी, मैं इस लायक कहां कि आप मुझे इतना प्यार दें. मैं ने आप लोगों को अपनी गलत सोच की वजह से इतना दुख पहुंचाया, मैं तो आप को अपना मुंह भी दिखाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी. मैं कितनी बुरी हूं भाभी, कितनी बुरी…’’ मेरा रुदन तेज हुआ जा रहा था और भाभी मेरी पीठ सहलाए जा रही थीं.

‘‘मत रो निशि, मत रो. अब वह भी तुम्हारा हम से अगाध प्रेम ही तो था, वरना किसी को क्या पड़ी है, अच्छा हो या बुरा हो. तुम्हें गलत लगा, इसीलिए तुम ने रोका और हमें तुम्हारी बात सही लगी इसीलिए हम ने उसे मान लिया.’’

‘‘तुम्हारी भाभी बिलकुल सही कह रही हैं निशि. जो हो गया उसे भूल जा, और दिल खोल कर आने वाली खुशियों का इंतजार कर.’’ तभी कमरे में जज साहब के संग भैया आतेआते बोले, ‘‘मेरे मन का बोझ इतनी सहजता से उतर जाएगा, सोचा नहीं था,’’ मैं ने कृतज्ञता से जज साहब को देखा जिन्होंने अपनी समझदारी से इतनी बड़ी खुशी मुझे दे दी थी. उन्होंने मेरी आंखें पढ़ लीं और मुसकरा दिए.

‘‘मगर अभी तो अंतरा का दुख है मेरे सामने. वह तो बहुत नाराज है अपनी बूआ से. उसे कैसे वापस पा सकूंगी मैं?’’

‘‘अरे, अपने बच्चे छोटेछोटे हैं. ज्यादा देर तक अपने बड़ों से नाराज नहीं रहते. मैं ने उसे समझाया है निशि, उस के मन में तुम्हारे लिए कोई गुस्सा नहीं है.’’ भैया बोले तो साथसाथ भाभी भी बोल पड़ीं, ‘‘और अभी सुबहसुबह ही तो फूफाजी से उस की ढेरों बातें हुई हैं और फूफाजी ने उस से वादा किया है कि अब चाहे उस की बूआ कुछ भी कहें, वह अपनी अंतरा की शादी उसी के संग कराएंगे जिसे वह पसंद करती है. पहले चर्च में अंतरा की उस ईसाई लड़के से शादी होगी, फिर मिशिका की मंडप के नीचे. बच्चे जितनी जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, उतनी ही जल्दी मान भी जाते हैं निशि.’’

भाभी अपनी बात कह चुकीं तो मैं ने खुश हो कर तुरंत कहा, ‘‘और अब सब से पहले तैयार हो कर हम लोग वहां चलेंगे. मुझे भी तो अपने दूसरे दामाद को शाम के डिनर के लिए आमंत्रित करना है. उन से भी तो माफी मांगनी है, इस बुरी बूआ को.’

करें थोड़ी सी देखभाल और पाए ड्राई स्किन के बजाय सौफ्ट, चमकती त्वचा

सर्दियों में ड्राई स्किन को ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है. ठंड में ड्राई स्किन रूखी, सूखी और पपड़ी सी दिखने लगती है और जरूरत से ज्यादा देखभाल और अतिरिक्त नमी की जरूरत होती है.. आइए जानते हैं कि कैसे कुछ खानपान और देखभाल के साथ सर्दियों में भी ड्राई स्किन को चमकदार बनाए रख सकते हैं जो चीजें आपको किचन में ही मिल जाएगी और कुछ समय देने भर से आप बेहतर महसूस करेंगी..

1- उचित मात्रा में (8 से दस ग्लास) पानी पीते रहना चाहिए, अगर ज्यादा सर्दी हो तो गुनगुना पानी भी पी सकते हैं. पानी हमारी स्किन को हाइड्रेड रखता है और प्राकृतिक नमी बनी रहती है. आप नहाने के लिए भी हल्के गर्म पानी का ही इस्तेमाल करें ज्यादा गर्म पानी स्किन को नमी को कम करता है. नहाने के तुरंत बाद ही टावेल से पोंछ कर कोई अच्छा मौश्चराइजर या तेल लगा सकती है. नहाने के तुरंत बाद त्वचा नर्म होती है और उस समय लगायी गयी क्रीम बेहतर रिजल्ट देती है.

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2- सर्दियों में खासकर रूखी त्वचा के लिए सही क्रीम या प्राकृतिक तेल का चुनाव भी अहम होता है. अगर तेल लगाना चाहती है तो नारियल या जैतून का तेल अच्छा रहेगा. थोड़ा ज्यादा समय हो तो नहाने से पहले ही तेल से मसाज कर ले और एक घंटे बाद गुनगुने पानी से नहाकर नर्म तौलिये से हल्के हाथो से पोंछ ले.. इससे डेड सेल्स भी निकल जाएंगे और उसके बाद हल्का सा माश्चराइजर लगा ले.. इससे स्किन ज्यादा कोमल और चमकदार रहेगी.

3- साबुन भी कोई क्रीम बेस्ड या माइल्ड ही ले.. चेहरे के लिए शहद युक्त फेसवाश ले.. अगर चेहरा ज्यादा ड्राई नज़र आ रहा है तो थोड़ा शहद अप्लाई करें और 10 – 15 मिनट बाद नौर्मल पानी से धो ले l इसी तरह दूध को भी कौटन बाल से चेहरे पर लगाकर छोड़े और 10 मिनट बाद धो ले.. ये चेहरे को ड्राई होने से रोकेगा l दूध न केवल चेहरे को नम रखता है बल्कि research कहती हैं कि दूध पीने से भी स्किन rebuild होती है.. इसमें मौजूद phospholipids स्किन समस्याओं को कम करते हैं.

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4.  कोई भी अच्छी पेट्रोलियम जैली हमेशा साथ रखे.. जब भी हाथ, चेहरा या होंठ सूखे लगे तो थोड़ी सी लगा ले.. ये नमी को बरकरार रखेगा l दिन में दो बार चेहरे पर क्रीम और एक बार पूरी बॉडी पर तेल या क्रीम जरूर लगाए.. तेल वही चुने जो आपको सूट करता हो और चिपचिपाहट न हो.. रात में सोते वक़्त कुहनियों, होठों, एड़ियों पर अलग से पेट्रोलियम जैली जरूर लगाए..दिन में मोजे पहन कर रखने से भी पैर मुलायम बने रहेंगे l लिपस्टिक लगाने से पहले भी थोड़ी पेट्रोलियम जैली हमेशा लगाए l दिन में चेहरे पर सनस्क्रीन लगाना न भूले और साथ ही रात को सोते वक़्त कोई भी अच्छी नाइट क्रीम या बेबी क्रीम लगा सकती हैं.

15 दिन में एक बार किसी अच्छी क्रीम से चेहरे पर मसाज करना बेहतर होगा या महीने में एक बार पार्लर भी जाकर cleansing करा सकती है और इसका चुनाव अपनी स्किन टाइप देखकर करें..

आप और आपके अभिभावक !

बनारस की दिव्या को मम्मी -पापा का साथ जरूर अच्छा लगता है, लेकिन हर बात पर मम्मी को टोकना उसे पसंद नही है. दिव्या चाहती है कि  उनके मम्मी -पापा उसके ऊपर भरोसा करें , क्योंकि वह दबे सवार में यह स्वीकारती है कि  हां –  मम्मी-पापा उनके मस्ती में ब्रेकर की तरह है. वह यह भी स्वीकार करती है कि कई दफा उसकी लड़ाई अभिभावकों से हो चुकी है. वही दिल्ली के साकेत की आरुणा का मानना है कि माता-पिता  से अच्छा दोस्त कोई नही , लेकिन आरुणा भी यह कहती है कि हां-मुझे हर गलती पर करार डांट पड़ता है, जो कुछ पल के लिए मुझे अपने अभिभावकों के बारे में गलत सोचने को मजबूर कर देता है. मेरठ के अजय चौधरी तो खुल कर कहते हैं, मै उसी क्षेत्र में करियर बनाना पसंद करुंगा जो मुझे पसंद है. अजय बताते है कि  12 वीं के बाद उनके  पिता कि इच्छा इन्हे इंजीनियर बनाने का था लेकिन उनकी रूचि निजी क्षेत्र में काम करने का था , इसलिए उन्होंने अभिभावक के इच्छा के विरोध जाना सही समझा, कुछ समय तक उनके पिता उनसे नाराज रहे फिर स्थिति सामान्य हो गई. आज अजय एक निजी संस्था में काम करते हुए अपने निजी जीवन में काफी खुश है.  इस प्रकार के कई उदाहरण है, बच्चो को दबे स्वर में अभिभावकों के विरोध आवाज बुलंद करने की.

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हां एक बात तो इन उदाहरणों  से साफ होता है कि कहीं ना कहीं अभिभावक भी बच्चों पर आवश्यकता से अधिक दबाव बना देते है . अगर 110 में से 84 फीसदी नवयुवक कुछ करने से पहले माता -पिता का इजाजत लेना उचित समझते हैं. जबकि 16 फीसदी इसका कोई जरुरत नहीं समझते. नवयुवक अपने बातों पर अभिभावकों का मश्वरा लेना उचित समझाते है.  तभी तो 78 फीसदी नवयुवक अभिभावकों के मशवरे पर  अमल करते हैं.  अगर मौज – मस्ती के बीच ब्रेकर की बात होती है तो 18 फीसदी खुल कर इस बात कों स्वीकार करते है कि उनके अभिभावक मौज -मस्ती में ब्रेकर बन जाते हैं.  जबकि 82 फीसदी नवयुवक  इस बात को सिरे से खारीच करते है.  अगर समय रहते  अभिभावक खुल कर सामने नही आये तो मौज -मस्ती के ब्रेकर का 18 फीसदी  ही कल के लिए भयावह बन सकता है. आधुनिक फैशन युग में सिगरेट को एक फैशन मानने वाले 11 फीसदी नायुवक अभिभावकों के सामने भी सिगरेट पिने की बातों सही मानते है.  जबकि 89  फीसदी नवयुवक आज भी अभिभावकों के सामने इस फैशन रूपी  नशा के प्रचलन को कभी ना करने कि बात करते है.  यह एक शुभ संकेत है फिर भी 11 फीसदी का जवाब अभिभाको को सोचने  पर मजबूर कर देने वाला है  कि कल उनके बच्चे इस फैशन के चपेट में ना आ जाये.  72 फीसदी नवयुवक का मानना है कि  उन्हें अपनी  गलती के लिए डांट पड़ती है, जबकि 28  फीसदी नवयुवक ऐसे नकारते है. अभिभावकों के लिए यह जरुरी है कि  वह आपने बच्चो को गलती पर डाटने के बजाये समझाने पर जोर दे. ताकि 72 फीसदी का विरोध में उठाने वाला स्वर काम हो और बच्चे उनके पास और पास आये. इंजीनियरिंग का क्रेज  अभिभावकों के बीच  आज भी बना हुआ है, लेकिन नवयुवक इसे  नकारते है. 64 फीसदी नवयुवक अपने पसंद से करियर चुनना चाहते है. आपसी झड़पों के बारे में 66 फीसदी नवयुवक का मानना है कि उनका अपने घर में झगडा नही होता  है.  जबकि एह तिहाई ( 34 फीसदी ) का मानना है कि उनका झगडा आपने घर में हुआ है . यह विशेष रिपोर्ट अभिभावकों कों बच्चो  से और  नजदीक आने का संदेश देता है , तो नवयुवको के बदलते स्वरूप को बायान करता है.

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 कैसे तैयार किया गया रिपोर्ट  ..

यह विशेष रिपोर्ट मुख्य रूप से बच्चों के बीच पनप रही पश्चिमी सभ्यता कों भापने एवं बच्चों और अभिभावकों के बीच की दूरियों के कारणों को खोज निकलने के लिए तैयार किया गया है. आप और आप के अभिभावक पर विशेष रिपोर्ट तैयार करने के लिए दिल्ली, बिहार और उत्तर प्रदेश के कई जगहों के नवयुवकों से बात किया गया. शुरुआती तौर पर 110 नवयुवकों से बातचीत कर बच्चों और अभिभावकों के बीच आ रही दूरियों के कारणों कों खोजने की कोशिश किया गया. इस बातचीत  में 18 – 25 साल के नवयुवको कों शामिल किया गया. वार्तालाप के दौरान करियर, घरेलू झड़प और अभिभावकों के लिए सम्मान से जुड़े प्रशन पूछे  गए.  सिगरेट के बढ़ते प्रचलन और मौज -मस्ती में अभिभावकों को ब्रेकर बताने वाले प्रश्न भी इसका एक हिस्सा था. कुल सात प्रश्नों कों नवयुवको के अलग -अलग टोली से पूछी गई , ताकि रिपोर्ट के  रुझानो में हकीकत झलके.  कालेज जाने वाले नवयुवक, दुकानों पर बैठ कर गप्पे मरने वाले नवयुवक एवं इजीनियरिंग और मेडिकल जैसे दिग्गज पाठ कर्मो कों पढ़ने वाले नवयुवक इस वार्तालाप  में शामिल हुए. अलग-अलग इलाकों से 110 नवयुवको के जवाबो  कों जानने के बाद रुझान तय किया गया. जिसके आधार पर यह विशेष रिपोर्ट तैयार किया गया .

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क्या कहते हैं नवयुवक — 

प्रवीण – समय के साथ अभिभावकों कों भी बच्चो कों समझाना चाहिए . जरुरी नही हर वक्त अभिभावक ही सही हो . 

रिया  – करियर का चुनाव करते समय अपनी योग्यता कों देखना चाहिए .क्यों कि अपनी रूचि अनुसार काम करने का मज्जा ही कुछ और होता  है . 

आशुतोष   – मम्मी का टोकना थोड़ी देर के लिए बुरा जरुर लगता है ,लेकिन बाद में लगता है कि उन्होंने हमारे भलाई के लिए ही हमें डाट या टोका है . 

 खुशबू   – मम्मी – पापा की कुछ बातें कभी कभी बुरा लग जाता है ,लेकिन सही मायने पर अभिभावक ही हमारे अच्छे मित्र होते है .

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