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दबंगों का कहर

लेखक- राजेश चौरसिया

  • बुंदेलखंड में आज़ भी जारी है सामंतवाद और दबंगों का कहर..
  • छतरपुर में दलित परिवार की आबरू लूटने का प्रयास कर की मार-पीट..
  • शिकायत के बाबजूद नहीं किया गिरफ्तार और अब जान से मारने की धमकी..
  • पीड़ित परिवार बच्चों सहित पहुंचा SP आफ़िस डाला डेरा..

आज़ादी के दशकों गुज़र जाने के बाद भी बुंदेलखंड में सामंतवाद और दबंगों कहर अनवरत जारी है. कई सरकारें और जनप्रतिनिधि आए-गए-चले-गए पर हालात ना बदले बल्कि और भी बद से बदतर हो चले हैं. ग्रामीण अंचलों में आज भी दलित और पिछड़े समुदाय सामंतवाद और दबंगों की जूती माने जाते हैं और यहां इन्हें इनके ही हिसाब से रहना-चलना पड़ता है.

ताजा मामला मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले का जहां अपने एक दलित महिला को अपनी आबरु बचाना इतना महंगा पड़ गया कि आरोपियों ने उसके पूरे परिवार पर कहर बरसा दिया और लाठी-डंडों से पीट-पीटकर लहूलुहान और घायल कर दिया.

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बता दें कि जिले के भगवां थाना क्षेत्र के गोटखपुरा गांव की रहने वाली रजनी अहिरवार के साथ कुछ समय पहले गांव के दबंग (ठाकुरों) ने घर में घुसकर आबरू लूटने का प्रयास किया था. जहां उसने विरोध कर अपने आप को छेड़-छाड से तो नहीं पर लुटने से बचा लिया और मामले की थाने में शिकायत दर्ज करा दी थी. जिसके चलते अब आरोपी दबंग अपनी रिपोर्ट वापस लेने और समझौता करने का लगातार दबाव बना रहे हैं. और नहीं मानने पर अब आरोपियों ने दलित पतिवार के घर में घुसकर बच्चे-बड़े-बूढ़ों-महिलाओं सहित सभी पर हमला बोल दिया और लाठी-डंडों से पीट-पीट कर लहूलुहान/घायल कर दिया. इस हमले में परिवार के बच्चे-महिलाएं-बूढ़े सब घायल हुए हैं.

शांति देवी बेवा और घायल शांति देवी और वृद्ध महिला कल्लो बाई अहिरवार की मानें तो मामले की थाने में रिपोर्ट करने के बावजूद आरोपियों को पुलिस नहीं पकड़ पा रही और आरोपी हैं कि अब भी लगातार उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहे हैं. जिससे हताश और परेशान होकर इस दलित परिवार ने सपरिवार SP ऑफिस में डेरा डाल रखा है. और न्याय की मांग कर रहे हैं.

साथ ही पीड़ित महिलाओं की मानें तो गांव में आपराधिक प्रवत्ति के दबंगों द्वारा लोगों से पैसों की अवैध वसूली भी की जाती है और जो भी लोग गांव से बाहर मेहनत-मजदूरी कर पैसा कमाने जाते हैं और लौट कर आते हैं तो उनसे पैसों की मांग करते हैं और नहीं देने पर उनपर अत्याचार करते हैं.

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वहीं ज़ब हमनें इस मामले पर पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों (ASP जयराज कुबेर) से बात की तो उन्होंने मामले को संज्ञान में लेते हुए तत्काल थाना प्रभारी टी.आई. को फोन कर मामले में उचित कार्यवाही और गिरफ्तारी के निर्देश दिए हैं. तो वहीं दलित परिवार को उनके घर वापिस जाने और जानोमाल के8 सुरक्षा का हवाला दिया है.

मामला चाहे जो भी हो पर इतना तो तय है कि बुंदेलखंड में सामंतवाद और दबंगों का कहर अब भी जारी है. यहां आजादी के कई दशक गुज़र जाने के बाद भी यहां दलित और पिछड़ा उपेक्षा का शिकार है. इनके हितों की रक्षा के लिये भले ही सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाएं और कानून बनाये हैं पर बावजूद वह इनकी पहुंच से बहुत दूर हैं.

दुर्घटना पर्यटन: भाग-2

उस आदमी के अनुसार, हुआ यह था कि कन्हैयालाल इधर अपनी कार पार्क कर के मौल में घुसे उधर उन की कार से हैड लैंप की बगल की खाली जगह से धुआं निकलना शुरू हो गया. किसी व्यक्ति ने जोर से आवाज लगाई कि गाड़ी से धुआं निकल रहा है और अचानक वहां भगदड़ मच गई थी. जिन लोगों की कारें कन्हैयालाल की कार के आसपास खड़ी थीं उन्होंने जल्दी से अपनी कारें वहां से हटाने के चक्कर में पहले एकदूसरे की गाडि़यों को टक्करें मारीं और फिर ड्राइवर की सीट से अपनाअपना मुंह निकाल कर एकदूसरे से गालियों के परस्पर आदानप्रदान में व्यस्त हो गए. पर इस के पहले कि यह आदानप्रदान उन के गाडि़यों से बाहर आ कर कुश्ती या घूंसेबाजी के मुकाबलों में बदल पाता, पता नहीं कैसे इतनी जल्दी वहां पहुंचे मौल के सुरक्षा और अग्निसेवा के अधिकारी ने जोरजोर से एक भोंपू पर चिल्ला कर लोगों को चेतावनी दी कि वे अपनी गाडि़यों में चाबी लगी छोड़ बाहर निकल आएं ताकि पार्किंग के कर्मचारी गाडि़यों को करीने से बाहर हटा दें.

तमाशाइयों के मुंह का स्वाद इस घोषणा से बिलकुल खराब हो गया क्योंकि बहुत सी कारों की टकराहट और उन के ड्राइवरों की घबराहट देखने में मुफ्त मनोरंजन की काफी संभावनाएं थीं. पर इस के बाद आतिशबाजी शुरू हो गई तो उन की निराशा कुछ कम हुई. आतिशबाजी भी मुफ्त की थी और इसे प्रस्तुत कर रही थी कन्हैयालाल की कार जिस में से उठने वाले धुएं ने अब लपटों का वेश धारण कर लिया था.

कार के बोनट के नीचे से निकलने वाली लपटें अचानक बहुत तेज हो गईं और धड़ाम की आवाज के साथ बोनट अपने स्थान से लगभग 5 फुट ऊपर उछल कर उस से भी ज्यादा भारी धड़ाम की आवाज के साथ फिर जलते हुए इंजन के ऊपर गिर पड़ा मानो इस धड़ाम की आवाज से चौंक कर बहुत से तमाशाई एकदूसरे के ऊपर गिर पड़े हों.

इंजन से उठने वाली लाललाल लपटों के साथ ही सामने के दोनों टायरों के जलने से उठते काले धुएं के बादलों ने जब तमाशाइयों को खांसने पर मजबूर किया और बैटरी के चटक कर फूटने के बाद उस से बहते एसिड के धुएं से उन का दम घुटने लगा तब जा कर यह तमाशा देखती भीड़, जो अब तक एकदूसरे पर टूटी पड़ रही थी, ने थोड़ा पीछे हटना शुरू किया.

इसी बीच, मौके का फायदा उठा कर कुछ महिलाओं के गले की चेन खींचने और कुछ लोगों की जेब काटने की वारदातें भी हो चुकी थीं. इस से भी इस अग्निपूजक भीड़ को पीछे हटने की प्रेरणा मिली. भीड़ के बिखरने के बाद मौल के अपने फायर ब्रिगेड के कर्मचारी मोटे हौजपाइप को ले कर कार के पास पहुंच पाए. उन के  प्रयासों से अगले 10-12 मिनटों में आग को काबू में किया जा सका.

धीरेधीरे लपटें शांत हो गईं और टायरों से उठता धुआं मन मसोस कर घर के अंदर पत्नी के आतंक से विद्रोह करते हुए पति की तरह केवल भुनभुनाता हुआ सा लगने लगा. जब एक बार फिर से अमनचैन और व्यवस्था की स्थिति कायम हो गई तो 2 पुलिस पैट्रोल कारें वहां पहुंचीं. उन में से 4 पुलिस वाले फुरती से उतरे और मुंह में ठूंसी सीटियों को जोरजोर से बजाते हुए उस भीड़ को, जो अब तक आग के नजारे को पेट भर कर देखने के बाद संतुष्ट हो कर स्वयं ही वापस जा रही थी, ‘पीछे हटो, पीछे हटो’ कहते हुए दोनों हाथों से धक्का देने लगे. भीड़ के लोग भ्रमित हो रहे थे कि अब क्या करें, वापस तो जा ही रहे हैं.

उधर, पुलिस के जवांमर्द सिपाही अपने ऊपर के अफसर अर्थात एक मोटे पुलिस इंस्पैक्टर, जो पैट्रोल कार में आधा बैठा और आधा पसरा हुआ था, को भुनभुनाते हुए कोस रहे थे कि उस की अकर्मण्यता और सुस्ती के कारण लाठीचार्ज करने का एक इतना खूबसूरत मौका हाथ से फिसला जा रहा था. पैट्रोल कार वालों को इतने अच्छे अवसर कहां मिल पाते हैं अपने हाथों की खुजली मिटाने के? सारा मजा तो थाने में नियुक्त पुलिस वाले ही करते हैं.

अपनी कार की अधजली लाश को कन्हैयालाल और उस की पत्नी ठगे से देखते रहे. कार के अंदर की हालत का जायजा लेने के लिए उन्होंने दरवाजे खोलने की कोशिश की तो पाया कि वे जाम हो गए थे. खिड़कियां तो अंदर से बंद थीं ही. रात के साढ़े 11 बजे कार को कहीं ले जाने का प्रश्न ही नहीं था. सुबह होने पर ही बीमा कंपनी को सूचित करने के बाद अगला कदम उठाया जा सकता था. इसलिए कन्हैयालाल ने पत्नी, जो अभी तक सिसक रही थी, के साथ घर जाने का निश्चय किया. जब पार्किंग के आदमी ने उन्हें याद दिलाई कि गाड़ी रातभर वहां छोड़ने का चार्ज 100 रुपए लगेगा तो उन्हें अपने जख्मों पर नमक छिड़के जाने की अनुभूति हुई पर मजबूरी थी, इसलिए मन मार कर हामी भरी और एक औटोरिकशे में बैठ कर वे घर वापस आ गए.

कन्हैयालाल को सपने में भी गुमान नहीं था कि आग लगने की खबर आग से भी ज्यादा तेजी से फैलेगी. अभी वे नित्यक्रिया से भी नहीं निबटे थे कि उन के पड़ोसी रामलाल, जो वकील थे, आ पहुंचे. उन्होंने बताया कि उन तक खबर एक और चश्मदीद गवाह द्वारा पहुंची थी. असल में वे अपने बेटे की बाबत कह रहे थे जो कल रात पिक्चर देखने गया था पर उसे मेरे बेटे के बजाय ‘चश्मदीद गवाह’ कह कर जो बात उन्होंने शुरू की उस का सारांश यह था कि कन्हैयालाल की कार बनाने वाली कंपनी पर दावा वे बीमे से हरजाने की रकम मिलने के बाद ठोकेंगे और अपनी फीस पड़ोसी होने के नाते कंसैशनल रेट पर लेंगे.

कन्हैयालाल ने जब कहा कि कार का कौम्प्रिहैंसिव बीमा था. वह सिर्फ 7 महीने पुरानी थी इसलिए डैप्रिसिएशन भी नहीं कटेगा और कार के पूरे दाम मिल जाएंगे तो वकील साहब पहले तो जोरजोर से हंसे फिर उन्होंने कन्हैयालाल की नादानी पर तरस खाते हुए समझाया कि बात कार के रिप्लेसमैंट की नहीं थी. बात थी इस दुर्घटना से कन्हैयालाल को होने वाले मानसिक संताप की और उन की पत्नी, जो दिल की मरीज थीं, के स्वास्थ्य पर लगे गहरे आघात की, जिस के कारण पत्नी का जीवन खतरे में था.

आगे पढ़ें- कन्हैयालाल ने जब कहा कि उन की पत्नी तो बिलकुल स्वस्थ थीं और उन्हें…     

दुर्घटना पर्यटन: भाग-1

पत्नी के उलाहनों से तंग आ गए थे कन्हैयालाल. उन की पत्नी अपने प्रिय हीरो परेशान खान की फिल्म देखने की रोज जिद करती थी. आखिरकार, कन्हैयालाल ने शनिवार की शाम को फिल्म दिखाने का निश्चय कर ही लिया. उन्होंने उसे समझाया तो बहुत कि दुकान जल्दी बंद कर के उन के चले आने या दो सुस्त और लापरवा सहायकों के भरोसे दुकान छोड़ आने की अपेक्षा 50 रुपए में उसी सप्ताह रिलीज हुई पिक्चर की पाइरेटेड सीडी से घरबैठे वीडियो देखना कहीं अधिक बुद्धिमानी का काम होगा, पर पत्नी नहीं मानी थी.

एक तो उसे न मालूम किस दुश्मन ने समझा दिया था कि पाइरेटेड सीडी खरीदना गलत काम है. दूसरे, वह पति के पीछे इसलिए पड़ गई थी कि वे यदि परेशान खान की तरह अपनी तेजी से गंजी हो रही खोपड़ी पर ग्राफ्ंिटग के महंगे तरीके को नहीं आजमाना चाहते तो कम से कम स्वयं अपनी आंखों से देख लें कि अपनी प्रत्यारोपित घनी काली जुल्फों के चलते गंजा होता जा रहा परेशान खान अपनी नई फिल्म में कितना सजीला जवान लगने लगा था. उसे पूरी आशा थी कि इस के बाद और कुछ नहीं तो कम से कम एक अच्छी सी विग खरीदने के लिए तो वे तैयार हो ही जाएंगे.

कन्हैयालाल जब एक बार निश्चय कर लें तो उसे अवश्य पूरा करते हैं, इसलिए उस शनिवार वे सचमुच रात को 8 बजे ही घर आ गए और फिर पत्नी को साथ ले कर 9 बजे उस मल्टीप्लैक्स के परिसर में पहुंच गए जहां परेशान खान के दीवानों का सागर लहरा रहा था.

उस भयंकर भीड़ को देख कर कन्हैयालाल को जहां इंटरनैट पर बुकिंग करा लेने की अपनी समझदारी पर गर्व हुआ वहीं दूसरी तरफ पत्नी को साथ लाने पर अफसोस. अगर वह साथ न होती तो वहां इकट्ठे सिरफिरों में से किसी को अपना 150 रुपए का टिकट आसानी से वे शतप्रतिशत मुनाफे पर सरका सकते थे. पर मजबूरी को समझते हुए उन्होंने गाड़ी को खचाखच भरी पार्किंग में बड़ी मुश्किल से जगह खोज कर पार्क किया और फिर पत्नी का हाथ बहुत रोमांटिक ढंग से अपने हाथों में ले कर पिक्चर हौल में घुस गए.

फिल्म कैसी रही, इस का कन्हैयालाल को अब ध्यान भी नहीं रह गया है क्योंकि उस के बाद जो कुछ हुआ उस ने उन के जीवन को एक बिलकुल नया और सुखद मोड़ दे दिया. दरअसल, हुआ यह कि फिल्म समाप्त होने पर जब कन्हैयालाल बाहर आए और कंधे से कंधा छीलने वाली भीड़ से गुजर कर अपनी कार तक पहुंचे तो एक विचित्र सी बात दिखी. कहां तो गाड़ी पार्क

करने के समय जगह ही नहीं मिल रही थी और अब यह आलम था कि उन की कार के आगेपीछे, दाएंबाएं चारों तरफ 25-30 मीटर तक कोई अन्य गाड़ी नहीं खड़ी थी और उन की छोटी सी कार नदी के बीच में एक नन्हे से द्वीप सी दिख रही थी. पहले कुतूहल फिर विस्मय और उस के बाद एक अज्ञात आशंका से उन का दिल घबरा उठा.

कार के पिछले हिस्से को देखने से कोई खास बात नहीं लगी पर जब पास पहुंचे तो कार की अगाड़ी को देख कर उन की पत्नी के मुख से एक लंबी चीख निकली और कन्हैयालाल के मुंह से निकली एक बड़ी लंबी सी गाली, फिर अपने इष्टदेव का लंबा सा आह्वान और फिर एक लंबी सी हाय.

कार पिछले बंपर से ले कर ड्राइवर के सामने विंडशील्ड तक तो सहीसलामत थी पर उस के आगे बोनट उखड़ा हुआ पड़ा था और बोनट, इंजन, सामने की ग्रिल वगैरह जल कर राख हो गए से लग रहे थे. बैटरी 2 टुकड़ों में थी, सामने के दोनों टायर जले हुए थे और आगे के दोनों दरवाजे हालांकि टूट कर अलग नहीं गिरे थे पर बुरी तरह झुलसे हुए थे. अगर लंबा विवरण न देना हो तो संक्षेप में इतना कहना पर्याप्त होगा कि कार श्मशानघाट पर खुले आसमान के नीचे जलती चिता पर अचानक बारिश हो जाने से आधी जली, आधी बुझी एक लाश सी लग रही थी.

कार की मालकिन, जिस ने विलंबित लय में चीख से अपना रुदन शुरू किया था, अब दहाड़ मार कर रो रही थी. कन्हैयालाल किंकर्तव्यविमूढ़ से खड़े थे. उन की प्रतिक्रिया हमेशा ही पत्नी से उल्टी होती थी. आज शुरुआत में तो उन्होंने भी पत्नी के साथ एक लंबी चीख भरी थी पर अब स्तब्ध खड़े थे.उन के मौन और मूर्तिवत मुद्रा को भंग किया एक आदमी ने जिस ने उन के कंधे पर सहानुभूतिपूर्वक हाथ रखा और बहुत मुलायम स्वर में कहा, ‘‘लो, आप आ गए साहब? हम पार्किंग वाले तो कब से इंतजार करकर के थक गए. हमारे मैनेजर साहब ने तो मौल में कई बार लाउडस्पीकर पर आप की गाड़ी का नंबर भी अनाउंस करवाया पर कोई आया ही नहीं. आप सिनेमा देख रहे होंगे.’’

कन्हैयालाल की इच्छा तो हुई कि उस का कौलर पकड़ कर और कंधे झ्ंिझोड़ कर पूछें कि पार्किंग में कार खड़ी करने पर भी उन की गाड़ी के साथ यह क्या हुआ और उसे ढेर सारी गालियां दे कर अपने मन की भड़ास निकाल लें, फिर धमकाना शुरू करें कि वे पार्किंग वालों से नई कार का मूल्य हरजाने में मांगेंगे. पर ऐसा करने में कई अड़चनें थीं. पहली तो यह कि वे इस व्यक्ति से डीलडौल में काफी हलके थे, दूसरी यह कि वास्तव में वे मारपिटाई और गालीगलौज करने वालों में नहीं थे.

यह दूसरी बात है कि इस समय उन का ये दोनों ही काम करने का जोरों से मन कर रहा था पर कई साल के विवाहित जीवन और खानदानी दुकानदारी के पेशे ने उन्हें इतना तो सिखा ही दिया था कि जीवन में बहुत जोर से गुस्सा आने पर भी चिल्लानेचीखने से कुछ हासिल नहीं होता है.

सब से बड़ी बात यह थी कि यह आदमी तो पार्किंग का कोई अदना सा कर्मचारी लग रहा था, कहनासुनना कुछ होगा भी तो पार्किंग के ठेकेदार या फिर मल्टीप्लैक्स वाले उस मौल के मालिक से. और वे यह समझने में पूरी तरह सक्षम थे कि डीलडौल में तो वे इस आदमी से पीछे और नीचे थे ही, हैसियत, धनशक्ति, रसूख और उच्च सरकारी अधिकारियों से संपर्क आदि में मौल के मालिक ही नहीं बल्कि पार्किंग के ठेकेदार तक से भी बहुत पीछे थे. इसलिए जब उन के एकसाथ पूछे गए सवालों के जवाब में पार्किंग के उस कर्मचारी ने उस दुर्घटना का विस्तार से विवरण देना शुरू किया तो उन के पास चुपचाप सुनने और बीचबीच में सिसकती हुई पत्नी को चुप कराने के अलावा कोई चारा न था. मन मार कर वे सुनते रहे.

आगे पढ़ें- कन्हैयालाल इधर अपनी कार पार्क कर के मौल में घुसे उधर उन की कार से…

दुर्घटना पर्यटन: भाग-3

कन्हैयालाल ने जब कहा कि उन की पत्नी तो बिलकुल स्वस्थ थीं और उन्हें दिल की कोई बीमारी नहीं थी तो वकील साहब ने फिर मुसकरा कर अनुरोध किया कि कन्हैयाजी इस मुकदमे के लिहाज से अपनी पत्नी उन्हें सौंप दें. कन्हैयालाल इस बेहूदी बात को सुन कर भड़क उठे तो वकील साहब को अपनी गलती का एहसास हुआ और अपनी बात को सुधारते हुए उन्होंने कहना चाहा कि उन का मतलब यह था कि अपनी पत्नी का दिल उन्हें सौंप दें और चिंता न करें. पर यह कहने से पहले एक बार फिर वे स्वयं संभल गए और बात साफ की कि स्वस्थ पत्नी को अस्वस्थ कर देना उन के बाएं हाथ का खेल था, इसे वे अपनी पहचान के डाक्टरों की मदद से संभाल लेंगे, कन्हैयाजी चिंता न करें.

कन्हैयालाल ने कहा कि उत्तर वे सोच कर देंगे. पहले तो उन्हें कार को सिनेमा की पार्किंग से क्रेन द्वारा उठवा कर सर्विस स्टेशन पहुंचाने का काम करना था वरना कारपार्किंग का मीटर चलता रहेगा. वकील साहब ने फिर समझाया कि वे इस में भी जल्दबाजी से काम न लें, इंश्योरैंस वालों के बजाय कारनिर्माताओं से पहले बात कर लें फिर कार को बीमा वालों की जगह कार निर्माता स्वयं ले जाएंगे और उन्हें अपनी कंपनी की साख बचाने की जरा सी भी चिंता होगी तो सर्विस स्टेशन के बजाय कहीं अज्ञातवास में ले जाएंगे और तब तक उसे वहां गुप्त रूप से रखेंगे जब तक जनता की बदनाम स्मरणशक्ति अगले किसी राजनीतिक स्कैम में उलझ कर इस घटना को पूरी तरह भूल न जाए. बात धीरेधीरे कन्हैयालाल को जम रही थी. वैसे भी आज रविवार होने के कारण कागजी कार्यवाही कुछ आगे बढ़ने की आशा तो थी नहीं. पार्किंग वालों से ही कहना होगा कि कार अभी 1 दिन और वहीं रहेगी.

नाश्ता करने के बाद कन्हैयालाल मौल की कारपार्किंग में गए तो रास्तेभर सोचते गए कि 2 दिन लगातार पार्किंग में कार रखने के लिए वे पार्किंगचार्ज में डिस्काउंट मांगेंगे. पर जब पार्किंग वाले से बात हुई तो उन्हें घोर आश्चर्य हुआ जब उस ने कहा, ‘‘साहब, आप का पहले ही बहुत नुकसान हो गया है, अब आप से पैसे क्या मांगें. रखो कार, आप को जब तक रखना हो, हम पैसे नहीं लेंगे.’’

कन्हैयालाल तुरंत भांप गए कि दाल में कुछ काला है, इतनी मोहममता इस के दिल में कहां से उपज आई. उन्होंने थाह लेने के लिए कहा, ‘‘नहीं भाई, छोड़ो, मैं सोचता हूं इसे अब ले ही जाऊं,’’ तो पार्किंग वाला बिलकुल ही घबरा गया. बोला, ‘‘अरे नहीं साहब, ऐसा न करो, आज तो रहने दो, संडे का दिन है.’’

कन्हैयालाल को कोई शक बाकी नहीं रह गया कि दाल में कुछ काला नहीं था बल्कि पूरी दाल ही काली थी. अंत में उन्होंने बात खुलवा ही ली. और तय यह हुआ कि कार दिनभर वहां छोड़ने के वे पार्किंग वालों से 2 हजार रुपए लेंगे. हां, रुपए वे लेंगे, देंगे नहीं, यही तय हुआ. हुआ यह था कि पुलिस के द्वारा बाहर भगा दिए जाने के बाद भी कई लोगों ने फिर अंदर आ कर फूंकी हुई कार देखने की इच्छा प्रकट की थी तो पार्किंग वाले ने उन से कहा था कि बिना पार्किंगचार्ज लिए अंदर वह किसी को पैदल भी नहीं आने देगा और इस के बाद उस ने 40 लोगों से प्रतिव्यक्ति 20 रुपए वसूल कर के पिछली रात ही लगभग 800 रुपए बना लिए थे.

रात देर हो गई थी, इसलिए और लोग नहीं आए पर आज संडे होने के कारण रात वालों से आंखों देखा हाल सुन कर कम से कम 250-300 लोग तो उस कार को देखने आएंगे ही और उसे उम्मीद थी कि 20 रुपए के रेट से वह 5-7 हजार रुपए कमा ही लेगा. इसीलिए कन्हैयालाल को वह 2 हजार रुपए रौयल्टी के दे रहा था. सोमवार से शुक्रवार तक तो दर्शक कम आएंगे पर अगले सप्ताहांत तक गाड़ी छोड़ सकें तो कन्हैयालाल को उस के लिए अलग से वह 4 हजार रुपए पेशगी देने को तैयार था.

पार्किंग वाले से व्यापारवार्त्ता चल ही रही थी कि पार्किंग वाले और कन्हैयालाल का ध्यान एक आदमी ने अपनी तरफ खींचा. उस ने जेब से विजिटिंग कार्ड निकाल कर अपना परिचय दिया कि वह ‘दैनिक अफवाह’ समाचारपत्र का संवाददाता है और अपने समाचारपत्र के लिए जली हुई कार का फोटो खींचना चाहता है. पार्किंग वाले ने कन्हैयालाल को आंख मारी और कन्हैयालाल ने चौकन्ने हो कर उस से कहा, ‘‘इस के लिए आप को 5 हजार रुपए देने होंगे,’’ वह बेचारा बहुत गरीब अखबार का अत्यंत गरीब संवाददाता निकला. अभी वह रिरिया ही रहा था और कन्हैयालाल उसे कुछ छूट देने की सोच ही रहे थे कि पार्किंग गेट से दौड़ता हुआ एक लड़का आया और बेहद उत्तेजित हो कर खुशी से नाचते हुए बोला, ‘‘‘परसों तक’ टीवी चैनल वाले आए हैं और अपनी गाड़ी, जिस पर उन का बहुत बड़ा सा एरियल लगा हुआ है, अंदर लाने के लिए बैरियर का बांस हटाने को कह रहे हैं और इस के लिए बजाय 20 रुपए के 1 हजार रुपए देने को तैयार हैं.’’

कन्हैयालाल ने उसे जोर से डांट लगा कर कहा, ‘‘अबे, पागल हो गया है. मेरे पास भेज दे, 10 हजार से 1 रुपया कम न लेंगे हम,’’ अब तक पार्किंग के ठेकेदार के साथ उन्होंने आंखों ही आंखों में पार्टनरशिप का करार कर लिया था. लड़के को, जो वापस जा रहा था, पीछे से आवाज दे कर उन्होंने कहा, ‘‘और देख, बता दीजो कि कार मालिक और पार्किंग के ठेकेदार का इंटरव्यू करना हो तो उस के 10-10 हजार रुपए अलग से लगेंगे.’’

‘दैनिक अफवाह’ का संवाददाता, जो इतनी बड़ीबड़ी रकमों को सुन कर बेहोश होता सा लग रहा था, घिघियाता हुआ बोला, ‘‘सरजी, वे तो न्यूज चैनल वाले हैं, आप उन्हें स्टिल फोटोग्राफी के राइट्स मत देना. मैं अभी अपने संपादक से बात कर के बताता हूं कि मैं इस के लिए आप को कितने तक दे पाऊंगा,’’ और वह एक किनारे खड़ा हो कर अपने मोबाइल पर कोई नंबर मिलाने लगा.

तभी ‘परसों तक’ चैनल के आईडी कार्ड को गले में लटकाए चैनल की टीम का जो व्यक्ति वहां आया उस की ब्रैंडेड कंपनी की नीली जींस और धूप के चश्मे से सुसज्जित व्यक्तित्व के आगे ‘दैनिक अफवाह’ का संवाददाता बिलकुल फटेहाल सा लगने लगा.

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दुर्घटना पर्यटन

दुर्घटना पर्यटन: भाग-4

कन्हैयालाल से उस ने शानदार अमेरिकन ऐक्सैंट वाली अंगरेजी में पूछा कि क्या कार के मालिक आप ही हैं. हिंदी समाचार चैनल वाला ऐसी अंगरेजी क्यों झाड़ रहा था, यह कुतूहल मन में दबाए हुए कन्हैयालाल ने हामी भरी तो उस ने उन को समझाया कि चैनल की जो मशहूर ऐंकर उन का इंटरव्यू लेगी उस से बात करते हुए चैनल पर दिखाए जाने के लिए बड़ीबड़ी राजनीतिक पार्टियों के नेता दसियों हजार रुपए खर्चने को तैयार रहते हैं.

कन्हैयालाल कच्ची गोलियां नहीं खेले थे. उन्होंने वापस उसे समझाया कि राजनीतिक नेताओं के लिए तो यह सब रोज का खेल है पर उन के जीवन में तो ऐसा मौका एक ही बार आया था जिसे वे मुफ्त में नहीं गंवाएंगे. नीली जींस वाले ने तंग आ कर हथियार डाल दिए और कन्हैयालाल से कहा कि वे कैमरे के सामने आने के लिए अपने मुख पर मेकअप वाले से थोड़ा टचअप करवा लें कि तभी कन्हैयालाल के मन में आया कि टीवी चैनल पर इंटरव्यू देने से पहले अपने वकील पड़ोसी से बात कर लें तो अच्छा रहेगा. पर जब उन्होेंने मोबाइल पर नंबर लगा कर सलाह मांगी तो वकील साहब ने बहुत कड़क आवाज में उन को ऐसा करने से सख्त मना किया.

वकील साहब ने उन्हें बताया कि जिस इंटरव्यू को देने के लिए और कार को टीवी स्क्रीन पर दिखाने का वे कुल 10 और 10 अर्थात 20 हजार मांग रहे थे उसी इंटरव्यू को न देने के लिए, अगर दे दिया हो तो प्रसारित होने से रोकने के लिए, कार बनाने वाली कंपनी शायद कई लाख रुपए देने के लिए तैयार हो जाए. कन्हैयालाल ने कहा कि वे टीवी वालों से सौदा तय कर चुके हैं, बात से मुकरना कैसे संभव होगा तो वकील साहब ने सुझाया कि अभी तक उन्होंने केवल कार की दशा कैमरे में कैद करने और उन का इंटरव्यू करने का मोल मांगा था, इस का यह अर्थ नहीं था कि वे उसे प्रसारित भी कर सकते हैं. उस का प्रसारण करने के लिए वे 5 लाख और मांगें.

इस बीच, वकील साहब कार बनाने वालों से संपर्क साधेंगे और उन से इस इंटरव्यू आदि के प्रसारण को रोकने के लिए 10 लाख और मांगेंगे. यदि वे मान गए तो कन्हैयालाल चैनल वालों के साथ हुए सौदे से मुकर जाएं, आखिर लिखापढ़ी तो अभी कुछ हुई नहीं थी.

कन्हैयालाल ने जब अपनी मांगें टीवी वालों के सामने रखीं तो उन के भी छक्के छूट गए. जींस वाला घबरा कर बोला कि उसे अपने बौस से बात कर के अपू्रवल लेना पड़ेगा और इस के लिए कन्हैयालाल से उस ने थोड़ी देर रुकने और तब तक किसी और चैनल से बात न करने की प्रार्थना की. कन्हैयालाल भी यही चाहते थे. थोड़ा नखरा दिखा कर मान गए. उधर, वकील साहब ने बताया कि कार निर्माता कंपनी दिल्ली में अपने स्थायी प्रतिनिधि को 2 घंटे के अंदर बातचीत अर्थात मोलभाव के लिए भेज रही है और प्रार्थना कर रही है कि तब तक न्यूज चैनल वाले मामले में कोई जल्दबाजी न की जाए.

कन्हैया को सपने में भी ऐसे धन बरसाऊ विचार नहीं आए थे. उन्हें लगातार डर बना रहा कि वकील साहब की बातें हवाई किला न साबित हों. यह भी लगा कि कार के निर्माता यदि वकील साहब के झांसे में न आए तो कहीं टीवी चैनल से मिलती हुई रकम भी हाथ से न निकल जाए. पर वकील साहब ने कन्हैयालाल को आखिरकार राजी कर ही लिया कि वे जल्दबाजी से काम न लें.

वकील साहब से बात हुए अभी 2 घंटे भी नहीं बीते थे कि पार्किंग में एक काले रंग की मर्सिडीज कार आ कर रुकी और उस से उतर कर काला बिजनैस सूट पहने एक व्यक्ति ने कन्हैयालाल की जली हुई कार की ओर रुख किया. कन्हैयालाल को भांपने में देर न लगी कि वह कार निर्माता कंपनी से आया था, बल्कि उन्हें यह देख कर हंसी भी आई कि वह अपनी कंपनी की बनाई कार में नहीं आया था. क्या कन्हैयालाल की कार में लगी आग से वह स्वयं इतना डर गया था कि अपनी कंपनी की कार में आने की हिम्मत नहीं कर पाया? चलो, अच्छा हुआ, अब यह भी समझ गया होगा कि दूसरे लोगों को जब उन की कार के अग्निकांड के विषय में पता चलेगा तो वे इस मौडल की कार से कितना डरेंगे.

कार कंपनी का नुकसान लाखों में नहीं बल्कि करोड़ों में आएगा, इतना तो तय था.कन्हैयालाल सोचसोच कर खुश होते रहे जैसे कार नहीं जली हो, लौटरी लग गई हो. कन्हैयालाल उस मर्सिडीज की तरफ बढ़ने ही वाले थे पर वकील साहब ने फुसफुसा कर कहा कि ऐसा कर के वे अपनी कमजोरी न दिखाएं, काला बिजनैस सूट स्वयं उन तक आएगा.

यही हुआ. वह आया. अकेले ही आया. और आने के बाद चौकन्ने हो कर चारों तरफ देख कर उस ने पहले अपना परिचय दिया. हालांकि इस की जरूरत नहीं थी. कन्हैयालाल ने पहले ही सही भांप लिया था. फिर एकदम कन्हैयालाल के कान के पास अपना मुंह ला कर धीरे से उस ने पूछा कि अभी तक उन्होंने कोई इंटरव्यू तो नहीं दिया और कार की फोटो तो नहीं खींचने दी.

वकील साहब ने कन्हैयालाल को इस के बाद बात करने का कोई मौका ही नहीं दिया. पहले तो उन्होंने दुर्घटना से कन्हैयाजी की पत्नी के कमजोर दिल पर होने वाले आघात का ऐसा हृदयविदारक वर्णन किया कि स्वयं कन्हैयालाल की आंखों में आंसू आने को हो गए, फिर उन्होंने ‘परसों तक’ चैनल से प्राप्त होने वाले लाखों का जिक्र किया और आखिर में उन्होंने बताया कि कन्हैयालाल अपनी जली हुई कार को स्थायी रूप से उस पार्किंग में छोड़ने का निश्चय कर चुके थे ताकि इस मेक और मौडल की कार खरीदने का इरादा रखने वालों को सावधान किया जा सके और यह सब वे केवल समाजसेवा की भावना से करना चाहते थे.

उस के बाद क्या हुआ, बजाय वह सब बताने के, इतना ही बताना काफी है कि कन्हैयालाल आजकल एक बिलकुल नई कार में चलते दिखते हैं. अपनी छोटी दुकान उन्होंने बंद कर दी है और वकील रामलाल व मौल की पार्किंग के ठेकेदार साहब की पार्टनरशिप में उन्होंने एक नई कंपनी बना ली है.

यह कंपनी देशविदेश से आने वाले पर्यटकों को उन स्थलों पर ले जाती है जहां कोई बहुत भयंकर दुर्घटना घटी हो. रेत, प्लास्टर औफ पेरिस, लकड़ी आदि से बने हुए लाइफसाइज मौडलों की सहायता से वे भूकंप, बाढ़, सूनामी आदि के हैरतअंगेज दृश्य बना कर दिखाते हैं. पर्यटकों से पीडि़त लोगों से बातचीत आदि कराते हैं और जहां तक संभव हो चीत्कार, रोने आदि की आवाजों व मूवी कैमरे में कैद दुर्घटनास्थल पर मची तबाही के ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम विदेशी सैलानियों के सामने प्रस्तुत कर के देश के लिए काफी  विदेशी मुद्रा भी अर्जित करते हैं.

जाफराबाद और चांदबाग में भी CAA के खिलाफ प्रदर्शन

सीएए के खिलाफ प्रदर्शन खत्म होने का नहीं ले रहा है एक तरफ दिल्ली के शाहीन बाग में 70 दिन से धरना जारी है,इस बीच जाफराबाद में महिलाओं ने जाम लगा दिया है, वहां पर भी सीएए और एनआरसी के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं ने मोर्चा खोल दिया है, सड़क पर उतर कर धरना प्रदर्शन कर रही हैं.

बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाएं देर रात से जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे बैठ गई औऱ धरना करने लगीं. जिसकी वजह से मेट्रो स्टेशन को बंद करना पड़ा औऱ आम लोगों को दिक्कत भी उठानी पड़ रही है. इसके साथ सीलमपुर को जाने वाला मेन रोड भी बंद हो गया है, मौके पर भारी फोर्स मौजूद है.

दिल्ली के चांद बाग में तीसरा शाहीन बाग बन गया है, यहां भी मुस्लिम महिलाएं धरने पर बैठ गई हैं, सुबह 10 बजे से चांद बाग में प्रदर्शन चल रहा है. महिलाओं ने रोड जाम कर दिया है. नौबत ये आ गई कि पुलिस को लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा क्योंकि प्रदर्शनकारियों ने रोड जाम कर रखा था. वहीं दूसरी ओर बीजेपी के नेता कपिल मिश्रा ने ट्वीट किया है कि वो कुछ देर में जाफराबाद को जवाब देने के लिए सीएए के समर्थन में सड़क पर उतरेंगे.

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जाफराबाद के ठीक सामने मौजपुर चौक की रेड लाइट पर प्रदर्शन करेंगे. कपिल मिश्रा ने अपने एक बयान में कहा कि “हम सीएए वापस नहीं लेंगे क्योंकि कद बढ़ा नहीं करते एड़ियां उठाने से और सीएए वापस नहीं होगा सड़कों पर बीबीयां बिठाने से.” अब कपिल मिश्रा का बयान उनके लिए मुसीबत खड़ा कर सकती है क्योंकि उनका ये बयान आपत्तिजनक है. ये उनका जुमलानुमा बयान था.

इनकी सिर्फ एक ही मांग है की सीएए को वापस लेना चाहिए क्योंकि ये हमारे हक छीन सकता है उन्हें लगता है कि ये उनकी नागरिकता पर असर डालेगा जबकि खुद गृह मंत्री अमित शाह ये बात बता चुके हैं इससे यहां के लोगों की नागरिकता पर कोई असर नहीं पड़ेगा लेकिन फिर भी प्रदर्शन जारी है और जाहिर है कि यदि ये धरना प्रदर्शन ऐसे ही चलता रहा तो कहीं कुछ बड़ी अनहोनी ना हो जाए क्योंकि इसकी आशंका लग रही है.

अब देखना यही होगा कि सरकार इसके लिए क्या कड़े रुख अपनाती है? क्योंकि फैसला करना बहुत ही जरूरी है वरना दिल्ली की हर जगह कहीं शाहीन बाग न बनने लगे.

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मर्दांनगी को लेकर हमने एक अलग धारणा बना रखी है- आयुष्मान खुराना

समाज में टैबू समझे जाने यानी कि वर्जित विषयों के पर्याय बन चुके और ‘‘अंधाधुन’’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल कर चुके अभिनेता आयुष्मान खुराना (Ayushmann Khurrana) के लिए कहानी व किरदार ही मायने रखते हैं. इन दिनों वह आनंद एल रौय और टीसीरीज निर्मित तथा हितेश केवल्या निर्देशित फिल्म ‘‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’’ (Shubh Mangal Zyada Saavdhan) को लेकर अति उत्साहित हैं, जिसमें दो समलैंगिक पुरूषों की प्रेम कहानी है. प्रस्तुत है ‘‘गृहशोभा’’ (Grihshobha) पत्रिका के लिए आयुष्मान खुराना से हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश…

आप अपने आठ वर्ष के करियर में किसे टर्निंग प्वाइंट मानते हैं?

-सबसे पहली फिल्म ‘‘विक्की डोनर’’मेरे कैरियर की टर्निंग प्वाइंट थी. उसके बाद ‘‘दम लगा के हईशा’’टर्निंग प्वाइंट थी. यह फिल्म मेरे लिए एक तरह से वापसी थी. क्योंकि बीच के 3 साल काफी गड़बड़ रहे. ‘‘दम लगा के हाईशा’’के बाद ‘‘अंधाधुन’’टर्निंग प्वाइंट रही. जिसने मुझे सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरुस्कार दिलाया. फिर फिल्म‘आर्टिकल 15’भी एक तरह का टर्निंग प्वाइंट था. इस फिल्म के बाद एक अलग व अजीब तरह की रिस्पेक्ट /इज्जत मिली. फिल्म‘‘आर्टिकल 15’’में मैने जिस तरह का किरदार निभाया,उस तरह के लुक व किरदार में लोगों ने पहले मुझे देखा नहीं था.  फिर जब फिल्में सफल हो रही हों,तो एक अलग तरह की पहचान मिल जाती है. मुझे आपका,दशकों से, क्रिटिक्स से भी रिस्पेक्ट मिल रही है. यह अच्छा लगता है.

‘‘अंधाधुन’’के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद आपके प्रति फिल्मकारो में किस तरह के बदलाव आप देख रहे हैं?

-फिल्म‘‘अंधाधुन’’ ने बहुत कुछ दिया है. मुझे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. यह फिल्म चाइना में बहुत बड़ी फिल्म बनी. बदलाव यह आया कि अब लोग मुझे अलग नजरिए से देखते हैं. मुझे रिस्पेक्ट देते हैं. अब दर्शक भी जदा इज्जत दे रहे हैं. जब मैं पत्रकारों से मिलता हूं, तो अच्छा लगता है. क्योंकि ‘अंधाधुन’ एक ऐसी फिल्म है, जिसे मैंने खुद जाकर मांगी थी.

आप अक्सर कहते है कि आप ‘गृहशोभा मैन’हैं. इसके पीछे क्या सोच रही है?

-कई लोगों ने मुझसे कहा कि मैं तो ‘गृहशोभा’ पत्रिका हूं. उनका कहना था कि मैं जिस तरह के विषय वाली फिल्में सिलेक्ट करता हूं, वह इतने निजी होते हैं, जिस पर आप खुलकर बात करने से कतराते नही हैं. पर आप ‘गृहशोभा’ पत्रिका की तरह खुल कर बात करते हैं. आप ‘गृहशोभा’ के लिए लिखते हैं,तो कितनी मजेदार लाइफ है आपकी.

आपने वर्जित विषयों पर आधारित फिल्में की, जिन पर लोग बात करना तक पसंद नहीं करते. जब आपने यह निर्णय लिया था, तो आपके घर में किस तरह की प्रतिक्रिया मिली थी?

-मेरा पूरा कैरियर रिस्क पर बना है. बाकी कलाकार जिन विषयों को रिस्की मानते हैं,उन्हीं विषयों पर बनी फिल्में कर मैंने अपना कैरियर बनाया. इस तरह की रिस्क मैं आगे भी लेता रहूंगा. मतलब मैं रिस्क ना लूं, ऐसा कैसे हो सकता है. कई लोगों के लिए समलैंगिकता विषय पर फिल्म एक रिस्क है. पर मुझे लगता है कि आज के दौर में इसकी जरूरत है.  सुप्रीम कोर्ट ने भी सेक्शन 377 को जायज ठहरा दिया है. देखिए ‘गे’ लोगो की अपनी निजी जिंदगी है.

‘‘शुभ मंगल सावधान’’ भी एक वर्जित विषय पर थी. इसके प्रर्दशन के बाद किस प्रतिक्रिया ने ज्यादा संतुष्टि दी?

-ऐसी तो कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. पर फिल्म हर किसी को बहुत अच्छी लगी थी. वास्तव में हमारी धारणा होती है कि हीरो को ऐसा होना चाहिए. मर्दांनगी को लेकर हमने अपनी एक धारणा बना रखी है, जो कि हमारे देश में बिस्तर तक की सीमित होती है. इस फिल्म में मर्दांनगी को लेकर लोगों की सोच पर एक कटाक्ष था. उस सोच पर एक तरह का प्रहार था,जो कि बहुत सफल भी रहा. फिल्म के प्रदर्शन के बाद उस पर लोगों ने खुलकर बात करना भी शुरू किया. लोगों की समझ में आया कि खांसी या जुखाम की तरह इसका भी इलाज किया जा सकता है. अब लोग इसका इलाज करने लगे है. कुछ लोग मुझसे मिले और इस विषय पर फिल्म करने के लिए मेरा शुक्रिया अदा किया. पर खुले में किसी ने कुछ नही कहा. पर मेरे पास आकर जरूर बोलते थे.

मतलब अभी भी वह टैबू बना हुआ है?

-जी हां!! अभी भी वह टैबू बना हुआ है. पर फिल्म के प्रदर्शन के बाद कुछ तो बातचीत हुई. हमने पहला कदम उठाया.

होमोसेक्सुएलिटी जैसे विषय पर अपनी नई फिल्म‘‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’’को आप पारिवारिक फिल्म मानते हैं. जबकि इस तरह के विषय में अश्लीलता आने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं. ऐसे में बतौर कलाकार  स्क्रिप्ट सुनते वक्त आपने किस बात पर ध्यान दिया?

-फिल्म के निर्माता आनंद एल राय पारिवारिक फिल्म के लिए जाने जाते हैं. जब वह आपके साथ हों, तो आपको इतनी चिंता की जरूरत नहीं होती. जब मुझे आनंद एल राय की तरफ से इस फिल्म का आफर मिला,तो मुझे यकीन था कि वह पारिवारिक फिल्म ही बनाएंगे. इसके बावजूद मैं स्क्रिप्ट जरुर सुनता हूं. स्क्रिप्ट सुनते समय मैं इस बात पर पूरा ध्यान देता हूं कि फिल्म में क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए.  इस फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे आप परिवार के साथ बैठकर न देख सकें. वैसे भी अब तो बच्चे बच्चे को पता है कि समलैंगिकता क्या होती है. पर इसे अपनाना जरूरी है.

देखिए,समलैंगिकता ऐसा नहीं है कि आप एक दिन सुबह सोकर जगे और आपको ऐसा लगा कि मैं ‘गे’ बन जाऊंगा. ऐसा होता नहीं है. बचपन से आपकी वही सोच होती है,जो आपको पसंद है. वही आपको पसंद है. हर युवक लड़के या लड़कियां या कुछ लोग दोनों पसंद करते हैं.  लेकिन यह आपकी निजी जिंदगी है,आप जिसका चयन करना चाहें, उसका चयन करें. आपकी जिंदगी में अगर उससे फर्क नहीं पड़ता है,तो फिर दूसरों को क्या तकलीफ?

जैसा कि आपने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सेक्शन 377 को कानूनी जामा पहना दिया है. तो अब आपकी यह फिल्म कितनी महत्वपूर्ण हो गई है?

-मेरी राय में यह ह्यूमन राइट की बात है. ‘गे’ लोगों को ‘बुली’ किया जाता है. बचपन से इनका मजाक उड़ाया जाता है. बचपन से इनको नीची नजरों से देखा जाता है. तो हमारा और हमारी फिल्म का मकसद उनमें समानता लाना जरूरी है. यह फिल्म भी फिल्म ‘आर्टिकल 15’ की तरह से ही है. एक तरह से देखा जाए, तो यह उसका कमर्शियल वर्जन है. फिल्म ‘‘आर्टिकल 15’’में पिछड़े वर्ग को समानता दिलाने की बात है. यहां हम होमोसेक्सुआलिटी की बात कर रहे हैं. लेकिन यह कमर्शियल और पारिवारिक फिल्म है. जबकि ‘‘आर्टिकल 15’’कमर्शियल नहीं थी. वह डार्क थी. जबकि ‘‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’’ कॉमेडी फिल्म है. यह फिल्म इंसानों के बीच समानता को जरूरी बताती है. फिर चाहे जैसा इंसान हो,चाहे जिस जाति का और  जिस सोच का भी हो.

फिल्म ‘‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’’ की स्क्रिप्ट पढ़ने पर किस बात ने आपको इसे करने के लिए प्रेरित किया?

-सबसे पहले तो इसका विषय समसामायिक और बहुत अच्छा है. मेरी राय में होमोसेक्सुअलिटी पर आज तक कोई भी अच्छी फिल्म नहीं बनी है. जो बनी हैं, वह पूर्ण रूपेण कलात्मक रही,जो कि दर्षको तक पहुंचने की बजाय केवल फिल्म फेस्टिवल तक सीमित रही. जबकि हमारा हिंदुस्तान इस तरह की फिल्में देखने के लिए तैयार है.

दूसरी बात इस फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ते समय मुझे फिल्म ‘‘ड्रीम गर्ल’’की शूटिंग के वक्त का आंखों देखी घटना याद आयी. मैं मथुरा जैसे छोटे शहर में रात के वक्त शूटिंग कर रहा था. मैने देखा कि पार्किंग में दो लड़के एक दूसरे को ‘किस’कर रहे हैं. तो मेरे दिमाग में बात आयी कि भारत इसके लिए तैयार है. क्योंकि खुले में कभी भी लड़के या लड़कियों का ‘किस’नहीं होता है. मुंबई में ऐसा हो सकता है,पर छोटे शहरों में संभव नही. तो मैंने कहा कि हम इसके लिए तैयार तो हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी कानूनन मंजूरी दे ही दी है. मैंने खुले में भी देख लिया हैं. इसलिए इसके ऊपर फिल्म बनाई जा सकती हैं.

जब से मैने दो लड़को को ‘किस’करते हुए देखा था,तब से मैं ‘होमोसेक्सुएलिटी के विषय को एक्स्प्लोरर कर रहा था. फिर मुझे पता चला कि हितेश जी इसी विषय पर फिल्म लिख रहे है,तो मैने उनसे कहा था कि स्क्रिप्ट पूरी होने पर मुझे सुनाएं. जब उन्होने स्क्रिप्ट सुनाई,तो मुझे तो बहुत फनी लगी.  इस विषय की फिल्म का फनी होना बहुत जरूरी है. अगर फिल्म गंभीर हो जाएगी,तो लोग इंज्वॉय नहीं कर पाएंगे और हम जो बात कह रहे हैं,वह वहां तक पहुंची नहीं पाएगी.  इसी विषय पर इससे पहले बनी गंभीर होने के चलते ही सिर्फ फेस्टिवल में ही दिखाई गई है. फिल्म फेस्टिवल में इस तरह की फिल्मों के दर्शक ‘गे’ समलैंगिक या समलैंगिकों के साथ खड़े रहने वाले लोग ही रहे. जबकि हमें यह फिल्म उनको दिखानी है,जो ‘गे’ समलैंगिकता के विरोध में हैं. इन तक हम तभी अपनी फिल्म को पहुंचा सकते हैं, जब हम इन्हें मनोरंजन दें. फिर पता भी नहीं चलेगा कि कैसे उन तक संदेश पहुंच जाता है. तो वही चीज हमने भी इस फिल्म के जरिए सोचा है.

इस फिल्म के अपने किरदार को कैसे परिभाषित करेंगें?

-मैने इसमें कार्तिक का किरदार निभाया है, जो कि समलैंगिक है और उसे एक अन्य समलैंगिक युवक अमन से प्यार है.

इस फिल्म के अपने किरदार को निभाने के लिए किस तरह के मैनेरिज्म या बौडी लैंगवेज अपनायीं?

-हमने यह दिखाया है कि हाव भाव कोई जरूरी नहीं है कि लड़कियों की तरह हों. रोजमर्रा की जिंदगी में आप किसी भी आदमी को देख सकते हैं, जो समलैंगिक हो सकता है. एक नजर में आपको नही पता चलेगा कि सामने वाला समलैंगिक है. यह कटु सच्चाई भी है. यही बात हमारी फिल्म के अंदर भी है. हमने कुछ भी स्टीरियोटाइप नहीं दिखाया है कि यह हाव भाव होना चाहिए. लड़कियों की तरह बात करता है,कभी-कभी ऐसा होता भी है,पर जरूरी नहीं है.  मैं फिल्में कम देखता हूं. किताबें ज्यादा पढ़ता हूं. मैं एक अंग्रेजी किताब पढ़ रहा हूं ‘लिव विथ मी. ’यह किताब मैंने पढ़़ी है,जो कि ‘गे’लड़कों की कहानी है. इस किताब से मैंने कुछ चीजें कार्तिक के किरदार को निभाने के लिए ली हैं.

इसके अलावा भी आपने कुछ पढ़ने की यह जानने की कोशिश की है?

-जी हां! हमारी फिल्म इंडस्ट्री में भी काफी समलैंगिक लोग हैं. फैशन इंडस्ट्री में भी हैं. यूं तो हर जगह हैं और होते हैं. पर इस तरह के लोगों को हमारी इंडस्ट्री में ज्यादा स्वीकार किया जाता है. कॉरपोरेट में भी होते हैं,लेकिन वहां वह खुलकर आ नहीं पाते. वहां वह बंधन में महसूस करते हैं. जबकि हमारी फिल्म इंडस्ट्री बहुत खुली है. यहां आप जैसे हैं, वैसे रहिए.  यह बहुत बड़ी बात है. इस बात को मुंबई आने के बाद से तो मैं जानता ही हॅूं. आप तो मुझसे पहले से मुंबई में हैं और फिल्लम नगरी में सक्रिय हैं,तो आप ज्यादा बेहतर ढंग से जानते व समझते हैं.

जब मैं कौलेज में पढ़ रहा था,तब हमारे कौलेज में ‘‘गे’’ क्लब हुआ करता था. एक दिन मुझे इस ‘गे’क्लब के अंदर गाना गाने के लिए बुलाया गया. उन्होंने मुझसे कहा कि,‘हम सभी को आपका गाना बहुत पसंद आया है. आप हमारे क्लब में आकर गाना गाए. ’आप यकीन नहीं करेंगे, पर उनकी बात सुनकर मैं डर गया था. मैंने कह दिया था कि यह मुझसे नहीं हो पाएगा. मैं आप लोगों से नहीं मिल सकता. पर आज मैं उन्ही ‘गे’/ समलैंगिक लोगों के साथ खड़ा हूं. तो समय के साथ यह बदलाव मुझमें भी आया है. मैं चाहता हूं कि यही बदलाव देश के बाकी लोगों में भी आ सके.

बदलाव हो रहा है?

-जी हां! हमारी इस फिल्म के अंदर भी वही है कि जब दो इंसान प्यार करते हैं, भले वह लड़के लड़के हो या लड़की लड़की हो,इस पर यदि इन दोनों की निजी एकमत है,तो इन्हें अपने हिसाब से जिंदगी जीने देना चाहिए.

हम पटना गए थे. वहां हमसे किसी पत्रकार ने पूछा यदि यह होगा तो वंश कैसे आगे बढ़ेगा? मैंने कहा कि,‘सर आपको जिंदगी जीने के लिए वंश की पड़ी है. ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? आप बच्चे को गोद ले सकते हैं? इसके अलावा अब तो  बच्चे पैदा करने के लिए कई वैज्ञानिक तकनीक आ गयी हैं,जिससे आप बच्चा कर सकते हैं. इस तरह की सोच को बदलना जरूरी है. यह सोच रातों रात नहीं बदलेगी,वक्त लगेगा. लेकिन पहला कदम हम ले चुके हैं.

आप अपनी तरफ से क्या करना चाहेंगे कि इंसानी सोच बदल सके?

-मैं तो फिल्मों के जरिए ही कर सकता हूं. मैं एक्टिविस्ट नहीं हूं. मैं हर मुद्दे पर फिल्म के जरिए ही बात करता रहूंगा. एक्टिविस्ट बनने का निर्णय आपका अपना होता है. मैं समाज में जो भी बदलाव लाना चाहता हूं,उसका प्रयास अपनी कला के जरिए ही करना चाहता हूं. मुझे लगता है कि जो आप चौराहे पर खड़े होकर नहीं कर सकते हैं,उसे आप फिल्म के जरिए ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकते हैं. एक अंधेरे कमरे में फिल्म इंसान को हिप्नोटाइज कर लेता है. आपको अपने अंदर ले जाता है और आपको समझा देता है. फिल्म के साथ भावनात्मक रुप से आप जुड़ जाते हैं. फिल्म के जरिए रिश्ता जो बन जाता है.

इस फिल्म को देखने के बाद दर्शक अपने साथ क्या लेकर जाएगा?

-सबसे पहले तो दर्शक अपने साथ मनोरंजन लेकर जाएगा. फिल्म देखते समय बहुत ठहाके लगेंगे. इस फिल्म में दिखाया गया है कि एक छोटे आम मध्यम वर्गीय परिवार को जब  पता चलता है कि उनका बेटा ‘गे’/समलैंगिक है, तो वह इसे किस तरह से लता है. उसके इर्द -गिर्द कैसा मजाक होता है? फिर वह परिवार कैसे इसे स्वीकार करता है.

आपके लिए प्यार क्या मायने रखता है?

– मुझे लगता है दोस्ती सबसे बड़ी चीज होती है. अगर आपकी बीवी आपके दोस्त नहीं है, उनका साथ आपको अच्छा नहीं लगता,तो आपकी उनसे कभी नहीं निभ सकती. आकर्षण तो कुछ वर्षों का होता है. उसके बाद तो दोस्ती होती है. आप कितने कंपैटिबल है. आपको साथ में फिल्में देखना अच्छा लगता है या एक ही तरह की किताबें पढ़ना अच्छा लगता है या एक ही तरह के गाने सुनना अच्छा लगता है. जब तक यह ना हो तब तक प्यार नहीं बरकरार रहता. शाहरुख खान साहब ने बोला कि प्यार दोस्ती है,तो सही कहा है.

इस बार वैलेंटाइन डे की कोई प्लानिंग है?

-मैं वैलेंटाइन डे में विश्वास नहीं रखता. मुझे लगता है कि यह तो सिर्फ कार्ड और फूल बेचने के लिए एक मार्केटिंग का जरिया है. प्यार तो आप रोज कर सकते हैं,उसके लिए एक दिन रखने की क्या जरूरत है? जितने भी दिन बने हुए हैं,वह सिर्फ फूलों और केक की बिक्री के लिए बने है,इसके अलावा कुछ नहीं है.

आप लेखक व निर्देशक कब बन रहे हैं?

-अभी तो नहीं. . . जब तक लोग मुझे कलाकार के तौर पर देखना चाहते हैं,तब तक तो एक्टिंग ही करूंगा.  क्योंकि अभिनय करना बहुत आसान काम है. लेखन व निर्देषन बहुत कठिन काम है.

वेब सीरीज करना चाहते हैं?

-ऐसी कोई योजना नहीं है. पर अगर कुछ अलग व अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो,तो बिल्कुल करना चाहूंगा.

सोशल मीडिया पर क्या लिखना पसंद करते हैं?

-सोशल मीडिया पर कभी कविताएं लिख देता हूं. कभी मैं अपनी फिल्म के संबंध में लिख देता हूं. ऐसा कुछ नियम नहीं है कि क्या लिख सकता हूं. आजकल तो फिल्म ही प्रमोट कर रहा हूं.

कभी आपने यह नहीं सोचा कि किसी एक विषय को लेकर लगातार कुछ न कुछ सोशल मीडिया पर लिखते रहें?

-पहले ब्लौग लिखता था. मैं कुछ ना कुछ लिखता रहता था. पर अब समय नहीं मिलता है. लिखना तो चाहता हूं,पर समय नहीं मिलता है. क्योंकि आजकल लगातार फिल्म की शूटिंग कर रहा हूं.

नमस्ते ट्रंप बनाम नमस्ते भारत!

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आ गए हैं और जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी के कार्यकाल में होता रहा है कि हर कार्यक्रम को “एक वृहद इवेंट” बना दिया जाता है. डोनाल्ड ट्रंप के भारत आगमन को भी वैसे ही रंग दिया गया है. जैसे कि हमारे प्रधानमंत्री मोदी की शैली है. मोदी चाहते हैं हर चीज बड़े पैमाने पर हो, यही कारण है कि डोनाल्ड ट्रंप का भारत आगमन भारत की आवाम पर 100 करोड़ से अधिक बेशकीमती रुपए की होली साबित हो चुका  है.

विगत 70 वर्षों में जाने कितने दिग्गज, देश दुनिया के राष्ट्राध्यक्षों का भारत आगमन हुआ. मगर जैसा बेतहाशा अपव्यय  करोड़ों रुपयों का डोनाल्ड ट्रंप के आगमन पर दिखाई दे रहा है, वैसा कभी नहीं हुआ था. यह एक चिंता का विषय है. अतिथियों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसमें अतिरेक व अपव्यय  आज बेहद दुखद और चिंता का सबब है.

इसकी वजह है भारत का एक विकासशील देश होना, हमारे देश का आम आदमी बड़ी मेहनत से धन अर्जित करता है और जब वह पैसा सरकार के पास जाता है तो सरकार का दायित्व है उस पैसे का सदुपयोग करना. इसी तरह उद्योगपति जो धन टैक्स के रूप में देते हैं उसका वितरण राष्ट्रहित में समृद्धि के लिए होना चाहिए ना कि दिखावे  के लिए.

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जब नरेंद्र मोदी महात्मा गांधी की बात करते हैं, गांधी को उन्होंने आत्मसात किया है तो फिर यह गलतियां क्यों हो रही है? महात्मा गांधी  तो दिखावे के सख्त खिलाफ थे. क्या आज हमारे  प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की कथनी और करनी में अंतर नहीं  है? अगर है तो यह भी दुखद है और देश  के  लिए  चिंता का सबब भी है. आज हम कुछ प्रश्न आपके सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं, आप स्वयं तय करें कि अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा और भारत के रुपयों  को उल्लास की तरह उड़ाना कितना समीचीन है-

हमारे न्यूज़ चैनल तो धन्य है!

भारतीय मीडिया के दो पक्ष है. एक है प्रिंट और दूसरा इलेक्ट्रॉनिक. निसंदेह प्रिंट मीडिया अपनी सीमा में रहकर देश को दिशा और जागरूक बनाने का काम करता रहा है. मगर हमारा इलेक्ट्रौनिक मीडिया बारंबार दिशा से भटक जाता है यही स्थिति दुनिया के सबसे बड़े ताकतवर राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति के भारत आगमन के दरमियान भी दिखाई दे रही है. जैसी प्रस्तुति इलेक्ट्रॉनिक चैनलों  की है उस संदर्भ में कहा जा सकता है कि “हमने कहा था, तेल लगाने के लिए, तो न्यूज़ चैनल मक्खन लगाने लगे” ट्रंप की भारत यात्रा, गुजरात, आगरा और दिल्ली की है इधर  टीवी चैनलों के संवाददाता चीख चीख कर बता रहे हैं कि किस दीवार पर कौन सा रंग लगा और कैसा चित्र बनाया गया. क्या यही सब पत्रकारिता का सामाजिक सरोकार है?

जगह-जगह मोदी और ट्रंप की दोस्ती उकेरी गई.  दूसरी तरफ व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने कहा कि ट्रंप भातर में सीएए और एनआरसी पर भी चर्चा करेंगे. भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता पर हाल ही में घटित घटनाओं से अमेरिका चिंतित है. अगरचे,  डोनाल्ड ट्रंप ने  इस पर  कुछ विपरीत कह दिया तो प्रधानमंत्री  के नाते मोदी को ना उबलते उगलते बनेगा ना निगलते, यह भी याद रखना चाहिए कि  डोनाल्ड ट्रंप कभी भी कुछ भी कह देते हैं जिस पर अक्सर प्रश्नचिन्ह लग जाता है. इसके पहले ट्रंप बयान दे चुके हैं कि अमेरिका के साथ भारत का व्यवहार अच्छा नहीं रहा है.

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डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा: करोड़ों रुपए की होली 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आने और उल्लास से भरे स्वागत के निचोड़ के रूप में हम पूछ सकते हैं कि भारत को क्या मिलेगा? सार तथ्य है कि कोई बड़ी “ट्रैड डील” भी इस यात्रा में संभव नहीं. ट्रंप अमेरिका में दिए अपने बयानों में कई बार उल्लेख करते हैं की भारत यात्रा के दरमियान 7000000 से लेकर एक करोड़ तक जनता उनके स्वागत के लिए खड़ी रहेगी. 100 करोड़ से अधिक की राशि उनकी इस यात्रा पर भारत सरकार खर्च कर रही है.

अमेरिका में पिछले बार संपन्न हुए राष्ट्रपति चुनाव में, ट्रंप पर यह आरोप लगा था की उन्होंने अमेरिकी मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए रूस का सहारा लिया था. उन पर इसी आरोप को लेकर महाभियोग भी अमेरिकी संसद में चलाया गया था. ट्रंप को मालूम है की भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक डेमोक्रेट्स को ही वोट देते हैं. पिछली बार भारतीय मूल के 40% मतदाताओं ने डेमोक्रेट्स को वोट दिया था.

इधर भारत में मोदी दिल्ली चुनाव मैं हुई करारी हार से अत्यधिक आहत है. ऐसे में यह कहा जा सकता है की आगामी बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ट्रंप की इस यात्रा मे सकारात्मकता ढूंढ रहे हैं. और इसी तरह ट्रंप महाभियोग के आरोपों से विचलित तथा भारतीय मूल के मतदाताओं का वोट बटोरने के लिए, यह यात्रा कर रहे हैं.

पर सवाल अभी भी अनुत्तरित है की इतने सरकारी खर्च से भारत या उसके नागरिकों को क्या हासिल होगा? सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है  डोनाल्ड ट्रंप का साबरमती आश्रम जाना. महात्मा गांधी ने दुनिया को सत्य अहिंसा और एक  “सादगी” का मार्ग दिखाया था और अगर आप महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने जा रहे हैं नमन करते हैं तो फिर करोड़ों रूपए की होली क्यों. और हां! अगर यह कार्यक्रम, इवेंट “नमस्ते ट्रंप” की जगह “नमस्ते भारत” होता तो देश का सम्मान  बढ़ता.

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बेबी कौर्न से बनाएं ये 6 टेस्टी डिश और पाएं सबकी तारीफे

बेबी कौर्न यानी मकई बहुत छोटा और अपरिपक्व अनाज है. यह आमतौर पर सालभर खाया जाता है. बेबी कौर्न कच्चा और पका कर दोनों तरह से खाया जाता है. यह एशियाई व्यंजनों में बहुत आम है. इसे आप सलाद में सब्जी की तरह से या फिर कटलेट में या व्हाइट सौस में डाल कर बेक कर सकते हैं, ग्रिल करें या तंदूरी बेबी कौर्न बनाएं, जैसे चाहें, इस्तेमाल करें.

1 बेबी कौर्न कबाब

सामग्री
10-15 बेबी कौर्न, 25 ग्राम चीज, 2 उबले आलू, 1 बड़ा चम्मच कटा हरा धनिया, 2 हरीमिर्चें, 1/2 कप ब्रैड का चूरा, नमक स्वादानुसार, तेल सेंकने के लिए.

विधि
बेबी कौर्न बारीक पीस कर उस में उबले आलू, नमक, हरा धनिया और चीज डाल कर मिलाइए, कटलेट का आकार दीजिए और ब्रैड के चूरे में लपेट कर गरम तवे पर थोड़ा तेल लगा कर सेंक लें. कबाब तैयार हो गए. गरमागरम, हरे धनिए की चटनी या टमाटर की चटनी के साथ खाइए.

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2 भरवां पैकेट कौर्न

सामग्री
1 कप मैदा, 2 बड़े चम्मच तेल, 1/4 छोटा चम्मच नमक, 1 कप  व्हाइट सौस, 5-6 बेबी कौर्न, 4 बड़े चम्मच लाल, पीले, हरे रंग की शिमलामिर्च, नमक स्वादानुसार, 1/4 छोटा चम्मच पिसी कालीमिर्च पाउडर, तलने के लिए तेल.

विधि
मैदे में नमक और तेल डाल कर अच्छी तरह मिलाएं, पानी से पूरी के आटे से भी सख्त आटा गूंध लें. गुंधे आटे को ढक कर 20 मिनट के लिए रख दें. भरावन के लिए बेबी कौर्न को नमक के पानी में उबाल लें और उस के छोटे टुकड़े कर लें. लाल, पीली, हरी शिमलामिर्च को बारीक काट कर व्हाइट सौस में डालें. नमक और मिर्च पाउडर डाल कर मिश्रण तैयार करें. गुंधे आटे से छोटीछोटी लोई बनाएं. लोई से पतली पूरी बेल कर चौकोर आकार में काटें. 1/2 चम्मच मिश्रण पूरी के बीच में रख कर पैकेट बनाएं. पैकेट को बंद कर के गरम तेल में तल लें.

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3 आलू कौर्न सब्जी

सामग्री
6 बेबी कौर्न, 1 कटा प्याज, 1/4 छोटा चम्मच पिसी लालमिर्च, 2 साबुत सूखी लालमिर्च, 1 हरीमिर्च, 2 कटे हुए टमाटर, 1 चम्मच अदरकलहसुन पेस्ट, 2 उबले आलू, 1/4 कप मटर के दाने, 1 बड़ा चम्मच तेल, 1 छोटा चम्मच सरसोंदाना, 1 चम्मच उड़द की दाल, 1 छोटा चम्मच पिसी हलदी,1/2 चम्मच नीबू का रस, नमक स्वादानुसार.

विधि
बेबी कौर्न उबाल लें. एक पैन में तेल गरम करें. उड़द दाल, 2 सूखी लालमिर्चें, सरसोंदाना चटकाएं. अदरकलहसुन पेस्ट, प्याज, हलदी पाउडर और टमाटर डाल कर भूनें. बारीक कटी हुई हरीमिर्च, उबला हुआ बेबी कौर्न, उबले मैश किए हुए आलू, नमक, पानी डाल कर कुछ मिनट के लिए उबाल लें. नीबू का रस डाल कर हरी धनिया पत्ती से गार्निश कर चपाती, पूरी, इडली या डोसे के साथ गरमगरम परोसें.

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4 तंदूरी बेबी कौर्न

सामग्री
10-15 बेबी कौर्न, 1/2 छोटा चम्मच नमक, 1/4 कप बेसन, 4 बड़े चम्मच दही, 2 हरीमिर्चें, 1 इंच अदरक का टुकड़ा, 1/4 छोटा चम्मच पिसी लालमिर्च, तलने के लिए तेल, नमक स्वादानुसार.

विधि
बेसन में दही, अदरक, पिसी हरीमिर्च डालें और पानी की सहायता से घोल तैयार कर लें. घोल में नमक और बेबी कौर्न भी डाल कर मिलाएं और मैरिनेशन के लिए 1/2 घंटे के लिए रखें. तंदूर में ग्रिल करें या फिर गरम तवे पर हलका तेल डाल कर दोनों तरफ से सेंक लें. चटपटे तंदूरी बेबी कौर्न तैयार हैं.

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5 कौर्न चीज चीला

सामग्री
10-15 बेबी कौर्न, 1 कप मैदा, 1/2 छोटा चम्मच नमक, 2 हरीमिर्चें, 1/4 छोटा चम्मच कालीमिर्च पाउडर, 3 बड़े चम्मच मौजरेला चीज, 3 बड़े चम्मच तेल.

विधि
मैदे का नमक और कालीमिर्च पाउडर के साथ घोल तैयार कर लें. गरम तवे पर हलका तेल डाल कर घोल से पतला चीला बना कर दोनों तरफ से सेंक लें. बेबी कौर्न को धो कर और लंबाई में आधा करते हुए 2 भागों में काट लें. कटे हुए बेबी कौर्न में नमक लगा कर10 मिनट के लिए रख दें. अब उस में मौजरेला चीज भर कर दूसरे टुकड़े से बंद कर दें. फिर तैयार चीले में लपेट कर गरम तवे पर दोनों तरफ से सेंक लें. गरमागरम चीला टमाटर सौस व हरे धनिए की चटनी के साथ परोसें.

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6 चटपटे बेबी कौर्न चावल

सामग्री
1 कप बासमती चावल, 1/4 कप तेल, 1/2 छोटा चम्मच जीरा, 1 इंच  अदरक का टुकड़ा कद्दूकस किया हुआ, 2 हरीमिर्चें, 1 छोटा चम्मच पिसा सूखा धनिया, 1/4 छोटा चम्मच पिसी लालमिर्च, 1 कप कटी ब्रोकली, 1 प्याज, 1/2 कप कटी गाजर, 3 बड़े चम्मच लाल, पीली, हरी शिमलामिर्च, 1/2 कप कटी फ्रैंच बींस, 1 जुकीनी, 1 टमाटर, नमक स्वादानुसार.

विधि
चावल को साफ कर के, धो कर 20 मिनट के लिए पानी में भिगो दें. बाद में उबाल लें. कड़ाही में थोड़ा तेल डाल कर गरम करें. प्याज के लंबे टुकड़े हलके भूरे होने तक भूनें. उस के बाद ब्रोकली, जुकीनी, फ्रैंच बींस, शिमलामिर्च और गाजर डाल कर इतना भूनें कि ज्यादा गलें नहीं. कड़ाही में गरम तेल में जीरा चटकाएं. अदरक पेस्ट और हरीमिर्च डाल कर थोड़ा सा भूनें और सूखा धनिया, नमक डालें. मसाले को थोड़ा सा भूनिए. चावल और सब्जियां डाल कर मिलाएं, हरी धनिया पत्ती और पुदीना पत्ती हाथ से तोड़ कर डाल दें. पुलाव को चटनी या रायते के साथ परोसें.

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