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मेरा रोजाना सेक्स करने का मन करता है, मैं कैसे इस परेशानी को ठीक करूं?

सवाल

मैं 25 साल का हूं. शादी को 3 साल हो चुके हैं. मेरा रोजाना सेक्स करने का मन करता है, लेकिन काम की वजह से मुझे बाहर जाना पड़ता है. ऐसे में मुझे नींद नहीं आती और लगता है कि किसी भी लड़की के साथ सोऊं. मेरा काम ऐसा है कि बीवी को अपने साथ नहीं रख सकता. कभी मुझे कहीं जाना पड़ता है, तो कभी कहीं. मेरी दिक्कत दूर करें?

जवाब

आप को टूरिंग जौब छोड़ कर ऐसी नौकरी खोजनी चाहिए, जिस में हर रात आप घर पर रह सकें. आप पूरी मेहनत से ऐसी नौकरी की तलाश करेंगे, तो जरूर कामयाब होंगे. तब बीवी का साथ आप को रोजाना मिलेगा.

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55 की उम्न में भी न करें परहेज सेक्स से…

कुछ समय पहले की बात है. एक विख्यात सेक्स विशेषज्ञ को एक महिला का पत्र मिला. लिखा था, मेरे पति 54 साल के हैं. उन्होंने फैसला किया है कि वह अब भविष्य में मुझ से कोई  जिस्मानी संबंध न रखेंगे. उन का कहना है कि उन्होंने कहीं पढ़ा है कि 50 साल बाद वीर्य का निकलना मर्द पर अधिक शारीरिक दबाव डालता है और वह अगर नियमित संभोग में लिप्त रहेगा तो उस की आयु कम रह जाएगी यानी वह वक्त से पहले मर जाएगा. इसलिए उन्होंने सेक्स को पूरी तरह से त्याग दिया है. क्या इस बात में सचाई  है? अगर नहीं, तो आप कृपया उन्हें सही सलाह दें.

मैं आशा करती हूं कि इस में कोई सत्य न हो, क्योंकि यद्यपि मैं 50 की हूं मेरी इच्छाएं अभी बहुत जवान हैं. मैं इस विचार से ही बहुत उदास हो जाती हूं कि अब ताउम्र मुझे सेक्स सुख की प्राप्ति नहीं होगी. मैं ने अपने पति को समझाने की बहुत कोशिश की.

मुझे यकीन है कि वह गलत हैं. लेकिन मेरे पास कोई मेडिकल सुबूत नहीं है, इसलिए वह मेरी बात पर ध्यान नहीं देते.

मुझे विश्वास है कि जहां मैं नाकाम रही वहीं आप कामयाब हो जाएंगे.

यह केवल एक महिला का दुखड़ा नहीं है. अगर सर्वे किया जाए तो 50 से ऊपर की ज्यादातर महिलाएं इसी कहानी को दोहराएंगी और महिलाएं ही क्यों पुरुषों का भी यही हाल है. सेक्स से इस विमुखता के कारण स्पष्ट और जगजाहिर हैं, लेकिन एक बात जिसे मुश्किल से स्वीकार किया जाता है और जो आधुनिक शोध से साबित है, वह यह है कि सेक्स न करने से व्यक्ति जल्दी बूढ़ा हो जाता है और उसे बीमारियां भी घेर लेती हैं. एक 55 साल की महिला से सेक्स के बाद जब उस के प्रेमी ने कहा कि वह जवान लग रही है, तो उस ने आईना देखा. उस ने अपने शरीर में अजीब किस्म की तरंगों को महसूस किया और उसे लगा कि वह अपने जीवन में 20 वर्ष पहले लौट आई है. 50 के बाद सेक्स में दिलचस्पी कम होने की कई वजहें हैं. हालांकि अब वैदिक काल जैसी कट्टरता नहीं है, लेकिन अब भी सोच यही है कि 50 पर गृहस्थ आश्रम खत्म हो जाता है और वानप्रस्थ आश्रम शुरू हो जाता है. इसलिए शायद ही कोई घर बचा हो जिस में यह वाक्य न दोहराया जाता हो : नातीपोते वाले हो गए, अब तुम्हारे खेलने के दिन कहां बाकी हैं. शर्म करो, अब बचपना छोड़ो. बहूबेटे क्या कहेंगे? क्या सोचेंगे कि बूढ़ों को अब भी चैन नहीं है.

दरअसल, भक्तिकाल में जब ब्रह्मचर्य और वीर्य को सुरक्षित रखने पर जो बल दिया गया उस से यह सोच विकसित हो गई कि सेक्स का उद्देश्य आनंदित स्वस्थ और तनावमुक्त रहना नहीं बल्कि केवल उत्पत्ति है. एक बार जब संतान की उत्पत्ति हो जाए तो सेक्स पर विराम लगा देना चाहिए. इस तथाकथित धार्मिक धारणा पर अब तक साइंस का गिलाफ चढ़ाने का प्रयास किया  जाता रहा है. मसलन, हाल ही में ‘योग’ से  संबंधित एक पत्रिका में लिखा था, ‘‘वीर्य में सेक्स हारमोन होते हैं. उन्हें सुरक्षित रखें और सेक्स में लिप्त हो कर उसे बरबाद न करें. यह कीमती हारमोन यदि बचा लिए जाते हैं तो वापस रक्त में चले जाते हैं और शरीर में ताजगी और स्फूर्ति आ जाती है. आधी छटांक वीर्य 40 छटांक रक्त के बराबर होता है, क्योंकि वह इतने ही खून से बनता है. जिस्म से जितनी बार वीर्य निकलता है उतनी ही बार कीमती रासायनिक तत्त्व बरबाद हो जाते हैं, वह तत्त्व जो नर्व व बे्रन टिश्यू के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण  हैं. यही वजह है कि अति उत्तेजक पुरुषों की पत्नियां और वेश्याओं की आयु बहुत कम होती है.

इस पूरे ‘प्रवचन’ के लिए एक ही शब्द है, बकवास. सब से पहली बात तो यह है कि वीर्य में शुक्राणु बड़ी मात्रा में साधारण शकर, सेट्रिक एसिड, एसकोरबिक एसिड, विटामिन सी, बाइकारबोनेट, फासफेट और अन्य पदार्थ होते हैं जो ज्यादातर एंजाइम होते हैं, इन सब का उत्पादन अंडकोशिकाएं, सेमिनल बेसिकल्स और एपिडर्मिस व वसा की डक्ट के जरिए होता है. वीर्य में सेक्स हारमोन होते ही नहीं. यह सारे तत्त्व या पदार्थ जिस्म में खाने की सप्लाई से बनते हैं जोकि एक न खत्म होने वाली प्रक्रिया है. निष्कासित होने से पहले वीर्य सेमिनल वेसिकल्स में स्टोर होता है, अगर इसे निष्कासित नहीं किया गया तो भीगे ख्वाबों से यह अपनेआप हो जाएगा. जाहिर है इस के शरीर में स्टोर होने का अर्थ है कि जिस्म में यह सरकुलेशन का हिस्सा रहा ही नहीं है और न ही ऐसी कोई प्रक्रिया है जिस से वीर्य फिर खून में शामिल हो कर ऊर्जा का हिस्सा बन जाए.

विख्यात वैज्ञानिक डा. इसाडोर रूबिन का कहना है, ‘‘अगर यह धारणा सही होती कि वीर्य के निकलने से या महिला के चरम आनंद प्राप्त करने से जिस्म में कमजोरी आ जाती है और उम्र में कटौती हो जाती है, तो कुंआरों की आयु विवाहितों से ज्यादा होती, क्योंकि अविवाहितों को सेक्स के अवसर कम मिलते हैं. वास्तविकता यह है कि विवाहित व्यक्ति लंबे समय तक जीते हैं.’’

हाल में किए गए शोधों से पता चला है कि अगर कोई व्यक्ति काफी दिन तक सेक्स से दूर रहता है तो कुछ प्रोस्टेटिक फ्लूड सख्त हो कर ग्रंथि में रह जाते हैं. इस से प्रोस्टेट ग्रंथि का आकार बढ़ जाता है और व्यक्ति को पेशाब करने में कठिनाई होने लगती है. इस समस्या पर अगर ध्यान न दिया जाए तो फिर प्रोस्टेट की सर्जरी आवश्यक हो जाती है. 50 के बाद सेक्स से विमुखता का एक अन्य कारण यह है कि जवानी में लोग कसरत पर और अपने जिस्म को सुडौल रखने के लिए खानपान पर अकसर खास ध्यान नहीं  देते. इस से उम्र के साथ उन के शरीर पर फैट जमा होने लगता है जिस से वह मोटे हो जाते हैं. यह जानने के लिए ज्ञानी होना आवश्यक नहीं है कि मोटापा अपनेआप में कई गंभीर बीमारियों की जड़ होता है. व्यक्ति जब बीमार रहेगा तो उस का ध्यान सेक्स की ओर कहां जाएगा, साथ ही पुरुष का जब पेट निकल जाता है और उस का सीना भी औरतों की तरह लटक जाता है तो वह उस मुस्तैदी से सेक्स में लिप्त नहीं हो पाता जैसे वह जवानी में होता था. महिलाओं के बेडौल और मोटे होने से उन में मर्द के लिए पहले जैसा आकर्षण नहीं रह पाता. इसलिए जरूरी है कि उम्र के हर हिस्से में कसरत की जाए और अपना वजन नियंत्रित रखा जाए.

वैसे सेक्स भी अपनेआप में बेहतरीन कसरत है. अन्य फायदों के अलावा इस से मांसपेशियों सुगठित रहती हैं, ब्लड पे्रशर सामान्य और अतिरिक्त फैट कम हो जाता है. गौरतलब है कि पुरुष के गुप्तांग में जोश स्पंजी टिश्यू के छिद्रों में खून के बहाव से आता है. अगर आप के जिस्म पर 1 किलो अतिरिक्त फैट है तो रक्त को 22 मील और ज्यादा सरकुलेट होना पड़ता है. अगर व्यक्ति बहुत मोटा है तो फैट उस के सामान्य सरकुलेशन को और कमजोर कर देता है और खास मौके पर इतना रक्त उपलब्ध नहीं होता कि पूरी तरह से जोश में आ जाए.

दरअसल, खानेपीने का तरीका सामान्य सेहत को ही नहीं सेक्स जीवन को भी प्रभावित करता है. इस में कोई दोराय नहीं कि पतिपत्नी क्योंकि एक ही छत के नीचे रहते हैं इसलिए खाना भी एक सा ही खाते हैं. अगर किसी दंपती के खाने में विटामिन ‘बी’ की कमी है तो इस का उन के जीवन पर जटिल प्रभाव पडे़गा. इस की वजह से पत्नी में अतिरिक्त एस्ट्रोजन (महिला सेक्स हारमोन) आ जाएंगे और उस की सेक्स इच्छाएं बढ़ जाएंगी जबकि पति में इस का उलटा असर होता है. एस्टो्रजन के बढ़ने से उस के एंड्रोजन (पुरुष सेक्स हारमोन) में कमी आ जाती है.

दूसरे शब्दों में, स्थिति यह हो जाएगी कि पत्नी तो ज्यादा प्यार करना चाहेगी, लेकिन पति की इच्छाएं कम हो जाएंगी. इसलिए आवश्यक है कि संतुलित हाई प्रोटीन खुराक ली जाए. साथ ही शराब और सिगरेट की अधिकता से बचा जाए, क्योंकि इन दोनों के सेवन से व्यक्ति वक्त से पहले चरम पर पहुंच जाता है और फिर अतृप्त सा महसूस करता है.

गौरतलब है कि इंटरनेशनल जर्नल आफ सेक्सोलोजी-7 के अनुसार विटामिन और हारमोंस का गहरा रिश्ता है. दर्द भरी माहवारी में राहत के लिए जब टेस्टेस्टेरोन हारमोन दिया जाता है तो उस की अधिक सफलता के लिए साथ ही विटामिन ‘डी’ भी दिया जाता है. इसी तरह से गर्भपात के संभावित खतरे से बचने के लिए प्रोजेस्टरोन हारमोन के साथ विटामिन ‘सी’  दिया जाता है.

50 के बाद सेक्स से विमुखता की एक वजह यह भी है कि दोनों पतिपत्नी बननासंवरना काफी हद तक कम कर देते हैं. अच्छे और आकर्षक कपडे़ पहनने से और बाल अच्छी तरह बनाने से यकीनन महिला का मनोबल और आत्मविश्वास बढ़ता है. इस के बावजूद आप को रजोनिवृत्ति से गुजर चुकी ऐसी अनेक महिलाएं मिल जाएंगी जो भद्दे कपडे़ पहनती हैं, ऐसे बाल संवारती हैं जो फैशन में नहीं है. गाल उन के लटक गए होते हैं, ऊपरी होंठ पर बाल होते हैं, स्तन लटके हुए और पेट व कूल्हे फैले हुए होते हैं. ऐसी पत्नियों में भला किस पति की दिलचस्पी बरकरार रहेगी जबकि जरा सी कोशिश से यह सबकुछ बदला जा सकता है. महिलाएं अच्छी डे्रस शाप पर जाएं, सप्ताह में एक बार ब्यूटी पार्लर जाएं, लटकी हुई खाल और मांसपेशियों को सही आकार देने के लिए हैल्थ व ब्यूटी जिम्नेजियम में कोर्स करें और दृढ़ता से तय कर लें कि मांसपेशियों को सख्त रखने के लिए वे रोजाना कुछ मिनट व्यायाम के लिए भी निकालेंगी. यह सौंदर्य उपचार और हलकी कसरत न सिर्फ उन के मनोबल को बेहतर रखेगी बल्कि सख्त जिस्म उन के सेक्सुअल सिस्टम को भी दुरुस्त रखेगा और उन के पति उन की ओर आकर्षित रहेंगे. ज्ञात रहे कि आत्मविश्वास से भरी सुंदर स्त्री जो अपने जिस्म के रखरखाव में भी माहिर हो, वह अपनी ओर एक 16 साल की लड़की से ज्यादा ध्यान आकर्षित करा लेती है.

यहां यह बताना भी आवश्यक होगा कि इसी किस्म का आकर्षण लाने के लिए पुरुषों को भी चाहिए कि वे कसरत करें, ब्यूटी पार्लर जाएं और अच्छे कपडे़ पहनें, साथ ही उन की पत्नी जब रजोनिवृत्ति से गुजर रही हो तो उस का विशेष ध्यान रखें. पत्नी जितना खुल कर अपने पति से बातें कर सकती है उतना वह अपने डाक्टर से भी नहीं कह पाती. इसलिए अगर रजोनिवृत्ति के दौरान पति ने उसे सही से संभाल लिया तो आगे का सेक्स जीवन बेहतर रहेगा.

अब तक जो बहस की गई है उस से स्पष्ट है कि अच्छे, स्वस्थ और लंबे जीवन के लिए 50 के बाद भी सेक्स उतना ही आवश्यक है जितना कि उस से पहले. लेकिन उसे बेहतर बनाए रखने के लिए अपने नजरिए में बदलाव लाना भी जरूरी है और अगर कोई समस्या है तो मनोवैज्ञानिक और डाक्टर से खुल कर बात करने में कोई शर्म नहीं करनी चाहिए.

फिल्मों में आने के बाद TV से टूट गया ‘बागी-3’ की एक्ट्रेस अंकिता लोखंडे का नाता, दिया ये बयान

इन दिनों बौलीवुड में अंकिता लोखंडे की पहचान फिल्म अभिनेत्री के रूप में होती है. अंकिता लोखंडे को फिल्म ‘‘मणिकर्णिका’’ में झलकारी बाई के किरदार में काफी पसंद किया गया था. अब वह साजिद नाडियाडवाला निर्मित और अहमद खान निर्देशित फिल्म ‘‘बागी 3’’ को लेकर काफी उत्साहित हैं. छह मार्च को रिलीज होने वाली इस फिल्म में उनकी जोड़ी रितेश देशमुख के साथ है.

नेटफ्लिक्स और अमेजन का है जमाना…

हाल ही में जब अंकिता लोखंडे से हमारी मुलाकात हुई और हमने उनसे वर्तमान समय में टीवी की स्थिति को लेकर सवाल किया, तो अंकिता लोखंडे ने कहा- ‘‘मुझे आज की तारीख में सच में नहीं पता कि टीवी पर क्या चल रहा है. क्योंकि हम लोग आजकल टीवी देखते ही नहीं है. आजकल जमाना इतना बदल चुका है कि नेटफ्लिक्स और अमेजन के अतिरिक्त लोग कुछ देखते ही नहीं. बिलकुल सच बता रही हूं. मैं सिर्फ बिग बॉस देखती थी. बाकी मुझे नहीं पता.”

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मुझे नहीं पता टीवी पर क्या चल रहा है…

आगे अंकिता कहती हैं- ‘पवित्र रिश्ता’ के वक्त की मेरी कई दोस्त टीवी पर काम कर रही हैं, पर मुझे सच में नहीं पता कि टीवी का क्या दौर चल रहा है? कलाकार तो कलाकार ही होता है. वह आप कभी बदल नहीं सकते. कला तो कला होती है. किसी भी सीरियल को सफल बनाने में किस्मत बहुत मायने रखती है. दूसरा कलाकार का काम के प्रति समर्पण होना चाहिए. मैंने साढ़े छह साल ‘पवित्र रिश्ता’ में अभिनय करते समय सभी को साथ लेकर चली हूं.

 

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लोगों को लगता था मैं एटीट्यूड में रहती हूं…

मेरे साथ के कुछ लोगों को लगता था कि मैं एटीट्यूड में रहती हूं, पर मुझे लगता है कि मैं शिप की कप्तान हूं और मैं अपने साथ लोगों को ले कर चलूं. इसके बिना कोई भी सीरियल लंबे समय तक चल नहीं सकता. सेट पर कई लोग कहते थे कि अब यह सीरियल बंद हो जाए, तो मैं तुरंत कहती थी कि, ‘ऐसा नही कहना चाहिए. इससे आपका घर चल रहा है. फिर भी आपको यह सीरियल नहीं करना है तो मत करो. पर आपके अलावा सेट पर तीन सौ लोग हैं, जिनका घर इससे चलता है.’ यही वजह है कि आज भी प्रोडक्शन के जो छोटे छोटे लोग हैं,राम दादा वगैरह वह भी मुझे ढेर सारा प्यार देते हैं.

 

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सफल होने के बाद तो सब मिलता ही है…

जब छोटे लोगों का प्यार आपको मिलने लगे, तो अंदर से ऐसा लगता है कि हमने कुछ तो कमाया है.मैं मानती हूं कि बड़े लोगों का प्यार तो मिल ही जाता है. सफलता के बाद तो सब मिलता है. लेकिन छोटे लोगों का जब आपको प्यार मिलता है,तब लगता है कि आपने सही सफलता हासिल की है. इन छह सालों में उन्होंने मुझे एक बच्ची की तरह बड़ा किया है. मैं वही सोई हूं, वहीं खड़ी हुई हूं. फिर चाहे बुखार हो, डेंगू हो, मलेरिया हो. मैंने मेहनत की है. उन्होंने मुझे बनाया है.

आज भी बन सकते हैं वैसे शो…

आज भी उस तरह के सीरियल बन सकते हैं पर आपके अंदर सीरियल बनाने के लिए वह जोश और वह पैशन चाहिए. पैशन के बिना तो कुछ नहीं हो सकता है. बिना पैशन के आप अपना घर नहीं बना सकते. अगर सीरियल की बात करें, तो बिल्कुल भी नहीं बना सकते.

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मुझे कचहरी से बचाओ: भाग-3

बस साहब, अब हमें और क्या चाहिए था. मिजाज गद्गद हो गया. अपने पड़ोसी के विनाश के सामने तो मेरे लिए इस से बड़ा सुख कुछ न था. मैं ने जोश में आ कर वकील साहब को 5 हजार रुपए नजर किए और खुशीखुशी घर आ गया. हमारा सारा गम जाता रहा. दूसरे दिन केस ‘मूव’ हो गया.

तारीख पड़ी, हम हाजिर हुए. वकील साहब ने अपने चैंबर में बुलाया. इतने प्रेम से पेश आए कि मन खुश हो गया. आज भी सभ्यता और शिष्टाचार जिंदा है. उन्होंने सूचित किया, ‘‘थोड़ी देर में आप के केस का नंबर आ जाएगा. बहस करनी पड़ेगी, आप फीस जमा कर दीजिए.’’

हमारी घिग्घी बंध गई.

‘‘जी, अभी उसी दिन तो आप को 5 हजार रुपए दिए थे. आप…’’

‘‘कमाल करते हैं आप, वे पैसे तो हम ने केस तैयार करने के लिए लिए थे. केस को तैयार करना पड़ता है. पढ़ना पड़ता है. रातरात भर जागना पड़ता है. अभी केस पर बहस होनी है.’’

हम क्या कर सकते थे. 3 हजार रुपए जमा किए, मानो पुरखों का पिंडदान किया हो. बहस की पूरी तैयारी हो गई थी. सब लोग कोर्ट नंबर 3 में पहुंचे. जज साहब नहीं आए थे. इंतजार होने लगा. थोड़ी देर में घोषणा हुई, ‘जज साहब आज नहीं आएंगे. उन्हें नजला हो गया है. आज छुट्टी पर हैं.’ हम ने वकील साहब की ओर देखा. वकील साहब दूसरी ओर देख रहे थे. बाहर आने पर उन्होंने सूचित किया, ‘‘अगले महीने की 10 तारीख को आइए.’’

उस के बाद चले गए. हम ठगे से वहीं खड़े रहे. हमारे 3 हजार रुपए का बलिदान हो गया, हासिल कुछ नहीं हुआ. मन मार कर वापस आ गए. जितने लोगों से बात होती, सब यही कहते कि मामले को रफादफा करा लो, वरना ये वकील तुम्हें अगले जन्मों तक लड़ाएंगे. हम ने फिर भी अपने मन को कड़ा किया. अब जब मैदान-ए-जंग में आ ही गए हैं तो पीठ नहीं दिखाएंगे, चाहे जो हो जाए. कुछ पैसे जाते हैं तो जाएं. पड़ोसी के सामने झुकें, हरगिज नहीं. जो होगा देखा जाएगा. अगले माह की 10 तारीख को तो आना ही था, आ गई. हम कोर्ट में पहुंचे. तलवार साहब बिलकुल मुस्तैद खड़े थे. उन्होंने सूचित किया, ‘‘आप के केस की पूरी तैयारी कर ली है. इस बार जज साहब भी रहेंगे, पता कर लिया है. बस, एक बहस काफी है. आप के भाईसाहब तो बाहर आ ही जाएंगे. उस के बाद आप के पड़ोसी को भी देखेंगे. आप फीस जमा कर दीजिए. मुंशीजी से मिल लीजिए.’’

हम ने मुंशीजी से मुलाकात की. उन्होंने हमें देखते ही हिनहिनाना शुरू कर दिया, ‘‘आप तो वकील साहब के मित्र हैं. इसलिए हम तो चुप ही रहेंगे. दूसरा कोई होता तो उस से लड़ कर लेते. आप जो फीस दे रहे हैं वह तो वकील साहब के लिए है. हम गरीबों के लिए तो कुछ है ही नहीं.’’

हम ने 1 हजार रुपए वकील साहब के लिए व 500 रुपए मुंशीजी को दिए. कुल 1,500 रुपए का बलिदान हो गया. धड़कते हृदय से हम ने 3 नंबर कोर्ट में प्रवेश किया. जज साहब भी आ गए. हमारे केस का नंबर भी आ गया. सरकारी वकील उठा. गला साफ कर के बड़े ही नाटकीय अंदाज में बोला, ‘‘हुजूर, माफ किया जाए. हमारे पास यह केस आज ही पहुंचा है. हम ने इसे पढ़ा नहीं है. अगली तारीख पर पढ़ कर आने का वादा करता हूं.’’

उस के बाद जज साहब ने एक मजाक किया. सब लोग हंसने लगे. हमारी जड़बुद्धि में कुछ नहीं आया. हमारे वकील साहब ने बाहर रुकने को कहा. दूसरे केस देखने लगे. हम रुके रहे. बाहर आते ही वकील साहब बोले, ‘‘यह जब तक खाएगा नहीं, तब तक गाएगा नहीं. बड़ा ही घाघ किस्म का आदमी है. एक नंबर का खाऊ है, खाऊ. आप एक काम कीजिए, उस के लिए भी कुछ दानदक्षिणा छोड़ दीजिए. मुंशीजी समझा देंगे.’’

हमारी चेतना थोड़ी देर के लिए लुप्त सी हो गई. वकील साहब चले गए. हम क्या करते. गरदन फंस गई थी. न निकालते बन रही थी न…लाचार हो कर हम ने वकील साहब की शर्तें पूरी कीं. रोतेबिलखते घर आए. एक सरकारी मास्टर जो तनख्वाह के रुपए पर जीता है उस की दशा का अंदाजा कोई वेतनभोगी ही समझ सकता है. यह तो रही हमारी हालत.

हमारे पास पैसे आते तो थे. वहां तो हम ने यह सीन भी देखा कि फटापुराना, जर्जर मुवक्किल है और वकील साहब उस को हलाल कर रहे हैं. वह रो रहा है, गिड़गिड़ा रहा है, मगर वकील साहब पूरी फीस ले कर ही छोड़ते हैं. बहस हो चाहे नहीं हो.

खैर, अगली तारीख की जानकारी हमें फोन से दी गई. वकील साहब बोले, ‘‘अगले महीने की 5 तारीख को ‘डेट’ है. आप आना चाहें तो आ जाएं. हम आप की पीड़ा समझते हैं लेकिन क्या करें. हम जिस माहौल में जी रहे हैं उस में एक मध्यवर्गीय आदमी की यही पीड़ा है, इसलिए मार्क्स इसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद कहता था. ये साहब माओत्से तुंग का आदर्शवाद है कि…’’

हम ने अपना मोबाइल औफ कर लिया. ये बातें अब हमारी समझ में भी आ गई थीं. जेल में आते तो भाईसाहब का चेहरा देख कर फिर से लड़ने का हौसला आ जाता.

अगली तारीख भी आ ही गई. हम ने जाने का ही निश्चय किया. फीस फिर जमा करनी थी वरना वकील साहब ही बीमार हो जाते. मन को मनाना मुश्किल काम है. सबकुछ ठीकठाक चला. बहस भी हुई. हमारे वकील साहब बोले भी. सरकारी वकील ने पैसे की लाज रखी. चुप रहा. जज साहब बोले, ‘‘केस की डायरी मंगा लीजिए.’’

कुल 5 शब्द बोल कर दूसरा केस देखने लगे. हमारे 1 हजार रुपए फिर बलिवेदी पर चढ़ गए. अब हमारा मन बगावत करने लगा था. हम ने अपने वकील साहब से जानना चाहा कि

ये डायरी क्या बला है. उन्होंने  सविस्तार समझाया और अंत में अत्यंत दुखी मन से बोले,  ‘‘मुंशीजी से समझ लीजिए.’’

इस वाक्य का अर्थ हमारी समझ में आ गया था. हम मुंशीजी की शरण में पहुंचे और बिना कुछ कहे डायरी मंगाने के 1 हजार रुपए रख दिए. अगली तारीख बता दी गई. 2 महीने के बाद,

8 तारीख को. बारबार स्कूल से छुट्टी लेने का मतलब हमारे प्राचार्य ने हमारा नाम उन बांकुरों में शामिल कर लिया जो सरकार से पैसा ले कर अपना काम करते हैं. हम अपनी जगह मजबूर थे, प्राचार्य अपनी जगह. इसी मजबूरी के आलम में बुजुर्गवार ने हमें सलाह दी कि केस वकील नहीं लड़ते, केस लड़ते हैं मुवक्किल. आप किसी पुराने केसबाज से सलाह लीजिए. आप को बाहर निकलने का रास्ता बताएगा.

यों तो उन्होंने भी इस क्षेत्र में काफी नाम कमाया था. अपनी कुल जमीन बेच कर लड़ गए थे. हम ने सोचा गुरु की तलाश में कहीं सारी उम्र न निकल जाए. इसलिए उन्हीं से ज्ञान की याचना की. उन्होंने केस की पूरी कहानी सुनने के बाद बताया कि पड़ोसी से मिलो. अगर वह समझौता करने के लिए तैयार हो जाए तो मामला खत्म. समझौते की कौपी लगेगी. बस हो गई बेल.

हम ने जिज्ञासु छात्र की तरह पूछा कि आखिर हमारा पड़ोसी अपने धर्म का त्याग कर हमारे साथ समझौता क्यों करेगा? उन्होंने गुरुसुलभ ठहाका लगाया और बोले, ‘‘आप को लगता है कि आप का पड़ोसी परेशान नहीं होगा. साहब, उस को भी इसी तरह लूट रहे होंगे. दोनों वकील आपस में मिल गए होंगे. आप को भी मिलने का संदेश दे रहे हैं. ‘कायर मत बन अर्जुन युद्ध कर’ यह संदेश वकील लोग सब को देते हैं. आप लड़ेंगे तभी तो ये बनेंगे. दुनिया से यदि लड़ाईझगड़े बंद हो जाएं तो समझदार लोग कहां जाएंगे.’’

अब हमारी समझ में आ गया कि कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान कुरुक्षेत्र के मैदान में क्यों दिया था. खैर साहब, हम भागते हुए अपने पड़ोसी के पास गए, आखिर वे हमारे चाचा थे.

‘‘चाचाजी, हमें ये वकील लोग लूट लेंगे. आप हम पर दया कीजिए. आप अपना गुस्सा हम पर उतार लीजिए. हमारे सिर पर 400 जूते मार लीजिए. यदि हमारा सिर हिल जाए तो 400 और लगा लीजिए, मगर समझौता कर लीजिए. आप हमारे पिताजी के भाई हैं. हमारे लिए तो पिताजी की तरह ही हैं.’’

चाचाजी पिघल गए. उन्होंने हमारा कंधा सहलाया और बोले, ‘‘चाहता तो मैं भी यही था लेकिन डर था कि तुम लोग नहीं मानोगे. खेतखलिहान अपनी जगह पर हैं. चलो, कल ही समझौता लगा देंगे.’’

समझौता हुआ. उस की कौपी लगी. भाईसाहब बाहर आ गए. हम ने तय किया कि आज के बाद हम कचहरी के नाम से परहेज करेंगे. चार जूते खा कर भी अगर शांति से रह सके तो रहेंगे लेकिन कचहरी से बचेंगे.

मुझे कचहरी से बचाओ: भाग-2

जापानी टौर्च, चीनी खिलौने, नाना प्रकार की घडि़यां, कैमरे और न जाने क्याक्या, कानून की नाक के ऐन नीचे पूरे ठाट से बिक रहे थे. पुलिस प्रशासन के प्रति हमारी श्रद्धा उमड़ी. ‘ऐसे कोउ उदार जग माहीं’? पुलिस यदि इन गरीबों को पकड़ ले तो बेचारे क्या करेंगे? इन की रोजीरोटी का कितना खयाल रखती है, बदले में ये लोग भी तो रखते हैं. परस्पर प्यार और भाईचारा ही तो हमारे देश की पहचान है.

सामान देखते हुए हम भीड़ में जा निकले. गवाहों की खरीदफरोख्त चल रही थी. गवाह 3 हजार रुपए मांग रहा था. खूनी की हैसियत वाला आदमी उसे 1 हजार रुपए देने के लिए तैयार था. ‘इंसानियत’, ‘सामाजिकता’, ‘ईमान’, ‘धर्म’ जैसे शब्दों का प्रयोग दोनों ओर के लोग कर रहे थे. हमारे रुकने का एक कारण यह भी था. पुलिस के लोग भी थे. दोनों पक्ष के लोग खूब मुसकरा रहे थे. बड़ा ही सौहार्दपूर्ण वातावरण था. मामला जब 1500 में निबट गया तो हम वहां से खिसक लिए.

आगे पेशेवर जमानतदारों का बाजार था. 3 लोग मजे से प्रैक्टिस पर थे. 5 हजार की जमानत के 500, 10 हजार की जमानत के 1 हजार. हमारा मन श्रद्धा से झुक गया. मान लो किसी का जानने वाला इस शहर में नहीं हो तो वह गवाह और जमानतदार कहां से लाएगा? अब कम से कम इस बात की गारंटी तो है कि रुपए हों तो किसी चीज की कमी नहीं है. ‘सकल पदारथ है जग माहीं…’ तुलसी बाबा को प्रणाम कर के हम आगे बढ़े.

एक जमानतदार से हम ने गुजारिश की, ‘‘कमाई हो जाती है?’’

बदले में बेचारे ने मुंह लटका कर कहा, ‘‘कहां साहब, बस गुजारा चल जाता है. मेरे चाचा की दिल्ली में प्रैक्टिस है. बहुत अच्छी कमाई होती है. हम तो अपनी खेतीकिसानी के चक्कर में फंसे हैं वरना अच्छी प्रैक्टिस के लिए तो महानगरों में ही जाना अच्छा है. वहां बड़ेबड़े लोग आते हैं, अच्छी कमाई हो जाती है.’’

‘‘लेकिन अगर कोई बदमाश भाग गया तो पुलिस वाले आप को पकड़ेंगे.’’

‘‘कहां से पकड़ेंगे? हमारे जो राशनकार्ड और मतदाता पहचानपत्र हैं, सब नकली हैं. ये जो जमीन के कागजात आप देख रहे हैं, ऐसी जगह कहां है, हमें नहीं पता. सारी चीजें यहीं बन जाती हैं कोर्ट कैंपस में ही.’’

हम उस के ज्ञान की सीमा के आगे नतमस्तक हुए. भारत अनेकता में एकता का देश क्यों कहलाता है इस का एक प्रत्यक्ष उदाहरण मिला. इतनी लीलाओं के चश्मदीद गवाह बनने के कारण 2 बज गए. तब तक हम 8 कप चाय और

10 समोसे खा चुके थे. चाय और समोसों की विशेषताओं का वर्णन करें तो अलग से एक पोथा भर जाएगा. 3 बजे हमारा पतन हो गया. हम चाय वाले की बैंच पर ही निढाल से जा गिरे. चाय वाले ने हमें देखा और एक मुसकराहट फेंकी.

4 बजे हमारे अंदर नई चेतना जगी. चेतना को ले कर चैतन्य होते कि अचानक शोर मचा.

‘‘भाग गया, भाग गया.’’

पुलिस वाले दौड़ने लगे. लोग भागने लगे. हमारा चायवाला इन परिस्थितियों में भी निश्छल भाव से मुसकरा रहा था. हम ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक इस अफरातफरी का कारण जानना चाहा उस ने तो बड़े आत्मविश्वास से सूचित किया.

‘‘एक कैदी भाग गया है.’’

थोड़ी देर के बाद उस ने आकाशवाणी सी की, ‘‘यह काम उस के वकील का है. वकीलों का काम ही यही है. अपने क्लाइंट की हर संभव मदद करते हैं. उन के लिए असंभव कुछ है भी नहीं. उन की बड़ी धाक है इस कचहरी में.’’

हम पुलकित हुए. कितने महानमहान वकील हैं इस दुनिया में. अंदर वालों की भी सेवा और बाहर वालों की भी. ‘मेरा भारत महान’ ऐसे ही नहीं कहते. अभी हमारा चिंतन आगे बढ़ता कि तलवार साहब आते दिखे. आते ही बोले, ‘‘आज आप का काम नहीं हो सकेगा. आप कल आइए.’’

हम ने सहमते हुए निवेदन किया, ‘‘जी, मैं रोज नहीं आ सकता. विद्यालय से और छुट्टी लेना इतना आसान नहीं है.’’

‘‘ठीक है, फिर आप मुंशीजी से समझ लीजिए.’’

हम मुंशीजी की शरण में पहुंचे. मुंशी नामधारी जीव कचहरी का आदिम प्राणी है. जब कचहरी नहीं थी तब भी मुंशी था. कचहरी नहीं रहेगी तब भी मुंशी रहेगा. वकीलों के प्राण इसी तोतारूपी मुंशी में कैद रहते हैं. यह एक ऐसा जीव है जिस के पास सोचने की क्षमता तो बहुत होती है मगर समझने की नहीं. वह केवल अपनी ही बात समझ सकता है, नहीं तो पैसे की बात समझता है.

हम ने उस से समझने की कोशिश की. समझातेसमझाते उस ने 500 रुपए रखवा लिए. अब हम जिंदगी की नाना प्रकार की चिंताओं से मुक्त हो गए. हमारा एक ही काम था. मुंशीजी को फोन करना. वे कभी कल नहीं कहते, केवल आज कहते. हमारी उन की अच्छी जानपहचान बन गई लेकिन एफआईआर की नकल नहीं निकली.

आखिर 1 मास के उपरांत हमें नकल मिल गई. हम युरेकायुरेका कह कर थोड़ा नाचे. शाम को तलवार साहब का फोन आया, ‘‘कहां हैं साहब, आप के दर्शन ही नहीं हो रहे. आइए, चाय पीते हैं.’’

हम उन के घर पहुंचे. इलायची वाली चाय पेश की गई. हमारी आवभगत हो रही थी लेकिन पता नहीं क्यों हमारे दिल की धड़कन थम ही नहीं रही थी. हम चौकन्ने हो रहे थे. आखिरकार, इंतजार खत्म हुआ. वकील साहब बोले, ‘‘आप का केस पढ़ लिया है. ऐसा तगड़ा डिफैंस तैयार करेंगे कि भाईसाहब एक ही बहस में बाहर आ जाएंगे. साहब, यह भी कोई बात हुई कि जो आदमी सीन में मौजूद ही नहीं हो उस के खिलाफ केस दायर हो जाए. हम तो दारोगा को भी घसीटेंगे. कब तक चुप रहेंगे हम लोग?’’

हमारे अंदर जिस कुंठा ने जन्म ले लिया था उस का अंत हो गया. एक नया जोश भर गया.

‘‘हम तो कहते हैं कि आप के पड़ोसी को भी किसी न किसी मामले में यहां घसीट लाएंगे. आखिर उसे भी तो सबक मिलना चाहिए कि आप क्या चीज हैं. चला है आप से टकराने. उसे पता नहीं है कि आप क्या चीज हैं. हम जो आप के साथ हैं. इस बार बच्चू को ऐसा सबक सिखा दीजिए कि फिर कभी आप की ओर देखने का साहस ही न करे. कहते हैं न कि क्षमा शोभती उस भुजंग को जिस के पास गरल हो.’’

आगे पढें- अपने पड़ोसी के विनाश के सामने तो मेरे लिए इस से…

मुझे कचहरी से बचाओ: भाग-1

घरेलू झगड़ा कचहरी तक पहुंचा तो मास्टरजी भी तमाम जमापूंजी ले कर चल दिए मुकदमेबाजी करने ‘काले कोट’ वालों की दुनिया में. लेकिन मास्टरजी को कहां पता था कि यहां तो बिल्लियों की लड़ाई में बंदरों की मौज मनती है. फिलहाल, मास्टरजी की मनोदशा यह है कि चार जूते मार लो लेकिन कम्बख्त कचहरी से बचा लो.

अनेक धर्मों की तरह पड़ोसी का भी अपना एक धर्म है. जागरूक पड़ोसी वे कहलाते हैं जो न तो खुद चैन से रहते हैं न पड़ोसी को चैन से रहने देते हैं. संयोग से हमारे पड़ोसी में ये सारे गुण इफरात से मौजूद हैं. हमारी नजर में वे आदर्श पड़ोसी हैं, उन की नजर में हम.

एक बार जमीनजायदाद को ले कर हम दोनों के बीच लाठियां तन गईं. हम दूसरों की लात सह सकते हैं लेकिन पड़ोसी की बात नहीं. हमारे भाईसाहब बचपन से ही अच्छे निशानेबाज रहे हैं, सो उन्होंने एकदो लाठियां जड़ दीं. मामला थाने में गया. थानेदार साहब ने गीता पढ़ी थी. उन को पता था कि जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा है, आगे और भी अच्छा होगा. उन्होंने हमें बुला कर समझाया, ‘‘देखिए मास्टर साहब, आप भले आदमी हैं, इसलिए कह रहा हूं कि मामले को रफादफा कर लीजिए. कोर्टकचहरी का चक्कर बहुत खराब होता है. आप अपने भाईसाहब को कहीं भी छिपाएंगे, पुलिस खोज ही लेगी. आप तो जानते ही हैं कि कानून के हाथ कितने लंबे होते हैं,’’ उन्होंने हाथ को फैला कर दिखाया. हमें यकीन हो गया कि कानून के हाथ दारोगाजी के हाथ की तरह ही लंबे होते होंगे. हम ने अपनी मजबूरी और ईमानदारी एकसाथ दिखाने की कोशिश की.

‘‘सर, जिस दिन मारपीट हुई उस दिन हमारे भाईसाहब घर पर नहीं थे. उन का कोई हाथ नहीं है.’’

‘‘देखिए साहब, यह बात तो हम अच्छी तरह जानते हैं कि उन का हाथ नहीं है मगर नाम दर्ज है. इसलिए गिरफ्तार करना ही पड़ेगा. जब हम गिरफ्तार करेंगे तो जेल भी भेजना पड़ेगा. जेल की बात तो आप जानते ही हैं. एक बार गए तो चोरउचक्कों की सोहबत. गीता में कहा गया है कि कायर मत बन अर्जुन. जो देना है लेदे कर मामला निबटा लेने में ही भलाई है, बाकी आप की मरजी.’’

शांतिवार्त्ताएं होने लगीं. मोलतोल होने लगे लेकिन मामला सुलझा नहीं. दारोगाजी के पास गीता का ज्ञान था. हर काम को प्रकृति की इच्छा मानते थे. कर्तव्य कर रहे थे लेकिन फल की इच्छा नहीं रखते थे. उन का फल हमारे बूते से बाहर था.

आखिरकार हमारे भाईसाहब जेल की शोभा बढ़ाने के लिए प्रस्थान कर गए. अब शुरू हुआ नाटक का दूसरा भाग. ‘जेल से बेल’ शीर्षक से.

मेरे एक मित्र थे, बी के तलवार. वकालत उन का पेशा था. पार्टटाइम कवि भी थे. कविता से पब्लिक में घुसने का मौका मिल जाता था. वे अपने को प्रगतिशील भी मानते थे. मानते ही नहीं थे बल्कि समाज सुधार के दावे भी करते थे. हम से जब भी मिलते, इतना जरूर कहते कि मास्टर ही सच्चे समाजसुधारक होते हैं. आप को नमन करने का मन करता है. हम ने सोचा, इतना प्रगतिशील कवि है तो वकील भी उतना ‘डाकू’ नहीं होगा.

एक दिन सुबहसुबह हम उन के आवास पर जा पहुंचे. उन्होंने बड़ा भव्य स्वागत किया. बातों से इतनी आवभगत की कि मन खुश हो गया. अंत में हम ने काम की बात की. उन्होंने सपाट लहजे में कहा, ‘‘कचहरी आ जाइएगा. एफआईआर की नकल निकालनी होगी. उस का अध्ययन करने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है. मेरा चैंबर पता है न आप को. जिला जज के सामने वाले हौल में.’’

हम ने फीस के बारे में पूछना मुनासिब नहीं समझा. अपने मित्र हैं, जो लेंगे देखा जाएगा.

हम कचहरी में पहुंचे. चारों ओर काले कोट वालों का साम्राज्य, या तो फटेपुराने कपड़ों में मुवक्किल या वरदी में पुलिस वाले. कारें, साइकिलें, मोटर वाली भी और बिना मोटर वाली भी.

नाना प्रकार के वाहन और नाना प्रकार के लोग. हम ने भी अभिमन्यु वाली वीरता से भीड़ को चीरना शुरू किया और पूछतेपाछते जा पहुंचे तलवार साहब के टेबल तक. अपने जूनियरों से घिरे वे भगवान विष्णु की तरह मुसकरा रहे थे. हमें देख कर एकदम से ठहाके लगा कर हंसे, बोले, ‘‘ऐसी जगह है मास्टर साहब कि यहां राजा और रंक, शरीफ और बदमाश, अनपढ़ और पढ़ेलिखे सब आते हैं. यह मंदिर है न्याय का. आप को भी न्याय मिलेगा. बस, जरा प्रसाद चढ़ाना पड़ता है.’’

फिर ठहाका. हम ने भी मुसकराने की कोशिश की. असफल रहे. पहली बार कचहरी में जाने का मौका मिला था. हम अपने को नर्वस महसूस कर रहे थे. यह भी डर था कि कोई जानपहचान का आदमी देख न ले. उन्होंने हमारी अवस्था का अंदाजा लगाया और अपने एक जूनियर से बोले, ‘‘देखो, ये हमारे मित्र हैं. इन का केस नंबर ले लो और जा कर केस की नकल ले आओ. ये कहीं नहीं जाएंगे, बुद्धिजीवी आदमी हैं. तुम जाओ. सिंहजी, आप इस को 500 रुपए दे दीजिए. यहां तो चारों ओर लूट मची हुई है. कहांकहां से रक्षा होगी.’’

हम ने भी साथ में चलने की इल्तिजा की और साथ हो लिए. रिकौर्ड रूम का किरानी, जो शायद पिछले कुंभ के समय आखिरी बार मुसकराया था, बहुत व्यस्त था. सरकार को गालियां दिए जा रहा था जिस की वजह से एक दिन का चैन भी नसीब नहीं होता. जूनियर महोदय की कृपा से थोड़ा मुसकराया लेकिन जल्दी ही गंभीर हो कर बोला, ‘‘शाम के 4 बजे आइए.’’

शाम के 4 बजे का अर्थ हमारा नादान हृदय समझ नहीं सका. हम कचहरी के अहाते में ही आहत से घूमघूम कर समय काटने लगे. जल्दी ही हमारी समझ में आने लगा कि 4 किस समय बजते हैं. समय काटना इतना आसान काम नहीं है. यह भी एक कला है जो दूसरी कलाओं की तरह सब को नहीं आती. दुनिया के सारे निठल्लों को नमस्कार कर के हम ने भालू का नाच देखने का मन बनाया.

मदारी की कला देख कर हमें तसल्ली हुई कि देश से अभी हाथ की सफाई खत्म नहीं हुई है. मदारी जब भालू को ले कर चला गया तो हम उदास मन से सड़क के किनारे बिक रहे चाइनीज सामानों की ओर मुखातिब हुए.

आगे पढ़ें- पुलिस प्रशासन के प्रति हमारी श्रद्धा उमड़ी…

मुझे कचहरी से बचाओ

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के भारत दौरे की अहम बातें

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने नई दिल्ली के हैदराबद हाउस में बैठक से पहले कहा कि उनका भारत में जोरदार और भव्य स्वागत किया गया. उन्होंने आगे कहा कि गुजरात के मोटेरा स्टेडियम में जब-जब वो मोदी का नाम ले रहे थे तब-तब उन्हें लोगों का उत्साह देखने को मिलता और  उन्होंने कहा कि भारत के लोग पीएम मोदी से बहुत प्यार करते हैं.

ट्रंप ने अपने भाषण में कहा कि पाकिस्तान से उनके संबंध अच्छे हैं और पाकिस्तान की सरकार के साथ मिलकर आतंकवाद सक्रिय चरमपंथियों को जड़ से मिटाने में मदद करेंगे. ट्रंप ने इसमें भारत की भूमिका का भी जिक्र किया और कहा कि भारत को बहुत बड़ी जिम्मेदारी निभानी होगी इस क्षेत्र में. देश के बेहतर भविष्य के लिए भारत को इस क्षेत्र की समस्या का समाधान भी निकालना पड़ेगा.

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नमस्ते ट्रंप बनाम नमस्ते भारत!

ट्रंप मेलानिया कहां-कहां गए?

सबसे पहले ट्रंप अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम गए जहां उनका भव्य स्वागत किया गया. 20 साल में पहली बार ऐसा हुआ था कि कोई अमेरिकी राषट्रपति ताजमहल के दीदार के लिए आया. ट्रंप ने अपने परिवार के साथ आगरा जाकर ताजमहल का दीदार किया, फिर दिल्ली आकर द्विपक्षीय संबंधो पर व्यापक बातचीत भी की.

ट्रंप को राष्ट्रपति भवन में 21 तोपों की सलामी दी गई और गार्ड ऑफ ऑनर से सम्मानित भी किया गया. जिसके बाद उन्होंने राजघाट जाकर गांधी जी को श्रद्धांजलि भी दी. साथ ही विजिटर बुक में संदेश लिखा और फिर हैदाराबाद हाउस जाकर वहां प्रधानमंत्री मोदी से कई मसलों पर अहम बातचीत भी की.

मेलानिया दिल्ली के एक सरकारी स्कूल सर्वोदय को-एड सीनियर सेकेंडर स्कूल में पहुंची और वहां पर स्कूल के हैप्पीनेस क्लास में शामिल हुईं. बच्चों ने ताली बजाकर मेलानिया का स्वागत  किया  साथ ही बच्चों ने मेलानिया की आरती भी उतारी और तिलक भी लगाया. मेलानिया भी बच्चों से मिलकर काफी खुश नजर आई. उन्होंने बच्चों से हाथ मिलाया उनसे बातें की.

स्कूल में मिलेनिया के लिए छोटे- छोटे बच्चों ने कल्चरल प्रोग्राम भी किया और फर्स्ट लेडी ने इसे खूब एन्जॉय किया. मेलानिया ने पूरे स्कूल को एक छोटी सी स्पीच भी दी ये सब करते हुए वो काफी खुश नज़र आ रही थीं.

भारत आएंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ड्रंप, किसको कितना फायदा ?

सोने-चांदी के बर्तनों में परोसा गया ट्रंप को खाना

ट्रंप के खाने को लेकर भारत में अच्छी खासी तैयारी की गई है सारी चीजों का ध्यान रखा गया है. सबसे पहले तो ये जाने की सोने-चांदी के बर्तनों में ट्रंप को खाना परोसा गया. अमेरिकी मसाले के साथ बनाए गए भारतीय डिश में  टेस्ट का  भरपूर ख्याल रखा गया और जिसमें  ढोकला,समोसे,ग्रीन टी,लेमन टी,वेज बर्गर ये सारी चीजें परोसी गईं.

कुल मिलाकर उनके भोजन का पूरा ख्याल रखा गया था लेकिन शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा गया था. खबरों के मुताबिक ट्रंप जहां भी जाते हैं वहां पर उनको बीफ बहुत पसंद है लेकिन भारत दौरे में ये बीफ को उनके मेन्यू से बाहर रखा गया है. उनके खाने की तैयारी काफी दिन पहले से हो रही थी.

हम इस तमाशे का हिस्सा क्यों हैं?

ऋतु ही बौराने की है. आम से ज्यादा खास बौरा रहे हैं. फिर वे तो अमेरिका से खासतौर से बौराने आए हैं. अहोभाग्य इस आर्यावर्त के , लग ऐसा रहा है मानो सुदामा के घर कृष्ण पधारे हैं. सुदामा ने चावल की पोटली नहीं खोली बल्कि जुमेटो पर बिरियानी आर्डर कर दी है. उनके आने की आहट के साथ ही गरीबखाना सजने लगा था.सुदामा बीबी के गहने लाला के पास गिरवी रख देगा लेकिन देश की नाक नहीं कटने देगा. वे कृष्ण के ही नहीं बल्कि पूरे देश के दोस्त हैं पर कैसे हैं यह बौराये हुये लोगों को नहीं मालूम.जार्ज पंचम के वक्त में भी किसी को नहीं मालूम था बस ड्यूटी थी कि जैकारा करना है सो करते रहे थे आज भी नमस्ते नमस्ते कर रहे हैं.

उनके आने के पहले ही गरीबी दीवारों में चुनवा दी गई थी , गरीब दूर कहीं हांक दिये गए थे. ठीक वैसे ही जैसे किसी निर्धन के घर कभी कोई अमीर रिश्तेदार आता है तो नंग धड़ंग बच्चों को खेलने भेज दिया जाता है. गृह स्वामिनी ट्रंक में से शादी के वक्त मायके से मिली सलमा सितारों बाली साड़ी निकाल कर पहन लेती है लेकिन गरीबी उसके रूखे सूखे चेहरे से टपक ही पड़ती है. अमीर रिश्तेदार एक नजर में ही ताड़ जाता है कि इनकी जीडीपी ज्यों की त्यों गिरी पड़ी है. पड़ोसी से पैसे ही उधार नहीं लिए जाते बल्कि क्राकरी भी उधार ली जाती है.

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रईस रिश्तेदार अपने आप में शोषक और सूदखोर होता है.वह खाता कम है नाश्ते का निरीक्षण यह सोचते ज्यादा करता है कि इनकी औकात मूँगफली के दानों की नहीं फिर ये साले काजू कहाँ से ले आए वे भी भुने हुये और मसालेदार. फिर वह समझ जाता है कि गरीबी ढकने के चक्कर में मेजबान अनजाने में उसे और उजागर ही कर रहा है. उसे अपने वैभव और संपन्नता पर गर्व हो आता है इसी भावुकता में वह जानबूझकर मेजबान को गले लगा बैठता है. फिर यह पीढ़ियों तक सुनाया जाने बाला किस्सा बन जाता है कि देखो बड़े आदमी हैं पर गुरूर इनमें नाम का भी नहीं.

मेहमान का स्वागत हर्ज की बात नहीं हर्ज की बात स्वागत का खुशामद में बदल जाना है.इतनी हीनता पहले कभी नहीं देखी गई कि 100 करोड़ से भी ज्यादा की राशि हमने अपनी हीनता ढकने में फूँक दी फिर भी उसे ढक नहीं पाये. लोकतान्त्रिक विपन्नता उजागर करने का इससे बेहतर तरीका कोई और हो भी नहीं सकता. हम तब भी भिक्षुक थे और आज भी हैं बस मांगने का तरीका बदल गया है. अब हम उजागर कर के मांगना सीख गए हैं अगला भी यही चाहता है कि झुकाकर नहीं सर उठाकर मांगना सीखो जिससे हमें भी देने में आनंद आए और वापसी की आस भी बंधी रहे.

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हम सुदामा से कर्ण बनने के चक्कर में कंगाल होते जा रहे हैं और सुनने यह मिल रहा है कि देखो दुनिया उनसे मिलने जाती है और वे हमसे खुद मिलने आए हैं यह एक महान उपलब्धि है इस पर भी गर्व करो. करने अब गर्व ही रह गया है जिसे करने कोई कर नहीं लगता उल्टे अपने धर्म और संस्कृति पर मिथ्या अभिमान हो आता है कि भूखे नंगे रहकर भी ( ही ) हम पूज्यनीय हैं. इस भव्य चकाचौंध में हमने प्रजा होने का हक अदा कर दिया दो दिन हमने महंगाई और बेरोजगारी पर नियमित संगोष्ठी नहीं की. इस इवैंट के आगे शाहीनबाग तक भुला बैठे. हम भेड़ों की तरह अहमदाबाद , आगरा और दिल्ली में हाथ बांधे नमस्ते नमस्ते करते रहे.

हमने यह पूछने की जुर्रत नहीं की कि हम इस तमाशे का हिस्सा क्यों बने हैं.

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करण सिंह ग्रोवर ने खास अंदाज में मनाया जन्मदिन, लांच की नई वेबसाइट और यूट्यूब चैनल

करण सिंह ग्रोवर(Karan Singh Grover) ने हाल ही में मालदीव्स में अपना जन्मदिन मनाया. वो एक अच्छे अभिनेता तो है ही लेकिन साथ ही करण एक बहुत अच्छे पेंटर भी हैं. हाल ही में उन्होंने एक आर्टिस्ट के तौर पर ऑफिशियली अपना डेब्यू किया. अपने जन्मदिन के खास मौके पर करण सिंह ग्रोवर ने अपना आर्ट वेबसाइट Starinfinityart.com और यूट्यूब चैनल ‘Starinfinityart’ को लांच किया.

ये वेबसाइट उनके आर्ट वर्क के लिए होगा जिसपर लोग उनके द्वारा बनाई गई आर्ट को देख और खरीद सकेंगे. साथ ही साथ वो ये भी समझ पाएंगे कि उनका कौन्सेप्ट क्या है और वो किसपर आधारित हैं.

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दिलचस्प बात यह है कि, कलाकार की मौजूदा और आने वाला आर्ट अंतर-आयामी प्राणियों और अंतरिक्ष यात्रा के पड़ावों पर आधारित होगा| यह सभी जीवित प्राणियों के लिए ब्रह्मांड द्वारा दिए गए प्रतीकों / संकेतों को भी व्यक्त करता है और उन सभी विभिन्न आयामों को समझने और स्वीकार करने के बारे में है जिसे हम यूं नहीं समझ पाते.

करण कहते हैं, “मुझे अक्सर कहा जाता है कि मैं शो या फिल्में करते समय नियमित रूप से उम्र में ढल रहा हूं और मुझसे पूछा जाता है कि मैं कहां गायब हूं. इसकी वजह ये है कि मैं पेंट करता हूं. मेरे सिर के अंदर कई दुनिया हैं जो कभी-कभी मुझे कुछ और करने से रोक देती हैं इसलिए उन भावनाओं को कैनवास पर उतारने की ज़रूरत महसूस होती है. जब तक मेरी अभिव्यक्ति पूरी नहीं होती है, मैं किसी और चीज पर फोकस नहीं कर पाता| और अब, मैं अपना काम दिखाने के लिए तैयार हूं. वेबसाइट और चैनल मेरे जन्मदिन पर चैनल लौन्च हो रहे हैं. आप पूछेंगे – यह सिर्फ एक कलाकार के रूप में मेरा जन्म है. मुझे कई टुकड़ों को जोड़ना है| जल्द ही एक्सिबिशन होने वाली है. ”

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बेटी के ग्रेंड वेलकम के लिए शिल्पा शेट्टी ने रखी शानदार पार्टी, देखें Photos

बौलीवुड एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी कुंद्रा (Shilpa shetty kundra ) हाल ही में दूसरी बार मां बनी हैं. शिल्पा ने इस बात का खुलासा शिवरात्री के दिन सोशल मीडिया के जरिए किया. हालांकि बेटी का जन्म 15 फरवरी को हुआ था. घर में नन्ही परी के आने के बाद राज और शिल्पा बेहद खुश हैं. इन्होंने अपनी बेटी का नाम समीशा शेट्टी कुंद्रा(Samisha Shetty Kundra) रखा है.

बेटी के जन्म के बाद शिल्पा ने अपने घर पर पार्टी रखी थी जिसमें उनके करीब दोस्त और रिश्तेदार मौजूद थें. शिल्पा ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया बेटी का इंतजार पिछले पांच साल से था. बेटी से पहले शिल्पा शेट्टी को एक बेटा वियान राज कुंद्रा(Viyan Raj Kundra) है.

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पांच साल से शिल्पा को था बेटी का इंतजार…

बता दें, शिल्पा शेट्टी सरोगेसी से मां बनी हैं. फोटो में आप देख सकते हैं शिल्पा का पूरा घर बैलून से सजा हुआ है. शिल्पा ने राज के साथ मिलकर केक काटकर पार्टी की शुरुआत किया, दोनों के चेहरे पर बेटी के आने की खुशी साफ नजर आ रही है.

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शिल्पा और राज (Raj Kundra)की शादी साल 2009 में हुई थी. साल 2012 में शिल्पा ने बेटे वियान को जन्म दिया. वियान के आने के बाद उन्हें अपने परिवार में एक बेटी चाहिए थी. जिसके लिए वह लगातार कोशिश कर रहे थें.

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शिल्पा को जब पता चला वह दूसरी बार मां बनने वाली है इससे पहले वह दो फिल्म ‘निकम्मा’ और ‘हंगामा’ को शाइन कर चुकी थीं. वहीं इस बात को जानने के बाद शिल्पा के मैनेजर ने सभी प्रोजेक्ट्स को टाइम पर खत्म करवाया जिससे शिल्पा ने अपने मैनेजर का धन्यवाद भी किया.

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