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#lockdown: लौक डान में काम आई घर पर उगाई सब्जियां

कोरोनावायरस के संक्रमण से बचने के लिए 21 दिन के देश व्यापी लौक डाउन ने जन जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है. शहरों में रहने वाले लोगों को दूध, सब्जी,फल भी नहीं मिल पा रहे हैं. गांव कस्बों में इन चीजों का असर थोड़ा कम ही दिखा है. इसका कारण गांव और कस्बों में खेती किसानी के कामों के साथ के साथ पशुपालन और सब्जियों की खेती का होना है.हमारे देश के गांवों में खेती ही एक मात्र आमदनी का जरिया है. गांवों में रहने वाले छोटी जोत के किसान सब्जी भाजी उगाकर अतिरिक्त आमदनी हासिल कर लेते हैं.

जब देश के शहरी इलाकों में जरूरत की बस्तुओं की हाय तौबा मची है,तो गांव कस्बों के लोगों को आसानी से ताजी सब्जी भाजी खाने को मिल रही है. गांवों में भी अब खेती करने वाले किसान परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई लिखाई के लिए शहरों में रहने लगे हैं. यैसे लोग अपने खेतीबाड़ी के अनुभवों का लाभ उठाकर अपने रहवासी घर के आसपास खाली जगह में सब्जी उगाकर अपनी आमदनी का खर्च तो कम कर ही लेते हैं और ताजी सब्जियों का स्वाद भी उठा पाते हैं. यदि खाली जगह उपलब्ध नहीं हो तो छत पर टेरिफ गार्डन बनाकर सब्जियां उगा सकते हैं.

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गाडरवारा की हाइवे सिटी में रहने वाले शिक्षक सुरेन्द्र पटेल ने अपने घर के बाजू में पड़ी खाली जगह  पर क्यारियां में  भटा, टमाटर, पालक, मिर्ची, धनिया उगाये हैं. वे बताते हैं कि सुबह-शाम इन सब्जी की क्यारियों की देखभाल करते हैं . लाक डाउन के समय जब घर से बाहर नहीं निकलना मुश्किल हो रहा है, तब यही ताजी और हरी सब्जियां खाकर वे अपने परिवार की सेहत बढ़ा रहे हैं.

जरजोला रोड नरसिंहपुर में रहने वाले बाबूलाल पटेल का कहना है कि वे भी अपने गांव में घर के बाड़े में करेला, लौकी, तोरैया, के साथ पालक, मैथी और धना पत्तों की सब्जी उगाते हैं. सीजन के हिसाब से वे साल के बारह महिने अपने घर परिवार के लिए सब्जियां उगाते हैं, सब्जियों की निंदाई, गुड़ाई और खाद पानी देने के लिए परिवार के सदस्यों की मदद भी उन्हें मिलती है. बरमान कला में रहने बाले लक्ष्मण लोधी बताते हैं कि वे अपने घर के आसपास की अनूपयोगी जगह पर आलू,टमाटर, पालक, मैथी, अदरक-लहसुन को उगाकर अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करते हैं. लक्ष्मण बताते हैं कि वे कभी भी बाजार से सब्जियां नहीं खरीदते.सब्जियों के अलावा घर पर ही पपीता, नींबू और अमरूद के फलदाई पेड़ भी लगाये हैं.

नर्मदा नगर करेली में रहने वाली प्राइमरी स्कूल की टीचर बताती हैं कि उन्होंने भी अपने घर के पीछे की खाली जगह पर टमाटर के पच्चीस पौधे लगाए हैं, जो पिछले तीन माह से फल दे रहे हैं.  बागवानी के इस शौक में उनके पति भी उनका पूरा साथ देते हैं. साईंखेड़ा के दीपक बसेडिया ने अपनी छत पर टमाटर बरबटी , सेमफली के साथ मिर्ची के पौधे लगा रखे हैं, जिनसे हर दिन उनके परिवार को ताजा टमाटरों से बनी सब्जी के अलावा चटनी भी खाने को मिलती है. दीपक के पिता पेशे से डाक्टर महेन्द्र बसेडिया कहते हैं कि पूरी तरह से जैविक खाद का उपयोग कर छत पर गार्डनिंग करने का यह शौक लौक डाउन में वरदान साबित हुआ है.

घर सब्जी भाजी और फल उगाने वाले जानकारों की मानें तो बागवानी का यह शौक घर परिवार की सेहत बनाने के अलावा परिवार की आमदनी के एक हिस्से की बचत भी करता है, जो हम बाजार से सब्जियां खरीदने में  खर्च करते हैं.

भाजपा के 40 साल: ताकत से उपजती तानाशाही

40 साल के सफर में भाजपा ने सत्ता जरूर कब्जा करके अपनी ताकत  को भले ही बढ़ा लिया हो पर उसने अपने “चाल चरित्र और चिंतन” और ” पार्टी विद डिफरेंट’ की पहचान खो दी है. पार्टी का एजेंडा पूरी तरह से धार्मिक और तानाशाही हो गया है. पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो कर हाइकमान युग शुरू हो गया है.  जिस देश को कॅरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए वैक्सीन बनाने का काम करना चाहिए था वो देश कॅरोना को भगाने के लिए थाली, ताली और दीयों की रोशनी का सहारा ले रहा है.

40 साल पहले 6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ था.जनता पार्टी से पहले भाजपा जनसंघ के नाम से जानी जाती थी.

भारतीय जनता पार्टी के गठन में अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, विजयराजे सिंधिया और सिकंदर बख्त जैसे नेताओ का प्रमुख हाथ था.

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1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूरे भारत मे केवल 2 लोकसभा सीटो पर जीत हासिल हुई थी.अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में भाजपा ने आगे बढ़ना शुरू किया.इस दौरान हिन्दूवादी नेता के रूप में लालकृष्ण आडवाणी का देश मे उदय होना शुरू हुआ.

राम मंदिर से आगे बढ़ी भाजपा

देश मे अपना राजनीतिक असर बढ़ाने के लिए भाजपा ने अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया. राम मंदिर आंदोलन की कमान भाजपा में लाल कृष्ण आडवाणी ने संभाली और सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकाली जिससे भजपा को नई ताकत मिली और तब 1989 में भाजपा के समर्थन से केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी. इसके बाद भाजपा का विजय रथ आगे बढ़ने लगा. 1996 में 13 दिन और 1998 में 13 माह की भाजपा सरकार बनी. 1999 में भजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में सरकार बनी और 5 साल राज किया.

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अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी युग तक बीजेपी ने अपने 40 साल के संघर्ष में तमाम तरह के उतार चढ़ाव से गुजरते हुए शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है. आज केंद्र से लेकर 18 राज्यों में अपनी या गठबंधन की सरकार है और पार्टी के 303 लोकसभा सांसद हैं.

मोदी युग मे बढ़ी ताकत और तानाशाही

2013 में भाजपा में मोदी युग की शुरुआत हुई. बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव के लिए पीएम उम्मीदवार चुना.2014 में भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत का आंकड़ा पार किया और बहुमत वाली सरकार बनाई.

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री और अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष बनने के साथ ही भाजपा में अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर के युग की समाप्ति हो गई. इसके साथ ही साथ भाजपा में आन्तरिक लोकतंत्र हाशिये पर चला गया. जिस “चाल चरित्र और चिंतन” की बात करने वाली भाजपा दूसरे राजनीतिक दलों से खुद को अलग मानती थी वो पहचान खो गई.

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अब भाजपा में कॉंग्रेस जैसा हाई कमान होने लगा। पार्टी के सारे फैसले हाईकमान स्तर पर लिए जाने लगे. असल मायनो में पार्टी ”मोदी युग” चलने लगी. पार्टी के सभी तौर तरीके बदलने लगें.

संघ का एजेंडा और ताकत की कमान

प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने 2014 से 2019 तक अपना पहला कार्यभार पूरा किया 2019 के लोकसभा चुनाव में वो जायद ताकत के साथ चुनाव जीत कर आये तो जनसंघ के पुराने मुद्दों को देश पर लागू करने लगें.

कश्मीर में 370 हटाने और तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने तक फैसला मोदी सरकार में हुआ है.

नरेन्द्र मोदी जब दूसरी बार प्रधानमंत्री है तो अपने करीबी  अमित शाह गृहमंत्री की जिम्मेदारी दे दी. एक तरह से भाजपा में ”मोदी शाह” युग की शुरुआत हो गई.पूरी पार्टी दो नेताओ के चारों तरफ घूमने लगी.

समाज मे बढ़ी धार्मिक दूरियां

राम मंदिर के निर्माण का अदालत से रास्ता साफ हुआ तो भाजपा ने भव्य राममंदिर बनाने की राजनीति के सहारे हिंदुत्व को एकजुट करने का काम किया और पार्टी नागरिकता कानून के सहारे मुस्लिम विरोध करने वालो को हवा देने लगी. वोट के धार्मिक धुर्वीकरण से भले जी राजनीति को लाभ मिला हो पर समाज का नुकसान हुआ. हिंदुत्व के प्रचार से देश मे आपसी भेदभाव बढ़ने लगा। देश के विकास का एजेंडा दरकिनार कर दिया गया.

देश की आर्थिक हालात बद से बद्दतर हो गई है.रही सही कसर कोरोना के विश्वव्यापी संकट ने बढ़ा दिया है. इससे निपटने के लिए सरकार के पास किसी तरह के साधन नही है इस कारण देश मे लॉक डाउन का सहारा लिया जा रहा है. जिससे देश ले आर्थिक हालात बेहद खराब हो रहे है। इनसे उबर पाना मुश्किल चुनोती है.

Lockdown: हॉलीवुड सितारों की तरह बॉलीवुड एक्टर्स भी सुना रहे बच्चों की कहानियां 

मुंबई लॉकडाउन की वजह से सीमाओं में रहने को विवश दुनिया खुद को उसके अनुरूप ढाल रही है. इसीके साथ ही बच्चों के लिए बेशुमार नई सामग्री उपलब्ध हुई है. साइबर संसार बच्चों को व्यस्त रखने के रचनात्मक तरीकों से सराबोर है. इस बीच ऑनलाइन सांस्कृतिक दौड़ एक अन्य, कम संभावित लक्ष्य की ओर मुड़ गई है, जो है बच्चों की सीधी-सरल कहानियां.

बॉलीवुड अभिनेत्री व सेव द चिल्ड्रन की आर्टिस्‍ट एम्‍बेसेडर दिया मिर्जा, और सोहा अली खान ने सोशल मीडिया पर हॉलीवुड सितारों जेनिफर गार्नर और एमी एडम्स के साथ जुडते हुए #SaveWithStories के माध्यम से दुनिया को अपनी पसंदीदा बाल कहानियां सुनाईं. बॉलीवुड की अन्य हस्तियां भी जल्द ही सबसे असुरक्षित बच्चों और हाशिए पर मौजूद समुदायों के लिए काम करने वाले बाल अधिकार संगठन के साथ सहयोग करने जा रही हैं. यह सारी कवायद फिलहाल जारी राष्ट्रीय लॉकडाउन के दौरान माहौल को थोड़ा हल्का बनाने के लिए है, क्योंकि विशेषज्ञ भी इस बात पर जोर देते हैं कि बच्चों के लिए नियमित दिनचर्या महत्वपूर्ण है.

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शेल सिवेर्स्टीन की कहानी ‘द गिविंग ट्री’ पढ़ने वाली दिया ने एक इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा, “हमारे बच्चे जहां घरों में सुरक्षित रूप से रह रहे हैं, वहीं बिना आश्रय या संरक्षण के समाज के सीमांतों पर रहने वाले बहुत से बच्चे पहले से कहीं ज्यादा असुरक्षित हो गए हैं. मैंने जो कहानी चुनी है, वह दुनिया भर के ऐसे ही बच्चों को समर्पित है. अब हम भारत में @savethechildrenindia @savewithstories का समर्थन करके बच्चों की  मदद कर सकते हैं.

वे रोगों और संक्रमण के जोखिम से घिरे बच्चों तक अपने कार्यक्रमों के जरिए लगातार पहुंचते रहेंगे. यह सरल है, #SavewithStories – बच्चों के लिए एक ऐसी कहानी चुनें जो बचपन में आपको प्रेरित करती थी या फिर एक ऐसी कहानी जो आपने तलाशी हो, जैसा कि मैंने बच्चों के साथ साझा करने के लिए अच्छी पुस्तकों में ढूंढ़ी थी. इसके बाद एक पोस्ट या स्टोरी पर एक पुस्तक पढ़ने का वीडियो डालें और अपने दोस्तों से आग्रह करें कि www.savethechildren.in/savewithstories पर दान करके #SlowTheCurve करें, यानी रोग के फैलाव को रोकने में हाथ बंटाएं.

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मैं @sakpataudi @nehadhupia @varundvn @bipashabasu @gulpanag @karanjohar को बच्चों के लिए उनकी पसंदीदा कहानी चुनने और पढ़ने के लिए नामित करती हूं  ️ ️ ️#StayHomeStaySafe.

इस पर सोहा अली खान ने पांच अन्य हस्तियों को समाज के सीमांतों पर रहने वाले बच्चों के समर्थन में स्टोरीटेलिंग सेशन की मेजबानी करने के लिए टैग किया. आबादी के बाकी हिस्सों की तरह लॉकडाउन सितारों को भी प्रभावित कर रहा है, ऐसे में फिल्म और टेलीविजन कलाकार भी सद्‌भावनावश वायरल होती पहलों से जुड़ रहे हैं. बच्चों की कहानी का चलन सामान्य सितारा हलकों के पार भी पहुंच रहा है और मीडिया हस्तियां भी कहानी सुनाने वालों की सूची में अपना नाम दर्ज करा रही हैं.

#SavewithStories हाशिए पर मौजूद समुदायों के बच्चों की मदद के लिए ‘सेव द चिल्ड्रन’ की एक पहल है. इसका उद्देश्य खासतौर पर वर्तमान दौर में ऐसे बच्चों के लिए पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की उपलब्धता निरंतर बनाए रखना है, जब बच्चे ही सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं.

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सेव द चिल्ड्रन के विषय में…

सेव द चिल्ड्रन भारत के 20 राज्यों में और 120 देशों में बच्चों, खासतौर पर वे जो सबसे ज्यादा वंचित और हाशिए पर मौजूद हैं, की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानवीय / डीआरआर जरूरतों से जुड़े मुद्दों पर काम करता है. भारत के साथ सेव द चिल्ड्रन का जुड़ाव 80 साल से अधिक पुराना है. अधिक जानकारी के लिए www.savethechildren.in पर विजिट करें.

#coronavirus: दुबई में फंसे सचिन जे. जोशी करेंगे भारत में जरूरतमंद लोगों की मदद

२१ दिन के लॉकडाउन के मद्देनजर अभिनेता-उद्यमी सचिन जे. जोशी ने सरकारी कर्मचारियों और मानवता की सेवा के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन करने का वादा किया. बिग ब्रदर फाउंडेशन के साथ अपने पसंदीदा प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में, सचिन ने सक्रिय पुलिस कर्मियों और नगरपालिका कर्मियों को गर्म पौष्टिक भोजन प्रदान करने का फैसला किया.

“शहर पर  लगातार निगरानी रखने वाली पुलिस, अस्पताल के डॉक्टर, नर्स और पैरामेडिक्स, नगर निगम के कर्मचारी समय पर जीवनावश्यक चीजे और २४ घंटे पानी की आपूर्ति होनी चाहिये, यह सुनिश्चित करते हैं.ट्रैफिक पुलिस  अन्य बलों के साथ सुनिश्चित कर रही है कि सभी बंदोबस्त का सख्ती से पालन किया जाए.”, सचिन जे. जोशी ने कहा.

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बिग ब्रदर संस्था टीम के एक सदस्य ने स्पष्ट किया, “जिला कार्यालय या पुलिस उन्हें उस क्षेत्र के बारे में एक घंटे पहले और उसी दिन जानकारी देती है जहाँ भोजन की आवश्यकता  होती है, और हम आवश्यकताओं को पूरा करते हैं.”


भारत में तालाबंदी के बाद से सचिन जे जोशी दुबई में फंसे हुए हैं। जोशी ने वहां से संगठन के कामकाज का समन्वय किया है.इस बारे में उन्होंने कहा, “भारत में प्रबंधकों की मेरी टीम मेरे निर्देशों के अनुसार काम कर रही है.मेरे कारखाने के कर्मचारी होटल के शेफ को सभी आवश्यक तैयारियों में सहायता कर रहे हैं. वे सभी आवश्यक सुरक्षा उपायों से इससे पूर्ण कर रहे हैं. हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहे हैं.खासकर उन लोगों के लिए जो इन दिनों भूख से जूझ रहे हैं और वाहतुक बंद होने के कारण उनके पास घर लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं है.. दुर्भाग्यवश, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात और एनसीआर-दिल्ली के छोटे शहरों और गांवों के लिए आवश्यक राशन प्राप्त करना असंभव है.हम उनकी मदद भी कर रहे हैं.

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सचिन जे जोशी की पत्नी उर्वशी शर्मा, जो घर से ही इस कार्यपर देखरेख कर रही है, उन्होंने कहा, “मैं भारत में हूं और इन सभी कार्य पर  हर मदद के लिए दैनिक संपर्क में हूं. मेरे पति और हमारी पूरी टीम पूरी कोशिश कर रही है कि हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करें! इस प्रकार के परीक्षण के दौरान इंसानियत और संवेदनशील होना बेहद जरुरी है. हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उदाहरण स्थापित करने की आवश्यकता है”

 

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One of my favourite pics of all time..!! Going down the memory lane #happy #family #cute #memories #life #beautiful

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साल २०१२ में लाभ की योजना के लिए नहीं बल्कि ‘बिग ब्रदर’ संस्था एक सामाजिक दूरदर्शी रखने वाले  सचिन जोशी ने  ग्रामीण क्षेत्रों में वंचित महिलाओं और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए शुरू की गई थी और आज बिग ब्रदर फाउंडेशन की टीम ने एलबीएस, कांजूर मार्ग, पवई हिरानंदानी, भांडुप और अन्य स्थानों में सामाजिक कार्य पुरा किया. लॉकडाउन ख़त्म होने तक यह कार्य करना इस संस्था का विचार है.पूरे मिशन की अनुमानित कुल लागत ३ करोड़ रुपये है.सचिन जे जोशी ने कहा, “हमारी योजना है की यह मिशन पुरे २१ दिन के लॉकडाउन अवधि के भीतर चलता रहे.इस समय जब लोग दान की अहमियत देते वक्त, मैं अपने हाथों से मदद करना चाहता हूं. ”ऐसे बिग ब्रदर फाउंडेशन और सचिन जे. जोशी को और अधिक शक्ति प्राप्त करें!

Lockdown: अमिताभ बच्चन ने लिया ये बड़ा फैसला, 1 लाख दिहाड़ी मजदूरों के लिए करेंगे ये काम

जल्द ही अमिताभ बच्चन ऑल इंडिया फिल्म एंप्लॉइज कन्फेडरेशन से जुड़े मजदूरों की मदद करेंगे. दिहाड़ी मजदूरों को मासिक राशन मुहैया कराएंगे. अमिताभ बच्चन के इस कदम का कल्याण ज्वेलर्स वालों ने जमकर तारीफ की है. आगे उन्होंने अमिताभ बच्चन की तारीफ करते हुए लिखा है कि- इस समय हमारा पूरा देश संकट में है. इस परिस्थिति में अमिताभ जी ने जो कदम उठाई है उसमें सोनी पिक्चर्स नेटवर्क इंडिया और  कल्याण ज्वेलर्स के तरफ से समर्थन किया जा रहा है. इससे देश के एक लाख मजदूरों की मदद की जाएगी.

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यह बात सभी को पता है. सोनी टीवी नेटवर्क से अमिताभ बच्चन का रिश्ता बहुत पुराना है. सोनी टीवी पर अमिताभ बच्चन रियलिटी शो गेम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ को होस्ट करते हैं. यह शो दर्शकों के बीच काफी मशहूर है.इस शो को महानायक अमिताभ बच्चन साल 2010 से होस्ट करते आ रहे हैं.

दुनिया भर में लोग कोरोना जैसी खतरनाक महामारी से परेशान हैं. लगातार इसकी संख्या बढ़ती दिखाई दे रही है. सरकार इससे बचने के लिए कई उपाय बता रही है बावजूद इसके लोग इस गंभीर बीमारी का शिकार हो रहे हैं. इस बीमार का अभी तक कोई दवा नहीं बन पाया है. अमिताभ बच्चन के अलावा और भी कई सितारे इस महामारी से बचने के लिए पैसे पीएम फंड में दान दिए हैं.

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अगर बात करें अमिताभ के वर्कफ्रंक की तो वह जल्द ही फिल्म ‘ब्रह्मशास्त्र’ में नजर आएंगे. इस फिल्म में अमिताभ के साथ आलिया और रणवीर कपूर भी नजर आएंगे.

चारों तरफ मोदी– मंत्री गायब

कोरोना संकट ने देश में जब दस्तक दी थी तब किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था खासतौर से उन नेताओं और मंत्रियों ने जिनहे जनता देश भर की ज़िम्मेदारी सौंपती है.  इस लापरवाही की सजा आज पूरा देश कैसे कैसे भुगत रहा है यह सबके सामने है. सबके सामने तो यह दृश्य भी है कि कोरोना की जंग सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकेले लड़ रहे हैं उनके मंत्रिमंडल के अधिकतर सदस्य हैरतअंगेज तरीके से खबरों से ही गायब हैं.

ऐसा क्यों है इस सवाल का सटीक जबाब तो यही निकलता है कि मंत्रियों को बोलने ही नहीं दिया जा रहा जिससे चारों तरफ नरेंद्र मोदी ही दिखें . यह भी सच है कि कोरोना के बारे में कोई उल्लेखनीय या उपयोगी जानकारी किसी के पास है नहीं सिवाय इन चंद जुमलों के कि कोरोना को हराना है और संकट के इस वक्त में 130 करोड़ देशवासियों को एकजुटता दिखानी है.

इस एकजुटता को भी एक दायरे में बांधकर रख दिया गया है जिसका संचालन और प्रवंधन भी नरेंद्र मोदी अपने मुताबिक कर रहे हैं जिसके 3 एपिसोड 22 , 24 मार्च और 5 अप्रेल को लोग तमाशों की शक्ल में देख चुके हैं.

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इमेज चमकाने की कोशिश

कोरोना के बवंडर के ठीक पहले सबसे बड़ा मुद्दा सीएए और एनआरसी क़ानूनों का विरोध था. मुसलमानों सहित बेकबर्ड हिन्दू एनआरसी का विरोध कर रहे थे जिसका केंद्र दिल्ली का शाहीन बाग बन गया था. इस विरोध जो शिक्षण संस्थाओं तक में दाखिल हो गया था को दबाने सरकार ने हड़बड़ी से काम लिया. एनआरसी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बयानों में विकट का विरोधाभास था जिसने लोगों की बेचैनी और बढ़ा दी थी.

शाहीन बाग का विरोध अमूमन शांत ही था लेकिन फिर जो दंगे भड़के तो सरकार और खासतौर से नरेंद्र मोदी की छवि बिगड़ने लगी थी . उनके बारे में आम राय यह बनने लगी थी जो सच भी थी कि वे एक के बाद एक एकतरफा फैसले हिटलर स्टाइल में ले रहे हैं और यह इत्तफाक की बात नहीं मानी जा सकती कि सभी फैसले मुस्लिम समुदाय में ही खलबली मचाने बाले क्यों हैं.

शाहीन बाग के एतिहासिक प्रदर्शन के दौरान मोदी सरकार बढ़ती बेरोजगारी और गिरती जीडीपी को लेकर भी आरोपों के कटघरे में आई थी लेकिन उसकी किरकिरी उस वक्त ज्यादा हुई थी जब प्रदर्शनकारियों को समझाने या बात करने सरकार की तरफ से अमित शाह नहीं गए थे बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकर अजित डोभाल को भेजा गया था. इसके बाद  दंगे हालांकि थम गए लेकिन नरेंद्र मोदी की इमेज देश भर में बिगड़ने लगी थी. दिल्ली और झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजे इसी नजरिए से देखे और विश्लेषित किए गए थे कि मोदी जी में अब वो पहले बाली बात नहीं रही.

तो क्या कोरोना की लड़ाई में उन्हें आगे रखना और बाकी मंत्रियों को नेपथ्य में भेज देना क्या इसी रणनीति का हिस्सा है क्या कि मोदी की छवि फिर से चमके और उनकी स्वीकार्यता फिर से बढ़े इसे मंत्रियों की निष्क्रियता के चलते देखें तो जबाब हाँ में ही निकलता है.

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कौन क्या कर रहा है –

एक संघीय ढांचे और लोकतन्त्र में कई मंत्री होते हैं.  हमारे देश के मंत्रिमंडल में भी हैं लेकिन संकट के इन दिनों में कहाँ हैं, कैसे हैं यह किसी को नहीं मालूम हां 5 अप्रेल की रात जिनहोने दिये जलाए उन्हें न्यूज़ चेनल्स ने दिखा दिया.  इनमें रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और गृहमंत्री अमित शाह प्रमुख हैं जिन्हें लोग मोदी का उत्तराधिकारी या विकल्प मानने लगे थे .

लेकिन 22 मार्च के जनता कर्फ़्यू के बाद अमित शाह भी गायब से हो गए हालांकि वे बीच बीच में दिखे लेकिन कोई नीतिगत बात उन्होने नहीं कही. इन दिनों वे राहत राशि वितरण का विवरण एक पीआरओ की तरह दे रहे हैं या सड़कों पर हो रही मार कुटाई की शिकायतें सुनकर लाक डाउन का वक्त काट रहे हैं. एकाएक ही अमित शाह हाशिये पर ढकेल दिये गए हैं तो इसके माने हर कोई अपने हिसाब से लगा रहा है कि सरकार में नंबर दो पर भी मोदी हैं या इधर दूसरा नंबर होता ही नहीं.

काफी जद्दोजहाद और मशक्कत के बाद मंत्री बनाए गए कद्दावर ठाकुर नेता राजनाथ सिंह घर में ही मीटिंगे कर समीक्षाएं बगैरह कर रहे हैं जिसके कोई माने नहीं होते सिवाय इसके कि चार छह मंत्री एकसाथ  बैठकर गपशप और गुफ्तगू कर लेते हैं. इससे उनमें कोरोना के बाबत कुछ करने का भाव आ जाता है ठीक वैसे ही जैसे ताली थाली पीटने बालों और दिये जलाने बालों में आया था.

एक और दिग्गज मंत्री नितिन गडकरी ने तो एक हफ्ते से कोई बयान ही नहीं दिया. 26 मार्च को उन्होने अपना एक महीने का वेतन कोरोना वायरस से लड़ने दान देने की घोषणा की थी और दूसरे दिन यह कहा था कि देश भर में टोल प्लाज़ा पर शुल्क नहीं लिया जाएगा यह और बात है कि अब तक वाहनों की अवाजही न के बराबर रह गई थी.

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एक और अहम मंत्रालय विदेश एस जयशंकर के पास है जिनके बारे में आखिरी समाचार 6 दिन पहले यह आया था कि उन्होने अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पेम्पियों से कोरोना वायरस को लेकर फोन पर चर्चा की. ऐसी बातें बेहद औपचारिक होती हैं. सुषमा स्वराज जब विदेश मंत्री थीं तब बिलानागा  ट्वीट जरूर करती रहतीं थीं. कुछ देशवासियों को विदेश से वापस लाने का काम भी उन्होने कर दिखाया था.

देश के तमाम छोटे बड़े मंत्री यही कर रहे हैं और जिनके पास करने यह भी नहीं है वे सुबह कुल्ले के साथ नरेंद्र मोदी की तारीफ करने का अपना प्रिय कार्य कर देते हैं, इनमें कपड़ा और महिला बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी का नाम सबसे ऊपर आता है जो ट्वीट कर बताती रहती हैं कि उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में महिला स्व्यम सहायता समूह खादी के मास्क तैयार कर रहीं हैं और इस बाबत उन्हें 44 मीटर कपड़ा मुहैया कराया गया है. 4 दिन पहले उन्होने अमेठी के गरीबों को मोदी किट भेजी है जिसमें राहत सामग्री है.  यह राहत सामग्री बक़ौल भारत सरकार  की वरिष्ठ मंत्री 5 किलो चावल, 5 किलो आट , 1 किलो दाल, ढाई किलो आलू, 50 ग्राम सब्जी मसाला, 50 ग्राम पिसी हल्दी और 1 किलो नमक है.

अब भला कोई कैसे कह दे कि मोदी के अलावा भी कोई मंत्री कोरोना के खिलाफ लड़ रहा है दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में मंत्री हल्दी, आटा बाँट रहे हैं तो सहज समझा सा सकता है कि उनकी हालत पार्षदों से भी गई गुजरी हो गई है या कर दी गई है एक ही बात है .

कांग्रेसी परिवार की भाजपाई बहू देश की पहली पूर्णकालिक वित्त मंत्री निर्मला सीता रमन का काम प्रेस कान्फ्रेंस के जरिये राहत राशि और घोषणाएँ भर पढ़ना रह गया है. लोग उन्हे भूल न जाएँ इसलिए उन्होने भी अपना एक माह का वेतन नितिन गडकरी की तरह प्रधानमंत्री केयर फंड में दान कर कोरोना के खिलाफ जंग में अपना योगदान देकर दानदाताओं की लिस्ट में शुमार करबा लिया  रेलें बंद कर देने का ऐलान कर चुके रेल मंत्री भी 29 मार्च से कुछ नहीं बोले हैं सिवाय एक महीने का वेतन पीएम केयर फंड में देने की घोषणा के. यही हाल कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और केंद्रीय उपभोक्ता और सार्वजनिक वितरण मंत्री राम विलास पासवान के हैं जो सप्ताह में एकाध बार लाक डाउन में  राशन की पर्याप्त उपलब्धता है का डायलोग बोलकर गायब हो जाते हैं.

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केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर किसानों को कुछ आवश्यक आश्वासन देकर अज्ञातवास में चले गए हैं कि किसानों की हर समस्या का निदान किया जा रहा है केंद्र सरकार ने फसल कटाई के जरूरी उपकरण उपलब्ध कराने के निर्देश दिये हैं. अव्वल तो किसानों तक उनका यह बयान पहुंचा ही नहीं इसलिए कोई यह पूछने बाला और बताने बाला भी नहीं कि कितने उपकरण कहाँ पहुंचे और कैसे पहुंचे. किसान बेचारा कोरोना और लाक डाउन को झींकता फसल कटाई और बिक्री को रो रहा है कि अब क्या करे.

वैसे भी वक्त कुछ पूछने का नहीं बल्कि कुछ कर दिखाने का है इसके लिए रात को 9 बजे दिये जलाने का अदभुद टोटका समारोह पूर्वक कर और करबा दिया गया है. इसलिए लोगों को फिक्र नहीं करनी चाहिए. पूरा मंत्रिमंडल देश और लोगों की चिंता में इतना दुखी है कि इस दुख के चलते उसके हाथ पाँव फूल गए हैं. एक स्वास्थमंत्री हर्षवर्धन के सिवा कोई बंगले से बाहर नहीं निकल रहा है क्योंकि कोरोना की नजरे इनायत इन पर हो गई तो देश कौन सभालेगा.

तो मोर्चा अकेले प्रधानमंत्री ने संभाल रखा है जो सबसे बड़े आइडिया किंग हैं.  अब यह पहेली कोई नहीं बूझ पा रहा कि उनके दिमाग में थाली ताली पीटने और 9 मिनिट रोशनी करबाने बाले जैसे दिलचस्प आइडिये आते कहाँ से हैं. जहां से भी आते हों लेकिन कोरोना संकट के चलते मोदी की इमेज पर जो धब्बा अर्थव्यवस्था को लेकर लग रहा था वह हालफिलहाल ढँक गया है और अब कोशिश यह की जाएगी कि सारा ठीकरा कोरोना के सर ही फोड़ दिया जाये रही बात एनआरसी की तो हाल फिलहाल इस मुद्दे के उठने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे.

फ्लॉप शो: गिर रही है नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता

कल का लाइट एंड साउंड शो लगभग फ्लाप रहा इस बात को साबित करने सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक यह पोस्ट ही काफी है कि – आज दिया जलाओ अभियान की अपार सफलता के बाद अगले हफ्ते नागिन डांस छत पर ……. .  ऐसी एक नहीं बल्कि अनेकों पोस्ट 2 दिन पहले से ही वायरल होने लगीं थीं जिनमे इस 9 मिनिट के प्रकाश पर्व का जमकर मखौल आम और खास लोगों ने बनाया था.

लड़ाई कोरोना के खिलाफ लड़ी गई ऐसा कहने की कोई वजह या ठोस तर्क किसी के पास नहीं .  हाँ यह जरूर देखा गया कि जंग भक्तगन बनाम बुद्धिमान लोगों के बीच छिड़ गई थी . 8 – 10 करोड़ भक्तों ने नरेंद्र मोदी की वीडियो के जरिये की गई अपील के बाद ही मोर्चा संभाल लिया था . ये भक्त कभी ज्योतिष तो कभी आध्यात्म की आड़ लेकर मोदी को महमानव और अवतार सिद्ध करने अड़ गए थे . होते होते बात तथाकथित हिंदुओं की तथाकथित एकता और लाक डाउन के चलते हताश और मायूस होते लोगों को मनोवैज्ञानिक संबल देने पर आकर टिक गई.

लेकिन जिस तरह 9 के आंकड़े को एक चमत्कार साबित करने की कोशिश शुरू में विरोध से घबराए भक्तों ने की उससे यह भी समझ आया कि भगवा खेमे में इस मुहिम की कामयाबी  को लेकर शंका व्याप्त थी जिसे दूर करने मोदी की अपील से परे खूब आतिशबाज़ी भी की गई , जय जय श्रीराम के नारे भी लगाए गए और वैदिक मंत्रों का भी पाठ ज़ोर ज़ोर से किया गया .

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अगर मकसद यह या कुछ और भी था तो कोई 100 करोड़ लोगों ने इसे उबाऊ और थोपे गए सरकारी फैसले के तौर पर देखा . हाल तो यह था कि एकाध दो चेनल्स को छोडकर सभी भक्त चेनलों ने शाम 7 बजे से ही यह राग अलापना शुरू कर दिया था कि पूरा देश ज़ोर शोर से दिये जला रहा है , प्रकाश पर्व मना रहा है , दिवाली जैसे माहौल को लेकर लोग उत्साहित हैं और मोदी जी के साथ हैं .  इतना ही नहीं रात 9 बजे प्रसारित होने बाले धार्मिक सीरियल रामायण  का वक्त भी 15 मिनिट बढ़ा दिया गया था . इन चेनल्स ने देर रात तक जगमगाती कालोनियों के जगमग नजारे और सेलिब्रिटीज दिखाये जो भाजपा के या उसके समर्थित थे .

इस लिहाज से तो बिलाशक शो हिट रहा लेकिन इसमें देश को 20 फीसदी हिस्से और आबादी तक समेट देने का झूठ उन्हें बोलना पड़ा .  कोई ओड़ीशा , झारखंड , छतीसगढ़ , पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों  के आदिवासी इलाकों और बड़े शहरों की ही झुग्गियों में केमरे लेकर नहीं गया क्योंकि वहाँ मुकम्मल सन्नाटा था . यानि देश वही माना गया जहां बेकबर्ड नहीं बल्कि फारबर्ड लोग रहते हैं . ये मुख्यधारा हैं और कोरोना जैसी विपदा में भी हिन्दू राष्ट्र की कवायद को आकार देने की नाकाम कोशिश में लगे रहे तो बात भगवा गेंग के लिहाज से चिंता की है .

यह कह पाना भी मुश्किल है कि जो थोड़ा बहुत हुआ वह मोदी का लिहाज था या खौफ था या फिर हिन्दुत्व के नायक को फिल्न में बनाए रखने की खिसियाहट थी . तर्क करने बालों के इन सवालों का जबाब भक्त नहीं दे पाये कि लाइट से कोरोना कैसे भागेगा और यह कौन सी थेरेपी है .  जब पोंगा पंथ की बखिया उधड़ने लगी तो झट से एकता और संबल का कार्ड पेश करते यह कहा जाने लगा कि मोदी जी मनोवैज्ञानिक तरीके से लाक डाउन से उपजे अवसाद तनाव और परेशानियों का इलाज कर रहे हैं .

यह दलील भी चंद घंटों में इन जबाबों के साथ खारिज कर दी गई कि राहत और इलाज के नाम पर क्या किया जा रहा है सिवाय हल्ला मचाने के , इसका जबाब भक्तों ने अतिरेक उत्साह के साथ दिया पर साफ दिखा कि अधिकतर लोग इस लाइट शो से किसी तरह का इत्तफाक नहीं रख रहे हैं और बिना किसी लिहाज के इस कर्मकांड और समूहिक मूर्खता का विरोध करते जागरूक नागरिक होने का परिचय दे रहे हैं.

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यही लोकतन्त्र की खूबी और पहचान भी है कि लोग ज्यादा वक्त तक बेकार के ड्रामों से नहीं बहलते .  यही वे लोग हैं जो कोरोना को लेकर वास्तविक रूप से चिंतित और गंभीर हैं और चाहते हैं कि संकट के इस दौर में महज मुसलमानों को दिखाने एकता प्रदर्शित न की जाये .

लेकिन चूंकि होना जाना कुछ नहीं है इसलिए यह वर्ग अब नागिन डांस जैसी बात कर जी हल्का कर रहा है तो यह उन भक्तों के लिए नागवार गुजर रहा है जो चाहते यह हैं कि सभी उनकी तरह दिमागीतौर पर दिवालिये होते मोदी को भगवान अवतार और महमानव स्वीकार लें फिर जरूर कोरोना भाग जाएगा . 5 अप्रेल की रात 9 बजे साबित यह हुआ है कि नरेंद्र मोदी अब पहले की तरह लोकप्रिय नहीं रह गए हैं उनकी आलोकप्रियता अब ताली थाली दीयों और नागिन डांस से ज्यादा दिनों तक नहीं ढकी जा सकती.

#coronavirus: सरकार की फसल खरीद नीति में झोल किसान फिर दोराहे पर

एक तरफ कोरोना का संकट, दूसरी तरफ घर से बाहर निकलने पर पाबंदी. वहीं किसानों का दुखड़ा यह कि उन का दुख जाने बिना सरकार ने फसल खरीद की नीति बना दी.

लॉक डाउन खत्म होते ही हरियाणा ने सरसों व गेहूं की फसल खरीदने की तारीख का ऐलान कर दिया है.एक ओर सरसों की फसल खरीद 15 अप्रैल से वहीं गेहूं की फसल खरीद 20 अप्रैल से सरकारी एजेंसियां शुरू करेंगी.

जहां पहले चरण में राज्य सरकार की एजेंसियां केवल छोटे किसानों की फसल खरीदेंगी, वहीं बड़े किसानों को कम से कम एक महीने तक अपनी फसल का भंडारण अपने स्तर पर करना होगा.

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सरकार की इस शर्त से किसानों की न सिर्फ भंडारण संबंधी चिंता बढ़ गई है, बल्कि किसान संगठन सरकार के इस फैसले का विरोध करने की तैयारी में हैं.

प्रगतिशील किसान मंच के प्रधान सत्यवीर डागर का कहना है कि सरकार ही किसानों के बीच भेदभाव कर रही है. इस से किसानों के बीच बना सालों पुराना सामाजिक तानाबाना भी प्रभावित होगा.इसलिए किसान भी सरकार की इस फसल खरीद नीति से खुश नहीं हैं.

फसल के भंडारण के नाम पर राज्य सरकार ने किसानों को बोनस देने का भी ऐलान किया है, मगर किसान ऊंट के मुंह में जीरा वाली बात कह रहे हैं.

किसान संगठनों का कहना है कि लॉक डाउन खुलने तक वे सरकार के सामने किसी तरह की समस्या पैदा नहीं करना चाहते, मगर सरकार के पास अभी समय है और इन दिनों में सरकार खरीद की व्यवस्था बना सकती है.

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वहीं कृषि मंत्री जेपी दलाल का कहना है कि किसान के लिए बेशक संकट का समय है, मगर इस मौजूदा समय में किसान राज्य सरकार की मुश्किलों को भी समझें और इस में सहयोग करें.

उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार किसान का दानादाना खरीदेगी. जिस तरह सरकार की दुग्ध एजेंसी लॉक डाउन में पशुपालकों का बूंदबूंद दूध खरीदने का काम कर रही हैं, उसी तर्ज पर किसान की समस्या पर भी ध्यान देगी.

एक ओर कृषि मंत्री किसानों की परेशानी को जानेसमझे बिना अपना पक्ष रख रहे हैं, वहीं किसानों पर कोरोना के चलते दोहरी मार पड़ रही है.

यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि किसान अपनी फसल सरकारी एजेंसी को बेच पाते हैं या किसान संगठनों के हाथ की कठपुतली बने रहना चाहते हैं. पर इतना तो तय है कि किसानों पर कोरोना संकट के अलावा सरकारी संकट विकट रूप लिए खड़ा है जिस का समाधान

#coronavirus: दिया जलाने की नहीं, डॉक्टर्स को बचाने की ज़रूरत है साहेब

जानलेवा कोरोना वायरस संक्रमण से बचने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी जनता से ताली-थाली पिटवा रहे हैं तो कभी दिए जलवा रहे हैं. क्या कोरोना वायरस शोर और रोशनी देख कर भाग जाएगा? साहेब, कोरोना से जनता की जान बचानी है तो सबसे पहले देश के डॉक्टर्स और नर्सेज को बचाइए, उनको आवश्यक संसाधन, दवाएं, मास्क, सेनिटाइजर और सुरक्षा मुहैय्या करवाइये ताकि वो पूरी हिम्मत और सुरक्षा के साथ कोरोना संक्रमित मरीज़ों का इलाज कर सकें. मगर यहां हो ये रहा है कि इन तमाम चीज़ों के अभाव में डॉक्टर्स और नर्सेज खुद कोरोना की चपेट में आ कर कोरन्टाइन हुए जा रहे हैं. जब अस्पतालों में डॉक्टर्स ही मरीज़ बन जाएंगे तो फिर कोरोना से लड़ेगा कौन ?

साहेब, ताली पीटने में वक़्त जाया करने से बेहतर है संकट के इस वक़्त में देश के स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को ठीक करें ताकि ताली-थाली और दिए जलाने जैसे टोने-टोटके की जरूरत ही न पड़े.अपने दिमाग की बत्ती जलाइए। भोली जनता को गुमराह मत करिये. आपके पहले टोटके को पूरा करने के चक्कर में जनता थाली-कलछी ले कर सड़कों पर उतर पड़ी. जगह-जगह जमघट लगा कर सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा गेम ही बजा डाला.अब आपके दूसरे टोटके को पूरा करने में बिजली विभाग के सामने बड़ी आफत आ खड़ी हुई है. पूरे देश में एक साथ बत्ती गुल करा कर आपने तो तमाम ग्रिड फेल करने का इंतज़ाम कर लिया था. ये तो भला हो बिजली विभाग के इंजीनियर्स का कि उन्होंने जल्दी-जल्दी ये सन्देश फैलाना शुरू किया कि प्रधानमंत्री के मन की बात जनता ज़रूर पूरी करे, मगर सिर्फ बल्ब और ट्यूबलाइट ही बुझाये, पंखा, फ्रिज, टीवी आदि चलता रहने दे ताकि बिजली लाइनों में ज़रूरत से ज़्यादा बिजली ना दौड़े और ट्रिप होने का ख़तरा ना उत्पन्न हो. अब ये सन्देश इस महान देश के सभी मोदी-भक्तों तक पहुंच पाया या नहीं, कहा नहीं जा सकता. सोचिये ग्रिड फेल होने और ठीक होने में लगने वाले समय के दौरान देश के कितने अस्पतालों में वेंटिलेटर्स, ऑपरेशन्स व् अन्य काम रुक जाएंगे जो सिर्फ बिजली पर आधारित हैं. इनका आंकलन किये बगैर ही साहेब, जनता को नए नए फरमान सुनाये जा रहे हैं.

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साहेब को इस कठिन समय में अपने मंत्रीगणो के साथ  इस बात पर चिंतन करना चाहिए कि   इतने बड़े देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए जो स्वास्थ्य सुविधा होनी चाहिए, जो बिलकुल भी नहीं है, उन्हें थोड़ा बहुत ही सही मगर कैसे दुरुस्त किया जाए.कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में सबसे आगे खड़े स्वास्थ्य कर्मियों के पास व्यक्तिगत सुरक्षा किट-पीपीई (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट) तक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं, वह कैसे उपलब्ध कराये जाएँ.गौरतलब है कि सुरक्षा संसाधनों की कमी की वजह से ही डॉक्टरों में भी यह संक्रमण तेजी से फैल रहा है.सरकार के ढुलमुल रवैये से स्वास्थ्य सेवा में जुटा समुदाय बेहद परेशान है. कोरोना से लड़ रहे डॉक्टरों, नर्सों और तमाम दूसरे सहयोगी कर्मचारियों में भी संक्रमण फैलने का खौफ बढ़ता ही जा रहा है.वे ड्यूटी तो निभा रहे हैं मगर सभी यह सोचकर परेशान हैं कि अगर उनको संक्रमण हुआ तो उनकी वजह से उनका परिवार भी संक्रमित हो सकता है.

इस बात पर भी चिंतन करने की ज़रूरत है कि 14 अप्रैल को लॉक डाउन ख़तम होने के बाद अगर कोरोना की थर्ड स्टेज शुरू हो गई और गरीब जनता इसकी चपेट में आ गई तो उनको तो अस्पतालों में एंट्री ही नहीं मिलेगी, क्योंकि वहां ज़रूरी संसाधनों की बेतरह कमी है. साथ ही कोई डॉक्टर या नर्स उनको हाथ नहीं लगाएगा क्योंकि उनके पास खुद को बचाने के साधन नहीं हैं.

साहेब को डॉक्टर्स की हिफाज़त के लिए जल्दी से जल्दी देश के तमाम अस्पतालों में ज़रूरी संसाधन उपलब्ध कराने की घोषणा और कार्रवाई शुरू करनी चाहिए.डॉक्टर्स और नर्सेज को इस बात का भरोसा दिलाना चाहिए कि उनकी जान की हिफाज़त सरकार की जिम्मेदारी और एक बड़ी चिंता है. देश के तमाम डॉक्टर्स, नर्सेज और मेडिकल स्टाफ का बीमा तुरंत हो जाना चाहिए ताकि उनको थोड़ा तो इत्मीनान हो जाए कि मरीज़ों का इलाज करते वक़्त दुर्भाग्य से अगर वे कोरोना का शिकार हो गए और उनकी जान चली गई तो उनके परिवार के सामने आर्थिक संकट से निपटने के लिए कुछ थोड़ा सा इंतज़ाम तो इस सरकार ने कर दिया है.

साहेब, डॉक्टर्स और नर्सिंग स्टाफ में डर का माहौल है। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल के कुछ डॉक्टर्स और नर्स सहित 108 स्वास्थ्य कर्मियों को क्वारंटाइन किया गया है क्योंकि इस अस्पताल में दो कोरोना के मरीज  भर्ती थे, जिनके संपर्क में आ कर मेडिकल स्टाफ भी संक्रमित हो गया. अब इन दोनों मरीज़ों को राममनोहर लोहिया अस्पताल भेजा गया है, जहाँ भी स्वास्थ सुविधाएँ और कोरोना से बचाव के ज़रूरी संसाधन पर्याप्त नहीं हैं.

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देश भर के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों और मेडिकल स्टाफ के पास मास्क और आवश्यक किट की कमी होने की वजह से वे सभी एक के बाद एक कोरोना से संक्रमित होते जा रहे हैं. कुछ डॉक्टरों के मुताबिक उन्हें नियमित रूप से नए मास्क नहीं मिल रहे हें. कोरोना से बचाने वाली कंप्लीट पीपीई किट सबको नहीं मिल पा रही है.

गृह मंत्रालय सही आंकड़े जारी नहीं कर रहा है कि कोरोना ने चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कितने लोगों को संक्रमित किया है. एम्स के एक वरिष्ठ डाक्टर का कहना है कि जिन्हें कोरोना वायरस पेशेंट्स को देखने की ड्यूटी नहीं दी गयी थी ऐसे डॉक्टर भी कोरोना की गिरफ्त में हैं. दिल्ली के हिंदू राव अस्पताल के चार डॉक्टरों और कुछ नर्सों ने डर के मारे अपना इस्तीफा भेजा तो उत्तरी दिल्ली म्युनिसिपल कार्पोरेशन ने उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई  का नोटिस भेज दिया है।म्युनिसिपल की तरफ से भेजे गये संदेश में साफ कहा गया कि इन डाक्टरों और नर्सों के इस्तीफों को स्वीकार नहीं किया जायेगा और इनके नाम मेडिकल काउंसिल या नर्सिंग काउंसिल को भेज कर इनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जायेगी। अब बताओ कोई अपनी जान भी ना बचाये ? जबरा मारे भी और रोये भी ना दे?

नयी दिल्ली एम्स के रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के महासचिव श्रीनिवास राजकुमार कह रहे हैं कि पूरे देश में कोरोना वायरस से लड़ रहे डाक्टरों और नर्सों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं जिनसे वह खुद इस बीमारी से बच सकें। तमाम सुरक्षित संसाधनों की कमी की वजह से डॉक्टरों और नर्सों में ही नहीं स्वास्थ्य सेवा में जुटे सभी लोगों में डर का माहौल है.

पोस्टग्रेजुएकट इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी महेश देवनानी ने अपने ट्वीटर हैंडल पर देश भर में कोरोना वायरस से संक्रमित स्वास्थ्य समुदाय से जुड़े लोगों के बारे में जानकारियां इकट्ठा की हैं. इसमें दिल्ली, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस से संक्रमित डाक्टरों, नर्सों और दूसरे स्वास्थ्य कर्मचारियों की जानकारी मौजूद ह.

वो लिखते हैं कि कुछ अस्पतालों में मुहैया किये गये सुरक्षा संसाधनों और मास्क की क्वालिटी इतनी खराब हैं कि इस्तेमाल करते वक्त ही वह खराब हुए जा रहे हैं. स्वास्थ्य समुदाय नहीं चाहता कि इलाज कर रहे डाक्टर और नर्स खुद इस बीमारी से संक्रमित हो जायें.अगर ऐसा होता है तो वो जिन स्वास्थय कर्मियों के संपर्क में आएं उनका भी पता लगाना होगा. इस प्रकार से यह कड़ी बढ़ती ही जाएगी और हालात को संभालना काफी मुश्किल हो जाएगा.

सफदरजंग अस्पताल के रेजीडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने ट्वीटर पर पीपीई किट, एन95 मास्क, ट्रिपल लेयर मास्क और सेनीटाइजर्स मुहैया करने की अपील की है. इस अपील में कहा गया है कि दिल्ली में कोविड 19 के इलाज में लगे डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के पास पर्याप्त मात्रा में सुरक्षा उपकरण उपलब्ध नहीं हैं. यह भी सवाल उठाये जा रहे हैं कि आखिर पीएम फंड का इस्तेमाल इसके लिए क्यों नहीं किया जा रहा है?

साहेब, कोरोना से जंग लड़ रहे डाक्टरों और दूसरे मेडिकल स्टाफ संसाधनों की कमी की वजह से इस जानलेवा वायरस की चपेट में आने का जोखिम उठा रहे हैं.मगर सरकार अपनी पीठ थपथपाते नहीं थक रही है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में कहीं कोई कमी नहीं है. आखिर कब तक झूठ की धुंध में सच को छिपाते रहेंगे? इस वक़्त देश में डॉक्टरों की सुरक्षा ज्यादा मायने रखती है न कि देशवासियों का दीये जलाकर एकजुटता का प्रदर्शन करना.

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कोरोना संक्रमित डॉक्टरों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है. ताज्जुब इस बात का है कि संकट की इस घड़ी में भी पीएम ऐसी अजीबोगरीब पेशकश करने से नहीं चूक रहे जबकि इस वक़्त तो उन्हें डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए आवश्यक इंतजाम करने में अपनी पूरी ताकत झोंक देनी चाहिए.

फ्रांस में पर्फ्यूम बनाने वाली कंपनियों ने सेनिटाइज़र का उत्पादन युद्ध स्तर पर करना शुरू कर दिया है. कार बनाने वाली फैक्टरियों में वेंटिलेटर्स बड़े पैमाने पर बनाये जा रहे हैं. मगर हम क्या कर रहे हैं? हम थाली बजा रहे हैं, ताली पीट रहे हैं और दिए जला रहे हैं. प्रधानमंत्री देश की जंनता को संबोधित करते हुए कहते हैं कि कोरोना के अंधकार को चुनौती देने के लिए देश की 130 करोड़ जनता को दीया, मोमबत्ती या मोबाइल की लाइटें जलानी चाहिए. ऐसा करके हम कोरोना की महामारी से उपजे अंधकार को प्रकाश की ताकत का परिचय देंगे। अफ़सोस.

कितने खेद की बात है कि दिल्ली के एक अस्पताल में मुआयना करने गये स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन खुद तो एन95 मास्क पहने नजर आ रहे हैं मगर उनके आस पास खड़े डॉक्टर साधारण सर्जिकल मास्क लगाए दिखते हैं। जाहिर सी बात है, हम समझ सकते हैं कि डॉक्टरों के बजाय सरकार मंत्रियों और वीवीआईपी की सुरक्षा में कोई कोताही नहीं बरत रही है. मगर सरकार को समझने की जरूरत है कि जब डॉक्टर ही नहीं रहेंगे तो कोरोना महामारी से हमें बचायेगा कौन? क्या सरकार को अब कर्तव्य निभा रहे डॉक्टरों की जान बचाने की कवायद शुरू नहीं करनी चाहिए? जनता को टोने-टोटके सुझाने की जगह सरकार यदि अपने दिमाग की बत्ती जला ले तो  देश और देशवासियों को ज्यादा फायदा होगा.

#coronavirus: चीन बनाम पाकिस्तान, फरेब कहें या दोस्ती में दरार

वाह रे कोरोना… जिस ने पूरी दुनिया की आंखें खोल दी, वहीं चीन की दगाबाजी सामने आई है. चीन ने अपने अजीज दोस्त पाकिस्तान को बातों के जरीए ऐसा लपेटा कि न आह निकल रही है, न वाह. हर ओर किरकिरी हो रही है.

दरअसल, चीन ने हाई क्वॉलिटी N-95 मास्क के नाम पर पाकिस्तान को करोड़ों की तादाद में अंडरगारमेंट्स से बने मास्क भेज दिए. वहीं पाकिस्तान सरकार ने बिना देखे  इसे अस्पतालों में पहुंचा दिया, लेकिन डॉक्टर इसे देख कर हैरान रह गए.

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डॉक्टरों ने यह माना भी है कि ये कोरोना वायरस को रोकने के लायक नहीं हैं और अंडरगारमेंट्स से बने हुए हैं.

जी हां, इस का खुलासा पाकिस्तान के एक टीवी चैनल एनबीटीवी ने किया है.  हालांकि पाकिस्तानी मीडिया इस खबर को फेक न्यूज बता रहा है. हो सकता है कि यह मुस्लिम विरोधी जिहाद का हिस्सा हो.

पाकिस्तानी मीडिया के सीनियर मेंबर हैरिस अली ने ट्वीट करते हुए कहा कि ऐसा कोई न्यूज चैनल नहीं है. साथ ही, यह भी कहा कि यह फरवरी तक ही एक्टिव था. जिस चैनल से यह खबर आई, उस का लोगो भी अलग था.

वैसे, एनबीटीवी की इस रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने पाकिस्तान को तगड़ा चूना लगाया दिया है और हाई क्वॉलिटी N95 मास्क की जगह अंडरगारमेंट से बने मास्क भेज दिए हैं.

इस खबर के आने के बाद सोशल मीडिया पर भी यह मास्क जम कर वायरल हो रहा है. लोग पाकिस्तान सरकार का मजाक बना रहे हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि पाकिस्तान को ये मास्क उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये इस्लाम के खिलाफ हैं, वहीं कुछ लोग मानते हैं कि चीन और पाकिस्तान अच्छे दोस्त हैं और चीन से जो भी मिले, पाकिस्तान को उसे गिफ्ट समझ कर रख लेना चाहिए.

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इधर, पाकिस्तानी सेना ने अपने नागरिकों से घर के अंदर जाने और अनावश्यक यात्रा से बचने का आग्रह किया है. लोगों को सोशल डिस्टेंस बनाए रखने और मुंह पर मास्क लगाने की सलाह दी गई है.

लेकिन पाकिस्तानी लोग भी सोशल डिस्टेंसिंग जैसी जरूरी चीजों का ख्याल नहीं रख रहे हैं.  नमाज पढ़ने के लिए लोग भारी तादाद में मस्जिदों में अब भी जुटते हैं और रोके जाने पर पुलिस को चकमा देने की कोशिश करते हैं.

जागरूकता की कमी, सरकार की नाकामी और अस्पतालों की हालत खराब होने के कारण कोरोना मरीजों की तादाद हर रोज बढ़ रही हैं.

पाकिस्तान ही इस धोखाधड़ी के नाम पर नहीं ठगा गया है, यूरोप के कई देशों ने भी इस से पहले शिकायत की थी कि चीन से भेजे गए मास्क और किट खराब क्वालिटी के हैं. स्पेन और नीदरलैंड्स ने तो मेडिकल सप्लाई वापस करने का भी फैसला कर लिया.

एक ओर चीन द्वारा फैलाया गया कोरोना और फिर इस से निपटने के नाम पर मास्क, कोरोना किट, वेंटिलेटर बेचना कहीं यह फितरत तो नहीं.

लोग तो घरों में दुबके रहे, बाहर निकलने पर मास्क जैसी चीजों को सलाह देते अघाते नहीं थक रहे, वहीं चीन घटिया माल को खपा कर पैसा बनाने में लगा है. इस में कहीं न कहीं अंतर्राष्ट्रीय साजिश की बू नजर आती है.

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