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#lockdown: घर पर बनाए बच्चों का मनपसंद ओरियो केक

केक किसे नहीं पसंद, जब बात डिजर्ट कि आती है तो उस लिस्ट में केक का नाम भी जोड़ा जाता है. बच्चे हों या बड़े केक का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है. बच्चों को ज्यादातर ओरियो बिस्किट केक या चोकलेट केक पसंद होता है. छुट्टी वाले दिन बच्चे कुछ स्पेशल खाने  कि जिद्द करते है. ऐसे में आप बच्चों के लिए डिजर्ट में स्वादिष्ट ओरियो केक बना सकती हैं. ओरियो केक बनाना बहुत आसान है.
आइए, जानते है इस स्वादिष्ट डिजर्ट कि रेसिपी:-

ओरियो केक बनाने के लिए आप को नीचे दिए गए सामाग्री कि जरूरत पड़ेगी.
• 20 ओरियो बिस्किट
• 2 टेबलस्पून चीनी
• 1 गिलास दूध
• 1 टेबलस्पून बेकिंग पाउडर
• 1 चोकलेट सिरप
• 1 पैकेट जेम्स
• 1 वाइट चोकलेट
• 1 टेबलस्पून मक्खन
• बटर पेपर

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ओरियो केक को बनाने के लिए आप को 3 स्टेप फॉलो करना है.
स्टेप 1: इस लाजवाब ओरियो बिस्किट केक को घर पर बनाने के लिए सब से पहले ओरियो बिस्किट को मिक्सर ग्राइंडर में ग्राइंड करके पेस्ट बना लें. अब एक बोल लें और उस में बिस्किट का पेस्ट डाले. इस में 1 टेबलस्पून बेकिंग पाउडर और 2 टेबलस्पून चीनी डालकर इस मिश्रण को मिला लें. अब इस मिश्रण में थोड़ा-थोड़ा दूध डालकर बैटर को चलाएं.स्टेप 2: इस के बाद एक बोल को मक्खन से ग्रीस कर लें और बटर पेपर लगा कर उस पर भी मक्खन का लेयर लगा दें. बटर पेपर से केक चिपकेगा नहीं. अब इस में सारा बैटर डालें. और इस बोल को 5 मिनट के लिए माइक्रोवेव में रख दें. केक अच्छी तरह से बेक हुआ है या नहीं यह जानने के लिए टुथपिक केक में डालकर चेक करें. यदि टुथपिक में केक नहीं चिपक रहा इस का मतलब केक अच्छी तरह से बेक हो गया है.

स्टेप 3: जब केक ठंडा हो जाए प्लेट में रख दें. अब केक को चोकलेट सिरप, वाइट चोकलेट और जेम्स से गार्निंश कर लें. इसे आप खाने के बाद डिजर्ट में सर्व कर सकती हैं. बच्चों को यह केक बहुत पसंद आएगा.

अनोखा रिश्ता: भाग 3

अगले दिन सुबह राजेश मिठाई, फल, पनीर, सैंडविच, एक थर्मस में बौर्नविटा व एक थर्मस में कौफी ले कर ऊपर रोहन के पास पहुंच गए. रोहन मैगी बनाने की तैयारी कर रहा था. राजेश ने गर्मजोशी से गुडमौर्निंग करते हुए कहा, ‘आओ बेटा, साथ में नाश्ता करते हैं.’

रोहन चुपचाप किचन से निकल आया, बोला, ‘मुझे बेटा मत कहा कीजिए, मैं कोई बच्चा नहीं हूं.’

राजेश ने कहा, ‘ठीक है, फ्रैंड कहूंगा या रोहन ही बोलूं?’

रोहन बोला, ‘जो बोलना हो बोलिए. बस, बेटा मत कहिए.’

राजेश और रोहन ने नाश्ता कर लिया. रोहन ने सभी चीजें शौक से खाईं. राजेश ने पूछा, ‘बोलो फ्रैंड, कौफी पीओगे या गरमागरम बौर्नविटा?’

रोहन ने मुसकराते हुए कहा, ‘कुछ भी दे दीजिए.’

राजेश ने छेड़ते हुए कहा, ‘नहीं फ्रैंड, मैं इस चक्कर में नहीं पड़ूंगा. मुझे क्या पता कि आज तुम्हें क्या पीना है, इसीलिए मैं दोनों ही ले आया हूं.’

रोहन ने हंसते हुए कहा, ‘आप मुझे कौफी दे दीजिए.’

रामेश्वरजी से फोन पर बात हुई. सुबह बे्रकफास्ट का वाकेआ सुन वे खुश हो कर बोले, ‘वाह, राजेशजी, यह तो कमाल हो गया. वह अपने हमउम्र के अलावा तो किसी से हंस कर बात ही नहीं करता.’ ढाईतीन बजे के लगभग रोहन कालेज से लौट कर ऊपर जाने वाला था, मैं ने उसे टोकते हुए कहा, ‘रोहन, मैं ने तुम्हारे लिए खाना बना लिया है. यदि यहां बैठ कर खाओगे तो लगा देती हूं, वरना ऊपर ले जा सकते हो.’

दो पल वह ठिठका, बोला, ‘दे दीजिए.’

मैं ने रामेश्वरजी से रोहन की पसंद जान ली थी. उस की पसंद का पनीर बटर मसाला, दाल तरी, बूंदी का रायता, सलाद, रोटीचावल उसे लगा कर दे दिया.

रात में राजेश खाना ले कर ऊपर ही चले गए. रोहन टीवी देख रहा था. उन्हें देख अचकचा कर बोला, ‘इतना परेशान मत होइए, मैं पिज्जा और्डर कर देता.

राजेश कब चुप रहने वाले थे, ‘फ्रैंड, आज आंटी के हाथों का बना खा लो. कल डिनर में पिज्जा और्डर करेंगे, मुझे और आंटी को भी बहुत पसंद है.’

दोनों ने साथ खाना खाया, कुछ बातचीत भी हुई. रोहन ने भी बातचीत में दिलचस्पी दिखाई. राजेश चलते समय बोले, ‘ओ के फ्रैंड, गुडनाइट, सुबह बे्रकफास्ट पर मिलते हैं.’

रोहन गुडनाइट कहते हुए बोला, ‘अंकल, बे्रकफास्ट पर एक शर्त पर मिलूंगा. आप बे्रकफास्ट ऊपर नहीं लाएंगे. मैं नीचे आ कर लूंगा.’

राजेश ने खुश हो कर कहा, ‘चलो, यही तय रहेगा.’

राजेश बेहद खुश थे कि रोहन ने अपनेपन से उन्हें अंकल शब्द से संबोधित किया था.

‘पहले ही दिन का रिस्पौंस इतना अच्छा मिलेगा, इस की तो मैं ने कल्पना ही नहीं की थी, अब मुझे विश्वास हो रहा है कि मुझे मेरा रोहन वापस मिल जाएगा.’ फोन पर भावविह्वल हो कर रामेश्वरजी बोले.

अगले दिन साढ़े 7 के पहले, रोहन खुद ही बे्रकफास्ट के लिए आ गया. मैं टेबल ठीक कर रही थी. आते ही वह बोला, ‘गुडमौर्निंग, आंटी. आप के हाथों में जादू है. आप खाना बहुत अच्छा बनाती हैं.’

मैं ने उसे थैंक्स करते हुए सिर सहला दिया, जिस का उस ने प्रतिवाद नहीं किया. हम तीनों ने साथ ही नाश्ता किया. वह कालेज जाने के लिए तत्पर हुआ तो मैं ने पूछा, ‘रोहन, तुम अपनी पसंद बता देते तब मैं लंच में वही बनाती.’

उस ने कहा, ‘आंटी, आप इतना अच्छा बनाती हैं कि कुछ भी बनाइए, अच्छा ही बनेगा.’

मैं ने कहा, ‘फिर भी, तुम्हारी पसंद का बनाने का दिल कर रहा है.’

उस ने कहा, ‘मुझे राजमाचावल, साथ में प्याज व हरीमिर्च का रायता बहुत पसंद है.’

मैं ने कहा, ‘ठीक है, मैं यही बनाऊंगी. रात में तो तुम्हारा डबल चीज पिज्जा खाने का मन है न?’

रोहन ने कहा, ‘आंटी, यदि आप को तकलीफ न हो तो मैं आप के हाथ का बना खाना ही खाना चाहूंगा.’

हम पतिपत्नी रोहन के व्यवहार से बेहद खुश हुए. उस ने औपचारिकता त्याग कर मेरे हाथ के खाने की फरमाइश की.

रामेश्वरजी से फोन पर बात होती रहती थी. वे यह जान कर खुशी से बोले, ‘राजेशजी, आप लोगों ने बहुत जल्दी उस के दिमाग की खिड़की खोल दी. चलिए, अब हमें रोशनी डालने की जगह तो मिल गई.’ आज रोहन का कालेज बंद था. हम ने पूरा दिन ही रोहन के साथ बिताने का कार्यक्रम बनाया. सुबह 8 बजे तक वह आ गया. मैं ने टेबल ठीक करते हुए कहा, ‘बेटा, आज मैं ने साउथ इंडियन डिशेज बनाई हैं. तुम्हें यदि पसंद न हों तो तुम्हारे लिए कुछ और बना देती हूं.’

मैं ने गौर किया, मेरे ‘बेटा’ संबोधन पर उस ने एतराज नहीं जताया.

रोहन ने झट से कहा, ‘नहीं, आंटी, मुझे तो साउथ इंडियन डिशेज बेहद पसंद हैं. मैं तो यही खाऊंगा.’

बे्रकफास्ट के बाद हम तीनों कौफी ले कर बालकनी में चले आए. रोहन अब काफी अपनेपन से बातें करने लगा था. हम ने उसे राजीव का एलबम दिखाया. उस ने राजीव व उस की पत्नी तथा बेटी के बारे में काफी बातें कीं तथा बोला, ‘राजीव भैया को आप लोगों से ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए था, कम से कम फोन से तो बराबर बातें करनी चाहिए थीं. और साल में एक बार तो आप लोगों से मिलने के लिए उन्हें आना चाहिए था.’

मैं ने कहा, ‘रोहन बेटा, कुछ बच्चे ऐसा कर जाते हैं. मातापिता तो अपना सर्वस्व बच्चों पर लगा देते हैं, वे खुद से ज्यादा बच्चों की चिंता करते हैं किंतु कुछ बच्चे अपनी जिंदगी की मंजिल तय करते समय उन्हें राह में अकेला छोड़ आगे बढ़ जाते हैं. वे अपनी उन्नति व स्वार्थ के नशे में मातापिता को भुला बैठते हैं. वे यह भी भूल जाते हैं कि यदि मातापिता ने भी उन्हें भुला दिया होता तब वे किस लायक होते?’

मेरी बातें सुनने के बाद रोहन शांतभाव से कुछ सोचने लगा हम ने टटोलते हुए पूछा, ‘क्या बात है, बेटा? एकदम शांत हो गए हो?’

‘नहीं आंटी, यों ही,’ उस ने बात टालते हुए कहा.

हम दोनों अच्छी तरह समझ रहे थे कि रोहन, रामेश्वरजी के प्रति स्वयं के व्यवहार की समीक्षा कर रहा है.

राजेश ने देखा, लोहा गरम है, चोट करना उचित रहेगा. वे उसे टटोलते हुए बोले, ‘फ्रैंड, तुम अपने पापा के प्रति काफी रूखे हो, क्या बात है? फ्रैंड मानते हो न मुझे, इतना जानने का तो हक है मेरा?’

रोहन धीरे से बोला, ‘अंकल, मैं चाह कर भी पापा के साथ सहज नहीं रह पाता हूं. अभी वे नहीं हैं तो उन की कमी महसूस करता हूं किंतु सामने होते हैं तो चिढ़ ही होती है उन से. मैं पूरी तरह कन्फ्यूज्ड हूं. मैं ने बचपन में मातापिता को हमेशा झगड़ते ही देखा है.’

वह दो पल रुक कर फिर बोला, ‘पापा मम्मी को अपनी बात समझाने में असमर्थ रहे, इसलिए वे मुझे बेहद कमजोर इंसान लगते हैं.’

राजेश ने समझाते हुए कहा, ‘बच्चों का मनमस्तिष्क बहुत भावुक व कोमल होता है. वह बड़ों की बातों को देखतासुनता तो है किंतु पूरी तरह से समझने में असमर्थ होता है. वह अपनी छोटी समझ से एक धारणा बना लेता है. तुम मेरे बेटे समान हो, तुम्हारा भला चाहता हूं. निश्ंिचत रहो, मैं तुम्हें कुछ गलत नहीं बताऊंगा.’

राजेश ने समझाना जारी रखते हुए कहा, ‘फ्रैंड, तुम्हारे पापा एक कमजोर नहीं बहुत मजबूत इंसान हैं. तुम्हारी मम्मी को मैं जितना समझ पाया हूं वह यह कि उन्हें धनदौलत की बेहिसाब भूख थी. वे तुम्हारे पापा से रिश्वत लेने के लिए लड़ाईझगड़ा करती थीं. फ्रैंड, बैंक मैनेजर को इतनी तनख्वाह तो मिलती है कि वह एक सम्माननीय जीवन व्यतीत कर सके. ईमानदारी तो चरित्र का अनमोल गहना है. तुम्हारे पापा जैसे इंसान का सम्मान होना चाहिए न कि अपमान.

‘तुम्हारे पापा को पत्नी व मित्र ने धोखा दिया. यह ऐसा घाव है जो नासूर बन कर तुम्हारे पापा और तुम्हारी जिंदगी बरबाद कर रहा है. अपनों के धोखे को सहज कर जिंदगी को कर्तव्य की भांति निभाना किसी कमजोर इंसान के बस की बात नहीं है, फ्रैंड. ‘तुम्हारे पापा तुम्हारी अच्छी परवरिश के लिए अपने दुख को दरकिनार कर कर्तव्य को बखूबी निभा रहे हैं. तुम अपना कन्फ्यूजन दूर करो तथा अपने पापा का आदरसम्मान कर खुद को योग्य बेटा सिद्ध करो.’

अगली सुबह रामेश्वरजी लौट आए. जैसे ही उन की टैक्सी गेट के सामने रुकी, हम से पहले रोहन गेट तक पहुंच गया. उस ने जल्दी से टैक्सी का गेट खोला. रामेश्वरजी बाहर निकले. उस ने चरणस्पर्श कर पूछा, ‘कैसे हैं, पापा?’ रामेश्वरजी भावविह्वल हो कर बोले, ‘मैं बहुत अच्छा हूं, तुम्हें देख कर सफर की सारी थकान दूर हो गई,’ और रोहन को गले से लगा लिया. रोहन खुश था. वह पापा के हाथों से ब्रीफकेस ले कर ऊपर चला गया.

रामेश्वरजी राजेश के गले से लग गए, हम लोगों ने रामेश्वरजी के चेहरे पर अद्वितीय खुशी देखी. गुस्सैल रोहन को स्नेहमयी रोहन में बदला हुआ देख रामेश्वरजी बोले, ‘आप लोगों ने कमाल कर दिया. मुझे मेरे बेटे से मिलवा दिया. मैं कैसे आप लोगों का एहसान चुकाऊं…’

राजेश बीच में ही बात काटते हुए बोले, ‘दोबारा एहसान का जिक्र न करिएगा, अभी जल्दी से ऊपर जाइए, आप का बेटा इंतजार कर रहा है.’ रामेश्वरजी व रोहन से हमारा एक अनोखा रिश्ता बन गया है. इस रिश्ते ने रोहन को तो सही मार्ग दिखाया ही हमें अकल्पनीय उपहार दे दिया. आज रोहन एक कुशल इंजीनियर है. सुंदर  व सुशील सौम्या उस की पत्नी है और 2 प्यारेप्यारे बच्चों ने घरआंगन गुलजार कर दिया है.

हम पतिपत्नी का मन बेटा, बहू, पोता, पोती के लिए तरसता था. एकांत में हम आंसू बहाते थे. आज रोहन के कारण वह रिक्त कोना गुलजार हो उठा है. ऐसा महसूस होता है कि रोहन के रूप में राजीव मिल गया है. सच में, माइनसमाइनस प्लस हो गया, मरुस्थल सा बना हमारा मन रिमझिम फुहार से सराबोर हो उठा.

#lockdown: लॉक डाउन और कुंदा

अँधेरे में बेचैन सी कुंदा ने धीरे से अपने तकिये के नीचे रखे  फ़ोन में टाइम देखने के लिए जैसे ही गर्दन घुमाई, बराबर में लेटे उसके पति सोहन ने चिढ़े से स्वर में कहा ,” तुम्हे रात में भी चैन नहीं है ? क्या कर रही हो ?”

”टाइम देख रही थी ।”

”क्यों ?”

”नींद नहीं आ रही थी ।’

”क्यों ? नींद को क्या हुआ है ?”

कुंदा ने चुपचाप सोहन की तरफ से करवट ले ली , सोहन ने उसकी कमर में हाथ डाल दिया , कुंदा की उलझन और बढ़ी, मोहन का हाथ हटा दिया । सोहन ने भी करवट ले ली और सो गया ।कुंदा धीरे से उठ कर बैठी , फ़ोन उठाया , छोटे से कमरे में नजर डाली , दोनों बच्चे सोनू और गुड़िया सो रहे थे , एक किनारे उसकी सास गहरी नींद में थी , इसी छोटे से कमरे में बीत रहा था उसका हताश सा जीवन , कुंदा का मन हुआ , अभी घर से भाग जाए और सीधे रामसिंह के कमरे   पर  पहुँच कर उसके साथ चैन से सो जाए , पर  अब तो  लॉक डाउन के  समय जैसे वह पिंजरे में बंद पक्षी की तरह रात दिन बस इधर से उधर छटपटा ही सकती थी । वह चुपचाप नाममात्र की किचन के फर्श पर यूँ ही लेट गयी , फिर चैन नहीं आया , मन हुआ , रामसिंह को फ़ोन करे , वह फिर उठी , और बाहर आकर कई लोगों के लिए बने कॉमन बाथरूम की तरफ गयी , टॉयलेट के अंदर जाकर उसने फौरन रामसिंह को फ़ोन किया , पर इतनी रात में शायद वह सो रहा था ,

उसने फ़ोन नहीं उठाया तो कुंदा ने ढेर सारे मैसेज रामसिंह को भेजे और अपनी तरफ से उन्हें डिलीट भी कर दिया , सोहन आजकल घर पर था तो सावधानी जरुरी थी , फिर निराश सी आकर किचन में लेट गयी , आँखों की कोरों से कुछ आंसू भी ढलक गए ,रामसिंह, कब देखूंगी उसे !उसके बिना नहीं रह सकती , उसके पास भी नहीं जा सकती , उसने फ़ोन को ही सीने से लगा लिया , यह फ़ोन उसे रामसिंह ने ही दिया था , कितना प्यार करता है उसे , रामसिंह उसी बिल्डिंग का वॉचमैन है जहाँ वह कुछ घरों में काम करने जाती है , यूँ ही आते जाते वह कभी कभी बिल्डिंग में ही बनी एक बेंच जैसी जगह पर बैठ जाया करती , रामसिंह से नजरें मिलीं तो दिल जैसे वहीँ अटक सा गया था , ऐसा अटका कि दोनों के बीच की सारी दूरियां मिटती चली गयीं ।  रामसिंह एक और वॉचमैन अजय के साथ रूम शेयर करता था , रामसिंह घर पर जब अकेला होता तो कुंदा को बता देता । कुंदा सारे काम निपटा कर उसके पास पहुँच जाती । दोनों एक दूसरे के बहुत करीब आते चले गए।  कुंदा की सास माया बच्चों को संभाल लेती . सोहन किसी होटल में काम करता था .घरों के बहुत काम हो गए हैं , कहकर कुंदा सोहन के साथ खूब रहती .रामसिंह और कुंदा बिल्डिंग में तो रोज बात करते ही थे , उसने कुंदा को काफी काम भी दिलवाये थे . कुंदा ने घर में बोल दिया था कि रात को भी खाना बनाने का काम मिला है । सोहन घर में पैसों का हिसाब किताब तो पूछता नहीं था.

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दो साल से दोनों का प्रेम सम्बन्ध जोरों शोरों से चल रहा था पर अब लॉक डाउन में जैसे कुंदा पर बड़ी आफत आयी थी , घर से बाहर निकलना बंद हो गया था , सभी घरों से छुट्टी हो गयी थी , अब छोटे से कमरे में सास , पति और बच्चों की घिचपिच से ऊब होने लगी थी , उसे पता ही नहीं चला कि वह पूरी रात सो नहीं पायी थी , अचानक फ़ोन में मैसेज आने का वाइब्रेशन हुआ तो चौंकी , रामसिंह के मेसेज थे , कैसे रहूं तुम्हारे बिना , कुंदा , मेरी तो ड्यूटी चल ही रही है , कोई बहाना करके थोड़ी देर आकर मिल जाओ .सोसाइटी के अंदर अंदर से आ सको तो , तुम्हारे घर पर अभी सब हैं इसलिए फ़ोन नहीं करता हूँ , अपना ध्यान रखना ,कुंदा , शकल ही दिखा जाओ .”

कुंदा ने पहले सारे मैसेज डिलीट किये फिर फ़ोन सीने से लगा सिसक पड़ी , वह अगर गलत भी कर रही है तो क्या कर सकती है , सोहन उसे वैसा प्यार नहीं करता जैसा रामसिंह करता है , सोहन एक मतलबी , खड़ूस सा पति बन कर रह गया है , उसका अब दम घुट रहा है , उसे मुस्कुराये हुए भी कितने दिन हो गए । बच्चों  के लिए उसके दिल में ममता है पर रामसिंह भी उसके लिए बहुत कुछ है , वह अगर इस कमरे की घुटन से दूर उसके साथ थोड़ी देर खुश रह लेती है तो क्या बुरा है , रामसिंह अकेला रहता है , उसका परिवार गांव में रहता है , उसकी पत्नी को शहरी जीवन रास नहीं आता , रामसिंह भी उसके साथ खुश है तो क्या बुरा है , हम दोनों ही प्यार को तरसे हुए थे , अब मिल गए , खुश हैं , बस , वह इतना ही जानती है , वह कोई बड़ी बड़ी ठीक , गलत की भाषा नहीं सोचेगी .

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इतने में माया की कर्कश सी आवाज सुबह सुबह उसके कानों में पड़ी ,” अरी कुंदा , पांच बज गए , पानी नहीं भरना है क्या ? कहीं भी सो जाती है  घोड़े बेचकर ! और यह किचन में क्यों पड़ी है ?”

कुंदा चुपचाप उठी , मन ही नहीं हुआ कुछ जवाब देने का , रात भर जाग कर अब सर भारी था , मुँह हाथ धोकर चाय चढ़ाई, पानी भरने लगी , सोहन गुर्राया ,धीरे धीरे काम नहीं कर सकती ?”

”पानी न भरूँ ?”

”हाँ , मत भर ‘

कुंदा फिर धीरे ही काम करती रही , फिर वही पहाड़ सा पूरा दिन !, वह रामसिंह से मिलने के जतन सोचती रही , आखिरकार बहाना सूझ ही गया , शाम को बोली , सोच रही हूँ , जाकर पगार ले आऊं सबसे , चार तारीख तो हो ही गयी है , लॉक डाउन कहीं और न बढ़ जाए ,सामानभी भरना पड़ता है , मैडम ने कहा था , आकर पैसे ले जाना ”

वह जानती थी कि शायद पैसों की बात पर जाने को मिल जाए.

जैसा कुंदा ने सोचा था वैसा ही हुआ , सोहन ने इतना ही पूछा ,’किधर से जाएगी ?’

”अंदर अंदर से , वैसे भी सब्जी लाने की छूट तो है ही .”

कुंदा ने बड़े दिनों बाद रामसिंह की पसंद की साड़ी पहनी , अच्छा सा जूड़ा बनाया , और जैसे हवा के पैरों पर उड़ती चली जा रही थी ,रामसिंह को पहले नहीं बताया था , वह उसे सरप्राइज देना चाहती थी , दूर से देखा , रामसिंह बिल्डिंग के चैनल के अंदर खड़ा था , उसने भी कुंदा को अंदर आते देख लिया था , वह बेचैनी से चैनल के और पास आकर खड़ा हो गया , कुंदा !”

”रामसिंह , कैसे हो ?”

रामसिंह उदास सा बोला , चैनल खोल कर तुझे अंदर आने नहीं दे सकता , कुंदा , मनाही है ।”

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” कोई बात नहीं , बस , तुम्हे देख लिया ,इतना बहुत है , रामसिंह , जिया नहीं जा रहा ,” कहते कहते कुंदा की आँखें भर आयीं .

दोनों एक दूसरे को भरी भरी आँखों से देखते रहे , फिर सीढ़ियों से किसी के आने की आहट आयी तो कुंदा फौरन जाने के लिए पलट गयी , कुछ आगे जाकर पलट कर रामसिंह को देखा , वह भी उसे ही देख रहा था , कुंदा अब उदास सी घर की तरफ बढ़ रही थी , सोहन पूछेगा तो बोल देगी , मैडम ने दो दिन बाद बुलाया है, फिर एक बार और जा सकेगी , घर जाने का बिलकुल मन नहीं था , उसे काम पर आना हमेशा से पसंद था , अब घर में बंद होकर उससे बैठा ही नहीं जा रहा था , कुछ चारा भी तो नहीं था , कब सब ठीक होगा ,” एक आह भर कर वह बेजान सी  घर आकर काम में लग गयी , मन आज फिर चैनल के उस पार अटका रह गया था.

#Lockdown: कैसे करें हैंडल बच्चों को लॉकडाउन में

लॉक डाउन के इस समय में हमारे साथ-साथ बच्चे भी घर के अंदर कैद हो चुके हैं. और बच्चों की फितरत होती है खेलना-कूदना क्योंकि उनमें हमसे कहीं अधिक एनर्जी होती है. किन्तु इस वातावरण में बच्चों के पास न तो स्कूली शिक्षा है, और न ही खेलने की अलग जगह. सामान्य हालातों में जब हम घर के अंदर बच्चों की धमा-चौकड़ी से तंग आ जाते हैं तो उन्हें खेलने के लिए घर से बाहर पार्क या मैदान में भेज देते हैं, परंतु इस समय ऐसा करना मुमकिन नहीं है. और इसीलिए अधिकतर माता-पिता बच्चों के कारण काफी परेशान हो रहे हैं. बच्चों के हर समय घर में रहने और मम्मी-पापा को परेशान करने के कारण कई चुटकुले भी बन रहे हैं, जैसे अगर लॉक डाउन यूँ ही चलता रहा तो कोई माँ ही कोरोना का इलाज ढूंढ निकालेगी!

बच्चों को हैंडल करना जितना मुश्किल है, उतना ही आसान भी. लॉक डाउन ने आपको बच्चों के साथ अच्छे क्वालिटी टाइम के साथ क्वान्टिटी टाइम भी दिया है. बस, आपको थोड़ी समझदारी से काम लेना होगा.

घर बैठे क्या करें बच्चे

उछल-कूद मचाना बच्चों की नैचुरल डिमांड होती है जोकि आजकल वो कर नहीं पा रहे हैं. अगर आपका बच्चा खेल-कूद में ज़्यादा इंटरेस्टेड था तो ऐसे में आप उसे समझने की कोशिश करें. उसके साथ इन्वोल्व हों. आज एक अच्छा मौका है टीवी के ऊपर अपनी निर्भरता खत्म करने का. बच्चों के साथ बोर्ड गेम खेलें ताकि वो स्क्रीन की दुनिया से बाहर आ सकें.

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घर में केवल बैठे रहने से आपके साथ आपके बच्चे की सेहत पर भी गलत असर पड़ सकता है. आप अपने बच्चों के साथ मिलकर रोज़ कुछ देर एक्सर्साइज करें.

बच्चों में किताबें पढ़ने की रुचि बढ़ाएँ. वैसे बच्चों को पढ़ाई के अलावा अन्य पुस्तकें जैसे कॉमिक, कहानी की किताबें आदि पढ़ने का समय कम ही मिलता है. आजकल के इस सुनहरे अवसर का भरपूर उपयोग करते हुए उन्हें पुस्तकें पढ़ने को कहें. आप भी इस समय खूब पढ़ें. जब बच्चे आपको पढ़ते हुए देखेंगे तो उन्हें भी पढ़ने में रुचि पैदा होगी. आजकल इस लॉक डाउन में कई किताबें डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हैं. आप उनका सब्स्क्रिप्शन लेकर बच्चों को पढ़वा सकते हैं. मान्यता ने अपनी बेटी के लिए चम्पक का सब्स्क्रिप्शन लिया तो वह इतनी खुश हुई कि अब सारा समय पढ़ने और नई बातें सीखने में बिताती है. कहानियों के जरिये वो भाषा पर पकड़ और भावना व्यक्त करना भी सीख रही है.

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इस समय का सदुपयोग करते हुए आप बच्चों को घर के काम, उनकी उम्र के अनुसार सिखा सकते हैं. डस्टिंग, अपनी चीज़ें जगह पर रखना, गीले कपड़े सुखाना, सूखे कपड़े फ़ोल्ड करना, बटन टाँकना, सब्जी काटना या पकाना, कपड़ों पर इस्त्री करना आदि कई ऐसे काम हैं जो बच्चे अपनी उम्र और रुचि के हिसाब से सीख सकते हैं. आगे जाकर यही काम उन्हें जीवन में स्वावलंबी बनाने में सहायक होंगे.

कितना स्क्रीन टाइम

आज के समय में हर घर में कम से कम 3 स्क्रीन मौजूद रहते हैं. बच्चे भी अक्सर मोबाइल या टीवी में अपना समय व्यतीत करते रहते हैं. माता-पिता बच्चों के हर समय फोन, कंप्यूटर या टीवी में आँखें गढ़ाने से भी परेशान हैं. उन्हें डर है कि बच्चों की आँखें खराब हो सकती हैं, उनके ऊपर इतने ज़्यादा स्क्रीन-टाइम का क्या असर हो रहा होगा, या फिर उनका मन पढ़ाई से बिलकुल उचट जाएगा.

आपको ये समझना होगा कि जो बच्चे इंटेलिजेंट होते हैं उन्हें स्क्रीन कुछ ज़्यादा ही पसंद आती है क्यूंकी जो भी वो सोचते हैं और समझना चाहते हैं वो उन्हें पहले ही स्क्रीन पर दिख जाता है. अगर आपका बच्चा गलत ट्रैक पर नहीं है तो उसे थोड़ा स्क्रीन टाइम देना गलत भी नहीं है. बस ज़रूरत है वो क्या देखता है उसे मॉनिटर करने की. स्क्रीन का कंटैंट देखते हुए आप उसे निर्धारित समय के लिए स्क्रीन दें.

बंद घर में बच्चे के ज़िद करने पर

जो चीज़ बच्चा मांग रहा है और आप सोचते हैं कि आप उसे दे सकते हैं, वो चीज़ पहले ही दे दें. लेकिन जो चीज़ उसे नहीं देनी है, उसके लिए अगर बच्चा ज़िद करने लगता है, तो हर बार आप यही कहें कि ये चीज़ आपको नहीं मिलेगी. यदि बच्चे की ज़िद बढ़ती जाती है, वह रोता-चीखता है, टेंपर-टैंटरम करने लगता है तब भी आपका उत्तर यही होना चाहिए कि ये चीज़ आपको नहीं मिलेगी. इस बात का ध्यान रखिए कि चाहे 2 बार, चाहे 200 बार, चाहे 2000 बार, न तो आपका उत्तर बदलना चाहिए और न ही आपकी बोलने की टोन. क्योंकि यदि बच्चे के रोने पर आप उसकी बात मान गए तो वो सीखेगा कि रोने-चिल्लाने से मेरी बात मान ली जाएगी. बच्चे बहुत जल्दी अपने वातावरण के अनुसार ढलते हैं, और सीखते हैं. उन्हें ये लर्निंग नहीं करने देनी है कि अपनी बात मनवाने के लिए टेंपर-टैंटरम थ्रो करना है. लेकिन साथ ही आपको अपना टेंपर भी लूज़ नहीं करना है. ये नहीं कि बच्चे की ज़िद रोकने के लिए आप उसे मारने लगें. एक ही बात कहने और नॉर्मल टोन रखने से बच्चा समझ जाएगा कि जो बात आपने पहली बार बोल दी, वही होगा.

अच्छा रहेगा यदि आप ऐसी स्थिति में बच्चे को कोई दूसरा ऑप्शन दें जिससे वो कहीं और अपना ध्यान लगा सके. जैसे, पुराने एल्बम देखने लगें. हर बच्चा अपना बचपन देखकर खुश हो उठता है.

अंधविश्वास से रखें दूर

कोरोना से निबटने के लिए आजकल सोशल मीडिया पर तरह तरह के अंधविश्वास फैले हुए हैं. इस समय अगर आप अनर्गल बातों जैसे फलानी पूजा से कोरोना मिट जाएगा, या फिर अंधविश्वास जैसे कपूर-इलायची पास रखने से, लहसुन खाने से, संतरे के छिलकों के पानी की भाप लेने से कोरोना नहीं होगा आदि बातों में विश्वास करेंगे तो बच्चे भी यही अंधविश्वास सीखेंगे. लेकिन अगर आप बच्चे में साइंटिफिक टेम्परामेंट अभी से डालेंगे तो आगे चलकर बच्चे के लिए बहुत अच्छा रहेगा. उन्हें बतायें कि कोरोना कैसे फैलता है और कैसे उसकी रोकथाम मुमकिन है. बच्चे को सही जानकारी दें ताकि उसके मन का डर खत्म हो सके.

जज बनने की नौबत

घर के अंदर ही बने रहने से एक से ज़्यादा बच्चों वाले घरों में बच्चों के बीच झगड़ा होने के चांस बढ़ गए होंगे. और ऐसी स्थिति में अक्सर बच्चे माता-पिता पर ये आरोप लगाने लगते हैं कि आप मुझसे नहीं बल्कि मेरे भाई या बहन से अधिक प्यार करते हो, उसका पक्षपात करते हो. खास तौर पर माएँ ऐसे हालात में झगड़ा सुलझाते हुए काफी परेशान हो जाती हैं. राधिका कहती है कि मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं अपने बच्चों की केवल जज बन गयी हूँ, माँ नहीं.

डॉ. कविता अरोड़ा, मनोवैज्ञानिक, सलाह देती हैं कि बच्चों का झगड़ा स्वतः ही सुलटने दें. एक, दो या तीन दिन भी इंतज़ार करना पड़े तो करें और झगड़े को खुद ही खत्म होने दें. बच्चे जितनी जल्दी लड़ते हैं उतनी ही जल्दी सुलह भी कर लेते हैं. इसमें चिंता की कोई बात नहीं है.

मम्मी और पापा में मतभेद

जब बच्चे लड़ते हुए मीनल के पास पहुँचे तो उसने छोटे को बड़े से सॉरी कहलवा कर भेज दिया. लेकिन बच्चों को मम्मी का ये फैसला सही नहीं लगा और वो अपने पापा राहुल के पास पहुँच गए. राहुल ने दोनों की बात सुनी और कहा कि गलती छोटे की नहीं, बड़े की थी. बच्चों की लड़ाई के चक्कर में मीनल और राहुल ने एक दूसरे की बात काटी और उनमें ही लड़ाई हो गयी.

फैमिली एक्सपर्ट नितिन एन नागर कहते हैं कि मम्मी और पापा को इस बात पर एक साथ होना ही होगा कि घर में लड़ाई का नहीं, हँसी-खुशी का माहौल रहे और इसलिए दोनों को बच्चों के सामने एक टीम की तरह आना होगा. ताकि घर में कोई क्लेश न हो, कसा हुआ माहौल न हो बल्कि खुशी हो. अगर बच्चे मम्मी की बात से सहमत नहीं हैं तो पापा का कर्तव्य है कि वो उसी बात को और बेहतर ढंग से बच्चों को समझाएँ. अगर मम्मी अपनी बात कहने में सक्षम नहीं हो पा रहीं तो पापा को चाहिए कि उसी बात में और वैल्यू जोड़कर बच्चों को बतायें और एक टीम की तरह उन्हें हैंडल करें. वैसे भी बच्चों की लड़ाई अधिक देर नहीं चलती. उनकी थोड़ी देर की लड़ाई को सुलझाते हुए ये न हो कि मम्मी-पापा में लड़ाई हो जाए.

बंद घर में तनाव नहीं, संयम दिखाएँ

आजकल इन्फोर्मेशन की वजह से बच्चों में तनाव का माहौल देखने को मिल रहा है. अमूमन घरों में ऐसा माहौल है जैसे कोरोना की वजह से प्रलय आने वाली है और सब खत्म हो जाएगा. बच्चे देखकर सीखते हैं, मॉडलिंग से सीखते हैं और अडोप्ट करते हैं. यदि आपके अंदर चिंता होगी, तनाव होगा तो वो बच्चों के अंदर भी जाएगा. यदि आपने घर के अंदर कोरोना को लेकर डर का वातावरण बनाया हुआ है, आप सारा दिन टीवी पर न्यूज़ में कोरोना से जुड़ी घबराने वाली खबरें देख रहे हैं तो आपके बच्चे भी कोरोना के नाम से डरने लगेंगे, और उनमें चिंता की भावना बढ़ेगी. जैसा कि रचना की सात साल की बेटी के साथ हो रहा है. वू आजकल अक्सर डरी-सहमी रहती है और हर समय यही सवाल पूछती रहती है, “मम्मी, क्या हम सब कोरोना से मर जाएँगे?”

सीनियर साइकोलोजिस्ट, डॉ. प्रशांत भिमानी कहते हैं कि घर के अंदर सकारात्मक माहौल रखें, बशर्ते आप सावधानियों पर ध्यान देते रहें. तो बच्चे भी पॉज़िटिव रहेंगे.

अनोखा रिश्ता: भाग 2

‘बैंक में औडिट के कारण मैं चाह कर भी छुट्टी न ले सका, इसलिए दिन में मैं औफिस और रोहन स्कूल चले जाते थे. इस बीच शालू और मेरे मित्र सुमन को बातचीत का अच्छा अवसर मिलता. दोनों के ही विचार मिलते थे. सुमन भी सरकारी अफसर था तथा अपने पद का लाभ उठा तनख्वाह के अतिरिक्त ऊपरी कमाई का हिमायती था. दोनों ने साथ रहने का निर्णय ले लिया.

‘मैं सपने में भी ऐसी कल्पना नहीं कर सकता था. उस दिन मैं रोहन के पास बैठ कर न्यूजपेपर देख रहा था. रोहन अपना होमवर्क कर रहा था. सुमन आधे घंटे में लौटने को कह कर बाहर गया था. तभी शालू ने बिना प्रस्तावनाउपसंहार के कहा, मुझे आप से तलाक चाहिए.

‘अचानक पड़े प्रहार से मैं अचकचा सा गया, फिर भी खुद को संभालते हुए कहा, थोड़ा समझो शालू, मेरी जैसी या मेरे से कम तनख्वाह पाने वाले मेरे सहकर्मी, सभी तो शांतिपूर्वक जीवन जी रहे हैं.

‘चिकने घड़े की तरह शालू पर कोई प्रभाव न पड़ा. वह प्रतिउत्तर में बोली, और लोग कर लेते होंगे इतनी तनख्वाह में गुजर, मुझ से नहीं होती. मैं रोज की खींचतान से परेशान हो गई हूं.

‘मैं ने फिर कोशिश करते हुए कहा, शालू, जरा रोहन के विषय में तो सोचो, इस कच्ची उम्र में उसे मातापिता दोनों का स्नेह व संरक्षण चाहिए.

‘शालू तो निर्णय ले चुकी थी. इसलिए पूर्ववत ही बोली, तुम उसे मांपिता दोनों का स्नेहसंरक्षण देना. मैं तुम दोनों को छोड़ कर जा रही हूं. मुझे तुम्हारी कोई निशानी नहीं चाहिए. मैं नए सिरे से जिंदगी शुरू करना चाहती हूं.

‘मैं भी अपना आपा खो बैठा, चीखते हुए कहा, अरे निर्लज्ज, कम से कम सुमन के जाने का तो इंतजार कर लेती, वर्षों बाद तो मैं अपने जिगरी यार से मिला हूं. चार दिन तो खुशी से जी लेने देती. वह तो अच्छा है कि वह अभी यहां नहीं है वरना मेरी पारिवारिक स्थिति देख वह कितना दुखी होता.

‘शालू ने कटाक्ष करते हुए कहा, मैं उन्हीं के साथ जा रही हूं. वे मेरे लिए उपयुक्त जीवनसाथी हैं, न आमदनी की चिंता और न ही खर्चे का हिसाब. जैसे चाहो कमाओ और जीभर कर उड़ाओ. हम दोनों के विचार पूरी तरह समान हैं.

‘शालू की बातें सुन मैं अवाक् रह गया. सारी बातें समझ में आने लगीं. मेरा जिगरी यार मेरे साथ समय गुजारने के लिए नहीं रुका था बल्कि अपने मित्र की असंतुष्ट पत्नी को अपने जाल में फांसने के लिए रुका था. सुमन की पत्नी का 6 माह पूर्व एक ऐक्सिडैंट में देहांत हो चुका था. असंतुष्ट शालू को उस ने भांप लिया और दो के झगड़े में तीसरे का लाभ वाली कहावत चरितार्थ कर बैठा. मैं इन सब बातों से अनभिज्ञ अपनों के हाथों ठगा गया. बस, उस समय से शालू गई तो गई, बाद में हमारा कानूनी तलाक भी हो गया.’

खाना बन चुका था, लंच का समय भी हो चला था किंतु रामेश्वरजी की जीवनगाथा सुन, अजीब सी उदासीनता पसर गई थी. हम सभी चुप थे. रामेश्वरजी ने ही चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘क्या भाभीजी, खाना नहीं खिलाइएगा?’

मैं ने उठते हुए कहा, ‘जरूरजरूर, अभी लगाती हूं.’

रामेश्वरजी ने धीरे से कहा, ‘मेरा तलाक हुए 12 वर्ष हो चुके हैं, अब तो इस दर्द के साथ जीने की आदत सी हो गई है.’

खाना खाने के बाद हम तीनों ड्राइंगरूम में आ कर बैठ गए. राजेश ने पूछा, ‘रामेश्वरजी, आज आप ने अपनी पत्नी के बारे में बताया, किंतु मेरे मन में एक और प्रश्न है. मैं, आप के और रोहन के रिश्ते के बारे में जानना चाहता हूं. वह आप के प्रति बहुत रूखा व सख्त है जो उचित नहीं. कुछ तो बताइए, शायद हम कुछ मदद कर सकें.’

रामेश्वरजी ने कहा, ‘सच कहूं तो मुझे इस हेतु मदद की आवश्यकता है भी किंतु मैं किसी से कहने से झिझकता हूं कि भला मेरी व्यक्तिगत समस्या में क्यों कोई दिलचस्पी ले कर मदद करेगा. आप ने पूछा है, मैं आभारी हूं और आप को अवश्य बताता हूं.

‘शालू मुझे छोड़ कर चली गई. कच्ची उम्र का नन्हा रोहन देखसुन तो सब रहा था किंतु समझ कम रहा था. शालू के जाने के बाद उसे शालू से तो नफरत हो गई किंतु प्यार वह मुझ से भी नहीं कर सका. उसी ने बैडरूम में लगी हमारी तसवीर कूड़ेदान में डालते हुए धमकी भरे लहजे में कहा, दोबारा मत लगाइएगा.

‘मुझे ऐसा महसूस होता है कि रोहन मुझे एक कमजोर इंसान मानने लगा है, जो अपनी पत्नी को न संभाल सका, भला वह क्या कर सकेगा? मातापिता की रोज की किचकिच ने उस का बचपन बरबाद कर दिया. इन झगड़ों से शायद खुद को असुरक्षित महसूस कर वह सख्त व रूखा बन बैठा है.’

मैं ने कहा, ‘आप ने ठीक कहा, भाईसाहब…मांपिता के झगड़ों से चिढ़ कर उस ने आप के साथ सख्त व रूखा व्यवहार अपना लिया है. वह आप को अपमानित कर संतुष्ट होता है.’

राजेश ने कहा, ‘मुझे भी ऐसा महसूस हो रहा है. वह आप को बेइज्जत करने का मौका ढूंढ़ता रहता है किंतु एक अच्छी बात है कि वह अपने हमउम्र के साथ अच्छा व्यवहार करता है. तभी तो उस के इतने दोस्त हैं. हमें उस के मन से इस गलत धारणा को निकालना होगा कि उस के पापा एक कमजोर इंसान हैं, हमें प्रयास कर उसे समझाना होगा कि उस के पापा एक मजबूत इंसान हैं जिन्होंने अपना जीवन उस की परवरिश हेतु न्योछावर कर दिया. वे भी तो दूसरा विवाह कर सकते थे, तब उस का क्या होता? उन्होंने स्वयं से ज्यादा रोहन पर ध्यान दिया. हम तीनों के प्रयास से मुझे पूरा विश्वास है कि रोहन का पूरा मैल धुल जाएगा तथा एक निर्मल, कोमल रोहन विकसित हो सकेगा.’

‘आप लोगों के सहयोग से यदि रोहन बदल जाता है, मेरा जीवन धन्य हो उठेगा, मैं आप लोगों का एहसान कभी नहीं भूलूंगा,’ रामेश्वरजी भावविह्वल हो बोले.

मैं तुरंत बोल पड़ी, ‘कर दी न, भाईसाहब, परायों वाली बात? अरे, अपनों के बीच एहसान कहां से आ गया?’

राजेश बोले, ‘देखिए रामेश्वरजी, हम ने अपने बेटे राजीव को प्यार से पालापोसा, पढ़ायालिखाया. आज वह विदेश में जा बैठा है तथा परायों सा व्यवहार कर रहा है. वह खुश है, यह सोच हम भी खुश हो लेते हैं. अब अपनी आंखों के सामने रोहन को भटकते देख रहे हैं. हम सब उसे सही रास्ते पर लाने का प्रयास करते हैं, अवश्य लाभ होगा.’

हम तीनों ने मिल कर तय किया कि औफिस के काम के बहाने रामेश्वरजी 4-6 दिनों के लिए शहर से बाहर जाएं जिस से हम रोहन के नजदीक आ सकें. रामेश्वरजी ने तय कार्यक्रम के अनुसार रोहन को बाहर जाने का कार्यक्रम बता दिया. उस ने उन की बातों का कोई जवाब नहीं दिया. रामेश्वरजी अपना सामान ले कर जा रहे थे, वह बेपरवा औंधेमुंह लेटा रहा.

#lockdown: लॉक डाउन में पत्नी के बदलते स्वर

रामी परेशान थी, देश में कोरोना के कारण 21 दिन का लॉक डाउन था. बच्चे और पति राज घर पर ही थे. हर वक़्त बच्चों के साथसाथ ये भी कुछ न कुछ फरमाइश करते रहते.

रामी को इस का कोई तोड़ नजर नही आ रहा था, तभी घर का काम करते हुए 3 अप्रैल की सुबह मोदी के 9 मिनट के भाषण की आवाज उस के कानों में सुनाई पड़ी :
5 अप्रैल, रात 9 बजे, 9 दीए… रामी  बस इतना ही सुन सकी, तभी छोटे बच्चे ने कार्टून का चैनल लगा दिया इसलिए पूरी स्पीच न सुन सकी.

पति राज छत से टहल कर नीचे आए और एक चाय की मांग कर डाली. उन्हें  नहीं पता था मोदी के इस भाषण के बारे में.

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पति राज कुछ समझ पाता, पत्नी रामी ने थैला थमाते हुए कहा कि पहले कहीं से 9 दीए का इंतजाम करो.

“क्यों…? क्या हुआ…? इन दीए का क्या करोगी…?” राज ने पूछने की गुस्ताखी की, “क्या लॉक डाउन में भी…”

“जी हां, पहले जो कहा है, वो करो,” रामी ने गुस्सा दिखाते हुए कहा.

“अच्छा, जो तुम कहोगी, वही होगा, पर पहले नहा तो लेने दो,” राज ने अपना पक्ष रखा.

राज कुछ सोचता हुआ नहाने बाथरूम की ओर चला गया.

राज जब नहा कर आया, तो उस  ने मुस्कान बिखेरते हुए रामी से एक कप चाय की फरमाइश कर दी.

चाय का नाम सुनते ही रामी
का पारा चढ़ गया,” पहले जो कहा है, उसे पूरा करो.”

नरम पड़ते हुए राज ने रामी से कहा,”क्या हुआ आज जो इतनी गुस्से में हो?”

“मैं गुस्से में नहीं हूं…” रामी ने नाराजगी छिपाते हुए कहा.

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“जब मैं आज घर का नाश्ता तैयार कर रही थी, तभी एक अच्छी स्पीच आ रही थी, जिस में कहा गया कि रविवार की रात 9 बजे 9 मिनट अंधेरा करें, फिर 9 दीए जला कर बालकनी में रखें.” रामी ने इतना ही कहा.

“तुम भी बेवजह हंगामा करती हो,” राज ने छोटे बेटे के हाथ से मोबाइल छीन न्यूज वाला चैंनल लगा दिया.

न्यूज़ सुन कर राज ने अपना सिर पीट लिया और बोला, “हंसी आती है ऐसी बातों पर. क्या इस से कोरोना अपनी चाल बदल लेगा? क्या यही है वायरस को मारने का अचूक फॉर्मूला? पहले अंधेरा कर दो. फिर कुछ देर तक तेज दिए या मोबाइल की फ्लैश चला दो. रोशनी से आंखें फेल जाएंगी. वायरस दिखेगा नहीं और चला जाएगा, कहानी समाप्त.”

“यह तुम क्या बोले जा रहे हो? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा,” रामी राज के अजीब चेहरे को देख कर बोली.

“तुम बस अपने घर पर ध्यान दो. इधरउधर की बातों में कम,” राज अजीब नजरों से रामी को देखता हुआ खुद ही चाय बनाने लगा.

राज को चाय बनाते देख रामी खुद ही असल बात पर आते हुए बोली, “मैं इन दोनों बच्चों से काफी तंग आ चुकी हूं, सारा दिन काम करतेकरते मैं भी थक जाती हूं. कमबख्त, ये लॉक डाउन नहीं हुआ, दिमाग का दही हो गया.”

राज ने रामी के गले मे हाथ डालते हुए कहा, “क्यों इतना नाराज़ हो?”

हाथ छिटकते हुए रामी बोली, “रहने दो आप भी. मैं ने भी अब तय कर लिया है कि आज रात 9 बजे इन बच्चों से बात करूंगी,” कहते हुए वह वहां से चली गई.

पूरे दिन खुटका रहा, रामी न जाने क्याक्या बच्चों से बोलेगी.

रात 9 बजे हम सब के लिए फर्श पर दरी बिछा दी गई.

ठीक रात के 9 बजते ही रामी ने 9 मिनट तकअंधेरा कर दिया, उस के बाद मोबाइल की फ्लैश जलाते हुए दरी पर बैठ गई.

यह हरकत देख बच्चे हैरानी से मां की ओर देखने लगे.

कुछ देर बाद राज ने लाइट जलाई और बच्चों के पास ही आ कर बैठ गए.

बच्चों की ओर देख कर रामी बोली, “मेरे प्यारो, पापा के दुलारो, आप सब का काम करतेकरते मैं थक गई हूं. लॉक डाउन के चलते सब ही घर में बैठे हैं और सिर्फ खाए जा रहे हैं, सो रहे हैं बस.”

“पूरे दिन मोबाइल पर गेम या व्हाट्सएप पर चैटिंग के अलावा टीवी के तमाम प्रोग्राम देखते रहते हैं.

“और, मैं पूरे दिन चकरघिन्नी की तरह इधर से उधर तुम सब की फरमाइश पूरी करने के लिए दौड़ती रहती हूं, इसलिए मैं ने बहुत सोचसमझ कर यह फैसला लिया है कि आज रात 12 बजे…” कहते हुए रामी ने थोड़ा पोज बदला, ध्यान से सुनिए, “आज रात 12 बजे…”

फिर रामी बच्चों की ओर देखने लगी… बच्चों के साथसाथ राज की भी सांस ऊपरनीचे हो रही थी. पता नहीं, क्या कहेगी. फिर मेरी ओर देख कर वह बोली, “आज रात 12 बजे से अब इस घर में मेरा लॉक डाउन रहेगा. आज से सब अपनाअपना काम खुद ही करेंगे, अगर आप चाहते हैं कि सबकुछ ठीकठाक चलता रहे तो आप को मेरे द्वारा बनाए नियम मानने होंगे.

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“सब से पहला नियम तो यह कि किचन अब इमर्जेंसी में ही खुलेगा, वह भी मेरी मरजी से. मतलब, सिर्फ ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर और वह भी लिमिट में.

“इस के अलावा शाम 4 बजे का स्नैक वाला प्रोग्राम नहीं होगा,चाय हो या कॉफी, सिर्फ सुबह और शाम ही मिलेगी. दिनभर किसी को चाय या कॉफी नहीं मिलेगी.

“दूसरा नियम यह कि खाने के स्वाद, मात्रा और क्वालिटी पर किसी को कुछ भी कहने का हक नहीं होगा.

“आप सभी को मेरे बनाए नियम मानने होंगे. यह नियम आज रात 12 बजे से ही लागू माने जाएंगे.”

फिर बच्चों की ओर उंगली दिखाते हुए रामी बोली,”अगर घर में ठीक ढंग से रहना है तो मेरे इन नियमों को मानना होगा, अन्यथा बाहर सड़क पर पुलिस वालों से मार खाने के लिए तैयार रहना.”

रामी की बात में सचाई थी, इसलिए सभी चुप थे. पति राज ने बच्चों की आंखों में देखा और एक मत से रामी के लिखे नियम पर दस्तखत कर दिए.

ऐसा देख रामी अपनी जीत पर इतराते हुए मुसकराई और बेडरूम की ओर विजयी मुद्रा में सोने चल दी.

टूटा जाल शिकारी का : भाग 3

परिजन व पुलिस उसे मुर्दा मान लेंगे, तो कोई उस की तलाश नहीं करेगा. प्रीति को ले कर वह कहीं दूर चला जाएगा और आगे का उस के संग जीवन गुजारेगा.

प्रीति भी चंद्रमोहन की इस योजना से सहमत हो गई. आपसी विचारविमर्श के बाद 30 अप्रैल, 2014 को योजना को अंतिम रूप दे दिया गया और अगले दिन यानी 1 मई की रात को उसे क्रियान्वित करने का निर्णय लिया गया. योजना को अंजाम देने के लिए चंद्रमोहन ने तुगलपुर स्थित पैट्रोल पंप से एक डिब्बे में 3 लीटर पैट्रोल भरवा कर कार में रख लिया.

1 मई की रात को 11 बजे सविता का भाई विदेश अंसल प्लाजा के आसपास घूमने वाले पागल युवक को बहलाफुसला कर मोटरसाइकिल पर बैठा लाया. चंद्रमोहन अपनी कार में बैठा पहले से उस का इंतजार कर रहा था.

चंद्रमोहन ने एक सुनसान जगह पर कार रोकी और विक्षिप्त युवक को पिछली सीट पर बैठा कर अपनी बेल्ट से उस का गला घोंट कर मार डाला.

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इस के बाद चंद्रमोहन ने अपने कपडे़ उतार कर विदेश को दिए, जिन्हें विदेश ने पागल के पहने कपड़े उतार कर उसे चंद्रमोहन के कपड़े पहना दिए. अपना फोन व पर्स भी चंद्रमोहन ने उस की जेब में रख दिया.

चंद्रमोहन ने पहले से ही अपने लिए एक जोड़ी कपड़े गाड़ी में रख रखे थे, जो उस ने खुद पहन लिए. इस के बाद चंद्रमोहन और विदेश ने मृत पड़े विक्षिप्त युवक का शरीर उठा कर गाड़ी की पिछली सीट पर रखा और कार को ड्राइव करते हुए अंसल प्लाजा के निकट होंडा कंपनी के सामने वाली जेपी ग्रीन वाली रोड पर ले गए.

पागल युवक के मृत शरीर को उन्होंने पिछली सीट से हटा कर ड्राइविंग सीट पर बैठाया गया और फिर सीट बेल्ट से उसे कस दिया, ताकि वह जीवित भी हो तो कार से उतर कर भाग ना सके. तब तक आधी रात का वक्त हो चला था. चंद्रमोहन और विदेश ने प्लास्टिक की कैन में भरा पैट्रोल कार पर चारों तरफ और भीतर की सीटों के साथ विक्षिप्त युवक पर अच्छी तरह से छिड़का. इस के बाद उन्होंने कार में आग लगा दी.

चंद पलों में ही कार धूधू कर के जलने लगी. कार को धूधू जलता देख दोनों मोटरसाइकिल से फरार हो गए. आधी रात का वक्त था. वहां से गुजरती कुछ गाडि़यों ने जब कार जलती देखी तो रुक गए. लेकिन तब तक कार इतनी बुरी तरह जल चुकी थी कि उसे बुझाने की हिम्मत किसी की नहीं हुई. किसी ने फायर ब्रिगेड को फोन कर दिया.

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सूचना मिलने के 15-20 मिनट बाद दमकल की गाड़ी भी मौके पर पहुंच गई. कुछ देर में आग पर काबू तो पा लिया गया. लेकिन तब तक कार जल कर कोयला हो चुकी थी. दमकलकर्मियों ने देखा कि कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे एक व्यक्ति की भी जलने से मौत हो गई थी.

मौके से फरार होने के बाद विदेश तो अपने घर चला गया, जबकि चंद्रमोहन ने ट्रेन से बंगलुरु की राह पकड़ ली. बंगलुरु पहुंच कर चंद्रमोहन ने सब से पहले अपने सिर के बाल और मूंछ मुंडवाई. फिर अपने शातिरदिमाग का इस्तेमाल कर जोड़तोड़ से उस ने नितिन शर्मा के नाम की एक आईडी बनवा ली.

नई आईडी बनवाते समय उस ने अपना पता नलवा, हिसार, हरियाणा दर्ज कराया. उस के बाद चंद्रमोहन ने अपनी पहचान से जुड़े दूसरे नकली दस्तावेज भी तैयार करवा लिए. इतना सब होने के बाद चंद्रमोहन ने अगले 4 दिनों में इन तमाम दस्तावेजों के बल पर होंडा टू व्हीलर कंपनी में नौकरी भी पा ली.

बंगलुरु में अज्ञातवास के दौरान चंद्रमोहन सेलफोन के माध्यम से प्रीति के साथ निरंतर संपर्क में रहा. आईडी बन जाने के बाद 7 जून को चंद्रमोहन प्रीति को ले जाने के लिए दिल्ली आया.

फोन के माध्यम से योजना पहले ही बन चुकी थी. योजना के तहत 7 जून की रात 8 बजे प्रीति अपने घर से इस तरह का नाटक कर के लापता हुई ताकि सब को लगे उस का अपहरण हो गया है.

प्रीति अपने लापता होने की घटना को अपहरण का रंग देना चाहती थी, इसलिए घर से बाहर निकलते ही उस ने हलक से हल्की सी चीख भी निकाली. किस्मत ने भी उस वक्त उस का साथ दिया और बिजली गुल हो गई.

घर से कुछ दूर पर ही प्रीति को एक आटोरिक्शा मिल गया, जिसे पकड़ कर वह दिल्ली पहुंच गई, जहां तय स्थान पर वह चंद्रमोहन से मिली. चंद्रमोहन ने पहले ही नई दिल्ली से बंगलुरु जाने वाली कर्नाटक एक्सप्रेस में 2 बर्थ आरक्षित करा रखी थीं.

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दोनों सीधे नई दिल्ली स्टेशन जा कर ट्रेन में सवार हो गए और अगले दिन बंगलुरु पहुंच गए. बंगलुरु पहुंचने के बाद चंद्रमोहन ने नकली आईडी से 2 सिम कार्ड खरीदे. वे जिन नंबरों को इस्तेमाल करते थे, वे नंबर दोनों ने किसी को नहीं दिए थे.

रिमांड अवधि में जब पुलिस ने चंद्रमोहन से संतराम को फोन करने का कारण पूछा, तो चंद्रमोहन ने बताया कि वह पुलिस को गुमराह करना चाहता था, इसीलिए उस ने पीसीओ पर जा कर संतराम को फोन कर के कहा था कि उन की बेटी उस के पास है.

लेकिन उस वक्त चंद्रमोहन ने यह कल्पना तक नहीं की थी कि उस की यही गलती उस की गिरफ्तारी का आधार बन जाएगी. क्योंकि इसी एक फोन काल का पीछा करतेकरते पुलिस प्रीति की तलाश में बंगलुरु पहुंच गई बंगलुरु में पुलिस जब प्रीति तक पहुंची तो पुलिस के हाथ चंद्रमोहन की गरदन तक पहुंच गए.

पुलिस रिमांड में हुई पूछताछ के दौरान इस मामले के जांच अधिकारी कासना थानाप्रभारी समरजीत सिंह ने 31 अगस्त, 2014 को चंद्रमोहन की निशानदेही पर जेपी ग्रीन की दीवार से 200 मीटर की दूरी पर फेंकी गई वह प्लास्टिक की कैन भी बरामद कर ली, जिस में पैट्रोल ला कर चंद्रमोहन ने पागल व्यक्ति के ऊपर डाल कर आग लगाई थी.

पुलिस ने अदालत में बतौर गवाह पैट्रोल पंप के उस सेल्समैन को भी पेश किया, जिस से चंद्रमोहन ने कैन में पैट्रोल खरीद कर भरवाया था.

पुलिस ने इस मामले में चंद्रमोहन के साले विदेश को भी हत्या में सहयोग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. बाद में तीनों आरोपियों को आवश्यक पूछताछ के बाद जेल भेज दिया गया.

जांच अधिकारी समरजीत सिंह ने 23 नवंबर, 2014 को एक विक्षिप्त युवक को कार में जला कर हत्या करने के आरोप में और खुद की पहचान छिपा कर दूसरे राज्य में छिपने के मुकदमे में हत्या की धारा 302 के साथ भादंसं की धारा 201, 202, 120बी, 420, 467, 468 व 471 की धारा भी जोड़ दी और आरोपपत्र अदालत में पेश कर दिया.

आरोपपत्र पर सुनवाई के दौरान ही बचावपक्ष की दलीलों के आधार पर अभियुक्ता प्रीति और विदेश के खिलाफ लगाए गए कुछ आरोपों को अदालत ने खारिज कर दिया था. बाद में मार्च, 2016 में यह वाद सुनवाई के लिए सत्र न्यायालय में भेज दिया गया.

इस मामले की जांच के दौरान पुलिस ने अदालत में चंद्रमोहन द्वारा कालोर की होंडा कंपनी में नौकरी पाने के लिए दी गई नकली आईडी व दूसरे दस्तावेज साक्ष्य के तौर पर पेश किए, जिस से उस के खिलाफ अपनी पहचान छिपाने के लिए जालसाजी करने और नकली दस्तावेज तैयार करने के आरोप सही पाए गए.

सरकारी वकील जिला सहायक शासकीय अधिवक्ता हरीश सिसोदिया ने अभियोजन की तरफ से ठोस सबूत दिए, लेकिन अभियोजन पक्ष इस बात को साबित नहीं कर पाया कि इस मामले में चंद्रमोहन के साले विदेश की कोई भूमिका थी. इसलिए अदालत ने उसे दोषी न पा कर बरी कर दिया.

अभियोजन की तरफ से चंद्रमोहन और प्रीति की दादरी के आर्यसमाज मंदिर में हुई शादी के प्रमाण भी अदालत में पेश किए गए. इतना ही नहीं, अभियोजन पक्ष की तरफ से ऐसे कई ठोस साक्ष्य और गवाह अदालत में पेश गए, जिस से ये साबित हो गया कि चंद्रमोहन ने एक साजिश के तहत अपनी प्रेमिका के साथ रहने के लिए अपनी मृत्यु का झूठा नाटक रचा.

खुद को मरा साबित करने के लिए चंद्रमोहन ने एक विक्षिप्त व्यक्ति की हत्या कर उस के शव को अपनी कार में डाल कर कार समेत जला दिया. चूंकि प्रीति को चंद्रमोहन के अपराध की जानकारी थी और उस ने ये जानकारी छिपाई, इसलिए उसे 6 माह के कारावास की सजा मिली.

प्रीति जेल से जमानत मिलने के पूर्व पहले ही न्यायालय की तरफ से मिली सजा काट चुकी थी, इसलिए उसे जेल नहीं जाना पड़ा. जबकि विदेश को इस मामले में अदालत ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया.

—कथा पुलिस की जांच व न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के तथ्यों पर आधारित है

अनोखा रिश्ता: भाग 1

राजीव उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए अमेरिका गया था लेकिन वहीं का हो कर रह गया. अच्छी पढ़ाई के फलस्वरूप उसे वहां बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई. नौकरी के 4 महीने के अंदर ही उस ने अपनी अमेरिकी सहकर्मी से शादी भी कर ली.

मैं मन ही मन सोचती, ‘सच में, आज की दुनिया बहुत ही तीव्रगति से भाग रही है. कुछ समय पहले तक मेरा राजीव खानेपहनने तक में मेरी सलाह लेता था, अब वह शादी जैसे अहम विषय पर भी खुद ही निर्णय लेने लगा.’

राजीव के व्यवहार से हम पतिपत्नी बहुत उदास थे. राजेश गंभीर स्वभाव के हैं, इसलिए प्रकट नहीं करते थे लेकिन मुझ से अपनी उदासी छिपाई नहीं जाती थी. राजेश मुझे समझाते, ‘सविता, उदास होने से कोई फायदा नहीं है, बेटा तरक्की कर रहा है, खुश है, यह सोच कर खुश रहो, ज्यादा उम्मीद न लगाओ.’ मैं उदासीनता से कहती, ‘राजीव की तरक्की से तो मैं बहुत खुश हूं लेकिन हमारे बारे में सोचना भी तो उस का कर्तव्य है. इसे वह कैसे भूल बैठा. अपने देश में नौकरी करता, यहां की लड़की से शादी करता, हमें भी अपनी खुशी में भागीदार बनाता. वह तो वहीं का हो कर रह गया.’

राजेश मुझे समझाते हुए कहते, ‘आज के युग में यह बहुत ज्यादा हो रहा है. हमारे देश के युवा विदेश की चकाचौंध से आकर्षित हो कर वहीं रचबस जाते हैं. हमारे कई परिचितों के बच्चों ने भी ऐसा किया है.’

‘मुझे बहुत आश्चर्य होता है, बच्चों के ऐसे व्यवहार पर,’ मैं ने कहा तो राजेश ने मुझे समझाते हुए कहा, ‘देखो सविता, राजीव के व्यवहार से स्पष्ट है कि वह लौट कर हमारे पास नहीं आ रहा है. अब तो उस के फोन भी बहुत कम आते हैं, आते भी हैं तो चंद सैकंड के लिए, मात्र औपचारिकता. वह अपनी दुनिया में मस्त है.’

कुछ पल बाद उन्होंने फिर कहना शुरू किया, ‘हम ने बड़े प्यार व शौक से यह दोमंजिला मकान बनवाया था क्योंकि हैदराबाद में राजीव को नौकरी मिल जाने की पूरी उम्मीद थी. वह भी हमेशा ऐसा ही कहा करता था. वह तो अमेरिका जाने के बाद अपनी कहीसुनी सारी बातें ही भूल बैठा. खैर, उस समय तो हम ने यही सोचा था कि राजीव यहीं नौकरी करेगा और शादी के बाद भी वह हमारे साथ ही रहेगा. यदि हम सब का तालमेल ठीक बैठा तब सब एक ही मकान में रहेंगे. यदि एकदूसरे से असुविधा महसूस हुई तब अलगअलग ऊपर व नीचे रह लेंगे. इस तरह से साथसाथ या पासपास रह सकेंगे.’

मैं ने उदासीनता से कहा, ‘अब तो न साथसाथ न ही पासपास रहना हो सकेगा.’ राजेश ने कहा कि ऊपर का हिस्सा किराए पर दे देंगे. मैं ने सहमति देते हुए कहा कि यही सही रहेगा. इस से कोई तो बात करने के लिए मिलेगा. पैसा तो हमारे पास ठीकठाक है. दोनों की पैंशन गुजरबसर के लिए काफी है. ऊपरी मंजिल किराए पर देने से सूनापन व अकेलापन जाता रहेगा.

इस विचार से हम ने घर के बाहर ‘टूलेट’ का बोर्ड लगा दिया.अगले ही दिन रामेश्वर दयाल बातचीत के लिए आ पहुंचे. उन्होंने बताया कि वे बैंक मैनेजर हैं. उन का बैंक हमारी ही कालोनी में है. उन के बेटे का इंजीनियरिंग कालेज हमारी कालोनी के नजदीक है. इसलिए वे हमारा मकान किराए पर लेने के इच्छुक हैं. हम दोनों को वे बेहद शालीन व सभ्य मालूम हुए. हम ने उन्हें मकान किराए पर दे दिया.

रविवार के दिन वे लोग हमारे घर में शिफ्ट हो गए. राजेश ने उन से आग्रह किया, ‘रामेश्वरजी, आज आप को सामान व्यवस्थित करना है, इसलिए आप लोग लंच हमारे साथ कीजिए.’ हंसमुख रामेश्वरजी ने कहा, ‘चलिए यही ठीक रहेगा. एक दिन तो अपने हाथ के खाने से छुटकारा मिलेगा,’ और वे ठहाका लगा कर हंस पड़े.

रामेश्वरजी अपने इकलौते बेटे रोहन के साथ लगभग 1 बजे खाना खाने आ गए. रोहन को देख मुझे बारबार राजीव की याद आ जाती, ठीक वही रंगरूप, कदकाठी, उठनेबैठने, बातें करने का तरीका भी बहुत मिलताजुलता. रोहन से बात करने, उसे खिलाने में मुझे विशेष आनंद महसूस हो रहा था.

रामेश्वरजी और रोहन के आ जाने से हमें स्वत: ही घर में चहलपहल सी महसूस होने लगी. अगले दिन सुबह रोहन की तेज आवाज सुनाई दी, ‘नहीं, मैं नहीं पीऊंगा बौर्नविटा, मुझे कौफी ही पीनी है.’

रामेश्वरजी मनुहार करते हुए बोले, ‘आज पी लो, बना दिया है. कल से कौफी ही बना दूंगा.’ रोहन, बालकनी से चिल्लाते हुए बोला, ‘मैं ने कह दिया न, नहीं पीऊंगा तो बस नहीं पीऊंगा, मेरे पीछे मत लगिए,’ और वह तेजी से सीढ़ी उतर गेट के बाहर निकल गया.

रामेश्वरजी यह कहते हुए उस के पीछे दौड़े, ‘थोड़ा रुको, मैं तुरंत कौफी बना देता हूं, प्लीज, पी कर जाओ.’रोहन तो गेट से बाहर निकल चुका था, रामेश्वरजी के पहुंचतेपहुंचते वह तो मोटरसाइकिल स्टार्ट कर नौ दो ग्यारह हो चुका था.

हम पतिपत्नी बागबानी में लगे हुए थे. हम दोनों ने पितापुत्र की सारी बातें सुनी थीं, किंतु अनसुने से बने अपने काम में लगे हुए थे. रामेश्वरजी ऊपर जाने के पहले एक मिनट के लिए ठिठके, बोले, ‘आप का बगीचा काफी सुंदर है. आप दोनों का ही बागबानी में मन लगता है. आप ने अपने किचन गार्डन में भी काफी कुछ लगा रखा है.’

राजेश ने हाथ धोते हुए कहा, ‘काफी कुछ तो नहीं, हां कुछकुछ लगा दिया है. रामेश्वरजी, क्या बताऊं ताजीताजी मूली, भिंडी, टमाटर, पालक का स्वाद ही कुछ अलग होता है.’

राजेश ने उन से चाय का आग्रह किया किंतु वे असहज महसूस कर रहे थे इसलिए व्यस्तता का बहाना बना ऊपर लौट गए. अगले दिन फिर रोहन के चीखने की आवाज सुनाई दी, ‘आप ने क्यों कौफी बनाई, मुझे कौफी नहीं पीनी, मैं बौर्नविटा पीऊंगा.’

रामेश्वरजी ने आहत स्वर में कहा, ‘तुम तो हद करते हो, आज कौफी बना दी तो तुम्हें बौर्नविटा चाहिए.’रोहन बदतमीजी से बोला, ‘आप यह सब क्यों करते हैं? मैं कोई बच्चा नहीं हूं, खुद बना लूंगा.’

रामेश्वरजी ने प्यार से कहा, ‘मुझे तुम्हारे लिए करना अच्छा लगता है.’

रोहन ने सख्त लहजे में कहा, ‘मुझे बुरा लगता है.’

रोहन यह आया, वह गया की तर्ज पर तेजी से मोटरसाइकिल से चलता बना. बेचारे रामेश्वरजी दौड़ कर भी उसे रोक न पाए.

हम पतिपत्नी बागबानी के बाद चाय का प्याला ले कर बगीचे में ही बैठे थे. राजेश ने आज फिर रामेश्वरजी से चाय का आग्रह किया. रामेश्वरजी मान गए. साथ चाय पीना, कुछ हलकीफुलकी बातें करना हम तीनों को ही अच्छा लगा.

आज रविवार का दिन था. पितापुत्र में बहस हो रही थी. तेज आवाज रोहन की ही थी. हम दोनों सोच ही रहे थे कि ऊपर जा कर देखते हैं कि माजरा क्या है. तभी रोहन बंदूक से छूटी गोली की तेजी जैसे दनदनाता हुआ निकला, गेट के बाहर सुमो गाड़ी में 8-10 लड़केलड़कियां लदे हुए थे तथा होहल्ला कर रहे थे. रोहन भी उस में सवार हो, होहल्ले में शामिल हो चलता बना सब के साथ. रामेश्वरजी पूछते ही रह गए, ‘कब तक लौटोगे, यह तो बताते जाओ?’ लेकिन रोहन को उन्हें सुनने व जवाब देने की सुध हो तब न.

हमें देख रामेश्वरजी हमारे साथ ही आ बैठे. हमारे आग्रह पर उन्होंने चायनाश्ता हमारे साथ ही किया.

घंटे डेढ़ घंटे बाद रामेश्वरजी ऊपर जाने का उपक्रम करने लगे. मैं ने कहा, ‘भाईसाहब, रोहन भी बाहर गया हुआ है. आप हमारे साथ ही लंच कीजिए.’

पहले तो वे कुछ सकुचाए किंतु बारबार आग्रह करने पर राजी हो गए.

खाना तो हम तीनों ने मिल कर बनाया. राजेश तो रोज ही मेरी कुकिंग में मदद करते थे. रामेश्वरजी भी यह कह कर साथ हो लिए, ‘चलिए, मैं तो रोज ही खाना पकाता हूं, थोड़ी मदद किए देता हूं.’

साथसाथ काम करते हुए काफी औपचारिकताएं खत्म हो गईं, इसलिए हम खुल कर बातें करने लगे. मैं ने कहा, ‘भाईसाहब, बुरा न मानें तो एक बात जानना चाहूंगी, वैसे इच्छा न हो तो ना कर दीजिएगा.’

रामेश्वरजी अचंभित से बोले, ‘कैसी बातें करती हैं, भाभीजी. जो पूछना हो पूछ लीजिए.’

मैं ने कहा, ‘भाईसाहब, मुझे यह बात दुविधा में डालती है कि आप ने अपने घर में अपनी पत्नी की एक भी तसवीर नहीं लगाई है?’

रामेश्वरजी धीरे से बोले, ‘भाभीजी, अब जब नाता ही नहीं रहा तब तसवीर लगाने का क्या मतलब?’

मैं ने आश्चर्य से पूछा, ‘नाता नहीं रहा, मतलब वे जीवित हैं?’

रामेश्वरजी ने फीकी मुसकान के साथ कहा, ‘हां, वह जीवित है, उस ने मुझे छोड़ दिया.’

मैं ने आश्चर्य से कहा, ‘यह सब ऐसे कैसे हो गया?’

रामेश्वरजी बोले, ‘मैं एक बैंक कर्मचारी हूं. बैंक इतना पैसा तो देता है कि ढंग से जीवन बसर हो जाए किंतु उसे बहुत ही हाईफाई जिंदगी पसंद थी. उस के पापा उच्च सरकारी अफसर थे, जिन्हें तनख्वाह के अलावा रिश्वत व उपहारों की भी आमदनी होती थी. वह अपने मातापिता की इकलौती संतान है इसलिए बेहिसाब पैसा खर्च करने की नहीं बल्कि बरबाद करने की भी उसे पूरी छूट थी.

‘मेरे पास उस के मायके जैसी आमदनी न थी. मैं अपनी पूरी तनख्वाह उस के हाथ में सौंप देता, किंतु मेरी तनख्वाह तो उस के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान साबित होती. ‘पैसे को ले कर वह मुझ से झगड़ती. वह भी पढ़ीलिखी थी. मैं ने उस से कहा, तुम भी नौकरी कर लो, आमदनी बढ़ने से मनमरजी खर्च कर सकोगी.

‘वह कहती, मेरे मातापिता को यह पसंद नहीं कि उन की राजकुमारी नौकरी करे.

‘मैं कहता, आजकल तो बड़ेबड़े घर की लड़कियां भी नौकरी कर रही हैं. इसीलिए झगड़ने से अच्छा है आमदनी बढ़ाई जाए. ‘वह कहती, हमारी कालोनी में मेरी मां की एक सहेली हैं, उन के पति भी बैंक मैनेजर हैं. वे तो अच्छा कमा लेते हैं. वे लोग तो बड़े ठाट से रहते हैं. उन्हें देख कर ही मैं ने तुम से शादी के लिए हां की थी.

‘मैं ने उसे समझाया, देखो शालू, मैं रिश्वत लेना और देना दोनों ही गलत मानता हूं. तुम नौकरी नहीं करना चाहतीं, मत करो. मेरी तनख्वाह में शांति से रहो.‘शालू को तो ऊपरी कमाई का नशा चढ़ा हुआ था. उस ने बचपन से ऊपरी कमाई का आनंद उठाया था. वह मायके से पैसा लाना चाहती जिस के लिए मैं ने उसे साफ कह दिया था कि यदि वह वहां से पैसा लाएगी तो मैं जान दे दूंगा.

‘शालू ने मितव्ययिता से रहना सीखा ही न था. इसलिए पैसे के लिए नित्य झगड़ना ही उस का काम बन गया था. रोहन का तकाजा देने से भी वह नहीं रुकती थी.’

मैं ने कहा, ‘अमीर मायका होने के कारण समझौता न कर पाईं और मायके जा बैठीं.’

रामेश्वरजी ने कहा, ‘मायके जा बैठतीं तो इतना दुख न होता किंतु वह तो…’ इतना कहते हुए उन की आंखों से आंसू टपक गए. हम सभी शांत हो गए. उन्होंने फिर कहना आरंभ किया, ‘उस दौरान मेरा एक कालेज का दोस्त औफिस के काम से आया तथा मेरे घर पर मिलने भी आया. वह आया तो 2 दिनों के लिए था किंतु यह कहते हुए हफ्तेभर के लिए रुक गया कि यार, अब आया हूं तो रुक जाता हूं, बारबार आना तो होता नहीं, इसी बहाने अपने यार से जीभर कर बातें भी हो जाएंगी. मैं भी खुश हो गया कि चलो अच्छा है, इस बहाने पुरानी यादें ताजा होंगी और शालू के झगड़ों से अवकाश भी मिल जाएगा.

 गोएबल्स मेरे गुरूवर

मैंने राजनीति से एक पते की बात सीखी है. आप कहेंगे क्या सीखा है ?

मैं कहूंगा -जीवन का सच.

आप कहेंगे- हम समझे नहीं ?

मैं कहूंगा- समझ जाएंगे, समझ जाएंगे. जरा धैर्य से मेरी बात सुनो .

आप कहेंगे- धैर्य ? राजनीति से सीख और धैर्य! भाई, यह तो स्वभाविक जिज्ञासा  पैदा करने वाली बात है,शीघ्र बताइए न !

मैं कहता हूँ – यूं तो राजनीति से बहुत कुछ सीखा जा सकता है, मगर मैंने एक चीज सीखी है और सीखी ही नहीं जीवन में धारणा की है.

आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे. कहेंगे- अच्छा ? जरा हमें भी सुनाइए तो सही .

मैं कहता हूँ -तो सुनिए .मैंने एक ही चीज  सीखी है .अपनों पर कोई कैसा भी फुहड अरोप लगाया जाए  उसे सुनों  और नकार दो . राजनीतिक विरोधियों पर जरा सा दाग लगे, तो तालियां बजाओ और हो हो कर सड़क के आदमी की तरह अट्टाहास लगाओ और ऐसा व्यवहार प्रदर्शित करो मानो किला फतह हो गया हो. आशा है, आप मेरे ज्ञान की बात समझ चुके होंगे .मैं देख रहा हूं, आपका चेहरा विचित्र हाव-भाव के साथ मेरी ओर है.आपकी आंख मेरे चेहरे पर लगी हुई है. चेहरे पर जो हाव-भाव आ जा रहे हैं. मैं उन्हें पढ़ सकता हूं.

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आप कहेंगे – यार, रोहरानंद! यह क्या बात हुई .यह भी कभी शोभा देता है.

मैं कहता हूँ – दोस्त, यही शोभा देता है. राजनीति में समानधर्मा होना पड़ता है, अगर घाघ और बेशर्म का मेल नहीं हुआ तो राजनीतिक न घर के रहेंगे, न घाट के. राजनीति में मोटी चमड़ी का होना निहायत निरापद है. अगर आरोप से घबरा गए, तो एक क्षण भी सत्ता में नहीं रह सकते. ऐसे ऐसे झूठे आरोप लगाए जाते हैं की आप का इस्तीफा अवश्यंभावी है. अतः बुद्धिमानी इसी में है की कोई सौ फीसदी सही आरोप भी लगाए, तो शब्दों का संजाल खड़ा  कर दो . हिटलर के सलाहकार गोयबल्स को अपना गुरु मानो और  नकारो. गोयबल्स का मंत्र था सौ बार झूठ कहने से, वह  सत्य हो जाता है. सो, सौ क्या, हजार बार अपने हित की बात को कहो. जनता कंफ्यूज हो जाएगी और फिर पतली गली से निकल लो.मित्रों ! यह रोहरानंद आपको लाख रुपए की बात बता रहा है, गांठ बांध लो,जीवन सफल हो जाएगा. सुनो! कभी भी चेहरे पर शिकन मत आने देना. कोई रंगे हाथ पकड़ ले, तब भी चेहरे पर मुस्कुराहट या गंभीर भाव रखना और अपने हित की बात कहना .उदाहरणार्थ राजनीति में भ्रष्टाचार करते रंगे हाथ पकड़े जाओ, तब क्या करोगे ? सुनो -चेहरे पर आत्मविश्वास का भाव लेकर आना.आप कहेंगे- यार रोहरानंद! क्यों हमें मूर्ख बना रहे हो ऐसा कहां संभव है. भ्रष्टाचार करते पकड़े जाने पर आधी हिम्मत तो यूं ही टूट जाती है .फिर साहस करके अपनी बात कैसे कहूंगा.

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मैं कहता हूं- सुनो! यह समझना, मैं अभिनय कर रहा हूं. सामने वाले सभी साधारण लोग हैं, मैं असाधारण व्यक्ति हूं. सेलीब्रिटी हूं .मुझ पर देश की नजर है, मै पकड़ा गया तो देश का क्या होगा ? मैं देशवासियों का आदर्श हूं. संपूर्ण देश- मुझे सम्मान से देखता है, अब अगर रंगे हाथ पकड़े जाने पर भ्रष्टाचार स्वीकार कर लूं तो इस देश का क्या होगा ? देश तो टूट ही जाएगा. सो, मैं कभी भी यह स्वीकार नहीं करूंगा कि हां, मैंने भ्रष्टाचार किया है, मैं कहूंगा, यह हमारी छवि खराब करने का षड्यंत्र है. जब बात बिगड़ी तो चार-छ: बड़े लोगों का स्टेटमेंट जारी करवा दूंगा कि मैं भला क्यों और कैसे भ्रष्टाचार कर सकता हूं. और ज्यादा बात बिगड़ी तो मैं जांच करवाने की बात कहूंगा. और बढी तो पूरे धमक के साथ कहूंगा अगर आरोप सत्य सिद्ध हुए तो राजनीति छोड़ दूंगा. मैं संन्यास ले लूंगा. मगर असल मे मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा. सत्ता मिलना कितना दुष्कर है, मैं क्या इतनी आसानी से हार मान जाऊंगा ? तो मित्रों ! आप भी मेरे अर्जित ज्ञान का लाभ उठा सकते हैं, अगर मेरे पद चिन्हों पर चले तो रोहरानंद को गर्व होगा.

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