बनारस की दिव्या को मम्मी -पापा का साथ जरूर अच्छा लगता है, लेकिन हर बात पर मम्मी को टोकना उसे पसंद नही है. दिव्या चाहती है कि  उनके मम्मी -पापा उसके ऊपर भरोसा करें , क्योंकि वह दबे सवार में यह स्वीकारती है कि  हां -  मम्मी-पापा उनके मस्ती में ब्रेकर की तरह है. वह यह भी स्वीकार करती है कि कई दफा उसकी लड़ाई अभिभावकों से हो चुकी है. वही दिल्ली के साकेत की आरुणा का मानना है कि माता-पिता  से अच्छा दोस्त कोई नही , लेकिन आरुणा भी यह कहती है कि हां-मुझे हर गलती पर करार डांट पड़ता है, जो कुछ पल के लिए मुझे अपने अभिभावकों के बारे में गलत सोचने को मजबूर कर देता है. मेरठ के अजय चौधरी तो खुल कर कहते हैं, मै उसी क्षेत्र में करियर बनाना पसंद करुंगा जो मुझे पसंद है. अजय बताते है कि  12 वीं के बाद उनके  पिता कि इच्छा इन्हे इंजीनियर बनाने का था लेकिन उनकी रूचि निजी क्षेत्र में काम करने का था , इसलिए उन्होंने अभिभावक के इच्छा के विरोध जाना सही समझा, कुछ समय तक उनके पिता उनसे नाराज रहे फिर स्थिति सामान्य हो गई. आज अजय एक निजी संस्था में काम करते हुए अपने निजी जीवन में काफी खुश है.  इस प्रकार के कई उदाहरण है, बच्चो को दबे स्वर में अभिभावकों के विरोध आवाज बुलंद करने की.

Tags:
COMMENT