Download App

Meditation Posture : ध्यानमुद्रा में बैठना स्थिर पानी की तरह सड़ना “शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भी रहें सक्रिय”

Meditation Posture : हारवर्ड के बिजनैस स्कूल के एक प्रोफैसर क्लेटन क्रिस्टेंसन का कहना है कि शारीरिक और मानसिक सक्रियता आपस में जुड़ी है और जो स्थिर बैठे रहते हैं वे कुछ नया नहीं कर पाते हैं. जिन्होंने नया अनुसंधान किया या नई खोज की वे हमेशा बेचैनी से घूमते, हिलतेडुलते, चलते रहते हैं. वे नई जगह देखते हैं, नए रास्तों पर चलते हैं, नई चीजें सीखते हैं और पुराने कामों को एकदम नए ढंग से करने की सोचते हैं.

ध्यानमुद्रा में वर्षों एक जगह स्थिर बैठ कर तपस्या करने वालों को समाज तो सिरआंखों पर रखता है लेकिन वह घिसीपिटी लाइनों पर चलता है और तालाब के स्थिर पानी कर तरह सड़ जाता है. ज्यादातर धार्मिक अनुष्ठान बिलकुल एक पैटर्न को फौलो करते हैं और इसीलिए अतिधार्मिक स्थानों में कुछ नया नहीं होता. आप के घरपरिवार में ऐसा हो रहा है क्या?

Egyptian Pyramid : फैरो के फेर में मिस्रवासी – खुद को खून चूसने वाले मकडज़ाल में फंसा लिया

Egyptian Pyramid : पुजारियों की क्षमता कितनी हो सकती है, इस का अंदाजा मिस्र की 500 साल पुरानी सभ्यता से लगाया जा सकता है जब सैकड़ों पिरामिड बने. मिस्र के लोगों को विश्वास दिला दिया गया था कि फैरो न केवल देवताओं/ईश्वर का दूत है बल्कि वह खुद ईश्वर/देवता है और उस को खुश रखना हर मिस्र वाले का कर्तव्य है.

मिस्रवासी उन कहानियों में विश्वास रखते थे कि असल में उन का जन्म, जीवन व मृत्यु उस ईश्वरीय फैरो के हाथ में है जो उन की तरह ही बिफर पड़ता था, खाना खाता था, लड़ाई में लडऩे जाता था और मरता था. उस की मृत्यु को ईश्वरीय बनाने के लिए पुरोहितों ने विशाल पिरामिड बनवा दिए जहां मृत फैरो का शव रखा जाता था.

उस के बाद की सभ्यताओं में मिस्र की बात लुप्त हो गई. सभ्यता से सीखा या नहीं लेकिन उन्होंने ईश्वर के संदेशवाहकों, पुत्रों, अवतारों की कहानियों को पुरोहितों से सुन कर मान लिया और खुद को कठोर नियमों के खून चूसने वाले मकडज़ाल में फंसा लिया.

Hindi Love Stories : दो चेहरे वाले लोग – मुकुंद क्या सोचकर हैदराबाद गया था?

Hindi Love Stories : रश्मि जीजाजी का दोगलापन देख हैरान रह गई थी. बेटों जैसी पलीबढ़ी बेटी पर तो उन्हें फख्र था परंतु बहू को आजादी देने के पक्ष में वे न थे. दो चेहरों वाले इस इंसान का कौन सा चेहरा असली था, कौन सा नकली, क्या कोई जान सका? वैसे, जीजी मेरी सगी बहन तो नहीं, लेकिन अम्मा और आपा ने उन्हें हमेशा अपनी बेटी के समान ही माना. इसलिए जब मेरे पति ने मुंबई की नौकरी छोड़ कर हैदराबाद में काम करने का निश्चय किया,

तब आपा ने नागपुर से चिट्ठी में लिखा, ‘अच्छा है, हमारे कुछ पास आओगे तुम लोग. और हां, जीजी के हैदराबाद में होते हुए फिर हमें चिंता कैसी.’ जीजी बड़ी सीधीसादी, मीठे स्वभाव की हैं. दूसरों के बारे में सोचतेसोचते अपने बारे में सबकुछ भूल जाने वाले लोगों में वे सब से आगे गिनी जा सकती हैं. अपने मातापिता, भाईबहन, कोई न होने पर भी केवल निस्वार्थ प्रेम के बल पर उन्होंने सैकड़ों अपने जोड़े हैं. ‘लेकिन, तुम्हारे जीजाजी को वे जीत नहीं पाई हैं,’ मुकुंद मेरे पति ने 2-3 बार टिप्पणी की थी. ‘जीजाजी कितना प्यार करते हैं जीजी से,’ मैं ने विरोध करते हुए कहा था, ‘घर उन के नाम पर, गाड़ी उन के लिए, साडि़यां, गहने…

सबकुछ.’ मुकुंद ने हर बार मेरी तरफ ऐसे देखा था जैसे कह रहे हों, ‘बच्ची हो, तुम क्या सम?ागी.’ हैदराबाद आने के बाद मेरा जीजाजी के घर आनाजाना शुरू हुआ. घरों में फासला था पर मैं या जीजी समय निकाल कर सप्ताह में एक बार तो मिल ही लेतीं. अब तक मैं ने जीजी को मायके में ही देखा था. अब ससुराल में जिम्मदारियों के बोझ से दबी, लोगों की अकारण उठती उंगलियों से अपने भावनाशील मन को बचाने की कोशिश करती जीजी मुझे दिखाई दीं, कुछ असुरक्षित सी, कुछ घबराई सी और मैं केवल उन्हें देख ही सकती थी. जीजी की बेटी शिवानी कंप्यूटर इंजीनियर थी. वह मैनेजमैंट का कोर्स करने के बाद अब एक प्रतिष्ठित फर्म में अच्छे पद पर काम कर रही थी. जीजाजी उस के लिए योग्य वर की तलाश में थे. मैं ने कुछ अच्छे रिश्ते सुझाए भी पर जीजाजी ने मुंह बनाते हुए कहा, ‘‘क्या तुम भी रश्मि, शिवानी की योग्यता का कोई लड़का बताओ तो जानें.’’

‘‘लेकिन जीजाजी, उमेश बहुत अच्छा लड़का है. होशियार, सुदर्शन, स्वस्थ, अच्छा कमाता है. कोई बुरी आदत नहीं है.’’ ‘‘पर, उस पर अपनी 2 छोटी बहनों के विवाह की जिम्मेदारी है और उस का अपना कोई मकान भी नहीं,’’ जीजाजी ने एकएक उंगली मोड़ कर गिनाना चाहा. ‘‘यह तो दोनों मिल कर आराम से कर सकते हैं. शिवानी भी तो कमाती है,’’ मैं ने उन की बातों को काटते हुए कहा. ‘‘देखो रश्मि, मैं ने अपनी बेटी को बेटे की तरह पाला है. उसे उस की काबिलीयत का पैसा मिल रहा है. इतने सालों की उस की कड़ी मेहनत, मेरा मार्गदर्शन अब जा कर रंग लाया है. वह सब किसी दूसरे के लिए क्यों फूजूल में फेंक दिया जाए?’’ मैं स्तब्ध रह गई, जीजी की कितनी ही चीजें जीजाजी की बहनें मांग कर ले जाती थीं. हम लोगों की तरफ से दिए गए उपहार ‘उफ’ तक मुंह से न निकालते हुए जीजी ने अपने देवरों को उन के मांगने पर दे दिए थे. मां कभी पूछतीं, ‘‘आरती,

वह पेन कहां गया जो तुम्हें पिछली दीवाली में भैया ने दिया था.’’ जीजी बेहद विनम्रता के साथ कहतीं, ‘‘रमन भैया ने परीक्षा के लिए लिया था, पसंद आ गया तो पूछा कि मैं रख लूं, भाभी. मैं मना कैसे करती, मां.’’ एक बार भैया दीदी के लिए भैयादूज पर एक बढि़या धानी साड़ी लाए थे. तब जीजी की सहेली अरुणा दीदी भी उन से मिलने के लिए आई थीं. उन्होंने छूटते ही कहा, ‘‘मत दो इस पगली को कुछ भी. साड़ी भी ननद ने मांग ली तो दे देगी.’’ तब जीजी ने अपनी मुसकान बिखेरते हुए कहा था, ‘‘वे भी तो मेरे अपने हैं. जैसे मेरे भैया, मेरी रश्मि, मेरी अरुणा.’’ अब उसी जीजी की बेटी को पिता से क्या सीख मिल रही थी. मैं ने जीजा की ओर देखा. वह काम में मगन थे.

जैसे उन्होंने सुना ही न हो. मुकुंद कहते हैं, ‘‘मैं कुछ ज्यादा ही आशावादी हूं, दीवार से सिर टकराने के बाद भी दरवाजे की टोह लेती रहती हूं.’’ जीजी के बारे में मैं कुछ ज्यादा भावुक भी तो हूं. शिवानी, हालांकि कुछ नकचढ़ी है, फिर भी बचपन से उसे देखने के कारण उस से लगाव भी तो हो गया है. इसलिए बारबार प्रस्ताव ले कर आती हूं. ‘‘क्या रश्मि, तुम ने बताया था न पता. वहां चिट्ठी भेजी थी,’’ एक दिन जीजाजी बोले, ‘‘कौन, वह बेंगलुरु वाला.’’ मैं कुछ उत्साहित हो गई. ‘‘हां, वही महाशय, उन की यह लंबीचौड़ी चिट्ठी आईर् है. मैं इसे पढ़ कर तुम्हें सुना देता पर ऐसी मूर्खताभरी बातों का मैं फिर से उच्चारण नहीं करना चाहता.’’ ‘‘इस में उन की क्या गलती है,’’ जीजी ने पहली बार चर्चा में भाग लिया, ‘‘वे लोग चाहते हैं कि उन की बहू को गाना आना चाहिए. वे सब गाते हैं.’’

‘‘तुम चुप रहो, आरती,’’ जीजाजी की आवाज में कड़वाहट थी, ‘‘शिवानी को गाना ही सीखना होता तो कंप्यूटर इंजीनियर क्यों बनती. अरे, घंटेभर के गाने के लिए 1,000-1,200 रुपए दे कर वह जब चाहे 10-12 गाने वालों का गाना सुनवा सकती है. तुम भी आरती…’’ ‘‘लेकिन जीजाजी, उन्होंने तो अपनी अपेक्षाएं आप को बता दी हैं. वह भी आप ने संपर्क किया तब,’’ मैं ने कहा. ‘‘तुम दोनों बहनें पूरी गंवार मनोवृत्ति वाली बन रही हो,’’ शिवानी ने कहा, ‘‘लड़की है, इसलिए उसे रंगोली बनाना, गाना गाना, खाना बनाना आदि आना ही चाहिए. यह सब विचार कितने दकियानूसी भरे हैं. अब हम लड़कियां बैंक, औफिस आदि हर जगह मर्दों की तरह कुशलता से सबकुछ संभालती हैं तो सिलाईबुनाई अब मर्द क्यों नहीं सीखते.’’ ‘‘शिवानी, अगर तुम्हें कोई लड़का पसंद नहीं है तो मना कर दो पर किसी की अपेक्षाओं की खिल्ली उड़ाना कहां तक उचित है,’’ जीजी का स्वर जरा ऊंचा था. ‘‘तुम मेरी बेटी पर किसी तरह का दबाव नहीं डालोगी,’’ जीजाजी ने एकएक शब्द अलग करते हुए सख्त आवाज में कहा, ‘‘मैं ने देखा है, रश्मि साथ होती है तब तुम्हें कुछ ज्यादा ही शब्द सूझते हैं.’’ मैं दंग रह गई और जीजी चुप.

हम क्या शिवानी की या जीजी के ससुराल वालों की दुश्मन थीं, जो दोनों साथ मिल कर शब्दयुद्ध छेड़तीं. मुकुंद को मैं ने यह सब बताया ही नहीं. शायद वह जीजी के घर से संबंध कम करने के लिए कहते. जीजी की दुनिया में मैं शीतल छाया बन कर रहना चाहती थी. कितना कुछ झेला होगा जीजी ने आज तक. जीजाजी के सभ्य, सुसंस्कृत चेहरे के पीछे इतना जिद्दी, इतना स्वकेंद्रित व्यक्ति होगा, यह किसे पता था. मेरी जीजी से सारे परिवार के लिए स्वेटर बुनवाने वाले जीजाजी अपनी बेटी के बारे में इतना अलग दृष्टिकोण क्यों अपनाते होंगे. आएदिन अपने दोस्तों के लिए मेहमाननवाजी के बहाने जीजी को रसोई में व्यस्त रखते थे, जीजाजी. क्या खाना बनाना सुशिक्षित लड़कियों के लिए ‘बिलो डिग्निटी’ है. जीजी भी तो पढ़ीलिखी हैं. पढ़ाने की क्षमता रखती हैं.

अपने बच्चों की पढ़ाई में कई सालों तक सहायता करती रहती हैं. बाहर की दुनिया में कदम रखते ही अगर औरत ही घर को भुला देगी तो घर सिर्फ ईंटों का, लोहे का, सीमेंट का एक ढांचा ही तो रहेगा. उस का घरपन कैसे टिक पाएगा? करीब 2 साल के बाद शिवानी का विवाह हो गया. ससुराल के लोग बड़े अच्छे हैं. दामाद तो हीरा है पर अमेरिका में नौकरी कर रहा है, जहां शिवानी को खाना भी बनाना पड़ता है. झाड़ू, बरतन, कपड़े सबकुछ करती है वह. उस से अधिक पढ़ेलिखे, अधिक कमाने वाले जमाई राजा भी उस का हाथ बंटाते हैं. सुखी दांपत्य के लिए पतिपत्नी को एकदूसरे के कामों में हाथ तो बंटाना ही पड़ता है. जीजाजी जा कर सबकुछ देख आए हैं. मैं ने एक दिन नौकरों के बारे में पूछ ही लिया. ‘‘क्या पागलों जैसे सवाल करती हो रश्मि,’’ उन्होंने डांटा, ‘‘वहां नौकर नहीं मिलते.

हर व्यक्ति को अपना काम स्वयं करना पड़ता है. भई, अपना काम खुद करने में वहां के लोग संकोच नहीं करते. उन का मानना है कि व्यक्ति को आत्मनिर्भर होना चाहिए. फिर मेरे दामाद मदद भी तो करते हैं, अमेरिका में महिलाओं की बड़ी इज्जत है.’’ मैं ने चुप रहना ही उचित समझ. अमेरिका में महिलाओं की इज्जत किस प्रकार होती है, इस बारे में कौन क्या कह सकता है. काम में हाथ बंटा कर, वक्त आने पर पत्नियों को मारने वाले, पत्नी को छोड़ कर दूसरी स्त्री के साथ जाने वाले या छोटे से कारण से तलाक देने वाले अमेरिकी पतियों की संख्या के बारे में कौन नहीं जानता है. फिर उन की संस्कृति की प्रशंसा करने वाले जीजाजी अपने घर में एक गिलास पानी भी खुद हाथों से ले कर नहीं पीते, यह क्या मैं ने देखा नहीं. खैर, दो चेहरे वाले लोगों के झंझट में कौन सिर खपाए.

‘‘अविनाश के लिए अब ढेरों रिश्ते आ रहे हैं,’’ चाय पीते हुए जीजाजी बोले, ‘‘लड़की वालों को पता है कि ऐसा अच्छा घरवर और कहीं तो बड़ी मुश्किल से मिलेगा.’’ उन्होंने गर्व से जीजी की तरफ देखा. जीजी प्लेट में बिस्कुट सजाने में मगन थीं. ‘‘आप की बात सौ फीसदी सच है, जीजाजी,’’ मैं ने कहा, ‘‘रूप, गुण, शिक्षा, वैभव क्या कुछ नहीं है हमारे अविनाश के पास और जीजी जैसी ममतामयी सास,’’ इतना कह कर मैं ने प्यार से जीजी के गले में अपनी बांहें डाल दीं. ‘‘क्या चाहिए, रश्मि,’’ जीजा ने पूछा, ‘‘इतना मस्का क्यों लगा रही हो जीजी को.’’ ‘‘अविनाश की तसवीर और बायोडाटा दे दो. तुम्हारे लिए 2-4 अच्छी बहुएं लाऊंगी, जिन में से शायद एक तुम्हें पसंद भी आ जाए.’’ ‘‘जरा देखपरख के लाना रिश्ते,’’ जीजाजी ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘आजकल की लड़कियां बहुत तेजतर्रार हो गई हैं.’’ ‘‘मतलब…’’ ‘‘अरे, 4 दिनों पहले एक लड़की के मातापिता मिलने आए थे.

वैसे तो वे हैदराबाद किसी की शादी में आए थे, लेकिन जब अविनाश के बारे में उन्हें पता चला तो अपनी बेटी के लिए रिश्ता ले कर मिलने आ गए.’’ ‘‘अच्छी थी लड़की?’’ मैं ने उत्सुकता से पूछा. ‘‘फोटो लाए नहीं, पर हां, जानकारी तो प्रभावित करने वाली थी,’’ जीजाजी ने बताया, ‘‘उन की बेटी ने एमबीए किया है और पिछ?ले 6 सालों से पुणे में नौकरी कर रही है. अगर अविनाश पुणे में कोई नौकरी कर ले तो काम हो सकता है.’’ ‘‘अच्छा, और अविनाश का यहां का काम.’’ ‘‘वही तो मैं कह रहा हूं. आजकल तो लड़की वालों के बातविचार ही समझ में नहीं आते. उन की लड़की एक एमबीए डिगरी को छोड़ कर और किसी चीज में निपुण नहीं है और 8 साल से यहां काम जमा कर बैठा हुआ मेरा बेटा शहर छोड़ कर वहां जाए.’’ ‘‘मना कर देते आप,’’ जीजी ने धीरे से कहा. ‘‘वही तो किया. लेकिन आरती, इन इंजीनियर, डाक्टर लड़कियों के मातापिता सोचते हैं कि उन्होंने जैसे आकाश छू लिया है.

अगर लड़की उन्नीस है तो लड़का भी तो बीस या इक्कीस वाला ही ढूंढ़ेंगे न? फिर इतनी शर्तें, इतना घमंड क्यों.’’ जीजी बोलीं, ‘‘आजकल लोग लड़कालड़की की परवरिश में फर्क नहीं करते. उन्हें भी अपनी अपेक्षाएं बताने का हक है.’’ ‘‘अरे भई, शिक्षादीक्षा, खानापीना, लाड़प्यार सभी में लड़केलड़की बराबर होंगे तब भी फर्क तो रहेगा न,’’ जीजाजी बोले, ‘‘बहू इस घर में आएगी, अविनाश उस घर को नहीं जाने वाला.’’ बातों से लगा कि जीजाजी अब चिढ़ गए हैं. ‘‘लेकिन जीजाजी, आजकल दोनों की कमाई में फर्क नहीं है. समान अधिकार हैं स्त्रीपुरुष के.’’ ‘‘देखो रश्मि, हम लोगों को बहू चाहिए, नौकरी नहीं. इस घर को एक कुशल गृहिणी की जरूरत है, अफसर की नहीं. अगर लड़की होशियार है, कोई काम कर रही है तो इस घर से उसे पूरा सहयोग मिलेगा, लेकिन अगर वह घर से ज्यादा महत्त्व अपने कैरियर को देना चाहती है तो उसे शादी नहीं करनी चाहिए.’’ ‘‘जीजाजी, आप ने मेरे सामने यह अभिप्राय बता दिया तो ठीक है, लेकिन किसी आधुनिक विचारों वाली लड़की के सामने मत बोलिएगा.

?ागड़ा हो जाएगा.’’ ‘‘होने दो, लेकिन अपने अनुभव की बातें बताने से मुझे कोई नहीं रोक पाएगा,’’ जीजाजी की आवाज कुछ ऊंची उठ गई, ‘‘उस दिन एक महाशय पत्नी के साथ आए थे. कहने लगे कि उन की बेटी को विदेश जाने का मौका मिलने वाला है तो क्या अविनाश उस के साथ अपने खर्च से जा पाएगा?’’ ‘‘फिर…’’ ‘‘मैं ने कह दिया कि महाशय, मेरे बेटे को विदेश जाने का मौका मिलता तो पत्नी का खर्चा वह खुद देता और उसे साथ ले जाता. उन की बेटी भी तो मेरे बेटे का टिकट खरीद सकती है. दोनों की कमाई में फर्क नहीं. अधिकार समान है, फिर यह दोहरा मानदंड क्यों?’’ मैं चुप्पी लगा गई. अगर कहती कि जीजाजी, दोहरे मानदंड वाले तो आप हैं. शिवानी की शादी के समय आप के विचार कुछ अलग थे और आज बेटे की शादी के समय में कुछ अलग हैं. जीजी ने कितनाकुछ खो कर घरपरिवार को, संस्कृति के मूल्यों को बरकरार रखा था. जीजाजी समझदार होते तो जीजी अपने व्यक्तित्व को गरिमामय रख कर भी वह सबकुछ कर सकती थीं. कोई काम भी कर सकती थीं.

जीजी को खरोंचने का काम अकेले जीजाजी करते थे. बेटी और बहू में फर्क करने वाली सास पर अनेक धारावाहिक देखने और दिखाने वाले समाज में जीजाजी जैसे कई पुरुष भी हैं जो पत्नी और बेटी के सम्मान में जमीनआसमान का अंतर रखते हैं. मैं जब सीधीसादी पर समझदार नंदिनी का रिश्ता ले कर गई, तब मुझे जीजाजी की पसंद पर कोई खास भरोसा नहीं था. मेरे मन में जीजी के लिए एक अच्छी, प्यार और सम्मान देने वाली बहू लाने की इच्छा इतनी प्रबल न होती तो मैं जीजाजी के सामने इतने सारे प्रस्ताव न रखती. मुझे पता था कि अविनाश को नंदिनी पसंद आएगी, क्योंकि वह मां के संस्कारों के सांचे में ढला था. मैं यह भी जानती थी कि शिवानी की मुंहफट बातों को स्मार्टनैस समझने वाले जीजाजी को कम बोलने वाली नंदिनी कैसे पसंद आएगी.

घर संभाल कर अनुवाद और लेखन करने वाली लड़की किसी डाक्टर या इंजीनियर लड़की जितनी बोल्ड कैसे हो सकती है. शिवानी बिजली है. उस के सामने नंदिनी एक दीपक की छोटी सी लौ की तरह मंद, आलोकहीन लगेगी. लेकिन मेरी सोच गलत साबित हुई. अपनी मधुरता से नंदिनी ने सब को मोह लिया. विवाह हो गया. बहुत खुश है अविनाश. जीजी को मेरी तरह एक शीतल छाया मिल गई है. जब मैं जीजाजी को बड़े शौक से खाना खाते और नंदिनी को कोई खास बनाई गई चीज परोसते हुए देखती हूं, तब मेरे मन में संदेह जागता है कि मैं ने नंदिनी के साथ अन्याय तो नहीं किया. शायद जीजाजी को जीजी जैसी स्नेहिल, घर को प्यार करने वाली ही बहू चाहिए थी ताकि उन का,

उन के बेटे का घर अक्षुण्ण रहे. उन के चैन और आराम बने रहें. लेकिन मेरा मन खुद से प्रश्न करता है, दो चेहरे वाले इंसानों की असलियत कौन जान सकता है. क्या पता अविनाश भी कुछ सालों बाद जीजाजी की तरह… मैं राह देख रही हूं जीजी के पोतेपोतियों की. पोती आएगी, तभी पता चलेगा कि जीजाजी का दूसरा चेहरा सचमुच उतर चुका है या मौका मिलते ही वह फिर उन के आजकल के चेहरे को ढ?कने आ पहुंचेगा. मेरा आशावादी मन कल्पना में देख रहा है, उस उतरे हुए चेहरे की धज्जियां और अब चढ़े हुए चेहरे पर झलकती तंदुरुस्ती की गुलाबी चमक. द्य इन्हें आजमाइए ? अपने घर के लिए कुछ खरीदें तो स्पेसिफिक जगह को दिमाग में रखें. ड्राइंगरूम का कारपेट रूम के साइज के अनुसार होना चाहिए. अगर अपने बैडरूम में कपल फोटो लगाना है तो वौल का साइज चेंज कर के ही फ्रेम का साइज चुनें क्योंकि चीजें स्पेस के अनुसार जंचती हैं. ? प्रैग्नैंसी के दौरान आप का उठना,

बैठना और सोना ये तीनों चीजें आप के पेट में पल रहे शिशु पर असर डाल सकती हैं. इसलिए अपने शरीर की पोजीशन का हमेशा ध्यान रखें. सही तरीके से उठें, बैठें और सोएं ताकि शिशु पर किसी तरह का कोई प्रभाव न पड़े. ? वजन कम करने के चक्कर में बाहर के पैकेट प्रौडक्ट्स का सेवन ज्यादा करने लगते हैं जो सेहत के लिए काफी हानिकारक होता है. वजन को कम करने के लिए घर का बना खाना खाएं, जो हैल्दी और प्रिजर्वेटिव फ्री होता है. ? महिलाएं इसे नजरअंदाज करती हैं, लेकिन सही ब्रैस्ट शेप के लिए सही ब्रा बहुत जरूरी है. अगर आप अपनी ब्रा को ले कर श्योर नहीं हैं तो एक बार एक्स्पर्ट से बात जरूर कर लें. ? यदि आप जिम से वर्कआउट करने के बाद प्रोटीन पाउडर लेते हैं तो यह आप को एनर्जी देने वाला तथा आप की मसल्स में ग्रोथ करने वाला साबित होगा. Hindi Love Stories

Social Story In Hindi : खजाने की खोज में

Social Story In Hindi : लोगों की यह धारणा है कि प्राचीन काल में राजामहाराजा 2 खजाने रखते थे, सामान्य काल के लिए ‘सामान्य कोष’ तथा आपातकाल के लिए ‘गुप्त कोष.’ सामान्य कोष की जानकारी सभी को होती थी मगर गुप्त कोष भूमि के नीचे अत्यंत गुप्त रूप से बनाया जाता था. गुप्त कोष में खानदानी संपत्ति व लूटमार से प्राप्त संपत्ति रखी जाती थी. उस का उपयोग अकाल, बाढ़, महामारी, आक्रमण आदि के समय किया जाता था. अब राजामहाराजा नहीं रहे लेकिन लोगों का विश्वास है कि पुराने किलों, दुर्गों, महलों और खंडहरों में अभी भी बहुत से गुप्त खजाने दबे पड़े हैं.

झांसी से 28 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश का शहर दतिया स्थित है. दतिया जनपद में 2 तहसीलें हैं, दतिया और सेंवढ़ा. दोनों स्थानों पर विशाल किले हैं. दतिया के किले में यहां के पूर्व महाराज का निवास है तथा सेंवढ़ा के किले के अधिकांश भाग में सरकारी कार्यालय हैं. सेंवढ़ा से कुछ दूरी पर स्थित मलियापुरा गांव में रामहजूर और अशोक नाम के 2 मित्र रहते थे. वे दोनों हमउम्र और बेरोजगार थे. दोनों उत्साही युवक बिना मेहनत किए रातोंरात लखपति बनना चाहते थे.

अचानक एक दिन रामहजूर के मन में सेंवढ़ा के किले के खजाने का खयाल आया. उस ने सोचा कि अगर किसी तरह यह खजाना उस के हाथ लग जाए तो उस के सारे कष्ट दूर हो सकते हैं. रामहजूर ने अपने मन की बात अशोक को बताई. अशोक भी रामहजूर की ही प्रवृत्ति का था, अत: उसे उस की बात बहुत अच्छी लगी. दोनों मित्र सेंवढ़ा के किले के खजाने को प्राप्त करने की योजनाएं बनाने लगे. एक बार दोनों मित्र सेंवढ़ा गए तथा किले का सूक्ष्म अवलोकन किया. वहां एक भाग में सरकारी कार्यालय हैं तथा दूसरे भाग में एसएएफ के जवान भी रहते हैं. अत: दोनों मित्रों को लगा कि खजाने की खोज के लिए 5-7 लोगों की जरूरत पड़ेगी.

नवंबर का महीना था. सेंवढ़ा में सनकुआं का मेला चल रहा था. अचानक प्रेमनारायण, लखन, कमलेश, जगदीश और मस्तराम को देख कर रामहजूर की आंखों में चमक आ गई. ये सभी 18 से 20 वर्ष की आयु के नवयुवक उस के मित्र थे. पांचों मित्र सनकुआं का मेला देखने आए थे. रामहजूर और अशोक ने पांचों मित्रों के सामने खजाने की खोज का प्रस्ताव रखा. पांचों मित्र शीघ्र ही तैयार हो गए. खजाना मिलने से पहले ही उन्होंने खजाने से प्राप्त धन को आपस में बराबरबराबर बांटने का निश्चय कर लिया. सभी मित्र आधी रात तक सलाहमशवरा करते रहे तथा अगले दिन उन्होंने खजाने की खोज प्रारंभ करने का निश्चय कर लिया.

अगले दिन सब से पहले रामहजूर और अशोक ने गैंती व फावड़े की व्यवस्था की और किले की ओर चल पड़े. 14 नवंबर का दिन था. पूरे देश में जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन मनाया जा रहा था. सेंवढ़ा में भी कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे. अत: इन युवकों की ओर किसी का ध्यान नहीं गया.

सेंवढ़ा के किले का वह भाग जो प्रयोग में नहीं आता है, अधिक खंडहर हो गया है उसी भाग में एक बड़ी कोठरी थी जो हमेशा बंद रहती थी. रामहजूर और अशोक खजाने के चक्कर में सेंवढ़ा किले के कई चक्कर लगा चुके थे. उन का सारा ध्यान इसी कोठरी पर था.

कोठरी मुख्य भाग से अलग नीचे की ओर इस प्रकार बनाई गई थी कि काफी घूमने के बाद उस तक पहुंचा जा सकता था. अत: रामहजूर और अशोक को पक्का विश्वास था कि इस कोठरी के भीतर से ही खजाने का रास्ता होना चाहिए.

सातों मित्र खजाने की खोज करतेकरते उसी कोठरी तक आ पहुंचे. उन्होंने गैंतीफावड़े से रास्ता साफ किया और भीतरी हिस्से में पहुंच गए. वहां काफी अंधेरा था.

खजाने की खोज में निकले किसी भी युवक को अपने साथ टौर्च लाना याद नहीं रहा था.

कोठरी के भीतरी हिस्से में पहुंच कर सातों युवक आपस में विचारविमर्श करने लगे. वहां इतना अंधेरा था कि रोशनी के बिना आगे काम नहीं किया जा सकता था. कुछ युवकों का मत था कि पहले रोशनी की कुछ व्यवस्था की जाए, फिर आगे बढ़ा जाए.

दूसरी तरफ रामहजूर और अशोक इतना आगे बढ़ चुके थे कि अब वे पीछे लौटने के लिए तैयार नहीं थे. उन का कहना था कि किले में पहरा रहता है. अत: वे हमेशा इसी तरह बेरोकटोक नहीं आ सकते. इसलिए जो कुछ करना हो इसी समय हो जाना चाहिए.

अचानक रामहजूर के मन में एक विचार आया. उस की जेब में माचिस पड़ी थी. उस ने सोचा कि माचिस से इतनी रोशनी हो जाएगी कि काम चल जाएगा और बाहर किसी को पता भी नहीं चलेगा.

रामहजूर ने तुरंत जेब में हाथ डाल कर माचिस निकाली जैसे ही पहली तीली सुलगाई कि भयंकर विस्फोेट हुआ और किले की दीवारें कांप उठीं. उस के बाद भी कर्णभेदी कई धमाके हुए जिन से कोठरी की छत उड़ गई.

रामहजूर का शरीर क्षतविक्षत हो गया. उस के साथियों की हालत भी नाजुक बनी हुई थी. वे लोग जिस कोठरी को खजाने का द्वार समझ रहे थे वह पुराना बारूदखाना था. वहां अभी भी काफी बारूद भरा पड़ा था. दोपहर का डेढ़ बज रहा था. सेंवढ़ा किले के सरकारी कार्यालयों में तैनात पुलिस गार्ड व एसएएफ के जवानों ने धमाकों की आवाजें सुनीं तो वे भाग कर वहां पहुंचे. पुलिस गार्ड ने मामले की गंभीरता को समझते हुए इस की सूचना अपने अधिकारियों को दी. सेंवढ़ा में अग्निशमन की कोई व्यवस्था नहीं थी. इस कारण दतिया तथा लहार से दमकल के दस्ते बुलाए गए. 2 घंटे के अथक प्रयास के बाद किसी तरह आग पर काबू पाया जा सका.

रामहजूर तो विस्फोट के साथ ही मर चुका था. उस के दूसरे साथी अशोक, प्रेमनारायण, लखन व कमलेश ने किले से अस्पताल ले जाते समय रास्ते में दम तोड़ दिया. मस्तराम तथा जगदीश ने ग्वालियर के चिकित्सालय में जा कर दम तोड़ा. इस प्रकार बिना परिश्रम के धनप्राप्ति की इच्छा रखने वाले नवयुवकों को अपने लालची स्वभाव के कारण असमय अपने प्राण गवांने पड़े. Social Story In Hindi 

Family Story : फैन – मानसी के साथ उस दिन क्या हुआ था ?

Family Story : करीब 8 महीने पहले शीला बूआ का अपने भतीजे राजीव की शादी के अवसर पर सप्ताह भर के लिए कानपुर से दिल्ली आना हुआ था. उस के बाद अब वे 1 महीने के लिए अपने छोटे भाई शंकर के घर रहने आई थीं.

राजीव की बहू मानसी अपने कमरे से निकल कर जब उत्साहित अंदाज में भागती सी उन के पास आई तब उस ने जींस और टौप पहना हुआ था. बूआ के माथे में पड़े बल देख कर शंकर, उन की पत्नी सुमित्रा और राजीव तीनों समझ गए कि नई बहू का पहनावा उन्हें पसंद नहीं आया. बूआजी की नाराजगी से अनजान मानसी ने पहले उन के पैर छुए और फिर बड़े जोश के साथ गले लगते हुए बोली, ‘‘मैं ने मम्मी से आप की पसंद की चाय बनानी सीख ली है. आप के लिए चाय मैं ही बनाया करूंगी, बूआजी.’’

‘‘तुम्हारे शरीर से पसीने की बदबू आ रही है,’’ उस की बात से खुश होने के बजाय बूआ ने नाक सिकोड़ कर उसे परे कर दिया.

‘‘आप के आने से पहले मैं व्यायाम कर रही थी. जब आप की आवाज सुनी तो मुझ से रुका नहीं गया और भागती हुई मिलने चली आई. मेरे नहाते ही पसीने की बदबू गायब हो जाएगी.’’

‘‘क्या तुम अभी तक नहाई नहीं हो?’’ बूआ ने दीवार पर लगी घड़ी की तरफ देखा, जिस में 11 बज रहे थे.

‘‘आज रविवार है, बूआजी.’’

‘‘उस से क्या हुआ?’’

‘‘रविवार का मतलब है सब कुछ आराम से करने का दिन.’’

‘‘अच्छे घर की बहुओं की तरह तुम्हें रोज सूरज निकलने से पहले नहा लेना चाहिए,’’ बूआ ने तीखे स्वर में उसे डांट दिया.

‘‘आप के हुक्म को मान कर मैं संडे को भी जल्दी नहा लिया करूंगी. अब मैं आप के लिए चाय बना कर लाऊं?’’ बूआ की डांट का बुरा न मान मानसी मुसकराती हुई बोली.

‘‘हां, ले आओ बहू,’’ सुमित्रा ने अपनी बहू को बूआजी के सामने से हटाने की खातिर जवाब दिया, पर उन की यह तरकीब सफल नहीं हुई.

बूआ ने सुमित्रा से ही नाराजगी से घूरते हुए पूछा, ‘‘कहीं तुम ने भी बिना नहाए रसोई में घुस कर काम करने की आदत अपनी पढ़ीलिखी बहू से तो नहीं सीख ली है?’’

‘‘बिलकुल नहीं, दीदी. चाय मैं ही बना कर लाती हूं,’’ सुमित्रा अपनी जान बचाने को रसोई की तरफ चल पड़ीं.

‘‘और मैं आप से ढेर सारी बातें करने को फटाफट नहा कर आती हूं,’’ मानसी झुक कर बूआजी के गले लगी और फिर तुरंत अपने कमरे की तरफ भाग गई.

‘‘यह तो साफ दिख रहा है कि बहू अपने घर से कोई अदबकायदा सीख कर नहीं आई है, पर तुम तो उसे इज्जतदार घर की बहू की तरह ढंग से रहना सिखाओ… इसे इतना ज्यादा सिर चढ़ा कर सब रिश्तेदारों के बीच में अपना मजाक उड़वाने का इंतजाम न करो,’’ इस तरह की बातें करते हुए बूआ चाय आने तक शंकर और राजीव की क्लास लेती रहीं.

दोनों उन की सारी बातें खामोशी से सुनते रहे. बूआजी के सामने उलटा बोलने या उन के कहे को टालने की हिम्मत किसी में नहीं थी.

‘‘दीदी, अब आप ही उसे काबिल और समझदार बना कर जाना. मैं बाजार हो कर आता हूं,’’ चाय का कप बूआ के हाथ में आते ही शंकर अपनी जान बचा कर घर से निकल गए.

राजीव बूआजी की अटैची को उठा कर उसे गैस्टरूम में रखने के बहाने से वहां से खिसक लिया. बेचारी सुमित्रा अपनी ननद का लंबा लैक्चर सुनने के लिए तैयार हो उन के सामने सिर झुका कर बैठ गईं. उसी दिन शाम को ड्राइंगरूम में एकसाथ चाय पीते हुए राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी में हुए घोटालों पर चर्चा हो रही थी.

‘‘जरा धीरे हंसाबोला कर, बहू,’’ मानसी को गुस्से से टोकने के बाद बूआजी ने शंकरजी की तरफ मुड़ कर चुभते लहजे में पूछा, ‘‘तू ससुर है या बहू का देवर? अब जरा गंभीर हो कर घर में रहना सीख.’’

किसी के कुछ कहने से पहले ही मानसी बोल पड़ी, ‘‘ये तो सचमुच मेरे दोस्त ससुरजी हैं, बूआजी. हमारे बीच…’’

मानसी अपनी बात पूरी नहीं कर सकी, क्योंकि उस की बात सुन कर अपनी हंसी रोकने के चक्कर में शंकर का खांसतेखांसते दम फूल गया.

‘‘बड़ों के सामने इतना ज्यादा बोलना तुम्हें शोभा नहीं देता है, बहू. तुम बड़ों का शर्मलिहाज करना सीखो,’’ सब को मुसकराते देख बूआ को तेज गुस्सा आया और उन्होंने मानसी को इतनी जोर से डांटा कि घर के हर सदस्य के चेहरे पर तनाव झलक उठा.

‘‘जी, बूआजी,’’ मानसी ने पल भर को अपने मुंह पर उंगली रखी और फिर फौरन उसे हटा कर बूआजी को चहकते हुए बताने लगी, ‘‘यह सारा कुसूर मेरे पापा का है. आप जब उन से मिलें, तो उन्हें जरूर डांटना. उन्होंने मुझे बचपन से ही किसी भी विषय पर अपने साथ खुल कर चर्चा करने की छूट दे रखी थी. अब मैं यहां पापा के साथ बातें करतेकरते जोश में भूल जाती हूं कि ये तो मेरे ससुरजी हैं. मुझे इन के सामने खामोश रहना चाहिए.’’

‘‘शंकर, तू इसे गलत व्यवहार करते देख कर डांटताटोकता क्यों नहीं है?’’

‘‘दीदी, मैं अब से टोका करूंगा,’’ शंकरजी के लिए अभी भी अपनी हंसी रोकना मुश्किल हो रहा था.

‘‘और मैं अपने को सुधारने का वादा करती हूं, पापा,’’ मानसी ने यों गरदन झुका ली मानों बहुत बड़ा जुर्म करते पकड़ी गई हो. यह देख सब की हंसी छूट गई.

‘‘तुम सब का तो इस जोकर लड़की ने दिमाग खराब कर दिया है,’’ बूआजी को अपनी हंसी रोकना मुश्किल लगा तो वे बड़बड़ाती हुईं अपने कमरे में चली गईं.

बूआजी के आने से घर का माहौल अजीब सा हो गया था. वे मानसी की कमियां गिनाते हुए नहीं थकती थीं. जब और कोई उन की ‘हां’ में ‘हां’ नहीं मिलाता तो वे नाराज सी नजर आतीं घर में घूमतीं.

‘‘तुम लोगों ने इसे जरूरत से ज्यादा सिर चढ़ा रखा है,’’ यह डायलौग वे दिन भर में न जाने कितनी दफा कहती थीं.

बूआ के आने के करीब 10 दिन बाद सुमित्रा के नैनीताल वाले चाचाजी का देहांत हो गया. शंकरजी और सुमित्रा को राजीव कार से नैनीताल ले गया. वे तीनों अगले दिन शाम तक लौटने वाले थे.

उन के जाने के बाद बूआजी पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली आरती के साथ शाम को बाजार घूमने निकल गईं वहां दोनों ने जम कर चाट खाई. बदपरहेजी का नतीजा यह हुआ कि रात के 9 बजतेबजते बूआजी की तबीयत खराब होनी शुरू हो गई. उन्हें उलटियां शुरू हो गईं. बाद में जब दस्त भी शुरू हो गए तो उन्हें बहुत कमजोरी महसूस होने लगी. मानसी कालोनी के बाहर से तिपहिया स्कूटर ले कर आई और उन्हें डाक्टर को दिखाने चल दी.डाक्टर के वेटिंगरूम में इंतजार कर रहे मरीजों की काफी भीड़ थी पर वह बूआजी को ले कर सीध डाक्टर साहब के कक्ष में घुस गई. कंपाउंडर ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तो मानसी ने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘जो उलटीदस्त कर कर के मरा जा  रहा है, उस मरीज को इंतजार करने को कहना गलत है. डाक्टर साहब पहले इस सीरियस मरीज को ही देखेंगे.’’

डाक्टर भी बूआजी को लाइन के बिना पहले देखने की उस की प्रार्थना को टाल नहीं सके. उन्होंने बूआजी की जांच करने के बाद दवा लिख दी. घर आ कर बूआजी को पहली खुराक लेने के कुछ देर बाद से आराम मिलना शुरू हो गया. मानसी पूरे जोश के साथ उन की तीमारदारी में जुट गई. उस ने बूआ से पूछ कर मूंग की दाल की खिचड़ी बनाई. बूआजी का कुछ खाने का मन नहीं कर रहा था पर मानसी ने सामने बैठ कर उन्हें प्यार से कुछ चम्मच खिचड़ी खिला ही दी. बूआजी को 2 घंटे बाद दर्द बढ़ने लगा तो उन्होंने घबरा कर मानसी से पूछा, ‘‘अगर रात को मुझे ले कर डाक्टर के यहां जाना पड़ा तो किसे बुलाएगी?’’

‘‘मैं हूं न, बूआजी. आप किसी बात की फिक्र न करो,’’ मानसी ने बूआजी के माथे का चुंबन ले कर इतने आत्मविश्वास से कहा कि बूआजी की सारी टैंशन दूर हो गई.

रात को नैनीताल से फोन आया तो मानसी ने अपने ससुरजी को भी आश्वस्त कर दिया, ‘‘चिंता की कोई बात नहीं है. मैं सब संभाल लूंगी.’’ रात में जब भी बूआजी की आंख खुली उन्होंने मानसी को जागता पाया. वह हर बार उन्हें नमकचीनी के घोल के कुछ घूंट पिला कर ही मानती. करीब 12 बजे जब उन का बुखार बढ़ने लगा तो मानसी ने काफी देर तक उन के माथे पर गीली पट्टियां रखीं. बुखार कम हुआ तो बूआजी की कुछ देर को आंख लग गई. फिर अचानक रात में उन्हें इतनी जोर से उलटी हुई कि वे अपने कपड़े व पलंग की चादर को खराब होने से नहीं बचा पाईं.

‘‘अब चिंता की कोई बात नहीं. इस बार पेट में बची बाकी चाट भी बाहर आ गई है. देखना, अब आप की तबीयत सुधरती चली जाएगी, बूआजी.’’

मानसी की बात सुन कर कष्ट भुगत रहीं बूआजी मुसकराने से खुद को रोक नहीं पाईं. मानसी ने उन के कपड़े उतरवाए. तौलिया गीला कर के पूरा बदन साफ किया. बाद में पलंग की चादर बदली. फिर उन्हें नए कपड़े पहनाने के बाद उन का सिर इतने अच्छे तरीके से दबाया कि बूआजी को 15 मिनट में गहरी नींद आ गई. सुबह 7 बजे के करीब बूआजी की नींद खुली तो उन्होंने मानसी को पलंग के पास कुरसी पर बेसुध सा सोते पाया. उन्होंने उस के सिर पर प्यार से हाथ रखा तो उस ने फौरन चौंक कर आंखें खोल दीं. बूआजी ने कोमल स्वर में मानसी से कहा, ‘‘बहू, अब तू अपने कमरे में जा कर आराम से सो जा.’’

‘‘अब आप की तबीयत कैसी है?’’ मानसी की आंखों में चिंता के भाव झलक उठे.

‘‘बहुत अच्छा महसूस कर रही हूं. आखिरी उलटी करने के बाद बहुत चैन मिला था.’’

‘‘मैं नहा कर आप के लिए चाय बनाती हूं.’’

‘‘अरे, नहीं. तुम आराम करो. मैं खुद बना लूंगी.’’

‘‘तब तो आप के हाथ की बनी चाय मैं भी पीऊंगी,’’ मानसी छोटी बच्ची की तरह तालियां बजा कर खुश हुई तो बूआजी भी खुल कर मुसकरा उठीं.

दोनों ने साथ चाय पी. फिर रात भर की थकी मानसी बूआ की बगल में सो गई. मानसी 12 बजे के करीब उठी तब तक बूआजी ने रोटीसब्जी बना दी थी. साथसाथ लंच करते हुए दोनों के बीच खूब गपशप चलती रही. शाम को शंकर, सुमित्रा और राजीव लौट आए. बूआजी को स्वस्थ देख कर उन सब की आंखों में राहत के भाव उभरे. बूआजी ने मानसी को अपनी छाती से लगा कर उस की खुले दिल से तारीफ की, ‘‘अब मेरी समझ में आ गया है कि क्यों तुम सब इस बातूनी लड़की के फैन हो. यह सचमुच हीरा है हीरा. कल रात क्या डांटा था इस ने कंपाउंडर को… इस ने ऐसी फर्राटेदार अंगरेजी बोली कि डाक्टर साहब की भी मुझे लाइन के बगैर देखने से इनकार करने की हिम्मत नहीं हुई.

‘‘सारी रात जाग कर इस ने मेरी देखभाल की है. तुम सब कल्पना भी नहीं कर सकते कि नमकचीनी का घोल पीने से इनकार करने पर कितनी जोर से यह मुझे डांट देती थी. इस हिम्मती लड़की ने कल रात न खुद का हौसला खोया और न मुझे खोने दिया.

‘‘घर के काम करना तो यह बातूनी लड़की देरसवेर सीख ही जाएगी पर इस के जैसी चुलबुली, हंसमुख और करुणा से भरा दिल रखने वाली बहू बहुत मुश्किल से मिलती है. राजीव, तू ने अपने लिए बहुत अच्छी लड़की चुनी है.’’

भावुकता का शिकार बनी बूआजी ने जब प्यार से राजीव और मानसी का माथा चूमा तो उन की आंखों में आंसू छलक उठे. अब बूआ के सामने मानसी को कोई कुछ नहीं कह सकता था, क्योंकि घर के बाकी लोगों की तरह अब वे भी सोने का दिल रखने वाली मानसी की जबरदस्त प्रशंसक बन गई थीं. Family Story

Romantic Story In Hindi : थोड़ी सी बेवफाई

Romantic Story In Hindi : ‘हाय, पहचाना.’ व्हाट्सऐप पर एक नए नंबर से मैसेज आया देख मैं ने उत्सुकता से प्रोफाइल पिक देखी. एक खूबसूरत चेहरा हाथों से ढका सा और साथ ही स्टेटस भी शानदार…

जरूरी तो नहीं हर चाहत का मतलब इश्क हो… कभीकभी अनजान रिश्तों के लिए भी दिल बेचैन हो जाता है. मैं ने तुरंत पूछा, ‘‘हू आर यू? क्या मैं आप को जानता हूं?’’

‘‘जानते नहीं तो जान लीजिए, वैसे भी मैं आप की जिंदगी में हलचल मचाने आई हूं…’’

‘‘यानी आप कहना चाहती हैं कि आप मेरी जिंदगी में आ चुकी हैं? ऐसा कब हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अभी, इसी पल. जब आप ने मेरे बारे में पूछा…’’

मैं समझ गया था, युवती काफी स्मार्ट है और तेज भी. मैं ने चुप रहना ही बेहतर समझा, तभी फिर मैसेज आया देख कर मैं इग्नोर नहीं कर सका.

‘‘क्या बात है, हम से बातें करना आप को अच्छा नहीं लग रहा है क्या?’’

‘‘यह तो मैं ने नहीं कहा…’’ मैं ने तुरंत जवाब दिया.

‘‘तो फिर ठीक है, मैं समझूं कि आप को मुझ से बात करना अच्छा लग रहा है?’’

‘‘हूं… यही समझ लो. मगर मुझे भी तो पता चले कि आप हैं कौन?’’

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है? आराम से बताऊंगी.’’

युवती ने स्माइली भेजी, तो मेरा दिल हौले से धड़कने लगा. मैं सोच में डूब गया कि यह युवती अजनबी है या उसे पहले से जानती है. कहीं कोई कालेज की पुरानी दोस्त तो नहीं, जो मजे लेने के लिए मुझे मैसेज भेज रही है. मुश्किल यह थी कि फोटो में चेहरा भी पूरा नजर नहीं आ रहा था. तभी मेरा मोबाइल बज उठा. कहीं वही तो नहीं, मैं ने लपक कर फोन उठाया. लेकिन बीवी का नंबर देख कर मेरा मुंह बन गया और तुरंत मैं ने फोन काट दिया. 10 सैकंड भी नहीं गुजरे थे कि फिर से फोन आ गया. झल्लाते हुए मैं ने फोन उठाया, ‘‘यार 10 मिनट बाद करना अभी मैं मीटिंग में हूं. ऐसी क्या आफत आ गई जो कौल पर कौल किए जा रही हो?’’

बीवी यानी साधना हमेशा की तरह चिढ़ गई, ‘‘यह क्या तरीका है बीवी से बात करने का? अगर पहली कौल ही उठा लेते तो दूसरी बार कौल करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.’’ ‘‘पर आधे घंटे पहले भी तो फोन किया था न तुम ने, और मैं ने बात भी कर ली थी. अब फिर से डिस्टर्ब क्यों कर रही हो?’’

‘‘देख रही हूं, अब तुम्हें मेरा फोन उठाना भी भारी लगने लगा है. एक समय था जब मेरी एक कौल के इंतजार में तुम खानापीना भी भूल जाते थे…’’ ‘‘प्लीज साधना, समझा करो. मैं यहां काम करने आया हूं, तुम्हारा लैक्चर सुनने नहीं…’’

उधर से फोन कट चुका था. मैं सिर पकड़ कर बैठ गया. कभीकभी रिश्ते भी भार बन जाते हैं, जिन्हें ढोना मजबूरी का सबब बन जाता है और कुछ नए रिश्ते अजनबी हो कर भी अपनों से प्यारे लगने लगते हैं. जब अपनों की बातें मन को परेशान करने लगती हैं, उस वक्त मरहम की तरह किसी अजनबी का साथ जिंदगी में नया उत्साह और जीने की नई वजह बन जाता है. ऐसा नहीं है कि मैं अपनी बीवी से प्यार नहीं करता. मगर कई बार रिश्तों में ऐसे मोड़ आते हैं, जब जरूरत से ज्यादा दखलंदाजी बुरी लगने लगती है. प्यार अच्छा है, मगर पजेसिवनैस नहीं. हद से ज्यादा पजेसिवनैस बंधन लगने लगता है, तब रिश्ते भार बन जाते हैं और मन में खालीपन घर कर जाता है. मेरी जिंदगी में भी कुछ ऐसा ही दौर आया था और इस खालीपन को भरने के लिहाज से उस अनजान युवती का दखल मुझे भाने लगा था. जिंदगी में एक नया अध्याय जुड़ने लगा था. नई ख्वाहिशों की आंच मन में अजीब सी बेचैनी पैदा कर रही थी. एक बार फिर से जिंदगी के प्रति मेरा रुझान बढ़ने लगा. दिलोदिमाग में बारबार उसी लड़की का खयाल उमड़ता कि कब उस का मैसेज आए और मेरी धड़कनों को बहकने का मौका मिले.

‘‘हाय, क्या सोच रहे हो?’’ अचानक फिर से आए उस युवती के मैसेज ने मेरे होंठों पर मुसकान बिखेर दी, ‘‘बस, तुम्हें ही याद कर रहा था.’’

‘‘हां, वह तो मैं जानती हूं. मैं हूं ही ऐसी बला जो एक बार जिंदगी में आ जाए तो फिर दिल से नहीं जाती.’’

मैं यह सुन कर हंस पड़ा था. कितनी सहज और मजेदार बातें करती है यह युवती. मैं ने फिर पूछा, ‘‘इस बला का कोई नाम तो होगा?’’

‘‘हां, मेरा नाम कल्पना है.’’

नाम बताने के साथ ही उस ने एक खूबसूरत सी शायरी भेजी. हसीं जज्बातों से लबरेज वह शायरी मैं ने कई दफा पढ़ी और फिर शायरी का जवाब शायरी से ही देने लगा.सालों पहले मैं शायरी लिखा करता था. कल्पना की वजह से आज फिर से मेरा यह पैशन जिंदा हो गया था. देर तक हम दोनों चैटिंग करते रहे. ऐसा लगा जैसे मेरा मन बिलकुल हलका हो गया हो. उस युवती की बातें मेरे मन को छूने लगी थीं. वह ब ड़े बिंदास अंदाज में बातें करती थी. समय के साथ मेरी जिंदगी में उस युवती का हस्तक्षेप बढ़ता ही चला गया. रोज मेरी सुबह की शुरुआत उस के एक प्यारे से मैसेज से होती. कभीकभी वह बहुत अजीब सेमैसेज भेजती. कभी कहती, ‘‘आप ने अपनी जिंदगी में मेरी जगह क्या सोची है, तो कभी कहती कि क्या हमारा चंद पलों का ही साथ रहेगा या फिर जन्मों का?’’

एक बात जो मैं आसानी से महसूस कर सकता था, वह यह कि मेरी बीवी साधना की खोजी निगाहें अब शायद मुझ पर ज्यादा गहरी रहने लगी थीं. मेरे अंदर चल रही भावनात्मक उथलपुथल और संवर रही अनकही दास्तान का जैसे उसे एहसास हो चला था. यहां तक कि यदाकदा वह मेरे मोबाइल भी चैक करने लगी थी. देर से आता तो सवाल करती. जाहिर है, मेरे अंदर गुस्सा उबल पड़ता. एक दिन मैं ने झल्ला कर कहा, ‘‘मैं ने तो कभी तुम्हारे 1-1 मिनट का हिसाब नहीं रखा कि कहां जाती हो, किस से मिलती हो?’’

‘‘तो पता रखो न अतुल… मैं यही तो चाहती हूं,’’ वह भड़क कर बोल पड़ी थी. ‘‘पर यह सिर्फ पजेसिवनैस है और कुछ नहीं.’’

‘‘प्यार में पजेसिवनैस ही जरूरी है अतुल, तभी तो पता चलता है कि कोई आप से कितना प्यार करता है और बंटता हुआ नहीं देख सकता.’’

‘‘यह तो सिर्फ बेवकूफी है. मैं इसे सही नहीं मानता साधना, देख लेना यदि तुम ने अपना यह रवैया नहीं बदला तो शायद एक दिन मुझ से हाथ धो बैठोगी.’’

मैं ने कह तो दिया, मगर बाद में स्वयं अफसोस हुआ. पूरे दिन साधना भी रोती रही और मैं लैपटौप ले कर परेशान चुपचाप बैठा रहा. उस दिन के बाद मैं ने कभी भी साधना से इस संदर्भ में कोई बात नहीं की. न ही साधना ने कुछ कहा. मगर उस की शक करने और मुझ पर नजर रखने की आदत बरकरार रही. उधर मेरी जिंदगी में नए प्यार की बगिया बखूबी खिलने लगी थी. कल्पना मैसेज व शायरी के साथसाथ अब रोमांटिक वीडियोज और चटपटे जोक्स भी शेयर करने लगी थी. कभीकभी मुझे कोफ्त होती कि मैं इन्हें देखते वक्त इतना घबराया हुआ सा क्यों रहता हूं? निश्चिंत हो कर इन का आनंद क्यों नहीं उठा पाता? जाहिर है, चोरीछिपे कुछ किया जाए तो मन में घबराहट तो होती ही है और वही मेरे साथ भी होता था. आखिर कहीं न कहीं मैं अपनी बीवी से धोखा ही तो कर रहा था. इस बात का अपराधबोध तो मुझे था ही. एक दिन कल्पना ने मुझे एक रोमांटिक सा वीडियो शेयर किया और तभी साधना भी बड़े गौर से मुझे देखती हुई गुजरी. मैं चुपके से अपना टैबलेट ले कर बाहर बालकनी में आ गया. वीडियो डाउनलोड कर इधरउधर देखने लगा कि कोई मुझे देख तो नहीं रहा. जब निश्चिंत हो गया कि साधना आसपास नहीं है, तो वीडियो का आनंद लेने लगा. उस वक्त मुझे अंदर से एक अजीब सा रोमांटिक एहसास हुआ. उस अजनबी युवती को बांहों में भरने की तमन्ना भी हुई मगर तुरंत स्वयं को संयमित करता हुआ अंदर आ गया.

साधना की अनुभवी निगाहें मुझ पर टिकी थीं. निगाहें चुराता हुआ मैं लैपटौप खोल कर बैठ गया. मुझे स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि ऐसा कैसे हो गया? एक समय था जब साधना मेरी जिंदगी थी और आज किसी और के आकर्षण ने मुझे इस कदर अपनी गिरफ्त में ले लिया था. उधर समय के साथ कल्पना की हिमाकतें भी बढ़ने लगी थीं. मैं भी बहता जा रहा था. एक अजीब सा जनून था जिंदगी में. वैसे कभीकभी मुझे ऐसा लगता जैसे यह सब बिलकुल सही नहीं. इधर साधना को धोखा देने का अपराधबोध तो दूसरी तरफ अनजान लड़की का बढ़ता आकर्षण. मैं न चाहते हुए भी स्वयं को रोक नहीं पा रहा था और फिर एक दिन उस के एक मैसेज ने मुझे और भी ज्यादा बेचैन कर दिया.

कल्पना ने लिखा था, ‘‘क्या अब हमारे रिश्ते के लिए जरूरी नहीं है कि हम दोनों को एकदूसरे को मिल कर करीब से एकदूसरे का एहसास करना चाहिए.’’

‘‘जरूर, जब तुम कहो…’’ मैं ने उसे स्वीकृति तो दे दी मगर मन में एक कसक सी उठी. मन का एक कोना एक अनजान से अपराधबोध से घिर गया. क्या मैं यह ठीक कर रहा हूं?  मैं ने साधना की तरफ देखा.

साधना सामने उदास सी बैठी थी, जैसे उसे मेरे मन में चल रही उथलपुथल का एहसास हो गया था. अचानक वह पास आ कर बोली, ‘‘मां को देखे महीनों गुजर गए. जरा मेरा रिजर्वेशन करा देना. इस बार 1-2 महीने वहां रह कर आऊंगी.’’ उस की उदासी व दूर होने का एहसास मुझे अंदर तक द्रवित कर गया. ऐसा लगा जैसे साधना के साथ मैं बहुत गलत कर रहा हूं और मैं ही उस का दोषी हूं. मगर कल्पना से मिलने और उस के साथ वक्त बिताने का लोभ संवरण करना भी आसान न था. अजीब सी कशमकश में घिरा मैं सो गया. सुबह उठा तो मन शांत था मेरा. देर रात मैं कल्पना को एक मैसेज भेज कर सोया था. सुबह उस का जवाब पढ़ा तो होंठों पर मुसकान खेल गई. थोड़े गरम कपड़े पहन कर मैं मौर्निंग वाक पर निकल गया. लौट कर कमरे में आया तो देखा, साधना बिस्तर पर नहीं है. घर में कहीं भी नजर नहीं आई. थोड़ा परेशान सा मैं साधना को छत पर देखने गया तो पाया, एक कोने में चुपचाप खड़ी वह उगते सूरज की तरफ एकटक देख रही है.

मैं ने उसे पीछे से बांहों में भर लिया. उस ने मेरी तरफ चेहरा किया तो मैं यह देख कर विचलित हो उठा कि उस की आंखों से आंसू निकल रहे थे. मैं ने प्रश्नवाचक नजरों से उस की तरफ देखा तो वह सीने से लग गई, ‘‘आई लव यू…’’

‘‘आई नो डियर, बट क्या हुआ तुम्हें?’’

अचानक रोतीरोती वह हंस पड़ी, ‘‘तुम्हें तो ठीक से बेवफाई करनी भी नहीं आती.’’

‘‘क्या?’’ मैं ने चौंक कर उस की ओर देखा.

‘‘अपनी महबूबा को भला ऐसे मैसेज किए जाते हैं? कल रात क्या मैसेज भेजा था तुम ने?’’

‘‘तुम ने लिखा था, डियर कल्पना, जिंदगी हमें बहुत से मौके देती है, नई खुशियां पाने के, जीवन में नए रंग भरने के… मगर वह खुशियां तभी तक जायज हैं, जब तक उन्हें किसी और के आंसुओं के रास्ते न गुजरना पड़े. किसी को दर्द दे कर पाई गई खुशी की कोई अहमियत नहीं. प्यार पाने का नहीं बस महसूस करने का नाम है. मैं ने तुम्हारे लिए प्यार महसूस किया. मगर उसे पाने की जिद नहीं कर सकता, क्योंकि मैं अपनी बीवी को धोखा नहीं दे सकता. तुम मेरे हृदय में खुशी बन कर रहोगी, मगर तुम्हें अपने अंतस की पीड़ा नहीं बनने दूंगा. तुम से मिलने का फैसला मैं ने प्यार के आवेग में लिया था मगर अब दिल की सुन कर तुम से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि रिश्तों में सीमा समझना जरूरी है.

‘‘हम कभी नहीं मिलेंगे… आई थिंक, तुम मेरी मजबूरी समझोगी और खुद भी मेरी वजह से कभी दुखी नहीं रहोगी… कीप स्माइलिंग…’’

मैं ने चौंकते हुए पूछा, ‘‘पर यह सब तुम्हें कैसे पता…?’’

‘‘क्योंकि तुम्हारी कल्पना भी मैं हूं और साधना भी…’’ कह कर साधना मुसकराते हुए मेरे हृदय से लग गई और मैं ने भी पूरी मजबूती के साथ उसे बांहों में भर लिया.

आज मुझे अपना मन बहुत हलका महसूस हो रहा था. बेवफाई के इलजाम से आजाद जो हो गया था मैं. Romantic Story In Hindi 

Social Story : का से कहूं – सहेलियों की व्यथा की दिल छूती कहानी

Social Story : कहने को तो मैं बाजार से घर आ गई थी पर लग रहा है मेरी खाली देह ही वापस लौटी है, मन तो जैसे वहीं बाजार से मेरी बचपन की सखी सुकन्या के साथ चला गया था. शायद उस का संबल बनने के लिए. आज पूरे 3 वर्ष बाद मिली सुकन्या, होंठों पर वही सदाबहार मुसकान लिए. यही तो उस की विशेषता है, अपनी हर परेशानी, हर तकलीफ को अपनी मुसकराहट में वह इतनी आसानी, इतनी सफाई से छिपा लेती है कि सामने वाले को धोखा हो जाता है कि इस लड़की को किसी तरह का कोई गम है.

‘‘अरे भाई, आज जादू की सब्जी बना रही हो,’’ विवेक, मेरे पति, के टोकते ही मैं यथार्थ के धरातल पर आ गई. अब मुझे ध्यान आया कि मैं खाली कुकर में कलछी चला रही हूं. वे शायद पानी पीने के लिए रसोई में आए थे.

‘‘क्या बात है विनि, परेशान हो?’’ इन्होंने पूछा, ‘‘आओ, बैठ कर बातें करते हैं.’’

‘‘पर खाना,’’ मेरे यह कहते ही ये बोले, ‘‘तुम्हें भी पता है, मन में इतनी हलचल ले कर तुम ठीक से खाना बना नहीं पाओगी और मैं शक्कर वाली सब्जी खा नहीं पाऊंगा.’’

मैं अपलक विवेक का चेहरा देखती रही जो मुझे, मुझ से भी ज्यादा समझते हैं.

आज एक बार फिर प्रकृति को कोटिकोटि धन्यवाद देने को मन कर रहा है कि उस ने मुझे इतना समझने वाला पति दिया है.

‘‘फिर से खो गईं,’’ विवेक ने मेरे चेहरे के सामने चुटकी बजाते हुए कहा, ‘‘आने दो सासूमां को, उन से पूछूंगा कि कहीं आप अपनी यह बेटी कुंभ के मेले से तो नहीं लाई थीं. बारबार खो जाती है,’’ फिर इन्होंने मुझे सोफे पर बैठाते हुए कहा, ‘‘अब बताओ, क्या बात है?’’

‘‘आप को सुकन्या याद है?’’

‘‘कौन, वह शरारती लड़की जिस ने हमारे विवाह में मेरे दोस्तों को सब से ज्यादा छकाया था? क्या हुआ उसे?’’ इन्होंने पूछा.

‘‘आज बाजार में मिली थी. पता है, कालेज में हम 3 सखियों की आपस में बहुत घनिष्ठता थी. मैं, पारुल और सुकन्या. हम तीनों के विचार, व्यवहार तथा पारिवारिक स्थितियां एकदूसरे से एकदम अलग थीं. हम तीनों ने एक ही कालेज में ऐडमिशन लिया था. पारुल के पिताजी शहर के जानेमाने लोहे के व्यापारी थे. घर में धनदौलत की नदी बहती थी. पापा भी सरकारी महकमे में थे. हम पर दौलत की बरसात तो नहीं थी, पर कोई कमी भी नहीं थी. इस के विपरीत पितृविहीन सुकन्या के घर का खर्च मुश्किल से तब पूरा होता था जब वह और उस की मां सारा दिन सिलाई करती थीं. इन सब के बावजूद मैं ने कभी भी उस के माथे पर परेशानी की एक शिकन नहीं देखी थी.

‘‘शायद हमारी आर्थिक स्थिति जैसा ही हमारा स्वभाव था. नाजों में पली पारुल जरा सी तकलीफ में घबरा जाती थी तो दूसरी तरफ सुकन्या बड़ी से बड़ी परेशानी भी बिना उफ किए झेल जाती थी और बची मैं, जिस के लिए सुकन्या कहती थी, ‘अच्छा है कि तू मेरे और पारुल के बीच में रहती है वरना, यह पारुल तो मुझे भी अपनी तरह कमजोर बना देगी, कांच की गुडि़या.’ पारुल भी कहां चुप रहती, पलट कर जवाब मिलता, ‘हां, रहने दे मुझे कांच की गुडि़या की तरह नाजुक. मुझे नहीं बनना तेरी तरह पत्थर, सीने में दिल ही नहीं है.’ और बदले में सुकन्या यह शेर सुना कर लाजवाब कर देती थी :

‘आईने को तो बस टूट जाना है, आईना बनने से बेहतर है पत्थर बनो, तराशे जाओगे तो महान कहलाओगे.’

‘‘पर वक्त की मार देखो, मेरी दोनों सहेलियां टूट कर बिखर गईं जो पत्थर थी वह भी और जो कांच थी वह भी.’’

मेरी आंखों में रुके हुए आंसुओं का बांध टूट गया था. मैं बहुत देर तक विवेक की बांहों में सिसकती रही.

‘‘मुझे बताओ, क्या हुआ इस के बाद, तुम्हारा मन हलका हो जाएगा,’’ काफी देर की खामोशी के बाद विवेक बोले तो मैं ने सब कह दिया, ‘‘हमारा कालेज में पहला वर्ष ही था कि पारुल की सगाई हो गई शहर के ही व्यापारी के बेटे विजय से. वे दोनों रोज एकदूसरे से फोन पर घंटों बातें करते थे. वह अपनी सारी बातें हम से शेयर करती. पारुल की बातें खत्म नहीं होतीं और सुकन्या अकसर उसे चिढ़ाने के लिए कहती, ‘ओफ हो, जिस लड़की की सगाई हो गई हो उस के तो पास तो फटकना भी नहीं चाहिए.’ यह सुन कर पारुल रूठ जाती और मुझे बीचबचाव करना पड़ता था.

‘‘मुझे आज भी याद है जब पारुल के विवाह से ठीक 1 महीने पहले विजय ने शादी से मना कर दिया. परिणाम यह हुआ कि पारुल, जिस ने कभी छोटा सा दुख भी नहीं झेला था, ने उसी रात एक चिट्ठी में यह लिख कर ‘मैं विजय के बिना नहीं जी सकती हूं’ आत्महत्या कर ली.

‘‘उसी दिन सुकन्या ने मुझ से कहा था, ‘विनि, मैं शादी से पहले किसी को अपने इतने करीब नहीं आने दूंगी कि उस के दूर जाते ही मेरी जिंदगी ही मुझ से रूठ जाए.’ और अभी 2 महीने पहले ही तो उस ने मुझे फोन पर बताया था, ‘मेरी सगाई हो गई है, विनि.’ खुशी उस की आवाज से छलक रही थी. तो मैं ने भी पूछा, ‘क्या नाम है? बातेंवातें कीं?’

‘‘‘धीर नाम है उन का और हां, खूब बातें करते हैं.’

‘‘‘अच्छा जी, खूब बातें करते हैं तो आखिर पत्थर को भी बोलना आ ही गया. अब तो धीर जी से मिलना ही पड़ेगा.’ मैं ने चुटकी ली थी.

‘‘‘हां विनि, मुझे पता ही नहीं चला कब धीर ने मेरे पत्थर दिल को पिघला कर मोम बना दिया और उसे धड़कना सिखा दिया. 3 महीने बाद शादी है, तू जरूर आना.’

‘‘‘हांहां, जरूर आऊंगी,’ मैं ने कह दिया.

‘‘आज बाजार में मिली, होंठों पर वही सदाबहार मुसकान. मैं ने पूछा, ‘कहां जा रही है धूप में? शादी को 1 महीने से कम समय रह गया है. इतनी धूप में घूमेगी तो काली हो जाएगी.’

‘‘‘अरे, तुझे तो पता ही है पार्लर खोला है. उसी का सामान लेने जा रही हूं.’ वह जैसे मुझ से पीछा छुड़ाना चाह रही हो.

‘‘‘अरे पार्लरवार्लर छोड़, पिया के घर जाने की तैयारी कर,’ मैं ने उस का हाथ थामते हुए कहा.

‘‘तभी मेरी नजर उस की आंखों पर गई. शायद वह एक सैकंड का सौवां भाग जितना ही समय था जब उस की आंखों में दर्द की लहर गुजरी जिसे उस ने बहुत सफाई से छिपा लिया था क्योंकि अगले क्षण उस की सदाबहार मुसकराहट वापस उस के होंठों पर थी. वह मुझ से नजर नहीं मिला पा रही थी.

‘‘वह झटके से वापस जाने के लिए मुड़ी पर मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया. ‘नहीं एक्सरे, आज नहीं,’ कह कर वह अपना हाथ छुड़ाने लगी.

‘‘‘नहीं, आज ही,’ मैं ने जिद की.

‘‘हमेशा ही ऐसा होता था. उसे जब भी मुझ से अपनी कोई परेशानी छिपानी होती थी, मुझ से नजर मिलाने से कतराती थी, कहती थी, ‘मैं अपने हंसते चेहरे की आड़ में अपना दर्द सारी दुनिया से छिपा लेती हूं पर एक्सरे, तू फिर भी सब समझ जाती है.’ और तब वह मुझे विनी न कह कर एक्सरे बुलाती. आज भी ऐसा हुआ था.

‘‘‘कल धीर के घर वाले आए थे. उन्होंने अचानक ही अपनी डिमांड बढ़ा दी. अम्मा ने मजबूरी बताते हुए हाथ जोड़े तो उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया,’ उस ने अपना चेहरा घुमाते हुए कहा.

‘‘‘कल तेरा रिश्ता टूटा और आज तू पार्लर जा रही है,’ मुझे अपनी ही आवाज गले में फंसती हुई लग रही थी.

‘‘‘तू तो जानती है, हम दोनों बहनों ने कितनी मुश्किल से पैसे जोड़ कर यह पार्लर खोला है और अब अगर शादीविवाह के मौकों पर पार्लर बंद रखेंगे तो काम कैसे चलेगा.’

‘‘विवेक, समय की मार देखो, मेरी दोनों सहेलियों के साथ एकजैसे ही हादसे हुए. पारुल कांच की तरह टूट कर बिखर गई. उस का टूटना सब ने देखा और बिखरना भी. और दूसरी तरफ सुकन्या, वह न तो टूट सकी और न ही बिखर सकी, क्योंकि अगरवह कांच की तरह टूट कर बिखरती तो उन टूटी हुई किरचों से उस के अपने ही लहूलुहान हो जाते. घायल हो जाती उस की मांबहनें. तभी तो उस ने अपने टूटे हुए ख्वाबों को अपने दिल में ही दफन कर दिया. उस को तो दुखी हो कर शोक मनाने का अधिकार भी नहीं था. उस के ऊपर सारे घर की जिम्मेदारी जो थी.’’

विवेक ने मेरे मुख से दुखभरी कथा को सुन मुझ से अपनी सहेलियों के दर्द में शामिल होने को कहा. हालांकि अपने दिल की बात सुना कर मैं हलकी हो गई. Social Story

Family Story In Hindi : टुकड़ों में बंटी जिंदगी

Family Story In Hindi : मैं मंदबुद्धि था. अपने मन के जज्बात व्यक्त करता भी कैसे जब समझ ही कुछ नहीं आता था. लोगों की तिरस्कृत नजरों को झेलता हुआ मैं अब बस दूसरे के हाथों की कठपुतली मात्र रह गया था… पिता की गलतियों के कारण ही मैं मंदबुद्धि बालक पैदा हुआ. जब मैं मां के गर्भ में था तो मेरी मां को भरपूर खाना नहीं मिलता था. उन को मेरे पिता यह कह कर मानसिक यंत्रणा देते थे कि उन की जन्मपत्री में लिखा है कि उन का पहला बच्चा नहीं बचेगा. वह बच्चा मैं हूं. जो 35 वर्षगांठ बिना किसी समारोह के मना चुका है.

पैदा होने के बाद मैं पीलिया रोग से ग्रसित था, लेकिन मेरा इलाज नहीं करवाया गया. मेरी मां बहुत ही सीधी थीं मेरे पापा उन को पैसे नहीं देते थे कि वे अपनी मरजी से मेरे लिए कुछ कर सकें. सबकुछ सहते हुए वे अंदर से घुटती रहती थीं. वह जमाना ही ऐसा था जब लड़कियां शादी के बाद अपनी ससुराल से अर्थी में ही निकलती थीं. मायके वाले साथ नहीं देते थे. मेरी नानी मेरी मां को दुखी देख कर परेशान रहती थीं. लेकिन परिवार के अन्य लोगों का सहयोग न मिलने के कारण कुछ नहीं कर पाईं. मैं 2 साल का हो गया था, लेकिन न बोलता था, न चलता था. बस, घुटनों चलता था.

मेरी मां पलपल मेरा ध्यान रखती थीं और हर समय मु झे गोदी में लिए रहती थीं. शायद वे जीवनभर का प्यार 2 साल में ही देना चाहती थीं. मेरे पैदा होने के बाद मेरे कार्यकलाप में प्रगति न देख कर वे बहुत अधिक मानसिक तनाव में रहने लगीं. जिस का परिणाम यह निकला कि वे ब्लडकैंसर जैसी घातक बीमारी के कारण 3 महीने में ही चल बसीं. लेकिन मैं मंदबुद्धि बालक और उम्र भी कम होने के कारण सम झ ही नहीं पाया अपने जीवन में आए इस भूचाल को. सूनी आंखों से मां को ढूंढ़ तो रहा था, लेकिन मु झे किसी से पूछने के लिए शब्दों का ज्ञान ही नहीं था.

मुझे अच्छी तरह याद है जब मेरी मां का क्रियाकर्म कर के मेरे मामा और नाना दिल्ली लौटे तो मु झे एक बार तो उन्होंने गोद में लिया, लेकिन मेरी कुछ भी प्रतिक्रिया न देख कर किसी ने भी मेरी परवाह नहीं की. बस, मेरी नानी ने मु झे अपने से बहुत देर तक चिपटाए रखा था. मेरे पापा तो एक बार भी मु झ से मिलने नहीं आए. मां ने अंतिम समय में मेरी जिम्मेदारी किसी को नहीं सौंपी. लेकिन मेरे नानानानी ने मु झे अपने पास रखने का निर्णय ले लिया. उन का कहना था कि मेरी मां की तरह मेरे पापा मु झे भी यंत्रणा दे कर मार डालेंगे. वे भूले नहीं थे कि मेरी मां ने उन को बताया था कि गलती से मेरी बांह पर गरम प्रैस नहीं गिरी थी, बल्कि मेरे पिता ने जानबू झ कर मेरी बांह पर रख दी थी, जिस का निशान आज तक मेरी बांह पर है. एक बार सीढ़ी से धकेलने का प्रयास भी किया था.

इस के पीछे उन की क्या मानसिकता थी, शायद वे जन्मपत्री की बात सत्य साबित कर के अपना अहं संतुष्ट करने की कोशिश कर रहे थे. वे मु झे कभी लेने भी नहीं आए. मां की मृत्यु के 3 महीने के बाद ही उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया. यह मेरे लिए विडंबना ही तो थी कि मु झे मेरी मां के स्थान पर दूसरी मां नहीं मिली, लेकिन मेरे पिता को दूसरी पत्नी मिलने में देर नहीं लगी. पिता के रहते हुए मैं अनाथ हो गया. मैं मंदबुद्धि था, इसलिए मेरे नानानानी ने मु झे पालने में बहुत शारीरिक, मानसिक व आर्थिक कष्ट सहे. शारीरिक इसलिए कि मंदबुद्धि होने के कारण 15 साल की उम्र तक लघु और दीर्घशंका का ज्ञान ही नहीं था, कपड़ों में ही अपनेआप हो जाता था और उन को नानी को साफ करना पड़ता था.

रात को बिस्तर गीला हो जाने पर नानी रात को उठ कर बिस्तर बदलती थीं. ढलती उम्र के कारण मेरे नानानानी शारीरिक व मानसिक रूप से बहुत कमजोर हो गए थे. लेकिन मोहवश वे मेरा बहुत ध्यान रखते थे. मैं स्कूल अकेला नहीं जा पाता था, इसलिए मेरे नाना मु झे स्कूलबस तक छोड़ने जाते थे. मु झे ऐसे स्कूल में भेजा जहां सभी बच्चे मेरे जैसे थे. उन्होंने मानसिक कष्ट सहे, इसलिए कि मेरे मंदबुद्धि होने के कारण नानानानी कहीं भी मु झे ले कर जाते तो लोग परिस्थितियों को नजरअंदाज करते हुए मेरे असामान्य व्यवहार को देख कर उन को ताने देते. उस से उन का मन बहुत व्यथित होता. फिर वे मु झे कहीं भी ले कर जाने में कतराने लगे. उन के अपने बच्चों ने भी मेरे कारण उन से बहुत दूरी बना ली थी.

कई रिश्तेदारों ने तो यहां तक भी कह दिया कि मु झे अनाथाश्रम में क्यों नहीं डाल देते? नानानानी को यह सुन कर बहुत दुख होता. कई बार कोई घर आता तो नानी गीले बिस्तर को जल्दी से ढक देतीं, जिस से उन की नकारात्मक प्रतिक्रिया का दंश उन को न झेलना पड़े. मैं शारीरिक रूप से बहुत तंदुरुस्त था. दिमाम का उपयोग न होने के कारण ताकत भी बहुत थी, अंदर ही अंदर अपनी कमी को सम झते हुए सारा आक्रोश अपनी नानी पर निकालता था. कभी उन के बाल खींचता कभी उन पर पानी डाल देता और कभी उन की गोदी में सिर पटक कर उन को तकलीफ पहुंचाता. मातापिता के न रहने से उन के अनुशासन के बिना मैं बहुत जिद्दी भी हो गया था. मैं ने अपनी नानी को बहुत दुख दिया.

लेकिन इस में मेरी कोई गलती नहीं थी क्योंकि मैं मंदबुद्धि बालक था. नानानानी ने आर्थिक कष्ट सहे, इस प्रकार कि मेरा सारा खर्च मेरे पैंशनधारी नाना पर आ गया था. कहीं से भी उन को सहयोग नहीं मिलता था. उन्होंने मेरा अच्छे से अच्छे डाक्टर से इलाज करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वैसे भी मु झे कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी. नानी मेरे भविष्य को ले कर बहुत चिंतित रहती थीं और मेरे कारण मानसिक आघात सहतेसहते थक कर असमय ही 65 वर्ष की उम्र में ही सदा के लिए विदा हो गईं. उस समय मेरी उम्र 18 वर्ष की रही होगी. अब तक मानसिक और शारीरिक रूप से मैं काफी ठीक हो गया था. अपने व्यक्तिगत कार्य करने के लिए आत्मनिर्भर हो गया था. लेकिन भावाभिव्यक्ति सही तरीके से सही भाषा में नहीं कर पाता था. टूटीफूटी और कई बार निरर्थक भाषा ही बोल पाता था.

मेरे जीवन की इस दूसरी त्रासदी को भी मैं नहीं सम झ पाया और न परिवार वालों के सामने अभिव्यक्त ही कर पाया, इसलिए नानी की मृत्यु पर आए परिवार के अन्य लोगों को मु झ से कोई सहानुभूति नहीं थी. वैसे भी, अभी नाना जिंदा थे मेरे पालनपोषण के लिए. औपचारिकता पूरी कर के सभी वापस लौट गए. नाना ने मु झे भरपूर प्यार दिया. उन के अन्य बच्चों के बच्चों को मु झ से ईर्ष्या भी होती थी कि उन के हिस्से का प्यार भी मु झे ही मिल रहा है. लेकिन उन के तो मातापिता भी थे, मैं तो अनाथ था. मेरी मंदबुद्धि के कारण यदि कोईर् मेरा मजाक उड़ाता तो नाना उन को खूब खरीखोटी सुनाते, लेकिन कब तक…? वे भी मु झे छोड़ कर दुनिया से विदा हो गए. उस समय मैं 28 साल का था, लेकिन परिस्थिति पर मेरी प्रतिक्रिया पहले जैसी थी. मेरा सबकुछ लुट चुका था और मैं रो भी नहीं पा रहा था. बस, एक एहसास था कि नाना अब इस दुनिया में नहीं हैं. इतनी मेरे अंदर बुद्धि नहीं थी कि मैं अपने भविष्य की चिंता कर सकूं. मु झे तो पैदा ही कई हाथों की कठपुतली बना कर किया गया था. लेकिन अभी तक मैं ऐसे हाथों के संरक्षण में था, जिन्होंने मु झे इस लायक बना दिया था

कि मैं शारीरिक रूप से बहुत सक्षम और किसी पर निर्भर नहीं था और कोई भी कार्य, जिस में बुद्धि की आवश्यकता नहीं हो, चुटकियों में कर देता था. वैसे भी, जो व्यक्ति दिमाग से काम नहीं करते, शारीरिक रूप से अधिक ताकत वाले होते हैं. मेरी मनोस्थिति बिलकुल 2 साल के बच्चे की तरह थी, जो उस के साथ क्या हो रहा है, उस के लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा है, सम झ ही नहीं पाता. लेकिन मेरी याद्दाश्त बहुत अच्छी थी. गाडि़यों के नंबर, फोन नंबर तथा किसी का घर किस स्थान पर है. मु झे कभी भूलता नहीं था. कहने पर मैं कोई भी शारीरिक कार्य कर सकता था, लेकिन अपने मन से कुछ नहीं कर पाता था. नाना की हालत गंभीर होने पर मैं ने अपने पड़ोस की एक आंटी के कहने पर अपनी मौसी को फोन से सूचना दी तो आननफानन मेरे 2 मामा और मौसी पहुंच गए और नाना को अस्पताल में भरती कर दिया. डाक्टरों ने देखते ही कह दिया कि उन का अंतिम समय आ गया है. उन के क्रियाकर्म हो जाने के बाद सब ने घर की अलमारियों का मुआयना करना शुरू किया. महत्त्वपूर्ण दस्तावेज निकाले गए. सब की नजर नाना के मकान पर थी. मैं मूकदर्शक बना सब देखता रहा. भरापूरा घर था. मकान भी मेरे नाना का था. मेरे एक मामा की नजर आते ही मेरे हृष्टपुष्ट शरीर पर टिक गई.

उन्होंने मेरी मंदबुद्धि का लाभ ले कर मु झे मेरे मनपसंद खाने की चीजें बाजार से मंगवा कर दीं और बारबार मु झे उन के साथ भोपाल जाने के लिए उकसाते रहे. मु झे याद नहीं आता कि कभी उन्होंने मेरे से सीधेमुंह से बात भी की हो. तब तो और भी हद हो गई थी जब एक बार मैं नानी के साथ भोपाल उन के घर गया था और मेरे असामान्य व्यवहार के लिए उन्होंने नानी को दोषी मानते हुए बहुत जलीकटी सुनाई. उन को मामा की बातों से बहुत आघात पहुंचा. जिस कारण नानी निश्चित समय से पहले ही दिल्ली लौट गई थीं. अब उन को अचानक इतना प्यार क्यों उमड़ रहा था. यह सोचने की बुद्धि मु झ में नहीं थी. इतना सहयोग यदि नानी को पहले मिलता तो शायद वे इतनी जल्दी मु झे छोड़ कर नहीं जातीं. पहली बार सब को यह विषय विचारणीय लगा कि अब मैं किस के साथ रहूंगा? नाना से संबंधित कार्यकलाप पूरा होने तक मेरे मामा ने मेरा इतना ब्रेनवौश कर दिया कि मैं कहां रहना चाहता हूं?

किसी के भी पूछने पर मैं झट से बोलता, ‘मैं भोपाल जाऊंगा,’ नाना के कई जानने वालों ने मामा को कटाक्ष भी किया कि कैसे सब खत्म हो जाने के बाद उन का आना हुआ. इस से पहले तो उन को वर्षों से कभी देखा नहीं. इतना सुनते ही ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ मुहावरे को सार्थक करते हुए वे उन पर खूब बरसे. परिणाम यह निकला कि बहुत सारे लोग नाना की तेरहवीं पर बिना खाए ही लौट गए. आखिरकार, मैं मामा के साथ भोपाल पहुंच गया. मेरी दाढ़ी और बाल बहुत बड़ेबड़े हो गए थे. सब से पहले मेरे मामा ने उन्हें संवारने के लिए मु झे सैलून भेजा, फिर मेरे लिए नए कपड़े खरीदे, जिन को पहन कर मेरा व्यक्तित्व ही बदल गया था. मेरे मामा की फैक्ट्री थी, जिस में मैं उन के बेटे के काम में हाथ बंटाने के लिए जाने लगा. जब मैं नानी के साथ एक बार यहां आया था, तब मु झे इस फैक्ट्री में घुसने की भी अनुमति नहीं थी. अब जबकि मैं शारीरिक श्रम करने के लायक हो गया तो उन के लिए मेरे माने ही बदल गए थे. धीरेधीरे मु झे सम झ में आने लगा कि उन का मु झे यहां लाने का उद्देश्य क्या था? मैं चुपचाप एक रोबोट की तरह सारा काम करता. मु झे अपनी इच्छा व्यक्त करने का तो कोई अधिकार ही नहीं था. दिल्ली के जिस मकान में मेरा बचपन गुजरा, उस में तो मैं कभी जा नहीं सकता था क्योंकि प्रौपर्टी के झगड़े के कारण उस में ताला लग गया था. और मैं भी मामा की प्रौपर्टीभर बन कर रह गया था, जिस में कोई बंटवारे का झं झट नहीं था. उन का ही एकछत्र राज्य था. मैं अपने मन से किसी के पास जा नहीं सकता था, न किसी को मु झे बुलाने का अधिकार ही था. मेरा जीवन टुकड़ों में बंट गया था.

मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं था. मैं अपना आक्रोश प्रकट भी करता तो किस के सामने करता. कोई नानानानी की तरह मेरी भावना को सम झने वाला ही नहीं था. मैं तो इस लायक भी नहीं था कि अपने पिता से पूछूं कि मेरे इस प्रकार के टुकड़ों में बंटी जिंदगी का उत्तरदायी कौन है? उन को क्या हक था मु झे पैदा करने का? मेरी मां अंतिम समय में, मेरे पिता की ओर इशारा कर के रोते हुए मामा से कह रही थीं, ‘इस ने मु झे बीमारी दी है, इस को मारो…’ लेकिन प्रतिक्रियास्वरूप किसी ने कुछ नहीं किया, करते तो तब जब उन को मेरी मां से प्यार होता. काश, मु झे इतनी बुद्धि होती कि मैं अपनी मां का बदला अपने पिता से लेता. लेकिन काश ऐसा कोई होता जो मेरा बदला जरूर लेता. जिस के पास बुद्धि है. मेरी कथा को शब्दों का जामा पहनाने वाली को धन्यवाद, कम से कम उन को मु झ से कुछ सहानुभूति तो है, जिस के कारण मु झ मंदबुद्धि बालक, जिस को शब्दों में अभिव्यक्ति नहीं आती, की मूकभाषा तथा भावना को सम झ कर उस की आत्मकथा को कलमबद्ध कर के लोगों के सामने उजागर तो किया. Family Story In Hindi

Religion : कांवड़ यात्रा के नाम पर शूद्रों को बर्बाद करने की साजिश

Religion : परदादा ने बेगारी ढोई. दादा ने बोझा ढोया. बाप ईंट ढोता है और बेटा कांवड़ ढोने में लगा है. शूद्रों के लिए यह नई तरह की गुलामी का आगाज है.

पंडिताइन परेशान थी. पंडिताइन के घर के बाहर 5 घंटों से डीजे चल रहा था. डीजे के तेज शोर में पंडिताइन का बड़ा लड़का डिस्टर्ब हो रहा था. पंडिताइन से रहा नहीं गया तो वो बाहर निकली और सीधे राम लखन जाटव के दरवाजे पर पहुंच गई. पंडिताइन को अपने दरवाजे पर देख कर राम लखन जाटव को लगा कि वो उन के बेटे की कांवड़ यात्रा के लिए उन्हें अप्रिशिएट करने आई है लेकिन पंडिताइन ने चिल्लाते हुए कहा, ‘तुम्हारा बेटा कांवड़ लेने जा रहा है तो इस में मेरे बेटे की पढ़ाई का नुकसान क्यों कर रहे हो?’

यही इस कांवड़ यात्रा का सब से कड़वा सच है. कुछ अपवादों को छोड़ कर इस यात्रा में सिर्फ और सिर्फ शूद्रों के बच्चे ही शामिल होते हैं. मजदूर बाप के वो बेटे जिन्हे बोझा ढोने की आदत है. जिन का बाप ईंट ढोता है उन का बेटा कुछ न कुछ तो ढोएगा ही. कांवड़ ही सही.

अभी हाल ही में बरेली के शिक्षक डा. रजनीश गंगवार की लिखी एक कविता सुर्खियों में आई. कविता की पंक्तियां थीं. “कांवड़ लेने मत जाना, तुम ज्ञान के दीप जलाना” और “मानवता की सेवा कर के, तुम सच्चे मानव बन जाना” इस तार्किक कविता ने पाखंडवादी सिस्टम की चूलें हिला कर रख दी. धार्मिक भावनाएं आहत हुईं और डा. रजनीश गंगवार पर एफआईआर दर्ज हो गई.

अंजना ओम कश्यप ने अपने शो में इस कविता पर रोना शुरू किया. उन्होंने कहा की रजनीश गंगवार की कविता हिंदू धर्म के साथ मजाक है और यह शिवभक्तों को शिव की पूजा से रोकने का प्रयास है. जिन मुद्दों पर अंजना का अपना कोई ओपिनियन नहीं होता वहां वे आरएसएस की स्क्रिप्ट पढ़ देती हैं. इस मामले में भी वही हुआ. अंजना ने कहा की हिंदूओं के त्योहारों पर ही लोगों को मानवता क्यों याद आती है? कविता के जरिये कांवाडियों का मजाक उड़ाने वाले लोगों ने मुहर्रम पर कविता क्यों नहीं लिखी?

अंजना ओम कश्यप को यह मालूम ही नहीं की डा. रजनीश की कविता तो फिर भी मर्यादित और संयमित शब्दों में लिखी गई है अगर वे कांवड़ और इस तरह की तमाम धार्मिक यात्राओं पर लिखी आर्यसमाजियों की किताबें पढ़ लें तो शायद वो होश खो बैठे. आरएसएस की स्क्रिप्ट पढ़ने वाली अंजना ओम कश्यप ने अगर संविधान ही ठीक से पढ़ा होता तो वह यह बात कहने से पहले सौ बार सोचती.

संविधान के अनुच्छेद 51ए(एच) के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह समाज में वैज्ञानिक चेतना को बढ़ाने का काम करे. संविधान का यह अनुच्छेद भारत के प्रत्येक नागरिक के मूल कर्तव्यों को निर्धारित करते हुए कहता है-

“भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे.”

डा. रजनीश गंगवार ने अपनी कविता के माध्यम से अपने उन संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन किया है जो कि मेनस्ट्रीम मीडिया को लीड कर रही अंजना ओम कश्यप को करना चाहिए था.

अपने टेलीविजन शो में अंजना ओम कश्यप कांवड़ यात्रा को समस्त हिंदूओं की आस्था बता रही हैं. अगर सच में ऐसा है तो क्या वो ऐसी एक तस्वीर साझा कर सकती हैं जिस में उन के परिवार का कोई युवक कांवड़ ढोता हुआ नजर आ रहा हो? क्या वे अपने शो में इन सवालों पर चिल्ला सकती हैं कि हिंदूओं के ठेकेदार बनने वाले संबित पात्रा या सुधांशु द्विवेदी के घर से कोई कांवड़ ढोता क्यों नहीं दिखा? अमित शाह के पुत्र जय शाह कांवड़ियों की भीड़ में शामिल क्यों नहीं हुए? कितने प्रतिशत ईडब्ल्यूएस के बच्चे इस पावन यात्रा में शामिल हुए? कांवड़ियों की इस भीड़ में ब्राह्मण युवाओं की भागीदारी कितनी है? राजपूतों के बच्चे इस भीड़ में कहां है? बीच सड़क पर डीजे के आगे नाचते नंगे धड़ंग लड़कों में वैश्य समाज के लड़के कितने हैं? अगर अपर कास्ट के युवा हिंदू धर्म की इस पावन यात्रा का हिस्सा नहीं हैं तो यह समस्त हिंदूओं की आस्था का पर्व कैसे हुआ?

इन तमाम प्रश्नों का सीधा सा जवाब यह है कि यह यात्रा समस्त हिंदूओं की यात्रा नहीं बल्कि सिर्फ शूद्रों को पाखंडवाद में झोंक कर उन्हें गुलाम बनाए रखने का प्रायोजित कार्यक्रम भर है और इस प्रायोजित कार्यक्रम को स्थाई बनाए रखने के लिए पूरा सिस्टम काम पर लगा है.

कांवड़ियों के स्वागत में सड़कों के किनारे बड़ेबड़े होर्डिंग्स लगे हैं. इन होर्डिंग्स में छोटेबड़े नेता हाथ जोड़े कांवड़ियों का स्वागत करते दिखाई देते हैं. इन छुटभइये नेताओं के बच्चे भी कांवड़ यात्रा में शामिल नहीं होते. यहां कास्ट और क्लास फैक्टर मायने रखता हैं. ऊंचे कास्ट और पैसे वालों के बच्चे कांवड़ नहीं ढोते. शहरों के फ्लैट कल्चर और सोसाइटीज में पले युवा भी कांवड़ से दूरी बना कर रखते हैं.

जो लोग रोज सुबह पार्कों में 5 किलोमीटर की दौड़ लगाते हैं या ट्रेडमिल पर प्रतिदिन 10 किलोमीटर तक दौड़ लेते हैं वो कांवड़ की भीड़ में आधा किलोमीटर भी पैदल नहीं चल सकते क्योंकि यह उन के रूटीन से बाहर की बात है. सेहत के लिए दौड़ना अलग बात है और पाखंड के लिए भागना दूसरी बात. यही लोग कांवड़ शिविरों के लिए मोटा चंदा देते हैं या कई जगहों पर कांवड़ियों की सेवा में खुद लगे दिखाई देते हैं. इस मामले में यह लोग भी आस्थावान होते हैं मगर यह लोग कांवड़ ढोने जितनी आस्था नहीं रखते.

शिवभक्ति अपनी जगह है लेकिन शिव को खुश करने के लिए इतनी भी बेगारी खटने की जरूरत नहीं. सावन की गरमी, ऊपर से मीलों लम्बा सफर. बोझा अलग से. यह काम ऊंची नाक वालों और ऊंची जात वालों का नहीं है. ईडब्ल्यूएस वालों का भी नहीं. ईडब्ल्यूएस वाले गरीब हैं मगर इतने भी खाली नहीं हैं कि इस हुड़दंग का हिस्सा बन जाएं. इन लोगों के लिए हर दिन कीमती होता है. कोई अपना एक दिन भी क्यों बरबाद करे. ईडब्ल्यूएस वालों को अगर किसी धार्मिक यात्रा में जाना ही हो तो वो वैष्णव देवी, अमरनाथ या केदारनाथ की यात्राओं पर निकलेंगे जहां भगवान के दर्शन से ज्यादा मजा नेचर के अवलोकन में आता है. खर्च की कोई परवाह नहीं.

कांवड़ यात्रा तो उन लोगों का काम है जिन के बाप दादा के लिए बोझा ढोना ही नियति रही है. कांवड़ ढोने वालों ने बचपन से गरमी सर्दी और बरसात को झेला है. यह सब आदत में शामिल है. घर में वैसे भी खाली बैठे हैं. पढ़ाई लिखाई से कोई वास्ता नहीं. अपने जैसे कुछ दोस्त मिल गए तो सफर मजे से कट जाएगा. चिलम, दारू सब मुफ्त में मिलेगा. पानी ही तो ढोना है. सेहत पर क्या फर्क पड़ता है. साल का एक महीना बरबाद भी हो जाए तो भी इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. वैसे भी जिंदगी भर मजदूरी ही करनी है. एक महीना भगवान के नाम पर बेगारी खट लेने में हर्ज ही क्या है?

Social Story In Hindi : उस रात का सच

Social Story In Hindi : महेंद्र को यकीन था कि हरिद्वार थाने में वह ज्यादा दिनों तक थानेदार के पद पर नहीं रहेगा, इसीलिए नोएडा के थाने में तबादला होते ही उस ने अपना बोरियाबिस्तर बांधा और रेलवे स्टेशन चला आया. रेल चलते ही हरिद्वार में गुजारे समय की यादें उस के सामने एक फिल्म की तरह गुजरने लगीं. दरअसल, हुआ ऐसा था कि रुड़की थाने में रहते हुए वहां के एक साधु द्वारा वहीं के लोकल नेताओं को लड़कियों के साथ मौजमस्ती कराते महेंद्र ने रंगे हाथों पकड़ा था और थाने में बंद कर दिया था.

यकीन मानिए, उन नेताओं को थाने में  लाए उसे 10 मिनट भी नहीं हुए थे कि डीएसपी साहब का फोन आ गया कि फलांफलां नेता को फौरन रिहा कर दो. महेंद्र बड़े अफसर का आदेश मानने को मजबूर था, इसलिए उसे उन नेताओं को फौरन रिहा करना पड़ा. चूंकि वे नेता सत्ताधारी दल से जुड़े थे, इसलिए उन्होंने महेंद्र का तबादला हरिद्वार थाने में करा दिया. हरिद्वार थाने में कुछ दिन महेंद्र चुपचाप बैठा अपना काम करता रहा, लेकिन जब एक दिन थाने में बैठ कर वह पुरानी फाइलें देख रहा था, तभी एक फाइल पर जा कर उस की नजर रुक गई. उस ने फाइल में दर्ज रिपोर्ट पढ़ी. उस रिपोर्ट में लिखा था,  ‘गंगाघाट आश्रम में रहने वाली गंगाबाई आश्रम की तिजोरी में से 10 हजार रुपए चुरा कर भागी.’

उसी फाइल के अगले पेज पर उस आश्रम के महंत और उस के एक शिष्य का बयान था,  ‘उस रात हम दोनों साधना करने के लिए पास की पहाड़ी पर बने मंदिर में गए थे. चूंकि इस बात की जानकारी गंगाबाई को थी, इसी बात का फायदा उठा कर उस ने हमारे कमरे में से तिजोरी की चाबी चुराई और उस में रखे 10 हजार रुपए चुरा कर भाग गई. आश्रम से एक रजाई भी गायब है.’

महेंद्र ने जब यह रिपोर्ट पढ़ी, तो उसे इस में कुछ गोलमाल लगा. उस ने तभी सबइंस्पैक्टर राकेश को बुलाया और उस से पूछा,  ‘‘राकेश, गंगाघाट आश्रम में हुई चोरी की तहकीकात क्यों नहीं की गई?’’ उस ने जबाब दिया,  ‘‘सर, थानेदार साहब ने मुझ से कहा था कि आश्रम का महंत इस मामले की जांच की तहकीकात में मदद नहीं कर रहा है, इसलिए इसे ऐसे ही पड़ा रहने दो. सो, तब से यह फाइल ऐसे ही पड़ी है.’’ राकेश के जाने के बाद महेंद्र को लगा कि हो न हो, इस मामले में कुछ राज जरूर है, जो महंत छिपा रहा है. उस ने तय किया कि इस मामले की तहकीकात वह खुद ही करेगा.

इस के बाद महेंद्र ने आश्रम पर पैनी नजर रखनी शुरू कर दी. एक दिन शाम को महेंद्र गंगाघाट आश्रम के सामने वाले होटल में बैठा था. उस की नजर आश्रम के गेट पर थी. उस ने देखा कि कुछ औरतें आश्रम के अंदर गई हैं और तकरीबन एक घंटे बाद निकलीं. यह देख कर महेंद्र सोच में पड़ गया कि ये औरतें इतनी देर तक आश्रम में क्या कर रही थीं? जैसे ही वे औरतें आश्रम से बाहर निकल कर होटल के पास आईं, तभी महेंद्र ने उन में से एक औरत से पूछा,  ‘‘बहनजी, क्या आश्रम में बहुत से मंदिर हैं, जो दर्शन करने के लिए बहुत देर लगती है?’’ वह औरत हंसी और बोली,  ‘‘भैया, आश्रम में तो एक भी मंदिर नहीं है. हम तो महंतजी के पास गई थीं. वे  लाइलाज बीमारियों का इलाज भी मुफ्त में करते हैं.’’

महेंद्र ने आगे पूछा,  ‘‘बहनजी, आप इन महंतजी के आश्रम में कब से आ रही हैं?’’

वह औरत बोली,  ‘‘आज तो मैं दूसरी ही बार आई हूं, लेकिन महंतजी कहते हैं कि तुम्हारी बीमारी गंभीर है. तुम्हें ठीक होने में 4-5 महीने तो लग ही जाएंगे,’’ इतना कह कर वह औरत चली गई.

एक दिन शाम को महेंद्र ने एक पुलिस वाले को उस आश्रम के बाहर बैठा दिया और उस से कहा, ‘‘कोई औरत अंदर से बाहर आए, तो उसे ले कर तुम मेरे पास आना.’’

उस दिन रात के 8 बजे वह पुलिस वाला एक 30-32 साला औरत को ले कर महेंद्र के घर आया. महेंद्र ने उसे बैठने के लिए कहा.

‘‘क्या आप आश्रम में नौकरी करती हैं?’’ महेंद्र ने पूछा.

‘‘नहीं सर. दरअसल, मेरी शादी हुए तकरीबन 7 साल हो गए हैं और अभी तक मेरी गोद नहीं भरी है. मेरे महल्ले की एक औरत ने मुझे बताया कि तू गंगाघाट आश्रम के महंत के पास जा. कुछ ही दिनों में तेरी गोद भर जाएगी, इसलिए आज मैं पहली बार वहां गई थी.’’

महेंद्र ने उस से यह जानकारी ली और उसे इस तसदीक के साथ जाने के लिए कहा,  ‘‘मैं ने तुम से जो जानकारी ली है, यह बात तुम किसी को मत बताना. यहां तक कि महंत को भी नहीं.’’

उन दोनों औरतों से मिली जानकारी संकेत दे रही थी कि हो न हो, उस आश्रम में कोई  ‘अपराध का अड्डा’ जरूर चल रहा है. सो, महेंद्र ने गंगाघाट आश्रम में हुई चोरी की घटना की तहकीकात जोरशोर से शुरू कर दी.

एक बार जब महेंद्र इसी सिलसिले में महंत से मिलने आश्रम गया, तो उस ने उसे इस मामले पर हाथ ही नहीं रखने दिया और बोला,  ‘‘जाने भी दीजिए. 10 हजार रुपए कोई बड़ी बात नहीं है. आप तो चाय पीजिए.’’

उस की होशियारी देख महेंद्र के मन में शक और भी गहरा गया.

एक दिन रात को जब महेंद्र गश्त के लिए निकला, तो देखा कि वह महंत अपने शिष्य के साथ पहाड़ी पर जा रहा था. उस के पहाड़ी पर जाते ही महेंद्र गंगाघाट आश्रम के अंदर पहुंचा. वहां उसे भोलाराम नाम का एक आदमी मिला.

‘‘तुम यहां क्या करते हो? ’’ महेंद्र ने पूछा.

‘‘सर, आप मुझे इस आश्रम का मैनेजर भी कह सकते हैं और चौकीदार भी. सच तो यह है कि यहां का सारा काम मैं ही संभालता हूं. अब मेरी उम्र 70 पार हो चली है, इसलिए समय काटने के लिए मैं यहां रहता हूं. मैं ईमानदार आदमी हूं, इसलिए महंत ने मुझे अपने पास रखा है,’’ उस आदमी ने बताया.

‘‘तुम ईमानदार हो और सच्चे भी लगते हो. अच्छा, यह बताओं कि तुम्हारे आश्रम में रहने वाली गंगाबाई कैसी औरती थी? क्या वाकई वह चोरी कर सकती है?’’ महेंद्र ने पूछा.

वह आदमी बोला,  ‘‘सर, मैं आप से झूठ नहीं बोलूंगा. दरअसल, गंगाबाई इस आश्रम में झाड़ूपोंछे का काम करती थी. वह  ‘सुंदर’ तो थी ही, लेकिन  ‘जवान’ होने से कामकाज में बहुत तेज भी थी.

‘‘जब मैं नयानया इस आश्रम में आया, तब गंगाबाई ने ही मुझे बताया था कि महंतजी का नित्यक्रम एकदम पक्का है. वे सुबह मुझ से एक गिलास दूध मंगवाते हैं, फिर उस में अपने पास रखे काजूबदाम और अन्य मेवे मिलाते हैं और उसी का सेवन करते हैं. फिर दोपहर में केवल 2 रोटी खाते हैं. इसी तरह शाम को भी उन का यही नित्यक्रम रहता है.’’

‘‘उस दिन उस की यह बात सुन कर मुझे हंसी आ गई थी. तब गंगाबाई ने मुझ से पूछा भी था,  ‘भोला भैया, तुम्हें हंसी क्यों आई?’

‘‘सर, मुझे हंसी इसलिए आई थी कि उस की बात सुन कर मैं सोच में पड़ गया था कि एक दिन में 2-2 गिलास  मेवे वाला दूध पी कर यह महंत उसे हजम कैसे करता होगा? क्योंकि वह अपने कमरे से कभीकभार ही बाहर जाता है.

‘‘सर, गंगाबाई का पति इसी आश्रम में रहता था. मेरे यहां आने से पहले आश्रम का सारा काम वही देखता था. कुछ दिनों से मैं ने उस में एक बरताव देखा था कि वह रोजाना रात को शराब पी कर आश्रम में आने लगा था. तब मेरे मन में सवाल भी उठा था कि उस के पास शराब पीने के लिए पैसे कहां से आते हैं?

‘‘एक दिन मुझ से रहा नहीं गया और मैं ने गंगाबाई से पूछ ही लिया,  ‘बहन, तुम रोजाना अपने पति को शराब पीने के लिए पैसे क्यों देती हो?’

‘‘तब वह बोली थी,  ‘भोला भैया, मेरे पति को शराब पीने के लिए पैसे मैं नहीं देती हूं, बल्कि खुद महंतजी ही देते हैं.’’’

उस दिन उस आदमी के मुंह से ऐसी बातें सुन कर महेंद्र भी दंग रह गया था.

उस आदमी ने आगे बताया, ‘‘एक दिन जब रात को गंगाबाई का पति शराब पी कर आया, तब महंतजी ने उस की सरेआम पिटाई की और आश्रम के गेट से उसे बाहर धकेलते हुए कहा,  ‘तू रोजाना शराब पी कर आश्रम के नियमों को तोड़ता है. अब तू इस आश्रम में नहीं रह सकेगा. आज के बाद तू मुझे कभी अपना मुंह मत दिखाना.’

‘‘सर, उस रात उस का पति जो इस आश्रम से गया, तो आज तक उस का पता नहीं चला कि वह कहां है? जिंदा भी है या नहीं?

‘‘गंगाबाई भी अपने पति के साथ यहां से जाना चाहती थी, लेकिन उसी दिन महंत का एक शिष्य आश्रम में आया और उस ने महंतजी को कह कर उसे आश्रम से नहीं जाने दिया. महंत और उस का शिष्य रोजाना मेवे वाला दूध गंगाबाई के हाथों से पीते रहे.’’

‘‘एक दिन महंतजी ने मुझ से कहा,  ‘कुछ दिन के लिए तुम अपने ऋषिकेश वाले आश्रम जा कर रहो और वहां का इंतजाम देखो.’

‘‘सर, समय कब रुका है, जो रुकता. मैं एक महीने बाद दोबारा इस आश्रम में आ गया.

‘‘एक दिन सुबहसुबह गंगाबाई दौड़ीदौड़ी अपने कमरे से बाहर निकली और बाथरूम में जा कर उलटियां करने लगी. जब उस की इस हरकत पर महंतजी और उन के शिष्य की भी नजर पड़ी, तब शिष्य बोला,  ‘गुरुजी, कुछ गड़बड़ लगती है. गंगा सुबह से कई बार उलटियां कर चुकी है. मुझे लगता है कि वह पेट से हो गई है.’

‘‘शिष्य के मुंह से ऐसी बात सुनते ही महंत के माथे पर पसीना आ गया. वे बोले, ‘जैसेजैसे इस का पेट बढ़ता जाएगा, अपने पाप का घड़ा लोगों के सामने आने लगेगा. फिर जो लोग हमें साधुसंन्यासी मान कर पूजते हैं, वे ही हमारा मुंह काला कर के हमें सरेबाजार घुमाएंगे. अगर इस मुसीबत को हम ने जल्दी से नहीं निबटाया, तो हम निबट जाएंगे.’

‘‘सर, उस रात का सच आप को बता रहा हूं. वह अमावस की काली रात थी. जब रात को गंगाबाई उन्हें दूध देने उन के कमरे में गई, तभी उन्होंने उस के मुंह में कपड़ा ठूंसा, फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी और आधी रात के बाद रात के अंधेरे में  महंत के शिष्य ने उस की लाश एक रजाई में लपेटी और उसे गंगा में बहा आया.

‘‘उस के बाद उन दोनों ने तिजोरी से रुपए निकाल कर उसे खुला छोड़ दिया, ताकि  लगे कि यहां चोरी की वारदात हुई है.

‘‘सर, उस रात हुई हत्या और चोरी के बहुत से सुबूत मैं ने अपने पास महफूज रखे हैं. मेरी भी यही इच्छा थी कि साधु के रूप में छिपे इन अपराधी भेडि़यों को मैं सलाखों के पीछे देखूं, लेकिन जब आप के पहले के थानेदार ने इस केस में दिलचस्पी नहीं दिखाई, इसलिए मैं उन के सामने इन सुबूतों को नहीं लाया. अब मैं इस मामले से जुड़े सारे सुबूत आप को सौंप दूंगा.’’

‘‘अच्छा भोला भैया, यह बताओ कि यहां शाम ढले रोजाना कुछ औरतें अपनी लाइलाज बीमारी के इलाज के लिए आती हैं, जो कुछ  गोद भर जाने की चाह में. इस का क्या राज है?’’ महेंद्र ने धीरे से पूछा.

भोला बोला,  ‘‘सर, यह महंत और उस का शिष्य भोलीभाली औरतों को उन की लाइलाज बीमारी को मुफ्त में ठीक करने के बहाने यहां बुलाते हैं. तकरीबन 2 महीने तक जड़ीबूटियों के नाम पर पहाड़ी पर लगे पेड़ों की डालियों को पीस कर उन्हें दूध में पिलाया जाता है और जब वे औरतें इस महंत पर पूरा विश्वास करने लगती हैं, तब बारीबारी से, एकएक को दूध में  नशे की गोलियां मिला कर बेहोश किया जाता है और फिर ये उन के जिस्म के साथ अपनी हवस पूरी करते हैं. बेचारी इज्जत खो चुकी औरतें शर्म के मारे किसी को कुछ नहीं बतातीं और चुपचाप घर में बैठ जाती हैं.’’

‘‘लेकिन, आश्रम में गोद भरने ये औरतें किस आस पर आती हैं?’’ महेंद्र ने भोला से पूछा.

‘‘सर, यह महंत ऐसी हवा अपने बारे में फैलाता है कि गंगाघाट के आश्रम के महंत को सिद्धि प्राप्त हुई है और उन के आशीर्वाद से बांझ औरतों को भी बच्चे हो जाते हैं.

‘‘हमारा यह महंत गोद भरने की चाह रखने वाली औरतों को रात को आश्रम में बुलाता है, उन को 2-4 बार पूजापाठ और हवनों में बैठाता है, फिर एक  फल हाथ में दे कर उस के कान में धीरे से कहता है कि जब हम आदेश करें, तब इसे अपने मुंह में रखना. देखना, तुम्हारी गोद जल्दी ही भर जाएगी.

‘‘फिर उस औरत को महंत के कमरे के पास वाले अंधियारे कमरे में जाने के लिए कहा जाता है. वहां पहुंचते ही महंत का शिष्य उस औरत के कान में धीरे से कहता है, ‘आज तुम्हारी गोद भरने का  शुभ दिन है. देखना, आज चमत्कार होगा और महंतजी की कृपा से तुम्हारी गोद भर जाएगी. तुम इस फल को आंख बंद कर के खाती रहो.

‘‘जब वह औरत बिना कपड़ों में चमत्कार होने की राह देख रही होती है, तभी कभी यह महंत, तो कभी उस का शिष्य उस को उस अंधियारे कमरे में शिकार बनाते हैं. आखिर  मेवे वाला दूध कभी तो अपना असर दिखाएगा ही न?

‘‘अपनी लुटी इज्जत को ढकने के चक्कर में ऐसी औरतें इन पाखंडियों की करतूत किसी को नहीं बतातीं, इसलिए इन की यह दुकानदारी चलती रहती है.’’

‘‘अगर मैं महंत के खिलाफ ऐक्शन लूं, तो क्या तुम गवाही दोगे?’’ महेंद्र ने भोलाराम से पूछा.

‘‘सर, मैं यह सब लिख कर भी देने को तैयार हूं,’’ भोलाराम ने पूरे जोश के साथ कहा.

भोलाराम के बयान और उस के द्वारा दिए सुबूतों के आधार पर महेंद्र ने अगले ही दिन महंत और उस के शिष्य को गिरफ्तार कर लिया.

महंत और उस के शिष्य को गिरफ्तार हुए 2 घंटे भी नहीं हुए थे कि महेंद्र को आईजी और डीएसपी से संदेश मिलने शुरू हो गए कि उस महंत को तत्काल रिहा करो और उस के खिलाफ जो सुबूत है, उन्हें जला कर नष्ट कर दो.

जब महेंद्र ने आईजी साहब से कहा,  ‘‘सर, उस महंत के खिलफ मेरे पास पुख्ता सुबूत हैं.’’

तब आईजी बोले,  ‘‘मिस्टर, थोड़ी मेरी बात समझने की भी कोशिश करो. उस महंत का प्रभाव इतना ज्यादा है कि हम पर भी ऊपर से लगातार दबाव आ रहा है.’’

महेंद्र ने आईजी साहब से कहा,  ‘‘सर, मैं उन्हें रिहा नहीं कर सकता.’’

तब वे बोले,  ‘‘फिर तुम मेरा यह और्डर भी सुन लो, तुम्हारा तबादला  नोएडा थाने में किया जाता है. तुम तत्काल नोएडा थाने में जा कर मुझे सूचना दो.’’

रेल एकदम से रुक गई. मालूम करने पर पता चला कि किसी ने चेन खींची थी. रेल के रुकते ही इंस्पैक्टर महेंद्र यादों के साए से बाहर निकल कर हकीकत की दुनिया में आ गया. तब भी उस के मन में यह एकदम पक्का था कि वह किसी भी थाने मे क्यों न रहे, उस के काम करने का तरीका यही रहेगा, चाहे फिर तबादले कितने ही क्यों न होते रहें. Social Story In Hindi

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें