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Hindi Love Stories : पंछी एक डाल के

Hindi Love Stories : ‘‘औफिस के लिए तैयार हो गईं?’’ इतनी सुबह रजत का फोन देख कर सीमा चौंक पड़ी.

‘‘नहीं, नहाने जा रही हूं. इतनी जल्दी फोन? सब ठीक है न?’’

‘‘हां, गुडफ्राईडे की छुट्टी का फायदा उठा कर घर चलते हैं. बृहस्पतिवार की शाम को 6 बजे के बाद की किसी ट्रेन में आरक्षण करवा लूं?’’

‘‘लेकिन 6 बजे निकलने पर रात को फिरोजाबाद कैसे जाएंगे?’’

‘‘रात आगरा के बढि़या होटल में गुजार कर अगली सुबह घर चलेंगे.’’

‘‘घर पर क्या बताएंगे कि इतनी सुबह किस गाड़ी से पहुंचे?’’ सीमा हंसी.

‘‘मौजमस्ती की रात के बाद सुबह जल्दी कौन उठेगा सीमा, फिर बढि़या होटल के बाथरूम में टब भी तो होगा. जी भर कर नहाने का मजा लेंगे और फिर नाश्ता कर के फिरोजाबाद चल देंगे. तो आरक्षण करवा लूं?’’

‘‘हां,’’ सीमा ने पुलक कर कहा.

होटल के बाथरूम के टब में नहाने के बारे में सोचसोच कर सीमा अजीब सी सिहरन से रोमांचित होती रही. औफिस के लिए सीढि़यां उतरते ही मकानमालिक हरदीप सिंह की आवाज सुनाई पड़ी. वे कुछ लोगों को हिदायतें दे रहे थे. वह भूल ही गई थी कि हरदीप सिंह कोठी में रंगरोगन करवा रहे हैं और उन्होंने उस से पूछ कर ही गुडफ्राईडे को उस के कमरे में सफेदी करवाने की व्यवस्था करवाई हुई थी. हरदीप सिंह सेवानिवृत्त फौजी अफसर थे. कायदेकानून और अनुशासन का पालन करने वाले. उन का बनाया कार्यक्रम बदलने को कह कर सीमा उन्हें नाराज नहीं कर सकती थी.

सीमा ने सिंह दंपती से कार्यक्रम बदलने को कहने के बजाय रजत को मना करना बेहतर समझा. बाथरूम के टब की प्रस्तावना थी तो बहुत लुभावनी, अब तक साथ लेट कर चंद्र स्नान और सूर्य स्नान ही किया था. अब जल स्नान भी हो जाता, लेकिन वह मजा फिलहाल टालना जरूरी था.

सीमा और रजत फिरोजाबाद के रहने वाले थे. रजत उस की भाभी का चचेरा भाई था और दिल्ली में नौकरी करता था. सीमा को दिल्ली में नौकरी मिलने पर मम्मीपापा की सहमति से भैयाभाभी ने उसे सीमा का अभिभावक बना दिया था. रजत ने उन से तो कहा था कि वह शाम को अपने बैंक की विभागीय परीक्षा की तैयारी करता है. अत: सीमा को अधिक समय नहीं दे पाएगा, लेकिन असल में फुरसत का अधिकांश समय वह उसी के साथ गुजारता था. छुट्टियों में सीमा को घर ले कर आना तो खैर उसी की जिम्मेदारी थी. दोनों कब एकदूसरे के इतने नजदीक आ गए कि कोई दूरी नहीं रही, दोनों को ही पता नहीं चला. न कोई रोकटोक थी और न ही अभी घर वालों की ओर से शादी का दबाव. अत: दोनों आजादी का भरपूर मजा उठा रहे थे.

सीमा के सुझाव पर रजत ने शाम को एमबीए का कोर्स जौइन कर लिया था. कुछ रोज पहले एक स्टोर में एक युवकयुवती को ढेर सारा सामान खरीदते देख कर सीमा ने कहा था, ‘‘लगता है नई गृहस्थी जमा रहे हैं.’’ ‘‘लग तो यही रहा है. न जाने अपनी गृहस्थी कब बसेगी?’’ रजत ने आह भर कर कहा.

‘‘एमबीए कर लो, फिर बसा लेना.’’

‘‘यही ठीक रहेगा. कुछ ही महीने तो और हैं.’’

सीमा ने चिंहुक कर उस की ओर देखा. रजत गंभीर लग रहा था. सीमा ने सोचा कि इस बार घर जाने पर जब मां उस की शादी का विषय छेड़ेंगी तो वह बता देगी कि उसे रजत पसंद है. औफिस पहुंचते ही उस ने रजत को फोन कर के अपनी परेशानी बताई.

‘‘ठीक है, मैं अकेला ही चला जाता हूं.’’

‘‘तुम्हारा जाना जरूरी है क्या?’’

‘‘यहां रह कर भी क्या करूंगा? तुम तो घर की साफसफाई करवाने में व्यस्त हो जाओगी.’’

‘‘ठीक है,’’ कह सीमा ने मम्मी को फोन कर बता दिया कि रंगरोगन करवाने की वजह से वह रजत के साथ नहीं आ रही. रविवार की शाम को कमरा सजा कर सीमा रजत का इंतजार करने लगी. लेकिन यह सब करने में इतनी थक गई थी कि कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. रजत सोमवार की शाम तक भी नहीं आया और न ही उस ने फोन किया. रात को मम्मी का फोन आया. उन्होंने बताया, ‘‘रजत यहां आया ही नहीं, मथुरा में सुमन के घर है. उस के घर वाले भी वहीं चले गए हैं.’’

सुमन रजत की बड़ी बहन थी. सीमा से भी मथुरा आने को कहती रहती थी. ‘अब इस बार रजत घर नहीं गया है. अत: कुछ दिन बाद महावीर जयंती पर जरूर घर चलना मान जाएगा,’ सोच सीमा ने कलैंडर देखा, तो पाया कि महावीर जयंती भी शुक्रवार को ही पड़ रही है.

लेकिन कुछ देर के बाद ही पापा का फोन आ गया. बोले, ‘‘तेरी मम्मी कह रही है कि तू ने कमरा बड़ा अच्छा सजाया है. अत: महावीर जयंती की छुट्टी पर तू यहां मत आ, हम तेरा कमरा देखने आ जाते हैं.’’

‘‘अरे वाह, जरूर आइए पापा,’’ उस ने चिंहुक कर कह तो दिया पर फिर जब दोबारा कलैंडर देखा तो कोई और लंबा सप्ताहांत न पा कर उदास हो गई.

अगले दिन सीमा के औफिस से लौटने के कुछ देर बाद ही रजत आ गया. बहुत खुश लग रहा था, बोला, ‘‘पहले मिठाई खाओ, फिर चाय बनाना.’’

‘‘किस खुशी में?’’ सीमा ने मिठाई का डब्बा खोलते हुए पूछा.

‘‘मेरी शादी तय होने की खुशी में,’’ रजत ने पलंग पर पसरते हुए कहा, ‘‘जब मैं ने मम्मी को बताया कि मैं बस से आ रहा हूं, तो उन्होंने कहा कि फिर मथुरा में ही रुक जा, हम लोग भी वहीं आ जाते हैं. बात तो जीजाजी ने अपने दोस्त की बहन से पहले ही चला रखी थी, मुलाकात करवानी थी. वह करवा कर रोका भी करवा दिया. मंजरी भी जीजाजी और अपने भाई के विभाग में ही मथुरा रिफायनरी में जूनियर इंजीनियर है. शादी के बाद उसे रिफायनरी के टाउनशिप में मकान भी मिल जाएगा और टाउनशिप में अपने बैंक की जो शाखा है उस में मेरी भी बड़ी आसानी से बदली हो जाएगी. आज सुबह यही पता करने…’’

‘‘बड़े खुश लग रहे हो,’’ किसी तरह स्वर को संयत करते हुए सीमा ने बात काटी.

‘‘खुश होने वाली बात तो है ही सीमा, एक तो सुंदरसुशील, पढ़ीलिखी लड़की, दूसरे मथुरा में घर के नजदीक रहने का संयोग. कुछ साल छोटे शहर में रह कर पैसा जोड़ कर फिर महानगर में आने की सोचेंगे. ठीक है न?’’

‘‘यह सब सोचते हुए तुम ने मेरे बारे में भी सोचा कि जो तुम मेरे साथ करोगे या अब तक करते रहे हो वह ठीक है या नहीं?’’ सीमा ने उत्तेजित स्वर में पूछा.

‘‘तुम्हारे साथ जो भी करता रहा हूं तुम्हारी सहमति से…’’

‘‘और शादी किस की सहमति से कर रहे हो?’’ सीमा ने फिर बात काटी.

‘‘जिस से शादी कर रहा हूं उस की सहमति से,’’ रजत ने बड़ी सादगी से कहा, ‘‘तुम्हारे और मेरे बीच में शादी को ले कर कोई वादा या बात कभी नहीं हुई सीमा. न हम ने कभी भविष्य के सपने देखे. देख भी नहीं सकते थे, क्योंकि हम सिर्फ अच्छे पार्टनर हैं, प्रेमीप्रेमिका नहीं.’’

‘‘यह तुम अब कह रहे हो. इतने उन्मुक्त दिन और रातें मेरे साथ बिताने के बाद?’’

‘‘बगैर साथ जीनेमरने के वादों के… असल में यह सब उन में होता है सीमा, जिन में प्यार होता है और वह तो हम दोनों में है ही नहीं?’’ रजत ने उस की आंखों में देखा.

सीमा उन नजरों की ताब न सह सकी. बोली, ‘‘यह तुम कैसे कह सकते हो, खासकर मेरे लिए?’’

रजत ठहाका लगा कर हंसा. फिर बोला, ‘‘इसलिए कह सकता हूं सीमा कि अगर तुम्हें मुझ से प्यार होता न तो तुम पिछले 4 दिनों में न जाने कितनी बार मुझे फोन कर चुकी होतीं और मेरे रविवार को न आने के बाद से तो मारे फिक्र के बेहाल हो गई होतीं… मैं भी तुम्हें रंगरोगन वाले मजदूरों से अकेले निबटने को छोड़ कर नहीं जाता.’’

रजत जो कह रहा था उसे झुठलाया नहीं जा सकता था. फिर भी वह बोली, ‘‘मेरे बारे में सोचा कि मेरा क्या होगा?’’

‘‘तुम्हारे घर वालों ने बुलाया तो है महावीर जयंती पर गुड़गांव के सौफ्टवेयर इंजीनियर को तुम से मिलने को… तुम्हारी भाभी ने फोन पर बताया कि लड़के वालों को जल्दी है… तुम्हारी शादी मेरी शादी से पहले ही हो जाएगी.’’

‘‘शादी वह भी लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली लड़की के साथ? मैं लड़की हूं रजत… कौन करेगा मुझ से शादी?’’

‘‘यह 50-60 के दशक की फिल्मों के डायलौग बोलने की जरूरत नहीं है सीमा,’’ रजत उठ खड़ा हुआ, ‘‘आजकल प्राय: सभी का ऐसा अतीत होता है… कोई किसी से कुछ नहीं पूछता. फिर भी अपना कौमार्य सिद्ध करने के लिए उस समय अपने बढ़े हुए नाखूनों से खरोंच कर थोड़ा सा खून निकाल लेना, सब ठीक हो जाएगा,’’ और बगैर मुड़ कर देखे रजत चला गया. रजत का यह कहना तो ठीक था कि उन में प्रेमीप्रेमिका जैसा लगाव नहीं था, लेकिन उस ने तो मन ही मन रजत को पति मान लिया था. उस के साथ स्वच्छंदता से जीना उस की समझ में अनैतिकता नहीं थी. लेकिन किसी और से शादी करना तो उस व्यक्ति के साथ धोखा होगा और फिर सचाई बताने की हिम्मत भी उस में नहीं थी, क्योंकि नकारे जाने पर जलालत झेलनी पड़ेगी और स्वीकृत होने पर जीवन भर उस व्यक्ति की सहृदयता के भार तले दबे रहना पड़ेगा.

अच्छा कमा रही थी, इसलिए शादी के लिए मना कर सकती थी, लेकिन रजत के सहचर्य के बाद नितांत अकेले रहने की कल्पना भी असहनीय थी तो फिर क्या करे? वैसे तो सब सांसारिक सुख भोग लिए हैं तो क्यों न आत्महत्या कर ले या किसी आश्रमवाश्रम में रहने चली जाए? लेकिन जो भी करना होगा शांति से सोचसमझ कर. उस की चार्टर्ड बस एक मनन आश्रम के पास से गुजरा करती थी. एक दिन उस ने अपने से अगली सीट पर बैठी महिला को कहते सुना था कि वह जब भी परेशान होती है मैडिटेशन के लिए इस आश्रम में चली जाती है. वहां शांति से मनन करने के बाद समस्या का हल मिल जाता है. अत: सीमा ने सोचा कि आज वैसे भी काम में मन नहीं लगेगा तो क्यों न वह भी उस आश्रम चली जाए. आश्रम के मनोरम उद्यान में बहुत भीड़ थी. युवा, अधेड़ और वृद्ध सभी लोग मुख्यद्वार खुलने का इंतजार कर रहे थे. सीमा के आगे एक प्रौढ दंपती बैठे थे.

‘‘हमारे जैसे लोगों के लिए तो ठीक है, लेकिन यह युवा पीढ़ी यहां कैसे आने लगी है?’’ महिला ने टिप्पणी की.

‘‘युवा पीढ़ी को हमारे से ज्यादा समस्याएं हैं, पढ़ाई की, नौकरी की, रहनेखाने की. फिर शादी के बाद तलाक की,’’ पुरुष ने उत्तर दिया.

‘‘लिव इन रिलेशनशिप क्यों भूल रहे हो?’’

‘‘लिव इन रिलेशनशिप जल्दबाजी में की गई शादी, उस से भी ज्यादा जल्दबाजी में पैदा किया गया बच्चा और फिर तलाक से कहीं बेहतर है. कम से कम एक नन्ही जान की जिंदगी तो खराब नहीं होती? शायद इसीलिए इसे कानूनन मान्यता भी मिल गई है,’’ पुरुष ने जिरह की, ‘‘तुम्हारी नजरों में तो लिव इन रिलेशनशिप में यही बुराई है न कि यह 2 लोगों का निजी समझौता है, जिस का ऐलान किसी समारोह में नहीं किया जाता.’’

जब लोगों को विधवा, विधुर या परित्यक्तों से विवाह करने में ऐतराज नहीं होता तो फिर लिव इन रिलेशनशिप वालों से क्यों होता है?

तभी मुख्यद्वार खुल गया और सभी उठ कर अंदर जाने लगे. सीमा लाइन में लगने के बजाय बाहर आ गई. उसे अपनी समस्या का हल मिल गया था कि वह उस गुड़गांव वाले को अपना अतीत बता देगी. फिर क्या करना है, उस के जवाब के बाद सोचेगी. कार्यक्रम के अनुसार मम्मीपापा आ गए. उसी शाम को उन्होंने सौफ्टवेयर इंजीनियर सौरभ और उस के मातापिता को बुला लिया.

‘‘आप से फोन पर तो कई महीनों से बात हो रही थी, लेकिन मुलाकात का संयोग आज बना है,’’ सौरभ के पिता ने कहा.

‘‘आप को चंडीगढ़ से बुलाना और खुद फिरोजाबाद से आना आलस के मारे टल रहा था लेकिन अब मेरे बेटे का साला रजत जो दिल्ली में सीमा का अभिभावक है, यहां से जा रहा है, तो हम ने सोचा कि जल्दी से सीमा की शादी कर दें. लड़की को बगैर किसी के भरोसे तो नहीं छोड़ सकते,’’ सीमा के पापा ने कहा. सौरभ के मातापिता एकदूसरे की ओर देख कर मुसकराए फिर सौरभ की मम्मी हंसते हुए बोलीं, ‘‘यह तो हमारी कहानी आप की जबानी हो गई. सौरभ भी दूर के रिश्ते की कजिन वंदना के साथ अपार्टमैंट शेयर करता था, इसलिए हमें भी इस के खानेपीने की चिंता नहीं थी. मगर अब वंदना अमेरिका जा रही है. इसे अकेले रहना होगा तो इस की दालरोटी का जुगाड़ करने हम भी दौड़ पड़े.’’

कुछ देर के बाद बड़ों के कहने पर दोनों बाहर छत पर आ गए.

‘‘बड़ों को तो खैर कोई शक नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि हम दोनों एक ही मृगमरीचिका में भटक रहे थे…’’

‘‘इसीलिए हमें चाहिए कि बगैर एकदूसरे के अतीत को कुरेदे हम इस बात को यहीं खत्म कर दें,’’ सीमा ने सौरभ की बात काटी.

‘‘अतीत के बारे में तो बात यहीं खत्म कर देते हैं, लेकिन स्थायी नीड़ का निर्माण मिल कर करेंगे,’’ सौरभ मुसकराया.

‘‘भटके हुए ही सही, लेकिन हैं तो हम पंछी एक ही डाल के,’’ सीमा भी प्रस्ताव के इस अनूठे ढंग पर मुसकरा दी. Hindi Love Stories

Family Story In Hindi : परिवर्तन – शिव और कमला के बीच क्या बाकी रह गया था ?

Family Story In Hindi : शेव बनाते हुए शिव सहाय ने एक उड़ती नजर पत्नी पर डाली. उसे उस का बेडौल शरीर और फैलता हुआ सा लगा. वह नौकरानी को धुले कपड़े अच्छी तरह निचोड़ कर सुखाने का आदेश दे रही थी. उस ने खुद अपनी साड़ी झाड़ कर बताई तो उस का थुलथुल शरीर बुरी तरह हिल गया, सांस फूलने से स्थिति और भी बदतर हो गई, और वह पास पड़ी कुरसी पर ढह सी गई.

क्या ढोल गले बांध दिया है उस के मांबाप ने. उस ने उस के जन्मदाताओं को मन ही मन धिक्कारा-क्या मेरी शादी ऐसी ही औरत से होनी थी, मूर्ख, बेडौल, भद्दी सी औरत. गोरी चमड़ी ही तो सबकुछ नहीं.

‘तुम क्या हो?’ वह दिन में कई बार पत्नी को ताने देता, बातबात में लताड़ता, ‘जरा भी शऊर नहीं, घरद्वार कैसे सजातेसंवारते हैं? साथ ले जाने के काबिल तो हो ही नहीं. जबतब दोस्तयार घर आते हैं तो कैसी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है.’

जब देखो सिरदर्द, माथे पर जकड़ कर बांधा कपड़ा, सूखे गाल और भूरी आंखें. उस के प्रति शिव सहाय की घृणा कुछ और बढ़ गई. उस ने सामने लगी कलाकृतियों को देखा.

वार्निश के डब्बों और ब्रशों पर सरसरी निगाह डाली. बिजली की फिटिंग के सामान को निहारा. कुछ देर में मिस्त्री, मैकेनिक सभी आ कर अपना काम शुरू कर देंगे. उस ने बेरहमी से घर की सभी पुरानी वस्तुओं को बदल कर एकांत के उपेक्षित स्थान में डलवा दिया था.

क्या इस औरत से भी छुटकारा पाया जा सकता है? मन में इस विचार के आते ही वह स्वयं सिहर उठा.

42 वर्ष की उम्र के करीब पहुंची उस की पत्नी कमला कई रोगों से घिर गई थी. दवादारू जान के साथ लगी थी. फिर भी वह उसे सब तरह से खुश रखने का प्रयत्न करती लेकिन उन्नति की ऊंचाइयों को छूता उस का पति उसे प्रताडि़त करने में कसर नहीं छोड़ता. अपनी कम्मो (कमला) के हर काम में उसे फूहड़पन नजर आता. सोचता, ‘क्या मिला इस से, 2 बेटियां थीं जो अब अपना घरबार बसा चुकी हैं. बाढ़ के पानी की तरह बढ़ती दौलत किस काम आएगी? 58 वर्ष की उम्र में वह आज भी कितना दिलकश और चुस्तदुरुस्त है.

कुरसी पर निढाल सी हांफती पड़ी पत्नी के रंगे बाल धूप में एकदम लाल दिखाई दे रहे थे. वह झल्लाता हुआ बाथरूम में घुस गया और देर तक लंबे टब में पड़ा रहा. पानी में गुलाब की पंखडि़यां तैर रही थीं. हलके गरम, खुशबूदार पानी में निश्चल पड़े रहना उस का शौक था.

कमला उस के हावभाव से समझ गई कि वह खफा है. उस ने खुद को संभाला और कमरे में आ कर दवा की पुडि़या मुंह में डाल ली.

बड़ी बेटी का बच्चा वैभव, उस ने अपने पास ही रख लिया था. बस, उस ने अपने इस लाड़ले के बचपन में अपने को जैसे डुबो लिया था. नहीं तो नौकरों से सहेजी इस आलीशान कोठी में उस की राहत के लिए क्या था? ढाई दशकों से अधिक समय से पत्नी के लिए, धनदौलत का गुलाम पति निरंतर अजनबी होता गया था. क्या यह यों ही आ गई? 18 वर्ष की मोहिनी सी गोलमटोल कमला जब ससुराल में आई थी तो क्या था यहां?

तीनमंजिले पर किराए का एक कमरा, एक बालकनी और थोड़ी सी खुली जगह थी. ससुर शादी के 2 वर्षों पहले ही दिवंगत हो चुके थे. घर में थीं जोड़ों के दर्द से पीडि़त वृद्धा सास और 2 छोटी ननदें.

पिता की घड़ीसाजी की छोटी सी दुकान थी, जो पिता के बाद शिव सहाय को संभालनी पड़ी, जिस में मामूली सी आय थी और खर्च लंबेचौड़े थे. उस लंबे से कमरे में एक ओर टीन की छत वाली छोटी सी रसोई थी. दूसरी ओर, एक किनारे परदा डाल कर नवदंपती के लिए जगह बनाई गई थी. पीछे की ओर एक अलमारी और एक दीवारघड़ी थी. यही था उस का सामान रखने का स्थान. दिन में परदा हटा दिया जाता. शैय्या पर ननदें उछलतीकूदती अपनी भाभी का तेलफुलेल इस्तेमाल करने की फिराक में रहतीं.

कमला मुंहअंधेरे रसोई में जुट जाती. बच्चों को स्कूल जाना होता था, और पति को दुकान. जल्दी ही वह भी एक प्यारी सी बच्ची की मां बन गई.

शुरू में शिव सहाय अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था. उसे लगता, उस की उजलीगुलाबी आभा लिए पत्नी कम्मो गृहस्थी की चक्की में पिसती हुई बेहद कमजोर और धूमिल होती जा रही है. रात को वह उस के लिए कभी रबड़ी ले आता तो कभी खोए की मिठाई.

कमला का आगमन इस परिवार के लिए समृद्धि लाने वाला सिद्ध हुआ. दुकान की सीमित आय धीरेधीरे बढ़ने लगी.

कमला ने पति को सलाह दी कि वह दुकान में बेचने के लिए नई घडि़यां भी रखे, केवल पुरानी घडि़यों की मरम्मत करना ही काफी नहीं है. चुपके से उस ने पति को अपने कड़े और गले की जंजीर बेचने के लिए दे दीं ताकि वह नई घडि़यां ला सके. इस से उस की आय बढ़ने लगी. काम चल निकला.

किसी कारण से पास का दुकानदार अपनी दुकान और जमीन का एक टुकड़ा उस के हाथों सस्ते दामों में बेच कर चला गया. दुकान के बीच का पार्टीशन निकल जाने से दुकान बड़ी हो गई. उस की विश्वसनीयता और ख्याति तेजी से बढ़ी. घड़ी के ग्राहक दूरपास से उस की दुकान पर आने लगे. मौडर्न वाच शौप का नाम शहर में नामीगिरामी हो गया.

मौडर्न वाच शौप से अब उसे मौडर्न वौच कंपनी बनाने की धुन सवार हुई. उस के धन और प्रयत्न से घड़ी बनाने का कारखाना खुला, बढि़या कारीगर आए. फिर बढ़ती आमदनी से घर का कायापलट हो गया. बढि़या कोठी, एंबेसेडर कारें और सभी आधुनिक साजोसामान.

बस पुरानी थी, तो पत्नी कमला. दौलत को वह अपने प्रयत्नों का प्रतिफल समझने लगा. लेकिन दिल के किसी कोने में उसे कमला के त्याग व सहयोग की याद भी उजागर हो जाती. अभावों की दुनिया में जीते उस के परिवार और उसे, आखिर इसी औरत ने तो संभाल लिया था. उस ने खुद भी क्याकुछ नहीं किया, घर सोनेचांदी से भर दिया है. इस बदहाल औरत के लिए रातदिन डाक्टर को फोन खटखटाते, मोटे बिल भरते खूबसूरत जिंदगी गंवा रहा है.

यदाकदा उस के मन में तूफान सा उठने लगता, वह अर्द्ध बीमार सी पत्नी पर गालियों की बौछार कर देता. कितनी सीधी और शांत औरत है. किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं. बस, एक मुसकान चिपकाए खाली सा चेहरा और उस की सुखसुविधाओं का ध्यान.

गृहस्थी की गाड़ी यों ही हिचकोले खाती चल रही थी. कभीकभी एक दुष्ट विचार उस के मन में गहरा जाता. काश, कोई अच्छी सी पत्नी आ सकती इस घर में. पर नई गृहस्थी बसाने की बात क्या सोची भी जा सकती है? वह नाना बन चुका है. नवासा 21 वर्ष का होने को आया. इंजीनियर बनने में कुल 2 साल ही तो शेष हैं. वही तो संभालेगा उस का फलताफूलता धंधा. रिश्ते के लिए अभी से लोग चक्कर लगाने लगे हैं. ऊपर की मंजिल उस के लिए तैयार कराई गई है, उस का एअरकंडीशंड बैडरूम और अनोखी साजसज्जा का ड्राइंगरूम. उस के लिए पत्नी के चुनाव के बारे में वह बहुत सजग है.

नाश्ते की मेज पर बैठा वह पत्नी से वैभव के संबंध के बारे में सलाहमशवरा करना चाहता था लेकिन आज वह और भी पुरानी व बीमार दिखाई दे रही थी. उस की मेज की दराज में अनेक फोटो और पत्र वैभव के संबंध में आए पड़े हैं. लेकिन क्या इस फूहड़ स्त्री से ऐसे नाजुक प्रसंग को छेड़ा जा सकता है?

वह कुछ देर तक चुप बैठा ब्रैड के स्लाइस का टुकड़ा कुतरता रहा. मन ही मन अपनेआप पर झुंझलाता रहा. न जाने क्यों व्यर्थ का आवेश उस की आदत बन चुकी है. उस की दरिद्रता के दिनों की साथी, उस की सहायिका ही नहीं, अर्द्धांगिनी भी, न जाने क्यों आज उस के लिए बेमानी हो चुकी है? कभीकभी अपनी सोच पर वह बेहद शर्मिंदा भी होता.

कमला को पति की भारी डाक देखने तक में कोई रुचि नहीं थी. नौकर गेट पर लगे लैटरबौक्स से डाक निकाल कर अपने साहब की मेज पर रख आता था. लेकिन आज नाश्ते के बाद बाहर टंगे झूले पर बैठी कमला ने पोस्टमैन से डाक ले कर झूले के हत्थे पर रख लिया. 2-3 मोटे लिफाफे झट से नीचे गिर पड़े. उस ने उन्हें उठाया तो उसे लगा लिफाफों में चिट्ठी के साथ फोटो भी हैं. सोचने लगी, किस के फोटो होंगे? उस ने उन्हें उलटापलटा, तो कम चिपका एक लिफाफा यों ही खुल गया. एक कमसिन सी लड़की की फोटो उस में से झांक रही थी. उस ने पत्र पढ़ा. वैभव के रिश्ते की बात लिखी थी. तो यह बात है, चुपचाप बहू लाने की योजना चल रही है. और उसे कानोंकान खबर तक नहीं.

क्या हूं मैं, केवल एक धाय मात्र? उस की आंखों से टपटप आंसू गिरने लगे. सदा से सब की झिड़कियां खाती आई हूं. पहले सास की सुनती रही. उन से डरडर कर जीती रही. यहां तक कि छोटी ननदें भी जो चाहतीं, कह लेती थीं. उसे सब की सहने की आदत पड़ गई है. उस की अपनी बेटियां भी उस की परवा नहीं करतीं और अब यह व्यक्ति, जो कहने को पति है, उसे निरंतर तिरस्कृत करता रहता है.

आखिर क्या दोष है उस का? कल घर में धेवते की बहू आएगी तो क्या समझेगी उसे? घर की मालकिन या कोने में पड़ी एक दासी? उस की दशा क्या होगी? उस की आज जो हालत है उस का जिम्मेदार कौन है? क्यों डरती है वह हर किसी से?

उस के पति ने भी कभी उस के रूप की सराहना की थी. उसे प्यार से दुलराया था. छाती से चिपटा कर रातें बिताई थीं. अब वह एक खाली ढोल हो कर रह गई है.

साजसज्जा की सामग्री से अलमारियां भरी हैं. साडि़यों और सूटों से वार्डरोब भरे पड़े हैं. लेकिन इस बीमार थुलथुल देह पर कुछ सोहता ही नहीं.

कम्मो झूले से उठ खड़ी हुई और ड्रैसिंग मेज पर जा कर खुद को निहारने लगी. क्या इस देह में अब भी कुछ शेष है? उसे लगा, उस के अंदर से एक धीमी सी आवाज आ रही है, ‘कम्मो, अपनी स्थिति के लिए केवल तू ही जिम्मेदार है. तू अपने पति की उन्नति में सहायक बनी लेकिन उस की साथी नहीं बनी. वह ऊंचाइयां छूता गया और तू जमीन का जर्रा बनती गई. वह आधी रात को घर में घुसा, तू ने कभी पूछा तक नहीं. बस, उस के स्वागत में आंखें बिछाए रही.’

उस की इच्छा हुई वह भी आज गुलाब की पंखडि़यों में नहाए. उस ने बाथरूम के लंबे टब में गुलाब की पंखडि़यां भर दीं, गीजर औन कर दिया. गरम फुहारों से टब लबालब भर गया तो उस में जा कर लेटी रही. उस में से कुछ समय बाद निकली तो काफी हलका महसूस कर रही थी. आज उस ने अपनी मनपसंद साड़ी पहनी और हलका मेकअप किया.

अब वह जिएगी तो अपने लिए, कोई परवा करे या न करे. एक आत्मविश्वास से वह खिलने लगी थी. स्नान के बाद ऊपर जा कर धूप में जाने की इच्छा उस में प्रबल हो उठी, लेकिन एक अरसे से वह सीढि़यां नहीं चढ़ी थी. घर की ड्योढ़ी लांघती तो उस की सांस बेकाबू हो जाती है, फिर इतनी अधिक सीढि़यां कैसी चढ़ेगी? फिर भी, आज उसे स्वयं को रोक पाना असंभव था. उस ने धीरेधीरे 3-4 सीढि़यां चढ़ीं, तो सांस ऊपरनीचे होने लगी.

वह बैठ गई. सामान्य होने पर फिर चढ़ने लगी. कुछ समय बाद वह छत पर थी. नीले आसमान में सूर्य चमक रहा था. उसे अच्छा लगा. वह आराम से झुक कर सीधी हो सकती है. बिना कष्ट के उस ने आगेपीछे, फिर दाएंबाएं होने का यत्न किया तो एक लचक सी शरीर में दौड़ गई. तत्पश्चात थोड़ी देर बाद वह बिना किसी परेशानी के नीचे उतर आई.

रसोई में रसोइया खाना बनाने की तैयारी कर रहा था. कमला काफी समय से वहां नहीं झांकी थी. नंदू पूछता, ‘क्या बनेगा’ तो बेमन से कह देती, ‘साहब की पसंद तू जानता ही है.’ पुराना नौकर मालिकों की आदतें जान गया था. इसलिए बिना अधिक कुछ कहे वह उन के लिए विभिन्न व्यंजन बना लेता. समय पर नाश्ता और खाना डायनिंग टेबल पर पहुंच जाता. घी, मसालों में सराबोर सब्जियां, चावल, रायता, दाल, सलाद सभी कुछ. कमला तो बस 2-4 कौर ही मुंह में डालती थी, पर फिर भी काया फूलती ही गई. उस का यही बेडौल शरीर ही तो उसे पति से दूर कर गया है.

कमला नीचे आई तो रसोईघर में घुस गई. उसे आज स्वयं भोजन बनाने की इच्छा थी. कमला ने हरी सब्जियां छांट कर निकालीं, फिर स्वयं ही छीलकाट कर चूल्हे पर रख दीं. आज से वह उबली सब्जियां खाएगी.

शिव सहाय कुछ दिनों के लिए बाहर गया था. कमला एक तृप्ति और आजादी महसूस कर रही थी. आज की सी जीवनचर्या को वह लगातार अपनाने लगी. शारीरिक श्रम की गति और अधिक कर दी. उसे खुद ही समझ में नहीं आया कि अब तक उस ने न जाने क्यों शरीर के प्रति इतनी लापरवाही बरती और मन में क्यों एक उदासी ओढ़ ली.

शिव सहाय दौरे से वापस आया और बिना कमला की ओर ध्यान दिए अपने कामों में व्यस्त हो गया. पतिपत्नी में कईकई दिनों तक बातचीत तक नहीं होती थी.

शिव सहाय कामकाज के बाद ड्राइंगरूम की सामने वाली कुरसी पर आंख मूंद कर बैठा था. एकाएक निगाह उठी तो पाया, एक सुडौल नारी लौन में टहल रही है. उस का गौर पृष्ठभाग आकर्षक था. कौन है यह? चालढाल परिचित सी लगी. वह मुड़ी तो शिव सहाय आश्चर्य से निहारता रह गया. कमला में यह परिवर्तन, एक स्फूर्तिमय प्रौढ़ा नारी की गरिमा. वह उठ कर बाहर आया, बोला, ‘‘कम्मो, तुम हो, मैं तो समझा था…’’

कम्मो ने मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘क्या समझा आप ने कि कोई सुंदरी आप से मिलने के इंतजार में टहल रही है?’’

शिव सहाय ने बोलने का और मौका न दे कम्मो को अपनी ओर खींच कर सीने से लगाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी बहुत उपेक्षा की है मैं ने. पर यकीन करो, अब भूल कर भी ऐसा नहीं होगा. आखिर मेरी जीवनसहचरी हो तुम.’’ कम्मो का मन खुशी से बांसों उछल रहा था वर्षों बाद पति का वही पुराना रूप देख कर. वही प्यार पा कर उस ने निर्णय ले लिया कि अब इस शरीर को कभी बेडौल नहीं होने देगी, सजसंवर कर रहेगी और पति के दिल पर राज करेगी.

वैभव की शादी के लिए वधू का चयन दोनों की सहमति से हुआ. निमंत्रणपत्र रिश्तेदारों और परिचितों में बांटे गए. शादी की धूम निराली थी.

सज्जित कोठी से लंबेचौड़े शामियाने तक का मार्ग लहराती सुनहरी, रुपहली महराबों और रंगीन रोशनियों से चमचमा रहा था. स्टेज पर नाचरंग की महफिल जमी थी तो दूसरी ओर स्वादिष्ठ व्यंजनों की बहार थी. अतिथि मनपसंद पेय पदार्थों का आनंद ले कर आते और महफिल में शामिल हो जाते.

आज कमला ने भी जम कर शृंगार किया था. वह अपने अनूठे सौंदर्य में अलग ही दमक रही थी. कीमती साड़ी और कंधे पर सुंदर पर्र्स लटकाए वह इष्टमित्रों की बधाई व सौगात ग्रहण कर रही थी. वह थिरकते कदमों से महफिल की ताल में ताल मिला रही थी. लोगों ने शिव सहाय को भी साथ खींच लिया. फिर क्या था, दोनों की जोड़ी ने वैभव और नगीने सी दमकती नववधू को भी साथ ले लिया. अजब समां बंधा था. कल की उदास और मुरझाई कमला आज समृद्धि और स्वास्थ्य की लालिमा से भरपूर दिखाई दे रही थी. ऐसा लग रहा था मानो आज वह शिव सहाय के घर और हृदय पर राज करने वाली पत्नी ही नहीं, उस की स्वामिनी बन गई थी. Family Story In Hindi 

Romantic Story In Hindi : फिर प्यार हो गया

Romantic Story In Hindi : एमआरआई टैस्ट करवाने के नाम से नीरा की हालत खराब थी. उस ने सुना था कि मशीन के अंदर लेटना पड़ता है, फिल्मों में देखा भी था. सुबह ही वह अस्पताल में भरती हुई थी. नीरा का नंबर आने में समय था. समीर ने उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘घबराओ मत, अभी मैं डाक्टर से अनुरोध करता हूं कि मुझे तुम्हारे साथ अंदर चलने दें.’’ नीरा कुछ बोली नहीं.

कमर के तेज दर्द से परेशान नीरा को भरती होना पड़ा था. कमरदर्द तो उसे सालों से था पर इतना ज्यादा नहीं रहता था. वह तो अब भी इतनी गंभीरता से न सोचती पर समीर अब पूरी तरह से इलाज करवाने पर अड़ गए थे. हुआ यह था कि 2 महीने पहले समीर के कुलीग रजत बाथरूम में फिसल कर गिर गए थे. कई दिन तक उन का कमर का दर्द ठीक नहीं हुआ तो वे इसी अस्पताल के इन्हीं और्थोपेडिक डा. नवीन के पास आए थे. उन का भी एमआरआई और कई दूसरे टैस्ट हुए थे और उन की जब रिपोर्ट्स आई थीं तो जैसे एक तूफान सा आ गया था. रजत को स्पाइन कैंसर था. उन की स्पाइन 65 फीसदी खराब हो चुकी थी. उन्होंने ही बताया था कमरदर्द तो उन्हें अकसर रहता था पर वे इसे काम की अधिकता का प्रैशर समझ लेते थे.

नीरा ने तब से नोट किया था कि समीर उस की सेहत को ले कर परेशान रहने लगे थे. अपने व्यस्त दिनचर्या के बावजूद घर के कई कामों में उस का हाथ बंटाने लगे थे. अस्पताल में बैठी नीरा को दर्द तो था ही, कभी बैठ रही थी, कभी उठ कर टहलने लगती थी. इतने में समीर ने आ कर कहा, ‘‘नीरा, सौरी, डाक्टर किसी को साथ नहीं जाने दे रहे हैं.’’ समीर के चेहरे की उदासी नीरा को बहुतकुछ सोचने पर मजबूर करती रही. उस ने खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं, चिंता मत करो, मैं ठीक हूं.’’ और नीरा ने खुद को काफी संयत कर लिया था. इतने में नीरा के मोबाइल पर उस के दोनों बच्चों रिया और राहुल के फोन आ गए. दोनों कालेज तो गए थे पर मन मां में ही अटका था. दोनों से बातें कर के नीरा ने अपना फोन बंद कर के समीर को पकड़ा दिया. उस का नंबर आ गया था, मन बेचैन था, न चाहते हुए भी आंखें भर आईं. समीर कुछ कह नहीं पाए. बस, नीरा का हाथ अपने हाथ में ले कर चुपचाप पलभर खड़े रहे. समीर की भीगी हथेलियां जैसे समीर के दिल की हालत बयां कर रही थीं. नीरा ने अंदर जाते हुए पीछे मुड़ कर एक बार समीर की आंखों में झांका, उदास, भीगी सी आंखों की नमी नीरा ने अपने दिल में भी उतरती महसूस की. पल भर में लगा यह हाथ, यह छुअन जैसे आज सबकुछ है उस के लिए. उस का मन हुआ, मुड़ कर चूम आए समीर की हथेली लेकिन माहौल पर एक नजर डालते हुए अंदर चली गई.

नीरा ने नर्स का दिया गाउन पहना. दिल धड़का जब नर्स ने उसे एक स्विच दिया और कहा, ‘‘कुछ प्रौब्लम हो तो इसे दबा देना, हम आ जाएंगे.’’

नीरा ने पूछा, ‘‘इस रूम में कोई नहीं रहेगा?’’

‘‘नहीं मैडम, वह देखो, हम सब ग्लास के उस तरफ हैं.’’ नीरा के कानों में रूई रखते हुए नर्स ने कहा, ‘‘बहुत तेज आवाज आती है, घबराना नहीं, कुछ नहीं होता है.’’

‘‘कितनी देर लगेगी?’’

‘‘25 मिनट.’’

‘‘क्या? इतनी देर इस मशीन में लेटना है?’’

‘‘हां मैडम, चलो, अब लेट जाओ.’’ कमरे में बहुत ठंडक थी. वह चुपचाप लेट गई. नर्स ने उस पर कंबल डाल दिया और वह स्विच हाथ में पकड़ा दिया, फिर खुद कमरे से बाहर चली गई. नीरा को जब मशीन के अंदर किया गया, उस का मन हुआ हाथपैर मार कर जोर से चीख पड़े, वह यहां ऐसे नहीं लेट पाएगी. उस का दम घुटने लगा. आंसू बह चले. सांस रुकती सी लगी. मशीन की टकटक की आवाज कानों को जैसे फाड़ने लगी कि अचानक फिर एक आवाज उसे अपनी ओर खींचने लगी, ओह, फिर अनिरुद्ध, उफ, आज इस समय भी. यह कहां से फिर उस की याद आ गई, अब? इस मुश्किल टैस्ट के समय. 25 साल हो रहे हैं समीर की पत्नी बने. और यह अनिरुद्ध, क्यों गाहेबगाहे चला आता है उस के खयालों में. मशीन की तेज आवाज और रुकती सांस की बेचैनी के बीच वह हैरान रह गई. आज अनिरुद्ध का चेहरा कहीं पीछे जा रहा था और समीर की भीगी हथेलियां उसे अपनी ओर खींचने लगीं. उस का मन हुआ कि जोर से आवाज दे कर समीर को बुलाए और उस के सीने में अपना मुंह छिपा कर जोरजोर से रोए.

वह नर्स का दिया स्विच दबाने ही वाली थी कि समीर की आवाज कानों में गूंजी, सुबह ही तो कह रहे थे, ‘ठीक रहना तुम नीरा, आजकल सो नहीं पाता हूं.’ समीर की आवाज उस के दिल में उतरती चली गई और वह शांत होती हुई चुपचाप लेटी रह गई. स्विच की पकड़ एकदम ढीली पड़ गई. पिछले 25 सालों का वैवाहिक जीवन बंद आंखों के आगे घूमने लगा. कालेज में उस का प्यार सीमाएं तोड़, वर्जनाओं को नकारता हुआ, किसी सैलाब की तरह आगे नहीं बढ़ा था बल्कि अनिरुद्ध और उस का प्यार तो एक सुगंधित फूल की तरह था जिस में वे दोनों ही डूबे रहे, किसी को पता नहीं चला. और बहुत चाह कर भी इन 25 सालों में वह अपने दिमाग से अनिरुद्ध की छवि को दूर नहीं कर पाई. रोज रात को बिस्तर पर लेटते ही उस की आंखों के सामने वह साकार होता रहा है. विवाह के समय भूल ही गई उसे अपने जीवन से अलग करना, अंदर से हमेशा उस के साथ ही जुड़ी रही.

विवाह उस के लिए बस एक समझौता था. अपनी सारी भावनाएं तो वह अनिरुद्ध को सौंप चुकी थी. उसे बहुत ही सौम्य, शालीन, सुव्यवस्थित किस्म के इंसान समीर का भरपूर प्यार और पूर्ण समर्पण मिला पर, समीर के प्रति उस का समर्पण हमेशा आधाअधूरा ही रहा. मशीन की टकटक बंद हुई तो उसे लगा जैसे वह बहुत लंबा सफर कर के लौटी है. अचानक समीर को देखने का मन हुआ. आजकल पता नहीं क्यों हर समय यही दिल चाहता है कि समीर आसपास रहें. पहले ऐसा नहीं होता था. जब से उस की तबीयत खराब है, सारे काम छोड़ कर समीर छुट्टी ले कर उस का ध्यान रख रहे हैं. खाना बनाने के लिए जबरदस्ती मेड भी रखवा दी है. जरा सा भी वजन उसे उठाने नहीं देते. कभी भी उस का हाथ पकड़ कर चुपचाप लेट जाते हैं उस के बराबर में. नर्स आई तो उस के विचारों में विराम लगा. नर्स ने उसे सहारा दे कर उठाया. कपड़े बदलने के लिए कहा. वह चेंज कर के बाहर आई तो समीर बेचैनी से टहलते दिखे. उसे देखते ही लपके, ‘‘ठीक हो न?’’

नीरा ने ‘हां’ में गरदन हिलाई.

‘‘आओ, दो मिनट बैठो, फिर रूम में चलते हैं, रिपोर्ट तो 3 बजे तक आएगी.’’ अस्पताल के रूम में बैड पर लेट कर नीरा ने कहा, ‘‘अब तुम भी थोड़ा आराम से बैठ जाओ, सुबह से इधर से उधर कर रहे हो.’’ समीर ने बैग खोलते हुए कहा, ‘‘चलो, पहले अब नाश्ता करते हैं. लेकिन रुको, मैं कैंटीन से चाय ले कर अभी आया.’’ नीरा के कुछ कहने से पहले ही समीर कमरे से निकल गए. नीरा को नाश्ते में चाय चाहिए, यह सब को पता है, जबकि समीर चाय पीते ही नहीं हैं. समीर चाय ले कर आए, दोनों ने नाश्ता किया. नाश्ता और खाना सुबह मेड श्यामला ने बना ही दिया था. उस के बाद समीर बेचैनी से अंदरबाहर करते रहे, बारबार घड़ी देखते. उन के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. लंच भी बहुत थोड़ा सा खाया. बच्चे फोन के जरिए संपर्क में थे. ढाई बजे से ही रिपोर्ट लेने के लिए कभी काउटर तक जाते, कभी नर्स से पूछते.

थोड़ी देर बाद समीर तेजी से चलते हुए रूम में आए. नीरा के बैड पर बैठ कर उसे सीने से लगा लिया, ‘‘रिपोर्ट्स आ गईं नीरा, डाक्टर से फोन पर बात कर के आया हूं. उन्होंने फोन पर ही रिपोर्ट्स पूछ ली थी. कोई बड़ी चिंता नहीं है. नीरा, डिस्क में थोड़ी दिक्कत है, ठीक हो जाएगी. ओह, नीरा.’’ समीर की बांहों में नीरा ऐसे दुबकी थी जैसे वह कोई छोटी बच्ची हो. आज उस का मन हुआ, बस, वह इन्हीं बांहों में समाए रहे. समीर ने कहा, ‘‘बच्चों को बता दूं, वे भी परेशान हैं.’’ समीर बच्चों से बात करते हुए कितने आश्वस्त दिख रहे थे. अब वह लेट कर आज स्वयं को धिक्कारने लगी, आखिर क्यों नहीं वह एक सीधी राह पर चल पाती है. केयरिंग पति है, बच्चे हैं. समीर एक अच्छे पति, पिता और जिम्मेदार इंसान हैं. पर वह क्यों मूर्ख है? यादों से चिपके रहने की आदत को छोड़ क्यों नहीं देती?

ये यादें उसे वर्तमान से दूर ढकेलती हैं. वह क्यों उन्हें अपने खुशहाल जीवन में इस तरह बिखेर देती है कि वर्तमान उस में दब सा जाता है. जीवन के कितने साल उस ने अतीत में जी कर बेकार कर दिए. अब उन खूबसूरत लमहों की भरपाई कभी कर पाएगी? बेचारे समीर तो उस की गंभीरता को उस का स्वभाव ही मान चुके हैं. शाम को बच्चे भी सीधे अस्पताल ही आ गए. नीरा से लिपट गए दोनों. कुछ देर चारों बातें करते रहे. शाम को डाक्टर ने आ कर बताया, ‘‘डिस्क में थोड़ी परेशानी है. दर्द ज्यादा है तो कल सुबह में एक इंजैक्शन देंगे, फिर ऐक्सरसाइज, एक्यूपंक्चर और दवाओं से ठीक हो जाओगी.’’ और कुछ बातें समझा कर डाक्टर चले गए. रात को बच्चे घर चले गए. समीर को ही रुकना था. सुबह औपरेशन थिएटर में जाने के खयाल से ही नीरा तनाव में थी, चुपचाप लेट कर आंसू रोकने की कोशिश कर रही थी. समीर उस के पास ही आ कर बैठ गए. अपना हाथ उस के माथे पर रख कर पूछा, ‘‘डर रही हो? घबराओ मत, मैं हूं न.’’

समीर का एक हाथ नीरा के माथे पर था, दूसरे हाथ में नीरा का हाथ था. आज समीर का स्पर्श शरीर पर महसूस होता हुआ उस की सोच को भिगोता जा रहा था. वह आंखें मूंदे उन की परिचित खुशबू को महसूस करने लगी. उसे लग रहा था उस के अंदर एक नई नीरा ने जन्म ले लिया है. उस का खुद से यह एक नया परिचय था. वह खुद से ही अभिभूत लगी. अब जैसे उस की सोच, उस का जिस्म सुगंधित हो उठे हैं. अब वह इसी खुशबू में भीगी फिरती रहेगी जीवनभर. उस ने पूरे मन से आज अतीत को तिलांजलि दे दी. अब जीवन की सार्थकता पीछे मुड़ने में नहीं, बल्कि वैवाहिक रिश्ते के साथ ईमानदारी से आगे बढ़ने में ही थी. जीवन के 40वें दशक में इस समय वह विमुग्ध थी, अपनेआप पर, समीर पर, इस नियति पर. आज लग रहा था कितना बेमानी था सब. हाथ तो पहले भी छुआ है समीर ने लेकिन आज समीर का स्पर्श जैसे तपतीजलती दोपहर के बाद आधी रात की ठंडीठंडी चांदनी. एक बार तो उस का मन किया कि कह दे, समीर, हाथ मत हटाना पर होंठ और जबान को जैसे ताले लग गए थे.

समीर कुछ सोचते हुए कहीं और देख रहे थे और वह उन्हें यों देख रही थी कि पलक भी झपकाई तो न जाने कितने पलों का घाटा हो जाएगा. ऐसा तो कभी भी नहीं हुआ था. शायद, उसे प्यार हो गया है. हां, फिर से. यकीनन. अचानक समीर ने नीरा को देखा. समीर की आंखें बता रही थीं कि नीरा की आंखों में उन्हें अपनी तसवीर ही दिख रही थी. वे हैरानी से मुसकराए. वह भी मुसकरा दी. उसे लगा वह हर डर, घबराहट और हिचकिचाहट से ऊपर उठ कर स्वच्छंद, स्वतंत्र और निष्कपट हृदय की स्वामिनी हो चुकी है. Romantic Story In Hindi

Family Story : हौबी – पति की आदतों से वह क्यों परेशान थी ?

Family Story : मेरे पति को सदा ही किसी न किसी हौबी ने पकड़े रखा. कभी बैडमिंटन खेलना, कभी शतरंज खेलना, कभी बिजली का सामान बनाना, जो कभी काम नहीं कर सका. बागबानी में सैकड़ों लगा कर गुलाब जितनी गोभी के फूल उगाए. कभी टिकट जमा करना, कभी सिक्के जमा करना. तांबे के सिक्के सैकड़ों साल पुराने वे भी सैकड़ों रुपए में लिए जाते जो अगर तांबे के मोल भी बिक जाएं तो बड़ी बात.

ये उन्हें खजाने की तरह संजोए रहते हैं. जब ये किसी हौबी में जकड़े होते हैं, तो इन को घर, बच्चे, मैं कुछ दिखाई नहीं देता. सारा समय उसी में लगे रहते हैं. खानेपीने तक की सुध नहीं रहती. औफिस जाना तो मजबूरी होती थी. अब ये रिटायर हो गए हैं तो सारा समय हौबी को ही समर्पित हैं. लगता अगर मुख्य हौबी से कुछ समय बच जाए तो ये पार्टटाइम हौबी भी शुरू कर दें.

आजकल सिक्कों की मुख्य हौबी है, जिस में सिक्कों के बारे में पढ़नालिखना और दूसरों को सिक्कों की जानकारी देना कि यह सिक्का कौन सा है, कब का है आदि. इंटरनैट पर सिक्काप्रेमियों को बताते रहते हैं. सारा दिन इंटरनैट पर लगे रहते हैं. कुछ समय बचा तो सुडोकू भरना. यहां तक कि सुडोकू टौयलेट में भी भरा जाता है और मैं टौयलेट के बाहर इंतजार करती रहती हूं कि मेरा नंबर कब आएगा. आजकल सुडोकू कुछ शांत है. अब ये एक नई हौबी की पकड़ में आ गए हैं. इन को खाना पकाने का शौक हो गया है. जीवन में पहली बार कुछ काम की हौबी ने इन को पकड़ा है. मैं ने सोचा कुछ तो लाभ होगा. बैठेबैठे पकापकाया स्वादिष्ठ भोजन मिलेगा.

इन्होंने पूरे मनोयोग से खाना पकाना शुरू किया. पहले इंटरनैट से रैसिपी पढ़ते, फिर उसे नोट करते. बाद में ढेरों कटोरियों में मसाले व अन्य सामग्री निकालते. नापतोल में कोई गड़बड़ नहीं. जैसे लिखा है सब वैसे ही होना चाहिए. हम लोगों की तरह नहीं कि यदि कोई मसाला नहीं मिला तो भी काम चला लिया. ये ठहरे परफैक्शनिस्ट अर्थात सब कुछ ठीक होना चाहिए. सो यदि डिश में इलायची डालनी है और घर में नहीं है तो तुरंत कार से इलायची लाने चले जाएंगे. 10 रुपए की इलायची और 50 रुपए का पैट्रोल.

जब सारा सामान इकट्ठा हो जाता तो बनाने की प्रक्रिया शुरू होती. शुरूशुरू में तो गरम तेल में सूखा मसाला डाल कर भूनते तो वह जल जाता. फिर उस जले मसाले की सब्जी पकती. फिर डिश सजाई जाती. फिर फोटो खींच कर फेसबुक पर डाला जाता. फेसबुक पर फोटो देख कर लोग वाहवाह करते, पर जले मसाले की सब्जी खानी तो मुझे पड़ती. मैं क्या कहूं? सोचा बुरा कहा तो इन का दिल टूट जाएगा. सो पानी से गटक कर ‘बढि़या है’ कह देती. इन का हौसला बढ़ जाता.

ये और मेहनत से नएनए व्यंजन पकाते. कभी सब्जी में मिर्च इतनी कि 2 गिलास पानी से भी कम न होती. कभी साग में नमक इतना कि बराबर करने के लिए मुझे उस में चावल डाल कर सगभत्ता बनाना पड़ता. किचन ऐसा बिखेर देते कि समेटतेसमेटते मैं थक जाती. बरतन इतने गंदे करते कि कामवाली धोतेधोते थक जाती. डर लगता कहीं काम न छोड़ दे.

मेरी सहनशीलता तो देखिए, सब नुकसान सह कर भी इन की तारीफ करती रही. इस आशा में कि कभी तो ये सीख जाएंगे और मेरे अच्छे दिन आएंगे. सच ही इन की पाककला निखरने लगी और हमारी किचन भी संवरने लगी. विभिन्न प्रकार के उपयोग में आने वाले बरतन, कलछियां, प्याज काटने वाला, आलू छीलने वाला, आलू मसलने वाला सारे औजारहथियार आ गए. चाकुओं में धार कराई गई. पहले इन सब चीजों की ओर कभी ये ध्यान ही नहीं देते थे. अब ये इतने परफैक्ट हो गए कि नैट पर विभिन्न रैसिपियां देखते, फिर अपने हिसाब से उन में सब मसाले डालते और स्वादिष्ठ व्यंजन बनाते.

अब देखिए मजा. कभी कुम्हड़े का हलवा बनता तो कभी गाजर का, जिस में खूब घी, मावा और सारे महीने का मेवा झोंक दिया जाता. हम दोनों कोलैस्ट्रौल के रोगी और घर में खाने वाले भी हम दोनों ही. अब इतना मेवामसाला पड़ा हलवा कोई फेंक तो देगा नहीं. सो खूब चाटचाट कर खाया.

अब उन सब्जियों को भी खाने लगे, जिन्हें पहले कभी मुंह नहीं लगाते थे. एक से एक स्वादिष्ठ व्यंजन खूब घी, तेल, मेवा, चीनी में लिपटे व्यंजन. मेरे भाग्य ही खुल गए. इन की इस हौबी से बैठेबैठे एक से एक व्यंजन खाने को मिलने लगे. इतना अच्छा खाना खाने के बाद तबीयत कुछ भारी रहने लगी. डाक्टर को दिखाया तो पता चला कोलैस्ट्रौल लैबल बहुत बढ़ गया है.

डाक्टर की फीस, खून जांच, दवा सब मिला कर कई हजार की चपत बैठी. घीतेल, अच्छा खाना सब बंद हो गया. अब उबला खाना खाना पड़ रहा है. अब बताइए इन की हौबी मेरे लिए मजा है या सजा?

Krishna Arjun Movie : विश्व की पहली वन टेक दोहरी भूमिका वाली फिल्म ‘कृष्णा अर्जुन’ को सैंसर बोर्ड ने प्रमाणपत्र देने से किया इनकार

Krishna Arjun Movie : एरिक रौबर्टस के साथ इंटरनैशनल वैब सीरीज ‘मदीनाह’ और दो लघु फिल्मों में अभिनय करने के बाद हेमवंत तिवारी 2023 में विश्व की पहली वन शौट ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘लोमड़’ को बनाने को ले कर चर्चा में हैं, जिसे 24 विभिन्न इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवलों में पुरस्कृत किया गया था. दर्शकों ने इस फिल्म को काफी पसंद किया था. यह एक घंटा 37 मिनट की फिल्म थी. उन की एक लघु फिल्म ‘लाइफ इज ब्यूटीफुल’ (जिंदगी खूबसूरत है) को कान्स इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में प्रदर्शित की गई थी.

अब हेमवंत तिवारी ने विश्व की पहली वन-टेक यानी सिंगल शौट की दोहरी भूमिका वाली फिल्म ‘कृष्णा अर्जुन’ बनाई है. लेकिन दो घंटे 14 मिनट की लंबी अवधि वाली इस फिल्म केा सिनेमाघरों में रिलीज नहीं किया जा सकता क्योंकि सैंसर बोर्ड ने इसे प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया है. जबकि हेमवंत तिवारी कुछ सीन ब्लर करने (शाहरुख खान की फिल्म ‘जवान’ में कुछ नग्न दृष्यों को ब्लर करने पर सैंसर बोर्ड ने पारित किया था) व कुछ संवाद म्यूट कर ‘ए’ प्रमाणपत्र लेने को तैयार थे. लेकिन हेमवंत अपनी फिल्म के एक भी सीन पर कैंची नहीं चला सकते. कोई भी कट करने से पूरी प्रक्रिया विफल हो जाएगी, क्योंकि इस से हेमवंत से वन-टेक फ़िल्म बनाने का श्रेय छिन जाएगा. कट, यहां तक कि एक कट भी, ध्यान देने योग्य होगा, वह उन के इस दावे को झूठा साबित करेगा कि उन की फिल्म एक शौट वाली है.

फिल्म ‘कृष्णा अर्जुन’ एक बोल्ड फिल्म है जिस में मंत्री द्वारा एक लड़की के साथ 3 लड़कों से बलात्कार करवाने का आरोप है. अब ल़डकी गर्भवती है. वह न्याय की भीख मांग रही है. इस लड़ाई में जुड़वां भाई कृष्णा व अर्जुन उस लड़की की मदद कर रहे हैं लेकिन मंत्री के इशारे पर पुलिस स्टेशन के अंदर ही नंगा नाच चल रहा है. इस में मंत्री, जज व पुलिस तंत्र भी जुड़ा हुआ है. अर्जुन की हत्या करने के बाद जज, मंत्री व पुलिस अर्जुन के भाई कृष्णा को पूर्णरूपेण नंगा कर पीटते हैं. इस तरह इस फिल्म में गंदी गालियों की बौछार है, तो वहीं एक लंबा नग्न दृश्य भी है.

सैंसर बोर्ड ने गालियों और यौन संवादों के भरपूर इस्तेमाल और लगभग पूरी नग्नता पर आपत्ति जताई है. बोर्ड चाहता है कि ये सारे सीन काट दिए जाएं. फिल्म के निर्माता, लेखक, निर्देशक व मुख्य अभिनेता हेमवंत तिवारी का तर्क है कि अगर वे एक भी सीन कट करते हैं तो उन की फिल्म ‘कृष्णा अर्जुन’ दुनिया की पहली वन-टेक फिल्म नहीं कहलाएगी और वे इस श्रेय को खोना नहीं चाहते. हेमवंत तिवारी नहीं चाहते कि हौलीवुड फिल्मों ‘बर्डमैन’ और ‘1917’ की तरह उन की फिल्म पर भी वन-टेक फ़िल्म होने का आभास देने के लिए योजनाबद्ध तरीके से शूट और संपादित किए जाने का आरोप लगे.

हेमवंत तिवारी कहते हैं, ‘‘हम नग्न दृश्य को ब्लर करने के साथ ही जज, मंत्री व गालियों को म्यूट करने को तैयार हैं. मगर सैंसर बोर्ड चाहता है कि मैं सीन को ‘ब्लर’ करने के बजाय काट दूं, तभी वह ‘ए’ प्रमाणपत्र देगा. जबकि इस से पहले सैंसर बोर्ड शाहरुख खान की फिल्म ‘जवान’ के नग्न दृश्य को ‘ब्लर’ कर पारित कर चुका है. पर मेरी बात नहीं सुनी जा रही है. मैं बोर्ड से लड़ने में खुद को सक्षम नहीं मानता, इसलिए मैं ने अपनी फिल्म को यूट्यूब पर रिलीज कर दिया है, जहां लोग पैसे दे कर देख सकते हैं. हम ने अपनी यह फिल्म ‘सृष्टिकर्ता’ यानी औरत को समर्पित की है.’’

Chandra Shekhar Aazad : राजनीति में ऊंचाइयां छूनी हैं तो औरतों को दूर रखें

Chandra Shekhar Aazad : राजनीति में छवि माने रखती है. छवि एक बार खराब हो जाए तो वापस आना लगभग नामुमकिन होता है. चपलचालाक राजनेता वही माना जाता है जो भले चाहे जैसा हो लेकिन उस की छवि दागदार न हो. मगर कई ऐसे मामले आए हैं जहां सिर्फ एक घटना से नेताओं को अपना राजनीतिक कैरियर छोड़ना पड़ा.

पिछले दिनों भीम आर्मी के संस्थापक और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ पर एक पीएचडी स्कौलर डा. रोहिणी घावरी ने यौन शोषण का आरोप लगाया. डा. रोहिणी कोई आम महिला नहीं, बल्कि पढ़ीलिखी, आत्मनिर्भर और विदेश में काम करने वाली एक खूबसूरत महिला हैं.

डा. रोहिणी घावरी मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की रहने वाली हैं, वाल्मीकि समुदाय से आती हैं. उन के पिता इंदौर के एक बीमा अस्पताल में सफाई कर्मचारी के पद पर कार्यरत हैं. बेहद साधारण बैकग्राउंड से आने के बावजूद रोहिणी ने शिक्षा और आत्मविश्वास के दम पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. उन्होंने स्विट्जरलैंड की एक यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त की और पीएचडी के लिए एक करोड़ रुपए की स्कौलरशिप भी हासिल की थी. उन्होंने बिजनैस एडमिनिस्ट्रेशन में पीएचडी की है.

इस से पहले उन्होंने इंस्टिट्यूट औफ कौमर्स से फौरेन ट्रेड में बीबीए किया और उस के बाद इंस्टिट्यूट औफ मैनेजमैंट से मार्केटिंग में एमबीए की पढ़ाई की. वे 5 सालों से स्विट्जरलैंड में जौब कर रही हैं और एक स्वयंसेवी संस्था भी चला रही हैं जो सामाजिक मुद्दों पर काम करती है. साल 2019 में वे पढ़ाई के सिलसिले में विदेश गई थीं और वहीं से उन का संपर्क चंद्रशेखर आजाद से हुआ. दोनों के बीच प्रेम हुआ और शारीरिक संबंध बने.

रोहिणी का आरोप है कि चंद्रशेखर के साथ 5 साल तक संबंध में रहने के दौरान उन्होंने कई बार महसूस किया कि वे सिर्फ उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने खुद को ‘विक्टिम नंबर 3’ बताया और यह भी दावा किया कि उन के जैसी और भी कई पीड़िताएं हैं जिन का यौन और भावनात्मक शोषण चंद्रशेखर ने किया और जिन की आवाज आज तक नहीं सुनी गई. चंद्रशेखर ने हर लड़की से अपने शादीशुदा होने की बात छिपाई और उन का विश्वास तोड़ा.

रोहिणी चंद्रशेखर के खिलाफ एफआईआर कराने और कानूनी लड़ाई लड़ने के मूड में है. निश्चित ही उन्हें उन राजनीतिक ताकतों का अप्रत्यक्ष सहयोग मिल रहा होगा जो राजनीति के मैदान में चंद्रशेखर की बढ़ती ताकत से घबराए हुए हैं.

चंद्रशेखर आजाद एक बहुजन नेता के रूप में चर्चा में उस वक्त आए जब उन्होंने अपने गांव के बाहरी इलाके में ‘द ग्रेट चमार औफ घड़खौली वेलकम यू’ नामक एक होर्डिंग लगाई. फरवरी 2021 में टाइम पत्रिका ने उन्हें भविष्य को आकार देने वाले 100 उभरते नेताओं की अपनी वार्षिक सूची में शामिल किया.

चंद्रशेखर आजाद ने सतीश कुमार और विनय रतन सिंह के साथ मिल कर वर्ष 2014 में भीम आर्मी नामक संगठन बनाया, जो भारत में शिक्षा के माध्यम से दलितों की मुक्ति के लिए काम करता है. यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों के लिए मुफ्त स्कूल चलाता है और मुफ्त शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराता है.

2020 में चंद्रशेखर आजाद ने आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) की स्थापना की. 2024 के आम चुनाव में चंद्रशेखर आज़ाद ने नगीना लोकसभा क्षेत्र में 1,51,473 वोटों से बड़ी जीत हासिल की और क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में दलित और पिछड़े समाज के बीच उन की तूती बोलने लगी.

बसपा नेत्री मायावती, जो खुद को दलितों की अकेली देवी समझती थीं, दलित समाज का आजाद के प्रति बढ़ते आकर्षण को देख कर घबरा उठीं. उन को अपना वोटबैंक आजाद की ओर तेजी से खिसकता नजर आया तो आजाद के मुकाबले में उन्हें अपने भतीजे आकाश आनंद, जो कि चंद्रशेखर की तरह ही धुआंधार भाषणबाजी का महारथी है, को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर मैदान में उतारना पड़ा. बसपा ही नहीं, बल्कि भाजपा, जो पिछड़े और दलितों को साधने में दिनरात एक किए हुए है, भी चंद्रशेखर की बढ़ती ताकत और प्रसिद्धि से घबरा उठी. ऐसे समय में अचानक एक महिला का सामने आना और चंद्रशेखर पर यौन शोषण का आरोप लगाना, इन राजनीतिक पार्टियों के लिए बिलकुल वैसे ही हुआ जैसे अंधे के हाथ बटेर लग गए. चंद्रशेखर का चरित्र हनन करने में ये पार्टियां तुरंत जुट गईं.

जाहिर है, डा. रोहिणी घावरी को इन पार्टियों का सपोर्ट मिला. तभी वे इतनी मुखर हुईं. वरना 5 साल तक वे मुंह में दही जमाए बैठी रहीं. हालांकि जिस दिन उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वे प्रेम में छली गईं, उन्हें तो उसी दिन आजाद के खिलाफ एफआईआर करवानी चाहिए थी. रही बात चंद्रशेखर की शादीशुदा जिंदगी छिपाने की, तो जो व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में 2014 में ही आ गया और जिस ने कई चुनाव लड़े, उस का पूरा बायोडाटा तो वैसे ही इंटरनैट पर उपलब्ध है. साफ है कि चंद्रशेखर की बढ़ती ताकत और बढ़ता वोटबैंक जिन लोगों को खटक रहा है, डा. रोहिणी घावरी को सामने रख कर चंद्रशेखर को बलात्कारी घोषित करने और किसी तरह उन के जेल जाने का रास्ता तैयार करने में उन्हीं लोगों का हाथ है.

इस से पहले अभिनेता और उत्तर प्रदेश की गोरखपुर सीट से भाजपा सांसद रवि किशन पर भी एक लड़की शिनोवा सोनी ने आरोप लगाया था कि रवि किशन के उस की मां अपर्णा सोनी से संबंध थे और वह रवि किशन की बेटी है. लड़की का आरोप है कि रवि किशन ने कभी भी सार्वजनिक रूप उसे बेटी स्वीकार नहीं किया, जबकि घर आने पर वह उस से एक पिता की तरह ही बहुत प्यार करते थे. लड़की का आरोप है कि शादीशुदा होते हुए भी रवि किशन ने उस की मां अपर्णा सोनी से संबंध बनाए और वे हमेशा उन के घर आतेजाते रहे. पिता होने के बावजूद शिनोवा सोनी उन को अंकल कह कर बुलाने के लिए मजबूर थी.

गौरतलब है कि शिनोवा सोनी ने यह आरोप उस समय लगाए जब चुनाव नजदीक थे और रवि किशन भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में थे.

अब चूंकि रवि किशन भाजपा से जुड़े हुए थे, तो यहां मामला उलटा पड़ गया और रवि किशन की पत्नी प्रीति शुक्ला ने अपर्णा सोनी, उस के पति राजेश सोनी, बेटी शिनोवा, बेटा सौनक के साथ ही सपा नेता विवेक कुमार पांडेय समेत कुछ अन्य लोगों के खिलाफ लखनऊ के एक थाने में केस दर्ज करा दिया. इन सभी के खिलाफ धारा 120-बी, 195, 386, 388, 504 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ. इस एफआईआर में सपा नेता पर महिला के साथ मिल कर आपराधिक षड्यंत्र करने का आरोप लगाया गया.

प्रीति की एफआईआर के मुताबिक, मुंबई की एक महिला, जिस का नाम अपर्णा सोनी उर्फ अपर्णा ठाकुर है, ने धमकी देते हुए कहा कि उस के और उस के साथियों के अंडरवर्ल्ड माफियाओं से संबंध हैं. अगर हमारी बात नहीं मानी और 20 करोड़ रुपए रंगदारी नहीं दी, तो तुम्हारे पति (रवि किशन शुक्ला) को मेरे साथ बलात्कार करने के मामले में फंसा दूंगी. साथ ही, सपा के इशारे पर उन के पति को बदनाम कर छवि धूमिल करने का भी आरोप लगाया गया.

पीस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधायक डा. अयूब भी राजनीति के क्षेत्र में बड़ी तेजी से उभर रहे थे पर तभी एक लड़की के परिजनों ने उन पर रेप का आरोप लगाया. उस समय डा. अयूब की पार्टी प्रदेश में अपना खासा स्थान बना चुकी थी और बड़ी संख्या में मुसलमान उन को अपने नेता के रूप स्वीकार कर उन से जुड़ रहे थे.

आरोप है कि संतकबीर नगर निवासी एक युवती को डा. अय्यूब डाक्टर बनाने का झांसा दे कर लखनऊ लाए और एक निजी इंस्टिट्यूट में बीएससी नर्सिंग में दाखिला करवा कर उस का यौन शोषण करने लगे. बाद में पीड़िता से पीछा छुड़ाने के लिए उसे गलत दवाएं दे कर उस की किडनी और लिवर को खराब कर दिया. युवती को गंभीर हालत में 23 फरवरी, 2017 को ट्रामा सैंटर में भरती करवाया गया, जहां 24 फरवरी, 2017 की रात उस की मौत हो गई.

लड़की के परिजनों ने डा. अयूब की गिरफ़्तारी के लिए सीएम तक से गुहार लगाई. ढाई महीने चली जांच के बाद डा. अयूब को रेप केस में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

लखनऊ पुलिस के मुताबिक़ फरवरी 2016 से अयूब की कौल रिकौर्ड चैक करने पर पता चला कि 365 दिनों में 312 बार अयूब और लड़की के बीच बातचीत हुई. अयूब ने जहां 128 बार लड़की को कौल किया तो वहीं 184 बार लड़की ने अयूब को कौल किया. तत्कालीन एसएसपी मंजिल सैनी के मुताबिक, पुलिसिया जांच में एक साल के अंदर कई बार लड़की और अयूब की लोकेशन साथ मिलीं, इन में मैट्रो सिटी स्थित घर और विधायक निवास का घर दोनों शामिल हैं. आरोप लगाने वाली लड़की के भाई का कहना है कि वह वर्ष 2012 से ही डा. अयूब के साथ रह रही थी. डा. अयूब पर बलात्कार का आरोप लगने और जेल जाने से पार्टी को काफी धक्का लगा और धीरेधीरे पार्टी सिमट गई व तमाम नेता पार्टी से अलग हो गए.

नारायण दत्त तिवारी के नाजायज रिश्ते का मामला 2008 में सामने आया था जब रोहित शेखर नामक व्यक्ति ने दावा किया था कि एन डी तिवारी उन के पिता हैं. रोहित शेखर और उन की मां उज्ज्वला तिवारी ने एन डी तिवारी के खिलाफ पितृत्व का मुकदमा दायर किया था. इस मामले में नारायणदत्त तिवारी की बुढ़ापे में काफी छीछालेदर हुई और इस प्रकरण ने तिवारी के राजनीतिक कैरियर को लगभग ख़त्म कर दिया था. काफी समय तक वे डीएनए टैस्ट के लिए तैयार न हुए. मगर कोर्ट के आदेश के आगे उन्हें झुकना पड़ा. डीएनए टैस्ट के बाद यह साबित हो गया कि रोहित शेखर एन डी तिवारी के बेटे हैं. तब एन डी तिवारी ने रोहित शेखर को अपना बेटा मान लिया और उन के साथ अपने रिश्ते को स्वीकार किया. हालांकि, कुछ सालों बाद ही नारायण दत्त तिवारी का देहांत हो गया और उस के कुछ समय बाद ही उन का बेटा रोहित शेखर भी असमय मौत की नींद सो गया.

प्रेम और शारीरिक संबंध दो बालिग़ लोगों के बीच मरजी से बनाया रिश्ता होता है. इस में दोनों की भूमिका बराबर होती है. प्रेम यदि सच्चा है तो वहां तो कोई सवाल ही कभी पैदा नहीं होता. मगर प्रेम यदि विवाह की इच्छा से हो और पुरुष मुकर जाए या व्यक्ति स्त्री से अपनी शादी की बात छिपा कर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी करने से इनकार करे तो वह अपराध है और स्त्री को तुरंत उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाना चाहिए. मगर देखा गया कि फ़िल्मी हस्तियों और राजनेताओं के मामले में औरतों का मुंह मौक़ा देख कर खुलता है.

राजनेताओं के इर्दगिर्द बड़ी संख्या में औरतें डोलती रहती हैं और उन की निकटता पाना चाहती हैं. कुछ इस लालच में कि उन को पार्टी में कोई छोटामोटा पद मिल जाए, कुछ धन की आशा में तो कुछ आकर्षण में. सत्ता, पैसा और प्रसिद्धि – ये तत्त्व स्वाभाविक रूप से कई लोगों को आकर्षित करते हैं. जब कोई व्यक्ति राजनीतिक रूप से प्रभावशाली होता है तो लोग उस के आसपास रहना चाहते हैं, क्योंकि उस से उन्हें सामाजिक, आर्थिक या व्यक्तिगत लाभ मिलने की उम्मीद होती है. कुछ महिलाएं राजनीति या समाज में अपने कैरियर को आगे बढ़ाने के लिए प्रभावशाली नेताओं के संपर्क में आना चाहती हैं. इस से उन्हें टिकट, पद, अनुशंसा या प्रचार का मौका मिल जाता है. कभीकभी उन के बीच व्यक्तिगत संबंध बन जाते हैं और वे सार्वजनिक जीवन में चर्चित हो जाते हैं.

ऐसे रिश्ते सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति के लिए कभीकभी काफी घातक साबित होते हैं. सार्वजानिक जीवन में जो व्यक्ति है उस से पहली आशा यही होती है कि उस का चरित्र बेदाग़ हो. वह निष्कलंक और नैतिक रूप से दृढ़ हो. जनता अपने प्रतिनिधि पर तभी भरोसा करती है जब उसे लगे कि वह ईमानदार, न्यायप्रिय, सद्गुणी और सच्चा है. उस का आचरण समाज के लिए प्रेरणा बनता है. एकाध अपवादों को छोड़ दें तो जिनजिन नेताओं के चरित्र पर दाग लगा उन का राजनीतिक कैरियर लगभग ख़त्म हो गया. वो चाहे हरियाणा के सिरसा से विधायक गोपाल कांडा हों, उत्तर प्रदेश के अमरमणि त्रिपाठी हों या नारायण दत्त तिवारी. पी वी नरसिंह राव सरकार के मंत्री जवाहरलाल डर्डा, शिबू सोरेन जैसे कई नेता यौन उत्पीड़न या स्त्रियों से जुड़ी छवि के कारण आलोचना में आए और अपने कैरियर में बैकफुट पर चले गए.

औरतों की संगत, नाजायज संबंधों या उन से जुड़े कथित या वास्तविक स्कैंडलों ने भारत के ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कई राजनेताओं के कैरियर को प्रभावित किया है. कुछ मामलों में तो उन के राजनीतिक कैरियर को पूरी तरह से खत्म कर दिया.

अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की नामक इंटर्न के बीच यौन संबंधों का मामला उजागर हुआ तो क्लिंटन के खिलाफ महाभियोग चला. हालांकि वे राष्ट्रपति पद पर बने रहे लेकिन उन की राजनीतिक साख को गहरी चोट पहुंची.

ब्रिटेन और अमेरिका में स्ट्रिप क्लब स्कैंडल्स हुआ था जिस में कई सांसद और मंत्री क्लबों में औरतों के साथ पकड़े गए, जिस से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा या उन का राजनीतिक कैरियर थम गया.

फ्रांस के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के प्रमुख डोमिनिक स्ट्रास-कान पर वर्ष 2011 में न्यूयौर्क के एक होटल में एक नौकरानी ने यौन हमले का आरोप लगाया. डोमिनिक स्ट्रास-कान को न सिर्फ आईएमएफ प्रमुख पद से इस्तीफा देना पड़ा बल्कि उन की फ्रांस के राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं भी समाप्त हो गईं.

इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि सार्वजनिक जीवन में ‘चरित्र’ की उम्मीद बहुत अहम होती है. महिलाओं से जुड़े विवाद, चाहे सही आरोप हों या गलत, नेताओं की छवि और विश्वसनीयता को गहरे तक प्रभावित करते हैं. इसलिए राजनीति में यदि ऊंचाइयां छूनी हैं तो औरतों से दूर रहना जरूरी है, खासकर उन औरतों से जो किसी लालचवश आप की गोद में आ गिरती हैं और लालच पूरा न होने पर आप के खिलाफ सड़क पर खड़ी हो जाती हैं.

Deepika Padukone : हौलीवुड वाक औफ फेम का हिस्सा बनी दीपिका पादुकोण “यह उपलब्धि है या पीआर ऐक्टिविटी”

Deepika Padukone : दीपिका पादुकोण वैसे तो दुनियाभर में चर्चित अभिनेत्री हैं मगर उन का कद क्या इतना ऊंचा हो गया है कि वे हौलीवुड वाल औफ फेम का हिस्सा बन गईं. इसे ले कर राय दो धड़ों में बंट गई है.

3 जुलाई, 2025 को ‘हौलीवुड चैम्बर्स औफ कौमर्स’ ने अपने यूट्यूब चैनल पर लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान जो घोषणा की, उस के बाद बौलीवुड अदाकारा दीपिका पादुकोण इतिहास रचते हुए ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ में जगह बनाने वाली पहली भारतीय अभिनेत्री बन गई हैं. जिन्हें ‘मोशन पिक्चर्स’ की कैटेगरी में 2026 क्लास में चुना गया है. उन्हें इस क्लास में 35 इंटरनैशनल हस्तियों में से चुना गया है. इस पर दीपिका पादुकोण ने खुशी जताते हुए इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी लिख कर धन्यवाद भी अदा किया. इस से पहले 1960 में यह उपलब्धि दक्षिण के अभिनेता साबू दस्तगीर को मिली थी. यह अलग बात है कि तब तक वह अमरीकी नागरिक बन चुके थे.

उस हिसाब से कहा जा रहा है कि ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ सम्मान पाने वाली दीपिका पादुकोण एकमात्र भारतीय कलाकार हैं. पर बौलीवुड और उस के बाहर भी यह बहस का मुद्दा बन गया है. सवाल उठाया जा रहा है कि यह दीपिका पादुकोण और भारतीय सिनेमा के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि है. कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि यह उपलब्धि है भी नहीं. कहीं यह अपना घर फूक कर दीवाली मनाने अथवा अपने गाल पर अपने हाथों से थप्पड़ मारने वाला मसला तो नहीं है?

हम याद दिला दें कि ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ में दिग्गज आर्टिस्ट्स जैसे एमिली ब्लंट, टिमोथी चालमेट, रामी मालेक, रैचेल मैकऐडम्स, स्टैनली टुच्ची, डेमी मूर सहित ढाई हजार से ज्यादा हौलीवुड कलाकारों के नाम शामिल हैं.

बौलीवुड में दीपिका पादुकोण के पीआर की तरफ से बाकायदा इसे बहुत बड़ी उपलब्धि बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि यह सम्मान विश्व सिनेमा में किसी भारतीय प्रतिभा के लिए मील का पत्थर है.

दीपिका पादुकोण की इस उपलब्धि व सम्मान को कमतर क्यों आंका जा रहा है? इस पर सवालिया निशान क्यों उठाए जा रहे हैं. उस के लिए ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ की चयन प्रक्रिया को समझना होगा.

पहली बात तो ‘हौलीवुड वाक औफ फेम’ क्या है? तो कैलीफोर्निया के लौस एंजेल्स में हौलीवुड बोलेवार्ड और वाइन स्ट्रीट के किनारे पर एक फुटपाथ है. हौलीवुड बोलेवार्ड के फुटपाथ पर 15 ब्लौक पर व वाइन स्ट्रीट के 3 ब्लौक पर पंचकोणीय चांदी और ताम्बे के सितारे जड़े हैं. 1960 में पहली बार स्थायी रूप से इन तारों को स्थापित किया गया था, जिन पर अभिनेताओं, संगीतकारों, निर्माताओं, निर्देशकों, नाट्य/संगीत समूहों, एथलीटों, काल्पनिक पात्रों और अन्य लोगों के नाम अंकित है.

10 जुलाई 2025 तक मार्लिन ब्राडो व चार्ली चैप्लीन सहित 2816 नाम अंकित हो चुके हैं. वाक औफ फेम का रखरखाव व देखभाल हौलीवुड चैम्बर औफ कौमर्स व हौलीवुड हिस्ट्री ट्रस्ट करती है. यह एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है. हर साल करीबन एक करोड़ पर्यटक आते हैं. हौलीवुड चैंबर चयनित मशहूर हस्तियों या उन के प्रायोजकों से हर साल शुल्क के रूप में (वर्तमान में 85,000 डौलर अर्थात लगभग 73 लाख रूपए) एकत्र करता है जिस से तारे के निर्माण और स्थापना के साथसाथ वाक औफ फेम के रखरखाव का खर्च वहन किया जाता है.

मसलन, स्टारज केबल नेटवर्क ने अपनी श्रृंखला क्रैश के प्रचार के लिए डेनिस हौपर के स्टार के लिए भुगतान किया. जबकि इस सम्मान को पाने के लिए दीपिका पादुकोण ने 73 लाख रुपए चुकाए हैं. कुल मिला कर जिस सम्मान को ले कर दीपिका पादुकोण खुशी जाहिर कर रही हैं, इंस्टाग्राम पर पोस्ट लिख रही हैं, उसे उन्होंने 73 लाख रुपए चुका कर पाया है. तो लोग सवाल उठा रहे हैं कि यह किस तरह की उपलब्धि है? क्या इस तरह खरीदे गए सम्मान से किसी व्यक्ति या सिनेमा या देश का सम्मान बढ़ता है? क्या इस तरह की उपलब्धि को उपलब्धि माना जाना चाहिए? क्या दीपिका पादुकोण अभिनय जगत में सभी को मात दे चुकी हैं?

बौलीवुड का ही एक तबका इसे अवार्ड या सम्मान के बजाय पीआर ऐक्टिविटी ही बता रहा है. पर इन सवालों का जवाब दीपिका पादुकोण की तरफ से नहीं दिया गया. हां, मीडिया में उन के पीआर की मारफत लेख छप रहे हैं कि हर साल हौलीवुड वाक औफ फेम में 200 नौमिनेशन आते हैं, उन में से 24 का ही चयन किया जाता है.

लोग तो सवाल यह उठा रहे हैं कि अगर प्रतिभा के बल पर यह सम्मान मिलता, तो फिर हौलीवुड वाक औफ फेम में ओम पुरी, इरफान, नसीरुद्दीन शाह, अमिताभ बच्चन, औस्कर विजेता ए आर रहमान का चयन क्यों नहीं किया गया. इतना ही नहीं, हौलीवुड से भी एंजिला जूली, अल पचीनो, रौबर्ट डाउनी ज्यूनियर, रौबर्ट डिनेरो, जिम केरी, ब्रैड पिट, लिनियार्डो डी कैपियो सहित कई बेहतरीन व नामचीन हौलीवुड स्टार भी हौलीवुड वाक औफ फेम का हिस्सा नहीं हैं. इन्होंने पैसा नहीं दिया तो क्या इन का सिनेमा जगत में कोई योगदान नहीं है? पर दीपिको पादुकोण की इस उपलब्धि पर कोई खुल कर कुछ कहने को तैयार नहीं. सभी के मुंह सिले हुए हैं.

लेकिन दीपिका पादुकोण के अति करीबी ने अपना नाम न बताने पर कहा, ‘लोग बेवजह बात का बतंगड़ बना रहे हैं.’ हौलीवुड वाक औफ फेम का हिस्सा बनना आसान नहीं है. हौलीवुड चैंबर्स औफ कौमर्स की चयन प्रक्रिया बहुत कठिन है. जहां तक 73 लाख रुपए का सवाल है, तो कलाकार का नाम सम्मान के साथ जिन तारों के साथ लिखा जाता है, वह सड़क पर है. यह क्षेत्र करीबन दो किलोमीटर में फैला हुआ है. ऐसे में साफसफाई व रखरखाव पर बहुत बड़ी धनराशि खर्च होती है. उसी को हौलीवुड चैंबर्स औफ कौमर्स वसलूता है, जिसे कहीं से भी गलत नहीं कहा जा सकता और इस से कलाकार को मिलने वाले सम्मान या उस की उपलब्धि कम नहीं हो जाती.’

भारत में एक मापदंड बन गया है कि अगर किसी भारतीय ने विदेश में कुछ पा लिया है, तो वह महान मान लिया जाता है. उस ने वह सम्मान कैसे पाया, कोई नहीं देखता. सिर्फ सम्मान ही क्यों, हमारे यहां कांस इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल भी हौआ बना हुआ है. कुछ फिल्मकार अपनी फिल्म का कांस इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में चयन न होने पर अपने खर्च से कान इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल जाते हैं और बाजार खंड का हिस्सा बन कर अपने खर्च पर डिस्ट्रीब्यूटरों को अपनी फिल्म दिखाते हैं. वहां से वापस आ कर भारतीय मीडिया में खबर छपवाते हैं कि कांस में उन की फिल्म को जबरदस्त सराहना मिली.

यों तो इस से पहले भी दीपिका पादुकोण को कई बार अंतर्राष्ट्रीय पटल पर सम्मानित किया जा चुका है. 2018 में टाइम मैगजीन की 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में उन का नाम था. उन्हें टाइम 100 इंपैक्ट अवार्ड भी मिल चुका है. 2022 में कतर में फीफा वर्ल्ड कप के दौरान ट्रौफी को अनवील करने का अवसर उन्हें मिला था.

Tokophobia : हौवा न बनने दें प्रैग्नैंसी के डर यानी टोकोफोबिया को

Tokophobia : टोकोफोबिया बीमारी से ज्यादा एक मानसिक अवस्था है जिस में महिलाएं प्रैग्नैंसी को ले कर डर जाती हैं. बेंगलुरु में हुई एक रिसर्च के मुताबिक 55 फीसदी महिलाएं इस का शिकार हैं. लेकिन यह कोई गंभीर बात नहीं है, थोड़ी सी समझ और इलाज से इस से छुटकारा पाना आसान है.

केस–1 : “इसी साल जनवरी की बात है. मैं और अनिमेष (बदला नाम) एक फ्रैंड के यहां पार्टी में गए थे. शुक्रवार का दिन था, दोनों बेफिक्र थे कि अगले 2 दिन छुट्टी है. हमारी पार्टियां हंगामेदार होती हैं.” एनसीआर की एक नामी कंपनी में 24 लाख रुपए सालाना के पैकेज पर जौब कर रही 28 वर्षीया संभावना (बदला नाम) आगे बताती है, “उस रात हम दोनों ने ही ड्रिंक्स कुछ ज्यादा ले ली थी. कड़कड़ाती ठंड थी. रात कोई 3 बजे हम दोनों अपने ढाई कमरे के फ्लैट पर आए, तब खुमारी भी थी और थकान भी थी. इसी हालत में ड्राइंगरूम में सोफे पर ही लुढ़क गए. तभी एकाएक ही अनिमेष ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे अपनी तरफ खींच लिया.

“हमें इतना भी होश नहीं रहा कि जा कर बेडरूम से कंडोम यानी प्रोटैक्शन ले आते. हलके नशे में मन में खटका जरूर था कि कहीं वह गड़बड़ न हो जाए जिस से बचने के लिए हम लोग शादी के ढाई साल बाद से एहतियात बरत रहे थे. अकसर मन के ऐसे डर सच हो जाते हैं, वही मेरे साथ हुआ. टाइम पर पीरियड्स नहीं आए तो दिल धड़क उठा. स्ट्रिप ला कर प्रैग्नैंसी की पुष्टि की तो मैं तो घबरा उठी, क्योंकि हम दोनों ही अभी अगले 2 साल तक बच्चा नहीं चाहते थे. अनिमेष भी चिंता में पड़ गया और तुरंत कोई फैसला न ले सका कि बच्चा रखें या न.

“आखिर 15 दिन की ऊहापोह और सोचविचारी के बाद हम लोगों ने अबौर्शन कराने का फैसला लिया जो मानसिक रूप से मेरे लिए आसान काम नहीं था लेकिन फिर भी मैं इस के लिए तैयार हो गई क्योंकि प्लान के मुताबिक हमारी फाइनैंशियल पोजीशन ऐसी नहीं थी कि हम लोग बच्चा अफोर्ड कर पाते.

“हालांकि अबौर्शन में कोई परेशानी नही हुई, सबकुछ आराम से हो गया, मुझे पता भी नहीं चला. डाक्टर के मुताबिक तो मैं शाम को भी घर वापस जा सकती थी लेकिन कोई रिस्क उठाना ठीक नहीं समझा इसलिए एक रात हम ने बड़े से अस्पताल के लक्जरी वार्ड में गुजारी जो सहज नहीं थी. शायद, संस्कारों के चलते मन में गिल्ट था. खैर, अब सबकुछ ठीक है और पहले की तरह सामान्य है. लेकिन मन में प्रैग्नैंसी को ले कर एक अजीब सा डर बैठ गया है जिस का असर हमारी सैक्स लाइफ पर भी पड़ रहा है. डर यह कि कहीं एहतियात बरतने के बाद भी मैं प्रैग्नैंट न हो जाऊं जबकि मैं जानती हूं कि यह डर फुजूल है.

“दूसरा डर पहले डर से ज्यादा डरावना है कि कहीं ऐसा न हो कि जब हम बच्चा चाहें तब गर्भ ठहरे ही न. औपरेशन के दौरान कहीं कोई अंदरूनी गड़बड़ न हो गई हो. मम्मी अकसर उन की एक दूर की देवरानी का किस्सा बताया करती थीं कि उन्होंने यों ही सैक्स लाइफ एंजौय करने के लिए अबौर्शन करवा लिया था लेकिन फिर कभी मां नहीं बन सकीं. उन्हें दोतीन बार अपनेआप मिसकैरेज दूसरेतीसरे महीने में ही हो जाता था. लिहाजा, उन्होंने और चाचा ने बच्चे का खयाल ही छोड़ दिया. दो डाक्टर्स से कंसल्ट किया और तमाम चैकअप भी कराए. दोनों ने ही कहा कि कोई दिक्कत नहीं. आप के डर बेकार हैं, आप जब चाहें तब बच्चा प्लान कर सकते हैं.

“हालांकि अनिमेष मुझे हिम्मत बंधाते और हर तरह से समझाते रहते हैं लेकिन मैं अकसर महसूसती हूं कि वे भी पहले की तरह सहज नहीं हैं और उस रात के लिए खुद को दोष देते रहते हैं. अब 2 साल बाद जब प्रैग्नैंट हो कर बच्चे को जन्म दूंगी तभी यह डर पीछा छोड़ेगा.”

केस-2 : 26 वर्षीया आस्था (बदला नाम), जो चेन्नई में एक अंतर्राष्ट्रीय बैंक में कार्यरत है, का अनुभव भी संभावना सरीखा ही है. वह बताती है, “पिछले साल गरमी में मैं और शाश्वत (बदला नाम) एक रिश्तेदार की डैस्टिनेशन मैरिज में शामिल होने ऋषिकेश के पास एक रिजौर्ट में ठहरे थे. रिश्तेदार ने ही ट्रेन का रिजर्वेशन करा दिया था, इसलिए उसी से जाना मजबूरी हो गई थी. सफर लंबा था और मारे गरमी के बुरा हाल हो गया था. रात को ऋषिकेश के भव्य रिजौर्ट के अपने रूम में पहुंचे तो वहां की गुलाबी ठंडक ने हमें मदहोश कर दिया.

डिनर के बाद रूम में पहुंचे थे. बदले मौसम ने हमें यह सोचने का मौका भी नहीं दिया कि पास में कंडोम नहीं है. हम लोग 5 दिन ऋषिकेश घूमेफिरे, शादी अटेंड की. अच्छा यह हुआ कि शाश्वत कंडोंम ले आए थे. पर जो होना था वह पिछली रात ही हो चुका था यानी मैं प्रैग्नैंट हो चुकी थी. इस का पता मुझे चेन्नई पहुंचने के बाद चला. शादी को अभी एक साल ही हुआ था, हम लोग मांबाप बनने की जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहते थे.

भागेभागे डाक्टर के पास गए तो उन्होंने अबौर्शन की सलाह दी जो शाश्वत से सलाह के बाद मैं ने बिना देर किए करवा लिया. लेकिन 10 – 15 दिनों बाद ही पेट में दर्द शुरू हो गया. हलकीहलकी ब्लीडिंग भी हुई तो हम दोनों घबरा गए. फिर डाक्टर के पास भागे तो उन्होंने आश्वस्त किया कि चिंता की या घबराने की कोई बात नहीं, दवाइयों से सब ठीक हो जाएगा. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैं बिलकुल ठीक हो गई हूं. अंदर कुछ गड़बड़ जरूर हो गई है, ऐसा मुझे लगता है और अकसर बिना किसी वजह के डर भी लगता है. कई बार तो लगता है कि अब दोबारा शायद ही प्रैग्नैंसी झेल पाऊंगी.

यह सैकंडरी टोकोफोबिया है

ये दोनों ही मामले दरअसल सैकंडरी टोकोफोबिया नाम की बीमारी के हैं जिस का संबंध शरीर से ज्यादा मन से होता है. चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक, टोकोफोबिया एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है जिस में महिला को प्रैग्नैंसी या डिलीवरी से बहुत ज्यादा चिंता होती है या तेज डर लगता है. इस की वजह उस का पहले का तकलीफदेह अनुभव होता है. संभावना और आस्था इसी सैकंडरी टोकोफोबिया की गिरफ्त में अनजाने में ही सही आ गई थीं. टोकोफोबिया शब्द टोको और फोबिया से मिल कर बना है. टोक का मतलब प्रसव होता है. इस के दूसरे नाम मेसियोफोबिया और पट्युरीफोबिया हैं.

इस हालत में महिला को दोबारा प्रैग्नैंट होने से डर लगने लगता है और वह प्रैग्नैंसी से बचने की कोशिश करती है. कुछ महिलाएं तो सैक्स से ही कतराने लगती हैं. ऐसा तब ज्यादा होता है जब वे पिछले अबौर्शन या डिलीवरी के बारे में सोचने लगती हैं. सोचतेसोचते ही गुजरा हादसा हकीकत सा लगने लगता है जिस से वे घबरा उठती हैं. दिमाग में तरहतरह के खयाल आने लगते हैं जो आमतौर पर नैगेटिव ही होते हैं.

“कुछ दिनों तक तो मैं ढंग से सो ही नहीं पाई थी,” संभावना बताती है, “सोचतेसोचते हार्ट बीट बढ़ जाती थी. सांस तक मुश्किल से ले पाती थी और पसीना भी आने लगता था. ऐसे में अनिमेष मुझे संभालता था. हम दोनों रातरातभर बैठे मोबाइल पर गेम खेलते रहते थे. इस से हमारे कामकाज पर भी असर पड़ने लगा था. अब हालांकि बहुत कुछ कंट्रोल में है लेकिन इसे सबकुछ नहीं कहा जा सकता.

असमंजस में महिलाएं

कभीकभी, अभी भी, यह सोचते घबराहट होने लगती है कि जब जरा से अबौर्शन से यह हालत हो गई तो डिलीवरी में क्या होगा, भले ही फिर वह नौर्मल न हो कर मेरी इच्छा के मुताबिक सिजेरियन हो. कई बार यह भी लगता है कि बच्चे की झंझट ही क्यों पालें, गोद भी तो ले सकते हैं. इस में क्या हर्ज है. फिर लगता है कि अपना बच्चा अपना ही होता है और मेरी मां और सास दोनों की इच्छा है कि मैं वक्त रहते मां बन जाऊं और उन्हें भी नातीपोते खिलाने का सुख और ख़ुशी मिले. इसी डर से उन्हें या किसी को भी अबौर्शन के बारे में नहीं बताया था.

अपनेआप को समझातेसमझाते मैं थक भी जाती हूं और झल्ला भी उठती हूं कि बेमतलब को फसाद मोल ले लिया. उस दिन खुद पर कंट्रोल कर पाते या कंडोम इस्तेमाल कर लेते तो यह नौबत तो न आती.

इन दोनों जैसी कई महिलाओं को ऐसी हालत से रूबरू होना पड़ता है जिस का असर उन के व्यक्तित्व के अलावा कैरियर सहित पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है. कुछ महिलाएं तो इतनी घबरा जाती हैं कि फिर कभी मां न बनने का अप्रिय फैसला बेमन से ले लेती हैं. कई बार यह डर पीटीएसडी यानी पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रैस डिसऔर्डर से भी कनैक्ट रहता है.

पीटीएसडी भी एक मनोस्थिति है जिस में महिला का कोई अनुभव दर्दनाक, भयावह या किसी अप्रिय घटना का गवाह बनने के चलते होता है, मसलन किसी भीषण एक्सिडैंट को देख लेना या हिंसक लड़ाईझगड़ा देख लेना या फिर किसी प्राकृतिक आपदा को देख लेना. ऐसी घटनाएं महिलाओं को मानसिक और भावनात्मक रूप से डिस्टर्ब कर देती हैं.

आस्था और संभावना ने तो खुद अबौर्शन करवाया था लेकिन किसी और वजह से भी अबौर्शन का हो जाना महिला को सैकंडरी टोकोफोबिया का मरीज बना सकता है. संभावना का मामला इस से जुड़ा लगता है क्योंकि उस ने अपनी मम्मी से चाची के अबौर्शन के बारे में सुन रखा था जो उस के अचेतन में कहीं सुरक्षित रखा था.

लेकिन यह कोई खास चिंता की बात नहीं है. सैकंडरी टोकोफोबिया कोई ऐसी स्थिति नहीं है जिस से बचा न जा सके या जिस का इलाज न हो. इस स्थिति का निदान मनोचिकित्सक और गायनीकोलौजिस्ट से होने के बाद इलाज संभव है. इस में आमतौर पर एंटी डिप्रैशन दवाएं डाक्टर्स देते हैं. इस के अलावा सीबीटी यानी काग्निटिव विहेवियोरल थेरैपी भी कारगर साबित होती है. और भी कई थेरैपी फर्क डालती हैं लेकिन सब से अहम है परिवारजनों, खासतौर से पति, का हर स्तर पर सहयोग जो आस्था और संभावना को तो मिला हुआ है लेकिन सभी को मिले, यह जरूरी नहीं.

यह होता है प्राइमरी टोकोफोबिया

अब यह जिम्मेदारी पति की बनती है कि वह पत्नी की दिमागी हालत और परेशानी को समझते उस का सहयोग करे और बच्चे की जिद न करे जो कि पत्नी पर एक बड़े दबाब का काम करता है. सास और ससुराल वालों को टरकाना एक दफा आसान होता है लेकिन पति की इच्छा या दबाब की बहुत ज्यादा अनदेखी पत्नी नहीं कर पाती. इस हालत से गुजर रहीं महिलाएं शारीरिक सबंध बनाने से भी बचने की कोशिश करती हैं. इसलिए पति को समझ और सब्र से काम लेना चाहिए.

यह तो रही एक अप्रिय अनुभव या हादसे की बात लेकिन कई युवतियां बिना इन से रूबरू हुए भी प्रैग्नैंसी या डिलीवरी से डरने लगती हैं जिसे प्राइमरी टोकोफोबिया कहा जाता है. इस में भी युवतियां प्रैग्नैंट होने से डरती हैं जिस से उन की स्थिति सैकंडरी टोकोफोबिया की महिलाओं सरीखी हो जाती है. यह डर आमतौर पर कहेसुने की बिना पर पैदा होता है कि डिलीवरी में असहनीय दर्द होता है और बच्चा मुश्किल से जन्म ले पाता है.

फिल्मों में प्रसव के ऐसे दृश्य इफरात से दिखाए जाते हैं जिन में बच्चे को जन्म दे रही महिला भीषण दर्द से छटपटा रही होती है. उस के दोनों हाथ पीछे पलंग को पकड़े हुए होते हैं, दांत बंधे होते हैं वगैरहवगैरह. इस से डर जाना स्वभाविक है लेकिन यह भी याद रखा जाना चाहिए कि प्रसव भी बेहद स्वाभाविक है लगभग पहली बार के सहवास की तरह जिस के बाद का सुख और तृप्ति सारा दर्द भुला देते हैं.

हरेक युवती को यह भी याद रखना चाहिए कि वह कोई पहली या आखिरी नहीं है जो इस से हो कर गुजरेगी. उस से पहले करोड़ोंखरबों अनगिनत प्रसव सफलतापूर्वक हो चुके हैं. अब तो काफी सहूलियतें, दवाएं और तकनीकें मौजूद हैं जो दर्द से राहत दिलाती हैं वरना एक दौर वह भी था जब महिलाएं एक के बाद एक दर्जनभर तक बच्चों को जन्म देती थीं और उन्हें आराम करने की भी इजाजत न होती थी.

प्राइमरी टोकोफोबिया का इलाज भी सैकंडरी टोकोफोबिया जैसा ही है. इन दोनों से बचने के लिए एक स्वस्थ और व्यस्त दिनचर्या के साथसाथ प्रसव के बारे में जानकारियां हासिल करते रहना है जिस से डर कम हो या खत्म ही हो जाए.

Sex Tips : दूसरी शादी के बाद सैक्स

Sex Tips : दूसरी शादी के बाद सैक्स लाइफ एकदम आसान नहीं होती बल्कि उसे आसान बनाना पड़ता है. अगर समझ और सब्र से काम लिया जाए तो सैक्स लाइफ पहली शादी के मुकाबले ज्यादा बेहतर हो सकती है. आइए जानें इस में पेश आने वाली परेशानियां और उन के हल.

दूसरी शादी किसी के लिए भी एक तरह से नई जिंदगी की शुरुआत होती है लेकिन यह सुखद और सफल तभी होती है जब पतिपत्नी के बीच सैक्स और रोमांस में कोई कमी न हो. आमतौर पर दूसरी शादी करने वाले पुरुष और महिला दोनों इस बात को ले कर शंकित रहते हैं कि अगर वे नए जीवनसाथी के साथ सैक्स में तालमेल नहीं बैठाल पाए तो क्या होगा. दूसरी शादी एक ऐसा जुआ है जिस में जीतहार यानी सफलताअसफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि पतिपत्नी दोनों का यौन व्यवहार कैसा है.

भोपाल के 35 वर्षीय राघवेंद्र की पत्नी का निधन कोरोना के दौरान हो गया था. परिवार के दबाव के चलते उन्हें दूसरी शादी साल 2023 की शुरुआत में करनी पड़ी हालांकि खुद उन की भी इच्छा थी. लेकिन डर इस बात से रहे थे कि बाकी सब तो ठीक है लेकिन क्या पता दूसरी पत्नी के साथ सहज ढंग से सैक्स संबंध बना पाएंगे या नहीं. पेशे से सरकारी नौकर राघवेंद्र की दूसरी पत्नी रंजना भी जौब में थीं.

दिक्कत क्रमांक – 1

सुहागरात को शारीरिक संबंध नहीं बने, केवल औपचारिक बातें होती रहीं. राघवेंद्र बताते हैं-
“मैं ने रंजना को शादी तय होने से पहले ही बता दिया था कि शुरू के कुछ दिन जिन कुछ मामलों में सहज रहना मेरे लिए आसान नहीं होगा, सैक्स उन में से एक होगा. रंजना समझदार थी, सो, समझ गई कि पहली तलाकशुदा को एक दफा भुला देना आसान काम है लेकिन मृतक पत्नी को भूल पाना सहज नहीं होता क्योंकि उस से तमाम तरह के लगाव रहते हैं जो मौत के बाद एकदम खत्म नहीं हो जाते. इस में वक्त लगता है. उस ने एतराज नहीं जताया, न ही इस बारे में ज्यादा सवालजवाब किए.”

जब इन दोनों से अनौपचारिक चर्चा इस प्रतिनिधि द्वारा उन्हीं के घर में बैठ कर की जा रही थी तब दोनों ही, जाहिर है, गोपनीयता बरतने की शर्त पर काफीकुछ बताने के लिए उत्साहित थे. रंजना ने बताया, “इन की मंशा मैं समझ गई थी कि दीदी को भुला पाना इन के लिए कठिन होगा, इसलिए किसी भी बात के लिए मैं इन्हें इंसिस्ट नहीं करना चाहती थी. अगर पुरुष के लिए दूसरी शादी मौका और चुनौती दोनों हैं तो अविवाहित महिला के हिस्से में सिर्फ चुनौतियां ही आती हैं.”

“रंजना से अंतरंग संबंध बनाने में मुझे एक अजीब सी हिचक हो रही थी,” राघवेंद्र बोले, “कुछ था जो हम दोनों के आड़े आ रहा था. शायद वह सुधा की याद थी. मैं ने यह बात शादी के तीसरे दिन ही अंजना को बता भी दी थी तो वह बेहद गंभीरता से बोली थी, ‘कोई बात नहीं, जब आप का मन करे, पतिपत्नी का रिश्ता विश्वास और आपसी अंडरस्टैंडिंग पर टिका होता है.’ यह जवाब मुझे अंदर तक आश्वस्त कर गया था कि मैं बेवजह खुद के और रंजना के साथ ज्यादती कर रहा हूं और उस में यह घर और माहौल भी आड़े आ रहे हैं. लिहाजा, मैं ने तुरंत मनाली जाने के लिए रिजर्वेशन करवा लिए.

“वहां जा कर सारी झिझक और कोई कौम्पलैक्स था तो वे दूर हो गए. 4 दिन हम ने न्यू कपल्स जैसे रोमांस और सैक्स में गुजारे. भोपाल से दिल्ली और वहां से मनाली तक टैक्सी का सफर बेहद सुहाना था. मनाली उतरते ही मुझे जाने क्या हुआ कि मैं टैक्सी से उतर कर सामने वाली मैडिकल शौप से कंडोम का पैकेट खरीद लाया और चुपचाप रंजना को दिखा भी दिया तो उस ने भी एक खास अंदाज में मुसकरा कर बाईं आंख दबा दी, तो मैं तो पगला उठा था.

“अब मुझे उस दिन और उन दिनों के बारे में सोचते ही हंसी आती है. भोपाल वापस आए तो सबकुछ सहज था. आज हमारा बिट्टू सवा साल का होने जा रहा है और हमारी सैक्स लाइफ बहुत बेहतर गुजर रही है जिस में रंजना की समझ, स्मार्ट पहल और धैर्य का बड़ा हाथ है. अगर वह मुंह चढ़ाती, मुझ पर कोई कमैंट करती तो शायद दिक्कत पेश आती.”

इस जोड़े की बातों से समझ यही आता है कि दूसरी शादी के बाद सैक्स करना आसान नहीं होता. पुरुष अगर पत्नी की मौत के बाद शादी करता है तो पहली पत्नी की याद स्वाभाविक रूप से उसे आती है. वह उस की जगह, खासतौर से बिस्तर, किसी और को देते गिल्ट फील कर सकता है. हैरानी की बात इस मानसिकता में यह है कि वह सामाजिक तौर पर उसे पत्नी का दर्जा विधिविधान से दे चुका होता है.

लेकिन अगर यह यानी पहले जीवनसाथी की याद सैक्स संबंधों और रोमांस में बाधक बनने लगे तो बहुत सा वक्त जाया हो जाता है और कई तरह की गलतफहमियां पैदा होती हैं सो अलग.

दिक्कत क्रमांक -2

48 वर्षीय रवि की दूसरी शादी रश्मि से हुई थी. रवि की पहली शादी का अनुभव बेहद कटु रहा था. पत्नी से कलह और अनबन के चलते तलाक हुआ था जिस का मुकदमा कोई 6 साल चला था. तलाक के बाद 42 वर्षीया रश्मि से उन की शादी हुई तो वे थोड़ा डरे हुए थे कि क्या पता, इस अरसे के बाद सहवास कर पाएंगे या नहीं. दूसरे, बढ़ती उम्र और बेतरतीब लाइफस्टाइल के अलावा मुकदमे के तनाव ने उन्हें ब्लडप्रैशर और डाइबिटीज का भी मरीज बना दिया था.

शादी से पहले अपने फिजिशियन को उन्होंने यह समस्या बताई तो उन्हें सलाह मिली कि उम्र और इन बीमारियों को सैक्स से कोई खास संबंध नहीं. कुछ और भी समझाइशें फिजिशियन ने उन्हें दीं जिन में अहम यह थी कि वे कोई वहम न पालें और सैक्सवर्धक दवाओं के झांसे में न आएं.

उधर रश्मि की हालत भी जुदा नहीं थी जिसे रोमांस का तो थोड़ा बहुत था लेकिन सैक्स का कतई तजरबा नहीं था. वह इस उम्र में मां बनने न बनने को ले कर भी हिचक रही थी. वह भी लेडी डाक्टर से मिली थी जिन्होंने यह सलाह दी थी कि इस बारे में शादी के बाद पति से चर्चा कर आगे बढ़ना. हालफ़िलहाल तो सैक्स में कोई दिक्कत नहीं आएगी. इस उम्र में भी मां बना जा सकता है. लेकिन यह शादी से बाद की बात है. अभी तो मन से सारे डर और आशंकाएं निकाल कर एंजौय करो.

दोनों ने अपनेअपने डाक्टर्स की सलाह मानी और आज शादी के 3 साल बाद सुखद वैवाहिक जीवन गुजार रहे हैं. सैक्स में कोई दिक्कत उन्हें पेश नहीं आ रही है. हां, मां बनने के लक्षण रश्मि को कतई नहीं दिखे जिसे ले कर दोनों को कोई गिला नहीं क्योंकि रवि का एक बेटा एक बेटी पहले से ही हैं जो पहली पत्नी की कस्टडी में हैं और महीनेदोमहीने में दोनों उन से मिल भी आते हैं.

इस मामले में दिक्कत उम्र और उम्रजनित बीमारियां थीं जो सैक्स में आड़े नहीं आतीं.

दिक्कत क्रमांक – 3

30 वर्षीय संकेत का तलाक हमउम्र नेहा से हुआ तो उस ने 6 महीने बाद ही अपनी तलाकशुदा सहकर्मी अनन्या से शादी कर ली. ये तीनों ही बेंगलुरु में रहते एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करते हैं. अनन्या और संकेत दोनों को ही सैक्स का अनुभव था, इसलिए उन्हें लग रहा था कोई परेशानी नहीं आएगी. लेकिन दिक्कत उस वक्त हुई जब संकेत बिस्तर में उस की तुलना नेहा से यह कहते करने लगा कि उस के साथ ज्यादा मजा आता था.

यह बात अनन्या को नागवार गुजरी लेकिन वह यह सोच कर खामोश रही कि अभी संकेत और नेहा के तलाक को ज्यादा वक्त नहीं हुआ है, इसलिए उस ने यों ही रौ में आ कर कह दिया होगा. लेकिन हद तो तब हो गई जब वह हर कभी उस के यौन व्यवहार की तुलना नेहा से करने लगा. अनन्या ने उसे रोका और समझाया भी कि मुझे यह तुलना पसंद नहीं. जैसे दो लोगों का सामान्य व्यवहार अलग होता है वैसे ही उन का यौन व्यवहार भी अलग होता है, इसलिए हमें उस से जैसा भी है तालमेल बैठा लेना चाहिए.

संकेत तालमेल नहीं बैठा पाया. उलटे, अनन्या को ही ब्लेम करने लगा कि तुम इतनी पढ़ीलिखी हो, नए जमाने की हो, सौफ्टवेयर इंजीनियर हो लेकिन पति की सैक्स इच्छाओं और अपेक्षाओं को नहीं समझ पा रही हो. जबकि नेहा सबकुछ समझ रही थी कि संकेत का सैक्स करने का तरीका नौर्मल नहीं है. इस आरोप पर भरीभुनी बैठी अनन्या फट पड़ी कि तो जाओ फिर उसी के पास, जब इतना और ऐसेवैसे जैसे तुम चाहो वैसे मजा वह देती थी तो तलाक क्यों दे दिया. मेरे साथ रहना है तो थोड़ा एडजस्ट करना पड़ेगा जैसे मैं कर रही हूं.

अब दोनों की जिंदगी नरक सी हो गई है. एक छत के नीचे अजनबियों जैसे रहने लगे हैं दोनों. बस, दिनरात कंपनी के काम और काम, इस के सिवा कुछ नहीं, न सैक्स न रोमांस. दोनों को ही लगता है कि बेकार में शादी की. सैक्स तो बेंगलुरु जैसे शहर में आसानी से उपलब्ध हो जाता है, फिर गले में यह घंटा वेबजह लटका लिया.

इस मामले में दिक्कत पहले जीवनसाथी के यौन व्यवहार से दूसरे की तुलना ज्यादा है, जो निहायत ही गैरजरूरी है. दूसरे, काम की अधिकता और भावनात्मक लगाव का पैदा न हो पाने के अलावा अपरिपक्वता भी है.

दिक्कत क्रमांक -4

मुंबई की एक कंपनी में नौकरी कर रहे 32 वर्षीय अर्चित का पत्नी छवि से तलाक हुए 2 साल गुजरे थे कि दूसरी शादी एक छोटे शहर या क़सबा कुछ भी कह लें में रहने वाली 28 वर्षीया शोभा से तय हो गई. शोभा मामूली पढ़ीलिखी थी लेकिन थी बेइंतहा ख़ूबसूरत, जो रवि ने पहली बार उसे देखते ही हां कर दी थी. नहीं तो वह दूसरी शादी के लिए भी कोई आधा दर्जन लड़कियां रिजैक्ट कर चुका था. शादी के बाद कुछ दिन मुंबई स्थित अपने फ्लैट में ठहर कर हनीमून के लिए उस ने गोवा जाने का प्लान बनाया था.

मुंबई में पहली ही रात उस का मन कसैला हो उठा जब उसे शोभा की बगलों और प्राइवेट पार्ट के बाल खूंटे से महसूस हुए. क्या पता कैसी गंवार औरत पल्ले पड़ गई, नहीं तो आजकल गांवों तक की लड़कियां इतनी स्मार्ट तो होती हैं कि कम से कम सुहागरात के दिन तो साफसफाई और हाइजिन का खयाल रखें. यह सोचतेसोचते वह आधे रास्ते से वापस आ गया. उधर शोभा बेचारी समझ ही नहीं पाई कि आखिर अर्चित को एकाएक ही यह क्या हो गया जो वह बेरुखी से उठ कर ड्राइंगरूम में जा कर मोबाइल से खेलने लगा.

दोतीन दिन यों ही अनमने से गुजरे. पति की बेरुखी देख शोभा सकते में थी कि उस से क्या गलती हो गई लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. जितने सपने उस ने सुहागरात को ले कर संजोए थे, सब मिटटी में मिल गए. उधर अर्चित भी असमंजस में था कि क्या करे, अगर सलीके से रहना नहीं आता तो इस में शोभा की क्या गलती. हो सकता है उसे इन सब बातों का आइडिया ही न हो और फिर, यह कोई बहुत बड़ी कमी तो नहीं. लिहाजा, उस ने ठंडे दिमाग से सोचते अपनी समस्या हल करने का फैसला लिया. अगली सुबह अर्चित उठा तो उस का मूड बदला हुआ था. उस ने उठते ही शोभा को बांहों में जकड़ लिया.

शोभा बेचारी समझ ही नहीं पाई कि यह कैसा अजीब आदमी है. अभी तक तो सीधेमुंह बात नहीं कर रहा था और अब इफरात से लाड़प्यार और चुंबन बरसा रहा है. चायनाश्ते के दौरान ही अर्चित ने उस से कहा कि चलो, मुंबई घूमने चलते हैं. लंच बाहर ही करेंगे और किसी मौल से तुम्हारे मेकअप के लिए कुछ सामान ले आते हैं. इन में भी तुम्हारे लिए हेयररिमूवर बहुत जरुरी है. बाथरूम में नहातेनहाते शोभा को समझ आया कि क्यों अर्चित ने हेयररिमूवर शब्द पर जोर दिया था. समझ आते ही वह खुद पर झल्ला भी उठी और शर्मा भी उठी कि जल्दबाजी में इस का तो उसे ध्यान ही नहीं रहा जबकि भाभी ने इस तरफ इशारा किया था.

अब दोनों सैक्स लाइफ एंजौय कर रहे हैं और अकसर सुहागरात की इस बात की चर्चा कर हंस भी पड़ते हैं.

इस मामले में दिक्कत पत्नी का थोड़ा पिछड़ा होना था क्योंकि उस का बैकग्राउंड भी ऐसा ही था. इसी तरह जरूरी नहीं कि दूसरी पत्नी का बौद्धिक और शैक्षणिक स्तर भी पहली जैसा हो. इस परेशानी को दूर करने की जिम्मेदारी पति उठाए तो बात बनते देर नहीं लगती.

यह करें बेहतर सैक्स लाइफ के लिए

दूसरी शादी, महिला हो या पुरुष दोनों के लिए, एक तरह का रिस्क ही होती है. इसे निभाने के लिए कई छोटेबड़े समझौते करने दोनों की मजबूरी हो जाती है. कई नागवार बातों को नजरअंदाज भी करना पड़ता है. सैक्स लाइफ पहली शादी की तरह सहज और सामान्य नहीं होती क्योंकि किसी एक पक्ष को इस का अनुभव होता है पर वह अकसर बजाय सहूलियत देने के, दिक्कत पैदा करता है. इस के बाद भी कुछ दिन बीत जाने के बाद आमतौर पर सब सामान्य हो जाता है. थोड़ी दिक्कत तब पेश आती है जब पति या पत्नी के छोटे बच्चे हों.

भोपाल की ही एक बैंककर्मी सविता बताती हैं कि उन की शादी 42 वर्ष की उम्र के बाद तलाकशुदा अमित से हुई थी जिन का पहली पत्नी से 8 साल का बेटा था. पहली ही रात वह हतप्रभ रह गई जब बच्चे को भी सुहाग की सेज पर लेटे देखा. उस ने इसे सहजता से लिया. पति ने भी अपनी मजबूरी दोहराई. दोतीन महीने बाद ही बच्चे की पापा के साथ सोने की आदत छूट गई और सबकुछ ठीक हो गया लेकिन इस के लिए उसे काफी सब्र से काम लेना पड़ा.

कुल जमा दूसरी शादी के बाद सैक्स लाइफ कोई समस्या नहीं रह जाती अगर आप आमतौर पर पेश आने वाली ऊपर बताई कुछ दिक्कतों को समझें और नीचे दी गईं टिप्स पर अमल करें-

  •  सैक्स संबंध बनाने में जल्दबाजी न करें. शुरुआती दिनों में छूना और फोरप्ले करना सहजता की तरफ ले जाता है.
  • सब से पहले दूसरे जीवनसाथी से भावनात्मक परिचय बढ़ाते लगाव पैदा करें.
  • पहले जीवनसाथी की तुलना अव्वल तो किसी भी मसले पर नहीं करना चाहिए पर यौन व्यवहार की तुलना तो कतई नहीं करना चाहिए. इस से दूसरा हर्ट हो सकता है.
  •  दूसरे विषयों की तरह सैक्स पर भी खुल कर बातचीत करना ठीक रहता है.
  • साफसफाई और स्वच्छता का खयाल रखना चाहिए.
  • छोटीमोटी बीमारियां आमतौर पर सैक्स में बाधक नहीं होतीं लेकिन फिर भी अगर मन में शंका हो तो फिजिशियन या मनोचिकित्सक सलाह ले लेनी चाहिए.
  • यह हमेशा याद रखना चाहिए कि पहले या पहली की अब जिंदगी में कोई अहमियत नहीं है, इसलिए उस की याद या जिक्र भी फुजूल है.
  • दूसरी शादी कोई जुर्म नहीं है, इसलिए उसे ले कर मन में कोई गिल्ट नहीं रखना चाहिए.
  • आमतौर पर दूसरी शादी ज्यादा उम्र में ही होती है, इसलिए लाइफस्टाइल का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए, मसलन खानपान, व्यायाम आदि.

Family Story : कृष्णिमा – बाबूजी को किस बात का संदेह था ?

Family Story : ‘‘आखिर इस में बुराई क्या है बाबूजी?’’ केदार ने विनीत भाव से बात को आगे बढ़ाया.

‘‘पूछते हो बुराई क्या है? अरे, तुम्हारा तो यह फैसला ही बेहूदा है. अस्पतालों के दरवाजे क्या बंद हो गए हैं जो तुम ने अनाथालय का रुख कर लिया? और मैं तो कहता हूं कि यदि इलाज करने से डाक्टर हार जाएं तब भी अनाथालय से बच्चा गोद लेना किसी भी नजरिए से जायज नहीं है. न जाने किसकिस के पापों के नतीजे पलते हैं वहां पर जिन की न जाति का पता न कुल का…’’

‘‘बाबूजी, यह आप कह रहे हैं. आप ने तो हमेशा मुझे दया का पाठ पढ़ाया, परोपकार की सीख दी और फिर बच्चे किसी के पाप में भागीदार भी तो नहीं होते…इस संसार में जन्म लेना किसी जीव के हाथों में है? आप ही तो कहते हैं कि जीवनमरण सब विधि के हाथों होता है, यह इनसान के वश की बात नहीं तो फिर वह मासूम किस दशा में पापी हुए? इस संसार में आना तो उन का दोष नहीं?’’

‘‘अब नीति की बातें तुम मुझे सिखाओगे?’’ सोमेश्वर ने माथे पर बल डाल कर प्रश्न किया, ‘‘माना वे बच्चे निष्पाप हैं पर उन के वंश और कुल के बारे में तुम क्या जानते हो? जवानी में जब बच्चे के खून का रंग सिर चढ़ कर बोलेगा तब क्या करोगे? रक्त में बसे गुणसूत्र क्या अपना असर नहीं दिखाएंगे? बच्चे का अनाथालय में पहुंचना ही उन के मांबाप की अनैतिक करतूतों का सुबूत है. ऐसी संतान से तुम किस भविष्य की कामना कर रहे हो?’’

‘‘बाबूजी, आप का भय व संदेह जायज है पर बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में केवल खून के गुण ही नहीं बल्कि पारिवारिक संस्कार ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं,’’ केदार बाबूजी को समझाने का भरसक प्रयास कर रहा था और बगल में खामोश बैठी केतकी निराशा के गर्त में डूबती जा रही थी.

केतकी को संतान होने के बारे में डाक्टरों को उम्मीद थी कि वह आधुनिक तकनीक से बच्चा प्राप्त कर सकती है और केदार काफी सोचविचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि लाखों रुपए क्या केवल इसलिए खर्च किए जाएं कि हम अपने जने बच्चे के मांबाप कहला सकें. यह तो केवल आत्मसंतुष्टि तक सोचने वाली बात होगी. इस से बेहतर है कि किसी अनाथ बच्चे को अपना कर यह पैसा उस के भविष्य पर लगा दें. इस से मांबाप बनने का गौरव भी प्राप्त होगा व रुपए का सार्थक प्रयोग भी होगा.

‘केतकी, बस जरूरत केवल बच्चे को पूरे मन से अपनाने की है. फर्क वास्तव में खून का नहीं बल्कि अपनी नजरों का होता है,’ केदार ने जिस दिन यह कह कर केतकी को अपने मन के भावों से परिचित कराया था वह बेहद खुश हुई थी और खुशी के मारे उस की आंखों से आंसू बह निकले थे पर अगले ही क्षण मां और बाबूजी का खयाल आते ही वह चुप हो गई थी.

केदार का अनाथालय से बच्चा गोद लेने का फैसला उसे बारबार आशंकित कर रहा था क्योंकि मांबाबूजी की सहमति की उसे उम्मीद नहीं थी और उन्हें नाराज कर के वह कोई कार्य करना नहीं चाहती थी. केतकी ने केदार से कहा था, ‘बाबूजी से पहले सलाह कर लो उस के बाद ही हम इस कार्य को करेंगे.’

लेकिन केदार नहीं माना और कहने लगा, ‘अभी तो अनाथालय की कई औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, अभी से बात क्यों छेड़ी जाए. उचित समय आने पर मांबाबूजी को बता देंगे.’

केदार और केतकी ने आखिर अनाथालय जा कर बच्चे के लिए आवेदनपत्र भर दिया था.

लगभग 2 माह के बाद आज केदार ने शाम को आफिस से लौट कर केतकी को यह खुशखबरी दी कि अनाथालय से बच्चे के मिलने की पूर्ण सहमति प्राप्त हो चुकी है. अब कभी भी जा कर हम अपना बच्चा अपने साथ घर ला सकते हैं.

भावविभोर केतकी की आंखें मारे खुशी के बारबार डबडबाती और वह आंचल से उन्हें पोंछ लेती. उसे लगा कि लंबी प्रतीक्षा के बाद उस के ममत्व की धारा में एक नन्ही जान की नौका प्रवाहित हुई है जिसे तूफान के हर थपेडे़ से बचा कर पार लगाएगी. उस नन्ही जान को अपने स्नेह और वात्सल्य की छांव में सहेजेगी….संवारेगी.

केदार की धड़कनें भी तो यही कह रही हैं कि इस सुकोमल कोंपल को फूलनेफलने में वह तनिक भी कमी नहीं आने देगा. आने वाली सुखद घड़ी की कल्पना में खोए केतकी व केदार ने सुनहरे सपनों के अनेक तानेबाने बुन लिए थे.

आज बाबूजी के हाथ से एक तार खिंचते ही सपनों का वह तानाबाना कितना उलझ गया.

केतकी अनिश्चितता के भंवर में उलझी यही सोच रही थी कि मांजी को मुझ से कितना स्नेह है. क्या वह नहीं समझ सकतीं मेरे हृदय की पीड़ा? आज बाबूजी की बातों पर मां का इस तरह से चुप्पी साधे रहना केतकी के दिल को तीर की तरह बेध रहा था.

केदार लगातार बाबूजी से जिरह कर रहा था, ‘‘बाबूजी, क्या आप भूल गए, जब मैं बचपन में निमोनिया होने से बहुत बीमार पड़ा था और मेरी जान पर बन आई थी, डाक्टरों ने तुरंत खून चढ़ाने के लिए कहा था पर मेरा खून न आप के खून से मेल खा रहा था न मां से, ऐसे में मुझे बचाने के लिए आप को ब्लड बैंक से खून लेना पड़ा था. यह सब आप ने ही तो मुझे बताया था. यदि आप तब भी अपनी इस जातिवंश की जिद पर अड़ जाते तो मुझे खो देते न?

‘‘शायद मेरे प्रति आप के पुत्रवत प्रेम ने आप को तब तर्कवितर्क का मौका ही नहीं दिया होगा. तभी तो आप ने हर शर्त पर मुझे बचा लिया.’’

‘‘केदार, जिरह करना और बात है और हकीकत की कठोर धरा पर कदम जमा कर चलना और बात. ज्यादा दूर की बात नहीं, केवल 4 मकान पार की ही बात है जिसे तुम भी जानते हो. त्रिवेदी साहब का क्या हश्र हुआ? बेटा लिया था न गोद. पालापोसा, बड़ा किया और 20 साल बाद बेटे को अपने असली मांबाप पर प्यार उमड़ आया तो चला गया न. बेचारा, त्रिवेदी. वह तो कहीं का नहीं रहा.’’

केदार बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘बाबूजी, हम सब यही तो गलती करते हैं, गोद ही लेना है तो उन्हें क्यों न लिया जाए जिन के सिर पर मांबाप का साया नहीं है कुलवंश, जातबिरादरी के चक्कर में हम इतने संकुचित हो जाते हैं कि अपने सीमित दायरे में ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. संसार में ऐसे बहुत कम त्यागी हैं जो कुछ दे कर भूल जाएं. अकसर लोग कुछ देने पर कुछ प्रतिदान पा लेने की अपेक्षाएं भी मन में पाल लेते हैं फिर चाहे उपहार की बात हो या दान की और फिर बच्चा तो बहुत बड़ी बात होती है. कोई किसी को अपना जाया बच्चा देदे और भूल जाए, ऐसा संभव ही नहीं है.

‘‘माना अनाथालय में पल रहे बच्चों के कुल व जात का हमें पता नहीं पर सब से पहले तो हम इनसान हैं न बाबूजी. यह बात तो आप ही ने हमें बचपन में सिखाई थी कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. अब आप जैसी सोच के लोग ही अपनी बात भुला बैठेंगे तब इस समाज का क्या होगा?

‘‘आज मैं अमेरिका की आकर्षक नौकरी और वहां की लकदक करती जिंदगी छोड़ कर यहां आप के पास रहना चाहता हूं और आप दोनों की सेवा करना चाहता हूं तो यह क्या केवल मेरे रक्त के गुण हैं? नहीं बाबूजी, यह तो आप की सीख और संस्कार हैं. मैं ने बचपन में आप को व मांजी को जो करते देखा है वही आत्मसात किया है. आप ने दादादादी की अंतिम क्षणों तक सेवा की है. आप के सेवाभाव स्वत: मेरे अंदर रचबस गए, इस में रक्त की कोई भूमिका नहीं है और ऐसे उदाहरणों की क्या कमी है जहां अटूट रक्त संबंधों में पनपी कड़वाहट आखिर में इतनी विषाक्त हो गई कि भाई भाई की जान के दुश्मन बन गए.’’

‘‘देखो, मुझे तुम्हारे तर्कों में कोई दिलचस्पी नहीं है,’’ सोमेश्वर बोले, ‘‘मैं ने एक बार जो कह दिया सो कह दिया, बेवजह बहस से क्या लाभ? और हां, एक बात और कान खोल कर सुन लो, यदि तुम्हें अपनी अमेरिका की नौकरी पर लात मारने का अफसोस है तो आज भी तुम जा सकते हो. मैं ने तुम्हें न तब रोका था न अब रोक रहा हूं, समझे? पर अपने इस त्याग के एहसान को भुनाने की फिराक में हो तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो.’’

इतना कह कर सोमेश्वर अपनी धोती संभालते हुए तेज कदमों से अपने कमरे में चले गए. मांजी भी चुपचाप आदर्श भारतीय पत्नी की तरह मुंह पर ताला लगाए बाबूजी के पीछेपीछे कमरे में चली गईं.

थकेहारे केदार व केतकी अपने कमरे में बिस्तर पर निढाल पड़ गए.

‘‘अब क्या होगा?’’ केतकी ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘होगा क्या, जो तय है वही होगा. सुबह हमें अपने बच्चे को लेने जाना है, और मैं नहीं चाहता कि इस तरह दुखी और उदास मन से हम उसे लेने जाएं,’’ अपने निश्चय पर अटल केदार ने कहा.

‘‘पर मांबाबूजी की इच्छा के खिलाफ हम बच्चे को घर लाएंगे तो क्या उन की उपेक्षा बच्चे को प्रभावित नहीं करेगी? कल को जब वह बड़ा व समझदार होगा तब क्या घर का माहौल सामान्य रह पाएगा?’’

अपने मन में उठ रही इन आशंकाओं को केतकी ने केदार के सामने रखा तो वह बोला, ‘‘सुनो, हमें जो कल करना है फिलहाल तुम केवल उस के बारे में ही सोचो.’’

सुबह केतकी की आंख जल्दी खुल गई और चाय बनाने के बाद ट्रे में रख कर मांबाबूजी को देने के लिए बाहर लौन में गई, मगर दोनों ही वहां रोज की तरह बैठे नहीं मिले. खाली कुरसियां देख केतकी ने सोचा शायद कल रात की बहसबाजी के बाद मां और बाबूजी आज सैर पर न गए हों लेकिन उन का कमरा भी खाली था. हो सकता है आज लंबी सैर पर निकल गए हों तभी देर हो गई. मन में यह सोचते हुए केतकी नहाने चली गई.

घंटे भर में दोनों तैयार हो गए पर अब तक मांबाबूजी का पता नहीं था. केदार और केतकी दोनों चिंतित थे कि आखिर वे बिना बताए गए तो कहां गए?

सहसा केतकी को मांजी की बात याद आई. पिछले ही महीने महल्ले में एक बच्चे के जन्मदिन के समय अपनी हमउम्र महिलाओं के बीच मांजी ने हंसी में ही सही पर कहा जरूर था कि जिस दिन हमारा इस सांसारिक जीवन से जी उचट जाएगा तो उसी दिन हम दोनों ही किसी छोटे शहर में चले जाएंगे और वहीं बुढ़ापा काट देंगे.

सशंकित केतकी ने केदार को यह बात बताई तो वह बोला, ‘‘नहीं, नहीं, केतकी, बाबूजी को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वे मुझ पर क्रोधित हो सकते हैं पर इतने गैरजिम्मेदार कभी नहीं हो सकते कि बिना बताए कहीं चले जाएं. हो सकता है सैर पर कोई परिचित मिल गया हो तो बैठ गए होंगे कहीं. थोड़ी देर में आ जाएंगे. चलो, हम चलते हैं.’’

दोनों कार में बैठ कर नन्हे मेहमान को लेने चल दिए. रास्ते भर केतकी का मन बच्चा और मांबाबूजी के बीच में उलझा रहा. लेकिन केदार के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था. उमंग और उत्साह से भरपूर केदार के होंठों पर सीटी की गुनगुनाहट ही बता रही थी कि उसे अपने निर्णय पर जरा भी दुविधा नहीं है.

केतकी का उतरा हुआ चेहरा देख कर वह बोला, ‘‘यार, क्या मुंह लटकाए बैठी हो? चलो, मुसकराओ, तुम हंसोगी तभी तो तुम्हें देख कर हमारा नन्हा मेहमान भी हंसना सीखेगा.’’

नन्ही जान को आंचल में छिपाए केतकी व केदार दोनों ही कार से उतरे. घर का मुख्य दरवाजा बंद था पर बाहर ताला न देख वे समझ गए कि मां और बाबूजी घर के अंदर हैं. केदार ने ही दरवाजे की घंटी बजाई तो इसी के साथ केतकी की धड़कनें भी तेज हो गई थीं. नन्ही जान को सीने से चिपटाए वह केदार को ढाल बना कर उस के पीछे हो गई.

दरवाजा खुला तो सामने मांजी और बाबूजी खडे़ थे. पूरा घर रंगबिरंगी पताकों, गुब्बारों तथा फूलों से सजा हुआ था. यह सबकुछ देख कर केदार और केतकी दोनों विस्मित रह गए.

‘‘आओ बहू, अंदर आओ, रुक क्यों गईं?’’ कहते हुए मांजी ने बडे़ प्रेम से नन्हे मेहमान को तिलक लगाया. बाबूजी ने आगे बढ़ कर बच्चे को गोद में लिया.

‘‘अब तो दादादादी का बुढ़ापा इस नन्हे सांवलेसलौने बालकृष्ण की बाल लीलाओं को देखदेख कर सुकून से कटेगा, क्यों सौदामिनी?’’ कहते हुए बाबूजी ने बच्चे के माथे पर वात्सल्य चिह्न अंकित कर दिया.

बाबूजी के मुख से ‘बालकृष्ण’ शब्द सुनते ही केदार और केतकी ने एक दूसरे को प्रश्न भरी नजरों से देखा और अगले ही पल केतकी ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘लेकिन बाबूजी, यह बेटा नहीं बेटी है.’’

‘‘तो क्या हुआ? कृष्ण न सही कृष्णिमा ही सही. बच्चे तो प्रसाद की तरह हैं फिर प्रसाद चाहे लड्डू के रूप में मिले चाहे पेडे़ के, होगा तो मीठा ही न,’’ और इसी के साथ एक जोरदार ठहाका सोमेश्वर ने लगाया.

केदार अब भी आश्चर्यचकित सा बाबूजी के इस बदलाव के बारे में सोच रहा था कि तभी वह बोले, ‘‘क्यों बेटा, क्या सोच रहे हो? यही न कि कल राह का रोड़ा बने बाबूजी आज अचानक गाड़ी का पेट्रोल कैसे बन गए?’’

‘‘हां बाबूजी, सोच तो मैं यही रहा हूं,’’ केदार ने हंसते हुए कहा.

‘‘बेटा, सच कहूं तो आज मैं ने बहुत बड़ी जीत हासिल की है. मुझे तुझ पर गर्व है. यदि आज तुम अपने निश्चय से हिल जाते तो मैं टूट जाता. मैं तुम्हारे फैसले की दृढ़ता को परखना चाहता था और ठोकपीट कर उस की अटलता को निश्चित करना चाहता था क्योंकि ऐसे फैसले लेने वालों को सामाजिक जीवन में कई अग्नि परीक्षाएं देनी पड़ती हैं.’’

‘‘समाज में तो हर प्रकार के लोग होते हैं न. यदि 4 लोग तुम्हारे कार्य को सराहेंगे तो 8 टांग खींचने वाले भी मिलेंगे. तुम्हारे फैसले की तनिक भी कमजोरी भविष्य में तुम्हें पछतावे के दलदल में पटक सकती थी और तुम्हारे कदमों का डगमगाना केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बल्कि आने वाली नन्ही जान के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता था. बस, केवल इसीलिए मैं तुम्हें जांच रहा था.’’

‘‘देखा केतकी, मैं ने कहा था न तुम से कि बाबूजी ऐसे तो नहीं हैं. मेरा विश्वास गलत नहीं था,’’ केदार ने कहा.

‘‘बेटा, तुम लोगों की खुशी में ही तो हमारी खुशी है. वह तो मैं तुम्हारे बाबूजी के कहने पर चुप्पी साधे बैठी रही, इन्हें परीक्षा जो लेनी थी तुम्हारी. मैं समझ सकती हूं कि कल रात तुम लोगों ने किस तरह काटी होगी,’’ इतना कह कर सौदामिनी ने पास बैठी केतकी को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘वह तो ठीक है मांजी, पर यह तो बताइए कि सुबह आप लोग कहां चले गए थे. मैं तो डर रही थी कि कहीं आप हरिद्वार….’’

‘‘अरे, पगली, हम दोनों तो कृष्णिमा के स्वागत की तैयारी करने गए थे,’’ केतकी की बातों को बीच में काटते हुए सौदामिनी बोली, ‘‘और अब तो हमारे चारों धाम यहीं हैं कृष्णिमा के आसपास.’’

सचमुच कृष्णिमा की किलकारियों में चारों धाम सिमट आए थे, जिस की धुन में पूरा परिवार मगन हो गया था. Family Story

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