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Hindi Story: अनुष्ठान- अचूक उपाय

Hindi Story: रूही की पग फिराई की रस्म होते ही सुधा घर में एकदम अकेली रह गई थी. बीते जीवन की स्मृतियां मन के सूने आंगन में दस्तक दिए जा रही थी. वह चाह कर भी उन्हें रोक नहीं पा रही थी. 15 बरस पहले 6 साल की रूही का हाथ पकड़ कर सुधा ससुराल की दहलीज लांघ कर मायके वापस आ गई थी. कारण था लड़के को जन्म नहीं देना. सासससुर ने उस के पति पर दूसरी शादी का दबाव बना रखा था. पति ऐसा नहीं चाहते थे, लेकिन मांबाप की बात नहीं टाल पा रहे थे.

महीनों तक चली कशमकश के बाद सुधा ने उस घर को छोड़ने का फैसला ले लिया था. ससुराल वाले तो यही चाहते थे. आपसी सहमति से तलाक हो गया. उस के मातापिता ने उस के फैसले में उस का साथ तो दिया, किंतु सामाजिक निंदा ने उन के दिल पर इतनी गहरी चोट दी कि कुछ ही सालों में दुनिया को अलविदा कह गए.

भाभी के तानों और भाई की बेरुखी से तंग आ कर सुधा ने दूसरे शहर में एक विद्यालय में शिक्षिका के पद पर आवेदन कर दिया. अब उसी विद्यालय में उस की नौकरी पक्की हो गई थी.

रूही की शादी के लिए ली गई छुट्टियां खत्म होने वाली थीं. घर में कहीं भी कदम रखती तो रूही नजर आ जाती. खयालों से एक पल के लिए भी रूही को निकाल नहीं पा रही थी. परछाईं की तरह हर समय उस के साथ रहने वाली रूही अब दूसरे घर की रौनक बन गई थी. जब से होश संभाला था, उस ने मातापिता के रूप में सुधा को ही देखा था. जाने कहां से इतनी समझ आ गई थी कि कभी किसी बात के लिए जिद ही नहीं की. शादी के लिए भी विचार अलग ही थे उस के. टीवी सीरियल वाला संयुक्त परिवार उसे पसंद था. आधुनिक, किंतु संस्कारी बहू कैसे हर समस्या का समाधान ढूंढ़ लेती थी, उसे भी वैसा ही कुछ करना था. कुछ भी कर के अपने घर को टूटने नहीं देना था बस. पूजा, पाठ और अनुष्ठान कर के अपने घर से हर बुरी बला को दूर रखना था.

सुधा ने अपने तरीके से कई बार समझाने की कोशिश की कि आज के समय में आत्मनिर्भर होना शादी करने से ज्यादा जरूरी है, लेकिन रूही के विचार नहीं बदले.

दोस्तों के घर माता का जागरण होता तो उसे काम मिल जाता. पूरी तन्मयता से सहयोग करती. शादी तो उस का प्रिय इवेंट हुआ करता था. सुधा जब भी कहती कि लड़कियों को केवल शादी कर के घर ही नहीं संभालना होता है, बल्कि अपना अस्तित्व भी पहचानना होता है.

आज का समय औरत और मर्द के विस्तृत दायरे का है. औरत को भी पूरा हक है अपनी काबिलीयत के अनुसार मुकाम हासिल कर के अच्छा जीवन बिताने का. लेकिन रूही पर कोई असर नहीं होता. हर बात वह हंस कर टाल देती,”मां तुम्हारी नौकरी तो अब पक्की हो गई है ना. शादी के बाद कुछ ऊंचनीच हो गई तो तुम्हारे पास रह लूंगी. तुम्हारा खाना, कपड़े, बरतन सब काम संभाल लूंगी.”

यह सुन कर सुधा उसे गले से लगा लेती. उस ने भी कभी दबाव नहीं बनाया रूही के ऊपर. वह खुद को समझा लेती कि रूही भले ही उस की परछाईं हो, लेकिन उस की किस्मत और उस की सोच दोनों अलग हैं. हो सकता है कि एक संयुक्त परिवार में वह बेहतर सामंजस्य बैठा पाए. क्या पता उस की धार्मिक कार्यों में इतनी सक्रियता से ऊपर वाले का ध्यान उस पर चला जाए और उस की जिंदगी की कहानी सुधा से अलग लिखी जाए. यही कारण था कि ग्रेजुएशन होते ही रूही के लिए आए एक संयुक्त परिवार के रिश्ते को सुधा ने तुरंत हां कह दिया.

परिवार में दो भाई ही थे. बड़ा भाई विवाहित था. छोटे भाई के लिए उन्होंने रूही का हाथ मांगा था. दोनों भाई पैतृक व्यवसाय में लगे हुए थे अपने पिता के साथ.

दादा ने व्यवसाय खड़ा किया था. अब भी बीचबीच में औफिस जाते रहते थे. दादी सास अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति वाली थीं. जैसी रूही ने ससुराल की कल्पना की थी, वैसा ही परिवार था, इसलिए उसे तो कोई एतराज था ही नहीं.
छुट्टियां खत्म हो गई थीं. सुधा ने फिर से विद्यालय जाना प्रारंभ कर दिया था. सालभर चलने वाले त्योहारों के बारे में सुधा को सोचने की जरूरत नहीं पड़ी.

रूही की ससुराल से फोन आ जाता कि हमारे घर में यह रस्म इस तरह अदा होती है. सुधा वैसा ही मान लेती.

होली पर रूही उस के पास आई थी. क्योंकि पहली होली पर उन के परिवार की परंपरा के अनुसार बहू अपने घर ही रहती थी. उस की ससुराल से नेग आना था. सुधा इस बात से ही खुश थी कि इसी बहाने रूही से तसल्ली से बात तो हो जाएगी.

रूही ने बताया कि वहां पर सब निर्णय पंडितजी से पूछ कर लिए जाते हैं. बहुएं सुबह नहाधो कर पहले मंदिर में पूजा करने जाती हैं, उस के बाद घर के काम करती हैं.

उस के ददिया ससुर ने घर के सामने ही एक छोटा सा मंदिर बनवाया हुआ था. एक पुजारी भी रखा हुआ था. उस की जेठानी अभी पंडित के निर्देशानुसार संतान प्राप्ति के लिए अखंड पाठ कर रही थी. दादी सास अपने पूजा, व्रत, पाठ आदि में रूही को साथ रखती थी. वही उन्हें व्रत के विधान और व्रत, कथा पढ़ कर सुनाती थी. घर के सभी मर्द व्यवसाय में व्यस्त रहते. समय होता तो पूरा परिवार साथ में कहीं घूमने चला जाता.

रूही के पति शोभित से उस की अब तक सीमित बातचीत ही हुई थी. होली के अगले दिन ही रूही के दादा ससुर और उस के जेठ उसे वापस ससुराल लिवा ले गए. सुधा भी अपने विद्यालय में व्यस्त हो गई. अब पहले से अधिक समय विद्यालय को देने लगी थी. शिक्षण के साथसाथ दूसरी जिम्मेदारियां भी उस ने संभाल ली थीं. व्यस्तता बढ़ने से दिनचर्या अव्यवस्थित हो गई थी. लेकिन समय निकल रहा था. रूही के साथ औपचारिक बातचीत ही होती थी. घर में रहते हुए वह खुल कर बात नहीं कर पाती थी. सुधा ने भी धीरेधीरे अपने मन को समझा लिया कि रूही ने अपनी ससुराल में सामंजस्य बैठा लिया है. उसे ज्यादा फोन कर के संतुलन में अवरोध उत्पन्न नहीं करना चाहिए.

एक दिन सुधा विद्यालय से घर आई, तो सिर में अचानक दर्द होने लगा. उस ने चाय बना कर पी ली, फिर भी शरीर निढाल सा हो रहा था. थर्मामीटर में देखा तो बुखार था. परिचित डाक्टर को फोन किया, तो वो घर आ कर निरीक्षण के उपरांत दवा दे कर चले गए. साथ में आराम करने और खानपान व्यवस्थित रखने की सलाह भी दे कर गए.

सुधा का मन हो रहा था कि इस समय रूही उस के पास आ कर रहे. इसी उम्मीद से उस ने उस की सास के पास फोन किया. उन्होंने बताया कि दादी सुंदरकांड सुन रही हैं. रोज रूही उन को पढ़ कर सुनाती है. अभी और एक महीना पाठ चलेगा, तब तक रूही घर से कहीं नहीं जा सकती है.

सुधा ने दवा ली और मुंह ढक कर लेट गई. आंख खुली तो दरवाजे की घंटी जोरजोर से बज रही थी. उस ने देखा तो रूही अपने दादा ससुर और ड्राइवर के साथ घर के बाहर खड़ी थी.
दरवाजा खोला तो सब अंदर आए. रूही मां के साथसाथ अंदर आ गई. लिपट गई सुधा से.

“मां मेरे जाने का यह मतलब तो नहीं कि आप अपना ध्यान ही नहीं रखें और बीमार हो जाएं,” सुन कर सुधा मुसकरा दी और बोली,” अब ठीक हो जाऊंगी, तुम से मिल ली हूं ना. बहुत दिनों से मन था मिलने का.”

“अच्छा तो मुझे बुलाने का सब नाटक था,” कह कर रूही जोर से हंस पड़ी. उस ने बताया कि वह जिद कर के बस मां को देखने के लिए आई है. आज ही वापस जाना है. जातेजाते अगले महीने अधिक समय तक रुकने को बोल कर गई. सुधा के शरीर में जैसे जान सी आ गई थी. दिन गिनगिन कर एक महीना निकाल लिया उस ने.

रूही को बस एक हफ्ते का कह कर भेजा उस की ससुराल वालों ने. घर पर आते ही उस ने सब गहनेकपड़े उतार कर रख दिए और अपनी शादी से पहले की एक ड्रेस पहन ली. 2 दिन तक तो वह सोती ही रही. सुधा ने भी कुछ नहीं कहा.

उस दिन सुधा की छुट्टी थी. उस ने रूही की पसंद का नाश्ता बना कर उसे जगाया. दोनों साथ बैठ कर नाश्ता कर रही थी. अचानक ही रूही बोली, “मां, मुझे वहां वापस मत भेजना,” यह सुन सुधा चौंक गई, सोचा, ‘मजाक कर रही होगी.’ फिर भी उस ने पूछा, “पर क्यों? तुम्हारी पसंद की सीरियल वाली ससुराल है.”

रूही की आंखों से टपटप आंसू गिर रहे थे. वह बोली, “यही तो समस्या है मां, सीरियल वाली ससुराल सीरियल में ही अच्छी लगती है. वास्तविकता में उस मे नहीं रहा जा सकता है,” कह कर रूही तो चुप हो गई, लेकिन सुधा के पैरों के नीचे से जमीन निकल गई. उस ने बात जारी रखते हुए पूछा, “पर, हुआ क्या? खुल कर बताओ.”

अब तो रूही और भी जोर से रोने लगी. सुधा ने उसे चुप कराया. बहुत देर बाद उस ने मुंह खोला,” मां, शोभित ने मुझ से शादी सिर्फ अपने परिवार को खुश करने के लिए की है. वह पहले ही कोर्ट में अपनी एक महिला दोस्त से शादी कर चुका था. वे दोनों विदेश जाने वाले थे, लेकिन घर में पता चल गया. घर वाले उस शादी को नहीं मानते हैं, वो चाहते हैं कि मैं पूजापाठ से, तंत्रमंत्र से उसे वश में कर लूं, जिस से वो उस लड़की से तलाक ले ले.”

सुधा की तो जैसे चेतना ही शून्य हो गई थी यह सब सुन कर. फिर भी उस ने खुद पर नियंत्रण रखते हुए रूही से पूछा, “बेटा, वे लोग तुम्हारे साथ हैं तो हो सकता है कि सब ठीक हो जाए और शोभित तुम्हें पत्नी स्वीकार कर ले.”

रूही ने सुधा की ओर ऐसे देखा, जैसे कहना चाह रही हो, “मां, ऐसे चमत्कार नहीं होते हैं.” सुधा परेशान तो नहीं, हैरान थी. भारतीय समाज की प्रगति के बारे में सोच कर. बस पूजा करने के तरीके आधुनिक हो गए हैं. पुजारी का मन और मंशा आज भी वही है. रूही भी आज उसी दोराहे पर खड़ी है, जहां सालों पहले वह खड़ी थी. सुधा बेटा नहीं दे पाई और रूही बेटा नहीं लौटा पा रही है. तभी रूही बोल पड़ी, जैसे कुछ याद आ गया हो, “मां, मेरी ससुराल वाले मेरे साथ नहीं, पंडित के साथ हैं. मेरी जेठानी को उन की पूजा से बेटा हो गया है, इसलिए वो लोग फिर से अनुष्ठान करना चाहते हैं. पर, मैं नहीं करना चाहती. यदि शोभित वापस आ भी गया तो फिर बेटा पैदा करने के लिए अनुष्ठान करना होगा. मुझ से यह सब नहीं होगा मां,” कह कर रूही तो उठ कर चली गई, लेकिन सुधा आंखें बंद कर के बैठ गई. एक निर्णय उस ने ले लिया था कि रूही कोई समझौता नहीं करेगी. वह आज ही रूही को वकील से मिलवाने ले कर जाएगी. लेकिन एक बात उसे समझ नहीं आ रही थी कि ऊपर वाले ने रूही की किस्मत भी उस के जैसी क्यों लिख दी थी? क्या ऊपर वाला भी अनुष्ठान करने से प्रभावित हो जाते हैं? क्यों हर बार औरत ही शिकार होती है? गलती मर्द करे और सुधार के लिए अनुष्ठान औरत करे. बेटे के जन्म के लिए जिम्मेदार मर्द है और जिंदगीभर दुख औरत उठाती है. आखिर कब यह मानसिकता बदलेगी? किस दिन एक औरत अपने तरीके से अपने जीवन को जी सकेगी?

रूही शादी से पहले वाले अपने कपड़े पहने सामने खड़ी थी. हाथ में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की एक किताब थी, जो उस ने खुद ही खरीदी थी.

“मां, मैं अपना अनुष्ठान शुरू कर रही हूं. आप को मेरा साथ देना होगा,” रुही की आत्मविश्वास से भरी आवाज सुन कर सुधा ने ऊपर की ओर देखा, “तेरे अनुष्ठान का तरीका बदल रही हूं, बस तुम मेरा साथ देना.”

” तथास्तु,” यह रूही की आवाज थी. Hindi Story.

लेखिका -अर्चना त्यागी

Israel Hamas Ceasefire: ट्रंप की 20 सूत्रीय गाज़ा शान्ति योजना – क्या थमेगा युद्ध?

Israel Hamas Ceasefire: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 20 सूत्री ग़ज़ा शान्ति योजना ने अंतर्राष्ट्रीय पटल पर हलचल मचा दी है. ट्रंप ने इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मौजूदगी में ग़ज़ा में शांति का प्रस्ताव रखा है. कहा जा रहा है कि 20 बिंदुओं पर आधारित इस शांति योजना के तहत ग़ज़ा में लड़ाई रुक जाएगी, इज़राइली बंधक रिहा होंगे, हमास का निशस्त्रीकरण होगा और ग़ज़ा के प्रशासन के लिए एक अंतरराष्ट्रीय ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ गठित किया जाएगा, जिसमें ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर भी शामिल होंगे.

बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप की योजना का समर्थन तो किया है मगर उन्होंने गेंद फिलहाल हमास के पाले में डाल दी है और कहा है कि अगर योजनानुसार हमास सारी शर्तें मान लेता है तो इससे इज़राइल के वे मकसद पूरे होंगे जिनके लिए ये युद्ध शुरू हुआ था.

हमास ने इस योजना पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. उसने कहा है कि उसे हफ्ते भर का वक्त लगेगा क्योंकि वो इसकी समीक्षा में जुटा है. ट्रंप ने कहा है कि इस शांति योजना के तहत, यदि सभी शर्तें पूरी होती हैं तो भविष्य में फ़िलिस्तीन राष्ट्र के निर्माण का रास्ता भी खुल सकता है. पर हमास यदि इस योजना को स्वीकार नहीं करता है तो इसका बहुत बुरा अंजाम होगा. हालांकि, नेतन्याहू ने भी साफ़ कह दिया है कि वे ट्रंप-योजना का समर्थन करते हैं मगर इसका मतलब फ़िलिस्तीन राष्ट्र का निर्माण करना नहीं है और यदि ऐसा होता है तो इज़राइल इसका पूरी ताकत से विरोध करेगा.

विश्लेषक मानते हैं कि यदि नेतन्याहू इस शांति समझौते को पूरी तरह मान लेते हैं और यह लागू हो जाता है तो वे घरेलू स्तर पर फंस जाएंगे. दरअसल, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी कई कट्टरवादी पार्टियों के साथ सरकार चला रही है. ये दल ग़ज़ा से किसी भी सूरत में पीछे हटना नहीं चाहते हैं. इन दलों में वित्त मंत्री बेज़ेलेल स्मोट्रिच की पार्टी भी शामिल है जिसके पास 14 सीटें हैं. ट्रंप की शांति योजना के केंद्र में ग़ज़ा को क़ब्ज़े से मुक्त करना है. ये स्मोट्रिच जैसे नेताओं को कभी भी स्वीकार्य नहीं होगा. नेतन्याहू के अमेरिका जाने से पहले ही स्मोट्रिच ने कह दिया था कि कुछ चीजों पर समझौता नहीं करना है. इनमें ग़ज़ा से इज़राइली सेना का पीछे हटना भी शामिल है.

उधर हमास ने कहा है कि वह निशस्त्रीकरण की मांग को खारिज करता है. इसके साथ किसी भी हमास कार्यकर्ता या नागरिक को ग़ज़ा से बाहर भेजने का प्रस्ताव भी उन्हें स्वीकार नहीं है. हमास ग़ज़ा से इज़राइल की वापसी की गारंटी भी चाहता है और इसे वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लिखित में चाहता है. हमास ने मांग की है कि शांति समझौते पर यदि दोनों ओर से हस्ताक्षर होते हैं तो उसके बाद ग़ज़ा के भीतर या बाहर हमास नेताओं की टारगेट किलिंग न हो.

नेतन्याहू और हमास दोनों ही अपनी-अपनी शर्तों पर डटे हुए हैं, जो एक-दूसरे के जबरदस्त विरोधी हैं. ऐसे में योजना अमल में लाई जाएगी और लाई जाएगी तो कितने संशोधनों और कितने समय बाद आएगी, यह कहना मुश्किल है. शान्ति की चर्चा के बीच भी इज़राइल ग़ज़ा पर लगातार हमले कर रहा है. पहली अक्टूबर को उसने ग़ज़ा में दो बार हमले किया जिसमें 16 फिलिस्तीनी नागरिक मारे गए. ये हमले ईस्ट जैतून इलाके में स्थित अल-फलाह स्कूल में हुए, जिसमें विस्थापितों को रखा गया था.

ट्रंप की योजना पर नेतन्याहू सहमति तो दे रहे हैं, लेकिन उन्हें इस बात की भी पूरी आशंका है कि इसके बाद उनके लिए इज़राइल का प्रधानमंत्री बने रहना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि जो यहूदी दल उनका समर्थन कर रहे हैं, वे किसी भी सूरत में ग़ज़ा पर इज़राइली क़ब्ज़ा छोड़ने के लिए सहमत नहीं हैं.

नेतन्याहू पर बंधकों के परिजनों का भी दबाव है. संयुक्त राष्ट्र में उन्होंने अपना भाषण बंधकों के परिवारों को संबोधित करते हुए शुरू किया था. उन्होंने बार बार बंधकों को सम्बोधित कर कहा – आप हमारी यादों में है.

ऐसे में ट्रंप की मेहनत सफल होगी, ग़ज़ा में शांति आएगी और नए फिलिस्तीन राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया शुरू होगी, ऐसी संभावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है. दरअसल न तो हमास इज़राइल पर भरोसा करता है और न ही इज़राइल हमास पर. धर्म ने दोनों को अपनी अपनी संकुचित सोच में जकड़ रखा है. इज़राइल ने तो फिर भी ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में तरक्की की है, मगर यहूदी मानसिकता इस्लाम को हीन दृष्टि से देखना नहीं छोड़ सकती है. हमास की सोच भी वही सदियों पुरानी रूढ़ियों में धंसी हुई है, जो औरत को मर्द का गुलाम और जंग को अपना नसीब समझते हैं.

ऐसा नहीं है कि ग़ज़ा में शांति स्थापित करने की बात पहली बार हो रही है. संघर्ष विराम इससे पहले भी कई बार हुए हैं मगर वे बहुत कारगर नहीं रहे. इस बार भी संशय बरकरार है. नेतन्याहू शायद ये मानकर चल रहे हों कि हमास इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा. ऐसी स्थिति में वो और अधिक आक्रामक कार्रवाई को भी ये कहकर तर्कसंगत ठहरा सकेंगे कि उन्होंने मौका दिया था लेकिन हमास ही शांति नहीं चाहता. ऐसा लग रहा है कि नेतन्याहू हमास के प्रस्ताव को रद्द कर देने पर निर्भर हैं. यदि हमास प्रस्ताव को नकार देता है तो जैसा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है, इज़राइल को अमेरिका का भी पूरा सहयोग मिलेगा.

ग़ज़ा में शांति बहाली के प्रयास कतर भी कर रहा था, मगर 9 सितम्बर को इज़राइल ने कतर की राजधानी दोहा में मौजूद हमास के ठिकानों पर हमला कर दिया जिसमें एक कतर नागरिक भी मारा गया. इसके बाद कतर ने अपने पैर पीछे खींच लिए. हालांकि पिछले दिनों नेतन्याहू ने व्हाइट हाउस में ट्रंप से मुलाक़ात के दौरान उनके दबाव में कतर के प्रधानमंत्री (विदेश मंत्री भी) शेख़ मोहम्मद बिन अब्दुर्रहमान बिन जासिम अल थानी को फ़ोन करके हमले पर खेद जताते हुए माफ़ी भी मांग ली है. नेतन्याहू ने कतर से ये भी कहा कि भविष्य में इजराइल क़तर राष्ट्र की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं करेगा. इस फोन कॉल के बाद जारी एक बयान में कतर ने कहा है कि वह ग़ज़ा में शांति स्थापित करने के लिए मध्यस्थता के लिए तैयार है.

डोनाल्ड ट्रंप इस शांति बहाली की अगुवाई कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने कई मुस्लिम राष्ट्राध्यक्षों से बात की है, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल है. क़तर, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, तुर्की, सऊदी अरब, मिस्र ने ट्रंप योजना का स्वागत और समर्थन किया है. इनके अलावा यूरोपीय देश जैसे, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, रूस आदि ने भी इस योजना का स्वागत किया है. फिर डोनाल्ड ट्रंप को शांति का नोबेल पुरस्कार भी पाने की भी गजब की उत्कंठा है, और अब तो उन्होंने यहां तक कह दिया है कि यदि उन्हें नोबेल नहीं मिलता है तो यह पूरे अमेरिका का अपमान होगा.

हमास की गलती और आम नागरिकों की तबाही

7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इज़राइल पर हमला किया था और 12 सौ से अधिक इज़राइली नागरिकों की हत्या की थी और 250 से अधिक को बंधक बना लिया था. हमास का इज़राइल पर हमला लम्बे समय से चले आ रहे फिलिस्तीनी असंतोष, अल-अक्सा मस्जिद विवाद, ग़ज़ा की नाकेबंदी और इज़राइल की आतंरिक कमजोरी का नतीजा था. लेकिन इसकी भयानक कीमत दोनों पक्षों – इज़राइल और ग़ज़ा के आम नागरिकों को चुकानी पड़ी.

7 अक्टूबर के हमले के बाद इज़राइल ने ग़ज़ा में हमास को खत्म करने के मकसद से जवाबी सैन्य अभियान शुरू किया था. इस अभियान में अब तक 66 हज़ार से अधिक फ़िलिस्तीनी नागरिक मारे गए हैं. इनमें से आधे से अधिक बच्चे और महिलाएं हैं. इसके अलावा 1 लाख 68 हज़ार से अधिक फ़िलिस्तीन घायल हुए हैं.

उल्लेखनीय है कि ग़ज़ा पट्टी वर्ष 2007 से इज़राइल और मिस्र की कड़ी नाकाबंदी में है. वहां लम्बे समय से बड़ा मानवीय संकट है. बिजली, पानी, रसद की भारी कमी और असुरक्षा का माहौल है, और हमास इससे ग़ज़ा-पट्टी को आज़ाद करना चाहता है.

मगर 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इज़राइल पर अचानक हमला करके सबसे बड़ी गलती कर दी जिसके बाद शुरू हुए इज़राइल-हमास युद्ध का खामियाजा 66 हज़ार से अधिक फ़िलिस्तीनी लोगों ने अपनी जान गवां कर चुकाया. हमास के हमले से इज़राइल को खुला कारण मिल गया ग़ज़ा पर बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाने का. इस जंग में दोनों ओर के आम नागरिक हताहत हुए. मगर ग़ज़ा-पट्टी में बसने वालों की तबाही के मंजर दिल दहलाने वाले थे. मरने वाले और घायलों में बहुत बड़ी संख्या बच्चों और महिलाओं की है. अनेक बच्चे, बूढ़े, युवा और महिलायें अपंग हो गए. घर के घर तबाह हो गए. रोटियों के लाले पड़ गए. हमास की एक दिन की कार्रवाई ने फ़िलिस्तीनियों पर बरसों का दर्द और तबाही थोप दी. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का बड़ा हिस्सा हमास की कार्रवाई को आतंकवादी हमला मान बैठा, जिससे फ़िलिस्तीन की आम जनता के प्रति उनकी सहानुभूति कम हो गई. Israel Hamas Ceasefire

Family Story In Hindi: तब और अब- रमेश की नियुक्ति क्यों गलत समय पर हुई थी?

Family Story In Hindi: पिछले कई दिनों से मैं सुन रहा था कि हमारे नए निदेशक शीघ्र ही आने वाले हैं. उन की नियुक्ति के आदेश जारी हो गए थे. जब उन आदेशों की एक प्रतिलिपि मेरे पास आई और मैं ने नए निदेशक महोदय का नाम पढ़ा तो अनायास मेरे पांव के नीचे की जमीन मुझे धंसती सी लगी थी.

‘श्री रमेश कुमार.’

इस नाम के साथ बड़ी अप्रिय स्मृतियां जुड़ी हुई थीं. पर क्या ये वही सज्जन हैं? मैं सोचता रहा था और यह कामना करता रहा था कि ये वह न हों. पर यदि वही हुए तो…मैं सोचता और सिहर जाता. पर आज सुबह रमेश साहब ने अपने नए पद का भार ग्रहण कर लिया था. वे पूरे कार्यालय का चक्कर लगा कर अंत में मेरे कमरे में आए. मुझे देखा, पलभर को ठिठके और फिर उन की आंखों में परिचय के दीप जगमगा उठे.

‘‘कहिए सुधीर बाबू, कैसे हैं?’’ उन्होंने मुसकरा कर कहा.

‘‘नमस्कार साहब, आइए,’’ मैं ने चकित हो कर कहा. 10 वर्षों के अंतराल में कितना परिवर्तन आ गया था उन में. व्यक्तित्व कैसा निखर गया था. सांवले रंग में सलोनापन आ गया था. बाल रूखे और गरदन तक कलमें. कत्थई चारखाने का नया कोट. आंखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा लग गया था. सकपकाहट के कारण मैं बैठा ही रह गया.

‘‘तुम अभी तक सैक्शन औफिसर ही हो?’’ कुछ क्षण मौन रहने के बाद उन्होंने प्रश्न किया. क्या सचमुच उन के इस प्रश्न में सहानुभूति थी अथवा बदला लेने की अव्यक्त, अपरोक्ष चेतावनी, ‘तो तुम अभी तक सैक्शन औफिसर हो, बच्चू, अब मैं आ गया हूं और देखता हूं, तुम कैसे तरक्की करते हो?’

‘‘सुधीर बाबू, तुम अधिकारी के सामने बैठे हो,’’ निदेशक महोदय के साथ आए प्रशासन अधिकारी के चेतावनीभरे स्वर को सुन कर मैं हड़बड़ा कर खड़ा हो गया. मन भी कैसा विचित्र होता है. चाहे परिस्थितियां बदल जाएं पर अवचेतन मन की सारी व्यवस्था यों ही बनी रहती है. एक समय था जब मैं कुरसी पर बैठा रहता था और रमेश साहब याचक की तरह मेरे सामने खड़े रहते थे.

‘‘कोई बात नहीं, सुधीर बाबू, बैठ जाइए,’’ कह कर वे चले गए. जातेजाते वे एक ऐसी दृष्टि मुझ पर डाल गए थे जिस के सौसौ अर्थ निकल सकते थे.

मैं चिंतित, उद्विग्न और उदास सा बैठा रहा. मेरे सामने मेज पर फाइलों का ढेर लगा था. फोन बजता और बंद हो जाता. पर मैं तो जैसे चेतनाशून्य सा बैठा सोच रहा था. मेरी अस्तित्वरक्षा अब असंभव है. रमेश यों छोड़ने वाला नहीं. इंसान सबकुछ भूल सकता है, पर अपमान के घाव पुर कर भी सदैव टीसते रहते हैं.

पर रमेश मेरे साथ क्या करेगा? शायद मेरा तबादला कर दे. मैं इस के लिए तैयार हूं. यहां तक तो ठीक ही है. इस के अलावा वह प्रत्यक्षरूप से मुझे और कोई हानि नहीं पहुंचा सकता था.

रमेश की नियुक्ति बड़े ही गलत समय पर हुई थी, इस वर्ष मेरी तरक्की होने वाली थी. निदेशक महोदय की विशेष गोपनीय रिपोर्ट पर ही मेरी पदोन्नति निर्भर करती थी. क्या उन अप्रिय घटनाओं के बाद भी रमेश मेरे बारे में अच्छी रिपोर्ट देगा? नहीं, यह असंभव है. मेरा मन बुझ गया. दफ्तर का काम करना मेरे लिए असंभव था. सो, मैं ने तबीयत खराब होने का कारण लिख कर, 2 दिनों की छुट्टी के लिए प्रार्थनापत्र निदेशक महोदय के पास पहुंचवा दिया. 2 दिन घर पर आराम कर के मैं अपनी अगली योजना को अंतिम रूप देना चाहता था. यह तो लगभग निश्चित ही था कि रमेश के अधीन इस कार्यालय में काम करना अपने भविष्य और अपनी सेवा को चौपट करना था. उस जैसा सिद्घांतहीन, झूठा और बेईमान व्यक्ति किसी की खुशहाली और पदोन्नति का माध्यम नहीं बन सकता. और फिर मैं? मुझ से तो उसे बदले चुकाने थे.

मुझे अच्छी तरह याद है. जब आईएएस का रिजल्ट आया था और रमेश का नाम उस में देखा तो मुझे खुशी हुई थी, पर साथ ही, मैं थोड़ा भयभीत हो गया था. रमेश ने पार्टी दी थी पर उस ने मुझे निमंत्रित नहीं किया था. मसूरी अकादमी में प्रशिक्षण के लिए जाते वक्त रमेश मेरे पास आया था. और वितृष्णाभरे स्वर में बोला था, ‘सुधीर, मेरी बस एक ही इच्छा है. किसी तरह मैं तुम्हारा अधिकारी बन कर आ जाऊं. फिर देखना, तुम्हारी कैसी रगड़ाई करता हूं. तुम जिंदगीभर याद रखोगे.’

कैसा था वह क्षण. 10 वर्षों बाद आखिर उस की कामना पूरी हो गई. यों, इस में कोई असंभव बात भी नहीं थी. रमेश मेरा अधिकारी बन कर आ गया था. जीवन में परिश्रम, लगन तथा एकजुट हो कर कुछ करना चाहो तो असंभव भी संभव हो सकता है, रमेश इस की जीतीजागती मिसाल था. वर्ष 1960 में रमेश इस संस्थान में क्लर्क बन कर आया था. मैं उस का अधिकारी था तथा वह मेरा अधीनस्थ कर्मचारी. रोजगार कार्यालय के माध्यम से उस की भरती हुई थी. मैं ने एक ही निगाह में भांप लिया कि यह नवयुवक योग्य है, किंतु कामचोर है. वह महत्त्वाकांओं की पूर्ति के लिए कुछ भी कर सकता है. वह स्नातक था और टाइपिंग में दक्ष. फिर भी वह दफ्तर के काम करने से कतराता था. मैं समझ गया कि यह व्यक्ति केवल क्लर्क नहीं बना रहेगा. सो, शुरू से ही मेरे और उस के बीच एक खाई उत्पन्न हो गई.

मैं अनुशासनपसंद कर्मचारी था, जिस ने क्लर्क से सेवा प्रारंभ कर के विभागीय पदोन्नतियों की विभिन्न सीढि़यां पार की थीं. कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं दी थी.पर रमेश अपने भविष्य की सफलताओं के प्रति इतना आश्वस्त था कि उस ने एक दिन भी मेरी अफसरियत को नहीं स्वीकारा था. वह अकसर दफ्तर देर से आता. मैं उसे टोकता तो वह स्पष्टरूप से तो कुछ नहीं कहता, किंतु अपना क्रोध अपरोक्षरूप  से व्यक्त कर देता. काम नहीं करता या फिर गलत टाइप करता, सीट पर बैठा मोटीमोटी किताबें पढ़ता रहता. खाने की छुट्टी आधे घंटे की होती तो वह 2 घंटे के लिए गायब हो जाता. मैं उस से बहुत नाराज था. पर शायद उसे मेरी चिंता नहीं थी. सो, वह मनमानी किए जाता. उस ने मुझे कभी भी गंभीरता से नहीं लिया.

एक दिन मैं ने दफ्तर के बाद रमेश को रोक लिया. सब लोग चले गए. केवल हम दोनों रह गए. मैं ने सोचा था कि मैं उसे एकांत में समझाऊंगा. शायद उस की समझ में आ जाए कि काम कितना अहम होता है. ‘रमेश, आखिर तुम यह सब क्यों करते हो?’ मैं ने स्नेहसिक्त, संयत स्वर में कहा था. ‘क्या करता हूं?’ उस ने उखड़ कर कहा था.

‘तुम दफ्तर देर से आते हो.’

‘आप को पता है, दिल्ली की बस व्यवस्था कितनी गंदी है.’

‘और लोग भी तो हैं जो वक्त से पहुंच जाते हैं.’

‘उस से क्या होता है. अगर मैं देर से आता हूं तो

2 घंटे का काम आधे घंटे में निबटा भी तो देता हूं.’

‘रमेश दफ्तर का अनुशासन भी कुछ होता है. यह कोई तर्क नहीं है. फिर, मैं तुम से सहमत नहीं कि तुम 2 घंटे का काम…’

‘मुझे बहस करने की आदत नहीं,’ कह कर वह अचानक उठा और कमरे से बाहर चला गया. मैं अपमानित सा, तिलमिला कर रह गया. रमेश के व्यवहार में कोई विशेष अंतर नहीं आया. अब वह खुलेआम दफ्तर में मोटीमोटी किताबें पढ़ता रहता था. काम की उसे कोई चिंता नहीं थी.एक दिन मैं ने उसे फिर समझाया, ‘रमेश, तुम दफ्तर के समय में किताबें मत पढ़ा करो.’

‘क्यों?’

‘इसलिए, कि यह गलत है. तुम्हारा काम अधूरा रहता है और अन्य कर्मचारियों पर बुरा असर पड़ता है.’

‘सुधीर बाबू, मैं आप को एक सूचना देना चाहता हूं.’

‘वह क्या?’

‘मैं इस वर्ष आईएएस की परीक्षा दे रहा हूं.’

‘तो क्या तुम्हारी उम्र 24 वर्ष से कम है?’

‘हां, और विभागीय नियमों के अनुसार मैं इस परीक्षा में बैठ सकता हूं.’

‘फिर तुम ने यह नौकरी क्यों की? घर बैठ कर…’

‘आप की दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में टांग अड़ाने की बुरी आदत है,’ उस ने कह तो दिया फिर पलभर सोचने के बाद वह बोला, ‘सुधीर बाबू, यों आप ठीक कह रहे हैं. मजा तो तभी है जब एकाग्रचित्त हो यह परीक्षा दी जाए. पर क्या करूं, घर की आर्थिक परिस्थितियों ने मजबूर कर दिया.’

‘पर रमेश, यह बौद्धिक तथा नैतिक बेईमानी है. तुम इस कार्यालय में नौकरी करते हो. तुम्हें वेतन मिलता है. किंतु उस के प्रतिरूप उतना काम नहीं करते. तुम अपने स्वार्थ की सिद्धि में लगे हुए हो.’

‘जितने भी डिपार्टमैंटल खूसट मिलते हैं, सब को भाषण देने की बीमारी होती है.’

मैं ने तिलमिला कर कहा था, ‘रमेश, तुम में बिलकुल तमीज नहीं है.’

‘आप सिखा दीजिए न,’ उस ने मुसकरा कर कहा था.

मेरी क्रोधाग्नि में जैसे घी पड़ गया. ‘मैं तुम्हें निकाल दूंगा.’

‘यही तो आप नहीं कर सकते.’

‘तुम मुझे उकसा रहे हो.’

‘सुधीर बाबू, सरकारी सेवा में यही तो सुरक्षा है. एक बार बस घुस जाओ…’

मैं ने आगे बहस करना उचित नहीं समझा. मैं अपने को संयत और शांत करने का प्रयास कर रहा था कि रमेश ने एक और अप्रत्याशित स्थिति में मुझे डाल दिया.

‘सुधीर बाबू, मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूं.’

‘पूछो.’

‘आखिर तुम अपने काम को इतनी ईमानदारी से क्यों करते हो?’

‘क्या मतलब?’

‘सरकार एक अमूर्त्त चीज है. उस के लिए क्यों जानमारी करते हो, जिस का कोई अस्तित्व नहीं, उस की खातिर मुझ जैसे हाड़मांस के व्यक्ति से टक्कर लेते रहते हो. आखिर क्यों?’

‘रमेश, तुम नमकहराम और नमकहलाल का अंतर समझते हो?’

‘बड़े अडि़यल किस्म के आदमी हैं, आप,’ रमेश ने मुसकरा कर कहा था.

‘तुम जरूरत से ज्यादा मुंहफट हो गए हो, मैं…’ मैं ने अपने वाक्य को अधूरा छोड़ कर उसे पर्याप्त धमकीभरा बना दिया था.

‘मैं…मैं…क्या करते हो? मैं जानता हूं, आप मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते.’

बस, गाड़ी यों ही चलती रही. रमेश के कार्यकलापों में कोई अंतर नहीं आया. पर मैं ने एक बात नोट की थी कि धीरेधीरे उस का मेरे प्रति व्यवहार पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शालीन, संयत और अनुशासित हो चुका था. क्यों? इस का पता मुझे बाद में लगा.

रमेश की परक्षाएं समीप आ गईं. एक दिन वह सुबह ढाई महीने की छुट्टी लेने की अरजी ले कर आया. अरजी को मेरे सामने रख कर, वह मेरी मेज से सट कर खड़ा रहा.

अरजी पर उचटी नजर डाल कर मैं ने कहा, ‘तुम्हें नौकरी करते हुए केवल 8 महीने हुए हैं, 8-10 दिन की छुट्टी बाकी होगी तुम्हारी. यह ढाई महीने की छुट्टी कैसे मिलेगी?’

‘लीव नौट ड्यू दे दीजिए.’

‘यह कैसे मिल सकती है? मैं कैसे प्रमाणपत्र दे सकता हूं कि तुम इसी दफ्तर में काम करते रहोगे और इतनी छुट्टी अर्जित कर लोगे.’

‘सुधीर बाबू, मेरे ऊपर आप की बड़ी कृपा होगी.’

‘आप बिना वेतन के छुट्टी ले सकते हैं.’

‘उस के लिए मुझे आप की अनुमति की जरूरत नहीं. क्या आप अनौपचारिक रूप से यह छुट्टी नहीं दे सकते?’

‘क्या मतलब?’

‘मेरा मतलब साफ है.’

‘रमेश, तुम इस सीमा तक जा कर बेईमानी और सिद्धांतहीनता की बात करोगे, इस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. यह तो सरासर चोरी है. बिना काम किए, बिना दफ्तर आए तुम वेतन चाहते हो.’

‘सब चलता है, सुधीर बाबू.’

‘तुम आईएएस बन गए तो क्या विनाशलीला करोगे, इस की कल्पना मैं अभी से कर सकता हूं.’

‘मैं आप को देख लूंगा.’

‘‘सुधीर बाबू, आप को साहब याद कर रहे हैं,’’ निदेशक महोदय के चपरासी की आवाज सुन कर मेरी चेतना लौट आई भयावह स्मृतियों का क्रम भंग हो गया.

मैं उठा. मरी हुई चाल से, करीब घिसटता हुआ सा, मैं निदेशक के कमरे की ओर चल पड़ा. आगेआगे चपरासी, पीछेपीछे मैं, एकदम बलि को ले जाने वाले निरीह पशु जैसा. परिस्थितियों का कैसा विचित्र और असंगत षड्यंत्र था.

रमेश की मनोकामना पूरी हो गई थी. वर्ष पूर्व उस ने प्रतिशोध की भावना से प्रेरित हो कर जो कुछ कहा था, उसे पूरा करने का अवसर उसे मिल चुका था. उस जैसा स्वार्थी, महत्त्वाकांक्षी, सिद्धांतहीन और निर्लज्ज व्यक्ति कुछ भी कर सकता है.

चपरासी ने कमरे का दरवाजा खोला. मैं अंदर चला गया. गरदन झुकाए और निर्जीव चाल से मैं उस की चमचमाती, बड़ी मेज के समीप पहुंच गया.

‘‘आइए, सुधीर बाबू.’’

मैं ने गरदन उठाई, देखा, रमेश अपनी कुरसी से उठ खड़ा हुआ है और उस ने अपना दायां हाथ आगे बढ़ा दिया है, मुझ से हाथ मिलाने के लिए.

मैं ने हाथ मिलाया तो मुझे लगा कि यह सब नाटक है. बलि से पूर्व पशु का शृंगार किया जा रहा है.

‘‘सुधीर बाबू, बैठिए न.’’

मैं बैठ गया. सिकुड़ा और सिहरा हुआ सा.

‘‘क्या बात है? आप की तबीयत खराब है?’’

‘‘हां…नहीं…यों,’’ मैं सकपका गया.

‘‘इस अरजी में तो…’’

‘‘यों ही, कुछ अस्वस्थता सी महसूस हो रही थी.’’

‘‘आप कुछ परेशान और घबराए हुए से लग रहे हैं.’’

‘‘हां, नहीं तो…’’

अचानक, कमरे में एक जोर का अट्टहास गूंज गया.

मैं ने अचकचा कर दृष्टि उठाई. रमेश अपनी गुदगुदी घूमने वाली कुरसी में धंसा हुआ हंस रहा था.

‘‘क्या लेंगे, सुधीर बाबू, कौफी या चाय?’’

‘‘कुछ नहीं, धन्यवाद.’’

‘‘यह कैसे हो सकता है?’’ कह कर रमेश ने सहायिका को 2 कौफी अंदर भेजने का आदेश दे दिया.

कुछ देर तक कमरे में आशंकाभरा मौन छाया रहा. फिर अनायास, बिना किसी संदर्भ के, रमेश ने हा, ‘‘10 वर्ष काफी होते हैं.’’

‘‘किसलिए?’

‘‘किसी को भी परिपक्व होने के लिए.’’

‘‘मैं समझा नहीं, आप क्या कहना चाहते हैं.’’

‘‘10-12 वर्षों के बाद इस दफ्तर में आया हू. देखता हूं, आप के अलावा सब नए लोग हैं.’’

‘‘जी.’

‘‘आखिर इतने लंबे अरसे से आप उसी पद पर बने हुए हैं. तरक्की का कोई मौका नहीं मिला.’’

‘‘इस साल तरक्की होने वाली है. आप की रिपोर्ट पर ही सबकुछ निर्भर करेगा, सर,’’ न जाने किस शक्ति से प्रेरित हो, मैं यंत्रवत कह गया.

रमेश सीधा मेरी आंखों में झांक रहा था, मानो कुछ तोल रहा हो. मैं पछता रहा था. मुझे यह सब नहीं कहना चाहिए था. अब तो इस व्यक्ति को यह अवसर मिल गया है कि वह…

तभी चपरासी कौफी के 2 प्याले ले आया.

‘‘लीजिए, कौफी पीजिए.’

मैं ने कौफी का प्याला उठा कर होंठों से लगाया तो महसूस हुआ जैसे मैं मीरा हूं, रमेश राणा और प्याले में काफी नहीं, विष है.

‘‘सुधीर बाबू, आप की तरक्की होगी. दुनिया की कोईर् ताकत एक ईमानदार, परिश्रमी, नमकहलाल, अनुशासनप्रिय कर्मचारी की पदोन्नति को नहीं रोक सकती.’’ मैं अविश्वासपूर्वक रमेश की ओर देख रहा था. विष का प्याला मीठी कौफी में बदलने लगा था.

‘‘मैं आप की ऐसी असाधारण और विलक्षण रिपोर्ट दूंगा कि…’’

‘‘आप सच कह रहे हैं?’’

‘‘सुधीर बाबू, शायद आप बीते दिनों को याद कर के परेशान हो रहे हैं. छोडि़ए, उन बातों को. 10-12 वर्षों में इंसान काफी परिपक्व हो जाता है. तब मैं एक विवेकहीन, त्तरदायित्वहीन, उच्छृंखल नवयुवक, अधीनस्थ कर्मचारी था और अब मैं विवेकशील, उत्तरदायित्वपूर्ण अधिकारी हूं और समझ सकता हूं कि… तब और अब का अंतर?’’ हां, एक सुपरवाइजर के रूप में आप कितने ठीक थे, इस सत्य का उद्घाटन तो उसी दिन हो गया था, जब मैं पहली बार सुपरवाइजर बना था.’’ रमेश ने मेरी छुट्टी की अरजी मेरी ओर सरका दी और बोला, ‘‘अब इस की जरूरत तो नहीं है.’’

मैं ने अरजी फाड़ दी. फिर खड़े हो कर मैं विनम्र स्वर में बोला, ‘‘धन्यवाद, सर, मैं आप का बहुत आभारी हूं. आप महान हैं.’’

और रमेश के होंठों पर विजयी व गर्वभरी मुसकान बिछ गई. Family Story In Hindi

Family Story In Hindi: जरा सा मोहत्याग- मां को किसकी चिंता सता रही थी?

Family Story In Hindi: बहुत दिनों से नीमा से बात नहीं हो पा रही थी. जब भी फोन मिलाने की सोचती कोई न कोई काम आ जाता. नीमा मेरी छोटी बहन है और मेरी बहुत प्रिय है.

‘‘मौसी की चिंता न करो मां. वे अच्छीभली होंगी तभी उन का फोन नहीं आया. कोई दुखतकलीफ होती तो रोनाधोना कर ही लेतीं.’’

मानव ने हंस कर बात उड़ा दी तो मुझे जरा रुक कर उस का चेहरा देखना पड़ा. आजकल के बच्चे बड़े समझदार और जागरूक हो गए हैं, यह मैं समझती हूं और यह सत्य मुझे खुशी भी देता है. हमारा बचपन इतना चुस्त कहां था, जो किसी रिश्तेदार को 1-2 मुलाकातों में ही जांचपरख जाते. हम तो आसानी से बुद्धू बन जाते थे और फिर संयुक्त परिवारों में बच्चों का संपर्क ज्यादातर बच्चों के साथ ही रहता था. बड़े सदस्य आपस में क्या मनमुटाव या क्या मेलमिलाप कर के कैसेकैसे गृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं, हमें पता ही नहीं होता था. आजकल 4 सदस्यों के परिवार में किस के माथे पर कितने बल आए और किस ने किसे कितनी बार आंखें तरेर कर देखा बच्चों को सब समझ में आता है.

‘‘मैं ने कल मौसी को मौल में देखा था. शायद बैंक में जल्दी छुट्टी हो गई होगी. खूब सारी शौपिंग कर के लदीफंदी घूम रही थीं. उन की 2 सहयोगी भी साथ थीं.’’

‘‘तुम से बात हुई क्या?’’

‘‘नहीं. मैं तीसरे माले पर था और मौसी दूसरे माले पर.’’

‘‘कोई और भी तो हो सकती है? तुम ने ऊपर से नीचे कैसे देख लिया?’’

‘‘अरे, अंधा हूं क्या मैं जो ऊपर से नीचे दिखाई न दे? अच्छीखासी हंसतेबतियाते जा रही थीं… और आप जब भी फोन करती हैं रोनाधोना शुरू कर देती हैं कि मर गए, बरबाद हो गए. जो समय सुखी होगा उसे आप से कभी नहीं बांटती और जब जरा सी भी तकलीफ होगी तो उसे रोरो कर आप से कहेंगी. मौसी जैसे इनसान की क्या चिंता करनी… छोड़ो उन की चिंता. उन का फोन नहीं आया तो इस का मतलब है कि वे राजीखुशी ही होंगी.’’

मैं ने अपने बेटे को जरा सा झिड़क दिया और फिर बात टाल दी. मगर सच कहूं तो उस का कहना गलत भी नहीं था. सच ही समझा है उस ने अपनी मौसी को. अपनी जरा सी भी परेशानी पर हायतोबा मचा कर रोनाधोना उसे खूब सुहाता है. लेकिन बड़ी से बड़ी खुशी पचा जाना उस ने पता नहीं कहां से सीख लिया. कहती खुशी जाहिर नहीं करनी चाहिए नजर लग जाती है. किस की नजर लग जाती है? क्या हमारी? हम जो उस के शुभचिंतक हैं, हम जिन्हें अपनी परेशानी सुनासुना कर वह अपना मन हलका करती है, क्या हमारी नजर लगेगी उसे? अंधविश्वासी कहीं की. अभी पिछले हफ्ते ही तो बता रही थी कि मार्च महीने की वजह से हाथ बड़ा तंग है. कुछ रुपए चाहिए. मेरे पास कुछ जमाराशि है, जिसे मैं ने किसी आड़े वक्त के लिए सब से छिपा कर रखा है. उस में से कुछ रुपए उसे देने का मन बना भी लिया था. मैं जानती हूं रुपए शायद ही वापस आएं. यदि आएंगे भी तो किस्तों में और वे भी नीमा को जब सुविधा होगी तब. छोटी बहन है मेरी. मातापिता ने मरने से पहले समझाया था कि छोटी बहन को बेटी समझना. मुझ से 10 साल छोटी है. मैं उस की मां नहीं हूं, फिर भी कभीकभी मां बन कर उस की गलती पर परदा डाल देती हूं, जिस पर मेरे पति भी हंस पड़ते हैं और मेरा बेटा भी.

‘‘तुम बहुत भोली हो शुभा. अपनी बहन से प्यार करो, मगर उसे इतना स्वार्थी मत बनाओ कि उस का ही चरित्र उस के लिए मुश्किल हो जाए. मातापिता को भी अपनी संतान के चरित्रनिर्माण में सख्ती से काम लेना पड़ता है तो क्या वे उस के दुश्मन हो जाते हैं, जो तुम उस की गलती पर उसे राह नहीं दिखातीं?’’

‘‘मैं क्या राह दिखाऊं? पढ़ीलिखी है और बैंक में काम करती है. छोटी बच्ची नहीं है वह जो मैं उसे समझाऊं. सब का अपनाअपना स्वभाव होता है.’’

‘‘सब का अपनाअपना स्वभाव होता है तो फिर रहने दो न उसे उस के स्वभाव के साथ. गलती करती है तो उसे उस की जिम्मेदारी भी लेने दो. तुम तो उसे शह देती हो. यह मुझे बुरा लगता है.’’

मैं मानती हूं कि उमेश का खीजना सही है, मगर क्या करूं? मन का एक कोना बहन के लिए ममत्व से उबर ही नहीं पाता. मैं उसे बच्ची नहीं मानती. फिर भी बच्ची ही समझ कर उस की गलती ढकती रहती हूं. सोचा था क्व10-20 हजार उसे दे दूंगी. कह रही थी कि मार्च महीने में सारी की सारी तनख्वाह इनकम टैक्स में चली गई. घर का खर्च कैसे चलेगा? क्या वह इस सत्य से अवगत नहीं थी कि मार्च महीने में इनकम टैक्स कटता है? उस के लिए तैयारी क्या लोग पहले से नहीं करते हैं? पशुपक्षी भी अपनी जरूरत के लिए जुगाड़ करते हैं. तो क्या बरसात के मौसम के लिए छाते का इंतजाम नीमा के पड़ोसी या मित्र करेंगे? सिर मेरा है तो उस की सुरक्षा का प्रबंध भी मुझे ही करना चाहिए न. मैं हैरान हूं कि उस के पास तो घर खर्च के लिए भी पैसे नहीं थे और मानव ने बताया मौसी मौल में खरीदारी कर रही थीं. सामान से लदीफंदी घूम रही थीं तो शौपिंग के लिए पैसे कहां से आए?

सच कहते हैं उमेश कि कहीं मैं ही तो उसे नहीं बिगाड़ रही. उस के कान मरोड़ उसे उस की गलती का एहसास तो कराना ही चाहिए न. कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जिन के बिना गुजारा नहीं चलता. लेकिन वही हमें तकलीफ भी देते हैं. गले में स्थापित नासूर ऐसा ही तो होता है, जिसे काट कर फेंका नहीं जा सकता. उसी के साथ जीने की हमें आदत डालनी पड़ती है. निभातेनिभाते बस हम ही निभाते चलते जाते हैं और लेने वाले का मुंह सिरसा के मुंह जैसा खुलता ही जाता है.

40 की होने को आई नीमा. कब अपनी गलत आदतें छोड़ेगी? शायद कभी नहीं. मगर उस की वजह से अकसर मेरी अपनी गृहस्थी में कई बार अव्यवस्था आ जाती है. अकसर किसी के पैर पसारने की वजह से अगर मेरी भी चादर छोटी पड़ जाए तो कुसूर मेरा ही है. मैं ने अपनी चादर में उसे पैर पसारने ही क्यों दिए? मातापिता ही हैं जो औलाद के कान मरोड़ कर सही रास्ते पर लाने का दुस्साहस कर सकते हैं. वैसे तो एक उम्र के बाद सब की बुद्धि इतनी परिपक्व हो ही जाती है कि चाहे तो पिता का कहा भी न माने तो पिता कुछ नहीं कर सकता. मगर बच्चे के कान तक हाथ ले जाने का अधिकार उसे अवश्य होता है.

मैं ने शाम को कुछ सोचा और फिर नीमा के घर का रुख कर लिया. फोन कर के बताया नहीं कि मैं आ रही हूं. मानव कोचिंग क्लास जाता हुआ मुझे स्कूटर पर छोड़ता गया. नीमा तब स्तब्ध रह गई जब उस ने अपने फ्लैट का द्वार खोला.

‘‘दीदी, आप?’’

नीमा ने आगेपीछे ऐसे देखा जैसे उम्मीद से भी परे कुछ देख लिया.

‘‘दीदी आप? आप ने फोन भी नहीं किया?’’

‘‘बस सोचा तुझे हैरान कर दूं. अंदर तो आने दे… दरवाजे पर ही खड़ा कर दिया.’’

उसे एक तरफ हटा कर मैं अंदर चली आई. सामने उस का कोई सहयोगी था. मेज पर खानेपीने का सामान सजा था. होटल से मंगाया गया था. जिन डब्बों में आया था उन्हीं में खाया भी जा रहा था. पुरानी आदत है नीमा की, कभी प्लेट में सजा कर सलीके से मेज पर नहीं रखती. समोसेपकौड़े तो लिफाफे में ही पेश कर देती है. पेट में ही जाना है. क्यों बरतन जूठे किए जाएं? मुझे देख वह पुरुष सहसा असहज हो गया. सोचता होगा कैसी बदतमीज है नीमा की बहन एकाएक सिर पर चढ़ आई.

‘‘अपना घर है मेरा… फोन कर के आने की क्या तुक थी भला? बस बैठबैठे मन हुआ तो चली आई. क्यों तुम कहीं जाने वाली थी क्या?’’

मैं ने दोनों का चेहरा पढ़ा. पढ़ लिया मैं ने कुछ अनचाहा घट गया है उन के साथ.

‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए सोचा देख आऊं.’’

‘‘हां, विजय भी हालचाल पूछने ही आए हैं. ये मेरे सहयोगी हैं.’’

मेरे ही प्रश्न ने नीमा को राह दिखा दी. मैं ने तबीयत का पूछा तो उस ने झट से हालचाल पूछने के लिए आए सहयोगी की स्थिति साफ कर दी वरना झट से उसे कोई बहाना नहीं सूझ रहा था. मेरी बहन है नीमा. भला उसी के रंगढंग मैं नहीं पहचानूंगी? बचपन से उस की 1-1 हरकत मैं उस का चेहरा पढ़ कर ही भांप जाती हूं. 10 साल छोटी बहन मेरी बहुत लाडली है. 10 साल तक मेरे मातापिता मात्र एक ही संतान के साथ संतुष्ट थे. मैं ही अकेलेपन की वजह से बीमार रहने लगी थी. मौसी और बूआ सब की 2-2 संतानें थीं और मेरे घर में मैं अकेली. बड़ों में बैठती तो वे मुझे उठा देते कि चलो अंदर जा कर खेलो. क्या खेलो? किस के साथ खेलो? बेजान खिलौने और बेजान किताबें… किसी जानदार की दरकार होने लगी थी मुझे. मैं चिड़ीचिड़ी रहती थी, जिस का इलाज था भाई या बहन.

भाई या बहन आने वाला हुआ तो मातापिता ने मुझे समझाना शुरू कर दिया कि सारी जिम्मेदारी सिर्फ मेरी ही होगी. अपना सुखदुख भूल मैं नीमा के ही सुख में खो गई. 10 साल की उम्र से ही मुझ पर इतनी जिम्मेदारी आ गई कि अपनी हर इच्छा मुझे व्यर्थ लगती. ‘‘तुम उस की मां नहीं हो शुभा… जो उस के मातापिता थे वही तुम्हारे भी थे,’’ उमेश अकसर समझाते हैं मुझे.

अवचेतन में गहरी बैठा दी गई थी मातापिता द्वारा यह भावना कि नीमा उसी के लिए संसार में लाई गई है. मुझे याद है अगर हम सब खाना खा रहे होते और नीमा कपड़े गंदे कर देती तो रोटी छोड़ कर उस के कपड़े मां नहीं मैं बदलती थी. जबकि आज सोचती हूं क्या वह मेरा काम था? क्या यह मातापिता का फर्ज नहीं था? क्या बहन ला कर देना मेरे मातापिता का मुझ पर एहसान था? इतना ज्यादा कर्ज जिसे 40 साल से मैं उतारतेउतारते थक गई हूं और कर्ज है कि खत्म ही नहीं होता है.

‘‘आओ दीदी बैठो न,’’ अनमनी सी बोली नीमा.

मेरी नजर सोफे पर पड़े लिफाफों पर पड़ी. जहां से खरीदे गए थे उन पर उसी मौल का पता था जिस के बारे में मानव ने मुझे बताया था. कुछ खुले परिधान बिखरे पड़े थे आसपास. शायद नीमा उन्हें पहनपहन कर देख रही थी या फिर दिखा रही थी.

छटी इंद्री ने मुझे एक संकेत सा दिया… यह पुरुष नीमा की जिंदगी में क्या स्थान रखता है? क्या इसी को नीमा नए कपड़े पहनपहन कर दिखा रही थी.

‘‘क्या बुखार था तुम्हें? आजकल मौसम बदल रहा है… वायरल हो गया होगा,’’ कह मैं ने कपड़ों को धकेल कर एक तरफ किया.

उसी पल वह पुरुष उठ पड़ा, ‘‘अच्छा, मैं चलता हूं.’’

‘‘अरे बैठिए न… आप अपना खानापीना तो पूरा कीजिए. बैठो नीमा,’’ मेरा स्वर थोड़ा बदल गया होगा, जिस पर दोनों ने मुझे बड़ी गौर से देखा.

उस पुरुष ने कुछ नहीं कहा और फिर चला गया. नीमा भी अनमनी सी लगी मुझे.

‘‘बीमार थी तो यह फास्ट फूड क्यों खा रही हो तुम?’’ डब्बों में पड़े नूडल्स और मंचूरियन पर मेरी नजर पड़ी. उन डब्बों में 1 ही चम्मच रखा था. जाहिर है, दोनों 1 ही चम्मच से खा रहे थे.

‘‘कुछ काम था तुम से इसलिए फोन पर बात नहीं की… मुझे कुछ रुपए चाहिए थे… मानव की कोचिंग क्लास के लिए… तुम्हारी तरफ मेरे कुल मिला कर 40 हजार रुपए बनते हैं. तुम तो जानती हो मार्च का महीना है.’’ नीमा ने मुझे विचित्र सी नजरों से देखा जैसे मुझे पहली बार देख रही हो… चूंकि मैं ने कभी रुपए वापस नहीं मांगे थे, इसलिए उस ने भी कभी वापस करना जरूरी नहीं समझा. मैं बड़ी गौर से नीमा का चेहरा पढ़ रही थी. मैं उस की शाम बरबाद कर चुकी थी और संभवतया नैतिक पतन का सत्य भी मेरी समझ में आ गया था. अफसोस हो रहा है मुझे. एक ही मातापिता की संतान हैं हम दोनों बहनें और चरित्र इतना अलगअलग… एक ही घर की हवा और एक ही बरतन से खाया गया खाना खून में इतना अलगअलग प्रभाव कैसे छोड़ गया.

‘‘मेरे पास पैसे कहां…?’’ नीमा ने जरा सी जबान खोली.

‘‘क्यों? अकेली जान हो तुम. पति और बेटा अलग शहर में रहते हैं… उस पर तुम एक पैसा भी खर्च नहीं करती… कहां जाते हैं सारे पैसे?’’

नीमा अवाक थी. सदा उसी की पक्षधर उस की बहन आज कैसी जबान बोलने लगी. बोलना तो मैं सदा ही चाहती थी, मगर एक आवरण था झीना सा खुशफहमी का कि शायद वक्त रहते नीमा का दिमाग ठीक हो जाए. उस का परिवार और मेरा परिवार तो सदा ही उस के आचरण से नाराज था बस एक मैं ही उस के लिए डूबते को तिनके का सहारा जैसी थी और आज वह सहारा भी मैं ने छीन लिया.

‘‘पाईपाई कर जमा किए हैं मैं ने पैसे… मानव के दाखिले में कितना खर्चा होने वाला है, जानती हो न? मेरी मदद न करो, लेकिन मेरे रुपए लौटा दो. बस उन से मेरा काम हो जाएगा,’’ कह कर मैं उठ गई. काटो तो खून नहीं रहा नीमा में. मेरा व्यवहार भी कभी ऐसा होगा, उस ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. उस की हसीन होती शाम का अंजाम ऐसा होगा, यह भी उस की कल्पना से परे था. कुछ उत्तर होता तो देती न. चुपचाप बैठ गई. उस के लिए मैं एक विशालकाय स्तंभ थी जिस की ओट में छिप वह अपने पति के सारे आक्षेप झुठला देती थी.

‘‘देखो न दीदी अजय कुछ समझते ही नहीं हैं…’’

अजय निरीह से रह जाते थे. नीमा की उचितअनुचित मांगों पर. नारी सम्मान की रक्षा पर बोलना तो आजकल फैशन बनता जा रहा है. लेकिन सोचती हूं जहां पुरुष नारी की वजह से पिस रहा है उस पर कोई कानून कोई सभा कब होगी? अपने मोह पर कभी जीत क्यों नहीं पाई मैं. कम से कम गलत को गलत कहना तो मेरा फर्ज था न, उस से परहेज क्यों रखा मैं ने? अफसोस हो रहा था मुझे. दम घुटने लगा मेरा नीमा के घर में… ऐसा लग रहा था कोई नकारात्मक किरण मेरे वजूद को भेद रही है. मातापिता की निशानी अपनी बहन के वजूद से मुझे ऐसी अनुभूति पहले कभी नहीं हुई. सच कहूं तो ऐसा लगता रहा मांपिताजी के रूप में नीमा ही है मेरी सब कुछ और शायद यही अनुभूति मेरा सब से बड़ा दोष रही. कब तक अपना दोष मैं न स्वीकारूं? नीमा की भलाई के लिए ही उस से हाथ खींचना चाहिए मुझे… तभी वह कुछ सही कर पाएगी…

‘‘दीदी बैठो न.’’

‘‘नहीं नीमा… मुझे देर हो रही है… बस इतना ही काम था,’’ कह नीमा का बढ़ा हाथ झटक मैं बाहर चली आई. गले तक आवेग था. रिकशे वाले को मुश्किल से अपना रास्ता समझा पाई. आंसू पोंछ मैं ने मुड़ कर देखा. पीछे कोई नहीं था, जो मुझे रोकता. मुझे खुशी भी हुई जो नीमा पीछे नहीं आई. बैठी सोच रही होगी कि यह दीदी ने कैसी मांग कर दी… पहले के दिए न लौटा पाए न सही कम से कम और तो नहीं मांगेगी न… एक भारी बोझ जैसे उतर गया कंधों पर से… मन और तन दोनों हलके हो गए. खुल कर सांस ली मैं ने कि शायद अब नीमा का कायापलट हो जाए. Family Story In Hindi.

Beautiful Love Story In Hindi: 2 रातें- रोहित से क्यों नफरत करने लगी श्रेया?

Beautiful Love Story In Hindi: सुबह के 9 बज रहे थे जब मेरी नींद लगातार बजती डोरबेल से खुली। आदतन मैं ने अनामिका को आवाज लगानी चाही लेकिन मुझे याद आया कि वह अब कभी नहीं आएगी। अभी 3 दिन पहले ही तो हमारा तलाक हुआ था। मैं उठा, दरवाजा खोला तो देखा एक 18-20 साला अनजान लड़की बदहवास सी खड़ी थी,”नानी को अटैक आया है, प्लीज हैल्प मी…”

पहले तो मुझे कुछ समझ नहीं आया, जब समझा तो मेरे मुंह से निकला,”तुम हो कौन? नानी कहां है तुम्हारी?”

“नवीनजी की भांजी हूं, मामामामी दिल्ली गए हैं…”

नवीन मेरे पड़ोसी हैं. सरकारी अफसर हैं और हमउम्र होने के कारण अच्छी मित्रता भी है उन से। मैं ने भीतर जा कर अपना पर्स लिया, पैर में चप्पलें डालीं और चल पड़ा उस के साथ। वहां जा कर देखा तो पाया कि आंटी सोफे पर पसीने से लथपथ अपने सीने को दबाए बैठी थीं। मैं ने तुरंत पास के अस्पताल में फोन किया। लड़की बेहद घबराई हुई थी। मैं ने उसे सांत्वना देते हुए कहा,”चिंता मत करो, अभी ऐंबुलैंस आ रही है।”

अस्पताल पहुंचते ही उन का ट्रीटमैंट शुरू हो गया, फिर मैं ने लड़की से पूछा कि नवीन को फोन किया, तो उस ने बताया कि बात हो गई है। मामामामी अभी वापस रवाना हो रहे हैं। मैं ने अंदाज लगाया कि दिल्ली से जयपुर बाई रोड 4 से 5 घंटे तो लग ही जाएंगे। इसी बीच डाक्टर ने आ कर बताया कि चिंता की बात नहीं है माइल्ड अटैक है, अब वे ठीक हैं। कुछ दवाएं, रजिस्ट्रैशन इत्यादि काम मैं ने निबटा दिए थे। तभी आईसीयू से एक नर्स आ कर बोली,”श्रेया से उस की नानी मिलना चाहती है।”

लड़की यानी श्रेया अंदर गई और 20 मिनट के बाद लौटी तो शांत व आश्वस्त लग रही थी। उस ने कहा कि माफी चाहती हूं आप को परेशान करना पड़ा। मैं ने कहा,”नवीन की मां भी मेरी मां जैसी है, इस में क्या परेशानी है। बस, चाय नहीं पी है तो…”

वह फिर हंसती हुई बोली,”आप चाय पी कर आइए।”

“ठीक है,” कह कर मैं जाने लगा, तो अचानक मुझे याद आया कि श्रेया ने भी चाय नही पी होगी। मैं ने कहा, “तुम भी चलो, यहां कुछ काम तो नहीं है हमारा, कुछ होगा तो मेरे पास फोन आ जाएगा।”

“चलिए…”

कैंटीन में चाय पीते वक्त मैं ने ध्यान दिया, श्रेया बेहद सुंदर थी। लंबी व छरहरी और सिंदूर मिले दूधिया वर्ण की। मैं ने उस से कई सवाल पूछ डाले कि कहां रहती हो, क्या कर रही हो, यहां कब आई वगैरह। उस ने बताया कि जोधपुर से है, कल शाम को ही आई है, ग्रैजुएशन हुआ है आगे की पढ़ाई यहीं से करनी है। मामा कल रात ही दिल्ली गए हैं। जैसाकि मैं जानता था कि नवीन का ससुराल है दिल्ली।

अब कुछ अपनी बातें…
मैं 35 साल का हूं और म्यूजिशियन हूं। अपने पेशे में ज्यादा सफल नहीं हूं, पत्नी अनामिका से लव मैरिज की थी। वह सरकारी स्कूल में टीचर है और मेरा ससुराल यहीं जयपुर में ही था। वह चाहती थी कि मैं म्यूजिक को छोड़ कुछ कामधंधा करूं। वह बच्चा भी चाहती थी और इन्हीं 2 बातों को ले कर झगड़े होते रहते थे। अपने भीतर मैं समझता था कि वह सही है लेकिन अपना पैशन और अपना मेल ईगो छोड़ते नहीं बना।

खैर, इसी बीच श्रेया ने कहा कि वह 10 मिनट में आती है तो लगा कि वाशरूम गई होगी। मुझे सिगरेट की तलब उठ रही थी। मैं अस्पताल से बाहर चला आया। वहां बाहर ही एक दुकान से मैं ने सिगरेट ली और उसी के पीछे चला गया पीने। वहां मैं ने देखा कि श्रेया खड़ी सिगरेट पी रही है। मुझे देख कर वह एकबारगी सकपका गई लेकिन मुसकराते हुए बोली,”मामा को मत बताना…”

मैं ने पूछ लिया,”कौनसा ब्रैंड पीती हो? रूटीन में पीती हो?” मैं जानता हूं कि यह एक गंदी लत है मगर चाह कर भी इसे छोङ नहीं पा रहा था। कह सकते हैं कि सिगरेट ने मुझे अपनी गिरफ्त में ले लिया था। यह भी सही है कि सिगरेट की लत पहले फैशन में लोग करते हैं और फिर यह एक गंदी लत बन जाती है, यह जानते हुए कि यह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है।

खैर, वह बोली,”हां… कोई सी भी ब्रैंड पी लेती हूं…” सिगरेट खत्म कर हम अस्पताल गए। करीब 2 घंटे बाद नवीन और उस की पत्नी पंहुच गए और मैं और श्रेया घर लौट आए। नहा कर, खाना औनलाइन मंगवा कर शाम को करीब 4 बजे मैं श्रेया को ले कर वापस अस्पताल गया। तय हुआ कि नवीन और भाभी घर जा कर रैस्ट करेंगे और रात को वापस आएंगे। तब मैं और श्रेया घर चले जाएंगे। नवीन के घर पर मेड थी तो चिंता की कोई बात नहीं थी। रात को करीब 11 बजे श्रेया का फोन आया,”सिगरेट है आप के पास? ले कर छत पर आओ,” उस ने अधिकारपूर्ण स्वर में कहा।

नवीन और मेरे घर की छतों की मुंडेर एक ही थी। अपनी छत की दीवार कूद कर मैं गया तो वह छत पर बिछे एक बिस्तर पर बैठी थी। सिगरेट पीतेपीते उस ने मुझ से बेशुमार सवाल कर डाले,”बीवी कहां है, मामी बता रही थी कि लव मैरिज की है, प्यार कैसे हुआ, शादी कैसे की, तुम्हारे शौक क्याक्या हैं…”

मैं ने बिना लागलपेट के सब कह सुनाया। यह भी कि अनामिका से पहले भी मेरी कई आशनाई थी और यह भी कि मेरा उस से तलाक हो गया है। बस यह बात यहां किसी को पता नहीं है। अब सवाल करने की मेरी बारी थी। मैं ने पहले पढ़ाई से संबंधित सवाल पूछे, फिर उस की हौबीज के बारे में जाना, परिवार के बारे में जाना, अचानक से मैं ने पूछा,”कोई बौयफ्रैंड नहीं है…”

उस ने जवाब दिया,”अभी तो नहीं पर कई रह चुके, किसी को मैं ने छोड़ दिया, किसी ने मुझे। चलता रहता है… तुम को बनना है?”

मैं सीधा प्रश्न सुन कर हड़बड़ा गया। मैं ने उस के चेहरे की ओर देखते हुए कुछ जवाब देना चाहा तो देखा वह हंस रही थी। मुझे यह तो नहीं पता कि वह क्या सोच रही थी लेकिन कयास मेरा यही था कि वह मुझ से मजाक कर रही थी। आखिर थी ही वह इतनी जीवंत और स्वछंद। इसी तरह सिगरेट और बातें। कब रात गुजर गई पता ही नहीं चला। सुबह जब सूरज अपने पर निकालने की तैयारी में था तो उस ने मुझे कहा,” जाओ, कुछ देर सो भी लो। अस्पताल चलोगे?”

मैं स्वीकृति देते कहते हुए अपनी छत की तरफ का रुख किया। वह भी उठ कर नीचे जाने लगी। जातेजाते रुकी और बोली,”थैंक्यू, यह रात बड़ी शानदार थी…”

अगले दिन मैं 11 बजे सो कर उठा, चाय बना कर पी और तैयार हो कर नवीन के घर गया तो भाभी घर पर थीं। उन्होंने बताया कि नवीन अस्पताल ही है और श्रेया गई थी तभी मैं घर आई हूं। मैं भी अस्पताल निकल पड़ा और नवीन को मैं ने जबरदस्ती घर भेज दिया। नवीन ने बताया कि कल छुट्टी मिल जाएगी मम्मी को। सुन कर अच्छा लगा। मैं और श्रेया रात को 8 बजे अस्पताल से आए, रास्ते में वह मुझ से कह रही थी कि आज वह जल्दी सोएगी, थकान हो रही है। मुझे भी थकान हो रही थी तो मैं घर जाते ही सो गया।

रात को करीब 11 बजे अचानक से मेरी आंखें खुली, उस वक्त न जाने क्यों मुझे अनामिका की याद आई। अकेलेपन के भयावह एहसास ने मुझे जकड़ लिया, सीना भारी होने लगा, मुझे घुटन होने लगी। अनायास ही मैं ने मोबाइल उठाया और श्रेया को व्हाट्सऐप पर मैसेज किया,”सो गई क्या?”

2 मिनट बाद ही उस का जवाब आया,”नहीं, बस सोने जा रही थी।”

“तुम नहीं सोए?”

“सो गया था, बेचैनी से आंखें खुल गईं।”

“क्यों, क्या हुआ? परेशान हो?”

“नहीं, परेशान तो नहीं बस अकेला सा महसूस कर रहा हूं।”

“मैं समझती हूं, चिंता मत करो, सब सही हो जाएगा।”

अचानक से मेरे मन में जाने क्या आया, मैं ने उस से कहा,”आई नीड ए हग ऐंड किस यू…”

उधर से कोई जवाब नहीं आया, जबकि उस ने मैसेज देख लिया था। मैं ने इंतजार किया और मुझे घबराहट होने लगी कि कहीं उस की बेबाकी को मैं ने गलत समझ लिया और उस ने नवीन को अगर यह सब कह दिया तो…इस के आगे मैं सोच नहीं पाया। फिर से मैं ने उसे मैसेज किया,”हैलो, आई वाज किडिंग। आई एम रियली सौरी। डौंट माइंड प्लीज…” यह मैसेज भी सीन हुआ और रिप्लाई नहीं आया। मेरे दिल में गुड़गुड़ होने लगी। नींद तो पहले ही गायब हो गई थी। आधे घंटे बाद उस का मैसेज आया,”छत पर आओ…”

मैं डरतेझिझकते छत पर गया। वह सिगरेट पी रही थी। उस ने इशारे से कहा कि इधर आ जाओ। मैं दीवार कूद कर उस के पास गया। उस ने सिगरेट फेंकी, अपना चेहरा जरा सा उठाया और बांहें फैला दीं। मैं ने उसे अपने आलिंगन में लिया। मैं ने उस के होंठों पर होंठ रख दिए। उस को उसी तरह पकड़े मैं ने नीचे बिछे बिस्तर पर लिटा दिया। रात को 3 बजे मैं ने उठते हुए उस से कहा,”जाओ सो जाओ तुम, थकी हुई हो। वह उठी, अपने कपड़े ठीक किए और जातेजाते उस ने पलट कर मुझे देखा और बाय बोल कर नीचे चली गई।

अगली सुबह मैं 12 बजे सो कर उठा था। नवीन का फोन आया हुआ था। बात की तो पता चला कि आंटी को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया था और वे लोग घर आ गए थे। मुझे बीती रात याद आई तो चेहरे पर मुसकान आ गई। श्रेया के बारे में सोचतेसोचते ही तैयार हो कर नवीन के घर गया। श्रेया ने मुझ से आंखें भी न मिलाई, मैं थोड़ा हैरान हुआ थोड़ा परेशान। वापस घर आ कर उसे फोन किया तो बिजी टोन सुनाई दी। कई बार फोन करने के बाद समझ आया कि उस ने मेरा नंबर ब्लैक लिस्ट में डाल दिया है। ऐसा ही व्हाट्सऐप में था। मुझे लगा कि यह क्या हुआ, क्या मैं ने जबरदस्ती कुछ किया था? अचानक मुझे लगा कि मैं उस से बेहद प्यार करने लगा हूं और उस के बिना रह नही पाऊंगा।

हर दिन मेरी बेचैनी बढ़ने लगी और उस से बात करने के लिए में रोज आंटी की तबियत पूछने के बहाने नवीन के घर जाता रहा, पूरीपूरी शाम और रात छत पर घूमता था लेकिन वह नजर नहीं आती। मेरा हाल दीवानों सा हो गया था। आखिर एक दिन मुझे वह सुपर मार्केट में मिल गई। मैं ने उस का रास्ता रोक लिया। उस का हाथ कस कर जकड़ लिया,”तुम मुझे अवाइड क्यों कर रही हो? ऐसा क्यों कर रही हो तुम मेरे साथ?”

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा हाथ पकड़ने की, हो कौन तुम? मैं तुम को जानती तक नहीं,” गुस्से से तमतमाते हुए उस ने कहा तो मैं आश्चर्य से अधिक रुआंसा हो गया।

“यह क्या कह रही हो तुम श्रेया, ऐसा मत कहो, मैं तुम से प्यार करता हूं, तुम्हारे बिना मैं रह नहीं पाऊंगा, प्लीज…” मैं लगभग रोने लगा था। मैं ने एक पल के लिए उस के चेहरे पर करुणा देखी, लगा वह अभी रो देगी और मेरे सीने से आ लगेगी, लेकिन अगले ही पल उस का चेहरा पत्थर सा सपाट हो गया। उस ने शांत और स्थिर स्वर में कहा,”तुम ने मुझे प्यार नहीं किया रोहित, मैं ने प्यार नहीं किया। हां, तुम ने प्यार नहीं किया। प्यार शीतल होता है, तुम प्यासे हो, प्यार तृप्त होता है, तुम अतृप्त हो, प्यार पूरा होता है, तुम अधूरे हो…”

“यह सब तुम क्या कह रही हो, क्यों कह रही हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। हम ने बहुत प्यारे लम्हे साथ बिताए हैं, हम ने अपना सबकुछ शेयर किया है। हम ने सिर्फ 2 ही रातें साथ बिताई है रोहित, पहली रात मुझे तुम से प्यार होने लगा था, बहुत प्यारे लगे थे तुम, बिलकुल वैसे ही जिस के साथ मैं सहज रह सकूं, जिस को बता सकूं कि मेरा हर राज, हर दुख, हर सपना, लेकिन तुम ने जो कुछ मुझे दिया वह सब अगली ही रात वापस ले लिया यानी हिसाब बराबर।

मैं थके पांव वापस घर आ कर बिस्तर पर निढाल लेट गया। सच तो कह रही थी वह। मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था और इस सिगरेट की गंदी लत पर भी। मैं उठा और सिगरेट के डब्बे को डस्टबिन में फेंक दिया। Beautiful Love Story In Hindi.

लेखक- सूरज नाहट

Family Story In Hindi: धक्का- मनीषा के त्याग को लेकर जितेन ने क्या कहा?

Family Story In Hindi: ‘‘खैर, खुशी तो हमें तुम्हारी हर सफलता पर होती रही है और यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) द्वारा तुम्हारे चुने जाने पर अब हमें गर्व भी हो रहा है मगर एक बात रह-रह कर खटक रही है,’’ उदयशंकर अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए बीच में थोड़ा रुक गए, ‘‘तुम्हारे इतने दूर जाने के बाद तुम्हारी मम्मी एकदम अकेली रह जाएंगी.’’

‘‘छोडि़ए भी, उदय भैया, अकेली रह जाऊंगी? आप सब जो हैं यहां,’’ मनीषा जल्दी से बोली. अपने मन की बात उदयशंकर की जबान पर आती देख कर वह विह्वल हो उठी थी.

‘‘हम तो खैर मरते दम तक यहीं रहेंगे. लेकिन हम में और जितेन में बहुत फर्क है.’’

‘‘वह फर्क तो आप की नजरों में होगा, चाचाजी. पापा के गुजरने के बाद मैंने आप को ही उन की जगह समझा है. आप को अपना बुजुर्ग और मम्मी का संरक्षक समझता हूं,’’ जितेन बोला.

‘‘लीजिए, उदय भैया. अब आप केवल राजन के मित्र ही नहीं, जितेन द्वारा बनाए गए मेरे संरक्षक भी हो गए हैं,’’ मनीषा हंसी.

‘‘उसमें मुझे कोई एतराज नहीं है, मनीषा. मुझसे जो भी हो सकेगा तुम्हारे लिए करूंगा. मगर, मनीषा, मैं या मेरे बच्चे हमेशा गैर रहेंगे. सोचता हूं अगर जितेन यूनेस्को की नौकरी का विचार छोड़ दे तो कैसा रहे?’’

‘‘क्या बात कर रहे हैं, चाचाजी? लोग तो ऐसी नौकरी का सपना देखते रहते हैं, इसके लिए नाक रगड़ने को तैयार रहते हैं और मुझे तो फिर इस नौकरी के लिए खास बुलाया गया है और आप कहते हैं कि मैं न जाऊं. कमाल है,’’ जितेन चिढ़कर बोला.

‘‘लेकिन, तुम्हारी यह नौकरी भी क्या बुरी है? यहां भी तुम्हें खास बुलाया गया था और आगे तरक्की के मौके भी बहुत हैं. भविष्य तो तुम्हारा यहां भी उज्ज्वल है.’’

‘‘चाचाजी, आप ने अपने क्लब का स्विमिंग पूल भी देखा है और समुद्र भी. सो, दोनों का फर्क भी आप समझते ही होंगे,’’ जितेन मुसकराया.

‘‘मैं तो समझता हूं, बरखुरदार, लेकिन लगता है तुम नहीं समझते. क्लब के स्विमिंग पूल का पानी अकसर बदला जाता है, सो साफ-सुथरा रहता है. मगर समुद्र में तो दुनिया-जहान का कचरा बह कर जाता है. फिर उस में तूफान भी हैं, चट्टानें भी और खतरनाक समुद्री जीव भी. यूनेस्को की नौकरी का मतलब है पिछड़े देशों में जा कर अविकसित चीजों का विकास करना, पिछड़ी जातियों का आधुनिकीकरण करना. काफी टेढ़ा काम होगा.’’

‘‘जिंदगी में तरक्की करने के लिए टेढ़े और मुश्किल काम तो करने ही पड़ते हैं, चाचाजी. और फिर जिन्हें समुद्र में तैरने का शौक पड़ जाए वे स्विमिंग पूल में नहीं तैर पाते.’’

‘‘यही सोच कर तो कह रहा हूं, बेटे, कि तुम समुद्र के शौक में मत पड़ो. उस में फंस कर तुम मनीषा से बहुत दूर हो जाओगे. माना कि अब संपर्क साधनों की कमी नहीं, लगता है मानो आमनेसामने बैठ कर बातें कर रहे हैं. फिर भी, दूरी तो दूरी ही है. राजन के गुजरने के बाद मनीषा सिर्फ तुम्हारे लिए ही जी रही है. तुम्हारा क्या खयाल है? सिर्फ आपसी बातचीत के सहारे वह जी सकेगी, टूट नहीं जाएगी?’’

‘‘जानता हूं, चाचाजी. तभी तो मम्मी को आप के सुपुर्द कर के जा रहा हूं. मैं कोशिश करूंगा कि जल्दी ही इन्हें वहां बुला लूं.’’

‘‘और भी ज्यादा परेशान होने को. यहां की इतने साल की प्रभुत्व की नौकरी, पुराने दोस्त और रिश्ते छोड़ कर नए माहौल को अपनाना मनीषा के लिए आसान होगा? अगर कोई अच्छी जगह होती तो भी ठीक था, लेकिन तुम तो अफ्रीकी या अरब इलाकों में ही जाओगे. वहां खुश रहना मनीषा के लिए मुमकिन न होगा.’’

‘‘फिर भी हालात से समझौता तो करना ही पड़ेगा, चाचाजी. महज इस वजह से कि मेरे जाने से मम्मी अकेली रह जाएंगी, इत्तफाक से मिला यह सुनहरा अवसर मैं छोड़ने वाला नहीं हूं.’’

‘‘बहुत अच्छा हुआ, यह बात तू ने मम्मी के जाने के बाद कही,’’ उदयशंकर ने एक गहरी सांस खींच कर कहा.

‘‘क्यों? मम्मी तो स्वयं ही यह नहीं चाहेंगी कि उन की वजह से मेरा कैरियर खराब हो या मैं जिंदगी में आगे न बढ़ सकूं.’’

‘‘बेशक, लेकिन जो बात तुम ने अभी कही थी न, वही तुम्हारे पापा ने उन्हें आज से 25 वर्षों पहले बताई थी.’’

उसे सुन कर उन्हें राजन की याद आ जाना स्वाभाविक ही था. दरवाजे के पीछे खड़ी मनीषा का दिल धक्क से हो गया.

‘‘क्या बताया था पापा ने मम्मी को?’’ जितेन आश्चर्य से पूछ रहा था.

नीषा ने चाहा कि वह जा कर उदयशंकर को रोक दे. उस ने जो बात उदयशंकर को अपना घनिष्ठ मित्र समझ कर बताई थी उसे जितेन को बताने का उदय को कोई हक नहीं था. वह नहीं चाहती थी कि यह बात सुन कर जितेन उदारता अथवा एहसान के बोझ से दब जाए और मनीषा के प्रति उतना कृतज्ञ न हो पाने की वजह से उस के दिल में अपराधभावना आ जाए, मगर मनीषा के पैर जैसे जमीन से चिपक कर रह गए.

उदयशंकर बता रहे थे, ‘‘तुम्हारी मम्मी कितनी मेधावी थीं, शायद इस का तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा. उन जैसी प्रतिभाशाली लड़की को इतनी जल्दी प्यार और शादी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए था और अगर शादी कर भी ली थी तो कम से कम घर और बच्चों के मोह से तो बचे ही रहना चाहिए था. पर मनीषा ने घर और बच्चों के चक्कर में अपनी प्रतिभा आम घरेलू औरतों की तरह नष्ट कर दी.’’

‘‘खैर, यह तो आप ज्यादती कर रहे हैं, चाचाजी. मम्मी आम घरेलू औरत एकदम नहीं हैं,’’ जितेन ने प्रतिवाद किया, ‘‘मगर पापा ने क्या कहा था, वह बताइए न?’’

‘‘वही बता रहा हूं. तुम्हारी मम्मी ने कभी तुम से जिक्र भी नहीं किया होगा कि उन्हें एक बार हाइडलबर्ग के इंस्टिट्यूट औफ एडवांस्ड साइंसैज ऐंड टैक्नोलौजी में पीएचडी के लिए चुना गया था. तुम्हारी दादी और राजन ने तुम्हारी पूरी देखभाल करने का आश्वासन दिया था.  फिर भी मनीषा जाने को तैयार नहीं हुईं, महज तुम्हारी वजह से.’’

‘‘मैं उस समय कितना बड़ा था?’’

‘‘यही कोई 5-6 महीने के यानी जिस उम्र में मां ही होती है जो दूध पिला दे. और दूध तुम बोतल से पीते थे. सो, तुम्हारी दादी और पापा तुम्हारी देखभाल मजे से कर सकते थे. लेकिन तुम्हारी मम्मी को तसल्ली नहीं हो रही थी. उन के अपने शब्दों में कहूं तो ‘इतने छोटे बच्चे को छोड़ने को मन नहीं मानता. वह मुझे पहचानने लग गया है. मेरे जाने के बाद वह मुझे जरूर ढूंढ़ेगा. बोल तो सकता नहीं कि कुछ पूछ सके या बताए जाने पर समझ सके. उस के दिल पर न जाने इस का क्या असर पड़ेगा? हो सकता है इस से उस के दिल में कोई हीनभावना उत्पन्न हो जाए और मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा किसी हीनभावना के साथ बड़ा हो. मैं, डा. मनीषा, एक जानीमानी औयल टैक्नोलौजिस्ट की जगह एक स्वस्थ, होनहार बच्चे की मां कहलाना ज्यादा पसंद करूंगी.’’’

मनीषा और ज्यादा नहीं सुन सकी. उसे उस शाम की अपनी और राजन की बातचीत याद हो आई.

‘तुम्हारा बच्चा अभी तुम्हें ढूंढ़ने, कुछ सोचने और ग्रंथि बनाने की उम्र में नहीं है. पर जब वह कुछ सोचनेसमझने की उम्र में पहुंचेगा तब वह अपनी ही जिंदगी जीना चाहेगा और तुम्हारी खुशी के लिए अपनी किसी भी खुशी का गला नहीं घोंटेगा. यह समझ लो, मनीषा,’ राजन ने उसे समझाना चाहा था.

‘उस की नौबत ही नहीं आएगी, राजन. मेरी और मेरे बेटे की खुशियां अलगअलग नहीं होंगी. बेटे की खुशी ही मेरी खुशी होगी,’ उस ने बड़े दर्द से क था.

‘यानी तुम अपना अस्तित्व अपने बेटे के लिए ऐसे ही लुप्त कर दोगी. याद रखो, मनीषा, चंद सालों के बाद तुम पाओगी कि न तुम्हारे पास बेटा है और न अपना अस्तित्व, और फिर तुम अस्तित्वविहीन हो कर शून्य में भटकती फिरोगी, खुद को और अपने बेटे को कोसती जिस के लिए तुम ने स्वयं को नष्ट कर दिया.’

‘नहीं, मैं बेटे की ख्याति, सुख और समृद्धि के सागर में तैरूंगी. जब मेरा बेटा गर्व से यह कहेगा कि आज मैं जो कुछ भी हूं अपनी मम्मी की वजह से हूं तो उस समय मेरे गौरव की सीमा की कल्पना भी नहीं की जा सकती.’

‘यह सब तुम्हारी खुशफहमी है, मनीषा. जब तक तुम्हारा बेटा बड़ा होगा उस समय तक अपनी सफलता का श्रेय दूसरों को देने का चलन ही नहीं रहेगा. तुम्हारा बेटा कहेगा कि मैं जो कुछ भी हूं अपनी मेहनत और अपनी बुद्धि के बल पर हूं. यदि मांबाप ने बुद्धि के विकास के लिए कुछ सुविधाएं जुटा दी थीं तो यह उन की जिम्मेदारी थी. उन्होंने अपनी मरजी से हमें पैदा किया है, हमारे कहने से नहीं.’

‘चलिए, आप की यह बात भी मान ली. लेकिन दूर से चुप रह कर भी तो अपने बेटे की सुखसमृद्धि का आनंद उठाया जा सकता है.’

‘हां, अगर दूर और तटस्थ रह कर उस की खुशी में खुश रह सकती हो, तो बात अलग है. लेकिन अगर तुम चाहो कि तुम ने उस के लिए जो त्याग किया है उस के प्रतिदानस्वरूप वह भी तुम्हारे लिए कुछ त्याग कर के दे, तो नामुमकिन है. जहां तक मेरा खयाल है, वह अधिक समय तक तुम्हारे पास भी नहीं रहेगा. आजकल पढ़ाई काफी विस्तृत हो रही है.’

‘चलिए, बेटा रहे न रहे, बेटे के पापा तो मेरे पास ही रहेंगे न?’ मनीषा ने कहा था और सफाई से बात बदल दी थी. ‘वैसे मूर्खताओं में साथ देने के पक्ष में मैं नहीं हूं लेकिन तुम्हारा साथ तो देना ही पड़ेगा,’ राजन हंस कर बोले थे.

लेकिन, कहां दे पाए थे राजन साथ. जितेन अभी कालेज के प्रथम वर्ष में ही था कि एक दिन सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो कर वे उस का साथ छोड़ गए थे.

‘‘मम्मी, कहां हो तुम?’’ जितेन के उत्तेजित स्वर से मनीषा चौंक पड़ी. कर दिया न उदयशंकर ने सर्वनाश. जितेन को बता दिया और अब वह कहने आ रहा है कि यूनेस्को की नौकरी से इनकार कर देगा. मनीषा ने मन ही मन फैसला किया कि वह उसे क्या कह कर और क्याक्या कसमें दे कर जाने को मजबूर करेगी.

‘‘हां, बेटे, क्या बात है?’’

‘‘उदय चाचा कह रहे थे कि तुम ने मेरे लिए जीवन में आया एक सुनहरा मौका खो दिया?’’

‘‘हां, मगर वह मैं ने तुम्हारे लिए नहीं, अपनी ममता के लिए किया था. उस का तुम पर कोई एहसान नहीं है.’’

‘‘तुम एहसान की बात कर रही हो, मम्मी, और मैं समझता हूं कि इस से बड़ा मेरा कोई और उपकार नहीं कर सकती थीं,’’ जितेन तड़प कर बोला, ‘‘मैं आप को काफी समझदार औरत समझता था, लेकिन आप भी बस प्यार में ही बच्चे का भला समझने वाली औरत निकलीं. उस समय आप ने शायद यह नहीं सोचा कि आप की ज्यादा लियाकत का असर आप के बेटे के भविष्य पर क्या पड़ेगा?’’

जितेन की बात सुन कर मनीषा चुप रही, तो वह फिर बोला, ‘‘आज अगर आप के पास डौक्टरेट की डिगरी होती तो शायद पापा के गुजरने के बाद आप की पुरानी यूनिवर्सिटी आप को बुला लेती. हम लोग वहीं जा कर रहने लगते और मैं बजाय अफ्रीकीएशियाई देशों में जा कर, एक पश्चिमी औद्योगिक देश में काम करने का मौका पाता. यही नहीं, मेरी पढ़ाई पर इस का काफी असर पड़ता. निश्चित ही आप की आय तब ज्यादा होती. घर में ही एक प्रयोगशाला बनाने की जो मेरी तमन्ना थी, वह अगर हमारे पास ज्यादा पैसा होता तो पूरी हो जाती और उस का असर मेरे रिजल्ट पर भी पड़ता.’’ जितेन के स्वर में भर्त्सना थी.

‘‘हमेशा ही विश्वविद्यालय में फर्स्ट आता है. अरे छोड़ भी. उस से ज्यादा अच्छा रिजल्ट और क्या लाता?’’ मनीषा ने हंस कर बात टालनी चाही.

‘‘वही तो आप समझने की कोशिश नहीं करतीं. 85 प्रतिशत अंकों की जगह 95 प्रतिशत अंक पाना क्या बेहतर नहीं है? खैर, आप जो भी कहिए, आप ने वह फैलोशिप अस्वीकार कर के मेरा जो अहित किया है उस के लिए मैं आप को कभी माफ नहीं कर सकता,’’ कह कर जितेन तेजी से बाहर चला गया.

मनीषा जैसे टूट कर कुरसी पर गिर पड़ी. जितेन की कृतघ्नता या उदासीनता के लिए वह अपने को बरसों से तैयार करती आ रही थी, पर उस के इस आरोप के धक्के को सह सकना जरा मुश्किल था. Family Story In Hindi.

Hindi Family Story: फर्ज- क्या उस्मान निभा पाया अपने बेटे होने का फर्ज?

Hindi Family Story: जयपुर के सिटी अस्पताल में उस्मान का इलाज चलते 15 दिनों से भी ज्यादा हो गए थे लेकिन उस की तबीयत में सुधार नहीं हो रहा था.

आईसीयू वार्ड के सामने परेशान सरफराज लगातार इधर से उधर चक्कर लगा रहे थे. बेचैनी में कभी डाक्टरों से अपने बेटे की जिंदगी की भीख मांगते तो कभी फर्श पर बैठ कर फूटफूट कर रोने लग जाते.

उधर, अस्पताल के एक कोने में खड़ी उस्मान की मां फरजाना भी बेटे की सलामती के लिए नर्सों की खुशामद कर रही थी. तभी आईसीयू वार्ड से डाक्टर बाहर निकले तो सरफराज उन के पीछेपीछे दौड़े और उन के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहने लगे, ‘‘डाक्टर साहब, मेरे उस्मान को बचा लो. कुछ भी करो. उस के इलाज में कमी नहीं होनी चाहिए.’’

डाक्टर ने उन्हें उठा कर तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘देखिए अंकल, हम आप के बेटे को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं. उस की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है. औपरेशन और दवाओं को मिला कर कुल 5 लाख रुपए का खर्चा आएगा.’’

 

‘‘कैसे भी हो, आप मेरे बेटे को बचा लो, डाक्टर साहब. मैं 1-2 दिनों में पैसों का इंतजाम करता हूं,’’ सरफराज ने हाथ जोड़ कर कहा.

काफी भागदौड़ के बाद भी जब सरफराज से सिर्फ 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका तो निराश हो कर उस ने बेटी नजमा को मदद के लिए दिल्ली फोन मिलाया. उधर से फोन पर दामाद अनवर की आवाज आई.

‘‘हैलो अब्बू, क्या हुआ, कैसे फोन किया?’’

‘‘बेटा अनवर, उस्मान की हालत ज्यादा ही खराब है. उस के औपरेशन और इलाज के लिए 5 लाख रुपयों की जरूरत थी. हम से 2 लाख रुपयों का ही इंतजाम हो सका. बेटा…’’ और सरफराज का गला भर आया.

इस के पहले कि उन की बात पूरी होती, उधर से अनवर ने कहा, ‘‘अब्बू, आप बिलकुल फिक्र न करें. मैं तो आ नहीं पाऊंगा, लेकिन नजमा कल सुबह पैसे ले कर आप के पास पहुंच जाएगी.’’

दूसरे दिन नजमा पैसे ले कर जयपुर पहुंच गई. आखिरकार सफल औपरेशन के बाद डाक्टरों ने उस्मान को बचा लिया.

धीरेधीरे 10 साल गुजर गए. इस बीच सरफराज ने गांव की कुछ जमीन बेच कर उस्मान को इंजीनियरिंग की पढ़ाई करवाई और मुंबई एअरपोर्ट पर उस की नौकरी लग गई. उस ने अपने साथ काम करने वाली लड़की रेणु से शादी भी कर ली और ससुराल में ही रहने लगा.

इस के बाद उस्मान का मांबाप से मिलने आना बंद हो गया. कई बार वे बीमार हुए. उसे खबर भी दी, फिर भी वह नहीं आया. ईद, बकरीद तक पर भी वह फोन पर भी मुबारकबाद नहीं देता.

एक दिन सुबह टैलीफोन की घंटी बजी. सरफराज ने फोन उठाया उधर से उस्मान बोल रहा था, ‘‘हैलो अब्बा, कैसे हैं आप सब लोग? अब्बा, मुझे एक परेशानी आ गई है. मुझे 10 लाख रुपयों की सख्त जरूरत है. मैं 1-2 दिनों में पैसे लेने आ जाता हूं.’’

‘‘बेटा, तेरे औपरेशन के वक्त नजमा से उधार लिए 3 लाख रुपए चुकाने ही मुश्किल हो रहा है. ऐसे में मुझ से 10 लाख रुपयों का इंतजाम नहीं हो सकेगा. मैं मजबूर हूं बेटा,’’ सरफराज ने कहा.

इस के आगे सरफराज कुछ बोलते, उस्मान गुस्से से भड़क उठा, ‘‘अब्बा, मुझे आप से यही उम्मीद थी. मुझे पता था कि आप यही कहोगे. आप ने जिंदगी में मेरे लिए किया ही क्या है?’’ और उस ने फोन काट दिया.

अपने बेटे की ऐसी बातें सुन कर सरफराज को गहरा सदमा लगा. वे गुमसुम रहने लगे. घर में पड़े बड़बड़ाते रहते.

एक दिन अचानक शाम को सीने में दर्द के बाद वे लड़खड़ा कर गिर पड़े तो बीवी फरजाना ने उन्हें पलंग पर लिटा दिया. कुछ देर बाद आए डाक्टर ने जांच की और कहा, ‘‘चाचाजी की तबीयत ज्यादा खराब है, उन्हें बड़े अस्पताल ले जाना पड़ेगा.’’

डाक्टर साहब की बात सुन कर घबराई फरजाना ने बेटे उस्मान को फोन कर बीमार बाप से मिलने आने की अपील करते हुए आखिरी वक्त होने की दुहाई भी दी.

जवाब में उधर से फोन पर उस्मान ने अम्मी से काफी भलाबुरा कहा. गुस्से में भरे उस्मान ने यह तक कह दिया, ‘‘आप लोगों से अब मेरा कोई रिश्ता नहीं है. आइंदा मुझे फोन भी मत करना.’’

यह सुन कर फरजाना पसीने से लथपथ हो गई. वो चकरा कर जमीन पर बैठ गई. कुछ देर बाद अपनेआप को संभाल कर उस ने नजमा को दिल्ली फोन किया, ‘‘हैलो नजमा, बेटी, तेरे अब्बा की तबीयत बहुत खराब है. तू अनवर से इजाजत ले कर कुछ दिनों के लिए यहां आ जा. तेरे अब्बा तुझे बारबार याद कर रहे हैं.’’

नजमा ने उधर से फौरन जवाब दिया, ‘‘अम्मी आप बिलकुल मत घबराना. मैं आज ही शाम तक अनवर के साथ आप के पास पहुंच जाऊंगी.’’

शाम होतेहोते नजमा और अनवर जब  घर पर पहुंचे तो खानदान के लोग सरफराज के पलंग के आसपास बैठे थे. नजमा भाग कर अब्बा से लिपट गई. दोनों बापबेटी बड़ी देर तक रोते रहे.

‘‘देखो अब्बा, मैं आ गई हूं. आप अब मेरे साथ दिल्ली चलोगे. वहां हम आप को बढि़या इलाज करवाएंगे. आप बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे,’’ नजमा ने रोतेरोते कहा.

आंखें खोलने की कोशिश करते सरफराज बड़ी देर तक नजमा के सिर पर हाथ फेरते रहे. आंखों से टपकते आंसुओं को पोंछ कर बुझी आवाज में उन्होंने कहा, ‘‘नजमा बेटी, अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा. अब तू जो आ गई है. मुझे सुकून से मौत आ जाएगी.’’

‘‘ऐसा मत बोलो, अब्बा. आप को कुछ नहीं होगा,’’ यह कह कर नजमा ने अब्बा का सिर अपनी गोद में रख लिया. अम्मी को बुला कर उस ने कह दिया, ‘‘अम्मी आप ने खूब खिदमत कर ली. अब मुझे अपना फर्ज अदा करने दो.’’

उस के बाद तो नजमा ने अब्बा सरफराज की खिदमत में दिनरात एक कर दिए. टाइम पर दवा, चाय, नाश्ता, खाना, नहलाना और घंटों तक पैर दबाते रहना, सारी रात पलंग पर बैठ कर जागना उस का रोजाना का काम हो गया.

कई बार सरफराज ने नजमा से ये सब करने से मना भी किया पर नजमा यही कहती, ‘‘अब्बा, आप ने हमारे लिए क्या नहीं किया. आप भी हमें अपने हाथों से खिलाते, नहलाते, स्कूल ले जाते, कंधों पर बैठा कर घुमाते थे. सबकुछ तो किया. अब मेरा फर्ज अदा करने का वक्त है. मुझे मत रोको, अब्बा.’’

बेटी की बात सुन कर सरफराज चुप हो गए. इधर, सरफराज की हालत दिन पर दिन गिरती चली गई. उन का खानापीना तक बंद हो गया.

एक दिन दोपहर के वक्त नजमा अब्बा का सिर गोद में ले कर चम्मच से पानी पिला रही थी. तभी घर के बाहर कार के रुकने की आवाज सुनाई दी.

कुछ देर बाद उस्मान एक वकील को साथ ले कर अंदर आया. उस के हाथ में टाइप किए हुए कुछ कागजात थे. अचानक बरसों बाद बिना इत्तला दिए उस को घर आया देख कर सभी खुश हो रहे थे.

दरवाजे से घुसते ही वह लपक कर सरफराज के नजदीक जा कर आवाज देने लगा, ‘‘अब्बा, उठो, आंखे खोलो, इन कागजात पर दस्तखत करना है. उठो, उठो,’’ यह कह कर उस ने हाथ पकड़ कर उन्हें पैन देना चाहा.

नजमा ने रोक कर पूछा, ‘‘भाईजान, ये कैसे कागजात हैं?’’

लेकिन वह किसी की बिना सुने अब्बा को आवाजें देता रहा.

सरफराज ने आंखें खोलीं. उस्मान की तरफ एक नजर देखा. और अचानक उन के हाथ में दिए कागजात और पैन नीचे गिर पड़े. उन का हाथ बेदम हो कर लटक गया. यह देख नजमा चिल्लाई, ‘‘अब्बा, अब्बा, हमें अकेला छोड़ कर मत जाओ.’’ और घर में कुहराम मच गया. नजमा बोली, ‘‘भाईजान जो मकान आप अपने नाम कराना चाहते थे वह तो 10 साल पहले अब्बू ने आप के नाम कर दिया था. आप अब फिक्र न करो.’’

ये सब देख कर उस्मान ने फुरती से अब्बा के बिना दस्तखत रह गए कागजात उठाए और वकील के साथ बिना पीछे देखे बाहर निकल गया.

फरजाना, नजमा और अनवर भाग कर पीछेपीछे आए लेकिन तब तक कार रवाना हो गई.

तीनों दरवाजे में खड़े कार की पीछे उड़ी धूल के गुबार में चकाचौंधभरी शहरी मतलब परस्त दुनिया की आंधी में फर्ज और रिश्तों की मजबूत दीवार को भरभरा कर गिरते हुए देखते रह गए. Hindi Family Story.

Hindi Story: पाई को सलाम- मुश्किलों में इस तरह होती है सच्चे दोस्त की पहचान

Hindi Story: सऊदी अरब के एक अस्पताल में काम करते हुए मुझे अलगअलग देशों के लोगों के साथ काम करने का मौका मिला. मेरे महकमे में कुल 27 मुलाजिम थे, जिन में 13 सऊदी, 5 भारतीय, 6 फिलीपीनी और 3 पाकिस्तानी थे.

यों तो सभी आपस में अंगरेजी में ही बातें किया करते थे, लेकिन हम भारतीयों की इन तीनों पाकिस्तानियों से खूब जमती थी. एक तो भाषा भी तकरीबन एकजैसी थी और हम लोगों का खानापीना भी एकजैसा ही था.

हमारे महकमे का सब से नापसंद मुलाजिम एक पाकिस्तानी कामरान था, जिसे सभी ‘पाई’ के नाम से बुलाते थे.

क्या सऊदी, क्या फिलीपीनी, यहां तक कि बाकी दोनों पाकिस्तानी भी उस को पसंद नहीं करते थे.

वैसे तो ‘पाई’ हमारे साथ ही रहता और खातापीता था, लेकिन कोई भी उस की हरकतें पसंद नहीं करता था. काम में तो वह अच्छा था, लेकिन जानबूझ कर सब से आसान काम चुनता और मुश्किल काम को कम ही हाथ लगता.

अब मैडिकल ट्रांसक्रिप्शन है ही ऐसा काम, जिस में मुश्किल फाइल करना कोई भी पसंद नहीं करता, लेकिन चूंकि काम तो खत्म करना ही होता है, तो सभी लोग मिलबांट कर मुश्किल काम कर लेते. लेकिन मजाल है, जो ‘पाई’ किसी मुश्किल फाइल को हाथ में ले ले.

‘पाई’ कुरसी पर बैठ कर आसान फाइल का इंतजार करता रहता और जैसे ही कोई आसान फाइल आती, झट से उस को अपने नाम कर लेता. उस की इसी हरकत की वजह से सभी उस से चिढ़ने लगे थे.

भारतीय पवन हो या फिलीपीनी गुलिवर या फिर सऊदी लड़की सैनब, सभी उस की इस बात पर उस से नाराज रहते. इस के अलावा ‘पाई’ एक नंबर का कंजूस था. कभीकभार सभी लोग मिल कर किसी साथी मुलाजिम को कोई पार्टी देते, तो ‘पाई’ एक पैसा भी न देता.

वह बोलता, ‘‘मैं यहां क्या इन लोगों के लिए कमाने आया हूं?’’

पार्टी के लिए एक पैसा भले ही न देता हो, पार्टी में खानेपीने में सब से आगे रहता. ‘पाई’ खुद भी जानता था कि कोई उस को पसंद नहीं करता, लेकिन इस से उस को कोई फर्क नहीं पड़ता था.

शुक्रवार को सऊदी अरब में छुट्टी रहती है. मैं भी उस दिन अपने घर में ही था कि पवन का फोन आया.

फोन पर उस के रोने की आवाज सुन कर मैं परेशान हो गया. उस की सिसकियां कुछ कम हुईं, तो उस ने बताया कि उस का 10 साल का बेटा घर से गायब है. पता नहीं, किसी ने उस को किडनैप कर लिया है या वह खुद ही कहीं चला गया है, किसी को भी नहीं पता था.

मैं तुरंत पवन के कमरे में पहुंचा. जल्दी ही सरफराज, गुलिवर और नावेद भी वहां पहुंच गए. सभी पवन को तसल्ली दे रहे थे.

तभी पवन के घर से फोन आया. किसी ने उस के घर खबर दी कि उस का बेटा कोचीन जाने वाली बस में देखा गया है. सभी की राय थी कि पवन को तुरंत भारत जाना चाहिए.

मैनेजर सुसान से बात की गई. उन्होंने तुरंत पवन के जाने के लिए वीजा का इंतजाम किया. सरफराज अपनी गाड़ी में पवन और मुझे ले कर हैड औफिस गए और वीजा ले आए.

अब बड़ा सवाल था भारत जाने के लिए टिकट का इंतजाम करना. महीने का आखिरी हफ्ता चल रहा था और हम सभी अपनीअपनी तनख्वाह अपनेअपने देश को भेज चुके थे. सभी के पास थोड़ेबहुत पैसे बचे हुए थे, जो कि टिकट की आधी रकम भी नहीं होती.

मैं और सरफराज अपनेअपने जानने वालों को फोन कर रहे थे कि तभी वहां ‘पाई’ आ गया. हम में से किसी ने भी उस को पवन के बारे में नहीं बताया था. एक तो शायद इसलिए कि ‘पाई’ और पवन की कुछ खास बनती नहीं थी, दूसरे, इसलिए भी कि उस से हमें किसी मदद की उम्मीद भी नहीं थी.

‘पाई’ पवन से उस के बेटे के बारे में पूछताछ कर रहा था. बातोंबातों में उस को पता चला कि भारत जाने के लिए टिकट के पैसे कम पड़ रहे हैं. हम लोग अपनेअपने फोन पर मसरूफ थे और पता ही नहीं चला कि कब ‘पाई’ उठ कर वहां से चला गया.

‘‘उस को लगा होगा कि उस से कोई पैसे न मांग ले,’’ फिलीपीनी गुलिवर ने अपने विचार रखे.

तकरीबन 10 मिनट बाद ‘पाई’ आया और पवन के हाथ में 5 हजार रियाल रख दिए और कहने लगा, ‘‘जाओ, जल्दी से टिकट ले लो, ताकि आज की ही फ्लाइट मिल जाए. अगर और पैसों की जरूरत हो, तो बेझिझक बता देना. मैं अपने पैसे इकट्ठा 2-3 महीने में ही भेजता हूं, इसलिए अभी मेरे पास और भी पैसे हैं.’’

यह सुन कर पवन भावुक हो गया और ‘पाई’ को गले लगा लिया, ‘‘शुक्रिया ‘पाई’, मुसीबत के समय में मेरी मदद कर के तुम ने मुझे जिंदगीभर का कर्जदार बना लिया है.’’

‘‘कर्ज कैसा, हम सब एक परिवार ही तो हैं. मुसीबत के समय अगर हम एकदूसरे की मदद नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?’’

‘पाई’ का यह रूप देख कर मेरे मन में उस के प्रति जितनी भी बुरी भावनाएं थीं, तुरंत दूर हो गईं.

किसी ने सच ही कहा है कि दोस्त की पहचान मुसीबत के समय में ही होती है. और मुसीबत की इस घड़ी में पवन की मदद कर के ‘पाई’ ने अपने सच्चे दोस्त होने का सुबूत दे दिया.

‘पाई’ के इस अच्छे काम से मेरा मन उस के लिए श्रद्धा से भर गया. Hindi Story

Hindi Religious Story: सनातन- अमृत या विष?

Hindi Religious Story: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पुत्र व भूतपूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि के पौत्र उदयनिधि के सनातन कहे जाने वाले धर्म की आलोचना पर बिफरना शुरू कर दिया है. नरेंद्र मोदी ने विधानसभा चुनावों के दौरान एक नेता के व्यक्तिगत बयान, जो असल में सच है और जमीनी है, को विपक्षी दलों के एक मंच ‘इंडिया’ से जोड़ कर धर्म की राजनीति फिर शुरू कर दी.

सनातन धर्म क्या और कैसा है, इस के लिए भेदभाव ढूंढ़ने की जरूरत ज्यादा नहीं. इस की खबरें तो वैसे ही आसमान से टपकती रहती हैं जैसे कबूतरों की बीटें.

ओडिशा के हिंदुओं के प्रिय पुरी के जगन्नाथ मंदिर में तीनों भगवानों की मूर्तियों को 15 सितंबर, 2023 को दिनभर भूखा रहना पड़ा क्योंकि जो भोग सुबह 8.30 बजे लगता था, शाम को 5.30 बजे लगा. कारण था पुजारियों की हड़ताल.

सर्वशक्तिमान लौर्ड जगन्नाथ के सर्व शक्तिमान पुजारियों की शिकायत थी कि एक दिन पहले एक पुजारी जिस ने 2017 में इंटरकास्ट शादी की थी, मंदिर में जबरन घुस कर पूजा कर आया था. इस पर नाराज पुरोहितों ने हड़ताल कर दी और सर्वशक्तिमान लौर्ड जगन्नाथ को भोग तक नहीं लगाया.

जब मंदिर के चीफ एडमिनिस्ट्रेटर रंजन दास ने मंदिर की शुद्धि का वादा किया और अपने ही धर्म, अपनी ही जाति के एक पुजारी के प्रवेश से दूषित हो गए लौर्ड जगन्नाथ में फिर से पूजा करने का वादा किया, तो मामला सुलझ. हां, इस दौरान जगन्नाथ मंदिर में रखीं हुंडियों में पैसे पड़ते रहे क्योंकि भक्तों को नहीं रोका गया, मामला पैसे का जो था.

क्या यही सनातन धर्म है जिस का पक्ष प्रधानमंत्री रख रहे हैं जो एक पुजारी को अछूत मान लेता है जिस ने अंतर्जातीय विवाह कर लिया? क्या इसे ही बराबरी कहते हैं? क्या उस धर्म की रक्षा हो सकती है जो नीची जाति की औरत के एक पुजारी से विवाह को धर्म का एक बड़ा पाप समझता हो कि वह उक्त पुजारी को अब सर्वशक्तिमान लार्ड जगन्नाथ के लायक नहीं समझता.

इस पुजारी, जो सनातन धर्म और उस के ठेकेदारों का साथी था, को उसी के साथियों ने इसलिए रिजैक्ट कर दिया कि उस ने एक दूसरी जाति की लड़की से विवाह कर लिया. क्या यही सनातन धर्म है जो हमें आज 21वीं सदी में विरासत में मिला है और जिस के सहारे मई 2024 में या जल्दी नरेंद्र मोदी अमृतमंथन से अमृत निकालना चाह रहे हैं?

वैसे, अगर बात अमृतमंथन की करें तो क्या सनातन धर्म यह सिखाता है कि पहले दस्युओं के साथ बराबर की साझेदारी करो और फिर मोहिनी अवतार बन कर अमृत झटक ले जाओ?

सनातन धर्म के प्रचारक क्या यह बताएंगे कि जो धर्म हमें आज मिला है उस में कहां क्या विशेषता है? वैसे ईसाई, बौद्ध धर्म, इसलाम व जोरैस्ट्रियन धर्मों के मानने वालों की आज सैकड़ों खराबियां निकाली जा सकती हैं, लेकिन उन से कई गुना ज्यादा सनातन धर्म में निकाली जा सकती हैं. इस में अंगरेजों और मुगलों को दोष देने का बहाना न बनाइए. इस के लिए सिर्फ ग्रंथ पढ़ लीजिए जिन से सनातन धर्म का पानी बहता है और यह देख लें कि वह अमृत है या विष? Hindi Religious Story

Social Media Reels: रील्स मार रही हैं गानों की मधुरता, फैल रहा है नंगापन

Social Media Reels: सोशल मीडिया पर रील्स तेजी से पौपुलर हो रही हैं. यह बिजनैस का भी टूल्स बन गया है. इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर रील्स सब से अधिक ट्रैंड हो रही हैं. कई बड़े सोशल ब्रांड इस प्लेटफौर्म पर डैवलप हुए हैं. रील्स से लोग की कमाई हो रही है. क्रिकेट सुपरस्टार विराट कोहली एक इंस्टाग्राम पोस्ट से लगभग 9 करोड़ रुपए कमाते हैं. दुनियाभर में इंस्टाग्राम के एक्टिव यूजर्स की संख्या 2 अरब है. भारत में ये 32 करोड़ रुपए के आसपास है. सोशल मीडिया की बढ़ती पहुंच के चलते रील्स लोकप्रिय हो रही हैं.

सोशल मीडिया पर तमाम इंफ्लुएंसर्स हैं जिन का काम लोगों का प्रचार कर के पैसा कमाना होता है. इस वजह से रील्स के जरिए इंफ्लुएंसर्स पहले अपने फौलोअर्स बढ़ाते हैं, इस के बाद पैसा कमाते हैं. इंफ्लुएंसर्स रील्स के अलावा फोटो, वीडियो और स्टारी पोस्ट कर के प्रचार का काम करते हैं. स्टोरीज 24 घंटे तक ही लाइव रहती है. रील्स के लिए नौर्मल म्यूजिक के अलावा ट्रेंडिंग म्यूजिक का सहारा भी लिया जाता है. यह आजकल सब से अधिक पौपुलर है.

सोशल मीडिया पर रील्स बना कर फेमस हो रहे लोगों के लिए कमाई का जरिया खुल जाता है. यही वजह है कि छोटेछोटे गांवकस्बे के लड़केलड़कियां रील्स बनाते रहते हैं.

रील्स के जरिए रातोंरात फेमस हो कर इंफ्लुएंसर्स की कैटेगरी मिल जाती है. इस के बाद प्रचार करने के बदले पैसा मिलता है. सैक्स, बोल्ड विषय, गालियां, देहाती कहावतें, स्ट्रीट फूड और मोटिवेशनल स्पीच भी रील्स में खूब पसंद की जाती हैं. रातोंरात फेमस होने की चाह में संगीत की आत्मा मर रही है.

म्यूजिक के साथ है रील्स का गहरा रिश्ता

20 सैकंड से ले कर 50 सैकंड में ही रील्स का सफर खत्म हो जाता है. इस से मुखड़े भले ही फेमस हो जाएं लेकिन गीत और संगीत की आत्मा खत्म हो जाती है. इस की वजह यह है कि गानों का मजा उस के पूरी सुनने में होता है. गाने लिखने वाला पहले गाना लिखता है इस के बाद संगीतकार उस को धुन देता है तब गायक गाता है. इस के बाद उस का फिल्माकंन होता है. यह काम पूरे इत्मीनान और तैयारी से होता है. गाने पर डांस करने वाले को भी कोरियोग्राफर स्टेप्स सिखाता है. तब उस डांस की शूटिंग होती है. इस के बाद दर्शकों तक पहुंचता है. तो गाने और डांस दोनों को देख कर मजा आता है.

रील्स में यही काम अचानक होता है. 5 से 7 मिनट तक के गाने को 20 से 50 सैकंड में समेट दिया जाता है. इतने कम समय में गाने की पहली लाइन ही आ पाती है. म्यूजिक भी केवल एकदो लाइन का ही हो पाता है. रील्स में न पूरा गाना सुनाई देता है और न ही म्यूजिक समझ आता है. इस से गीत, संगीत और एक्टिंग तीनों की आत्मा मर रही है.

मोबाइल में सिमट गई पूरी दुनिया में अचानक सब कुछ रिकौर्ड हो जाता है. सोशल मीडिया पर गाने और म्यूजिक दोनों मिल जाते हैं. आधेअधूरे डांस कर के तैयार रील्स को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया जाता है. देखने वाले भी इस आधेअधूरे मैटेरियल को खुश हो कर देखते हैं, जिस के बाद म्यूजिक ट्रेंडिंग में जाता है.

नए गायक ले रहे रील्स का सहारा

रील्स में वैसे तो हर तरह के गाने आ रहे हैं. सब से ज्यादा सुने जाने वाले गानों में पंजाबी और भोजपुरी गाने हैं. लोकगीतों को ज्यादा पसंद किया जा रहा है. यह लोगों की समझ में आ जाते हैं और थिरकने के लिए मजबूर कर देते हैं. नए गायक कलाकार अपने गानों के प्रचार के लिए रील्स का सहारा लेते हैं. रील्स के ट्रेंडिंग यानी वायरल होने पर गाने भी सुने जाने लगते हैं. इन की रीच मिलियंस में होती है. इस के बाद यह गाने गायक की कमाई का जरिया बन जाते हैं.

रील्स के साथ सब से बड़ी बात यह होती है कि देखने वाले को अगर लत लग गई तो वह जब देखना शुरु करता है तो उसे छोड़ना मुश्किल हो जाता है. एक के बाद दूसरी रील स्क्रोल कर के आगे बढ़ाई जाने लगती है. जिस तरह के गाने वाली रील्स को ठहर कर देखते हैं सोशल मीडिया आप की पसंद समझ कर उसी तरह की रील्स दिखाने लगती है. दर्शकों को पसंद आने वाली खूबियों के बीच रील्स गीत, संगीत और एक्टिंग की आत्मा को मारने का काम कर रही है. वायरल होने वाली खूबियों के बीच इस के नुकसान अभी समझ नहीं आ रहे हैं. Social Media Reels

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