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Family Story : कोयले की लकीर – सुगंधा खुश थी या दुखी ?

Family Story : विनी ने सोचा न था जिस पितातुल्य इंसान पर वह विश्वास कर रही है वह इंसान उस विश्वास और सम्मान को एक झटके में समाप्त कर देगा. तो क्या वह अपने छलनी तनमन के साथ हार मान बैठ गई? विनी की प्रसन्नता की सीमा नहीं थी. एमए का रिजल्ट निकल आया था. 80 प्रतिशत मार्क्स आए थे. अपनी मम्मी सुगंधा के लिए उस ने उन की पसंद की मिठाई खरीदी और घर की तरफ उत्साह से कदम बढ़ा दिए. सुगंधा अपनी बेटी की सफलता से अभिभूत हो गईं.

खुशी से आंखें झिलमिला गईं. दोनों मांबेटी एकदूसरे के गले लग गईं. एकदूसरे का मुंह मीठा करवाया. घर में 2 ही तो लोग थे. विनी के पिता आलोक का देहांत हो गया था. सुगंधा सीधीसरल हाउसवाइफ थीं. पति की पैंशन और दुकानों के किराए से घर का खर्च चल जाता था. शाम को वे कुछ ट्यूशंस भी पढ़ाती थीं. विनी ने ड्राइंग ऐंड पेंटिंग में एमए किया था. आलोक को आर्ट्स में विशेष रुचि थी. विनी की ड्राइंग में रुचि देख कर उन्होंने उसे भी इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया था.

विनी शाम को कुछ बच्चों को ड्राइंग सिखाया करती थी. पेंटिंग के सामान का खर्च वह इन्हीं ट्यूशंस से निकाल लेती थी. सुगंधा ने बेटी को गर्वभरी नजरों से देखते हुए उस से पूछा, ‘‘अब आगे क्या इरादा है?’’ फिर विनी के जवाब देने से पहले ही उसे छेड़ने लगी, ‘‘लड़का ढूंढ़ा जाए?’’ विनी ने आंखें तरेरीं, ‘‘नहीं, अभी नहीं, अभी मुझे बहुतकुछ करना है.’’ ‘‘क्या सोचा है?’’ ‘‘पीएचडी करनी है. सोच रही हूं आज ही शेखर सर से मिल आती हूं. उन्हें ही अपना गाइड बनाना चाहती हूं. मां, आप को पता है, उन में मुझे पापा की छवि दिखती है. बस, वे मुझे अपने अंडर में काम करने दें.’’ ‘‘मैं तुम्हारे भविष्य में कोई बाधा नहीं बनूंगी, खूब पढ़ाई करो, आगे बढ़ो.’’ विनी अपनी मां की बांहों में छोटी बच्ची की तरह समा गई. सुगंधा ने भी उसे खूब प्यार किया. सुगंधा को अपनी मेहनती, मेधावी बेटी पर नाज था.

रुड़की के आरपी कालेज में एमए करने के बाद वह अपने प्रोफैसर शेखर के अधीन ही पीएचडी करना चाहती थी. शेखर का बेटा रजत विनी का बहुत अच्छा दोस्त था. बचपन से दोनों साथ पढ़े थे. पर रजत को आर्ट्स में रुचि नहीं थी, वह इंजीनियरिंग कर अब जौब की तलाश में था. दोनों हर सुखदुख बांटते थे, एकदूसरे के घर भी आनाजाना लगा रहता था. इन दोनों की दोस्ती के कारण दोनों परिवारों में भी कभीकभी मुलाकात होती रहती थी. विनी ने रजत को फोन कर अपना रिजल्ट और आगे की इच्छा बताई. रजत बहुत खुश हुआ, ‘‘अरे, यह तो बहुत अच्छा रहेगा. पापा बिलकुल सही गाइड रहेंगे. किसी अंजान प्रोफैसर के साथ काम करने से अच्छा यही रहेगा कि तुम पापा के अंडर में ही काम करो. आज ही आ जाओ घर, पापा से बात कर लो.’’ शाम को ही विनी मिठाई ले कर रजत के घर गई. शेखर के पास कुछ स्टूडैंट्स बैठे थे. विनी का बचपन से ही घर में आनाजाना था. वह निसंकोच अंदर चली गई.

शेखर की पत्नी राधा विनी पर खूब स्नेह लुटाती थी. रजत और राधा के साथ बैठ कर विनी गप्पें मारने लगी. थोड़ी देर में शेखर भी उन के साथ शामिल हो गए. दोनों ने उस की सफलता पर शुभाशीष दिए. उस की पीएचडी की इच्छा जान कर शेखर ने कहा, ‘‘ठीक है, अभी कुछ दिन लाइब्रेरी में सभी बुक्स देखो. किसकिस टौपिक पर काम हो चुका है, किस टौपिक पर रिसर्च होनी चाहिए, पहले वह डिसाइड करेंगे. फिर उस पर काम करेंगे. अभी कालेज की लाइब्रेरी में काफी नई बुक्स आई हैं, उन पर एक नजर डाल लो. देखो, क्या आइडिया आता है तुम्हें.’’ विनी उत्साहपूर्वक बोली, ‘‘सर, कल से ही लाइब्रेरी जाऊंगी. शेखर कालेज में विनी का पीरियड लेते थे. विनी उन्हें सर कहने लगी थी. रजत ने हमेशा की तरह टोका, ‘‘अरे, घर में तो पापा को सर मत कहो, विनी, अंकल कहो.’’ विनी हंस पड़ी, ‘‘नहीं, सर ही ठीक है, कहीं अंकल कहने की आदत हो गई और क्लास में मुंह से अंकल निकल गया तो क्या होगा, यह सोचो.

’’ सब विनी की इस बात पर हंस पड़े. विनी ने जातेजाते शेखर के रूम में नजर डाली. शेखर की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगती रहती थी. वह शेखर का बहुत सम्मान करती थी. हर पेंटिंग में स्त्री के अलगअलग भाव मुखर हो उठे थे. कहीं शक्ति बनी स्त्री, कहीं मातृत्व में डूबी स्त्री आकृति, कहीं प्रेयसी का रूप धरे मनोहारी आकृति, कहीं आराध्य का रूप लिए ओजपूर्ण स्त्री आकृति. शेखर के काम की मन ही मन सराहना करती हुई विनी घर लौट आई और सुगंधा को शेखर की सलाह बताई. अगले दिन से ही विनी लाइब्रेरी में किताबें पढ़ने में बिजी रहने लगी. 15 दिनों की खोजबीन के बाद उसे एक विषय सूझा. वह उत्साहित सी शेखर के घर की तरफ बढ़ गई. उसे पता था, रजत अपने दोस्तों के साथ कहीं गया हुआ था.

राधा तो अकसर घर में ही रहती थी. पर शाम को जिस समय विनी शेखर के घर पहुंची, राधा किसी काम से कहीं गई हुई थीं. शेखर घर में अकेले थे. विनी ने उन्हें विश किया. उन के हालचाल पूछे. पूछा, ‘‘आंटी नहीं हैं?’’ उन्होंने कहा, ‘‘अभी आ जाएंगी.’’ ‘‘आज बाकी स्टूडैंट्स नहीं हैं?’’ ‘‘नहीं आजकल उन्हें कुछ काम दिया हुआ है, पूरा कर के आएंगे.’’ ‘‘सर, मैं ने लाइब्रेरी में काफीकुछ देखा, ‘भारतीय गुफाओं में भित्ति चित्रण’ इस पर कुछ काम कर सकते हैं?’’ ‘‘हां, शाबाश, कुछ विषय और देख लो, फिर फाइनल करेंगे,’’ शेखर आज उस के सामने बैठ कर जिस तरह उसे देख रहे थे, विनी कुछ असहज सी हुई. वह जाने के लिए उठती हुई बोली, ‘‘ठीक है, सर, मैं अभी और पढ़ कर आऊंगी.’’

सच है, गृहस्थ हो या संन्यासी, सभी पुरुषों के अंदर एक आदिम पाश्विक वृत्ति छिपी रहती है. किस रूप में, किस उम्र में वह पशु जाग कर अपना वीभत्स रूप दिखाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. ‘‘रुको जरा, विनी मेरे लिए एक कप चाय बना दो. कुछ सिरदर्द है,’’ विनी धर्मसंकट में फंस गई. उस का दिमाग कह रहा था, फौरन चली जा, पर पिता की सी छवि वाले गुरु की बात टालने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी. फिर अपने दिल को ही समझा लिया, नहीं, उस का वहम ही होगा. आजकल माहौल ही ऐसा है न, डर लगा ही रहता है. ‘जी, सर’ कहती हुई वह किचन की तरफ बढ़ गई.

उसे अपने पीछे दरवाजा बंद करने की आहट मिली तो वह चौंक गई. शेखर उस की तरफ आ रहे थे. चेहरे पर न पिता की सी छवि दिखी, न गुरु के से भाव, विनी को उन के चेहरे पर कुटिल मुसकान दिखी. उसे महसूस हुआ जैसे वह किसी खतरे में है. शेखर एकदम उस के पास आ कर खड़े हो गए. उस के कंधों पर हाथ रखा तो विनी पीछे हटने लगी. नारी हर उम्र में पुरुष के अनुचित स्पर्श को भांप लेती है. शेखर बोले, ‘‘घबराओ मत, यह तो अब चलता ही रहेगा. थोड़े और करीब आ जाएं हम दोनों, तो रिसर्च करने में तुम्हें आसानी होगी. तुम्हारी हर मदद करूंगा मैं.’’ नागिन सी फुंफकार उठी विनी, ‘‘शर्म नहीं आती आप को? आप की बेटी जैसी हूं मैं. आप में हमेशा पिता की छवि दिखी है मुझे.’’ ‘‘मैं ने तो तुम्हें कभी बेटी नहीं समझा. तुम अपने मन में मेरे बारे में क्या सोचती हो, उस से मुझे जरा भी मतलब नहीं. आओ मेरे साथ.’’ विनी ने पीछे हटते हुए कहा, ‘‘मैं आंटी, रजत सब को बताऊंगी, आप की यह गिरी हुई हरकत छिपी नहीं रहेगी.’’ ‘‘बाद में बताती रहना, मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा,’’

कहते हुए उस का हाथ पकड़ कर बलिष्ठ शेखर उसे बैडरूम तक ले गए. विनी ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश में उन्हें काफी धक्के दिए. उन का हाथ दांतों से काट भी लिया. पर उन के सिर पर ऐसा शैतान सवार था कि विनी के रोके न रुका और दुर्घटना घट गई. सालों का आदर, विश्वास सब रेत की तरह ढहता चला गया. विनी ने रोरो कर चीखचीख कर शोर मचाया. तो शेखर ने कहा, ‘‘चुपचाप चली जाओ यहां से और जो हुआ उसे भूल जाओ. इसी में तुम्हारी भलाई है. किसी को बताओगी भी, तो जानती हो न, कितने सवालों के घेरे में फंस जाओगी. परिवार, समाज में मेरी इमेज का अंदाजा तो है ही तुम्हें.’’ ‘‘कहीं नहीं जाऊंगी मैं,’’ विनी चिल्लाई, ‘‘आने दो आंटी को, उन्हें और रजत को आप की करतूत बताए बिना मैं कहीं नहीं जाने वाली,’’ शेखर को अब हैरानी हुई, ‘‘बेवकूफी मत करो बदनाम हो जाओगी, कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी, समाज रोज तुम पर ही नएनए ढंग से कीचड़ उछालेगा, पुरुष का कुछ बिगड़ा है कभी?’’ विनी नफरतभरे स्वर में गुर्राई, ‘‘आप ने मेरा रेप किया है,

आप मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’ शेखर ने तो सोचा था विनी रोधो कर चुपचाप चली जाएगी पर वह तो अभी वैसी की वैसी बैठी हुई उन्हें गालियां दिए जा रही थी. हिली भी नहीं थी. इस स्थिति की तो उन्होंने कल्पना ही नहीं की थी. डोरबेल बजी तो उन के पसीने छूट गए, बोले, ‘‘भागो यहां से, जल्दी.’’ ‘‘मैं कहीं नहीं जा रही.’’ डोरबेल दोबारा बजी तो शेखर के हाथपैर फूल गए, दरवाजा खोला, राधा थीं. शेखर का उड़ा चेहरा देख चौंकी, ‘‘क्या हुआ?’’ शेखर इतना ही बोले, ‘‘सौरी, राधा.’’ ‘‘क्या हुआ, शेखर?’’ तभी बैडरूम से ‘आंटी’ कह कर विनी के तेजी से रोने की आवाज आई. राधा भागीं. बैड पर अर्धनग्न, बेहाल, रोने से फैले काजल की गालों पर सबकुछ स्पष्ट करती रेखा, बिखरे बाल, कराहतीरोती विनी राधा की बांहों में निढाल हो गईं. राधा जैसे पत्थर की बुत बन गई. विनी की हालत देख कर सबकुछ समझ गईं. फूटफूट कर रो पड़ीं. शेखर को धिक्कार उठीं, ‘‘यह क्या किया, हमारी बच्ची जैसी है यह. यह कुकर्म क्यों कर दिया? नफरत हो रही है तुम से.’’ राधा का रौद्र रूप देख कर शेखर सकपकाए. राधा ने उन की तरफ थूक दिया. तनमन में ऐसी आग लगी थी कि विनी को एक तरफ कर पास के कमरे में अगले हफ्ते होने वाली प्रदर्शनी के लिए रखी शेखर की तैयार 10-15 पेंटिंग्स पर वहीं रखे काले रंग से स्त्री के महान रूपों की तस्वीरों में कालिख भरती चली गईं. विनी को फिर अपने से चिपटा लिया. शेखर चुपचाप वहीं रखी एक चेयर पर बैठ गए थे. दोनों रोती रहीं, राधा और सुगंधा के अच्छे संबंध थे.

राधा ने सुगंधा को फोन किया और फौरन आने के लिए कहा. घर थोड़ी ही दूर था. सुगंधा और रजत लगभग साथसाथ ही घर में घुसे. सब स्थिति समझ कर सुगंधा तो विनी को, अपनी मृगछौने सी प्यारी बेटी को, गले से लगा कर बिलख उठी. रजत ने उन्हें संभाला. रजत ने रोते हुए विनी के आगे हाथ जोड़ दिए, ‘‘बहुत शर्मिंदा हूं, विनी, अब इस आदमी से मेरा कोई संबंध नहीं है.’’ राधा भी दृढ़ स्वर में बोल उठीं, ‘‘और मेरा भी कोई संबंध नहीं. रजत, मैं इस आदमी के साथ अब नहीं रहूंगी,’’ रजत विनी की हालत देख कर फूटफूट कर रो रहा था. बचपन की प्यारी सी दोस्त का यह हाल. वह भी उस के पिता ने, घिन्न आ रही थी उसे. सुगंधा का विलाप भी थमने का नाम नहीं ले रहा था. राधा कभी सुगंधा से माफी मांगती, कभी विनी से. शेखर को छोड़ कर सब गहरे दुख में डूबे थे. वे सोच रहे थे, सब रोधो कर अभी शांत हो जाएंगे. राधा कह रही थी, ‘‘काश, मैं विधवा होती, ऐसे पशु पति का साथ तो न होता. अपरिचितों से तो ये परिचित अधिक खतरनाक होते हैं. ये कुछ भी करें, इन्हें पता है, कोई कुछ बोलेगा नहीं. पर ऐसा नहीं होगा.’’ विनी के मुंह से जैसे ही निकला, ‘‘मेरा जीवन तो बरबाद हो गया,’’ राधा ने तुरंत कहा, ‘‘तुम्हारा क्यों बरबाद होगा, बेटी, तुम ने क्या किया है. तुम्हारा तो कोई दोष नहीं है.

अपने दिल पर यह बोझ मत रखना. इस दुष्कर्म को याद ही नहीं रखना. दुखी नहीं रहना है तुम्हें. पाप कोई और करे, दुखी कोई और हो, यह कहां का न्याय है?’’ राधा के शब्दों से जैसे सुगंधा भी होश में आई. यह समय उस के रोने का कहां था. यह तो बेटी को मानसिक संबल देने की घड़ी थी. अपने आंसू पोंछती हुई बोली, ‘‘नहीं विनी, इस घृणित इंसान का दिया घाव जल्दी नहीं भरेगा, जानती हूं, पर भरेगा जरूर, यह भी भरोसा रखो. समझ लेना बेटा, सड़क पर चलते हुए किसी कुत्ते ने काट खाया है. इस दुष्कर्मी का कुकर्म मेरी बेटी के आत्मविश्वास की मजबूत चट्टान को भरभरा कर गिरा नहीं सकता.’’ विनी फिर रोने लगी, सिसकते हुए बोली, ‘‘मेरे सारे वजूद पर कालिख सी पोत दी गई है, कैसे जिऊंगी,’’ रजत उस के पास ही जमीन पर बैठते हुए बोला, ‘‘विनी, ताजमहल की सुंदरता ऐसे दुष्कर्मियों की खींची कोयले की लकीरों से खराब नहीं होती. इस लकीर पर पानी डालते हुए सिर ऊंचा रख कर आगे बढ़ना है तुम्हें. हम सब तुम्हारे साथ हैं. तुम्हारा जीवन यहां रुकेगा नहीं. बहुत आगे बढ़ेगा,’’

और फिर शेखर की तरफ देखता हुआ बोला, ‘‘और आप को तो मैं सजा दिलवा कर रहूंगा.’’ बात इस हद तक पहुंच जाएगी, इस की तो शेखर ने कल्पना भी नहीं की थी. अपने अधीन पीएचडी करने वाली अन्य छात्राओं का भी वे शारीरिक शोषण करते आए थे. किसी ने उन के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की थी. उन्हें किसी का डर नहीं था. इस तरह के किसी भी आदमी को समाज, परिवार या कानून का डर नहीं होता क्योंकि उन के पास इज्जत, पद का ऐसा लबादा होता है जिस से नीचे की गंदगी कोई चाह कर भी नहीं देख सकता. वे कमजोर सी, आम परिवार की छात्राओं को अपना शिकार बनाया करते थे. विनी के बारे में भी यही सोचा था कि मांबेटी रोधो कर इज्जत के डर से चुप ही रह जाएंगी. पर उन की पत्नी और पुत्र ने स्थिति बदल दी थी. अब जो हो रहा था, वे हैरान थे. अकल्पनीय था. पत्नी और पुत्र के सामने शर्मिंदा होना पड़ गया था. राधा उठ कर खड़ी हो गई थी, ‘‘रजत, मैं इस घर में नहीं रहूंगी.’’ ‘‘हां, मां, मैं भी नहीं रह सकता.’’ शेखर ने उपहासपूर्वक पूछा, ‘‘कहां जाओगे दोनों? बड़ीबड़ी बातें तो कर रहे हो, कोई और ठिकाना है?’’ अपमान की पीड़ा से राधा तड़प उठी, ‘‘तुम्हारे जैसे बलात्कारी पुरुष के साथ रह कर सुविधाओं वाला जीवन नहीं चाहिए मुझे, मांबेटा कहीं भी रह लेंगे.

तुम से संबंध नहीं रखेंगे. तुम्हें सजा मिल कर रहेगी. ‘‘आज अपने बेटे के साथ मिल कर एक निर्दोष लड़की को एक साहस, एक सुरक्षा का एहसास सौंपना है. धरोहर के रूप में अपनी आने वाली पीढि़यों को भी यही सौंपना होगा.’’ राधा आगे बोली, ‘‘चलो रजत, मैं यह टूटन, यह शोषण स्वीकार नहीं करूंगी. अपने घर के अंदर अगर इस घिनौनी करतूत का विरोध नहीं किया तो बाहर भी औरत कैसे लड़ पाएगी और हमेशा रिश्तों की आड़ में शोषित ही होती रहेगी. परिवार की इज्जत, रिश्तेदारी और समाज के खयाल से मैं चुप नहीं रहूंगी.’’ सुगंधा भी विनी को संभालते हुए उस का हाथ पकड़ कर जाने के लिए खड़ी हो गईं. अचानक कुछ सोच कर बोली, ‘‘राधा, चाहो तो आज से तुम दोनों हमारे घर में रह सकते हो.’’ रजत उन के पैरों में झुक गया, ‘‘हां, आंटी, मैं भी आ रहा हूं आप के घर. चलो मां, अभी बहुत लंबी लड़ाई लड़नी है. साथ रहेंगे तो अच्छा रहेगा. और विनी, तुम एक दिन भी इस कुकर्मी के कुकर्म को याद कर दुखी नहीं होगी. तुम्हें बहुत काम है. नया गाइड ढूढ़ंना है. पीएचडी करनी है.

इस आदमी की रिपोर्ट करनी है. इसे कोर्ट में घसीटना है. सजा दिलवानी है. बहुत काम है. विनी, चलो,’’ चारों उन के ऊपर नफरतभरी नजर डाल कर निकल गए. अब शेखर को साफसाफ दिख रहा था कि अब उन के किए की सजा उन्हें मिल कर रहेगी. अगर विनी और सुगंधा अकेले होते तो कमजोर पड़ सकते थे. पर अब चारों साथ थे, तो उन की हार तय थी. कितनी ही छात्राओं के साथ किया बलात्कार उन की आंखों के आगे घूम गया. वे सिर पकड़ कर बैठे रह गए थे. वे चारों गंभीर, चुपचाप चले जा रहे थे. ऐसे समाज से निबटना था जो बलात्कार की शिकार लड़की को ही सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है. उस के साथ ऐसा व्यवहार करता है जैसे उस ने कोई गुनाह किया हो. शारीरिक और मानसिक रूप से पहले से ही आहत लड़की को और सताया जाता है. लेकिन, इन चारों के इरादे, हौसले मजबूत थे. समाज की चिंता नहीं थी. लड़ाई मुश्किल, लंबी थी पर चारों के दिलों में इस लड़ाई में जीत का एहसास अपनी जगह बना चुका था. हार का संशय भी नहीं था. जीत निश्चित थी.

द्य ऐसा भी होता है मनोहरजी का बेटा अपनी मां को लेने गांव आया था. उन की बहू का बच्चा होने वाला था. इसलिए बेटा मां को मुंबई ले जा रहा था. वह मनोहरजी के लिए पैंटकमीज का कपड़ा मुंबई से लाया था. बेटे ने कपड़ा मनोहरजी को देते हुए कहा, ‘‘इसे सिलवा लीजिएगा, आप पर बहुत अच्छा लगेगा.’’ पिताजी ने कहा, ‘‘इस की क्या जरूरत थी, मुझे धोतीकुरते में ही आराम मिलता है.’’ मनोहरजी कपड़े पा कर बहुत प्रसन्न थे. उन्होंने दर्जी को दे कर अपनी नाप की पैंटशर्ट सिलवा ली. कपड़े उन्होंने पहन कर नापे, वे खुद को बहुत सुंदर महसूस कर रहे थे. एक महीने बाद खबर आई कि बहू ने एक बेटे को जन्म दिया है. बेटे के जन्मोत्सव के लिए बेटे ने उन्हें भी मुंबई बुलाया था. वे मुंबई जाने की तैयारी करने लगे. नियत समय पर वे मुंबई पहुंचे. बेटा उन्हें लेने के लिए आया हुआ था. जब वे बेटे के घर पहुंचे तो बहुत प्रसन्न थे कि उस का रहनसहन कितना ऊंचा है. उन का बेटा कितना बड़ा अफसर है, उस के कितने ठाटबाट हैं. बेटे के जन्मोत्सव की पार्टी रखी गई. घर में तैयारी चल रही थी.

शाम को सभी लोग पार्टी के लिए तैयार हो रहे थे. मनोहरजी अपनी वही पैंटशर्ट पहने तैयार हुए जो उन का बेटा उन्हें गांव में दे गया था. बेटे ने जब उन्हें उन कपड़ों में देखा, तो चीखते हुए बोला, ‘‘आप के पास यही कपड़े पहनने को हैं.’’ बहू भी दौड़ती हुई आई कि क्या हो गया. तब बहू पिताजी को ले कर कमरे में आई और पिताजी से बोली, ‘‘आप दूसरे कपड़े पहन लीजिए. ये कपड़े यहां के इंजीनियरों की यूनिफौर्म के हैं. इंजीनियर को साल में 2 जोड़ी कपड़े मिलते हैं. वे उन्हें स्वयं न सिलवा कर अपने रिश्तेदारों में बांट देते हैं या दान कर देते हैं. आप को इन कपड़ों में देख कर लोग क्या सोचेंगे.’’ मनोहरजी बहू की बात सुन कर सकते में आ गए. उन्हें बड़ा दुख हो रहा था कि बेटे ने उन्हें कपड़ा देने के पहले यह बात क्यों नहीं बता दी थी. उपमा मिश्रा  Family Story

Social Story In Hindi : बिना जड़ का पेड़ – अपनों के बीच अपनी पहचान बनाते पुरुष की जद्दोजद की कहानी

Social Story In Hindi : “मैं आज से कोई 5-6 साल पहले अपना घर व व्यवसाय छोड़ कर पाकिस्तान से हिंदुस्तान आया था. खुद को अपने सहधर्मी व्यक्तिओं के बीच सुरक्षित रखने के लिए,” यह वे हमेशा अपने से मिलने वाले लोगों को बोला करते.

कृष्णराय हमारे बंगले के पास अभी रहने आए थे. मैं ने उन के मुख से कई बार यहां भारत के अनुभव व पाकिस्तान में उन की सुखद आर्थिक स्थिती के बारे में सुनता रहता था.

एक दिन मैं ने उन को यों ही मजाक में कहा, “कृष्णरायजी, आप हमेशा अपने बारे में किश्तों में बताते रहते हैं, कभी किसी के साथ बैठ कर अपनी पूरी कहानी सुनाइए,” मगर उन के चेहरे के भावों को देख कर मैं ने जल्दी क्षमा मांगी.

उन्होंने गहरी सांस ली और बोले,”चांडक साहब, इस में क्षमा की बात नहीं है. आप ठीक कहते हैं, मुझे हर किसी को अपनी बात नहीं कहनी चाहिए. लेकिन क्या करूं, मन में रख नहीं रख पाता हूं, अंदर घुटन महसूस करता हूं. सच कहूं, मैं अपनी पूरी कहानी किसी को सुनाना चाहता हूं ताकि जी हलका हो सके,” उन्होंने उदासी से कहा.

“आज मैं अपने काम से फारिग हूं, आप को ऐतराज नहीं हो तो मैं आप की कहानी सुनना चाहता हूं. विश्वास कीजिए, मैं आप की कहानी का मजाक नहीं बनाऊंगा,” मैं ने संजीदगी से कहा.

उन्होंने मेरी ओर गंभीर नजरों से देखा, शायद सोचा हो कि कहूं या नहीं? लेकिन फिर उन्होंने अपनी कहानी शुरू की, अपने पाकिस्तान में जन्म से ले कर व भारत में स्थायी होने तक…

मेरा जन्म पाकिस्तान में एक रईस व जमींदार हिंदू परिवार में हुआ था. मैं ने बचपन से ले कर जवानी तक कभी भी किसी की चीज की कमी महसूस नहीं की, जो चाहा वह मिला. घर पर नौकरों की फौज थी. मेरे बाबा हमारे गांव के सब से बड़े जमींदार थे. गांव में वही होता था जो हमारे बाबा चाहते थे. यह सब आजादी के पहले की नहीं, आजादी के बाद की बात थी.
हमारा वहां बहुत बड़ा संयुक्त परिवार था. हम ने कभी भी अपनेआप को अकेला महसूस नहीं किया. 2 साल पढ़ने के लिए मैं कराची गया. लेकिन पढ़ाई बीच में छोड़ कर मैं जल्दी जमींदारी में लग गया.

कुछ समय बाद हम ने शहर में भी अपना व्यवसाय खोल दिया. हम हिंदू थे पर पूरा गांव मुसलमान था. हमारे नौकर व ग्राहक भी मुसलिम थे.

मैं ने कभी जाना भी नहीं कि हिंदू व मुसलिमों में फर्क भी होता है. न ही कभी गांव के मुसलिमों ने हमें यह महसूस होने दिया. 1965 व 1971 में जब हमारे रिश्तेदारों ने, जो पाकिस्तान छोड़ कर हिंदुस्तान जा रहे थे, हमारे दादा से भी हिंदुस्तान चलने का आग्रह किया था. लेकिन दादा अपनी जन्मभूमी छोड़ कर जाने को तैयार ही नहीं थे. वे हठीले जमींदार थे, दूसरा उन्होंने कभी खतरा महसूस नहीं किया.

हम लोग वहां सुख व आनंद के साथ जी रहे थे. मेरे बड़े भाई स्थानीय समर्थकों की सहायता से वहां की नगरपालिका के अध्यक्ष बने. उन्होंने वहां की जनता के लिए अच्छे काम किए और लंबे समय तक इस पद पर बने रहे. लेकिन इस बीच अयोध्या के मामले ने हमारे दिलोदिमाग को भीतर तक झकझोरा और हम पहली बार खुद को असुरक्षित समझने लगे. हम अपने दोस्तों व गांववालों से नजरें मिलाते तो ऐसा लगता जैसे हिंदुस्तान में जो हो रहा है उस के लिए हम जिम्मेदार हैं.

हमें हिंदुओं के बारें में धार्मिक स्थिति तो पता थी पर सामाजिक व राजनीतिक स्थिति से हम लोग अनजान थे. अब हम जब अपने दूसरों जगहों के रिश्तेदारों से मिलते तो यही चर्चा होती कि क्या हम पाकिस्तान में सुरक्षित हैं? यदि हां, तो कब तक? हमारे चेहरे भले ही शांत हो पर मनमस्तिष्क में द्वंद्व चलता रहता था. मस्तिष्क कह रहा था कि हम सुरक्षित नहीं हैं पर मन कहता कि यह तो हमारी जन्मभूमी है.

इस बीच रथयात्रा निकली. हिंदुस्तान के दंगों की चर्चा पाकिस्तानी समाज व अखबारों में होने लगी. वहां कुछ लोग इस की प्रतिकिया करने लगे. पुराने मंदिर खंडहर फिर समतल मैदान होने लगे. हिंदुओं की दुकानें जो गिनीचुनी थीं लुटी जाने लगीं.

मुझे लग रहा था कि भारत पाकिस्तान के विभाजन की प्रकिया अभी तक पूरी नहीं हुई है. अब हमारा पाकिस्तान में रहना मुझे असहज लगने लगा. मैं अब जल्द से जल्द विधर्मी देश को छोड़ कर सहधर्मी देश में आने की सोचने लगा ताकि मैं अपने लोगों के बीच सुरक्षित महसूस कर सकूं. मुझे लग रहा था कि भारत पाकिस्तान के विभाजन की प्रकिया अभी तक पूरी नहीं हुई है. मैं परिवार के सदस्यों के बीच इस बात को ले कर विचारविमर्श करने लगा. लेकिन सब ने मुझे यही समझाया कि यहां से उखड़ कर, वहां पनपना आसान नहीं होगा. यहां की जमींदारी व जमाजमाया व्यवसाय छोड़ कर कहीं तुम्हें वहां की दरदर की ठोकरें न खानी पड़े. तुम्हारी हालत बिना जड़ के पेड़ की तरह हो जाएगी. आखिर उन का तर्क सही था.

लेकिन दूसरी तरफ मन कहता कि जहां चाह वहां राह. दूसरा मेरा हठीला स्वभाव अपने बाबा पर गया था. वैसे भी घोड़े पर चढ़ने वाला दुल्हा फेरे खाने के बाद ही नीचे उतरता है.

जब मेरे मुसलमान दोस्तों व गांव वालों को मेरे निर्णय के बारे में पता चला तो वे सब मेरे पास आए और मुझे समझाने लगे, “किशन तुम्हें हम पर विश्वास नहीं, हम लोग न जाने कितनी पीढ़ियों से एकसाथ रह रहे हैं, क्या हमारे होते हुए तुम्हें आंच आ सकती है?” समझाते हुए उन की आंखों में आंसू आने लगे. मैं भी रोने लगा. एक बार तो मैं ने भी अपना निर्णय बदलने की सोची लेकिन कुछ समय बाद के बुरे खयालों से मेरा दिल कांपने लगा.

आखिरकार, मैं अपना घर, कारोबार व जन्मभूमी, बसबसाया सुख छोड़ कर अनजाने लेकिन सहधर्मी देश की ओर निकल पड़ा, संशयपूर्ण भविष्य को साथ में ले कर.

घर व गांव को छोड़ते हुए मेरे आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. मेरे परिजन, गांव वालों व दोस्तों की आंखों में आंसू थे. मेरे दोस्तों व गांव वालों ने विदा करते समय कहा,”किशन, यदि तुम्हें पराई जमीन पंसद न आए तो निस्संकोच अपने गांव वापस आ जाना,” यह उन के अंतिम वाक्य थे, जो मुझे न जाने कितनी बार याद आए.

अभी तक तो मेरी जिंदगी सुख के धरातल पर चल रही थी. पुरखों के बोए बीजों के फल मैं खा रहा था. उबङखाबड़ और परेशानियों वाली जिंदगी के दर्शन अभी तक बाकी थे जो यहां आने के बाद होने लगे.
नई आशा व विश्वास में आ गया अपने सहधर्मी देश. बहुत सारे सामान व अपने परिवार के साथ मैं मुंबई एअरपोर्ट पर उतरा. सब से पहली परेशानी यहीं से शुरू होती है. यहां पर कस्टम अधिकारियों ने शुरू में बहुत परेशान किया क्योंकि एक तो मैं पाकिस्तान से आया था, दूसरा मेरे साथ पूंजी के रूप में बहुत सारा सोना आभूषणों के रूप में मेरे साथ था. पर जब उन्होंने पाकिस्तान में एक हिंदू के रूप में मेरी व्यथा सुनी तो उन का दिल पसीजा और उन्होंने मेरे न सिर्फ कस्टम ड्यूटी माफ की बल्कि उन्होंने मेरे और मेरे परिवार को दिल से कैंटीन में खाना भी खिलाया. मेरे प्रति एक हिंदू के रूप में यह पहली सहानुभूति थी.

हिंदुस्तान आ कर कुछ दिन मैं अपनी बड़ी बहन के यहां रहा. कुछ दिन बाद उन्हीं के शहर में एक मकान भी लिया, जहां मैं ने पहली बार सहधर्मी पड़ोसियों के अनुभव लिए. मैं जहां रह रहा था वहां पाकिस्तान से विस्थापित हो कर आना जिज्ञासा का विषय नहीं था, क्योंकि हमारी तरह के बहुत सारे परिवार विस्थापित हो कर यहां आ कर बस गए थे. जिज्ञासा का विषय तो हमार शाही रहनसहन व खानपान था. साथ में हमारा बड़ा परिवार भी सब की नजरों में चर्चा का विषय था. हमारे यहां 8-10 सदस्यों का परिवार सामान्य समझा जाता था. लेकिन यहां के 2-3 सदस्यों वाले परिवारों में हमें स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनना ही था.

हमारी मातृभाषा सिंधी थी जो यहां की गुजराती भाषा से बहुत भिन्न थी. हालांकि मुझे इस की खास परेशानी नहीं थी क्योंकि कराची में मेरे कुछ दोस्त गुजरात से आए हुए थे, लेकिन बच्चों व बीवी को बहुत परेशानी होती थी.

हम ने कुछ ही समय में सारी भौतिक सुखसुविधाएं जुटा लीं. हमारा शाहीखर्च उन को आश्चर्यचकित कर देता था. मेरी पत्नी का उन को चायनाश्ता के साथ स्वागत करना विस्मय से भर देता था क्योंकि वे लोग चाय तक ही सीमीत रहते थे. बच्चों का दिनभर झगड़ना उन की शांत जिंदगी में तुफान ला देता था. बहुत लोगों ने इस की शिकायत की. लेकिन मेरे कहने पर कि यह तो बच्चे हैं उन को गुस्से में ला देता था, “आप तो बड़े हैं,” ऐसा अपमान बहुत बार हुआ.

काम करने वाली जिस दिन नहीं आती उस दिन जूठे बरतनों व कपड़ों का अंबार लग जाता था. मेरे घर का माहौल देख कर लोगों ने धीरेधीरे आना बंद कर दिया.

उधर मैं व्यवसाय ढूंढ़ने के लिए इधरउधर अपने भाई के दोस्त के साथ भटकने लगा. व्यवसाय शुरू करना व उसे सुचारु रूप से चलाना कितना मुश्किल भरा होता है यह मुझे अब पता लगना था. अब तक मैं अपने बापदादा की जमीजमाई जमींदारी पर आराम के साथ जिंदगी गुजार रहा था.

दूसरी तरफ मेरी बहन के परिवार के साथ संबध कटने लगा, वे मुझे व्यवसाय में मदद के लिए असमर्थ लगे. लेकिन आज सोचता हूं कि वे उस समय कितने सही थे. उन का मुझे कुछ समय राह देख कर, व्यवसाय शुरू करने की सलाह को मैं ने गलत तरीके से लिया था. आज यह सोच कर ग्लानी से भर उठता हूं.

मैं ने जल्द ही भाई दोस्त के कहने पर अहमदाबाद के नजदीक शहर में अपना व्यवसाय शुरू किया, लेकिन जो व्यवसाय मैं ने शुरू किया उस का मुझे तनिक भी अनुभव नहीं था. जिस कारण शुरू में मैं बहुत परेशान रहा.

मेरी परेशानी देख कर मेरी बहन ने अपने बेटे को मेरी मदद करने लिए भेजा. वह इस मामले में बड़ा अनुभवी व होशियार निकला. उस ने मेरे व्यवसाय को जमाने में मेरी बहुत मदद की. मेरे बच्चे तो बहुत ही छोटे थे.

बच्चों को भी शुरू में विद्यालय व आसपास के माहौल में सामंजस्य बैठाने में बहुत तकलीफें आईं. भाषा की तकलीफें तो थीं ही साथ में और भी कई परेशानियां थीं.

एक बार मेरे बेटे को विद्यालय में राष्ट्रगान बोलने को कहा तो उस ने पाकिस्तान का राष्ट्रगान सुना दिया. इस पर विद्यालय व शहर में बहुत हंगामा हुआ. घर पर बुलावा आया, मुझे माफी मांगनी पड़ी व भविष्य में ऐसा नहीं होगा लिखित आश्वासन भी देना पड़ा.

हर महीने पुलिस थाने जा कर उपस्थिती के साथ नजराना भी देना पड़ता था. यहां पर व्यवसाय के चक्कर में सरकारी अधिकारियों के साथ रोज पाला पड़ता था.

मेरा सपना हिंदुस्तान आ कर चकनाचूर हो गया. मैं ने तो यह सपना देखा था कि सहधर्मी देश आ कर मैं सुरक्षित व सुखी रहूंगा. हालांकि मुझे व्यवसाय में सफलता मिल रही थी पर मैं यहां की परेशानियां झेलने में असफल व असमर्थ था.

जब मैं अपने साथी व्यापारी व रिश्तेदारों से बातें करता तो वे हंस कर कहते,”यह तो साधारण रोज की बातें हैं जिन का जिंदगीभर सामना करना पड़ता है. जितना बड़ा व्यापारी उतनी ज्यादा परेशानियां.

मैं परेशान हो गया, मन में अजीब सा द्वंद्व पैदा हो गया. कभीकभी सोचता था कि सबकुछ छोड़ कर वापस पाकिस्तान चला जाऊं. लेकिन वहां मेरे दोस्त व रिश्तेदार क्या कहेंगे? क्या उन के व्यंग्यबाण मैं झेल पाउंगा? हो सकता है वहां की सरकार मुझे शक की नजरों से देखे.

इस तनाव के कारण मैं चिड़चिड़ा हो गया. मैं तनाव में रहने लगा. मेरे व्यवहार में अजीब सी कर्कशता आ गई. बच्चे भी सहमने लगे. मैं ने पहली बार जाना कि अपनी जड़ों से कट कर दूसरी जगह जुड़ना कितना कठिन व कष्टदायक होता है.

मुझे बीमार व तनाव में देख कर मेरी पत्नी ने बड़ी बहन को बुलाया. मेरी हालत देख कर मेरी बहन की आंखों में आंसू आ गए.

मैं ने रोते हुए कहा, “दीदी, अब मैं यहां और नहीं रह सकता. मेरे में और परेशानियां झेलने की क्षमता नहीं है. मैं अब वापस अपने लोगों के बीच लौट जाना चाहता हूं.”

“क्या हम तुम्हारे नहीं हैं कृष्ण? और फिर क्या बारबार एक जगह से पेड़ों को उखाड़ कर दूसरी जगह रोपना आसान है? क्या तुम पहले की तरह वहां रह सकोगे? इतना फैला हुआ व्यापार समेटना क्या आसान है? तुम्हारे बच्चों का यहां मन लग गया है. देखो वे कितने खुश हैं,” मस्ती से खेलते बच्चों को दखते हुए बोली.

“क्या वापस पाकिस्तान जा कर बच्चों की हालत तेरी जैसी नहीं हो जाएगी?”

कुछ देर बाद रुक कर दीदी आगे बोली,”तुम एक बार वहां की जिंदगी को भूल कर, वहां के सारे सुखों को भूल कर, यहां नई जिंदगी शुरू कर दो. यही सोचो कि तुम्हारा जन्म यहीं पर हुआ है. मैं जब ससुराल आई थी, तब मेरा यहां कोई नहीं था. मैं अपना सुखदुख किसी को सुना नहीं सकती थी. लेकिन तुम्हारा तो यहां पूरा परिवार है, मैं हूं, अपने लोगों से तुम्हारा फोन पर संपर्क है. और तुम जल्दी घबरा गए, जल्दी हार मान गए. मैं तो तुम्हारी तरह वापस भी नहीं जा सकती थी. तू तो मेरा भाई है, तेरे में तो मेरे से भी ज्यादा हिम्मत, हौसला व हिम्मत होनी चाहिए. उठ और हिम्मत से काम ले. सहनशील व संयमशील बन कर जिंदगी को आसान व सफल बना,” दीदी ने सिर पर हाथ फेर कर कहा.

‘उन की बात सही थी कि मेरा वापस जाना संभव नहीं. मेरे बच्चों की भी हालत मेरी जैसी न हो जाए. अब मुझे यहीं रहना होगा. मुझे ही इस मुल्क के अनुकूल होना पड़ेगा,’ यह सोच कर मैं ने अपना मन मजबूत किया. इस से जो समस्याएं मुझ में पहाड़ सी दिखती थीं वे कंकड़ के समान दिखने लगी. मैं वही हंसमुख कृष्णकुमार बना. मुझ में हद से ज्यादा संयमशीलता आ गई. मेरा व्यवसाय अच्छा जमने लगा.

कृष्णराय के घर से आने के बाद मैं सोचने लगा कि सच में कितना मुश्किल होता है अपनी जड़ों से कट कर दूसरी जगह पनपना, भले ही वह जगह अपनी मनपंसद व अनुकूल ही क्यों न हो.  Social Story In Hindi 

Romantic Story In Hindi : दो कदम तन्हा – अंजलि ने क्यों किया डा. दास का विश्वास ?

Romantic Story In Hindi : ‘‘दास.’’ अपने नाम का उच्चारण सुन कर डा. रविरंजन दास ठिठक कर खड़े हो गए. ऐसा लगा मानो पूरा शरीर झनझना उठा हो. उन के शरीर के रोएं खड़े हो गए. मस्तिष्क में किसी अदृश्य वीणा के तार बज उठे. लंबीलंबी सांसें ले कर डा. दास ने अपने को संयत किया. वर्षों बाद अचानक यह आवाज? लगा जैसे यह आवाज उन के पीछे से नहीं, उन के मस्तिष्क के अंदर से आई थी. वह वैसे ही खड़े रहे, बिना आवाज की दिशा में मुड़े. शंका और संशय में कि दोबारा पीछे से वही संगीत लहरी आई, ‘‘डा. दास.’’

वह धीरेधीरे मुड़े और चित्रलिखित से केवल देखते रहे. वही तो है, अंजलि राय. वही रूप और लावण्य, वही बड़ी- बड़ी आंखें और उन के ऊपर लगभग पारदर्शी पलकों की लंबी बरौनियां, मानो ऊषा गहरी काली परतों से झांक रही हो. वही पतली लंबी गरदन, वही लंबी पतली देहयष्टि. वही हंसी जिस से कोई भी मौसम सावन बन जाता है…कुछ बुलाती, कुछ चिढ़ाती, कुछ जगाती.

थोड़ा सा वजन बढ़ गया है किंतु वही निश्छल व्यक्तित्व, वही सम्मोहन.  डा. दास प्रयास के बाद भी कुछ बोल न सके, बस देखते रहे. लगा मानो बिजली की चमक उन्हें चकाचौंध कर गई. मन के अंदर गहरी तहों से भावनाओं और यादों का वेग सा उठा. उन का गला रुंध सा गया और बदन में हलकी सी कंपन होने लगी. वह पास आई. आंखों में थोड़ा आश्चर्य का भाव उभरा, ‘‘पहचाना नहीं क्या?’’

‘कैसे नहीं पहचानूंगा. 15 वर्षों में जिस चेहरे को एक पल भी नहीं भूल पाया,’ उन्होंने सोचा.

‘‘मैं, अंजलि.’’

डा. दास थोड़ा चेतन हुए. उन्होंने अपने सिर को झटका दिया. पूरी इच्छा- शक्ति से अपने को संयत किया फिर बोले, ‘‘तुम?’’

‘‘हां, मैं. गनीमत है पहचान तो लिया,’’ वह खिलखिला उठी और

डा. दास को लगा मानो स्वच्छ जलप्रपात बह निकला हो.

‘‘मैं और तुम्हें पहचानूंगा कैसे नहीं? मैं ने तो तुम्हें दूर से पीछे से ही पहचान लिया था.’’

मैदान में भीड़ थी. डा. दास धीरेधीरे फेंस की ओर खिसकने लगे. यहां कालिज के स्टूडेंट्स और डाक्टरों के बीच उन्हें संकोच होने लगा कि जाने कब कौन आ जाए.

‘‘बड़ी भीड़ है,’’ अंजलि ने चारों ओर देखा.

‘‘हां, इस समय तो यहां भीड़ रहती ही है.’’

शाम के 4 बजे थे. फरवरी का अंतिम सप्ताह था. पटना मेडिकल कालिज के मैदान में स्वास्थ्य मेला लगा था. हर साल यह मेला इसी तारीख को लगता है, कालिज फाउंडेशन डे के अवसर पर…एक हफ्ता चलता है. पूरे मैदान में तरहतरह के स्टाल लगे रहते हैं. स्वास्थ्य संबंधी प्रदर्शनी लगी रहती है. स्टूडेंट्स अपना- अपना स्टाल लगाते हैं, संभालते हैं. तरहतरह के पोस्टर, स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां और मरीजों का फ्री चेकअप, सलाह…बड़ी गहमागहमी रहती है.

शाम को 7 बजे के बाद मनोरंजन कार्यक्रम होता है. गानाबजाना, कवि- सम्मेलन, मुशायरा आदि. कालिज के सभी डाक्टर और विद्यार्थी आते हैं. हर विभाग का स्टाल उस विभाग के एक वरीय शिक्षक की देखरेख में लगता है. डा. दास मेडिसिन विभाग में लेक्चरर हैं. इस वर्ष अपने विभाग के स्टाल के वह इंचार्ज हैं. कल प्रदर्शनी का आखिरी दिन है.

‘‘और, कैसे हो?’’

डा. दास चौंके, ‘‘ठीक हूं…तुम?’’

‘‘ठीक ही हूं,’’ और अंजलि ने अपने बगल में खड़े उत्सुकता से इधरउधर देखते 10 वर्ष के बालक की ओर इशारा किया, ‘‘मेरा बेटा है,’’ मानो अपने ठीक होने का सुबूत दे रही हो, ‘‘नमस्ते करो अंकल को.’’

बालक ने अन्यमनस्क भाव से हाथ जोड़े. डा. दास ने उसे गौर से देखा फिर आगे बढ़ कर उस के माथे के मुलायम बालों को हलके से सहलाया फिर जल्दी से हाथ वापस खींच लिया. उन्हें कुछ अतिक्रमण जैसा लगा.

‘‘कितनी उम्र है?’’

‘‘यह 10 साल का है,’’ क्षणिक विराम, ‘‘एक बेटी भी है…12 साल की, उस की परीक्षा नजदीक है इसलिए नहीं लाई,’’ मानो अंजलि किसी गलती का स्पष्टीकरण दे रही हो. फिर अंजलि ने बालक की ओर देखा, ‘‘वैसे परीक्षा तो इस की भी होने वाली है लेकिन जबरदस्ती चला आया. बड़ा जिद्दी है, पढ़ता कम है, खेलता ज्यादा है.’’

बेटे को शायद यह टिप्पणी नागवार लगी. अंगरेजी में बोला, ‘‘मैं कभी फेल नहीं होता. हमेशा फर्स्ट डिवीजन में पास होता हूं.’’

डा. दास हलके से मुसकराए, ‘‘मैं तो एक बार एम.आर.सी.पी. में फेल हो गया था,’’ फिर वह चुप हो गए और इधरउधर देखने लगे.

कुछ लोग उन की ओर देख रहे थे.

‘‘तुम्हारे कितने बच्चे हैं?’’

डा. दास ने प्रश्न सुना लेकिन जवाब नहीं दिया. वह बगल में बाईं ओर मेडिसिन विभाग के भवन की ओर देखने लगे.

अंजलि ने थोड़ा आश्चर्य से देखा फिर पूछा, ‘‘कितने बच्चे हैं?’’

‘‘2 बच्चे हैं.’’

‘‘लड़के या लड़कियां?’’

‘‘लड़कियां.’’

‘‘कितनी उम्र है?’’

‘‘एक 10 साल की और एक 9 साल की.’’

‘‘और कैसे हो, दास?’’

‘‘मुझे दास…’’ अचानक डा. दास चुप हो गए. अंजलि मुसकराई. डा. दास को याद आ गया, वह अकसर अंजलि को कहा करते थे कि मुझे दास मत कहा करो. मेरा पूरा नाम रवि रंजन दास है. मुझे रवि कहो या रंजन. दास का मतलब स्लेव होता है.

अंजलि ऐसे ही चिढ़ाने वाली हंसी के साथ कहा करती थी, ‘नहीं, मैं हमेशा तुम्हें दास ही कहूंगी. तुम बूढ़े हो जाओगे तब भी. यू आर माई स्लेव एंड आई एम योर स्लेव…दासी. तुम मुझे दासी कह सकते हो.’

आज डा. दास कालिज के सब से पौपुलर टीचर हैं. उन की कालिज और अस्पताल में बहुत इज्जत है. लोग उन की ओर देख रहे हैं. उन्हें कुछ अजीब सा संकोच होने लगा. यहां यों खड़े रहना ठीक नहीं लगा. उन्होंने गला साफ कर के मानो किसी बंधन से छूटने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘बहुत भीड़ है. बहुत देर से खड़ा हूं. चलो, कैंटीन में बैठते हैं, चाय पीते हैं.’’

अंजलि तुरंत तैयार हो गई, ‘‘चलो.’’

बेटे को यह प्रस्ताव नहीं भाया. उसे भीड़, रोशनी और आवाजों के हुजूम में मजा आ रहा था, बोला, ‘‘ममी, यहीं घूमेंगे.’’

‘‘चाय पी कर तुरंत लौट आएंगे. चलो, गंगा नदी दिखाएंगे.’’

गेट से निकल कर तीनों उत्तर की ओर गंगा के किनारे बने मेडिकल कालिज की कैंटीन की ओर बढ़े. डा. दास जल्दीजल्दी कदम बढ़ा रहे थे फिर अंजलि को पीछे देख कर रुक जाते थे. कैंटीन में भीड़ नहीं थी, ज्यादातर लोग प्रदर्शनी में थे. दोनों कैंटीन के हाल के बगल वाले कमरे में बैठे.

कैंटीन के पीछे थोड़ी सी जगह है जहां कुरसियां रखी रहती हैं, उस के बाद रेलिंग है. बालक की उदासी दूर हो गई. वह दौड़ कर वहां गया और रेलिंग पकड़ कर गंगा के बहाव को देखने लगा.

डा. दास और अंजलि भी कुरसी मोड़ कर उधर ही देखने लगे. गरमी नहीं आई थी, मौसम सुहावना था. मोतियों का रंग ले कर सूर्य का मंद आलोक सरिता के शांत, गंभीर जल की धारा पर फैला था. कई नावें चल रही थीं. नाविक नदी के किनारे चलते हुए रस्सी से नाव खींच रहे थे. कई लोग किनारे नहा रहे थे.

मौसम ऐसा था जो मन को सुखद बीती हुई घडि़यों की ओर ले जा रहा था. वेटर चाय का आर्डर ले गया. दोनों नदी की ओर देखते रहे.

‘‘याद है? हम लोग बोटिंग करते हुए कितनी दूर निकल जाते थे?’’

‘‘हां,’’ डा. दास तो कभी भूले ही नहीं थे. शाम साढ़े 4 बजे क्लास खत्म होने के बाद अंजलि यहां आ जाती थी और दोनों मेडिकल कालिज के घाट से बोटिंग क्लब की नाव ले कर निकल जाते थे नदी के बीच में. फिर पश्चिम की ओर नाव खेते लहरों के विरुद्ध महेंद्रू घाट, मगध महिला कालिज तक.

सूरज जब डूबने को होता और अंजलि याद दिलाती कि अंधेरा हो जाएगा, घर पहुंचना है तो नाव घुमा कर नदी की धारा के साथ छोड़ देते. नाव वेग से लहरों पर थिरकती हुई चंद मिनटों में मेडिकल कालिज के घाट तक पहुंच जाती.

डूबती किरणों की स्वर्णिम आभा में अंजलि का पूरा बदन कंचन सा हो जाता. वह अपनी बड़ीबड़ी आंखें बंद किए नाव में लेटी रहती. लहरों के हलके छींटे बदन पर पड़ते रहते और डा. दास सबकुछ भूल कर उसी को देखते रहते. कभी नाव बहती हुई मेडिकल कालिज घाट से आगे निकल जाती तो अंजलि चौंक कर उठ बैठती, ‘अरे, मोड़ो, आगे निकल गए.’

डा. दास चौंक कर चेतन होते हुए नाव मोड़ कर मेडिकल कालिज घाट पर लाते. कभी वह आगे जा कर पटना कालिज घाट पर ही अनिच्छा से अंजलि को उतार देते. उन्हें अच्छा लगता था मेडिकल कालिज से अंजलि के साथ उस के घर के नजदीक जा कर छोड़ने में, जितनी देर तक हो सके साथ चलें, साथ रहें. वेटर 2 कप चाय दे गया. अंजलि ने बेटे को पुकार कर पूछा, ‘‘क्या खाओगे? बे्रडआमलेट खाओगे. यहां बहुत अच्छा बनता है.’’

बालक ने नकरात्मक भाव से सिर हिलाया तो डा. दास ने पूछा, ‘‘लस्सी पीओगे?’’

‘‘नो…नथिंग,’’ बालक को नदी का दृश्य अधिक आकर्षित कर रहा था.

चाय पी कर डा. दास ने सिगरेट का पैकेट निकाला.

अंजलि ने पूछा, ‘‘सिगरेट कब से पीने लगे?’’

डा. दास ने चौंक कर अपनी उंगलियों में दबी सिगरेट की ओर देखा, मानो याद नहीं, फिर उन्होंने कहा, ‘‘इंगलैंड से लौटने के बाद.’’

अंजलि के चेहरे पर उदासी का एक साया आ कर निकल गया. उस ने निगाहें नीची कर लीं. इंगलैंड से आने के बाद तो बहुत कुछ खो गया, बहुत सी नई आदतें लग गईं.

अंजलि मुसकराई तो चेहरे पर स्वच्छ प्रकाश फैल गया. किंतु डा. दास के मन का अंधकार अतीत की गहरी परतों में छिपा था. खामोशी बोझिल हो गई तो उन्होंने पूछा, ‘‘मृणालिनी कहां है?’’

‘‘इंगलैंड में. वह तो वहीं लीवरपूल में बस गई है. अब इंडिया वापस नहीं लौटेगी. उस के पति भी डाक्टर हैं. कभीकभी 2-3 साल में कुछ दिन के लिए आती है.’’

‘‘तभी तो…’’

‘‘क्या?’’

‘‘कुछ भी नहीं, ब्रिलियंट स्टूडेंट थी. अच्छा ही हुआ.’’

मृणालिनी अंजलि की चचेरी बहन थी. उम्र में उस से बड़ी. डा. दास से वह मेडिकल कालिज में 2 साल जूनियर थी.

डा. दास फाइनल इयर में थे तो वह थर्ड इयर में थी. अंजलि उस समय बी.ए. इंगलिश आनर्स में थी.

अंजलि अकसर मृणालिनी से मिलने महिला होस्टल में आती थी और उस से मिल कर वह डा. दास के साथ घूमने निकल जाती थी. कभी कैंटीन में चाय पीने, कभी घाट पर सीढि़यों पर बैठ कर बातें करने, कभी बोटिंग करने.

डा. दास की पहली मुलाकात अंजलि से सरस्वती पूजा के फंक्शन में ही हुई थी. वह मृणालिनी के साथ आई थी. डा. दास गंभीर छात्र थे. उन्हें किसी भी लड़की ने अपनी ओर आकर्षित नहीं किया था, लेकिन अंजलि से मिल कर उन्हें लगा था मानो सघन हरियाली के बीच ढेर सारे फूल खिल उठे हैं और उपवन में हिरनी अपनी निर्दोष आंखों से देख रही हो, जिसे देख कर आदमी सम्मोहित सा हो जाता है.

फिर दूसरी मुलाकात बैडमिंटन प्रतियोगिता के दौरान हुई और बातों की शुरुआत से मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ. वह अकसर शाम को पटना कालिज में टेनिस खेलने जाते थे. वहां मित्रों के साथ कैंटीन में बैठ कर चाय पीते थे. वहां कभीकभी अंजलि से मुलाकात हो जाती थी. जाड़ों की दोपहर में जब क्रिकेट मैच होता तो दोनों मैदान के एक कोने में पेड़ के नीचे बैठ कर बातें करते.

मृणालिनी ने दोनों की नजदीकियों को देखा था. उसे कोई आपत्ति नहीं थी. डा. दास अपनी क्लास के टापर थे, आकर्षक व्यक्तित्व था और चरित्रवान थे.

बालक के लिए अब गंगा नदी का आकर्षण समाप्त हो गया था. उसे बाजार और शादी में आए रिश्तेदारों का आकर्षण खींच रहा था. उस ने अंजलि के पास आ कर कहा, ‘‘चलो, ममी.’’

‘‘चलती हूं, बेटा,’’ अंजलि ने डा. दास की ओर देखा, ‘‘चश्मा लगाना कब से शुरू किया?’’

‘‘वही इंगलैंड से लौटने के बाद. वापस आने के कुछ महीने बाद अचानक आंखें कमजोर हो गईं तो चश्मे की जरूरत पड़ गई,’’ डा. दास गंगा की लहरों की ओर देखने लगे.

अंजलि ने अपनी दोनों आंखों को हथेलियों से मला, मानो उस की आंखें भी कमजोर हो गई हैं और स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा है.

‘‘शादी कब की? वाइफ क्या करती है?’’

डा. दास ने अंजलि की ओर देखा, कुछ जवाब नहीं दिया, उठ कर बोले, ‘‘चलो.’’

मैदान की बगल वाली सड़क पर चलते हुए गेट के पास आ कर दोनों ठिठक कर रुक गए. दोनों ने एकदूसरे की ओर देखा, अंदर से एकसाथ आवाज आई, याद है?

मैदान के अंदर लाउडस्पीकर से गाने की आवाज आ रही थी. गालिब की गजल और तलत महमूद की आवाज थी :

‘‘आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक…’’

तलत महमूद पटना आए थे.

डा. घोषाल ने रवींद्र भवन में प्रोग्राम करवाया था. उस समय रवींद्र भवन पूरा नहीं बना था. उसी को पूरा करने के लिए फंड एकत्र करने के लिए चैरिटी शो करवाया गया था. बड़ी भीड़ थी. ज्यादातर लोग खड़े हो कर सुन रहे थे. तलत ने गजलों का ऐसा समा बांधा था कि समय का पता ही नहीं चला.

डा. दास और अंजलि को भी वक्त का पता नहीं चला. रात काफी बीत गई. दोनों रिकशा पकड़ कर घबराए हुए वापस लौटे थे. डा. दास अंजलि को उस के आवास तक छोड़ने गए थे. अंजलि के मातापिता बाहर गेट के पास चिंतित हो कर इंतजार कर रहे थे. डा. दास ने देर होने के कारण माफी मांगी थी. लेकिन उस रात को पहली बार अंजलि को देर से आने के लिए डांट सुननी पड़ी थी और उस के मांबाप को यह भी पता लग गया कि वह डा. दास के साथ अकेली गई थी. मृणालिनी या उस की सहेलियां साथ में नहीं थीं.

हालांकि दूसरे दिन मृणालिनी ने उन्हें समझाया था और डा. दास के चरित्र की गवाही दी थी तब जा कर अंजलि के मांबाप का गुस्सा थोड़ा कम हुआ था किंतु अनुशासन का बंधन थोड़ा कड़ा हो गया था. मृणालिनी ने यह भी कहा था कि डा. दास से अच्छा लड़का आप लोगों को कहीं नहीं मिलेगा. जाति एक नहीं है तो क्या हुआ, अंजलि के लिए उपयुक्त मैच है. लेकिन आजाद खयाल वाले अभिभावकों ने सख्ती कम नहीं की.

बालक ने अंजलि का हाथ पकड़ कर जल्दी चलने का आग्रह किया तो उस ने डा. दास से कहा, ‘‘ठीक है, चलती हूं, फिर आऊंगी. कल तो नहीं आ सकती, शादी है, परसों आऊंगी.’’

‘‘परसों रविवार है.’’

‘‘ठीक तो है, घर पर आ जाऊंगी. दोपहर का खाना तुम्हारे साथ खाऊंगी. बहुत बातें करनी हैं. अकेली आऊंगी,’’ उस ने बेटे की ओर इशारा किया, ‘‘यह तो बोर हो जाएगा. वैसे भी वहां बच्चों में इस का खूब मन लगता है. पूरी छुट्टी है, डांटने के लिए कोई नहीं है.’’

डा. दास ने केवल सिर हिलाया. अंजलि कुछ आगे बढ़ कर रुक गई और तेजी से वापस आई. डा. दास वहीं खड़े थे. अंजलि ने कहा, ‘‘कहां रहते हो? तुम्हारे घर का पता पूछना तो भूल ही गई?’’

‘‘ओ, हां, राजेंद्र नगर में.’’

‘‘राजेंद्र नगर में कहां?’’

‘‘रोड नंबर 3, हाउस नंबर 7.’’

‘‘ओके, बाय.’’

अंजलि चली गई. डा. दास बुत बने बहुत देर तक उसे जाते देखते रहे. ऐसे ही एक दिन वह चली गई थी…बिना किसी आहट, बिना दस्तक दिए.

डा. दास गरीब परिवार से थे. इसलिए एम.बी.बी.एस. पास कर के हाउसजाब खत्म होते ही उन्हें तुरंत नौकरी की जरूरत थी. वह डा. दामोदर के अधीन काम कर रहे थे और टर्म समाप्त होने को था कि उसी समय उन के सीनियर की कोशिश से उन्हें इंगलैंड जाने का मौका मिला.

पटना कालिज के टेनिस लान की बगल में दोनों घास पर बैठे थे. डा. दास ने अंजलि को बताया कि अगले हफ्ते इंगलैंड जा रहा हूं. सभी कागजी काररवाई पूरी हो चुकी है. एम.आर.सी.पी. करते ही तुरंत वापस लौटेंगे. उम्मीद है वापस लौटने पर मेडिकल कालिज में नौकरी मिल जाएगी और नौकरी मिलते ही…’’

अंजलि ने केवल इतना ही कहा था कि जल्दी लौटना. डा. दास ने वादा किया था कि जिस दिन एम.आर.सी.पी. की डिगरी मिलेगी उस के दूसरे ही दिन जहाज पकड़ कर वापस लौटेंगे.

लेकिन इंगलैंड से लौटने में डा. दास को 1 साल लग गया. वहां उन्हें नौकरी करनी पड़ी. रहने, खाने और पढ़ने के लिए पैसे की जरूरत थी. फीस के लिए भी धन जमा करना था. नौकरी करते हुए उन्होंने परीक्षा दी और 1 वर्ष बाद एम.आर.सी.पी. कर के पटना लौटे.

होस्टल में दोस्त के यहां सामान रख कर वह सीधे अंजलि के घर पहुंचे. लेकिन घर में नए लोग थे. डा. दास दुविधा में गेट के बाहर खड़े रहे. उन्हें वहां का पुराना चौकीदार दिखाई दिया तो उन्होंने उसे बुला कर पूछा, ‘‘प्रोफेसर साहब कहां हैं?’’

चौकीदार डा. दास को पहचानता था, प्रोफेसर साहब का मतलब समझ गया और बोला, ‘‘अंजलि दीदी के पिताजी? वह तो चले गए?’’

‘‘कहां?’’

‘‘दिल्ली.’’

‘‘और अंजलि?’’

‘‘वह भी साथ चली गईं. वहीं पीएच.डी. करेंगी.’’

‘‘ओह,’’ डा. दास पत्थर की मूर्ति की भांति खड़े रहे. सबकुछ धुंधला सा नजर आ रहा था. कुछ देर बाद दृष्टि कुछ स्पष्ट हुई तो उन्होंने चौकीदार को अपनी ओर गौर से देखते पाया. वह झट से मुड़ कर वहां से जाने लगे.

चौकीदार ने पुकारा, ‘‘सुनिए.’’

डा. दास ठिठक कर खड़े हो गए तो उस ने पीछे से कहा, ‘‘अंजलि दीदी की शादी हो गई.’’

‘‘शादी?’’ कोई आवाज नहीं निकल पाई.

‘‘हां, 6 महीने हुए. अच्छा लड़का मिल गया. बहुत बड़ा अधिकारी है. यहां सब के नाम कार्ड आया था. शादी में बहुत लोग गए भी थे.’’

रविवार को 12 बजे अंजलि डा. दास के घर पहुंची. सामने छोटे से लान में हरी दूब पर 2 लड़कियां खेल रही थीं. बरामदे में एक बूढ़ी दाई बैठी थी. अंजलि ने दाई को पुकारा, ‘‘सुनो.’’

दाई गेट के पास आई तो अंजलि ने पूछा, ‘‘डाक्टर साहब से कहो अंजलि आई है.’’

दाई ने दिलचस्पी से अंजलि को देखा फिर गेट खोलते हुए बोली, ‘‘डाक्टर साहब घर पर नहीं हैं. कल रात को ही कोलकाता चले गए.’’

‘‘कल रात को?’’

‘‘हां, परीक्षा लेने. अचानक बुलावा आ गया. फिर वहां से पुरी जाएंगे…एक हफ्ते बाद लौटेंगे.’’

दाई बातूनी थी, शायद अकेले बोर हो जाती होगी. आग्रह से अंजलि को अंदर ले जा कर बरामदे में कुरसी पर बैठाया. जानना चाहती थी उस के बारे में कि यह कौन है?

अंजलि ने अपने हाथों में पकड़े गिफ्ट की ओर देखा फिर अंदर की ओर देखते हुए पूछा, ‘‘मेम साहब तो घर में हैं न?’’

‘‘मेम साहब, कौन मेम साहब?’’

‘‘डा. दास की पत्नी.’’

‘‘उन की शादी कहां हुई?’’

‘‘क्या?’’

‘‘हां, मेम साहब, साहब ने आज तक शादी नहीं की.’’

‘‘शादी नहीं की?’’

‘‘नहीं, मेम साहब, हम पुरानी दाई हैं. शुरू से बहुत समझाया लेकिन कुछ नहीं बोलते हैं…कितने रिश्ते आए, एक से एक…’’

अंजलि ने कुछ नहीं कहा. आई तो सोच कर थी कि बहुत कुछ कहेगी, लेकिन केवल मूक बन दाई की बात सुन रही थी.

दाई ने उत्साहित हो कर कहा, ‘‘अब क्या कहें, मेम साहब, सब तो हम को संभालना पड़ता है. बूढे़ हो गए हम लोग, कब तक जिंदा रहेंगे. इन दोनों बच्चियों की भी परवरिश. अब क्या बोलें, दिन भर तो ठीक रहता है. सांझ को क्लिनिक में बैठते हैं,’’ उस ने परिसर में ही एक ओर इशारा किया फिर आवाज को धीमा कर के गोपनीयता के स्तर पर ले आई, ‘‘बाकी साढ़े 8 बजे क्लब जाते हैं तो 12 के पहले नहीं आते हैं…बहुत तेज गाड़ी चला कर…पूरे नशे में. हम रोज चिंता में डूबे 12 बजे रात तक रास्ता देखते रहते हैं. कहीं कुछ हो गया तो? बड़े डाक्टर हैं, अब हम गंवार क्या समझाएं.’’

अंजलि ने गहरी धुंध से निकल कर पूछा, ‘‘शराब पीते हैं?’’

‘‘दिन में नहीं, रात को क्लब में बहुत पीते हैं.’’

‘‘कब से शराब पीने लगे हैं?’’

‘‘वही इंगलैंड से वापस आने के कुछ दिन बाद से. हम तब से इन के यहां हैं.’’

इंगलैंड से लौटने के बाद. अंजलि ने हाथ में पकड़े गिफ्ट को दाई की ओर बढ़ाते हुए पूछा, ‘‘शादी नहीं हुई तो ये दोनों लड़कियां?’’

दाई ने दोनों लड़कियों की ओर देखा, फिर हंसी, ‘‘ये दोनों बच्चे तो अनाथ हैं, मेम साहब. डाक्टर साहब दोनों को बच्चा वार्ड से लाए हैं. वहां कभीकभार कोई औरत बच्चा पैदा कर के उस को छोड़ कर भाग जाती है. लावारिस बच्चा वहीं अस्पताल में ही पलता है. बहुत से लोग ऐसे बच्चों को गोद ले लेते हैं. अच्छेअच्छे परिवार के लोग.  Romantic Story In Hindi 

Social Story : दो खजूर – क्या आसिफ मुस्तफा काजी के पद के योग्य था ?

Social Story : बगदाद के बादशाह मीर काफूर ने अपने विश्वासी सलाहकार आसिफ मुस्तफा को बगदाद का नया काजी नियुक्त किया, क्योंकि निवर्तमान काजी रमीज अबेदिन अब बूढ़े हो चले थे और उन्होंने बादशाह से गुजारिश की थी कि अब उन का शरीर साथ नहीं दे रहा है इसलिए उन्हें राज्य के काजी पद की खिदमत से मुक्त कर दें. बगदाद राज्य का काजी पद बहुत महत्त्वपूर्ण और जिम्मेदारी भरा होता था. बगदाद के काजी पद पर नियुक्ति की खुशी में आसिफ मुस्तफा ने एक जोरदार दावत दी. उस दावत में उस के मातहत राज्य के सभी न्यायिक दंडाधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी आमंत्रित थे. राज्य के लगभग सभी सम्मानित व्यक्ति भी दावत में उपस्थित थे.

सब लोग दावत की खूब तारीफ कर रहे थे, क्योंकि वहां हर चीज मजेदार बनी थी. आसिफ मुस्तफा सारा इंतजाम खुद देख रहा था. सुरीले संगीत की धुनें वातावरण को और भी रसमय बना रही थीं. अचानक आसिफ मुस्तफा को ध्यान आया कि उस ने एक चीज तो मंगवाईर् ही नहीं. आजकल खजूर का मौसम चल रहा है. अत: उस फल का दावत में होना जरूरी है. बगदाद में पाया जाने वाला अरबी खजूर बहुत स्वादिष्ठ होता है. दावतों में भी उसे चाव से खाया जाता है.

आसिफ ने अपने सब से विश्वसनीय सेवक करीम को बुलाया और उसे सोने का एक सिक्का देते हुए कहा, ‘‘जल्दी से बाजार से 500 अच्छे खजूर ले आओ.’’ बगदाद में खजूर वजन के हिसाब से नहीं बल्कि संख्या के हिसाब से मिलते थे. सेवक फौरन रवाना हो गया. थोड़ी देर बाद लौटा तो उस के पास खजूरों से भरा हुआ एक बड़ा थैला था.

आसिफ मुस्तफा ने कहा, ‘‘थैला जमीन पर उलटो और मेरे सामने सब खजूर गिनो.’’

करीम अपने मालिक के इस आदेश पर दंग रह गया. वह सोच भी नहीं सकता था कि उस का मालिक उस जैसे पुराने विश्वसनीय सेवक पर इस तरह शक करेगा. सब मेहमान भी हैरत से आसिफ की तरफ देखने लगे.

करीम ने फल गिनने शुरू किए. जब गिनती पूरी हुई तो वह थरथर कांपने लगा. खजूर 498 ही थे. आसिफ बिगड़ कर बोला, ‘‘तुम ने बेईमानी की है. तुम ने 2 खजूर रास्ते में खा लिए हैं. तुम्हें इस जुर्म की सजा अवश्य मिलेगी.’’

करीम ‘रहमरहम…’ चिल्लाता रहा, लेकिन आसिफ मुस्तफा जरा भी नहीं पसीजा. उस ने सिपाहियों को आदेश दिया कि करीम को फौरन गिरफ्तार कर लिया जाए. आसिफ के इस बरताव से सारे मेहमान हक्केबक्के थे कि इतनी सी बात पर एक पुराने वफादार सेवक को सजा देना कहां का इंसाफ है.

आसिफ ने आदेश दिया, ‘‘करीम की पीठ पर तब तक कोड़े बरसाए जाएं, जब तक वह अपना अपराध कबूल न कर ले.’’ उस के आदेश का पालन किया जाने लगा. करीम की चीखें शामियाने में गूंजने लगीं. जब पिटतेपिटते करीम लहूलुहान हो गया तो उस ने चिल्ला कर कहा, ‘‘हां, मैं ने 2 खजूर चुरा लिए, 2 खजूर चुरा लिए. मीठेमीठे खजूर देख कर मेरा जी ललचा गया था. मैं अपराध कबूल करता हूं. मुझे छोड़ दो.’’

उस की इस बात पर मेहमानों में खुसुरफुसुर होने लगी कि अब ईमानदारी का जमाना नहीं रहा. जिसे देखो, वही बेईमानी करता है. किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, वफादार सेवक पर भी नहीं. सभी करीम को कोस रहे थे, जिस की वजह से दावत का मजा किरकिरा हो गया था. तभी आसिफ मुस्तफा ने कहा, ‘‘सिपाहियो, खोल दो इस की जंजीरें.’’

जंजीरें खोल दी गईं. करीम को आसिफ के सामने पेश किया गया. सारे मेहमान चुपचाप देख रहे थे कि अब आसिफ मुस्तफा उस के साथ क्या व्यवहार करता है. सब का विचार था कि करीम ने अपराध स्वीकार कर लिया है इसलिए इसे बंदीगृह में भेज दिया जाएगा या नौकरी से निकाल दिया जाएगा. लेकिन इस के बाद आसिफ मुस्तफा अपनी जगह से उठ कर करीम के पास आया. उस के शरीर से रिसते खून को अपने रूमाल से साफ किया. उस की मरहमपट्टी की और दूसरे साफ कपड़े पहनाए. सभी आश्चर्य करने लगे कि यह क्या तमाशा है. जब करीम रहम की भीख मांग रहा था, तब तो उस की पुरानी वफादारी का लिहाज नहीं किया और अब कबूल चुका है तो उस की मरहमपट्टी हो रही है.

आसिफ मुस्तफा ने करीम से माफी मांगी. फिर मेहमानों से कहने लगा, ‘‘मैं जानता हूं करीम बेकुसूर है. इस ने कोई अपराध नहीं किया. यह देखिए,’’ उस ने अपने कुरते की आस्तीन में से 2 खजूर निकाल कर कहा, ‘‘ये हैं वे 2 खजूर जिन्हें मैं ने पहले ही फुरती से निकाल लिया था. ऐसा मैं ने इसलिए किया था कि आप को बता सकूं कि लोगों को कठोर दंड दे कर जुर्म कबूल करवाना कितनी बड़ी बेइंसाफी है, लेकिन ऐसा हो रहा है. हमारा काम अपराधियों का पता लगाना और उन के अपराध के लिए उन्हें सजा देना है न कि किसी भी निर्दोष को मार कर उसे चोर साबित करना.’’ सभी आसिफ मुस्तफा की इस सच्ची बात पर वाहवाह कर उठे. उन्हें विश्वास हो गया कि आसिफ वाकई काजी के पद के योग्य है. उस के कार्यकाल में किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलेगी और कुसूरवार बच नहीं पाएगा.  Social Story

Family Story In Hindi : बोझ – अपनों का बोझ भी क्या बोझ होता है ?

Family Story In Hindi : मां ने फुसफुसाते हुए मेरे कान में कहा, ‘‘साफसाफ कह दो, मैं कोई बांदी नहीं हूं. या तो मैं रहूंगी या वे लोग. यह भी कोई जिंदगी है?’’

इस तरह की उलटीसीधी बातें मां 2 दिनों से लगतार मुझे समझा रही थी. मैं चुपचाप उस का मुख देखने लगी. मेरी दृष्टि में पता नहीं क्या था कि मां चिढ़ कर बोली, ‘‘तू मूर्ख ही रही. आजकल अपने परिवार का तो कोई करता नहीं, और तू है कि बेगानों…’’

मां का उपदेश अधूरा ही रह गया, क्योंकि अनु ने आ कर कहा, ‘‘नानीअम्मा, रिकशा आ गया.’’ अनु को देख कर मां का चेहरा कैसा रुक्ष हो गया, यह अनु से भी छिपा नहीं रहा.

मां ने क्रोध से उस पर दृष्टि डाली. उस का वश चलता तो वह अपनी दृष्टि से ही अनु, विनू और विजू को जला डालती. फिर कुछ रुक कर तनिक कठोर स्वर में बोली, ‘‘सामान रख दिया क्या?’’

‘‘हां, नानीअम्मा.’’

अनु के स्वर की मिठास मां को रिझा नहीं पाई. मां चली गई किंतु जातेजाते दृष्टि से ही मुझे जताती गई कि मैं बेवकूफ हूं.

मां विवाह में गई थी. लौटते हुए 2 दिन के लिए मेरे यहां आ गई. मां पहली बार मेरे घर आई थी. मेरी गृहस्थी देख कर वह क्षुब्ध हो गई. मां के मन में इंजीनियर की कल्पना एक धन्नासेठ के रूप में थी. मां के हिसाब से घर में दौलत का पहाड़ होना चाहिए था. हर भौतिक सुख, वैभव के साथसाथ सरकारी नौकरों की एक पूरी फौज होनी चाहिए थी. इन्हीं कल्पनाओं के कारण मां ने मेरे लिए इंजीनियर पति चुना था.

मां की इन कल्पनाओं के लिए मैं कभी मां को दोषी नहीं मानती. हमारे नानाजी साधारण क्लर्क थे, लेकिन वे तनमन दोनों से पूर्ण क्लर्क थे. वेतन से दसगुनी उन की ऊपर की आमदनी थी. पद उन का जरूर छोटा था किंतु वैभव की कोई कमी नहीं थी. हर सुविधा में पल कर बड़ी हुई मां ने उस वैभव को कभी नाजायज नहीं समझा. यही कारण था कि मेरे नितांत ईमानदार मास्टर पिता से मां का कभी तालमेल नहीं बैठा.

मुझे अब भी याद है कि मैं जब भी मायके जाती, मां खोदखोद कर इन की कमाई का हिसाब पूछती. घुमाफिरा कर नानाजी के सुखवैभव की कथा सुना कर उसी पथ पर चलने का आग्रह करती, किंतु हम सभी भाईबहनों की नसनस में पिता की शिक्षादीक्षा रचबस गई थी. विवाह भी हुआ तो पति पिता के मनोनुकूल थे.

मां के इन 2 दिनों के वास ने मेरी खुशहाल गृहस्थी में एक बड़ा कांटा चुभो दिया. आज जब सभी अपने काम पर चले गए तो रह गई हैं रचना और मां की बातों का जाल.

रचना को दूध पिला कर सुला देने के बाद मैं घर में बाकी काम निबटाने लगी. ज्यादातर काम तो अनु ही निबटा जाती है, फिर भी गृहस्थी के तो कई अनदेखे काम हैं. सब कामों से निबट कर जब मैं अकेली बैठी तो मां की बातें मुझे बींधने लगीं. ‘क्या हम ने गलत किया है? क्या मैं रचना और आशीष का हक छीन रही हूं? क्या उन की इच्छाओं को मैं पूर्ण कर पा रही हूं? मुझे अपने पति पर क्रोध आने लगा. सचमुच मैं मूढ़ हूं. कितनी लच्छेदार बातें बना कर मुझ से इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठवा दी. मुझे अपनी स्थिति अत्यंत दयनीय नहीं, असह्य लगने लगी. मां के आने से पूर्व भी तो परिस्थितियां यही थीं. सब बच्चे अनु, विनू और विजू साथ रहे किंतु आज उन का रहना असह्य क्यों लग रहा है?’

मन बारबार अतीत में भटकने लगा है. 3 साल पहले की घटना मेरे मनमस्तिष्क पर भी स्पष्ट रूप से अंकित थी. रचना तब होने वाली थी. होली की छुट्टियां हो चुकी थीं. उसी दिन हमें अपनी बड़ी ननद  के यहां जाना था. किंतु वह जाना सुखद नहीं हुआ. उस दिन बिजली का धक्का लगने से उन्हें बचाते हुए जीजी और भाईसाहब दोनों मृत्यु के ग्रास बन गए. रह गए बिलखते, विलाप करते उन के बच्चे अनु, विनू और विजू, सबकुछ समाप्त हो गया. आज के युग में हर व्यक्ति अपने ही में इतना लिप्त है कि दूसरे की जिम्मेदारी का करुणक्रंदन मन को विचलित किए दे रहा था.

रात्रि के सूनेपन में मेरे पति ने मुझ से लगभग रोते हुए कहा, ‘आभा, क्या तुम इन बच्चों को संभाल सकोगी?’

मैं पलभर के लिए जड़ हो गई. कितनी जोड़तोड़ से तो अपनी गृहस्थी चला रही हूं और उस पर 3 बच्चों का बोझ.

मैं कुछ उत्तर नहीं दे पाई. अपना स्वार्थ बारबार मन पर हावी हो जाता. वे अतीत की गाथाएं गागा कर मेरे हृदय में सहानुभूति जगाना चाह रहे थे. अंत में उन्होंने कहा, ‘अपने लिए तो सभी जीते हैं, किंतु सार्थक जीवन उसी का है जो दूसरों के लिए जिए.’

अंततोगत्वा बच्चे हमारे साथ आ गए. घरबाहर सभी हमारी प्रशंसा करते. किंतु मेरा मन अपने स्वार्थ के लिए रहरह कर विचलित हो जाता. फिर धीरेधीरे सब कुछ सहज हो गया. इस में सर्वाधिक हाथ 17 वर्षीय अनु का था.

उन लोगों के आने के बाद हम पारिवारिक बजट बना रहे थे, तभी ‘मामी आ जाऊं?’ कहती हुई अनु आ गई थी. उस समय उस का आना अच्छा नहीं लगा था, किंतु कुछ कह नहीं पाई. ‘मामी,’ मेरी ओर देख कर उस ने कहा था, ‘आप को बजट बनाते देख कर चली आई हूं. अनावश्यक हस्तक्षेप कर रही हूं, बुरा नहीं मानिएगा.’

‘नहींनहीं बेटी, कहो, क्या कहना चाहती हो?’

‘आप रामलाल की छुट्टी कर दें. एक आदमी के खाने में कम से कम 2,000 रुपए तो खर्च हो ही जाते हैं.’

मेरे प्रतिरोध के बाद भी वह नहीं मानी और रामलाल की छुट्टी कर दी गई. अनु ने न केवल रामलाल का बल्कि मेरा भी कुछ काम संभाल लिया था.

उस के बाद रचना का जन्म हुआ. रचना के जन्म पर अनु ने मेरी जो सेवा की उस की क्या मैं कभी कीमत चुका पाऊंगी?

रचना के आने से खर्च का बोझ बढ़ गया. उसी दिन शाम को अनु ने आ कर कहा, ‘‘मम्मा, मेरी एक टीचर ने बच्चों के लिए एक कोचिंग सैंटर खोला है. प्रति घंटा 300 रुपए के हिसाब से वे अभी पढ़ाने के लिए देंगी. बहुत सी लड़कियां वहां जा रही हैं. मैं भी कल से जाऊंगी.’’

हम लोगों ने कितना समझाया पर वह नहीं मानी. अपनी बीए की पढ़ाई, घर का काम, ऊपर से यह मेहनत, किंतु वह दृढ़ रही. इन के हृदय में अनु के इस कार्य के लिए जो भाव रहा हो, पर मेरे हृदय में समाज का भय ही ज्यादा था. दुनिया मुझे क्या कहेगी? बड़े यत्न से अच्छाई का जो मुखौटा मैं ने ओढ़ रखा है, वह क्या लोगों की आलोचना सह सकेगा?

पर वह प्रतिमाह अपनी सारी कमाई मेरे हाथ पर रख देती. कितना कहने पर भी एक पैसा तक न लेती. यह देख कर मैं लज्जित हो उठती.

विनू भी पढ़ाई के साथसाथ पार्टटाइम ट्यूशन करता. इन्होंने बहुत मना किया, पर बच्चों का एक ही नारा था-  ‘मेहनत करते हैं, चोरी तो नहीं.’

3 साल देखतेदेखते बीत गए. आशीष और रचना दोनों की जिम्मेदारियों से मैं मुक्त थी. वह अपने अग्रजों के पदचिह्नों पर चल रहा था. कक्षा में वह कभी पीछे नहीं रहा. मेरी आंखों के सामने बारीबारी से अनु, विनू और विजू का चेहरा घूम जाता. उस के साथसाथ आशीष का भी. क्या इन बच्चों को घर से निकाल दूं?

मेरा बाह्य मन हां कहता. 3 का खर्च तो कम होगा. किंतु अंतर्मन मुझे धिक्कारता. कल अगर हम दोनों नहीं रहे तो आशीष और रचना भी इसी तरह फालतू हो जाएंगे. मैं फफकफफक कर रोने लगी.

‘‘क्या बात है, मामी, रो क्यों रही हैं?’’ अनु के कोमल स्वर से मेरी तंद्रा भंग हो गई. शाम हो चुकी थी.

मां ने कितना अत्याचार किया मात्र 2 दिनों में. आशीष और रचना को छिपा कर हर चीज खिलाना चाहती थी. बारबार बच्चों को उलटीसीधी बातें सिखाती.

मैं अनु की ओर देखने लगी. मुझे लगा अनु नहीं, मेरी रचना बड़ी हो गई है और हम दोनों के अभाव में मां की दी हुई मानसिक यातनाएं भोग रही है.

मैं ने अनु को हृदय से लगा लिया. ‘‘नहींनहीं, मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी.’’

‘‘मुझे आप से अलग कौन कर रहा है?’’ अनु ने हंस कर कहा.

‘‘किंतु इसे जाना तो होगा ही,’’ यह करुण स्वर मेरे पति का था. पता नहीं कब वे आ गए थे.

‘‘क्या?’’ मैं ने अपराधी भाव से पूछा.

‘‘अनु का विवाह पक्का हो गया है. मेरे अधीक्षक ने अपने पुत्र के लिए स्वयं आज इस का हाथ मांगा है. दहेज में कुछ नहीं देना पड़ेगा.’’

अनु सिर झुका कर रोने लगी. मेरे हृदय पर से एक बोझ हट गया. उसे हृदय से लगा कर मैं भी खुशी में रो पड़ी.  Family Story In Hindi

False Knowledge : दुराज्ञान का फेर

False Knowledge : ज्ञान की जरूरत सब को है, दुराज्ञान की नहीं. दुराज्ञान तो न केवल एक अकेले बल्कि उस के पूरे परिवार को, उस के संबंधियों को, उस के गांव को और यहां तक कि पूरे देश को भी ऐसे गहरे गड्ढे में डाल सकता है जिस में गिर कर भी एक अकेला या पूरा समूह अपने को सही ही मानता रहे जबकि दूसरों को दुश्मन समझता रहे. यही नहीं, उक्त गड्ढे में अपनी ही फैलाई गंदगी पर गौरव भी महसूस करता रहे.

ऐसे लोग परिवारों में अकसर दिख जाते हैं जो पारिवारिक या निजी संबंधों को ले कर पूर्वाग्रह पाल लेते हैं और मरने तक उन से निकल नहीं पाते. वे खुद के लिए बोझ होते हैं और दूसरों के लिए भी नुकसानदायक. मुसीबत तब होती है जब दुराज्ञान का शिकार आसपास वालों को प्रभावित कर के सब को अपने साथ मिला लेता है. मुसीबत तब भी होती है जब आसपास वालों के दुराज्ञान को सही ज्ञान मान कर लोग उन से चिपकने लगते हैं.

विधवा से विवाह करना वर्जित है, यह दुराज्ञान है, जिसे इस देश के लोगों ने सदियों सहा. यह सही तब होता जब विधुर भी शादी न करते. जिन समाजों में विधवाओं का विवाह होता था वहां कोई आफत नहीं आई, यह जान कर भी जो इस से चिपटे रहे वे विधवाओं के जीवन को तो नर्क बनाते ही रहे, उन्हें घरों में कैद रख एक आफत भी मोल लेते रहे.

निसंतान औरतों को अपशकुनी मान कर आज भी उन का अपमान किया जाता है तब भी जब उन के पति को मालूम होता है कि स्पष्ट रूप से दोषी वही है. पूरा परिवार हर समय गंभीर तनाव में जीता है. सब लोग न खुद चैन से जीते हैं न निसंतान जोड़े को चैन से जीने देते रहे हैं.

हमारे पुराणों में ऐसी सैकड़ों कहानियां भरी हैं जिन में निसंतान दंपती तपस्या करते रहे, व्रतों में पैसा व शक्ति बरबाद करते रहे, पुत्रेष्ठि यज्ञ करतेकराते रहे, नियोग तक अपनाते रहे. क्या वे दुराज्ञान के शिकार नहीं थे? क्या आज उन की गिनती कम हो गई है?

आजकल हम भारतीयों को इसी दुराज्ञान के कारण अपने अतीत पर बहुत गौरव है. रोजाना सोशल मीडिया या टीवी चैनलों में समृद्ध व शक्तिशाली भारत की बातें की जाती रहती हैं. और इन्हीं के आधार पर हम अपना वर्तमान कम ठीक कर रहे हैं जबकि इन्हीं बातों की शराब पी कर मस्त ज्यादा हो रहे हैं.

हमारा यह दुराज्ञान असल में उन जरमन व अन्य यूरोपीय विचारकों ने शुरू किया था जिन्हें 17वीं, 18वीं सदी में भारतीय संस्कृत की किताबों का अनुवाद मिलना शुरू हुआ. जो लोग यह सोचे बैठे थे कि पढ़नालिखना तो केवल यूरोप के लोग जानते हैं उन्हें उस पर आश्चर्य हुआ और अनेक विद्वानों ने भारतीय पुस्तकों के आधार पर बड़े प्रशंसात्मक विचारों वाली पुस्तकें लिख डालीं.

मजेदार बात यह है कि मैक्समूलर और जेम्स मिल जैसे विद्वान न कभी भारत में आए न यहां रहे, फिर भी उन्होंने एक के बाद एक किताब लिख मारीं जो आज के विषैले दुराज्ञान की जड़ हैं. हम ने इन नकली पुस्तकों को सही मान कर झूठ को सच समझ लिया और रात को दिन समझने लगे.

आज भारत गरीब है, बिखरा है, गंदा है, करप्ट है, अंधविश्वासी है लेकिन हम इस सब को वैसे ही मानने को तैयार नहीं जैसे एक परिवार का मुखिया मानने को तैयार नहीं होता कि वह पुरानी लीक पर चल कर गलत कर रहा है.

आज हर घर में जो विवाद है उस के पीछे वही दुराज्ञान है जो कभी यूरोपियों ने हमारे गले मढ़ दिया था. हम समझने को तैयार ही नहीं कि हम गलत हो सकते हैं. हम हर पाखंड, परिपाटी को बिना समझे व बिना परखे इस युग में भी अपने पर थोपे चले जा रहे हैं जबकि विज्ञान, गणित, इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, वायरलैस, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस वगैरह का बोलबाला है.

इसे दोगलापन नहीं कहेंगे क्योंकि यह जानबूझ कर या स्वार्थवश नहीं किया जा रहा. यह तो वह कोरा दुराज्ञान है जो हमारे मनमस्तिष्क में गहरी जड़ें जमा चुका है. यह ऐसा है कि सब से मौडर्न मैडिसन के साथ झाड़फूंक कराने को भी सहजता से स्वीकार कर लेता है.

जीवन एक गणित है जिस में दो और दो कभी भी पांच नहीं होते. इस के विपरीत हम जिद पर अड़े हैं कि पूर्वजों ने जो कहा था वही सही है, वही सच है. यह आज की प्रौढ़ पीढ़ी और युवा पीढ़ी के बीच सब से बड़ी खाई का कारण है. हमें आज अगर नहीं मालूम कि यह युवा पीढ़ी क्या व क्यों कर रही है तो इसलिए कि युवा पीढ़ी नहीं समझ सकती कि प्रौढ़ पीढ़ी क्यों इस दुराज्ञान से चिपकी हुई है. False Knowledge

Superstitions : अंधविश्वास की जड़ें पूरी दुनिया में फैली हैं

Superstitions : अंधविश्वास के लिए भारत हमेशा बदनाम रहा है, मगर यह बीमारी दुनिया के अनेक देशों में फैली हुई है. लगभग हर समाज और संस्कृति में अनेक तरह के अंधविश्वास पनपे. कुछ तो ऐसे अंधविश्वास रहे हैं जो बहुत खतरनाक साबित हुए, फिर भी बहुत प्रचलित रहे. इन अंधविश्वासों ने बड़ी संख्या में लोगों की जान ली और समाज को नुकसान पहुंचाया. इस में कोई दोराय नहीं कि अंधविश्वास की पहली शिकार औरत और दूसरा शिकार मासूम बच्चे होते हैं.

दुनिया के सब से खतरनाक लेकिन बहुप्रचलित अंधविश्वास में चुड़ैल-टोना और डायन प्रथा प्रमुख थी. यूरोप में ‘विच हंट्स’ (16वीं–17वीं सदी) के दौरान हजारों महिलाओं को सिर्फ चुड़ैल समझ कर जिंदा जला दिया गया. भारत और अफ्रीका में भी आज तक कई जगह महिलाओं को ‘डायन’ कह कर मार दिया जाता है. मानव बलि और नरबलि सिर्फ भारत में ही नहीं दी जाती बल्कि प्राचीन संस्कृतियों (माया, एजटेक, इंका, भारत के कुछ हिस्सों) में देवताओं को प्रसन्न करने के लिए इंसानों की बलि दी जाती थी. यह विश्वास इतना गहरा था कि समाज इसे धर्म समझ कर इस का पालन करता था.

काली बिल्ली द्वारा रास्ता काटना बड़ा अशुभ माना जाता है. यूरोप से ले कर एशिया तक यह अंधविश्वास फैला कि बिल्ली या उल्लू को देखना अशुभ है. नतीजा बिल्लियों का सामूहिक कत्लेआम हुआ, खासकर मध्यकालीन यूरोप में. इस से चूहों की संख्या बढ़ी और प्लेग जैसी महामारी फैली.

एक और अंधविश्वास काफी समय तक लोगों की जान लेता रहा. ये था खून से इलाज यानी ब्लड-लेटिंग. यूरोप और एशिया में माना जाता था कि बीमारियों को खून निकालने से ठीक किया जा सकता है. लाखों मरीज इस ‘इलाज’ से मर गए क्योंकि असल में इससे शरीर और कमजोर हो जाता था.

जाति और जन्म आधारित अंधविश्वास तो आज तक दुनिया भर में कायम है. भारत और कई समाजों में यह मान्यता रही कि जन्म से कोई ऊंचा नीचा होता है. इस के चलते भेदभाव, छुआछूत और लाखों लोगों का सामाजिक शोषण हुआ और हो रहा है.

भारत में शनि ग्रहण और ग्रहदोष का डर दिखा कर औरतों का खूब शोषण होता है. ग्रहण को अपशकुन मान कर गर्भवती महिलाओं को कैद कर देना, खानापीना रोक देना, या ग्रह शांति के नाम पर महंगे अनुष्ठान करवाना भारत में आज भी जारी है.

कई देशों में बीमारी की वजह जादूटोना को माना जाता था. अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में एचआईवी, मलेरिया, और मानसिक रोगों को टोना टोटका या दुष्ट आत्मा का असर माना जाता रहा और उस के इलाज की जगह झाड़फूंक कराने से लाखों जानें गईं.

मध्य पूर्व, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और अफ्रीका में यह अंधविश्वास रहा कि परिवार या कबीले के खून का बदला खून से ही चुकाना चाहिए. लिहाजा पीढ़ियों तक हिंसा और कत्लेआम चलते रहे, साफ है कि अंधविश्वास केवल व्यक्तिगत नहीं होते, बल्कि पूरी सभ्यता और मानव इतिहास को प्रभावित करते हैं. कई बार अंधविश्वासों ने विज्ञान और उसकी खोजों की राह रोक दी. उदाहरण के लिए – यूरोप में डार्क एजेस के दौरान धार्मिक अंधविश्वासों के कारण वैज्ञानिक खोजों को दबाया गया. शासक अंधविश्वासों का उपयोग जनता पर नियंत्रण रखने के लिए करते थे. जैसे ‘दैवी अधिकार’ का विचार, जिस में राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था और उस का आदेश ईश्वर का आदेश होता था.

ऐसे ही समय में मानव वध या बलिदान को भी अंधविश्वासों से वैध ठहराया गया. जबजब अंधविश्वास प्रबल हुए, विज्ञान और आलोचनात्मक सोच पीछे छूट गई. लेकिन जबजब समाज ने अंधविश्वासों को चुनौती दी पुनर्जागरण और औद्योगिक क्रांति हुई और तभी सभ्यताएं तेजी से आगे बढ़ीं. यानी अंधविश्वास सिर्फ व्यक्तिगत भ्रम नहीं, बल्कि सभ्यता की गति और दिशा तय करने वाले कारक भी हैं.  Superstitions

Peter Navarro : ब्राहमणों पर ऐसा क्या बोला अमेरिका जो भारत में मच गया सियासी बवाल

Peter Navarro : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने कहा कि ‘मैं बस इतना कहूंगा कि भारतीय लोग समझें कि यहां क्या हो रहा है. ब्राह्मण भारतीय लोगों की कीमत पर मुनाफा कमा रहे हैं और हमें इसे रोकना होगा.’

पीटर नवारो ने वो कहा जो कांग्रेस के नेता राहुल गांधी लगातार कहते आ रहे हैं. राहुल गांधी ने ओबीसी को समाने रख कर यही बात कही थी कि पीएमओ में ओबीसी का अफसर नहीं होता है. पीएमओ को ऊंची जातियों के अफसर चला रहे हैं. राजनीतिक कारणो से राहुल गांधी ने ब्राहमण शब्द का इस्तेमाल कम किया था. जो मुद्दा राहुल गांधी ने उठाया था वही डोनाल्ड ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो उठा रहे हैं.

फौक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में नवारो ने अमेरिका की ओर से भारत पर लगाए 50 प्रतिशत टैरिफ को सही ठहराया. उन्होंने कहा कि नई दिल्ली क्रेमलिन के लिए सिर्फ एक धोबीघर है. मुझे समझ नहीं आ रहा कि भारत दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद पुतिन और शी जिनपिंग के साथ क्यों घुलमिल रहा है ?

नवारो ने आगे कहा मैं बस इतना कहूंगा कि भारतीय लोग समझें कि यहां क्या हो रहा है. ब्राह्मण भारतीय लोगों की कीमत पर मुनाफा कमा रहे हैं और हमें इसे रोकना होगा.

पीटर नवारो इस बात कि तरफ ध्यान दिलाना चाहते थे कि भारत जो क्रूड आयल रूस से खरीद रहा है उस का लाभ भारत के ‘ऊंची जाति’ वाले कारोबारी ले जा रहे हैं. ‘ऊंची जाति’ को पीटर नवारो ने ‘ब्राहमण’ का नाम दे दिया. भारत में इस को ‘ब्राहमण वर्ग’ की अलोचना के रूप में लिया गया. इस को ले कर सोशल मीडिया पर आलोचना और समर्थन का सैलाब आ गया.

शिवसेना नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि “नवारो का ये बयान बुढ़ापे के चरम पर पहुंची उन की निराशा है. नवारो का भारत में किसी खास जाति का जिक्र कर के अपनी बात समझाने की कोशिश करना, चाहे उन का मकसद यह दिखाना ही क्यों न हो कि कुछ लोग बाकी लोगों से अधिक फायदे में हैं, बेहद शर्मनाक और डराने वाली बात है. अमेरिकी प्रशासन में किसी वरिष्ठ व्यक्ति की ओर से ब्राह्मण शब्द का प्रयोग भारत के संदर्भ में अचानक नहीं हो सकता, यह जानबूझ कर किया गया था.”

टीएमसी नेता सागरिका घोष ने नवारो के बयान पर लिखा ‘”बोस्टन ब्राह्मण कभी अमेरिका में न्यू इंग्लैंड के अमीर अभिजात वर्ग के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक शब्द था. अंगरेजी भाषी दुनिया में आज भी ब्राह्मण को आर्थिक और सामाजिक रूप से अमीर दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है.”

साकेत गोखले ने कहा “अज्ञानता का एक सही उदाहरण पीटर नवारो कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स से हैं. न्यू इंग्लैंड में खासकर बोस्टन और उन के आसपास के इलाकों में ‘ब्राह्मण’ शब्द का इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो काफी अमीर हो.”

पीटर नेवारो के रूसी तेल के ब्राह्मण कनेक्शन जोड़ने पर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि “अमेरिका कह रहा है कि रुस के तेल का फायदा ब्राह्मण जाति को हो रहा है, तेल लेने वाले कौन हैं, भारत सरकार, क्या पीएम मोदी ब्राह्मण हैं? निजी कम्पनी के कौन से मालिक ब्राह्मण हैं ? लगता है कि राहुल गांधी की अज्ञानता का स्क्रिप्ट अमेरिका पहुंचा गई है. अमेरिका को सत्य नडेला, सुंदर पिचई, इंदिरा नुई के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि ये सभी ब्राह्मण हैं और अमेरिका की कम्पनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं.”  Peter Navarro

Illegal Immigrants : घुसपैठियों ने बनाई दुनिया

Illegal Immigrants : इन दिनों बिहार के चुनाव में भी घुसपैठियों का मुद्दा जोरों पर है. वोटर लिस्ट की जांच चल रही है ताकि घुसपैठियों को पहचाना जा सके. महाराष्ट्र में देश के दूसरे राज्यों के मजदूरों को घुसपैठिया बता कर उन्हें खदेड़ने की राजनीति लंबे समय से चलती आ रही है. घुसपैठियों के नाम पर यह नैरेटिव सैट करने की कोशिश की जाती है कि दूसरे देशों या राज्यों से आने वाले लोग बोझ की तरह होते हैं जो संसाधनों पर डाका डालते हैं और क्षेत्र के आम नागरिकों के लिए खतरा बन जाते हैं. क्या यह नैरेटिव उचित है?

पूरी दुनिया में हमेशा से लोग माइग्रेट करते आए हैं. एक सदी पहले तक पूरी दुनिया में लोग बेरोकटोक इधर से उधर आतेजाते और बसते रहे हैं. पूरी दुनिया में कला, संस्कृति और व्यापार के आदानप्रदान में माइग्रेशन की अहम भूमिका रही. किसी ने मजबूरी में तो किसी ने अवसरों की तलाश में दूसरी जगहों को खोजा और वहां पर प्रवास किया. कोलंबस ने अमेरिका को खोजा और फिर यूरोप से अमेरिका की ओर प्रवास का सिलसिला शुरू हुआ. इन्हीं माइग्रेट करने वाले लोगों ने अमेरिका को बनाया और बसाया. भारत समेत तमाम एशियाई देशों की भी यही सच्चाई है.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया में औपनिवेशिक ताकतें कमजोर हुईं और उन्होंने उन देशों को अपने शिकंजे से मुक्त कर दिया जो वर्षों से इन औपनिवेशिक शक्तियों की गुलामी को झेल रहे थे. नए बने राष्ट्रों में राष्ट्रवाद कुलांचें मारने लगा जिस से उन्होंने अपनी सीमाओं की घेराबंदी शुरू कर दी. इस का नतीजा यह हुआ कि माइग्रेशन बंद हो गया. राष्ट्रवाद के नाम पर दुनिया के तमाम देश आइसोलेट हो कर अपनीअपनी सीमाओं में बंद हो गए.

यह मानव विकास के खिलाफ एक राजनीतिक षड्यंत्र था. मानवता के संपूर्ण इतिहास में यह सब से बड़ी त्रासदी थी. जिस माइग्रेशन की वजह से दुनियाभर में संस्कृतियों और सभ्यताओं का आदानप्रदान व विकास हुआ था वह अचानक रुक गया और इस से मानवता की सांस्कृतिक गति भी रुक गई.

वर्ष 1947 से पहले के भारत में लोग कहीं भी जा सकते थे और कोई भी भारत में आ सकता था. कोई रुकावट नहीं थी. व्यापारी, कलाकार और खानाबदोश जनजातियां भारत से निकल कर यूरोप तक पहुंचती रहीं तो यूरोप और चीन से भी बड़ी संख्या में लोग भारत में आते रहे. इस तरह के माइग्रेशन से फायदा सभी को होता है लेकिन आज सभी देशों ने अपनीअपनी सीमाओं की ऐसी घेराबंदियां की हैं कि इंसान तो क्या, जानवर भी इन सीमाओं को नहीं लांघ सकता.

पिछले हजारों वर्षों से भारत में जो भी आया वह यहीं का हो कर रह गया. शक भारत में दूसरी शताब्दी ईसापूर्व के आसपास आए. मध्य एशिया का यह कबीला भारत को लूटने आया था लेकिन यहीं का हो कर रह गया. शक कबीले से ही भारत में महेश्वर और रुद्रदामन जैसे महान राजा हुए जिन्होंने पहली और दूसरी शताब्दी ईसवी में पश्चिमी भारत में शासन किया.

कुषाण भारत में पहली सदी ईस्वी में आए. कुषाण कबीला भी मध्य एशिया से भारत में आया और इस कबीले ने उत्तरपश्चिमी भारत में अपना साम्राज्य स्थापित किया. इसी कबीले से कनिष्क जैसे महान शासक पैदा हुए जिन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया और एशिया में भारतीय संस्कृति के विस्तार में अहम भूमिका निभाई.

भारत में 5वीं शताब्दी की शुरुआत में हूण आए. यह भी खानाबदोश जनजाति थी जो मध्य एशिया से भारत में आई थी. हूणों ने गुप्त शासक स्कंदगुप्त (455-467 ईस्वी) के शासनकाल में भारत पर आक्रमण किया और मिहिरकुल के नेतृत्व में उत्तर भारत में अपनी शक्ति स्थापित की. इन कबीलों के अलावा कई छोटीबड़ी जनजातियां यूरोप और मध्य एशिया से भारत में दाखिल हुईं और यहां के कल्चर में समा कर यहीं की हो कर रह गईं. भारत में आने वाला कोई कबीला भारत से वापस नहीं गया और न ही उन्हें किसी ने यहां से भगाने की कोशिश की.

भारत में घुसपैठिए समस्या हैं या समाधान

पिछले साल हुए झारखंड के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने घुसपैठियों का मुद्दा जोरशोर से उठाया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने चुनावी भाषणों में इस मुद्दे को हवा दी थी. बीजेपी का आरोप था कि झारखंड में आदिवासियों की जमीन बंगलादेशी घुसपैठिए हड़प रहे हैं.

झारखंड में घुसपैठ के मुद्दे को राजनीतिक दृष्टिकोण से संवेदनशील बनाया गया है तो इस के पीछे कुछ कारण भी हैं. झारखंड के संथाल परगना में 1951 में आदिवासी आबादी 44.67 फीसदी थी, जो 2011 में घट कर 28.11 फीसदी रह गई.

बीजेपी का आरोप है कि इलाके में आदिवासियों की घटती जनसंख्या के लिए बंगलादेशी घुसपैठिए जिम्मेदार हैं. घुसपैठियों द्वारा आदिवासी लड़कियों से शादी की जाती है. इस तरह वे आदिवासी समाज में घुसपैठ कर उन की जमीनें हथिया लेते हैं.

छोटानागपुर टेनेंसी और संथाल परगना में इसी तरह आदिवासियों की जमीनें हथियाने की घटनाएं सामने आई हैं. इस तरह की घटनाओं को ले कर बीजेपी ने इसे आदिवासियों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने की तरह पेश किया. झारखंड चुनावों में बीजेपी ने घुसपैठिये के मुद्दे को ‘रोटी, बेटी, माटी’ की सुरक्षा के नारे के साथ जोड़ दिया जबकि सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोरचा (जेएमएम) सरकार ने घुसपैठ के दावों को खारिज कर दिया.

असम में घुसपैठियों का मुद्दा लंबे समय से चल रहा है. असम में यह मुद्दा महत्त्वपूर्ण इसलिए भी रहा है क्योंकि असम की बड़ी सीमा बंगलादेश से लगती है. इस सीमा से बंगलादेशियों की लगातार घुसपैठ हुई है. ब्रिटिश शासन के दौरान पूर्वी बंगाल (वर्तमान बंगलादेश) से लोगों को असम में खेती और श्रम के लिए लाया गया, जिस से प्रवास का एक पैटर्न शुरू हुआ और यह लगातार चलता रहा.

1971 में बंगलादेश की स्थापना के बाद वर्षों तक बंगलादेश में आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता बनी रही जिस के कारण बड़ी संख्या में लोग भारत-बंगलादेश सीमा के माध्यम से असम में घुसपैठ करते रहे.

बोड़ो उग्रवादी गुट ने 3 दशकों तक बंगलादेशी घुसपैठियों के खिलाफ संघर्ष किया. असम की अस्मिता बचाने के नाम पर चले इस संघर्ष में हजारों लोग मारे गए. असम की राजनीति में लंबे समय से घुसपैठिए मुख्य मुद्दा रहे हैं और जब से असम में बीजेपी सत्ता में आई है उस के लिए सब से जरूरी काम घुसपैठियों को उखाड़ फेंकना ही है.

जुलाई 2025 को असम के धुबरी जिला थर्मल पावर प्रोजैक्ट की 3,500 बीघा जमीन पर बने करीब 1,700 घरों को बुल्डोजर से ढहाया गया. इस कार्रवाई में 1,400 परिवार विस्थापित हुए. कई संगठनों ने इस कार्यवाही का विरोध किया जिस के बाद बिस्वा सरमा सरकार ने आश्वासन दिया कि जिन के पास जमीन के वैध कागजात हैं, उन्हें मुआवजा या वैकल्पिक जमीन दी जाएगी.

जून 2025 को असम के गोलपारा में लगभग 1,500 एकड़ वन भूमि पर बने 667 घरों को ध्वस्त किया गया, जिन में ज्यादातर बंगलादेशी मूल के लोग रहते थे. सरकार ने इसे अवैध कब्जा हटाने का अभियान बताया. पिछले कुछ महीनों में असम के नलबाड़ी और लखीमपुर जैसे जिलों में भी ऐसी कार्रवाइयां हुईं, जिन में 2,300 से अधिक परिवार बेघर हुए.

असम और झारखंड की तरह ही दिल्ली में भी घुसपैठियों का मुद्दा जबतब गरमाता रहता है. 2020 में उत्तरपूर्वी दिल्ली और 2022 में जहांगीरपुरी में हुई हिंसा में दिल्ली पुलिस ने रोहिंग्या और बंगलादेशी मुसलमानों की संलिप्तता पाई जिस से दिल्ली के ये घुसपैठिए दक्षिणपंथ की राजनीति में अहम मुद्दा बन गए.

असम में सरकार ने घुसपैठियों की बस्तियों पर बुल्डोजर चलाया तो दिल्ली में बीजेपी की सरकार बनने के बाद से सरकारी बुल्डोजर लगातार ऐक्शन में है.

जून 2025 में दिल्ली के अशोक विहार में 200 से अधिक अवैध मकानों को ध्वस्त किया गया. गोविंदपुरी में 300 से अधिक झुग्गियों को तोड़ा गया. कालकाजी में 300 से ज्यादा घरों को ध्वस्त किया गया. निजामुद्दीन इलाके में 600 से अधिक मकानों को तोड़ा गया. तैमूर नगर में अवैध झुग्गियों पर बुल्डोजर कार्रवाई की गई.

इस के अलावा यमुना पुस्ता, बवाना, जहांगीरपुरी, सीमापुरी और कालिंदी कुंज जैसे इलाकों में भी घुसपैठियों की बस्तियों पर कार्रवाई की गई. इन में से कुछ डीडीए की जमीनों पर अवैध कब्जे को हटाने की कार्रवाई थीं. ज्यादातर बस्तियों को रोहिंग्या और बंगलादेशी घुसपैठियों को खदेड़ने के नाम पर तोड़ा गया.

घुसपैठियों की समस्या को नफरत से हल करना मानवता नहीं है. वर्षों की मेहनत से बनाए लोगों के घरों को रातोंरात धूल में मिला देने में कौन सी इंसानियत है. जो लोग भारत में पहले ही आ चुके हैं उन्हें डिटैंशन कैंपों में ठूंस देना भी इंसानियत नहीं है. रातोंरात जिन घरों को तोड़ा गया वे कहां जाएंगे?

घुसपैठियों के प्रति बेशक हमदर्दी मत रखिए लेकिन इस तरह की नफरत की भावना रखना भी उचित नहीं है. नफरत के नजरिए से देखें तो पड़ोसी देशों से भारत में आए लोग भी घुसपैठिए ही हैं लेकिन इसे तार्किक और मानवीय नजरिए से सम?ों तो यह आधुनिक प्रवास या मौडर्न माइग्रेशन है.

माइग्रेशन करने वाले लोग, जो बंगलादेश और म्यांमार की सीमाओं से भारत में आते हैं, ज्यादातर वह गरीब तबका होता है जिस के लिए अपना देश ही पराया हो जाता है. बेहद मजबूरी में ही कुछ लोग जोखिमभरा ऐसा कदम उठाते हैं और अपने देश की सीमाओं को लांघ कर भारत में घुसपैठ करते हैं. भारत में आ कर वे ?ाग्गियां बनाते हैं और यहां निम्न श्रेणी के कार्यों से अपने परिवार का पेट पालते हैं.

इन घुसपैठियों की औरतें शहरों में लोगों के घरों में काम करती हैं तो मर्द कूड़ा बीनने से ले कर रिकशा चलाने तक का काम करते हैं. इस में दोराय नहीं कि इन में कुछ चोरी या नशे के कारोबार में भी संलिप्त हो जाते हैं जिस से ये लोग आम नागरिकों के लिए खतरा बन जाते हैं. ऐसे में इन घुसपैठियों के प्रति नकारात्मक वातावरण पैदा होना भी स्वाभाविक बात है लेकिन इस का समाधान बुल्डोजर और डिटैंशन कैंप तो कतई नहीं है.

झुग्गीझोपड़ियों में बसर करने वाले ये लोग, जिन्हें सरकार घुसपैठिया कहती है, शहरों और शहरियों की जरूरत हैं. इन घुसपैठियों के खिलाफ माहौल खड़ा करने और इन्हें सब से बड़ी समस्या बताने के पीछे सिर्फ राजनीति है. वरना शहरों में महज 5 हजार में घर का झाड़ूबरतन करने वाली मेड किस की जरूरत नहीं.

क्या है घुसपैठियों की त्रासदी का समाधान

एशिया और मिडिल ईस्ट के ज्यादातर देश लंबे वक्त तक औपनिवेशिक ताकतों के गुलाम रहे हैं. इन देशों को आजादी तो मिली लेकिन इस आजादी के साथ सीमा विवाद के गहरे जख्म भी मिले. इसी सीमा विवाद के चलते एक भूभाग में रहने वाले लोग कई देशों में बंट गए. रातोंरात सब बदल गया. सदियों जिस जगह को लोग अपना सम?ाते रहे वे उन से छीन ली गई. लाखों लोग विस्थापित हुए और विस्थापित लोगों को नई जगह पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

इन देशों में दशकों तक राजनीतिक अस्थिरता बनी रही जिस का खमियाजा आम लोगों को ही भुगतना पड़ा. कुछ लोगों ने भविष्य की बेहतरी के लिए तो कुछ लोगों ने जान के डर से पलायन किया और देशों की सीमाओं को लांघ कर घुसपैठिए बन गए. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विस्थापन होता रहा और यूनाइटेड नैशन देखता रहा. घुसपैठ और घुसपैठिए किसी भी देश के लिए समस्या नहीं बल्कि समाधान होते हैं. यह माइग्रेशन की स्वाभाविक प्रक्रिया है जो सदियों से चलती आई है.

गौरतलब यह है कि 1937 तक बर्मा (म्यांमार) ब्रिटिश भारत का हिस्सा था. उस समय व्यापार और रोजगार के लिए भारतीय मूल के लोग म्यांमार गए थे और आज भी वहां 25 लाख भारतीय समुदाय के लोग निवास करते हैं. वर्ष 2021 में भारत में घुसपैठ करने वाले लोगों में बड़ी तादाद भारतीय मूल के लोगों की भी है जो ब्रिटिश काल में म्यांमार चले गए थे.

आज के समय घुसपैठ और घुसपैठियों को ले कर बीजेपीशासित राज्यों ने सख्त कदम तो उठाए हैं लेकिन घुसपैठियों के खिलाफ बीजेपी की कार्रवाई सिर्फ राजनीति से प्रेरित नजर आती है. बीजेपी के पास इस समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं है. अगर बीजेपी सरकार ऐसा सोचती है कि बुल्डोजर से घुसपैठियों की बस्तियों को तबाह कर देने से यह समस्या खत्म हो जाएगी तो यह सिर्फ जनता को बेवकूफ बनाने का तरीका भर है.

घुसपैठ कोई समस्या नहीं है. यह माइग्रेशन की सामान्य प्रक्रिया है जो वर्षों से चलती आई है. अगर इसे समस्या मान भी लें तो इस समस्या का समाधान करना राज्यों का काम नहीं है. इस के लिए केंद्र सरकार को विवेकपूर्ण नीतियां बनानी होंगी और इस समस्या के समाधान के रास्ते में इंसानियत का भी खयाल रखना होगा.

केंद्र सरकार को बंगलादेश और म्यांमार सरकारों से घुसपैठियों को वापस भेजने के लिए प्रत्यर्पण नीतियों को मूर्त रूप देना होगा. इस के अलावा कोई रास्ता नहीं है. फिर भी जो लोग भारत में रह जाएं उन्हें नागरिकता प्रदान कर शिक्षा व रोजगार के जरिए मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करना होगा. यही इस जटिल समस्या का एक विवेकपूर्ण और मानवीय समाधान हो सकता है.

भारत की संस्कृति हमेशा से समावेशी रही है. ‘वसुधैव कुटुंबकम’, ‘पूरा विश्व एक परिवार’ है’ यह वाक्य भारतीय दर्शन और संस्कृति की महानता साबित करने वाले लोग बारबार दोहराते हैं. अपने अंतर्राष्ट्रीय दौरों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकसर इस वाक्य की विवेचना करते नजर आते हैं. आरएसएस के मोहन भागवत भी वसुधैव कुटुंबकम को भारत की आनबानशान बताते हैं लेकिन बीजेपी भारत की इस आनबानशान को बुलडोज करने में लगी हुई नजर आती है.

घुसपैठियों के खिलाफ डोनाल्ड ट्रंप

वर्ष 1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका की खोज की. आधुनिक अमेरिका का इतिहास कोलंबस की इसी खोज से शुरू होता है. कोलंबस के बाद स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस और इंग्लैंड के व्यापारियों ने अमेरिका को बनाया व बसाया. इस तरह देखा जाए तो आज अमेरिका में बसे 95 फीसदी लोग घुसपैठिए ही हैं. दुनिया की सब से बड़ी आर्थिक महाशक्ति होने के कारण आज पूरी दुनिया से लोग अमेरिका जाने का ख्वाब देखते हैं. बाहरी लोगों की मेहनत से ही अमेरिका बना है लेकिन जब से डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए हैं उन्होंने घुसपैठियों के खिलाफ मोरचा खोल दिया है.

ट्रंप ने अवैध प्रवासियों को बड़े पैमाने पर देश से निकालने की शुरुआत की. इसी क्रम में 100 से अधिक भारतीय नागरिकों को बेहद शर्मनाक तरीके से डिपोर्ट कर दिया. ट्रंप ने शपथ लेते ही सब से पहले रिफ्यूजी रिसैटलमैंट प्रोग्राम को रद्द कर दिया और हजारों शरणार्थियों को अमेरिका से खदेड़ दिया.

अमेरिका में प्रवासियों के लिए इस वक्त हालात बुरे हैं. इस बीच भारतीयों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव की घटनाएं भी बढ़ी हैं. प्रवासियों के खिलाफ ट्रंप की नीतियों से अमेरिकी समाज के अंदर दबी हुई ‘वाइट सुप्रीमेसी’ वाली नस्लीय मानसिकता ने एक बार फिर उभार मारना शुरू कर दिया है. इस का खमियाजा अमेरिका में बसे लोगों को भुगतना पड़ रहा है.

विदेश नीति से जुड़े भारत सरकार के तमाम दावों के बावजूद ट्रंप सरकार ने भारतीयों के साथ कोई रियायत नहीं बरती. ट्रंप भारतीयों को घुसपैठिया मान रहे हैं. यही कारण है कि भारतीयों के खिलाफ नस्लीय घटनाओं में भी तेजी आई है.

जौर्जिया में 3 भारतीय डाक्टरों (डा. कपिल पारीक, डा. ज्योति मानेकर और डा. अनिशा पटेल) ने नौर्थईस्ट जौर्जिया हैल्थ सिस्टम पर नस्लभेद का मुकदमा दायर किया है. इन डाक्टरों का आरोप है कि उन के भारतीय मूल के होने के कारण उन की कार्यक्षमता पर सवाल उठाए गए और उन के काम में जानबूझ कर रुकावटें डाली गईं. कुछ भारतीय डाक्टर्स पर बेहद संगीन आरोप भी लगे हैं. इन घटनाओं को अमेरिकी मीडिया ने व्यापक रूप से उछाला जिस से भारतीय मूल के डाक्टर्स के खिलाफ ऐसा माहौल बना कि सैकड़ों डाक्टर्स को अमेरिका छोड़ कर भारत आना पड़ रहा है.

न्यू जर्सी के डा. रितेश कालरा पर मरीजों को अवैध नशीली दवाएं (जैसे औक्सीकोडोन) देने और दवाओं के बदले यौन संबंध बनाने की मांग करने के आरोप लगे हैं. इस के अलावा, डा. उमैर एजाज पर महिलाओं व बच्चों के नग्न वीडियो बनाने जैसे गंभीर आरोप हैं. इन मामलों ने भारतीय डाक्टरों की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है.

अमेरिका में 38 फीसदी डाक्टर भारतीय मूल के हैं. अगर अमेरिका में घुसपैठियों का मुद्दा और गरमाता है तो इस से सब से बड़ा नुकसान उन डाक्टरों को उठाना पड़ सकता है जिन्होंने बहुत मेहनत से अमेरिका में जगह बनाई है. अगर भारतीय मूल के डाक्टरों का यह हाल है तो जो भारतीय अमेरिका में छोटेमोटे कामों में लगे हैं उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा होगा.

आगे का अंश बौक्स के बाद 

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घुसपैठियों के खिलाफ ईरान

ईरान ने महज 16 दिनों में 5 लाख से ज्यादा अफगान नागरिकों को देश से बाहर निकाल दिया है. यह कार्रवाई 24 जून से 9 जुलाई के बीच हुई है. यानी, हर दिन औसतन 30,000 से ज्यादा अफगानों को देश से निकाला गया. संयुक्त राष्ट्र ने इसे दशक की सब से बड़ी जबरन निकासी में से एक करार दिया है. इजराइल के साथ युद्ध के बाद देश की सुरक्षा के नाम पर ईरान ने यह कदम उठाया है.

अफगानिस्तान से बड़ी तादाद में बेरोजगार ईरान की ओर रुख करते हैं. अफगानिस्तान से निकलने वाले लोगों का यह माइग्रेशन दशकों से चल रहा है. कई अफगानी लोगों ने ईरान में दुकानें खोलीं तो कई छोटेमोटे रोजगार में लगे हुए थे. इन में बड़ी तादाद मजदूरों की थी जो अब वापस अफगान भेजे जा रहे हैं. एक मुसलिम देश को दूसरे देश के मुसलिम बरदाश्त नहीं लेकिन स्वीडेन जैसे गैरइसलामिक देशों ने इंसानियत दिखाते हुए मुसलिम देशों के आंतरिक कलह से बरबाद हुए लोगों को अपने देशों में शरण दी.

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माइग्रेशन को रोकना मानवता के विरुद्ध एक षड्यंत्र ही है

अफ्रीका से बाहर निकलने वाले पहले मानव प्रवास से ले कर आज तक के प्रवास में कोई विशेष अंतर नहीं है. 74 हजार साल पहले अफ्रीका से बाहर निकलने वाले लोगों को भी अवसरों की तलाश थी, आज भी लोग इसी कारण माइग्रेट करते हैं. पूरी दुनिया को माइग्रेट करने वाले लोगों ने ही बनाया और बसाया है. लेकिन आज राष्ट्रवाद की आड़ में देशों ने अपनीअपनी घेराबंदियां कर दीं हैं जिस से माइग्रेशन के द्वार बंद हो गए हैं. कहीं हजारों किलोमीटर लंबी कंटीली तार बिछा दी गई है तो कहीं ऊंची दीवारें खड़ी कर दी गई हैं.

हैरानी की बात यह है कि यह सब पहले से सभ्य मानी जानी वाली दुनिया में किया जा रहा है और लोगों को माइग्रेट करने से रोकने के लिए यह सब हो रहा है. क्या यह मानवता का हृस नहीं है? जो लोग किन्ही भी कारणों से देशविहीन हो गए हों, क्या उन्हें धरती पर रहने का हक नहीं है? 2 देशों की लड़ाई में विस्थापित होने वाले लोगों का ठिकाना क्या है?

अगर वे अपने परिवार की खातिर किसी दूसरी दुनिया की तलाश करें तो इस में गलत क्या है? अपने लिए थोड़ी सी जमीन की तलाश करते, इधरउधर भटकते परिवारों को घुसपैठिया कहें तो क्या यह सभ्यता की निशानी है?

इस धरती पर रहने वाले हर इंसान को दुनिया में कहीं भी रहने और बसने का अधिकार होना चाहिए. माइग्रेशन मानवता के इतिहास और उस के विकासक्रम का सब से जरूरी हिस्सा रहा है, इसे रोकना मानवता के विरुद्ध एक षड्यंत्र ही है. यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी आधुनिक और सभ्य दुनिया को बनाने व बसाने में उन लोगों का सब से बड़ा योगदान रहा है जिन्हें आज हम घुसपैठिया कहते हैं. Illegal Immigrants

Stress Management : मातापिता मुझ पर अच्छे अंक लाने का दबाव डालते हैं

Stress Management : मैं 20 वर्षीया कालेज छात्रा हूं. पढ़ाई का दबाव, परीक्षाओं की चिंता और कैरियर की असुरक्षा. इन सब ने मुझे इतना तनावग्रस्त कर दिया है कि नींद तक पूरी नहीं आती. कभीकभी लगता है कि यह सब मेरी क्षमता से बाहर है. मैं इस तनाव से कैसे निकलूं?

जवाब : यह समस्या आज के लगभग हर छात्र की है. कैरियर और प्रतिस्पर्धा का दबाव युवाओं की जिंदगी का सब से बड़ा तनाव बन चुका है. लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि तनाव से सफलता नहीं मिलती, बल्कि सही योजना और आत्मविश्वास से मिलती है.

सब से पहले, अपने दिन का टाइमटेबल बनाइए. पढ़ाई को छोटेछोटे हिस्सों में बांट कर पढ़ें. रातभर जगने के बजाय 2-2 घंटे के अंतराल में पढ़ाई करें और बीचबीच में आराम लीजिए. मातापिता से खुल कर बातें करें. उन्हें समझाइए कि आप अपनी पूरी मेहनत कर रही हैं और ज्यादा दबाव आप को तोड़ सकता है. जब वे आप के मन की स्थिति समझेंगे तो निश्चित रूप से उन का नजरिया बदलेगा.

मन को शांत करने के लिए व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल करें. इस से मानसिक ऊर्जा और एकाग्रता बढ़ेगी. याद रखिए, अच्छे अंक जरूरी हैं लेकिन जिंदगी सिर्फ अंकों पर नहीं टिकी है. आत्मविश्वास और कौशल ही असली पूंजी है. तनाव छोड़ कर अगर आप पूरे मन से मेहनत करेंगे तो सफलता आप के कदम चूमेगी ही. Stress Management 

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे. 

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