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Social Story : सैल्फी के ताजा रेट – सैल्फी के चक्कर में भाव खाती हुई दाल

Social Story : महीनों से घर से दाल, सब्जियां गायब हैं. सुखचैन तो खैर उसी दिन से गायब हो गया था जिस दिन मोतीचूर का लड्डू आया था. चंद्रमुखी आजकल सूरजमुखी चल रही है. सूरजमुखी ने नाक में दम कर रखा है कि बहुत हो गया दालसब्जियों से मुंह छिपाना. अब और बहाने मत बनाओ. मर्द हो तो मर्द वाला करतब कर के दिखाओ. घर में तो बड़े मर्द बने फिरते हो. मगर जब बाजार से सब्जीदाल लाने को कहती हूं तो बाजार जाने से ऐसे डरते हो जैसे…

मेरे लिए न सही तो न सही, कम से कम उस के लिए ही सही, किलोआधकिलो कोई भी दाल ले ही आओ. दाल का मुंह देखे बिन अब किचन काटने को आती है. मैं तो तुम्हें पतिदेव मानती रही और तुम पति कहलाने के लायक भी नहीं. सोचा था, ‘जिंदगीभर तुम्हारे साथ मटरपनीर खाऊंगी पर तुम, अरहर तो छोड़ो, चने की दाल खिलाने के लायक भी नहीं. सच पूछो तो अब मैं अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार बहुत पछता रही हूं. इस उम्र में कहीं और जाने से भी रही.’

वैसे तो मेरे जैसा पति, पत्नी के तानों से कभी तंग नहीं आता पर पहली बार पता नहीं क्या हुआ, क्यों हुआ कि मेरे लिजलिजे अहं को पत्नी के ताने प्र्रभावित कर गए और मैं बिना एक पल गंवाए पत्नी के तानों से आहत हो गया.

जिस तरह कभी पत्नी के तानों से आहत हो कर तुलसीदास घर छोड़ कर कथाकथित प्रभु की खोज में निकले थे उसी तरह अपनी बीवी के तानों से तंग आ कर मेरा मन भी बाजार जा, दाल पाने को मचल उठा. मैं बाजार की ओर बिन सोचेविचारे, कांधे पर झोला लटकाए दाल की खोज में निकल पड़ा. अब जो होगा, देखा जाएगा. सिर दिया बाजार में, तो रेट से क्या डरना.

मुझे लगता है कि कई बार बहुत से काम बिन सोचेविचारे ही, बस रेले में करने पड़ते हैं. जो उन के बारे में यह सोचा कि इस काम को करने से पहले सोच लिया जाए तो सोचने के बाद पता चलता है कि इस काम को करने की मैं कितनी बड़ी बेवकूफी कर रहा था.

ज्यों ही बाजार के गेट से पहला कदम भीतर धरा, टांगें जवाब देने लगीं. लगा, वैराग्य की राह जैसी कठिन है बाजार की राह, बल्कि उस से भी कठिन. वैराग्य की राह से पार पाना बाजार की राह की अपेक्षा आसान है. जिस तरह जीव को माया अपने वश में कर उसे प्रभु से मिलने नहीं देती, उसी तरह बाजार के भाव उसे डरा अपनी बीवी में उठने नहीं देते.

बाजार के जलते अंगारों पर आंखें बंद कर कदम रखता, बीवी के तानों का स्मरण करता अपनी नस्ल की दाल के चरणस्पर्श करने को हुआ ही कि लाला ने हड़काते रोका, ‘‘धूर्त, क्या कर रहे हो? दाल से छेड़छाड़ करने का इरादा है क्या? पुलिस बुलवाऊं? पता नहीं कहां से चले आते हैं. छेड़छाड़ करने को अब दालें ही रह गईं इन बदतमीजों को.’’ यह कह उस ने फोन की तरफ हाथ बढ़ाया.

‘‘नहीं, मैं तो बस दाल के चरणस्पर्श कर इन का आशीर्वाद लेना चाहता था, लालाजी. इन का आशीर्वाद पा, इन्हें डोली में बिठा, अपने घर सादर ले जाना चाहता हूं,’’ मैं दास्यभाव के भक्त सा घिघियाया.

‘‘200 रुपए प्रति किलोक्राम रेट है इन का आजकल,’’ लाला ने मेरी जब में झांकते हुए पूछा, ‘‘कितनी दूं?’’

‘‘200 ग्राम दे दो भगवन,’’ मैं ने कहा तो लाला गुस्साया, ‘‘पता नहीं कहां से चले आते हैं भिखारी बाजार में. अपनी इज्जत का तो खयाल ही नहीं, दाल की इज्जत का भी खयाल नहीं रखते. किलो से कम दाल बेचना पाप है, मेरे बाप,’’ लाला ने बाजारू पापपुण्य के बीच की मायावी रेखा से अवगत कराया.

‘‘लाला, फ्री में दालसंग एक सैल्फी तो ले सकता हूं न?’’ मैं ने रिरियाते कहा तो लाला मूंछों पर ताव देता बोला, ‘‘माश दाल संग पर सैल्फी 50 रुपए, अरहर संग पर सैल्फी 60 रुपए, चने संग सैल्फी पर 40 रुपए. कहो, किस के साथ सैल्फी लेनी है?’’

मैं समझ गया, बाजार में कुछ भी फ्री नहीं है, सैल्फी भी नहीं.  Social Story

Udaipur Files : फिर विवादित विषय पर खुली एक और फाइल

Udaipur Files : आजकल हमारे गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 3 महीने में जातीय जनगणना कराए जाने की बातें जोरशोर से की जा रही हैं. गृहमंत्री ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के बारे में कहा कि यह कानून पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारतीय राष्ट्रीयता प्रदान करने के लिए बनाया गया है न कि नागरिकता छीनने के लिए.

दूसरी ओर हमारी सरकार ने मुसलमानों की वक्फ बोर्ड की जमीनें हथियाने पर कानून बनाया. इस से देशभर में मुसलमान भड़क गए और भाजपा भगवाधारियों को खुश करने में लगी रही. इसी का फायदा उठा कर कुछ कट्टरपंथियों ने मुसलमानों को भड़काना शुरू कर दिया और कहना शुरू कर दिया, ‘सिर कलम से जुदा.’ इस का असर यह हुआ देशभर में मुसलिमों द्वारा छिटपुट हिंसा भी की गई.

इसी के तहत 28 जून, 2022 को उदयपुर के एक 40 साल के दरजी कन्हैयालाल की बेरहमी से हत्या कर दी गई. यह ह्त्या धार्मिक कट्टरता के चलते हुई. यह एक ऐसी हत्या थी जिस ने पूरे देश को झकझोर दिया. हत्यारों ने घटना का वीडियो बनाया और उसे औनलाइन वितरित कर दिया. आरोपी थे मोहम्मद रियाज अख्तर और गौस मोहम्मद.

कन्हैयालाल उदयपुर के धानमंडी इलाके में दरजी की दुकान चलाते थे. उन का परिवार दुकान और रोजमर्रा की जिंदगी में ही उलझ रहता था. लेकिन एक सोशल मीडिया पोस्ट ने उन की जिंदगी बदल कर रख दी. उन्होंने भाजपा नेता रहीं नूपुर शर्मा के समर्थन में एक पोस्ट डाली थी. कन्हैया लाल ने सोशल मीडिया अकाउंट पर पैगंबर मोहम्मद साहब पर एक विवादित पोस्ट शेयर कर दी थी. इस पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई तो पुलिस ने कन्हैयालाल को गिरफ्तार कर लिया. धमकियां मिलने पर उन्होंने सुरक्षा की मांग भी की थी.

28 जून, 2022 को 2 युवक रियाज अख्तर और गौस मोहम्मद कन्हैयालाल की दुकान पर कपड़े सिलवाने आए और बहाने से कन्हैयालाल को बुला कर धारदार हथियार से उन की हत्या कर दी.

आरोपियों को गिरफ्तार कर मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी गई. यह मामला अभी जयपुर की अदालत में लंबित है. हाईकोर्ट ने फिल्म निर्माताओं से जवाब भी मांगा है.

‘उदयपुर फाइल्स’ बस इसी घटना पर बनाई गई फिल्म है. इसे ‘ताशकंद फाइल्स’, ‘कश्मीर फाइल्स’, ‘केरला फाइल्स’, ‘बस्तर : द नक्सल स्टोरी’ जैसी कैटेगरी में गिना जा सकता है. बौलीवुड में इन जैसी फिल्मों को बनाने वाला और देखने वाला एक तबका हाल के वर्षों में उभरा है. इन फिल्मों का सिंपल सा जोड़गणित है. धार्मिक और राजनीति से देश में उभरी भावनाओं पर फिल्म बनाओ, इस में प्रचार पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ता, थोड़ा सत्ता समर्थक बन जाओ, इस से फिल्म टैक्सफ्री करवा लो. ऐसी फिल्में विवादित होती हैं तो चर्चाओं में बन ही जाती हैं.

‘उदयपुर फाइल्स’ जल्दबाजी में बनाई गई फिल्म दिखाई देती है. फिल्म को दर्शक इसलिए भी नसीब नहीं हुए क्योंकि हालफिलहाल में ही यह घटना घटी है और अधिकतर लोग इस घटना के क्रमबद्ध तरीके से वाकिफ हैं. इन घटनाओं को ड्रामेटिक अंदाज में पहले ही कई न्यूज चैनल तमाम एआई माध्यमों से दिखा चुके हैं. वहीं, इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो नया जान पड़ता है.

दरअसल, यह बात इस फिल्म के निर्देशक भी जानते हैं मगर उन्होंने बनाई है क्योंकि वे इस घटना से उपजे सांप्रदायिक तनाव और भावों का फायदा उठाना चाहते हैं. वैसे भी, आजकल सच्ची घटनाओं पर फिल्में बनने का दौर चल पड़ा है, इस में निर्देशक और पटकथा लेखक को मेहनत कम ही लगती है.

फिल्म में कहीं भी इस बात का संकेत नहीं दिया गया कि इस की जड़ भारत में तेजी से बढ़ रही सांप्रदायिक राजनीति है, जिस का जिम्मेदार मौजूदा सत्तापक्ष है. वह अलगअलग समुदायों को आपस में भड़काने वालों को आश्रय दे रहा है.

इस से पहले भी कई मौबलिंचिंग की घटनाएं घटीं, जिस में दूसरे समुदाय के लोगों को गौरक्षकों द्वारा टारगेट किया गया.

फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ टाइप बनाने की कोशिश की गई है. हालांकि फिल्म में बहुत सारे कट लगाए गए हैं. फर्स्ट हाफ तो खराब है, इंडिया, पाकिस्तान जरूरत से ज्यादा किया गया है, जो अखरता है. सैकंड हाफ में कहानी हिलाती है. सपोर्टिंग कास्ट काफी खराब है, सिर्फ कन्हैयालाल वाले सीन जानदार हैं. गाने बेकार हैं. कहानी फिल्म के साथ इंसाफ नहीं करती.

विजय राज ने बढ़िया ऐक्टिंग की है. उस के एक्सप्रैशंस बढ़िया हैं. वे आप को रुला देते हैं. रजनीश दुग्गल का काम भी अच्छा है. निर्देशन साधारण है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.  Udaipur Files

Hindi Satire : कष्ट निवारक कुत्ता

Hindi Satire : हाए री सरला, पंडितजी के बताए उपाय में ऐसे उलझ कि कष्ट निवारक काले कुत्ते को ढूंढ़ना महंगा पड़ गया. इतना महंगा कि कभी सड़क की खाक छानती तो कभी घरघर घीरोटी ले जाती फिरती. मगर कष्ट जहां का तहां ही रहा.

आज फिर से मनसुख भाई और उन की पत्नी सरला के बीच अच्छीखासी नोंकझोंक हुई. इधर कुछ दिनों से पतिपत्नी के बीच खटपट तेज हो गई थी. मनसुख कपड़े की दुकान चलाते थे जबकि सरला सीधीसादी गृहिणी थी. घर के काम के साथ वह टीवी के भक्ति चैनलों पर भी अच्छा समय दिया करती थी.
‘‘सरला बहन, आज फिर से मनसुख भाई की तेज आवाज हमारे घर में अंदर तक पहुंच रही थी.’’ दोपहर में सरला को बालकनी में कपड़े फैलाते देख पड़ोसिन मालती ने कहा.
‘‘सरला बहन, मैं कब से बोल रही हूं कि यह सब ग्रह का फेर है. एक बार पंडितजी से मिल ही लो. कोई न कोई राह तो जरूर निकल आएगी.’’
पड़ोसिन मालती की बात सुन कर सरला का मन भी डोल गया. वह पंडितजी के पास जाने के लिए तैयार हो गई.

बाजार में चौक वाले मंदिर पर एक पंडितजी बैठते थे. मालती सरला को ले कर उन्हीं के पास गई. वहां जा कर सरला ने हाथ जोड़ कर अपनी समस्या बताई. जिस प्रकार शरीर में कुछ तकलीफ होने पर व्यक्ति किसी डाक्टर के पास निदान के लिए जाता है, उसी प्रकार सरला अपनी गृहस्थी की समस्या दूर करने के लिए पंडितजी के पास आई थी.

सारी बात सुन कर पंडितजी ने एक सरसरी निगाह सरला पर डाली और बोले, ‘‘आप के ललाट की रेखाएं बता रही हैं कि आप के ऊपर शनि की साढ़े साती सवार है और आप का गुरु भी बहुत कमजोर है.’’
‘‘पंडितजी, इस से नजात कैसे मिलेगी?’’ चिंता के भाव के साथ हाथ जोड़े सरला बोली.
‘‘गुरु को भारी करने के लिए कुछ विशेष पूजा और हवन करना होगा. शनि देव को प्रसन्न करने के लिए घी में चुपड़ी रोटी सुबहशाम काले कुत्ते को खिलाएं. शनि देव की कृपा के साथ काल भैरव की भी विशेष कृपा मिलेगी.’’

पंडितजी की यह बात सुन कर सरला के मन में दुविधा पनपने लगी. उसे मालूम था कि उस के पति मनसुख इन फालतू के पूजाहवन के लिए रुपए खर्च करने से रहे. अब क्या किया जाए!

वह सोच रही थी कि तभी मालती ने उसे हिलाया, ‘‘पंडितजी की दक्षिणा दे दो, सरला बहन. किस सोच में पड़ी हो?’’ पंडितजी को 2,100 रुपए देने का सुन कर सरला फिर असमंजस में पड़ गई. वह अपने पर्स को देखने लगी. सरला के मन को भांपते हुए मालती ने दक्षिणा कम करवा कर पंडितजी को 501 रुपए दिलवाए.

पंडितजी को दक्षिणा दे कर सरला मालती के साथ घर लौटी. उस ने मनसुख को मनाने की पूरी कोशिश की कि वह पूजाहवन के लिए मान जाए. आखिर गुरु को भारी जो करना था. लेकिन मनसुख भाई तो ठहरे कपड़े की दुकानदारी चलाने वाले, राहुकेतु की दुकानदारी चलाने वाले की बात वे नहीं माने.

अब सरला सोची कि गुरु कमजोर रहता है तो रहे, उसे फिर कभी बलिष्ठ बना लेंगे. कम से कम काले कुत्ते को घी चुपड़ी रोटी खिला कर शनिदेव को तो प्रसन्न कर लें और काल भैरव की कृपा भी लगेहाथ प्राप्त कर लें. फिर क्या था, अगले दिन से ही सरला काल भैरव के प्रतिछाया (कुत्ता) की तलाश में सुबहशाम सड़क पर निकलने लगी. हाथ में घी लगी दो रोटियां और उस में भी अंदर गुड़ डाल कर. थोड़ी देर तक सड़क पर टहलने पर उसे एक काला कुत्ता दिख गया. मगर वह 4-5 अन्य कुत्तों के साथ इधरउधर पूंछ हिलाते चल रहा था, मानो सब वाक पर निकले हों.

सरला उन कुत्तों की तरफ आगे बढ़ी और डरतेडरते दूर से ही काले कुत्ते के पास रोटी फेंक दी. लेकिन हाय रे समय, शनि देव इतनी जल्दी कहां प्रसन्न होने वाले थे. सरला की राह में तो बाधाओं की शुरुआत अब हो रही थी. अचानक रोटी का टुकड़ा आया तो काले कुत्ते से पहले बाकी कुत्ते छीनाझपटी करने लगे. पहले मैं पहले मैं की होड़ उन में ऐसी मची कि रोटी के टुकड़ेटुकड़े हो गए. सरला तो बिना पीछे देखे तेज कदमों से वहां से निकल ली.

घर आ कर सोचने लगी कि उस का प्रयास व्यर्थ गया. लेकिन वह हिम्मत नहीं हारी. वह फिर से काले कुत्ते की तलाश और उसे रोटी खिलाने की मशक्कत के लिए सड़क पर निकल पड़ी. उसे एक कुतिया दिखी. उस के कई छोटे बच्चे थे. संयोग से उस में एक बच्चा पूरे काले रंग का था. सरला उस के आगे रोटी फेंक कर वापस मुड़ गई. लेकिन अफसोस, यह निवाला भी काले कुत्ते को न मिला. उस कुतिया ने ही रोटी खा ली. सुबह की तरह भौंभौं की घमासान सुनाई नहीं पड़ी तो सरला ने पलट कर देखा. वह मन ही मन सोचने लगी, ‘चलो, कुतिया के दूध में ही मिल कर वह रोटी का अंश उस के बच्चे (काले कुत्ते) के पेट में चला जाएगा.’

इन मेहनतकश हालात को महीना बीत गया लेकिन सरला के जीवन में अच्छी बातें फलित नहीं हुईं. वह फिर पंडितजी से मिली. पंडितजी ने बताया कि जब तक श्रद्धा भाव से काले कुत्ते को पूरी रोटी नहीं खिलाएगी तब तक सकारात्मक परिणाम नहीं दिखेंगे. सरला से पंडितजी ने इस बार भी दक्षिणा में 501 रुपए लिए.

अब सरला ने सोचा कि किसी पालतू काले कुत्ते को रोटी खिलाना सही होगा. उसे सड़क के दूसरी तरफ एक गली में काला पालतू कुत्ता होने की जानकारी मिली. सरला घी वाली रोटी ले कर चुपके से उधर निकल पड़ी. उस घर से अनजान, घर वाले से अनजान और कुत्ता तो बिलकुल अपरिचित. मुख्य दरवाजे के पास ही काला कुत्ता जंजीर से बंधा खड़ा था. सरला जैसे ही उस की तरफ बढ़ी, कुत्ते ने भूंकना शुरू कर दिया. सरला उस कुत्ते को रोटी खिलाती, उस के पहले ही घर में चोरचोर की आवाज सुनाई देने लगी. उसे समझते देर न लगी कि घर वालों ने कुत्ते के भूंकने से उसे चोर समझ लिया है. वह बिना रोटी खिलाए उलटे पैर वहां से भागी. बेहिसाब भागने में सड़क पर भी ध्यान नहीं दिया और एक गाड़ी के नीचे आतेआते बची. गाड़ी वाला अचानक ब्रेक न लगाता तो वह आज सीधे शनि देव के पास पहुंच गई होती.

शनि देव को प्रसन्न करने और काल भैरव का विशेष आशीर्वाद पाने के लिए काले कुत्ते को रोटी खिलाना सरला के लिए बड़ी टेढ़ी खीर साबित हो रही थी. अब वह निराश हुई जा रही थी. उसे महसूस हो रहा था कि लगता है अब शनि देव की कृपा पाने से वंचित रह जाएगी. यों ही घर में शनि की वक्री दृष्टि और साढ़ेसाती अपनी धाक जमाए रहेगी. लेकिन तभी उसे उम्मीद की रोशनी दिखी.

सरला को मालूम हुआ कि महल्ले के अवस्थीजी के यहां कुत्ता आया है. सुखद बात यह कि वह काले रंग का है. उस का नाम शेरा रखा गया था. सरला ने राहत की सांस ली.

चलो, अब अवस्थीजी के घर अपना आनाजाना तो है ही. ऐसे में उन के शेरा से मित्रता कर के उसे बड़े प्यार से रोटी खिलाऊंगी. अब रोटी की कौन कहे, उसे तो चावलसब्जी आदि भी दे जाऊंगी. तब हमारे सभी संकट निश्चित दूर हो जाएंगे.

सरला का अवस्थीजी के घर आनाजाना बढ़ गया. वह शेरा से भी दोस्ती बढ़ाने लगी. बातोंबातों में उस ने शेरा को रोटी खिलाने की इजाजत भी ले ली. शेरा और सरला समान अक्षर के नाम वाले थे, इसलिए शायद उन के हृदय की कुंडली के सारे गुण मिल गए. दोनों परम मित्र बन गए. सरला का मन गदगद था. लेकिन हां, शेरा सरला की दी घी वाली रोटी कभी कोई टुकड़ा खाता, कभी पूरा छोड़ देता. मगर इतने में भी सरला खुश थी. उसे विश्वास हो रहा था कि अब उस के सारे कष्ट निश्चित ही दूर हो जाएंगे और शेरा भी उस की रोटियां चाव से चट करने लगेगा.

शेरा ने सरला को अपना बना लिया था. भले ही रोटी का टुकड़ा कभी कम खाता या कभी न खाता मगर सरला को देख कर वह पूंछ हिलाना शुरू कर देता था. सरला की आवाज सुन कर वह अपनी गरदन उठा कर देखने भी लगता था. सरला को याद आया कि पंडितजी ने उसे बताया था कि यदि कुत्ता आप के सामने पूंछ हिलाए तो सम?ा जाना कि शनि देव आप पर प्रसन्न हैं और यह आप के लिए एक शुभ संकेत है. यदि वह गरदन उठा कर आप को निहारने लगे तो समझ जाना कि आप का रुका हुआ कार्य शीघ्र पूरा होने वाला है.

पंडितजी की बताई बात याद आते ही सरला का मन गदगद हो गया. वह शेरा के माध्यम से काल भैरव और शनि देव की विशेष कृपा पाने ही वाली थी कि फिर से एक बाधा उत्पन्न हो गई.

दरअसल, हुआ यों कि शेरा अचानक बीमार पड़ गया. अवस्थीजी की पूरी फैमिली परेशान. होती भी क्यों नहीं, शेरा को अपने परिवार का सदस्य जो मानते थे. बहुत नाजों से उसे पाल रहे थे. खानेपीने से ले कर खेलने व सोने तक की पूरी व्यवस्था उच्च स्तरीय. उस का ऐशोआराम देख कर सामान्य लोगों के मन में भी ‘अगले जनम मोहे कुत्ता ही कीजो’ की आकांक्षा पनपने लगी. घर के सारे सदस्य शेरा पर खूब प्यार लुटाते.

बीमार शेरा को शहर के बड़े डौग स्पैशलिस्ट के पास ले जाया गया. डाक्टर ने उसे कड़वी दवाइयों के साथ इंजैक्शन भी दिया. तबीयत सही होने तक शेरा के खानपान को ले कर सतर्कता बरतने की सलाह दी गई. इस वजह से सरला को रोटी न खिलाने की हिदायत मिल गई. सरला के ऊपर शनि देव की कृपा हुई या नहीं लेकिन समस्या और संघर्ष ने जरूर अपनी कृपादृष्टि डाल दी थी.

आज फिर से सरला स्वयं को वहीं खड़ी मान रही थी, अर्थात काले कुत्ते की सेवा करना अभी मुश्किल था. सरला ने एक फैसला लिया जिसे उस ने घर में फरमान की तरह सुना दिया कि उसे खुद का एक काला कुत्ता अपने ही घर में पालना है. मनसुख भाई ने बहुत सम?ाया लेकिन सरला तो अपनी जिद पर अड़ी थी.

थकहार कर उस की जिद के आगे मनसुख भाई को अपना शीश झुकाना पड़ा. डौगशौप से एक काले रंग का सैकंडहैंड कुत्ता खरीद कर आया. सैकंडहैंड इसलिए क्योंकि वह पहले एक घर में अपनी उपस्थिति और सेवा दे चुका था. दरअसल, उस कुत्ते के मालिक को विदेश जाना था इसलिए उसे यहां शौप में बेचना पड़ा.

सरला भी उसे यह समझ कर ले आई कि कम दाम में पलापलाया ट्रेंड कुत्ता मिल रहा है तो अच्छा है. इसे घर में रहने के तौरतरीके बताने नहीं पड़ेंगे. लेकिन इस काल भैरव की प्रतिछाया (काला कुत्ता) को भी घी चुपड़ी रोटी खिलाना सरला के लिए चुनौती ही बन गया.

पता चला कि यह कुत्ता तो बड़ा ही वीआईपी जीवन जीने का आदी है. इस के नाजनखरे और शौक के क्या ही कहने. घर के सामान्य शौचालय में जाना इसे गवारा नहीं था. उसे तो कमोड की आदत थी. मनसुख भाई ठहरे सामान्य आदमी. इन का जीवन भी वैसा ही था जैसा मध्यवर्गीय लोग गुजारते हैं. तत्काल राहत के लिए कुत्ते को सुबहशाम वाक के बहाने बाहर ले कर जाना पड़ा. कुत्ता महाराज फ्रैश तो हो जाते मगर किसी न किसी से सरला और मनसुख भाई का पंगा भी हो जाता. आखिर कोई अपने घर के बाहर कुत्ते की टट्टी को कैसे बरदाश्त कर सकता था. जिस दिन उसे बाहर न ले जाते उस दिन घर में ही गंदगी पसर जाती. सरला को नाक बंद कर के साफ करना पड़ता. मनसुख भाई की फटकार झेलनी पड़ती, सो अलग.

खाने में भी जनाब के नखरे कम नहीं थे. हमेशा मांस, अंडे और हड्डियों के लिए जीभ लपलपाते रहते. शाकाहारी खाने को मुंह भी न लगाते. सरला का परिवार शुद्ध शाकाहारी था. मजबूरी में कुछ महंगे डौग बिस्कुट ला कर खिलाए गए. लेकिन आखिर बिस्कुट के सहारे कितना पेट भरता. कुत्ते का पेट और स्वास्थ्य दोनों कुप्रभावित हो गए. कुत्ते के शौच पर और मनसुख भाई को अपने क्रोध पर कंट्रोल नहीं रहा. बेचारी सरला शनि देव का आशीर्वाद पाने के बदले उन की साढ़ेसाती और ढैया दोनों में पिस रही थी. इधर काल भैरव भी कुछ सहारा नहीं दे पा रहे थे.

काल भैरव का आशीर्वाद तो न मिला ऊपर से कुत्ते की सेवा में सरला की हालत खराब हो रही थी. मनसुख भाई का क्रोध उबाल मार रहा था सो अलग. आज वह दुकान के लिए भूखे ही निकल पड़े. घर में चाय तक न बन पाई थी. इधर सरला कुत्ते की पोटी साफ कर रही थी कि लापरवाही से उस की चेन खुली रह गई. बेचारा एक तो भूखा, ऊपर से बीमार, खीझ तो उस के अंदर भी रही होगी. तेज गति से निकल गया सड़क पर हड्डी व मांस की तलाश में. खाने की तलाश में 3-4 लोगों को काट लिया. वे लोग सरला के घर पहुंच गए शिकायत करने लगे कि उस के कुत्ते ने सड़क पर कितना आतंक मचाया है. शिकायत झगड़े में बदल गई.

बेचारी सरला अकेले उन के क्रोध का सामना कर रही थी. उसे एहसास हुआ कि जब शनि देव को प्रसन्न करने के लिए काल भैरव के इस प्रतिछाया (काला कुत्ता) के चक्कर में नहीं पड़ी थी तो सिर्फ पति मनसुख का ही क्रोध झेलना पड़ता था वह भी कभीकभी. लेकिन अब तो कुत्ते को ले कर महल्ले वालों की भी की भौंक और धौंक सुननी पड़ रही है.

कुत्ता किसी और की चमड़ी उधेड़ता, उस से पहले ही सरला ने नगरनिगम वाले को बुला कर उसे ले जाने की याचना कर डाली. अब सरला ने कान पकड़े और कहा कि हे शनि देव, आप अपनी कृपा मुझ पर यों ही बरसा देना. इस काल भैरव के प्रतिछाया को संभालना और खिलाना मेरे वश की बात नहीं.  Hindi Satire

Creation Of Universe : सृष्टि की शुरुआत – धर्म ने बहकाया साइंस ने बताया

Creation Of Universe : पृथ्वी का जन्म कैसे हुआ, धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इंसान को किस ने बनाया जैसे प्रश्न अकसर पूछे जाते हैं. ये प्रश्न मानव कुतूहल के स्वाभाविक प्रश्न नहीं हैं. मानव कुतूहल से उपजे प्रश्न मानव के अस्तित्व से जुड़े थे- परिस्थितियों के अनुकूल कैसे जीना है, प्राकृतिक आपदाओं से कैसे बचना है, जंगली जानवरों से अपनी और अपने झुंड की सुरक्षा कैसे करनी है, अपने मवेशियों के लिए बेहतर चरागाह कहां ढूंढ़ना है?

मानव की जिज्ञासाएं यहीं तक सीमित थीं. बारिश, तूफान, आग, बिजली और भूकंप जैसी आपदाओं के पीछे के कारणों को आदिकाल का मानव नहीं जानता था, न ही जानना चाहता था. इन प्राकृतिक आपदाओं के डर से ही आदिमानव ने इन्हें पूजना शुरू कर दिया होगा. यहां भी मानव के कुतूहल में केवल अपने सर्वाइवल से जुड़े प्रश्न थे.

अमेजन के जंगलों में रहने वाले ट्राइब्स हों या अफ्रीका के आदिवासी कबीले, आज भी उन की सहज जिज्ञासाएं उन के सर्वाइवल तक ही सीमित हैं. ये आदिवासी लोग मानव के लाखों वर्षों के विकासक्रम की जिंदा तसवीर हैं. दूरदराज के जंगलों में रहने वाले जो आदिवासी कबीले बाहरी धर्मों के संक्रमण से बच गए उन की संस्कृति में आज भी कोई धर्म या अल्लाह, भगवान या गौड नहीं है. पृथ्वी का जन्म कैसे हुआ, धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इंसान को किस ने बनाया जैसे प्रश्नों का आदिवासी संस्कृतियों में कोई मतलब नहीं था और न आज है. आज भी आदिवासी संस्कृति केवल सर्वाइवल से जुड़े प्रश्नों पर ही आधारित है.

दुनिया की अलगअलग जगहों पर 10 से 12 हजार वर्षों पहले खेती की शुरुआत हुई. इस से मानव समूहों का इधरउधर भटकना कम हुआ और गांव, नगर, कसबे बसने शुरू हो गए. यह सभ्यताओं का शुरुआती दौर था. कृषि और पशुपालन पर आधारित सभ्यताओं में हर व्यक्ति के पास काम था हालांकि कुछ निठल्ले लोग भी थे जिन्होंने मानव के सर्वाइवल से जुड़े प्रश्नों को मोड़ कर नए कुतूहल पैदा कर दिए. जैसे, मरने के बाद क्या होता है, दुनिया किस ने बनाई, इंसान को किस ने पैदा किया आदि व इस तरह के अन्य प्रश्नों से लोगों को बरगलाने का प्रयास शुरू किया गया.

कृषि पर आधारित सभ्यताओं के शुरू होने के नतीजे में आम लोगों का शिकार के लिए भटकना बंद हो गया था. फसल काटने के बाद से फसल उगाने के बीच लोगों के पास समय था. उस खाली समय में ही निठल्ले लोगों ने सृष्टि और सृष्टि रचयिता से जुड़े प्रश्नों को समाज के अवचेतन में बिठाना शुरू किया. लोगों के बीच प्रश्न उठाए जाते कि बताओ, तुम्हें अन्न कौन दे रहा है, तुम क्यों पैदा हुए, जन्म लेने से पहले तुम कहां थे और मरने के बाद तुम्हारा क्या होगा आदि.

इन प्रश्नों के जाल में साधारण मेहनतकश लोग फंसते चले गए. तब इन प्रश्नों के मनमरजी के जवाब गढ़े गए और भ्रामक कहानियां बनाई जाने लगीं. उन ?ाठी कहानियों को गढ़ने वाले निठल्ले लोग ही शुरुआती समाज में पुरोहित बन गए. उन पुरोहितों ने ही विभिन्न धर्मों के आविष्कार कर दिए.

भ्रम पैदा करती धार्मिक कथाएं

हर धर्म में भ्रम पैदा करने वाली कथाएं मौजूद हैं. धर्मों की ये कहानियां चमत्कारिक देवताओं, अवतारों, दूतों और सृष्टिकर्ता के प्रतीकों की होती हैं जिन से लोगों को बहकाया जाता है. इन धार्मिक कहानियों के नाम पर आस्था का व्यापार खड़ा करना आसान हो गया है. आस्था के नाम पर काल्पनिक प्रतीकों की पूजा, आराधना, दान और इबादत करवाई गई और लोग अपनी आस्थाओं की खातिर मरनेमारने को तैयार हो गए. आस्था में अंधी जनता यह न पूछ ले कि जिन प्रतीकों के नाम पर उन से दान देने और मरनेमारने को कहा जा रहा है, आखिर इन काल्पनिक प्रतीकों का सच क्या है, ये हैं कौन, इस षड्यंत्र को छिपाने के लिए सृष्टि की उत्पत्ति का प्रश्न और उस का उत्तर बहुत उपयोगी हो जाते हैं.

मानव यह तो देखता है कि उस के चारों ओर तरहतरह के निर्माण हैं, नदियां हैं, सागर हैं, पहाड़ हैं, मरुस्थल हैं, पेड़पौधे, पशुपक्षी हैं, बादल है, चांद, सितारे, सूर्य हैं लेकिन इन की उत्पत्ति कैसे हुई या इन्हें किस ने बनाया जैसे प्रश्नों से आम जनता का कोई लेनादेना नहीं होता. मेहनतकश को इन प्रश्नों से कोई लेनादेना कभी नहीं रहा. सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़े ये प्रश्न षड्यंत्रकारी पुरोहितों की देन हैं और आज भी यह षड्यंत्र जारी है.

स्वामी नित्यानंद सरस्वती का यूट्यूब पर एक वीडियो है जिस में स्वामीजी से 5वीं कक्षा का छात्र पूछता है कि पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा की उत्पति कैसे हुई. स्वामी नित्यानंद इस वीडियो में उत्पत्ति की पौराणिक कल्पित कहानी न कह कर पृथ्वी के काल्पनिक गुणों का बखान करने लगते हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि 5वीं कक्षा के छात्र को जो सवाल स्कूल में पूछना चाहिए वह एक बाबा से पूछ रहा है. लेकिन, उसे भी पौराणिक कथा न सुना कर मनगढ़ंत बातों से बहकाया जा रहा है.

आप ने ऐसे तमाम वीडियो यूट्यूब पर देखे होंगे जिन में जनता की भीड़ से कोई व्यक्ति उठ कर ऐसे ही प्रश्न पूछता है और धर्मगुरु उस प्रश्न का जवाब देता है. मुसलमानों के बीच तारिक जमील बहुत फेमस है. एक वीडियो में उस से एक नौजवान ने पूछा कि कायनात कैसे बनी तो वे इसलामिक कहानियों के जरिए कायनात के जन्म की कहानी सुनाते हैं.

सवाल यह है कि उत्पत्ति के रहस्यों का उत्तर धर्मगुरुओं से क्यों पूछा जाता है. बेरोजगारी, गरीबी, शोषण, हिंसा और दंगों से जुड़े प्रश्न क्यों नहीं पूछे जाते? इन धर्मगुरुओं का परमात्मा जो सृष्टि की रचना कर सकता है वह दुनिया से गरीबी और अन्याय क्यों नहीं मिटा सकता?

सृष्टि रचना से जुड़े सवाल तो उन से पूछने चाहिए जो प्रकृति के अनुसंधानों में लगे हैं. जो पत्थरों, पानी, मौसम, चांद, सितारों, सूर्य की गति का अध्ययन करने में अपना जीवन खपाते हैं.

हिंदू प्रवचनों में, ईसाई चर्चों में, मसजिदों में, बौद्ध मठों में ऐसे ही सवाल अकसर पूछे जाते हैं और तमाम धर्मगुरु इन प्रश्नों के उत्तर के लिए अपनी उन्हीं पौराणिक कहानियों को आधार बनाते हैं जिन के पीछे छिपा होता है उन का अपना प्रवर्तक. अपनेअपने काल्पनिक प्रवर्तकों की आड़ में ही ये पुरोहित अपनेअपने भक्तों पर राज करते हैं. दरअसल, यह कोरा षड्यंत्र है. लोगों से ये सवाल पुछवाए जाते हैं और फिर अपने धर्म व प्रवर्तक पर फिट कर के एक कहानी सुनाई जाती है.

आज मौजूद सभी धर्म उस युग के हैं जब विज्ञान एकदम शैशव स्थिति में था. मानव ने मकान बनाने सीख लिए थे. मानव पत्थरों को काट सकता था. आग जला सकता था. पहिया बना सकता था. कपड़ा बुन सकता था. जानवरों को पालतू बना सकता था. बस्तियों का निर्माण कर सकता था. बोलने की कला विकसित हो चुकी थी. शब्द ज्ञान आ चुका था. सभी आधुनिक धर्म तब पनपे जब बहुत से आविष्कार हो चुके थे.

पर ऐसा कोई धर्म नहीं है जिस को शुरू करने वाला जंगलों में पेड़ के नीचे बिना कपड़ों के रहता था, अपना खाना खुद बनाता था. आज दुनिया के सभी धर्म जो सृष्टि निर्माण की कहानियां बनाते फिरते हैं वे उस युग के हैं जब मानव सभ्यता खासी विकसित हो चुकी थी. आज के सभी धर्म 21वीं सदी की वैज्ञानिक तकनीकों के सहारे चल रहे हैं लेकिन इन धर्मों का आधार सभ्यताओं से भी प्राचीन मनगढ़ंत कहानियों पर ही टिका है.

आज जो भक्त धर्मों के बिजनैस सैंटरों में जा रहे हैं उन्हें आज भी प्रेरित किया जा रहा है कि वे जरूरी बातों को भूल कर उन प्रश्नों को पूछें जिन के माध्यम से पुरोहितों के षड्यंत्र को पोषण मिलता हो. यह आकाश, पृथ्वी, आकाशगंगा, लाखों तरह के जीवजंतु, वायरलैस की क्षमता वाली तरंगें आखिर बनाईं किस ने? तुम्हें अन्न कौन दे रहा है? तुम क्यों पैदा हुए? जन्म लेने से पहले तुम कहां थे और मरने के बाद तुम्हारा क्या होगा? ये व इस जैसे प्रश्न एक साजिश के तहत पुछवाए जाते हैं.

अनसुलझे सवालों का नाम धर्म

आज के पुरोहितों द्वारा प्रायोजित इन कृत्रिम सवालों के जवाब 2,000 से 4,000 साल पहले के ग्रंथों के हवाले से दिए जाते हैं. हर कहानी का ग्रंथ एक भगवान से जुड़ा है, उस भगवान से जो हर दूसरे धर्म के भगवान से अलग है. हर धर्म में सृष्टि उत्पत्ति की कथा कुछ अलग है क्योंकि हर धर्म को सृष्टि उत्पत्ति के रहस्यों को अपने प्रतीकों से जोड़ना जो है.

राघवाचार्यजी महाराज का मार्च 2022 का एक वीडियो है जिस में वे बताते हैं कि सृष्टि का निर्माण ब्रह्मा ने किया. ब्रह्मा ने अपने शरीर के 2 भागों से स्त्री और पुरुष का निर्माण किया. 3 लाख लोगों ने इस वीडियो को देखा. राघवाचार्यजी उत्पत्ति की कहानी के माध्यम से ब्रह्मा को संपूर्ण पृथ्वी, संपूर्ण मानव जाति का निर्माता बता देते हैं और इस तरह बिना कहे ही वे खुद को 21वीं सदी में सृष्टिकर्ता का एजेंट घोषित कर देते हैं.

मुल्लामौलवी अपने भक्तों को यह इसलामिक कहानी सुनाते हैं कि अल्लाह ने सब से पहले आदम को मिट्टी से बनाया और आदम की दाईं पसली से हौवा को बनाया. इस कहानी के जरिए ये लोग खुद को आदम की संतान घोषित करते हैं और साथ ही, भक्तों के अवचेतन में यह बिठा देते हैं कि अल्लाह की नजर में मर्द जात ही श्रेष्ठ है. औरतें तो मर्दों की पसलियों से जन्मीं हैं, उन में अपना दिमाग नहीं होता, उन का अपना कोई वजूद नहीं होता.

राघवाचार्य यह भी कह डालते हैं कि ब्रह्माजी ने पुरुष को अपनी बुद्धि से पैदा किया और स्त्री को उस के हृदय से. यानी दोनों में भेद है. एक में बुद्धि है, दूसरे में है ही नहीं. औरतों को नीचा दिखाने और नीचा बनाए रखने की साजिश इस सृष्टि बनाने की कहानियों में पहले ही फिट कर दी गई है.

इस तरह की कहानियां विष्णु पुराण, शिव पुराण, नारद पुराण और वेदों में दोहराई गई हैं पर जब भी ये पुराण रचे गए थे तब तक तो मानव सभ्यता काफी विकसित हो चुकी होगी. किसी किताब में यह वर्णन नहीं है कि स्त्री और पुरुष को भाषा किस ने सिखाई, भाषा कहां से आई, तब स्त्रीपुरुष कपड़े पहनते थे या नहीं, उन्हें कपड़े पहनना या कपड़े बनाना किस ने सिखाया, वे शिशु अवस्था में पैदा हुए या वयस्क अवस्था में आदि.

सब से रोचक बात यह है कि सभी धर्मों में सृष्टि की उत्पत्ति की कहानी एक सी है लेकिन हरेक का प्रवर्तक अलग है जो दूसरे धर्मों वालों को भटका हुआ मानता है और दूसरे धर्म के मानने वाले का सिर फोड़ने का आदेश देता है.

धर्म इस दुनिया का सब से पुराना बिजनैस है जिस में धरती पर जीवन की शुरुआत की कथा सब से महत्त्वपूर्ण प्रोडक्ट है. धर्म की मार्केटिंग करने वाले लोगों ने मानव की सहजता और उस की कमजोरियों का फायदा उठा कर ही धर्म के इस सब से पुराने धंधे को आज तक बरकरार रखा है. एजेंट इसे बेचने का सब से पुराना हथकंडा अपनाते हैं; वे खुद ही यह सवाल गढ़ते हैं कि बताओ, दुनिया किस ने बनाई. आम आदमी इस प्रश्न में फंस जाता है तब धर्म के प्रवर्तक अपनी प्राचीन संस्कृति के पुनरुत्थान के नाम पर और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार इस प्रश्न का जवाब देते हैं.

सृष्टि रचना का श्रेय वे अपने द्वारा गढ़े गए किसी काल्पनिक शक्ति को देते हैं और उस शक्ति के उपासक बन कर धर्म का धंधा करते हैं. धर्म प्रवर्तकों द्वारा आम जनता को इस तरह भरमाया जाता है कि उस का ईश्वर, जो इस सृष्टि की रचना कर सकता है, तुम्हारा कल्याण भी कर सकता है.

बुनियादी सवालों से भटकाने का जरिया धर्म

धर्मों के आविष्कारक बड़े चालाक किस्म के प्राणी थे. उन्होंने लोगों की बुनियादी जरूरतों, जैसे भूख, सुरक्षा और संसाधन जुटाने में कोई योगदान नहीं दिया. रोजमर्रा की जिंदगी में संघर्षशील इंसान की सहूलियत के लिए भी कुछ नहीं किया न पुल बनाए, न हल चलाए, न दवाएं ढूंढ़ीं और न रास्ते खोजे. बस, कहानियां बनाईं और इन कपोलकल्पित कहानियों से जनता को भरमाया.

आश्चर्य है कि आज 98 फीसदी आबादी विज्ञान की खोजों के बावजूद युगों पुरानी इन धार्मिक कहानियों को सच मानती है, जबकि, इस्तेमाल वह विज्ञान की खोजों से पैदा सामान को करती है चाहे वह आग जलाना हो या रौकेट उड़ाना.

जब से इंसान सोचनेसमझने लायक विकसित हुआ है तभी से उस के मन में सिर्फ सर्वाइवल से जुड़े प्रश्न उठते रहे कि प्राकृतिक आपदाओं और खूंखार जंगली जानवरों से कैसे बचा जाए, उपजाऊ और सुरक्षित स्थानों को कैसे ढूंढ़ा जाए. लेकिन शातिर लोगों ने इंसान के इन जरूरी व स्वाभाविक प्रश्नों को मोड़ दिया और उन से यह पूछना शुरू कर दिया कि आखिर जीवों को किस ने पैदा किया. जिंदगी के बारे में इस बुनियादी सवाल पर आज के लगभग सभी धर्मों की नींव रखी हुई है. इन धर्मों ने सदियों तक इंसानी जिज्ञासाओं को किसी काल्पनिक ईश्वर तक समेटे रखने की चालाकियां की हैं.

दरअसल, किसी भी धर्म के पास इन प्रश्नों का कोई तथ्यजनक उत्तर नहीं था, इसलिए धर्म के धंधेबाजों ने ऐसी कहानियां गढ़ लीं जो सुनने में अच्छी लगती हैं. जब ये काल्पनिक कहानियां लोगों के अवचेतन में बैठने लगीं तब बड़ी चालाकी से ऐसी हर धार्मिक कहानी के कहानीकार ने स्वयं को ईश्वर के एजेंट के रूप में स्थापित कर लिया. पीढ़ी दर पीढ़ी कहानीकारों के वारिस इस धंधे का लाभ उठाते आ रहे हैं.

सृष्टि रचना के बारे में हिंदू धर्म क्या कहता है

हिंदू धर्मशास्त्रों में सृष्टि उत्पत्ति से जुड़ी अनेक बेसिरपैर की कहानियां मौजूद हैं, कहीं ब्रह्माजी को सृष्टि का रचयिता बताया गया है तो कहीं विष्णुजी को और कहीं देवी दुर्गा को संपूर्ण सृष्टि की निर्माणकर्ता घोषित किया गया. इन शक्तियों या देवताओं की पूजा करने के नियम बनाए गए और इन कर्मकांडों को धर्म का हिस्सा बना दिया गया. इन कर्मकांडों को करने से देवताओं का आशीर्वाद और न करने से अनिष्ट का डर दिखा कर लोगों को भक्त बनाया गया और इन भक्तों के कारण ही आज भी युगों पुराने धर्म जिंदा हैं. कर्मकांड करने पर आर्थिक लाभ एजेंट को ही होता था.

हिंदू धर्म के अनुसार, सृष्टि की रचना से पहले पूरा संसार जल में डूबा हुआ था. जब सृष्टि की रचना का समय आया तो भगवान नारायण की नाभि से एक प्रकाशमान कमल प्रकट हुआ. उसी कमल से वेद मूर्ति ब्रह्माजी प्रकट हुए. ब्रह्माजी के 4 मुंह हैं और उन के 4 हाथ हैं. ब्रह्माजी ने सब से पहले 4 पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार की उत्पत्ति की. इस के बाद उन्होंने अपने शरीर के अंशों से ही मनु और शतरूपा की रचना की, जिन से फिर मनुष्य की उत्पत्ति हुई. हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु और शिव का भी सृष्टि की प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण योगदान माना जाता है.

वेदों के अनुसार, ब्रह्मांड का व्यास 50,00,00,000 योजन बताया गया है. यह योजन कितने किलोमीटर के बराबर है, इस की नाप भी आज के एजेंटों ने बताई है.

श्रीमद देवी महापुराण में सृष्टि रचना

देवी भागवत पुराण के अनुसार, नारदजी ने अपने पिता ब्रह्मा से पूछा था, ‘हे पिताश्री, इस ब्रह्मांड की रचना आप ने की या श्री विष्णुजी इस के रचयिता हैं या शिवजी ने इसे रचा है? सचसच बताने की कृपा करें.’

ब्रह्माजी ने बताया, ‘बेटा नारद, मैं ने अपनेआप को कमल के फूल पर बैठा पाया था, मु?ो नहीं मालूम कि अचानक उस अगाध जल में मैं कहां से उत्पन्न हो गया था. स्वयं की उत्पत्ति के बाद मैं एक हजार वर्ष तक पृथ्वी का अन्वेषण करता रहा. सृष्टि में चहुंओर जल ही जल था. फिर आकाशवाणी हुई कि तप करो. मैं ने एक हजार वर्ष तक तप किया और फिर सृष्टि करने की आकाशवाणी हुई.

‘मैं ने सृष्टि रचना आरंभ की ही थी कि मधु और कैटभ नाम के 2 राक्षस आए. उन के भय से मैं कमल का डंठल पकड़ कर नीचे उतरा. वहां भगवान विष्णुजी शेष शैय्या पर अचेत पड़े थे. उन में से एक स्त्री (प्रेतवत प्रविष्ट दुर्गा) निकली. वह आकाश में आभूषण पहने दिखाई देने लगी, तब भगवान विष्णु होश में आए.

‘अब सृष्टि में मैं और विष्णु 2 थे. इतने में भगवान शंकर भी आ गए. देवी ने हमें विमान में बैठाया और ब्रह्मलोक में ले गई. विष्णु ने कहा, यह हम तीनों की माता है, यही जगत जननी प्रकृति देवी है. मैं ने इस देवी को तब देखा था जब मैं छोटा सा बालक था, यह मुझे पालने में झुला रही थी.’

-श्रीमद देवी महापुराण, तीसरा स्कन्द, अध्याय 1.3 (गीता प्रैस, गोरखपुर से प्रकाशित, अनुवादकर्ता हनुमान प्रसाद पोद्दार तथा चिमनलाल गोस्वामी. पृष्ठ संख्या 114 से 128 देवी महापुराण की उपरोक्त कथा को पढ़ कर प्रश्न उठता है कि किसे सृष्टि रचयिता माना जाए? ब्रह्मा ने जब आंखें खोलीं तो खुद को किसी फूल पर बैठा पाया. ब्रह्मा को पता ही नहीं चला कि उस अथाह जल में वे अचानक कहां से उत्पन्न हो गए. स्वयं की उत्पत्ति के बाद ब्रह्मा एक हजार वर्ष तक पृथ्वी का अन्वेषण करते रहे. इस का मतलब यह कि सृष्टि रचना से पहले अथाह जल और पृथ्वी का अस्तित्व था.

फिर आकाशवाणी हुई कि तप करो और उन्होंने एक हजार वर्ष तक तप किया. इस तप के पूरा होने के बाद सृष्टि करने की आकाशवाणी हुई. इस का अर्थ यह हुआ कि ब्रह्मा जिस पृथ्वी पर अथाह जल में एक फूल पर प्रकट हुए थे, वे सब तो पहले से बनी सृष्टि का ही हिस्सा थे. ब्रह्मा ने जैसे ही, अपने शब्दों में, नई सृष्टि रचना आरंभ की तो मधु और कैटभ नाम के 2 राक्षस आ गए. यहां प्रश्न खड़ा होता है कि ये दोनों राक्षस सृष्टि रचना से पहले कहां से पैदा हो गए. इन दोनों राक्षसों के भय से ब्रह्मा कमल का डंठल पकड़ कर भाग खड़े हुए. ब्रह्मा रसातल में नीचे उतरे. रसातल पृथ्वी बनने से पहले कैसे बन गया? वहां उन्हें विष्णु शेष शैय्या पर अचेत पड़े मिले.

क्या ये सब मजेदार, रोचक, रोमांचक, कपोलकल्पित कहानियां नहीं हैं? नारद ने एक कहानी सुनाई और हम इसे सच मान लें, क्या यह बेवकूफी नहीं है? यदि इन बातों को सच मान भी लें तो बताइए कि आज ये सब प्राणी कहां हैं? वह कमल, वह शेषनाग, वह ब्रह्मा, विष्णु, महेश सब आज कहां गए? शास्त्रों में इन सभी के गायब होने की बात कहीं नहीं लिखी. हिंदू धर्म के धर्मप्रवर्तकों को तो ये सब नजर आने चाहिए न.

हिंदू धर्म की सृष्टि रचना की कहानियों में विरोधाभास तो है ही, साथ ही, ये कहानियां अवैज्ञानिक भी हैं. इन कहानियों को सिर्फ कहानी मान कर चलें तो ये बालमन के मनोरंजन का साधन तो हो सकती हैं लेकिन वैज्ञानिक सत्य नहीं हो सकतीं. इन धार्मिक कहानियों का विज्ञान से दूरदूर तक कोई नाता नहीं है. सवाल यह है कि आज भी बहुत से लोग इन भ्रामक कहानियों को सत्य क्यों मानते हैं?

दरअसल, पीढ़ी दर पीढ़ी ये कहानियां समाज के सब से शक्तिशाली वर्ग, पुरोहित, द्वारा दोहराई जाती हैं और जो भी इन का विरोध करता है उसे नास्तिक, मलेच्छ, दानव, दैत्य व चांडाल कह कर समाज से निकाल दिया जाता है और अकसर मार भी डाला जाता है.

ऋग्वेद के मंडल 10, सूक्त 90, मंत्र 1 में उस विराट ब्रह्म का वर्णन है जिस ने यह सृष्टि बनाई. गीता, अध्याय 10-11, मंत्र नं. 46, में भी सृष्टिकर्ता ब्रह्म का ऐसा ही वर्णन है. अर्जुन ने कहा है, ‘हे सहस्रबाहु अर्थात हजार भुजा वाले, आप अपने चतुर्भुज रूप में दर्शन दीजिए जिस के हजारों हाथपैर, हजारों आंखें कान आदि हैं, वह विराट रूप जो प्रभु अपने अधीन सर्वप्राणियों को पूर्ण काबू कर के 20 ब्रह्मांडों को गोलाकार परिधि में रोक कर स्वयं इन से ऊपर 21वें ब्रह्मांड में बैठा है. हर धर्म में ईश्वर को ले कर इस तरह की कल्पनाएं भरी पड़ी हैं और सभी धर्म अपने ईश्वर की पूजा या इबादत का विधान करते हैं और स्वयं अपने तथाकथित ईश्वर का एजेंट बन कर लोगों की अज्ञानता का फायदा उठाते हैं.

सृष्टि रचना के बारे में ईसाई धर्म क्या कहता है

सृष्टि रचना से जुड़ी बाइबिल की अवैज्ञानिक बातें- बाइबिल के मुताबिक ईश्वर ने एक ही सप्ताह में सृष्टि की रचना कर दी थी जिस में उस ने पेड़पौधे, जीवजंतु, पहाड़नदियां और मनुष्य को अलगअलग 6 दिनों में बनाया था. परमेश्वर ने पहले दिन सूरज और पानी बनाए (जब सूरज और पानी बने ही नहीं थे तब ये कहां से आए, यह न पूछो, बस, मानते चले जाओ). दूसरे दिन उस ने आसमान बनाया. तीसरे दिन पानी को एक जगह इकट्ठा कर ईश्वर ने धरती और समुद्र बनाए और धरती पर पेड़पौधे लगाए. चौथे दिन परमेश्वर ने तारों का निर्माण किया. 5वें दिन परमेश्वर ने समुद्र में रहने वाले जीवजंतुओं के साथ उड़ने वाले पक्षियों को बनाया और 6ठे दिन परमेश्वर ने धरती और जानवरों पर अधिकार के लिए अपनी छवि में इंसान की रचना की और उसे गिनती में बढ़ने का आशीर्वाद दिया.

6 दिनों में सृष्टि रचना कंप्लीट हो जाने के बाद परमेश्वर ने 7वें दिन आराम किया. बाइबिल के उत्पत्ति ग्रंथ में (विशेष रूप से पृष्ठ संख्या 2, अ. 1:20 – 2:5) परमेश्वर द्वारा 6 दिनों में दुनिया की रचना की बात दर्ज है.

बाइबिल के अनुसार, बारिश का पानी आकाश के छोटेछोटे छिद्रों से धरती पर आता है. इस के अलावा बाइबिल में सूर्य के स्थिर रहने (यहोशू 10:13), समुद्र के 2 भागों में विभाजित होने (निर्गमन 14:21-22) जैसी अवैज्ञानिक बातें भी भरी पड़ी हैं.

यहां प्रश्न यह है कि परमेश्वर को सृष्टि रचने में 6 दिनों का समय क्यों लगा? परमेश्वर ने पहले दिन सूरज और पानी के निर्माण किए जोकि बिलकुल अवैज्ञानिक बात है. आज के विज्ञान के अनुसार, हमारा सूर्य बिगबैंग के 8 अरब वर्षों बाद किसी अज्ञात नेबुला में गुरुत्त्वाकर्षण के कारण हाइड्रोजन के बादलों के सघन होने की प्रक्रिया के नतीजे में अस्तित्व में आया. बाइबिल कहती है कि पहले ही दिन परमेश्वर ने सूर्य का निर्माण किया जोकि विज्ञान के अनुसार तथ्यहीन बात साबित होती है.

ईसाई धर्म के एजेंट आम ईसाइयों को बरगलाते हैं. वे जीसस को ईश्वर का पुत्र कहते हैं और खुद परमेश्वर के पुत्र के सेवक बन कर लोगों के चंदों से वेटिकन जैसे आलीशान चर्च बनवा लेते हैं. दुनियाभर के चर्च आसपास के मकानों से कहीं ज्यादा सुंदर और भव्य बने होते हैं. इन भव्य इमारतों में बैठे परमेश्वर के एजेंट बिना मेहनत के आलीशान जिंदगी जीते हैं और भक्तों पर राज करते हैं.

सृष्टि रचना के बारे में इसलाम धर्म क्या कहता है कुरान के अनुसार, अल्लाह जब किसी चीज की इच्छा जाहिर करता है तो उसे केवल यह कहना होता है कि ‘हो जा’ और वह हो जाता है.

‘‘अल्लाह आकाशों और धरती जैसी अनोखी चीज को पैदा करने वाला है, इसलिए जब वह किसी काम का निर्णय करता है तो उस के लिए बस कह देता है कि ‘हो जा’ और वह हो जाती है.’’ (सूरह अल-बकरा, आयत 117, कुरान).

यहां सवाल यह उठता है कि जब अल्लाह को सृष्टि का निर्माण करना था तब उसे 6 दिनों का समय क्यों लग गया?

कुरान के सूरह हूद, आयत-7 में लिखा है- ‘‘वही है जिस ने आकाशों और धरती को 6 दिनों में पैदा किया ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले कि तुम में से कर्म में कौन सब से अच्छा है. इस से पहले उस का सिंहासन पानी पर था.’’

इन विरोधाभासी दोनों आयतों से पता चलता है कि ‘हो जा’ कहने भर से काम नहीं चलता. निर्माण के लिए सालों की मेहनत करनी पड़ती है और उपरोक्त आयत से अल्लाह के सृष्टि निर्माण का उद्देश्य भी स्पष्ट होता है कि उस ने कायनात को इसलिए रचा ताकि वह लोगों की परीक्षा ले सके.

इस से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि अल्लाह सर्वज्ञानी नहीं है, तभी तो वह परीक्षा के माध्यम से लोगों के अच्छेबुरे कर्म जानना चाहता है. कायनात को बनाने से पहले पानी कहां से आ गया? क्या पानी कायनात का हिस्सा नहीं? सृष्टि रचना से जुड़ी इस तरह की कपोलकल्पनाओं से अज्ञानी लोगों को भरमाया जा सकता है लेकिन विज्ञान की समझ रखने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि ये बातें इतिहास के नासमझ लोगों की कोरी कल्पनाएं मात्र हैं.

विज्ञान के अनुसार सृष्टि का जन्म कैसे हुआ

हमारी धरती जीवन की विविधताओं से भरी हुई है. हरेभरे मैदानों से ले कर सूखे रेगिस्तानों तक और ऊंचे पहाड़ों से ले कर समुद्र की गहराइयों तक हमें धरती का हर हिस्सा जीवन से परिपूर्ण नजर आता है और हम इंसान धरती पर जीवन की इसी विविधता का हिस्सा हैं.

आदिकाल का मनुष्य सृष्टि के रहस्यों को नहीं जानता था, इसलिए वह प्रकृति में घटने वाली घटनाओं से बहुत डरता था. इंसान के इसी स्वाभाविक डर ने कई प्रकार के अंधविश्वासों को पैदा कर दिया जो बाद में अलगअलग धर्मों के रूपों में स्थापित हो गए.

धरती कैसे बनी? जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई? इंसान कैसे बना? धरती कैसे काम करती है? रात और दिन कैसे होते हैं? पिछले 200 वर्षों के वैज्ञानिक शोधों द्वारा इन प्रश्नों का जवाब ढूंढ़ निकाला जा चुका है. आइए, इन प्रश्नों का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं.

बिगबैंग से हुई सृष्टि की शुरुआत

लगभग 13 अरब 70 करोड़ वर्षों पहले हमारे इस विराट अनंत और हैरतअंगेज यूनिवर्स का जन्म हुआ. ब्रह्मांड के जन्म की इसी थ्योरी को हम बिगबैंग थ्योरी कहते हैं. बिगबैंग से पहले क्या था, इस पर वैज्ञानिक अलगअलग थ्योरी देते हैं. स्टीफन हौकिंग के अनुसार, ‘हमारा ब्रह्मांड 3 तत्त्वों से बना है. ये 3 तत्त्व हैं टाइम, स्पेस और मैटर. तीनों का अस्तित्व बिगबैंग से ही प्रारंभ होता है. बिगबैंग से पूर्व समय का ही अस्तित्व नहीं था, तब यह मानने का कोई औचित्य ही नहीं है कि बिगबैंग से पहले भी कुछ था.’

हमारा यूनिवर्स अपनी शुरुआत से ही फैलता चला गया. बिगबैंग की शुरुआती अवस्था में जो ऊर्जा पैदा हुई उस से मैटर और एंटीमैटर पैदा हुए. उन दोनों के घर्षण से शुरुआती 12 प्रकार के एलिमैंट बने जिन में से एक हाइड्रोजन था.

हाइड्रोजन के अणुओं से ही हीलियम बना. हाइड्रोजन और हीलियम से बने अरबोंखरबों सितारे और असंख्य आकाशगंगाएं. 6 अरब वर्ष पहले 2 विशालकाय सितारे आपस में टकराए जिसे सुपरनोवा विस्फोट कहा जाता है. इन्हीं सितारों के नेबुला से तकरीबन साढ़े 5 अरब साल पहले सूरज का जन्म हुआ.

हमारे यूनिवर्स की शुरुआत के 8 अरब वर्षों के बाद हमारी आगशगंगा, मिल्कीवे, के किसी कोने में हाइड्रोजन के बादल सघन हो रहे थे. ग्रेविटी के कारण हाइड्रोजन के विशाल बादलों ने हमारे सूर्य का रूप लेना शुरू किया.

करीब 5 अरब वर्षों पहले शुरू हुई यह प्रक्रिया 50 करोड़ वर्षों तक चलती रही. सूर्य बनने की प्रक्रिया के बाद बची धूल और गैस ने सैकड़ों पिंडों का रूप धारण किया. ये सभी पिंड गुरुत्व के कारण केंद्र में स्थित बड़े पिंड का चक्कर लगाने लगे. इस तरह बना हमारा सौरमंडल.

शुरुआती सौरमंडल में सैकड़ों ग्रह थे, हजारों पिंड थे, लाखों उल्का पिंड थे और करोड़ोंअरबों की तादाद में विशाल पत्थर थे जो अंतरिक्ष में सूर्य का चक्कर लगा रहे थे. साढ़े 4 अरब वर्षों पहले के उस सौरमंडल में कुछ बृहस्पति से भी बड़े ग्रह थे और कुछ प्लूटो से भी छोटे.

समय के अंतराल में इन में से अधिकांश ग्रह आपस में टकरा गए जिस से ग्रहों की संख्या कम हो गई. इन ग्रहों की टक्कर से बिखरे मलबों से इन ग्रहों के चंद्रमा बने.

4 अरब वर्ष पहले सौरमंडल के ग्रहों के बीच एक विशाल पिंड से दूसरे बड़े पिंड की भयंकर टक्कर हो गई. इस टकराव से उस पिंड का 25 प्रतिशत भाग मलबे में तबदील हो गया और शेष बचे भाग ने धीरेधीरे एक ग्रह का रूप धारण किया. इस तरह हमारी पृथ्वी का जन्म हुआ और इस टक्कर से पैदा हुए मलबों के ढेर ने धीरेधीरे एक और छोटे पिंड का रूप धारण किया जो चंद्रमा कहलाया.

शुरुआती पृथ्वी आज की पृथ्वी से एकदम अलग थी. साढ़े 4 अरब वर्ष पहले की धरती पर ठोस धरातल नहीं था. धरती की सतह पर धरती के गर्भ से निकलने वाले मैग्मा और लावा की भरमार थी. तापमान 400 से 1,600 डिग्री सैल्सियस था. न कोई पहाड़, न नदी, न समुद्र. चारों ओर आकाश से बरसते आग के गोले और धरातल पर बहती आग की नदियां ही थीं.

ऐसी थी हमारी शुरुआती पृथ्वी. करीब 3.8 अरब वर्ष पहले तक पृथ्वी का तापमान कुछ कम हुआ. धरती पर 20 करोड़ वर्षों तक धधकते लावा और मैग्मा के बादल बरसते रहे. इस तेजाबी बारिश ने विशाल रासायनिक समुद्र का निर्माण कर दिया. 3.7 अरब साल पहले विशाल समुद्र से पृथ्वी का 80 प्रतिशत भाग पानी में डूब चुका था. शेष 20 प्रतिशत जो भाग बचा था उसे पेनिजिया लैंड कहा जाता है. यह पेनिजिया महाद्वीप भी टूटने लगा. इस के कई भाग एकदूसरे से अलग हो कर दूर खिसकने लगे. धरती के गोल होने के कारण एकदूसरे से अलग हुए ये भूखंड फिर से एकदूसरे से टकराने लगे. विशाल भूखंडों के इस महाटक्कर से विशाल पर्वतों के निर्माण हुए.

पर्वतों के निर्माण ने फिर से धरती को बदला. समुद्र का पानी सूर्य की प्रचंड गरमी से वाष्पित हो कर इन पहाड़ों पर बरसता और इस तरह करोड़ों वर्षों में बड़ेबड़े ग्लेशियरों के निर्माण होने लगे.

30 करोड़ वर्षों में पृथ्वी का वातावरण बनने लगा. मौसमचक्र बनने लगे. हालांकि ये परिवर्तन जीवन के अनुकूल नहीं थे, फिर भी समुद्र की गहराइयों में जीवन की इकाइयों के संकेत दिखाई देने लगे.

पृथ्वी पर होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं ने शुरुआती एक कोशिका वाले जीवों का निर्माण किया. जीवन के इन शुरुआती तत्त्वों ने पृथ्वी पर स्थित कार्बन डाइऔक्साइड को सोख कर औक्सीजन का निर्माण करना शुरू कर दिया.

इन माइक्रो और्गेनिज्म से कई प्रकार के सूक्ष्म बैक्टीरिया विकसित होने लगे. उस के बाद के करोड़ों वर्षों में इन एक कोशिका वाले सूक्ष्म जीवों से बहुकोशिकीय जीव विकसित हुए.

करीब 3 अरब वर्ष पहले की पृथ्वी काफी बदल चुकी थी. अब पृथ्वी पर पर्याप्त रूप में औक्सीजन था, पानी था, नदियां थीं. समुद्र के गर्भ में अनेक छोटे जीव पल रहे थे व विकसित हो रहे थे. इसी दौर में जीवों की अनेक नई प्रजातियां पैदा हुईं.

जीवन का यह खेल केवल समुद्र में ही हो रहा था. महाद्वीप सुनसान थे. वहां अभी जीवन के नाम पर काई जैसा तत्त्व ही उपलब्ध था जो विकसित हो रहा था. धीरेधीरे द्वीपों की बंजर जमीन भी हरियाली में बदलने लगी. वहां भी शुरुआती घास पैदा होने लगी. जीवन की जो प्रतिस्पर्धा समुद्र में चल रही थी वह द्वीपों पर भी होने लगी. लेकिन पृथ्वी की सतह पर यह होड़ विभिन्न प्रकार की घास की प्रजातियों में थी जो अलगअलग पेड़पौधों का रूप ले रही थी. वहीं समुद्र की गहराइयों में बहुकोशिकीय जीव विभिन्न प्रकार के कीड़ेमकोड़े और मछलियों के रूप में विकसित होने लगे थे.

विकास की इस चरम प्रतियोगिता के दौर में कुछ समुद्री जीवों ने समुद्र से बाहर निकल कर धरातल पर कदम रखा जहां उन के लिए प्रतिस्पर्धा बिलकुल नहीं थी, बस, उन्हें नए माहौल के हिसाब से खुद को बदलना था.

2 अरब साल पहले समुद्र से निकल कर धरती पर सब से पहले कदम रखने वाली मछलियों के वंशजों ने विकास की बेहद कठिन प्रक्रियाओं से गुजरते हुए विशाल जीवों का रूप धारण कर लिया.

आगे चल कर यही विशाल जीव डायनासोर के रूप में विकसित हुए जिन्होंने लंबे अरसे तक पृथ्वी पर राज किया. करीब 6 करोड़ साल पहले पृथ्वी से एक भयंकर धूमकेतु टकराया जिस ने डायनासोरों के विशाल साम्राज्य को एक झटके में खत्म कर दिया.

इस टक्कर ने पृथ्वी से बड़े जीवों का बिलकुल सफाया कर दिया. पृथ्वी के लगभग 90 प्रतिशत जीव खत्म हो गए. जो छोटे जीव बच गए उन्होंने परिस्थितियों का सामना किया और लाखों वर्षों के विकासक्रम में खुद को कई अलगअलग प्रजातियों में विकसित कर लिया.

आधुनिक मनुष्यों के पूर्वज 2 लाख वर्ष पहले अफ्रीका के इथियोपिया में विकसित हुए और करीब 80 हजार वर्ष पहले इंसानों का एक छोटा सा दल नई दुनिया की तलाश में अफ्रीका से यमन के रास्ते 16 किलोमीटर का समुद्री रास्ता पार करते हुए यूरोप पहुंच गया. उस ने 200 वर्षों की वैज्ञानिक खोजों और परीक्षणों पर आधारित सृष्टि रचना की. इस थ्योरी को अच्छी तरह समझने के लिए कुछ और बातों को जानना जरूरी है.

धर्म के ठेकेदार स्वयं को ईश्वर का सेवक कहते हैं. जबकि, वे ईश्वर की सेवा के नाम पर जनता से लूटी गई दौलत से आलीशान जिंदगी जीते हैं. इस के उलट, सृष्टि और इंसान की जिंदगी से जुड़ी नित नई खोज करने वाले वैज्ञानिक स्वयं को ईश्वर का दलाल घोषित नहीं करते. ये वैज्ञानिक साधारण जिंदगी जीते हैं. साधारण घरों में रहते हैं. साधारण खाना खाते हैं. स्वयं की मूर्तियां नहीं बनवाते. आइजेक न्यूटन, गैलीलियो गैलिली, चार्ल्स डार्विन और अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिकों की जहां मूर्तियां बनी हैं वहां कोई पुजारी नहीं बैठा. जिन पुस्तकों में दुनिया का वास्तविक ज्ञान है वे पुस्तकें पुस्तकालयों में हैं; किसी धर्म के खास चर्चों, मसजिदों या मंदिरों में नहीं. जिन महान वैज्ञानिकों ने सृष्टि के बड़े रहस्यों को सुलझाया, लोगों को उन वैज्ञानिकों के नाम तक नहीं मालूम क्योंकि ये वे महान लोग थे जिन्हें भक्तों की जरूरत नहीं थी.

सर्वप्रथम फ्रेडरिक वोहलर ने दी ईश्वर को चुनौती

धर्म के ठेकेदारों का मानना था कि नेचर में मौजूद हरेक तत्त्व सिर्फ ईश्वर ही पैदा कर सकता है. इंसान के बस की बात नहीं कि वह कुछ भी पैदा कर सके. लेकिन, फ्रेडरिक वोहलर ने 1828 में यूरिया को लैब में तैयार कर ईश्वर को चुनौती दे डाली थी तब धार्मिकों ने इसे खुदा की अवहेलना माना और दुनियाभर में सर फ्रेडरिक वोहलर की निंदा की गई. तमाम तरह के फतवे जारी हुए. जान से मारने की धमकियां दी गईं लेकिन यह सब वोहलर जैसे वैज्ञानिकों के लिए कोई नई बात नहीं थी.

जीवन की उत्पत्ति के बारे में इंसानी समझ कभी आगे न बढ़ पाती अगर गैलीलियो गैलिली, कोपरनिकस, जियोर्दानो ब्रूनो और चार्ल्स डार्विन जैसे महान लोग धर्म की युगों पुरानी घेराबंदियों को लांघने की हिम्मत न करते.

जीवन की उत्पत्ति के बारे में धार्मिक मान्यताओं से अलग विज्ञान ने आज कई पहेलियों का हल ढूंढ़ लिया है. आज हम जानते हैं कि धरती पर जीवन की विविधताओं का स्रोत कोई

ईश्वर नहीं बल्कि विकासवाद (एवोल्यूशन) है. एवोल्यूशन के हजारों सुबूत हमें मिल चुके हैं लेकिन अभी तक हमारे पास इस सवाल का ठोस जवाब नहीं है कि धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई.

धरती पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इस सवाल का जवाब खोजने से पहले हमें यह समझना होगा कि जीवन है क्या? यह प्रश्न भी मानव की खोजी प्रवृत्ति से जुड़ा है. आदिमानव हमेशा से अपने सर्वाइवल के लिए जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है. नदी के उस पार क्या है? पहाड़ के पीछे क्या है? समुद्र के उस पार क्या है? गुफा के अंदर क्या है? आदिकाल के मनुष्य के लिए इस तरह के प्रश्नों का हल ढूंढ़ने की प्रक्रिया हजारों वर्षों तक चली. शुरू में मनुष्य की जिज्ञासु प्रवृत्ति सिर्फ उस के संघर्ष और विकास से जुड़ी रही. आगे चल कर इंसान की यह प्रवृत्ति उत्सुकता में बदली, जिस का फायदा हर कदम पर पुरोहितों ने उठाया.

जीवन की परिभाषा क्या

जीवन की परिभाषा क्या है? इस सवाल पर ज्यादातर वैज्ञानिकों की कौमन राय यह है कि वह मौलिक्यूल जो जानकारियों को स्टोर कर सके और अपनी नकल तैयार कर सकने के काबिल हो, उसे नस्ल कहते हैं. हर नई नस्ल पुरानी पीढ़ी से थोड़ी एडवांस भी होनी चाहिए ताकि यह नेचर में अपनी उपस्थिति कायम रख सके. इस के साथ ही, यह मौलिक्यूल एनर्जी के किसी स्रोत पर निर्भर हो कर मेटाबौलिज्म को करने में सक्षम भी हो. ऐसे किसी भी मौलिक्यूल को हम जीवन की एक इकाई कह सकते हैं.

सरल भाषा मे कहें तो वह कोई भी तत्त्व जिसे भोजन यानी एनर्जी की जरूरत होती हो, उस में स्वयं को सुरक्षित रखने के गुण हों और जो प्रजनन कर अपनी नस्ल को आगे बढ़ा सकता हो, उस को हम जीवन कह सकते हैं.

कैसे काम करता है हमारा शरीर

शरीर के काम करने को बेहतर ढंग से समझना हो तो हमारे पास उदाहरण के लिए हमारा शरीर है. यह शरीर कई और्गनों से मिल कर बना है. शरीर को जीवित बनाए रखने के लिए किडनी, दिल, फेफड़े, स्किन, धमनियां और दिमाग मिल कर काम करते हैं. शरीर के ये हिस्से बने हैं टिश्यूज से और ये टिश्यूज बने हैं सेल्स यानी कोशिकाओं से.

एक सिंगल सेल में वे सभी गुण होते हैं जिसे हम जीवन कह सकते हैं. एक सिंगल सेल भोजन करता है, खुद की सुरक्षा कर सकता है और अपनी कौपी बना सकता है. ऐसी खरबों कोशिकाओं का बना हमारा शरीर भी मेटाबौलिज्म करता है, खुद की सुरक्षा कर सकता है और दो शरीर मिल कर अपने से मिलतीजुलती अनगिनत कौपीज बना सकते हैं. खरबों जीवित कोशिकाओं की इसी संयुक्त इकाई को हम जिंदा शरीर कहते हैं. धरती के तमाम जीव इसी तरह बने हैं यानी धरती पर हम जिन जीवों को देखते हैं उन का वजूद खरबों कोशिकाओं की संयुक्त कार्यप्रणाली की वजह से है.

जिस तरह हम खुद में एक जिंदगी हैं उसी तरह हमारे शरीर का हरेक सेल अपनेआप में एक जीवन है और धरती पर जिन भी तत्त्व को हम जीवन कहते हैं वे सभी इन्हीं छोटे सेल्स की कंबाइन इकाई होते हैं.

धरती पर जीवन की शुरुआत में यही सिंगल सैलुलर जीव वजूद में आए थे जो अरबों वर्षों के क्रमिक विकास में मल्टीसैलुलर जीव बने. सिंगल सेल से खरबों प्रजातियां कैसे इन्वौल्व हुईं, इस के लिए हमें एवोल्यूशन को समझना होगा.

एवोल्यूशन क्या है

जीवन के आनुवंशिक गुणों में पीढ़ी दर पीढ़ी होने वाले बदलाव को क्रम विकास या एवोल्यूशन कहते हैं. धरती पर जीवन की विविधताओं का स्रोत क्रम विकास ही है.

चार्ल्स डार्विन ने सर्वप्रथम इंसान और बाकी सभी जीवों के क्रमिक विकास की थ्योरी दी थी. चार्ल्स डार्विन के शोध के अनुसार, इतिहास में बहुत पीछे जाने पर सभी जीवों की ओरिजिन का स्रोत जीवन की किसी एक शाखा से ही जुड़ता है. सीधे शब्दों में कहें तो सभी जीवों के पूर्वज एक ही रहे होंगे.

इस नजरिए से डार्विन ने यह साबित किया कि जीव की हर प्रजाति चाहे वह इंसान हो, जीवजंतु हों, पेड़पौधे हों या समुद्री जीव हों, सभी एकदूसरे के रिश्तेदार हैं जो करोड़ों वर्षों के प्राकृतिक चयन (नैचुरल सिलैक्शन) की वजह से अलगअलग प्रजातियों में विकसित हुए. इसी को थ्योरी औफ एवोल्यूशन यानी विकासवाद का सिद्धांत कहा जाता है. सर चार्ल्स डार्विन के एवोल्यूशन के सिद्धांत को स्थापित हुए 150 वर्ष गुजर चुके हैं. इस बीच अनेक जीव वैज्ञानिकों ने डार्विन के विकासवाद की पुष्टि की है. आज के जीव विज्ञान के लिए एवोल्यूशन एक बुनियादी मापदंड है.

बहुकोशिकीय जीवन की शुरुआत कैसे हुई

अफ्रीका के गैबोन से 2.1 बिलियन वर्ष पुरानी चट्टानों में पहले के बहुकोशिकीय जीवाश्म पाए गए हैं. इस से यह साबित होता है कि 2 अरब साल पहले भी बहुकोशिकीय जीव धरती पर मौजूद थे. इस जीवाश्म के शोध से पता चला कि यह बहुकोशिकीय जीवन का बिलकुल शुरुआती चरण था. बहुकोशिकीय जीवन सिंगल सैलुलर जीवों का ही एडवांस्ड रूप है. तकरीबन 2.5 अरब साल पहले एकल कोशिकाओं का एक समूह एक अलग द्रव्यमान में इकट्ठा हुआ, जिसे ग्रेक्स कहा जाता है. एक अरब वर्ष के विकासक्रम के दौरान यही ग्रेक्स बहुकोशिकीय इकाई के रूप में विकसित हो गया. आज धरती पर मौजूद तमाम तरह के जीव इसी विकासक्रम का परिणाम हैं. जीवाश्म वैज्ञानिकों के शोध बताते हैं कि बहुकोशिकीय पौधे 470 मिलियन साल पहले शैवाल से विकसित हुए थे.

अब सवाल यह कि सिंगल सेल वाले जीव कैसे बने, इन की शुरुआत कहां से हुई? आणविक जीव विज्ञान ने साबित किया कि सभी जीव एक ही माइक्रोमौलिक्यूल्स (डीएनए, आरएनए और प्रोटीन) को साझा करते हैं और इन अणुओं यानी माइक्रोमौलिक्यूल्स के बीच सूचना स्थानांतरित करने के लिए एक ही आनुवंशिक कोड होता है. इस शोध से यह स्थापित हो गया कि धरती पर मौजूद सभी प्रकार के जीव 3.7 अरब साल पहले के किसी एक ही पूर्वज को साझा करते हैं.

1996 में एक फाउंडेशन द्वारा फ्रांस में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान इस साझे पूर्वज का नामकरण कर इसे लुका (लास्ट यूनिवर्सल कौमन एंसेस्टर) नाम दिया गया. लुका के जीनोमिक्स के डेटा के परीक्षण यह बताते हैं कि आज की जीवित दुनिया के 3 डोमैन, आर्किया, बैक्टीरिया और यूकेरियोट्स, का साझा पूर्वज लुका ही था.

इसे और ठीक से समझने के लिए हमें एक बार फिर सेल को समझना होगा. एक सिंगल सेल, कई माइक्रो एलिमैंट्स से मिल कर बना होता है. इन में सब से महत्त्वपूर्ण एलिमैंट प्रोटीन होता है जो बनता है अमीनो एसिड से और अमीनो एसिड बनता है एटम्स से. हम जानते हैं कि एक एटम खुद में जीवन नहीं होता और न ही हम अमीनो एसिड या न्यूक्लिक एसिड को ही जीवन कह सकते हैं. प्रोटीन मैंबरैंस और माइटोकौंड्रिया भी खुद में जीवन नहीं हैं लेकिन ये सब मिल कर जिस सिंगल सेल का निर्माण करते हैं वह जीवन कहलाता है. यानी, कुछ निर्जीव कैमिकल्स मिल कर एक जीवित सेल का निर्माण कर देते हैं और इस तरह जियोग्राफी में मौजूद कैमिस्ट्री से बायोलौजी की हैरतअंगेज शुरुआत हो जाती है.

सवाल यह है कि कैमिस्ट्री से बायोलौजी के बीच की इस यात्रा को कैसे समझ जाए? तकरीबन 4 अरब साल पहले की धरती का वातावरण ऐसा था कि जीवन के बुनियादी एलिमैंट्स बन सकें. सतह पर मौजूद कुछ कैमिकल्स का संपर्क जब आसमानी बिजली से हुआ तब धरती पर अमीनो एसिड का निर्माण हुआ.

अमीनो एसिड को तो हम लैब में भी तैयार कर चुके हैं. वर्ष 1952 में 2 वैज्ञानिकों ने लैब में अमीनो एसिड तैयार कर दिया था जिसे मिलर यूरी एक्सपैरिमैंट कहते हैं. सरल गैसों से कार्बनिक अणुओं के बनने की प्रक्रिया को दिखाने वाले इस मिलर-यूरे प्रयोग को अमेरिकी रसायनज्ञ स्टेनली मिलर और हेरोल्ड यूरे ने अंजाम दिया था. दोनों वैज्ञानिकों ने लैब के अंदर कैमिकल रिऐक्शन की ऐसी कंडीशन तैयार की जैसी शुरुआती धरती पर थी और नतीजतन, उन्होंने प्रयोगशाला में अमीनो एसिड तैयार कर दिखाया. इस प्रयोग से यह साबित होता है कि 3 अरब 80 करोड़ साल पहले धरती के गर्भ से बायोलौजी का जन्म कैमिकल रिऐक्शन की वजह से ही हुआ.

जीवन के बुनियादी तत्त्व में जीवन कहां से आया

अमीनो एसिड और न्यूक्लिक एसिड जैसे जीवन के सब से बुनियादी एलिमैंट्स धरती पर ही नहीं बल्कि हमारे सौरमंडल के दूसरे ग्रहों पर भी मौजूद होते हैं. ये मंगल पर भी हैं और अंतरिक्ष में भटकते धूमकेतुओं पर भी. 3 अरब 80 करोड़ साल पहले अंतरिक्ष से लगातार बरसते धूमकेतू भी जीवन का यह रा मैटीरियल धरती तक पहुंचा सकते थे.

सवाल यह नहीं है कि जीवन के बुनियादी तत्त्व कैसे बने बल्कि सवाल यह है कि इन बुनियादी तत्त्वों से जीवन कैसे बना?

हम अब तक यह जान चुके हैं कि धरती पर जीवन की शुरुआत 3 अरब 80 करोड़ साल पहले हुई और उस वक्त के वातावरण में कुछ ऐसे कैमिकल रिऐक्शन हुए जिन से शुरुआती कोशिकीय जीव वजूद में आए लेकिन कैमिस्ट्री से बायोलौजी के बीच की बहुत सी गुत्थियां अब भी अनसुलझ ही हैं.

धरती पर जीवन की शुरुआत कहां पर हुई

जड़ से चेतन कैसे बना? इसे और बारीकी से समझने के लिए हमें पहले यह जानना होगा कि 3 अरब 80 करोड़ साल पहले धरती पर जीवन की शुरुआत कहां पर हुई. फौसिल रिकौर्ड के जरिए हमें धरती पर जीवन की अरबों साल पुरानी विकासयात्रा के पुख्ता सुबूत मिल चुके हैं लेकिन जीवन की शुरुआत कैसे हुई, इस बात के ठोस प्रमाण हम अभी तक हासिल नहीं कर पाए हैं. इस सवाल का हल तब ही मिल सकता है जब हम यह जान लें कि धरती पर जीवन की शुरुआत ठीकठीक कहां पर हुई.

3 अरब 80 करोड़ साल पहले की धरती की सतह पर जीवन के पनपने लायक एनवायरमैंट मौजूद नहीं था. सो, क्या जीवन की शुरुआत महासागरों के गर्भ में हुई? समुद्र की गहराइयों में मौजूद ज्वालामुखीय क्षेत्रों में जीवन के पनपने की संभावनाएं मौजूद हो सकती थीं लेकिन नए एक्सपैरिमैंट्स यह बताते हैं कि समुद्र की गहराइयों में शुरुआती जीवन का पनपना नामुमकिन बात है. इसे हम ‘वाटर पैराडौक्स’ कहते हैं. तो फिर, जीवन की शुरुआत जमीन पर कहां हुई?

अब नए शोध के नतीजे में यह बात निकल कर आई है कि तकरीबन 3 अरब 80 करोड़ साल पहले धरती की सतह पर मौजूद छोटे तालाबों में जीवन की शुरुआत हुई होगी. लेकिन अब ऐसे तालाबों को धरती पर ढूंढ़ना नामुमकिन है क्योंकि समय के लंबे अंतराल के बाद ऐसे तमाम स्थानों का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है.

धरती पर 3 अरब 80 करोड़ साल पुरानी वह जगह अब कहीं है ही नहीं जहां हम जीवन की शुरुआत के सुबूत ढूंढ़ सकें तो क्या हम कभी यह नहीं जान पाएंगे कि जियोग्राफी पर कैमिस्ट्री से बायोलौजी की शुरुआत कैसे हुई? क्या इस सवाल का जवाब ढूंढ़े बिना हमें हार मान कर बैठ जाना चाहिए?

नहीं, विज्ञान कभी हार नहीं मानता. धरती पर न सही तो मंगल पर सही, सवाल है तो जवाब भी जरूर मिलेगा, यही विज्ञान है. जी हां, अगर धरती पर ऐसी कोई जगह मौजूद नहीं है तो क्यों न हम ऐसी जगह की तलाश मंगल पर करें?

मंगल पर जीवन की उत्पत्ति की खोज

मंगल भी लगभग उतना ही पुराना है जितनी धरती. मंगल ग्रह की सतह भी धरती से काफी मिलतीजुलती है. मंगल पर कई क्रैटर्स हैं जिन में कभी पानी मौजूद था. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अरबों साल पुराने मंगल के इन गड्ढों के आसपास जीवन की उत्पत्ति के वे सुबूत मिल सकते हैं जो हमारी जिज्ञासाओं को शांत कर सकते हैं क्योंकि अपने शुरुआती समय में मंगल और पृथ्वी दोनों लगभग एकजैसे ही थे. मंगल की सतह पर मौजूद आज सूखे हुए क्रैटर्स अपने अंदर बीते हुए वक्त के बहुत से राज ताजा किए हुए हो सकते हैं. इन में अरबों सालों से अब तक ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. मंगल पर एक ऐसा ही क्रैटर है जिस का नाम है जजेरो क्रैटर.

पर्सिवियरैंस नाम के एक रोवर को नासा ने 30 जुलाई, 2020 को मंगल की ओर रवाना किया जो 18 फरवरी, 2021 को मंगल की सतह पर लैंड हुआ. तब से यह रोवर मंगल के जजेरो क्रैटर पर कैमिस्ट्री और बायोलौजी के बीच की उस कड़ी को ढूंढ़ने में लगा है जो धरती पर जीवन की शुरुआत की गुत्थी को सुलझ सकती है.

बेशक, हम अभी तक यह न जान पाए कि जड़ से चेतन कैसे बना लेकिन इतना तो जान ही गए हैं कि जड़ से चेतन को बनाने में किसी ईश्वर, अल्लाह या गौड का कोई हाथ नहीं है.

धरती पर जीवन किसी ईश्वर की वजह से नहीं है. इस कड़वे सच को समझते ही ईश्वर का रोल, ईश्वर से जुड़ी मान्यताएं और ईश्वर की जरूरत भी खत्म हो जाती है. ईश्वर की मान्यताओं के खत्म होते ही ईश्वर पर आधारित धर्मों की वाहियात दलीलें भी खत्म हो जाती हैं और इन दलीलों के खत्म होते ही धर्म के दलालों का खेल भी खत्म हो जाता है.

लेकिन विडंबना यह है कि दुनिया के तमाम धार्मिक गिरोह हमेशा इस कोशिश में लगे रहते हैं कि आम आदमी तक सत्य की रोशनी पहुंच ही न पाए और आम इंसान हमेशा धार्मिक गिरोहों की बनाई मनगढ़ंत कहानियों में अपनी जिंदगी का हल ढूंढ़ता फिरे.

पृथ्वी की उत्पत्ति के बारे में विज्ञान के पास कोई अंतिम उत्तर नहीं है और न ही विज्ञान यह दावा करता है कि यहीं से उत्पत्ति हुई और विकास प्रारंभ हुआ. हां, उस खोज में वैज्ञानिकों ने ऐसी बहुत सी खोजें कीं जिन का लाभ आज हम टैक्नोलौजी और मैडिसिन व अन्य रूपों में उठा रहे हैं. धार्मिक काल्पनिक कहानियों को सुनसुन कर, पढ़पढ़ कर, गागा कर न टैक्नोलौजी पैदा होती है न मैडिसिन बनती है. जो भी दावों के साथ मानव उत्पत्ति का रहस्य धार्मिक पुस्तकों से बताते हैं, वे खुद अस्पतालों के चक्कर लगाते हैं, मोटरगाड़ियों से चलते हैं, मोबाइल व कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं जो विज्ञान के ही आविष्कार हैं.

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मनुष्य की प्राचीन अभिव्यक्ति में नहीं दिखे देवीदेवता

पूरी दुनिया में मनुष्य की अभिव्यक्ति के सब से पुराने प्रमाण भित्ति चित्रों के रूप में मिलते हैं. इंडोनेशिया के सुलावेसी की एक गुफा में जंगली सूअर के शिकार के चित्र उकेरे गए हैं जो लगभग 51,200 साल पुराने हैं. भारत के मध्य प्रदेश में भीमबेटका की गुफाओं में 30,000 साल पुराने चित्र हैं. चट्टानों पर उकेरे गए चित्रों में शिकार, नृत्य और दैनिक जीवन की झलक साफ नजर आती है. ये गुफा चित्र मानव सभ्यता की शुरुआती रचनात्मकता और पर्यावरण के साथ उस के संबंध को दर्शाते हैं, साथ ही, ये गुफा चित्र प्रागैतिहासिक मानव के जीवन, कला और संस्कृति को समझने का एक अनमोल स्रोत भी हैं.

दक्षिणपश्चिम फ्रांस में डोर्डोग्ने इलाके में लास्को गुफा चित्र और अल्टामिरा गुफा चित्र लगभग 20,000 साल पुराने हैं. इन दोनों गुफा चित्रों में घोड़े, हिरण, बैल के खूबसूरत चित्र बने हैं, साथ ही, शिकार के दृश्यों को लाल, काले और पीले रंगों में उकेरा गया है. इन चित्रों को ‘पाषाण युग का सिस्टिन चैपल’ कहा जाता है, क्योंकि ये मानव कला और सांस्कृतिक इतिहास की शुरुआत को दर्शाते हैं.

यहां सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन गुफा चित्रों में कहीं भी किसी भगवान या देवीदेवता का कोई चित्र नहीं है. ये तमाम गुफा चित्र मनुष्य के सर्वाइवल की कहानी कहते हैं. मनुष्य के संघर्ष की लंबी कहानी में मनुष्य को कहीं भी भगवानों की जरूरत पड़ी हो, ऐसा इन गुफा चित्रों में कहीं नजर नहीं आता. भगवान, देवीदेवता और अल्लाह मानव के लाखों वर्षों के एवोल्यूशन में कहीं नहीं थे. ये तब आए जब मनुष्यों ने खेती करना सीखा और गांव बसने शुरू हुए. सभ्यताओं की शुरुआत के इस दौर में कुछ धूर्त और चालाक लोगों ने ईश्वर, देवीदेवता और खुदाओं की खोज कर दी और इन्हें जबरन लोगों पर थोपना शुरू कर दिया ताकि लोग पुरोहितों को ईश्वर का प्रतिनिधि मान कर उन की बनाई कपटपूर्ण कहानियों को सच मानें और उन्हें मुफ्त में दान व स्त्रियां मिल सकें.

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Industrial Crisis : औपरेशन सिंदूर के बाद थमा औद्योगिक पहिया

Industrial Crisis : औपरेशन सिंदूर के बाद लुधियाना की औद्योगिक इकाइयों में मजदूरों का संकट गहराया है. जानिए कि कैसे पलायन ने हौजरी, साइकिल और औटो पार्ट्स इंडस्ट्री को ठप कर दिया है और फैक्ट्री मालिक अब गांवगांव जा कर मजदूरों को मनाने में लगे हैं.

कभी पंजाब की आर्थिक राजधानी मानी जाने वाली लुधियाना सिटी आज मजदूर संकट से जूझ रही है. 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा पाकिस्तान और पीओके में की गई एयरस्ट्राइक (औपरेशन सिंदूर) के बाद हालात तेजी से बदले. सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील माने जाने वाले इस क्षेत्र से मजदूरों का भारी पलायन हुआ जिस से औद्योगिक गतिविधियां लगभग ठप हो गई हैं.

भारत का मैनचैस्टर थमाथमा सा

लुधियाना को ‘भारत का मैनचैस्टर’ कहा जाता है क्योंकि यह हौजरी, टैक्सटाइल, औटो पार्ट्स और साइकिल निर्माण का मुख्य केंद्र है. 30 अप्रैल, 2025 तक यहां 45,000 फैक्ट्रियों में करीब 12 लाख मजदूर कार्यरत थे. लेकिन औपरेशन सिंदूर के बाद मजदूरों में युद्ध का भय इस कदर समाया कि 25 मई तक यह संख्या घट कर मात्र 8 लाख रह गई.

फैक्ट्रियों पर ताले

पंजाब की 553 किलोमीटर लंबी सीमा पाकिस्तान से सटी है, जो अमृतसर, गुरदासपुर, फाजिल्का जैसे सीमावर्ती जिलों से हो कर गुजरती है. लुधियाना के इन जिलों के पास होने के कारण यह सुरक्षा संकट का केंद्र बन गया. पाकिस्तानी ड्रोन लुधियाना के आसमान में देखे गए, जिस से मजदूरों के मन में डर और गहरा गया.

डर का माहौल

पाकिस्तान ने हालांकि केवल 4 दिनों बाद ही यानी 10 मई, 2025 को सीजफायर की गुहार लगाई और संघर्षविराम लागू हुआ लेकिन जो मजदूर एक बार घर लौट गए उन्होंने वापस आने से इनकार कर दिया. उन का डर अभी भी बना हुआ है. वे स्थानीय रोजगार या अन्य सुरक्षित शहरों में काम करने को प्राथमिकता दे रहे हैं.

फैक्ट्री मालिकों पर दोहरी मार

उत्पादन ठप : मजदूरों के अभाव में उत्पादन रुक चुका है. साइकिल से ले कर हौजरी और औटो पार्ट्स तक, हर उद्योग प्रभावित है.

बढ़ता आर्थिक दबाव : बिजली बिल, बैंक कर्ज की किस्तें, रद्द और्डर और अटकी सप्लाई चेन इन सब के चलते फैक्ट्री मालिक भारी आर्थिक दबाव में हैं.

मजदूरों को मनाने की कोशिशें

फैक्ट्री मालिकों ने अपने मैनेजरों को उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के गांवों में भेजा है ताकि वे वहां मजदूरों को मना सकें. मजदूरों को एडवांस सैलरी, इंक्रीमैंट, मुफ्त राशन और यात्राभत्ता जैसी सुविधाएं औफर की जा रही हैं. फिर भी, मजदूर लुधियाना लौटने को तैयार नहीं.

किस इंडस्ट्री पर कितना असर

साइकिल इंडस्ट्री
इकाइयों की संख्या : 5,000.
मजदूरों का पलायन : 50,000.
उत्पादन : पहले 5,000 साइकिल प्रतिदिन, अब घट कर 3,000.

औटो पार्ट्स इंडस्ट्री
फैक्ट्रियां : 400.
मजदूर पहले : 25,000, अब केवल 15,000.
काम प्रभावित : पैकिंग से डिस्पैच तक.

हौजरी-टैक्सटाइल इंडस्ट्री
इकाइयां : 75,000.
मजदूर : पहले 6 लाख, अब केवल 4 लाख.
असर : रंगाई, बुनाई और तैयार माल का उत्पादन ठप.
यह केवल मजदूरों की नहीं, सरकार की नीति की भी हार है.

मजदूरों का लुधियाना से पलायन सिर्फ युद्धभय से उत्पन्न संकट नहीं है, यह सरकार की औद्योगिक नीति और मजदूर सुरक्षा उपायों की विफलता का संकेत भी है. अगर मजदूरों को असुरक्षा से बाहर निकालने के लिए समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो लुधियाना की छवि एक औद्योगिक महानगर से एक खाली होते औद्योगिक कब्रगाह में बदल सकती है.

लुधियाना की हालत बताती है कि किसी भी शहर की औद्योगिक मजबूती सिर्फ मशीनों से नहीं, बल्कि मजदूरों के भरोसे से बनती है. मजदूर ही हैं जो उद्योगों के पहियों को खींचते हैं, इस श्रम बल को फिलहाल रिप्लेस नहीं किया जा सकता. युद्ध की परिस्थिति भले ही निकल गई हो लेकिन डर और अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है. यदि सरकार और उद्योग जगत मजदूरों के मन से यह डर निकालने में सफल न हुए तो लुधियाना की पुनर्बहाली एक लंबा व चुनौतीपूर्ण सफर सा होगा.  Industrial Crisis

Property Purchase : मकान व जमीन जब जाएं खरीदने

Property Purchase : आजकल मकान या जमीन खरीदते समय उन लोगों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है जो सही से जांचपरख नहीं करते. कई बार चालाक लोग भी फ्रौड का शिकार हो जाते हैं. ऐसे में जानिए कि जमीन या मकान लेते समय किन बातों का ध्यान रखा जाए.

आज के दौर में जमीन की खरीदारी बेहद कठिन काम हो गया है. एक तो जमीन महंगी हो गई है, दूसरे गलत तरह से बेचीखरीदी जा रही है. इस में सरकार की नाकामी सब से अधिक है. भ्रष्टाचार के चलते एक ही जमीन की कईकई रजिस्ट्री हो जा रही हैं. जमीन को बिकवाने और खरीद में बिचौलिए भी होते हैं जिन को प्रौपर्टी डीलर कहा जाता है. वैसे तो हर शहर विकसित हो रहा है लेकिन बड़े शहरों के विकास ने अपने आसपास के गांव और खेती की जमीन को खत्म कर दिया है. गांव के लोग शहर में रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं. इस के लिए वे गांव की जमीन बेच कर शहर के छोटेछोटे मकानों में रहने को आ रहे हैं.

लखनऊ, दिल्ली, पटना, भोपाल जैसे शहरों में जमीन की कीमतें आसमान छू रही हैं. लखनऊ में आवास विकास परिषद ने अनंत नगर परियोजना में प्लौट अलोट किए हैं उन में 2 हजार स्क्वायर फुट वाले प्लौट की कीमत 80 लाख रुपए हो गई है. सरकार का काम सस्ते दरों पर मकान बेचना होता है न कि किसी प्राइवेट बिल्डर की तरह से मुनाफा कमाना. लखनऊ में प्राइवेट सैक्टर में औसतन वेतन 12 से 15 हजार रुपए प्रतिमाह है. ऐसे में सरकार की ये योजनाएं उस के किस काम की हैं? ऐेसे लोग किसी तरह से पैसा जुटा कर सस्ती जमीन, प्लौट या फ्लैट खरीदते हैं तो वहां धोखाधड़ी में फंस जाते हैं.

कई प्राइवेट बिल्डर ऐसी जगहों पर फ्लैट बना देते हैं या लोग मकान बना लेते हैं जो सरकार द्वारा आवासीय नहीं होती हैं. ऐसे में जब घर बन कर तैयार हो जाते हैं तो सरकारी बुलडोजर वहां घर गिराने पहुंच जाता है. लखनऊ के बिजनौर इलाके में 25 घरों की कालोनी को लखनऊ विकास प्राधिकरण ने अवैध घोषित कर दिया है जबकि घरों की रजिस्ट्री और बैंक लोन तक हो चुका है. कई परिवार यहां रहने भी आ गए हैं. कोई कालोनी रातोंरात बन कर तैयार नहीं होती है. जब यह बनती है तब तक सरकारी अफसर सोए रहते हैं. अचानक जागते हैं और फिर बुलडोजर ले कर दरवाजे पर खड़े हो जाते हैं. यह केवल लखनऊ की बात नहीं है. हर जगह यही हालत है.

संभल कर करें जमीन की खरीदारी

आप रहने के लिए मकान खरीद रहे हो या प्लौट या फिर फ्लैट, सावधान रहिए. जमीन के पेपर देख लें. उन के सहीगलत का जितना पता कर सकते हैं, जरूर कर लें. इस के बाद अगर गलत खरीद लिया है तो डरिए नहीं. अपनी जमीन पर कब्जा बनाए रखिए और कोर्ट में लड़ाई लड़िए. डर कर मत भागिए. कोई न कोई हल जरूर निकलेगा. कई तरह के कानून हैं जो आप के पक्ष में होते हैं. अगर आप ने गलत कब्जा नहीं किया है तो आप का नुकसान नहीं होगा.

जमीन की खरीद में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत होती है. जमीन खरीदने से पहले सभी आवश्यक दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए. इस में खसरा खतौनी, जमाबंदी और नक्शा शामिल हैं. इस के अलावा यह भी देखें कि जमीन पर कोई लोन तो नहीं है. जमीन के मालिक का आईडी प्रूफ भी वैरिफाई कर लें. खसरा खतौनी जमीन के मालिकाना हक और सीमाओं को दर्शाता है. जमाबंदी से यह पता चलता है कि यह जमीन राजस्व रिकौर्ड में किस तरह से दर्ज है. जमीन का नक्शा जमीन के आकार व उस के स्थान को दिखाता है.

तहसील और सब रजिस्ट्रार औफिस से 12 साल का रिकौर्ड निकलवा कर जांच करें कि जमीन पहले कभी बंधक तो नहीं रही है. जमीन खरीदने के पहले यह देखना भी जरूरी है कि जमीन की प्रकृति यानी वह कृषि, आवासीय, व्यावसायिक किस प्रकार की है. यदि घर बनाने के लिए जमीन खरीद रहे हैं तो यह देख लें कि वहां आवासीय अनुमति है. जमीन खरीदने के बाद स्टैंप ड्यूटी भर कर रजिस्ट्री कराएं और फिर दाखिल खारिज कराएं. हर खरीदार जानकार नहीं होता है. ऐसे में वकील की मदद लें. दस्तावेजों की जांच करवाएं.

अगर जनरल पावर औफ अटौर्नी के आधार पर जमीन खरीदी जा रही है तो वह रजिस्टर्ड होनी चाहिए. रजिस्ट्री के बाद दाखिल खारिज कराना जरूरी है. जमीन खरीदने से पहले क्षेत्र के बारे में जानकारी कर लें. वहां की विकास योजनाएं और भविष्य की संभावनाएं क्या है, यह देख लें. किसी भी संदिग्ध चीज को नजरअंदाज न करें और यदि आवश्यक हो तो कानूनी सलाह लें. अपने दस्तावेजों को सुरक्षित रखें और उन की प्रतियां भी फाइल बना कर रखें. आजकल पेपर रखने का चलन कम हो रहा है. फाइल को डिजिटल स्कैन करा कर भी रखें.

धारा 143 क्यों महत्त्वपूर्ण है

उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 143 कृषि भूमि को गैरकृषि उपयोग जैसे आवासीय या व्यावसायिक उददेश्यों के लिए परिवर्तित करने की अनुमति देती है. जमीन के मालिक को सब मजिस्ट्रेट एसडीएम के पास आवेदन करना होता है. यदि एसडीएम संतुष्ट हो जाता है तो वह भूमि के पुनर्वर्गीकरण की घोषणा जारी करता है. यदि आप अपनी खेती की जमीन का कोई दूसरा उपयोग करना चाहते हैं तो धारा 143 के तहत भूमि का रूपांतरण कानूनी रूप से आवश्यक है. अगर आप किसी किसान से अपने मकान बनाने के लिए जमीन खरीद रहे हैं तो यह देख लें कि धारा 143 हुई है या नहीं.

जमीन के संबंध में धारा 80 क्या है

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 80 कृषि भूमि को गैरकृषि प्रयोजनों जैसे औद्योगिक, वाणिज्यिक या आवासीय उपयोग के लिए बदलने की अनुमति देती है. भूमिधर, औनलाइन आवेदन कर के अपनी कृषि भूमि को गैरकृषि प्रयोजनों के लिए उपयोग करने की अनुमति प्राप्त कर सकता है. आवासीय कालोनी, टाउनशिप कालोनी बनाने वाले बिल्डर कई बार बिना अनुमति लिए अपार्टमैंट बना लेते हैं. ऐेसे में परेशानी तब खड़ी होती है जब बनेबनाए फ्लैट गिराने के लिए बुलडोजर आ जाता है.

धारा 143 और धारा 80 दोनों ही जमीन से जुड़े कानून हैं. धारा 143 को अब धारा 80 के रूप में जाना जाता है. यह नए और पुराने कानून का अंतर है. दोनों ही धाराएं एक तरह से ही काम करती हैं. ये जमीन के प्रारूप और प्रयोग को बदलने के लिए प्रयोग की जाती हैं. मकान के लिए जमीन खरीदते समय इस बात का ध्यान हर हाल में रखना चाहिए. अगर किसी अपार्टमैंट में फ्लैट खरीद रहे हैं तो यह तय कर लें कि इस जमीन का भूउपयोग कानूनन सही से बदल लिया गया है या नहीं.

अगर आप शहर के अपने मकान में रह रहे हैं और वहां से कोई बिजनैस करना चाहते हैं या घर में दुकान खोलना चाहते हैं तो भी आप को मकान का उपयोग बदलवाना पड़ेगा. धारा 80 के तहत ही घर में कमर्शियल एक्टिविटी करने की छूट मिलती है. अगर ऐसा नहीं करते तो नगरनिगम आप के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता है. कई बार सरकार अपनी तरफ से भी आवासीय को व्यावसायिक उपयोग में बदलने का काम करती है.

फ्लैट खरीदने से पहले कर लें सही से जांच

फ्लैट खरीदने से पहले कई महत्त्वपूर्ण कागजात और कानूनी दस्तावेजों की जांच करनी चाहिए जिस से सुनिश्चित हो सके कि संपत्ति कानूनी तौर पर सुरक्षित है. इन में बिक्री विलेख यानी सेल डीड, शीर्षक विलेख टाइटल डीड, एन्कम्ब्रन्स सर्टिफिकेट यानी अदेय प्रमाणपत्र और औक्यूपैंसी सर्टिफिकेट प्रमुख रूप से शामिल हैं. इस के अतिरिक्त, संपत्ति कर की रसीदें देख लें. अगर रेरा कानून लागू है तो देख लें कि जिस जमीन पर अपार्टमैंट बने हैं वह रेरा एपू्रव्ड है या नहीं. इस में सब से महत्त्वपूर्ण सेल डीड होती है. जो फ्लैट के स्वामित्व को बिल्डर से खरीदार को हस्तांतरित करता है. यह सुनिश्चित करें कि यह पंजीकृत है और इस में सभी नियम और शर्तें स्पष्ट रूप से उल्लिखित हैं. टाइटल डीड से यह पता चलता है कि संपत्ति का शीर्षक स्पष्ट है और विक्रेता के पास इसे बेचने का कानूनी अधिकार है.

एन्कम्ब्रन्स सर्टिफिकेट, जिस को अदेय प्रमाणपत्र कहते हैं, यह बताता है कि संपत्ति पर कोई बकाया या कानूनी देनदारी तो नहीं है, जैसे कि कोई ऋण या कानूनी विवाद. औक्यूपैंसी सर्टिफिकेट यह दर्शाता है कि संपत्ति निर्माण के नियमों और विनियमों के अनुसार पूरी हो चुकी है और रहने योग्य है. संपत्ति कर रसीदें बताती हैं कि संपत्ति कर का भुगतान कर दिया गया है. अगर जमीन रेरा पंजीकरण में आती है तो यह देख लें कि संपत्ति रेरा के तहत पंजीकृत है, यह सुनिश्चित करें कि बिल्डर ने पंजीकरण कराया है और परियोजना रेरा नियमों के आधार पर ही बनी है.

यदि आवश्यक हो तो विभिन्न सरकारी विभागों जैसे नगरनिगम, पानी और बिजली विभाग से एनओसी प्राप्त करें. इस के अतिरिक्त, आप को बिल्डर के साथ डैवलपमैंट एग्रीमैंट, पावर औफ अटौर्नी और अन्य जरूरी दस्तावेजों की भी जांच करनी चाहिए.

रेरा क्या है

रियल एस्टेट विनियमन एवं विकास अधिनियम 2016 को रेरा कहा जाता है. रियल एस्टेट रैगुलेटरी अथौरिटी भारत में रियल एस्टेट क्षेत्र की निगरानी करता है. घर खरीदारों के हितों को बढ़ावा देने और इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए रेरा अधिनियम लागू किया गया है. यह आवासीय योजनाओं को बनाने वाले बिल्डर्स और घर खरीदने वाले ग्राहकों के बीच के विवादों को हल करने का काम करता है. इसलिए अगर किसी बिल्डर्स से अपार्टमैंट खरीद रहे हैं तो यह जरूर देखें कि वह परियोजना रेरा द्वारा स्वीकृत है या नहीं.

कुछ राज्यों को छोड़ कर भारत के लगभग सभी राज्यों ने अपने यहां रियल एस्टेट क्षेत्र को विनियमित करने के लिए राज्य रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण स्थापित कर लिए हैं. यूपी रेरा, रेरा गुजरात, रेरा कर्नाटक, रेरा राजस्थान और रेरा महाराष्ट्र जैसे कई हैं. घर खरीदारों और डैवलपर्स के बीच झगड़े और विवादों की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए इस को बनाया गया था. इस के तहत 500 वर्ग मीटर से ज्यादा क्षेत्रफल वाली सभी रियल एस्टेट परियोजनाओं को रेरा प्राधिकरणों के पास पंजीकृत होना अनिवार्य है. इस के अलावा ऐसे प्रत्येक बिल्डर को फ्लैट के खरीदार को निर्माण की प्रगति की जानकारी देनी होगी. समय सीमा का पालन करना होगा.

रेरा अधिनियम 2016 लागू होने के बाद भारत के रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आई है. रियल एस्टेट डैवलपर्स के लिए किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले राज्य रेरा में पंजीकरण कराना अनिवार्य है, इसलिए भ्रामक दावों की घटनाओं में कमी आई है. रेरा अधिनियम ने राज्यवार नियामक निकायों की स्थापना को अनिवार्य बना दिया है जो प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में रियल एस्टेट विकास पर नजर रखते हैं.

परियोजनाओं में देरी करने या अधिनियम का पालन न करने वाले डैवलपर्स पर जुर्माना लगा कर घर खरीदारों के हितों की रक्षा की जाती है.

घर बनाने से पहले नक्शा पास कराना जरूरी

जब आप अपनी खरीदी जमीन पर मकान बनवाते हैं तो पहले मकान का नक्शा सरकारी विभाग, जैसे शहर में हैं तो वहां के विकास प्राधिकरण और अगर शहरी सीमा से बाहर है तो जिला पंचायत से मकान का नक्शा पास कराना जरूरी होता है. यह नक्शा उत्तर प्रदेश आवास भवन निर्माण एवं विकास उपविधि 2008, जिस को 2025 में संशोधित किया गया है, के अनुसार पास कराया जाता है. नक्शा पहले आर्किटैक्ट से बनवाना पड़ता है. नक्शा बनवाने के लिए पैसा देना पड़ता है.

इस के बाद नक्शा विकास प्राधिकरण, नगरनिगम या फिर जिला पंचायत के औफिस में जमा करना पड़ता है. इस का निर्धारित शुल्क है. इस के बाद इंजीनियर नक्शा पास करते हैं. नक्शा पास कराने के बाद ही मकान बनाने की अनुमति दी जाती है. इस में भ्रष्टाचार खूब होता है. नक्शा पास करने के नाम पर मनमानी की जाती है.

उत्तर प्रदेश में सरकार ने भवन निर्माण से जुड़ी परेशानियों से राहत देने के लिए उत्तर प्रदेश आवास भवन निर्माण एवं विकास उपविधि 2008 में बदलावों को मंजूरी दी है. जिस से अब 1,000 वर्ग फुट तक के प्लौट पर मकान बनाने के लिए नक्शा पास कराना जरूरी नहीं होगा. इस के अतिरिक्त 5,000 वर्ग फुट तक के प्लौट के लिए सिर्फ आर्किटैक्ट का प्रमाणपत्र ही पर्याप्त होगा. इस के तहत पहले जहां अपार्टमैंट के लिए 2,000 वर्गमीटर प्लौट अनिवार्य था, अब 1,000 वर्गमीटर में भी अपार्टमैंट निर्माण की अनुमति मिल सकेगी. साथ ही, अस्पताल और कमर्शियल बिल्डिंग के लिए 3,000 वर्गमीटर पर्याप्त होगा.

अब घर से ही प्रोफैशनल सर्विसेस चलाने का नियम बना दिया गया है. इस के तहत 25 फीसदी हिस्से में नर्सरी, क्रेच, होम स्टे या फिर वकील, डाक्टर, आर्किटैक्ट, आईटी जैसे प्रोफैशनल्स अपने दफ्तर चला सकेंगे. इस के लिए नक्शे में अलग से उल्लेख करना जरूरी नहीं होगा.

रिहायशी इलाकों में 24 मीटर या उस से चौड़ी सड़क वाले क्षेत्रों में दुकानें और दफ्तर खोले जा सकेंगे. इस के साथ ही वकील, डाक्टर जैसे प्रोफैशनल्स कम चौड़ाई वाली सड़कों पर भी अपने औफिस खोल सकते हैं. 45 मीटर चौड़ी सड़क पर किसी भी ऊंचाई की इमारत बनाने की इजाजत मिलेगी. वहीं, फ्लोर एरिया रेशियो अब तीनगुना तक बढ़ा दिया गया है.

इस तरह से जब मकान बनवाने, फ्लैट खरीदने जा रहे हैं तो उस से जुड़े कानूनी पहलुओं को समझ लें. उन की जानकारी वकीलों द्वारा मिल सकती है. इस के अलावा पत्रपत्रिकाओं और किताबों में यह छपती रहती है. वहां से पता कर सकते हैं. किसी भी लैवल पर किसी भी तरह की शंका का समाधान जरूरी होता है, तभी आप कानूनी पचड़ों से बच सकते हैं.  Property Purchase

Diamond Value : हीरा कीमती क्यों

Diamond Value : दुनियाभर में हीरे की मांग तेजी से बढ़ रही है. इसे स्टाइल और स्टेटस सिंबल शुरू से ही माना जाता था. अब आम स्वीकार्यता बढ़ने लगी है. महिलाएं इस की चमक के आगे सोने को भी फीका समझने लगी हैं.

अपने प्लौट पर घर बनवाने के चक्कर में अनुज की सारी बचत लगभग खत्म होने को थी. अभी सैकंड फ्लोर पर टाइल्स और वुड का सारा काम बचा हुआ था. फिर छत भी पड़नी थी. अनुज कर्ज नहीं लेना चाहता था. उस ने पत्नी के कुछ गहने बेचने की बात सोची. मगर अंजलि तो यह सुनते ही बिफर गई, ‘मैं अपने गहने हरगिज नहीं दूंगी.’

‘अच्छा, तुम अपने मत दो मगर अम्मा का वह नैकलेस-टौप्स ही निकाल दो जो हीरे का है,’ अनुज ने मनुहार की.

‘उन की तरफ तो तुम आंख उठा कर भी नहीं देखना. एक वही सैट तो है जिस को पहन कर लगता है कि हमारा भी समाज में कुछ स्टेटस है. वरना ये सोने के गहने तो हर किसी के पास हैं. तुम से तो उम्मीद नहीं कि तुम मुझे कभी वैसा हीरे का हार बनवा कर दोगे. जो है, वह भी बेच डालो,’ गुस्से से उलाहना देती अंजलि पैर पटकते हुए दूसरे कमरे में चली गई.

अंजलि ने गहने देने से साफ इनकार कर दिया तो अनुज मायूस हो गया. मरता क्या न करता, आखिर में उसे अपने बड़े भाई से 5 लाख रुपए उधार लेने पड़े. अगर अंजलि वह हीरे का हार और टौप्स दे देती तो वे कम से कम 8 लाख रुपए के बिक जाते. पुराने पुश्तैनी जेवर हैं, जिन में 10 बड़े हीरों के साथसाथ 4 लाल भी जड़े हैं. मगर अंजलि उस सैट को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करती है.

अंजलि की बात भी सही है. हीरे के जेवर सोने से ज्यादा कीमती होते हैं. इन से लोगों को आप का स्टेटस भी पता चलता है. हीरे का जेवर पहन कर कोई भी महिला खुद को गौरवान्वित महसूस करती है. हीरा सिर्फ एक आभूषण ही नहीं होता, बल्कि यह प्रतिष्ठा, सौंदर्य और आत्मविश्वास का भी प्रतीक माना जाता है. जब कोई महिला हीरा धारण करती है तो वह अपने व्यक्तित्व में एक अलग ही चमक महसूस करती है.

हीरे की चमक और दुर्लभता उसे अनमोल बनाती है. यह समृद्धि और शान का प्रतीक तो है ही, हीरा पहनने से महिला को लगता है कि वह भी उतनी ही खास और अनमोल है जितना कि वह रत्न. समाज में हीरे को हमेशा से रौयल्टी और गौरव से जोड़ा गया है, इसलिए इसे धारण करने से आत्मगौरव की भावना खुदबखुद आ जाती है. हीरे का हार किसी औरत के गले में हो तो लोगों की नजरें उस पर से हटती नहीं हैं.

ज्यादातर औरतें सोने की तुलना में हीरे के गहनों को ज्यादा पसंद करती हैं. इस के पीछे कई मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सौंदर्य कारण हैं. हीरे के जेवरों का आकर्षण, चमक और पारदर्शिता उसे सोने से कहीं अधिक आकर्षक बनाती है. हीरे की ‘फायर’ (रंगीन चमक) गहनों को और ग्लैमरस बनाती है. हीरा स्टेटस और लग्जरी का प्रतीक है. इस से आप की संपन्नता झलकती है. पश्चिमी संस्कृति में तो हीरे को ‘फौरएवर’ यानी हमेशा टिकाऊ प्रेम का प्रतीक कहा जाता है. इसलिए ज्यादातर इंगेजमैंट रिंग में हीरा ही जड़ा होता है.

मौडर्न ज्वैलरी डिजाइन में हीरे का इस्तेमाल ज्यादा होता है, जो हर ड्रैस और अवसर के साथ मेल खाता है. सोना कभीकभी ज्यादा पारंपरिक या भारी लग सकता है, जबकि हीरा एलीगेंट और मौडर्न दिखता है.

हीरे के गहने सोने से ज्यादा दुर्लभ और यूनीक लगते हैं. हर हीरा अलग कट, रंग और क्लैरिटी वाला होता है, जो पहनने वाले को खास एहसास देता है. बहुत सी औरतों के लिए हीरा सिर्फ गहना नहीं, बल्कि प्यार, रिश्ते और यादों की निशानी होता है. इंगेजमैंट रिंग या एनिवर्सरी गिफ्ट के तौर पर हीरा मिलने पर वे खुशी से झुम उठती हैं. औरतें पार्टियों में ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा में पहनने के लिए भी हीरे को ज्यादा ग्लैमरस मानती हैं. सोना ‘सेफ्टी’ है, लेकिन हीरा ‘ब्यूटी और स्टेटस’ का प्रतीक है.

सोना निवेश के लिहाज से बेहतर है क्योंकि वह आसानी से बेचा जा सकता है और उस की कीमत अलगअलग दुकानों पर अलगअलग नहीं होती, जबकि हीरे को हर दुकानदार अपने हिसाब से परख कर उस की कीमत लगाता है.

असली हीरे की क्या पहचान है

हीरे की पहचान करना आसान नहीं होता, क्योंकि नकली हीरे जैसे क्यूबिक जरिकोनिया, अमेरिकन डायमंड, मोइसानाइट बिलकुल असली जैसे दिखते हैं. लेकिन कुछ परखने के तरीके हैं जिन से असली और नकली में फर्क समझ जा सकता है. सच्चे हीरे की पहचान उस की कठोरता से होती है.

हीरा दुनिया का सब से कठोर प्राकृतिक खनिज है. यह कांच, स्टील या धातु को भी आसानी से खुरच सकता है. नकली हीरे इतने कठोर नहीं होते हैं. इस के अलावा असली हीरा सफेद और रंगीन रोशनी को बहुत तीव्रता से परावर्तित करता है. नकली हीरे में यह चमक कम होती है या ज्यादा इंद्रधनुषी दिखाई देती है.

फौग टैस्ट से भी असली और नकली हीरे की पहचान की जाती है. असली हीरे पर सांस छोड़ने पर धुंध यानी फौग टिकती नहीं है, वह तुरंत गायब हो जाती है, जबकि नकली हीरे पर यह धुंध कुछ सैकंड तक टिकी रहती है. पानी में डाल कर भी हीरे की पहचान की जाती है. असली हीरा बहुत डैंस यानी घना होता है और पानी में डालने पर तुरंत नीचे डूब जाता है, जबकि नकली हीरा कई बार तैरता रहता है या धीरेधीरे नीचे बैठता है.

असली हीरे में हलकीफुलकी प्राकृतिक खामियां होती हैं, जबकि नकली हीरा बिलकुल साफ और एकदम परफैक्ट दिखता है. असली हीरे को कागज या अखबार पर रखने से शब्द साफ नहीं दिखते जबकि नकली हीरे से शब्द या अक्षर साफ दिखाई दे जाते हैं. वहीं असली हीरा बहुत ज्यादा गरम होने पर भी नहीं टूटता, जबकि नकली हीरा अचानक गरम करने पर टूट सकता है.

ये तो सब हीरे की परख के घरेलू तरीके हैं मगर सब से भरोसेमंद तरीका है जीआईए (जेमोलौजिकल इंस्टिट्यूट औफ अमेरिका) या आईजीआई जैसी अंतर्राराष्ट्रीय संस्था का सर्टिफिकेट लेना. साधारण परख घर पर हो सकती है, लेकिन असलीनकली का 100 फीसदी प्रमाण केवल जेमोलौजिस्ट या लैब टैस्ट से ही मिलता है.

बहुमूल्य हीरा कोहेनूर

सर्वविदित है कि कोहेनूर हीरा दुनिया के सब से मशहूर और बहुमूल्य हीरों में गिना जाता है. इस का इतिहास लगभग 800 साल पुराना माना जाता है. समयसमय पर यह हीरा अलगअलग शासकों और साम्राज्यों के हाथों में रहा और आखिरकार ब्रिटेन पहुंच गया. इस के कीमती होने के पीछे सिर्फ इस का आकार या चमक ही कारण नहीं है, बल्कि कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक पहलू भी जुड़े हुए हैं.

कोहेनूर अपने समय में दुनिया का सब से बड़ा हीरा था. इस का वजन मूलरूप से लगभग 793 कैरेट था, मगर काटने और पौलिशिंग के बाद यह अब करीब 105.6 कैरेट ही रह गया है. कोहेनूर की चमक और पारदर्शिता अद्वितीय मानी जाती है.

कोहेनूर हीरा भारत की खान से निकला और प्राचीन काल से ही शाही खजानों का हिस्सा रहा. यह कई राजवंशों, जैसे- मुगल, फारसी, अफगान, सिख, ब्रिटिश के हाथों से गुजरा और हर शासक इसे शक्ति और समृद्धि का प्रतीक मानता था.

कोहेनूर हीरे की यात्रा

13वीं शताब्दी (लगभग 1200:1300) में कोहेनूर हीरा काकतीय वंश (आंध्र प्रदेश, भारत) के काकतीय मंदिर (वारंगल के श्रीरामलिंगेश्वर मंदिर) में देवीदेवताओं के मुकुट में जड़ा हुआ था. इसे उस समय ‘राजा का रत्न’ कहा जाता था. 14वीं शताब्दी (1323) में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने वारंगल पर आक्रमण किया और कोहेनूर अपने कब्जे में लिया.

16वीं शताब्दी (1526) में यह हीरा मुगल सम्राट बाबर के पास पहुंचा. बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में इस हीरे का उल्लेख किया है. इस के बाद यह हीरा मुगलों की शाही धरोहर बन गया और शाहजहां ने इसे अपने मयूर सिंहासन में जड़वाया.

वर्ष 1739 में जब फारस (ईरान) के शासक नादिर शाह ने भारत पर आक्रमण किया तब वह मयूर सिंहासन समेत कोहेनूर को लूट कर ईरान ले गया. नादिर शाह ने ही इस का नाम रखा ‘कोह-ए-नूर’ यानी ‘प्रकाश का पर्वत’. 1747:1751 में नादिर शाह की हत्या के बाद यह हीरा उस के सेनापति अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी वंश, अफगानिस्तान) के पास पहुंचा. बाद में कोहेनूर हीरा अब्दाली के वंशज शुजा शाह दुर्रानी के पास आ गया.

19वीं शताब्दी की शुरुआत में अफगानिस्तान में राजनीतिक संघर्ष के दौरान शुजा शाह को लाहौर भागना पड़ा और उस ने यह हीरा 1813 में सिख साम्राज्य के महाराजा रणजीत सिंह को सौंप दिया. रणजीत सिंह ने इसे सिख साम्राज्य का शाही खजाना बना दिया.

दलीप सिंह पंजाब के अंतिम सिख महाराजा थे जिन के पास कोहेनूर हीरा था, जिन्हें 10 साल की उम्र में जबरन कोहेनूर अंगरेजों को देने के लिए फोर्स किया गया था.

1849 में प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध और द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब पर कब्जा कर लिया. तब लाहौर संधि 1849 के तहत कोहेनूर हीरा ब्रिटिशों के हवाले कर दिया गया. 1850 में महारानी विक्टोरिया के आदेश पर कोहेनूर हीरा इंगलैंड ले जाया गया और इसे महारानी विक्टोरिया के मुकुट में जड़ दिया गया.

आज भी कोहेनूर हीरा ब्रिटिश शाही परिवार के मुकुट में जड़ा हुआ है. इसे लंदन के टावर औफ लंदन में सुरक्षित रखा गया है.

आगे का अंश बौक्स के बाद 

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भारत में हीरा कारोबार

भारत दुनिया के सब से बड़े हीरा व्यापारिक केंद्रों में से एक माना जाता है. भारत दुनिया का पहला देश था जहां से प्राकृतिक हीरों की खोज हुई. प्राचीन गोलकुंडा खान, आंध्र प्रदेश में पहली बार हीरा प्राप्त हुआ. कोहेनूर, दरिया ए नूर जैसे ऐतिहासिक हीरे भारत से ही निकले. मुगल काल से हीरा व्यापार दुनियाभर में फैला.

भारत आज कच्चे हीरों का सब से बड़ा काटछांट (कटिंग एंड पौलिशिंग) केंद्र है. विश्व के लगभग 90 फीसदी हीरे भारत में कट और पौलिश किए जाते हैं. सूरत (गुजरात) हीरा उद्योग की राजधानी है. यहां लाखों कारीगर कटिंग एंड पौलिशिंग में लगे हैं. मुंबई में हीरों का मुख्य व्यापारिक हब है. यहां भारत डायमंड बोर्स : दुनिया की सब से बड़ी डायमंड ट्रेडिंग बिल्ंिडग है.

भारतीय हीरा उद्योग का आकार लगभग 35:40 अरब अमेरिकी डौलर का है. यह भारत के कुल रत्न और आभूषण निर्यात का लगभग 70 फीसदी हिस्सा बनाता है. इस क्षेत्र में करीब 10 लाख से ज्यादा लोग रोजगार पाए हुए हैं.

भारत कच्चे हीरे मुख्य रूप से अफ्रीका, रूस, कनाडा जैसे देशों से आयात करता है. कटे और पौलिश किए हीरे अमेरिका, यूरोप, चीन, हौंगकौंग और यूएई को निर्यात होते हैं. अमेरिका भारत के हीरों का सब से बड़ा खरीदार है.

रूसयूक्रेन युद्ध के बाद रूस से हीरों की सप्लाई काफी प्रभावित हुई है. चीन और अन्य देशों की प्रतिस्पर्धा और हीरों की प्रामाणिकता (सिंथेटिक/लैब-ग्रोन डायमंड्स) आज हमारे सामने एक बड़ी चुनौती हैं.

लैब ग्रोन डायमंड्स में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है. सरकार इस क्षेत्र को प्रोत्साहन देने के लिए पीएलआई स्कीम और टैक्स रियायतें दे रही है. मगर क्रिसिल के विश्लेषण के अनुसार, नए अमेरिकी टैरिफ्स (25 फीसदी और बाद में 50 फीसदी) की वजह से भारत के पौलिश्ड डायमंड एक्सपोर्ट में 20:25 फीसदी की गिरावट की संभावना है, जिस से मार्जिन्स पर भी दबाव आएगा.

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हीरे और सोने की तुलना

सोना और हीरा दोनों ही बहुमूल्य रत्न/धातु माने जाते हैं, लेकिन उन की कीमत तय करने के मानदंड अलगअलग होते हैं. सोने की कीमत वजन (ग्राम/तोला/औंस) के हिसाब से तय होती है और यह अंतर्राष्ट्रीय बाजार (लंदन बुलियन मार्केट) और मांग-आपूर्ति पर निर्भर करता है. जैसे अगस्त 2025 में भारत में सोने की कीमत लगभग 10,090 रुपए प्रति ग्राम (24 कैरेट) है. वहीं हीरे की कीमत वजन से नहीं, बल्कि 4सी नियम: कट, क्लैरिटी, कलर, कैरेट वेट से तय होती है. 1 कैरेट (लगभग 0.2 ग्राम) हीरे की कीमत कुछ हजार रुपए से ले कर कई लाख रुपए या करोड़ों तक हो सकती है. उदाहरण के तौर पर 1 कैरेट का साधारण हीरे का मूल्य 70,000 रुपए से ले कर 1.5 लाख रुपए तक हो सकता है. 1 कैरेट का उच्च गुणवत्ता वाला हीरा 10 लाख रुपए से भी अधिक मूल्य का हो सकता है.

अगर सिर्फ वजन के हिसाब से तुलना करें तो 1 ग्राम सोना 7,000 रुपए का है तो वहीं 1 ग्राम हीरा (यानी लगभग 5 कैरेट) की कीमत 3 से 50 लाख रुपए तक हो सकती है. यह दाम उस की क्वालिटी को देख कर निकाला जाता है. मतलब, सामान्यतौर पर हीरा सोने से कई सौ गुना ज्यादा महंगा होता है.

सोना हमेशा लिक्विड एसेट (आसानी से खरीदा-बेचा जाने वाला) है, जबकि हीरे का पुनर्विक्रय मूल्य (रीसेल वैल्यू) उतना स्थिर नहीं होता. परंतु 1 कैरेट हीरा, भले ही वह निम्न गुणवत्ता वाला हो, सोने से लगभग 20:100 गुना महंगा होता है.

हीरा बनता कैसे है

हीरा वास्तव में शुद्ध कार्बन का क्रिस्टलीय रूप है. जैसे पैंसिल में इस्तेमाल होने वाला ग्रेफाइट भी कार्बन से बना होता है, वैसे ही हीरा भी कार्बन से ही बनता है. फर्क केवल उन के क्रिस्टल स्ट्रक्चर का है. हीरा बनने की प्रक्रिया बहुत ही अद्भुत और वैज्ञानिक है. यह धरती की गहराई में लाखोंकरोड़ों सालों में बनता है. हीरा धरती की सतह से लगभग 140:200 किलोमीटर गहराई में बनता है, जहां पर तापमान लगभग 1000:1200 डिग्री सैंटिग्रेड और दबाव 45:60 किलोबार (यानी लाखों गुना ज्यादा) होता है. इतनी ऊंची गरमी और दबाव के कारण कार्बन अणु एक खास तरीके से टेट्राहेड्रल संरचना में जम जाते हैं, जिस से हीरे का कठोर क्रिस्टल बनता है.

हीरे बनने के बाद वे धरती की गहराई में लाखों वर्षों तक रहे. लाखों साल पहले ज्वालामुखी विस्फोट हुए जिन्होंने इन हीरों को सतह तक पहुंचाया. यह ज्वालामुखी विशेष प्रकार की चट्टानों के साथ हीरों को भी ऊपर ले आया. आज हीरे अनेक खदानों में पाए जाते हैं.  Diamond Value

Hindi Love Stories : कुछ कहना था तुम से – 10 साल बाद सौरव को क्यों आई वैदेही की याद ?

Hindi Love Stories : वैदेही का मन बहुत अशांत हो उठा था. अचानक 10 साल बाद सौरव का ईमेल पढ़ बहुत बेचैनी महसूस कर रही थी. वह न चाहते हुए भी सौरव के बारे में सोचने को मजबूर हो गई कि क्यों मुझे बिना कुछ कहे छोड़ गया था? कहता था कि तुम्हारे लिए चांदतारे तो नहीं ला सकता पर अपनी जान दे सकता है पर वह भी नहीं कर सकता, क्योंकि मेरी जान तुम में बसी है. वैदेही हंस कर कहती थी कि कितने झूठे हो तुम… डरपोक कहीं के. आज भी इस बात को सोच कर वैदेही के चेहरे पर हलकी सी मुसकान आ गई थी पर दूसरे ही क्षण गुस्से के भाव से पूरा चेहरा लाल हो गया था. फिर वही सवाल कि क्यों वह मुझे छोड़ गया था? आज क्यों याद कर मुझे ईमेल किया है?

वैदेही ने मेल खोल पढ़ा. सौरव ने केवल 2 लाइनें लिखी थीं, ‘‘आई एम कमिंग टू सिंगापुर टुमारो, प्लीज कम ऐंड सी मी… विल अपडेट यू द टाइम. गिव मी योर नंबर विल कौल यू.’’

यह पढ़ बेचैन थी. सोच रही थी कि नंबर दे या नहीं. क्या इतने सालों बाद मिलना ठीक रहेगा? इन 10 सालों में क्यों कभी उस ने मुझ से मिलने या बात करने की कोशिश नहीं की? कभी मेरा हालचाल भी नहीं पूछा. मैं मर गई हूं या जिंदा हूं… कुछ भी तो जानने की कोशिश नहीं की. फिर क्यों वापस आया है? सवाल तो कई थे पर जवाब एक भी नहीं था.

जाने क्या सोच कर अपना नंबर लिख भेजा. फिर आराम से कुरसी पर बैठ कर सौरव से हुई पहली मुलाकात के बारे में सोचने लगी…

10 साल पहले ‘फोरम द शौपिंग मौल’ के सामने और्चर्ड रोड पर एक ऐक्सीडैंट में वैदेही सड़क पर पड़ी थी. कोई कार से टक्कर मार गया था. ट्रैफिक जाम हो गया था. कोई मदद के लिए सामने नहीं आ रहा था. किसी सिंगापोरियन ने हैल्पलाइन में फोन कर सूचना दे दी थी कि फलां रोड पर ऐक्सीडैंट हो गया है, ऐंबुलैंस नीडेड.

वैदेही के पैरों से खून तेजी से बह रहा था. वह रोड पर हैल्प… हैल्प चिल्ला रही थी, पर कोई मदद के लिए आगे नहीं आ रहा था. उसी ट्रैफिक जाम में सौरव भी फंसा था. न जाने क्या सोच वह मदद के लिए आगे आया और फिर वैदेही को अपनी ब्रैंड न्यू स्पोर्ट्स कार में हौस्पिटल ले गया.

वैदेही हलकी बेहोशी में थी. सौरव का उसे अपनी गोद में उठा कर कार तक ले जाना ही याद था. उस के बाद तो वह पूरी बेहोश हो गई थी. पर आज भी उस की वह लैमन यलो टीशर्ट उसे अच्छी तरह याद थी. वैदेही की मदद करने के ऐवज में उसे कितने ही चक्कर पुलिस के काटने पड़े थे. विदेश के अपने पचड़े हैं. कोई किसी

की मदद नहीं करता खासकर प्रवासियों की. फिर भी एक भारतीय होने का फर्ज निभाया था. यही बात तो दिल को छू गई थी उस की. कुछ अजीब और पागल सा था. जब जो उस के मन में आता था कर लिया करता था. 4 घंटे बाद जब वैदेही होश में आई थी तब भी वह उस के सिरहाने ही बैठा था. ऐक्सीडैंट में वैदेही की एक टांग में फ्रैक्चर हो गया था, मोबाइल भी टूट गया था. सौरव उस के होश में आने का इंतजार कर रहा था ताकि उस से किसी अपने का नंबर ले इन्फौर्म कर सके.

होश में आने पर वैदेही ने ही उसे अच्छी तरह पहली बार देखा था. देखने में कुछ खास तो नहीं था पर फिर भी कुछ तो अलग बात थी.

कुछ सवाल करती उस से पहले ही उस ने कहा, ‘‘अच्छा हुआ आप होश में आ गईं वरना तो आप के साथ मुझे भी हौस्पिटल में रात काटनी पड़ती. खैर, आई एम सौरव.’’

सौरव के तेवर देख वैदेही ने उसे थैंक्यू नहीं कहा.

वैदेही से उस ने परिवार के किसी मैंबर का नंबर मांगा. मां का फोन नंबर देने पर सौरव ने अपने फोन से उन का नंबर मिला कर उन्हें वैदेही के विषय में सारी जानकारी दे दी. फिर हौस्पिटल से चला गया. न बाय बोला न कुछ. अत: वैदेही ने मन ही मन उस का नाम खड़ूस रख दिया.

उस मुलाकात के बाद तो मिलने की उम्मीद भी नहीं थी. न उस ने वैदेही का नंबर लिया था न ही वैदेही ने उस का. उस के जाते ही वैदेही की मां और बाबा हौस्पिटल आ पहुंचे थे. वैदेही ने मां और बाबा को ऐक्सीडैंट का सारा ब्योरा दिया और बताया कैसे सौरव ने उस की मदद की.

2 दिन हौस्पिटल में ही बीते थे.

ऐसी तो पहली मुलाकात थी वैदेही और सौरव की. कितनी अजीब सी… वैदेही सोचसोच मुसकरा रही थी. सोच तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. सौरव के ईमेल ने वैदेही के पुराने सारे मीठे और दर्द भरे पलों को हरा कर दिया था.

ऐक्सीडैंट के बाद पंद्रह दिन का बैडरेस्ट लेने को कहा गया

था. नईनई नौकरी भी जौइन की थी तब वैदेही ने. घर पहुंच वैदेही ने सोचा औफिस में इन्फौर्म कर दे. मोबाइल खोज रही थी तभी याद आया मोबाइल तो हौस्पिटल में सौरव के हाथ में था और शायद अफरातफरी में उस ने उसे लौटाया नहीं था. पर इन्फौर्म तो कर ही सकता था. उफ, सारे कौंटैक्ट नंबर्स भी गए. वैदेही चिल्ला उठी थी. तब अचानक याद आया कि उस ने अपने फोन से मां को फोन किया था. मां के मोबाइल में कौल्स चैक की तो नंबर मिल गया.

तुरंत नंबर मिला अपना इंट्रोडक्शन देते हुए उस ने सौरव से मोबाइल लौटाने का आग्रह किया. तब सौरव ने तपाक से कहा, ‘‘फ्री में नहीं लौटाऊंगा. खाना खिलाना होगा… कल शाम तुम्हारे घर आऊंगा… एड्रैस बताओ.’’

वैदेही के तो होश ही उड़ गए. मन में सोचने लगी कैसा अजीब प्राणी है यह. पर मोबाइल तो चाहिए ही था. अत: एड्रैस दे दिया.

अगले दिन शाम को महाराज हाजिर भी हो गए थे. सारे घर वालों को सैल्फ इंट्रोडक्शन भी दे दिया और ऐसे घुलमिल गया जैसे सालों से हम सब से जानपहचान हो. वैदेही ये सब देख हैरान भी थी और कहीं न कहीं एक अजीब सी फीलिंग भी हो रही थी. बहुत मिलनसार स्वभाव था. मां, बाबा और वैदेही की छोटी बहन तो उस की तारीफ करते नहीं थक रहे थे. थकते भी क्यों उस का स्वभाव, हावभाव सब कितना अलग और प्रभावपूर्ण था. वैदेही उस के साथ बहती चली जा रही थी.

वह सिंगापुर में अकेला रहता था. एक कार डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी में मैनेजर था. तभी आए दिन उसे नई कार का टैस्ट ड्राइव करने का मौका मिलता रहता था. जिस दिन उस ने वैदेही की मदद की थी उस दिन भी न्यू स्पोर्ट्स कार की टैस्ट ड्राइव पर था. उस के मातापिता इंडिया में रहते थे.

इस दौरान अच्छी दोस्ती हो गई थी. रोज आनाजाना होने लगा था. वैदेही के परिवार के सभी लोग उसे पसंद करते थे. धीरेधीरे उस ने वैदेही के दिल में खास जगह बना ली. उस के साथ जब होती थी तो लगता था ये पल यहीं थम जाएं. वैदेही को भी यह एहसास हो चला था कि सौरव के दिल में भी उस के लिए खास फीलिंग्स हैं. मगर अभी तक उस ने वैदेही से अपनी फीलिंग्स कही नहीं थीं.

15 दिन बाद वैदेही ने औफिस जौइन कर लिया. सौरव और वैदेही का औफिस और्चर्ड रोड पर ही था. सौरव अकसर वैदेही को औफिस से घर छोड़ने आता था. फ्रैक्चर होने की वजह से

6 महीने केयर करनी ही थी. वैदेही को उस का लिफ्ट देना अच्छा लगता था.

आज भी वैदेही को याद है सौरव ने उसे

2 महीने के बाद उस के 22वें बर्थडे पर प्रपोज किया था. औसतन लोग अपनी प्रेमिका को गुलदस्ता या चौकलेट अथवा रिंग के साथ प्रपोज करते हैं, पर उस ने वैदेही के हाथों में एक कार का छोटा सा मौडल रखते हुए कहा कि क्या तुम अपनी पूरी जिंदगी का सफर मेरे साथ तय करना चाहोगी? कितना पागलपन और दीवानगी थी उस की बातों में. वैदेही उसे समझने में असमर्थ थी. यह कहतेकहते सौरव उस के बिलकुल नजदीक आ गया और वैदेही का चेहरा अपने हाथों में थामते हुए उस के होंठों को अपने होंठों से छूते हुए दोनों की सांसें एक हो चली थीं. वैदेही का दिल जोर से धड़क रहा था. खुद को संभालते हुए वह सौरव से अलग हुई. दोनों के बीच एक अजीब मीठी सी मुसकराहट ने अपनी जगह बना ली थी.

कुछ देर तो वैदेही वहीं बुत की तरह खड़ी रही थी. जब उस ने वैदेही का उत्तर जानने की उत्सुकता जताई तो वैदेही ने कहा था कि अगले दिन ‘गार्डन बाय द वे’ में मिलेंगे. वहीं वह अपना जवाब उसे देगी.

उस रात वैदेही एक पल भी नहीं सोई थी. कई विषयों पर सोच रही थी जैसे कैरियर, आगे की पढ़ाई और न जाने कितने खयाल. नींद आती भी कैसे, मन में बवंडर जो उठा था. तब वैदेही मात्र 22 साल की ही तो थी और इतनी जल्दी शादी भी नहीं करना चाहती थी. सौरव भी केवल 25 वर्ष का था. पर वैदेही उसे यह बताना भी चाहती थी कि उस से बेइंतहा मुहब्बत हो गई है और जिंदगी का पूरा सफर उस के साथ ही बिताना चाहती है. बस कुछ समय चाहिए था उसे. पर यह बात वैदेही के मन में ही रह गई थी. कभी इसे बोल नहीं पाई.

अगले दिन वैदेही ठीक शाम 5 बजे ‘गार्डन बाय द वे’ में पहुंच गई. वहां पहुंच कर उस ने सौरव को फोन मिलाया तो फोन औफ आ रहा था. उस का इंतजार करने वह वहीं बैठ गई. आधे घंटे बाद फिर फोन मिलाया तब भी फोन औफ ही आ रहा था. वैदेही परेशान हो उठी. पर फिर सोचा कहीं औफिस में कोई जरूरी मीटिंग में न फंस गया हो. वहीं उस का इंतजार करती रही. इंतजार करतेकरते रात के 8 बजे गए, पर वह नहीं आया और उस के बाद उस का फोन भी कभी औन नहीं मिला.

2 साल तक वैदेही उस का इंतजार करती रही पर कभी उस ने उसे एक बार भी फोन नहीं किया. 2 साल बाद मांबाबा की मरजी से आदित्य से वैदेही की शादी हो गई. आदित्य औडिटिंग कंपनी चलाता था. उस के मातापिता सिंगापुर में उस के साथ ही रहते थे.

शादी के बाद कितने साल लगे थे वैदेही को सौरव को भूलने में पर पूरी तरह भूल नहीं पाई थी. कहीं न कहीं किसी मोड़ पर उसे सौरव की याद आ ही जाती थी. आज अचानक क्यों आया है और क्या चाहता है?

वैदेही की सोच की कड़ी को अचानक फोन की घंटी ने तोड़ा. एक अनजान नंबर था. दिल की धड़कनें तेज हो चली थीं. वैदेही को लग रहा था हो न हो सौरव का ही होगा. एक आवेग सा महसूस कर रही थी. कौल रिसीव करते हुए हैलो कहा तो दूसरी ओर सौरव ही था. उस ने अपनी भारी आवाज में ‘हैलो इज दैट वैदेही?’ इतने सालों के बाद भी सौरव की आवाज वैदेही के कानों से होते हुए पूरे शरीर को झंकृत कर रही थी.

स्वयं को संभालते हुए वैदेही ने कहा, ‘‘यस दिस इज वैदेही,’’ न पहचानने का नाटक करते हुए कहा, ‘‘मे आई नो हू इज टौकिंग?’’

सौरव ने अपने अंदाज में कहा, ‘‘यार, तुम मुझे कैसे भूल सकती हो? मैं सौरव…’’

‘‘ओह,’’ वैदेही ने कहा.

‘‘क्या कल तुम मुझ से मरीना वे सैंड्स होटल के रूफ टौप रैस्टोरैंट पर मिलने आ सकती  हो? शाम 5 बजे.’’

कुछ सोचते हुए वैदेही ने कहा, ‘‘हां, तुम से मिलना तो है ही. कल शाम को आ जाऊंगी,’’ कह फोन काट दिया.

अगर ज्यादा बात करती तो उस का रोष सौरव को फोन पर ही सहना पड़ता. वैदेही के दिमाग में कितनी हलचल थी, इस का अंदाजा लगाना मुश्किल था. यह सौरव के लिए उस का प्यार था या नफरत? मिलने का उत्साह था या असमंजसता? एक मिलाजुला भावों का मिश्रण जिस की तीव्रता सिर्फ वैदेही ही महसूस कर सकती थी.

अगले दिन सौरव से मिलने जाने के लिए जब वैदेही तैयार हो रही थी, तभी आदित्य कमरे में आया. वैदेही से पूछा, ‘‘कहां जा रही हो?’’

वैदेही ने कहा, ‘‘सौरव सिंगापुर आया है. वह मुझ से मिलना चाहता है,’’ कह वैदेही चुप हो गई. फिर कुछ सोच आदित्य से पूछा, ‘‘जाऊं या नहीं?’’

आदित्य ने जवाब में कहा, ‘‘हां, जाओ. मिल आओ. डिनर पर मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा,’’ कह वह कमरे से चला गया.

आदित्य ने सौरव के विषय में काफी कुछ सुन रखा था. वह यह जानता था कि सौरव को वैदेही के परिवार वाले बहुत पसंद करते थे… कैसे उस ने वैदेही की मदद की थी. आदित्य खुले विचारों वाला इनसान था.

हलके जामुनी रंग की ड्रैस में वैदेही बहुत खूबसूरत लग रही थी. बालों को

ब्लो ड्राई कर बिलकुल सीधा किया था. सौरव को वैदेही के सीधे बाल बहुत पसंद थे. वैदेही हूबहू वैसे ही तैयार हुई जैसे सौरव को पसंद थी. वैदेही यह समझने में असमर्थ थी कि आखिर वह सौरव की पसंद से क्यों तैयार हुई थी? कभीकभी यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर किसी के होने का हमारे जीवन में इतना असर क्यों आ जाता है. वैदेही भी एक असमंजसता से गुजर रही थी. स्वयं को रोकना चाहती थी पर कदम थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

वैदेही ठीक 5 बजे मरीना बाय सैंड्स के रूफ टौप रैस्टोरैंट में पहुंची. सौरव वहां पहले से इंतजार कर रहा था. वैदेही को देखते ही वह चेयर से खड़ा हो वैदेही की तरफ बढ़ा और उसे गले लगते हुए बोला, ‘‘सो नाइस टू सी यू आफ्टर ए डिकेड. यू आर लुकिंग गौर्जियस.’’

वैदेही अब भी गहरी सोच में डूबी थी. फिर एक हलकी मुसकान के साथ उस ने कहा, ‘‘थैंक्स फार द कौंप्लीमैंट. आई एम सरप्राइज टु सी यू ऐक्चुअली.’’

सौरव भांप गया था वैदेही के कहने का तात्पर्य. उस ने कहा, ‘‘क्या तुम ने अब तक मुझे माफ नहीं किया? मैं जानता हूं तुम से वादा कर के मैं आ न सका. तुम नहीं जानतीं मेरे साथ क्या हुआ था?’’

वैदेही ने कहा, ‘‘10 साल कोई कम तो नहीं होते… माफ कैसे करूं तुम्हें? आज मैं जानना चाहती हूं क्या हुआ था तुम्हारे साथ?’’

सौरव ने कहा, ‘‘तुम्हें याद ही होगा, तुम ने मुझे पार्क में मिलने के लिए बुलाया था. उसी दिन हमारी कंपनी के बौस को पुलिस पकड़ ले गई थी, स्मगलिंग के सिलसिले में. टौप लैवल मैनेजर को भी रिमांड में रखा गया था. हमारे फोन, अकाउंट सब सीज कर दिए गए थे. हालांकि 3 दिन लगातार पूछताछ के बाद, महीनों तक हमें जेल में बंद कर दिया था. 2 साल तक केस चलता रहा. जब तक केस चला बेगुनाहों को भी जेल की रोटियां तोड़नी पड़ीं. आखिर जो लोग बेगुनाह थे उन्हें तुरंत डिपोर्ट कर दिया गया और जिन्हें डिपोर्ट किया गया था उन में मैं भी था. पुलिस की रिमांड में वे दिन कैसे बीते क्या बताऊं तुम्हें…

‘‘आज भी सोचता हूं तो रूह कांप जाती है. किस मुंह से तुम्हारे सामने आता? इसलिए जब मैं इंडिया (मुंबई) पहुंचा तो न मेरे पास कोई मोबाइल था और न ही कौंटैक्ट नंबर्स. मुंबई पहुंचने पर पता चला मां बहुत सीरियस हैं और हौस्पिटलाइज हैं. मेरा मोबाइल औफ होने की वजह से मुझ तक खबर पहुंचाना मुश्किल था. ये सारी चीजें आपस में इतनी उलझी हुई थीं कि उन्हें सुलझाने का वक्त ही नहीं मिला और तो और मां ने मेरी शादी भी तय कर रखी थी. उन्हें उस वक्त कैसे बताता कि मैं अपनी जिंदगी सिंगापुर ही छोड़ आया हूं. उस वक्त मैं ने चुप रहना ही ठीक समझा था.

‘‘और फिर जिंदगी की आपाधापी में उलझता ही चला गया. पर तुम हमेशा याद आती रहीं. हमेशा सोचता था कि तुम क्या सोचती होगी मेरे बारे में, इसलिए तुम से मिल कर तुम्हें सब बताना चाहता था. काश, मैं इतनी हिम्मत पहले दिखा पाता. उस दिन जब हम मिलने वाले थे तब तुम मुझ से कुछ कहना चाहती थीं न… आज बता दो क्या कहना चाहती थीं.’’

वैदेही को यह जान कर इस बात की तसल्ली हुई कि सौरव ने उसे धोखा नहीं दिया. कुदरत ने हमारे रास्ते तय करने थे. फिर बोली, ‘‘वह जो मैं तुम से कहना चाहती उन बातों का अब कोई औचित्य नहीं,’’ वैदेही ने अपने जज्बातों को अपने अंदर ही दफनाने का फैसला कर लिया था.

थोड़ी चुप्पी के बाद एक मुसकराहट के साथ वैदेही ने कहा, ‘‘लैट्स और्डर सम कौफी.’’  Hindi Love Stories

Family Story : कोयले की लकीर – सुगंधा खुश थी या दुखी ?

Family Story : विनी ने सोचा न था जिस पितातुल्य इंसान पर वह विश्वास कर रही है वह इंसान उस विश्वास और सम्मान को एक झटके में समाप्त कर देगा. तो क्या वह अपने छलनी तनमन के साथ हार मान बैठ गई? विनी की प्रसन्नता की सीमा नहीं थी. एमए का रिजल्ट निकल आया था. 80 प्रतिशत मार्क्स आए थे. अपनी मम्मी सुगंधा के लिए उस ने उन की पसंद की मिठाई खरीदी और घर की तरफ उत्साह से कदम बढ़ा दिए. सुगंधा अपनी बेटी की सफलता से अभिभूत हो गईं.

खुशी से आंखें झिलमिला गईं. दोनों मांबेटी एकदूसरे के गले लग गईं. एकदूसरे का मुंह मीठा करवाया. घर में 2 ही तो लोग थे. विनी के पिता आलोक का देहांत हो गया था. सुगंधा सीधीसरल हाउसवाइफ थीं. पति की पैंशन और दुकानों के किराए से घर का खर्च चल जाता था. शाम को वे कुछ ट्यूशंस भी पढ़ाती थीं. विनी ने ड्राइंग ऐंड पेंटिंग में एमए किया था. आलोक को आर्ट्स में विशेष रुचि थी. विनी की ड्राइंग में रुचि देख कर उन्होंने उसे भी इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने को प्रोत्साहित किया था.

विनी शाम को कुछ बच्चों को ड्राइंग सिखाया करती थी. पेंटिंग के सामान का खर्च वह इन्हीं ट्यूशंस से निकाल लेती थी. सुगंधा ने बेटी को गर्वभरी नजरों से देखते हुए उस से पूछा, ‘‘अब आगे क्या इरादा है?’’ फिर विनी के जवाब देने से पहले ही उसे छेड़ने लगी, ‘‘लड़का ढूंढ़ा जाए?’’ विनी ने आंखें तरेरीं, ‘‘नहीं, अभी नहीं, अभी मुझे बहुतकुछ करना है.’’ ‘‘क्या सोचा है?’’ ‘‘पीएचडी करनी है. सोच रही हूं आज ही शेखर सर से मिल आती हूं. उन्हें ही अपना गाइड बनाना चाहती हूं. मां, आप को पता है, उन में मुझे पापा की छवि दिखती है. बस, वे मुझे अपने अंडर में काम करने दें.’’ ‘‘मैं तुम्हारे भविष्य में कोई बाधा नहीं बनूंगी, खूब पढ़ाई करो, आगे बढ़ो.’’ विनी अपनी मां की बांहों में छोटी बच्ची की तरह समा गई. सुगंधा ने भी उसे खूब प्यार किया. सुगंधा को अपनी मेहनती, मेधावी बेटी पर नाज था.

रुड़की के आरपी कालेज में एमए करने के बाद वह अपने प्रोफैसर शेखर के अधीन ही पीएचडी करना चाहती थी. शेखर का बेटा रजत विनी का बहुत अच्छा दोस्त था. बचपन से दोनों साथ पढ़े थे. पर रजत को आर्ट्स में रुचि नहीं थी, वह इंजीनियरिंग कर अब जौब की तलाश में था. दोनों हर सुखदुख बांटते थे, एकदूसरे के घर भी आनाजाना लगा रहता था. इन दोनों की दोस्ती के कारण दोनों परिवारों में भी कभीकभी मुलाकात होती रहती थी. विनी ने रजत को फोन कर अपना रिजल्ट और आगे की इच्छा बताई. रजत बहुत खुश हुआ, ‘‘अरे, यह तो बहुत अच्छा रहेगा. पापा बिलकुल सही गाइड रहेंगे. किसी अंजान प्रोफैसर के साथ काम करने से अच्छा यही रहेगा कि तुम पापा के अंडर में ही काम करो. आज ही आ जाओ घर, पापा से बात कर लो.’’ शाम को ही विनी मिठाई ले कर रजत के घर गई. शेखर के पास कुछ स्टूडैंट्स बैठे थे. विनी का बचपन से ही घर में आनाजाना था. वह निसंकोच अंदर चली गई.

शेखर की पत्नी राधा विनी पर खूब स्नेह लुटाती थी. रजत और राधा के साथ बैठ कर विनी गप्पें मारने लगी. थोड़ी देर में शेखर भी उन के साथ शामिल हो गए. दोनों ने उस की सफलता पर शुभाशीष दिए. उस की पीएचडी की इच्छा जान कर शेखर ने कहा, ‘‘ठीक है, अभी कुछ दिन लाइब्रेरी में सभी बुक्स देखो. किसकिस टौपिक पर काम हो चुका है, किस टौपिक पर रिसर्च होनी चाहिए, पहले वह डिसाइड करेंगे. फिर उस पर काम करेंगे. अभी कालेज की लाइब्रेरी में काफी नई बुक्स आई हैं, उन पर एक नजर डाल लो. देखो, क्या आइडिया आता है तुम्हें.’’ विनी उत्साहपूर्वक बोली, ‘‘सर, कल से ही लाइब्रेरी जाऊंगी. शेखर कालेज में विनी का पीरियड लेते थे. विनी उन्हें सर कहने लगी थी. रजत ने हमेशा की तरह टोका, ‘‘अरे, घर में तो पापा को सर मत कहो, विनी, अंकल कहो.’’ विनी हंस पड़ी, ‘‘नहीं, सर ही ठीक है, कहीं अंकल कहने की आदत हो गई और क्लास में मुंह से अंकल निकल गया तो क्या होगा, यह सोचो.

’’ सब विनी की इस बात पर हंस पड़े. विनी ने जातेजाते शेखर के रूम में नजर डाली. शेखर की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगती रहती थी. वह शेखर का बहुत सम्मान करती थी. हर पेंटिंग में स्त्री के अलगअलग भाव मुखर हो उठे थे. कहीं शक्ति बनी स्त्री, कहीं मातृत्व में डूबी स्त्री आकृति, कहीं प्रेयसी का रूप धरे मनोहारी आकृति, कहीं आराध्य का रूप लिए ओजपूर्ण स्त्री आकृति. शेखर के काम की मन ही मन सराहना करती हुई विनी घर लौट आई और सुगंधा को शेखर की सलाह बताई. अगले दिन से ही विनी लाइब्रेरी में किताबें पढ़ने में बिजी रहने लगी. 15 दिनों की खोजबीन के बाद उसे एक विषय सूझा. वह उत्साहित सी शेखर के घर की तरफ बढ़ गई. उसे पता था, रजत अपने दोस्तों के साथ कहीं गया हुआ था.

राधा तो अकसर घर में ही रहती थी. पर शाम को जिस समय विनी शेखर के घर पहुंची, राधा किसी काम से कहीं गई हुई थीं. शेखर घर में अकेले थे. विनी ने उन्हें विश किया. उन के हालचाल पूछे. पूछा, ‘‘आंटी नहीं हैं?’’ उन्होंने कहा, ‘‘अभी आ जाएंगी.’’ ‘‘आज बाकी स्टूडैंट्स नहीं हैं?’’ ‘‘नहीं आजकल उन्हें कुछ काम दिया हुआ है, पूरा कर के आएंगे.’’ ‘‘सर, मैं ने लाइब्रेरी में काफीकुछ देखा, ‘भारतीय गुफाओं में भित्ति चित्रण’ इस पर कुछ काम कर सकते हैं?’’ ‘‘हां, शाबाश, कुछ विषय और देख लो, फिर फाइनल करेंगे,’’ शेखर आज उस के सामने बैठ कर जिस तरह उसे देख रहे थे, विनी कुछ असहज सी हुई. वह जाने के लिए उठती हुई बोली, ‘‘ठीक है, सर, मैं अभी और पढ़ कर आऊंगी.’’

सच है, गृहस्थ हो या संन्यासी, सभी पुरुषों के अंदर एक आदिम पाश्विक वृत्ति छिपी रहती है. किस रूप में, किस उम्र में वह पशु जाग कर अपना वीभत्स रूप दिखाएगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. ‘‘रुको जरा, विनी मेरे लिए एक कप चाय बना दो. कुछ सिरदर्द है,’’ विनी धर्मसंकट में फंस गई. उस का दिमाग कह रहा था, फौरन चली जा, पर पिता की सी छवि वाले गुरु की बात टालने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी. फिर अपने दिल को ही समझा लिया, नहीं, उस का वहम ही होगा. आजकल माहौल ही ऐसा है न, डर लगा ही रहता है. ‘जी, सर’ कहती हुई वह किचन की तरफ बढ़ गई.

उसे अपने पीछे दरवाजा बंद करने की आहट मिली तो वह चौंक गई. शेखर उस की तरफ आ रहे थे. चेहरे पर न पिता की सी छवि दिखी, न गुरु के से भाव, विनी को उन के चेहरे पर कुटिल मुसकान दिखी. उसे महसूस हुआ जैसे वह किसी खतरे में है. शेखर एकदम उस के पास आ कर खड़े हो गए. उस के कंधों पर हाथ रखा तो विनी पीछे हटने लगी. नारी हर उम्र में पुरुष के अनुचित स्पर्श को भांप लेती है. शेखर बोले, ‘‘घबराओ मत, यह तो अब चलता ही रहेगा. थोड़े और करीब आ जाएं हम दोनों, तो रिसर्च करने में तुम्हें आसानी होगी. तुम्हारी हर मदद करूंगा मैं.’’ नागिन सी फुंफकार उठी विनी, ‘‘शर्म नहीं आती आप को? आप की बेटी जैसी हूं मैं. आप में हमेशा पिता की छवि दिखी है मुझे.’’ ‘‘मैं ने तो तुम्हें कभी बेटी नहीं समझा. तुम अपने मन में मेरे बारे में क्या सोचती हो, उस से मुझे जरा भी मतलब नहीं. आओ मेरे साथ.’’ विनी ने पीछे हटते हुए कहा, ‘‘मैं आंटी, रजत सब को बताऊंगी, आप की यह गिरी हुई हरकत छिपी नहीं रहेगी.’’ ‘‘बाद में बताती रहना, मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा,’’

कहते हुए उस का हाथ पकड़ कर बलिष्ठ शेखर उसे बैडरूम तक ले गए. विनी ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश में उन्हें काफी धक्के दिए. उन का हाथ दांतों से काट भी लिया. पर उन के सिर पर ऐसा शैतान सवार था कि विनी के रोके न रुका और दुर्घटना घट गई. सालों का आदर, विश्वास सब रेत की तरह ढहता चला गया. विनी ने रोरो कर चीखचीख कर शोर मचाया. तो शेखर ने कहा, ‘‘चुपचाप चली जाओ यहां से और जो हुआ उसे भूल जाओ. इसी में तुम्हारी भलाई है. किसी को बताओगी भी, तो जानती हो न, कितने सवालों के घेरे में फंस जाओगी. परिवार, समाज में मेरी इमेज का अंदाजा तो है ही तुम्हें.’’ ‘‘कहीं नहीं जाऊंगी मैं,’’ विनी चिल्लाई, ‘‘आने दो आंटी को, उन्हें और रजत को आप की करतूत बताए बिना मैं कहीं नहीं जाने वाली,’’ शेखर को अब हैरानी हुई, ‘‘बेवकूफी मत करो बदनाम हो जाओगी, कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी, समाज रोज तुम पर ही नएनए ढंग से कीचड़ उछालेगा, पुरुष का कुछ बिगड़ा है कभी?’’ विनी नफरतभरे स्वर में गुर्राई, ‘‘आप ने मेरा रेप किया है,

आप मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे.’’ शेखर ने तो सोचा था विनी रोधो कर चुपचाप चली जाएगी पर वह तो अभी वैसी की वैसी बैठी हुई उन्हें गालियां दिए जा रही थी. हिली भी नहीं थी. इस स्थिति की तो उन्होंने कल्पना ही नहीं की थी. डोरबेल बजी तो उन के पसीने छूट गए, बोले, ‘‘भागो यहां से, जल्दी.’’ ‘‘मैं कहीं नहीं जा रही.’’ डोरबेल दोबारा बजी तो शेखर के हाथपैर फूल गए, दरवाजा खोला, राधा थीं. शेखर का उड़ा चेहरा देख चौंकी, ‘‘क्या हुआ?’’ शेखर इतना ही बोले, ‘‘सौरी, राधा.’’ ‘‘क्या हुआ, शेखर?’’ तभी बैडरूम से ‘आंटी’ कह कर विनी के तेजी से रोने की आवाज आई. राधा भागीं. बैड पर अर्धनग्न, बेहाल, रोने से फैले काजल की गालों पर सबकुछ स्पष्ट करती रेखा, बिखरे बाल, कराहतीरोती विनी राधा की बांहों में निढाल हो गईं. राधा जैसे पत्थर की बुत बन गई. विनी की हालत देख कर सबकुछ समझ गईं. फूटफूट कर रो पड़ीं. शेखर को धिक्कार उठीं, ‘‘यह क्या किया, हमारी बच्ची जैसी है यह. यह कुकर्म क्यों कर दिया? नफरत हो रही है तुम से.’’ राधा का रौद्र रूप देख कर शेखर सकपकाए. राधा ने उन की तरफ थूक दिया. तनमन में ऐसी आग लगी थी कि विनी को एक तरफ कर पास के कमरे में अगले हफ्ते होने वाली प्रदर्शनी के लिए रखी शेखर की तैयार 10-15 पेंटिंग्स पर वहीं रखे काले रंग से स्त्री के महान रूपों की तस्वीरों में कालिख भरती चली गईं. विनी को फिर अपने से चिपटा लिया. शेखर चुपचाप वहीं रखी एक चेयर पर बैठ गए थे. दोनों रोती रहीं, राधा और सुगंधा के अच्छे संबंध थे.

राधा ने सुगंधा को फोन किया और फौरन आने के लिए कहा. घर थोड़ी ही दूर था. सुगंधा और रजत लगभग साथसाथ ही घर में घुसे. सब स्थिति समझ कर सुगंधा तो विनी को, अपनी मृगछौने सी प्यारी बेटी को, गले से लगा कर बिलख उठी. रजत ने उन्हें संभाला. रजत ने रोते हुए विनी के आगे हाथ जोड़ दिए, ‘‘बहुत शर्मिंदा हूं, विनी, अब इस आदमी से मेरा कोई संबंध नहीं है.’’ राधा भी दृढ़ स्वर में बोल उठीं, ‘‘और मेरा भी कोई संबंध नहीं. रजत, मैं इस आदमी के साथ अब नहीं रहूंगी,’’ रजत विनी की हालत देख कर फूटफूट कर रो रहा था. बचपन की प्यारी सी दोस्त का यह हाल. वह भी उस के पिता ने, घिन्न आ रही थी उसे. सुगंधा का विलाप भी थमने का नाम नहीं ले रहा था. राधा कभी सुगंधा से माफी मांगती, कभी विनी से. शेखर को छोड़ कर सब गहरे दुख में डूबे थे. वे सोच रहे थे, सब रोधो कर अभी शांत हो जाएंगे. राधा कह रही थी, ‘‘काश, मैं विधवा होती, ऐसे पशु पति का साथ तो न होता. अपरिचितों से तो ये परिचित अधिक खतरनाक होते हैं. ये कुछ भी करें, इन्हें पता है, कोई कुछ बोलेगा नहीं. पर ऐसा नहीं होगा.’’ विनी के मुंह से जैसे ही निकला, ‘‘मेरा जीवन तो बरबाद हो गया,’’ राधा ने तुरंत कहा, ‘‘तुम्हारा क्यों बरबाद होगा, बेटी, तुम ने क्या किया है. तुम्हारा तो कोई दोष नहीं है.

अपने दिल पर यह बोझ मत रखना. इस दुष्कर्म को याद ही नहीं रखना. दुखी नहीं रहना है तुम्हें. पाप कोई और करे, दुखी कोई और हो, यह कहां का न्याय है?’’ राधा के शब्दों से जैसे सुगंधा भी होश में आई. यह समय उस के रोने का कहां था. यह तो बेटी को मानसिक संबल देने की घड़ी थी. अपने आंसू पोंछती हुई बोली, ‘‘नहीं विनी, इस घृणित इंसान का दिया घाव जल्दी नहीं भरेगा, जानती हूं, पर भरेगा जरूर, यह भी भरोसा रखो. समझ लेना बेटा, सड़क पर चलते हुए किसी कुत्ते ने काट खाया है. इस दुष्कर्मी का कुकर्म मेरी बेटी के आत्मविश्वास की मजबूत चट्टान को भरभरा कर गिरा नहीं सकता.’’ विनी फिर रोने लगी, सिसकते हुए बोली, ‘‘मेरे सारे वजूद पर कालिख सी पोत दी गई है, कैसे जिऊंगी,’’ रजत उस के पास ही जमीन पर बैठते हुए बोला, ‘‘विनी, ताजमहल की सुंदरता ऐसे दुष्कर्मियों की खींची कोयले की लकीरों से खराब नहीं होती. इस लकीर पर पानी डालते हुए सिर ऊंचा रख कर आगे बढ़ना है तुम्हें. हम सब तुम्हारे साथ हैं. तुम्हारा जीवन यहां रुकेगा नहीं. बहुत आगे बढ़ेगा,’’

और फिर शेखर की तरफ देखता हुआ बोला, ‘‘और आप को तो मैं सजा दिलवा कर रहूंगा.’’ बात इस हद तक पहुंच जाएगी, इस की तो शेखर ने कल्पना भी नहीं की थी. अपने अधीन पीएचडी करने वाली अन्य छात्राओं का भी वे शारीरिक शोषण करते आए थे. किसी ने उन के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की थी. उन्हें किसी का डर नहीं था. इस तरह के किसी भी आदमी को समाज, परिवार या कानून का डर नहीं होता क्योंकि उन के पास इज्जत, पद का ऐसा लबादा होता है जिस से नीचे की गंदगी कोई चाह कर भी नहीं देख सकता. वे कमजोर सी, आम परिवार की छात्राओं को अपना शिकार बनाया करते थे. विनी के बारे में भी यही सोचा था कि मांबेटी रोधो कर इज्जत के डर से चुप ही रह जाएंगी. पर उन की पत्नी और पुत्र ने स्थिति बदल दी थी. अब जो हो रहा था, वे हैरान थे. अकल्पनीय था. पत्नी और पुत्र के सामने शर्मिंदा होना पड़ गया था. राधा उठ कर खड़ी हो गई थी, ‘‘रजत, मैं इस घर में नहीं रहूंगी.’’ ‘‘हां, मां, मैं भी नहीं रह सकता.’’ शेखर ने उपहासपूर्वक पूछा, ‘‘कहां जाओगे दोनों? बड़ीबड़ी बातें तो कर रहे हो, कोई और ठिकाना है?’’ अपमान की पीड़ा से राधा तड़प उठी, ‘‘तुम्हारे जैसे बलात्कारी पुरुष के साथ रह कर सुविधाओं वाला जीवन नहीं चाहिए मुझे, मांबेटा कहीं भी रह लेंगे.

तुम से संबंध नहीं रखेंगे. तुम्हें सजा मिल कर रहेगी. ‘‘आज अपने बेटे के साथ मिल कर एक निर्दोष लड़की को एक साहस, एक सुरक्षा का एहसास सौंपना है. धरोहर के रूप में अपनी आने वाली पीढि़यों को भी यही सौंपना होगा.’’ राधा आगे बोली, ‘‘चलो रजत, मैं यह टूटन, यह शोषण स्वीकार नहीं करूंगी. अपने घर के अंदर अगर इस घिनौनी करतूत का विरोध नहीं किया तो बाहर भी औरत कैसे लड़ पाएगी और हमेशा रिश्तों की आड़ में शोषित ही होती रहेगी. परिवार की इज्जत, रिश्तेदारी और समाज के खयाल से मैं चुप नहीं रहूंगी.’’ सुगंधा भी विनी को संभालते हुए उस का हाथ पकड़ कर जाने के लिए खड़ी हो गईं. अचानक कुछ सोच कर बोली, ‘‘राधा, चाहो तो आज से तुम दोनों हमारे घर में रह सकते हो.’’ रजत उन के पैरों में झुक गया, ‘‘हां, आंटी, मैं भी आ रहा हूं आप के घर. चलो मां, अभी बहुत लंबी लड़ाई लड़नी है. साथ रहेंगे तो अच्छा रहेगा. और विनी, तुम एक दिन भी इस कुकर्मी के कुकर्म को याद कर दुखी नहीं होगी. तुम्हें बहुत काम है. नया गाइड ढूढ़ंना है. पीएचडी करनी है.

इस आदमी की रिपोर्ट करनी है. इसे कोर्ट में घसीटना है. सजा दिलवानी है. बहुत काम है. विनी, चलो,’’ चारों उन के ऊपर नफरतभरी नजर डाल कर निकल गए. अब शेखर को साफसाफ दिख रहा था कि अब उन के किए की सजा उन्हें मिल कर रहेगी. अगर विनी और सुगंधा अकेले होते तो कमजोर पड़ सकते थे. पर अब चारों साथ थे, तो उन की हार तय थी. कितनी ही छात्राओं के साथ किया बलात्कार उन की आंखों के आगे घूम गया. वे सिर पकड़ कर बैठे रह गए थे. वे चारों गंभीर, चुपचाप चले जा रहे थे. ऐसे समाज से निबटना था जो बलात्कार की शिकार लड़की को ही सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है. उस के साथ ऐसा व्यवहार करता है जैसे उस ने कोई गुनाह किया हो. शारीरिक और मानसिक रूप से पहले से ही आहत लड़की को और सताया जाता है. लेकिन, इन चारों के इरादे, हौसले मजबूत थे. समाज की चिंता नहीं थी. लड़ाई मुश्किल, लंबी थी पर चारों के दिलों में इस लड़ाई में जीत का एहसास अपनी जगह बना चुका था. हार का संशय भी नहीं था. जीत निश्चित थी.

द्य ऐसा भी होता है मनोहरजी का बेटा अपनी मां को लेने गांव आया था. उन की बहू का बच्चा होने वाला था. इसलिए बेटा मां को मुंबई ले जा रहा था. वह मनोहरजी के लिए पैंटकमीज का कपड़ा मुंबई से लाया था. बेटे ने कपड़ा मनोहरजी को देते हुए कहा, ‘‘इसे सिलवा लीजिएगा, आप पर बहुत अच्छा लगेगा.’’ पिताजी ने कहा, ‘‘इस की क्या जरूरत थी, मुझे धोतीकुरते में ही आराम मिलता है.’’ मनोहरजी कपड़े पा कर बहुत प्रसन्न थे. उन्होंने दर्जी को दे कर अपनी नाप की पैंटशर्ट सिलवा ली. कपड़े उन्होंने पहन कर नापे, वे खुद को बहुत सुंदर महसूस कर रहे थे. एक महीने बाद खबर आई कि बहू ने एक बेटे को जन्म दिया है. बेटे के जन्मोत्सव के लिए बेटे ने उन्हें भी मुंबई बुलाया था. वे मुंबई जाने की तैयारी करने लगे. नियत समय पर वे मुंबई पहुंचे. बेटा उन्हें लेने के लिए आया हुआ था. जब वे बेटे के घर पहुंचे तो बहुत प्रसन्न थे कि उस का रहनसहन कितना ऊंचा है. उन का बेटा कितना बड़ा अफसर है, उस के कितने ठाटबाट हैं. बेटे के जन्मोत्सव की पार्टी रखी गई. घर में तैयारी चल रही थी.

शाम को सभी लोग पार्टी के लिए तैयार हो रहे थे. मनोहरजी अपनी वही पैंटशर्ट पहने तैयार हुए जो उन का बेटा उन्हें गांव में दे गया था. बेटे ने जब उन्हें उन कपड़ों में देखा, तो चीखते हुए बोला, ‘‘आप के पास यही कपड़े पहनने को हैं.’’ बहू भी दौड़ती हुई आई कि क्या हो गया. तब बहू पिताजी को ले कर कमरे में आई और पिताजी से बोली, ‘‘आप दूसरे कपड़े पहन लीजिए. ये कपड़े यहां के इंजीनियरों की यूनिफौर्म के हैं. इंजीनियर को साल में 2 जोड़ी कपड़े मिलते हैं. वे उन्हें स्वयं न सिलवा कर अपने रिश्तेदारों में बांट देते हैं या दान कर देते हैं. आप को इन कपड़ों में देख कर लोग क्या सोचेंगे.’’ मनोहरजी बहू की बात सुन कर सकते में आ गए. उन्हें बड़ा दुख हो रहा था कि बेटे ने उन्हें कपड़ा देने के पहले यह बात क्यों नहीं बता दी थी. उपमा मिश्रा  Family Story

Social Story In Hindi : बिना जड़ का पेड़ – अपनों के बीच अपनी पहचान बनाते पुरुष की जद्दोजद की कहानी

Social Story In Hindi : “मैं आज से कोई 5-6 साल पहले अपना घर व व्यवसाय छोड़ कर पाकिस्तान से हिंदुस्तान आया था. खुद को अपने सहधर्मी व्यक्तिओं के बीच सुरक्षित रखने के लिए,” यह वे हमेशा अपने से मिलने वाले लोगों को बोला करते.

कृष्णराय हमारे बंगले के पास अभी रहने आए थे. मैं ने उन के मुख से कई बार यहां भारत के अनुभव व पाकिस्तान में उन की सुखद आर्थिक स्थिती के बारे में सुनता रहता था.

एक दिन मैं ने उन को यों ही मजाक में कहा, “कृष्णरायजी, आप हमेशा अपने बारे में किश्तों में बताते रहते हैं, कभी किसी के साथ बैठ कर अपनी पूरी कहानी सुनाइए,” मगर उन के चेहरे के भावों को देख कर मैं ने जल्दी क्षमा मांगी.

उन्होंने गहरी सांस ली और बोले,”चांडक साहब, इस में क्षमा की बात नहीं है. आप ठीक कहते हैं, मुझे हर किसी को अपनी बात नहीं कहनी चाहिए. लेकिन क्या करूं, मन में रख नहीं रख पाता हूं, अंदर घुटन महसूस करता हूं. सच कहूं, मैं अपनी पूरी कहानी किसी को सुनाना चाहता हूं ताकि जी हलका हो सके,” उन्होंने उदासी से कहा.

“आज मैं अपने काम से फारिग हूं, आप को ऐतराज नहीं हो तो मैं आप की कहानी सुनना चाहता हूं. विश्वास कीजिए, मैं आप की कहानी का मजाक नहीं बनाऊंगा,” मैं ने संजीदगी से कहा.

उन्होंने मेरी ओर गंभीर नजरों से देखा, शायद सोचा हो कि कहूं या नहीं? लेकिन फिर उन्होंने अपनी कहानी शुरू की, अपने पाकिस्तान में जन्म से ले कर व भारत में स्थायी होने तक…

मेरा जन्म पाकिस्तान में एक रईस व जमींदार हिंदू परिवार में हुआ था. मैं ने बचपन से ले कर जवानी तक कभी भी किसी की चीज की कमी महसूस नहीं की, जो चाहा वह मिला. घर पर नौकरों की फौज थी. मेरे बाबा हमारे गांव के सब से बड़े जमींदार थे. गांव में वही होता था जो हमारे बाबा चाहते थे. यह सब आजादी के पहले की नहीं, आजादी के बाद की बात थी.
हमारा वहां बहुत बड़ा संयुक्त परिवार था. हम ने कभी भी अपनेआप को अकेला महसूस नहीं किया. 2 साल पढ़ने के लिए मैं कराची गया. लेकिन पढ़ाई बीच में छोड़ कर मैं जल्दी जमींदारी में लग गया.

कुछ समय बाद हम ने शहर में भी अपना व्यवसाय खोल दिया. हम हिंदू थे पर पूरा गांव मुसलमान था. हमारे नौकर व ग्राहक भी मुसलिम थे.

मैं ने कभी जाना भी नहीं कि हिंदू व मुसलिमों में फर्क भी होता है. न ही कभी गांव के मुसलिमों ने हमें यह महसूस होने दिया. 1965 व 1971 में जब हमारे रिश्तेदारों ने, जो पाकिस्तान छोड़ कर हिंदुस्तान जा रहे थे, हमारे दादा से भी हिंदुस्तान चलने का आग्रह किया था. लेकिन दादा अपनी जन्मभूमी छोड़ कर जाने को तैयार ही नहीं थे. वे हठीले जमींदार थे, दूसरा उन्होंने कभी खतरा महसूस नहीं किया.

हम लोग वहां सुख व आनंद के साथ जी रहे थे. मेरे बड़े भाई स्थानीय समर्थकों की सहायता से वहां की नगरपालिका के अध्यक्ष बने. उन्होंने वहां की जनता के लिए अच्छे काम किए और लंबे समय तक इस पद पर बने रहे. लेकिन इस बीच अयोध्या के मामले ने हमारे दिलोदिमाग को भीतर तक झकझोरा और हम पहली बार खुद को असुरक्षित समझने लगे. हम अपने दोस्तों व गांववालों से नजरें मिलाते तो ऐसा लगता जैसे हिंदुस्तान में जो हो रहा है उस के लिए हम जिम्मेदार हैं.

हमें हिंदुओं के बारें में धार्मिक स्थिति तो पता थी पर सामाजिक व राजनीतिक स्थिति से हम लोग अनजान थे. अब हम जब अपने दूसरों जगहों के रिश्तेदारों से मिलते तो यही चर्चा होती कि क्या हम पाकिस्तान में सुरक्षित हैं? यदि हां, तो कब तक? हमारे चेहरे भले ही शांत हो पर मनमस्तिष्क में द्वंद्व चलता रहता था. मस्तिष्क कह रहा था कि हम सुरक्षित नहीं हैं पर मन कहता कि यह तो हमारी जन्मभूमी है.

इस बीच रथयात्रा निकली. हिंदुस्तान के दंगों की चर्चा पाकिस्तानी समाज व अखबारों में होने लगी. वहां कुछ लोग इस की प्रतिकिया करने लगे. पुराने मंदिर खंडहर फिर समतल मैदान होने लगे. हिंदुओं की दुकानें जो गिनीचुनी थीं लुटी जाने लगीं.

मुझे लग रहा था कि भारत पाकिस्तान के विभाजन की प्रकिया अभी तक पूरी नहीं हुई है. अब हमारा पाकिस्तान में रहना मुझे असहज लगने लगा. मैं अब जल्द से जल्द विधर्मी देश को छोड़ कर सहधर्मी देश में आने की सोचने लगा ताकि मैं अपने लोगों के बीच सुरक्षित महसूस कर सकूं. मुझे लग रहा था कि भारत पाकिस्तान के विभाजन की प्रकिया अभी तक पूरी नहीं हुई है. मैं परिवार के सदस्यों के बीच इस बात को ले कर विचारविमर्श करने लगा. लेकिन सब ने मुझे यही समझाया कि यहां से उखड़ कर, वहां पनपना आसान नहीं होगा. यहां की जमींदारी व जमाजमाया व्यवसाय छोड़ कर कहीं तुम्हें वहां की दरदर की ठोकरें न खानी पड़े. तुम्हारी हालत बिना जड़ के पेड़ की तरह हो जाएगी. आखिर उन का तर्क सही था.

लेकिन दूसरी तरफ मन कहता कि जहां चाह वहां राह. दूसरा मेरा हठीला स्वभाव अपने बाबा पर गया था. वैसे भी घोड़े पर चढ़ने वाला दुल्हा फेरे खाने के बाद ही नीचे उतरता है.

जब मेरे मुसलमान दोस्तों व गांव वालों को मेरे निर्णय के बारे में पता चला तो वे सब मेरे पास आए और मुझे समझाने लगे, “किशन तुम्हें हम पर विश्वास नहीं, हम लोग न जाने कितनी पीढ़ियों से एकसाथ रह रहे हैं, क्या हमारे होते हुए तुम्हें आंच आ सकती है?” समझाते हुए उन की आंखों में आंसू आने लगे. मैं भी रोने लगा. एक बार तो मैं ने भी अपना निर्णय बदलने की सोची लेकिन कुछ समय बाद के बुरे खयालों से मेरा दिल कांपने लगा.

आखिरकार, मैं अपना घर, कारोबार व जन्मभूमी, बसबसाया सुख छोड़ कर अनजाने लेकिन सहधर्मी देश की ओर निकल पड़ा, संशयपूर्ण भविष्य को साथ में ले कर.

घर व गांव को छोड़ते हुए मेरे आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. मेरे परिजन, गांव वालों व दोस्तों की आंखों में आंसू थे. मेरे दोस्तों व गांव वालों ने विदा करते समय कहा,”किशन, यदि तुम्हें पराई जमीन पंसद न आए तो निस्संकोच अपने गांव वापस आ जाना,” यह उन के अंतिम वाक्य थे, जो मुझे न जाने कितनी बार याद आए.

अभी तक तो मेरी जिंदगी सुख के धरातल पर चल रही थी. पुरखों के बोए बीजों के फल मैं खा रहा था. उबङखाबड़ और परेशानियों वाली जिंदगी के दर्शन अभी तक बाकी थे जो यहां आने के बाद होने लगे.
नई आशा व विश्वास में आ गया अपने सहधर्मी देश. बहुत सारे सामान व अपने परिवार के साथ मैं मुंबई एअरपोर्ट पर उतरा. सब से पहली परेशानी यहीं से शुरू होती है. यहां पर कस्टम अधिकारियों ने शुरू में बहुत परेशान किया क्योंकि एक तो मैं पाकिस्तान से आया था, दूसरा मेरे साथ पूंजी के रूप में बहुत सारा सोना आभूषणों के रूप में मेरे साथ था. पर जब उन्होंने पाकिस्तान में एक हिंदू के रूप में मेरी व्यथा सुनी तो उन का दिल पसीजा और उन्होंने मेरे न सिर्फ कस्टम ड्यूटी माफ की बल्कि उन्होंने मेरे और मेरे परिवार को दिल से कैंटीन में खाना भी खिलाया. मेरे प्रति एक हिंदू के रूप में यह पहली सहानुभूति थी.

हिंदुस्तान आ कर कुछ दिन मैं अपनी बड़ी बहन के यहां रहा. कुछ दिन बाद उन्हीं के शहर में एक मकान भी लिया, जहां मैं ने पहली बार सहधर्मी पड़ोसियों के अनुभव लिए. मैं जहां रह रहा था वहां पाकिस्तान से विस्थापित हो कर आना जिज्ञासा का विषय नहीं था, क्योंकि हमारी तरह के बहुत सारे परिवार विस्थापित हो कर यहां आ कर बस गए थे. जिज्ञासा का विषय तो हमार शाही रहनसहन व खानपान था. साथ में हमारा बड़ा परिवार भी सब की नजरों में चर्चा का विषय था. हमारे यहां 8-10 सदस्यों का परिवार सामान्य समझा जाता था. लेकिन यहां के 2-3 सदस्यों वाले परिवारों में हमें स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनना ही था.

हमारी मातृभाषा सिंधी थी जो यहां की गुजराती भाषा से बहुत भिन्न थी. हालांकि मुझे इस की खास परेशानी नहीं थी क्योंकि कराची में मेरे कुछ दोस्त गुजरात से आए हुए थे, लेकिन बच्चों व बीवी को बहुत परेशानी होती थी.

हम ने कुछ ही समय में सारी भौतिक सुखसुविधाएं जुटा लीं. हमारा शाहीखर्च उन को आश्चर्यचकित कर देता था. मेरी पत्नी का उन को चायनाश्ता के साथ स्वागत करना विस्मय से भर देता था क्योंकि वे लोग चाय तक ही सीमीत रहते थे. बच्चों का दिनभर झगड़ना उन की शांत जिंदगी में तुफान ला देता था. बहुत लोगों ने इस की शिकायत की. लेकिन मेरे कहने पर कि यह तो बच्चे हैं उन को गुस्से में ला देता था, “आप तो बड़े हैं,” ऐसा अपमान बहुत बार हुआ.

काम करने वाली जिस दिन नहीं आती उस दिन जूठे बरतनों व कपड़ों का अंबार लग जाता था. मेरे घर का माहौल देख कर लोगों ने धीरेधीरे आना बंद कर दिया.

उधर मैं व्यवसाय ढूंढ़ने के लिए इधरउधर अपने भाई के दोस्त के साथ भटकने लगा. व्यवसाय शुरू करना व उसे सुचारु रूप से चलाना कितना मुश्किल भरा होता है यह मुझे अब पता लगना था. अब तक मैं अपने बापदादा की जमीजमाई जमींदारी पर आराम के साथ जिंदगी गुजार रहा था.

दूसरी तरफ मेरी बहन के परिवार के साथ संबध कटने लगा, वे मुझे व्यवसाय में मदद के लिए असमर्थ लगे. लेकिन आज सोचता हूं कि वे उस समय कितने सही थे. उन का मुझे कुछ समय राह देख कर, व्यवसाय शुरू करने की सलाह को मैं ने गलत तरीके से लिया था. आज यह सोच कर ग्लानी से भर उठता हूं.

मैं ने जल्द ही भाई दोस्त के कहने पर अहमदाबाद के नजदीक शहर में अपना व्यवसाय शुरू किया, लेकिन जो व्यवसाय मैं ने शुरू किया उस का मुझे तनिक भी अनुभव नहीं था. जिस कारण शुरू में मैं बहुत परेशान रहा.

मेरी परेशानी देख कर मेरी बहन ने अपने बेटे को मेरी मदद करने लिए भेजा. वह इस मामले में बड़ा अनुभवी व होशियार निकला. उस ने मेरे व्यवसाय को जमाने में मेरी बहुत मदद की. मेरे बच्चे तो बहुत ही छोटे थे.

बच्चों को भी शुरू में विद्यालय व आसपास के माहौल में सामंजस्य बैठाने में बहुत तकलीफें आईं. भाषा की तकलीफें तो थीं ही साथ में और भी कई परेशानियां थीं.

एक बार मेरे बेटे को विद्यालय में राष्ट्रगान बोलने को कहा तो उस ने पाकिस्तान का राष्ट्रगान सुना दिया. इस पर विद्यालय व शहर में बहुत हंगामा हुआ. घर पर बुलावा आया, मुझे माफी मांगनी पड़ी व भविष्य में ऐसा नहीं होगा लिखित आश्वासन भी देना पड़ा.

हर महीने पुलिस थाने जा कर उपस्थिती के साथ नजराना भी देना पड़ता था. यहां पर व्यवसाय के चक्कर में सरकारी अधिकारियों के साथ रोज पाला पड़ता था.

मेरा सपना हिंदुस्तान आ कर चकनाचूर हो गया. मैं ने तो यह सपना देखा था कि सहधर्मी देश आ कर मैं सुरक्षित व सुखी रहूंगा. हालांकि मुझे व्यवसाय में सफलता मिल रही थी पर मैं यहां की परेशानियां झेलने में असफल व असमर्थ था.

जब मैं अपने साथी व्यापारी व रिश्तेदारों से बातें करता तो वे हंस कर कहते,”यह तो साधारण रोज की बातें हैं जिन का जिंदगीभर सामना करना पड़ता है. जितना बड़ा व्यापारी उतनी ज्यादा परेशानियां.

मैं परेशान हो गया, मन में अजीब सा द्वंद्व पैदा हो गया. कभीकभी सोचता था कि सबकुछ छोड़ कर वापस पाकिस्तान चला जाऊं. लेकिन वहां मेरे दोस्त व रिश्तेदार क्या कहेंगे? क्या उन के व्यंग्यबाण मैं झेल पाउंगा? हो सकता है वहां की सरकार मुझे शक की नजरों से देखे.

इस तनाव के कारण मैं चिड़चिड़ा हो गया. मैं तनाव में रहने लगा. मेरे व्यवहार में अजीब सी कर्कशता आ गई. बच्चे भी सहमने लगे. मैं ने पहली बार जाना कि अपनी जड़ों से कट कर दूसरी जगह जुड़ना कितना कठिन व कष्टदायक होता है.

मुझे बीमार व तनाव में देख कर मेरी पत्नी ने बड़ी बहन को बुलाया. मेरी हालत देख कर मेरी बहन की आंखों में आंसू आ गए.

मैं ने रोते हुए कहा, “दीदी, अब मैं यहां और नहीं रह सकता. मेरे में और परेशानियां झेलने की क्षमता नहीं है. मैं अब वापस अपने लोगों के बीच लौट जाना चाहता हूं.”

“क्या हम तुम्हारे नहीं हैं कृष्ण? और फिर क्या बारबार एक जगह से पेड़ों को उखाड़ कर दूसरी जगह रोपना आसान है? क्या तुम पहले की तरह वहां रह सकोगे? इतना फैला हुआ व्यापार समेटना क्या आसान है? तुम्हारे बच्चों का यहां मन लग गया है. देखो वे कितने खुश हैं,” मस्ती से खेलते बच्चों को दखते हुए बोली.

“क्या वापस पाकिस्तान जा कर बच्चों की हालत तेरी जैसी नहीं हो जाएगी?”

कुछ देर बाद रुक कर दीदी आगे बोली,”तुम एक बार वहां की जिंदगी को भूल कर, वहां के सारे सुखों को भूल कर, यहां नई जिंदगी शुरू कर दो. यही सोचो कि तुम्हारा जन्म यहीं पर हुआ है. मैं जब ससुराल आई थी, तब मेरा यहां कोई नहीं था. मैं अपना सुखदुख किसी को सुना नहीं सकती थी. लेकिन तुम्हारा तो यहां पूरा परिवार है, मैं हूं, अपने लोगों से तुम्हारा फोन पर संपर्क है. और तुम जल्दी घबरा गए, जल्दी हार मान गए. मैं तो तुम्हारी तरह वापस भी नहीं जा सकती थी. तू तो मेरा भाई है, तेरे में तो मेरे से भी ज्यादा हिम्मत, हौसला व हिम्मत होनी चाहिए. उठ और हिम्मत से काम ले. सहनशील व संयमशील बन कर जिंदगी को आसान व सफल बना,” दीदी ने सिर पर हाथ फेर कर कहा.

‘उन की बात सही थी कि मेरा वापस जाना संभव नहीं. मेरे बच्चों की भी हालत मेरी जैसी न हो जाए. अब मुझे यहीं रहना होगा. मुझे ही इस मुल्क के अनुकूल होना पड़ेगा,’ यह सोच कर मैं ने अपना मन मजबूत किया. इस से जो समस्याएं मुझ में पहाड़ सी दिखती थीं वे कंकड़ के समान दिखने लगी. मैं वही हंसमुख कृष्णकुमार बना. मुझ में हद से ज्यादा संयमशीलता आ गई. मेरा व्यवसाय अच्छा जमने लगा.

कृष्णराय के घर से आने के बाद मैं सोचने लगा कि सच में कितना मुश्किल होता है अपनी जड़ों से कट कर दूसरी जगह पनपना, भले ही वह जगह अपनी मनपंसद व अनुकूल ही क्यों न हो.  Social Story In Hindi 

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