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Family Story in Hindi: वो खतरनाक मुस्कान!

Family Story in Hindi: उस कौफी शाप में बैठी मैं बड़ी देर से दरवाजे के बाहर आते जाते कदमों को देख रही थी. कदमों को पढ़ना भी एक कला है. दिल्ली की बसों या मेट्रो में लोगों के चेहरों को पढ़ना भी मेरी आदत में शुमार है. मैं चेहरे देख कर व्यक्ति के व्यवहार, पीड़ा या खुशी का अंदाजा लगाते हुए आराम से अपना सफर तय करती हूं. उस रोज मन बड़ा उदास सा था, इसलिए दोपहर बाद कौफी हाउस में आकर बैठ गई थी. नजरें कौफी हाउस के दरवाजे पर अटक गईं. दरवाजे के पार एक जोड़ी कदम सफेद चूड़ीदार में चहकते हुए जा रहे थे. कदमों में आवारगी का पुट था. पंजों पर उछल-उछल कर चलने के क्रम से पता चलता था कि इन कदमों को धारण करने वाली युवती काफी प्रसन्नचित्त है. नई-नई जवानी की मदहोशी में मुब्तिला, भविष्य की चिंताओं से मुक्त कदम…. तभी साड़ी में लिपटे कुछ हल्के और थके कदम सामने से गुजरे.

पुरानी सी मटमैली बैली में फंसे कदम. सुस्त चाल गवाह थी कि जीवन का बोझ ढोते-ढोते इन कदमों की जिम्मेदारियां इस उम्र में भी कम नहीं हुई हैं. अपनी ख्वाहिशों को मार कर बच्चों के भविष्य और खुशियों के लिए जीवन अर्पण करने वाली शायद आज भी सुबह से शाम दफ्तर और घर के बीच खट रही है. इतने में एक जोड़ी कदम दूसरी जोड़ी के साथ नजर आए. ये कदम बहुत उल्लासित से थे. थिरकन का भाव लिए हुए. ये कदम दूसरे कदम से कुछ लिपट लिपट कर चल रहे थे. जरूर ये पति पत्नी हैं. एक दूसरे के प्यार में डूबे हुए. तभी एक जोड़ी कदम कौफी शाप के दरवाजे से भीतर आते नजर आए. गोरे गोरे, सलोने कदम… काले रंग की सैंडल में… बेहद खूबसूरत.

पास आते इन कदमों पर मेरी नजरें गड़ गईं. सलीके से कटे हुए नाखून, साफ और गुलाबी रंगत लिए हुए एड़ियां, पैरों का शेप देख कर ही अंदाजा हो गया कि व्यक्ति का कद छह फुट के करीब है. ये कदम मेरी ही ओर बढ़ते आ रहे हैं. आते-आते यह कुछ दूरी पर रुक गये और फिर सामने वाली टेबल पर थम गये. मेरी नजरें बड़ी देर तक इन कदमों से लिपटी रहीं. फिर दिल चाहा कि नजरें उठा कर इन खूबसूरत कदमों के स्वामी की शक्ल देखूं. मैंने नजरें उठायीं. सामने वाली टेबल पर वह बैठा था. सफेद कुर्ता और नीली जींस. गजब की पर्सनेलिटी. गोल खूबसूरत चेहरा, गोरी रंगत, भूरे बाल, तीखी मूछें और काली घनेरी पलकों वाली बड़ी-बड़ह आंखें. वह जरूर किसी सम्मानित और संस्कारी परिवार का व्यक्ति है, मेरी धारणा बनी. उसकी टेबल पर बेयरा कौफी का प्याला रख गया था. वह धीरे-धीरे कौफी सिप करने लगा. तभी उसने अपनी जेब से एक सफेद लिफाफा निकाल कर खोला.

अन्दर से एक कागज निकाला और पढ़ने लगा. मेरी नजरें उसके चेहरे से हटने को तैयार नहीं थीं. उसके होंठों पर मुस्कान तैर रही थी. यह जरूर इसका नियुक्ति पत्र होगा. ऐसी मुस्कान तो तभी चेहरे पर दिखती है. या फिर उसकी प्रेमिका का पत्र… जिसकी कल्पना ने उसके चेहरे की रंगत को और दमका दिया था. उसने पत्र वापस लपेट कर लिफाफे में डाला और टेबल पर रख कर कौफी सिप करने लगा. मैं अभी उसके बारे में अपनी धारणा को और विस्तार दे रही थी, कि अचानक वह उठ कर दरवाजे की ओर चल दिया.

अरे… उसका पत्र तो टेबल पर ही रह गया. मैं उसकी टेबल की तरफ झपटी कि उसका पत्र उठा कर उसे पकड़ा दूं. टेबल से पत्र उठाया, मगर एक क्षण में मेरे जहन में यह विचार कौंधा कि पत्र को खोल कर देखूं. आखिर इसमें ऐसा क्या था जिसको पढ़ कर वह इतना खुश था. मैं उसकी टेबल पर बैठ गई. लिफाफा खोल कर पत्र निकाला. वहां सफेद कागज पर अखबार की छोटी सी कटिंग चिपकी थी, उसकी फोटो के साथ, लिखा था – आतंकी संगठन हिजबुल के आतंकी उस्मान की तलाश में दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम कश्मीर रवाना… Family Story in Hindi.

Most Popular Story in Hindi: सहारा- क्या मोहित अपने माता-पिता का सहारा बना?

Most Popular Story in Hindi: अपने बेटेबहू के घर छोड़ कर अलग हो जाने के बाद मुझे यह एहसास बहुत सता रहा है कि मैं ने आप दोनों के साथ बहुत गलत व्यवहार किया है. अपनी बेटी को समझाने के बजाय मैं उसे भड़का कर हमेशा ससुराल से अलग होने की राय देती रही. अब मुझे अपने किए की सजा मिल गई है, बहनजी…आप मुझे आज माफ कर दोगी तो मेरे मन को कुछ शांति मिलेगी.’ पश्चात्ताप की आग में जल रही मीना ने जिस वक्त आरती से आंसू बहाते हुए क्षमा मांगी थी उस वक्त उमाकांत और महेश भी उस कमरे में ही उपस्थित थे.

जब आरती ने मीना को गले से लगा कर अतीत की सारी शिकायतों व गलतफहमियों को भुलाने की इच्छा जाहिर की तो भावविभोर हो उमाकांत और महेश भी एकदूसरे के गले लग गए थे.

आरती और महेश ने मीना और उमाकांत को अपने घर से 3 दिन बाद ही विदा किया था.

‘तुम ऐसा समझो कि अपनी बेटी की ससुराल में नहीं, बल्कि अपनी सहेली के घर में रह रही हो. तुम से बातें कर के मेरा मन बहुत हलका हुआ है. मुझे न कमर का दर्द सता रहा है न बहूबेटे के गलत व्यवहार से मिले जख्म पीड़ा दे रहे हैं. तुम कुछ ठीक होने के बाद ही अपने घर जाना,’ आरती की अपनेपन से भरी ऐसी इच्छा ने मीना को बेटी की ससुराल में रुकने के लिए मजबूर कर दिया था.

आने वाले दिनों में दोनों दंपतियों के बीच दोस्ती की जड़ें और ज्यादा मजबूत होती गई थीं. पहले एकदूसरे के प्रति नाराजगी, नफरत और शिकायतों में खर्च होने वाली ऊर्जा फिर आपसी प्रेम को बढ़ाती चली गई थी.

‘‘मां, आप के साथ क्यों नहीं आई हैं?’’ अलका के इस सवाल को सुन उमाकांत अतीत की यादों से झटके के साथ उबर आए थे.

‘‘कुछ देर में वे आती ही होंगीं. इसे फ्रिज में रख आ,’’ उमाकांत ने रसमलाई का डिब्बा अलका को पकड़ा दिया.

वे सब लोग जब कुछ देर बाद गरमागरम चाय का लुत्फ उठा रहे थे तब एक बार फिर घंटी की आवाज घर में गूंज गई.

दरवाजा खुलने के बाद अलका और मोहित ने जो दृश्य देखा वह उन के लिए अकल्पनीय था.

मोहित की मां आरती ने अलका की मां मीना का सहारा ले कर ड्राइंगरूम में प्रवेश किया. बहुत ज्यादा थकी सी नजर आने के बावजूद वे दोनों घर आए मेहमानों को देख कर खिल उठी थीं.

मोहित ने तेजी से उठ कर पहले दोनों के पैर छुए और फिर मां की बांह थाम ली. मीना के हाथ खाली हुए तो उन्होंने अपनी बेटी को गले लगा लिया.

अलका उन से अलग हुई तो राहुल अपनी दादी की गोद से उतर कर भागता हुआ नानी की गोद में चढ़ गया. सब के लाड़प्यार का केंद्र बन वह बेहद प्रसन्न और बहुत ज्यादा उत्साह से भरा हुआ नजर आ रहा था.

‘‘इस बार 2 कप चाय मैं बना कर लाता हूं,’’ उमाकांत ने अपना कप उठाया और चाय का घूंट भरने के बाद रसोई की तरफ चल पड़े.

उन की जगह चाय बनाने के लिए अलका रसोई में जाना चाहती थी पर आरती ने उस का हाथ पकड़ कर रोक लिया. Most Popular Story in Hindi.

Hindi Female Friendship Story: स्वरूपिनी- निहारिका चेन्नई से कौन-सी खूबसूरत याद लेकर आई?

Hindi Female Friendship Story: निहारिका अपने भाई के साथ चेन्नई गई तो उसे अपनी बचपन की दोस्त स्वरूपिनी मिली. अपनी दोस्ती की याद में जिस टौय कार को इन दोनों ने इतने साल संजो कर रखा था उस का राज वर्षों बाद खुला. क्या था वह राज? मैं यानी निहारिका दिल्ली में रहती हूं और यहां एक कंपनी में काम करती हूं. 2 साल ही हुए हैं मुझे नौकरी मिले हुए. पहले के एक साल कोरोना के चलते मैं वर्क फ्रौम होम कर रही थी.

अब एक साल से मुझे रोजाना ऑफिस आना पड़ता है. यों तो मुझे अपना काम बहुत पसंद है पर आज-कल इस में मेरा मन नहीं लग रहा. आज भी बड़े बेमन से ऑफिस आई और अपनी सीट पर बैठ गई. मन तो लग नहीं रहा था, बस, ऐसे ही थोड़ा-बहुत काम कर के लंच टाइम तक का वक्त गुजारा. लंच होते ही मैं खुश हो गई कि चलो आधा दिन तो निकल गया, तभी मेरे भैया का फोन आ गया. वो नोएडा में रहते हैं. वे मेरे सगे भाई नहीं हैं. मेरी मौसी के बेटे हैं पर प्यार मुझसे सगी बहन से भी ज्यादा करते थे. मैंने फोन उठाया और बातें करते-करते पूरा लंच ब्रेक ही खत्म होने को आया. फोन रखते हुए भैया ने पूछा, ‘‘सुन छोटी, मैं अगले हफ्ते चेन्नई जा रहा हूं. वहां कुछ काम है. तू अगर इतनी बोर हो रही है तो चल मेरे साथ. काम खत्म होने के बाद मैं तुझे चेन्नई घुमा दूंगा. वैसे भी अगले हफ्ते वीकैंड के साथ फ्राइडे का भी ऑफ है. पहले दिल्ली आ कर तुझे ले लूंगा, फिर साथ में चलेंगे. फ्राइडे मॉर्निंग जाएंगे, सनडे इवनिंग तुझे घर पर छोड़ दूंगा.’’ ‘‘भैया, चलना तो मैं भी चाहती हूं पर मम्मी-पापा पता नहीं मानेंगे या नहीं. यहीं आस-पास की बात होती तो कोई बात नहीं. चेन्नई थोड़ी दूर है और आप तो जानते ही हैं कि वे मेरी कितनी ज्यादा चिंता करते हैं.’’ ‘‘उन से तो मैंने पहले ही बात कर ली है, छोटी. वे मान गए हैं,’’ भैया ने कहा. ‘‘थैंक्यू सो मच, भैया तो फिर अगले हफ्ते चलते हैं.’’ उस रात को जब मैं अपने घर की बालकनी में खड़ी थी, तब ही उस का ध्यान आया.

वह भी तो चेन्नई से ही थी मेरी सबसे अच्छी दोस्त पर एक दिन बस इस चीज को मुझे पकड़ा कर यूं अचानक ही चली गई. कितनी याद आती है आज भी, जब उसके बारे में सोचती हूं. तभी तो आज तक इसे अपने बैग से लगाए घूम रही हूं. आज चेन्नई के बारे में बात होते ही उससे जुड़ी सारी यादें ताजा हो गईं. जब वहां जाऊंगी तो उसकी कितनी याद आएगी. यह सब सोचते हुए और उस चीज को पकड़े हुए कब बालकनी के सोफे पर सो गई, पता ही न चला. अगले हफ्ते बुधवार को ही भैया आ गए और शुक्रवार की सुबह हम चेन्नई के लिए रवाना हो गए. करीब 12 बजे हम चेन्नई पहुंच गए. एयरपोर्ट पर ही भैया के नाम की नेमप्लेट लिए एक शख्स खड़ा था. वह हमें एक बहुत ही सुंदर से रिजॉर्ट में ले गया. रिजॉर्ट आते वक्त मैंने समंदर और बीच देखे थे. मैंने तभी भैया से कहा था कि यहां हम जरूर आएंगे.

रिजॉर्ट में आते ही भैया के ऑफिस से फोन आया और मुझे वहां छोड़ कर वे अपने काम पर चले गए. मैंने उस के बाद रिजॉर्ट घूमा और शाम तक वहां पास में ही एक बुक कैफे में बुक्स पढ़ती रही. तभी भैया का फोन आया कि उन का काम खत्म हो गया है और वे मेरा रिजॉर्ट के गेट पर इंतजार कर रहे हैं. मैं थोड़ी देर में ही वहां पहुंच गई और हम उस बीच पर जाने के लिए निकल पड़े, जो सुबह यहां आते समय देखा था. उस बीच के पास ही बहुत सुंदर मेला भी लगा हुआ था. मैं वहां से कुछ सामान ले रही थी, तभी पीछे से एक आवाज आई, ‘‘रानी… रानी, सुनो. वहीं रहो, मैं आ रही हूं.’’ यह सुन कर मैं हैरान हो गई कि मुझे कौन इस नाम से बुला रहा है. यह नाम तो मेरा कोई भी नहीं जानता और दादी के अलावा तो कोई भी इस नाम से मुझे बुलाता भी नहीं है. ये नाम तो भैया को भी शायद ही पता होगा.

मैं अभी सोच ही रही थी कि वही आवाज फिर पीछे से आई. मैंने पीछे की ओर मुड़ कर देखा तो एक थोड़ी हैल्थी-सी लड़की मेरी तरफ जल्दी-जल्दी चलती हुई आ रही है और मुझे रुकने के लिए कह रही है. जैसे ही वो मेरे पास आई तो मैंने पूछा कि आप कौन हैं? ‘‘मुझे पहचान नहीं पाई हो क्या तुम?’’ मैंने कहा, ‘‘नहीं.’’ ‘‘देखो, तुम्हारे बैग पर जो चीज लगी है, वैसी ही मेरे पास भी है.’’ यह देख कर तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि वह कोई आम चीज तो है नहीं कि सब के पास हो या किसी भी दुकान पर आसानी से मिल जाए. यह तो केवल 2 ही हैं. एक, उस के पास और एक मेरे पास.

अभी मैं सोच ही रही थी कि उस ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही हो?’’ ‘‘कुछ नहीं,’’ और कहा, ‘‘स्वरूपिनी, तुम इतने सालों बाद…’’ ‘‘हां, मैं तुम्हारी दोस्त स्वरूपिनी. अब पहचान गई न मुझे. विश्वास ही नहीं हो रहा कि तुम इतने सालों बाद कैसे? और तुम ने मुझे पहचान कैसे लिया?’’ ‘‘बस, इस चीज के ही कारण. मैंने तुम्हें भीड़ में भी पहचान लिया. मैं बहुत बार दिल्ली में वहां पर गई थी, जहां हम पहले रहते थे. पर पता चला कि तुम भी कहीं और चली गई हो.’’ ‘‘हां, तुम्हारे वहां से अचानक जाने के बाद मेरे मम्मी-पापा ने भी कहीं और घर ले लिया था.’’ तभी स्वरूपिनी बोली, ‘‘याद है तुम्हें कि हम बचपन में साथ में कितना खेलते थे?’’ ‘‘हां, पर तुम्हारे पापा ने अचानक ट्रांसफर ले लिया था, क्योंकि तुम्हारे दादा की तबीयत ठीक नहीं रहती थी और तुम्हें वहां उन के पास जाना पड़ा था.’’

‘‘हां, इस वजह से अप्पा ने अपना ट्रांसफर हमारे होमटाउन चेन्नई में लिया था. ‘‘देखो, उस के बाद आज मिलना हुआ है,’’ तभी स्वरूपिनी ने पूछा, ‘‘वैसे, तुम बताओ रानी कि तुम यहां चेन्नई में क्या कर रही हो?’’ तभी मैंने उसे भैया से मिलवाया. ‘‘इनके साथ इन के काम के लिए और थोड़ा घूमने के लिए आई थी.’’ स्वरूपिनी ने तभी वक्त देखा और कहा कि, ‘‘देख रानी, मुझे अभी जाना होगा. कल ऐसा कर तू घर आ जा. पूरा दिन वहां आराम से बात करेंगे.’’ मैंने कहा, ‘‘नहीं, तुम ही रिजॉर्ट आ जाना. मुझे यहां की भाषा नहीं आती तो तुम्हारे घर आने में दिक्कत होगी और भैया को भी अपने काम से जाना है. इसलिए तुम रिजॉर्ट आ जाना.’’ उसे मैंने रिजॉर्ट का पता दिया और कहा कि चलो, कल मिलते हैं. मुझे तो अभी भी ये यकीन नहीं हो रहा था कि मुझे अपनी सबसे अच्छी दोस्त से वापस मिलना हो पाया है. अगले दिन वक्त से पहले ही स्वरूपिनी रिजॉर्ट पहुंच गई. आते ही उसने सबसे पहले मेरी अपने अम्मा-अप्पा से वीडियो कॉल पर बात करवाई. फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया. पिछले 15 वर्षों की बातें सब आज एक-दूसरे को बता रहे थे. बातों ही बातों में स्वरूपिनी ने पूछा कि इतने सालों में तुम ने मुझे फोन क्यों नहीं किया? मैंने कहा कि तुम्हारा नंबर ही कहां था. उस सुबह जब मैं स्कूल बस का इंतजार कर रही थी, मेरे पास तुम भागी-भागी आई थीं.

मुझे यह टॉय कार थमा कर और इतना ही कह कर चली गई कि तुम्हारे अप्पा ने तुम्हारे शहर चेन्नई में ही ट्रांसफर ले लिया है और तुम्हें अभी जाना पड़ रहा है. ‘‘हां रानी, उससे एक रात पहले दादा की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी. तभी अप्पा ने अचानक चेन्नई ट्रांसफर होने का फैसला किया. हम जरूरत का सामान लेकर अगली सुबह चेन्नई के लिए निकल पड़े.’’ ‘‘अच्छा रानी, तुम ने इतने वर्षों में मुझे एक बार भी फोन नहीं किया. याद नहीं किया क्या मुझे’’ ‘‘मैंने कहा न कि तुम्हारा नंबर नहीं था मेरे पास.’’ ‘‘क्या बात कर रही हो, रानी? नंबर तो मैं तुम्हें दे कर गई थी.’’ ‘‘तुम मुझे बस यह टॉय कार पकड़ा कर गई थीं.’’ ‘‘हां तो इसी में तो था न मेरा नंबर.’’ ‘‘इस छोटी-सी टॉय कार में?’’ ‘‘हां बाबा, इस में. तुम ने इसे खोल कर कभी देखा नहीं क्या?’’ ‘‘क्या यह खुलती भी है?’’ ‘‘हां, तुम्हें याद होगा, जब मेरे अप्पा ने नई गाड़ी ली थी, तब उस शोरूम के मालिक ने उस गाड़ी की जैसी मुझे 2 टॉय कारें भी दी थीं. ये लाल वाली मैंने तुम्हें दी थी और हरी वाली मेरे पास है. यह देखो.’’

‘‘हां, यह तो मुझे पता है पर यह खुलती है, यह मुझे पता नहीं है.’’ ‘‘हां, इसलिए तो इस में अपना नंबर मैंने एक परची में लिख कर रख दिया था और तुम्हें इस को पकड़ा कर चली गई थी. सोचा कि तुम्हें जैसे ही मेरा नंबर मिल जाएगा, तुम मुझे फोन कर लोगी, रानी.’’ ‘‘मुझे तो इतने वर्षों में पता ही नहीं चला कि यह टॉय कार खुलती भी है.’’ ‘‘लाओ, अपनी गाड़ी मुझे दो. मैं खोल कर दिखाती हूं.’’ स्वरूपिनी ने जैसे ही उसे खोला. उस में से एक छोटी-सी परची निकली, जिस पर उस ने अपना नंबर लिख रखा था. उस ने कहा कि यह वही नंबर है, जो उस ने कल रात मुझे दिया था. ‘‘पता है रानी, तुम्हारे फोन का मैंने कितना इंतजार किया, इसलिए आज तक अपना नंबर मैंने नहीं बदला.’’ ‘‘मुझे माफ करना स्वरूपिनी, मुझे नहीं पता था कि इस गाड़ी में ही तुम्हारा नंबर है. पता है, तुम्हारे जाने के बाद तो कोई दोस्त भी नहीं बना पाई. पता होता कि तुम्हारा नंबर इस में ही है तो इतने वर्ष तुम्हारा इंतजार करने के बजाय तुम्हें रोज फोन कर के घंटों बात करती.’’ ‘‘छोड़ो रानी, जो होना था हो गया. अब हम कभी भी एक-दूसरे से दूर नहीं जाएंगे. अब हम कहीं भी रहें पर एक-दूसरे के संपर्क में रहेंगे.’’

‘‘मेरा तो वैसे भी अपने पति के काम के सिलसिले में दिल्ली आना-जाना लगा ही रहता है. हम तब मिल भी लिया करेंगे.’’ मैं स्वरूपिनी की ये सब बातें सुन कर रोने लग गई तो वो कहने लगी कि चलो, अब जो हो गया उसे छोड़ दो. अब तो हम मिल ही गए न. फिर हम यूं ही और काफी देर तक बातें करते रहे. आज इस बात को 3 वर्ष हो गए हैं. अब मैं और स्वरूपिनी रोज ही बात करते हैं. अब जब भी वो दिल्ली आती है, मुझसे मिले बिना नहीं जाती. सच में मेरी चेन्नई की यह यात्रा तो बहुत ही यादगार रही. इस ने मुझे मेरी वर्षों पुरानी दोस्त से जो मिला दिया और मुझे अब यह भी तो समझ आ गया था कि क्यों उस सुबह वह मुझे टॉय कार दे कर गई थी. मैं आज भी भैया को धन्यवाद बोलती हूं कि वे मुझे अपने साथ चेन्नई ले गए, वरना मैं तो शायद कभी भी अपनी दोस्त से दोबारा मिल ही न पाती. Hindi Female Friendship Story.

Modern Lifestyle: अब नहीं दिखते ड्राइंग रूम में बुक शेल्फ

Modern Lifestyle: “धनिया ने झल्लाकर कहा – ‘तुम्हें तो बस यही सुध रहती है कि लोग क्या कहेंगे! लोग तो जुबान के पक्के नहीं हैं, आज कहेंगे कुछ, कल कुछ. तुम्हारा घर जले या बचे, उन्हें क्या? लेकिन मैं अपने मन से क्यों जलूँ? तुम मर जाओ तो तुम्हारी आत्मा को कौन गोदान करेगा? गोदान बिना तो आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती, यह भी तो सुनो!’

होरी ने सिर झुकाकर कहा – ‘हाँ धनिया, यही तो चिंता है. मरने से क्या डर? लेकिन गोदान बिना मुक्ति कैसे मिलेगी?’

धनिया ने गंभीर स्वर में कहा – ‘मुक्ति कर्म से मिलती है, दान से नहीं. जिसने जीवन भर अन्याय नहीं किया, झूठ नहीं बोला, छल नहीं किया, वही मुक्त है. जिसके पास देने को कुछ नहीं, वह भी क्या नरक जाएगा?’”

यह अंश है हिंदी के महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की महान कृति ‘गोदान’ का. धनिया और होरी के बीच यह संवाद ग्रामीण जीवन की गहराई, मजबूरी और गरीब पर दान दक्षिणा करने के लिए सवर्ण के दबावों को बखूबी दर्शाता है. किताब में कई स्थानों पर पति पत्नी के संवाद कई गंभीर सवाल पैदा करते हैं, जो पढ़ने वाले की अक्ल और संवेदना के दरवाजे भी खोलते हैं. एक जगह जहां होरी अपने बैल को बेचने की मजबूरी में कातर दृष्टि से उन्हें देख रहा है, वहीं उसका प्यारा बैल उससे मूक वार्ता करता दिखता है, उस अंश को पढ़ कर आँखें भीग जाती हैं.

होरी ने अपनी लाठी उठाई और बैल के पास जाकर खड़ा हो गया. बैल उसके सामने उदास-सा मुँह झुकाए खड़ा था, मानो समझ रहा हो कि अब उसका मालिक उसे बेचने जा रहा है.

होरी की आँखों में आँसू आ गए. वह बोला – “तू मेरा कितना साथी रहा है रे! खेत जोते हैं, हल खींचा है, तू भी तो मेरे साथ दिन-रात धूप-बरसात झेलता रहा. पर क्या करूँ, मजबूरी है. जब घर में खाने को अन्न न हो तो बैल भी बेचने पड़ते हैं.”

बैल की आँखों में भी जैसे नमी-सी थी. होरी ने उसे प्यार से सहलाया और हृदय में जैसे किसी ने चाकू घोंप दिया हो.

“किसान की यही किस्मत है,” उसने मन ही मन कहा, “जिंदगी भर जो कमाता है, वह दूसरों के हाथ चला जाता है.”

ऐसी दिल को छू लेने वाली बातें, संवेदनाओं को झकझोर देने वाले मार्मिक प्रसंग क्या यूट्यूब की किसी रील में मिलेंगे? कंप्यूटर पर किसी ईबुक को पढ़ कर उस तरह का अहसास कभी जाग ही नहीं सकता, जो अहसास पुस्तक को अपने हाथ में लेकर घर के किसी खामोश कोने में बैठ कर पढ़ने पर जागता है. प्रेमचंद का उपन्यास हाथ में हो तो उसकी एक एक पंक्ति आपकी आँखों के सामने एक चलचित्र सी गुजरती प्रतीत होती है.

प्रेमचंद ही नहीं किसी भी अच्छे लेखक की पुस्तक आप जब हाथ में लेकर पढ़ते हैं तो वह आपके भीतर तक समा जाती है. आपके अंदर एक रोमांच पैदा करती है. सवाल उठाती है. आपको विचारशील बनाती है. जवाब देने के लिए उकसाती है. मगर जब आप वही पुस्तक ऑनलाइन पढ़ते हैं तो ऐसा कुछ भी नहीं होता है. ईबुक में क़ाफीकुछ काटछांट भी होती है जिससे लेखक की कही पूरी बात पाठक तक नहीं पहुंच पाती.

राहुल सांकृत्यायन की प्रसिद्ध कृति “वोल्गा से गंगा” भारतीय साहित्य की एक ऐतिहासिक और वैचारिक रूप से गहन रचना है. यह केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के विकास, समाज, संस्कृति और विचारधाराओं की यात्रा का जीवंत दस्तावेज है. “वोल्गा से गंगा” का अर्थ है – रूस की वोल्गा नदी से लेकर भारत की गंगा नदी तक की यात्रा. इसमें लगभग 6000 वर्षों की मानव सभ्यता की यात्रा को दर्शाया गया है. यह कहानी मानव समाज, संस्कृति, विचार, श्रम, प्रेम और संघर्ष की विकास गाथा है. इसे आप ऑनलाइन पढ़ कर क्या मजा ले पाएंगे? इसे तो किसी सूने कोने में तन्मय होकर पढ़ने में ही आनंद है.

इस पुस्तक के एक अंश “स्नेह का स्रोत” से –

“मनुष्य का सबसे बड़ा बल उसका मस्तिष्क है. वही उसे पशु से अलग करता है. जब वह अपनी बुद्धि का प्रयोग करना सीख गया, तभी से उसने प्रकृति को जीतना शुरू किया. आरंभ में वह जंगली जानवरों की तरह रहता था. उसके पास न वस्त्र थे, न घर. लेकिन उसने पत्थर को हथियार बनाया, आग की खोज की, और धीरे-धीरे समाज बनाया. आज वह सोचता है, बोलता है, और दूसरों के सुख-दुख में भाग लेता है – यही है उसकी असली मनुष्यता. प्रेम और स्नेह ही वे धागे हैं जिनसे मनुष्य-समाज बुना गया है. जिस दिन यह स्नेह टूट जाएगा, उस दिन सभ्यता भी समाप्त हो जायेगी.”

यह पूरी किताब इतिहास और कल्पना का सुंदर मिश्रण है. इसमें कहानी और इतिहास का ऐसा संयोजन है जिससे पाठक अतीत के जीवन को महसूस कर पाता है. मानव सभ्यता की यात्रा, जिसमें आदिम समाज से लेकर आधुनिक समाज तक, विचारों, धर्मों और सामाजिक संरचनाओं के विकास का क्रम दिखाया गया है. सामाजिक चेतना और वैज्ञानिक दृष्टि को उकेरते सांकृत्यायन ने जहाँ अंधविश्वासों, वर्गभेद और धार्मिक पाखंड का घोर विरोध किया है वहीं वे विज्ञान, तर्क और समानता का समर्थन करते नजर आते हैं. उनकी इस कृति में समाजवाद, मानवतावाद और इतिहास-चिंतन की गहरी छाप मिलती है. “वोल्गा से गंगा” सिर्फ एक उपन्यास नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की विकासगाथा है, जो यह दिखाती है कि कैसे विचार, संस्कृति और समाज समय के साथ बदलते और विकसित होते हैं. इस विवरण को आप तभी आत्मसात कर सकते हैं जब पुस्तक आपके हाथ में हो.

युवल नूह हरारी की प्रसिद्ध पुस्तक “Sapiens: A Brief History of Humankind” (सेपियंस: मानव जाति का संक्षिप्त इतिहास) में कई ऐसे हिस्से हैं जो अत्यंत रोचक और विचारोत्तेजक हैं. एक खास अंश जो किताब का सार और उसकी गहराई दोनों दिखाता है-

“कल्पना की शक्ति” (The Power of Imagination), हरारी लिखते हैं – “लगभग 70,000 साल पहले, Homo sapiens ने एक ऐसी चीज़ विकसित की, जिसने उसे बाकी सभी प्रजातियों से अलग कर दिया – कल्पना करने की क्षमता. यह वही शक्ति थी जिसने इंसान को ऐसे विचारों पर विश्वास करने की क्षमता दी जो असल में मौजूद नहीं थे – जैसे देवता, राष्ट्र, कानून और पैसा. ये सब सामूहिक कल्पनाएँ हैं, लेकिन इन्हीं कल्पनाओं ने लाखों लोगों को एक साथ जोड़ दिया. कोई भी दो चिंपैंज़ी कभी मिलकर ‘मानवाधिकारों’ या ‘फ्रांस गणराज्य’ की बात नहीं करेंगे. मगर मनुष्य, इन कल्पनाओं पर भरोसा कर, विशाल समाज, सेनाएँ और धर्म खड़े कर सकता है. यही वह छलांग थी जिसने हमें ग्रह की सबसे शक्तिशाली प्रजाति बना दिया.”

हरारी बताते हैं कि मनुष्य का असली विकास सिर्फ शारीरिक नहीं था, वह वैचारिक था. मनुष्य ने जब अमूर्त चीजों पर विश्वास करना सीखा, तभी सभ्यता, धर्म, राजनीति, और संस्कृति का जन्म हुआ. हरारी कहते हैं कि मानव समाज सिर्फ मांस और हड्डियों से नहीं बना है, बल्कि कहानियों, मिथकों और विश्वासों के जाल से बना है. इन्हीं ने मनुष्यों को संगठित समाज, सभ्यता और साम्राज्य बनाने की शक्ति दी.

ऐसा गूढ़ ज्ञान और ऐसी रोचक बातें किसी यूट्यूब चैनल, किसी ईबुक, किसी ब्लॉग आदि में पढ़ने को नहीं मिलेंगी. इन पुस्तकों को यदि आपने हाथ में लेकर नहीं पढ़ा, आप ज्ञान, मनोरंजन, संवेदना और जीवन के गूढ़ अहसासों से बहुत दूर एक छिछले स्तर के जीवन में हैं. शायद इसीलिए आपकी बातों में गहराई नहीं है. न आपका लोगों पर विश्वास है और न लोगों को आप पर. आपके इर्दगिर्द तमाम रिश्ते सतही हैं.

आज के तकनीकी दौर में  जब लोग ज्ञान के नाम पर केवल “फास्ट कंटेंट” उपभोग कर रहे हैं, वे असली अनुभव, चिंतन और आत्मिक परिपक्वता से दूर होते जा रहे हैं.  गूढ़ ज्ञान और जीवन की सच्ची अनुभूतियां किसी यूट्यूब चैनल, ई-बुक या ब्लॉग में नहीं मिलेंगी. इन अनुभूतियों को महसूस करने के लिए पुस्तकों को हाथ में लेकर पढ़ना पड़ता है – शब्दों की गंध, पन्नों का स्पर्श, और लेखक के मन की यात्रा के साथ.

डायरेक्टर सीबीआई रहे स्वर्गीय जोगिंदर सिंह के घर के ड्राइंग रूम में प्रवेश करने पर सबसे पहले किताबों की अनेकों रैक नजर आती थीं. जो किताबों से ठसाठस भरी थीं. अनेकानेक किताबें – जिसमें से कुछ उनकी स्वयं की लिखी हुई थी और बाकी बड़े बड़े ऑथर्स की, जिनमें कई बड़े विदेशी ऑथर्स भी थे. किताबें हर विषय की थीं. उस ड्राइंग रूम में जिसके एक कोने में एल-शेप में दो पुराने सोफे और उनके आगे एक साधारण सी मेज पड़ी थी. दूसरे कोने में एक तिकोनी सी छोटी मेज पर एक फ्लॉवर-वाज में कुछ ताजे फूल और उसके नीचे की शेल्फ में एक डायरी और पेन पड़ा था. उस बेहद साधारण से कमरे में जो असाधारण आकर्षण था, वह था वहाँ रखी हजारों किताबें. अनमोल किताबें. ज्ञान का अथाह समुद्र.

पुराने अफसरों, विद्वानों, शिक्षकों के घरों में ड्राइंग रूम में बुक शेल्फ, बुक कार्नर या शीशे की अलमारी में करीने से सजी किताबें आज भी दिखाई देती हैं. उच्च शिक्षित अधिकारियों-विद्वानों के घरों में छोटी लाइब्रेरी के लिए भी स्थान होता है. जिसमें अच्छे लेखकों की लिखी पुस्तकें, अच्छी पत्र-पत्रिकाओं का संग्रह होता है. ऐसे परिवार ज्ञान और प्रेम से भी परिपूर्ण नजर आते हैं. क्योंकि मन को तृप्त और संतुष्ट करने की क्षमता, रिश्तों की गहराई समझाने और मजबूत बनाने वाली ताकत सिर्फ पुस्तकों में होती है, यह बात ज्ञानीजन बेहतर समझते हैं.

गौरतलब है कि मनुष्य की जिज्ञासा ही उसे अन्य प्राणियों से अलग बनाती है. यह जिज्ञासा ज्ञान की प्यास में बदल जाती है और इस प्यास को शांत करने का सबसे सच्चा माध्यम पुस्तकें हैं. ज्ञान की प्यास अन्य किसी माध्यम से शांत नहीं होती. अच्छी पुस्तकें न केवल जानकारी देती हैं, बल्कि मन को गहराई से तृप्त और संतुष्ट करती हैं. जब मन जीवन की उलझनों, शोर और भ्रम से थक जाता है, तब किताबें ही उसे एक शांत आश्रय देती हैं. ऐसा आश्रय जहाँ विचारों की गहराई, कल्पना की उड़ान और आत्मचिंतन की शान्ति एकसाथ मिलती है.

एक किताब में उसके लेखक के तीस-चालीस साल के जीवन का अनुभव समाया होता है. जिसे आप तीन से चार घंटे में पढ़ लेते हैं. एक अच्छी पुस्तक या पत्रिका के पन्नों में डूब कर जो आनंद प्राप्त होता है, वह किसी भौतिक वस्तु या यूट्यूब की रील्स के क्षणिक सुख से नहीं मिल सकता. पुस्तकें केवल ज्ञान नहीं देतीं, वे आत्मा को समृद्ध करती हैं, मन को शांत करती हैं और जीवन को अर्थपूर्ण बनाती हैं.

एक समय था जब ज्यादातर घरों में सबसे सजीला कोना बुक शेल्फ हुआ करता था, जहां किताबें सिर्फ रखी ही नहीं जाते थीं, बल्कि घर के संस्कारों की गवाही भी देती थीं. किसी के घर में जाते ही किताबों की खुशबू और उनके शीर्षक यह बता देते थे कि घर वाले कितने विचारशील हैं. ड्राइंग रूम की सेन्ट्रल टेबल पर भी अच्छी पत्रिकाओं का जमावड़ा होता था. पर अब समय बदल गया है. दीवारों पर सजावट के लिए महंगी पेंटिंग्स और शोपीस लगने लगे हैं. किताबें गायब हो चुकी हैं. शायद इसलिए कि लोगों को अब ज्ञान से ज्यादा दिखावे की परवाह है. घरों से बुक शेल्फ, बुक कार्नर का गायब होना सिर्फ ज्ञान-विज्ञान से दूर होना ही नहीं बल्कि संस्कृति का भी क्षरण है.

आज लोगों के पास खूब पैसा है. शहरीकरण बहुत तेजी से बढ़ रहा है. गगनचुम्बी अट्टालिकाएं बन रही हैं. चमचमाते फ्लैट्स में हर तरह की सुख सुविधा है. ठेकेदार-बिल्डर्स नए नए डिजाइन के मकान बना रहे हैं. जिसमें एक कोना भगवान के मंदिर के लिए है तो दूसरे कोने में छोटा सा बार भी है. ड्राइंग रूम में ग्लास वाल, किचन में मॉड्यूलर सेटअप, अगर कुछ गायब है तो वह है बुक कॉर्नर. दिखावे की दौड़ती-भागती दुनिया में उसको बनाने का ख्याल भी किसी को नहीं आता. घरों में किताबों के लिए न जगह बची है और न समय.

कामिनी जैन की दादी कॉलेज की प्रिंसिपल थीं. घर में पढ़ने लिखने का माहौल था. कामिनी ने बचपन से ही अपने घर में किताबों का बड़ा भण्डार पाया था. मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ महादेवी वर्मा, सुमित्रनंदन पंत जैसे हिंदी के श्रेष्ठ लेखकों की रचनाएं तो उसने नवीं कक्षा तक पहुंचते पहुंचते ही पढ़ डाली थीं. अनेक कवियों और शायरों की रचनाएं भी उसे कंठस्थ थीं. कभी किसी मंच पर कोई व्याख्यान होता, विचार विमर्श होता या भाषण देने का अवसर आता तो कामिनी सबसे आगे होती थी. अपने स्कूल-कॉलेज में उसने इतने पदक प्राप्त किये, जिनकी गिनती नहीं थी.

कामिनी की शादी दिल्ली के एक अमीर परिवार में हुई. उसके मायके के मकान के मुकाबले में पति का तीन फ्लोर वाला आलीशान घर, चमचमाते फर्श, छत से लटकते मूल्यवान झूमर (chandelier) और दीवारों पर टंगी बहुमूल्य पेंटिंग्स को देख कर उसकी आँखें चौंधिया गयीं. दो-तीन दिन के बाद जब उसने मायके से लाये अपने सामान को खोल कर अपने कमरे में सजाना शुरू किया तो सबसे पहले उसने एक शेल्फ में अपनी कुछ अच्छी किताबें सजायीं, जिन्हें वह जितनी बार भी पढ़ती, उसे उनमें नयापन ही लगता था. शाम को पति आये तो उस शेल्फ पर किताबें देख कर भड़क उठे. बोले – ये सड़ी-गली किताबें कहाँ से उठा लाई हो? फेंकों इन्हें. पूरे कमरे की शो खराब कर रही हैं.

कामिनी पति की बात सुन कर सन्न रह गयी. उन्हें किताबों का महत्व समझाना चाहा तो तो वे और ज्यादा बिगड़ने लगे. उसको मिडिल क्लास मेंटालिटी का बता कर अपनी सोच बदलने और अमीर खानदान की बहू की तरह व्यवहार करने की सीख देकर बोले – ये कबाड़ हटाओ यहां से और जो कीमती शोपीस यहां सजे थे उन्हें वापस लगाओ.

आज कामिनी की शादी को पांच साल हो गए हैं. पांच साल से उसकी किताबें पलंग के भीतर बने बॉक्स में कैद हैं. हर रात वह पति के साथ उस पलंग पर लेट कर सोचती है – काश मैं अपनी किताबों को इस कैद से मुक्त कर पाऊं. उसका मन उन्हें पढ़ने के लिए छटपटाता है. पति की रोमांटिक बातों में उसे कोई रस नहीं आता. वह किसी कविता की कोई पंक्ति कह उठती है तो पति के सिर के ऊपर से निकल जाती है. कुंद बुद्धि, जो किताबों को कबाड़ समझता हो, उसे भला कविता किस तरह समझ में आएगी? पांच साल में ही उसका आलिशान महल कामिनी को उजड़ा हुआ मकबरा लगने लगा है. जहां ज्ञान की कोई जगह नहीं है. अब वह इस मकबरे से बाहर निकलने के लिए छटपटा रही है.

आज के डिजिटल युग में वह समय कहीं खो गया है, जब घरों में बुक शेल्फ केवल सजावट का हिस्सा नहीं, बल्कि परिवार के विचारों, रुचियों और बौद्धिक पहचान का प्रतीक हुआ करती थी. लोगों के लिए किताबें सिर्फ पढ़ने का साधन नहीं, बल्कि जीवन का अहम हिस्सा थीं. किताबें व्यक्ति का व्यक्तित्व ही नहीं उसकी सोच, उसके आदर्शों और कल्पनाशीलता को उजागर करती थीं. अगर किसी बुक शेल्फ पर क्लासिक साहित्य, दर्शन या विज्ञान की किताबें होती थीं, तो यह घर के लोगों की गहरी सोच को दर्शाती थी. वहीं, रोमांचक उपन्यास या यात्रा वृत्तांतों का संग्रह परिवार के जिज्ञासु और साहसी स्वभाव का संकेत देता था.

आज का समाज जो किताबों से दूर होता जा रहा है, उसे यह समझने की जरूरत है कि किताबें संस्कारों की धरोहर होती हैं. बुजुर्गों की बुक शेल्फ भावी पीढ़ियों के लिए एक विरासत की तरह होती थी. बच्चों को अपने माता-पिता और दादा-दादी की पसंदीदा किताबों के माध्यम से उनके मूल्यों और विचारों को समझने का मौका मिलता था. एक घर में पुस्तकालय का होना, बच्चों के भविष्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है.

किताबें ही ज्ञान और शांति का केंद्र हैं. किताबों की धीमी, मीठी खुशबू और उनकी उपस्थिति एक शांत और चिंतनशील वातावरण बनाती है. घर में किताबों का कोना परिवार के लिए डिजिटल दुनिया से दूर एक सुकून भरी जगह होता है. मेहमानों के आने पर यह कोना चर्चा का केंद्र बन सकता है, जहां विचारों का आदान-प्रदान हो.

किताबें इंसान को इतिहास से जोड़ती हैं. पुरानी किताबें अपने दौर के कागज, जिल्द और प्रिंटिंग की गुणवत्ता के कारण भी विशेष महत्व रखती हैं. वे अपने समय और इतिहास का एक हिस्सा हैं, जिन्हें छूना और महसूस करना एक अनूठा अनुभव देता है.

आजकल के डिजिटल युग में, ई-बुक्स और इंटरनेट की सुविधा ने भले ही भौतिक किताबों की जगह ले ली है, लेकिन एक भरी हुई बुक शेल्फ का अपना आकर्षण होता है. जिस पुस्तक के पन्ने हम हाथों से स्पर्श कर पलटते हैं, उनका अनुभव डिजिटल बुक के अनुभव से कहीं गहरा होता है. किताबों के अभाव में यूट्यूब और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटियों से ज्ञान पाने का डंका पीटने वाले छिछली सोच और सतही रिश्तों के साथ जी रहे हैं. उनमें न तो कोई गहराई है और ना स्थायित्व. किताबों के बिना घर और समाज में कोई ज्ञान नहीं बल्कि सिर्फ एक शोर है. Modern Lifestyle

Retirement Planning: ऐसी तैयारी रखें कि आपका बुढ़ापा किसी पर बोझ न हो

Retirement Planning: पार्क के कोने वाली सीट पर दो बूढ़ी महिलाएं आपस में अपने-अपने दुखड़े बांट रही थीं. इनमें से एक थीं 77 वर्षीय रजनी बाला और दूसरी उनकी दूर के रिश्ते की भाभी स्नेहलता कौशिक, जिनकी उम्र भी लगभग 75 वर्ष है. दोनों के घर आसपास ही हैं, लिहाजा शाम की सैर पर दोनों साथ ही पार्क में आती हैं. दोनों महिलाएं पढ़ी लिखी और अच्छे खाते पीते परिवार की हैं. दोनों के पति अच्छी जॉब से रिटायर हुए हैं. दोनों के बेटे ही नहीं, बल्कि बहुएं भी अच्छी जॉब में हैं. रजनी बाला का एक पोता और स्नेहलता के पास एक पोता और एक पोती हैं. तीनों बच्चे अपनी किशोरावस्था में हैं. घर में नौकर हैं, ड्राइवर है. अच्छा बैंक बैलेंस है. यानी किसी चीज की कोई कमी नहीं है मगर शिकायतें फिर भी बहुत हैं.

रजनीबाला को शिकायत है कि उनके पति अपना सारा समय टीवी या कंप्यूटर पर बिताते हैं. बेटा बहू सारा दिन ऑफिस में रहते हैं, शाम को आते हैं तो दोनों अपने कमरे में एक दूसरे के साथ होते हैं. पोता भी टीवी  या मोबाइल फ़ोन पर ज्यादा समय बिताता है और उनके पास बहुत कम बैठता है. ऐसे में वे सबके होते हुए भी घर में बहुत अकेली हैं. उनकी शिकायत है कि उनका दुःख दर्द बांटने वाला कोई भी नहीं है.

रजनी बाला अपनी भाभी से बता रही थीं कि उनकी बहू कुसुम ने उनके पोते को पता नहीं क्या पाठ पढ़ा दिया है कि अब वह उनके पास भी आकर नहीं बैठता. वे स्नेहलता से बोलीं – ”छोटा था तो सारा दिन मेरी गोद से नहीं उतरता था. बहू तो ठाठ से सजधज कर ऑफिस चली जाती थी, अंकुर को देखने की जिम्मेदारी मेरी थी. मैं ही उसे समय से दूध पिलाती, खाना खिलाती, उसके नैपकिन बदलती, उसको दुलारती और सुलाती थीं. वो स्कूल जाने लगा तब भी उसके बहुत सारे काम मैं ही करती थीं. कभी कभी उसको स्कूल से लेने भी जाती थीं. मगर छठी कक्षा में आने के बाद तो उसने ऐसी दूरी ही बना ली है, जैसे मैं उसकी दुश्मन हूँ. मेरी हर बात अनसुनी कर देता है. कई कई बार आवाज लगाओ तब कहीं मेरे कमरे में आता है. चार काम बताओ तो एकाध काम ही करता है. बहू से कहो तो बोलती है – मां जी, अंकुर अपनी स्टडी कर रहा है. आप बार बार आवाज देती हैं तो वह डिस्टर्ब होता है. हो ना हो, बहू ने ही उसको मेरे पास आने से मना किया है.”

स्नेहलता ने उनकी बातों से सहमति जताते हुए कहा, ”यही हाल तो मेरे घर का भी है. मेरे ग्रैंड चिल्ड्रन भी बस अपने में ही मगन रहते हैं. दादा दादी से तो कोई मतलब ही नहीं है. हम कुछ पूछें तो उलटा ही जवाब देते हैं. सब बहू के सिखाये पढ़ाये में हैं. अभी नानी का फ़ोन आ जाए तो घंटों बात करते हैं, मगर मुझसे बात करने के लिए दोनों के पास टाइम नहीं है.

दरअसल आज के समय में इस तरह की शिकायतें अधिकतर परिवारों में बुजुर्गों की हैं, कि उनके ग्रैंड चिल्ड्रन उनकी बात नहीं सुनते, उनके पास नहीं बैठते या कोई काम बोलो तो नहीं करते हैं. जिन घरों में किशोर बच्चे हैं वे अपना समय अपनी पढ़ाई में, स्कूल में, दोस्तों के साथ, खेल में या कंप्यूटर अथवा मोबाइल फ़ोन में व्यतीत कर रहे हैं. ऐसे में बुजुर्गों के पास बैठने का समय उनके पास नहीं है. अगर वे कुछ समय उनके साथ बिताते भी हैं तो उनकी दो पीढ़ी पीछे की पुरानी बातों में बच्चो को कोई इंटरेस्ट नहीं आता है. फिर दादा दादी हर वक़्त कोई ना कोई काम ही बताते रहते हैं.

रजनी बाला जो पोते के पास ना आने का सारा दोष अपनी बहू के सिर मढ़ रही थीं दरअसल वे यह नहीं जानती कि उन्हीं की गलत बातों के कारण अंकुर ने उनके पास बैठना कम कर दिया है. दरअसल रजनी बाला अक्सर अंकुर के जरिये अपनी बहू की जासूसी करने की कोशिश करती हैं. एक दिन वे अंकुर से पूछ रही थीं कि उसके मम्मी पापा रात में किस बात पर झगड़ा कर रहे थे? एक दिन पूछने लगीं कि तुम्हारी मम्मी अपनी सैलरी लाकर पापा को देती है या अपने पास रखती है? तुम नानी के घर गए थे तो नानी ने इस बार तुम लोगों को क्या क्या दिया? तुम्हारी मम्मी को क्या क्या दिया? तुमको कुछ पैसे दिए या खाली हाथ ही वापस कर दिया? तुम्हारी मम्मी नानी के घर क्या क्या सामान लेकर गए थे? आदि आदि. अब ऐसे सवालों के जवाब कौन देना चाहेगा?

ऐसे सवाल यदि आप किशोर होते बच्चे से पूछेंगे तो उसको आपकी मंशा तो समझ में आने लगती हैं. अंकुर ने भी अपनी मां से कह दिया कि दादी ऐसी बातें पूछती हैं, मैं क्या बताऊँ उनको? जवाब में कुसुम ने बेटे से कहा कि वह स्कूल से आने के बाद अपने कमरे में ही बैठ कर होमवर्क किया करे और खाना खा कर सो जाया करे. अब कुसुम ने क्या गलत किया?

यह बात तो बुजुर्गों को सोचनी चाहिए कि वे अपने पोते पोतियों से ऐसी बातें न करें जो उनके विकसित होते हुए मन मस्तिष्क में जहर घोलने का काम करें. या उनको ऐसा महसूस होने लगे कि उनके माँ बाप के खिलाफ उनका इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके अलावा रोजमर्रा के जो काम खुद किये जा सकते हैं, उसके लिए भी बार बार बच्चों को आवाज लगाने की जरूरत नहीं है. अपने पलंग पर ठाठ से पड़े रहने की बजाय अपने हाथ पैर भी चलाते रहें. आपको पानी चाहिए तो आप किचेन में जाकर खुद पानी ले लें. अब यह क्या बात हुई कि आपको नहाना है तो आप बच्चों से कह रहे हैं कि गीजर ऑन कर दो, बाल्टी में पानी भर दो, मेरे कपड़े अलमारी से निकाल दो. अगर यह सारे काम आप खुद करने में सक्षम हैं तो उसके लिए बच्चों को आवाज न लगाए.

संतोष कालरा 80 साल के हैं. इस उम्र में भी उनकी सेहत अच्छी है. चलते फिरते हैं. सुबह सैर को भी जाते हैं. मगर उनको सिगरेट पीने की बुरी लत है. बिल्डिंग के सेकंड फ्लोर पर उनका परिवार रहता है. पत्नी का निधन हुए दस साल हो गए हैं. पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी सिगरेट पीने की लत बढ़ गयी. एक दिन में दो दो डिब्बी (20 सिगरेट) तक पी जाते हैं. बेटा बहू मना करते हैं मगर वे उनकी बात पर ध्यान ही नहीं देते. कहते हैं – ”पीता हूँ तो अपने पैसे की पीता हूँ.” एक दिन सेकंड फ्लोर से उतर कर नीचे मार्केट तक जाने में उनको मुश्किल लगी तो उन्होंने अपने 13 वर्षीय पोते शिवा को पैसे और सिगरेट की खाली डिब्बी देकर नीचे भेजा कि वह मार्केट से उनके लिए सिगरेट ले आये. शिवा जाकर ले आया. उसके बाद तो जब भी उनकी सिगरेट ख़त्म होती, वे शिवा को चुपचाप पैसे देकर सिगरेट लाने के लिए नीचे भेज देते. एक दिन शिवा की माँ ने पूछ लिया कि कहाँ गया था तो शिवा ने बता दिया कि दादा की सिगरेट लेने गया था. उस दिन तो घर में हंगामा हो गया. बहू बेटे दोनों ने पापा जी को खूब सुनाया. इतने छोटे बच्चे से सिगरेट मंगाते आपको शर्म नहीं आयी? कुछ तो अक्ल से काम लिया करिये. पापाजी को उस दिन बहुत बुरा लगा.

अक्सर देखा जाता है कि जिन घरों में बच्चों के साथ उनके दादा दादी भी रहते हैं, वहाँ बच्चों पर काम का अतिरिक्त बोझ उनके दादा दादी द्वारा डाला जाता है. जबकि वे काम बुजुर्ग स्वयं भी कर सकते हैं. मगर वे बच्चों को अपने काम में उलझाए रखना चाहते हैं ताकि घर पर उनका अधिकार ज्यादा प्रकट हो. वे बच्चों को अपने जमाने के संस्कार देने के भी बड़े इच्छुक होते हैं. उनको धर्म का ज्ञान देने में उनकी बड़ी रूचि होती है. कुछ लोग बच्चों से उनकी माँ के खिलाफ भी बोलते रहते हैं. जैसे तेरी माँ को तो कुछ आता ही नहीं है… तेरी माँ कुछ करती नहीं… तेरी माँ ऐसी है, वैसी है… इससे बच्चों के मन में दादा दादी के प्रति सम्मान भी कम हो जाता है और वे उनसे दूरी भी बना लेते हैं.

आज की जेनेरशन दो पीढ़ी पहले की जेनेरशन से काफी तेज और स्मार्ट है. तकनीक के क्षेत्र में और गैजेट्स को उपयोग करने में वह अपने माता पिता को बहुत पीछे छोड़ चुके हैं. ऐसे में जब दादा दादी उनको धर्म या किसी अन्य विषय का घिसा पिटा ज्ञान देने लगते हैं तो उनका जवाब होता है कि ”यह सब हम जानते हैं… ”

बच्चों पर पढ़ाई का बोझ भी है. कम्पटीशन का ज़माना है. उनके सामने बड़े लक्ष्य हैं. वे कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल फ़ोन पर बहुत कुछ बहुत तेजी से सीख रहे हैं. उनके पास समय का अभाव है. ऐसे में यदि घर के बुजुर्ग यह आशा करें कि किशोरावस्था के बच्चे उनके पास बैठ कर उनसे रामायण-महाभारत या कुरान-हदीस या बाइबिल-गुरु ग्रंथ साहब की बातें सुनेंगे, तो ऐसा संभव नहीं है. वे तो ख़ामोशी से अपने कमरे में बैठ कर कंप्यूटर पर ज्ञान अर्जित कर रहे हैं. और आपको उस कंप्यूटर की एबीसीडी नहीं आती, फिर वे आपसे क्या बातें करें?

बच्चे दादा दादी से बहुत प्यार करते हैं. उनके पास उन्हें सुरक्षा और स्नेह मिलता है. परन्तु बच्चों को उनका समय और स्पेस भी चाहिए. जब यह दोनों चीजें उनसे छिनने लगती हैं तो वह दादा दादी से दूर होने लगते हैं. उन्हें लगता है कि ये तो बस हर वक्त काम ही बताते रहते हैं. वहीं जब दादा दादी बच्चों के माता पिता के खिलाफ कोई बात करते हैं तो भी बच्चों के मन में दादा दादी के प्रति गुस्सा भरने लगता है. कोई भी बच्चा अपने माता पिता के खिलाफ बात नहीं सुनना चाहता, भले वह उसके दादा दादी क्यों न बोल रहे हों.

ऐसे में बुजुर्गों को अपनी हद समझनी चाहिए. सच तो यह है कि व्यक्ति को रिटायरमेंट की उम्र से ही अपने बुढ़ापे की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. इसके लिए अपनी आर्थिक मजबूती रखनी जरूरी है, ताकि आप किसी पर बोझ न बनें. कभी ऐसा समय आ गया कि आप चलने फिरने के लायक न रहें तो कम से कम एक सर्वेंट का खर्च आप वहन कर सकें, इतना पैसा आपके पास हो. इस तरह आप अपनी जरूरत की चीजें मंगाने के लिए घर के किसी अन्य सदस्य पर निर्भर नहीं होंगे. नौकर आपके रोजमर्रा के कार्यों में भी आपकी मदद करेगा. आपको नहाने धोने के लिए मदद चाहिए तो वह आपकी मदद करेगा.

आपके पास बुढ़ापे के लिए इतना पैसा अवश्य होना चाहिए कि आप अपने मनोरंजन के लिए अपने कमरे में टीवी, कंप्यूटर आदि लगवा सकें. ताकि आपको अकेलापन ना लगे. कई बार घर में एक ही टीवी सबके लिए होता है, ऐसे में बच्चे सारा दिन उस पर अपने कार्यक्रम देखते रहते हैं और बुजुर्गों को यह शिकायत होती है, कि उनकी पसंद का चैनल तो लगता ही नहीं है. तो अपने बुढ़ापे के मनोरंजन के लिए भी सारे इंतजाम पहले से कर के रखें. अपने कमरे में अपना टीवी लगाएं.

इसके अलावा अपने पुराने दोस्तों के संपर्क में भी रहें ताकि उनसे अपने लेवल की बातें कर के आप अपना मन हल्का कर सकें. और आपको ऐसा न लगे कि आप अकेले रह गए हैं. कभी कभी दोस्तों से मिलने भी जाएँ. उनके साथ सैर सपाटा भी करें. बहुत सारे बुजुर्ग ऐसे हैं जिनका जीवनसाथी अब नहीं रहा. ऐसे लोग ज्यादा एकाकीपन महसूस करते हैं. उन्हें तो खासतौर पर अपनी उम्र के लोगों से संपर्क बना कर रखना चाहिए, जो समय समय पर आपसे मिलने भी आएं. Retirement Planning

Hindi Love Story: बदलाव- उर्मिला ने चलाया अपने हुस्न का जादू

Hindi Love Story: गांव से चलते समय उर्मिला को पूरा यकीन था कि कोलकाता जा कर वह अपने पति को ढूंढ़ लेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कोलकाता में 3 दिन तक भटकने के बाद भी पति राधेश्याम का पता नहीं चला, तो उर्मिला परेशान हो गई.

हावड़ा रेलवे स्टेशन के नजदीक गंगा के किनारे बैठ कर उर्मिला यह सोच रही थी कि अब उसे क्या करना चाहिए. पास ही उस का 10 साला भाई रतन बैठा हुआ था.

राधेश्याम का पता लगाए बिना उर्मिला किसी भी हाल में गांव नहीं लौटना चाहती थी. उसे वह अपने साथ गांव ले जाना चाहती थी. उर्मिला सहमीसहमी सी इधरउधर देख रही थी. वहां सैकड़ों की तादाद में लोग गंगा में स्नान कर रहे थे. उर्मिला चमचमाती साड़ी पहने हुई थी. पैरों में प्लास्टिक की चप्पलें थीं.

उर्मिला का पहनावा गंवारों जैसा जरूर था, लेकिन उस का तनमन और रूप सुंदर था. उस के गोरे तन पर जवानी की सुर्खी और आंखों में लाज की लाली थी.

हां, उर्मिला की सखीसहेलियों ने उसे यह जरूर बताया था कि वह निहायत खूबसूरत है. उस के अलावा गांव के हमउम्र लड़कों की प्यासी नजरों ने भी उसे एहसास कराया था कि उस की जवानी में बहुत खिंचाव है. सब से भरोसमंद पुष्टि तो सुहागसेज पर हुई थी, जब उस के पति राधेश्याम ने घूंघट उठाते ही कहा था, ‘तुम इतनी सुंदर हो, जैसे मेरी हथेलियों में चौदहवीं का चांद आ गया हो.’

उर्मिला बोली कुछ नहीं थी, सिर्फ शरमा कर रह गई थी. उर्मिला बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक गांव की रहने वाली थी. उस ने 19वां साल पार किया ही था कि उस की शादी राधेश्याम से हो गई.

राधेश्याम भी गांव का रहने वाला था. उर्मिला के गांव से 10 किलोमीटर दूर उस का गांव था. उस के पिता गांव में मेहनतमजदूरी कर के परिवार का पालनपोषण करते थे. उर्मिला 7वीं जमात तक पढ़ी थी, जबकि राधेश्याम मैट्रिक फेल था. वह शादी के 2 साल पहले से कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में चपरासी था.

शादी के लिए राधेश्याम ने 10 दिनों की छुट्टी ली थी, लेकिन उर्मिला के हुस्नोशबाब के मोहपाश में ऐसा बंधा कि 30 दिन तक कोलकाता नहीं गया.

जब घर से राधेश्याम विदा हुआ, तो उर्मिला को भरोसा दिलाया था, ‘जल्दी आऊंगा. अब तुम्हारे बिना काम में मेरा मन नहीं लगेगा.’

उर्मिला झट से बोली थी, ‘ऐसी बात है, तो मुझे भी अपने साथ ले चलिए. आप का दिल बहला दिया करूंगी. नहीं तो वहां आप तड़पेंगे, यहां मैं बेचैन रहूंगी.’

उर्मिला ने राधेश्याम के मन की बात कही थी. लेकिन उस की मजबूरी यह थी कि 4 दोस्तों के साथ वह उर्मिला को रख नहीं सकता था.

सच से सामना कराने के लिए राधेश्याम ने उर्मिला से कहा, ‘तुम 5-6 महीने रुक जाओ. कोई अच्छा सा कमरा ले लूंगा, तो आ कर तुम्हें ले चलूंगा.’

राधेश्याम अंगड़ाइयां लेती उर्मिला की जवानी को सिसकने के लिए छोड़ कर कोलकाता चला गया.

फिर शुरू हो गई उर्मिला की परेशानियां. पति का बिछोह उस के लिए बड़ा दुखदाई था. दिन काटे नहीं कटता था, रात बिताए नहीं बीतती थी.

तिलतिल कर सुलगती जवानी से उर्मिला पर उदासीनता छा गई थी. वह चंद दिन ससुराल में, तो चंद दिन मायके में गुजारती.

साजन बिन सुहागन उर्मिला का मन न ससुराल में लगता, न मायके में. मगर ऐसी हालत में भी उस ने अपने कदमों को कभी बहकने नहीं दिया था.

पति की अमानत को हर हालत में संभालना उर्मिला बखूबी जानती थी, इसलिए ससुराल और मायके के मनचलों की बुरी कोशिशों को वह कभी कामयाब नहीं होने देती थी.

ससुराल में सासससुर के अलावा 2 छोटी ननदें थीं. मायके में मातापिता के अलावा छोटा भाई रतन था. उर्मिला ने जैसेतैसे बिछोह में एक साल काट दिया. मगर उस के बाद वह पति से मिलने के लिए उतावली हो गई.

हुआ यह कि कोलकाता जाने के 6 महीने तक राधेश्याम ने उसे बराबर फोन किया. मगर उस के बाद उस ने फोन करना बंद कर दिया. उस ने रुपए भेजना भी बंद कर दिया.

राधेश्याम को फोन करने पर उस का फोन स्वीच औफ आता था. शायद उस ने फोन नंबर बदल दिया था.

किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर राधेश्याम ने एकदम से परिवार से संबंध क्यों तोड़ दिया?

गांव के लोगों को यह शक था कि राधेश्याम को शायद मनपसंद बीवी नहीं मिली, इसलिए उस ने घर वालों व बीवी से संबंध तोड़ लिया है.

लेकिन उर्मिला यह बात मानने के लिए तैयार नहीं थी. वह तो अपने साजन की नजरों में चौदहवीं का चांद थी. राधेश्याम जिस कंपनी में नौकरी करता था, उस का पता उर्मिला के पास था. राधेश्याम के बाबत कंपनी वालों को रजिस्टर्ड चिट्ठी भेजी गई.

15 दिन बाद कंपनी का जवाब आ गया. चिट्ठी में लिखा था कि राधेश्याम 6 महीने पहले नौकरी छोड़ चुका था.

सभी परेशान हो गए. कोलकाता जा कर राधेश्याम का पता लगाने के सिवा अब और कोई रास्ता नहीं था.

उर्मिला का पिता अपंग था. कहीं आनेजाने में उसे काफी परेशानी होती थी. वह कोलकाता नहीं जा सकता था.

उर्मिला का ससुर हमेशा बीमार रहता था. जबतब खांसी का दौरा आ जाता था, इसलिए वह भी कोलकाता नहीं जा सकता था.

हिम्मत कर के एक दिन उर्मिला ने सास के सामने प्रस्ताव रखा, ‘अगर आप कहें, तो मैं अपने भाई रतन के साथ कोलकाता जा कर उन का पता लगाऊं?’

परिवार के लोगों ने टिकट खरीद कर रतन के साथ उर्मिला को हावड़ा जाने वाली ट्रेन में बिठा दिया.

राधेश्याम जिस कंपनी में काम करता था, सब से पहले उर्मिला वहां गई. वहां के स्टाफ व कंपनी के मैनेजर ने उसे साफ कह दिया कि 6 महीने से राधेश्याम का कोई अतापता नहीं है.

उस के बाद उर्मिला वहां गई, जहां राधेश्याम अपने 4 दोस्तों के साथ एक ही कमरे में रहता था. उस समय 3 ही दोस्त थे. एक गांव गया हुआ था.

तीनों दोस्तों ने उर्मिला का भरपूर स्वागत किया. उन्होंने उसे बताया कि 6 महीने पहले राधेश्याम यह कह कर चला गया था कि उसे एक अच्छी नौकरी और रहने की जगह मिल गई है. मगर सचाई कुछ और थी.

‘कैसी सचाई?’ पूछते हुए उर्मिला का दिल धड़कने लगा.

‘दरअसल, उसे किसी अमीर औरत से प्यार हो गया था. वह उसी के साथ रहने चला गया था,’ 3 दोस्तों में से एक दोस्त ने बताया.

उर्मिला को लगा, जैसे उस के दिल की धड़कन बंद हो जाएगी और वह मर जाएगी. उस के हाथपैर सुन्न हो गए थे, मगर जल्दी ही उस ने अपनेआप को काबू में कर लिया.

उर्मिला ने पूछा, ‘वह औरत कहां रहती है?’

तीनों में से एक ने कहा, ‘यह हम तीनों में से किसी को पता नहीं है. सिर्फ गणपत को पता है. उस औरत के बारे में हम लोगों ने उस से बहुत पूछा था, मगर उस ने बताया नहीं था.

‘उस का कहना था कि उस ने राधेश्याम से वादा किया है कि उस की प्रेमिका के बारे में वह किसी को कुछ नहीं बताएगा.’

‘गणपत कौन…’ उर्मिला ने पूछा.

‘वह हम लोगों के साथ ही रहता है. अभी वह गांव गया हुआ है. वह एक महीने बाद आएगा. आप पूछ कर देखिएगा. शायद, वह आप को बता दे.’

‘मगर, तब तक मैं रहूंगी कहां?’

‘चाहें तो आप इसी कमरे में रह सकती हैं. रात में हम लोग इधरउधर सो लेंगे.’

मगर उर्मिला उन लोगों के साथ रहने को तैयार नहीं हुई. उसे पति की बात याद आ गई थी.गांव से विदा लेते समय राधेश्याम ने उस से कहा था, ‘मैं तुम्हें ले जा कर अपने साथ रख सकता था, मगर दोस्तों पर भरोसा करना ठीक नहीं है.

‘वैसे तो वे बहुत अच्छे हैं. मगर कब उन की नीयत बदल जाए और तुम्हारी इज्जत पर दाग लगा दें, इस की कोई गारंटी नहीं है.’

उर्मिला अपने भाई रतन के साथ बड़ा बाजार की एक धर्मशाला में चली गई.

धर्मशाला में उसे सिर्फ 3 दिन रहने दिया गया. चौथे दिन वहां से उसे जाने के लिए कह दिया गया, तो मजबूर हो कर उसे धर्मशाला छोड़नी पड़ी.

अब उर्मिला अपने भाई रतन के साथ गंगा किनारे बैठी थी कि अचानक उस के पास एक 40 साला शख्स आया.

पहले उस ने उर्मिला को ध्यान से देखा, उस के बाद कहा, ‘‘लगता है कि तुम यहां पर नई हो. कहीं और से आई हो. काफी चिंता में भी हो. कोई परेशानी हो, तो बताओ. मैं मदद करूंगा…’’ Hindi Love Story.

Family Story in Hindi: कोशिशें जारी हैं- शिवानी और निया के बीच क्या था रिश्ता?

Family Story in Hindi: ‘‘पहली बार पता चला कि निया तुम्हारी बहू है, बेटी नहीं…’’ मिथिला शिवानी से कह रही थी और शिवानी मंदमंद मुसकरा रही थी.

‘‘क्यों, ऐसा क्या फर्क होता है बेटी और बहू में? दोनों लड़कियां ही तो होती हैं. दोनों ही नौकरियां करती हैं. आधुनिक डै्रसेज पहनती हैं. आजकल यह फर्क कहां दिखता है कि बहू सिर पर पल्ला रखे और बेटी…’’

‘‘नहीं… फिर भी,’’ मिथिला उस की बात काटती हुई बोली, ‘‘बेटी, बेटी होती है और बहूबहू. हावभाव से ही पता चल जाता है. निया तुम से जैसा लाड़ लड़ाती है, छोटीछोटी बातें शेयर करती है, तुम्हारा ध्यान रखती है, वैसा तो सिर्फ बेटियां ही कर सकती हैं. तुम दोनों की ऐसी मजबूत बौंडिग देख कर तो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता कि तुम दोनों सासबहू हो. ऐसे हंसतीखिलखिलाती हो साथ में कि कालोनी में इतने दिन तक किसी ने यह पूछने की जहमत भी नहीं उठाई कि निया तुम्हारी कौन है. बेटी ही समझा उसे.’’

‘‘ऐसा नहीं है मिथिला. यह सब सोच की बातें हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर लड़कियां ठीक ही होती हैं. लेकिन जिस दिन लड़की पहला कदम घर में बहू के रूप में रखती है, रिश्ते बनाने की कोशिश उसी पल से शुरू हो जानी चाहिए, क्योंकि हम बड़े हैं, इसलिए कोशिशों की शुरूआत हमें ही करनी चाहिए और अगर उन कोशिशों को जरा भी सम्मान मिले तो कोशिशें जारी रहनी चाहिए. कभी न कभी मंजिल मिल ही जाती है. हां, यह बात अलग है कि अगर तुम्हारी कोशिशों को दूसरा तुम्हारी कमजोरी समझ रहा है तो फिर सचेत रहने की आवश्यकता भी है,’’ शिवानी ने अपनी बात रखी.

‘‘यह तो तुम ठीक कह रही हो… पर तुम दोनों तो देखने में भी बहनों सी ही लगती है. ऐसी बौंडिग कैसे बनाई तुम ने? प्यार तो मैं भी करती हूं अपनी बहू से पर पता नहीं हमेशा ऐसा क्यों लगता है कि यह रिश्ता एक तलवार की धार की तरह है. जरा सी लापरवाही दिखाई तो या तो पैर कट जाएगा या फिसल जाएगा. तुम दोनों कितने सहज और बिंदास रहते हो,’’ मिथिला अपने मन के भावों को शब्द देती हुई बोली.

‘‘बहू तो तुम्हारी भी बहुत प्यारी है मिथिला.’’

‘‘है तो,’’ मिथिला एक लंबी सांस खींच कर बोली, ‘‘पर सासबहू के रिश्ते का धागा इतना पतला होता है शिवानी कि जरा सा खींचा तो टूटने का डर, ढीला छोड़ा तो उलझने का डर. संभलसंभल कर ही कदम रखने पड़ते हैं. निश्चिंत नहीं रह सकते इस रिश्ते में.’’

‘‘हो सकता है… सब के अपनेअपने अनुभव व अपनीअपनी सोच है… निया के साथ मुझे ऐसा नहीं लगता,’’ शिवानी बात खत्म करती हुई बोली.

‘‘ठीक है शिवानी, मैं चलती हूं… कोई जरूरत हो तो बता देना. निया भी औफिस से आती ही होगी,’’ कहती हुई मिथिला चली गई. शिवानी इतनी देर बैठ कर थक गई थी, इसलिए लेट गई.

शिवानी को 15 दिन पहले बुखार ने आ घेरा था. ऐसा बुखार था कि शिवानी टूट गई थी. पूरे बदन में दर्द, तेज बुखार, उलटियां और भूख नदारद. निया ने औफिस से छुट्टी ले कर दिनरात एक कर दिया था उस की देखभाल में. उस की हालत देख कर निया की आंखें जैसे हमेशा बरसने को तैयार रहतीं. शिवानी का बेटा सुयश मर्चेंट नेवी में था. 6 महीने पहले वह अपने परिवार को इस कालोनी में शिफ्ट कर दूसरे ही दिन शिप पर चला गया था. 4 साल होने वाले थे सुयश व निया के विवाह को.

शिवानी के इतना बीमार पड़ने पर निया खुद को बहुत अकेला व असहाय महसूस कर रही थी. पति को आने के लिए कह नहीं सकती थी. वह बदहवास सी डाक्टर, दवाई और शिवानी की देखरेख में रातदिन लगी थी. इसी दौरान पड़ोसियों का घर में ज्यादा आनाजाना हुआ, जिस से उन्हें इतने महीनों में पहली बार उन दोनों के वास्तविक रिश्ते का पला चला था, क्योंकि सुयश को किसी ने देखा ही नहीं था. निया जौब करती, शिवानी घर संभालती. दोनों मांबेटी की तरह रहतीं और देखने में बहनों सी लगतीं.

निया की उम्र इस समय 30 साल थी और शिवानी की 52 साल. हर समय प्रसन्नचित, शांत हंसतीखिलखिलाती शिवानी ने जैसे अपनी उम्र 7 तालों में बंद की हुई थी. लंबी, स्मार्ट, सुगठित काया की धनी शिवानी हर तरह के कपड़े पहनती. निया भी लंबी, छरहरी, सुंदर युवती थी. दोनों कभी जींसटौप पहन कर, कभी सलवारसूट, कभी चूड़ीदार तो कभी इंडोवैस्टर्न कपड़े पहन कर इधरउधर निकल जातीं. उन के बीच के तारतम्य को देख कर किसी ने यह पूछना तो गैरवाजिब ही समझा कि निया उस की कौन है.

शिवानी लेटी हुई सोच रही थी कि कई महिलाएं यह रोना रोती हैं कि उन की बहू उन्हें नहीं समझती. लेकिन न हर बहू खराब होती है, न हर सास. फिर भी अकसर पूरे परिवार की खुशी के आधार, इस प्यारे रिश्ते के समीकरण बिगड़ क्यों जाते हैं. जबकि दोनों की जान एक ही इंसान, बेटे व पति के पास ही अटकी रहती है और उस इंसान को भी ये दोनों ही रिश्ते प्यारे होते हैं. इस एक रिश्ते की खटास बेटे का सारा जीवन डांवाडोल कर देती है, न पत्नी उसे पूरी तरह पा पाती है और न मां.

बहू जब पहला कदम घर में रखती है तो शायद हर सास यह बात भूल जाती है कि वह अब हमेशा के लिए यहीं रहने आई है, थोड़े दिनों के लिए नहीं और एक दिन उसी की तरह पुरानी हो जाएगी. आज मन मार कर अच्छीबुरी, जायजनाजायज बातों, नियमों, परंपराओं को अपनाती बहू एक दिन अपने नएपन के खोल से बाहर आ कर तुम्हारे नियमकायदे, तुम्हें ही समझाने लगेगी, तब क्या करोगे?

बेटी को तुम्हारी जो बातें नहीं माननी हैं उन्हें वह धड़ल्ले से मना कर देती है, तो चुप रहना ही पड़ता है. लेकिन अधिकतर बहुएं आज भी शुरूशुरू में मन मार कर कई नापसंद बातों को भी मान लेती हैं. लेकिन धीरेधीरे बेटे की जिंदगी की आधार स्तंभ बनने वाली उस नवयौवना से तुम्हें हार का एहसास क्यों होने लगता है कुछ समय बाद. उसी समय समेट लेना चाहिए था न सबकुछ जब बहू ने अपना पहला कदम घर के अंदर रखा था.

दोनों बांहों में क्यों न समेट लिया उस खुशी की गठरी को? तब क्यों रिश्तेदारों व पड़ोसियों की खुशी बहू की खुशी से अधिक प्यारी लगने लगी थी. बेटी या बहू का फर्क आज के जमाने में कोई खानपान या काम में नहीं करता. फर्क विचारों में आ जाता है.

बेटी की नौकरी मेहनत और बहू की नौकरी मौजमस्ती या टाइमपास, बेटी छुट्टी के दिन देर तक सोए तो आराम करने दो, बहू देर तक सोए तो पड़ोसी, रिश्तेदार क्या कहेंगे? बेटी को डांस का शौक हो और घर में घुंघरू खनकें तो कलाप्रेमी और बहू के खनकें तो घर है या कोठा? बेटी की तरह ही बहू भी नन्हीं, कोमल कली है किसी के आंगन की, जो पंख पसारे इस आंगन तक उड़ कर आ गई है.

आज पढ़लिख कर टाइमपास नौकरी करना नहीं है लड़कियों के शौक. अब लड़कियों के जीवन का मकसद है अपनी मंजिल को हर हाल में पाना. चाहे फिर उन का वह कोई शौक हो या कोई ऊंचा पद. वे सबकुछ संभाल लेंगी यदि पति व घरवाले उन का बराबरी से साथ दें, खुले आकाश में उड़ने में उन की मदद करें.

ऐसा होगा तो क्यों न होगी इस रिश्ते की मजबूत बौंडिंग. सास या बहू कोई हव्वा नहीं हैं, दोनों ही इंसान हैं. मानवीय कमजोरियों व खूबियों से युक्त एवं संवेदनाओं से ओतप्रोत. शिवानी अपनी सोचों के तर्कवितर्क में गुम थी कि तभी बाहर का दरवाजा खुला, आहट से ही समझ गई शिवानी कि निया आ गई. एक अजीब तरह की खुशी बिखेर देती है यह लड़की भी घर के अंदर प्रवेश करते ही. निया लैपटौप बैग कुरसी पर पटक कर उस के कमरे में आ गई.

‘‘हाय ममा.. हाऊ यार यू…,’’ कह कर वह चहकती हुई उस से लिपट गई.

‘‘फाइन… हाऊ वाज युअर डे…’’

‘‘औसम… पर मैं ने आप को कई बार फोन किया, आप रिसीव नहीं कर रही थीं. फिर सुकरानी को फोन कर के पूछा तो उस ने बताया कि आप ठीक हैं. वह लंच दे कर चली गई थी.’’

‘‘ओह, फोन. शायद औफ हो गया है.’’ शिवानी मोबाइल उठाती हुई बोली, ‘‘चल तेरे लिए चाय बना देती हूं.’’

‘‘नहीं, चाय मैं बनाती हूं. आप अभी कमजोर हैं. थोड़े दिन और आराम कर लीजिए’’, कह कर निया 2 कप चाय बना लाई और चाय पीतेपीते दिन भर का पूरा हाल शिवानी को सुनाना शुरू कर दिया.

‘‘अच्छा अब तू फ्रैश हो जा बेटा. चेंज कर ले. सुकरानी भी आ गई. मनपसंद कुछ बनवा ले उस से.’’

‘‘ममा, सुकरानी के हाथ का खा कर तो ऊब गई हूं. आप एकदम ठीक हो जाओ. कुछ ढंग का खाना तो मिलेगा,’’ वह शिवानी की गोद में सिर रख कर लेट गई और शिवानी उस के बालों को सहलाती रही.

जब सुयश शिप पर होता था तो निया शिवानी के साथ ही सो जाती थी. खाना खा कर दिन भर की थकी हुई निया लेटते ही गहरी नींद सो गई. उस का चेहरा ममता से निहारती शिवानी फिर खयालों में डूब गई. ‘कौन कहता है कि इस रिश्ते में प्यार नहीं पनप सकता… उन दोनों का जुड़ाव तो ऐसा है कि प्यार में मांबेटी जैसा, समझदारी में सहेलियों जैसा और मानसम्मान में सासबहू जैसा.’

छत को घूरतेघूरते शिवानी अपने अतीत में उतर गई. पति की असमय मृत्यु के बाद छोटे से सुयश के साथ जिंदगी फूलों की सेज नहीं थी उस के लिए. कांटों से अपना दामन बचाते, संभालते जिंदगी अत्यंत दुष्कर लगती थी कभीकभी. वह ओएनजीसी में नौकरी करती थी. पति के रहते कई बार घर और सुयश के कारण नौकरी छोड़ देने का विचार आया. पर अब वही नौकरी उस के लिए सहारा बन गई थी. सुयश बड़ा हुआ. वह उसे मर्चेंट नेवी में नहीं भेजना चाहती थी पर सुयश को यह जौब बहुत रोमांचक लगता था. सुयश लंबे समय के लिए शिप पर चला जाता और वह अकेले दिन बिताती.

इसलिए वह सुयश पर शादी के लिए दबाव डालने लगी. तब सुयश ने निया के बारे में बताया. निया उस के दोस्त की बहन थी. निया मराठी परिवार से थी और वह हिमाचल के पहाड़ी परिवार से. सुन कर ही दिल टूट गया उस का. पता नहीं कैसी होगी? पर विद्रोह करने का मतलब इस रिश्ते में वैमनस्य का पहला बीज बोना.

उस ने कुछ भी बोलने से पहले लड़की से मिलने का मन बना लिया पर जब निया से मिली तो सारे पूर्वाग्रह जैसे समाप्त हो गए. लंबी, गोरी, छरहरी, खूबसूरत, सौम्य, चेहरे पर दिलकश मुसकान लिए निया को देख कर विवाह की जल्दी मचा डाली. निया अपने मम्मीपापा की इकलौती लाडली बेटी थी. अच्छे संस्कारों में पली लाडली बेटी को प्यार लेना और देना तो आता था पर जिम्मेदारी जैसी कोई चीज लेना आजकल की बच्चियों को नहीं आता. बिंदास तरह से पलती हैं और बिंदास तरह से रहती हैं.

और इस बात को बेटी न होते हुए भी, बेटी की मां जैसा अनुभव कर शिवानी ने निया के गृहप्रवेश करते समय ही गांठ बांध लिया. दोनों बांहों से उस ने ऐसा समेटा निया को कि उस का माइनस तो कुछ दिखा ही नहीं, बल्कि सबकुछ प्लसप्लस होता चला गया. निया देर से सो कर उठती, तो घर में काम करने वाली के पेट में भी मरोड़ होने लगती पर शिवानी के चेहरे पर शिकन न आती.

निया के कुछ कपड़े संस्कारी मन को पसंद न आते पर पड़ोसियों से ज्यादा परवाह बहूबेटे की खुशियों की रहती. उन दोनों को पसंद है, पड़ोसी दुखी होते हैं तो हो लें. कुछ महीने रह कर सुयश 6 महीने के लिए शिप पर चला गया. निया अपनी जौब छोड़ कर आई थी इसलिए वह अपने लिए नई जौब ढूंढ़ने में लगी थी. शिवानी ने सुयश के जौब में आने के बाद रिटायरमैंट ले लिया था. वह अब दौड़तीभागती जिंदगी से विराम चाहती थी. फिलहाल जो एक कोमल पौधा उस के आंगन में रोपा गया था, उसे मजबूती देना ही उस का मकसद था.

पर सुयश के शिप पर जाने के बाद निया मायके जाने के लिए कसमसाने लगी थी. शिवानी इसी सोच में थी कि अब उसे अकेले नहीं रहना पड़ेगा. पर जब निया ने कहा, ‘‘ममा, जब तक सुयश शिप में है, मैं मुंबई चली जाऊं? सुयश के आने से पहले आ जाऊंगी?’’

न चाहते हुए भी उस ने खुशीखुशी निया को मुंबई भेज दिया. यह महसूस कर कि अभी वह बिना पति के इतना लंबा वक्त उस के साथ कैसे बिताएगी. नए रिश्ते को, नए घर को अपना समझने में समय लगता है. सुयश के आने से कुछ दिन पहले ही निया वापस आई. हां, वह मुंबई से उसे फोन करती रहती और वह खुद भी उसी की तरह बिंदास हो कर बात करती. अपने जीवन में उस की खूबी को महसूस कराती. घर में उस की कमी को महसूस कराती पर अपनी तरफ से आने के लिए कभी नहीं कहती.

सुयश ने भी कुछ नहीं कहा. निया वापस आई तो शिवानी ने उसे बिछड़ी बेटी की तरह गले लगा लिया. सुयश कुछ महीने रह कर फिर शिप पर चला गया. पर इस बार निया में परिवर्तन अपनेआप ही आने लगा था. स्वभाव तो उस का प्यारा पहले से ही था पर अब वह उस के प्रति जिम्मेदारी भी महसूस करने लगी थी. इसी बीच निया को जौब मिल गई.

शिवानी खुद ही निया के रंग में रंग गई. निया ने जब पहली बार उस के लिए जींस खरीदने की पेशकश की तो उस ने ऐतराज किया, ‘‘ममा पहनिए, आप पर बहुत अच्छी लगेगी.’’

और उस के जोर देने पर वह मान गई कि बेटी भी होती तो ऐसा ही कर सकती थी. समय बीततेबीतते उन दोनों के बीच रिश्ता मजबूत होता चला गया. औपचारिकता के लिए कोई जगह ही नहीं रह गई. कोशिश तो किसी भी रिश्ते में सतत करनी पड़ती है. फिर एक समय ऐसा आता है जब उन कोशिशों को मुकाम हासिल हो जाता है.

जितना खुलापन, प्यार, अपनापन, विश्वास, उस ने शुरू में निया को दिया और उसे उसी की तरह जीने, रहने व पहनने की आजादी दी, उतना ही वह अब उस का खयाल रखने लगी थी. बेटी की तरह उस की छोटीछोटी बातें अकसर उस की आंखों में आंसू भर देती. कभी वह उस को शाल यह कह कर ओढ़ा देती, ‘‘ममा ठंड लग जाएगी.’’ कभी उस की ड्रैस बदला देती, ‘‘ममा यह पहनो. इस में आप बहुत सुंदर लगती हैं. मेरी फ्रैंड्स कहती हैं तेरी ममा तो बहुत सुंदर और स्मार्ट है.’’

निया ने ही उसे ड्राइविंग सिखाई. हर नई चीज सीखने का उत्साह जगाया. वह खुद ही पूरी तरह निया के रंग में रंग गई और अब ऐसी स्थिति आ गई थी कि दोनों एकदूसरे को पूछे बिना न कुछ करतीं, न पहनतीं. हर बात एकदूसरे को बतातीं. इतना अटूट रिश्ता तो मांबेटी के बीच भी नहीं बन पाता होगा. सोच कर शिवानी मुसकरा दी.

सोचतेसोचते शिवानी ने निया की तरफ देखा. वह गहरी नींद में थी. उस ने उस की चादर ठीक की और लाइट बंद कर खुद भी सोने का प्रयास करने लगी. दूसरे दिन रविवार था. दोनों देर से सो कर उठीं.

दैनिक कार्यक्रम से निबट कर दोनों बैडरूम में ही बैठ कर नाश्ता कर रही थीं कि उन की पड़ोसिनें मिथिला, वैशाली, मधु व सुमित्रा आ धमकीं. निया सब को नमस्ते कर के उठ गई.

‘‘अरे वाह, आओआओ… आज तो सुबहसुबह दर्शन हो गए. कहां जा रही हो चारों तैयार हो कर?’’ शिवानी मुसकरा कर नाश्ता खत्म करती हुई बोली.

‘‘हम सोच रहे थे शिवानी कि कालोनी का एक गु्रप बनाया जाए, जिस से साल में आने वाले त्योहार साथ में मनाएं मिलजुल कर,’’ मिथिला बोली.

‘‘इस से आपस में मिलनाजुलना होगा और जीवन की एकरसता भी दूर होगी,’’ वैशाली बात को आगे बढ़ाते हुए बोली.

‘‘हां और क्या… बेटेबहू तो चाहे साथ में रहें या दूर अपनेआप में ही मस्त रहते हैं. उन की जिंदगी में तो हमारे लिए कोई जगह है ही नहीं… बहू तो दूध में पड़ी मक्खी की तरह फेंकना चाहती है सासससुर को,’’ मधु खुद के दिल की भड़ास उगलती हुई बोली.

‘‘ऐसा नहीं है मधु… बहुएं भी आखिर बेटियां ही होती हैं. बेटियां अच्छी होती हैं फिर बहुएं होते ही वे बुरी कैसे बन जातीं हैं, मां अच्छी होती हैं फिर सास बनते ही खराब कैसे हो जाती हैं? जाहिर सी बात है कि यह रिश्ता नुक्ताचीनी से ही शुरू होता है. एकदूसरे की बुराइयों, कमियों और गलतियों पर उंगली रखने से ही शुरुआत होती है.

‘‘मांबेटी तो एकदूसरे की अच्छीबुरी आदतें व स्वभाव जानती हैं और उन्हें इस की आदत हो जाती है. वे एकदूसरे के स्वभाव को ले कर चलती हैं पर सासबहू के रूप में दोनों कुछ भी गलत सहन नहीं कर पाती हैं. आखिर इस रिश्ते को भी तो पनपने में, विकसित होने में समय लगता है. बेटी के साथ 25 साल रहे और बहू 25 साल की आई, तो कैसे बन पाएगा एक दिन में वैसा रिश्ता.’ उस रिश्ते को भी तो उतना ही समय देना पड़ेगा. कोशिशें निरंतर जारी रहनी चाहिए. एकदूसरे को सराहने की, प्यार करने की, खूबसूरत पहलुओं को देखने की,’’ शिवानी ने अपनी बात रखी.

‘‘तुम्हें अच्छी बहू मिल गई न… इसलिए कह रही हो. हमारे जैसी मिलती तो पता चलता,’’ सुमित्रा बोली.

‘‘लेकिन बेटे की पत्नी व बहू के रूप में देखने से पहले उसे उस के स्वतंत्र व्यक्तित्व के साथ क्यों नहीं स्वीकार करते? उस की पहचान को प्राथमिकता क्यों नहीं देते? उस पर अपने सपने थोपने के बजाए उस के सपनों को क्यों नहीं समझते? उस के उड़ने के लिए दायरे का निर्धारण तुम मत करो. उसे खुला आकाश दो जैसे अपनी खुद की बेटी के लिए चाहते हो, उस के लिए नियम बनाने के बजाए उसे अपने जीवन के नियम खुद बनाने दो, उसे अपने रंग में रंगने के बजाए उस के रंग में रंगने की कोशिश तो करो, तुम्हें पता नहीं चलेगा, कब वह तुम्हारे रंग में रंग गई.

‘‘आखिर सभी को अपना जीवन अपने हिसाब से जीने का पूरा हक है. फिर बहू से ही शिकायतें व अपेक्षा क्यों?’’ बड़े होने के नाते आज उस की गलतसही आदतों को समाओ तो सही, कल इस रिश्ते का सुख भी मिलेगा. कोशिश तो करो. हालांकि, देर हो गई है पर कोशिश तो की जा सकती है. रिश्तों को कमाने की कोशिशें सतत जारी रहनी चाहिए सभी की तरफ से,’’ शिवानी मुसकरा कर बोली.

‘‘मैं यह नहीं कहती कि इस से हर सासबहू का रिश्ता अच्छा हो जाएगा पर हां, इतना जरूर कह सकती हूं कि हर सासबहू का रिश्ता बिगड़ेगा नहीं,’’ उस ने आगे कहा.

चारों सहेलियां विचारमग्न सी शिवानी को देख रहीं थी और बाहर से उन की बातें सुनती निया मुसकराती हुई अपने कमरे की तरफ चली गई. Family Story in Hindi.

Hindi Family Story: हकीकत- लक्ष्मी की हकीकत ने क्यों सोचने पर मजबूर कर दिया?

Hindi Family Story: ‘‘बाबूजी, हमारे भाई की शादी में जरूर आना,’’ खुशी से चहकती लक्ष्मी शादी का कार्ड मुझे देते हुए कह रही थी.

‘‘जरूर आऊंगा लक्ष्मी. तुम्हारे यहां न आऊं, ऐसा कैसे हो सकता है…’’ मैं उसे दिलासा देते हुए बोला था.

लक्ष्मी के मांबाप उसी समय गुजर गए थे, जब वह मुश्किल से 15 साल की रही होगी. उस की गोद में डेढ़ साल का छोटा भाई और साथ में 5 साल की बहन रानी थी.

आज इस बात को कई साल हो गए हैं. डेढ़ साल का वह छोटा भाई आज खूबसूरत नौजवान है, जिस की शादी लक्ष्मी करा रही है.

मैं लक्ष्मी के जाते ही पुरानी यादों में खो गया. उस के पिता आंध्र प्रदेश से यहां मजदूरी करने आए थे, जो साइकिल मरम्मत की दुकान द्वारा अपना परिवार चलाते थे. वे किराए की झुग्गी में पत्नी व बच्चों के साथ रहते थे. उसी महल्ले में जग्गा बदमाश भी रहता था, जिस की निगाह 14 साल की लक्ष्मी पर जा टिकी थी.

सांवले रंग की लक्ष्मी तब भी भरे बदन वाली दिखती थी. एक दिन जग्गा ने मौका पा कर लक्ष्मी को रौंद डाला. कली फूल बनने से पहले ही मसल दी गई थी.

जग्गा की इस करनी से लक्ष्मी का सीधासादा बाप इतना गुस्साया कि उस ने सो रहे जग्गा की कुदाल से काट कर हत्या कर दी.

खून के केस में लक्ष्मी का बाप जेल चला गया और मां दाई का काम कर के अपने बच्चे पालने लगी.

इधर लक्ष्मी पेट से हो गई, तो उस की मां लोकलाज के डर से महल्ला बदल कर इधर आ गई. फिर तो सरकारी अस्पताल में बच्चे का जन्म और उस की जल्दी मौत. लक्ष्मी की मां द्वारा इस तनाव को झेल न पाना और अचानक मर जाना, सब एकसाथ हुआ. एक चैरिटेबल स्कूल में दाई की जरूरत थी, सो लक्ष्मी को रख लिया गया. सुबह नियमित समय पर आना, अपना काम मन से करना, सब से मीठा बोलना, लक्ष्मी के ऐसे गुण थे कि वह सभी का सम्मान पाने लगी.

आज इस बात को तकरीबन 25 साल से ज्यादा हो गए हैं. अब लक्ष्मी एक अधेड़ औरत दिखती है.

‘‘क्यों लक्ष्मी, इन सब झमेलों के बीच तुम अपनी शादी भूल गई?’’ मैं ने मजाक में पूछा था.

‘‘भूली कहां सर. शादी के बाद भी तो बच्चे ही होते न, सो 2 बच्चे मेरी गोद में हैं. मैं ने जन्म नहीं दिया है, तो क्या हुआ, अपना दूध पिला कर पाला तो है,’’ लक्ष्मी का यह जवाब मुझे अंदर तक हिला गया.

‘‘तुम ने दूध पिलाया है?’’ मेरे मुंह से निकल गया.

‘‘हां साहब, मैं उस जग्गा बदमाश के चलते बदनाम हो गई थी. कौन शादी करता मुझ से? बच्चा पैदा करने के चलते मैं ने एक बार अपने रोते भाई को मजाक में दूध पिलाया था. वह चुप हो गया और मुझे मजा आया, फिर तो मैं ने 2-3 साल तक उसे दूध पिलाया.’’ यह सुन कर मैं चुप हो गया.

‘‘क्या सोचने लगे बाबूजी?’’

‘‘यही कि तुम्हारी जितनी तारीफ करूं, कम है,’’ मेरे मुंह से निकला.

लक्ष्मी के दोनों भाईबहनों का स्कूल में दाखिला मैं ने ही कराया था. वहीं वे दोनों 12वीं जमात में फर्स्ट डिवीजन में पास कर चुके थे. बहन जहां नर्स की ट्रेनिंग ले कर सरकारी अस्पताल में नर्स थी, वहीं भाई ने बीकौम किया और बैंक में क्लर्क हो गया था. उसी की शादी का कार्ड ले कर लक्ष्मी मेरे पास आई थी.

‘‘लक्ष्मी, तुम ने इतना कुछ कैसे कर लिया?’’ मैं ने एक दिन उस से पूछा था.

‘‘यह सोचने का समय कहां था साहब. बाप जेल में, मां मर गई. रिश्तेदारों में से कोई झांकने तक नहीं आया, इसलिए जैसेतैसे कर के जो काम मिला करती गई.

‘‘स्कूल का काम करते हुए 1-2 घर का काम करतेकरते जैसेतैसे कर के पैसा कमा कर भाईबहन और खुद का पेट भरना था. फीस के अलावा सारे खर्च थे, जो पूरा करतेकरते जिंदगी निकल गई. आज सब अपने पैरों पर खड़े हैं, तो उन की शादी करनी है.’’

लक्ष्मी ने ईडब्लूएस मकान के लिए जब कहा, तो मैं चौंक गया था. मैं ने उसे बैंक से लोन दिलवाया था. गारंटी भी मैं ने ही दी थी. मजे की बात यह कि उस ने पूरी किस्त समय से भर कर मकान अपना कर लिया. इसी तरह दूसरी सारी समस्याओं का सामना भी वह मजे में करती गई.

एक दिन एक अखबार में किसी के खुदकुशी करने की खबर को सुन कर लक्ष्मी परेशान हो गई और पूछ बैठी, ‘‘साहब, लोग खुदकुशी क्यों करते हैं?’’

‘‘जो जिंदगी से नाराज होते हैं या जिन्हें मनचाहा नहीं मिलता, वे खुदकुशी कर लेते हैं,’’ मेरा जवाब था.

‘‘साहब, मेरी पूरी जिंदगी में संघर्ष ही रहा. मांबाप को खोया, बच्चा खोया, मगर लड़ती रही. अगर नहीं लड़ती, तो आज ये दोनों अनाथ होते. भटकभटक कर जान दे चुके होते, इसलिए इन की खातिर जीना पड़ा. अब तो आदत हो चुकी है. लेकिन मेरे मन में एक बार भी  खुदकुशी करने का विचार नहीं आया.’’

लक्ष्मी की इस बात ने मुझे बिलकुल चुप करा दिया. Hindi Family Story.

Family Story in Hindi: दुख में अटकना नहीं- नंदिता मयंक का बदलता रूप देखकर क्यों घबरा गई?

Family Story in Hindi: मृत्यु को मात दे कर जब नंदिता घर लौटीं और मयंक का बदला रूप देखा तो उन को लगा, सारी मोहमाया, प्यार व विश्वास के अटूट बंधन दरक गए हैं. ऐसे में उन के जीवन में ऐसा क्या हुआ जिस ने उन्हें दुखों से सहज पार पाने की राह दिखाई?

नंदिता ने जल्दी से घर का ताला खोला. 6 बज रहे थे. उन का पोता यश स्कूल से आने ही वाला था. उन्होंने फौरन हाथमुंह धो कर यश के लिए नाश्ता तैयार किया, साथसाथ डिनर की भी तैयारी शुरू कर दी. उन के हाथ खूब फुरती से चल रहे थे, मन में भी ताजगी सी थी. वे अभीअभी किटी पार्टी से लौटी थीं. सोसायटी की 15 महिलाओं का यह ग्रुप सब को बहुत अपना सा लगता था. सब महिलाओं को महीने के इस दिन का इंतजार रहता था. ये सब महिलाएं उम्र में 30 से 40 के करीब थीं. नंदिता उम्र में सब से बड़ी थीं लेकिन उन की चुस्तीफुरती देखते ही बनती थी. अपने शालीन और मिलनसार स्वभाव के चलते वे काफी लोकप्रिय थीं.नंदिता टीचर रही थीं और अभीअभी रिटायर हुई थीं. योग और सुबहशाम की सैर ने उन्हें चुस्तदुरुस्त रखा हुआ था. उन के इंजीनियर पति का कुछ साल पहले देहावसान हुआ था. वे अपने इकलौते बेटे मयंक और बहू किरण के साथ रहती थीं.

किटी पार्टी से जब वे घर आती थीं, उन का मूड बहुत तरोताजा रहता था. सब से मिलना जो हो जाता था. किरण भी औफिस जाती थी. घर की अधिकतर जिम्मेदारियां नंदिता ने अपने ऊपर खुशीखुशी ली हुई थीं. मयंक और किरण शाम को आते तो वे रात का खाना तैयार कर चुकी होती थीं. किरण घर में घुसते ही चहकती, ‘‘मां, बहुत अच्छी खुशबू आ रही है, आप ने तो सब काम कर लिया, कुछ मेरे लिए भी छोड़ देतीं.’’

मयंक हंसता, ‘‘किरण, क्या सास मिली है तुम्हें, भई वाह.’’

किरण नंदिता के गले में बांहें डाल देती, ‘‘सास नहीं, मां हैं मेरी.’’

बहूबेटे के इस प्यार पर नंदिता का मन खुश हो जाता, कहतीं, ‘‘सारा दिन तो अकेली रहती हूं, काम करते रहने से समय का पता नहीं चलता.’’

नंदिता का हौसला सब ने उन के पति की मृत्यु पर देख लिया था, उन के बेटेबहू का लियादिया स्वभाव किसी को पसंद नहीं आया था.

अपने पति की मृत्यु के बाद जब अगले महीने की किटी पार्टी में नंदिता आईं तो सब महिलाएं उन के दुख से दुखी व गंभीर थीं लेकिन उन्होंने अपनेआप को बहुत ही सामान्य रखा. सब महिलाओं के दिल में उन के लिए इज्जत और बढ़ गई. उन्होंने सब के चेहरे पर छाई गंभीरता को दूर करते हुए कहा, ‘‘तुम लोग याद रखना, सुख में भटकना नहीं और दुख में अटकना नहीं, जब सुख मिले उसे जी लो, दुख मिले उसे भी उतनी ही खूबी से जिओ, बिना किसी शिकायत के. उस का अंश, उस की खरोंचें मन पर न रहने दो. उस के परिणाम भी बड़ी हिम्मत से स्वीकार लो और सहज ही पार हो जाओ. जीवन का यही तो मर्म है जो मैं समझ चुकी हूं.’’

सब महिलाएं नम आंखों से उन्हें सुनती रहीं. स्वभाव से अत्यंत नम्र, सहनशील, शांत, स्वाभिमानी, अपनी अपेक्षा दूसरों के सुखों और भावनाओं का ध्यान रखने वाली, जितनी तारीफ करें उतनी कम. इतने सारे गुण इस एक में कैसे आ गए, यह सोच कई बार महिलाएं हैरान रह जातीं.

फिर उन में आए कुछ परिवर्तन सभी ने महसूस किए. वे अचानक सुस्त और बीमार रहने लगीं और जब वे किटी में भी नहीं आईं तो सब हैरान हुईं. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, उन्हीं की बिल्ंिडग में रहने वाली रेनू और अर्चना उन्हें देखने गईं तो वे बहुत खुश हुईं, ‘‘अरे, आओ, आज कैसी रही पार्टी, लेटेलेटे तुम्हीं लोगों में मन लगा रहा आज तो मेरा.’’

उन्हें कई दिनों से बुखार था, उन के कई टैस्ट हुए थे, रिपोर्ट आनी बाकी थी. उन की तबीयत ज्यादा खराब हुई तो उन्हें अस्पताल में भरती करना पड़ा. सब उन्हें देखने अस्पताल जाते रहे. वे सब को देख कर खुश हो जातीं.

उन की रिपोर्ट्स आ गईं. मयंक को बुला कर डा. गौतम ने कहा, ‘‘मि. मयंक, आप की मदर का एचआईवी टैस्ट पौजिटिव आया है, इंफैक्शन अब स्टेज-3 एड्स में बदल गया है जिस की वजह से उन के शरीर के कई अंग जैसे किडनी, बे्रन आदि प्रभावित हुए हैं.’’

मयंक अवाक् बैठा रहा, थोड़ी देर बाद अपने को संयत कर बोला, ‘‘मम्मी तो अपने स्वास्थ्य का इतना ध्यान रखती हैं, धार्मिक हैं,’’ फिर थोड़ा सकुचाते हुए बोला, ‘‘पापा भी कुछ साल पहले नहीं रहे, उन्हें यह बीमारी कहां से हो गई?’’

डा. गौतम गंभीरतापूर्वक बोले, ‘‘आप तो पढ़ेलिखे हैं, धर्म और एड्स का क्या लेनादेना? क्या शारीरिक संबंध ही एक जरिया है एचआईवी फैलने का और अब कब, क्यों, कैसे से ज्यादा जरूरी है कि उन की जान कैसे बचाई जाए? आज कई तरह के इलाज हैं जिन से इस बीमारी को रोका जा सकता है पर सब से जरूरी है उन्हें इस बारे में बताना जिस से वे खुद भी सारी सावधानियां बरतें और इलाज में हमारा साथ दें क्योंकि अब हमें उन्हें एड्स सैल में शिफ्ट करना पड़ेगा.’’

मयंक ने डा. गौतम को ही उन्हें बताने के लिए कहा. पता चलने पर नंदिता सन्न रह गईं. कुछ देर बाद मयंक आया तो मां से नजरें मिलाए बिना सिर नीचा किए बैठा रहा. नंदिता गौर से उस का चेहरा देखती रहीं, फिर अपने को संभालती हुई हिम्मत कर के बोलीं, ‘‘इतने चुप क्यों हो, मयंक?’’

‘‘मां, आप को यह बीमारी कैसे…’’

बेटे को सारी स्थिति समझाने के लिए स्वयं को तैयार करते हुए उन्होंने बताना शुरू किया, ‘‘तुम्हें याद होगा, तुम्हारे पापा का जब वह भयंकर ऐक्सिडैंट हुआ था तो उन्हें खून चढ़ाना पड़ा था. उस समय किसी को होश नहीं था और जिन लोगों ने ब्लड डोनेट किया था उन में से शायद किसी को यह बीमारी थी, ऐसा डाक्टरों ने बाद में अंदाजा लगाया था. तुम्हारे पापा उस दुर्घटना में उस समय तो बच गए लेकिन इस बीमारी ने उन के शरीर में तेजी से फैल कर उन की जान ले ली थी. मैं ने सब को यही बताया था कि उन का हार्टफेल हुआ है. मैं उन की मृत्यु को कलंकित नहीं होने देना चाहती थी.

‘‘तुम्हें याद होगा तुम भी उस समय होस्टल में थे और उन की मृत्यु के बाद ही घर पहुंचे थे. हमारा समाज ऊपर से परिपक्व दिखता है पर अंदर से है नहीं. एड्स को ले कर हमारा समाज आज भी कई तरह के पूर्वाग्रहों से पीडि़त है.’’

मयंक की आंखें मां का चेहरा देखतेदेखते भर आईं. वह उठा और चुपचाप घर लौट गया.

नंदिता को एड्स सैल में शिफ्ट कर दिया गया. वे सोचतीं यह बीमारी इतनी भयानक नहीं है जितना कि इस से बनने वाला माहौल. सब अपनेअपने दर्द से दुखी थे. उस वार्ड में 60 साल के बूढ़े भी थे और 18 साल के युवा भी. उस माहौल का असर था या बीमारी का, उन की हालत बद से बदतर होती जा रही थी. रोज किसी न किसी टैस्ट के लिए उन का खून निकाला जाता जिस में उन्हें बहुत कष्ट होता, कितनी दवाएं दी जातीं, कितने इंजैक्शन लगते, वे दिनभर अपने बैड पर पड़ी रहतीं. अब उन के साथ बस उन का अकेलापन था. वे रातदिन मयंक, किरण और यश से बात करने के लिए तड़पती रहतीं लेकिन बीमारी का पता चलने के बाद से किरण ने तो अस्पताल में पैर ही नहीं रखा था और अब मयंक कईकई दिन बाद आता भी तो खड़ेखड़े औपचारिकता सी निभा कर चला जाता.

नंदिता का कलेजा कट कर रह जाता, यह क्या हो गया था. उन्हें देखने सोसायटी से उन के ग्रुप की कोई महिला आती तो जैसे वे जी उठतीं. कुछ महिलाएं समय का अभाव बता कर कन्नी काट जातीं लेकिन कई महिलाएं उन से मिलने आती रहतीं. वे सब के हालचाल पूछतीं. किसी का मन होता जा कर मयंक और किरण से उन के हालचाल पूछें लेकिन दोनों का स्वभाव देख कर कोई न जाता. वैसे भी महानगर के लोगों को न तो ज्यादा मतलब होता है और न ही कोई आजकल अपने जीवन में किसी तरह का हस्तक्षेप स्वीकार करता है, खासकर मयंक और किरण जैसे लोग.

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कोई जब भी नंदिता को देखने जाता तो लगता उन्हें कहीं न कहीं जीने की इच्छा थी, इसी इच्छाशक्ति के जोर पर वे बहुत तेजी से ठीक होने लगीं और 5 महीने बाद वे पूरी तरह से स्वस्थ और सामान्य हो गईं. वे बहुत खुश थीं. एक बड़ा युद्ध जीत कर मृत्यु को हरा कर वे घर लौट रही थीं पर वे यह नहीं जानती थीं कि इन 5 महीनों में सबकुछ बदल चुका था.

उन्हें घर लाते समय मयंक बहुत गंभीर था. नंदिता ने सोचा इतने दिनों से सब को असुविधा हो रही है, थोड़े दिनों में सब पहले की तरह ठीक हो जाएगा. वे जल्दी से जल्दी यश को देखना चाहती थीं और यश की वजह से किरण भी उन से नहीं मिलने आ पाई. उसे कितना दुख होता होगा. यही सब सोचतेसोचते घर आ गया. मयंक पूरे रास्ते चुप रहा था. बस, हांहूं करता रहा था.

मयंक ने ही ताला खोला तो वे चौंकी, ‘‘किरण नहीं है घर पर?’’

मयंक चुप रहा. उन का बैग अंदर रखा. नंदिता ने फिर पूछा, ‘‘किरण और यश कहां हैं?’’

‘‘मां, आप की बीमारी पता चलने के बाद किरण यश के साथ यहां नहीं रहना चाहती थी. हम लोगों ने किराए पर फ्लैट ले लिया है.’’

नंदिता को लगा, सारी मोहमाया, प्यार और विश्वास के बंधन एक झटके में टूट गए हैं, उन की सारी संवेदनाएं ही शून्य हो गईं. उदास, शुष्क, खालीखाली, विरक्त आंखों से मयंक को देखती रहीं, फिर चुपचाप हतप्रभ सी वेदना के महासागर में डूब कर बैठ गईं. वे एकाकी, मौन, स्तब्ध बैठी रहीं तो मयंक ने ही चुप्पी तोड़ी, ‘‘मां, एक फुलटाइम मेड का प्रबंध कर दिया है, वह आने वाली होगी. आप को कोई परेशानी नहीं होगी और फोन तो है ही.’’

नंदिता चुप रहीं और मयंक चला गया.

लताबाई ने आ कर सब काम संभाल लिया. नंदिता के अस्पताल से घर आने का पता चलते ही उन की सहेलियां उन से मिलने पहुंच गईं. उन के घर का सन्नाटा महसूस कर के उन की आंखों की उदासी देख कर उन की सहेलियां जिन भावनाओं में डूबी थीं, उन्हें व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं थे उन के पास और जहां शब्द हार मानते हैं वहां मौन बोलता है.

नंदिता सब के हालचाल पूछती रहीं और स्वयं को सहज रखने का प्रयत्न करते हुए मुसकराने लगीं, बोलीं, ‘‘तुम लोग मेरे अकेले रहने के बारे में मत सोचो, इस की भी आदत पड़ जाएगी, सब ठीक है और तुम लोग तो हो ही, मैं अकेली कहां हूं.’’

सब उन की जिंदादिली पर हैरान हुए फिर अपनीअपनी गृहस्थी में सब व्यस्त हो गए. उन का अपना नियम शुरू हो गया. सुबहशाम सैर करतीं, अपनी हमउम्र महिलाओं के साथ गार्डन में थोड़ा समय बिता कर अपने घर लौट जातीं. सब ने गौर किया था वे अब कभी भी अपने बेटेबहू, पोते का नाम नहीं लेती थीं.

कुछ समय और बीता. आर्थिक मंदी की चपेट में किरण की नौकरी भी आ गई और मयंक को औफिस की टैंशन के कारण उच्च रक्तचाप रहने लगा. उस की तबीयत खराब रहने लगी. छुट्टी वह ले नहीं सकता था. दवा की एक प्राइवेट कंपनी में सेल्स मैनेजर था, काम का प्रैशर था ही. दोनों के शाही खर्चे थे, कोई खास बचत थी नहीं. अभी तक नंदिता के साथ रहता आया था. नंदिता के पास अपनी जमापूंजी भी थी, पति द्वारा सुरक्षित भविष्य के लिए संजोया धन था जिस से वे आज भी आर्थिक रूप से सक्षम थीं. अब लताबाई फुलटाइम मेड की तरह नहीं, बस सुबहशाम आ कर काम कर देती थी. नंदिता ने अकेले रहने की आदत डाल ली थी.

किरण के मातापिता अपने बेटे के साथ अमेरिका में रहते थे. किरण अपने जौब के लिए भागदौड़ कर रही थी. यश की देखभाल उचित तरीके से नहीं हो पा रही थी. मयंक और किरण को नंदिता की याद आने लगी. अब उन्हें नंदिता की जरूरत महसूस हुई. वैसे भी नंदिता अब स्वस्थ हो चली थीं.

एक दिन दोनों यश को ले कर नंदिता के पास पहुंच गए. नंदिता के पास उन की कुछ सहेलियां बैठी हुई थीं. मयंक पहले चुपचाप बैठा रहा, फिर उन से धीरे से बोला, ‘‘मां, आप से कुछ अकेले में बात करनी है.’’

उन की सहेलियों ने उठने का उपक्रम किया तो नंदिता ने टोका, ‘‘ये सब मेरी अपनी हैं, मेरे दुखसुख की साथी हैं, जो कहना हो, कह सकते हो.’’

मयंक को संकोच हुआ, किरण सिर झुकाए बैठी थी, यश नंदिता की गोद में बैठ चुका था.

मयंक ने कहा, ‘‘मां, हम यहां आप के पास आ कर रहना चाहते हैं. हम से गलती हुई है, हमें माफ कर दो.’’

नंदिता ने सपाट स्वर में कहा, ‘‘नहीं, अब तुम लोग यहां नहीं रहोगे.’’

मयंक सिर झुकाए अपनी परेशानियां बताता रहा, अपनी आर्थिक और शारीरिक समस्याओं को बताते हुए वह माफी मांगता रहा. सुषमा और अर्चना ने नंदिता के कंधे पर हाथ रख कर बात खत्म करने का इशारा किया तो नंदिता ने कहा, ‘‘नहीं सुषमा, इन्हें भी एहसास होना चाहिए कि परेशानी के समय जब अपने हाथ खींचते हैं तो जीवन कितना बेगाना लगता है, विश्वास नाम की चीज कैसे चूरचूर हो जाती है. मैं समझ चुकी हूं और सब से कहती हूं अपने बच्चों को पालते हुए अपने बुढ़ापे को नहीं भूलना चाहिए, वह तो सभी पर आएगा.

‘‘संतान बुढ़ापे में तुम्हारा साथ दे न दे पर तुम्हारा बचाया पैसा ही तुम्हारे काम आएगा. संतान जब दगा दे जाती है तब इंसान कैसे लड़ता है बुढ़ापे के अकेलेपन से, बीमारियों से, कदम दर कदम पास आती मौत की आहट से, कैसे? यह मैं ही जानती हूं कि पिछला समय मुझे क्या सिखा कर बीता है. मां बदला नहीं चाहती लेकिन हर मातापिता अपनी संतान से कहना चाहते हैं कि जो हमारा आज है वही उन का कल है लेकिन आज को देख कर कोई कल के बारे में कहां सोचता है बल्कि कल के आने पर आज को याद करता है,’’ बोलतेबोलते उन का कंठ भर आया.

कुछ पल मौन छाया रहा. मयंक और किरण ने हाथ जोड़ लिए, ‘‘हमें माफ कर दो, मां. हम से गलती हो गई.’’

यश ने चुपचाप सब को देखा फिर नंदिता से पूछा, ‘‘दादी, मम्मीपापा सौरी बोल रहे हैं? अब भी आप गुस्सा हैं?’’

नंदिता यश का भोला चेहरा देख कर मुसकरा दीं तो सब के चेहरों पर मुसकान फैल गई. सुषमा और अर्चना खड़ी हो गईं, मुसकराते हुए बोलीं, ‘‘हम चलते हैं.’’

नंदिता को लगा जीवन का सफर भी कितना अजीब है, कितना कुछ घटित हो जाता है अचानक, कभी खुशी गम में बदल जाती है तो कभी गम के बीच से खुशियों का सोता फूट पड़ता है. Family Story in Hindi.

Hindi Crime Story: मैं जीती

Hindi Crime Story: शहर और गांव की सीमा पर मैं वैसी ही पड़ी थी जैसा कुदरत ने मुझे इस धरती पर भेजा था. मेरे बदन पर खून से सना झीना सा एक कपड़ा लिपटा था. निगोड़ी हवा के एक झोंके ने उसे भी फडफ़ड़ा दिया था.

मैं 20 मिनट पहले ही दुनिया में आई थी. मैं गला फाड़ कर तो तब रोती जब दाई ने मेरा गला साफ किया होता. मेरा तो गला भी साफ नहीं था इसीलिए तो मैं रुकी बांसुरी सी महीनमहीन रो रही थी.

भय उगलती सांयसांय करती अंधेरी काली रात. बिजली कड़क रही थी. सन्नाटा बेकाबू हुआ जाता था. अंधेरे को अंधेरा बूझे.
कार सामने की सड़क पर आ कर रुकी थी. लंबा, तगड़ा, छोटीछोटी काली दाढ़ीमूंछों वाला एक ड्राइवर कार से नीचे उतरा था. मैं गाड़ी की डिक्की में थी. यदि 2 मिनट और डिक्की नहीं खुलती, तो तेरा दम घुट गया होता. ड्राइवर ने डिक्की से मुझे निकाला. वह सड़क से 10-15 कदम खेतों की ओर बढ़ा. उस ने बड़ी बेरहमी से मुझे नीचे पटक कर, इस विश्वास के साथ कि मैं अभी मर जाऊंगी, कहा, ‘मर.’

ओह, कैसा कसाई था वह. इतने बेदर्द तो वे भी नहीं होते जो मरे जानवर ढोते हैं. बांस की गांठों सी कठोर जमीन पर पड़ते ही मेरे बदन से टीस उठी थी.

मां ने मुझ नाजायज से नजात पा ली थी. टूटबिखर जाते मां के रिश्ते की बात ज्यों की त्यों बनी रह गर्ई थी. घर की इज्जत सलामत थी. पहाड़ से बड़े इस हादसे से परिवार उबर गया था. बड़े घरों में ऐसे अजबगजब नहीं होते.

घनी गहरी काली रात. कुत्ते, बिलाव, लोमड़ और सियार आदि से मेरी सुरक्षा थी. मगर अपने बिलों में अलसाए पड़े दुष्ट चींटों ने मेरी गंध ले ली थी कि मैं यहां पड़ी हूं. चीटों में विलक्षण सूझ होती है. वे एकदूसरे को सूंघते अपने लक्ष्य को साधते आगे बढ़ते जाते हैं.

डंक भरे सुर्ख स्याह चींटे आततायी दुश्मन से मुझ पर टूट पड़े थे. इतना स्वाद से भरा मुलायम मांस चींटे शायद पहली दफा खा रहे थे.

नन्ही सी मेरी जान. असंख्य चींटे. चींटों की नोंच से मैं बुरी तरह बिलख रही थी.
जैसे घर आया मेहमान धीरेधीरे घर को जाननेपहचानने लगता है उसी तरह मैं मां के पेट में आने के बाद मां की दुनिया को जाननेपहचानने लगी थी. शायद अभिमन्यु की तरह.

मेरी हर पीड़ा, हर कष्ट में अब मां थीं. मां, कमल के डंठल सी देह. गुलाब की पंखुरी से पतलेपतलेे उस के होंठ. मध्यम कद. 18-19 साल की उम्र. सरसों के निकले दानों सा सुरमई रंग. वह जब ऊंची एड़ी की सैंडल पहन कर 10वीं की किताब बगल में दबाए स्कूल के लिए निकलतीं तो धागे सी कांपतीं, इतनी सचेत, सावधान कि पैरों की आहट तक चुप. सहेलियों में घीशक्कर. लड़कों की छायामाया से दूर.

मां आबरू को औरत की अमूल्य थाती मानतीं. आचरण की सीखें देतीं. शर्म में पनडुब्बी सी डूबी रहतीं.

कुंती के आह्वान करते ही सूर्य आ गए थे. नहाईधोई मां एक सपने के सुपुर्द थीं. जहां चाह वहां राह. मां का सपना सच. काम अंधा होता है. बहक गए कदम. देह के दबाव में आ गई मां. लोहा लोहे से कटता है. देह देह से बुझती है.

डाकिनी रात.

धरती दरकी. धरती फटी. धरती लहूलुहान हुई. धरती जोरजोर से हिली. धरती आसमान छू गई. धरती हिलतीहिलती थिर गई थी. मूसलाधार बारिश हुई. मां नहा गई. सीप में स्वाति की एक बूंद सी मैं मां में आकार लेने आ गई थी.

मुसलमान परिवारों में मामाफूफी के लड़केलड़की के बीच पतिपत्नी के रूप में एक सहज संजीदा रिश्ता होता है. लेकिन हिंदुओं में यह रिश्ता राखी से जुड़ा है.
भोलीभाली मां को 2 महीने बाद पता चला कि मैं उन में हूं, इस सदमे का सामना मां नहीं कर पा रही थी. माथे की नसें तड़कतीतड़कती रुकीं. विक्षिप्त सी मां एकडेढ़ महीने तक गालियां खाती रहीं कि पाप गिर जाए.

मां की वह पलभर की कामाग्नि अब क्रोधाग्नि और चिंताग्नि में बदल कर उन्हें जलाने लगी थी. मां दिन झुलसतीं, रात सुलगतीं. न खातीं, न पीतीं, न सोतीं. बस, हर समय अपनी उस गलती को कोसती रहती थीं.

शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की तरह जितनी तेजी से मैं मां के गर्भ में बढ़ रही थी, बछेड़ी सी छरहरी मां की काया कृष्ण पक्ष के चांद की तरह क्षणक्षण घटती जा रही थी.

भ्रूण हत्या की बात अब बेमानी थी. मां ने साढ़े 3 महीने तक अपने पेट में रख कर मुझे जीवन दे दिया था.
पाप छिपाती मां बदहवास रहने लगी थीं. मां का हर पल साल सा बीतता. मां का तकिया आंसुओं से भीग जाता. छोह से भरी मां पेट पर मुक्के मारतीं, ताकि अनचाही मैं भीतर ही मर जाऊं. मां कहतीं, ‘दुष्ट, मर जा तू.’

मैं बादाम की गिरी सी मां में सुरक्षित थी.

चिंता और हताशा से घिरी मां ने कई बार खुद को मारने का मन बनाया था. शायद उन्होंने यह सोच कर कि 2 हत्याएं होंगी, ऐसा कदम न उठाने के लिए उठते आवेग को दबा लिया था.

मां के बदलते हावभाव और पटरी से उतर गई दिनचर्या से मामी के मन में शक पनपने लगा था. चूंकि नानी नहीं थीं, इसलिए अब मामी ही मां की मां थीं. बालबच्चों वाली मामी कई दिनों तक मां की उदासी को मासिक दिनों की गड़बड़ी समझती रही थीं.

एक दिन मामी ने मां से कहा भी था, ‘चंपी, अगर तबीयत ठीक नहीं रहती है, तो डाक्टर को दिखा लाऊं.’

‘नहीं,’ कहने के साथ मां के हाथ का निवाला हाथ में ही रह गया और मुंह का मुंह में. मां उठ कर भीतर चली गई थीं.

मामी का संदेह और पुख्ता हो गया था. धरती से बीज और औरत के पेट छिपाए नहीं छिपता है. और एक दिन शक से घिरी मामी ने खिड़की की झिर्री से कपड़े बदलती मां का पेट देख लिया था.

आकाश धरती पर आ गिरा था. प्रलय. मामी का सुर्ख लाल चेहरा जर्द हो गया था. तैश और रंज से बेहाल मामी दीवार से सिर टकराने लगी थीं. आबरू हलाल. अनचाहा काल. क्या बनेगी अब.

रात के 11 बजे थे. मां का दरवाजा खटखटाया. खुद के सांस का भी सामना करने की हिम्मत हार चुकी मां की घिग्घी बंध गई थी. वे डरतेडरते उठीं. दरवाजा खुला. मामा थे. 35 साल की उम्र. हाथी सा भारी बदन. चेहरे पर बड़ीबड़ी मूंछों के 2 गुच्छे. पुलिस में डीएसपी. डंडा मार कर जमीन से पानी निकालने की कूवत. आग के शोले से वह भीतर घुसते आए थे. मामी साथ थीं.

‘जी, भैयाजी,’ मां मानो जमीन में अब धंसी.

मामा की खून भरी मोटीमोटी आंखें मां को लीलती गईं, ‘का… कौन है.’

‘कौन है?’ मां माथा पकड़ कर बैठ गई थीं. दोनों का आधाआधा दोष है. करोड़ों की संपत्ति के वारिस कुलदीपक को बुझवाऊं.
पाप उजागर था. मां सुबकसुबक कर रोए जा रही थीं.

मामा की जेब में पिस्तौल थी. मामा गुस्से में थे. उन का हाथ जेब में जाते देख मामी ने उसे वहीं पकड़ लिया था, ‘बहन की हत्या करोगे.’

‘नीच,’ मामा दनदनातेफनफनाते मां के कमरे से बाहर निकल आए थे.

मामा ने अपने कमरे में आते ही छोटे मामा को फोन मिलाया, जो जयपुर में बिजनैस करते हैं. बड़े मामा की आवाज भर्राई थी.
बड़े मामा कहने लगे, ‘तुम्हारे पास ही ला रहा हूं पापिन को.’

बड़े मामा ने फोन पटक दिया था. बेहद दुखी मन से वे बोले थे, ‘भेड़ सी भोली बहन, बाघिन बन गई तू.’
कार रातोंरात चलती रही थी.

भोर का समय था. सूर्य की पीली किरणें अभी फूटी नहीं थीं. बड़े मामा की कार छोटे मामा की कोठी के सामने आ रुकी थी. मां कार में डरी कबूतरी सी बैठी थीं. बड़े मामा दबे कदम गाड़ी से बाहर निकले. उन्होंने घंटी बजाई. अंदर से किसी के उठ कर आने की आहट हुई.

दरवाजा खुला. छोटे मामा थे. उन की आंखें कह रही थीं कि वह रातभर सोए नहीं हैं. दया तभी आती है, जब अगला दया का पात्र हो.

कार का दरवाजा खोल कर बड़े मामा ने मां को बड़ी बेरहमी से कार से बाहर कर दिया था.

कुंआरी का पेट घर की आबरू की कब्र होती है. दोनों भाइयों के होंठ बोलतेबोलते फड़फड़ा कर ही रह गए थे. अल्फाज घुट कर कंठ में ही दफन हो गए.
पानी में लाश बहा कर लोग लाश को देखते नहीं हैं. मां को यहां छोड़ते ही बड़े मामा गाड़ी स्टार्ट कर आगे बढ़ा ले गए थे. हां, उन्होंने कार के कांच से जमीन पर थूक जरूर दिया था.

छोटी मामी ने मामा की इस घिनौनी बात को मानने से साफ मना कर दिया था कि मां को जहर दे दिया जाए. उन्होंने इतना ही कहा था, ‘रहने दीजिए, बच्ची गलती कर बैठी है.’

मजबूत कदकाठी के गोरेचिट्टे छोटे मामा को मां नरक दिखतीं. जब भी मां सामने आ जातीं, तो वह अपनी गरदन घुमा लेते या मुंह पर रूमाल ले लेते. मां जैसे उन की सगी बहन नहीं, जन्मजन्म की बैरन हों. मामा कल तक मां को बांहों में भर कर लाड़ से कहा करते थे, ‘मेरी बहन का ब्याह इतिहास होगा.’

आज…

मामी मां से रोजरोज उस का नाम पूछतीं. शायद मामा ही मामी पर दबाव डाल रहे होंगे. मामी मां से जितना खोदखोद कर पूछतीं, मां उतनी ही रोतीं, पर मुंह नहीं खोलती.

छोटे मामा की एक पड़ोसन थीं. 32 साल की उम्र. बेडौल होती काया. गपों की पिटारी. हमप्याला. 2 दोस्तों की तरह मामी और पड़ोसन एक ही कटोरी में खा लिया करती थीं.

पड़ोसिन आती. वह मां के धंसते जा रहे गालों की चिकोटी काट कर मां को अपनी मजबूत बांहों में भर लेती. फिर कहती, ‘सूखे पत्ते सी कितनी कमजोर हो गई है, मेरी बिटिया.’ फिर वह मां के लंबेलंबे केशों में उंगलियां फेर कर कहती, ‘यही तो औरत का धर्म है कि वह खुद धरती सी छीजती संसार रचती है. औरत की संपूर्णता औरत की कोख होती है.’

मामी की ओर देखते पड़ोसन की आंखों में शिकायत होती, ‘दुर्गी, यह तो अभी बच्ची है. इस की बच्चे करने की उम्र थोड़े न है.’

पड़ोसन का नाम करनी था. कुंद हुई मामी बात टाल जातीं, ‘करनी, क्या बताऊं, इस की बूढ़ी सास है. पोतेपोती का मुंह देखने के लिए जान देती है.’

पड़ोसन के लिए मां जैसे टाइमपास करने का एक जीताजागता खिलौना बन गई थीं. लेकिन मां चिंता और उदासी की गठरी बनी रहतीं.

मां को अपनी बांहों में समेट कर पड़ोसन सीखें देती, ‘बेटी, पेट वाली औरत को ऊंचीनीची जगह से बचना चाहिए.’

‘बेटी, ज्यादा ठंडेगरम पानी से मत नहाना, बच्चा होने के बाद पेट पर बादल पड़ जाते हैं. साड़ी पहनते औरत अच्छी नहीं दिखती.’

‘बेटी, एक करवट मत सोए रहना. पेट में बच्चे को हिलनेडुलने में दिक्कत होती है.’

पड़ोसिन की ये सीखे मां को शूल सी चुभतीं. मां उस की बांहें छुड़ा कर टपकती आंखों को हथेली की ओक में समेटती भीतर चली जातीं. चेहरे पर पड़ रही झाइयां और झुर्रियां आंसुओं से गीली हो जातीं.

पड़ोसन का घर आते रहना मामी की आंखों में पड़े कंकड़ सा करकने लगा था. एक दिन मामी ने सीधीसादी पड़ोसन में 5 साल पुरानी अपनी दोस्ती से यह सोच कर कुट्टी कर ली थी कि एक ‘नागिन’ के घर से निकल जाने के बाद फिर से उसे मना लूंगी.

मामी की बड़ी बिटिया कीनू 4 साल की और छोटी मीनू 3 साल की थी. उन दोनों अबोध बच्चियों को मामी मां से बचाए रखतीं, मानो मां कोढ़, खाज या तपैदिक की मरीज हों.

मामी जब भी उन बच्चियों को मां से घुलीमिली देखतीं, गुस्से से आंखें तरेर कर कहतीं, ‘कीनूमीनू, दोनों इधर आओ. चलो, नहाधो कर कपड़े पहनो और नाश्ता करो.’ पर, मामी की आंखें बचते ही वे बच्चियां फिर मां के गले आ लिपटतीं.

मां के कारण मामामामी का एकएक पल पहाड़ सा कटता. खेत के रखवाले की तरह उन की निगाहें हर क्षण चौकस रहतीं. मामामामी जब भी अकेले बैठते, मामी खीज कर कहतीं, ‘न जाने कब इस डाकिन से पिंड छुटेगा.’

मामा कहतेकहते भी कुछ नहीं कहते.

मामी पूछतीं, ‘डाक्टर से मिले थे.’

मामा का भारी मन टीस उठता, ‘दिन में रोज 2 बार फोन कर लेता हूं. वे एक ही सलाह देते हैं, इस तरह के गर्भपात में खतरा है.’

मैं मां के पेट में साढ़े 8 महीने की थी. मामा डाक्टर के इस सुझाव के साथ मां के लिए गोलियां लाए थे कि इन गोलियों को खाने से प्रेगनेंट का दर्द उठेगा. दर्द उठे, देर मत करना.
मां सब गोलियां हजम कर गई थीं. दर्द नहीं उठा था. हां, मानसिक पीड़ा से मां दोहरी हुई जाती थीं.

वह काली रात.

मामा मां को अस्पताल ले गए थे. मामी को भी साथ रखने की जरूरत नहीं समझी थी मामा ने.
स्टील के बड़ेबड़े औजार और मां के पेट में मुलायम सी मैं. स्त्री और पुरुष के प्राकृतिक संबंधों की नाजायज, अवैध औलाद.
अई मां, औजार 15 दिन पहले ही मुझ मां के पेट से खींच लाए थे.

खेत में पड़ी मैं चींटों की नोंच से बिलखतीतड़पती रुके गले से रोए जा रही थी कि एक कार एकाएक आ कर रुकी. मैं घबरा गई थी कि कहीं वही कसाई फिर आ गया है.

कई बार ऐसे संयोग बन जाते हैं, जिन पर विश्वास नहीं होता. दरअसल, वह कार यहां आ कर खराब हो गर्ई थी. कार से 2 आदमी नीचे उतरे थे. बिजली की चमक और टार्च की रोशनी एकसाथ मुझ पर गिरी. टार्च वाले आदमी ने मेरी ओर उंगली का संकेत कर के कहा, ‘लगता है, कोई नवजात बच्चा रो रहा है.’

बिना टार्च वाले ने आगे बढ़ते हुए कहा, ‘मैं उठा लाता हूं. अस्पताल में भरती करा देंगे, शायद जी जाए.’

टार्च वाले ने मना किया, ‘थाना, कचहरी का झंझट होगा. बेवजह हम फंसेंगे.’

बिना टार्च वाले आदमी में दया उपजी, ‘मैं लाता हूं उसे. अस्पताल पहुंचाना चाहिए.’

टार्च वाला आदमी गाड़ी का मालिक लगता था, वह कहने लगा, ‘मैं गाड़ी ठीक करता हूं, तुम उठा लाओ उसे.’

और वह दयावान मुझे अपने अंगोछे में लपेट लाया था.
शिशुगृह उन के रास्ते में पड़ता था. वे लोग मुझे शिशुगृह में रख कर चले गए थे.

मेरी दशा देख, दीदी की आंखों में आंसू भर आए थे. शायद मुझ सा दुर्भाग्य वह पहली दफा निरख रही होंगी. मुझे पालना से उठाते ही दीदी के शरीर पर असंख्य चींटे चढ़ गए थे.
भरी रात थी. मेरी दुर्दशा ने दीदी की आंखों की नींद उड़ा दी थी.

दीदी ने डिटोल घुले टब में मुझे झटपट नहलाया. मेरी समूची चमड़ी चींटों ने चाट ली थी. चमड़ी उतरे खरगोश सी मैं दीदी के हाथों में थी, मांस का लोथड़ मात्र. मरे चींटे टब में बादल के टुकड़े जैसे तैर रहे थे.

दीदी ने कपड़ा लपेट कर मुझे झूले में डाल दिया था और स्वयं कपड़े बदलने चली गई थीं कि मुझे तुरंत अस्पताल ले जाएंगी.

मेरी दुर्दशा देख डाक्टर की आंखें भर आई थीं. वे हतवाक थीं. उन की आंखों के कोर गीले थे. मेरी जांच करते उन के हाथ थरथर कांप रहे थे.

अस्पताल में रहते मेरे शरीर पर चमड़ी आने लगी थी. चींटों के डंक पीबने लगे थे. संक्रमण का खतरा बन गई मेरी बाईं आंख का आपरेशन हुआ. आंख निकालनी पड़ी थी. मेरी आंख के साथ ही आंख की खोह से मरे पड़े कई चींटे निकले थे.

15 दिन बाद मुझे शिशुगृह में ले आया गया था. जिस दिन मैं शिशुगृह में आई थी, उसी दिन दीदी ने मेरा नाम ‘शोभा’ रख कर मेरी फाइल तैयार की थी.

दूध पिलाती दीदी रोज मेरी सांसों की दुआएं मांगतीं और मैं अपनी बदहाल जिंदगी से मुक्ति. दीदी हारीं, मैं जीती. Hindi Crime Story.

लेखक-रत्नकुमार सांभरिया

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