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Family Story In Hindi : कारवां – परिवार के मायने समझाती कहानी

Family Story In Hindi : शादी जीवन का एक अहम फैसला होता है, जिसे वे चारों दोस्त ले चुके थे लेकिन उस फैसले में उन्हें अपने मातापिता की भी पूर्ण सहमति चाहिए थी क्योंकि वे अकेले नहीं, सब को साथ ले कर चलना चाहते थे.

कैंटीन में कोने की सीट पर चार दोस्तों की महफिल जमी थी. आसपास की चहलपहल से दूर वे अपनी ही बातों में गुम थे. चायकौफी की चुस्कियों के साथ उन का हंसीमजाक बदस्तूर जारी था. उन में कोई मितभाषी था तो कोई अंतर्मुखी, कोई चंचल तो कोई शांत पर दोस्ती चतुर्भुज जैसी जो सभी धर्मजाति से परे एक ऐसा वर्ग था जिस की समान आकार की भुजाएं चार दोस्त विजय, नंदिनी, अमन और शैली थे.

विजय, रवि और रमाजी का इकलौता बेटा था. विजय जब 17 वर्ष का था तब रविजी दिल्ली आ बसे थे. उन की कालोनी में ही नंदिनी का परिवार रहता था. विजय तब 11वीं कक्षा उत्तीर्ण कर के आया था और 12वीं कक्षा में एडमिशन के लिए काफी प्रयासरत था तब नंदिनी के पापा अनिलजी से हुए परिचय के कारण विजय का एडमिशन नंदिनी के ही स्कूल में हो गया था.

नंदिनी भी 12वीं कक्षा में ही थी और उस के बाद दोनों ने कालेज में एडमिशन भी एकसाथ ही लिया था. नंदिनी का एक बड़ा भाई था जो अपनी नौकरी के सिलसिले में लखनऊ में रहता था.

एडमिशन के दौरान काउंटर पर पेपर्स जमा करते हुए विजय और अमन की बातचीत हुई थी तो पता चला कि अमन भी उन्हीं की तरह कालेज में प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था. इस तरह तीनों ने एकसाथ ही क्लास में प्रवेश किया.

शैली अपने भैयाभाभी के साथ रहती थी. उस के मातापिता एक दुर्घटना के शिकार हो असमय ही मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे तब वह 16 वर्ष की थी. जौन और लीना ने उस के भाईभाभी हो कर भी मातापिता का फर्ज निभाया था.

मातापिता को खोने के बाद शैली शांत हो गई थी पर जौन और लीना के वात्सल्य ने शैली को संभाल लिया. स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद उस का मन कुछ उचाट सा रहता था पर लीना चाहती थी कि शैली अभी हंसेखेले, अपनी उम्र के दोस्तों के साथ घुलेमिले इसलिए उस ने बहुत प्यार और संयम के साथ शैली को समझाया. शैली भी लीना को बहुत मानती थी, सो, उस ने भी खुलेमन से कालेज में एडमिशन लिया.

कालेज के पहले 2 दिन वह अनुपस्थित रही पर तीसरे दिन गई तो नंदिनी से हुई दोस्ती की वजह से जल्दी ही वह विजय और अमन की भी अच्छी दोस्त बन गई और इस तरह इन चारों का ग्रुप बन गया.

रविजी को नया शहर काफी रास आ गया था. यहां उन्होंने अपने बिजनैस में तेजी से तरक्की की. संपन्नता और बढ़ी तो उन्होंने अपना मकान भी बदल लिया. एक छोटी सी कोठी बनवाई थी उन्होंने जो नंदिनी के घर से थोड़ी दूरी पर थी. घरों में बेशक थोड़ी दूरियां बढ़ गई थीं परंतु दोनों परिवारों के संबंधों में कोई दूरी नहीं आई थी.

विजय, नंदिनी, अमन और शैली तब सन नब्बे के बैच में थे. अब तो उन चारों की दोस्ती भी काफी मशहूर हो रही थी. क्लासरूम में नंदिनी और शैली आगे की सीट पर और विजय और अमन ठीक उन के पीछे बैठते थे. दोस्ती गहराती गई तो चारों एकसाथ कभीकभी क्लास भी बंक करने लगे. नंदिनी और शैली ने अर्थशास्त्र लिया था, इसलिए केवल अर्थशास्त्र के पीरियड में ही चारों अलग होते थे वरना कैंटीन हो या लाइब्रेरी, चारों साथ ही रहते थे.

एक दिन कैंटीन में विजय ने पूछा, ‘‘इस रविवार का क्या प्रोग्राम है?’’
‘‘मुझे तो अपनी आंटी के घर जाना है,’’ शैली ने समोसा खाते हुए जवाब दिया.
‘‘और मुझे तो पापा ने शोरूम के लिए कुछ सामान लाने का काम सौंपा हुआ है,’’ अमन चाय की चुस्की लेता हुआ बोला.
‘‘और नंदिनी, आप कहां व्यस्त हैं?’’ विजय ने नंदिनी को देखते हुए पूछा.
‘‘कहीं नहीं, मैं बिलकुल फ्री हूं. तुम बताओ, क्या प्रोग्राम बनाना चाह रहे हो?’’ नंदिनी चुहलभरे स्वर में बोली.
‘‘अरे, मैं सोच रहा था कि संडे को औटो एक्सपो का आखिरी दिन है तो चलते हैं सब.’’
‘‘औटो एक्सपो और मैं सोच रही थी तुम किसी फिल्म की बात करोगे,’’ शैली तुनक कर बोली.
‘‘चल हट यार, ये फिल्म कहां से आ गई बीच में?’’
‘‘अमन, तू तो चल यार, सामान फिर किसी दिन ले अइयो. यों भी संडे एक्सपो का आखिरी दिन है.’’
‘‘हां यार चल, वहां तो मुझे भी जाना है और नंदिनी, तुम तो नहीं चलोगी न, तुम्हें कोई फिल्म देखने जाना होगा?’’
‘‘अरे वाह, क्यों नहीं चलूंगी, गाडि़यों पर क्या सिर्फ तुम लड़कों का ही कौपीराइट है. मैं भी चलूंगी और अपनी पसंद की गाडि़यां भी देखूंगी,’’ नंदिनी इतराते हुए बोली.
‘‘हां, और वापस लौटते हुए खरीद भी लूंगी,’’ विजय हंसते हुए बोला तो उस की यह बात सुन कर अमन और शैली भी जोर से हंस पड़े.

नंदिनी का मुंह बन गया तो अमन ने हंसते हुए उस की पीठ पर हलके से धौल जमा दी, उस पर नंदिनी खिलखिला पड़ी.
‘‘मम्मी, परसों हम लोग औटो एक्सपो देखने जा रहे हैं.’’
‘‘औटो एक्स्पो, तुम्हें कब से गाडि़यों में दिलचस्पी होने लगी?’’
‘‘अरे, क्या हो गया है सब को, क्यों नहीं जा सकती मैं औटो एक्सपो में?’’ नंदिनी मुंह ही मुंह में बोलती हुई अपने कमरे की ओर बढ़ चली.
तभी अनिलजी के आने की आहट हुई तो नंदिनी ‘पापापापा’ कहते हुए उन की ओर दौड़ गई.
‘‘पापा, परसों मैं प्रगति मैदान जाऊं, वहां फेयर लगा है.’’
‘‘और यह तो पूछिए कि कैसा फेयर, गाडि़यों का औटो एक्सपो, वहां जाना है मैडम को,’’ ऊषाजी भी उन दोनों के नजदीक चली आईं.
‘‘कौनकौन जा रहा है, तुम चारों ही जा रहे हो न?’’ अनिलजी विजय के साथसाथ अमन और शैली को भी भलीभांति जानते थे.
‘‘नहीं पापा, शैली नहीं जा रही है. मैं, विजय और अमन जाएंगे, जाऊं न मैं, मेरे अच्छे पापा?’’ नंदिनी बच्चे समान मचल उठी.
यह देख कर अनिलजी की हंसी छूट गई और उन्होंने हां में सिर हिला दिया.
‘‘कालेज खत्म होने को है और बचपना अभी भी नहीं गया है,’’ ऊषाजी यह कह कर रसोई में चली गईं.
रात को बैडरूम में अनिलजी कोई किताब पढ़ रहे थे, ऊषाजी आईं और पानी का गिलास साइड टेबल पर रखते हुए बोलीं, ‘‘काफी रात हो गई है, अब सो जाइए.’’ इतना कह कर वे भी लेट गईं.
अनिलजी ने किताब बंद कर दी और ऊषाजी से मुखर हुए, ‘‘तुम्हें विजय पसंद है?’’
यह सुन कर ऊषाजी ने एक पल को अनिलजी की ओर देखा और फिर बोलीं, ‘‘आप नंदू के लिए सोच रहे हैं?’’
‘‘हां, बुराई क्या है? अच्छा लड़का है.’’
‘‘तो क्या अपनी नंदू भी उसे चाहती होगी?’’ ऊषाजी ने अपनी सवालिया नजरें अनिलजी पर टिका दीं.
‘‘अपनी नंदू को कहां कोई गाडि़यों का शौक है. औटो एक्सपो में किस लिए जा रही है जबकि शैली भी नहीं जा रही. जाहिर है, कालेज के अलावा भी विजय का और साथ पाने के लिए.’’
यह सुन कर ऊषाजी बोलीं, ‘‘हां, जोड़ी तो अच्छी है और फिर विजय है भी काफी समझदार जो अपनी नंदू के लिए बहुत अच्छी बात है. अब की बार रवि भाईसाहब से मिलें आप तो बातों ही बातों में जिक्र कर दीजिएगा.’’

कालेज का आखिरी वर्ष था. फेयरवैल की तैयारियां जोरोंशोरों से चल रही थीं. चारों ने एकसाथ ही जाने का निर्णय लिया. नंदिनी ने शैली को अपने घर में ही बुला लिया था और अमन विजय के घर पहुंचने वाला था. वहां से वे नंदिनी के घर जाने वाले थे और ऐसे सब इकट्ठे हो कर कालेज पहुंचने वाले थे.

फेयरवैल वाले दिन रमाजी ने नंदिनी को खुद तैयार किया. हलके गुलाबी रंग की साड़ी, सौम्य मेकअप और लंबे खुले बालों में नंदिनी का रूप यों दमका कि रमाजी उस की नजर उतारने को मजबूर हो गईं. नंदिनी खिलखिला कर मां के गले लग गई.

दोनों नीचे पहुंचीं तो शैली ड्राइंगरूम में पहले से बैठी हुई थी. नंदिनी को इस रूप में देख कर उस के मुंह से निकला, ‘‘अरे वाह, मेरी हीरोइन. अरे मैडम, आज हमारे कालेज का फेयरवैल है, तेरा इस घर से फेयरवैल नहीं है,’’ फिर एक उंगली ठोड़ी पर टिकाते हुए बोली, ‘‘अरे बिटिया, अभी ससुराल जाने का वक्त नहीं आया.’’

‘‘चलचल, ज्यादा बातें मत बना,’’ नंदिनी उस की ऐक्टिंग देख कर हंसते हुए बोली.
‘‘हां, जल्दी चल. विजय बाहर गाड़ी में इंतजार कर रहा है.’’
‘‘अमन नहीं आया? ये दोनों तो साथ में आने वाले थे न,’’ नंदिनी ने पूछा.
‘‘हां, वह कुछ काम पड़ गया है उसे तो अब वह सीधा कालेज ही पहुंचेगा.’’
ऊषाजी भी बाहर आईं, देखा, विजय गाड़ी की स्टेयरिंग सीट पर था. नंदिनी उस के साथ आगे बैठ गई और शैली पीछे वाली सीट पर बैठी. ऊषाजी ने हाथ हिला कर सब को हंसते हुए विदा किया.

परीक्षा परिणाम आए 3 महीने हो चुके थे. विजय अपने पापा के साथ उन के व्यवसाय में जुट गया और नंदिनी ने फैशन डिजाइनिंग कोर्स में दाखिला लिया था.

शैली के पापा बैंक में काम करते थे. शैली भी बैंक में ही जौब करना चाहती थी, इसलिए उस ने बैंकिंग की पढ़ाई करने का निश्चय किया हुआ था और वह वही कर रही थी.

अमन के पापा का ‘फर्नीचर मार्ट’ था और काफी अच्छा चलता था. शोरूम में उन का भांजा भी भरपूर सहायता करता था. घर की आर्थिक स्थिति अच्छी थी और इन सब बातों को देख कर ही अमन ने फोटोग्राफी का कोर्स करने की इजाजत मांगी, जिस की हामी उसे परिवार से सहज ही मिल गई थी.

वक्त अपनी गति से चल रहा था. 2 वर्ष और बीत गए. अब विजय के घर में उस की शादी की चर्चा काफी जोर पकड़ने लगी थी. उस के घर की टेबल लड़कियों की तसवीरों से भरी रहती थी और कुछ ऐसा ही हाल नंदिनी के घर पर भी था हालांकि उसे तसवीरें नहीं दिखाई जा रही थीं पर अब उस के मातापिता भी उस के विवाह की तीव्र इच्छा रखे हुए थे.

शैली अब बैंक में कार्यरत हो चुकी थी और अमन ने अपना छोटा सा फोटो स्टूडियो खोल लिया था.

पूरी दुनिया को मुट्ठी में कैद करने वाला यंत्र ‘मोबाइल’ तब नहीं था परंतु घर पर ट्रिनट्रिन करती लैंडलाइन की तार ने इन चारों दोस्तों की दोस्ती के तार को जोड़ रखा था.

हर 15 दिनों में एक दिन इन चारों की मुलाकात का दिन होता था. हंसीमजाक, सुखदुख, अपनेअपने क्षेत्र के अनुभव को कहनेसुनने में वक्त कैसे बीत जाता था, उन चारों को पता भी न चलता. हर मुलाकात का अंत अगली मुलाकात की तारीख निश्चित करने के साथ होता.

रविजी ने विजय के लिए एक और नई फैक्ट्री खोलने का फैसला किया. दिन और तारीख तय हुए तो मुहूर्त में सम्मिलित होने के लिए सभी को निमंत्रण देना था. रविजी ने विजय से कहा कि नंदिनी का घर पास ही है, वहां वे खुद ही हो आएंगे. उस के बाद विजय अमन और शैली के घर जा कर उन्हें सपरिवार आने का निमंत्रण दे आया था.

रविजी रमाजी के साथ नंदिनी के घर पहुंचे तो वह घर पर नहीं थी. अनिलजी और ऊषाजी ने बेहद खुलेदिल से उन का स्वागत किया. चाय का दौर चला तो घंटा, डेढ़ घंटा कब व्यतीत हो गया, पता न चला.

उन लोगों के जाने के बाद नंदिनी के मातापिता काफी संतुष्ट नजर आ रहे थे जैसे उन्हें मुंहमांगी मुराद मिल गई हो. रवि और रमाजी ने उन से नंदिनी का हाथ मांगा था विजय के लिए जिस के लिए दबे शब्दों में उन लोगों ने हां भी कर दी थी. अब उन्हें केवल नंदिनी की हां का इंतजार था.
‘‘नंदू, कल रवि भाईसाहब और रमा भाभी आए थे,’’ ऊषाजी ने नाश्ते की टेबल पर नंदिनी को बताया.
‘‘अच्छा, हां, वह अंकल की नई फैक्ट्री का इनोग्रेशन है न, इसलिए, पता है मम्मी, यह नई फैक्ट्री अंकल ने विजय को सौंपनी है.’’
‘‘पता है बेटा और साथ ही अब वे लोग विजय की शादी भी करवाना चाह रहे हैं,’’ ऊषाजी ने टोहने वाले स्वर में नंदिनी से कहा.
‘‘मम्मी, जैसे आप लोग मेरे पीछे पड़े हैं न, वैसे ही अंकलआंटी भी विजय के पीछे पड़े हैं,’’ नंदिनी खुल कर हंसते हुए बोली.
‘‘तो इस में गलत क्या है, अब तुम लोग अपनीअपनी लाइफ में सैटल हो चुके हो और फिर, उम्र का तकाजा भी यही है कि अब तुम दोनों की शादी भी हो जानी चाहिए,’’ ऊषाजी उत्साहित स्वर में बोलीं.
‘‘मम्मी, मैं काफी समय से नोट कर रही हूं कि आप को मेरी शादी की बहुत जल्दी है. तो ठीक है, मैं शादी के लिए तैयार हूं पर लड़का मेरी पसंद का होगा, बताइए मंजूर है?’’ नंदिनी ने शरारती स्वर में ऊषाजी से पूछा.

‘‘नंदू, तेरे पापा और मैं ने हम दोनों ने ही हमेशा तेरी हर जायज मांग को पूरा किया है. जो पढ़ना चाहा वो पढ़ी, जो कैरियर चुनना चाहा वही चुनने दिया पर यह तेरी शादी का सवाल है, इस में केवल तेरी मरजी नहीं चलेगी, लड़का हमें भी पसंद आना चाहिए वरना फिर तुझे हमारी पसंद से ही शादी करनी होगी,’’ ऊषाजी तनिक तीखे स्वर में बोलीं.
‘‘ओ मेरी प्यारी मम्मी, फिकर नौट, लड़के को आप सालों से जानती हैं. उस की फैमिली के बारे में भी आप को पता है. बस, जल्दी ही आप लोग उस का चेहरा भी देख लेंगे,’’ इतना कह कर नंदिनी ने अपना बैग उठाया और रमाजी को बाय कह कर घर से निकल गई.
शाम की चाय पीते हुए अनिलजी बोले, ‘‘अब वह हमें लड़के से क्या मिलवाएगी, उस की बातों से तो पूरा पता चल ही गया है कि विजय ही है वह लड़का.’’
‘‘मेरा भी यही खयाल है और जरूर विजय ने भी अपने घर में ऐसी ही बात की होगी तभी तो रवि भाईसाहब ने सीधे ही नंदू को मांग लिया.’’
‘‘चलो, अच्छी बात है. दोनों बच्चों ने अपनेअपने जीवनसाथी अपनी मरजी से और बहुत अच्छे चुने हैं,’’ अनिलजी बेहद नरम स्वर में बोले.

फैक्ट्री के उद्घाटन वाले दिन वहां काफी चहलपहल थी. विजय की दादी ने फीता काटा तो उन चारों की मित्र मंडली ने सब से ज्यादा तालियां बजाईं. माहौल काफी खुशगवार था. तभी माइक हाथ में ले कर रविजी ने सब को संबोधित किया.

‘‘मेरे सभी प्रियजन, आज आप सब इस खास अवसर पर उपस्थित हुए हैं, इस के लिए मैं आप सब का दिल से आभारी हूं. आप सभी का बहुतबहुत धन्यवाद और आज इस खुशी के मौके पर ही मैं आप सब से एक और दूसरी खुशी बांटना चाहता हूं.’’ यह सुन कर विजय, नंदिनी, अनिल और शैली चारों की ही आंखों में उत्सुकता नजर आई.
विजय तो बोल भी पड़ा, ‘‘जल्दी बताइए न पापा.’’
यह सुन कर रविजी हंसते हो बोले, ‘‘बताता हूं, अच्छा तुम यहां आओ मेरे पास.’’

विजय रमाजी के साथ उन के पास पहुंचा तो रविजी दोबारा सभी मेहमानों से संबोधित हुए, ‘‘वह दूसरी खुशखबरी यह है कि आप सब बहुत जल्द ही विजय को दूल्हे के रूप में देखेंगे और जो प्यारी सी बेटी उस की दुलहन बनेगी, वह भी यहीं मौजूद है और वह है मेरे अजीज दोस्त की बेटी नंदिनी.’’ यह कह कर अनिलजी ने विजय को देखा.

चारों तरफ तालियों का शोर था पर उस शोर में विजय सहित नंदिनी, अमन और शैली चारों ही सकते की सी अवस्था में थे और एकदूजे का मुंह ताक रहे थे.

विजय ने रविजी के हाथ से माइक ले कर साइड में रखा और धीमे स्वर में उन से बोला, ‘‘पापा, यह क्या कह रहे हैं, नंदिनी और मैं, हमारी शादी, यह विचार कैसे आया आप को और आप ने मुझ से पूछा भी नहीं?’’

‘‘अरे, यह कैसी बातें कर रहे हो, कुछ दिनों पहले जबजब तुम्हारी मां और मैं ने तुम से शादी की बात की थी तो तुम ने ही कहा था कि एक लड़की है और उस के परिवार को हम लोग जानते हैं और सब से बड़ी बात, तुम ने कहा कि वह तुम्हारे साथ ही पढ़ती थी तो अब इस बात पर और सोचने की गुंजाइश ही कहां थी कि वह लड़की नंदिनी के अलावा कोई और हो सकती है.’’

विजय मुसकरा पड़ा यह सुन कर, ‘‘क्यों पापा, शैली नहीं हो सकती क्या वह लड़की?’’
आश्चर्यचकित रह गए रविजी यह बात सुन कर, ‘‘क्या कह रहे हो?’’
रमाजी तो ‘काटो तो खून नहीं’ की अवस्था में आ गईं.
‘‘विजय, तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है, वह एक क्रिश्चियन परिवार और हम कट्टर ब्राह्मण. समाज में हमें मुंह दिखाना है या नहीं,’’ रमाजी की आंखों में तो जैसे खून तैर गया हो.
‘‘ठीक कह रहा हूं, पापा. और अब एक और जरूरी बात है वह यह कि नंदिनी भी मु?ो नहीं, किसी और को पसंद करती है.’’
विजय जैसे एक के बाद एक राज का खुलासा किए जा रहा था.
‘‘पर यह फैसला मेरे अकेले का नहीं है, बल्कि कुछ देर पहले नंदिनी के मम्मीपापा से बात कर के मैं ने आज यह बात कही.’’
रविजी की बात सुन कर विजय ने कुछ दूर खड़ी नंदिनी को देखा जो अपने मम्मीपापा से शायद उन्हीं बातों पर उलझ रही थी जो बातें विजय अपने पापा से कर रहा था.
शैली और अमन के चेहरों पर भी दिल और दिमाग में चल रही उथलपुथल की छाया थी.

यह परिस्थिति और अजीब मोड़ ले, इस से पहले ही अब सब को सच्चाई से अवगत होना होगा, बस, इसी खयाल के साथ विजय ने धीमे से रमाजी का हाथ थामा और रविजी को भी साथ लिया और नंदिनी की ओर बढ़ चला.
उस के करीब पहुंच कर वह उस के मम्मीपापा से मुखातिब हुआ.
‘‘अंकलजी, आंटीजी, मुझे लगता है नंदिनी ने अब तक आप को सबकुछ बेहतर तरीके से बता दिया होगा, हम दोनों बहुत अच्छे दोस्त हैं पर आपस में शादी का विचार हम दोनों के ही दिलों में कभी नहीं उपजा. मैं, दरअसल, शैली को पसंद करता हूं.’’

यह सुन कर अनिलजी और ऊषाजी भी हैरान हो गए और हैरानीभरी निगाहों से उन्होंने रविजी की ओर देखा.

माहौल भारी सा हो उठा था कि तभी नंदिनी ने जैसे एक और बम फोड़ा हो, ‘‘मम्मी, दरअसल, मैं और अमन एकदूसरे को पसंद करते हैं.’’
‘‘क्या?’’ अनिल और ऊषाजी के एक बार फिर से चौंकने की बारी थी.
‘‘यह सब क्या उलटापुलटा हो रहा है. मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा,’’ ऊषाजी यह कह कर पास पड़ी कुरसी पर बैठ गईं.
‘‘मैं समझती हूं, मम्मी. दरअसल, आप लोगों को गलतफहमी हो गई और हम लोगों से गलती हो गई कि मैं ने और विजय, हम दोनों ने ही आप लोगों को अपनीअपनी पसंद का सही नाम नहीं बताया.’’
‘‘और पापा, उस का नतीजा यह हुआ कि आप लोगों को लगा कि मैं और नंदिनी आपस में एकदूसरे से…’’ विजय ने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया.
तभी उन सभी के पीछे से एक बारीक आवाज आई, वह आवाज थी अमन की मम्मी सुरेखाजी की.

‘‘माफ कीजिएगा, आप लोगों के बीच दखल दे रही हूं पर अब सभी बातें खुल चुकी हैं और जहां तक अब मैं समझती हूं, हमें बच्चों की पसंद को खुलेदिल से अपना लेना चाहिए.’’
सभी हैरानपरेशान से उन की तरफ देखने लगे.
‘‘आप सभी की तरह मुझे भी अमन से यह बात अभी ही पता लगी है,’’ सुरेखाजी के मुंह से यह सुन कर विजय और नंदिनी ने उस की ओर देखा.
‘‘विजय, जा तू अपने दोस्त के पास, भाईसाहब की घोषणा के बाद उसे तेरे सहारे की बहुत जरूरत है,’’ सुरेखाजी ने हंसते हुए कहा.
विजय अमन की तरफ बढ़ा तो नंदिनी भी धीमे कदमों से उस के पीछे चल दी. सम?ा गई थी कि सभी परिवार के लोग अब आपस में बात करना चाहते हैं.
‘‘इन बच्चों ने किस दुविधा में डाल दिया है,’’ रमाजी के मुंह से निकला.
‘‘दुविधा ने अभी दुविधा का रूप लिया नहीं, रमा बहन. अच्छा हुआ जो पूरी बात आज यहीं खुल गई जब हम सब एक ही जगह एकत्रित हैं. बच्चों ने अपना फैसला बता दिया है और जबरदस्ती अपनी मरजी बच्चों पर थोपने का समय अब रहा नहीं. सभी परिवार एकदूजे से भलीभांति परिचित हैं, सालों से व्यवहार में रहे हैं, ऊषा बहन, मुझे दिल से बहुत खुशी होगी अगर नंदिनी मेरे घर बेटी बन कर आएगी.’’

सुरेखाजी की यह बात सुन कर ऊषाजी ने अनिलजी की ओर देखा.
‘‘और रवि भाईसाहब, शैली बिटिया बेहद गुणी और सहज स्वभाव की है. आप के और रमा बहन के रूप में उसे अपने मातापिता का प्यार मिल जाएगा. मेरी तो बस इतनी सी विनती है कि आप इस बात पर जरूर विचार कीजिएगा,’’ सुरेखाजी ने अपनेपन से कहा.
घर आते ही रमाजी बिलकुल बिफर गईं.
‘‘विजय, यह आज क्या किया है तुम ने? विवाह के लिए जीवनसाथी चुना भी दूसरे धर्म से. दोनों ही परिवार बिलकुल ही विभिन्न धर्मों वाले. न हमें उन के धर्म के बारे में कुछ ज्ञान है न वे हमारे धर्म के बारे में कुछ जानते हैं. और ये सब कब, कैसे हो गया?’’
विजय चुपचाप सब सुन रहा था और रविजी जैसे गहरी सोच में थे.
रमाजी रविजी से फिर बोलीं, ‘‘अरे, आप भी कुछ कहिए न. हैरान हूं मैं कि आप कैसे शांत बैठे हैं, क्या आप नहीं जानते कि इस की शादी के लिए मैं ने क्याक्या सोच रखा है, क्याक्या अरमान संजोए हुए हैं?’’
रविजी ने अपनी नजरें रमाजी के चेहरे पर टिका दीं और जैसे ही उन्होंने उन के कंधे पर हाथ रखा तो रमाजी की रुलाई फूट पड़ी.
विजय ने उन्हें चुप कराने की कोशिश की तो रवि ने आंखों ही आंखों में उसे फिलहाल वहां से जाने का इशारा किया. लगभग घंटेभर बाद वे विजय के कमरे में पहुंचे तो देखा, विजय अधलेटी अवस्था में पलंग पर था. उन्हें देखते ही वह उठ कर बैठ गया. रविजी भी उस के नजदीक ही पलंग पर बैठ गए.
‘‘पापा, मम्मी कैसी हैं अब?’’
‘‘अपने कमरे में हैं. काफी रोई हैं, अभी लेटी हुई हैं.’’
‘‘पापा, उन्हें समझाइए न.’’

रविजी ने कुछ पल शांत भाव से उस की ओर देखा और फिर बोले, ‘‘बेटा, हमारे लिए तो तुम हमेशा बच्चे ही रहोगे पर क्या असल जिंदगी में भी अभी छोटे बच्चे ही हो? शादी जैसे फैसले को क्या खेल समझ रखा है.’’

नंदिनी के परिवार को हम बेहतर जानते थे. वे लोग हमारी ही बिरादरी वाले हैं. लड़की दिखने में सुंदर है, सुशील है. और फिर, हम सब को अच्छी तरह जानतीसम?ाती थी पर अब अगर वह किसी और को चाहती है तो जाहिर है कि अब तुम्हारे लिए हम कोई और लड़की पसंद करते पर यह काम भी तुम ने खुद ही कर लिया. इस के लिए हमें कोई एतराज नहीं पर बिलकुल ही विपरीत धर्म की लड़की से विवाह आसान बात नहीं है.

‘‘चाहे हम शैली के परिवार को जानते हैं पर वह हम से बिलकुल अलग है, विजय. रीतिरिवाज, खानपान, पहनावा सभी कुछ तो अलग है. इस बात को तो तुम भी समझ.’’
‘‘पर पापा, मैं शैली को अच्छे से जानता हूं. वह हमारे घर आएगी तो हमारे तौरतरीके अच्छे से अपना लेगी. आप जानते हैं, वह तो मांसाहार से भी परहेज करती है.’’
‘‘देखो विजय, प्रेम संबंधों के शुरुआती दौर में यह ‘दुनिया से लड़ कर एकदूजे को अपनाएंगे’ ऐसी बातें बहुत अच्छी लगती हैं पर शादी के बाद जब हकीकत की जमीन पर कदम रखोगे न तो पांव जख्मी हो जाएंगे और वे जख्म भविष्य में नासूर बन कर रह जाएंगे.’’
विजय बेहद असमंजस की स्थिति में आ चुका था.
एक गहरी सांस ले कर रविजी बोले, ‘‘और बेटा, क्या शैली शादी के बाद अपने घर से रिश्ता तोड़ देगी, नहीं न, तो क्या तुम्हारी होने वाली संतान वहां के तौरतरीके से अनजान रहेगी? नहीं बेटे, ऐसा नहीं होगा और इन परिस्थितियों में जो सब से ज्यादा पछताएंगे, वे होंगे तुम और शैली क्योंकि अपनेअपने परिवार को खुश रखने का सारा भार तुम दोनों के कंधों पर ही होगा. इन बातों पर गौर करो, बेटा.’’

रविजी तो यह समझ कर वहां से चले गए पर अब विजय का सिर फटने को हो रहा था.
ऐसा नहीं था कि शैली और उस ने कभी इन बातों को सोचा नहीं था परंतु इतनी गहराइयों से वे इन सब बातों पर कभी विचार न कर पाए थे. इस रिश्ते के लिए ‘चाहे कुछ भी हो जाए हम अपनेअपने घर वालों को मना लेंगे’ बस यही बातें होती थीं उन की.

रविजी की बातों को सुनने के बाद वह पूरी रात बेचैनी से कमरे में टहलता रहा. सुबह रविजी ने ही रमाजी के लिए चाय बनाई और बैडरूम में ले कर पहुंचे. धीमे से उन्होंने रमाजी को उठाया. उन की आंखें सूजी सी थीं. उन्होंने चाय पीने से इनकार कर दिया. रविजी से बोलीं, ‘‘समझ दिया न आप ने विजय को कि यह शादी नहीं होगी. हम दुनिया को क्या मुंह दिखाएंगे? सभी रिश्तेदारों को हम पर हंसने का मौका मिल जाएगा. सभी कहेंगे कि अपनी बिरादरी से हम अपने इकलौते बेटे के लिए एक लड़की नहीं ढूंढ़ सके.’’
‘‘मैं ने उसे काफी समझाया है. अब तुम सब्र से काम लो. अभी मिलोगी तो गुस्से से बात मत करना और शैली की बात चले तो कुछ भी अनापशनाप मत बोलने लग जाना, अपना व्यवहार रोजमर्रा जैसा ही रखना.’’
रविजी के यह समझने पर विजय के घर पर तो कोई अप्रिय बात नहीं हुई परंतु नंदिनी के घर पर इन्हीं बातों की चर्चा हो रही थी.
जाहिर है, अनिलजी और ऊषाजी बीते दिन हुई घटना से उबर नहीं पाए थे.
‘‘नंदिनी, तुम ने कभी अमन के बारे में इस तरह तो नहीं बताया था कि तुम उस से शादी करना चाहती हो. हम दोनों तो विजय को ही तुम्हारे भावी वर के रूप में सोचते रहे,’’ अनिलजी ने नंदिनी से कहा.

‘‘पापा, मैं ने मम्मी से कहा था कि विजय की फैक्ट्री के मुहूर्त वाले दिन लड़के से मिलवा दूंगी, मैं उस दिन अमन का नाम आप लोगों को बताना चाहती थी पर उस से पहले ही अंकल ने…’’

अनिलजी और ऊषाजी ने एकदूजे को देखा और क्योंकि अब विजय ही शैली से शादी करना चाहता था तो विजय का नाम तो अब नंदिनी से जोड़ना फुजूल था पर अमन के परिवार से रिश्ता उन लोगों के लिए अकस्मात आया हुआ था तो इसे ले कर वे लोग अभी दुविधा में थे.

बेशक अमन की मांजी ने बीते दिन ही नंदिनी को खुले दिल से अपनी बहू बनाने की इच्छा नंदिनी के मम्मीपापा के समक्ष रखी थी पर फिर भी, इस नए रिश्ते को अपनाने में अनिल और ऊषाजी दोनों ही कुछ अनिश्चितता की अवस्था महसूस कर रहे थे और अभी कुछ समय के लिए यह बात उठाना नहीं चाहते थे.

उधर शैली के घर में जौन और लीना आपस में बात कर रहे थे, ‘‘लीना, आखिर शैली को अपनी कम्युनिटी में कोई लड़का नहीं मिला क्या जो उस ने विजय से शादी करने के बारे में सोचा?’’
‘‘सोचा नहीं जौन, वे दोनों एकदूजे को चाहते हैं. शैली सरल स्वभाव वाली एक समझदार लड़की है. अगर यह रिश्ता हुआ तो यकीन मानो, शैली कभी इस घर का नाम खराब नहीं करेगी. तुम चिंता मत करो, सब ठीक होगा.’’ लीना ने जौन के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा.
जौन की आंखों में चिंता की लकीरें कुछ कम हुईं तो उन्होंने पूछा, ‘‘तुम ने शैली से बात की?’’
‘‘हां, रात को ही की थी. वह बहुत रोई जैसे उस से उस ने प्यार नहीं, कोई अपराध कर दिया हो. जब मैं उसे संभाल रही थी तो वह रोतेरोते बोली कि वह कभी हम दोनों का दिल नहीं दुखाना चाहती थी. उस ने और विजय ने तो यह तय कर रखा है कि यदि दोनों के ही परिवार इस शादी की रजामंदी नहीं देते तो वे दोनों ही अपनेअपने परिवारों का मान रखेंगे.

घर छोड़ कर जाना या कोर्ट मैरिज जैसे कदम वे कभी न उठाते बल्कि फैमिली की रजामंदी ही उन दोनों के लिए सब से जरूरी है. तभी तो कह रही हूं, अपनी शैली को अब उस की पसंद से शादी की इजाजत दे दो. उस का मुरझाया चेहरा देखना अब मेरे बस में नहीं है. लीना की आंखों से आंसू बह चले तो जौन ने उसे सीने से लगा लिया.

अमन के पिता सुधीरजी सीधेसादे मगर व्यावहारिक व्यक्ति थे. सुरेखाजी ने उन्हें सारी बातें बताईं और साथ ही, यह भी बताया कि उन्हें काफी समय पहले से ही नंदिनी अमन के लिए बहुत पसंद है.

‘‘सिर्फ तुम्हारी पसंद से ही बात नहीं बनने वाली, नंदिनी के मातापिता भी इस रिश्ते को दिल से स्वीकारें, यह भी जरूरी है. अब तुम्हीं बताओ, उस दिन जब तुम ने अपना प्रस्ताव उन लोगों के समक्ष रखा तो उन लोगों की क्या प्रतिक्रिया थी? अमन और नंदिनी ने आपस में प्रेमसंबंध तो जोड़ लिया लेकिन विवाहसंबंध जोड़ने के लिए तो मातापिता की खुशी भी तो जरूरी है.’’

‘‘आप की बात समझती हूं मैं, पर उस वक्त तो स्थिति इतनी अजीब सी हो गई थी कि मैं आप को क्या बताऊं. रमा बहन तो बिलकुल ही नाखुश दिख रही थीं. मुझे नहीं लगता कि विजय का परिवार विजय की पसंद को अपनाएगा.’’

‘‘शादीब्याह का मामला है और फिर अंतर्जातीय. नाजुक हालात हैं उन लोगों के लिए. सोचनेसमझने में उन लोगों को वक्त तो लगेगा ही.’’

‘‘अमन, सबकुछ कितना डांवांडोल सा लग रहा है. ऐसी भूलभुलैया सी लग रही है जिस में से निकलने का कोई रास्ता सुझाई नहीं दे रहा,’’ नंदिनी काफी परेशानीभरे स्वर में बोली.

‘‘कई बार समस्याएं अथाह गहरे समुद्र समान दिखती हैं जो दिखने में भयावह होता है पर भला कोई समुद्र के पानी के बहाव को रोक सका है, न कोई दीवार न कोई पहाड़. जिस तरह पानी अपना रास्ता खुद खोज लेता है उसी तरह इस परेशानी का भी कोई हल जरूर निकलेगा. तुम चिंता मत करो बल्कि शैली को थोड़ी हिम्मत दो. मैं भी कल विजय से मिलूंगा,’’ इतना कह कर अमन ने फोन का रिसीवर नीचे रख दिया.

चारों ही परिवारों के लिए अगले कुछ दिन अजीब सी कशमकश में बीते पर कहते हैं न, रात इतनी भी लंबी नहीं होती कि अंधेरे को लीलने वाले सूरज को अपने साए में छिपा ले. सूरज उदय होता है और अंधेरे में डूबी हर चीज साफसाफ नजर आने लगती है.

रविजी के पुराने और गहरे दोस्त विशाल कपूर जो सालों पहले लंदन चले गए थे, उन का किसी जरूरी काम से अगले कुछ दिनों में दिल्ली आना तय हुआ. जैसे ही रविजी को यह पता चला, वे काफी खुश हुए. बहुत अरसे बाद दोनों दोस्तों की मुलाकात होने जा रही थी वरना तो चिट्ठियां और फोन ही जरिया थे दोनों की बातों के.

विशालजी ने अपने जरूरी काम निबटाए और अगले दिन जाने से पहले उन्होंने रविजी से रात के खाने के बाद घर के माहौल का जिक्र किया.
‘‘रवि यार, घर में कुछ शांत सा माहौल है, भाभी चुप सी रहती हैं और विजय, विजय तो जवान लड़का है पर एक अजीब सी उदासी उस के चेहरे पर दिखाई देती है, आखिर बात क्या है?’’
रविजी ने एक गहरी सांस ले कर विशालजी को सारी बात बताई.
सारी बात जानने के बाद विशालजी धीमे से हंस दिए.
रविजी चुपचाप उन्हें देखते रहे.

‘‘यार, मुझे तेरी दोस्ती पर बड़ा मान है पर ये धर्म, जाति की बातें बीच में न ला. तेरा खुद का मानना है कि लड़की अच्छी है, परिवार अच्छा है तो सिर्फ तेरी बिरादरी से नहीं है, इस वजह से तुम लोग वहां विजय की शादी नहीं करना चाहते, ये सब दकियानूसी विचार कम से कम मेरे सामने तो न रख. अमन और नंदिनी भी तो एक बिरादरी के नहीं हैं तब भी अमन का परिवार खुले हाथों से नंदिनी का स्वागत करने को तैयार है तो वहां नंदिनी के मातापिता राजी नहीं हो रहे. अरे, सभी उंगलियां एकसमान नहीं होतीं पर साथ मिलती हैं तभी मुट्ठी बनती है. तू भी यह बात समझ और अनिल भाई को भी समझ.’’

‘‘भारत में यह कोई छोटीमोटी बात नहीं है, शादी करनी है इकलौते बेटे की, हजार बातें सोचनी पड़ती हैं.’’
‘‘समाज की सोचना चाहता है अपने बेटे की खुशी को कुरबान कर के. अच्छा, एक बात बता, अगर तुम दोनों की बात मान कर विजय शैली से शादी न भी करे तो क्या गारंटी है कि वह तुम लोगों की पसंद से शादी कर ही लेगा. अगर उस ने शादी ही न करने का फैसला ले लिया तो तेरा समाज खुश हो जाएगा?

‘‘और, जिस बिरादरी की वकालत तू कर रहा है, जरा याद कर के बता दे कि तेरे कितने बिरादरी वालों ने अपनेअपने घर, अपने बच्चों की परवरिश, उन की शादियां तुझ से पूछ कर की हैं. देख यार, बात लाख पुरानी सही पर बिलकुल सटीक है कि कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना.’’
‘‘मैं अगर मान भी जाऊं तो भी विजय की मां नहीं मानेगी, उस के बहुत सपने हैं विजय की शादी को ले कर.’’
‘‘अरे, तो कर न उन के सारे सपने पूरे. बस, अपने बच्चे की खुशी की कीमत पर नहीं, सारी रस्में, सारी खुशियां सब मना यार, तेरे बेटे की शादी है.’’
बातें खत्म हो गईं और साथसाथ रात भी ढल गई. भोर का उजाला देखते हुए रवि जी ने काफीकुछ सोच लिया था. विशालजी तो वापस चले गए पर रविजी के आगे बहुतकुछ स्पष्ट कर गए थे.

अब सब से पहले उन्हें रमा को मनाना था. ‘‘नहीं, नहीं. ये कैसी बातें कर रहे हैं आप, क्या कहेंगे सब?’’ रमाजी आज भी उन्हीं बातों पर अडिग थीं. ‘‘रमा, हमें अपने बेटे के बारे में सोचना है और यह मत भूलो कि जोरजबरदस्ती से विजय की शादी तो क्या ही करवा पाएंगे, कहीं विजय को न खो दें.’’
‘‘चुप रहिए आप, मत कीजिए ऐसी बातें,’’ रमा के आंसू बहने लगे.
‘‘रमा, मान जाओ, विजय की खुशी के बारे में सोचो और किसी के बारे में नहीं.
यह क्या कम है कि आज के वक्त में बालिग बच्चों ने कोई कदम खुद नहीं
उठाया बल्कि हम बड़ों को यथासंभव मान दे रहे हैं. मैं कल ही अनिलजी से मिलता हूं और शैली के घर भी जाता हूं. बहुत वक्त जाया हो गया, अब और नहीं. और रमा, ये सब तुम्हारे साथ के बिना संभव नहीं. बोलो, साथ हो न मेरे?’’
रमाजी ने कुछ पल उन्हें देखा और फिर मुसकरा कर हां की मुद्रा में सिर हिला दिया.
‘‘रवि भाई साहब, ये सब क्या हो गया है. हम ने तो ये सब कभी सोचा भी नहीं था,’’ अनिलजी का स्वर कुछ बुझ सा था.

‘‘अनिल भाई, यदि सोचने मात्र से ही सब काम अपने मनमुताबिक हो जाएं तो इंसानी जीवन का महत्त्व ही क्या, जीवन मिला है कुछ अच्छा करने के लिए, नई दिशा में कदम बढ़ाने के लिए, आज का वक्त धर्म, जाति, बिरादरी से ऊपर उठ कर समाज को एकसाथ ले कर चलने का है.’’
‘‘उम्र के इस मोड़ पर भी मेरा दोस्त मुझे सही राह पर चलना सिखा सकता है तो मैं भी उस के विचारों को सर्वोपरि रख कर उस राह पर कदम बढ़ा सकता हूं और चाहता हूं कि इस फैसले में मुझे चारों परिवारों का साथ भी मिले जो समाज में एकता का संदेश दें. पिछड़े विचारों को किनारे कर नई पीढ़ी को समझ कर उन के साथ खुशी से जीवनयापन करें’’
‘‘यदि हमारे इस फैसले से कुछ परिवार भी समझदारी से काम लें और अपने रिश्तों को बनाए रखें तो हमारा जीवन सार्थक हो जाएगा.’’
‘‘आप सही कह रहे हैं भाईसाहब, केवल अपने ही विचारों की धुंध में अपने ही बच्चों पर विश्वास करने की जो इबारत स्पष्ट नहीं दिख रही थी, अब आंखों के आगे साफसाफ दिख रही है. आइए, अपनेअपने समधियों के घर चलें’’ अनिलजी बेहद खुश नजर आ रहे थे.
‘‘और अब की बार रिश्ता जोड़ने में कोई जल्दबाजी नहीं करूंगा,’’ यह कह कर रविजी ठहाका मार कर हंस पड़े और अनिलजी ने भी उन का खुल कर साथ दिया.

जौन और लीना विजय को पसंद तो शुरू से ही करते थे पर अब वे उसे दूसरी ही नजरों से देख रहे थे. शैली के जीवनसाथी के रूप में स्वीकारने में हिचकिचा रहे थे पर रविजी और अनिलजी की बातों से बेहद प्रभावित हुए और उन के दिलों को काफी सुकून मिला जब रविजी ने उन्हें यह बताया कि रमाजी की भी इस रिश्ते के लिए पूर्ण सहमति है और वे लोग अब किसी संशय में न रहें. दोनों ही अब शैली को ले कर संतुष्ट हो गए थे.

सुधीरजी और सुरेखाजी को आरंभ से ही इस रिश्ते के लिए कोई मलाल न था. बस, वे लोग केवल इतना चाहते थे कि नंदिनी के मातापिता भी खुशीखुशी नंदिनी को अमन से शादी करने की इजाजत दें ताकि भविष्य में सभी के संबंध सौहार्दपूर्ण बने रहें.

अनिलजी ने उन लोगों से भली प्रकार इस रिश्ते के बारे में बातें कीं. उन्होंने अमन के मातापिता को विश्वास दिलाया कि बच्चों की खुशी में ही उन की सच्ची खुशी है और वे अब इस रिश्ते को दिल से अपनाते हैं.

दोनों विवाह एक ही दिन संपन्न हुए. चार प्यारे दोस्त आज 2 खूबसूरत वैवाहिक जोड़े के रूप में दुनिया के सामने थे और उन चारों की खुशी देखते ही बनती थी.

सभी कुछ सुचारुरूप से चलने लगा. विजय और शैली ने बहुत संयम का परिचय दिया. चारों परिवार सारे तीजत्योहार मिल कर मनाते थे. रविजी और रमाजी ने शैली को अपनी बेटी की तरह अपना लिया था. शैली भी उन दोनों में अपने मातापिता की परछाईं देखती थी. अपनी समझदारी और लगन से जल्दी ही उस ने सब के दिल जीत लिए. रमाजी तो अब शैली के व्यव्हार की कायल हो चुकी थीं. अमन और नंदिनी ने भी कभी किसी परिस्थिति में अपने दोस्तों को अकेला नहीं छोड़ा.

रविजी के फैसले ने सभी बच्चों का उन की खुशियों से मिलन करवाया था. अब तो सभी लोग, चाहे वे पासपड़ोस से हों या उन के रिश्तेदार, इन परिवारों की एकता की मिसाल देते थे. जब भी किसी भी मौके पर सभी एकत्रित होते थे तो रविजी के दिल से एक ही बात निकलती थी कि ‘मैं तो अकेला ही चला था जानिब ए मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया.’ और यह कारवां था सब की खुशियों का, जो अब सामाजिक एकता का जीताजागता उदाहरण था.  Family Story In Hindi 

लेखिका : साहिबा टंडन

Family Story : टपरी – रिश्तों को रिचार्ज करती कथा

Family Story : चलो, थोड़ा रुकते हैं, थोड़ा जीते हैं. मोबाइल को जेब में रख, किसी अपने की आंखों में झांकते हैं. यही तो मन करता था नंदा का लेकिन वक्त के साथसाथ सब बदल रहा था.

मुंबई में बारिश के मौसम के बारे में कोई आम इंसान यहां सालों रहने के बाद भी अंदाजा नहीं लगा सकता. कभी लगता है, घर से निकल रहे हैं, तेज बारिश होने वाली है, छाता भी ले लो, बारिश वाले शूज भी पहन लो, ऐसे कपड़े पहन लो जो भीग कर तन से चिपट न जाएं और जब घर से बाहर निकलो तो सब सूखा. 2 घंटे बाद घर आओ तो लगता है कुछ ज्यादा ही तैयारी कर ली थी. एक बूंद भी न बरसा और कभी आसमान इतना साफ लगता है कि पक्का यकीन हो जाता है कि छाते को ढोने की कतई जरूरत नहीं है.

बीस सालों से बारिश के मौसम से नंदा यही आंखमिचौली खेल रही है या यह भी कह सकते हैं कि बारिश नंदा से आंखमिचौली खेलती है. प्रकृतिप्रेमी नंदा 45 साल की हाउसवाइफ है. वह अपने बच्चों रेयान और काव्या को कालेज और पति विजय को औफिस भेज कर 8 बजे सैर के लिए जरूर निकलती है.

पहले वह अपनी 2 सहेलियों अंजू और रेनू के साथ सैर पर जाती थी, बातें करतेकरते, हंसतेबोलते बढि़या सैर होती थी. फिर धीरेधीरे पहले अंजू, फिर रेनू गार्डन के ट्रैक पर एकदो राउंड के बाद एक बैंच पर बैठ कर रील्स देखने लगतीं, नंदा का मूड औफ हो जाता. फिर उन दोनों ने सैर पर आना ही छोड़ दिया. नंदा भी सोचती, ठीक है, साथ आ कर भी क्या कंपनी मिलती थी, दोनों फोन से ही चिपकी रहती थीं.

रोज सैर पर दिखते लोगों से भले ही कभी बात न हो, कोई जानपहचान न हो पर रोज दिखने से एक अबूझ रिश्ता सा बनता चला जाता है. ऐसे ही नंदा 2 लोगों को एक लंबे वक्त से देख रही थी. एक, फिट और हंसमुख से बुजुर्ग अकेले सैर करते दिखते थे जिन्हें अब नंदा गुडमौर्निंग कहती आगे बढ़ने लगी थी. वे भी जवाब दे कर मुसकरा कर आगे बढ़ जाते. दूसरा, करीब 32 साल का लड़का भी सैर पर नियमित दौड़ता, भागता दिखता था.

गार्डन के बाहर एक टपरी थी जहां सैर से लौटते लोग कभीकभी रुक कर चाय पीते. नंदा का बड़ा मन करता कि कभी ऐसे ही वह भी, पुरुषों की तरह, खड़ी हो कर चाय पी ले पर वहां कोई महिला कभी अकेली न दिखती. कभी कोई रुकती भी तो उस के पति साथ होते. सालों से उस का मन होता कि वह भी किसी के साथ यहां रुके, चाय पिए, हंसेबोले. सच बात तो यह थी कि नंदा किसी से दिल खोल कर बातें करना चाहती थी पर उस के आसपास की दुनिया अब फोन में खोती जा रही थी. कभीकभी तो सैर करते हुए लोग अपने फोन में देख रहे होते थे. नंदा को ये लोग चलतेफिरते जौम्बी लगते.

ऐसे ही बारिश के मौसम का एक दिन था. नंदा साफ मौसम देख कर बिना छाते के सैर पर आ गई थी. देखते ही देखते आसमान काला हो गया और बारिश शुरू हो गई. नंदा तेज कदमों से गार्डन से निकली. उस ने देखा, वे बुजुर्ग और वह रोज आने वाला लड़का उस टपरी के अंदर खड़े हो गए हैं. बारिश होने पर टपरी वाला जल्दी से बैंच अंदर खींच देता था. नंदा को टपरी में जाने का यह मौका बड़ा लुभावना लगा. वह उन बुजुर्ग और उस लड़के को मुसकरा कर देखती हुई उन लोगों के साथ खड़ी हो गई. अपने लिए टपरी वाले को चाय का और्डर देते हुए लड़के ने बुजुर्ग और नंदा से कहा, ‘‘आप लोग चाय पियोगे?’’
नंदा ने जरा संकोच से कहा, ‘‘मैं सैर पर न तो फोन लाती हूं, न पर्स. बस, घर की चाबी ले कर आ जाती हूं.’’
‘‘तो क्या हुआ, इतना अच्छा मौसम है, आज चाय मेरी तरफ से.’’
बुजुर्ग ने ‘हां’ में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘ठीक है, अगली बार मेरी तरफ से चाय होगी.’’
नंदा हंसी, ‘‘उस से अगली बार मैं पर्स ले आऊंगी. वैसे, मेरा नाम नंदा है. ‘दोस्ती’ सोसाइटी में रहती हूं.’’
‘‘मेरा नाम अजय है, ‘कंचनपुष्प’ में रहता हूं.’’
‘‘मैं शेखर, ‘दर्शन’ में रहता हूं.’’

टपरी वाले ने तीनों को चाय दी. नंदा आज बहुत खुश थी. परिवार के साथ बड़ेबड़े होटल्स में खाना खाना अलग, आज यहां बेफिक्र, अनजान लोगों के साथ टपरी में तेज बारिश में चाय पीना, अनोखा एहसास. बुजुर्ग ने पूछ लिया, ‘‘वैसे, तुम फोन के बिना कैसे? आजकल तो बारबार फोन देखे बिना किसी को चैन नहीं आता और तुम फोन लाती ही नहीं, कमाल की बात है.’’
‘‘कुछ समय तो इंसान ऐसा बिताए जो फोन के बिना गुजरे. फोन ने तो लाइफ ही बदल कर रख दी, कोई साथ में भी हो तो भी अकेलापन लगता है. अरे, बारिश रुक गई. मैं अब भागती हूं. थैंक यू, अजय. आज मेरा एक सपना पूरा हुआ.’’
‘‘कौन सा सपना?’’
‘‘यहां टपरी पर चाय पीने का सपना. कोई साथ नहीं मिलता था.’’ वे दोनों हंसने लगे. नंदा तेजी से दोनों से ‘कल सुबह मिलते हैं’ कह कर वहां से निकल गई.

आज घर जा कर नंदा का तनमन खिला हुआ था. वह एक ताजगी से भरी थी. दिनभर के काम उस ने बहुत उत्साह से निबटाए. शाम को जब विजय और बच्चे आ गए तो वह आज उन्हें अपना टपरी का अनुभव बताना चाहती थी पर जैसा कि आज के समय में एक ही घर के लोग मीलों दूर बैठे लोगों से तो चैट कर सकते हैं पर घर में ही एकदूसरे के मन की थाह पाने में किसी को कोई रुचि नहीं. डिनर के बाद तीनों हमेशा की तरह फोन पर बिजी थे. उस ने कई बार चाहा कि सब को एकसाथ बुला कर टपरी का किस्सा सुनाए पर उसे लगा, नहीं, रहने देती हूं, विजय उपदेश देंगे कि अजनबियों से दूर रहो, बच्चे थोड़ा मजाक बना लेंगे. फिर अपनेअपने फोन में घुस जाएंगे. विजय अब तक ट्विटर पर थे. नंदा का मन नहीं माना. वह उन के पास गई, ‘‘आज की एक मजेदार बात बताऊं?’’
फोन से बिना नजरें हटाए विजय ने ‘हूं’ कहा तो नंदा ने कहा, ‘‘फोन तो रखो.’’
‘‘कुछ पढ़ रहा हूं.’’
‘‘क्या?’’
‘‘ट्रोलर्स के जवाब. मजा आ जाता है, यार. सैलिब्रिटीज के तो पीछे पड़े रहते हैं. इन लोगों के मुंह से एक शब्द निकला नहीं कि बवाल खड़ा कर देते हैं.’’

नंदा के मन में कुछ चटक सा गया. अपने मन की बात किस से करे. बच्चों के रूम में ?झांका, दोनों रील्स देखदेख कर हंस रहे थे. वह चुपचाप अपने बाकी के काम निबटाने लगी. दिल आजकल उदास रहता है. हर रिश्ते में डिजिटल तकनीक घुस आई है. उसे लगता है, यह डिजिटल तकनीक हर रिश्ते को दीमक की तरह एक दिन खा जाएगी.
बातें खत्म होती जा रही हैं. कोई बात करना चाहता है तो सुनने वाला कोई नहीं है. अगले दिन वह फिर सैर पर गई. शेखर और अजय आज अपने से लगे. दोनों उसे देख कर मुसकराए. तीनों रोज की तरह अपनीअपनी सैर अलगअलग करते रहे. फिर वहां रखी एक बैंच पर शेखर बैठे दिखे तो नंदा भी उन के पास जा कर बैठ गई. अजय भी उन दोनों के पास आ कर खड़ा हो गया, पूछा, ‘‘आप लोगों की सैर हो गई?’’
‘‘हां, आज आने का मूड नहीं था, सोचा, घर पर भी क्या करूंगा, फिर आ ही गया.’’
‘‘मैं तो अंकल को बैठा देख रुक गई.’’
‘‘और मैं आप दोनों को बैठा देख रुक गया.’’ तीनों हंसे. नंदा ने कहा, ‘‘अब किसी दिन बारिश हो तो टपरी पर फिर चाय पिएं. मुझे कल बड़ा मजा आया.’’
शेखर ने कहा, ‘‘बारिश का क्या वेट करना, चलो, चाय पी लेते हैं.’’
अजय ने कहा, ‘‘बस मैं 2 राउंड और दौड़ कर आया.’’
‘‘ओके,’’ नंदा ने थम्स अप किया. शेखर ने पूछा, ‘‘और बताओ, घर पर कौनकौन है?’’
‘‘पति और 2 कालेज जाने वाले बच्चे. आप के घर पर कौनकौन है?’’
‘‘बेटा, बहू और एक पोता. तीनों कामकाजी. और मैं रिटायर्ड आदमी. पत्नी
रही नहीं.’’
‘‘आंह, सौरी.’’
नंदा ने कनखियों से शेखर को देखा, उन का चेहरा उदास था.
थोड़ी देर में पसीने से तर अजय आ गया, ‘‘चलें?’’

पता नहीं क्या बात थी, नंदा को इन 2 अजनबियों से बात करते हुए जरा भी डर नहीं लगा, न कोई संकोच हुआ. किसीकिसी की वाइब्स इतनी पौजिटिव होती हैं, नंदा यह साफसाफ महसूस कर रही थी. वैसे भी, एक लंबे समय से दोनों को देख तो रही ही थी. उस के मन में बहुत दिनों से एक ख्वाहिश रहती थी कि उस के कुछ ऐसे दोस्त बन जाएं जो डिजिटल तकनीक की दुनिया से कुछ दूर रहने वाले हों, कुछ ब्रेक लेने वाले हों, जिन से वह कुछ बातें करे, हंसे, बोले.

वह बातें करने के लिए तरसने लगी थी. सहेलियों से कई बार कहती, ‘शौपिंग के लिए निकलें? कुछ चाटवाट खा कर गप्पें मारते हुए आ जाएंगे.’ वे कहतीं, ‘शौपिंग तो औनलाइन हो जाती है, कौन दुकानों पर, मौल में धक्के खाए.’
हां, कभी खानेपीने का प्रोग्राम बन जाता तो वहां भी उन्हें खाने की चीजों की फोटो खींच कर सोशल मीडिया पर अपलोड करने की जल्दी रहती. सैल्फी लेने में व्यस्त रहतीं. जो परेशानी नंदा को घर में महसूस होती, वही अब सहेलियों के साथ भी होती. मन का अकेलापन बढ़ता जा रहा था. ऐसे में मिले ये दोनों अजनबी उसे अपने से लगने लगे. वह दिल खोल कर उन दोनों से बातें करती.
टपरी में आज बाहर खड़े हो कर नंदा ने चाय पी. उस का उत्साह देख कर शेखर हंस दिए, ‘‘नंदा, टपरी में चाय पी कर कोई इतना खुश हो सकता है, यह तो मैं सोच भी नहीं सकता था.’’
‘‘खुश होने की 2 वजहें एकसाथ मिल गईं. बातें करने वाले 2 दोस्त बन गए और टपरी में चाय तो कब से पीनी थी. अजय, तुम्हारे घर पर कौनकौन है?’’
‘‘मेरी वाइफ, कंचन. अभी हम 2 ही लोग हैं.’’
‘‘वह सैर पर नहीं आती?’’
‘‘नहीं, उसे शौक नहीं. वह सोशल मीडिया की मारी है. इस शौक ने उसे थोड़ा आलसी बना दिया है. पहले अच्छीभली अपनी फिटनैस पर ध्यान देने वाली लड़की थी, अब तो उस का हर काम फोन पर ही हो जाता है. पहले तो यहां मुझ से भी तेज दौड़भाग कर जाती थी पर जैसेजैसे आलस बढ़ा, उस का सब छूट गया. वैसे, एमबीए किया है, जौब की तलाश में है.’’
शेखर कहने लगे, ‘‘मुझे लगता था कि मैं इस उम्र में अकेला जी रहा हूं, अब लग रहा है, शायद सब अकेले होते जा रहे हैं.’’
‘‘आप सही सोच रहे हैं,’’ कह कर अजय चाय के पैसे देने लगा.

नंदा बड़े हलके, खुश मन से घर लौटी. कितना अच्छा लग रहा था आज. उस के जीवन में एक ही कमी थी, वह पूरी होती दिख रही थी. उसे दोस्त मिल गए थे, अनजान थे, अजनबी थे पर दोस्त बन रहे थे. उसे उन दोनों के साथ बातें करने में, समय बिताने में जरा सा भी अपराधबोध नहीं हो रहा था. नए दोस्तों से जुड़ाव उसे कोई नुकसान भी नहीं पहुंचा पाएगा, वह यह भी महसूस कर रही थी.

शेखर उस से बहुत बड़े हैं, उन की बातों में सिर्फ स्नेह दिखा है. अजय उस से बहुत छोटा है. वह एक स्त्री है जिस की सिक्स्थ सैंस कमाल होती है. उसे इन दोनों से कभी कोई परेशानी नहीं हो सकती, यह उसे समझ आ गया है. अगर कभी कोई शंका हुई भी तो वह अपने रास्ते बदल लेगी. प्यार, मोहब्बत, धोखे जैसी चीज यहां होने वाली नहीं है.

सब को एक अकेलापन महसूस हो रहा है जो शायद आज घरघर की परेशानी है पर कोई मान नहीं रहा है. घर के काम करतेकरते उस ने सोचा, अरे हां, कल एक छोटे से स्ंिलग बैग में पैसे ले कर जाएगी. कल उन दोनों को चाय वह पिलाएगी. टपरी वाला बनमस्का भी तो रखता है, आज कोई खा रहा था, बढि़या लग रहा था. कल वह भी अपने दोस्तों के साथ खाएगी. सालों से टपरी पर लोगों को दोस्तों के साथ रुकते, चाय पीते देख रही है. अब जा कर उसे दोस्त मिले हैं. वह भी सैर के बाद रोज टपरी पर रुकेगी जब तक रुक पाएगी.
इतने में विजय का फोन आया, ‘‘अरे, कहां थीं? इतनी देर से फोन कर रहा हूं.’’
‘‘सैर पर. क्या हुआ?’’
‘‘यार, तुम फोन ले कर जाया करो.’’
‘‘नहीं, मुझे जरूरत नहीं लगती. ले गई तो मैं भी जौम्बी की तरह मशीनी सैर करने लगूंगी. वैसे भी, फोन देखते सैर करते हुए लोगों से खुद ही बचना पड़ता है. फोन क्यों किया था?’’
‘‘टैंथ फ्लोर वाले मित्तल साहब की तबीयत खराब है, उन्हें हौस्पिटल ले गए हैं. उन की वाइफ के पास कोई नहीं है, तुम उन्हें फोन कर लेना और हौस्पिटल चली जाना.’’
‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’
‘‘मित्तल साहब ने फेसबुक पर स्टेटस डाला था, ‘गोइंग टू हौस्पिटल, नौट वैल.’
‘‘तुम औफिस में भी फेसबुक देख रहे हो? वैरी गुड,’’ नंदा ने मन ही मन अपना सिर पीट लिया.
‘‘उन के पास कोई नहीं है? वे तो कहती हैं, सोशल मीडिया पर मित्तल साहब के सोसाइटी में ही बहुत फौलोअर्स हैं. उन्हें तो किसी से मिलनाजुलना भी पसंद नहीं है.’’
‘‘सारे ताने मुझे सुनाए जा रहे हैं न?’’
नंदा ने कोई जवाब नहीं दिया, बस इतना कहा, ‘‘सिंधु बाई काम कर के चली जाए तो जाती हूं. उन्हें फोन अभी कर लूंगी.’’

नंदा को याद आया, एक दिन उस ने मित्तल साहब की पत्नी नैना से कहा था, ‘बिल्ंिडग का एक गेटटुगेदर शुरू कर लें, सब से मिलतेजुलते रहना चाहिए. एक सर्कल बनना चाहिए, मिलतेजुलते रहने से अच्छा लगेगा.’
‘नहीं, क्या करना है मिलजुल कर. तुम फ्री हो तो किसी और से बात कर लो. अपना कोई ग्रुप बना लो.’

नंदा ने फिर किसी से इस बारे में बात नहीं की थी. रेनू और अंजू से दोस्ती थी ही. नंदा ने नैना से बात की, पता चला, मित्तल साहब को सीने में दर्द हुआ था. टैस्ट हो गए थे, सब ठीक था. उन्हें शायद एसिडिटी ज्यादा थी. वे शाम तक घर आने वाले थे.
नंदा ने पूछा, ‘‘आप लोगों के लिए कुछ खाना ले आऊं?’’

नैना ने कहा, ‘‘हां, प्लीज, मेरे लिए कुछ हलका सा खाना ले आओ. इन की हैल्थ के तनाव में मेरा शायद बीपी हाई हो गया है. यहीं पर चैक भी करवा लूंगी. कैंटीन में मु?ो कुछ अच्छा नहीं लगा. बस, कुछ थोड़ा सा ले आओ. बेटी बाहर ही रहती है, उसे अभी कुछ नहीं बताया, परेशान हो जाएगी.’’
नंदा को लगा, नैना सचमुच टैंशन में हैं, बात करना चाहती है, बोलती जा रही थी. ‘‘ठीक है, आप चिंता न करें, मैं कुछ ले आती हूं.’’
‘‘थैंक यू, नंदा.’’

नंदा जल्दी ही उन के लिए परांठा और सब्जी बना कर ले गई. 61 साल के मित्तल साहब अब बेहतर थे. औब्जरवेशन में रखा गया था. 55 वर्षीया नैना को नंदा ने प्यार से नाश्ता करवाया. थोड़ी देर बाद वहां से चलते हुए कहा, ‘‘आप लोगों का डिनर भी मैं बना लूंगी. आप आराम कर लेना. किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे फोन कर देना.’’
‘‘फ्री हो तो रुको न थोड़ी देर.’’

नंदा ने सोचा, आज किसी से बात करने की नैना को कितनी जरूरत महसूस हो रही है वरना आज का इंसान अपनेआप में ही सिमट कर रहने लगा है. उसे याद आया, एक दिन लिफ्ट में नैना और नंदा साथ ही थे, नैना ने उसे देख कर बस सिर हिलाया था और फोन में कुछ देखने लगी थी. पता नहीं कितने लोग अब लिफ्ट में भी नजरें मिलाए बिना फोन में ही नजरें गड़ाए रखते थे. जितना नंदा यह सब नोट कर रही थी, उस का दिल और उचाट होता रहता.

ऐसा नहीं कि वह इस डिजिटल तकनीकी विकास के खिलाफ थी, बस उसे लगता कि इस तकनीक ने एक इंसान को दूसरे इंसान से दूर कर दिया है. अब वे बातें नहीं हैं, खिलखिलाहटें नहीं हैं, गप्पें नहीं हैं. उस के चारों तरफ एक मशीनी सा जीवन है. उसे कई बार लगता कि आने वाले समय में कहीं इंसान एक मशीन बन कर न रह जाए, कोमल भावनाएं खत्म न हो जाएं. घर जा कर उस ने विजय को बता दिया कि वह हौस्पिटल से आ गई है. उस ने रेनू और अंजू को भी फोन पर नैना के बारे में बताया तो दोनों ने कहा, ‘‘ठीक है, यार. फोन पर कल या परसों पूछ लेंगे. मित्तल साहब ठीक तो हैं ही, अच्छा है.’’
‘‘जा कर मिल लेना, नैना को अच्छा लगेगा. इंतजार क्यों करना कि किसी को कुछ हो तो हाजिरी लगाएं.’’
‘‘ओके, मैडम.’’ नंदा को हंसी आ गई. फिर वह मित्तल दंपती के लिए डिनर की तैयारी में लग गई.

विजय औफिस से आए, तब तक रेयान और काव्या भी घर आ कर अपने प्रोजैक्ट पर काम कर रहे थे. नंदा ने विजय से कहा, ‘‘तुम मित्तल साहब को डिनर भी दे आओ, उन से मिल भी लो.’’
‘‘तुम ही दे आओ, मैं जा कर क्या करूंगा.’’
नंदा को गुस्सा आ गया, ‘‘फिर मुझे क्यों हौस्पिटल भेजा था?’’
‘‘तुम्हें सब से मिलनेजुलने का शौक है न, इसलिए.’’ नंदा ने विजय को गुस्से में घूरा, उस ने कहा, ‘‘अच्छा बाबा, ठीक है, चलता हूं. सोचा था, ओटीटी पर एक नया शो आया है, अभी खाना खा कर शुरू करूंगा पर ठीक है, फटाफट खाना लगाओ, फिर खाना खा कर चलते हैं.’’
नंदा विजय के साथ जा कर नैना को खाना दे आई. मित्तल दंपती नंदा को बारबार थैंक्स कहते रहे. जब दोनों घर वापस आए, रेयान ने कहा, ‘‘अब ऊपर वाले आंटीअंकल ठीक हैं?’’
‘‘हां.’’
विजय ने नंदा को चिढ़ाया, ‘‘आज तुम्हारी मम्मी बहुत खुश हैं पड़ोसिन ने बात की.’’
नंदा ने कुछ नहीं कहा. रेयान और काव्या का पूरा ध्यान अपनेअपने फोन पर था. नंदा ने कहा, ‘‘फोन पर इतना व्यस्त तो पीएम भी न रहते होंगे. सब ने हद कर रखी है.’’
जवाब हाजिर था, ‘‘आप को कैसे पता, पीएम फोन पर हम से ज्यादा व्यस्त नहीं रहते होंगे?’’ नंदा चुप रही, रूटीन चलता रहा.

अगली सुबह शेखर और अजय उस का स्लिंग बैग देख कर हंस दिए. अजय ने कहा, ‘‘आज तो आप टपरी पार्टी के लिए रेडी हो कर आई हैं.’’
‘‘हां, एक सरप्राइज भी है.’’
‘‘क्या?’’
‘‘पहले अपनी अपनी सैर खत्म कर लें.’’ तीनों अपनीअपनी स्पीड में सैर करते रहे. गार्डन बहुत बड़ा था. कई ट्रैक्स थे. बहुत से लोग यहां सैर करने आते, खूब रौनक रहती थी. बहुत हरियाली वाला एरिया था. दूरदूर से लोग यहां कारों से, बाइक्स से आते, गाडि़यां बाहर खड़ी कर के बढि़या सैर करते. सैर हो गई तो नंदा शेखर को ढूंढ़ती हुई उन की बैंच तक पहुंच गई और उन्हें पिछली शाम का मित्तल दंपती का किस्सा सुनाने लगी. शेखर ने कहा, ‘‘मतलब, तुम पड़ोसिन अच्छी हो.’’
नंदा खुले मन से हंसी. शेखर को अजय और नंदा का साथ खूब भाता. सुबह के नए दोस्त उन्हें दिन में भी कई बार याद आते. दौड़ताभागता अजय भी जल्दी ही उन के पास आ गया, बोला, ‘‘चलो, बताओ, क्या सरप्राइज है?’’
‘‘टपरी पर तो चलो.’’
तीनों टपरी पर आ गए. नंदा ने बच्चों की तरह उत्साहित हो कर कहा, ‘‘आज चाय के साथ बनमस्का भी खाएंगे. कल बड़ी अच्छी खुशबू आ रही थी.’’
दोनों ने उस का मुंह देखा, फिर जोर से हंसे. अजय ने कहा, ‘‘भाई, मेरी भागदौड़ बेकार हो जाएगी. बटर तो मैं खाता नहीं.’’
शेखर ने कहा, ‘‘मैं भी घर जा कर बस फल खाता हूं, इस सब की तो मुझे आदत नहीं.’’

नंदा का मुंह उतर गया. अजय ने फौरन कहा, ‘‘नहीं, अंकल, ऐसा करते हैं, हफ्ते में एक दिन तो खा ही सकते हैं. चलेगा, एक दिन में कुछ नहीं होता.’’ फिर टपरी वाले से कहा, ‘‘हां भाई, आज बनमस्का भी खिला दो.’’

नंदा का चेहरा खिल उठा, ‘‘ठीक है, हफ्ते में एक दिन खा लिया करेंगे,’’ नंदा बड़ा प्यारा मुसकराई. अजय ने मजाक किया, ‘‘आज तो किसी चीज की खुशबू नहीं आ रही आप को?’’

शेखर और नंदा हंस दिए. चाय के साथ बनमस्का खाते हुए नंदा का मन खिलाखिला जा रहा था. देखने में बात कितनी छोटी सी थी लेकिन नंदा, शेखर और अजय के लिए यह बात कितनी बड़ी थी, वे ही जानते थे. वे तीनों छोटीछोटी बातों के लिए तरस रहे थे, एक ऐसे साथ के लिए तरस रहे थे जहां उन के पास किसी इंसान का साथ हो, बातें हों, हंसी हो, सुकून हो. इस टपरी ने 3 एकजैसे लोगों को कैसे मिलवा दिया था, इस बात पर तीनों मन ही मन हैरान थे और खुश भी. Family Story 

Exclusive Interview : सुभद्रा महाजन – गर्भपात आज भी टैबू

Exclusive Interview : सुभद्रा महाजन का प्रोफैशनल कैरियर पत्रकारिता से शुरू हुआ और अब वे फिल्मसर्जक बन चुकी हैं. अपनी फिल्म में उन्होंने हिमाचली कल्चर को दिखाया है जिसे काफी सराहा भी गया है.

‘हर इंसान को जिंदगी दूसरा मौका देती है’ इस बात की वकालत करने के साथ भारत में टैबू समझे जाने वाले गर्भपात के मुद्दे पर आधारित अपनी पहली फीचर फिल्म ‘सेकंड चांस’ से ही पूरे विश्व में तहलका मचा देने वाली युवा फिल्मसर्जक सुभद्रा महाजन मूलतया शिमला, हिमाचल प्रदेश की रहने वाली हैं लेकिन उन की फिल्म भौगोलिक सीमाओं से परे कार्लोवी वैरी इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल, बुसान इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल, धर्मशाला इटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल सहित कई फिल्म फैस्टिवल्स में सम्मान बटोर चुकी है.

सुभद्रा महाजन पिछले 10-12 वर्षों से इंटरनैशनल फिल्मकार पैन नलिन के साथ जुड़ी हुई हैं. उन्होंने 2015 में रिलीज फिल्म ‘एंग्री इंडियन गौडेसेस’ की सहलेखक के रूप में पुरस्कार बटोरा था. उस फिल्म को विश्व के 60 देशों में दिखाया गया था तो वहीं वे औस्कर में जा चुकी फिल्म ‘द लास्ट शो’ में मुख्य सहायक निर्देशक थीं.

जब सुभद्रा से पूछा गया कि वे पत्रकार से फिल्मसर्जक बनने की यात्रा पर रोशनी डालेंगी, तो वे कहती हैं, ‘‘मैं ठेठ पहाड़ी हूं. मेरा जन्म, परवरिश और शिक्षा शिमला, हिमाचल प्रदेश में हुई. मेरी मां उमा महाजन लेखक हैं. उन की एक किताब ‘बिटवीन द वर्ल्ड’ काफी चर्चित हुई थी. इस वजह से मेरी भी क्रिएटिविटी व लेखन में रुचि रही है. मुझे मेरी स्कूल पत्रिका, ‘मेयो कालेज गर्ल्स स्कूल’ का संपादक बनाया गया था. उस के बाद मुझे यकीन हो गया कि मुझे पत्रकार बनना चाहिए.’’

‘‘मैं ने सेंट जेवियर्स कालेज, मुंबई से पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री ली. मैं ने एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रिका और एक समाचार चैनल में इंटर्नशिप भी की. तब मुझे पता चला कि मैं सनसनी फैलाने और कौर्पोरेट एजेंडों के आगे झांकने के क्षेत्र में काम कर रही हूं, जबकि मेरे दिमाग में लोकतंत्र और चौथे स्तंभ का प्रहरी होने का जो उच्च आदर्श था, वह सच नहीं था.

‘‘उस समय मैं काफी निराश थी, लेकिन साथ ही, मैं कालेज में फिल्म क्लब में शामिल हो गई. वहीं पर मैं ने पहली बार विश्व सिनेमा देखा और उस ने मुझे चौंका दिया. वहां निकोलस, रे, सर्गेई, ईसेनस्टीन, आंद्रेई, टारकोवस्की और अकिरा कुरोसावा की क्लासिक फिल्में, साथ ही क्रिसटौफ किस्लोव्स्की, वोंग कार-वाई और पेड्रो अल्मोडोवर जैसे आधुनिक लेखक, कुछ ऐसे पहले अंतर्राष्ट्रीय फिल्म निर्माता थे जिन से मेरा परिचय हुआ और शायद सब से ज्यादा प्रभाव डालने वाले माजिद माजीदी थे. फिर मैं ने सेंट जेवियर से ही फिल्म और टीवी में पोस्टग्रेजुएशन किया.

‘‘मैं बहुत खुश हूं कि मुझे कालेज में भारतीय-फ्रैंच फिल्म निर्माता पैन नलिन के साथ पहली नौकरी मिली. मैं उन की बनाई पहली फिल्म ‘समसारा’ (2001) की बहुत बड़ी प्रशंसक थी. मैं ने पैन नलिन के साथ 10 साल से ज्यादा समय से काम कर रही हूं. बेशक सब से निचले पायदान से शुरू कर के अब उन की मुख्य सहायक निर्देशक और सहलेखक हूं. 2015 में ‘एंग्री इंडियन गौडेसेस’ के सहलेखन से ले कर औस्कर जा चुकी फिल्म ‘द लास्ट शो’ में मुख्य सहायक निर्देशक के रूप में काम करते हुए मैं ने उन से बहुतकुछ सीखा. फिल्म मेकिंग में कला व क्रिएटिविटी के साथ बहुतकुछ क्राफ्ट व अनुशासन की जरूरत होती है. यह सब भी मैं ने पेन नलिन से सीखा. वे बहुत ही ज्यादा क्रिएटिव हैं और बहुत सुंदर स्क्रिप्ट लिखते हैं.

‘‘जब मुझे लगा कि अब मैं अपनी सोच वाली पहली हिमाचली फीचर फिल्म बना सकती हूं, तो मैं ने ‘सेकंड चांस’ का लेखन, निर्देशन व सहनिर्माण किया. मैं ने रंगीन फिल्मों के जमाने में इसे ब्लैक एंड व्हाइट में फिल्माया है. मेरे दिमाग में यह तय था कि मैं इसे हिमाचल प्रदेश में वहां की ठेठ पहाड़ी संस्कृति में ही जा कर फिल्माऊंगी.’’

सुभद्रा हिमाचल छोड़ कर लगभग 15 साल से मुंबई में बस गई थीं. ऐसे में हिमाचल में फिल्म की शूटिंग करने की बात क्यों दिमाग में आई, इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, ‘‘हर इंसान की जिंदगी में कई पड़ाव होते हैं. एक बचपना होता है. फिर टीनएज की उम्र आती है जब उस के अंदर थोड़ा सा विरोध करने का स्वभाव आ जाता है. टीनएज उम्र में मेरे अंदर यह भाव आया था कि मैं अपने घर और पहाड़ों से दूर भागूं तो उस समय मैं मुंबई आ गई थी. फिर एक पड़ाव आता है जब घर की याद आती है तो ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ. मुझे भी घर और पहाड़ों की बहुत याद आई तो मैं लंबेलंबे समय के लिए हिमाचल प्रदेश यानी कि पहाड़ों पर जाने लगी.

‘‘मैं अपने घर कम जाती पर हिमाचल प्रदेश में अलगअलग जगहों पर अकेले घूमने जाती थी. वहां पर मैं ने ट्रेनिंग की, स्थानीय कल्चर से जुड़ी. पर्यावरण के मुद्दों को समझ. कई दोस्त बनाए. इस कारण भी मैं अपनी पहली फिल्म हिमाचल प्रदेश में ही बनाना चाहती थी. फिर हमारी हिमाचली फिल्म न के बराबर ही बनाई जाती हैं. मेरे मन में सवाल उठता रहा है कि हमारी हिमाचली फिल्में कहां हैं, जिन में हमारे लोग, हमारा कल्चर, ठेठ पहाड़ी पन्ना नजर आए और फिल्म की कहानियां भी औथैंटिक रूप से हिमाचली हों. सो, मैं इसी तरह की फिल्म बनाना चाहती थी.’’

कैसे सूझी यह फिल्म

जब उन से पूछा गया कि उन्हें पहली फिल्म ‘सेकंड चांस’ का बीज कहां से मिला तो वे कहती हैं, ‘‘कहानी का बीज कुछ तो मेरी जिंदगी से ही मिला. मैं आधी ठेठ पहाड़ी बन चुकी हूं तो आधी मौडर्न शहरी बन चुकी हूं. मैं ऐसी फिल्म बनाना चाहती थी जो इन दोनों दुनिया को मिला दे.

‘‘मैं एक ऐसी कहानी बताना चाहती थी जिस में एक युवा लड़की दिल्ली या मुंबई जैसे शहर से किसी वजह से वापस पहाड़ों पर एकांत जगह पर जाती है. फिर उस का वहां का अनुभव क्या रहता है? और जिन लोगों से मिलती है उन की जिंदगी में जो कुछ हो रहा होता है, उस के साथ जुड़ती है तो क्या होता है.’’

वे आगे बताती हैं, ‘‘शुरू से ही मेरे दिमाग में यह बात थी कि मैं अपनी फिल्म में नए व ‘नौन ऐक्टर्स’ ही लूंगी. मैं ईरानियन सिनेमा से ज्यादा प्रभावित हूं. मैं ने देखा है कि दिल को छू लेने वाली फिल्में उन्होंने नौन ऐक्टर्स के साथ बनाई हैं. दूसरी बात, इन फिल्मों के कलाकार हमारे पहाड़ी भाईबहनों से काफी मिलतेजुलते हैं. तो ‘सेकंड चांस’ की स्क्रिप्ट का पहला ड्राफ्ट तैयार होते ही मैं हिमाचल पहुंच गई और अपने घर के आसपास के गांवों में जा कर मैं ने कलाकारों की तलाश शुरू की. मैं ने किरदारों में फिट बैठें, ऐसे कलाकारों की तलाश की. मैं ने लोगों से बात की और उन के साथ कुछ कहानी बना कर शूट किया, जिस का हमारी फिल्म से कोई संबंध नहीं था पर इस अनुभव के आधार पर हम ने अपनी स्क्रिप्ट के दूसरे ड्राफ्ट में कुछ बदलाव किए.’’

अबौर्शन है मुद्दा

निया को अपने प्रेमी पर अविश्वास क्यों हुआ कि उस ने अबौर्शन का निर्णय लिया? इस सवाल के जवाब पर वे कहती हैं, ‘‘हमारी फिल्म की नायिका निया अपने जीवन के उस मोड़ पर है जहां वह अपने मातापिता के करीब नहीं है, उस की ऐसी कोई दोस्त भी नहीं जो उस की मदद के लिए आगे आए. वह एक तरह से आइसोलेटेड जिंदगी जी रही है जैसे कि आजकल शहरों में युवा पीढ़ी अकेलेपन से जूझ रही है.’’

‘‘आप फिल्म में देखेंगे कि उस ने कुछ बिजनैस की योजना बनाई थी पर वह आगे नहीं बढ़ा. यानी, उस की जिंदगी में कुछ भी हो नहीं पा रहा. सबकुछ ठप सा हो गया है. इस स्थिति में यदि एक युवती प्रैगनैंट हो जाए और ऐसा प्रेमी जो इस खबर को सुनने के बाद निया का फोन उठाना बंद कर दे तो लड़की स्वाभाविक निर्णय यही लेगी कि इस का गर्भपात करा लिया जाए.

‘‘निया ने इस के लिए दवा का सहारा लिया जोकि सर्जिकल गर्भपात से ज्यादा आसान होता है. लेकिन कई बार कुछ जटिलताएं भी हो जाती हैं. गर्भपात के लिए एक नियत समय के अंदर ही लड़की को कदम उठाना होता है या यों कहें कि निर्णय लेना होता है. गर्भपात कराने का निर्णय लेना आसान होता है पर उस के बाद उस का उस महिला के शरीर व दिमाग पर जो साइकोलौजिक असर होता है, वह काफी कठोर और लौंग टर्म हो सकता है. हमारी फिल्म में हम देखते हैं कि निया थोड़ा मैटेरियलिस्टिक है. उसे थोड़ा सा अपराधबोध, थोड़ा सा ट्रौमा भी हो सकता है. दवा से गर्भपात कराना हो या सर्जिकल कराना हो, समाज में गर्भपात का ऐसा टैबू बना हुआ है कि लड़की/महिला को अकेले ही डाक्टर के पास जाना पड़ता है. ऐसे में उस के अंदर एक डर भी रहता है. कभीकभी कुछ गड़बड़ी या दूसरे तरह की समस्याएं भी पैदा हो जाती हैं, जैसा कि निया के साथ होता है.’’

आप को नहीं लगता कि युवा पीढ़ी के सामने इस तरह के हालात का पैदा होना या समस्याओं के पैदा होने के पीछे संयुक्त परिवारों का विघटन है? इस पर सुभद्रा कहती हैं, ‘‘जी, यह तो कड़वा सच है. लेकिन इस पर कुछ कमैंट करना मेरे लिए थोड़ा सा मुश्किल है. देखिए, ग्रामीण इलाके की बनिस्बत शहरों में संयुक्त परिवार खत्म होते जा रहे हैं और एकाकी परिवार जन्म ले रहे हैं. शहरों में तो हमें एकाकी परिवार ही नजर आते हैं. एकाकी परिवारों में भी वहां ज्यादा समस्या है जहां मातापिता दोनो कामकाजी हैं. इस वजह से कई बार पारिवारिक बंधन को मजबूत रखते हुए विश्वास को बनाए रखना भी मुश्किल हो जाता है. कुछ लोगों का एक बड़ा मित्र मंडल होता है.

‘‘लेकिन कोविड के बाद मैं देख रही हूं कि हर इंसान अपने मोबाइल फोन के साथ ही जुड़ा रहता है. पता चलता है कि 10 दोस्त कहीं इकट्ठा हुए हैं पर वे आपस में बात करने या एकदूसरे के बारे में कुछ नई जानकारी हासिल करने की बनिस्बत अपनेअपने मोबाइल में व्यस्त हैं तो इस तरह भी लोग आइसोलेटेड हो जाते हैं. मैं ने अपनी हमउम्र लोगों को देखा है कि वे अकेले पड़ रही हैं.

‘‘हमारी शिक्षा प्रणाली व वर्तमान सामाजिक रचना भी यही सिखाती है कि पैसा कैसे कमाएं. युवा पीढ़ी योजना इसी तरह बनाती है कि पढ़ाई पूरी कर के सरकारी नौकरी पा जाएंगे. फिर विदेश घूमने जाएंगे. मकान खरीदेंगे व कार खरीदेंगे वगैरहवगैरह और इसी दिशा में सोचते हुए वे अपने आसपास के लोगों, दोस्तों तक से कट जाते हैं. हमारे यहां बच्चों को यह कभी नहीं सिखाया जाता कि अंदर से किस तरह मजबूत बनें, हर चीज, हालात का मुकाबला करने के लिए अपने इंटरनल सिस्टम को कैसे मजबूत बनाएं.

‘‘मैं ने अपनी सहेलियों में देखा है कि थोड़ी सी समस्या या मुसीबत आने पर वे उस से डील नहीं कर पाईं. आज की तारीख में कुछ ही लोगों को बाहर से मदद के लिए स्ट्रौंग फैमिली बौंड मिलता है. हर किसी को अतिविश्वसनीय दोस्त नहीं मिलते.’’

टूटते परिवारों के बीच सोशल मीडिया और मोबाइल की भूमिका पर वे कहती हैं, ‘‘सोशल मीडिया तो पैराडौक्सिल है. सोशल मीडिया से आप हर किसी से जुड़े रह सकते हैं पर सवाल है कि महज लाइक करने व शेयर करने के लिए या रील्स पर कमैंट करने के लिए? सोशल मीडिया का सही उपयोग कोई नहीं कर पा रहा है. हो यह रहा है कि लोग सोशल मीडिया के गुलाम बन गए हैं और सोशल मीडिया उन का उपयोग कर रहा है.’’

फिल्म के केंद्र में महिला किरदार

जब उन से पूछा गया कि उन की फिल्म की नायिका निया को अभिजात्य वर्ग का बताने की क्या वजह है तो इस पर वे कहती हैं, ‘‘फिल्म की नायिका निया भी मेरी तरह ही भारतीयों के अभिजात्य वर्ग से आती है- युवा मिलेनियल्स और जेन जेड, जो संपन्न परिवारों से आते हैं, के पास वे सभी अवसर खुले होते हैं जो न तो हमारे मातापिता के पास थे और न ही हमारे दादादादी के पास. दुनिया हमारी मुट्ठी में है और हम जो कुछ भी चाहते हैं वह हमारे स्मार्टफोन पर बस एक टैप की दूरी पर है. यह सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन मैं ने कई ऐसे उदाहरण देखे और अनुभव किए हैं जहां अनंत संभावनाओं के विशेषाधिकार के कारण बहुत भ्रम और उत्कृष्टता हासिल करने का बहुत दबाव पैदा हुआ है, क्योंकि आखिर हमें कौन रोक सकता है. इस परिदृश्य में ‘व्यापार’ अभी भी ‘कला’ से कहीं बेहतर है.

‘‘आज शैक्षिक और व्यावसायिक लक्ष्य आंतरिक संसाधनों की तुलना में भौतिक संपदा के इर्दगिर्द अधिक केंद्रित हैं. सोशल मीडिया ने पहले से ही इस अटपटे माहौल में प्रतिस्पर्धा को और बढ़ा दिया है. शहरीकरण के कारण और भी अकेलापन पैदा हुआ है. आत्महत्या के कारण एक से अधिक करीबी दोस्तों को खोने के बाद मुझे एहसास हुआ कि हमारी पीढ़ी बहुत अधिक आंतरिक खालीपन और कमजोरी का सामना कर रही है.’’

‘‘इस पीढ़ी में एक युवा महिला होना और भी अधिक भ्रमित करने वाला है, क्योंकि भले ही हम यह मानने में चिढ़ जाते हैं कि हमारे पारंपरिक पितृसत्तात्मक व्यवस्था में लैंगिक समानता बढ़ रही है, लेकिन यह बहुत हद तक सतही है. यह भ्रम को तोड़ने के लिए बस एक घटना की तरह है, जैसे कि आकस्मिक विवाहपूर्व गर्भावस्था और एक क्रूर रूप से बुरे समाज का सामना करने के लिए अकेले छोड़ दिया जाना और यह वास्तव में इस पहले से ही खोई हुई, पराजित और आघातग्रस्त युवा महिला के लिए ‘दुनिया का अंत’ हो सकता है. यह वह वास्तविकता है जिस से निया का चरित्र पैदा हुआ.’’

इन दिनों युवा पीढ़ी किसी पर भी यकीन नहीं कर रही. ऐसे में समस्या से ग्रस्त निया पहाड़ पर जा कर एक केयरटेकर, 70 वर्षीया भेमी पर यकीन कैसे कर लेती है? इस पर वे कहती हैं, ‘‘आप सही कह रहे हैं. आज की तारीख में हम बहुत ही ज्यादा कंडीशंड हो गए हैं पर निया को जरूरत है प्यार की और ऐसे इंसान की जो उसे संभाले. लेकिन वह ऐसा करने की इजाजत जल्दी किसी को न देगी. लेकिन हम ने दिखाया है कि निया पहले अपनेआप में खोई व सीमित रहती है लेकिन विंटर यानी कि ठंड का मौसम उसे भेमी के साथ जुड़ने में मदद करता है. ठंड बहुत है. वह पहाड़ पर है. बिजली चली गई है. ऐसे में उस के पास भेमी का सहारा लेने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है, यही धीरेधीरे उसे भेमी से जोड़ता है.

‘‘दूसरी तरफ, सनी की नानी यानी कि भेमी जो बात बताती है वह जोक्स की तरह कहती है. वह सबक नहीं सिखाती, बल्कि हंस कर ऐसी बात कह जाती है जो निया के दिल तक पहुंच जाती है. भेमी इस तरह निया का विश्वास जीत लेती है. जहां तक सनी का सवाल है तो सनी का एजेंडा इतना है कि उसे अपने साथ खेलने के लिए कोई चाहिए क्योंकि उस के पिता व नानी दोनों काम में व्यस्त रहते हैं तो सनी, निया के साथ क्रिकेट खेलता है. इस से निया को अपना बचपना याद आता है और वह सनी के साथ उस के खेलों से जुड़ जाती है, जिस से उस के चेहरे पर मुसकराहट लौट आती है.’’

पर्सनल लाइफ से जुड़ी फिल्म

फिल्म ‘सेकंड चांस’ में खुद सुभद्रा कहां हैं, इस पर वे कहती हैं, ‘‘यह फिल्म मेरे लिए बहुत पर्सनल फिल्म है. हर संवाद में आप को सुभद्रा नजर आएगी.’’ वे आगे कहती हैं, ‘‘मुझे नहीं पता कि उन के दिमाग में क्या सवाल उठेंगे पर मुझे लगता है कि फिल्म देखने के बाद युवा पीढ़ी हिमाचल प्रदेश घूमने व ट्रैकिंग करने, वहां के कल्चर को समझने, वहां के रहनसहन, पहनावा, खानपान को समझने के लिए हिमाचल जाना चाहेगी.

‘‘निया की यात्रा देख कर हर दर्शक के मन में एक आशा, उम्मीद जगनी चाहिए. उन्हें एहसास होना चाहिए कि ‘सेकंड चांस’ केवल निया के लिए नहीं है, उन के लिए भी हो सकता है. मैं मानती हूं कि यह दुनिया काफी कठिन है, लेकिन अगर हमारे दिल में आशा न हो, पौजिटिविटी न हो तो जिंदगी जीना दूभर हो जाएगी.’’

सुभद्रा के लिए प्यार क्या है? इस सवाल पर उन का कहना था, ‘‘मेरे लिए प्यार केवल प्रेमी व प्रेमिका के बीच रोमांस नहीं है. यह प्यार मां व बेटे के बीच, बेटे व पिता के बीच भी हो सकता है. प्यार हर जगह है. कई बार आप की समझ में नहीं आएगा कि प्यार क्या है पर आप कहीं जाते हैं और एक बच्चा आप के साथ कुछ ऐसा करता है कि आप मुसकराते हैं तो वह भी प्यार है.’’

अकसर हिमाचल प्रदेश में हिमाचली कल्चर को दिखाने वाली फिल्में नहीं बनतीं, इस पर वे कहती हैं, ‘‘बौलीवुड के फिल्मकार अपनी फिल्म के गाने फिल्माने के लिए हिमाचल की खूबसूरत वादियों में जाते हैं. पहाड़ों व बर्फ में जाते हैं पर हिमाचली कल्चर व लोगों को ले कर उन का कोई रिसर्च, कोई ध्यान नहीं होता. लेकिन मैं अपनी हर फिल्म हिमाचल की अलगअलग वादियों में बनाना चाहूंगी.’’

सुभद्रा की फिल्म ‘सेकंड चांस’ को इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में पसंद किया गया. इस की वजह बताती हुई वे कहती हैं, ‘‘मैं तो इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में अपनी फिल्म को ले कर नर्वस थी पर लोगों ने हमारी फिल्म की कहानी व लोकेशन के साथ रिलेट किया. फिल्म में इमोशन, ह्यूमर व दर्द भी है. ये सारे इमोशन विदेशों में भी लोगों के दिलों को छू गए.

‘‘अमेरिका में लोगों ने हम से भारत में गर्भपात के कानूनी नियमों को ले कर बात की. गर्भपात को ले कर सामाजिक मापदंडों पर भी चर्चा हुई. अमेरिका में गर्भपात पर चर्चा इसलिए ज्यादा हुई क्योंकि वहां गर्भपात के कानून को ले कर बहस छिड़ी हुई है. यहां तक कि यह चुनावी मुद्दा भी वहां पर रहा है लेकिन यूरोप में गर्भपात को ले कर बहुत कम चर्चा हुई.’’  Exclusive Interview

Hindi Love Stories : चार आंखों का खेल – क्या संध्या उसके खेल से बच पाई ?

Hindi Love Stories : चार आंखों का खेल मेरी नजर में दुनिया का सब से रोमांचक व खूबसूरत खेल है (कम से कम शुरू में तो ऐसा ही लगता है). इस खेल की सब से अच्छी बात यही है कि जो चार आंखें यह खेल खेलती हैं, इस खेलके बारे में बस उन्हीं को पता होता है. उन के आसपास रहने वालों को इस खेल का अंदाजा ही नहीं हो पाता है. मैं भी इस खेल में लगभग 1 साल पहले शामिल हुई थी. यहां मुंबई में जुलाई में बारिश का मौसम था. सोसायटी के गार्डन के ट्रैक पर फिसलने का डर था. वैसे मुझे बाहर सड़कों पर सैर करना अच्छा नहीं लगता. ट्रैफिक, स्कूलबसों के हौर्न का शोर, भीड़भाड़ से दूर मुझे अपनी सोसायटी के शांत गार्डन में सैर करना ही अच्छा लगता.

हां, तो बारिश के ही एक दिन मैं घर से 20 मिनट दूर एक दूसरे बड़े गार्डन में सैर के लिए जा रही थी. वहीं सड़क पर वह अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखा रहा था. हम दोनों ने अचानक एकदूसरे को देखा. पहली बार आंखों से आंखें मिलते ही जो होना था, हो चुका था. यह शायद आंखों का ही दोष है. किसी की आंखों से किसी की आंखें मिल जाएं, तो फिर उस का कोई इलाज नहीं रहता. शायद इसी का नाम चार आंखों का खेल है.

हां, तो जब हम दोनों ने एकदूसरे को देखा तो कुछ हुआ. क्या, यह बताना उस पल का वर्णन करना, उस एहसास को शब्दों का रूप देना मुश्किल है. हां, इतना याद रहा कि उस पूरा दिन मैं चहकती रही, न घर आते हुए बसों के हौर्न बुरे लग रहे थे, न सड़क पर कुछ शोर सुनाई दे रहा था. सुबह के 7 बजे मैं हवा में उड़ती, चहकती घर लौट आई थी.

मेरे पति निखिल 9 बजे औफिस निकलते हैं. 22 वर्षीय बेटी कोमल कालेज के लिए 8 बजे निकलती है. मैं रोज की तरह कोमल को आवाज दे कर किचन संभालने में व्यस्त हो गई. दोनों के जाने के बाद मैं दिन भर एक अलग ही उत्साह में घिरी रही. अगले दिन भी मैं सैर करने के लिए फिर बाहर ही गई. वह फिर उसी जगह अपने बेटे को साइकिल चलाना सिखा रहा था. हमारी आंखें फिर मिलीं, तनमन एक पुलक से भरते चले गए. फिर अगले 3-4 दिन मेरे सामने यह स्पष्ट हो गया कि उसे भी मेरा इंतजार रहता है. वह बारबार मुड़ कर उसी तरफ देखता है जहां से मैं उस रोड पर आती हूं. मैं ने उसे दूर से ही बारबार देखते देख लिया था.

चार आंखों का खेल बहुत ही खूबसूरती से शुरू हो गया था. दोनों खिलाड़ी शायद हर सुबह का बेचैनी से इंतजार करने लगे थे. मैं संडे को सैर पर कभी नहीं जाती थी, ब्रेक लेती थी, पर अब मैं संडे को भी जाने लगी तो निखिल ने टोका, ‘‘अरे, संध्या कहां…?’’

‘‘सैर पर,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर आज तो संडे है?’’

‘‘आंख खुल गई है, तो चली ही जाती हूं. तुम आराम करो, मैं अभी आई,’’ कह मैं तेज कदमों से भागी सी उस रोड पर चली जा रही थी. देखा, आज उस का बेटा नहीं था. सोचा संडे है, सो रहा होगा. आज वह अपनी पत्नी के साथ सैर कर रहा था. मैं ने गौर से उस की पत्नी को देखा. मुझे वह अच्छी लगी, काफी सुंदर व स्मार्ट थी. उस ने मुझे देखा, पत्नी की नजरें बचा कर आज पहली बार वह मुसकरा भी दिया तो मुझे लगा संडे को आना जैसे सार्थक हो गया.

अब कुछ तो जरूर था हम दोनों के बीच जिस ने मुझे काफी बदल दिया था. सुबह के इंतजार में मैं पूरा दिन, शाम, रात बिताने लगी थी. 10 दिन में ही मैं कितना बदल गई थी. पूरा दिन यह एहसास कि रोज सुबह इस उम्र में भी कोई आप का इंतजार कर रहा होगा, इतना ही बहुत है रोमांचित होने के लिए.

धीरेधीरे 1 महीना बीत गया. इस खेल के दोनों खिलाड़ी मुंह से कभी एक शब्द नहीं बोले थे. आंखें ही पूछती थीं, आंखें ही जवाब देती थीं.

एक दिन निखिल ने पूछा भी, ‘‘आजकल सोसायटी के गार्डन नहीं जा रही हो?’’

‘‘नहीं, फिसलने का डर रहता है.’’

‘‘पर तुम्हें तो सैर के समय बाहर का शोर अच्छा नहीं लगता?’’

‘‘हां, पर अब ठीक लग रहा है,’’ कहते हुए मन में थोड़ा अपराधबोध सा तो महसूस हुआ पर चूंकि इस खेल में मजा आने लगा था, इसलिए सिर झटक कर अगली सुबह का इंतजार करने लगी.

बारिश का मौसम खत्म हो गया था, पर मैं अब भी बाहर ही जा रही थी. अक्तूबर शुरू हो गया था. चार आंखों का खेल अब और भी रोमांचक हो चुका था. मैं उसे सिर्फ देखने के लिए बाहर का शोरगुल पसंद न होते हुए भी बाहर भागी चली जाती थी, पहले से ज्यादा तैयार, संजसंवर कर. नईनई टीशर्ट्स, ट्रैक पैंट में, स्टाइलिश शूज में, अपने शोल्डरकट बालों को कभी खुला छोड़ कर, कभी पोनीटेल बना कर, बढि़या परफ्यूम लगा कर षोडशी सी महसूस करती हुई भागी चली जाती थी. सैर तो हमेशा करती आई थी पर इतनी दिलकश सैर पहले कभी नहीं थी.

उस से आंखें मिलते ही कितने सवाल होते थे, आंखें ही जवाब देती थीं. कभी छुट्टी वाले दिन देर से जाने पर कभी अस्वस्थता के कारण नागा होता था, तो उस की आंखें एक शिकायत करती थीं, जिस का जवाब मैं आंखों में ही मुसकरा कर दे देती थी. कभी वह नहीं देखता था तो मैं उसे घूरती थी, वह भी मुसकरा देता था फिर. अजीब सा खेल था, बात करने की जरूरत ही नहीं थी. सुबह से देखने के बाद एक जादुई एहसास से घिरी रहती थी मैं. दिन भर न किसी बात पर गुस्सा आता था, न किसी बात से चिढ़ होती थी. शांत, खुश, मुसकराते हुए अपने घर के  काम निबटाती रहती थी.

निखिल हैरान थे. एक दिन कहने लगे, ‘‘अब तो बारिश भी गई, अब भी बाहर सैर करोगी?’’

‘‘हां, ज्यादा अच्छी और लंबी सैर हो जाती है, सालों से गार्डन में ही सैर कर के ऊब गई हूं.’’

‘‘ठीक है, जहां तुम्हें अच्छा लगे,’’ निखिल भी सैर पर जाते थे, पर जब मैं आ जाती थी, तब.

फिर कमरदर्द से संबंधित शारीरिक अस्वस्थता के कारण मुझे परेशानी होने लगी थी. सुबह 20 मिनट जाना, 20 मिनट आना, फिर आते ही नाश्ता, दोनों के टिफिन, मेरी परेशानी बढ़ रही थी. पहले मैं आधे घंटे में घर आ जाती थी. डाक्टर ने कुछ दिन सैर करने का समय कम करने के लिए कहा तो मैं बेचैन हो गई. मेरे तो रातदिन आजकल उसे सुबह देखने से जुड़े थे. उसे देखने का मतलब था सुबह उठ कर 20 मिनट चल कर जाना, 20 मिनट आना, 40 मिनट तो लगने ही थे. अपनी अस्वस्थता से मैं थकने लगी थी.

अब वहां जाने का नागा होने लगा था, क्योंकि आते ही किचन में मुझे 1 घंटा लगता ही था. मैं अब इतनी देर एकसाथ काम करती तो पूरा दिन मेरी तकलीफ बढ़ी रहती. अब क्या करूं? इतने दिनों से जो एक षोडशी की तरह उत्साहित, रोमांचित महसूस कर रही हूं, अब क्या होगा? सब छूट जाएगा?

निखिल परेशान थे, मुझे समझा रहे थे, ‘‘इतने सालों से यहीं सैर कर रही हो न. अब सुबह सैर पर मत जाओ, तुम्हें और भी काम होते हैं. शाम को फ्री रहती हो, आराम से उस समय सैर पर चली जाया करो. सुबह सब एकसाथ करती हो तो तुम्हारी तकलीफ बढ़ जाती है.’’

डाक्टर ने भी निखिल की बात पर सहमति जताई थी. पर मैं नहीं मानी. एक अजीब सी मनोदशा थी मेरी. शारीरिक रूप से आराम की जरूरत थी पर दिल को आराम उसे देखने से ही मिलता था. मैं उसे देखने के लिए बाहर जाती रही. पर अब नागे बहुत होते थे.

उस का बेटा अब तक साइकिल सीख चुका था. अब वह अकेला ही वहां दिखता था. चार आंखों का खेल जारी था. अपनी हैल्थ की चिंता न करते हुए मैं बाहर ही जाती रही.

पहली जनवरी की सुबह पहली बार उस ने मेरे पास से गुजरते हुए ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बोला. मैं ने भी अपने कदम धीरे करते हुए ‘थैंक्स, सेम टू यू’ कहा, इतने दिनों के खेल में शब्दों ने पहली बार भाग लिया था. मन मयूर प्रफुल्लित हो कर नाच उठा.

अब मेरी तबीयत खराब भी रहती तो मैं निखिल और कोमल से छिपा लेती. दोनों के जाने के बाद दर्द से बेहाल हो कर घंटो बैड पर लेटी रहती. कोमल बेटी है, बिना बताए भी चेहरा देख कर मेरे दर्द का अंदाजा उसे हो जाता था, तो कहती थी, ‘‘मौम, आप को स्ट्रैस लेने से मना किया है डाक्टर ने. आप मौर्निंग वाक पर नहीं जाएंगी, अब आप शाम की सैर पर ही जाना.’’

पर मैं नहीं मानी, क्योंकि मैं तो दुनिया के सब से दिलकश खेल की खिलाड़ी थी.

मई का महीना आया तो मेरे मन की उथलपुथल बढ़ गई. मई में मैं ने हमेशा शाम की ही सैर की थी. मुझे जरा भी गरमी बरदाश्त नहीं है. 8-10 दिन तो मैं गई. मुंबई की चिपचिपी गरमी से सुबह ही बेहाल, पसीनेपसीने लौटती. आ कर कभी नीबू पानी पीती, तो कभी आते ही एसी में बैठ जाती पर कितनी देर बैठ सकती थी. किचन के काम तो सब से जरूरी थे सुबह.

इस गरमी ने तो मेरे मन के भाव ही बदल दिए. इस बार की गरमी तो इस चार आंखों के खेल का सब से महत्त्वपूर्ण पड़ाव बन कर सामने आई. बहुत कोशिश करने पर भी मैं गरमी में सुबह सैर पर रोज नहीं जा पाई. छुट्टी वाले दिन चली जाती, क्योंकि जब आते ही किचन में नहीं जाना पड़ता था. उसे देखने के मोह पर गरमी की तपिश भारी पड़ने लगी थी. पसीना पोंछती जाती. उसे देख कर जब वापस आती, तब यह सोचती कि नहीं, अब नहीं जाऊंगी. बहुत गरमी है. मैं कोई षोडशी थोड़े ही हूं कि अपने किसी आशिक को देखने सुबहसुबह भागी जाऊं. अरे, मैं एक मैच्योर औरत हूं, पति है, बेटी है और इतने महीनों से हासिल क्या हुआ? न मुझे उस से कोई अफेयर चलाना है, न मतलब रखना है किसी तरह का. जो हुआ, बस हो गया. इस का कोई महत्त्व थोड़े ही है. जैसेजैसे गरमी बढ़ रही थी, मेरी अक्ल ठिकाने आ रही थी.

सारा उत्साह, रोमांच हवा हो रहा था. गरमी, कमरदर्द और सुबह के कामों ने मिल कर मुझे इस खेल में धराशायी कर दिया था. दिल तो अब भी वहीं उसी पार्क के रोड पर जाने के लिए उकसाता था पर दिमाग अब दिल पर हावी होने लगा था.

मन में कहीं कुछ टूटा तो था पर खुद को समझा लिया था कि ठीक है, लाइफ है, होता है ऐसा कभीकभी. यह उम्र, यह समय, ये जिम्मेदारियां शायद इस खेल के लिए नहीं हैं.

चार आंखों के इस खेल में मैं ने अपनी हार स्वीकार ली थी और पहले की तरह अपनी सोसायटी के गार्डन में ही शाम की सैर पर जाना शुरू कर दिया था.  Hindi Love Stories

Family Story : फर्ज – एक पिता की मजबूरी की मार्मिक कहानी

Family Story : सावित्री जैसे ही अस्पताल पहुंची कमरे में चल रहा डा. सुदर्शन और पति दीनानाथ का वार्त्तालाप सुन कर उन के कदम ठिठक गए, ‘‘देखो दीनानाथ,’’ सुदर्शन कह रहे थे, ‘‘तुम मेरी बात से सहमत हो या नहीं, यह मैं नहीं जानता, पर मेरे विचार से तुम्हें भाभी को सबकुछ सचसच बता देना चाहिए. आखिर, कब तक छिपाओगे उन से?’’

‘‘कोई बताने लायक बात हो तो बताऊं भी उस बेचारी को. एक दिन तो पता चलना ही है, तब तक तो उसे निश्ंिचतता से जी लेने दो,’’ तभी दीनानाथ का स्वर सावित्री के कानों से टकराया और वह शीघ्र ही सकते में आ गईं. मानो एकाएक किसी ने उन के कानों में गरम सीसा उड़ेल दिया हो. उन्होंने तेजी से उस कक्ष का द्वार

खोला और तूफान की गति से कमरे में प्रवेश किया.

‘‘क्या हुआ है आप को?’’ सावित्री ने हांफते हुए पूछा.

उन्हें अचानक अपने सामने पा कर एक क्षण को तो दीनानाथ का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया था पर क्षणांश में ही उन्होंने खुद को संभाल लिया था.

‘‘अरे, सावित्री, क्या हुआ? बहुत बदहवास सी लग रही हो? क्या घर से भागी चली आ रही हो? दीनानाथ ने मुसकरा कर तनाव को कम करने की कोशिश की मगर सावित्री की भावभंगिमा में कोई अंतर नहीं आया.

‘‘यह मेरे प्रश्न का उत्तर तो नहीं हुआ. आखिर हुआ क्या है आप को?’’ सावित्री ने अपना प्रश्न दोहराया.

‘‘वही तो… वही तो मैं डाक्टर से पूछ रहा हूं कि आखिर मुझे हुआ क्या है भाई जो मुझे यहां रोक रखा है? तुम नहीं जानतीं आजकल के इन डाक्टरों को, आप को जुकाम हुआ नहीं कि अतिथि सत्कार के मूड में आ जाते हैं. वैसे तुम्हें किस ने बताया कि मैं इस अस्पताल में हूं?’’ दीनानाथ धाराप्रवाह बोले जा रहे थे.

‘‘आप के औफिस फोन किया था. आप की सेक्रेटरी निरुपमा ने बताया कि आप औफिस में ही बेहोश हो गए थे. उसी ने यहां का पता भी दिया.’’

‘‘औफिस फोन किया था? क्यों? कोई खास बात थी क्या?’’ दीनानाथ ने प्रश्न किया.

‘‘खास बात ही तो थी. ऋचा का फोन आया था, मैडिकल कालेजों की सामूहिक प्रतियोगिता का परिणाम आ गया है. उस में ऋचा को अच्छा स्थान हासिल हुआ है. मैं ने उन सब को खाने पर बुला लिया. सोचा सब मिलजुल कर खुशी मनाएंगे पर कुछ विशेष खरीदारी करते हुए घर लौटने के लिए आप को औफिस फोन किया तो यह मनहूस समाचार मिला,’’ सावित्री की आंखें सजल हो उठीं.

‘‘देखा डाक्टर, तुम ने तो हमारी सावित्री को रुला ही दिया. अब तो मैं किसी की एक नहीं सुनूंगा. अब तो तुम्हें मुझे घर जाने की अनुमति देनी ही होगी,’’ दीनानाथ का चेहरा चमक उठा.

‘‘यह तो सचमुच अच्छी खबर सुनाई है भाभी ने. मैं तो खुद आप की इस खुशी में शामिल होना चाहता हूं पर क्या करूं, हमें तो कोई पूछता ही नहीं है,’’ डाक्टर सुदर्शन मुसकराए.

‘‘अरे, तो अब बुलाए लेते हैं. तुम हमारे साथ ही चलोगे. घर की ही बात है, इस में इतनी औपचारिकता दिखाने की क्या जरूरत है,’’ दीनानाथ ने चटपट निमंत्रण दे डाला था.

‘‘लेकिन आप की तबीयत? सुदर्शन भैया, इन्हें हुआ क्या है?’’ सावित्री घूमफिर कर पुन: उसी विषय पर आ गईं.

‘‘अरे, कुछ नहीं, यों ही जरा सी कमजोरी है. सभी तरह की जांच करवाने के लिए अस्पताल में भरती हो गया हूं, क्यों डाक्टर?’’ डाक्टर के मुंह खोलने से पहले ही दीनानाथ ने हलके अंदाज में कह दिया.

‘‘पर कमजोरी से बेहाश होते तो किसी को नहीं देखा,’’ सावित्री अब भी आश्वस्त नहीं हो पा रही थीं.

‘‘लो, इन की सुनो,’’ दीनानाथ ने नाटकीय अंदाज में डाक्टर सुदर्शन की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अपने कार्यकाल के दौरान जापान की यात्रा पर गए थे. वह तो ठीक उस समय अपने होश खो बैठे थे जब उन के स्वागत में भोज का आयोजन किया गया था. फिर मैं तो बेहद साधारण सा प्राणी हूं. मेरे बेहाश होने पर तुम्हें आपत्ति क्यों? क्यों डाक्टर…’’ कहते हुए दीनानाथ ने ठहाका लगाया.

‘‘हां, ठीक ही तो है. बेहोश होना और फिर होश में आना तो हमारा राष्ट्रीय खेल होना चाहिए,’’ डाक्टर सुदर्शन ने उन की हां में हां मिलाई.

‘‘आप नहीं जानते डाक्टर भैया कि आप ने मेरे सीने से कितना बड़ा बोझ उतार दिया. मुझे तो इतनी चिंता हो गई थी कि किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था, इसीलिए सबकुछ छोड़ कर यहां दौड़ी चली आई. अब तो मैं साथ ले जाऊं न आप के मरीज को,’’ सावित्री ने लंबी सांस ली.

‘‘नहीं, अभी नहीं. बड़ी कठिनाई से तो पकड़ में आए हैं आप के पति. हम तो सभी तरह की जांच करवा कर स्वयं को संतुष्ट व आश्वस्त करना चाहते हैं.’’

‘‘ठीक ही तो है, हम दोनों साथ ही पहुंच जाएंगे. तुम चलो, अतिथियों के स्वागतसत्कार का विशेष प्रबंध भी करना है.’’

‘‘अच्छा, तो मैं चलती हूं, अपना खयाल रखिएगा. सच कहती हूं डाक्टर भैया, अपने स्वास्थ्य की तो इन्हें जरा सी भी चिंता नहीं है. आप दोनों समय से पहुंच जाइएगा. ऐसा न हो कि मेहमान आ जाएं और हम आप की राह देखते रहें,’’ सावित्री चलने का उपक्रम करती हुई बोलीं.

‘‘अब?’’ सावित्री के जाते ही डा. सुदर्शन के मुंह से निकला. कुछ क्षण तक खामोशी रही जिसे दीनानाथ ने ही तोड़ा,  ‘‘तुम ने तो उन आकर्षक आंखों के सपनों की उमंग देखी थी, सुदर्शन. तुम्हीं कहो, कैसे उस सपनों के घरौंदे को तहसनहस कर दूं?’’

दीनानाथ का उत्तर सुन कर डा. सुदर्शन चुप रह गए. फिर कुछ सोच कर बोले, ‘‘देरसवेर तो तुम्हें बताना ही पड़ेगा. जरा सोचो, इस भयंकर बीमारी की बात उन्हें किसी और से पता चली तब क्या होगा? वैसे भी उन्हें बता देना ही उचित होगा. कम से कम वह स्वयं को संभाल तो लेंगी. यह मत भूलो कि उन के सामने जीवन की सब से बड़ी परीक्षा की घड़ी

आई है.’’

‘‘शायद तुम ठीक कहते हो. वैसे भी तुम ने तो मुझे लगभग 2 साल का समय दिया था और अब तो 3 साल पूरे होने जा रहे हैं. अब तो केवल चंद सांसें ही बाकी हैं. अत: सावित्री को सबकुछ बता कर मुझे अंतिम विदा की तैयारी शुरू कर लेनी चाहिए,’’ दीनानाथ का स्वर भर्रा गया था. न चाहते हुए भी आंखें भर आई थीं.

डा. सुदर्शन और दीनानाथ जब घर पहुंचे तो वहां उत्सव जैसा वातावरण था. ऋचा तो पिता को देखते ही उन के गले लग गई थी.

‘‘मुझे तुम पर गर्व है मेरी बच्ची,’’ दीनानाथ की आंखों में खुशी के आंसू थे.

‘‘आप को अपनी बेटी पर गर्व है तो हमें अपनी पुत्रवधू पर,’’ ऋचा के ससुर ने कहा.

दोनों परिवारों का उल्लास देखते ही बनता था. हंसतेगाते, नाचते कब आधी रात बीत गई किसी को पता ही नहीं चला.

दीनानाथ बेहद कमजोरी अनुभव कर रहे थे. अत: चुपचाप एक कोने में कुरसी पर बैठे अपने जीवन के उन अमूल्य क्षणों का आनंद ले रहे थे.

डा. सुदर्शन काफी देर पहले ही विदा ले कर जा चुके थे.

दीनानाथ अपने ही विचारों में खोए थे.

‘‘क्या बात है, पापा, बहुत थके हुए लग रहे हैं?’’ तभी अपने बेटे ऋषिराज का स्वर सुन कर वह चौंक पड़े.

‘‘ठीक हूं, बेटे, आजकल तो तुम्हारी सूरत देखने को तरस जाता हूं मैं. बहुत नाराज हो क्या मुझ से?’’ दीनानाथ ने बहुत थके हुए स्वर में कहा.

‘‘नहीं पापा, ऐसा कुछ नहीं है. नई नौकरी है, बहुत व्यस्त रहता हूं

इसलिए शायद आप को ऐसा आभास हुआ होगा.’’

‘‘मैं सब समझता हूं बेटे. हम तो चेहरा देख कर मन की बात भांप लेते हैं पर मेरी दुविधा तुम नहीं समझ सकोगे और न ही मैं तुम्हें समझा सकूंगा. बचपन से ही तुम्हारी उच्च शिक्षा के लिए तुम्हें विदेश भेजने की इच्छा थी पर कुछ नहीं हो सका. सारे सपने टूट गए…’’ दीनानाथ अपनी ही रौ में बहे जा रहे थे.

‘‘पापा, मैं सब समझता हूं. क्या मैं नहीं जानता कि ऋचा के विवाह में आप को कितना खर्च करना पड़ा था? रही विदेश जा कर पढ़ाई करने की बात, तो मैं अपनी इच्छा बाद में भी पूरी कर सकता हूं,’’ ऋचा ने पिता को आश्वस्त करना चाहा.

पितापुत्र के वार्त्तालाप के बीच ही ऋचा, उस के पति तथा अन्य परिवारजनों ने विदा ली. सावित्री और ऋचा उन्हें दरवाजे तक छोड़ने गए.

दीनानाथ को लगा कि अतिथियों को छोड़ने उन्हें भी दरवाजे तक जाना चाहिए. लिहाजा, वह धीरेधीरे उठे मगर स्वयं को संभाल न सके और वहीं पर गिर गए.

उधर ऋचा और उस का परिवार जा चुका था. उन्हें छोड़ कर अंदर आते हुए सावित्री और ऋषि ने दीनानाथ के कराहने का स्वर सुना तो लपक कर अंदर पहुंचे.

‘‘क्या हुआ, पापा?’’ ऋषि और सावित्री उन्हें झिंझोड़ रहे थे पर दीनानाथ को तो होश ही नहीं था.

‘‘ऋषि, जल्दी डाक्टर सुदर्शन के यहां फोन करो,’’ सावित्री रोंआसे स्वर में बोलीं.

ऋषि ने डाक्टर को पूरी स्थिति की जानकारी दी तो उन्होंने तुरंत उसे दीनानाथ के साथ अस्ताल पहुंचने को कहा.

बदहवास मांबेटे दीनानाथ को ले कर अस्पताल पहुंचे.

‘‘क्या हुआ डाक्टर भैया? आप ने तो कहा था इन्हें घर ले जा सकते हैं. कोई विशेष बात नहीं है,’’ सावित्री ने कातर स्वर में पूछा.

‘‘मैं तो शुरू से यही चाहता था कि इन के बारे में आप लोगों को सच बता दूं पर इन्होंने नहीं चाहा था कि उन के परिवार को मैं ऐसा दुख पहुंचाऊं, इसीलिए मैं अब तक चुप रहा पर अब…’’

‘‘पर अब क्या?’’ ऋषि ने प्रश्न किया.

‘‘तुम्हारे पिता कुछ ही दिनों के मेहमान हैं,’’ डा. सुदर्शन का स्वर बेहद सपाट और गंभीर था.

‘‘क्या कह रहे हो, भैया? शुभशुभ बोलो.’’

‘‘हां, भाभी, कब तक वास्तविकता से मुंह छिपाओगी? पर एक बात बता दूं, बहुत साहसी है मेरा मित्र. सारी घुटन, दुख और अकेलेपन से वह अकेले ही जूझता रहा पर अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करने में जीजान से जुटा रहा.’’

‘‘उन्हें हुआ क्या है, डाक्टर अंकल?’’ बैंच पर अपना मुंह छिपाए बैठी सुबकती हुई मां को संभालते हुए ऋषि ने पूछा.

‘‘रक्त कैंसर.’’

‘‘क्या…’’

‘‘हां, और यह बात तुम्हारे पिता लगभग 3 साल से जानते थे. अब तो यह उन का अंतिम पड़ाव है.’’

यह सुन कर तो सावित्री हक्कीबक्की रह गईं. पिछले डेढ़ साल के दौरान दीनानाथ ने सचमुच कुछ ऐसे कार्य किए थे जो शायद साधारण परिस्थितियों में वे नहीं करते. कैसे वह इन संकेतों को नहीं समझ पाई थीं. पिछले कुछ दिनों की घटनाएं उन की आंखों के आगे चलचित्र की तरह तैर रही थीं.

‘बैठो न थोड़ी देर, कहां भागी जा रही हो,’ एक दिन अपनी पत्नी को काम में व्यस्त रसोई की ओर जाते देख दीनानाथ बोले.

‘क्या करूं, गैस पर सब्जी रखी है, जल जाएगी. फिर ऋषि आता होगा, उस के लिए नाश्ता भी तो बनाना है,’ सावित्री हैरानपरेशान स्वर में बोली.

‘कभीकभार थोड़ा समय हमारे लिए भी निकाल लिया करो,’ दीनानाथ ने कुछ ऐसे अंदाज में कहा कि सावित्री उन्हें अपलक ताकती रह गई थीं. जबान से एक बोल भी नहीं फूटा था.

‘बात क्या है? मेरे लिए तो कभी समय ही नहीं रहा आप के पास, फिर आज इस तरह पास बैठने का आग्रह?’ कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद उन की जबान से कुछ शब्द फूटे थे.

‘अरे, कुछ नहीं, तुम तो यों ही बाल की खाल निकालने लगती हो. जोओ, गैस बंद कर आओ. कुछ जरूरी बात करनी है,’ दीनानाथ मुसकराए थे.

‘ठीक है, अभी 2 मिनट में आई,’ कहती हुई सावित्री फुरती से गईं और गैस बंद कर के उन के पास आ बैठीं.

‘इस शुक्रवार को कुछ मेहमान आने वाले हैं. मैं चाहता हूं उन के स्वागतसत्कार में कोई कमी न रह जाए,’ सावित्री के बैठते ही दीनानाथ बोले.

‘ऐसे कौन से मेहमान हैं, जिन के बारे में मुझे पता नहीं है?’ सावित्री के स्वर में आश्चर्य झलक रहा था.

‘अपनी ऋचा को देखने कुछ लोग आ रहे हैं. घरवर दोनों ही बहुत अच्छे हैं.’

‘क्या कह रहे हैं आप? ऋचा को देखने? आप तो अच्छी तरह जानते हैं कि ऋचा कभी तैयार नहीं होगी. आप को तो पता है कि वह डाक्टर बनना चाहती है. वह बचपन से यही सपना देखती आई है. अब एकाएक मैं कैसे कह दूं कि पढ़ाईलिखाई को तिलांजलि दे कर घरगृहस्थी में मन रमाओ…’’ सावित्री का स्वर न चाहते हुए भी रूखा हो आया था.

‘मुझे तो लगता है ऋचा से ज्यादा तुम इस विवाह के विरुद्ध हो. ऋचा विरोध भी करे तो तुम्हें उसे समझाना होगा. ऐसा अच्छा घरवर क्या भला रोज मिलता है? पढ़ाई ही करनी है न उसे तो विवाह के बाद कर लेगी. पितापुत्र दोनों ही डाक्टर हैं और उन्होंने मुझे आश्वासन दिया है कि यदि ऋचा पढ़ना चाहेगी तो वह उसे रोकेगे नहीं,’ दीनानाथ ने सावित्री को समझाना चाहा.

‘उन के कहने से क्या होता है. हमें भी तो अपनी बेटी का भलाबुरा सोच कर ही आगे कदम उठाना चाहिए. विवाह से पहले तो सब ऐसा ही कहते हैं पर बाद में सब के तेवर बदल जाते हैं. फिर विवाह के बाद उस के कंधों पर गृहस्थी का भार आ जाएगा, ऐसे में वह बेचारी क्या पढ़ाई कर पाएगी?’ सावित्री के स्वर में नाराजगी साफ झलक रही थी.

‘ऋचा नाराज होगी, यह तो मैं जानता था पर तुम से इतने विरोध की आशा नहीं थी. क्या मुझ पर विश्वास नहीं रहा तुम्हें?’ दीनानाथ धीरे से मगर दृढ़ स्वर में बोले थे.

‘मैं ने ऐसा कब कहा, और आप पर विश्वास न होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता,’ सावित्री का गला भर आया था.

‘तो मेरी बात मान लो और ऋचा को इस विवाह के लिए मनाने का काम भी तुम्हारा है.’

‘कोशिश करूंगी, मैं कोई आश्वासन नहीं दे सकती. मैं अपनी बेटी की आंखों में आंसू नहीं देख सकती,’ नाराज सावित्री उठीं और रसोई की ओर चली गईं. दीनानाथ एक फीकी सी मुसकान फेंक शून्य में ताकते बैठे रह गए थे.

रात को डाइनिंग टेबल पर ऋचा को न देख कर दीनानाथ ने पूछा, ‘ऋचा कहां है?’

‘बैठी रो रही है बेचारी अपनी नियति पर. वैसे भी उस के बिना ही खाने की आदत डाल लो तो अच्छा रहेगा,’ सावित्री बोलीं.

‘यह क्या तमाशा है? ऋषि, जाओ ऋचा को बुला कर लाओ,’ दीनानाथ ने अपने पुत्र को आदेश दिया. फिर वह सावित्री से मुखातिब हुए, ‘देखो, मैं ने तुम्हें पहले ही समझा दिया था कि मैं ने ऋचा के विवाह का निर्णय ले लिया है और मैं चाहता हूं कि तुम इस में मेरा साथ दो जिस से कि सबकुछ शांति से निबट जाएं.’

तभी ऋषि के साथ ऋचा आ गई तो वह बोले, ‘बैठो और खाना खाओ. देखो बेटी, घर के वातावरण को तनावमुक्त रखने की जिम्मेदारी हम सब के कंधों पर है और मैं नहीं चाहता कि तुम कुछ भी ऐसा करो जिस से मेरी परेशानी बढ़ जाए,’ उन्होंने इतनी दृढ़ता से कहा था कि सब चुप रह गए थे.

फिर तो उन्होंने किसी के विरोध की चिंता किए बिना ऋचा का विवाह कर दिया था.

उस के बाद उन्होंने जिद ठान ली थी कि गांव की जमीनजायदाद बेच कर शहर में मकान बनवाना है. उन की एक ही रट थी कि कौन देखभाल करेगा गांव की जायदाद की. सावित्री ने भरसक विरोध किया था फिर भी दीनानाथ नहीं माने थे.

मगर आज उन्हें अपने पर पछतावा हो रहा था. दीनानाथ ने समय पर प्रबंध न किया होता तो परिवार के पास सिर छिपाने के लिए छत भी न होती और फिर ऋषि का विदेश में उच्चशिक्षा का विरोध करते हुए उन्होंने सारे परिवार की नाराजगी झेली थी. ऋषि ने तो उन से बोलना तक बंद कर दिया था. सावित्री ने भी तो पति को पत्थर दिल बता कर मुंह मोड़ लिया था.

‘‘ऋषि,’’ वह बेटे को गले लगा कर बिलख रही थीं, ‘‘आज मुझे समझ आ रहा है कि वह तेरे विदेश जाने के इतने विरुद्ध क्यों थे.’’

‘‘कुछ मत कहो, मां. मैं तो स्वयं पर ही शर्मिंदा हूं. समझ नहीं आ रहा इस पितृऋण को मैं कैसे उतारूंगा,’’ ऋषि का चेहरा आंसुओं से भीग गया.

‘‘दीनानाथजी को होश आ गया है. आप लोगों को बुला रहे हैं,’’ तभी डा. सुदर्शन ने आ कर बताया.

‘‘अरे, तुम लोग रो रहे हो? देखो मैं ने भरपूर जीवन जिया है फिर मैं तो खुशहाल हूं कि मुझे इतना समय तो मिला जो मैं तुम लोगों के लिए जरूरी प्रबंध कर सका. ऋचा के लिए मैं अब बहुत खुश हूं. डाक्टर बनने का उस का सपना अब केवल सपना ही नहीं रहेगा. हां ऋषि, तुम्हारा मैं अपराधी जरूर हूं. मगर देखो बेटे, तुम्हारी इच्छा पूरी करने के लिए सारे परिवार का भविष्य दांव पर लगाना पड़ता और वह खतरा मैं उठाना नहीं चाहता था.

‘‘सच कहूं तो मैं थोड़ा स्वार्थी हो गया था. मैं नहीं चाहता था कि मेरे बाद तुम्हारी मां निपट अकेली रह जाए,’’ दीनानाथ का स्वर इतना धीमा था मानो कहीं दूर से आ रहा हो.

‘‘पापा, मुझे और शर्मिंदा मत कीजिए. आशीर्वाद दीजिए कि मैं भी आप की तरह साहसी बन सकूं,’’ ऋषि उन का हाथ अपने हाथों में थामते हुए बोला.

‘‘बेटा, तुम्हारी मां के लिए मैं कुछ विशेष नहीं कर सका, उस का भार मैं तुम्हारे कंधों पर छोड़ रहा हूं. और सावित्री, वादा करो, तुम रोओगी नहीं. याद रखना, मुझे आंसुओं से नफरत है,’’ कहते हुए दीनानाथ ने पुन: शांत हो कर आंखें मूंद लीं.

सावित्री और ऋषि अपने आंसुओं को रोकने का प्रयत्न कर रहे थे.  Family Story 

Social Story In Hindi : लांगो पंडित – पंडितजी की कट्टरपंथी उन्हीं पर पड़ गई भारी

Social Story In Hindi : जन्म से ही पैर टेढ़े थे. गांव में इस ऐब को ग्रहण लगना कहते हैं और ऐसे को ‘ग्रहण लगुआ’ कहा जाता है. बचपन में साथ खेलने वाले बच्चे और बड़े होने पर साथ पढ़ने वाले सहपाठी उन्हें लंगड़ालंगड़ा कह कर चिढ़ाया करते थे. मांबाप ने बड़े प्रेम से नाम रखा चंदन त्रिवेदी.

पिता बलदेव त्रिवेदी 3 भाई थे. चचेरे भाईबहन तो कई थे पर बलदेवजी के 2 ही पुत्र हुए- चंदन और बसंत. चंदन लंगड़ा तो था पर पढ़ने में अच्छा निकला, साथ ही, शैतानी में भी तेज था. धूर्तता, चापलूसी, डींगें हांकने इत्यादि गुणों में भी अव्वल निकला. सभी हंसते कि लंगड़ा है तब ऐसा है, कुदरत ने दोनों पैर ठीक रखे होते तो दुनिया को ही बेच देता. स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद उस ने कंपीटिशन दिए, केंद्रीय सरकार का कर्मचारी बन गया और शहर में ही नौकरी लग गई. बसंत के लिए पढ़ाई मानो पहाड़ थी.

हां, उस में तोता रटंत की क्षमता कुछ ज्यादा ही थी और वह पिता के साथसाथ पुरोहिताई में लग गया. समय पर बलदेव पंडित ने अपने दोनों पुत्रों का विवाह किया. पोतेपोतियों का मुख देख उन्हें गोद में खिला कर चल बसे. उन की पत्नी भी कुछ वर्षों बाद दुनिया छोड़ गईं.

बचपन में हुआ नामकरण नौकरी में आगे चल कर साथियों द्वारा लांगो पंडित में बदल गया. इस के पीछे की कहानी यह है कि चंदन बाबू के कार्यालय में एक दिन उन के गांव का एक मित्र कुछ कार्यवश जा पहुंचा. लांगो पंडित ने कार्यालय में अपनी विद्वत्ता और परिवार के बड़प्पन की हवा फैला रखी थी और सबों से कह रखा था कि सभी उन्हें आचार्यजी के नाम से जानते हैं. बेचारे साथी ने चंदन बाबू का पुराना पुकारू नाम ले कर उन से मिलना चाहा तो कोई उसे कुछ नहीं बता पाया. उस सरल हृदय ने सरलता से बखान किया कि वह अपने मित्र ‘लांगो पंडित’ से मिलना चाहता है जिस का जन्म से ही पैर खराब है, वह इस तरह से चलता है. ऐसा कहते हुए उस ने लांगो पंडित के चलने के ढंग की नकल कर के लोगों को दिखाई. लोग हंस पड़े और उन्हें यह सम?ाते देर न लगी कि यह उन के साथी तथा कथित आचार्यजी हैं.

मित्र से मिला आचार्यजी का यह नया नाम जल्दी ही कार्यालय से हो कर पूरे विभाग में सबों की जबान पर जा चढ़ा. सामने तो नहीं पर पीठपीछे उन्हें अब सभी लांगो पंडित के ही नाम से संबोधित करने लगे.

आचार्यजी में कई गुण भी थे. काम करने और बहस करने में वे कभी पीछे नहीं हटा करते. किसी भी विषय पर अपनी सलाह देना उन की आदत बन चुकी थी. हवा के पुल बांधना और सामने वाले को दिन में रात का आभास करा देना उन के बाएं हाथ का खेल था. अपने सामने किसी को नहीं बोलने देना, खुद की प्रशंसा करते न थकना और आवश्यकता पड़ने पर सामने वाले के सामने स्वयं को बेहद दीनहीन होने का एहसास करा देना उन का विशेष गुण था.

सांस्कृतिक मामलों में वे बड़े कड़क थे. बालभर भी कोई आगेपीछे हटा नहीं कि उन की आलोचना का शिकार हुआ. उन के अनुशासन का दायरा उन के इर्दगिर्द घूमा करता चाहे वह उन का कार्यस्थल हो या फिर घर. एकएक कर उन की 4 संतानें हुईं. पहली दोनों लड़कियां थीं और फिर 2 लड़के. नौकरी छोटी थी और आवश्यकताएं उस से कहीं ज्यादा, इसलिए हमेशा कोशिश करते रहते कि कहीं से कुछ प्राप्त कर सके.

सभी तरह के कर्मकांड और पूजापाठ भी करवाया करते. पहनावे में धोतीकुरता, ललाट पर चंदनटीका और पैरों में बढि़या ब्रैंड की सब से सस्ती वाली चप्पलें. जाड़े के दिनों में चप्पलों की जगह जूता ले लेता. लोग उन की चप्पल पर टीकाटिप्पणी करते तो कहते, ‘मु?ो तो इसे छोड़ कर कोई दूसरी चप्पल पसंद ही नहीं आती.’

‘आचार्यजी, अब थोड़ा अपनेआप को बदलिए. कुछ दिनों में कंपनी इस चप्पल को बनाना ही बंद कर देंगी.’

‘अरे, आचार्यजी, इतना कमाते हैं. कमीज में चिप्पी…’ कोई व्यंग्य करता और वे बात काट कर कहते, ‘‘कपड़ों से क्या फर्क पड़ता है. आदमी का व्यक्तित्व तो उस के संस्कार से ही झलकता है. फिर मैं तो जन्मजात ब्राह्मण हूं. पूजापाठ और संस्कार तो मेरे रगरग में रचाबसा है. थोड़े में संतोष करना चाहिए. जीवन तो गरीबगुजारे का नाम है.’’

उन की भाषणबाजी चल ही रही होती कि कोई उन्हें चिढ़ा देता, ‘अरे भाई आचार्यजी तो फिर केवल तनख्वाह से संतोष क्यों नहीं करते, पूजापाठ और दानदक्षिणा, सब ढंग से क्यों बटोरते हैं?’

‘पूजापाठ कराना और दानदक्षिणा लेना यह तो ब्राह्मण का काम है. मैं नहीं कराऊंगा तो कौन कराएगा, दूसरे तो नहीं कराएंगे न…’ बात आईगई हो जाती, वे फिर से अपना दुखड़ा सुनाने लग जाते या कोई दूसरी बात निकल आती.

इन्हीं दिनों उन्होंने अपनी बड़ी बेटी का विवाह तय कर दिया. उन का भरसक प्रयास रहा कि चमकदमक में कोई कमी न रहे. लोगों से उन्होंने बताया कि उन का होने वाला दामाद एक सरकारी उपक्रम में इंजीनियर है और दिल्ली में है. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि बरात में आए एक व्यक्ति की रिश्तेदारी कार्यालय के कर्मचारी से थी और लांगो पंडित की ढोल की पोल खुल गई. उसी ने बताया कि लड़का मामूली क्लर्क है. आने वाले कई दिनों तक लोग मुंह छिपा कर हंसते रहे. कुछ उन से खोदखोद कर पूछते भी रहे. लांगो पंडित के चेहरे पर मुर्दनी और क्रोध दोनों छाए रहे.

अभी 15 दिन ही गुजरे होंगे कि कार्यालय के एक कर्मचारी की बेटी ने अपने किसी सहकर्मी से अंतर्जातीय विवाह रचा लिया. लांगो पंडित के लिए तो मानो दाल में छौंक लग गई. उठतेबैठते, हर जगह इस प्रकरण को कुछ इस भांति उछालते कि उन के हाथ अलाउद्दीन का चिराग लग गया हो. आलोचना करते, अपनी संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देते और घुमाफिरा कर बात स्वयं पर ले आते. गर्व से कहते, ‘‘लोग मेरी बात करते हैं. अब अपने गिरेबान में झांक कर देखें.’’

‘‘अरे, आचार्यजी, समय बदल रहा है. पुराने समय में कौन सी जाति व्यवस्था थी?’’

‘‘अब तो समय के साथ सब टूट रहा है,’’ दूसरे ने कहा.

‘‘कैसे नहीं थी, जरा हम भी तो सुनें?’’

‘‘मनुष्य आदिमानव ही तो था.’’

‘‘किस युग की बात कर रहे हैं, आप? अब हमआप सब पढ़ेलिखे हैं.’’

‘‘आचार्यजी, यह बताइए कि कल आप की पुत्री या पुत्र…’’

‘‘मैं कहता हूं ऐसा हो ही नहीं सकता, असंभव.’’ बात काटते हुए वे बोल उठे.

‘‘मान लीजिए कि यदि आप के यहां ही ऐसा हो गया तो?’’ एक और साथी ने उन्हें फिर से कुछ कहने का प्रयास किया.

‘‘आप कुछ भी कह देंगे और कोई मान जाएगा?’’ वाकयुद्ध छिड़ गया और लोग बीचबचाव करने लगे. रहीसही कसर भी उस दिन पूरी हो गई जिस दिन उन की भिड़ंत उस साथी से हो गई जिस की पुत्री ने अंतर्जातीय विवाह किया था. जम कर तूतू मैंमैं हुई. मुंहफट तो वे थे ही, सीधी तरह किसी को कुछ कह देना उन के लिए कठिन नहीं था, इसलिए एक ही ?ाटके में पूरे औफिस को लपेटे में लेते हुए कहा, ‘‘मेरी बेटी की शादी में तो ऐसी कोई बात नहीं थी पर आप के साथसाथ सबों ने चटखारे लेले कर बखान किया. खूब व्यंग्यबाण चलाए, अब मेरी बारी है…’’

लोगों ने दोनों को शांत कराया और सम?ाया कि एकदूसरे पर कोई कुछ न बोले, यही अच्छा रहेगा. सबों का अपना व्यक्तिगत जीवन है और किसी को उस में ताकझांक करने का कोई अधिकार नहीं. आचार्यजी की दूसरी पुत्री थोड़ी कम खूबसूरत थी. इसलिए उस के विवाह में उन्हें काफी दौड़धूप करनी पड़ी. वर्षभर बाद उन्होंने उस का भी विवाह कर दिया. लोगों को उन्होंने बताया कि उन का दामाद एक मल्टीनैशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत है. बात जो भी रही हो लेकिन किसी को भी उन की बातों पर विश्वास नहीं हुआ.

6 माह गुजरे थे कि आचार्यजी ने एक दिन सबों को प्रसाद में लड्डू खिलाया और बताया कि बेटे का इंजीनियरिंग का कोर्स पूरा हो गया है और उसे नौकरी मिल गई है. सबों ने उन्हें बधाई दी. आचार्यजी अब बेटे के विवाह के लिए लग गए. लड़की वाले भी उन के यहां रिश्ते के लिए आने लगे. सबकुछ ठीकठाक और सामान्य ढंग से चल रहा था. आचार्यजी से थोड़ा हंसीमजाक भी कभीकभी हो ही जाया करता था.

अचानक एक दिन वे कार्यालय नहीं आए. किसी का ध्यान इस पर नहीं गया पर जब 2-3 दिन गुजर गए तो कुछ लोग चिंतित हुए. जिन से उन की पटती थी, उन में से एक व्यक्ति ने उन्हें कौल लगाई पर घंटी बजती रही और कोई उत्तर नहीं मिल सका. अगले दिन उन का छोटा बेटा छुट्टी का आवेदन ले कर आया, तब लोगों को पता चला कि वे बीमार हैं और आज ही सुबह उन्हें एक नर्सिंग होम में भरती किया गया है. लोगों ने तय किया कि उन्हें देखने तो जाना ही चाहिए. 2 दोस्तों से उन की गहरी मित्रता थी. वे दोनों उन्हें देखने गए.

आचार्यजी बैड पर लेटे हुए थे. उन की आंखें शून्य में निहार रही थीं. दोस्तों ने उन से जानना चाहा कि उन की तबीयत कैसी है और उन्हें क्या कष्ट है? उन्होंने एक बार उन की तरफ देखा, उन के होंठ फड़फड़ाए पर वे कुछ नहीं कह सके. पंडिताइन लंबा घूंघट निकाले थीं. वे गांवगंवई की सरल हृदय महिला थीं और उन्हें ज्यादा कुछ समझ में नहीं आता था. वे भी कुछ नहीं बता सकीं. उन का छोटा बेटा वहां नहीं था. डाक्टर के कक्ष में बैठे जूनियर डाक्टर ने बताया कि आचार्यजी का ब्लडप्रैशर अचानक ही बढ़घट रहा है और उन्हें डिप्रैशन यानी गहरा सदमा लगा है. उसी समय उन का छोटा बेटा लौट आया. उसी ने बताया कि दोनों में से कोई भी बड़ी बहनें अभी तक नहीं आ सकी हैं.

‘‘क्या इसी कारण वे सदमे में हैं?’’

‘‘तुम्हारा बड़ा भाई क्यों नहीं आया अभी तक?’’

‘‘भैया के कारण ही तो पापा डिप्रैशन में हैं,’’ हठात ही उस के मुंह से निकल गया.

‘‘वह कैसे?’’

‘‘अब क्या बताऊं, पापा ने किसी को कुछ बताने से मना किया था. भैया से पापा की बीमारी के विषय में कह दिया है,’’ वह सिसकने लगा.

‘‘बात क्या है, कुछ पता तो चले. हम लोगों से जो हो सकेगा, उतना तो मदद करेंगे ही.’’

‘‘घर की बात है. आप लोग किसी से न कहिएगा, वरना लोग मुझे… दरअसल, भैया ने ईसाई लड़की से विवाह कर लिया है.’’ Social Story In Hindi

Romantic Story In Hindi : तीन शब्द – राखी से वो तीन शब्द कहने की हिम्मत क्या जुटा पाया परम ?

Romantic Story In Hindi : परम आज फिर से कैंटीन की खिड़की के पास बैठा यूनिवर्सिटी कैंपस को निहार रहा था. कैंटीन की गहमागहमी के बीच वह बिलकुल अकेला था. यों तो वह निर्विकार नजर आ रहा था पर उस के मस्तिष्क में विगत घटनाक्रम चलचित्र की तरह आजा रहे थे.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के नौर्थ कैंपस की चहलपहल कैंपस वातावरण में नया उत्साह पैदा कर रही थी. हवा में हलकी ठंडक से शरीर में सिहरन सी दौड़ रही थी. दोस्तों के संग कैंटीन के बाहर खड़े हो कर आनेजाने वाले छात्रों को देख कर परम सोचने लगा कि टाइमपास का इस से अच्छा तरीका और क्या हो सकता है.

संकोची स्वभाव के परम ने जब पहली बार उसे देखा था तो एक अजीब सी झुरझुरी उस के शरीर में दौड़ गई थी. राखी, हां, यही नाम था उस का. वह भी तो उसी क्लास की छात्रा थी, जिस में परम पढ़ता था.

क्लास में कभी जब चाहेअनचाहे दोनों की निगाहें मिलतीं तो परम बेचैन हो उठता और चाहता कि वह उस के सामने खड़ा हो कर बस, उसे ही निहारता रहे.

कई बार परम ने राखी के समक्ष खुद की भावनाएं व्यक्त करने का प्रयास किया पर उस का संकोची स्वभाव आड़े आ जाता था. एक दिन संकोच को ताक पर रख कर उस ने उस का नाम मालूम होने पर भी अनजान बनते हुए पूछ लिया था, ‘‘क्या मैं आप का नाम जान सकता हूं?’’

हलकी मुसकराहट के साथ उस ने उत्तर दिया था, ‘‘राखी.’’

मात्र नाम जानने से ही परम को ऐसा लगा कि जैसे उस ने पूरा जीवन जी लिया. वह जड़वत उस एक शब्द को प्रतिध्वनित होते हुए महसूस कर रहा था.

कुछ समय बाद कालेज की ओर से छात्रों का समूह शैक्षणिक भ्रमण पर शिमला जा रहा था. परम के मित्र संदीप और चंदर ने कई बार परम को भी चलने के लिए कहा पर वह मना करता रहा, लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि राखी भी जा रही है, एकाएक उस ने भी हामी भर दी.

बस की यात्रा के दौरान हंसीमजाक के दौर के बीच उसे राखी से बात करने का मौका मिल ही गया. सादगी की प्रतिमूर्ति राखी भी उस की बातों में दिलचस्पी लेती नजर आई तो उस का हौसला और बढ़ गया. चीड़ और देवदार के पेड़ों से आती खुशबू ने मानो उस के मन को भांप लिया था और पूरे मंजर को खुशनुमा बना दिया था.

‘‘आप बहुत कम बोलती हैं?’’

‘‘जी, ऐसी तो कोई बात नहीं है,’’ और फिर बातों का सिलसिला आरंभ हो गया.

परम ने महसूस किया कि राखी भी उस के नजदीक आने का प्रयास कर रही थी. ज्यादातर दोस्त अपनेअपने चाहने वालों में मस्त थे. अनजाने में परम ने राखी के हाथ को हलके से क्या छू लिया उसे ऐसा लगा कि जैसे उस ने सारा जहां पा लिया हो.

लौटते समय दोनों एकसाथ बैठे. औपचारिक वार्त्तालाप खत्म होते ही दोनों एकदूसरे से बहुत कुछ कहना चाहते थे, पर जबान साथ नहीं दे रही थी. गंभीर खामोशी के बीच अनवरत एकदूसरे को निहारते हुए परम और राखी चुप रहने के बाद भी आंखों से मानो सबकुछ कह रहे थे. इस खामोशी की आवाज दोनों के दिलों में गहरे तक उतरती जा रही थी.

शिमला से वापस लौटने के बाद कैंपस में वे अब साथसाथ नजर आने लगे. कैंटीन, लाइबे्ररी व कैंपस के पार्क उन की उपस्थिति के गवाह थे. बिना आवाज का यह सफर एक निष्कर्षहीन सफर था. उन दोनों के मध्य खामोशी ही उन की आवाज बन गई थी. खामोश रह कर सबकुछ कह देने का उन का अंदाज निराला था.

वे शांत बहती नदी की तरह ही थे. उन के दिल के हाल से प्रकृति भी खासी परिचित होती जा रही थी. पेड़, पत्ते, नदी, फूलों पर मंडराती तितलियां, सब ने ही तो उन के बारे में बातें करना शुरू कर दिया था.

कालेज कैंपस में उन के भविष्य को ले कर चर्चाएं आम होती जा रही थीं और वे स्वयं खयालों में डूबे एकदूसरे के पूरक बनते जा रहे थे.

शब्दों के बिना की अभिव्यक्ति यों तो सशक्त होती है पर कुछ भाव तो शब्दों के बिना व्यक्त हो ही नहीं सकते. कितना कठिन होता है केवल ‘3 शब्द’, ‘आई लव यू’ कहना.

यों तो वे खामोश रह कर भी हर पल यही दोहराते थे, पर उन दोनों के मध्य ये 3 शब्द तो थे, पर उन में आवाज नहीं थी. शायद वे दोनों किसी खास पल, खास माहौल का इंतजार कर रहे थे, जब इन शब्दों को मूर्त रूप दिया जा सके.

छुट्टियों के एक लंबे अंतराल के बाद इन 3 शब्दों के अभाव ने 5 शब्दों का प्रादुर्भाव कर दिया, ये 5 शब्द थे, ‘राखी की शादी हो गई.’ और फिर राखी लौट कर नहीं आई.

कैंटीन में बैठे हुए विगत को निहारते हुए परम ने खुद के हाथ का दूसरे हाथ से स्पर्श किया, जिस ने पहली बार राखी के हाथों का स्पर्श किया था, गहरे विषाद ने उस के अंतर्मन को झकझोर दिया. आखिर एक लंबे अरसे के बाद वह इस स्थान पर अकेला बैठा था. आज उस के साथ राखी नहीं थी.

एकांत में बैठा परम बारबार उन 3 शब्दों का उच्चारण कर रहा था, पर उसे सुनने वाला कोई नहीं था. अगर उस ने समय पर हिम्मत दिखाई होती तो चाहे जो होता, आज उसे गिला तो नहीं होता. वह कोने में यों अकेला तो न बैठा होता.  Romantic Story In Hindi 

Family Story In Hindi : अपनी मंजिल – अमिता ने क्यूं चुना ये रास्ता?

Family Story In Hindi : अमिता रात को पुरानी बातें याद करने लगती है.होस्टल में पलीबढ़ी अमिता के मम्मीपापा का तलाक हो चुका था. हर साल छुट्टियों में वह घर न जा कर कहीं न कहीं कैंप में चली जाती और पापा भी उसे भेजने को राजी हो जाते.

हालांकि पापा उसे बहुत प्यार करते थे, पर मां की कमी उसे महसूस होती. इस बार छुट्टियों में आतंकवादी गतिविधियों के कारण उन का कैंप रद्द हो गया तो वह पापा को सरप्राइज देने के लिए अकेली ही दिल्ली चली गई. पापा उसे देख कर पसोपेश में पड़ गए. तभी एक युवती से उस का सामना हुआ. तब उसे पता चला कि उन्होंने तो शादी कर के दुनिया ही बसाई हुई है. वह उलटे पांव वहां से लौट गई. अमिता फिर अपनी मां के पास कानपुर चली गई. अब आगे…

अमिता के सामने एक पल में सारा संसार सुनहरा हो गया. मां कभी बच्चे से दूर नहीं जा सकती. पापा ने बहुत कुछ किया पर मां संसार में सर्वश्रेष्ठ आश्रय है.

‘इतने दिनों के बाद मेरी याद आई तु झे?’ उन्होंने फिर चूमा उसे.

‘चल…अंदर चल.’

‘बैठ, मैं चाय बनाती हूं.’

बैग को कंधे से उतार कर नीचे रखा और सोफे पर बैठी. घर में पता नहीं कौनकौन हैं? वे लोग उस का आना पता नहीं किसकिस रूप में लेंगे. मम्मी अपनी हैं पर बाकी से तो कोई रिश्ता नहीं, तभी अमिता चौंकी. अंदर कर्कश आवाज में कोई गरजा.

‘8 बज गए, चाय बनी कि नहीं.’

‘बनाती हूं, बिट्टू आई है न इसलिए देर हो गई.’

‘कौन है यह बिट्टू? सुबह किसी के घर आने का यह समय है क्या?’

‘धीरे बोलो, वह सुन लेगी. मेरी बेटी है अमिता,’ मां के स्वर में लाचारी और घबराहट थी.

‘तुम्हारी बेटी, वह होस्टल वाली न. मेरे घर में यह सब नहीं चलेगा. जाने के लिए कह दो.’

‘अरे, मु झ से मिलने आई होगी. 2-4 दिन रहेगी फिर चली जाएगी पर तुम पहले से हल्ला मत करो.’

मां के शब्दों में अजीब सी याचना और विनती थी. आंखों के सामने उजली सुबह स्याह हो गई. ये उस को नहीं रखेंगे तो अब क्या करेगी? पापा होटल में रख रहे थे वह फिर भी अच्छा था. किसी की दया का पात्र तो नहीं बनती.

परीक्षाफल आने में अभी पूरा एक महीना पड़ा है. उस के बाद ही तो वह कहीं नौकरी तलाश कर सकती है पर तब तक का समय? होस्टल खुला होता तो लौट जाती. वहीं कोई छोटामोटा काम देख लेती पर कानपुर तो नई और अनजान जगह है. कौन नौकरी देगा?

तभी सुनीता ट्रे में रख कर चाय ले आईं. पीछेपीछे एक गैंडे जैसा आदमी चाय पीता हुआ लुंगी और बनियान में आ गया. लाललाल आंखें, मोटे लटके होंठ, डीलडौल मजदूरों जैसा, भद्दा हावभाव. उस की आंखों के सामने सौम्य, भद्र व्यक्तित्व वाले उस के पापा आ गए. मम्मी की रुचि इतनी विकृत हो गई है. छि:.

‘चाय ले, ये सतीशजी हैं मेरे पति.’

मन ही मन अमिता ने सोचा यह आदमी तो पापा के चपरासी के समान भी नहीं है. उस ने बिना कुछ बोले चाय ले ली. गैंडे जैसे व्यक्ति ने स्वर को कोमल करते हुए कहा, ‘अरे, तुम मेरी बेटी जैसी हो. हमारे पास ही रहोगी.’

सुनीता का चेहरा खुशी से खिल उठा.

‘यही तो मैं कह रही थी. तेरे 2 छोटे भाई भी हैं. अच्छा लगेगा तु झे यहां.’

अमिता उस व्यक्ति की आंखों में लालच और भूख देख सिहर उठी. बिना सोचेसम झे वह कहां आ गई. मम्मी खुशी से फूली नहीं समा रहीं.

‘चाय समाप्त कर, चल तेरा कमरा दिखा दूं. साथ में ही बाथरूम है. नहाधो कर फ्रैश हो ले. मैं नाश्ता बनाती हूं. भूख लगी होगी.’

सुनीता बेटी को उस के कमरे मेें छोड़ आईं. मां के बाहर जाते ही उस ने अंदर से कुंडी लगा ली. उस की छठी इंद्री उसे सावधान कर रही थी कि वह यहां पर सुरक्षित नहीं है. उस का मन पापा का संरक्षण पाने के लिए रो उठा.

नहाधो कर अमिता बाहर आई तो 2 कालेकलूटे, मोटे से लड़के डाइनिंग टेबल पर स्कूल ड्रैस में बैठे थे. अमिता को दोनों एकदम जंगली लगे. सतीश नाश्ता कर रहा था. उसे फिर ललचाई नजरों से देख कर बेटों से बोला, ‘बच्चो, यह तुम्हारी दीदी है. अब हमारे साथ ही रहेगी और तुम लोग इस से पढ़ोगे,’ फिर पत्नी से बोला, ‘सुनो सुनीता, आज से ही टीचर की छुट्टी कर देना.’

‘टीचर की छुट्टी क्यों?’

‘अब इन बच्चों को यह पढ़ाएगी. 500 रुपए महीने के बचेंगे तो इस का कुछ तो खर्चा निकलेगा.’

अमिता ने सिर झुका लिया. सुनीता लज्जित हो गईं.

अमिता ने इस से पहले इतने भद्दे ढंग से बात करते किसी को नहीं देखा था और मम्मी यह सब  झेल रही हैं. जबकि यही मम्मी पापा का जरा सा गरम मिजाज नहीं  झेल सकीं और इस मूर्ख के आगे नाच रही हैं. उन की जरा सी जिद पर चिढ़ जाती थीं और अब इन दोनों जंगली बच्चों को  झेल रही हैं और चेहरे पर शिकन तक नहीं है. यही मम्मी हैं कि आज सतीश को खुश करने में कैसे जीजान से लगी हैं जबकि पापा की नाक में दम कर रखा था.

एक खटारा सी मारुति में दोनों बेटों को ले कर सतीश चला गया. बच्चों को स्कूल छोड़ खुद काम पर चला जाएगा. लंच में आते समय ले आएगा. सुनीता ने फिर 2 कप चाय का पानी चढ़ा दिया.

अमिता को अब मां से बात करना भी अच्छा नहीं लग रहा था. इस समय वह अपने भविष्य को ले कर चिंतित थी.

‘तू तो लंबी छुट्टी में कैंप में जाती थी… इस बार क्या हुआ?’

‘कैंप रद्द हो गया. जहां जाना था वहां माओवादी उपद्रव मचा रहे हैं.’

‘पापा के पास नहीं गई थी?’

अमिता को लगा कि हर समय सही बात कहना भी मूर्खता है. इसलिए वह बोली, ‘नहीं, अभी नहीं गई.’

‘तू ने कब से अपने पापा को नहीं देखा?’

‘क्या मतलब, हर दूसरेतीसरे महीने हम मिलते हैं.’

यह सब जान कर सुनीता बु झ सी गईं.

‘अच्छा, मैं सोच रही थी कि बहुत दिनों से…’

‘होस्टल का खर्चा भी कम नहीं. पापा ने कभी हाथ नहीं खींचा,’ बेटी को अपलक देखती हुई सुनीता कुछ पल को रुक कर बोलीं, ‘अब तो तू अपने पापा के साथ रह सकती है?’

अमिता ने सीधे मां की आंखों में देखा और पूछ बैठी, ‘क्यों?’

सुनीता की नजरें  झुक गईं. उन्होंने मुंह नीचा कर मेज से धूल हटाते हुए कहा, ‘मेरा मतलब…अब पढ़ाई तो पूरी हो गई, तुम्हारे लिए रिश्ता देखना चाहिए.’

अमिता के मन में कई बातें कहने की इच्छा हुई कि तुम तो बच्ची को एक  झटके में छोड़ कर चली आई थीं. 12 साल में पलट कर भी नहीं देखा. अब बेटी के रिश्ते की चिंता होने लगी? पर अपने को संभाला. इस समय उस के पैरों के नीचे जमीन नहीं है. आगे के लिए बैठ कर सोचने के लिए एक आश्रय तो चाहिए. अत: वह चुप ही रही. इस के बाद सुनीता ने बातचीत चालू रखने का प्रयास तो किया पर सफल नहीं हो पाईं. बेटी उठ कर अपने कमरे में चली गई.

ठीक 2 बजे सतीश अपनी खटारा गाड़ी में दोनों बच्चों को ले कर वापस आया. अमिता को फिर अपने पापा की याद आई. वह सारा दोष पापा को नहीं देती है. ढलती उम्र में स्त्री अकेली रह लेती है पर आदमी के लिए रहना कठिन है. वह कुछ सीमा तक असहाय हो जाता है. पापा का दोष इतना भर है कि अपनी पत्नी से बेटी की बात छिपाई और बेटी से अपने विवाह की वरना पापा ने पैसों से कभी हाथ नहीं खींचा.

मैं ने 100 रुपए मांगे तो पापा ने 500 दिए. साल में कई बार मिलते रहे. मेरी पढ़ाई की व्यवस्था में कोई कमी नहीं होने दी. उन का व्यवहार अति शालीन है. उन के उठने, बैठने, बोलने में शिक्षा और कुलीनता साफ  झलकती है. इस उम्र में भी वे अति सुदर्शन हैं. एक अच्छे परिवार की उन में छाप है और यह भौंडा सा व्यक्ति..छि:…छि:. मां की रुचि के प्रति अमिता को फिर से घृणा होने लगी.

उसे पूरा विश्वास है कि यह व्यक्ति व्यसनी, व्यभिचारी और असभ्य है. किसी अच्छे परिवार का भी नहीं है. उस व्यक्ति का सभ्यता, शालीनता से परिचय ही नहीं है. पहले मजदूर होगा, अब सुपरवाइजर बन गया है. इस आदमी के हावभाव देख कर तो यही लगता है कि यह आदमी मां की पिटाई भी करता होगा जबकि पापा ने कभी मां पर हाथ नहीं उठाया बल्कि मम्मी ही गुस्से में घर में तोड़फोड़ करती थीं. अब इस के सामने सहमीसिमटी रहती हैं. अब इस समय अमिता को मां की हालत पर रत्तीभर भी तरस नहीं आया. जो जैसा करेगा उस को वैसा  झेलना पड़ेगा.

रात को सोने से पहले अमिता ने कमरे का दरवाजा अच्छी तरह चैक कर लिया. उसे मां के घर में बहुत ही असुरक्षा का एहसास हो रहा था. मां का व्यवहार भी अजीब सा लग रहा था.

उस ने रात खाने से पहले टैलीविजन खोलना चाहा तो मां ने सिहर कर उस का हाथ पकड़ा और बोलीं, ‘सतीशजी को टैलीविजन का शोर एकदम पसंद नहीं. इसलिए जब तक वे घर में रहते हैं हम टैलीविजन नहीं चलाते. असल में फैक्टरी के शोर में दिनभर काम करतेकरते वे थक जाते हैं.’

अमिता तुरंत सम झ गई कि टैलीविजन चलाने के लिए इस घर में सतीश की आज्ञा चाहिए. मन में विराग का सैलाब उमड़ रहा था. यहां आना उस के जीवन की सब से बड़ी भूल है. अब सहीसलामत यहां से निकल सके तो अपने जीवन को धन्य सम झेगी, पर वह जाएगी कहां? उसे याद आया कि इसी मां के धारावाहिकों के चक्कर में पापा का मैच छूट जाता था पर मम्मी टैलीविजन के सामने जमी रहती थीं.

इंसान हालात को देख कर अपने को बदलता है, पर इतना? यह सम झौता है या पिटाई का आतंक? पूरे दिन मां यही सम झाने का प्रयास करती रहीं कि सतीश बहुत अच्छे इंसान हैं. ऊपर से जरा कड़क तो हैं पर अंदर से एकदम मक्खन हैं. उस को चाहिए कि उन से जरा खुल कर मिलेजुले तभी संपर्क बनेगा.

अमिता के मन में आया कि कहे मु झे न तो यहां रहना है और न ही अपने को इस परिवार से जोड़ना है. तो फिर क्यों इस के लिए खुशामद करूं.

रात को पता नहीं कैसे चूक हो गई कि खाना खा कर अपने कमरे में आ कर अमिता को कुंडी लगाने का ध्यान नहीं रहा. बाथरूम से निकल कर बिस्तर पर बैठ क्रीम का डब्बा अभी खोला भी नहीं था कि सतीश दरवाजा धकेल कर कमरे में आ गया. अमिता को अपनी गलती पर भारी पछतावा हुआ. इतनी बड़ी भूल कैसे हो गई पर अब तो भूल हो ही गई थी. उस ने सख्ती से पूछा, ‘कुछ चाहिए था क्या?’

गंदे ढंग से वह हंसा और बोला, ‘बहुत कुछ,’ इतना कह कर वह सीधे बिस्तर पर आ कर बैठ गया, ‘अरे, भई, जब से तुम आई हो हमारा ठीक से परिचय ही नहीं हो पाया. अब समय मिला है तो सोचा जरा बातचीत ही कर लें.’

अमिता को खतरे की घंटी सुनाई दी. दोनों बेटे सोने गए हैं. मम्मी रसोई समेट रही हैं सो उन के इधर आने की संभावना नहीं है. उस के पैरों तले धरती हिल रही है. वह अमिता के नजदीक खिसक आया और उस के हाथ उसे दबोचने को उठे. अमिता की बुद्धि ने उस का साथ नहीं छोड़ा. उस ने यह जान लिया था कि इस घर में चीखना बेकार है. मम्मी दौड़ तो आएंगी पर साथ सतीश का ही देंगी. अमिता को जरा भी आश्चर्य नहीं होगा अगर मम्मी उस के सामने यह सम झाने का प्रयास करेंगी कि यह तो प्यार है, उसे बुरा नहीं मानना चाहिए.

सतीश की बांहों का कसाव बढ़ रहा था. वैसे भी उस में मजदूर लोगों जैसी शक्ति है. पर शायद सतीश को यह पता नहीं था कि जिसे मुरगी सम झ कर वह दबोचने की कोशिश में है, वह लड़की अभीअभी ब्लैकबैल्ट ले कर आई है. हर दिन कैंप से पहले 10 दिन की ट्रेनिंग खुद के बचाव के लिए होती थी.

अमिता का हाथ उठा और सतीश पल में दीवार से जा टकराया. अमिता उठी, सतीश के उठने से पहले ही उस के पैर  पूरे ताकत से सतीश के शरीर पर बरसने लगे. वह निशब्द थी पर सतीश जान बचाने को चीखने लगा. सुनीता दौड़ कर आईं. वह किसी प्रकार लड़खड़ाता खड़ा ही हुआ था कि अमिता के हाथ के एक भरपूर वार से वह फिर लुढ़क गया.

‘थैंक्यू पापा,’ अमिता के मुंह से अनायास निकला. पैसे की परवा न कर के आप ने मु झे एक अच्छे कालेज में शिक्षा दिलवाई नहीं तो मैं आज अपने को नहीं बचा पाती.’

सुनीता रोतेरोते हाथ जोड़ने लगीं, ‘बस कर बिट्टू. माफ कर दे. इन के मुंह से खून आ रहा है.’

‘मम्मी, ऐसे कुत्तों को जीना ही नहीं चाहिए,’ दांत पीस कर उस ने कहा.

‘बेटी, मेरे 2 छोटेछोटे बच्चे हैं. माफ कर दे.’

मौका देख सतीश कमरे से भाग गया. सुनीता ने अमिता का हाथ पकड़ कर उसे समझाने का प्रयास किया तो अमिता गरजी, ‘रुको, मु झे छूने की कोशिश मत करना. मेरे पापा का जीना तुम ने मुश्किल कर दिया था. अच्छा हुआ तलाक हो गया क्योंकि तुम उस सुख भरी जगह में रहने के लायक ही नहीं थीं. नाली का कीड़ा नाली में ही रहना चाहता है. आज से मैं तुम्हारे साथ अपने जन्म का रिश्ता तोड़ती हूं.’

‘बिट्टू… मेरी बात तो सुन.’

‘मु झे अब आप की कोई बात नहीं सुननी. मु झे तो अपने शरीर से घिन आ रही है कि तुम्हारे शरीर से मेरा जन्म हुआ है. तुम वास्तव में एक गिरी औरत हो और तुम्हारी जगह यही है.’

दिमाग में ज्वालामुखी फट रहा था. उस ने जल्दीजल्दी सामान समेट बैग में डाला. जो छूट गया वह छूट गया. घर से निकल पड़ी और टैक्सी पकड़ कर सीधे स्टेशन पहुंची. वह इतनी जल्दी और हड़बड़ी में थी कि उस ने यह भी नहीं देखा कि कौन सी गाड़ी है. कहां जा रही है. वह तो भला हो कोच कंडक्टर का जो इस कोच में उसे जगह दे दी.

रात भर अमिता बड़ी चैन की नींद सोई. जब आंख खुली तब धूप निकल आई थी. ब्रश, तौलिया ले वह टायलेट गई. फ्रेश हो कर लौटी. बाल भी संवार लिए थे. ऊपर की दोनों सीट खाली थीं. सामने एक वयोवृद्ध जोड़ा बैठा था. पति समाचारपत्र पढ़ रहे हैं और पत्नी कोई धार्मिक पुस्तक.

अमिता ने बिस्तर समेट कर ऊपर डाल दिया फिर सीट उठा कर आराम से बैठी. खिड़की का परदा हटा कर बाहर देखा तो खेतखलिहान, बागबगीचे यहां तक कि मिट्टी का रंग तक बदला हुआ था. यह अमिता के लिए नई बात नहीं क्योंकि हर साल वह दूरदूर कैंप में जाती थी, आसाम से जैसलमेर तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक का बदलता रंगढंग उस ने देखा है. राजस्थान  की मिट्टी से मेघालय की तुलना नहीं तो ‘गोआ’ से ‘चंडीगढ़’ की तुलना नहीं.

चाय वाले को बुला कर अमिता ने चाय ली और धीरेधीरे पीने लगी. आराम- दायक बिस्तर और ठंडक से अच्छी नींद आई थी तो शरीर की थकान काफी कम हो गई थी. सामने बैठे वृद्ध दंपती के संपूर्ण व्यक्तित्व से संपन्नता और आभिजात्यपन  झलक रहा था. देखने से ही पता चला रहा था कि वे खानदानी अमीर परिवार से हैं. महिला 60 के आसपास होंगी तो पति 65 को छूते.

इन्हें भी आजमाइए

घर में हुए पेंट की गंध दूर करने के लिए कमरे में पानी से भरी बालटी रख कर उस में खाने का सोडा डाल दें और थोड़ीथोड़ी देर में पानी बदलते रहें. गंध धीरेधीरे दूर होती जाएगी.

बरसात या नमी के कारण अलमारी में रखे कपड़ों से सीलन की महक आने लगती है. इसे दूर करने के लिए अलमारी में किसी प्लास्टिक के मग में थोड़ा सा चूना रख दें. यह पूरी रात में नमी सोख लेगा.

यदि लैदर की कुरसियों का रंग खराब हो गया हो तो उन पर अलसी के तेल की पौलिश करें.

यदि वालपेपर न चिपक रहा हो तो पेस्ट को वालपेपर के बजाय दीवार पर लगा कर वालपेपर चिपकाएं,आसानी से चिपक जाएगा.

डबल चिन या ठुड्डी पर जमा चरबी दूर करने के लिए चपटे तकिए का प्रयोग करें. ठुड्डी का व्यायाम करें. सिर को धीरेधीरे पहले दाईं ओर घुमाएं और ठुड्डी को कंधे पर ले जाएं, फिर सिर पीछे ले जाएं. फिर सिर बाईं ओर घुमाएं.

अपने बगीचे को ऐसे फूलों से सजाएं जिन में कम पानी की आवश्यकता हो. इस से पानी की बचत होगी.

यदि आप का औफिस छोटा है तो भारी फर्नीचर के बजाय केन, रौट आयरन और पार्टिकल बोर्ड फर्नीचर खरीदें. इस से औफिस बड़ा लगेगा.  Family Story In Hindi 

Social Story : सैल्फी के ताजा रेट – सैल्फी के चक्कर में भाव खाती हुई दाल

Social Story : महीनों से घर से दाल, सब्जियां गायब हैं. सुखचैन तो खैर उसी दिन से गायब हो गया था जिस दिन मोतीचूर का लड्डू आया था. चंद्रमुखी आजकल सूरजमुखी चल रही है. सूरजमुखी ने नाक में दम कर रखा है कि बहुत हो गया दालसब्जियों से मुंह छिपाना. अब और बहाने मत बनाओ. मर्द हो तो मर्द वाला करतब कर के दिखाओ. घर में तो बड़े मर्द बने फिरते हो. मगर जब बाजार से सब्जीदाल लाने को कहती हूं तो बाजार जाने से ऐसे डरते हो जैसे…

मेरे लिए न सही तो न सही, कम से कम उस के लिए ही सही, किलोआधकिलो कोई भी दाल ले ही आओ. दाल का मुंह देखे बिन अब किचन काटने को आती है. मैं तो तुम्हें पतिदेव मानती रही और तुम पति कहलाने के लायक भी नहीं. सोचा था, ‘जिंदगीभर तुम्हारे साथ मटरपनीर खाऊंगी पर तुम, अरहर तो छोड़ो, चने की दाल खिलाने के लायक भी नहीं. सच पूछो तो अब मैं अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार बहुत पछता रही हूं. इस उम्र में कहीं और जाने से भी रही.’

वैसे तो मेरे जैसा पति, पत्नी के तानों से कभी तंग नहीं आता पर पहली बार पता नहीं क्या हुआ, क्यों हुआ कि मेरे लिजलिजे अहं को पत्नी के ताने प्र्रभावित कर गए और मैं बिना एक पल गंवाए पत्नी के तानों से आहत हो गया.

जिस तरह कभी पत्नी के तानों से आहत हो कर तुलसीदास घर छोड़ कर कथाकथित प्रभु की खोज में निकले थे उसी तरह अपनी बीवी के तानों से तंग आ कर मेरा मन भी बाजार जा, दाल पाने को मचल उठा. मैं बाजार की ओर बिन सोचेविचारे, कांधे पर झोला लटकाए दाल की खोज में निकल पड़ा. अब जो होगा, देखा जाएगा. सिर दिया बाजार में, तो रेट से क्या डरना.

मुझे लगता है कि कई बार बहुत से काम बिन सोचेविचारे ही, बस रेले में करने पड़ते हैं. जो उन के बारे में यह सोचा कि इस काम को करने से पहले सोच लिया जाए तो सोचने के बाद पता चलता है कि इस काम को करने की मैं कितनी बड़ी बेवकूफी कर रहा था.

ज्यों ही बाजार के गेट से पहला कदम भीतर धरा, टांगें जवाब देने लगीं. लगा, वैराग्य की राह जैसी कठिन है बाजार की राह, बल्कि उस से भी कठिन. वैराग्य की राह से पार पाना बाजार की राह की अपेक्षा आसान है. जिस तरह जीव को माया अपने वश में कर उसे प्रभु से मिलने नहीं देती, उसी तरह बाजार के भाव उसे डरा अपनी बीवी में उठने नहीं देते.

बाजार के जलते अंगारों पर आंखें बंद कर कदम रखता, बीवी के तानों का स्मरण करता अपनी नस्ल की दाल के चरणस्पर्श करने को हुआ ही कि लाला ने हड़काते रोका, ‘‘धूर्त, क्या कर रहे हो? दाल से छेड़छाड़ करने का इरादा है क्या? पुलिस बुलवाऊं? पता नहीं कहां से चले आते हैं. छेड़छाड़ करने को अब दालें ही रह गईं इन बदतमीजों को.’’ यह कह उस ने फोन की तरफ हाथ बढ़ाया.

‘‘नहीं, मैं तो बस दाल के चरणस्पर्श कर इन का आशीर्वाद लेना चाहता था, लालाजी. इन का आशीर्वाद पा, इन्हें डोली में बिठा, अपने घर सादर ले जाना चाहता हूं,’’ मैं दास्यभाव के भक्त सा घिघियाया.

‘‘200 रुपए प्रति किलोक्राम रेट है इन का आजकल,’’ लाला ने मेरी जब में झांकते हुए पूछा, ‘‘कितनी दूं?’’

‘‘200 ग्राम दे दो भगवन,’’ मैं ने कहा तो लाला गुस्साया, ‘‘पता नहीं कहां से चले आते हैं भिखारी बाजार में. अपनी इज्जत का तो खयाल ही नहीं, दाल की इज्जत का भी खयाल नहीं रखते. किलो से कम दाल बेचना पाप है, मेरे बाप,’’ लाला ने बाजारू पापपुण्य के बीच की मायावी रेखा से अवगत कराया.

‘‘लाला, फ्री में दालसंग एक सैल्फी तो ले सकता हूं न?’’ मैं ने रिरियाते कहा तो लाला मूंछों पर ताव देता बोला, ‘‘माश दाल संग पर सैल्फी 50 रुपए, अरहर संग पर सैल्फी 60 रुपए, चने संग सैल्फी पर 40 रुपए. कहो, किस के साथ सैल्फी लेनी है?’’

मैं समझ गया, बाजार में कुछ भी फ्री नहीं है, सैल्फी भी नहीं.  Social Story

Udaipur Files : फिर विवादित विषय पर खुली एक और फाइल

Udaipur Files : आजकल हमारे गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 3 महीने में जातीय जनगणना कराए जाने की बातें जोरशोर से की जा रही हैं. गृहमंत्री ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के बारे में कहा कि यह कानून पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारतीय राष्ट्रीयता प्रदान करने के लिए बनाया गया है न कि नागरिकता छीनने के लिए.

दूसरी ओर हमारी सरकार ने मुसलमानों की वक्फ बोर्ड की जमीनें हथियाने पर कानून बनाया. इस से देशभर में मुसलमान भड़क गए और भाजपा भगवाधारियों को खुश करने में लगी रही. इसी का फायदा उठा कर कुछ कट्टरपंथियों ने मुसलमानों को भड़काना शुरू कर दिया और कहना शुरू कर दिया, ‘सिर कलम से जुदा.’ इस का असर यह हुआ देशभर में मुसलिमों द्वारा छिटपुट हिंसा भी की गई.

इसी के तहत 28 जून, 2022 को उदयपुर के एक 40 साल के दरजी कन्हैयालाल की बेरहमी से हत्या कर दी गई. यह ह्त्या धार्मिक कट्टरता के चलते हुई. यह एक ऐसी हत्या थी जिस ने पूरे देश को झकझोर दिया. हत्यारों ने घटना का वीडियो बनाया और उसे औनलाइन वितरित कर दिया. आरोपी थे मोहम्मद रियाज अख्तर और गौस मोहम्मद.

कन्हैयालाल उदयपुर के धानमंडी इलाके में दरजी की दुकान चलाते थे. उन का परिवार दुकान और रोजमर्रा की जिंदगी में ही उलझ रहता था. लेकिन एक सोशल मीडिया पोस्ट ने उन की जिंदगी बदल कर रख दी. उन्होंने भाजपा नेता रहीं नूपुर शर्मा के समर्थन में एक पोस्ट डाली थी. कन्हैया लाल ने सोशल मीडिया अकाउंट पर पैगंबर मोहम्मद साहब पर एक विवादित पोस्ट शेयर कर दी थी. इस पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताई तो पुलिस ने कन्हैयालाल को गिरफ्तार कर लिया. धमकियां मिलने पर उन्होंने सुरक्षा की मांग भी की थी.

28 जून, 2022 को 2 युवक रियाज अख्तर और गौस मोहम्मद कन्हैयालाल की दुकान पर कपड़े सिलवाने आए और बहाने से कन्हैयालाल को बुला कर धारदार हथियार से उन की हत्या कर दी.

आरोपियों को गिरफ्तार कर मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी गई. यह मामला अभी जयपुर की अदालत में लंबित है. हाईकोर्ट ने फिल्म निर्माताओं से जवाब भी मांगा है.

‘उदयपुर फाइल्स’ बस इसी घटना पर बनाई गई फिल्म है. इसे ‘ताशकंद फाइल्स’, ‘कश्मीर फाइल्स’, ‘केरला फाइल्स’, ‘बस्तर : द नक्सल स्टोरी’ जैसी कैटेगरी में गिना जा सकता है. बौलीवुड में इन जैसी फिल्मों को बनाने वाला और देखने वाला एक तबका हाल के वर्षों में उभरा है. इन फिल्मों का सिंपल सा जोड़गणित है. धार्मिक और राजनीति से देश में उभरी भावनाओं पर फिल्म बनाओ, इस में प्रचार पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ता, थोड़ा सत्ता समर्थक बन जाओ, इस से फिल्म टैक्सफ्री करवा लो. ऐसी फिल्में विवादित होती हैं तो चर्चाओं में बन ही जाती हैं.

‘उदयपुर फाइल्स’ जल्दबाजी में बनाई गई फिल्म दिखाई देती है. फिल्म को दर्शक इसलिए भी नसीब नहीं हुए क्योंकि हालफिलहाल में ही यह घटना घटी है और अधिकतर लोग इस घटना के क्रमबद्ध तरीके से वाकिफ हैं. इन घटनाओं को ड्रामेटिक अंदाज में पहले ही कई न्यूज चैनल तमाम एआई माध्यमों से दिखा चुके हैं. वहीं, इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो नया जान पड़ता है.

दरअसल, यह बात इस फिल्म के निर्देशक भी जानते हैं मगर उन्होंने बनाई है क्योंकि वे इस घटना से उपजे सांप्रदायिक तनाव और भावों का फायदा उठाना चाहते हैं. वैसे भी, आजकल सच्ची घटनाओं पर फिल्में बनने का दौर चल पड़ा है, इस में निर्देशक और पटकथा लेखक को मेहनत कम ही लगती है.

फिल्म में कहीं भी इस बात का संकेत नहीं दिया गया कि इस की जड़ भारत में तेजी से बढ़ रही सांप्रदायिक राजनीति है, जिस का जिम्मेदार मौजूदा सत्तापक्ष है. वह अलगअलग समुदायों को आपस में भड़काने वालों को आश्रय दे रहा है.

इस से पहले भी कई मौबलिंचिंग की घटनाएं घटीं, जिस में दूसरे समुदाय के लोगों को गौरक्षकों द्वारा टारगेट किया गया.

फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ टाइप बनाने की कोशिश की गई है. हालांकि फिल्म में बहुत सारे कट लगाए गए हैं. फर्स्ट हाफ तो खराब है, इंडिया, पाकिस्तान जरूरत से ज्यादा किया गया है, जो अखरता है. सैकंड हाफ में कहानी हिलाती है. सपोर्टिंग कास्ट काफी खराब है, सिर्फ कन्हैयालाल वाले सीन जानदार हैं. गाने बेकार हैं. कहानी फिल्म के साथ इंसाफ नहीं करती.

विजय राज ने बढ़िया ऐक्टिंग की है. उस के एक्सप्रैशंस बढ़िया हैं. वे आप को रुला देते हैं. रजनीश दुग्गल का काम भी अच्छा है. निर्देशन साधारण है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.  Udaipur Files

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