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Hindi Social Story: जो बोएंगे वही काटेंगे- क्रिकेट की रोशनी में ओलिंपिक की आंखें क्यों चुंधिया रही हैं?

Hindi Social Story: कुछ समय पहले की ही तो बात है जब हमारा देश रियो ओलिंपिक से मात्र 2 पदक ले कर आया तब हमारे देश तथा देश के लोग प्रसन्न हो गए. आकाश में कालेकाले मेघ छाने लगे, कुछ देर के बाद चमचमा कर बिजली भी कौंधने लगी. भयंकर गड़गड़ाहट के साथ बादल गरजने लगे और बिन मौसम बरसात भी होने लगी. इसी को कहते हैं बिन बादल बरसात होना.

बरसात साधारण नहीं थी. यह तो अलौकिक थी. ऊपर से आशीर्वाद बरस रहा था. वह भी रुपयों के रूप में. आशीर्वाद कुछ इस कदर था कि अथाह धन के मालिक, धन्नासेठ तथा बड़ेबड़े धनकुबेर भी उस के आगे नतमस्तक हो गए. यह खेल, कोई खेल नहीं था.

कहीं से रुपए बरस रहे थे तो कहीं से ईनाम, कहीं पुरस्कारों की गड़गड़ाहटी घोषणा हो रही थी और कहीं से सम्मान. रुपए ये नरम फुहारें (हजारों) नहीं थे, ये तो मूसलाधार (लाखों) भी नहीं थे, ये तो भयंकर (करोड़ों) थे. कहीं से तो बीएमडब्लू कार भी बरसी थी जैसे रूसी खिलाडि़यों पर बरसी थी.

जरा सोचिए कि अगर चांदी (सिल्वर मैडल) और तांबा (ब्रौंज मैडल) पर यह हाल है (यानी देश इतना प्रसन्न हो रहा है) तो सोने (गोल्ड मैडल) पर क्या होता, इस का अनुमान खेल टिप्पणीकार के भी बस में न होगा.

हमारे देश की जनता को सोना चाहिए, वह भी पहनने के लिए, क्योंकि सोने की चिडि़या वाले देश में सोना पहनने की आदत अति प्राचीन है. इस से कुछ फर्क नहीं पड़ता कि सोना जीता हुआ हो या खरीदा हुआ, उसे तो आम खाने से मतलब है, पेड़ थोड़े ही गिनने हैं.

पर क्या किया जाए, गरीबी से तंग आ कर प्रेमी अपनी प्रेमिका को रि?ाने के लिए किसी फिल्म की कुछ लाइनें गाता है, ‘मेरा तोहफा तू कर ले कुबूल माफ करना हुई मु?ा से भूल, क्योंकि सोने में छाई महंगाई, मैं चांदी ले आया…’ सोने के हजारोंहजार सपने देखने वाली प्रेमिका का मुंह एकदम से लाल है चांदी देख कर, क्योंकि उस के तो अभी खेलने के दिन हैं.

हर 4 साल बाद लीप ईयर आता है और फरवरी का महीना 29 दिन का हो जाता है यानी 4 वर्ष में एक दिन और बढ़ जाता है. उसी तरह 4 वर्ष बाद ओलिंपिक भी आता है. यह निश्चित तो नहीं, पर भरपूर संभावना रहती है कि एक मैडल जरूर बढ़ जाएगा.

4 वर्ष तक क्रिकेटक्रिकेट करने वाली जनता अब सोनासोना करने लगती है. आप ने अकसर देखा होगा कि बरसात आने पर पीलेपीले मेंढक धरती फाड़ कर बाहर निकल आते हैं और बरसात खत्म होते ही फिर वे शीतनिंद्रा में चले जाते हैं. अब टी-ट्वैंटी करने वाले लोग मैडलमैडल खेलने लगते हैं और भारत के प्रति उम्मीद कुछ ज्यादा होने लगती है और खेल को खेल सम?ाते हैं.

4 वर्ष तक शायद ही किसी को पता होता हो कि भारत जैसे देश में क्रिकेट के अलावा दूसरा खेल भी खेला जाता है. भारत और पाकिस्तान का जब क्रिकेट मैच हो तब आप देख लीजिए पूरे देश का उफान, इस खेल भावना (देशभावना) में ओलिंपिक का तो काफी दूरदूर तक नामोनिशान नहीं होगा.

हमारा राष्ट्रीय खेल हौकी है पर देश में क्रिकेट के प्रति इस कदर दीवानगी है कि आप भ्रमित हो जाएंगे, कहीं आप यह न सोच लें कि भारत का राष्ट्रीय खेल क्रिकेट है. मेरे अनुसार क्रिकेट को ओलिंपिक में शामिल कर देना चाहिए और भारत का राष्ट्रीय खेल क्रिकेट घोषित कर देना चाहिए अगर आप के मन में थोड़ा भी देशप्रेम हो तो.

यहां जब बच्चा पैदा होता है तो क्रिकेट का बल्ला ले कर ही पैदा होता है और जिंदगीभर चौकेछक्के लगाता रहता है. अगर खेल नहीं खेल रहा है तो टीवी, रेडियो में मैच देख कर, सुन कर अपनी मन की भड़ास निकालता रहता है. यदि भारत जीत गया तो पटाखे फोड़ता है, यदि हारा, तो टीवी.

मेरे देश के मीडिया का हाल अब क्या बताऊं, नैशनल चैनल से ले कर प्राइवेट तक और अखबारों से ले कर रेडियो तक सभी केवल एक ही राग अलापते हैं. आप सोच रहे हैं कि संगीत में ही केवल राग होता है तो आप गलत हैं. मेरे देश में तो क्रिकेट नामक राग भी है जो तानसेन के राग दीपक से भी हजार गुना तेज है. तानसेन ने तो राग दीपक को राग मेघ गा कर राग दीपक के तेज को बु?ा दिया पर इस राग

का अभी तक कोई भी तोड़ पैदा नहीं हुआ है.

मेरे देश में क्रिकेट को छोड़ कर अन्य खेलों के प्रति सौतेला व्यवहार क्यों, शायद इस का जवाब ढूंढ़ने में वर्षों का समय लग जाए पर सच बात यही है कि जो अफीम (क्रिकेट) लोगों की रगों में प्रवेश कर गया है, उसे सही करना नशामुक्ति केंद्र के डाक्टर के भी वश में न होगा.

हमारे देश का युवा जब 18 साल का होता है तब उस के मन में बस एक ही उद्देश्य रहता है या तो इंजीनियर बनेगा या डाक्टर, कुछ के मन में एयर फोर्स या आर्मी. लेकिन खेल शायद ही किसी के दिमाग में आता होगा, क्योंकि वह जानता है कि डाक्टर, इंजीनियर बनने से रोजगार मिलेगा पर वह यह जानता ही नहीं कि खेलेगा तो भी उस को रोजगार मिल सकता है मतलब जागरूकता का अभाव क्योंकि यहां तो बातबात में लोग बोलते हैं कि खेलोगे कूदोगे होगे खराब, पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब.

हमें मैडल चाहिए तो अभी से नर्सरी लगानी होगी, निचले पायदान से काम करना होगा, भरपूर रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे, जागरूकता पैदा करनी होगी तथा मीडिया को भी सब खेलों पर बराबर ध्यान देना होगा.

यह आशीर्वाद इस नर्सरी पर नरम फुहारें बन कर भी बरस जाए तो काफी होगा, तब हमें शायद ही सोने की कमी हो, तब हम सोना खरीद कर नहीं, जीत कर पहनेंगे और एक बार फिर हमारा देश सोने की चिडि़या बन जाएगा.

खेल हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण है इस से हमारा स्वास्थ्य भी ठीक रहता है. खेल हमारे मनोरंजन का साधन भी है जोकि जीवन का अभिन्न अंग है.

यदि हम खेल पर ध्यान देंगे तो कोई दुश्मन भी हम से खेल खेलने की नहीं सोच सकता और फिर कोई भी हमारा खेल बिगाड़ नहीं सकता. तब खेल मात्र हमारा मनबहलाव का साधन ही नहीं, बल्कि देशगौरव की बात भी होगी.

और तब शायद ही कोई कह पाए, ‘ओलिंपिक जाओ, सैल्फी लो और वापस आ जाओ.’

इन सब बातों से तो एक ही निष्कर्ष निकलता है, ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाए,’ मतलब साफ है कि जो बोएंगे वही तो काटेंगे. Hindi Social Story.

Hindi Family Story: आंधी से बवंडर की ओर- क्या सोनिया अपनी बेटी को मशीनी सिस्टम से निजात दिला पाई?

Hindi Family Story: फन मौल से निकलतेनिकलते, थके स्वर में मैं ने अपनी बेटी अर्पिता से पूछा, ‘‘हो गया न अप्पी, अब तो कुछ नहीं लेना?’’

‘‘कहां, अभी तो ‘टी शर्ट’ रह गई.’’

‘‘रह गई? मैं तो सोच रही थी…’’

मेरी बात बीच में काट कर वह बोली, ‘‘हां, मम्मा, आप को तो लगता है, बस थोडे़ में ही निबट जाए. मेरी सारी टी शर्ट्स आउटडेटेड हैं. कैसे काम चला रही हूं, मैं ही जानती हूं…’’

सुन कर मैं निशब्द रह गई. आज की पीढ़ी कभी संतुष्ट दिखती ही नहीं. एक हमारा जमाना था कि नया कपड़ा शादीब्याह या किसी तीजत्योहार पर ही मिलता था और तब उस की खुशी में जैसे सारा जहां सुंदर लगने लगता.

मुझे अभी भी याद है कि शादी की खरीदारी में जब सभी लड़कियों के फ्राक व सलवारसूट के लिए एक थान कपड़ा आ जाता और लड़कों की पतलून भी एक ही थान से बनती तो इस ओर तो किसी का ध्यान ही नहीं जाता कि लोग सब को एक ही तरह के कपड़ों में देख कर मजाक तो नहीं बनाएंगे…बस, सब नए कपड़े की खुशी में खोए रहते और कुछ दिन तक उन कपड़ों का ‘खास’ ध्यान रखा जाता, बाकी सामान्य दिन तो विरासत में मिले कपड़े, जो बड़े भाईबहनों की पायदान से उतरते हुए हम तक पहुंचते, पहनने पड़ते थे. फिर भी कोई दुख नहीं होता था. अब तो ब्रांडेड कपड़ों का ढेर और बदलता फैशन…सोचतेसोचते मैं अपनी बेटी के साथ गाड़ी में बैठ गई और जब मेरी दृष्टि अपनी बेटी के चेहरे पर पड़ी तो वहां मुझे खुशी नहीं दिखाई पड़ी. वह अपने विचारों में खोईखोई सी बोली, ‘‘गाड़ी जरा बुकशौप पर ले लीजिए, पिछले साल के पेपर्स खरीदने हैं.’’

सुन कर मेरा दिल पसीजने लगा. सच तो यह है कि खुशी महसूस करने का समय ही कहां है इन बच्चों के पास. ये तो बस, एक मशीनी जिंदगी का हिस्सा बन जी रहे हैं. कपड़े खरीदना और पहनना भी उसी जिंदगी का एक हिस्सा है, जो क्षणिक खुशी तो दे सकता है पर खुशी से सराबोर नहीं कर पाता क्योंकि अगले ही पल इन्हें अपना कैरियर याद आने लगता है.

इसी सोच में डूबे हुए कब घर आ गया, पता ही नहीं चला. मैं सारे पैकेट ले कर उन्हें अप्पी के कमरे में रखने के लिए गई. पूरे पलंग पर अप्पी की किताबें, कंप्यूटर आदि फैले थे…उन्हीं पर जगह बना कर मैं ने पैकेट रखे और पलंग के एक किनारे पर निढाल सी लेट गई. आज अपनी बेटी का खोयाखोया सा चेहरा देख मुझे अपना समय याद आने लगा…कितना अंतर है दोनों के समय में…

मेरा भाई गिल्लीडंडा खेलते समय जोर की आवाज लगाता और हम सभी 10-12 बच्चे हाथ ऊपर कर के हल्ला मचाते. अगले ही पल वह हवा में गिल्ली उछालता और बच्चों का पूरा झुंड गिल्ली को पकड़ने के लिए पीछेपीछे…उस झुंड में 5-6 तो हम चचेरे भाईबहन थे, बाकी पासपड़ोस के बच्चे. हम में स्टेटस का कोई टेंशन नहीं था.

देवीलाल पान वाले का बेटा, चरणदास सब्जी वाले की बेटी और ऐसे ही हर तरह के परिवार के सब बच्चे एकसाथ…एक सोच…निश्ंिचत…स्वतंत्र गिल्ली के पीछेपीछे, और यह कैच… परंतु शाम होतेहोते अचानक ही जब मेरे पिता की रौबदार आवाज सुनाई पड़ती, चलो घर, कब तक खेलते रहोगे…तो भगदड़ मच जाती…

धूल से सने पांव रास्ते में पानी की टंकी से धोए जाते. जल्दी में पैरों के पिछले हिस्से में धूल लगी रह जाती…पर कोई चिंता नहीं. घर जा कर सभी अपनीअपनी किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाते. रोज का पाठ दोहराना होता था…बस, उस के साथसाथ मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई अलग से थोड़ी करनी होती थी, अत: 9 बजे तक पाठ पूरा कर के निश्ंिचतता की नींद के आगोश में सो जाते पर आज…

रात को देर तक जागना और पढ़ना…ढेर सारे तनाव के साथ कि पता नहीं क्या होगा. कहीं चयन न हुआ तो? एक ही कमरे में बंद, यह तक पता नहीं कि पड़ोस में क्या हो रहा है. इन का दायरा तो फेसबुक व इंटरनेट के अनजान चेहरे से दोस्ती कर परीलोक की सैर करने तक सीमित है, एक हम थे…पूरे पड़ोस बल्कि दूरदूर के पड़ोसियों के बच्चों से मेलजोल…कोई रोकटोक नहीं. पर अब ऐसा कहां, क्योंकि मुझे याद है कि कुछ साल पहले मैं जब एक दिन अपनी बेटी को ले कर पड़ोस के जोशीजी के घर गई तो संयोगवश जोशी दंपती घर पर नहीं थे. वहीं पर जोशीजी की माताजी से मुलाकात हुई जोकि अपनी पोती के पास बैठी बुनाई कर रही थीं. पोती एक स्वचालित खिलौना कार में बैठ कर आंगन में गोलगोल चक्कर लगा रही थी, कार देख कर मैं अपने को न रोक सकी और बोल पड़ी…

‘आंटी, आजकल कितनी अच्छी- अच्छी चीजें चल गई हैं, कितने भाग्यशाली हैं आज के बच्चे, वे जो मांगते हैं, मिल जाता है और एक हमारा बचपन…ऐसी कार का तो सपना भी नहीं देखा, हमारे समय में तो लकड़ी की पेटी से ही यह शौक पूरा होता था, उसी में रस्सी बांध कर एक बच्चा खींचता था, बाकी धक्का देते थे और बारीबारी से सभी उस पेटी में बैठ कर सैर करते थे. काश, ऐसा ही हमारा भी बचपन होता, हमें भी इतनी सुंदरसुंदर चीजें मिलतीं.’

‘अरे सोनिया, सोने के पिंजरे में कभी कोई पक्षी खुश रह सका है भला. तुम गलत सोचती हो…इन खिलौनों के बदले में इन के मातापिता ने इन की सब से अमूल्य चीज छीन ली है और जो कभी इन्हें वापस नहीं मिलेगी, वह है इन की आजादी. हम ने तो कभी यह नहीं सोचा कि फलां बच्चा अच्छा है या बुरा. अरे, बच्चा तो बच्चा है, बुरा कैसे हो सकता है, यही सोच कर अपने बच्चों को सब के साथ खेलने की आजादी दी. फिर उसी में उन्होंने प्यार से लड़ कर, रूठ कर, मना कर जिंदगी के पाठ सीखे, धैर्य रखना सीखा. पर आज इसी को देखो…पोती की ओर इशारा कर वे बोलीं, ‘घर में बंद है और मुझे पहरेदार की तरह बैठना है कि कहीं पड़ोस के गुलाटीजी का लड़का न आ जाए. उसे मैनर्स नहीं हैं. इसे भी बिगाड़ देगा. मेरी मजबूरी है इस का साथ देना, पर जब मुझे इतनी घुटन है तो बेचारी बच्ची की सोचो.’

मैं उन के उस तर्क का जवाब न दे सकी, क्योंकि वे शतप्रतिशत सही थीं.

हमारे जमाने में तो मनोरंजन के साधन भी अपने इर्दगिर्द ही मिल जाते थे. पड़ोस में रहने वाले पांडेजी भी किसी विदूषक से कम न थे, ‘क्वैक- क्वैक’ की आवाज निकालते तो थोड़ी दूर पर स्थित एक अंडे वाले की दुकान में पल रही बत्तखें दौड़ कर पांडेजी के पास आ कर उन के हाथ से दाना  खातीं और हम बच्चे फ्री का शो पूरी तन्मयता व प्रसन्न मन से देखते. कोई डिस्कवरी चैनल नहीं, सब प्रत्यक्ष दर्शन. कभी पांडेजी बोट हाउस क्लब से पुराना रिकार्ड प्लेयर ले आते और उस पर घिसा रिकार्ड लगा कर अपने जोड़ीदार को वैजयंती माला बना कर खुद दिलीप कुमार का रोल निभाते हुए जब थिरकथिरक कर नाचते तो देखने वाले अपनी सारी चिंता, थकान, तनाव भूल कर मुसकरा देते. ढपली का स्थान टिन का डब्बा पूरा कर देता. कितना स्वाभाविक, सरल तथा निष्कपट था सबकुछ…

सब को हंसाने वाले पांडेजी दुनिया से गए भी एक निराले अंदाज में. हुआ यह कि पहली अप्रैल को हमारे महल्ले के इस विदूषक की निष्प्राण देह उन के कमरे में जब उन की पत्नी ने देखी तो उन की चीख सुन पूरा महल्ला उमड़ पड़ा, सभी की आंखों में आंसू थे…सब रो रहे थे क्योंकि सभी का कोई अपना चला गया था अनंत यात्रा पर, ऐसा लग रहा था कि मानो अभी पांडेजी उठ कर जोर से चिल्लाएंगे और कहेंगे कि अरे, मैं तो अप्रैल फूल बना रहा था.

कहां गया वह उन्मुक्त वातावरण, वह खुला आसमान, अब सबकुछ इतना बंद व कांटों की बाड़ से घिरा क्यों लगता है? अभी कुछ सालों पहले जब मैं अपने मायके गई थी तो वहां पर पांडेजी की छत पर बैठे 14-15 वर्ष के लड़के को देख समझ गई कि ये छोटे पांडेजी हमारे पांडेजी का पोता ही है…परंतु उस बेचारे को भी आज की हवा लग चुकी थी. चेहरा तो पांडेजी का था किंतु उस चिरपरिचित मुसकान के स्थान पर नितांत उदासी व अकेलेपन तथा बेगानेपन का भाव…बदलते समय व सोच को परिलक्षित कर रहा था. देख कर मन में गहरी टीस उठी…कितना कुछ गंवा रहे हैं हम. फिर भी भाग रहे हैं, बस भाग रहे हैं, आंखें बंद कर के.

अभी मैं अपनी पुरानी यादों में खोई, अपने व अपनी बेटी के समय की तुलना कर ही रही थी कि मेरी बेटी ने आवाज लगाई, ‘‘मम्मा, मैं कोचिंग क्लास में जा रही हूं…दरवाजा बंद कर लीजिए…’’

मैं उठी और दरवाजा बंद कर ड्राइंगरूम में ही बैठ गई. मन में अनेक प्रकार की उलझनें थीं… लाख बुराइयां दिखने के बाद भी मैं ने भी तो अपनी बेटी को उसी सिस्टम का हिस्सा बना दिया है जो मुझे आज गलत नजर आ रहा था.

सोचतेसोचते मेरे हाथ में रिमोट आ गया और मैंने टेलीविजन औन किया… ब्रेकिंग न्यूज…बनारस में बी.टेक. की एक लड़की ने आत्महत्या कर ली क्योंकि वह कामर्स पढ़ना चाहती थी…लड़की ने मातापिता द्वारा जोर देने पर इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया था. मुझे याद आया कि बी.ए. में मैं ने अपने पिता से कुछ ऐसी ही जिद की थी… ‘पापा, मुझे भूगोल की कक्षा में अच्छा नहीं लग रहा क्योंकि मेरी सारी दोस्त अर्थशास्त्र में हैं. मैं भूगोल छोड़ रही हूं…’

‘ठीक है, पर मन लगा कर पढ़ना,’ कहते हुए मेरे पिता अखबार पढ़ने में लीन हो गए थे और मैं ने विषय बदल लिया था. परंतु अब हम अपने बच्चों को ‘विशेष कुछ’ बनाने की दौड़ में शामिल हो कर क्या अपने मातापिता से श्रेष्ठ, मातापिता साबित हो रहे हैं, यह तो वक्त बताएगा. पर यह तो तय है कि फिलहाल इन का आने वाला कल बनाने की हवस में हम ने इन का आज तो छीन ही लिया है.

सोचतेसोचते मेरा मन भारी होने लगा…मुझे अपनी ‘अप्पी’ पर बेहद तरस आने लगा. दौड़तेदौड़ते जब यह ‘कुछ’ हासिल भी कर लेगी तो क्या वैसी ही निश्ंिचत जिंदगी पा सकेगी जो हमारी थी… कितना कुछ गंवा बैठी है आज की युवा पीढ़ी. यह क्या जाने कि शाम को घर के अहाते में ‘छिप्पीछिपाई’, ‘इजोदूजो’, ‘राजा की बरात’, ‘गिल्लीडंडा’ आदि खेल खेलने में कितनी खुशी महसूस की जा सकती थी…रक्त संचार तो ऐसा होता था कि उस के लिए किसी योग गुरु के पास जा कर ‘प्राणायाम’ करने की आवश्यकता ही न थी. तनाव शब्द तो तब केवल शब्दकोश की शोभा बढ़ाता था… हमारी बोलचाल या समाचारपत्रों और टीवी चैनलों की खबरों की नहीं.

अचानक मैं उठी और मैं ने मन में दृढ़ निश्चय किया कि मैं अपनी ‘अप्पी’ को इस ‘रैट रेस’ का हिस्सा नहीं बनने दूंगी. आज जब वह कोचिंग से लौटेगी तो उस को पूरा विश्वास दिला दूंगी कि वह जो करना चाहती है करे, हम बिलकुल भी हस्तक्षेप नहीं करेंगे. मेरा मन थोड़ा हलका हुआ और मैं एक कप चाय बनाने के लिए रसोई की ओर बढ़ी…तभी टेलीफोन की घंटी बजी…मेरी ननद का फोन था…

‘‘भाभीजी, क्या बताऊं, नेहा का रिश्ता होतेहोते रह गया, लड़का वर्किंग लड़की चाह रहा है. वह भी एम.बी.ए. हो. नहीं तो दहेज में मोटी रकम चाहिए. डर लगता है कि एक बार दहेज दे दिया तो क्या रोजरोज मांग नहीं करेगा?’’

उस के आगे जैसे मेरे कानों में केवल शब्दों की सनसनाहट सुनाई देने लगी, ऐसा लगने लगा मानो एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई हो…अभी मैं अपनी अप्पी को आजाद करने की सोच रही थी और अब ऐसा समाचार.

क्या हो गया है हम सब को? किस मृगतृष्णा के शिकार हो कर हम सबकुछ जानते हुए भी अनजान बने अपने बच्चों को उस मशीनी सिस्टम की आग में धकेल रहे हैं…मैं ने चुपचाप फोन रख दिया और धम्म से सोफे पर बैठ गई. मुझे अपनी भतीजी अनुभा याद आने लगी, जिस ने बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर रहे अपने एक सहकर्मी से इसलिए शादी की क्योंकि आज की भाषा में उन दोनों की ‘वेवलैंथ’ मिलती थी. पर उस का परिणाम क्या हुआ? 10 महीने बाद अलगाव और डेढ़ साल बाद तलाक.

मुझे याद है कि मेरी मां हमेशा कहती थीं कि पति के दिल तक पेट के रास्ते से जाया जाता है. समय बदला, मूल्य बदले और दिल तक जाने का रास्ता भी बदल गया. अब वह पेट जेब का रास्ता बन चुका था…जितना मोटा वेतन, उतना ही दिल के करीब…पर पुरुष की मूल प्रकृति, समय के साथ कहां बदली…आफिस से घर पहुंचने पर भूख तो भोजन ही मिटा सकता है और उस को बनाने का दायित्व निभाने वाली आफिस से लौटी ही न हो तो पुरुष का प्रकृति प्रदत्त अहं उभर कर आएगा ही. वही हुआ भी. रोजरोज की चिकचिक, बरतनों की उठापटक से ऊब कर दोनों ने अलगाव का रास्ता चुन लिया…ये कौन सा चक्रव्यूह है जिस के अंदर हम सब फंस चुके हैं और उसे ‘सिस्टम’ का नाम दे दिया…

मेरा सिर चकराने लगा. दूर से आवाज आ रही थी, ‘दीदी, भागो, अंधड़ आ रहा है…बवंडर न बन जाए, हम फंस जाएंगे तो निकल नहीं पाएंगे.’ बचपन में आंधी आने पर मेरा भाई मेरा हाथ पकड़ कर मुझे दूर तक भगाता ले जाता था. काश, आज मुझे भी कोई ऐसा रास्ता नजर आ जाए जिस पर मैं अपनी ‘अप्पी’ का हाथ पकड़ कर ऐसे भागूं कि इस सिस्टम के बवंडर बनने से पहले अपनी अप्पी को उस में फंसने से बचा सकूं, क्योंकि यह तो तय है कि इस बवंडर रूपी चक्रव्यूह को निर्मित करने वाले भी हम हैं…तो निकलने का रास्ता ढूंढ़ने का दायित्व भी हमारा ही है…वरना हमारे न जाने कितने ‘अभिमन्यु’ इस चक्रव्यूह के शिकार बन जाएंगे. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: पांच रोटियां, पंद्रह दिन

Hindi Social Story: धनबाद के पास एक कोयले की खान में सैकड़ों मजदूर काम करते थे. मंगल सिंह उन में से एक था. उसे हाल ही में नौकरी पर रखा गया था. उस के पिता भी इसी खान में नौकरी करते थे, लेकिन एक दुर्घटना में उन की मौत हो गई थी. खान के मालिक ने मंगल सिंह को उस के पिता की जगह पर रख लिया था. मंगल सिंह 18 वर्ष का एक हंसमुख और फुरतीला जवान था. सुबहसुबह नाश्ता कर के वह ठीक समय पर खान के अंदर काम पर चला जाता था. उस की मां उस को रोज एक डब्बे में खाना साथ में दे दिया करती थीं. अपने कठिन परिश्रम औैर नम्र स्वभाव केकारण वह सब का प्यारा बन गया था.

बरसात का मौसम था. सप्ताह भर से जोरों की वर्षा हो रही थी. खान के ऊपर चारों तरफ पानी ही पानी नजर आता था.

एक दिन दोपहर के समय खान में मजदूरों ने पानी गिरने की आवाज सुनी तो वे चौकन्ने हो गए. चारों तरफ खलबली मच गई. खान में पानी भर जाने के डर से मजदूर अपनीअपनी जान बचाने के लिए लिफ्ट की ओर भागे. लिफ्ट से एक बार में कुछ ही मजदूर ऊपर जा सकते थे. कुछ लोग ऊपर गए भी, लेकिन पानी भरने की रफ्तार बड़ी तेज थी. तुरंत ही खान पानी से भर गई और लिफ्ट के पास खड़े कई मजदूर घुटघुट कर मर गए. मंगल सिंह की मां को इस घटना का पता चला तो वे परेशान हो गईं. मंगल सिंह के पिता की मौत का दुख वह अभी भूल भी न पाई थीं, अब अपने एकमात्र बेटे के दुख को कैसे बरदाश्त कर पातीं.

खान के एक भाग में मंगल सिंह अपने 9 साथियों के साथ काम में लगा था. खान में पानी गिरने के साथ ही उस ने अपने साथियों को सावधान कर दिया था. उस ने उन्हें लिफ्ट की ओर भागने के बजाय खान के ऊपरी हिस्से में चले जाने की सलाह दी. मंगल सिंह के कहने पर सभी ऊपरी हिस्से में चले आए. वहां से भी लिफ्ट तक पहुंचने के रास्ते थे. मंगल सिंह ने सोचा था कि अगर लिफ्ट चालू रही तो वहां से भी वे लोग खान के बाहर जा सकते हैं. पानी बड़ी तेजी से बढ़ रहा था. अब तो ऊपरी हिस्से में भी पानी भरना शुरू हो गया था, जहां मंगल सिंह औैर उस के साथियों ने शरण ले रखी थी. तब तक लिफ्ट भी बंद हो चुकी थी. मजदूर निराश हो गए.

खान के इस ऊपरी हिस्से में भी कोयले की कटाई होती थी. दिन भर का कटा कोयला कई ट्रौलियों में भरा हुआ था. पानी जब कमर तक आ गया तो मंगल सिंह ने किसी गंध का अनुभव किया.

‘यह पानी खान के अंदर का नहीं बल्कि ऊपर के किसी तालाब का है,’ मंगल सिंह ने अंदाजा लगाया. उसे मालूम था कि खान के आसपास कई छोटेबड़े तालाब हैं. अगर किसी एक तालाब का पानी खान में घुसा है तो उस से पूरी खान नहीं भर सकती. उसे आशा की एक किरण नजर आई. उस ने सोचा, ‘क्यों न बचने का कोई प्रयत्न किया जाए.’ उस ने अपने साथियों से कहा, ‘‘बिखरे हुए कोयले को हम लोग मिल कर ट्रौलियों में भर कर एक जगह जमा कर दें. जगह ऊंची हो जाने पर हम वहां शरण ले सकते हैं.’’

लेकिन मजदूरों में इतनी घबराहट थी कि मंगल सिंह की बात किसी ने नहीं सुनी. मौत का खौफ उन पर इस तरह छा गया था कि उन में कुछ सोचने की शक्ति ही नहीं रह गई थी. मंगल सिंह ने सोचा कि स्थिति बहुत खराब है, दुख में अगर आदमी घबरा जाए तो वह मुसीबत का सामना करने लायक नहीं रह जाता. मंगल सिंह ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने देखा, पानी में कुछ स्थिरता आई है. उस ने अनुभव किया कि उस के कपड़ों में कोई चीज चल रही है. अपने हाथ से पकड़ कर उस ने उसे बाहर निकाला. वह एक छोटी सी मछली थी. मंगल सिंह को विश्वास हो गया कि पानी किसी तालाब से ही खान में घुसा है. उस ने आशा जताई कि अगर और वर्षा न हुई तो खान में पानी अब औैर नहीं बढ़ेगा.

मजदूरों को कुछ कहे बिना उस ने खुद कई ट्रौलियों को एक जगह इकट्ठा कर लिया. कोयला उठाने के फावड़े वहां मौजूद थे. उस ने एक फावड़ा उठाया और ट्रौलियों में कोयला भरना शुरू किया. 2-3 मजदूरों ने भी उस का साथ दिया. कुछ ही देर में वहां कोयले का एक टीला खड़ा हो गया. मंगल सिंह सहित मजदूरों की संख्या 10 थी. खान में हवा आने के रास्ते मौजूद थे. पानी 3 फुट और बढ़ जाने पर भी इन के बचने की आशा अभी खत्म नहीं हुई थी.

खान में बाढ़ आने से पहले ही मजदूरों ने अपनाअपना खाना खा लिया था. लेकिन मंगल सिंह ने अभी तक खाना नहीं खाया था. एक बार उस की इच्छा हुई कि वह भी अपना खाना खा ले, लेकिन फिर उस ने सोचा, ‘पता नहीं खान के अंदर कितने दिन तक फंसे रहना पड़े. उसे बड़े जोर की भूख लगी थी, लेकिन अब चिंता केवल खुद की ही नहीं बल्कि साथ में फंसे अन्य मजदूरों की भी थी. पानी लगभग 2 फुट और बढ़ा. मंगल सिंह ने अपनी 5 रोटियों के बहुत सारे टुकड़े कर दिए. हर मजदूर हर रोज

1-1 टुकड़ा रोटी खा कर किसी तरह जीने लगा. रोटियों के टुकड़े खत्म होते जा रहे थे, लेकिन पानी नहीं घट रहा था. वे लोग निराश हो गए. उन्हें अब बचने की उम्मीद नहीं थी. भूख औैर प्यास के मारे उन में बोलने और उठनेबैठने की ताकत भी नहीं रह गई थी. पानी के साथ तालाब की मछलियां भी खान के अंदर आ गई थीं. कई मजदूरों ने मछलियों को पकड़ कर उन्हें कच्चा ही खाना शुरू कर दिया, लेकिन वे उन्हें पचा न पाए, उन्हें उलटियां होने लगीं. इस तरह 5 दिन बीत गए. छठे दिन 5 मजदूर बेहोश हो गए.

10वें दिन 2 अन्य मजदूरों की भी वही हालत हुई. 15वें दिन तो मंगल सिंह को छोड़ कर सभी मजदूर बेहोशी की हालत में आ गए. रोटी का अंतिम टुकड़ा भी खत्म हो चुका था. मंगल सिंह अपने साथियों की हालत देख कर व्याकुल हो उठा. अब उस से भी हिलाडुला नहीं जा रहा था. बोलने की भी ताकत नहीं रह गई थी, लेकिन फिर भी उस में जीने की हिम्मत बची थी. तभी उस ने देखा कि खान का पानी तेजी से घट रहा है. मंगल सिंह की खुशी का ठिकाना न रहा.

वह हर मजदूर को उस का नाम ले कर पुकारने लगा, लेकिन वे बेजान पड़े थे. कुछ घंटे के अंदर खान से पूरा पानी निकल गया. मंगल कोयले के टीले पर से किसी तरह नीचे उतरा. दीवार का सहारा ले कर धीरधीरे वह लिफ्ट की तरफ बढ़ा, लेकिन अधिक दूर न जा पाया और गिर पड़ा. फिर वहीं से सहायता के लिए चिल्लाने लगा.

ऊपर से लोगों का आनाजाना शुरू हो चुका था. मंगल सिंह की आवाज सुन कर वे उस के पास दौड़े आए. मंगल सिंह सहित सभी बेहोश मजदूरों को खान के बाहर लाया गया. मामूली उपचार के बाद सब की हालत ठीक हो गई. मंगल सिंह की हिम्मत और मदद से ही उन की जानें बची थीं. मजदूरों के परिवार खुशी से पागल हो गए. मंगल सिंह की मां की खुशी की सीमा ही न थी. मंगल सिंह को सरकार की तरफ से पुरस्कार भी मिला और नौकरी में पदोन्नति हुई. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: आओ नरेगा-नरेगा खेलें…

Hindi Social Story: आज देश में अगर हर जगह किसी चीज की चर्चा है तो वह नरेगा यानी नेशनल रूरल एंप्लायमेंट गारंटी ऐक्ट ही है. स्वाइन फ्लू व बर्ड फ्लू आदि तो बरसाती मेढक की तरह हैं जो कुछ समय के लिए टर्रटर्र करने के बाद इतिहास में उसी तरह विलीन हो जाते हैं जैसे भारत का किसी भी ओलिंपिक खेलों में प्रदर्शन विलीन हो जाता है. इतिहास को बदलने की शुरुआत जरूर निशानेबाज अभिनव बिंद्रा व मुक्केबाज बिजेंद्र कुमार ने की, नहीं तो हमारा ओलिंपिक में पदक के मामले में निल का स्वर्णिम इतिहास रहा है.

हां, ओलिंपिक खेलों में हमारा दल जरूर सदलबल रहा है. यानी अगर 50 खिलाड़ी गए तो अधिकारी 49 कभी नहीं रहे, 50 को तो पार कर ही जाते थे. आखिर हर खिलाड़ी के पीछे एक अधिकारी तो होना चाहिए न. उसे असफल होने पर धक्का लगाने के प्रयोजन से. एक कहावत है कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला होती है. हमारे यहां हर असफल खिलाड़ी के आगे एक अधिकारी होता है.

वैसे हम अपने राष्ट्रीय खेल हाकी में फिसड्डी हो गए हैं तो अब सभी के प्रिय खेल ‘नरेगानरेगा’ को राष्ट्रीय खेल घोषित कर दिया जाए. वैसे अघोषित रूप से यह राष्ट्रीय क्या अंतर्राष्ट्रीय खेल हो गया है क्योंकि कई अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ नरेगा की समस्याओं, उलझनों की आग में अपनी रोटी सेंक रहे हैं.

कहां नरेगा, कहां खेल. आप को यह अटपटा लग रहा होगा. पर सच है, बहुत से लोगों के लिए नरेगा ने एक नए खेल के रूप में जन्म लिया है. नरेगा में सरकार ने कानूनी रूप से मजदूर को, जो अपने ही क्षेत्र में काम करना चाहता है, 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी है. नहीं तो सरकार को बेरोजगारी भत्ता देना पड़ता है. नरेगा के वास्तविक हकदार वे मजदूर हैं जिन की रोजीरोटी की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है और वे शारीरिक श्रम करने को मजबूर व सहमत हैं.

लगता है, मजदूर शब्द की उत्पत्ति मजा+दूर से हुई है. केवल कमरतोड़ मेहनत का काम करने के लिए जहां मजा नाम की कोई चीज नहीं है अर्थात मजा बहुत दूर है इसलिए नाम है मजदूर.

नरेगा में सरकार ने मजा का बंदोबस्त किया है. मसलन, कार्यस्थल पर दवाइयों की किट, बच्चों के लिए झलाघर, पानी की व्यवस्था, पूरी न्यूनतम मजदूरी लेकिन मजदूर शब्द का कैरेक्टर ही ऐसा है कि मजा उस से दूर हो जाता है व उसे सजा के रूप में कम मजदूरी, विलंब से मजदूरी मिलती है.

नरेगा का मजा परदे के पीछे रह कर मजदूरों का भला चाहने वालों को मिलता है. ये कौन लोग हैं? ये हैं मजदूर का जाबकार्ड बनाने, बैंक में खाते खुलवाने के मददगार. नरेगा की रेलमपेल में अपनी मशीनरूपी रेल झोक देने वाले तसले, फावड़े, कुदाल बेचने वाले व्यापारी, मुद्रण के अलगअलग कार्य करने वाले, कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो गए कंसल्टेंट, एन.जी.ओ. आदि, नरेगा का मजा ले रहे हैं और बेचारे मजदूर सजा पा रहे हैं.

नरेगा का नाम मरेगा कर देना चाहिए क्योंकि इस में बाकी सबकुछ दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा पर मजदूर तो मरेगा ही. मशीनबाज ठेकेदार मशीन से करवा कर मजदूर को आधी मजदूरी काम घर बैठे दे कर जाबकार्ड पर उस का अंगूठा लगवा लेता है. जाबकार्ड भी ठेकेदार या ठेकेदाररूपी सरपंच के पास ही रहता है. यहां एक बात समझ में नहीं आई कि जो जिले शतप्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य कई साल पहले प्राप्त कर चुके हैं वहां भी नरेगा में मजदूर अंगूठा ही लगा रहा है यानी उस समय साक्षरता अभियान चलाने वालों ने सरकार को ठेंगा ही (अंगूठा) दिखाया है.

जितना काम नहीं हो रहा उस से ज्यादा उस का हिसाब रखने के लिए मस्टररोल, रजिस्टर छप रहे हैं. नरेगा मजदूरों के अलावा सब के लिए है. विपक्षी दल के विधायक के लिए भी है. उसे विधानसभा में उठाने के लिए कोई विषय नहीं मिलता तो नरेगा से संबंधित कुछ भी पूछ लेता है. मसलन, फलां जिले के रेलवे स्टेशन में मजदूर गठरी लिए क्यों बड़ी संख्या में खड़े रहते हैं जब नरेगा उन के जिले में चल रही है.

अब उन्हें कौन समझए कि पेट को दो वक्त की रोटी के हिसाब से देखें तो साल में 730 बार खाना चाहिए. नरेगा अधिक से अधिक केवल 200 बार रोटी देता है. वे तो गले तक भर पेट ले कर प्रश्न पूछते हैं. इसलिए मजदूर का 265 दिन का पिचका पेट उन्हें नहीं दिखता है. ये ऐसे ही प्रश्न हैं जैसे फ्रांस की राजकुमारी ने फ्रांसीसी क्रांति के समय अपनी जनता के बारे में कहा कि रोटी नहीं है तो ये केक क्यों नहीं खाते.

सरकाररूपी सिस्टम मजबूरी में नरेगा में सुधार के समयसमय पर फैसले लेता है पर जैसे पुलिस व चोरों के बीच चूहेबिल्ली का खेल चलता है, वैसे ही नरेगा के परदे के पीछे के हितलाभी ‘तू डालडाल मैं पातपात’ की तर्ज पर सरकारी नियंत्रण की तोड़ निकाल लेते हैं. लगे हाथ एकदो उदाहरण भी देख लें.

सरकार ने सोचा कि जाबकार्ड सभी को दे दो, चाहे मजदूर आए या न आए क्योंकि जाबकार्ड बनाने में मजदूर को पासपोर्ट बनवाने से ज्यादा चक्कर सचिव, सरपंच और पटवारी आदि के लगाने पड़ेंगे तो सयानों ने ठेकेदारों को अपने जाबकार्ड किराए पर दे दिए. मजदूर भी बड़े सरकारी ठेकेदार की तरह अपने विशेषाधिकार को पेटी कांट्रैक्टर को हस्तांतरित करने की तर्ज पर काम कर रहा है. चलो, नरेगा ने एक हथियार तो मजबूर, अरे नहीं मजदूर को दिया कि वह बिना हाड़मांस का शरीर हिलाए कुछ रुपए पा जाए.

सरकार ने मजदूर के खाते खोलना अनिवार्य कर दिया और भुगतान खाते से होगा. यह भी जरूरी कर दिया तो कई मजदूर ठेकेदारों के चंगुल में आ गए. बिना काम किए निश्चित प्रतिशत ठेकेदार से ले कर बैंक से निकाली राशि उसे सौंप दी.

सरकारी या प्राइवेट क्षेत्र में जैसे कोई बहुत बड़ी पूंजी वाला कारखाना खुल जाता है वैसे ही नरेगा रूपी विशाल उद्योग खुलने से कई उद्यमियों को घरबैठे उद्योग स्थापित करने का अवसर मिला है. ये कौनकौन हैं नीचे क्रमबद्ध सुशोभित हैं:

पत्रकारिता के व्यापारियों ने ‘नरेगा टाइम्स’ या ‘नरेगा पन्ना’ नाम से नियमित अखबार शुरू कर दिया है.

मुद्रणालयों ने अनापशनाप रजिस्टरों, फार्मों के स्कोप को देखते हुए, अपनी पिं्रटिंग इकाइयों का विस्तार कर लिया. कई बीमार प्रिंटिंग इकाइयां जो बी.आई.एफ.आर. के पास थीं, वापस क्रियाशील घोषित हो गईं. बी.आई.एफ.आर. वह संस्थान है जो बीमार औद्योगिक इकाइयों को पुनर्जीवित करने का कार्य करता है.

अचानक कई शहरों में जे.सी.बी. यानी कि नईनई एजेंसियां खुल गईं. उन्हें देख कर ऐसा लगा मानो छोटे शहर भी औद्योगिक क्रांति की ओर दौड़ पड़े हैं, क्योंकि अब बैंक भी जे.सी.बी. को उसी तरह फाइनेंस करने लगे हैं जैसे ट्रैक्टर आदि को करते थे. जे.सी.बी. कंपनी के हेडआफिस में भी आपातकालीन बैठक बुला कर नरेगा के कारण बिक्री लक्ष्य 500 नग कर दिया गया है. इस बैठक में यह बात भी निकल कर आई कि धारा 40 के मामलों की बाढ़ आ गई है. यदि पंचायत में काम करने वाले मजदूर नहीं हैं तो भी प्रशासन सरपंच को दोषी मान कर नोटिस दे देता है. अत: वकीलों को भी भरपूर रोजगार मिल रहा है. जय हो नरेगा. जो सब का ध्यान रखता है. अल्टीमेटली काम मशीनों से होंगे क्योंकि उतने मजदूर हैं नहीं जितने सरकार सोचती है और जो हैं भी, उन में से ज्यादातर में ‘जितना काम उतना दाम’ के सिद्धांत व कमतर होती शारीरिक क्षमता के कारण काम करने की इच्छा नहीं है.

नरेगा जिलों में पोस्टिंग का वैसा ही क्रेज है, जैसा गुजरात, जहां दारू निषेध है, के अवैध शराब की ज्यादा बिक्री वाले क्षेत्र के थानों में पोस्टिंग के लिए होता है. स्थानांतरण कार्य का स्कोप बढ़ गया है. नरेगा जिले के मुख्य अधिकारी को आंखें दिखाओ तो वह वशीकरण मंत्र के प्रभाव की तरह जो बोला जाए वही करने लगता है. आखिर वह भी सिविल सेवा में, देश सेवा के लिए ही तो आया है, नहींनहीं, सात पुश्तों की सेवा के लिए आया है.

दोपहिया, चार पहिया वाहन वालों, रिएल एस्टेट वालों की पौबारह है. सरपंच, अधिकारी, शिकायतकर्ता, एन.जी.ओ. और पत्रकार सभी नरेगा के कारण वाहन, जमीनजायदाद खरीद रहे हैं. नरेगा के कारण आटो मोबाइल में एक्साइज ड्यूटी कम होने के बावजूद डीलरों ने रेट बढ़ा दिए हैं. फिर भी बिक्री का ग्राफ बढ़ गया है.

कलक्टर, जिला पंचायत कार्यालय में स्थापना का कार्य देख रहे बाबू का कार्य बढ़ गया है क्योंकि नरेगा के कारण रोज किसी न किसी अधिकारी की जांच चल रही है. अधिकारी व कर्मचारी प्रभावशील व्यक्ति की मशीन को काम नहीं देते हैं तो वे शिकायत करवा देते हैं, मजिस्ट्रेट के न्यायालय में काम बढ़ गया है.

नरेगा क्रिटिक का एक नया क्षेत्र रोजगार के लिए खुल गया है. एक कंसल्टेंसी फर्म ने तो बाकायदा विज्ञापन दे कर ऐसे व्यक्तियों की सेवाएं लेनी चाही हैं. नरेगा ने सरपंच की औकात बढ़ा दी है. एक छोटे से क्षेत्र का जनप्रतिनिधि होने के कारण तथा नरेगा में लाखोंकरोड़ों का आबंटन मिलने से बहुत बड़े क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, विधायक व सांसद को उस ने आंखें दिखाना शुरू कर दिया है. अब वह विधायक व सांसद से अपने यहां की पंचायत में कार्य करवाने की मिन्नत नहीं करता बल्कि कभीकभी वह यह इच्छा पाल लेता है कि विधायक व सांसद उस से निवेदन की भाषा में कोई कार्य स्वीकृत करने की बोलें तो वह कार्य स्वीकृत उसी अंदाज में कर देगा जिस में पहले वे लोग किया करते थे, क्योंकि हर सांसद व विधायक के निर्वाचन क्षेत्र में सैकड़ों पंचायतें हैं. इस तरह से देखें तो प्रति ग्राम पंचायत उन के फंड का पैसा मामूली सा रह जाता है.

न्यायपालिका की सक्रियता से नरेगा भी नहीं बचा है. न्यायालयों में ट्रायल चलतेचलते ही कई लोग वास्तविक सजा से ज्यादा समय जेल में गुजार लेते हैं फिर भी मामले का फैसला नहीं होता है. उस पर न्यायपालिका की दिलेरी देखिए कि नरेगा के हर मामले में सक्रिय है.

नरेगा होने से सिविल सोसायटी बहुत सिविल हो गई है. क्योंकि हर स्तर पर कमी निकालने का हथियार नरेगा ने इन को दे दिया है. दुनिया में और भी मुद्दे हैं जिन्हें ये पकड़ना नहीं चाहते, सब नरेगा के पीछे चल पड़े हैं क्योंकि मजदूरों के साथ इन की भी रोजीरोटी इसी से चल रही है. यह योजना कैसे प्रभावी ढंग से चले इस के उलट कैसे उस में पोल बनी रहे? लोग परेशान हों? इस बात में ये ज्यादा रुचि रखते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सरकारी अस्पताल का डाक्टर इस कोशिश में रहता है कि अस्पताल के कुप्रबंधन में उस का योगदान कम न रहे जिस से उस के क्लीनिक में सरकारी अस्पताल के मरीज आते रहें व उस के घर का प्रबंधन सुचारु रहे.

एन.जी.ओ. में से कई ऐसी संस्था थीं जो लाखों का घपला कर माल डकार गईं और दफ्तर बंद कर गायब हो गईं. अब फिर नए नाम से नया संगठन बना कर नरेगा के घपलों में अपने घपले को फिर अंजाम देने की जुगत में हाथपैर चला रहे हैं. स्विस बैंक के अधिकारियों को अब ज्यादा घमंड नहीं करना चाहिए. उन के यहां जितना काला धन जमा है उस से ज्यादा नरेगा का बजट हो जाएगा.

अरे, मेरे देश के पत्रकारो, एन.जी.ओ., ठेकेदारो, अधिकारियो, छात्रो, एक्टिविस्टो, शिक्षाविदो और बहुत से दूसरे भी, तुम नरेगा को प्रभावी बनाने में अपना सकारात्मक योगदान दो तो वह दिन दूर नहीं कि देश का मजदूर भी नैनो से नरेगा में काम करने आएगा तो सोने की चिडि़या का संबोधन पुन: देश को मिलना शुरू हो जाएगा. Hindi Social Story.

Property Rights India: क्या पिता अपने पुत्र को अपनी संपत्ति से बेदखल कर सकता है?

Property Rights India: पिता और बेटे के बीच भी संपत्ति के कई विवाद खड़े हो जाते हैं. ऐसे में कई बार पिता अपने बेटे को अपनी संपत्ति से बेदखल करने का कदम उठा लेते हैं. कई अखबारों में इस तरह की नोटिस छपी दिख जाती है. बेटा ही नहीं अब बेटी भी कानून पिता की संपत्ति में अपना हक रखती है तो उस के साथ भी यह किया जा सकता है. यह मसले भारतीय हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (2005 संशोधन) के तहत हल किए जाते हैं.

 

हिंदू उत्तराधिकार कानून के मुताबिक पैतृक संपत्ति में बेटे का जन्म से अधिकार होता है. इसे सहदायिक अधिकार कहते हैं. बेटा पैतृक संपत्ति में बंटवारे के लिए मुकदमा दायर कर अपना हिस्सा मांग सकता है. इसे पार्टीशन सूट कहा जाता है. पिता अपनी संतान को अपनी पैत्रक प्रौपर्टी से पूरी तरह से बेदखल नहीं कर सकता है. पिता को अपनी स्व अर्जित संपत्ति से ही पुत्र को बेदखल करने का अधिकार होता है.

 

पिता वसीयत में बेटे का नाम न लिख कर, सार्वजनिक नोटिस के जरिए बेटे को बेदखल कर सकता है. ऐसी संपत्ति पर बेटा कोई दावा नहीं कर सकता है. वह कोर्ट में एक मुकदमा दायर कर के उसे अपनी संपत्ति से बेदखल कर सकता है जिस की सार्वजनिक नोटिस उस को अखबारों में सार्वजनिक सूचना के रूप में छपवानी पड़ती है. Property Rights India.

Diabetes Diet Tips: डायबिटीज है और वजन घटाना है तो अपनाएं माइंडफुल ईटिंग हैबिट्स

Diabetes Diet Tips: डायबिटीज आज सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि हमारी बदलती जीवनशैली का आईना बन गई है। कई बार भोजन पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाता है और भूख बार-बार लगने से वजन बढ़ता ही जाता है। ऐसे में लोग मान लेते हैं कि डायबिटीज होने पर वजन कम करना लगभग असंभव है, जबकि सच यह है कि थोड़े अनुशासन और सही आदतों से यह पूरी तरह संभव है।

भारत में डायबिटीज के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि हमें अपनी दिनचर्या और खान–पान दोनों में बदलाव की जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर डायबिटीज को समय पर नियंत्रित न किया जाए, तो यह शरीर के कई हिस्सों को नुकसान पहुँचा सकती है। और यदि व्यक्ति पहले से ही मोटापे से परेशान है, तो जोखिम और बढ़ जाता है। इसलिए वजन कम करना सिर्फ अच्छा दिखने के लिए नहीं, बल्कि स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है।

संतुलित आहार अपनाएँ:

डाइट में कार्बोहाइड्रेट कम रखें और रेशेदार अनाज, हरी सब्ज़ियाँ, सलाद और पर्याप्त पानी शामिल करें। मीठे पेय पदार्थ, तला-भुना और ज्यादा तेल वाला भोजन छोड़ना ही बेहतर है।

फाइबर को बनाए साथी:

फाइबर-युक्त आहार पेट को लंबे समय तक भरा रखता है। इससे बार-बार खाने की इच्छा कम होती है और वजन नियंत्रित रहता है।

ब्लड शुगर संतुलित रखें:

भोजन समय पर करें और दिन में 4–5 बार छोटे हिस्सों में खाएं। 7–8 घंटे की नींद और तनाव से दूरी शुगर लेवल को स्थिर रखने में मदद करती है।

नियमित व्यायाम जरूरी:

रोज़ 30 मिनट वॉक, योग, प्राणायाम या साइकिलिंग करें। रात के खाने के बाद 10–15 मिनट की हल्की वॉक डायबिटीज के लिए बेहद फायदेमंद है।

तनाव कम करें और हाइड्रेटेड रहें:

मेडिटेशन, किताबें और हल्का संगीत तनाव घटाते हैं। दिनभर में 3–4 लीटर पानी और नारियल पानी पीना शरीर को साफ रखता है। एनर्जी ड्रिंक और सोडा से दूरी ही बेहतर है।

डायबिटीज में वजन कम करना मुश्किल ज़रूर है, पर असंभव बिल्कुल नहीं—बस सही आदतें आपका साथ दें, तो रास्ता खुद साफ होने लगता है। Diabetes Diet Tips.

GST Rate Cuts: जीएसटी कटौती राहत नहीं, जनता को छलने का प्रयास

GST Rate Cuts: सरकार द्वारा हाल ही में रियल एस्टेट क्षेत्र में जीएसटी दरों में की गई कटौती को आम लोगों के लिए “राहत” बताया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इस दावे के बिल्कुल विपरीत है। यह फैसला वास्तविक सुधार से ज़्यादा भ्रम फैलाने वाला प्रचार साबित हो रहा है।

दरअसल, निर्माण क्षेत्र में उपयोग होने वाले कई कच्चे माल की दरें अब पहले से ज़्यादा बढ़ा दी गई हैं। जो सामान पहले 12% जीएसटी पर मिलता था, अब वही 18% जीएसटी के दायरे में आ गया है। ऐसे में निर्माण कंपनियों की लागत घटने की बजाय बढ़ रही है। नतीजतन, बिल्डर्स अब अपने प्रोजेक्ट्स की कीमतें बढ़ा रहे हैं ताकि बढ़े कर का बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जा सके।

सरकार के प्रचार के मुताबिक ईंट, टाइल और रेत जैसी वस्तुएँ सस्ती हुई हैं, लेकिन यह केवल पुराने स्टॉक पर लागू है। नए निर्माण की लागत में कोई ठोस कमी नहीं आई है।

छोटे बिल्डर्स और डेवलपर्स अब इनपुट टैक्स क्रेडिट की उलझनों से जूझ रहे हैं, जिससे परियोजनाओं की गति और धीमी हो रही है। खरीदारों को राहत देने की बजाय यह व्यवस्था उन्हें और अधिक भ्रमित कर रही है, क्योंकि टैक्स संरचना और भी जटिल हो गई है।

त्योहारी सीजन में इसे निवेश का “स्वर्ण अवसर” बताकर प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह कदम केवल सस्ते घर के सपने दिखाने वाला एक राजनीतिक दांव है। जमीन और स्टाम्प ड्यूटी पर कोई राहत नहीं होने के कारण कुल लागत में कोई ठोस कमी नहीं आई है।

रियल एस्टेट क्षेत्र पहले ही मंदी और अविश्वास से जूझ रहा था। ऐसे में जीएसटी कटौती का यह निर्णय विकास से ज़्यादा जनता को खुश करने का दिखावा प्रतीत होता है। GST Rate Cuts.

Hindi Family Story: जूमजूम झूम वाला- लड़कियों की फोटो खींचना कैसे पड़ गया भारी?

Hindi Family Story: रोहित ने शान से अपना नया स्मार्टफोन निकाल कर अपने दोस्तों को दिखाया और बोला, ‘‘यह देखो, पूरे 45 हजार रुपए का है.’’

‘‘पूरे 45 हजार का?’’ रमन की आंखें आश्चर्य से फैल गईं, ‘‘आखिर ऐसा क्या खास है इस मोबाइल में?’’

‘‘6 इंच स्क्रीन, 4 जीबी रैम, 32 जीबी आरओएम, 16 एमपी ड्यूल सिम, 13 मेगापिक्सल कैमरा…’’ रोहित अपने नए फोन की खासीयतें बताने लगा.

रोहित के पापा शहर के बड़े व्यापारी थे. रोहित मुंह में सोने का चम्मच ले कर पैदा हुआ था. उस की जेब हमेशा नोटों से भरी रहती थी इसलिए वह खूब ऐश करता था.

रोहित के पापा भी यह जानते थे, लेकिन उन्होंने कभी रोहित को टोका नहीं. उन का मानना था कि कुछ समय बाद तो रोहित को ही उन का व्यापार संभालना है इसलिए अभी जितनी मौजमस्ती करनी है कर ले.

पापा की छूट का रोहित पर बुरा असर पड़ रहा था. वह पढ़नेलिखने के बजाय नएनए दोस्त बनाने और मस्ती करने में लगा रहता.

आज भी वही हो रहा था. क्लास बंक कर के रोहित कैंटीन में दोस्तों के साथ बैठा अपनी शेखी बघारता हुआ उन्हें अपने नए मोबाइल की खूबियां बता रहा था. उस के दोस्त भी उस के मोबाइल की तारीफ के पुल बांधने में जुटे थे.

‘‘यार, मानना पड़ेगा, तुम्हारे पापा तुम्हें बहुत प्यार करते हैं. तभी तो तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी कर देते हैं,’’ सनी ने मोबाइल को देखते हुए कहा.

‘‘क्या बात करते हो यार, मेरी तो ज्यादातर ख्वाहिशें अधूरी हैं,’’ रोहित बोला.

‘‘कार, सूट, कीमती घडि़यां, विदेशी चश्मे और नोटों की गड्डियां सबकुछ तो तुम्हें हासिल है जिन के बारे में हम लोग सोच भी नहीं सकते. इस के बाद भी तुम्हारी कौन सी ख्वाहिश अधूरी रह गई है?’’ उमंग ने जानना चाहा.

‘‘कार, माईफुट. एक कार पकड़ा दी और पिछले 2 साल से उसे ढो रहा हूं,’’ रोहित ने बुरा सा मुंह बनाया. फिर लंबी सांस भरते हुए बोला, ‘‘मेरी तो ख्वाहिश है कि मेरा अपना एक प्राइवेट जैट हो, जिस पर बैठ कर मैं वीकऐंड मनाने यूरोप जाऊं. स्विट्जरलैंड में अपना एक खूबसूरत सा विला हो, जहां गर्लफ्रैंड के साथ छुट्टियां मनाने जाऊं.’’

‘‘यार, तुम्हारे पापा इतने अमीर हैं. तुम्हारा यह ख्वाब वे एक दिन जरूर पूरा करेंगे,’’ रमन ने कहा.

‘‘तुम्हारे मुंह में घीशक्कर,’’ रोहित ने रमन की पीठ थपथपाई, फिर बैरे को बुला कर सभी के लिए एकएक बर्गर और कोल्ड ड्रिंक का और्डर दिया, जबकि एकएक पिज्जा वे पहले ही खा चुके थे.

‘‘अरे भाई, किस चीज की दावत चल रही है,’’ तभी हेमंत ने कैंटीन में प्रवेश करते हुए पूछा.

‘‘रोहित 45 हजार का नया मोबाइल फोन लाया है. ऐसा मोबाइल पूरे शहर में किसी के पास नहीं होगा,’’ दीपक ने कोल्ड ड्रिंक का घूंट पीने के बाद मुंह पोंछते हुए बताया.

‘‘ऐसी क्या खास बात है इस में?’’ हेमंत ने करीब आ कर एक कुरसी पर बैठते हुए पूछा, तो रोहित से पहले रमन उस की खूबियां गिनाने लगा.

हेमंत ने मोबाइल हाथ में ले कर गौर से देखा. फिर बोला, ‘‘यार, तुम्हारे पिछले स्मार्टफोन में भी तो यही सब फीचर्स थे.’’

‘‘हां, लेकिन यह 4जी फ्रैंडली है और इस का कैमरा जूम वाला है. इस से तुम यहीं बैठेबैठे फोन के कैमरे को जूम कर दूर का फोटो भी साफसाफ खींच सकते हो और कोई तुम्हें देख भी नहीं पाएगा,’’ रोहित ने रहस्यमय अंदाज में फुसफुसाते हुए बताया.

‘‘कोई देख नहीं पाएगा तो उस से क्या फायदा होगा?’’ हेमंत ने पूछा.

‘‘यार, तू भी न पूरा घोंचू है,’’ रोहित ने कहा और फिर आगे बढ़ कर हेमंत की जेब से उस का मोबाइल निकाल कर उस के हाथ में रखते हुए बोला, ‘‘वह देख, तेरी क्लास की लड़की आ रही है. जा उस का एक फोटो खींच ला.’’

‘‘अबे, मरवाएगा क्या? कोई फोटो खींचते हुए देख लेगा तो जूते तो पड़ेंगे ही कालेज से भी निकाल दिया जाऊंगा,’’ हेमंत ने हड़बड़ाते हुए अपना मोबाइल अपनी जेब में वापस रख लिया.

रोहित ने ठहाका लगाया और बोला, ‘‘बेटा, यही खास बात है मेरे फोन में कि यहीं बैठेबैठे जूम कर के किसी का भी फोटो खींच लो और उसे व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाल दो ताकि सारे दोस्त उसे देख कर झूम सकें.’’

‘‘अरे वाह, तब तो इस फोन का नाम जूमजूम झूम वाला रख दो,’’ हेमंत का चेहरा खिल उठा. फिर वह खुशामदी स्वर में बोला, ‘‘यार, एक मिनट के लिए अपना फोन देना जरा इस लड़की का एक फोटो खींच लूं. क्लास में तो यह लिफ्ट ही नहीं देती,’’ हेमंत ने एक लड़की की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘छोड़ न यार. इस का क्या फोटो खींचना. यह लड़की तो रोज वाली है. बगल में जो गर्ल्स कालेज है वहां की लड़कियां बहुत नकचढ़ी हैं. सीधे मुंह बात ही नहीं करतीं. चल उन में से किसी खास पीस का फोटो खींच कर करते हैं कैमरे का उद्घाटन,’’ रोहित ने अपने दिल की बात सब के सामने रखी.

‘‘अरे वाह, आइडिया अच्छा है,’’ हेमंत चहकते हुए बोला, ‘‘ला, यह शुभ काम मैं ही कर दूं. बदले में तुम जो कहोगे कर दूंगा.’’

‘‘चल तू भी क्या याद करेगा,’’ रोहित ने मोबाइल हेमंत को पकड़ाया और बोला, ‘‘बस, एक शर्त है, फोटो जोरदार होना चाहिए. अगर सब को पसंद नहीं आया तो आज के नाश्ते का बिल तुझे भरना होगा.’’

‘‘मंजूर है,’’ हेमंत ने कहा और सभी दोस्तों की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘चलो, सभी बाउंड्री वाल के पास. जिस का कहोगे उस का फोटो खींच दूंगा.’’

‘‘इतने लोग गर्ल्स कालेज के पास जाएंगे तो पकड़े जाएंगे. तुम अकेले जाओ और चुपचाप फोटो खींच लाओ,’’ रोहित ने समझाया.

‘‘ठीक है,’’ हेमंत ने सिर हिलाया और मोबाइल ले कर सधे कदमों से ऐसे बाहर निकल गया जैसे किसी मोरचे पर जा रहा हो.

उस के कैंटीन से बाहर निकलते ही रोहित ने कहा, ‘‘यह अपने को बहुत तीसमारखां समझता है. आज इसे बकरा बनाना है. यह चाहे जितनी खूबसूरत लड़की का फोटो खींच कर लाए, सब उसे रिजैक्ट कर देना. फिर आज का बिल इसे ही भरना पड़ेगा.’’

यह सुन सभी ने ठहाका लगाया और हेमंत के वापस आने का इंतजार करने लगे.

थोड़ी देर बाद ही रमन, दीपक, उमंग और सनी के मोबाइल पर हेमंत का व्हाट्सऐप मैसेज आया.

‘‘अरे वाह, क्या पटाखा फोटो खींचा है,’’ कहते हुए रमन ने रोहित को फोटो दिखाया तो वह सन्न रह गया. दरअसल, उस कालेज में उस की बहन तान्या भी पढ़ती थी और हेमंत ने उसी का फोटो खींच कर व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाल दिया था वह भी उसी के नंबर से.

‘‘अबे, यह क्या कर दिया इस घोंचू ने, मेरी ही बहन का फोटो खींच कर व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाल दिया. अब तक तो यह फोटो पचासों लड़कों के पास पहुंच चुका होगा,’’ रोहित ने दोस्तों को बताया तो सभी परेशान हो गए.

‘‘क्या यह तुम्हारी बहन है, ओह नो,’’ कहते हुए सभी ने अपनेअपने मोबाइल जेब में रख लिए.

‘‘मैं इस कमीने को छोडूंगा नहीं,’’ रोहित के जबड़े भिंच गए और आंखें लाल अंगारा हो उठीं.

जैसे ही हेमंत कैंटीन में दाखिल हुआ, उसे देखते ही रोहित तेजी से उस की ओर लपका और उस के चेहरे पर घूंसा जड़ दिया.

‘‘यह क्या मजाक है?’’ हेमंत बोला.

‘‘मजाक तो तू ने किया है, जो अब तुझे बहुत महंगा पड़ने वाला है,’’ गुस्से से कांपते हुए रोहित ने हेमंत पर लातघूंसों की बरसात कर दी.

हेमंत की समझ में ही नहीं आ रहा था कि रोहित उसे मार क्यों रहा है. अचानक हेमंत ने रोहित को पूरी ताकत से धक्का दिया तो वह दूर जा गिरा. फिर हेमंत उसे घूरते हुए बोला, ‘‘तू पागल हो गया है क्या, जो मारपीट कर रहा है. आखिर बात क्या है?’’

‘‘पागल तो तू हो गया है, जो तूने मेरी बहन का फोटो व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाला है,’’ रोहित उसे खा जाने वाले लहजे में बोला तो हेमंत की आंखें आश्चर्य से फैल गईं, ‘‘क्या रोहित वह तुम्हारी बहन है. मुझे तो पता नहीं था और न ही मैं उसे पहचानता हूं, उफ, यह क्या हो गया?’’ हेमंत ने अपना सिर पकड़ लिया. उस की आंखों में पाश्चात्ताप साफ झलक रहा था.

वह रोहित के पास पहुंच भर्राए स्वर में बोला, ‘‘रोहित, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई है. तेरी बहन मेरी बहन हुई. मैं ने अपनी बहन को ही बदनाम कर दिया. मुझे माफ कर दे.’’

‘‘यह क्या तमाशा हो रहा है यहां पर?’’ तभी प्रिंसिपल साहब की कड़क आवाज सुनाई पड़ी. मारपीट होते देख कैंटीन का मैनेजर उन्हें बुला लाया था.

‘‘जी, कुछ नहीं. वह हम लोगों का आपसी मामला था,’’ रोहित हड़बड़ाते हुए उठ खड़ा हुआ.

‘‘आपसी मामले इस तरह निबटाए जाते हैं?’’ प्रिंसिपल साहब ने दोनों को डांटा. फिर बोले, ‘‘तुम लोग मेरे औफिस में आओ.’’

रोहित और हेमंत प्रिंसिपल साहब के पीछेपीछे उन के औफिस में गए. पूरी बात सुन कर प्रिंसिपल साहब का चेहरा गंभीर हो गया. उन्होंने फोन कर के फौरन दोनों के पापा को स्कूल में बुला लिया.

‘‘अंकल, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मुझे नहीं पता था कि वह रोहित की बहन है. अगर पता होता तो उस का फोटो कभी न खींचता,’’ हेमंत ने रोहित के पापा के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘तड़ाक,’’ इस से पहले कि वे कुछ कह पाते हेमंत के पापा उस के गाल पर तमाचा जड़ते हुए चीखे, ‘‘अगर तुझे पता भी होता तो तू किसी दूसरी लड़की का फोटो खींच लेता,  वह भी तो किसी न किसी की बहन होती. शर्म नहीं आती ऐसी हरकत करते हुए.’’

‘‘भाई साहब, गलती इस की नहीं बल्कि मेरी है. मैं ने ही रोहित को इतनी छूट दे रखी है कि यह अच्छेबुरे का भेद भूल गया है. आज इस की बहन का फोटो खिंच गया तो इसे तकलीफ हो रही है, लेकिन यही फोटो किसी और की बहन का होता तो इसे आनंद आ रहा होता,’’ रोहित के पापा ने आगे आ कर हेमंत के पापा का हाथ थाम लिया.

‘‘तुम लोगों को सोचना चाहिए कि जिन लड़कियों के साथ तुम छेड़छाड़ करते हो वे भी किसी न किसी की बहन होती हैं. तुम लोगों की हरकतों से उन्हें कितनी तकलीफ होती होगी, सोचा है कभी?’’ प्रिंसिपल साहब ने भी कड़े स्वर में डांटा.

‘‘सर, हमें माफ कर दीजिए,’’ रोहित ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘हां सर. हम लोग अब ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे,’’ हेमंत ने भी हाथ जोड़ कर माफी मांगी.

‘‘लेकिन फोटो वायरल होने से तान्या की जो बदनामी हुई उस का क्या होगा?’’ प्रिंसिपल साहब ने पूछा.

‘‘सर, फोटो मैं ने केवल अपनी क्लास के दोस्तों के ग्रुप पर ही डाला था. मैं अभी सब से हाथ जोड़ कर विनती करूंगा कि मेरी बहन का फोटो डिलीट कर दें,’’ हेमंत ने कहा.

‘‘ठीक है, जल्दी करो,’’ प्रिंसिपल साहब ने आज्ञा दी तो दोनों दौड़ते हुए क्लास में जा कर दोस्तों से फोटो डिलीट करने का आग्रह करने लगे. लेकिन अन्य दोस्तों से मामला पता चलने पर उन्होंने पहले ही ग्रुप से फोटो डिलीट कर दिया था.

‘‘घबराओ नहीं रोहित, तुम्हारी बहन हमारी भी बहन है. हम भी नहीं चाहेंगे कि उस के साथ गलत हो. साथ ही हम ने भी ऐसी छेड़खानी से तोबा करने की सोच ली है,’’ रमन सब की ओर से बोला. अब तक प्रिंसिपल साहब और हेमंत व रोहित के पापा भी क्लास में पहुंच गए थे. दोनों के पापा के चेहरों पर जहां पश्चात्ताप के भाव थे वहीं वे संकल्पित थे कि जरूरत से ज्यादा छूट दे कर बच्चों को बिगाड़ेंगे नहीं. साथ ही यह सुकून भी था कि बच्चों को अपनी गलती का एहसास हो गया है. रोहित और हेमंत की आंखें भी शर्म से झुकी हुई थीं. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: बलि- नरसिंह ने खिड़की से क्या देखा था?

Hindi Social Story: दिसंबर का महीना था. दोपहर के 2 बजे थे. सूरज चमक रहा था. अकसर 4 बजे खेतों पर आने वाला नरसिंह उस दिन 2 बजे ही आ गया था. खेत सुनसान पड़ा था. वहां सिंचाई का नामोनिशान नहीं दिखाई दे रहा था. ट्यूबवैल के चलने की भी आवाज नहीं आ रही थी. शायद बिजली नहीं थी. लेकिन उस समय तो कभी भी बिजली नहीं जाती थी. फिर क्या हुआ था? नरसिंह को कुछ समझ नहीं आया. नरसिंह ने एक बार फिर पूरे खेत पर अपनी नजर दौड़ाई. नौकर दुर्गा कहीं नहीं दिखाई दिया. बिजली नहीं होने की वजह से शायद वह अपने घर चला गया होगा.

बिजली का जायजा लेने के लिए नरसिंह ट्यूबवैल के कमरे की ओर बढ़ा. वहां दरवाजे पर ताला नहीं था, केवल सांकल लगाई जाती थी. हैरत की बात थी कि सांकल खुली हुई थी. नरसिंह कमरे का दरवाजा खोलने ही जा रहा था कि भीतर से किसी औरत और मर्द की हंसीठिठौली की आवाज सुनाई दी. नरसिंह ने अपना हाथ पीछे खींच लिया और दीवार में बने एक बड़े सूराख से भीतर देखने लगा. भीतर का नजारा देखते ही नरसिंह आगबबूला हो गया. उस का पूरा बदन पसीने से तरबतर हो गया. दरअसल, भीतर बिछी खाट पर उस की बेटी मालती और नौकर दुर्गा एकदूसरे से चिपके पड़े थे. उन के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था. नरसिंह को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मालती कालेज जाने के बहाने यहां नौकर दुर्गा के साथ कब से गुल खिला रही है. इसी उधेड़बुन में वह चुपके से वापस हो लिया और घर की तरफ चल दिया.

इधर दुर्गा मालती से कह रहा था, ‘‘मालकिन, आप बड़े घर की बेटी हैं. ऐसी गलती करना हम दोनों के लिए ठीक नहीं है.’’

‘‘दुर्गा, मैं तुम से प्यार करती हूं. मैं जानती हूं कि हमारी शादी कभी नहीं हो सकती. मेरे घर वाले नहीं मानेंगे. तुम्हारी बिरादरी के लोग भी नहीं मानेंगे. अगर हम घर से भी भागे, तो वे लोग हमें ढूंढ़ कर मार डालेंगे,’’ मालती अपने कपड़े पहनते हुए बोली.

‘‘तो भी मालकिन, ऐसा चोरीछिपे कब तक चलता रहेगा. आप रोज मेरे साथ यहां कमरे में समय बिताती हैं. अगर किसी को पता चलेगा तो…’’

‘‘तो क्या होगा…?’’ मालती बोली.

‘‘मुझे अपनी जान की परवाह नहीं है, पर आप का क्या होगा…’’ नौकर दुर्गा ने कहा.

‘‘मुझे कुछ नहीं होगा. और कुछ होगा भी तो तब देखा जाएगा. तब तक तो ऐसे ही चलने दो,’’ इतना कह कर मालती ने दुर्गा के होंठ चूम लिए. इस के बाद उस ने अपनी किताबें उठाईं और वहां से चली गई. दुर्गा ने पानी की मोटर चालू कर दी. खेतों में पानी चलने लगा था. वह फावड़ा ले कर कमरे से बाहर आ गया. दुर्गा और मालती का यह रिश्ता पिछले 6 महीने से गाढ़े से और गाढ़ा होता जा रहा था. नरसिंह के गांव के लोग हर साल अपने ग्राम देवता ‘अम्मोरू’ का उत्सव धूमधाम से मनाते थे. उस दिन गांव के सभी लोग गांव से बाहर बने देवी के मंदिर में ही रहते थे. उस मंदिर के चारों ओर नीम, पीपल, इमली वगैरह के बड़ेबड़े पेड़ लगे हुए थे. उत्सव वाले दिन गांव के हर घर की औरतें सुबहसवेरे नहा लेती थीं. वे नएनए कपड़े पहनती थीं. बड़ीबड़ी टोकरियों में देवी के भोग ‘बोनम’ का सामान रखती थीं. मंदिर के पेड़ों के नीचे 3 ईंटों से चूल्हा बनाया जाता था. मिट्टी के नए बरतनों में चावल, दाल, गुड़, नमक, हलदी वगैरह से देवी के लिए ‘बोनम’ पकाया जाता था.

नए घड़ों को धो कर उन्हें कुमकुम, हलदी और फूलों से सजाया जाता था. पकाए गए ‘बोनम’ को उन घड़ों में भरा जाता था. इस के बाद 3 या 5 के हिसाब से औरतें उन घड़ों को अपने सिर पर रखती थीं. ऐसा करने वाली औरतें सुबह से व्रत रखती थीं. उन के नए कपड़ों पर सोने चांदी के गहने भी होते थे. वे गले में फूलों के हार पहनती थीं. कुछ औरतें पैरों में घुंघरू भी बांधती थीं. हर औरत के हाथ में नीम की डंडी होती थी. इन औरतों के साथ इन के परिवार वाले भी होते थे. जुलूस में ढोलक और शहनाई बजाने वाले भी होते थे. लोग उन की धुन पर नाचते थे. कुछ औरतों में तो खुद ‘अम्मोरू’ आ जाता था. पुजारी ‘अम्मोरू’ को उतारने के लिए उन औरतों पर हलदी, कुमकुम, पवित्र पानी छिड़कता था और नीम की डंडी से हौलेहौले मारता था. पूरा जुलूस देवी के मंदिर की परिक्रमा करता था. मंदिर के बाहर चटाइयां बिछाई जाती थीं. पुजारी घड़ों में से निकाल कर आधा ‘बोनम’ चटाई पर निकाल कर रख देता था. फिर लोग जहां ‘बोनम’ पकाते थे, वहां जमा होते थे. वे पुजारी द्वारा वापस किए गए ‘बोनम’ को देवी का प्रसाद समझ कर खाते थे.

हर घर से एक मर्द नहाधो कर, नए कपड़े पहन कर सिर पर पगड़ी बांधता था. वह माथे पर कुमकुम का तिलक लगाता था. वह गले में नीम और फूलों की माला पहनता था. हाथ में नीम की डंडी पकड़ता था और देवी पर बलि चढ़ाने के लिए मुरगे, बकरी और शराब ले जाता था. तब तक देवी के मंदिर के सामने 2 पुजारी अपने हाथ में तलवार ले कर तैयार रहते थे. वहां नीम के पेड़ के नीचे ‘बलिवेदी’ थी. बलि चढ़ाने वाले जानवर का गला ‘बलिवेदी’ पर रख दिया जाता था और जानवर को मजबूती से पकड़ लिया जाता था. पुजारी अपनी तलवार से जानवर का गला काटता था. जानवर की कटी मुंडी देवी की तरफ गिरती थी और वह आदमी जानवर का धड़ वाला हिस्सा ले जाता था. यह सब सिलसिलेवार चलता रहता था. उस समय पुजारी और उन के हाथ की तलवार खून से लथपथ हो जाती थी. मंदिर के सामने खून की धारा बहती रहती थी. वहां का नजारा एकदम डरावना होता था.

उस दिन दुर्गा भी रगड़रगड़ कर नहाया था. उस ने नए कपड़े पहने थे. सिर पर पगड़ी बंधी थी. माथे पर तिलक लगाया था. उस ने 6 महीने से पाले एक बड़े से मुरगे को भी हलदी और कुमकुम लगाया था. उस के हाथ में शराब की एक बोतल भी थी. मंदिर में देवी की जयजयकार हो रही थी. लोग नाचगा रहे थे. शराब का सेवन भी हो रहा था. सुबह से शराब पीतेपीते पुजारी भी नशे में धुत्त थे. उन को सिर्फ ‘बलिवेदी’ पर रखे जानवर के सिर ही दिखाई दे रहे थे. दुर्गा लाइन में खड़ा था. जब उस की बारी आई, तो उस ने मुरगे को ‘बलिवेदी’ पर रखा. पुजारी ने तलवार उठाई. लेकिन यह क्या… मुरगे की गरदन के साथसाथ दुर्गा की गरदन भी काट दी गई. उस का जिस्म कुछ देर तड़प कर शांत हो गया. दुर्गा की ऐसी दर्दनाक मौत देख कर मंदिर में शोर मच गया. पुजारियों का शराब का नशा उतर गया. तलवारें नीचे गिर गईं. वे डर से थरथर कांप रहे थे.

गांव का मुखिया नरसिंह वहां आया. पुलिस बुलाई गई. पंचनामा हुआ. अफसरों की जेबें भर गईं. ‘ऐसा नहीं होना चाहिए था, पर देवी की यही इच्छा थी. हम कुछ नहीं कर सकते. दुर्गा धन्य था, जो देवी की बलि चढ़ गया,’ पंचनामे में ऐसा लिखा गया. नरसिंह ने दस्तखत कर दिए. इस घटना के कुछ दिन बाद नरसिंह ने पुजारी को अपने खेत पर बुलाया और उसे एक महीने के भीतर नया पक्का मकान बना कर दिए. 2 महीने के बाद नरसिंह ने अपनी बेटी मालती की धूमधाम से शादी की. पूरा गांव शादी में आया था. नरसिंह ने अपनी बेटी की शादी में उस पुजारी की पत्नी को 10 तोले सोने का हार दिया और एक चमचमाती कार भी. शादी के समय मालती 3 महीने के पेट से थी. उस के पेट में दुर्गा का अंश पल रहा था. पर चिंता किसे थी, जब देवी की कृपा थी न. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: गर जरा बता देतीं- निशा किस बात से डरी-सहमी थी?

Hindi Social Story: ‘‘कुलक्षणी,अभी से जवानी फूट पड़ी… शर्म नहीं आई तुझे  बाप तो चला गया और मेरे ऊपर यह मुसीबत… किस से कहूं  क्या करूं ’’

पड़ोसिन अचला के रोनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर मैं ने उन के घर की घंटी बजाई. उन से हमारे बहुत ही अच्छे संबंध थे. दरवाजा खोलते ही मुझे देख कर वे रोते हुए बोलीं, ‘‘कहीं का नहीं छोड़ा इस ने मुझे… पिता तो चल बसे हैं… मेरा तो कुछ खयाल करती  मैं क्या इस के बारे में नहीं सोचती हूं  इसी के लिए तो जी रही हूं.’’

मैं ने पूछा, ‘‘पर हुआ क्या है ’’

‘‘अरे, पेट से है यह,’’ कह वे जोरजोर से रोने लगीं.

मैं भी सुन कर हैरान रह गई. फिर पूछा, ‘‘कैसे  कहां ’’

‘‘इसी से पूछो. मुझे तो कुछ बताती ही नहीं.’’

‘‘आप शांत रहें… मैं इसे अपने घर ले जाती हूं. वहां इस से सब कुछ प्यार से पूछती हूं,’’ कह मैं उसे अपने घर ले गई. निशा डरीसहमी चुपचाप मेरे साथ चल दी. घर आ कर मैं ने उसे अपने साथ खाना खिलाया. जिस तरह से वह बड़ेबड़े निवाले खा रही थी उस से मालूम होता था सुबह से कुछ नहीं खाया है बेचारी ने. जब वह खाना खा चुकी तो मैं ने प्यार से पूछा, ‘‘सचसच बताओ यह किस का काम है  डरो नहीं.’’

उस के मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला, ‘‘मामा.’’

‘‘क्या यह सच है ’’

वह बोली, ‘‘हां, मामा घर आते रहते थे. कभी चौकलेट लाते, कभी नई ड्रैस, तो कभी घुमाने ले जाते. मैं सोचती थी यह सब उन का लाडप्यार है… फिर एक दिन मां घर में नहीं थीं… और बस… मैं ने उन्हें मना भी किया, पर नहीं माने उलटे बाद में बोले कि मां को मत बताना… वे मर जाएंगी… मैं तुम से माफी मांगता हूं… फिर कभी ऐसा न होगा. यह सुन कर मैं बहुत डर गई और फिर मां को कुछ नहीं बताया,’’ और फिर वह जोरजोर से रोने लगी.

मात्र 13 वर्ष की थी बेचारी. अभी तो जवानी की दहलीज पर कदम ही रखा था. कैसे समझती वह सब, जब 42 वर्षीय मामा न समझा फिर मैं उसे समझाते हुए बोली, ‘‘धैर्य रखो, सब ठीक हो जाएगा… मैं तुम्हारी मां से बात करती हूं… तुम यहीं रहो.’’ फिर जब मैं ने उस के घर जा कर उस की मां अचला को सच बताया तो उन के तो जैसे पैरों तले से जमीन खिसक गई. बोलीं, ‘‘क्या  काश, मेरी अभी मौत हो जाए,’’ और फिर दहाड़ें मार कर रोने लगीं.

मैं उन्हें धैर्य बंधाते हुए बोली, ‘‘चलिए, निशा से बात कीजिए.’’ थोड़ी ही देर बाद निशा अपनी मां की छाती से लग रोते हुए बोली, ‘‘मां, तुम ने बोला तुम देर शाम बाहर मत जाओ, मैं नहीं गई. स्कूल से सीधे घर आओ, मैं आई. दुपट्टा ठीक से लो, मैं ने लिया. महल्ले के लड़कों से मत बोलो, मैं नहीं बोली. पर तुम ने यह कभी नहीं कहा कि मामा, चाचा, फूफा, मौसा आदि से भी दूर रहो. मैं कैसे समझती कि जिन की गोद में खेल कर बड़ी हुई वे ही ऐसा करेंगे  अगर तुम बता देतीं तो यह न होता मां.’’

अचला अपने माथे पर जोर से हाथ मारते हुए बोलीं, ‘‘तुम ठीक कह रही हो बेटी… तुम्हारी कोई गलती नहीं… सब ठीक हो जाएगा… हम कोई उपाय सोचते हैं… तुम डरो नहीं, तुम्हारी मां तुम्हारे साथ है,’’ कह अचला ने मेरी तरफ ऐसे देखा गोया पूछ रही हों कि तुम्हीं बताओ क्या करें. तब मैं ने उन का हाथ थाम कर कहा, ‘‘घबराएं नहीं, यह मेरी भी बच्ची है. मेरी जानपहचान की डाक्टर हैं. सब ठीक हो जाएगा…’’ Hindi Social Story.

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