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Indian Politics: अरुंधती की ‘आजादी’ पर अंकुश

Indian Politics: जम्मू कश्मीर की एक कड़वी सच्चाई तो 22 अप्रैल को पहलगाम हमले के साथ ही उजागर हो गई थी कि वहां बदला कुछ खास नहीं है और धरती की इस जन्नत की हकीकत अकसर बाहर नहीं आती. मीडिया को तो ऐसे मुद्दों से कोई सरोकार ही नहीं कि दरअसल जम्मू कश्मीर में चल क्या रहा है. यह दुसाहस जो लोग कर सकते हैं बुकर पुरुस्कार विजेता अरुंधती राय उन में से एक हैं जिन्होंने अपनी किताब आजादी, स्वतंत्रता फासीवाद कथा में कश्मीर का पूरा सच उधेड़ कर रख दिया है.

आजादी में वही सब कुछ है जो हर कोई नहीं जानता. मसलन यह कि देश में अधिनायकवाद और फासीवाद सर चढ़ कर बोल रहा है लेकिन धार्मिक ढोल ढमाकों के शोर में किसी को कुछ सुनाई नहीं देता. कश्मीर के बहाने दरअसल अरुंधती ने पूरी भगवा गैंग को घेर लिया था. आजादी निबंध संग्रह की 240 पन्नो की किताब है जिस का सार यह है कि कश्मीर में भारतीय सेना की कार्रवाईयां मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही हैं और अनुच्छेद 370 को हटाना एक औपनिवेशिक फैसला था जिस ने कश्मीरियों के सेल्फ डिसीजन पर हमला किया है. अन्याय और दमन के साथसाथ वहां से लापता हो रहे लोगों का जिक्र भी इस किताब में है.

अब सरकार को भला कहां आलोचक और उदारवादी भाते हैं सो उस ने भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 98 के तहत आजादी पर प्रतिबंध लगा दिया. ऐसी एक नहीं बल्कि 25 अन्य किताबों पर भी प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की गई जिन में घाटी की बदहाली पर लिखा गया था. फ्रीडम औफ स्पीच को धता बताती बीएनएस की धारा 98 की खूबी यह है कि इस के तहत सरकार बिना किसी सुनवाई के ऐसी किताबों, प्रकाशन और दस्तावेजों को जब्त कर सकती है जो उसे पसंद नहीं. यानी यह धारा एक तरह की तानाशाही ही है.

यह सोचना बेमानी है कि यह प्रतिबंध राज्य सरकार ने लगाया बल्कि यह जम्मू कश्मीर के गृह विभाग यानी एलजी मनोज सिन्हा के हुक्म पर लगाया गया है जो केंद्र सरकार के अधीन काम करते हैं. जानने वाले जानते समझते हैं कि अरुंधती और उन के जैसे उदारवादी लेखक भगवा गैंग की नजर में देशद्रोही, माओवादी, नास्तिक, अर्बन नक्सली और कभीकभी कांग्रेसी भी होते हैं. लिहाजा किसी को हैरत नहीं हुई. वैसे भी यह अघोषित रूप से एक सेंसर्ड खबर थी इसलिए बात दूर तलक नहीं जा पाई. Indian Politics

Uttarakhand Cloudburst : धराली की आपदा प्रकृति का भीषण प्रकोप

लेखक – डा. दीपक कोहली

Uttarakhand Cloudburst : उत्तराखंड के धराली गांव में 5 अगस्त को बादल फटने से भारी तबाही मची. कई लोग लापता हुए और कुछ के मरने की खबर आई. इस साल भी जिस तरह पहाड़ों पर जलप्रलय देखने को मिला उस ने तेजी से बदलते जलवायु परिवर्तन को ले कर चिंताएं खड़ी कर दी हैं.

हाल ही में उत्तराखंड राज्य स्थित उत्तरकाशी जनपद के धराली गांव में जो घटित हुआ वह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि विज्ञान, पर्यावरण और मानवीय लापरवाही के सम्मिलित प्रभावों का विस्फोट था. इस त्रासदी में दर्जनों जानें गईं, सैकड़ों लोग लापता हुए और पूरा गांव 20 सैकंड में पानी, मलबे और चट्टानों के सैलाब में समा गया. धराली, उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री मार्ग पर स्थित एक छोटा लेकिन पर्यटन और तीर्थ दृष्टि से महत्त्वपूर्ण गांव है. धराली कोई साधारण गांव नहीं. गंगोत्री धाम से केवल 18 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव तीर्थयात्रियों का एक प्रमुख पड़ाव रहा है. यह क्षेत्र हिमालय की मध्य श्रेणियों में स्थित है और 2,500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर बसा हुआ है. इस के पास ही भगीरथी, गंगा की प्रमुख धारा और कई ग्लेशियल धाराएं बहती हैं. यहां की चट्टानें अपेक्षाकृत भंगुर और अस्थिर हैं. यह संपूर्ण भौगोलिक स्थिति इसे अत्यंत आपदा-संवेदनशील बनाती है.

धराली जैसे गांव वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं के खतरे में हैं. उन की भौगोलिक स्थिति ऐसी घाटी में है जहां विशाल चढ़ावउतार, संकरी नालियां और नदियां हैं और वहां अत्यधिक बारिश होने की संभावना रहती है. 5 अगस्त को जब बादल फटा तो बाजार की दुकानें, मकान, होटल, होमस्टे सब तबाह हो गए और देखते ही देखते 30 फुट तक मलबा जमा हो गया. तीर्थ, पर्यटन, खेती, सेब बगीचे और बाजार जीवन की धड़कन हैं लेकिन जब इस तरह बादल फटते हैं तो सबकुछ मिनटों में मिट्टी में मिल जाता है. सड़कों का संपर्क टूट जाता है, बिजली, पानी, टैलीफोन, इंटरनैट जैसी बुनियादी सुविधाएं ठप हो जाती हैं, लोग अपने परिजनों की खोज में भटकने को मजबूर हो जाते हैं. धराली की घटना अविस्मरणीय है क्योंकि यह न केवल प्राकृतिक त्रासदी की तसवीर है बल्कि मानवजनित असंतुलन और जलवायु परिवर्तन के भयानक इशारे भी हैं इस में.

वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार, जब सीमित क्षेत्र, आमतौर पर कुछ किलोमीटर दायरे में, बेहद कम समय अर्थात एक घंटा या उस से कम समय के लिए 100 एमएम या उस से अधिक बारिश होती है तो उसे बादल फटना या क्लाउड बर्स्ट कहते हैं. इस से एकाएक बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है. ऐसा तब होता है जब नमी से भरी गरम हवा पहाड़ों, खासकर हिमालय-श्रृंखला के ऊंचे इलाकों से टकरा कर ऊपर उठती है, वहां वह अचानक ठंडी हो कर स्कंधीकृत (कंसोलिडेटेड) भारी वज्रपातीय बादलों में बदल जाती है. जब पानी का भार बादलों में बहुत अधिक हो जाता है तो वे अचानक गुरुत्वाकर्षण की वजह से भारी जलवर्षा के रूप में फूट पड़ते हैं. फटने की इसी प्रक्रिया में महज कुछ ही मिनटों में लाखों लिटर पानी धरती पर गिरता है, पहाड़ी ढलान होने के कारण यह पानी बहुत तेज बहाव के साथ मिट्टी, चट्टान, पेड़, घर, इंसान और जानवर तक सबकुछ बहा ले जाता है.

पहाड़ों की ढलानें पानी को रोक नहीं सकतीं, इसलिए बरसात का सैलाब तेजी से नीचे की ओर बहता है और प्रलय का दृश्य बन जाता है. जलपीडि़त गांव, टूरिस्ट, खेती, परिवहन, बाजार सबकुछ मिनटों में बरबाद हो जाता है. हादसे वाले दिन सुबह अत्यधिक आर्द्रता और स्थानीय तापमान असंतुलन के कारण संवहनीय बादल बने थे जिस से 3 से अधिक स्थानों पर एकसाथ बादल फटने की पुष्टि हुई. इस कारण मलबे के साथ पानी की अत्यधिक मात्रा ने पूरे क्षेत्र को तबाह कर दिया. इस बात में दोराय नहीं कि बादल फटना एक प्राकृतिक घटना है, जिस पर इंसानों का कोई जोर नहीं लेकिन यह भी एक उद्वेलित करने वाला तथ्य है कि जब पानी के निकलने के रास्तों, नालों-गदेरों के मुहानों पर कंक्रीट के बड़ेबड़े स्ट्रक्चर खड़े हो चुके हैं तो फिर उन तमाम जगहों से जिन रास्तों से पानी को बहना था आखिर वह कैसे निकलेगा. उन रास्तों पर तो ‘प्रकृतिप्रेमी’ इंसान बस चुका है. स्पष्ट है कि यह जानबूझकर आफत बुलाने जैसा है. इसी के चक्कर में भारी जनधन की हानि ?ोलनी पड़ती है.

वैज्ञानिकों का एक अन्य अनुमान है कि धराली के पास स्थित एक ग्लेशियर ?ाल भी फटी हो सकती है, जिस से ?ाल में जमा बर्फ और पानी एकसाथ नीचे की ओर बहा. यदि यह सच है तो यह एक हिमनद ?ाल के फटने से बाढ़ की घटना थी, जो हिमालयी क्षेत्रों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण तेजी से बढ़ रही है.

2025 तक भारत में 300 से अधिक संभावित हिमनद  के फटने से बाढ़ की घटना के स्पौट चिह्नित किए जा चुके हैं. इस के अलावा धराली की त्रासदी को जलवायु परिवर्तन से अलग कर के नहीं देखा जा सकता. पिछले दो दशकों में हिमालयी क्षेत्र में औसत तापमान 1.3 डिग्री सैल्सियस तक बढ़ चुका है. इस से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और ग्लेशियल ?ालें बन रही हैं. वर्षा का पैटर्न अनियमित हुआ है, कभी बहुत कम तो कभी बहुत अधिक वर्षा.

मानसून अब हिमालय में ज्यादा तीव्र और अस्थिर हो चला है. जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल की रिपोर्ट्स पहले ही इस क्षेत्र को ‘हौटस्पौट औफ हाइड्रो-क्लाइमेटिक रिस्क’ घोषित कर चुकी हैं.

अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप

धराली त्रासदी की एक बड़ी वजह अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप भी रहा. सड़क चौड़ीकरण परियोजनाएं, भारी मशीनों से पहाड़ों की कटाई, पर्याप्त रिटेनिंग वाल न होना, मलबा नदियों में डाला जाना आदि से प्राकृतिक जल निकासी तंत्र अवरुद्ध हुआ. अवैध होटल और निर्माण कार्य, बगैर पर्यावरणीय स्वीकृति के निर्माण, नदी किनारे और ढलानों पर होटल, सीवेज और कचरा सीधे नदियों में, पेड़ों की कटाई और भूमि अपरदन, भूमि की जलधारण क्षमता कम हुई, जड़ें मिट्टी को पकड़ नहीं सकीं, भूस्खलन की संभावना बढ़ी.

सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न जनहित याचिकाओं में समयसमय पर गाइडलाइन जरूर दी हैं, मगर इन्हें ताक पर रख कर अनापशनाप निर्माण तो जैसे पहाड़ों में रिवाज हो चला है. यदि जलवायु परिवर्तन और मौसमी बदलावों के बीच हम पर्यावरण और परिस्थितिकी से तालमेल बनाने के बजाय हालात को मनमाने ढंग से रौंदते चले जाएंगे तो निश्चित ही ऊपरी हिमालय में होने वाली हलचलें धराली जैसे मंजर दोहराती रहेंगी.

मौसमी बदलावों के कारण ऊपरी हिमालय में ग्लेशियरों के गलन की बढ़ती गति और भूगर्भीय हलचलें बड़े पैमाने पर मलबा जुटा रही हैं. वहां बारिश और हिमस्खलन से अस्थायी ?ालें बन रही हैं. बादल फटने और अतिवृष्टि जैसे प्रकोपों के दौरान मौका पाते ही सारा मलबा बाढ़ और भूस्खलन को साथ ले कर कई गुना ताकत से बह कर नीचे तबाही मचा डालता है. धराली के जलप्रलय के पीछे भी विशेषज्ञ यही अनुमान लगा रहे हैं कि पानी का ऐसा रौद्र रूप ऊपर किसी अस्थायी ताल या ?ाल के टूटने से ही संभव है.

हादसों के कारणों को नजरअंदाज करना घातक

पुराने समय में लोगों को प्रकृति के साथ रहने और उस का मिजाज समझने का गहरा और व्यावहारिक सलीका आता था. हिमालय में उच्चे पथों पर धार्मिक और सांस्कृतिक यात्राओं का उद्देश्य ही यह था कि वहां होने वाली हर हलचल से वाफिक रहें. अब खासकर पहाड़ों में पर्यटन के बढ़ते रु?ान ने नए तरह के दबाव पैदा किए हैं. पुरानी परंपराएं और परिपाटियां पर्यटन का आधुनिक चोला ओढ़ कर उद्देश्यों से भटक चुकी हैं. बेशक पर्यटन से लोगों की आजीविका के रिश्ते को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन क्या इसे इतनी हद तक छूट दे दी जाए कि आपदा और मनुष्य के बीच बचाव की गुंजाइशें न रहें? भू-गर्भशास्त्री धराली को पहले ही बारूद का ढेर बताते रहे हैं लेकिन इन चेतावनियों को अनसुना कर सरकारें यहां पर्यटन संबंधी व्यापार का सपना संजोती आई हैं.

अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में अनियंत्रित और अराजक पर्यटन को ले कर यहां तक कह डाला कि सूरते हाल यही रही तो हिमाचल देश के नक्शे से मिट जाएगा. अदालत ने वहां आई आपदाओं को कुदरती कोप नहीं, मानवीय कारस्तानी बताया है. सर्वोच्च अदालत 2013 में लगभग यही बातें उत्तराखंड के बारे में भी कह चुकी है. केदारनाथ की विनाशलीला के फौरन बाद 13 अगस्त, 2013 को ‘अलकनंदा हाइड्रो पावर प्रोजैक्ट बनाम अनुज जोशी व अन्य’ के केस में फैसला सुनाते हुए जस्टिस के एस राधाकृष्णन और जस्टिस दीपक मिश्रा ने उत्तराखंड की सूरत ए हाल के लिए जलविद्युत परियोजनाओं को जिम्मेदार ठहराया था जोकि अदालत के ही शब्दों में ‘बगैर किसी ठोस अध्ययन के आननफानन मंजूर की जा रही हैं.’

हम ने देखा था कि केदारनाथ की त्रासदी पर पूरा देश एकजुट दिखा था और केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, निजी घराने, समाचारपत्र समूह, न्यास, सामाजिक संगठन और विद्यार्थियों समेत देश का हर तबका तनमनधन से सहायता को आगे आया था तब सरकारें चाहतीं तो सहानुभूति के उस जज्बे को हिमालय और उस के पारिस्थितिक तंत्र की चिंताओं से जोड़ कर देख सकती थीं. हिमालय की हिफाजत से संबंधित सिफारिशों, निर्णयों और नीतियों को अमली जामा पहनाने का उस से सटीक अवसर कोई और नहीं हो सकता था.

यह देशभर से मिली सहायता और सहानुभूति का संतोषप्रद विनिमय होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हादसों के बावजूद सरकारें हिमालय की इकोलौजी के मद्देनजर भू-वैज्ञानिकों की दीर्घकालिक चिंताओं से आंखें मूंद लेना चाहती हैं. वे ऊपरी हिमालय में होने वाली हलचलों और उन के खतरों के गहन वैज्ञानिक विश्लेषणों में नहीं जाना चाहतीं. हिमालय के संरक्षण को नियोजन का केंद्रबिंदु बनाए बिना बात नहीं बनने वाली. धराली इस कड़ी में एक और नसीहत है.

विकास की असंतुलित होड़

धराली की विनाशलीला केवल एक प्राकृतिक दुर्घटना नहीं है, यह हिमालय के साथ हमारी विकास की असंतुलित होड़ का दुष्परिणाम है. जब तक हम प्रकृति के संतुलन को नहीं सम?ोंगे और विज्ञान आधारित नीतियों को लागू नहीं करेंगे, तब तक ऐसी घटनाएं बारबार होती रहेंगी. हमें न सिर्फ राहत और बचाव पर ध्यान देना है, बल्कि पूर्वानुमान, तैयारी और सतत विकास की ओर बढ़ना होगा. धराली की घटना एक चेतावनी है, अब भी समय है संभलने का. उत्तरकाशी हादसा सिर्फ एक दुखद घटना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक चेतावनी है. यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि विकास के नाम पर हम प्रकृति से कितना दूर जा चुके हैं. यदि समय रहते हम ने अपने तरीके नहीं बदले तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और अधिक विध्वंसकारी हो सकती हैं. हमें याद रखना होगा कि पहाड़ों को काट कर विकास नहीं होता, बल्कि उन्हें सुरक्षित रख कर ही सच्ची प्रगति संभव है. Uttarakhand Cloudburst.

 

 

 

 

Relationship Tips : गरीब घर की बेटी जब बहू बन जाए

Relationship Tips : शादी को ले कर हमारे समाज में आज भी यह पुरातन धारणा कायम है कि शादी जन्मजन्मांतर का बंधन है. इस बंधन की पवित्रता को बनाए रखने के लिए एक आदर्श नारी की जरूरत होती है. यही कारण है कि शादी के लिए लोग ऐसी लड़की की तलाश करते हैं जो इस पुरानी धारणा में फिट हो सके. आदर्श बहू की तलाश में कई लोग गरीब घरों की ओर रुख करते हैं ताकि अभावों में गुजरबसर करने वाली लड़की एक धनी परिवार में आ कर खुद को कृतज्ञ महसूस करे और हमेशा दब कर रहे. लेकिन कई बार शादी के बाद जब यह भ्रम टूटता है तो लोग तिलमिला उठते हैं.

अपने छोटे भाई, बेटे या पोते की शादी के लिए लड़की की तलाश करने वाले लोगों के मन में अपनी मां या बीवी जैसी बहू की कल्पना होती है जो घर संभाले, बच्चों की देखभाल करे, पूरे घर की साफसफाई करे, किचन संभाले और कभी शिकायत न करे. पति थप्पड़ मारे, सास ताने मारे, ननद और जेठानी की सुनती रहे और कभी ऊंचे सुर में बात न करे. ऐसी अबला नारी बहू के रूप में सब को सुहाती है. मगर अब वह जमाना बीत चुका है. गांव हो या शहर, आज की लड़कियां अब ऐसी बहू बनना स्वीकार नहीं कर रहीं. आज की लड़कियां पहले वाली जेनरेशन की औरतों जैसी गुलाम नहीं रह गई हैं. लड़किया पढ़ रही हैं, कालेज तक पहुंच रही हैं, इसलिए अब वे कुछ हद तक आजादी के माने समझाने लगी हैं. शादी के बाद उन की आजादी पर आंच आए, यह आज की लड़कियों को बरदाश्त नहीं. हालांकि कुछ लड़कियां खुशीखुशी बहू वाली पारंपरिक भूमिकाएं निभाती हैं लेकिन पुरानी वाली बहू की भूमिका तो उन्हें भी कतई मंजूर नहीं. आज की पीढ़ी की ज्यादातर लड़कियां रिश्तों में संतुलन चाहती हैं. पति मनपसंद का है तो उस के परिवार के साथ थोड़ाबहुत तो एडजस्टमैंट कर सकती हैं लेकिन ज्यादा नहीं.

उत्तर प्रदेश जल विभाग से रिटायर्ड रामजीलाल नोएडा में रहते थे. नोएडा में रामजीलाल का खुद का मकान था. सरकार से मोटी पैंशन उन्हें मिलती थी. उन के 2 बेटे थे. 5 साल पहले बड़े बेटे अशोक की शादी धूमधाम से की थी. लड़की के घरवाले भी नोएडा में रहते थे और ज्यादा पैसे वाले थे. शादी के एक साल बाद ही अशोक अपनी पत्नी के साथ अलग रहने लगा. इस बात से रामजीलाल और उन की पत्नी बेहद नाराज थे. रामजीलाल अब अपने दूसरे बेटे अजय के लिए लड़की की तलाश कर रहे थे लेकिन इस बार उन्होंने तय किया कि वे अजय की शादी गरीब घर में करेंगे ताकि गरीब घर की लड़की घर में रह कर घर को संभाल सके. रामजीलाल ने बनारस में अपने पुराने दोस्त की बेटी से अजय की शादी तय कर दी. शादी बिना दहेज के हुई.

रामजीलाल बहुत खुश थे लेकिन उन की यह खुशी ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रही. एक साल में ही अजय अपनी पत्नी प्रियंका को ले कर फ्लैट में शिफ्ट हो गया. रामजीलाल जहां भी जाते, सब से यही कहते कि देखो, मैं अपने बेटे के लिए गरीब घर की लड़की लाया. जिस गांव की लड़की को अपने मायके में ढंग से खाना तक नहीं मिलता था उस लड़की को मैं गांव से उठा कर शहर में ले कर आया लेकिन उसे शहर की ऐसी हवा लगी कि एक साल भी वह घर में टिक नहीं पाई और मेरे शरीफ बेटे को बहका कर अलग रहने लगी.

तलाक के बढ़ते मामले औरतों की आजादी का संकेत

लड़कियों को ले कर पुरानी धारणाएं टूट रही हैं. बहुएं अब टिपिकल बहू की भूमिका में बंधना नहीं चाहतीं. लड़की चाहे गरीब घर की हो या अमीर घर की, वह अब गऊ नहीं रह गई. वह सोचनेसम?ाने लगी है. अब वह भले ही अरेंज मैरिज के जाल में फंस जाए लेकिन गुलाम बन कर जीवन नहीं गुजार सकती. यही वजह है कि तलाक के मामले तेजी से बढ़े हैं. हैरानी यह है कि तलाक के बढ़ते मामलों को ले कर औरतों पर ही दोषारोपण किया जा रहा है. धर्मगुरुओं की पूरी लौबी इसे ले कर घबराई हुई है और तलाक के बढ़ते मामलों के लिए औरतों को संस्कारों में बांधने की दुहाई दे रही है. धर्मगुरुओं की यह जमात असल में पुरुषवाद की ठेकेदार भी है जिन्हें औरतों की आजादी और उन के आत्मसम्मान से नफरत है. पुरुषवाद के ये ठेकेदार तलाक के बढ़ते ट्रैंड की कितनी भी आलोचना करें, यह औरतों की आजादी का एक बेहतरीन संकेत है.

2023 में देशभर में फैमिली कोर्ट्स में लगभग 8.26 लाख मामलों का निबटारा हुआ था. औसतन हर दिन लगभग 2,265 मामले निबटाए गए. 2023 के अंत तक फैमिली कोर्ट्स में लगभग 11.5 लाख मामले पैंडिंग थे. नैशनल फैमिली एंड हैल्थ सर्वे के मुताबिक पिछले 5 सालों में तलाक के मामलों में 35 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो काफी हैरान करने वाला आंकड़ा है. इस के अलावा यूनाइटेड नैशंस की तरफ से जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में तलाक के मामले पिछले कुछ सालों में लगभग दोगुने हो चुके हैं.  तलाक के बढ़ते मामले भारतीय समाज की पुरानी धारणाओं के विरुद्ध हैं जहां औरतें एक मर्द के साथ जीवन गुजारने को विवश की जाती थीं और मर्द के मरने के बाद भी वे इस बंधन से मुक्त नहीं हो पाती थीं. हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के लागू होने के बाद से औरतों की इस विवशता पर लगाम लगी लेकिन औरतों को ले कर भारतीय समाज की मानसिकता में ज्यादा अंतर नहीं आया. यही कारण है कि औरतों के विरुद्ध हिंसा में भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक है.

समाज की विकृत मानसिकता

दहेज के नाम पर देश में प्रतिदिन 18 महिलाओं को मार दिया जाता है. दहेज हत्या में उत्तर प्रदेश 11,874 मौतों के साथ पहले नंबर पर है. वहीं, बिहार में 5,354, मध्य प्रदेश में 2,859, पश्चिम बंगाल में 2,389 और राजस्थान में 2,244 मौतें दर्ज की गईं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 से 2021 के बीच देशभर में 35,493 महिलाओं की मौत दहेज हत्या के कारण हुई, जो प्रतिदिन लगभग 20 मौतों के बराबर है. महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के मामले में भारत को दुनिया के सब से खतरनाक देशों में गिना जाता है. भारत में प्रतिदिन तकरीबन 90 रेप के केसेस दर्ज होते हैं. देश की राजधानी दिल्ली में (2022 के डाटा अनुसार) हर घंटे औसतन 3 बलात्कार की घटनाएं दर्ज हुईं.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के सब से ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए थे. साल 2022 में उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 65,743 मामले दर्ज हुए. यह देश के किसी भी राज्य की तुलना में सब से अधिक है, साथ ही साल दर साल यह आंकड़ा बढ़ा भी है. नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि रेप के 65 फीसदी से ज्यादा मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं. रेप के मामलों में कन्विक्शन रेट 30 फीसदी से भी कम है. 2022 में रेप के 18,517 मामलों का ट्रायल पूरा हुआ था. इस में 5,067 मामलों में आरोपी को सजा मिली थी. इसी तरह महिलाओं के खिलाफ अपराध के 1,50 लाख से ज्यादा मामलों के ट्रायल पूरे हुए जिन में 38,136 मामलों में ही आरोपी दोषी साबित हुए. महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में कन्विक्शन रेट 25 फीसदी है. यानी हर 4 में से 3 आरोपी बरी हो जाते हैं.

आंकड़ों के मुताबिक, 2018 से 2022 के बीच 5 साल में रेप के 74 हजार से ज्यादा मामलों के ट्रायल पूरे हुए. इन में से 46,973 मामलों में आरोपी को बरी कर दिया गया. यानी 5 साल में रेप के 10 में से 6 मामलों में आरोपी बरी हो गए. ये आंकड़े बताते हैं कि रेप के ज्यादातर मामले या तो अदालत में साबित नहीं हो पाते या फिर ये ?ाठे होते हैं.

टिपिकल बहू इतिहास की बात

भारतीय समाज में शादी का मतलब ही यही होता है कि घर की बहू अपने पति के सैक्स की भूख को शांत करने के अलावा घर के कामों की जिम्मेदारी स्वीकार करे. पुराने जमाने में संयुक्त परिवारों में बहू का मतलब एक ऐसी औरत से होता था जो चौकाबरतन करे, कपड़े धोए, सासससुर की सेवा करे, घर के बड़ों की डांटफटकार सुनती रहे और बिना गलती के गलती स्वीकार कर सिर ?ाकाए घर के कामों में लगी रहे. बचा हुआ खाए या भूखी सो जाए. कभी शिकायत न करे. ऐसी बहुओं का डंका बजता था. मिसालें दी जाती थीं. लोगों ने अपनी मां और दादी को ऐसे ही देखा है, इसलिए वह आज अपने बच्चों के लिए ऐसी ही गूंगीबहरी बहू की कामना करते हैं. आज जमाना बदल चुका है. अब ऐसी बहुएं बूढ़ी दादी बन चुकी हैं या इतिहास में दफन हो चुकी हैं.

आज की लड़कियों को पति नहीं पार्टनर चाहिए

आज की शहरी लड़कियां शिक्षित और आत्मनिर्भर हैं. वे अपने कैरियर और व्यक्तिगत विकास को प्राथमिकता देती हैं. घर की बहू बन कर रहने में उन की स्वतंत्रता और महत्त्वाकांक्षाएं सिमट जाती हैं, इसलिए वह पार्टनर बनना चाहती हैं, बहू नहीं. आज की लड़कियां अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेना चाहती हैं, मरजी का कैरियर हो, मरजी की शादी हो और जीवनशैली भी अपनी मरजी की हो. ‘पारंपरिक बहू’ की भूमिका में परिवार की अपेक्षाएं औरतों की व्यक्तिगत इच्छाओं पर भारी पड़ती हैं, इसलिए आज की लड़कियों को बहू वाली पुरानी लाइफस्टाइल कतई पसंद नहीं. आज की लड़कियां घरेलू जिम्मेदारियों के साथसाथ अपनी पहचान भी बनाए रखना चाहती हैं. वह परिवार के संस्कारों के भार के नीचे दब कर अपने अस्तित्व को खोना नहीं चाहतीं, इसलिए उन्हें बहू बनना मंजूर नहीं.

सास से छुटकारा

सास चाहे अमेरिका की हो या भारत के गांव की, एकजैसी ही होती हैं. बेटे से प्यार ही इतना होता है कि उस की जिंदगी में आने वाली औरत पर वे कभी भरोसा ही नहीं कर पातीं. बेटा अगर 40 साल का भी हो जाए तो वह अपनी मां के लिए छोटा सा बाबू ही बना रहता है. यहीं से समस्याएं शुरू होती हैं. पुराने जमाने की सास घर की मालकिन भी होती थी. बड़ा परिवार होने के कारण घर की सारी बहुएं सास के इशारों पर नाचती थीं. बहुओं को क्या पहनना है, कैसे रहना है, यह सब सास तय करती थीं. सास के दंभ और दमन की शिकार बहुएं जब सास बनती थीं तब वे अपनी बहुओं के साथ वैसा ही बरताव करती थीं जैसा उन के साथ हुआ था. अब परिवार छोटे होने लगे हैं. सयुंक्त परिवारों का जमाना लद चुका है. ऐसे में सास और बहू के रिश्ते भी पहले जैसे नहीं रह गए हैं. आज की बहुएं सास को कंट्रोल करने का गुर सीख चुकी हैं.

देरी से शादी के फायदे

एक समय था जब लड़कियों का मासिकधर्म शुरू होने से पहले ही उन्हें ब्याह दिया जाता था. इस से छोटी बच्चियों की शारीरिक व मानसिक स्थिति हमेशा कमजोर बनी रहती थी. बाल विवाह के नाम पर हर भारतीय घर में बलात्कार होता था और पुरुषवादी समाज इस बलात्कार को धर्म के नाम पर जस्टिफाई करता था. आज से 200 साल पहले राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों ने समाज की इस दकियानूसी मानसिकता के खिलाफ आवाज उठाई. राजा राममोहन राय ने 1820 के दशक में बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का विरोध किया. उन के प्रयासों से ही 1829 में सती प्रथा पर रोक लगी. सती प्रथा पर रोक तो लगी लेकिन बाल विवाह के खिलाफ कानून बनने में 100 साल का वक्त लगा और समाज सुधारकों के लंबे संघर्ष के बाद भारत में बाल विवाह के विरुद्ध पहला कानून 1929 में बनाया गया था, जिसे चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रेंट एक्ट 1929 या शारदा एक्ट के नाम से जाना जाता है.

इस कानून के तहत लड़कियों की शादी की न्यूनतम आयु 14 वर्ष और लड़कों की 18 वर्ष निर्धारित की गई थी. इसे बाद में संशोधित कर 2006 में प्रोहिबिशन औफ चाइल्ड मैरिज एक्ट लागू किया गया, जिस में लड़कियों की शादी की आयु 18 वर्ष और लड़कों की 21 वर्ष निर्धारित की गई. शारदा एक्ट के 100 साल बाद आज भी भारत से बाल विवाह की सामाजिक बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5, 2019-21) के अनुसार, 23.3 फीसदी लड़कियों की शादियां 18 वर्ष से पहले हुई थीं. ग्रामीण इलाकों में यह प्रतिशत और ज्यादा है विशेष रूप से बिहार,  झारखंड और राजस्थान जैसे राज्यों में.

हालांकि, पहले के मुकाबले हालात में काफी सुधार हुए हैं. सब से बड़ी बात यह है कि लड़कियां स्कूल तक पहुंच रही हैं. इस से उन में अपने लिए आत्मविश्वास पैदा हो रहा है. देश में कराए गए एक औल इंडिया सर्वे औन हायर एजुकेशन 2021-22 के अनुसार, उच्च शिक्षा में कुल नामांकन में लड़कियों की हिस्सेदारी 48 फीसदी है. ग्रौस एनरोलमैंट रेशियो के संदर्भ में 2019-20 में लड़कियों का जीईआर 27.3 फीसदी था, जो पुरुषों के 26.9 फीसदी से थोड़ा अधिक है. पिछले एक दशक में महिला नामांकन में 38.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है, जो लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है. इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि लड़कियों के कदम शिक्षा से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं. गति धीमी है लेकिन इस में कोई शक नहीं कि पहले के मुकाबले लड़कियां बेहतर स्थिति में हैं. ऐसे वक्त में लड़कियों को अरेंज मैरिज की पारंपरिक व्यवस्था में बांधना मुश्किल है. लड़कियां जल्दी शादी के चक्कर में नहीं फंसना चाहतीं.

लड़कियां शादी को टाल रही हैं जिस से उन्हें शिक्षा पूरी करने और अपने कैरियर को मजबूत करने का मौका मिल सके. देरी से शादी करने वाली लड़कियां अपनी जिंदगी में स्थिरता चाहती हैं. वे पति पर निर्भर नहीं रहता चाहतीं. आज की लड़कियों को ऐसा पति नहीं चाहिए जिस के टुकड़ों पर वे पलें बल्कि ऐसा पार्टनर चाहिए जिस के साथ मिल कर वे अपनी जिंदगी को खूबसूरत बनाएं. उम्र बढ़ने के साथ लड़कियां भावनात्मक रूप से अधिक परिपक्व होती हैं, जिस से वे वैवाहिक जीवन की जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से सम?ा और निभा सकती हैं. देरी से शादी करने वाली लड़कियां शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ रहती हैं.

लड़की गरीब घर की हो या अमीर घर की, शादी के नाम पर अब इन्हें बरगलाना मुश्किल है. जो लड़कियां नादानी में घरवालों की मरजी से शादियां कर रही हैं वे पहले की तरह अबला नारी बन कर विवाह को ?ोल नहीं रहीं. सो, तलाक के मामले बढ़ रहे हैं. इस बदलते वक्त में पुरुषवादी समाज को भी बदलना होगा और नारी के प्रति अपनी परंपरागत सोच को त्याग कर सहअस्तित्व के साथ नारी की आजादी को स्वीकार करना होगा. Relationship Tips

Relationship Advice: इस रिश्ते को सहेज कर रखें

Relationship Advice: यह सरकार 10 साल से मेरे बहनोई को परेशान कर रही है विपक्ष के नेता राहुल गांधी के इस बयान पर भले ही भाजपा की तरफ से थोड़ी बयानबाजी और राजनीति हुई हो, लेकिन इसे एक भाई का अपनी बहन के प्रति स्नेह और संरक्षण देने के नजरिए से देखा जाना ज्यादा अहम है.

राजनीति में भाईबहन की इस जोड़ी का प्यार कभी किसी से छिपा नहीं रहा है. अकसर दोनों एकदूसरे की तारीफ और वकालात करते रहे हैं. प्रियंका गांधी के पति राबर्ट वाड्रा के खिलाफ एक मामले में चार्ज शीट दायर हुई तो राहुल की भावनाएं उमड़ पड़ना कोई हैरत की बात नहीं कही जा सकती.

मामला कोई भी हो, भाई कोई भी हो बहन बहनोई को दिक्कत या संकट में देख कर खामोश नहीं रह सकता. प्यार और खून के रिश्तों की इस कशिश को कोई न तो नकार सकता और न ही चुनौती नहीं दे सकता.

बात राहुल और प्रियंका की ही करें तो जब भी राहुल पर कोई परेशानी या संकट आया है तो प्रियंका भी चुप नहीं रही हैं.

पिछले साल दिसंबर में जब संसद में धक्कामुक्की के दौरान राहुल गांधी ने कथित तौर पर एक महिला को धक्का दिया था तब भाजपा ने खासा बवाल मचाया था. इन्हीं दिनों में गृह मंत्री अमित शाह द्वारा डाक्टर भीम राव आंबेडकर पर की गई एक टिप्पणी पर विपक्ष ने उन की घेराबंदी कर रखी थी जिस से अमित शाह की किरकिरी हो रही थी. तब प्रियंका ने कहा था कि वे लोग अमित शाह को बचाने और उन की विवादित टिप्पणी पर से ध्यान बंटाने के लिए भैया पर धक्का देने का आरोप लगा रहे हैं. यहां गौरतलब है कि उन्होंने भैया संबोधन का इस्तेमाल किया था राहुल या राहुल जी नहीं कहा था.

राजनीति की हर बात को राजनितिक नजरिए से देखा जाना स्वभाविक है फिर भले ही उन के पीछे भावनाएं और प्यार छिपा हो या बयान या बात की असल वजह भावनात्मक लगाव हो. आम जिंदगी में भी भाईबहन एकदूसरे का सहारा बने खड़े नजर आते हैं.

इस दौर में हर रिश्ते में खुदगर्जी और दरकन साफसाफ नजर आती है. लोग मदद के वक्त कतराते नजर आते हैं लेकिन एक बहन हमेशा भाई के लिए आधी रात को भी दौड़ने तैयार रहती है. जबकि दौर ऐसा भी है कि वक्त दोनों के पास नहीं है.

भोपाल के एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज के एक प्रोफैसर की मानें तो मां के गुजर जाने के बाद उन की इकलौती बड़ी बहन से संबंध टेलीफोनिक और हायहेलो तक सीमित रह गए थे.

बहन पुणे में नौकरी करती है जिस का अपनी घर ग्रहस्थी की व्यस्तता के चलते भोपाल आनाजाना न के बराबर था. कभी आई भी कुछ घंटों के लिए जिस से भाईबहन इम्फार्मल हो कर पहले की तरह बतिया ही नहीं पाए. नहीं तो दोनों की शादी के पहले पुराने घर, बचपन की यादें और बातों में रात कब गुजर जाती थी इस का पता भी नहीं चलता था.

एक बार मालूम है तू बहुत छोटा था. 5-6 साल का तब एक बारात के पीछेपीछे चला गया था तब कितना परेशान हुए थे सब… और…एक बार तो हद हो गई थी 6-8 महीने का रहा होगा अब जयपुर वाले मौसाजी एक सेमिनार में शामिल होने भोपाल आए थे और तुझे गोद उठा कर हवा में उछाल रहे थे तब तूने उन के मुंह पर सूसू कर दी थी तो मम्मी, पापा, मौसी और मैं सब खिलखिला कर हंस पड़े थे तब मौसाजी ने झेंप मिटाते कहा था कि जैसे खुशी के आंसू होते हैं वैसे ही यह खुशी की सूसू है…और एक बार ….

प्रोफैसर साहब कालेज और घर गृहस्थी की सारी झंझटे भूलभाल कर बचपन में पहुंच जाते थे. लेकिन यह सिलसिला एक बार बंद हुआ तो वे भूल ही गए कि उन्मुक्त हंसी क्या होती है, मीठीमीठी यादें क्या होती हैं, बहन का प्यार क्या होता है. फिर एक दिन अचानक अप्रिय तरीके से ही सही वे दिन वापस लौटे.

हुआ यूं था कि उन का एमपी नगर चौराहे पर एक्सीडैंट हो गया. होश आया तो खुद को अस्पताल में पाया. आसपास नजर दौड़ाई तो सामने दीदी भी खड़ी थी. सदमे और सकते की सी हालत में हैरान यह सोचते रह गए कि वे भोपाल में हैं या पुणे में हैं.

कराहते हुए जब पूछताछ की तो पत्नी ने बताया कि उन्हें 8 घंटे बाद होश आया है शरीर में तीन जगह फ्रैक्चर हुआ था, एक माइनर सर्जरी हुई है. राहगीर उठा कर अस्पताल में भर्ती करा गए थे. पुलिस आई तो जेब में रखे आधार कार्ड और बाइक के नंबर से पहचान हुई और उसे खबर मिली.

अस्पताल आतेआते उस ने कैब में बैठेबैठे ही यह खबर घर के व्हाट्सऐप ग्रुप में शेयर कर दी थी. दीदी ने पढ़ा तो जिस हालत में थी उसी में भागीभागी आई. इत्तफाक से पुणे से भोपाल की फ्लाइट भी मिल गई. 4 घंटे में वे भोपाल आ गई थीं लेकिन तब से पानी तक नही पिया कहती रहीं कि जब तक गुल्लू का औपरेशन नहीं हो जाता और वह होश में नहीं आ जाता, तबतक अन्न जल कुछ नहीं लूंगी.

2 घंटे में जाने कितनी मन्नते मांग चुकी हैं. खैर, खतरे की बात नहीं डाक्टर्स ने कहा है कि 4 दिन बाद डिस्चार्ज कर देंगे.

प्रोफैसर साहब हतप्रभ रह गए. क्योंकि लगभग सभी जगह खबर हो जाने के बाद भी देखने कोई परिचित रिश्तेदार अस्पताल नहीं आया था जिन्होंने ग्रुप में मेसेज देख लिया था उन में से अधिकतर ने डिजिटल संवेदनाएं प्रगट कर दी थीं कि ओह दुखद खबर… गेट वेल सून या ईश्वर उन्हें जल्द स्वस्थ करे….अगर कोई जरूरत हो तो इन्फार्म करें. लेकिन जिसे आना था वह बिना एक सेकंड का भी वक्त गंवाए पुणे से भोपाल आ गई थी और वह सिर्फ एक बहन ही हो सकती थी.

आंखों में अब दर्द के बजाय खुशी के आंसू थे. बहन ने जैसे ही होले से सर पर हाथ रखा तो उन्हें लगा अम्माबाबूजी का स्पर्श मिल गया. कुछ दिन बाद डिस्चार्ज हो कर अस्पताल से घर आ गए. बहन तो दूसरे ही दिन पुणे चली गई थी लेकिन घर आने के तीसरे ही दिन जीजाजी और भांजे के साथ फिर भोपाल आ गई और तीन दिन रुकी रही.

इस दौरान कुल चार दोस्त रिश्तेदार ही अस्पताल आए जबकि सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स पर सैकड़ों लोगों से उन की यारी दोस्ती थी. बहन आई तो बिना रक्षाबंधन के ही राखी जैसा बल्कि उस से भी बढ़ कर त्योहार मन गया.

नई पुरानी बातें हुई भोपाल घूमेफिरे नएनए पकवान घर में बने, कैरम और लूडो के गेम्स हुए, ब्लूटूथ स्पीकर चालू कर कराते पर गाने गाए गए, बहुत दिनों बाद टाकीज में फिल्म देखी गई, भोपाल के नामी रैस्टोरेंट्स में डिनर हुए और भी न जाने क्याक्या हुआ जो सालों से नहीं हुआ था. तब उन्हें लगा था कि काश वक्त यहीं ठहर जाए.

लेकिन वक्त कभी किसी के लिए ठहरता नहीं 3 दिन रुक कर बहन चली गई तब तक वे पूरी तरह ठीक हो गए थे और पहले की तरह चलनेफिरने लगे थे.

इस हादसे ने उन्हें यह सबक जरूर सिखा दिया कि बहन बहन होती है और मुसीबत में वही काम आती है. छोटे बच्चे को पड़ोसी के हवाले कर कैसे वह भाग कर पुणे से भोपाल आ गई. न पैसों का मुंह देखा और न ही वक्त का और उन से भी अहम काम जीजाजी ने किया जो किसी किस्म का एतराज नहीं जताया और फिर खुद भी साथ आ गए.

यह किसी एक का नहीं बल्कि तमाम बहनों का हाल है जो भाई को परेशानी में देख कुछ नहीं सोचती सिवाय इस के कि मेरा भाई खुश और सलामत रहे.

अपवाद स्वरूप ही ऐसा होता है कि भाई को जरूरत होने पर बहन आए नहीं. संजय और संजना के उदाहरण से तो यह भी समझ आता है कि विवाद होने पर भी बहने अपना फर्ज और प्यार नहीं भूल पातीं.

कारोबारी पिता की मौत के बाद उन की कोई 3 करोड़ की संपत्ति में संजना ने हिस्सा क्या मांग लिया संजय ने उसे न केवल सोशल मीडिया से बल्कि जिंदगी से ही ब्लौक कर दिया.

मामला अदालत में चल रहा है लेकिन जीएसटी चोरी के मामले में संजय गिरफ्तार हुआ तो सब से पहले संजना भाग कर आई और जमानत का इंतजाम किया. 4 दिन उस ने अपनी भाभी और भांजी को भी संभाला जिन के हाथपांव फूल गए थे क्योंकि उन के खानदान में किसी ने कभी थाने वकीलों और अदालत का मुंह नहीं देखा था.

जमानत पर संजय जेल से बाहर आया तो बहन के गले से लिपट कर बच्चों की तरह रोया. 3 दिन जेल में रहते उसे दुनिया समझ आ गई थी और बहन के प्रति पूर्वाग्रह भी खत्म हो गया था.

अब मामला अदालत के बाहर घर पर ही सुलझ गया है. संजय संजना का हिस्सा देने खुशीखुशी तैयार हो गया है लेकिन संजना ने प्रतीकात्मक तौर पर ही अपनी जरूरत के मुताबिक एक चौथाई हिस्सा लिया.

संजय को इस बात पर भी गिल्ट फील हुआ कि बहन को पैसों की जरूरत थी और वह पैतृक संपत्ति में से अपना वाजिब हक मांग रही थी. लेकिन उस ने पूरी निर्ममता स्वार्थ और बेईमानी से कौरवों की तरह यह कहते एक छदाम भी देने से मना कर दिया था कि तुम्हारा हिस्सा तो तुम्हारी शादी और दहेज की शक्ल में ही चला गया था और इस खानदान में लड़कियों का पुश्तैनी जायदाद पर कोई हक नहीं बनता.

हालांकि उस के वकील ने बता दिया था कि कानूनन हिस्सा तो देना पड़ेगा आप उस से बच नहीं सकते.

संकट में यही बहन काम आई तो मन से मेल भी धुल गया और रिश्ता भी टूटने से बच गया निस्वार्थ प्यार समर्पण स्नेह और मित्रत्ता के इस रिश्ते को निभाने आप क्या कर रहे हैं कभी ईमानदारी से सोचें और खुद का अवलोकन भी करें.

बकौल संजय यह वही संजना है जो मुझे रात देर से आने पर पापा की डांट और मार से बचाने आधी रात तक दरवाजा खोलने जागती रहती थी. एक बार जन्मदिन पर दोस्तों का दबाव था कि मैं उन्हें होटल में पार्टी दूं तब तकरीबन 2 हजार रुपए का खर्च था. लेकिन पापा ने यह कहते मना कर दिया था कि इस फिजूलखर्ची के लिए उन के पास देने फालतू पैसे नहीं तो मेरा रुआंसा चेहरा देख संजना ने अपनी साइकिल के लिए जोड़े 1500 रुपए उदारतापूर्वक दे दिए थे. और एक मैं हूं जिस ने उसे उस का वाजिब हिस्सा देने से इंकार कर दिया था. एक बार भाई खुदगर्ज हो सकता है लेकिन बहन नहीं.

इस रिश्ते और भाईबहन के त्याग व प्यार को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता राहुल प्रियंका का उदहारण तो प्रसंगवश है. नहीं तो सोशल मीडिया पर आए दिन रियल किस्से वायरल होते रहते हैं जिन में भाईबहन के प्यार को सहज समझा जा सकता है.

– साल 2021 में वायरल हुई एक पोस्ट में केरल की आफरा और उस के भाई मोहम्मद रफीक की दास्तां बताई गई थी. ये दोनों ही एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी एसएमए यानी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से पीड़ित थे.

इस बीमारी में मसल्स बेहद कमजोर होती जाती हैं जिस से कुछ सालों में ही मरीज की मौत हो जाती है. इस का इलाज बेहद महंगा और मुश्किल भी है. आफरा की हालत बिगड़ने लगी तो उस ने यह ठान लिया कि कम से कम अपने डेढ़ साल के नन्हें मासूम भाई को तो बचाने कुछ किया जाए.

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक महंगी दवा जोलगेंस्मा की कीमत लगभग 16 करोड़ रुपए है.

आफरा ने सोशल मीडिया के जरिए और अपना खुद का यूट्यूब चैनल बना कर लोगों से मदद की अपील की इस बाबत कुछ रियल वीडियोज शेयर किए जिन में भाई के लिए उस का प्यार साफ झलकता था.

मुहिम रंग लाई और कुछ ही दिनों में उम्मीद से ज्यादा लगभग 47 करोड़ रुपए इकट्ठा हो गए लेकिन आफरा अपने भाई का इलाज देखने जिंदा नहीं बची अगस्त 2021 में उस की मौत हो गई.

आफरा चमत्कारिक ढंग से रफीक को जिंदगी दे गई और भाईबहन के प्यार और त्याग की मिसाल भी कायम कर गई.

– ऐसी ही दिल को छू लेने वाली सच्ची कहानी गुजरात के भरूच की शीतल की भी है जिस के मातापिता दोनों की मौत हो गई थी. जैसा कि होता है इस बुरे वक्त में किसी ने शीतल की मदद नहीं की तिस पर भी दिक्कत यह कि उस का छोटा भाई मानसिक और शारीरिक तौर पर विकलांग था. वह अपने रोजमर्रा के काम तक नहीं कर पाता था.

शीतल ने अपने दम और स्तर पर संघर्ष किया भाई की देखभाल के लिए उसने शादी भी नहीं की और जब भाई को फुल टाइम देखरेख की जरूरत पड़ने लगी तो उस ने अपनी लगी लगाई नौकरी भी छोड़ दी. वह खुद उसे अपने हाथ से खाना खिलाती थी नहलातीधुलाती थी कपड़े बदलती थी.

2024 में यह कहानी मीडिया की सुर्खियों में रही थी लेकिन इस के बाद शीतल ने ही मीडिया से दूरी बना ली थी. शीतल चाहती और स्वार्थी होती तो भाई को उस के हाल पर छोड़ कर अपनी दुनिया बसा सकती थी या उसे किसी विकलांगों वाले आश्रम में भी छोड़ सकती थी लेकिन ऐसा कुछ न कर यह साबित कर दिखाया कि एक बहन अपने भाई के लिए क्या कुछ नहीं कर सकती. Relationship Advice

Online Gaming पर रोक के और भी हैं पहलू

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द्यूतं केवलं राजसंनादति, यत्र न धूर्तता, तत्रैव संनादति।

अर्थात, जुआ केवल राजा के नियंत्रण में होना चाहिए, जहां कोई धोखाधड़ी न हो, केवल वही जुआ अनुमत है. सूत्र (3.20.14):

और

द्यूतपालः पणस्य दशमं भागं ददाति, अन्यथा दण्डः।

अर्थात, जुए का आयोजक (द्यूतपाल) दांव की राशि का दसवां हिस्सा (10 फीसदी) कर के रूप में देगा अन्यथा उसे दंडित किया जाएगा. सूत्र (3.20.15) और यह भी कि-

द्यूतं च पणस्तकं च संनादति, तद् द्यूताध्यक्षः संनादति। तस्य पंचभागं राजा हरति, शेषं द्यूतकरे ददातिI

अर्थात, जुआ और पणस्तक (सट्टेबाजी) को नियंत्रित किया जाए. द्यूताध्यक्ष (जुए का अधिकारी) इस की निगरानी करेगा. राजा को जीत की राशि का पांचवां हिस्सा (5 फीसदी) कर के रूप में मिलेगा और शेष राशि जुआ आयोजक (द्यूतकर) को दी जाएगी. (सूत्र 3.20.12-13)

ये सूत्र उस तथाकथित महान अर्थशास्त्री चाणक्य के अर्थशास्त्र के हैं जिस के नक़्शेकदम पर मौजूदा केंद्र सरकार चल रही है. समझने वाले समझ गए होंगे कि यहां इन का हवाला किसलिए दिया जा रहा है लेकिन उस से पहले बहुत थोड़े से में यह समझ लेना जरूरी है कि विष्णु गुप्त यानी चाणक्य घोर ब्राह्मणवादी था जिस ने अपने अर्थशास्त्र में जहां भी मुमकिन हो सका धार्मिक पाखंडों और ब्राह्मणवाद का जम कर महिमामंडन किया.

उस के मुताबिक, ब्राह्मण जन्मना पूजनीय है. उस का अपमान एक गंभीर अपराध है. ब्राह्मण पर कम से कम टैक्स राजा को लगाना चाहिए और राज्य में खुशहाली के लिए यज्ञ, हवन, अनुष्ठान वगैरह करते रहना चाहिए. साथ ही, राजा को चाहिए कि वह ब्राह्मणों को दानदक्षिणा देता रहे.

चाणक्य को मिनी या पोर्टेबल मनु न कहना उस के साथ ज्यादती होगी. वह वर्णव्यवस्था का भी हिमायती और वैदिक सिद्धांतों का समर्थक था. जुए और सट्टे के संबंध में जो सूत्र चाणक्य ने दिए, देश की मौजूदा भगवा सरकार उन्हें कब का अमली जामा पहना चुकी होती लेकिन आड़े वही संविधान और कानून आ गए जो उस से बीते 11 सालों से न निगले जा रहे हैं, न ही उगले जा रहे हैं. लेकिन जब उस की औनलाइन गेम्स से टैक्स वसूली की मंशा पूरी नहीं हुई तो उस ने इन्हें बंद करने के लिए कानून ही बना दिया.

आइए समझें कैसे-

संसद के मानसून सत्र में पेश किए गए विधेयकों की श्रृंखला में बीती 20 अगस्त को सरकार एक और नया विधेयक प्रमोशन एंड रैगुलेशन औफ औनलाइन गेमिंग 2025 ले कर आई जिसे राष्ट्रपति महोदया ने 22 अगस्त को मंजूरी दे दी. कहने को इस विधेयक, जो कानून बन चुका, का मकसद औनलाइन मनी गेमिंग पर रोक लगाना है लेकिन ऐसे गेम जिन पर पैसों का दांव लगा कर जीत-हार होती है वे अब कानूनन बंद हैं.

मसलन, ड्रीम 11 रमी और पोकर वगैरह. इन के इश्तिहार भी प्रतिबंधित हैं. सट्टेबाजी, जिसे चाणक्य पणस्तक कहता है, पर भी नकेल कसी गई है.

इस कानून को लागू करने के लिए एक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा जिस का नाम सैंट्रल औनलाइन गेमिंग अथौर्टी या राष्ट्रीय औनलाइन गेमिंग प्राधिकरण होगा. यह प्राधिकरण इलैक्ट्रौनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन काम करेगा. यही प्राधिकरण तय करेगा कि कौन सा खेल रियल मनी गेम है और कौन सा ईस्पोर्ट्स या सोशल गेम है. विधेयक के मुताबिक, रियल मनी गेम्स पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा. रियल मनी गेम्स वे गेम होते हैं जिन पर खिलाड़ी दांव पर असली पैसे लगाता है और जीतने पर उसे नकद ईनाम दिया जाता है. औनलाइन केसिनो गेम्स हैं रमी, पोकर, ब्लैक जैक, तीन पत्ती या फ्लेश आदि. ड्रीम11 जैसे गेम, जो अकसर चर्चा में रहते हैं और जिन में खिलाड़ी वास्तविक खेलों के आधार पर अपनी टीमें बनाते हैं और अपनी टीम के जीतने पर पैसा कमाते हैं, में आमतौर पर लेनदेन क्रैडिट कार्ड, यूपीआई या डिजिटल वैलेट के जरिए होता है. जाहिर है इस में फाइनैंशियल रिस्क रहता है.

इस कानून से संबंधित मामलों की सुनवाई सैशन कोर्ट या मजिस्ट्रेट कोर्ट ही करेगा. चूंकि यह एक केंद्रीय कानून है इसलिए पूरे देश में समान रूप से लागू होगा.

इस के तहत दिलचस्प बात यह है कि दांव लगाने वालों को पीड़ित मान कर किसी सजा का प्रावधान नहीं किया गया है. दोषी वे कंपनियां होंगी जो यह खेल खिलाएंगी. चूंकि इस अपराध को संग्येय माना गया है इसलिए पुलिस अपराधी को बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है. मजिस्ट्रेट कोर्ट अपराध तय करेगा, सुबूतों की जांच करेगा और जरूरी समझेगा तो मामले को ट्रायल कोर्ट भेज सकता है.

एक्ट बिलाशक अच्छा और आम लोगों के भले का है लेकिन बिना पैसे लिएदिए औनलाइन गेम्स अभी भी चल रहे हैं जिन्हें ईस्पोर्ट्स कहा जाता है और सरकार इस विधेयक के जरिए इन्हें प्रोत्साहन देने की बात कर रही है, मसलन केन्डी क्रश सागा और पबजी वगैरह. यानी, तमाम आरएमजी यानी रियल मनी गेम्स बंद हो गए हैं लेकिन बिना पैसे वाले चल रहे हैं.

जाहिर है, झंझट दांव यानी बेट की है, जो कम दिलचस्प नहीं.

लागू होते ही इस विधेयक को कानूनी चुनौतियां मिलनी शुरू हो गई हैं. मुद्दा पुराना लेकिन महत्त्वपूर्ण स्किल बनाम चांस का है. कई गेमिंग कंपनियों ने अदालत की शरण ली है जिन में से एक है ए23 जो रमी और पोकर गेम खिलाती है. इस कंपनी की एक प्रमुख दलील यह है कि यह एक्ट स्किल आधारित गेम्स को भी जुआ मान कर वैध व्यापार को अपराधीकरण करता है जो संविधान के अनुच्छेद 19 (1) ( जी) व्यापार की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है जो समानता की बात करता है.

28 अगस्त को कर्नाटक हाईकोर्ट में दाखिल इस कंपनी की याचिका के मुताबिक यह विधेयक बिना पर्याप्त परामर्श के पारित हुआ है जबकि सरकार पहले स्किल गेम्स को प्रोत्साहन दे रही थी. दरअसल, सरकार ने वाकई किसी से मशवरा नहीं किया और न ही औनलाइन गेमिंग कंपनियों से चर्चा करने की जरूरत महसूस की. आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव की मानें तो यह एक प्रतिबंधात्मक कानून है इसलिए किसी से परामर्श करना उचित नहीं समझा.

ए 23 की कोर्ट में दी गई दलीलों में से एक यह भी है कि इस से कोई 2 लाख नौकरियां और करोड़ों का निवेश (लगभग 23 हजार करोड़) खतरे में है. कंपनी ने अंतरिम राहत की मांग की जिस से एक्ट का नोटिफिकेशन रोका जा सके. गौरतलब है कि राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद सरकार 3 महीने के अंदर कभी भी अधिसूचना जारी कर सकती है, इसलिए अदालत ने इस पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते 8 सितंबर की तारीख दे दी ताकि वह अपना पक्ष रख सके. एक अहम बात जिस पर अदालत ने गौर नहीं किया वह सौलिसिटर जनरल तुषार मेहता का यह कहना था कि कोर्ट संसद द्वारा पारित कानून पर दखल न दे.

अब कई और औनलाइन गेमिंग कंपनियां कोर्ट जाने की तैयारी कर रही हैं क्योंकि कर्नाटक हाईकोर्ट ने दखल तो दे दिया है. इन कंपनियों के वकील सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले पलट रहे हैं जो स्किल बनाम चांस पर आधारित हैं. ए 23 की एक दलील यह भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि जुआ राज्य का विषय है.

इस और ऐसी कई दलीलों पर लोगों की निगाहें हैं क्योंकि अगर 8 सितंबर को कर्नाटक हाईकोर्ट कंपनी को अंतरिम राहत देता है या इस विधेयक को असंवैधानिक करार देता है तो आरएमजी प्लेटफौर्म फिर से शुरू हो जाएंगे. लेकिन कोर्ट को सरकार की इन दलीलों को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं होगा कि यह सार्वजानिक स्वास्थ से जुड़ा कानून है और अकेले कर्नाटक में ही 32 लोग आरएमजी के चलते आत्महत्या कर चुके हैं. लेकिन हालफिलहाल इस पर कोई चर्चा नहीं हुई कि क्या लत लगाने वाले गेम्स, जैसे कैंडी क्रश, सागा और पबजी के चलते कोई आत्महत्या नहीं हुई.

जिन दिनों इस विधेयक पर संसद में बहस हो रही थी उन्हीं दिनों यानी 21 अगस्त को तेलंगाना से खबर आई थी कि निर्मल जिले के भैंसा टाउन में रेशिन्द्रा नाम के 15 वर्षीय किशोर ने आत्महत्या कर ली. उस के पिता संतोष और मां ने बताया कि रेशिन्द्रा को पबजी खेलने की लत लग गई थी. वह बजाय पढ़ाईलिखाई के, दिनरात मोबाइल पर यह खेल खेला करता था जिस से तंग आ कर उन्होंने उस का मोबाइल छीन लिया था. इस से दुखी हो कर रेशिन्द्रा ने यह घातक कदम उठा लिया.

बच्चों से मोबाइल छीनने पर उन का आत्महत्या कर लेना कोई नई बात नहीं है आएदिन इस तरह की खबरें मीडिया की सुर्ख़ियों में रहती हैं. यानी, मोबाइल की लत बड़ी वजह है जिसे इस्तेमाल करने को सरकार ही मजबूर करती है. बेहतर तो यह होगा कि वह बच्चों के हाथ में मोबाइल आने से रोकने के कदम उठाए बजाय इस के कि सिर्फ आरएमजी को इस का जिम्मेदार ठहराते कानून ही ले आए. खटमल मारने को खटिया ही जला देने की यह सरकारी प्रवृत्ति कब दूर होगी, यह किसी को नहीं मालूम.

इसलिए यह सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है कि जिन आत्महत्याओं के लिए औनलाइन गेम्स को दोषी ठहराया जा रहा है उस के पीछे और भी कई सच हो सकते हैं, मसलन कर्ज और अवसाद जैसे कई कारणों पर पुलिस इन्वैस्टिगेशन की झंझट से बचने के लिए शौर्ट कट चुनती हो. अगर इन पर अदालत में दलीलें पेश की गईं तो मुकदमों का रुख पलट भी सकता है.

दरअसल, होता यह है कि जब कोई भी आत्महत्या होती है तो पुलिस मृतक का मोबाइल खंगालती है और अगर उस की हिस्ट्री में औनलाइन गेमिंग पाई जाती है तो झट से एफआईआर में दर्ज कर लिया जाता है कि आत्महत्या की वजह औनलाइन गेमिंग है.

जीएसटी की अधूरी मंशा

क्या सिर्फ यही या ऐसी ही कुछ वजहें हैं जिन के चलते सरकार यह नया विधेयक ले कर आई या कोई और भी वजह है जो सरकार को साल रही थी तो इस का जवाब हां में भी निकलता है. इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने 49 औनलाइन कंपनियों के खिलाफ 1.12 लाख रुपए के शोकौज नोटिस पर रोक यानी स्टे लगा दिया था.

सरकार ने 11 जुलाई, 2023 को जीएसटी काउंसिल की 50वीं बैठक में औनलाइन गेमिंग पर 28 फीसदी जीएसटी का फैसला लिया था. तब बहुत सी दलीलों के साथ सरकार की एक दलील यह भी थी कि औनलाइन गेमिंग भले ही चांस आधारित हो या स्किल आधारित हो पर इस में दांव लगाने की प्रकृति जुए के समान है. इसलिए इसे जीएसटी नियमों के तहत ऐक्श्नेबल क्लेम माना गया जो जुए और सट्टे की श्रेणी में आता है.

अब इसे मासूमियत कहें या दोगलापन कि यही सरकार कौशल यानी स्किल गेम्स को प्रोत्साहन देने की बात विधेयक में कर रही है जिस का उल्लेख ऊपर किया गया है.

जीएसटी के फैसले के साथ ही कई औनलाइन गेमिंग कंपनियों ने देश के 9 हाई कोर्ट में 27 याचिकाएं दाखिल की थीं, जिन पर सरकार ने ट्रांसफर पिटीशन दाखिल करते हुए सभी मामलों सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई किए जाने की अपील की थी ताकि एकसमान फैसला हो सके. सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2024 में इस से सहमति जताई और जनवरी 2025 में नोटिस जारी किए, इसी साल मई से सुनवाई शुरू हुई जो अगस्त तक चली.

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की जीएसटी वाली बात या दलील नहीं मानी तो वह विधेयक ही ले आई जिस से यह मामला प्रासंगिक नहीं रहा. लेकिन सरकार की रैट्रोस्पेक्टिव टैक्स की मांग कायम है और उस ने नए एक्ट के उल्लंघन पर पहली दफा पकड़े जाने पर एक करोड़ रुपए की पेनाल्टी और एक साल तक की कैद है, दोबारा पकड़े जाने पर पेनाल्टी 5 करोड़ रुपए और सजा 5 साल की है.

जाहिर है सरकार की मंशा या पहली प्राथमिकता अरबों रुपयों के टैक्स वसूली की थी जिस का कुछ हिस्सा अब पेनाल्टी की शक्ल में आएगा. ऐसा ही सुझाव चाणक्य देता है कि जुआ-सट्टा हो, तो राजा या शासन की सरपरस्ती में ही हो जिस से राजस्व बढ़े. लेकिन, उस पर अदालत ने पलीता फेरा तो सरकार विधेयक ले आई जो चूंकि मूलतया एक बुराई के खिलाफ है इसलिए दूसरे पहलुओं पर कोई ध्यान नहीं दे रहा. उन पहलुओं का हल इकलौता कानून नहीं, बल्कि जागरूकता भी है. लालच की प्रवृत्ति भी बड़ी वजह है जो गड़े धन जैसे पौराणिक किस्सेकहानियों से समाज में आई.

यह कैसे दूर होगी, यह किसी सरकार या जनता को नहीं मालूम. मालूम तो लोगों को यह भी नहीं कि देश में औफलाइन जुआ-सट्टा भी अपराध है लेकिन वह धड़ल्ले से क्यों होता है. अपराध तो देह व्यापार भी है जिस का दायरा महानगरों से ले कर गांवदेहातों तक फैला है. लेकिन कोई कानून उसे खत्म नहीं कर पा रहा. सो, आरएमजी बंद हो पाएगी, इस में शक क्यों न रहे. Online Gaming

Hindi Story : एक नई दिशा

सरिता, बीस साल पहले, सितंबर (द्वितीय) 2005

Hindi Story : वसुंधरा के लिए हाथ आए रिश्ते को दीनानाथ गंवाना नहीं चाहते थे लेकिन वसुंधरा को मंजूर न था. वह जिंदगी में कुछ करना चाहती थी. क्या वसुंधरा वह हासिल कर पाई जो चाहती थी? पोस्टमैन के जाते ही वसुंधरा ने जैसे ही लिफाफा खोला, खुशी से उछल पड़ी और जोर से आवाज लगा कर मां को बुलाने लगी.

मां गायत्री ने कमरे में प्रवेश करते हुए घबरा कर पूछा, ‘‘क्यों, क्या हो गया?’’

‘‘मां, आप की बेटी बैंक में अफसर बन गई. यह देखो, मेरा नियुक्तिपत्र आया है,’’ और इसी के साथ वसुंधरा मां से लिपट गई.

‘‘क्या’’ कहने के साथ गायत्री का मुंह विस्मय से खुला का खुला रह गया.

‘‘मां, मैं न कहती थी कि मैं एक दिन अपने पैरों पर खड़े हो कर दिखाऊंगी. बस, आप मुझे सहयोग दो. देखो मां, आज वह दिन आ गया,’’ वसुंधरा भावुक हो कर बोली.

मां की आंखों से खुशी के छलकते आंसू पोंछते हुए उस ने गले में चुन्नी डाली और बैग उठाते हुए बोली, ‘‘मां, मैं ममता मैडम के घर जा रही हूं, उन्हें अपना नियुक्तिपत्र दिखाने. मैडम कालेज से अब वापस आ चुकी होंगी.’’

वसुंधरा का बस चलता तो वह उड़ कर ममता मैडम के पास चली जाती, जो बीएससी में पहले साल से ले कर तीसरे साल तक उस को फिजिक्स पढ़ाती रहीं और उस का मार्गदर्शन भी करती रहीं. आज खुशी का यह दिन उन के मार्गदर्शन का ही नतीजा है. वसुंधरा को याद हैं अतीत के वे दिन जब प्राइमरी स्कूल के अध्यापक और 4 बेटियों के पिता दीनानाथ को अपनी बेटी वसुंधरा का सदैव अपनी कक्षा में प्रथम आना भी कोई तसल्ली नहीं दे पा रहा था. उन्होंने हड़बड़ाहट में उस का विवाह वहां तय कर दिया जहां के बारे में वसुंधरा कभी सोच भी नहीं सकती थी. वह भी उस समय जब वह बीएससी द्वितीय वर्ष में थी.

राजू उस की सहेली मंजू की मौसी का लड़का था. मंजू ने उस के बारे में सबकुछ बता दिया था. अपार संपत्ति ने राजू को गैरजिम्मेदार ही नहीं, विवेकहीन भी बना दिया था. कोई ऐसा व्यसन न था जिस का वह आदी न हो. बड़ों का सम्मान करना तो वह जानता ही न था.

वसुंधरा को यह जान कर घोर आश्चर्य और दुख हुआ कि राजू के बारे में सबकुछ जानने के बाद भी उस के पिता वहां उस के रिश्ते की बात चला रहे हैं.

‘पिताजी, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती और उस लड़के से तो हरगिज नहीं जिस से आप मेरा रिश्ता करना चाहते हैं,’ वसुंधरा ने पिता से स्पष्ट शब्दों में अपने विचार रखते हुए कहा.

‘तुम कौन होती हो यह फैसला लेने वाली? मैं पिता हूं और यह मेरा अधिकार व जिम्मेदारी है कि मैं तुम्हारा विवाह समय से कर दूं,’ दीनानाथ गरजते हुए बोले.

‘पिताजी, मैं अभी पढ़ना चाहती हूं, जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं,’ वसुंधरा गिड़गिड़ाते हुए बोली.

‘तुम्हारी 3 बहनें और भी हैं. मुझे उन के बारे में भी सोचना है.’

‘वसु, तू तो हमारी स्थिति जानती है बेटी, वह एक संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार है, फिर उन्होंने खुद ही तेरा हाथ मांगा है. तू खुद सोच, हम कैसे मना कर दें,’ मां ने वसुंधरा को प्यार से सम?ाते हुए कहा.

‘अरे, जवानी में थोड़ी नासमझ तो सभी दिखाते हैं लेकिन परिवार की जिम्मेदारी पड़ते ही सब ठीक हो जाते हैं,’ दीनानाथ ने लड़के का बचाव करते हुए कहा.

‘पिताजी, वह  खुद अपनी जिम्मेदारी उठाने के काबिल तो है नहीं, फिर परिवार की जिम्मेदारी क्या उठाएगा?’ वसुंधरा ने आवेश में आ कर कहा.

‘खामोश, अपने पिता से बात करने की तमीज भी भूल गई. मैं ने फैसला ले लिया है, तुम्हारा विवाह वहीं होगा,’ दीनानाथ चिल्लाते हुए बोले.

वसुंधरा सम?ा गई कि उस के विरोध का कोई फायदा नहीं है. वह सोचने लगी कि वादविवाद प्रतियोगिताओं में निर्णायकगण और अपार जनसमूह को अपने प्रभावशाली वक्तव्यों से प्रभावित करने वाली लड़की आज अपने विचारों से अपने ही मातापिता को सहमत नहीं करा पा रही है. घर पर उस के पिताजी ने सगाई की सभी तैयारियां शुरू कर दी थीं. वसुंधरा का मन बहुत बेचैन रहने लगा. किसी भी काम में उस का मन नहीं लग रहा था.

‘वसुंधरा, तुम्हारी फाइल पूरी हो गई?’ ममता मैडम ने ऊंची आवाज में पूछा.

‘मैडम, बस थोड़ा सा काम रह गया है,’ वसुंधरा ने ?ोंपते हुए कहा.

‘क्या हो गया है तुम्हें आजकल? प्रैक्टिकल की डेट आने वाली है और अभी तक तुम्हारी फाइल पूरी नहीं हुई. अभी फाइल पूरी कर के स्टाफरूम में ले आना,’ मैडम ने जातेजाते आदेश दिया.

वसुंधरा ने जल्दीजल्दी फाइल पूरी की और सीधे स्टाफरूम की ओर भागी. संयोग से ममता मैडम उस समय वहां पर अकेली बैठी फाइलें चैक कर रही थीं. जैसे ही वसुंधरा ने अपनी फाइल मैडम को दी, उन्होंने उस की परेशानी को भांपते हुए कहा, ‘क्या बात है, वसुंधरा, आजकल तुम कुछ परेशान लग रही हो. टैस्ट में भी तुम्हारे नंबर अच्छे नहीं आए. तुम तो बहुत होशियार लड़की हो और हमें तुम से बहुत उम्मीदें हैं.’

मैडम की बातें सुन कर वसुंधरा, जो इतने दिनों से घुट रही थी, फफक कर रो पड़ी. उसे रोते देख कर मैडम ने घबरा कर कहा, ‘क्यों, क्या हुआ? घर पर सब ठीक तो है?’

वसुंधरा ने रोतेरोते सारी बात मैडम को बता दी. उस की बातें सुन कर मैडम स्तब्ध रह गईं. इंसान की मजबूरी उसे कैसेकैसे कदम उठाने पर मजबूर कर देती है. काफी देर तक वे विचार करती रहीं. सहसा उन का मन उस के पिता से मिलने को करने लगा. हालांकि उस के पिता से मिलना उन्हें खुद बड़ा अटपटा लग रहा था लेकिन वसुंधरा को बरबादी से बचाने के लिए उन का मन बेचैन हो उठा.

‘तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे पिताजी से इस विषय में बात करूंगी. कल रविवार है, उन से कहना कि मैं उन से मिलना चाहती हूं. बस, तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो,’ मैडम ने वसुंधरा की पीठ थपथपाते हुए कहा. वसुंधरा खुश हो कर सहमति से सिर हिलाते हुए चली गई. दीनानाथ रविवार के दिन ममता मैडम के घर मिलने आ गए. उन के पति नीरज भी वहां पर मौजूद थे. चाय के बाद उन्होंने वसुंधरा के लिए आए रिश्ते के बारे में बातचीत शुरू की, ‘यह तो हमारे लिए खुशी की बात है कि ऐसा बड़ा घर हमें अपनी लड़की के लिए मिल रहा है.’

मैडम ने तमक कर कहा, ‘घर तो आप की बेटी के लिए अवश्य अच्छा मिल रहा है लेकिन आप ने वर के बारे में कुछ सोचा कि वह क्या करता है? कितना पढ़ालिखा है? उस की आदतें कैसी हैं?’

तब वे अति दयनीय स्वर में बोले, ‘मैडम, आप तो हमारे समाज के चलन को जानती हैं. अच्छेअच्छे घरों के रिश्ते भी दहेज के कारण नहीं हो पाते. फिर मैं अभागा 4 बेटियों का बाप, कैसे यह दायित्व निभा पाऊंगा? वह परिवार मु?ा से कुछ दहेज भी नहीं मांग रहा है. बस, लड़का थोड़ा बिगड़ा हुआ है पर मु?ो भरोसा है कि वसुंधरा उसे संभाल लेगी.’

‘उसे जब उस के मातापिता नहीं संभाल पाए तो एक 20 साल की लड़की कैसे संभाल लेगी?’ अचानक मैडम कड़क आवाज में बोलीं, ‘आप वसुंधरा की शादी हरगिज वहां नहीं करेंगे. वह उसे दुख के सिवा और कुछ नहीं दे सकता. आप उस परिवार की ऊपरी चमकदमक पर मत जाएं.’

वेलाचारी से खामोश बैठे रहे. मैडम अपने स्वर को संयत करते हुए उन्हें सम?ाने लगीं, ‘वसुंधरा एक मेधावी छात्रा है. उम्र भी कम है. शादी एक आवश्यकता है मगर मंजिल तो नहीं. उसे पढ़ने दीजिए. प्रतियोगिताओं में बैठने का अवसर दीजिए. एक अच्छी नौकरी लगते ही रिश्तों की कोई कमी उस के जैसी सुंदर लड़की के लिए न रह जाएगी. नौकरी न केवल उसे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएगी वरन उस के आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को भी बढ़ाएगी.’ मैडम की बातों से सहमत हुए बगैर वसुंधरा के पिता एकाएक उठ गए और रुखाई से बोले, ‘चलता हूं, मैडमजी, देर हो रही है. वसुंधरा की सगाई की तैयारी करनी है.’

वसुंधरा बेताबी से पिता के लौटने का इंतजार कर रही थी. उसे पूरा विश्वास था कि मैडम ने जरूर पिताजी को सही फैसला लेने के लिए मना लिया होगा. जैसे ही दीनानाथ ने घर में प्रवेश किया, वसुंधरा चौकन्नी हो गई.

‘सुनती हो, तुम्हारी बेटी घर की बातें अपनी मैडमों को बताने लगी है,’ पिताजी ने गरजते हुए घर में प्रवेश किया.

‘क्या हुआ? क्यों गुस्सा हो रहे हो?’ मां रसोईघर से निकलते हुए बोलीं.

‘अपनी बेटी से पूछो. साथ ही यह भी पूछना कि क्या उस की मैडम आएगी यहां इन चारों का विवाह करने?’ पिता पूरी ताकत से चिल्लाते हुए बोले.

वसुंधरा सहम कर पढ़ाई करने लगी. तीनों बहनें भी पिताजी का गुस्सा देख कर घबरा गईं.

वसुंधरा को यह साफ दिखाई  देने लगा था कि पिताजी को सम?ा पाना बेहद मुश्किल है. उसे खुद ही कोई कदम उठाना पड़ेगा. उस ने फैसला ले लिया कि वह किसी भी कीमत पर राजू से विवाह नहीं करेगी. भले ही इस के लिए उसे मातापिता के कितने भी खिलाफ क्यों न जाना पड़े. मैडम की बातों से वसुंधरा उस समय एक नए जोश से भर गई जब दूसरे दिन कालेज में उन्होंने कहा, ‘यह लड़ाई तुम्हें स्वयं लड़नी होगी, वसुंधरा. बिना किसी दबाव में आए शादी करने के लिए एकदम मना कर दो. तुम्हारी योग्यता तुम्हारी मंजिल के हर रास्ते को खोलेगी. मैं तुम्हें वचन देती हूं कि मैं तुम्हारा मार्गदर्शन करूंगी.’

उस ने सारी बातों को एक तरफ ?ाटक कर अपनेआप को पूरी तरह अपनी आने वाली परीक्षा की तैयारी में डुबो दिया.

‘बेटी, आज कालेज मत जाना. लड़के वाले आने वाले हैं. पसंद तू सब को है, बस, वे सब तुम से मिलना चाहते हैं. साथ ही अंगूठी की नाप भी लेना चाहते हैं,’ मां ने अनुरोध करते हुए कहा.

‘मां, मैं पहले भी कह चुकी हूं कि मैं यह विवाह नहीं करूंगी,’ वसुंधरा ने किताबें समेटते हुए कहा.

‘क्या कह रही है? हम जबान दे चुके हैं और सगाई की तैयारी भी कर चुके हैं. अब तो मना करने का प्रश्न ही नहीं उठता,’ मां ने वसुंधरा को सम?ाने की कोशिश करते हए कहा, ‘फिर मु?ो पूरा विश्वास है कि तू उसे अवश्य अपने अनुसार ढाल लेगी.’

‘मां, मैं अपनी जिंदगी और शक्ति एक बिगड़े लड़के को सुधारने में बरबाद नहीं करूंगी,’ वसुंधरा ने दृढ़ता से कहा. फिर मां की ओर मुड़ते हुए बोली, ‘आप के सामने तो घर में ही एक उदाहरण है चाचीजी, क्या चाचाजी को सुधार पाईं? चाचाजी रोज रात को नशे में धुत हो कर घर लौटते हैं और चाचीजी अपनी तकदीर को कोसती हुई रोती रहती हैं. उन के तीनों बच्चे सहमे से एक कोने में दुबक जाते हैं.

‘मैं न तो अपने समय को कोसना चाहती हूं न उस पर रोना चाहती हूं. मैं उस का निर्माण करना चाहती हूं,’ वसुंधरा ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा, ‘फिर मां, मैं आज वैसे भी नहीं रुक सकती. आज मेरा प्रवेशपत्र मिलने वाला है.’

‘2 बजे तक आ जाना. लड़के वाले 3 बजे तक आ जाएंगे.’

मां की बात को अनसुना कर वसुंधरा घर से निकल गई.

अपने देवर के बारे में सोच गायत्री भी विचलित हो गईं और अपनी बेटी का एक संपन्न परिवार में रिश्ता कराने का उन का नशा धीरेधीरे उतरने लगा.

‘कहीं हम कुछ गलत तो नहीं कर रहे हैं अपनी वसु के साथ,’ गायत्री ने शंका जाहिर करते हुए पति से कहा.

‘मैं उस का पिता हूं, कोई दुश्मन नहीं. मुझे पता है, क्या सही और क्या गलत है. तुम बेकार की बातें छोड़ो और उन के स्वागत की तैयारी करो,’ दीनानाथ ने आदेश देते हुए कहा.

वसुंधरा ने कालेज से अपना प्रवेशपत्र लिया और उसे बैग में डाल कर सोचने लगी, कहां जाए. घर जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था. सहसा उस के कदम मैडम के घर की ओर मुड़ गए.

‘अरे, तुम,’ वसुंधरा को देख मैडम चौंकते हुए बोलीं, ‘आओआओ, इस समय घर पर मेरे सिवा कोई नहीं है,’ वसुंधरा को संकोच करते देख मैडम ने कहा.

लक्ष्मी को पानी लाने का आदेश दे वे सोफे पर बैठते हुए बोलीं, ‘कहो, कैसी चल रही

है पढ़ाई?’

‘मैडम, आज लड़के वाले आ रहे हैं,’ वसुंधरा ने बिना मैडम की बात सुने खोएखोए से स्वर में कहा.

मैडम ने ध्यान से वसुंधरा को देखा. बिखरे बाल, सूखे होंठ, सुंदर सा चेहरा मुर?ाया हुआ था. उसे देख कर उन्हें एकाएक बहुत दया आई. जहां आजकल मातापिता अपने बच्चों के कैरियर को ले कर इतने सजग हैं वहां इतनी प्रतिभावान लड़की किस प्रकार की उल?ानों में फंसी हुई है.

‘तुम ने कुछ खाया भी है?’ सहसा मैडम ने पूछा और तुरंत लक्ष्मी को खाना लगाने को कहा. खाना खाने के बाद वसुंधरा थोड़ा सामान्य हुई.

‘तुम्हारी कोई  समस्या हो तो पूछ सकती हो,’ मैडम ने उस का ध्यान बंटाने के लिए कहा.

‘जी, मैडम, है.’

वसुंधरा के ऐसा कहते ही मैडम उस के प्रश्नों के हल बताने लगीं और फिर उन्हें समय का पता ही न चला. अचानक घड़ी पर नजर पड़ी तो पौने 6 बज रहे थे. हड़बड़ाते हुए वसुंधरा ने अपना बैग उठाया और बोली, ‘मैडम, चलती हूं.’

‘घबराना मत, सब ठीक हो जाएगा,’ मैडम ने आश्वासन देते हुए कहा.

दीनानाथ चिंता से चहलकदमी कर रहे थे. वसुंधरा को देख गुस्से में पांव पटकते हुए अंदर चले गए. आज वसुंधरा को न कोई डर था और न ही कोई अफसोस था अपने मातापिता की आज्ञा की अवहेलना करने का. कहते हैं दृढ़ निश्चय हो, बुलंद इरादे हों और सच्ची लगन हो तो मंजिल के रास्ते खुदबखुद खुलते चलते जाते हैं. ऐसा ही वसुंधरा के साथ हुआ. मैडम की सहेली के पति एक कोचिंग इंस्टिट्यूट चला रहे थे. वहां पर मैडम ने वसुंधरा को बैंक की प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के लिए निशुल्क प्रवेश दिलवाया. मैडम ने उन से कहा कि भले ही उन्हें वसुंधरा से फीस न मिले लेकिन वह उन के कोचिंग सैंटर का नाम जरूर रोशन करेगी. यह बात वसुंधरा के उत्कृष्ट एकेडमिक रिकौर्ड से स्पष्ट थी.

समय अपनी रफ्तार से बीत रहा था. बीएससी में वसुंधरा ने कालेज में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए और आगे की पढ़ाई के लिए गणित में एमएससी में एडमिशन ले लिया. कोचिंग लगातार जारी रही. मैडम पगपग पर उस के साथ थीं. वसुंधरा को इतनी मेहनत करते देख दीनानाथ, जिन की नाराजगी पूरी तरह से गई नहीं थी, पिघलने लगे. 2 साल की कड़ी मेहनत के बाद जब वसुंधरा भारतीय स्टेट बैंक की प्रतियोगी परीक्षा में बैठी तो पहले लिखित परीक्षा, फिर साक्षात्कार आदि प्रत्येक चरण को निर्बाध रूप से पार करती चली गई. वसुंधरा श्रद्धा से मैडम के सामने नतमस्तक हो गई. बैग से नियुक्तिपत्र निकाल कर मैडम के हाथों में दे दिया. नियुक्तिपत्र देख कर मैडम मारे खुशी के धम्म से सोफे पर बैठ गईं.

‘‘तू ने मेरे शब्दों को सार्थक किया,’’ बोलतेबोलते वे भावविह्वल हो गईं. उन्हें लगा मानो उन्होंने स्वयं कोई मंजिल पा ली है.

‘‘मैडम, यह सब आप की ही वजह से संभव हो पाया है. अगर आप मेरा मार्गदर्शन नहीं करतीं तो मैं इस मुकाम पर न पहुंच पाती,’’ कहतेकहते उस की सुंदर आंखों से आंसू ढुलक पड़े.

‘‘अरे, यह तो तेरी प्रतिभा व मेहनत का नतीजा है. मैं ने तो बस एक दिशा दी,’’ मैडम ने खुशी से ओतप्रोत हो उसे थपथपाते हुए कहा.

वसुंधरा फिर उत्साहित होते हुए मैडम को बताने लगी कि उस की पहले मुंबई में टे्रेनिंग चलेगी, उस के बाद 2 साल का प्रोबेशन पीरियड, फिर स्थायी रूप से औफिसर के रूप में बैंक की किसी शाखा में नियुक्ति होगी. मैडम प्यार से उस के खुशी से दमकते चेहरे को देखती रह गईं.

उस शाम मैडम को तब बेहद खुशी हुई जब दीनानाथ मिठाई का डब्बा ले कर अपनी खुशी बांटने उन के पास आए. उन्होंने और उन के पति ने आदर के साथ उन्हें ड्राइंगरूम में बैठाया. दीनानाथ गर्व से बोले, ‘‘मेरी बेटी बैंक में औफिसर बन गई,’’ फिर भावुक हो कर कहने लगे, ‘‘यह सब आप की वजह से हुआ है. मैं तो बेटी होने का अर्थ सिर्फ विवाह व दहेज ही सम?ाता था. आप ने मेरा दृष्टिकोण ही बदल डाला. मैं व मेरा परिवार हमेशा आप का आभारी रहेगा.’’

ममता विनम्र स्वर में दीनानाथ से बोलीं, ‘‘मैं ने तो मात्र मार्गदर्शन किया है. यह तो आप की बेटी की प्रतिभा और मेहनत का नतीजा है.’’

‘‘जिस प्रतिभा को मैं दायित्वों के बोझ तले एक पिता हो कर न पहचान पाया, न उस का मोल समझ पाया, उसी प्रतिभा का सही मूल्यांकन आप ने किया,’’ बोलतेबोलते दीनानाथ का गला रुंध गया.

‘‘यह जरूरी नहीं कि सिर्फ पढ़ाई में होशियार बच्चा ही जीवन में सफल हो सकता है. प्रत्येक बच्चे में कोई न कोई प्रतिभा अवश्य होती है. हमें उसी प्रतिभा का सम्मान करते हुए उसे उसी ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.’’

दीनानाथ उत्साहित होते हुए बोले, ‘‘मेरी दूसरी बेटी आर्मी में जाना चाहती है. मैं अपनी सभी बेटियों को पढ़ाऊंगा, आत्मनिर्भर बनाऊंगा, तब जा कर उन के विवाह के बारे में सोचूंगा. मैं समय का बलवान हूं जो मुझे ऐसी प्रतिभावान बेटियां मिली है. Hindi Story

Hindi Kahani : बंजर का बीज

Hindi Kahani : गरीबी इंसान को क्याक्या दिन नहीं दिखाती. सुष्मिता ने ऐसी गुरबत देखी थी कि बस अब उस ने ठान ली थी कि जो करना है अकेले ही करना है. सुष्मिता ने स्टोव पर चाय का पानी चढ़ाया और नौब घुमा कर फ्लेम को जरा सा कम किया. पानी में यंत्रवत चीनी व चायपत्ती डालते उस के हाथों का उस के दिमाग में चलती सोचों से कहीं कोई सामंजस्य नहीं था. दिमाग के घोड़े अपनी ही दिशा में दौड़ रहे थे. जतन से जमा की गई अपनी कीमती बचत का बड़ा हिस्सा वह ब्यूटीपार्लर का सामान खरीदने में खर्च कर चुकी थी. उस का सामान पैकिंग खुलने का और उस के हाथ अपना टैलेंट दिखाने का इंतजार कर रहे थे. अभी तक एक भी क्लाइंट की कौल नहीं आई थी.

जिस पार्लर में वह काम सीखती थी वहां एक बड़ी कालोनी की मैडम काम करवाने आती थी. उसे सुष्मिता का काम बहुत पसंद था और वह उस के अलावा किसी से काम नहीं करवाती थी. उसी मैडम ने सुष्मिता की मदद करने का वादा किया था और कहा था कि वह अपनी सोसाइटी के व्हाट्सऐप ग्रुप पर उस का नंबर डाल देगी. फिर सोसाइटी की महिलाएं उसे अपने घर पर मेकअप का काम कराने के लिए बुलाने लगेंगी. एक बार जो भी महिला उस से काम करवा लेगी, वह उसे बारबार बुलाएगी, इस बात का विश्वास मैडम को था. उस ने नंबर पोस्ट कर के सुष्मिता को बता भी दिया था.

तभी से उस की नजर फोन के स्क्रीन पर टिकी थी. लेकिन अब तक एक भी कौल नहीं आई. पता नहीं मैडम ने नंबर डाला भी है या उस का मन रखने के लिए यों ही बोल दिया. गरीबी की बंजर भूमि में सुष्मिता भरोसे के बाग लगाए भी तो कैसे. मेहनत का दामन पकड़ वह दो कदम चलती है, उस का बुरा समय तब तक वापस चार कदम चल चुका होता है. जब घर का किराया, बेटे की फीस और पेट की आग हर वक्त मुंहबाए खड़ी हो और आमदनी एक धेले की भी न हो तो सूखे आश्वासन का कोई क्या करे, उसे कौन से अकाउंट में जमा करे और कौन सी बुक से उस भरोसे के चैक काटे, सुष्मिता की सोच हवा के रथ पर सवार थी.

ऐसे में अपनी इस हालत के लिए जिम्मेदार उस पति नामक शख्स के लिए उस के दिल से निकली नकारात्मक बातें भी यहांवहां बिखरी पड़ी थीं, जो 17 साल की उम्र में एक बच्चे और एक टूटी हुई शादी के बो?ा से उसे लाद कर खुद दूसरी औरत के साथ रंगरेलियां मना रहा था. उसे न अपने बेटे की चिंता थी, न बीवी की परवा. वो पराया था, पराया ही रहा. लेकिन सुष्मिता का बाप, जो उसे इस दुनिया में लाया था, उस ने ही कौन सी कसर छोड़ दी उस की जिंदगी को बरबाद करने में. उस ने भी तो 16 साल की कच्ची उम्र में अपनी बेटी का हाथ उस राक्षस के हाथ में दे कर अपना पल्लू ?ाड़ लिया था.

मां, मां बेचारी क्या करती. वह तो खुद सारी उम्र उसी नालायक बाप से अपनी दुर्गति करवाती रही. उस को कमा कर और पका कर खिलाती रही. लेकिन जब बात बेटियों के भविष्य की आई थी तो उस ने काफी जोर मारा था. अपनी इस ऊबड़खाबड़ कहानी के छोर टटोलते उस की सोच के घोड़े जहां जा पहुंचे, वह था वेस्ट बंगाल का एक छोटा सा गांव. नाम था रिशोप. उस गांव के एकदो छप्पर वाले छोटे से घर में सुष्मिता जन्मी और वहीं उस ने अपने बचपन के दिन बिताए थे. सोचतेसोचते सुष्मिता जैसे गांव के उस छप्पर में सशरीर पहुंच गई जहां कभी वह अपने मातापिता और छोटी बहन नमिता के साथ रह कर इसे घर का दर्जा देती थी. दूर शून्य में कहीं अपने अतीत को चलचित्र के परदे सा साफसाफ देखती उस छोटी सी उम्र की प्रौढ़ा को आज भी वे दिन याद थे-

जब घर की गाड़ी मां की गाढ़ी कमाई से किसी तरह घिसट रही थी. जब उस की दिनरात की अनवरत मेहनत भी पेट की आग बु?ाने में ही स्वाह हो जाती थी और तन ढकने की खींचातानी में सिर ढको तो टांग उघड़ जाती और टांग ढांपो तो सिर से पल्लू सरक जाता था. अपनी इस चादर के हिसाब से मां अपने पैरों को जितना भी सिकोड़ती, चादर कम ही रहती थी. दूसरी ओर था घर का मुखिया, जोकि हमेशा से मर्द ही होता है, इस घर का भी था, उस का बाप. लानत और हिकारत से भरा यह रिश्ता किसी भी आदर के लायक उसे तब भी नहीं लगा जब वह दुधमुंही बच्ची थी और अब भी जब वह खुद एक मां है.

उस का बाप गांव के अधिकतर मर्दों की तरह सिर्फ और सिर्फ मर्द था. दिल और दिमाग से रहित मर्द, जिस की मर्दानगी की परिभाषा नाड़े के नीचे से शुरू हो कर वहीं फिस्स हो जाती है. बाकी की सारी परिभाषाएं और सारी जिम्मेदारियां मां ही निभाती आई थी. उन्हें पैदा करने से ले कर पालनेपोसने, पढ़ानेलिखाने तक, मर्द की मर्दानगी का कहर ?ोल कर उस के लिए रात में बिस्तर गरमाने और दिन में शराब का इंतजाम करने तक, पहाड़ सी जिम्मेदारियां और उस की मुट्ठों भर हाड़ों की माला बनी सूखी सी मां. मां की एक सहेली, जो यहां शहर में रहती थी, उन दिनों गांव आई हुई थी. एक दिन वह मां से मिलने आई और उस ने बताया कि वह वहां घरों में काम कर के 30 से 35 हजार रुपया महीना कमा लेती है. यह सुन कर मां की उदास आंखों से भी एक सपना जन्मा.

मां ने भी अनेक अन्य औरतों की तरह थकहार कर गांव का भूखानंगा दामन छोड़ शहर का रास्ता पकड़ लिया. उस ने किसी तरह अपने उन 2 टूटेफूटे छप्परों के सहारे उधार का इंतजाम किया और उन चारों के लिए उस ट्रेन के टिकट खरीद लिए जो हमें सपनों के देश यानी यहां शहर ले आने वाली थी. यही वह सब से बड़ा कदम था जो मां ने अपनी बेटियों के उज्ज्वल भविष्य को ध्यान में रखते हुए उठाया था और उस का बाप अपनी जरूरतों से जुड़ा बेताल सा उस के पीछेपीछे हो लिया था. यहां शहर आ कर मां की सहेली द्वारा उस की पाककला के बखान के सहारे मां को कुछ घरों में खाना बनाने का काम मिल गया. गृहस्थी की गाड़ी चल निकली. दिनरात मेहनत कर मां ने अपनी दोनों बेटियों को सरकारी स्कूल में डाल कर जैसे हर मुराद पा ली. इस से ज्यादा उस की नजर में किसी ने कभी कुछ अर्जित किया भी नहीं था.

कुछ दिन बड़े ठाट में गुजरे. पेटभर खाना और तन ढकने को मालिकों के घर से मिले पुराने कपड़े. धीरेधीरे दोनों बहनें बड़ी हो रहीं थीं. सुष्मिता 16 की और नमिता 14 की हो गई थी. बाप के ढंग तो वही रहे लेकिन मां की मेहनत से उन की जिंदगी बेहतर हो चली. यह बात अलग है कि मां की उम्र ‘दिन दूनी रात चौगुनी’ के तरह बढ़ रही थी. उन का पूरा परिवार मां के उन कमजोर कंधों पर सवार था जो दिनभर लोगों की रोटियां बेलते और रातभर बाप की मर्दानगी ?ोलते. मां की मजबूरियां सम?ा सके, अब उतनी बड़ी सुष्मिता हो गई थी. इसीलिए उस ने सोचा कि मां को इस अजाब से राहत दिलाने के लिए उसे जल्द से जल्द कुछ करना चाहिए. इसी कुछ की खोज में उस ने स्कूल के बाद ब्यूटीपार्लर का काम सीखना शुरू किया. यही एक काम था जिस में फीस के बदले वह काम कर देती थी. सो, बिना किसी एक्स्ट्रा बो?ा के वह कुछ सीख पा रही थी.

लेकिन ऊपर बैठा कोई शायद इसी दिन का इंतजार कर रहा था कि उसे निम्नतर दर्जे तक अक्ल आ जाए ताकि फिर उस की फाइल खोली जा सके. तो बस एक दिन उस की फाइल खुल गई और निमित बनी उस की बहन नामिता. एक दिन नमिता जो स्कूल गई तो वापस ही नहीं आई. खोजबीन, हायतोबा, पूछताछ का जो नतीजा निकला, वह यह कि वह किसी लड़के के साथ देखी गई थी. सुष्मिता की जिंदगी का यही वह मोड़ था जो लिया तो नमिता ने था लेकिन जिंदगी सुष्मिता की मुड़ गई थी, पूरी तीन सौ साठ डिग्री.

‘कौन लड़का, कैसा लड़का, 14 साल की लड़की को भला लड़कों की कितनी पहचान होगी. न जाने कहां और कैसी हालत में होगी मेरी बेटी’ ऐसे अनगिनत सवालों से घिरी, चिंताओं के इस पहाड़ पर आंसू बहाती मां नशे में डूबे बाप को चेताने की कोशिश करती रही पर वह चेत जाता तो फिर बात ही क्या थी.

और जो सुबह वह चेता तो भी क्या चेता? इस से तो न ही चेतता तो अच्छा होता. जो बात मां अपनी सिसकियों में दबाए पड़ी थी, वही बात उस ने गला फाड़फाड़ कर सारे महल्ले को सुना दी. मां की पुलिस को इत्तला करने की गुजारिश को उस ने इज्जत का हवाला दे कर नकार दिया और उसी इज्जत को बोतल में डुबो कर बाप का फर्ज पूरा कर दिया. बाद में पता चला कि नमिता जिस लड़के के साथ भागी थी, उस के मांबाप ने दोनों को दोचार हाथ लगा कर आखिरकार अपना लिया और दोनों की शादी करवा दी. जैसेतैसे नमिता का घर तो बस गया लेकिन उस की इस नादानी का कहर टूटा बेकुसूर सुष्मिता पर.

पर उस पर क्यों, उस की भला क्या गलती थी? इसी सवाल का जवाब देने के लिए तो वह फाइल खोले बैठा था. उस की गलती तो शायद पैदा होना ही थी, वह भी इस बाप के घर में. हुआ यह कि कुछ ही दिनों बाद उस के बाप ने अपनी तथाकथित बचीखुची इज्जत को बचाने के लिए सुष्मिता की शादी अपने ही जैसे एक नकारा इंसान से तय कर दी ताकि कहीं वह भी उस के मुंह पर कालिख पोत कर किसी के साथ भाग न जाए. ‘क्या वही मुंह बापू, जो सारे दिन दारू के नशे में धुत, नाली में पड़ा रहता है और जिस पर कुत्ते टौयलेट कर जाते हैं?’ सुष्मिता ने पूछा तो एक जोर का ?ान्नाटेदार थप्पड़ उस के गालों पर बाप की बापता का निशान छाप गया.

तीसरे ही दिन उस की शादी कर डाली गई और डोली के साथ ही उस के सारे अरमान भी बिदा हो गए. अब वह उस जुर्म की सजा भुगतने को आजाद थी जो उस ने किया ही नहीं था. फिर वही कहानी, वही मारपीट, वही दारू और वही मर्दानगी, जो वह बचपन से अपने घर में देखती आई थी. मां के कमजोर सहारे की डाली अपनी नाजुक कली को वक्त की आंधी से नहीं बचा पाई. बेटियों के जिस भविष्य के लिए उस ने खुद को स्वाह कर दिया था, वह भविष्य उस की आंखों के सामने तारतार हो गया और वह कुछ न कर सकी. यदि मां में ही रीढ़ की हड्डी होती तो भला वह खुद कमाने के बावजूद एक नामर्द का एक्स्ट्रा लगेज क्यों जिंदगीभर ढोती? फिर उस समाज, जहां आज भी पति को छोड़ने वाली औरत की ओर लोग कटी पतंग जैसे लपकते हैं और मर्द की ओर कोई उंगली भी नहीं उठाता, से एक कमजोर औरत पार पाए भी तो कैसे? जिस औरत ने बचपन से यही सीखा है कि घर के दरवाजे पर मर्द की चप्पल भी रखी हो तो किसी की अंदर ?ांकने की हिम्मत नहीं होती, वह औरत भला मर्द की ज्यादतियों का क्या हिसाब मांगे.

मां की कमजोरियों का बो?ा बेटियों को भी ढोना पड़ता है. प्रकृति से यही एक सवाल पूछना चाहती थी सुष्मिता कि जब वह गरीब मां की गोद में बेटी डालती है तो उस के बाजुओं में मलखम और रीढ़ में सरिया डालना क्यों भूल जाती है? सत्रह साल की उम्र में गोद में दुधमुंहे बच्चे और माथे पर नाकाम शादी का कलंक लिए सुष्मिता फिर उसी के दरवाजे पर खड़ी थी जिस ने पहले भी उसे सिवा बरबादी के कुछ न दिया था. जो घर अपनी बेटी को पनाह न दे सका, उसी से एक बार फिर उम्मीद लगाने एक मां खड़ी थी. जानती थी कि वह रेगिस्तान में पानी ढूंढ़ रही है पर चारा भी क्या था? मां की गोद में अपने बेटे को डालते हुए उस ने एक ही गुजारिश की-

‘मां, तू मेरे बेटे को संभाल ले. तुम दोनों की दालरोटी मैं संभाल लूंगी.’

‘तू, तू कैसे?’ आंखों में भरे अनगिनत सवालों की गठरी उस की ओर सरकाते हुए मां ने पूछा था.

‘मैं ने सालभर ब्यूटीपार्लर में काम कर के कुछ पैसे बचाए थे, उन्हीं से मैं ने ब्यूटीपार्लर का कुछ सामान खरीद लिया है. अब मैं घरघर जा कर काम करूंगी और अपने बेटे को पालूंगी.’

इस के साथ ही उस ने अपनी उम्मीद की गठरी मां के सामने खोल दी और फिर एक बार अपनी नजर फोन पर डाली कि कहीं कोई कौल मिस तो नहीं हो गई. अब मैडम के व्हाट्सऐप मैसेज और कौल की नन्ही सी नैया के सहारे वह सागर पार करना चाहती थी. अपनी सोचों के सागर में डूबी सुष्मिता की तंद्रा स्टोव पर उफनती चाय ने तोड़ी और उस ने बचीखुची चाय को कप में छाना और उस पर नाश्ता लिख कर पेट के पते पर पोस्ट कर दिया. तभी उस का फोन बजा और उसे दुनिया की सब से मीठी आवाज सुनाई दी, ‘‘सुष्मिता, मु?ो तुम्हारा नंबर मेरी सोसाइटी के व्हाट्सऐप ग्रुप से मिला है. क्या तुम मेरा मेकअप करने और हेयरस्टाइल बनाने आ सकती हो? मु?ो पार्टी में जाना है.’’

‘‘जी बिलकुल.’’

उस ने अपने काले बैकपैक को उठाया, जिस में उस ने जतन से सारा सामान जमाया था और जो न जाने कब से खुलने को तरस रहा था. हिचकोले खातेखाते ही सही, जिंदगी की गाड़ी चल पड़ी. मैडम ने काम से प्रसन्न हो कर इनाम के तौर पर एक आश्वासन दिया और कहा, ‘‘तुम्हारा काम अच्छा है. मितु मेरी फ्रैंड है, उसी ने तुम्हारा नंबर गु्रप पर डाला था. बताया था कि तुम सिंगल मदर हो और क्राइसिस में हो. कभी कोई जरूरत हो तो बताना.’’

सुष्मिता ने उस आश्वासन को अपने बैग की जेब में संभाल कर रखा और अपनी पहली कमाई को माथे से लगा कर हाथ जोड़ अपनी पहली क्लाइंट से बिदा ली. वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से चलता रहा और सुष्मिता की जिंदगी अपनी रफ्तार से. धीरेधीरे मैडमों के कौल बढ़ने लगे और रोजमर्रा के खर्चों की चिंता कुछ कम हुई. लेकिन ऊपर जो उस की फाइल खोले बैठा था उसे यह बात कुछ जंची नहीं. सो, उस ने पन्ना पलट दिया. बाप नामक जीव को फिर अपना फर्ज याद आया और उस ने आधी रात को सुष्मिता का सामान उठा कर घर से बाहर फेंक दिया. कारण?

हां, कारण तो उस के पास हमेशा होता था, सो, इस बार भी था. वह बेचारा जैसेतैसे अपनी बीवी के पैसे चुरा कर शराब पी कर आया था. अभी उस ने अपनी बीवी को दो ही हाथ लगाए थे कि सुष्मिता बीच में आ गई. उस ने मां को उठाया और सम?ाया कि मां, तू इस आदमी को छोड़़ क्यों नहीं देती. बस, इस बात पर पिताजी को तो गुस्सा आना ही था. सो, सुष्मिता को हाथ पकड़ कर घर से बाहर निकालते हुए बोला, ‘‘अपना घर तो बिगाड़ आई है, अब मेरी बीवी को भड़का कर मेरा घर बिगाड़ना चाहती है. चली जा, जहां तेरे सींग समाएं, मेरे घर में तेरे लिए कोई जगह नहीं है.’’

जैसेतैसे सुष्मिता ने सिर छिपाने की जगह ढूंढ़ी और मदद के लिए अपने उन्हीं चप्पुओं के पास जा पहुंची जिन्होंने उस की नैया को पतवार दी थी.

सोसाइटी की मैडम को अपनी रामकहानी सुनाते हुए उस ने मदद की गुहार लगाई.

‘‘अगर वह तुम्हारे बच्चे को नहीं देखेंगे तो तुम काम कैसे करोगी? और फिर हम तुम्हें किस भरोसे पर कर्ज दें?’’ मैडम का सीधा सा सवाल था.

‘‘अब बस दीदी. अब कोई बैसाखी नहीं, कोई सहारा नहीं. अब मु?ो अपने बच्चे को खुद के बलबूते पर ही पालना है. मैं जितना पैसा उन को घर चलाने के लिए देती हूं, उतने में तो मेरा बेटा पल जाएगा. अब वह 6 साल का हो गया है. मैं ने उस के लिए होस्टल का इंतजाम कर लिया है. वहां उस की पढ़ाई भी अच्छे से हो जाएगी. हर इतवार को मैं उस से मिलने चली जाया करूंगी, 2 ही घंटे का तो रास्ता है.’’

‘‘तो अब मु?ा से क्या मदद चाहिए? एडमिशन तो हो गया है न?’’ मैडम ने पूछा.

‘‘जी दीदी, एडमिशन का इंतजाम तो जैसेतैसे हो गया लेकिन 3 महीने की फीस एकसाथ देनी है. अपने लिए एक कमरा भी किराए पर लिया है. दोतीन दीदियों से 5-5 हजार रुपए उधार लिए हैं. अगर आप से भी 5 हजार रुपए मिल जाएं तो मेरा काम चल जाएगा.

‘‘आप सब के पैसे मैं काम करकर के कटवा लूंगी.’’

उस के हाथ में रखे उधार के पैसे उस की मेहनत के विश्वास की उपज थे. जन्म और जन्मदाता तो उसे कोई संबल, कोई सहारा देने के बजाय उस की हिचकोले खाती नैया में दो पत्थर ही साबित हुए थे. लेकिन अब कोई एक्स्ट्रा लगेज नहीं. उस ने ठाना, ‘अब बस मैं हूं और हैं मेरे ये दो हाथ. यही मेरे मातापिता, यही मेरे बेटे का भविष्य और वर्तमान. चल सुष्मिता उठ, तुझे थकने की इजाजत नहीं है.’ यह सोचते हुए सुष्मिता उठी और चल पड़ी अपनी अगली क्लाइंट की ओर. Hindi Kahani

Hindi Story in Hindi : टीस का अंत

लेखक – नितेंद्र सागर

Hindi Story in Hindi : चंद्र का खत पढ़ कर आराधना को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. कैसे चंद्र के बेटे को अपनाया जाए, क्योंकि अब फैसला आराधना के पति के हाथ में था. जिंदगी बड़ी बेरहम होती है. जिस बात को ले कर उसे आप को परेशान करना हो, जी भर कर परेशान करती है. जिन लमहों को आप भूलने की कोशिश कर रहे हों, बारबार आप के सामने सिर उठा कर खड़े हो जाते हैं. सम?ाते का नाम जीवन है. सम?ाता और जीवन दो नहीं, एक ही चीज के पर्यायवाची शब्द हैं. देखनेसुनने में दोनों अलगअलग लगते हैं. स्कूल के पते पर खत आया आराधना मैडम का. आश्चर्य हुआ उन को कि इस मोबाइल के जमाने में खत भी लिख सकता है कोई. अपना पता देखने के बाद जब भेजने वाले का नाम देखा तो आश्चर्यचकित हो कर रह गई. वह भेजने वाला कोई चंद्र था. खत का मजमून इस प्रकार था-

‘मेरा अंतिम समय निकट है, शायद जब तक तुम्हें यह खत मिले, मैं इस दुनिया में न रहूं. हो सके तो मेरे इकलौते बेटे रोहन को अपना लेना.

‘आप का चंद्र.’

खत पढ़ कर आराधना के पैरों तले जमीन खिसक गई. बीता हुआ कल अचानक वर्तमान में आ कर खड़ा हो गया. जो सोचा नहीं था उस ने वह हो गया. ‘ओ चंद्र, ओ चंद्र,’ बुदबुदाई वह. चंद्र जिसे तनमन से चाहा था, जिस के सिवा किसी और की चाह नहीं थी, दुनिया में जिस के बगैर एक पल रहना मुश्किल था उस का खत. उस का दोस्त, उस का प्रेम, उस का साथी, उस का सबकुछ. चंद्र वक्त की आंधी में कैसे खो गया था. साथ में पढ़ते थे दोनों. चंद्र आराधना को अपना सबकुछ मानता था. मगर आराधना की हिम्मत नहीं हो पाई बगावत करने की. पापा ने जब आनंद से शादी करने को बोला तो अपने ही मकड़ी के जाल में उल?ा हुई आराधना इनकार न कर सकी. देखने में सुंदर और पढ़ने में होशियार आराधना के पिता उसे आगे नहीं पढ़ाना चाहते थे. आराधना पढ़ना चाहती थी.

सौतेली मां ने कहा, ‘नाक कटवाएगी यह हमारी. अगर हम ने इसे आगे पढ़ने दिया तो.’ मजबूरीवश आराधना ने पापा से कहा कि, ‘मु?ो अपनी मरजी से पढ़ने दो, फिर आप जब कहेंगे, जहां कहेंगे, वहां शादी कर लूंगी.’

किसी शायर ने क्या खूब कहा है- ‘प्रेमिकाएं विवाही जाती हैं सरकारी नौकरियों से, जमीनों से, दुकानों से, नहीं विवाही जातीं वह अपने प्रेमियों से.’ आराधना जानती थी मेरे बगैर चंद्र जिंदा न रहेगा. उस की दुनिया उजड़ जाएगी. उस ने चंद्र से कभी कहा भी था कि चंदर, मैं बहुत कमजोर लड़की हूं. लेकिन तब तक चंद्र अपना सबकुछ आराधना पर वार चुका था. निदा फाजली के शेर को याद करते हुए ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता’ आराधना शादी कर के आनंद के साथ अपनी ससुराल चली गई. छोड़ गई चंद्र को जीवन की मुसीबत का सामना करने इस भरी दुनिया में.

अकेला हो गया चंद्र. पहले ही उस का कोई नहीं था. अब दुनिया उजड़ गई उस की. बीमार हो गया. सरकारी अस्पताल में भरती हुआ. वहां की एक विधवा नर्स, जिस का एक बेटा था, ने चंद्र की बहुत सेवा की. लता नाम था उस का. लता भी अकेली थी, चंद्र भी अकेला. दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार. एकदूसरे के मन में सहानुभूति उमड़ी. उन्होंने शादी कर ली. कुदरत जिन के हिस्से में गम लिखती है फिर उस को परेशानियां देती ही जाती है.

कुछ लोगों पर कुदरत को कभी रहम नहीं आता. कुछ अपना कर्ज चुकाने के लिए दुनिया में आते हैं. कुछ समय साथ रहने के बाद लता भी चंद्र को छोड़ कर दुनिया से चली गई. एक ऐक्सिडैंट ने उस की जीवनलीला समाप्त कर दी. रह गया चंद्र और रोहन. पर जब चंद्र को पता चला किडनी की बीमारी उसे ज्यादा दिन तक दुनिया में नहीं रहने देगी तो उस ने अपने बेटे को अनाथालय में डालने से पहले एक खत आराधना को उस के घर के पते पर न भेज कर उस के स्कूल के पते पर भेजा. आराधना सम?ा नहीं पा रही थी क्या किया जाए. चंद्र के बेटे को कैसे अपनाया जाए. अपने पति को कैसे बताया जाए कि, चंद्र कौन था? रोहन कौन था? उस के अपने भी 2 बच्चे थे स्वामी और सोनू. घर पर आराधना के पति ने उस को परेशान सा देखा तो पूछा, ‘‘क्या बात है, आराधना, इतनी परेशान क्यों हो? शादी जरूर कर ली थी आराधना ने, मगर अपने मन से चंद्र को न भुला सकी. जब भी उसे चंद्र की याद आती थी, उस के मन में एक टीस उभर आती थी. आराधना के मम्मीपापा तो इस दुनिया से चले गए थे, आराधना को दे गए थे चंद्र के नाम की टीस.

उस का पति आनंद कभीकभी उस से पूछता था अचानक कभीकभी क्यों खो जाती हो अपनी सुधबुध भूल कर. इस समय आराधना के आंसू बह रहे थे. बहुत सोचने पर उस ने एक निर्णय ले ही लिया. आनंद के बारबार पूछने पर आज उस ने चंद्र के बारे में सबकुछ बता दिया और कहा, ‘‘यदि तुम रोहन को नहीं अपनाओगे तो मैं रोहन को ले कर तुम्हारी जिंदगी से कहीं दूर चली जाऊंगी और अपने दोनों बेटों को तुम्हें दे जाऊंगी.’’ इतना कह कर आराधना रोने लगी.

आनंद बहुत देर तक आराधना को देख कर बोला, ‘‘तुम ने मु?ो अब तक नहीं सम?ा, आराधना. तुम जबजब सुधबुध खो कर बैठ जाती थी तब मैं सम?ाता था तुम्हारे अंदर कोई सैलाब छिपा हुआ है जो बाहर आना चाहता है. मगर शायद तुम्हारी शर्म है जो उसे बाहर आने नहीं देती. तुम ने कभी मु?ो अपना दोस्त नहीं सम?ा. बस, एक आदर्श पत्नी का धरम निभाती रही. आज जब तुम ने सब बात मु?ो बता दी है तो मेरा भी निर्णय सुन लो, रोहन को हम सब मिल कर पालेंगे. आज से हमारे 2 नहीं, 3 बच्चे हैं.’’ यह सुन कर आराधना आज आनंद के सच्चे प्यार को समझ गई. Hindi Story in Hindi

Justice Gavai Controversy: आखिर जस्टिस गवई का गुनाह क्या है

Justice Gavai Controversy: उन्होंने एक नहीं बल्कि एकसाथ दो तीन गुनाह जानेअनजाने में कर दिए हैं या हो गए हैं फर्क कर पाना मुश्किल है. पहला तो यह कि सवर्णों के आराध्य विष्णु की बेजान मूर्ति की हकीकत उधेड़ कर रख दी कि वह सिर्फ पत्थर से बनी एक आकृति होती है. उस में कोई शक्ति नहीं होती. यह हकीकत सीधे कही जाए या इशारों में कही जाए आजकल किसी गुनाह या गुस्ताखी से कम नहीं होती.

दूसरे उन्होंने कानूनी तौर पर यह जता दिया कि प्राण प्रतिष्ठा जैसे धार्मिक कर्मकांडों से संविधान और कानून को कोई लेना देना नहीं. अदालतें इंसाफ के लिए हैं पूजापाठ की दुकानदारी चलाने और चमकाने के लिए नहीं और तीसरा गुनाह जो इन दोनों से ज्यादा संगीन है वह यह है कि वे सवर्णों के संविधान मनुस्मृति के मुताबिक शूद्र यानी दलित हैं और बौद्ध धर्म के मानने वाले हैं जिस का इस मुकदमे या विवाद और दो टूक फैसले से कोई प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष संबंध नहीं इस के बाद भी उन्हें बेवजह एक साजिश और खीझ खिसियाहट के तहत विवाद में घसीटा जा रहा है.

कट्टरवादी हिंदुओं की तिलमिलाहट की वजह बनते इस मुकदमे पर एक नजर डालें तो तरस आता है कि धर्म के दुकानदारों ने कानून और अदालतों का मजाक बना कर रख दिया है. यह मुकदमा उस की ही बानगी है. राकेश दलाल नाम के एक शख्स ने 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाखिल की जिस का सार यह है कि –

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो के जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की एक 7 फीट ऊंची मूर्ति है. लेकिन उस का सर नहीं है, इस सर को 17 वीं शताब्दी में मुगल हमलावरों ने काट दिया था. बकौल याची यह मूर्ति केवल पुरातात्विक वस्तु नहीं बल्कि आस्था का केंद्र है. इसलिए संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत हिंदू समुदाय को अपने देवता की मूर्ति की पूजा और प्राण प्रतिष्ठा का अधिकार है.

यहां तक दिक्कत, झंझट, एतराज या विवाद वाली कोई बात नहीं थी लेकिन राकेश दलाल ने सुप्रीम कोर्ट से चाहा यह कि वह एएसआई को निर्देश दे कि मूर्ति को पुनर्स्थापित किया जाए. यदि यह संभव न हो तो कम से कम प्राण प्रतिष्ठा की अनुमति दी जाए ताकि श्रद्धालु वहां धार्मिक रूप से पूजापाठ कर सकें.

इस की सुनवाई सीजेआई बीआर गवई और जस्टिस केबी विश्वनाथ की बेंच ने की. अपने फैसले में जस्टिस गवई ने कहा संरक्षित स्मारक में नया धार्मिक अनुष्ठान या मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा या मरम्मत भी कानूनन वर्जित है. प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1958 की धाराएं 19 और 20 इस की अनुमति नहीं देतीं. पूजा अर्चना की अनुमति देना या मूर्ति स्थापित कराना न्यायपालिका का विषय नहीं. अलावा इस के चूंकि यह मंदिर यूनेस्को की लिस्ट में राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय विश्व धरोहर है इसलिए भारत की यह प्रतिबद्धता है कि वह इन धरोहरों को मूल रूप में संरक्षित रखे. इसलिए भी न्यायपालिका इस तरह की अनुमति नहीं दे सकती, बकौल सुप्रीम कोर्ट यह एक प्रचार पाने वाली याचिका है.

अपनी कानूनी बेबसी के साथ जस्टिस गवई ने मूर्ति की बेबसी भी यह कहते जता दी कि यदि आप विष्णु के प्रबल भक्त हैं तो प्रार्थना और ध्यान करें और अपने देवता से कहिए कि वो खुद कुछ करें. बात में दम इस लिहाज से था कि मूर्तियां अपनी रक्षा खुद नहीं कर पातीं. उन्हें तगड़ी सिक्योरिटी में रखा जाता है. अगर मूर्तियों में कोई शक्ति होती तो किसी मुगल आक्रांता की हिम्मत नहीं होती कि वह उन्हें तोड़ेफोड़े या खंडित करे. इस लिहाज से जस्टिस गवई ने एक सटीक बात कही थी.

ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानने वाले भक्तों का यह सनातनी दावा है कि उस की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता जो ऐसे मामलों से गलत साबित हो जाता है जिन में लोग या हमलावर इत्मीनान से मूर्तियां तोड़ते हैं चोरी करते हैं, उन की तस्करी करते हैं और मूर्ति बेचारी कुछ नहीं कर पाती. हां मूर्ति की बड़ी उपयोगिता दान दक्षिणा झटकने में है जो भी मंदिर जाता है वह कुछ पैसे जरूर चढ़ाता है जो हकीकत में पंडेपुजारी समेटते हैं.

चूंकि हिंदू धर्म में खंडित मूर्ति की पूजा की मनाही है इसलिए अखंडित मूर्तियों के जरिये पंडेपुजारी अपना पेट और परिवार पालते हैं. यह बिना लागत वाला फुल टाइम रोजगार है. जिन लोगों को ओ माई गोड और पीके फिल्में याद हैं वे आसानी से समझ सकते हैं कि मूर्ति के जरिये कैसे बैठे बिठाए पैसा कमाया जाता है.

फैसला रौशनी में आते ही सनातनियों ने जस्टिस गवई को निशाने पर ले लिया. उन की जन्मकुंडली खंगालने पर इन भक्तों को ज्ञान प्राप्त हुआ कि उन्होंने यह फैसला और कमेंट इसलिए दिया कि वे दलित हैं और एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा वाली कहावत को चरितार्थ करती बात यह है कि वे आंबेडकरवादी हैं. उन के पिता आरजी गवई ने साल 1956 में डाक्टर भीमराव आंबेडकर के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया था.

आरजी गवई भी अपने दौर के कामयाब वकील थे और राजनीति में भी सक्रिय रहते थे. उन की गिनती रिपब्लिकन पार्टी औफ इंडिया के दिग्गज नेताओं में होती थी. ज्यादा नहीं कुछ साल पहले यानी 2008 से 2011 तक वे केरल के राज्यपाल थे. बिहार के भी प्रभारी राज्यपाल वे रह चुके थे. इस के पहले वे विधायक और राज्यसभा के सांसद भी चुने गए थे.

इसी वजह के चलते सनातनियों ने जम कर जस्टिस गवई को ट्रोल किया और उन के कमेंट को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया. विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि यह टिप्पणी हिंदू आस्थाओं का मजाक उड़ाती हुई है. अदालतें न्याय का मंदिर हैं वहां ऐसी टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए. एक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने जस्टिस गवई की टिप्पणी को हिंदू भावनाओं को आहत करने वाला बताया. लेकिन कोर्ट को ही कटघरे में यह कहते खड़ा कर दिया कि यह हिंदू धर्म के प्रति न्यायिक संवेदनशीलता की कमी को दर्शाती है.

मीडिया जिसे भक्त और गोदी मीडिया कहा जाता है ने सीधे तो आरोप नहीं लगाया लेकिन अधिकतर की राय यह थी कि कानूनन तो फैसला ठीक है लेकिन इंसाफ की सब से बड़ी कुर्सी पर बैठे गवई को धर्म के बारे में ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी. तो कैसी टिप्पणी उन्हें करनी चाहिए थी क्या यह निर्देश उन्हें या किसी को भी उन मीडिया घरानों और मीडियाकर्मियों से लेने पड़ेंगे जिन की खुद की कोई विश्वसनीयता और मौलिकता नहीं रही.

देश धर्मस्थलों और मूर्तियों का देश बनता जा रहा है. धार्मिक होता माहौल किसी सबूत का मोहताज नहीं. ऐसे में अगर लोग बातबात पर कोर्ट जाने लगें तो लम्बित मामलों की तादाद करोड़ों में पहुंचते देर नहीं लगेगी. हर कोई मुंह उठा कर अदालत पहुंच जाएगा कि मी लार्ड हमारे महल्ले के मंदिर की खंडित मूर्ति अखंडित में तब्दील करने सरकारी निकायों और विभागों को आदेश निर्देश जारी किए जाएं ताकि हम विधि विधान से पूजा पाठ कर सकें.

देश में धर्म स्थलों और मूर्तियों की भरमार है अरबोंखरबों की नाजायजजायज जमीनों पर मंदिर मसजिद चर्च गुरूद्वारे खड़े हैं. इन की कोई उपयोगिता या रिटर्न नहीं है. बेहतर तो यह होगा कि इन की जगह अस्पताल स्कूल और धर्मशालाएं बना दी जाएं जिस से न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी. Justice Gavai Controversy

Relationship Guide: पति से विवाद के बाद क्या बिस्तर पर कपड़े उतार कर आ सकती है पत्नी?

Relationship Guide: सुधा अपने औफिस से लौट कर आई थी. इसी बीच दरवाजे की घंटी बजी. उस ने दरवाजा खोला तो सामने डिलीवरी बौय खड़ा था. उस के हाथ में पार्सल था. उस ने सुधा के पति का नाम लिया. कहा ‘राकेश के नाम का पार्सल है. सुधा बोली ‘वह अभी घर पर नहीं हैं. औफिस गए हैं.’

‘सर से पूछ कर ओटीपी बता दीजिए उन के नम्बर पर आया होगा.’ डिलीवरी बौय ने कहा तो सुधा ने पति को फोन किया. पति को डिलीवरी बौय के बारे में बताया तो राकेश ने एक ओटीपी बता दिया. जिस के बाद डिलीवरी बौय ने पार्सल सुधा को दे दिया.

पहले उस ने सोचा कि पार्सल खोल कर देखें फिर लगा यह ठीक नहीं है. पर उस का मन नहीं माना उस ने पार्सल खोल लिया. देखा तो उस के अंदर राकेश ने हाथ ही घड़ी मंगवाई थी. यह मंहगी थी. सुधा ने पार्सल के साथ लगी रसीद देखी तो 25 हजार की घड़ी थी. सुधा का मूड घड़ी देखते ही खराब हो गया.

उस की वजह यह थी कि राकेश के पास कई घड़ियां पहले से थीं. इस के बाद इतनी मंहगी घड़ी की क्या जरूरत थी ? दूसरी तरफ राकेश पैसे की कमी को ले कर रोना भी रोता रहता था. कल की ही बात है घर की वाशिंग मशीन बदलने की बात सुधा ने की तो बोला था कि इधर ईएमआई में पैसा बहुत खर्च हो रहा है. 2 माह बाद लेंगे. वाशिंग मशीन के लिए पैसों का रोना और दिखावे के लिए महंगी घड़ी खरीद ली.

थोड़ी देर में राकेश आ गया. सुधा ने घड़ी का पैकेट देते कहा, ‘वाशिंग मशीन के लिए पैसा नहीं था और फालतू में घड़ी के लिए पैसा था ?’

राकेश ने पहले तो सुधा को समझाने की कोशिश की लेकिन फिर उस का गुस्सा भड़क गया. उस ने सुधा पर हाथ उठा दिया. सुधा ने भी सहन नहीं किया दोनों के बीच झगड़ा हुआ और सुधा घर छोड़ कर चली गई. सुधा भी नौकरी करती थी. अपना खर्च उठा सकती थी फिर पति की मार क्यों खाए ?

विवाद बढ़ गया. मसला पुलिस तक पहुंच गया. दोनों की शादी को 2 साल ही हुए थे. उन का कोई बच्चा नहीं था. एक हंसतीखेलती जिदंगी बिखर गई थी. पुलिस ने मारपीट का मुकदमा लिख लिया. वहां अलग से राकेश को जमानत लेनी पड़ी. जिस में उस का 40-50 हजार खर्च हो गया. तलाक के लिए जब फैमली कोर्ट गए तो 2 साल इधरउधर चक्कर काटते बीत गए. दोनों को हर 15 दिन में नौकरी से छुट्टी ले कर कोर्ट जाना पड़ता था. सुधा के वकील ने 75 हजार रुपए फीस के पहले ही ले लिए थे. इस के बाद हर पेशी पर अलग पैसे खर्च होते थे.

राकेश को घरेलू हिंसा वाला केस भी लड़ना पड़ रहा था. और तलाक वाला भी उस की परेशानी अधिक थी. 2 साल इस में लगाने के बाद फैमली कोर्ट ने समझौते के लिए कहना शुरू किया. वहां जज ने दोनों को समझाते हुए कहा कि जितने पैसे के लिए आप दोनों ने विवाद किया उस से कई गुना खर्च हो चुके होंगे. अब क्या सोच रहे हैं ? और पैसा खर्च करने से अच्छा है कि साथ रहिए.

दोनों के वकीलों ने भी यही समझाया. राकेश और सुधा साथ तो रहने लगे पर अब दोनों के बीच पहले वाले रिश्ते वापस नहीं बन सके थे.

एकदूसरे से दूरदूर रहते थे. केवल मशीन की तरह संबंधों को निभा रहे थे. न पहले जैसा प्यार था न पहले जैसी नोकझोंक. दोनों के मन में एक गांठ पड़ चुकी थी. एक छत और एक बिस्तर पर सोते हुए भी वह अलगअलग दिखते थे. सुधा और राकेश अकेले नहीं हैं. ऐसे कई पति पत्नी कोर्ट के फैसलों के बाद एक साथ रहते हुए भी अलगअलग रहते हैं. उन के तन मिल रहे होते हैं पर मन में कहीं गांठ पड़ चुकी होती है.

‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय, टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गांठ परी जाय’ रहीमदास के इस दोहा का मतलब है कि प्रेम का रिश्ता एक नाजुक धागे की तरह होता है, जिसे गुस्से में अचानक नहीं तोड़ना चाहिए. अगर यह एक बार टूट जाए, तो इसे फिर से जोड़ना बहुत मुश्किल होता है. यदि जुड़ भी जाए, तो उस में गांठ पड़ जाती है, जिस से पहले जैसा सहजता और विश्वास नहीं रहता है. पतिपत्नी के बीच का रिश्ता भी ऐसा ही होता है. यह बात कोर्ट को भी समझ लेनी चाहिए कि जब मामला पुलिस कोर्ट तक आ गया तो यह रिश्ता वापस जुड़ नहीं पाएगा. जबरन जुड़ भी गया तो गांठ पड़ ही जाएगी.

पतिपत्नी के बीच पनपने वाले विवादों को सुलझाने के जितने भी प्रयास हो रहे हैं वह उतने ही बढ़ते जा रहे हैं. पहले यह माना जाता था कि फैमिली कोर्ट में यह विवाद सुलझ जाएंगे. अब ऐसा नहीं है. फैमिली कोर्ट के बाद भी ऐसे विवाद ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक यह विवाद जाने लगे हैं. सुप्रीम कोर्ट का फैसला सभी को मान्य होता है. इस के ऊपर कोई दूसरी कोर्ट नहीं है. वरना हो सकता था कि यह मामले वहां तक भी जा पहुंचते. कोर्ट को यह लगता है कि वह जो भी फैसला देती है पतिपत्नी स्वीकार कर लेते हैं. इस के बाद उन की हर समस्या खत्म हो जाती है.

सवाल उठता है कि क्या पतिपत्नी के रिश्ते औन औफ जैसे बटन से चल सकते हैं? बटन औफ तो रिश्ता बंद, बटन औन तो रिश्ता शुरू. अगर कोई पतिपत्नी दो-तीन साल कोर्ट कचहरी और थाने के चक्कर लगा लेते हैं, दोनों एकदूसरे के खिलाफ तमाम तरह के आरोप लगा लेते हैं इस के बाद अगर कोर्ट के फैसले से सहमत हो कर एक साथ रहने भी लगते हैं तो क्या उन के बीच के संबंध ऐसे सहज हो सकते हैं कि वह पहले की तरह से बिस्तर पर कपड़े उतार कर एक साथ आ सकते हैं ? या कोर्ट के फैसले, घर परिवार, समाज और बच्चों का ध्यान रख कर केवल कोर्ट के फैसले को मानते हुए साथ रह रहे होते हैं.

असल में एक छत के नीचे रहते हुए भी वह केवल औपचारिकता निभा रहे होते हैं. पतिपत्नी के संबंध बेहद मजबूत होते हैं. यह एकदूसरे के भरोसे विश्वास पर टिके होते हैं. पति के साथ बिस्तर पर कपड़े उतारते हुए पत्नी के मन में एक क्षण को भी कोई दूसरा विचार आता नहीं है. यही दोनों के संबंधों की मजबूती होती है. आपसी विवाद के बाद क्या रिश्तों में इतनी गुजाइंश बची रहती है ? फैमली कोर्ट से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने वाले मामले बताते हैं कि अगर आगे कहीं अपनी बात रखने की गुजांइश मिले तो यह झगड़े वहां तक भी जा सकते हैं. आखिर इस का हल क्या है ?

पत्नी से खर्चों में योगदान की अपेक्षा करना ‘क्राइम’ नहीं

स्वाभाविक तौर पर पतिपत्नी के रिश्ते ऐसे होते हैं कि जिस में एकदूसरे से हर तरह के सहयोग की आपेक्षा की जाती है. यह रिश्ते अब बदल रहे हैं. घरेलू खर्च को ले कर एक विवाद कोलकाता हाईकोर्ट तक पहुंचा. पतिपत्नी दोनों ही जीएसआई विभाग में एक साथ काम करते हैं. 2011 में दोनों की शादी हुई. शादी के कुछ दिनों के बाद ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया. पत्नी ने पति के खिलाफ पुलिस में दर्ज शिकायत में दावा किया कि उस का पति “अधीर, आक्रामक, असमर्थक, क्रूर, बेपरवाह, असंवेदनशील, आलोचनात्मक, मांगलिक, आत्ममुग्ध, घमंडी और अन रोमांटिक स्वभाव का है.‘

पत्नी ने अपने आरोप में आगे बताया कि उस के पति और उस के मातापिता ने उस के रूप रंग पर टिप्पणी की. उस के नीची जाति का मजाक उड़ाया. महिला ने दावा किया कि उन्होंने उस पर होम लोन की ईएमआई चुकाने का दबाव डाला, उसे और उस के बच्चे को पर्याप्त भोजन, कपड़े और दवाइयां नहीं दीं. उस को मजबूरन औनलाइन खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा.’ पत्नी की शिकायत पर पुलिस ने पति के खिलाफ 498 के तहत मामला दर्ज किया. इस से बचने के लिए पति ने हाईकोर्ट पंहुचा. वहां इस मसले को समझ कर फैसला किया गया.

कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा कि, ‘कानून में साफ है कि आंतरिक कलह का हर मामला आईपीसी की धारा 498ए के तहत ‘क्रूरता’ नहीं माना जाता’. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिला का उस की जाति के लिए कथित सार्वजनिक रूप से मजाक नहीं उड़ाया गया था, तो यह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आएगा. कोलकाता हाईकोर्ट ने महिला की याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी करते हुए, ‘एक शिक्षित, कमाने वाली महिला से घरेलू खर्चों में योगदान की अपेक्षा करना भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत ‘क्रूरता’ नहीं है.’

जस्टिस अजय कुमार गुप्ता ने कहा कि ‘वैवाहिक जीवन में यह स्वाभाविक है. दोनों पतिपत्नी आपसी सम्मान बनाए रखें, जिम्मेदारियां शेयर करें और समाज के कल्याण में योगदान दें. दूसरी पक्ष (पत्नी) एक शिक्षित और कमाने वाली महिला है. पत्नी को घरेलू खर्चों में योगदान देने, कोविड-19 लौकडाउन के दौरान औनलाइन खरीदारी करने या सास द्वारा बच्चे को खाना खिलाने के लिए कहे जाने जैसी अपेक्षाएं, किसी भी तरह से, भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के अर्थ में ‘क्रूरता’ नहीं मानी जा सकतीं.’

कोर्ट ने आगे कहा, ‘अगर एक अपार्टमेंट की मालिकाना हक दोनों का है तो उस का ईएमआई की भुगतान पति की नहीं है, पत्नी भी बराबर की हिस्सेदार है. पति अगर ईएमआई भरने के लिए उस से पैसे की मांग करता है या फिर पिता द्वारा बच्चे को बाहर ले जाना घरेलू जीवन की क्राइम नहीं हैं.’ कोर्ट ने अपने फैसले के बाद यह आपेक्षा की है कि पतिपत्नी दोनों सुलह से रहेंगे. क्या यह संभव है ? झगड़े के बाद ऐसे संबंध बने रह सकते हैं ? शायद नहीं. मजबूरी में साथ रहने और मन से साथ रहने में अंतर होता है.

क्या है धारा 498 ए ?

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498 किसी विवाहित महिला को उस के पति या ससुराल पक्ष के किसी व्यक्ति द्वारा आपराधिक इरादे से बहला फुसला कर ले जाने या हिरासत में रखने से संबंधित है. इस धारा का उद्देश्य पति अपनी पत्नी को दूसरों के साथ ले जाने के इरादे से फुसलाने से बचा सके.

धारा 498ए पति या पति के रिश्तेदार द्वारा विवाहित महिला के साथ की गई क्रूरता से संबंधित है. धारा 498 में आपराधिक पलायन का अपराध है, और धारा 498-ए में पति या उस के रिश्तेदारों द्वारा शारीरिक या मानसिक क्रूरता शामिल है. दहेज की मांग से जुड़ी प्रताड़ना भी इस में शामिल है. जिस के लिए अधिकतम 3 साल की जेल और जुर्माना हो सकता है. यह धाराएं गैर-जमानती और संज्ञेय. जिस का अर्थ है कि पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तारी कर सकती है और जमानत आसानी से नहीं मिलती है.

आईपीसी की धारा 498 को भारतीय न्याय संहिता बीएनएस 2023 में धारा 85 और 86 में शामिल किया गया है. धारा 85 घरेलू संबंधों में कू्ररता से संबंधित है और धारा 86 आत्महत्या के लिए उकसाने, गंभीर चोट पहुंचाने जैसे मामलों में लगती है. एक तरह से देखें तो केवल नाम में बदलाव किया गया है. विवादों को जल्द से जल्द हल किया जाएं इस का कोई हल नहीं है. कोलकाता हाईकोर्ट के मसले में 5 साल से अधिक समय लग गया है.

पतिपत्नी विवाद में जो भी हल हो वह जल्दी से जल्दी किया जाए. इन विवादों को हल करने का अधिकतम समय 3 साल से अधिक न हो. कोर्ट विवाह संस्था को बचाने के नाम पर फैसला देने में देरी न करें. अगर पतिपत्नी झगड़ा ले कर कोर्ट तक आ गए हैं तो उन के अंदर समझौते की भावना खत्म हो गई है. ऐसे में उन को जबरन एकदूसरे के साथ रहने को मजबूर करने का लाभ नहीं है. पतिपत्नी को भी इस बात का आभास होना चाहिए कि कोर्ट तक मामला पहुंचने के बाद समझौता नहीं हो पाएगा. ऐसे में वह बातबात पर मुकदमा दायर करने से बचेंगे. जिस से कोर्ट पर मुकदमों का बोझ कम हो सकेगा.

पतिपत्नी विवादों की हालत

भारत की अदालतों में पतिपत्नी विवादों की फीगर जानने का कोई रास्ता नहीं है. इन की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है. कुछ रिपोर्ट के आधार पर इस का अनुमान लगाया जा सकता है. 2022 में देशभर में करीब 6.5 लाख से ज्यादा विवाह संबंधी मामले लंबित थे, और 2023 में यह संख्या बढ़ कर 8.25 लाख से अधिक हो गई थी. ये मामले सिविल और क्रिमिनल दोनों तरह के होते हैं, और इन की संख्या लगातार बढ़ रही है. 2025 में यह संख्या 12 लाख के ऊपर पहुंच चुकी है.

पतिपत्नी के बीच तकरार के मामले और उन के लंबित मामलों की संख्या में साल दर साल वृद्धि हो रही है. इन मामलों में सिविल केस जैसे तलाक और घरेलू हिंसा से जुड़े क्रिमिनल केस दोनों शामिल होते हैं. ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या से अदालतों पर भारी बोझ पड़ रहा है. इन पर निर्णय लेने में अधिक समय लगता है. क्योंकि कोर्ट का मानना है कि जितना संभव हो विवाह को बचाने का काम किया जाए.

कोर्ट को चाहिए की जल्दी से जल्दी ऐसे मामलों में तलाक दिया जाए. शादी बचाने के नाम पर केस को लबे समय तक खींचना ठीक नहीं होता है. अदालत के फैसले से पतिपत्नी एक छत के नीचे भी दो अजनबी लोगों की तरह से रह रहे होते हैं. पत्नी पहले की तरह पति के साथ बिस्तर में कपड़े उतार कर नहीं सो पाती है. भरोसा और प्यार टूटता है. तो उस का वापस जुड़ पाना कठिन होता है.

ऐसे में केवल अदालत के कह देने मात्र से पतिपत्नी मन से एक नहीं हो जाते हैं. पुलिस और कोर्ट में मुकदमा दाखिल करते समय जिस तरह से आरोप एकदूसरे पर लगाते हैं उन को भूल पाना सरल नहीं होता है. जिस की वजह से कोर्ट के समझौते के बाद भी रिश्ते सहज नहीं होते हैं. Relationship Guide

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