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Hindi Social Story: राधेश्याम नाई- आखिर क्यों खास था राधेश्याम नाई?

Hindi Social Story: ‘‘अरे भाई, यह तो राधेश्याम नाई का सैलून है. लोग इस की दिलचस्प बातें सुनने के लिए ही इस की छोटी सी दुकान पर कटिंग कराने या दाढ़ी बनवाने आते हैं. ये बड़ा जीनियस व्यक्ति है. इस की दुकान रसिक एवं कलाप्रेमी ग्राहकों से लबालब होती है, जबकि यहां आसपास के सैलून ज्यादा नहीं चलते. राधेश्याम का रेट भी सारे शहर के सैलूनों से सस्ता है. राधेश्याम के बारे में यहां के अखबारों में काफी कुछ छप चुका है.’’

राजेश तो राधेश्याम का गुण गाए जा रहा था और मुझे उस का यह राग जरा भी पसंद नहीं आ रहा था क्योंकि गगन टायर कंपनी वालों ने मुझे राधेश्याम का परिचय कुछ अलग ही अंदाज से दिया था.

गगन टायर का शोरूम राधेश्याम की दुकान के ठीक सामने सड़क पार कर के था. मैं उन के यहां 5 दिनों से बतौर चार्टर्ड अकाउंटेंट बहीखातों का निरीक्षण अपने सहयोगियों के साथ कर रहा था. कंपनी के अधिकारियों ने इस नाई के बारे में कहा था कि यह दिमाग से जरा खिसका हुआ है. अपनी ऊलजलूल हरकतों से यह बाजार का माहौल खराब करता है. चीखचिल्ला कर ड्रामा करता है और टोकने पर पड़ोसियों से लड़ता है.

इन 5 दिनों में राधेश्याम मुझे किसी से लड़ते हुए तो दिखा नहीं, पर लंच के समय मैं अपने कमरे की खिड़की से उस की हरकतें जरूर देख रहा था. उस की दुकान से लोगों की जोरदार हंसी और ठहाकों की आवाज मेरे लंच रूम तक पहुंचती थी.

इस कंपनी में मेरे निरीक्षण कार्य का अंतिम दिन था. मैं ने अपनी फाइनल रिपोर्ट तैयार कर के स्टेनो को दे दी थी. फोन कर के राजेश को बुलाया था. मुझे राजेश के साथ उस के घर लंच के लिए जाना था. राजेश मेरा मित्र था और मैं उस के  यहां ही ठहरा था.

राजेश मुझे लेने आया तो रिपोर्ट टाइप हो रही थी. अत: वह मेरे पास बैठ गया. राधेश्याम के बारे में राजेश के विचार सुन कर लगा जैसे मैं आसमान से नीचे गिरा हूं. तो क्या मैं अपनी आंखों से 5 दिनों तक जो कुछ देख रहा था वह भ्रम था.

पिछले दिनों काम करते हुए मेरा ध्यान नाई की दुकान की ओर बंट जाता तो मैं लावणी की तर्ज पर चलने वाले तमाशे को देखने लगता. तब एक दिन भल्ला साहब बोले थे, ‘साहब, मसखर नाई की एक्ंिटग क्या देख रहे हो, अपना जरूरी काम निबटा लो. यहां तो मटरगश्ती करने वाले लोग दिन भर बैठे रहते हैं.’

‘ऐसे लोगों के अड्डे की शिकायत पुलिस से करो,’ मैं ने सुझाव दिया.

‘हम ने सब प्रयास कर लिए,’ भल्ला साहब बोले, ‘इस की शिकायत पुलिस और यहां तक कि स्थानीय प्रशासन और मंत्री तक से कर दी है, पर इस उस्तरे वाले का बाल भी बांका नहीं होता. मीडिया के लोगों और स्थानीय नेताओं ने इस को सिर पर बैठा रखा है.’

अब राजेश ने तो मानो पासा ही पलट दिया था. रास्ते में राजेश को मैं ने टायर कंपनी के अधिकारियों की राय राधेश्याम के बारे में बताई. राजेश हंस कर बोला, ‘‘तुम इस शहर में नए हो न, इसलिए ये लोग बात को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे थे. दरअसल, राधेश्याम की चलती दुकान से उस के कई पड़ोसी दुकानदारों को ईर्ष्या है. वे राधेश्याम की दुकान हथिया कर वहां शोरूम खोलना चाहते हैं. अरे भई, बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, यह कहावत तो तुम ने सुन रखी है न?’’

गाड़ी चलाते हुए राजेश ने एक पल को मुझे देखा फिर कहने लगा, ‘‘टायर कंपनी वालों ने पहले तो उसे रुपयों का भारी लालच दिया. जब वह उन की बातों में नहीं आया तो उस पर तरहतरह के आरोप लगा कर सरकारी महकमों और पुलिस में उस की शिकायत की और इस पर भी बात न बनी तो अब उस के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि वह नाई बहुत बड़ी तोप है?’’

‘‘नहीं…नहीं…पर नगर का बुद्धिजीवी वर्ग उस के साथ है.’’

‘‘परंतु राजेश, मुझे उस अनपढ़ नाई की हरकतें बिलकुल भी अच्छी नहीं लगीं,’’ मैं ने उत्तर दिया.

‘‘तुम तो अभी इस शहर में 2 महीने और ठहरोगे. किसी दिन उस की दुकान पर ग्राहक बन कर जाना और स्वयं उस के स्वभाव को परखना,’’ राजेश ने चुनौती भरे स्वर में कहा.

मैं चुप हो गया. राजेश को क्या जवाब देता? मैं कभी ऐसी छोटी सी दुकान पर कटिंग कराने के लिए नहीं गया. दिल्ली के मशहूर सैलून में जा कर मैं अपने बाल कटवाता था.

राजेश ने मुझे अपनी कार घूमनेफिरने और काम पर जाने के लिए सौंपी हुई थी. मैं भी राजेश की कंपनी का लेखा कार्य निशुल्क करता था. एक दिन मैं कार से नेहरू मार्ग से गुजर रहा था कि अचानक ही कार झटके लेने लगी और थोड़ी दूर तक चलने के बाद आखिरी झटका ले कर बंद हो गई. मैं ने खिड़की के बाहर झांक कर देखा तो गगन टायर कंपनी का शोरूम ठीक सामने था. मैं ने इस कंपनी का काम किया था, सोचा मदद मिलेगी. उन के दफ्तर में पहुंचा तो जी.एम. साहब नहीं थे. दूसरे कर्मचारी अपने कार्य में व्यस्त थे. एक कर्मचारी से मैं ने पूछा, ‘‘यहां पर कार मैकेनिक की दुकान कहां है?’’ उस ने बताया कि मैकेनिक की दुकान आधा किलोमीटर दूर है. मैं ने उस से कहा, ‘‘2-3 लड़के कार में धक्का लगाने के लिए चाहिए.’’

‘‘लेकिन सर, अभी तो लंच का समय चल रहा है. 1 घंटे बाद लड़के मिलेंगे. मैं भी लंच पर जा रहा हूं,’’ कह कर वह रफूचक्कर हो गया.

सड़क पर जाम लगता देख कर मैं ने किसी तरह अकेले ही गाड़ी को ठेल कर किनारे लगा दिया. इस के बाद पसीना सुखाने के लिए खड़ा हुआ तो देखता हूं कि राधेश्याम नाई की दुकान के आगे खड़ा हूं.

दुकान के ऊपर बड़े से बोर्ड पर लिखा था, ‘राधेश्याम नाई.’ इस के बाद नीचे 2 पंक्तियों का शेर था :

‘जाते हो कहां को, देखते हो किधर,

राधेश्याम की दुकान, प्यारे है इधर.’

मेरी निगाहें बरबस दुकान के अंदर चली गईं. 3-4 ग्राहक बेंच पर बैठे थे और बड़े से आईने के सामने रखी कुरसी पर बैठे एक ग्राहक की दाढ़ी राधेश्याम बना रहा था. आपस में हमारी आंखें मिलीं तो राधेश्याम एकदम से बोल पड़ा, ‘‘सेवा बताइए साहब, कोई काम है हम से क्या? यदि कटिंग करवानी है तो 1 घंटा इंतजार करना पड़ेगा.’’

‘‘कटिंग तो फिर कभी करवाएंगे, राधेश्यामजी. अभी तो मेरी कार खराब हो गई है और मैकेनिक की दुकान तक इसे पहुंचाना है, क्या करें,’’ मैं परेशान सा बोला.

‘‘गाड़ी कहां है?’’ राधेश्याम बोले.

‘‘वो रही,’’ मैं ने उंगली के इशारे से बताया.

‘‘आप जरा ठहर जाओ,’’ फिर दुकान से नीचे कूद कर, आसपास के लड़कों को नाम ले कर राधेश्याम ने आवाज लगाई तो 3-4 लड़के वहां जमा हो गए.

उन की ओर मुखातिब हो कर राधेश्याम गायक किशोर कुमार वाले अंदाज में बोला, ‘‘छोरां, मेरा 6 रुपैया 12 आना मत देना पर इन साहब की गाड़ी को धक्का मारते हुए इस्माइल मिस्त्री के पास ले जाओ. उस से कहना, राधेश्याम ने गाड़ी भेजी है, ज्यादा पैसे चार्ज न करे. और हां, गाड़ी पहुंचा कर वापस आओगे तो गरमागरम समोसे खिलाऊंगा.’’

राधेश्याम का अंदाज और संवाद मुझे पसंद आया. मैं ने 50 का नोट राधेश्याम के आगे बढ़ाया, ‘‘धन्यवाद, राधेश्यामजी… लड़कों के लिए समोसे मेरी तरफ से.’’

‘‘ये लड़के मेरे हैं साहब…समोसे भी मैं ही खिलाऊंगा. इन पैसों को रख लीजिए और अभी तो इस्माइल मैकेनिक के पास पहुंचिए. फिर कभी दाढ़ी बनवाने आएंगे तब हिसाब बराबर करेंगे,’’ राधेश्याम गंवई अंदाज में मुसकराते हुए बोला.

मेरी एक न चली. मैं मैकेनिक के पास पहुंचा. बोनट खोलने पर मालूम हुआ कि बैटरी से तार का कनेक्शन टूट गया था. उस ने तार जोड़ दिया पर पैसे नहीं लिए.

राधेश्याम से यह मेरी पहली मुलाकात थी जो मेरे हृदय पर छाप छोड़ गई थी. मैं ने शाम को राजेश से यह घटना बताई तो वह भी खूब हंसा और बोला, ‘‘राधेश्याम वक्त पर काम आने वाला व्यक्ति है.’’

मेरे मन का अहम कुछ छंटने लगा था इसलिए मैं ने मन में तय किया कि राधेश्याम की दुकान पर दाढ़ी बनवाने जरूर जाऊंगा.

रविवार के दिन राधेश्याम की दुकान पर मैं सुबह ही पहुंच गया. उस समय दुकान पर संयोग से कोई ग्राहक नहीं था. उस ने मुसकरा कर मेरा स्वागत किया, ‘‘आइए साहब, लगता है कि आप दाढ़ी बनवाने आए हैं.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता?’’ मैं ने परीक्षा लेने वाले अंदाज में पूछा.

‘‘क्योंकि हर बार तो आप की कार खराब नहीं हो सकती न,’’ वह हंसने लगा.

‘‘राधेश्यामजी, पिछले दिनों मेरी कार में धक्का लगवाने के लिए शुक्रिया, पर मैं ने भी आप के यहां दाढ़ी बनवाने का अपना वादा निभाया,’’ मैं ने बात शुरू की.

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया, हुजूर. खाकसार की दालरोटी आप जैसे कद्रदानों की बदौलत ही चल रही है. हुजूर, देखना, मैं आप की दाढ़ी कितनी मुलायम बनाता हूं. आप के गाल इतने चिकने हो जाएंगे कि इन गालों का बोसा आप की घरवाली बारबार लेना चाहेगी.’’

‘‘अरे, राधेश्यामजी अभी तो मेरी शादी ही नहीं हुई. घरवाली बोसा कैसे लेगी.’’

‘‘हुजूर, राधेश्याम से दाढ़ी बनवाते रहोगे तो इन गालों पर फिसलने वाली कोई दिलरुबा जल्दी ही मिल जाएगी.’’

‘‘हुजूर, खाकसार जानना चाहता है कि आप कहां रहते हैं, जिंसी, अनाज मंडी, छावनी या ग्वाल टोला…’’ राधेश्याम लगातार बोले जा रहा था.

‘‘मैं जूता फैक्टरी के मालिक राजेश वर्मा का मित्र हूं और उन्हीं के यहां ठहरा हूं.’’

‘‘तब तो आप इस खाकसार के भी मेहमान हुए हुजूर. राजेश बाबूजी ने आप को बताया नहीं कि मुझ से आप अपने सिर की चंपी जरूर करवाएं. दिलीप कुमार और देव आनंद तो जवानी में मुझ से ही चंपी करवाते थे,’’ यह बताते हुए राधेश्याम ने मेरे गालों पर झागदार क्रीम मलनी शुरू कर दी थी.

फिर राधेश्याम बोला, ‘‘किशोर दा, अहा, क्या गाते थे. आज भी उन की यादों को भुलाना मुश्किल है. मैं ने किशोर कुमार और अशोक कुमार की भी चंपी की है.’’

‘‘आप शायद मेरी बात को झूठ समझ रहे हैं. मैं ने फिल्मी दुनिया की बड़ी खाक छानी है और गुनगुनाना भी वहीं से सीखा है,’’ कहते हए वह ऊंचे स्वर में गाने लगा :

‘ओ मेरे मांझी, ले चल पार,

मैं इस पार, तू उस पार ओ मेरे मांझी, अब की बार ले चल पार…’

मुझे लगा कि मेरे गालों पर लगाया साबुन सूख जाएगा अगर यह आदमी इसी तरह से गाता रहा. आखिर मैं ने उसे टोका, ‘‘राधेश्याम, पहले दाढ़ी बनाओ.’’

‘‘हां…हां… हुजूर साहब,’’ और इसी के साथ वह मेरे गालों पर उस्तरा चलाने लगा. पर अधिक देर तक चुप न रह सका. बोल ही पड़ा, ‘‘सर, आप को पता है कि आप की दाढ़ी में कितने बाल हैं?’’

‘‘नहीं,’’ मैं ने इनकार में सिर हिला दिया.

‘‘इसी तरह इस देश में कितनी कारें होंगी. किसी भी आम आदमी को नहीं पता. सड़कों पर चाहे पैदल चलने के लिए जगह न हो पर कर्ज ले कर लोग प्रतिदिन हजारों कारें खरीद रहे हैं और वातावरण को खराब कर रहे हैं,’’ राधेश्याम ने पहेली बूझी और मैं हंस पड़ा.

इस के बाद राधेश्याम अपने हाथ का उस्तरा मुझे दिखा कर बोला, ‘‘ये उस्तरा नाई के अलावा किसकिस के हाथ में है, पता है?’’

‘‘नहीं…’’ मैं अब की बार मुसकरा कर बोला.

‘‘सब से तेज धार वाला उस्तरा हमारी सरकार के हाथ में है. नित नए टैक्स लगा कर आम आदमी की जेब काटने में लगी हुई है,’’ राधेश्याम बोला.

अब तक राधेश्याम मेरी शेव एक बार बना चुका था. दूसरी बार क्रीम वाला साबुन मेरे गालों पर लगाते हुए बोला, ‘‘यह क्रीम जो आप की दाढ़ी पर लगा रहे हैं, इस का मतलब समझे हैं आप?’’

‘‘नहीं,’’ मैं बोला.

‘‘लोग आजकल बहुत चालाक और चापलूस हो गए हैं. जब अपना मतलब होता है तो इस क्रीम की तरह चिकना मस्का लगा कर दूसरों को खुश कर देते हैं किंतु जब मतलब निकल जाता है तो पहचानते भी नहीं,’’ राधेश्याम अपनी बात पर खुद ही ठहाका लगाने लगा.

मुझे राधेश्याम की इस तरह की उपमाएं बहुत पसंद आईं. वह एक खुशदिल इनसान लगा. मैं ने अपनी आंखें बंद कर लीं पर राधेश्याम चालू रहा और बताने लगा कि उस के घर में उस की बूढ़ी मां, पत्नी, 2 पुत्र और 1 पुत्री हैं.

पुत्री की वह शादी कर चुका था. उस का बड़ा बेटा एम.काम. कर चुका था और छोटा बी.ए. सेकंड ईयर में था. पर राधेश्याम को दुख इस बात का था कि उस का बड़ा बेटा एम.काम. करने के बाद भी पिछले 2 वर्षों से बेरोजगार था. वह सरकारी नौकरी का इच्छुक था पर उसे सरकारी नौकरी बेहद प्रयासों के बावजूद भी नहीं मिली.

अपनी दुकान से 5-6 हजार रुपए महीना राधेश्याम कमा रहा था. उस ने बेटे को सलाह दी थी कि वह दुकान में काम करे तो अभी जो दुकान 7 घंटे के लिए खुलती है उस का समय बढ़ाया जा सकता है. परंतु बेटे का तर्क था कि जब नाईगिरी ही करनी है तो एम.काम. करने का फायदा क्या था. पर राधेश्याम का कहना था कि नाईगिरी करो या कुछ और… पर काम करने की कला आनी चाहिए.

राधेश्याम की यह बात खत्म होतेहोते मेरी दाढ़ी बन चुकी थी. अब उस को अपनी असली कला मुझे दिखानी थी. उस ने अपनी बोतल से मेरे सिर पर पानी की फुहार मारी. फिर थोड़ी देर चंपी कर के सिर में कोई तेल डाला और मस्ती में अपने दोनों हाथों से मेरे सिर पर बड़ी देर तक उंगलियों से कलाबाजी दिखाता रहा.

मुझे पता नहीं सिर की कौनकौन सी नसों की मालिश हुई पर सच में आनंद आ गया. सारी थकान दूर हो गई. शरीर बेहद हलका हो गया था.

मैं राधेश्याम नाई को दिल से धन्यवाद देने लगा. उस का मेहनताना पूछा तो बोला, ‘‘कुल 20 रुपए, सरकार… यदि कटिंग भी बनवाते तो सब मिला कर 35 रुपए ले लेता.’’

मैं ने 100 का नोट निकाल कर कहा, ‘‘राधेश्याम, 20 रुपए तुम्हारी मेहनत के और शेष बख्शीश.’’

वह कुछ जवाब में कहता इस से पहले ही मैं बोल पड़ा, ‘‘देखो राधेश्याम, पहली बार तुम्हारी दुकान पर आया हूं… अनेक यादें ले कर जा रहा हूं इसलिए इसे रखना होगा. बाद में मिलने पर तुम्हारे फिल्मी दुनिया के अनुभव सुनूंगा.’’

अगले दिन ही मुझे दिल्ली लौटना पड़ा. इस के 6 माह बाद एक दिन राजेश का फोन आया कि उसे मेरी जरूरत पड़ गई है. मैं दिल्ली से राजेश के शहर में पहुंचा. 2 दिन में सारा काम निबटाया. इस के बाद दिल्ली लौटने से पहले सोचा कि राधेश्याम की दुकान पर 10 मिनट के लिए चल कर उस से मिल लूं, वह खुश हो जाएगा.

दुकान पर राधेश्याम का बड़ा लड़का मिला. वह कटिंग कर रहा था. मैं ने बड़ी व्याकुलता से पूछा, ‘‘राधेश्यामजी कहां हैं?’’

जवाब में वह फूटफूट कर रोने लगा. बोला, ‘‘पापा का पिछले महीने हार्ट अटैक के कारण निधन हो गया.’’

उस के रोते हुए बेटे को मैं ने अपने सीने से लगा कर दिलासा दी. जब वह थोड़ा शांत हुआ तो मैं ने उसे अपने पिता के व्यवसाय को अपनाते देख आश्चर्य प्रकट किया. कहा, ‘‘बेटे, तुम तो यह काम करना नहीं चाहते थे? क्या तुम्हारे लिए मैं नौकरी ढूंढूं. कामर्स पढ़े हो, मेरी किसी क्लाइंट की कंपनी में नौकरी लग जाएगी.’’

‘‘नहीं, अंकल, अब नौकरी नहीं करनी. पापा ठीक कहते थे कि पढ़ाई- लिखाई से आदमी का बौद्धिक विकास होता है पर सच्ची सफलता तो अपने काम को ही आगे बढ़ाने से मिलती है. नाई का काम करने से मैं छोटा नहीं बन जाऊंगा. छोटा बनूंगा, गलत काम करने से.’’

राधेश्याम के बेटे की आवाज में आत्मविश्वास झलक रहा था. Hindi Social Story.

Bihar Election Result 2025 : सत्तावाद में डूब गया समाजवाद

Bihar Election Result 2025 : बिहार में एनडीए गठबंधन भारी बहुत से जीत गई है. वजहें चाहे जो हों पर इसे विपक्ष की हार कहना गलत नहीं होगा क्योंकि 20 सालों बाद भी वे नीतीश को सत्ता से हटा नहीं पाए. आखिर क्या कारण है कि समाजवादी राजनीति दक्षिणपंथ के खिलाफ हिंदी पट्टी में दम तोड़ती नजर आ रही है?

बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस की अगुवाई वाले महागठबंधन की हार ने नए राजनीतिक चिंतन को जन्म दिया है. समाजवादी विचारधारा सत्तावाद के दवाब में बिखर क्यों जाती है ? दूसरी तरफ भगवावाद है जो अपने विचारों को खुद से चिपका कर रखता है. वह अपने वोटर को विचारधारा से अलग नहीं होने देते हैं. उदाहरण के लिए भारतीय जनसंघ को ही लें, जो बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी वह धर्म के सिद्वांत पर पहले की तरह की कायम है. दूसरी तरफ समाजवादी विचारधारा से बने दल अपने सिद्धांत को भूल कर परिवारवाद के चक्कर में उलझ कर रह गए हैं.

समाजवाद और परिवारवाद के सिद्धांत अलगअलग हैं. समाजवाद निजी संपत्ति और लाभ पर आधारित पूंजीवाद का विरोध करता है. समाजवाद का लक्ष्य सामूहिक हित और समानता को बढ़ावा देना है. समाजवाद सभी के लिए एक समान अवसर लाने की बात करता है. समाजवाद उत्पादन के साधनों और धन के वितरण पर सार्वजनिक नियंत्रण का समर्थन करता है. समाजवाद पारंपरिक लिंग भूमिकाओं पर सवाल उठाता है और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने का प्रयास करता है.

यह परिवारवादी मूल्यों के विपरीत होते हैं. परिवार के भीतर संपत्ति के उत्तराधिकार और हस्तांतरण की पारंपरिक प्रथाओं से अलग है. परिवारवाद में अकसर पितृसत्तात्मक संरचनाएं शामिल होती हैं जहां परिवार के भीतर पुरुश और महिला की भूमिकाएं अलग होती हैं. समाजवाद का तर्क है कि सार्वजनिक स्वामित्व आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि परिवारवाद इस सुरक्षा को परिवार के भीतर से प्राप्त करने पर निर्भर करता है.

लालू प्रसाद यादव समाजवादी विचारधारा के नेता रहे हैं, जिन्होंने सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सदभाव को अपनी राजनीति के मूल सिद्धांत माना था. उन की राजनीति जनता पार्टी के शुरू हुई. जो समाजवादी विचारों पर आधारित थी. लालू प्रसाद यादव ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कराने में भी अहम भूमिका निभाई. वह हमेशा सामाजिक रूप से पिछड़े और हाशिए पर रहने वालों के हितों की बात करते रहे. 1997 में राष्ट्रीय जनता दल यानि राजद की स्थापना की. जिस की विचारधारा में सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सदभाव को केंद्र में रखा.

राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेताओं के विचारों को ले कर चलने की बात करते थे. यह समाजवादी विचारधारा गांधीवादी विचारों से प्रभावित थी. विचारों से अलग राजनीतिक सत्ता के दबाव में कभी एक साथ रहे बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव और जार्ज फर्नाडिस बिखरने लगे. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनता ने राजद के बदले स्वरूप को नकार दिया. लालू यादव अगर अपने पुराने सहयोगी नीतीश कुमार और समाजवादी विचारों को साथ ले कर चल सकते तो वह चुनाव नहीं हारते.

क्यों हावी हुआ परिवारवाद?

करीब 20 साल से बिहार में जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं. इस लंबे कार्यकाल के बाद भी विपक्ष उन के खिलाफ किसी भी तरह के आरोप लगाने में असफल रहा. महागठबंधन यह बताने में असफल रहा कि वह बिहार के लिए किस तरह उपयोगी होंगे. राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव ने समाजवाद के नाम पर अपनी राजनीति को विस्तार दिया था. सत्ता हासिल करने के बाद वह समाजवाद को भूल गए. उन के लिए समाजवाद का मतलब केवल परिवारवाद रह गया. वह अपनी विचारधारा के लोगों को साथ ले कर चलने में फेल हो गए.

1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगी थी तब लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव और रामविलास पासवान जैसे नेता गैर कांग्रेसवाद के नाम पर जेल में थे. 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो गैरकांग्रेसवाद के नाम पर समाजवादी नेता और जनसंघ (पहले की भारतीय जनता पार्टी) एक ही सरकार में हिस्सा थे. जनता पार्टी सरकार ने पिछड़ी जातियों को उन के हक और अधिकार देने के लिए 1979 में मंडल कमीशन का गठन किया था. यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई. जब जनता पार्टी सरकार गिर गई तो जनसंघ के नेताओं ने अलग भारतीय जनता पार्टी बना ली.

समाजवाद से जुडे लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव और रामविलास पासवान जैसे नेता एक साथ रहे. 1990 में जनता दल के नेता वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे. तब समाजवादी नेता उन के साथ जनता दल में शामिल थे. वीपी सिंह ने पिछड़ों को उन को हक देने के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशें मान ली. देश में अलग किस्म की राजनीति ने जन्म ले लिया. जिस में पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे आने का मौका मिला. इस बदलाव को समझते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपने दल में पिछड़ी जातियों से आए नेता उमा भारती, कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री तक बना दिया.

वीपी सिंह के बाद पिछड़ी जातियों के नेताओं ने समाजवाद के नाम पर परिवारवाद का बढ़ावा दिया. इस का असर धीरेधीरे यह हुआ कि पिछड़ी जातियां अलगअलग खेमों में बंट गईं. धीरेधीरे इन सभी ने अपनी गोलबंदी करनी शुरू कर दी. पिछड़ी जातियों में आपसी फूट का लाभ भारतीय जनता पार्टी ने उठाया. भाजपा ने सरकार और संगठन में पिछड़ी जातियों को स्थान देना शुरू किया. इन को अपनी धर्म की राजनीति का हिस्सा बनाना शुरू कर दिया. धीरेधीरे दक्षिणवाद का विरोध करने वाले समाजवादी नेता धर्म के समर्थक बनने लगे. भाजपा ने इन के अलग देवताओं और महापुरुषों का अपनाना शुरू कर दिया.

भाजपा में भले ही कमान ऊंची जाति के नेताओं के हाथ में रखी लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी दलित पिछड़ी जातियों को देना शुरू किया. इसी सोच पर भाजपा ने 1998 में एनडीए यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया. इस में गैर कांग्रेसी दल शामिल हुए. उत्तर प्रदेश और बिहार के दो बड़े दल समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल इस का हिस्सा नहीं बने. बिहार से जदयू, लोक जनशक्ति पार्टी और टीएमसी एनडीए के साथ रहे. राष्ट्रीय दलों की खेमेबंदी में कुछ दल कांग्रेस के साथ हुए तो कुछ भाजपा के साथ रहे. यानी कुछ एनडीए में रहे तो कुछ यूपीए का हिस्सा बन गए.

समाजवाद छोड़ कर परिवारवाद की राह पकड़ चुके दल जब सत्ता में आए तो अपने सामाजिक समीकरणो को छोड़ कर खुद आगे बढ़ने लगे. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ने कोई सामाजिक गठजोड़ नहीं बनाया. उन को लगा कि जातीय नेताओं को टिकट देने से ही जनता उन के साथ हो जाएगी. भाजपा ने इस कमी को महसूस किया और दलित पिछड़े नेताओं और गठजोड़ दोनों को ही सत्ता में भागीदारी देनी शुरू की. 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तो मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बना दिया.

इस के पहले 1997 में जब राजद नेता लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में जेल जाने लगे तो उन्होंने अपना उत्तराधिकारी अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बनाया वह मुख्यमंत्री बन गई. बताया जाता है कि यह काम लालू प्रसाद यादव ने उस समय के प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल की सलाह पर किया था. 25 जुलाई 1997 को राबड़ी देवी ने बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी. यहां से बिहार ही नहीं पूरे देश की राजनीति में बदलाव आया. राजनीति से दूर एक साधारण गृहिणी को अचानक मुख्यमंत्री बना दिया गया. जो लालू प्रसाद यादव की पत्नी, एक घरेलू महिला और राजनीति से बिल्कुल अनजान थी. लालू प्रसाद यादव के इस सियासी कदम उठाया जिस ने बिहार ही नहीं पूरे देश को चैंका दिया. इस ने समाजवाद की जगह परिवारवाद के लिए एक रास्ता खोल दिया. यहां तक की खुद राबड़ी देवी इस के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थीं.

राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने की घोषणा किसी राजनीतिक मंथन या पार्टी की आंतरिक सहमति से नहीं, बल्कि लालू प्रसाद यादव की रणनीतिक जरूरत से हुई थी. लालू प्रसाद जानते थे कि अगर उन्होंने किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री बनाया, तो सत्ता उन के हाथों से जा सकती है. लेकिन अगर पत्नी मुख्यमंत्री बनती हैं, तो वे परोक्ष रूप से सत्ता की पकड़ बनाए रख सकते हैं.

राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री के रूप में अपना काम संभालने में काफी दिक्कतें आ रही थीं. वे विधानसभा में भाषण देने से बचती थीं. सचिवालय जाना उन्हें असहज करता था. इस वजह से उन को ‘रबर स्टांप’ मुख्यमंत्री कहा जाने लगा था. लालू प्रसाद यादव के करीबी नेताओं रघुवंश प्रसाद सिंह, रामचंद्र पूर्वे और अब्दुल बारी सिद्दीकी इस फैसले के साथ थे. लालू के बाद वह राबड़ी का साथ देते रहे जिस से लालू की पकड़ पार्टी पर बनी रही.

राबड़ी देवी का जन्म 1956 में बिहार के गोपालगंज जिले में हुआ था. उन्होंने 1973 में लालू प्रसाद यादव से विवाह किया. तब उन की उम्र महज 17 वर्ष थी. इन की बड़ी बेटी का जन्म उस समय हुआ था जब लालू प्रसाद यादव इमरजेंसी के दौरान जेल में थे. इसलिए उस का नाम ‘मीसा‘ रखा गया. इमरजेंसी को डीआईआर मीसा के नाम से जाना जाता था. 2000 के विधानसभा चुनाव में राबड़ी देवी ने अपनी पार्टी को जीत दिलाई. इस के बाद वह पूरे 5 साल मुख्यमंत्री रहीं. लालू प्रसाद यादव के बच्चे छोटे थे तो कई नाते रिश्तेदार जैसे उन के साले साधू यादव सत्ता पर काबिज रहे. इस का पार्टी पर बुरा प्रभाव पड़ा.

इस दौरान लालू प्रसाद जेल से बाहर भी आए, लेकिन उन्होंने दोबारा मुख्यमंत्री बनने की बजाय पर्दे के पीछे से राजनीति को साधने का रास्ता चुना. 2015 में जब तेजस्वी यादव ने बड़े हो कर राजनीति में कदम रखा तो उन की उम्र 26 साल थी. वैसे उन के बड़े भाई तेजप्रताप भी थे पर उन की रूचि राजनीति में नहीं थी. लालू प्रसाद यादव तेजप्रताप की जगह पर तेजस्वी यादव को ज्यादा प्रतिभाशाली मानते थे. इस कारण 2022 में जब नीतीश कुमार राजद के सहयोग से मुख्यमंत्री बने तो तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने और लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को कैबिनेट मंत्री का पद दिया गया.

सत्ता को ले कर परिवार में भी झगड़ा शुरू हो गया. राजद ही नहीं दूसरे दल भी इस का शिकार होने लगे. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने के बाद समाजवादी पार्टी में आपसी झगड़े शुरू हो गए. मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल यादव अलग हो गए. आपसी कलह में समाजवादी पार्टी 2017 में विधानसभा का चुनाव हार गई. तब से लगातार समाजवादी उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर है. दूसरी तरफ भाजपा ने पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे कर के सत्ता पर कब्जा जमा लिया.

भाजपा को यह पता था कि धर्म की राजनीति में मुसलिम उन को वोट नहीं देगा. ऐसे में उस ने दलित पिछड़ों को पार्टी में स्थान देना शुरू किया. धीरेधीरे दलित और पिछड़ों को धर्म से जोड़ना शुरू किया. समाजवादी विचारधारा के नेता इस बात को समझ ही नहीं पाए. वह केवल अपने परिवारवाद में फंसे रहे.

नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ इंडिया गठबंधन का मोर्चा बना दिया. इस में गैर भाजपाई कई दल शामिल हो गए. बिहार में राजद और केन्द्र में कांग्रेस नीतीश कुमार को साथ ले कर चलने के लिए तैयार नहीं थी. इंडिया गठबंधन में नीतीश कुमार को अलगथलग कर दिया गया. दूसरी तरफ भाजपा नीतीश कुमार के महत्व को समझ चुकी थी. उस ने नीतीश कुमार को अपनी तरफ करने की पहल की. नीतीश कुमार यह समझ गए थे कि कांग्रेस और राजद की जगह भाजपा के साथ रहने में लाभ है.

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार वापस भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हो गए. इस का असर यह हुआ कि 2024 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा 240 सीटे पा कर बहुमत के आंकड़े से दूर हुई तो नीतीश कुमार उन के सहयोगी बन गए. अगर कांग्रेस ने नीतीश के महत्व को समझा होता तो लोकसभा चुनाव में नीतीश कांग्रेस के साथ खड़े होते. केन्द्र में सहयोग करने वाले नीतीश कुमार बिहार में भी भाजपा के साथ बने रहे. कांग्रेस और राजद ने नीतीश कुमार को भड़काने का बहुत प्रयास किया. उन की उम्र और सेहत को ले कर आलोचना की. नीतीश कुमार ने बिना कोई विवादित बयान दिए चुनाव प्रचार किया. जनता ने मोदी और नीतीश की जोड़ी को वोट दे दिया.

पूरे राजनीतिक परिदृष्य को देखें तो पता चलता है कि एक राजद और कांग्रेस थी जिन में आपसी तालमेल का अभाव था आपसी खींचतान थी, दूसरी तरफ भाजपा, जदयू, लोक जनशक्ति पार्टी और दूसरे दलों का आपसी तालमेल था. यह दल विचारधारा के स्तर पर भले ही भाजपा के साथ न हो लेकिन आपस में एकजुट थे. ऐसे में भाजपा ने राजनीतिक स्तर पर बेहतर तालमेल रखा. वहीं राजद और कांग्रेस सामाजिक स्तर पर भी लोगों को जोड़ नहीं पाई. जिस से बिहार विधानसभा में करारी हार का सामना करना पड़ा.

हार का प्रभाव लालू प्रसाद यादव के परिवार पर पड़ा. तेजस्वी यादव के खिलाफ बड़े भाई तेज प्रताप यादव पहले ही अलग हो चुके थे. चुनाव के बाद बहन रोहणी आचार्य ने घर छोड़ दिया. अपने सोशल मीडिया एक्स पर अपने साथ मारपीट और घर से निकाले जाने की बात कही. यानी सत्ता के लिए जिस राजद ने परिवार को बढ़ावा दिया उसी में आपसी झगड़े हो गए. यही मुलायम सिंह यादव के परिवार में भी हुआ था. समाजवाद के जो सिद्वांत थे वह परिवारवाद में बदल गए. एक तरफ समाजवाद को ले कर चल रहे दल परिवारवाद में उलझ कर रह गए, दूसरी तरफ भगवा विचारधारा पर बनी भाजपा ने अपने आधार वोटबैंक को बढ़ाना शुरू कर दिया. वह अपनी भगवा विचारधारा पर कायम रहे.

सामाजिक गठजोड़ बनाने में सफल रही भाजपा

1962 में जनसंघ ने बिहार में 3 सीट जीत कर अपना खाता खोला था. 63 साल बाद जनसंघ से बनी भाजपा 89 सीट जीत कर सब से बड़ी पार्टी बन गई है. भाजपा ने 101 सीट पर अपने उम्मीदवारों को उतारा था जिस में सवर्ण समुदाय से 49, पिछड़ा अति पिछड़ा से 40 और 12 दलित थे. जातीय आधार पर देखें तो 21 राजपूत, 16 भूमिहार, 11 ब्राह्मण, एक कायस्थ, 13 वैश्य, 12 अति पिछड़ा, 7 कुशवाहा, 2 कुर्मी, 6 यादव और 12 दलित थे.

भाजपा ने जातीय समीकरणों को देखते हुए धर्मेन्द्र प्रधान को चुनाव प्रभारी बनाया था. साथ ही केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल और उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को सह प्रभारी बनाया था. ओबीसी समुदाय से आने वाले धर्मेन्द्र प्रधान और केशव प्रसाद मौर्य पर ओबीसी वोटर्स को साधने के साथसाथ जीत की रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी थी. सीआर पाटिल ने बूथ मैनेजमेंट पर काम किया. गुजरात चुनाव में भाजपा की जीत के बाद सीआर पाटिल का नाम चर्चा में था. उन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की बात भी चल रही थी.

चुनाव में महिलाओं के महत्व को देखते हुए पांच राज्यों छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली से 200 महिला कार्यकर्ताओं को बिहार भेजा. यह महिलाएं चुनाव से तीन महीने पहले ही बिहार आ गई थी. भाजपा की स्थानीय महिला नेताओं ने इन के साथ काम किया. इस के अलावा कई प्रदेश के मुख्यमंत्रियों जैसे रेखा गुप्ता, योगी आदित्यनाथ, मोहन यादव सहित कई बड़े नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा. नाराज नेताओं से बात कर के उन को पार्टी के साथ काम करने के लिए तैयार किया गया.

बिहार की जीत में महिलाओं की भूमिका

बिहार में चुनाव परिणामों को ले कर अलग बहस चल रही है. चुनाव से पहले ही एसआईआर का मुददा उठा था. चुनाव के बाद जिस तरह से नीतीश कुमार के पक्ष में वोट पड़े उस के कारणों की समीक्षा की जा रही है. इस में सब से अधिक चर्चा महिला वोटर की हो रही है. बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे देखें तो नीतीश की अगुवाई वाले एनडीए को 202 सीटे, तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन केवल 35 सीटें ही मिल सकी.

एनडीए की सफलता में महिलाओं की भूमिका अहम मानी जा रही है. बिहार विधानसभा चुनाव में कुल मतदान 67.13 प्रतिशत रहा था. इस में महिलाओं की हिस्सेदारी 71.78 प्रतिशत थी. जबकि पुरुषों ने 62.98 प्रतिशत मतदान किया था. यानी पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं ने चुनाव में अधिक हिस्सेदारी की. इस की प्रमुख वजह नीतीश कुमार की महिलाओं के प्रति केंद्रित रही योजनाओं का माना जा रहा है. शराबबंदी और कानून सब से प्रमुख मुददा बन गया. जनस्वराज पार्टी के प्रशांत किशोर शराबबंदी के पक्ष में नहीं थे और तेजस्वी यादव की जीत से बिहार में वापस जंगल राज आने का खतरा लग रहा था. ऐेसे में महिलाएं नीतीश कुमार के पक्ष में खड़ी हो गईं.

2005 में सत्ता संभालने के बाद नीतीश कुमार ने लड़कियों की शिक्षा पर विशेश ध्यान दिया था. तब बिहार में महिलाओं की शिक्षा दर 33.57 प्रतिशत थी. जो अब बढ़ कर 73.91 प्रतिशत हो गई है. नीतीश कुमार ने लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए मुफ्त साइकिल योजना शुरू की थी, इन योजनाओं से मुख्य रूप से माध्यमिक स्तर पर ड्रापआउट दर में बड़ी कमी दिखी. नीतीश सरकार ने लड़कियों को छात्रवृत्ति और मुफ्त यूनिफौर्म स्कीम से भी जोड़ा और 12वीं तक पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रोत्साहित किया.

बिहार में 10वीं, 12वीं और ग्रेजुएशन पास करने पर लड़कियों को वित्तीय प्रोत्साहन भी दिया जाता है. ग्रेजुएशन पूरी करने पर छात्राओं को 50 हजार रूपए तक का पुरस्कार मिलता है. पढ़ाई के बाद महिलाओं के लिए नौकरी और सुरक्षा पर भी नीतीश कुमार ने काम किया है. बिहार में सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण है. यह महिलाए अब न केवल खुद वोटर हो गई बल्कि उन के बच्चे भी बड़े हो गए हैं.

बिहार में महिला पुलिसकर्मियों का प्रतिशत भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले काफी अच्छा है. बिहार पुलिस में 37 प्रतिशत महिलाएं हैं. एनडीए ने इस चुनाव में ‘जंगल राज’ का मुद्दा जोर शोर से उठाया. नीतीश सरकार ने पिछले दो दशकों में ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी है. 2016 से बिहार के पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया. एनडीए की सफलता में जीविका योजना का प्रभाव देखने को मिला. यह योजना 2007 से चल रही है. इस ने महिलाओं को संगठित किया है और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाया. बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में 80 प्रतिशत महिलाएं ‘जीविका दीदी’ से जुड़ी हैं.

आचार संहिता का उल्लंघन

चुनाव के ठीक पहले नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपए सीधे महिलाओं के बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए. इस का लाभ राज्य की 25 लाख महिलाओं को मिला. यह राशि लोन नहीं है और ना ही इसे लौटाना होगा. अब विपक्षी दल इस को रिश्वत मान रहा है. यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन बताया जा रहा है. बिहार के 34 प्रतिशत से अधिक परिवार हर महीने सिर्फ छह हजार रूपए या उस से कम पर गुजर बसर करते हैं. ऐसे गरीब परिवारों के लिए एक बार में मिले 10 हजार रूपए उन की एक महीने की आमदनी के बराबर थे. गांव की इन महिलाओं ने इस राशि से बैल, बकरी या पशु खरीदे थे.

नगद रूपए अधिक असर करते हैं. ऐसा ही असर उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त मिले गैस सिलेंडर का भी था. इस 10 हजार रुपए के ट्रांसफर का मुकाबला तेजस्वी यादव ने महिलाओं को मकर संक्रांति पर 30 हजार रुपए देने की घोषणा की थी लेकिन महिलाओं ने उस पर भरोसा नहीं दिखाया. इस के अलावा नीतीश कुमार की शराब बंदी योजना भी महिलाओं के हित में है. यह महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा से सीधे जुड़ी है. नीतीश कुमार ने साल 2016 में शराब पर पूरी तरह पाबंदी लागू कर दी थी.

प्रशांत किशोर ने चुनाव के दौरान बयान दिया कि उन की पार्टी जन सुराज सत्ता में आई, तो एक घंटे में शराबबंदी हटाई जाएगी. उन का तर्क था कि बिहार में अवैध शराब का कारोबार बढ़ा है. जिस से राज्य को करोड़ों रुपए का राजस्व नुकसान हुआ. ऐसे में महिलाओं को लगा कि एनडीए और नीतीश कुमार ही सब से जरूरी है. एनडीए ने छठ पूजा को भी मुददा बना दिया. कई प्रदेशों से छठ पूजा में हिस्सा लेने आए लोगों के लिए मुफ्त बस सेवा शुरू की.

सवालों के घेरे में चुनाव आयोग

भाजपा और जदयू की बहुत सारी खूबियों के बीच उन की खामियों की चर्चा के बिना सही विष्लेषण करना मुश्किल है. चुनाव आयोग की भूमिका को ले कर सवाल उठ रहे हैं. इन में एसआईआर यानी वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के साथ ही साथ चुनाव के बीच में महिलाओं के खातों में 10 हजार रूपयो को भेजना वोट खरीदने का आरोप लग रहा है. चुनाव आयोग का काम देश में निष्पक्ष चुनाव कराना होता है. जिस तरह से चुनाव आयोग केन्द्र सरकार के दबाव में दिख रहा है उस को ले कर सवाल उठ रहे हैं. कई नेताओं ने चुनाव आयोग के अध्यक्ष ज्ञानेश कुमार को निशाने पर ले कर कहा कि इस जीत में चुनाव आयोग की भूमिका सब से अधिक है.

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ईवीएम को जिम्मेदार ठहराते हुए एक्स पर लिखा ‘जो मेरा शक था वही हुआ. 62 लाख वोट कटे 20 लाख वोट जुड़े, उस में से 5 लाख वोट बिना एसआईआर फौर्म भरे बड़ा दिए गए. अधिकांश वोट गरीबों के दलितों के अल्प संख्यक वर्ग के कटे. उस पर चुनाव आयोग पर तो शंका बनी हुई है.’

कांग्रेस ने कहा है कि जहां चुनाव शुरू होने से पहले 6 अक्तूबर को बिहार में वोटरों की संख्या करीब 7.42 करोड़ थी, वहीं यह आंकड़ा चुनाव के बीच 11 नवंबर को 7.45 करोड़ हो गया. चुनाव आयोग ने अब तक आधिकारिक तौर पर इन आरोपों पर कोई जवाब नहीं दिया है.

चुनाव आयोग पर यह आरोप लग रहा है कि एसआईआर कर 69 लाख वोट काट दिए. जिन के वोट काटे गए, वे विपक्ष के वोटर थे, जिन्हें टारगेट कर लिस्ट से बाहर किया गया. कांग्रेस ने चुनाव आयोग से सवाल किया है कि बिहार चुनाव के बीच अचानक से 3 लाख वोटर कैसे बढ़े ? कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने कहा कि नतीजे अप्रत्याशित हैं, इन की जांच होनी चाहिए. हमारे लोग डेटा इकट्ठा कर रहे हैं. हम फार्म 17सी, मतदाता सूची देखेंगे और तथ्यों और आंकड़ों के साथ अपना पक्ष रखेंगे. वोट चोरी का मुददा लंबे समय से चल रहा है. चुनाव आयोग कांग्रेस से हलफनामे पर शिकायत लिख कर देने को कह रहा है.

कांग्रेस इस के लिए तैयार नहीं है. वह केवल चुनाव आयोग पर निशाना लगा रही है. चुनाव आयोग ने एसआईआर का काम देश के बाकी राज्यों में भी शुरू कर दिया है. चुनावों में असल लड़ाई संगठन लड़ता है. वोट लेने के लिए बूथ लेवल मैनेजमेंट करना पड़ता है. इस के लिए कांग्रेस के पास कार्यकर्ता नहीं है. क्षेत्रीय दलों के पास कार्यकर्ता है लेकिन उन को संगठित कर के काम कराना सरल नहीं है.

दूसरी तरफ भाजपा के पास कार्यकर्ता और साधन दोनों हैं. इस के अलावा भाजपा ने धर्म को जोड़ कर ऐसे कार्यकर्ता तैयार कर लिए हैं तो मुफ्त में काम करते है. भाजपा ने धर्म और समाज को जिस तरह से जोड़ दिया है उस से निपटना सरल नहीं है. भाजपा ने जातीय स्तर पर भी धर्म का ऐसा प्रचार कर दिया है कि दलित और पिछड़ी जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा के धर्म प्रचार का हिस्सा हो गया है. पिछड़ों की अगुवाई करने वाली सपा और राजद जैसी पार्टियां अलग थलग पड़ गई है. इस कारण धीरेधीरे भाजपा अपने पांव फैलाने में सफल हो रही है. Bihar Election Result 2025.

Social Story In Hindi: चाहत- एक गृहिणी की ख्वाहिशों की दिल छूती कहानी

Social Story In Hindi: ‘थक गई हूं मैं घर के काम से. बस, वही एकजैसी दिनचर्या, सुबह से शाम और फिर शाम से सुबह. घर की सारी टैंशन लेतेलेते मैं परेशान हो चुकी हूं. अब मुझे भी चेंज चाहिए कुछ,’ शोभा अकसर ही यह सब किसी न किसी से कहती रहतीं. एक बार अपनी बोरियतभरी दिनचर्या से अलग, शोभा ने अपनी दोनों बेटियों के साथ रविवार को फिल्म देखने और घूमने का प्लान बनाया. शोभा ने तय किया इस आउटिंग में वे बिना कोई चिंता किए सिर्फ और सिर्फ आनंद उठाएंगी.

मध्यवर्गीय गृहिणियों को ऐसे रविवार कम ही मिलते हैं जिस में वे घर वालों पर नहीं, बल्कि अपने ऊपर समय और पैसे दोनों खर्च करें. इसलिए इस रविवार को ले कर शोभा का उत्साहित होना लाजिमी था. यह उत्साह का ही कमाल था कि इस रविवार की सुबह, हर रविवार की तुलना में ज्यादा जल्दी उठ गई थीं. उन को जल्दी करतेकरते भी सिर्फ नाश्ता कर के तैयार होने में ही 12 बज गए. शो 1 बजे का था, वहां पहुंचने और टिकट लेने के लिए भी समय चाहिए था. ठीक समय पर वहां पहुंचने के लिए बस की जगह औटो ही विकल्प दिख रहा था और यहीं से शोभा के मन में ‘चाहत और जरूरत’ के बीच में संघर्ष शुरू हो गया. अभी तो आउटिंग की शुरुआत ही थी, तो चाहत की विजय हुई. औटो का मीटर बिलकुल पढ़ीलिखी गृहिणियों की डिगरी की तरह, जिस से कोई काम नहीं लेना चाहता पर हां, जिन का होना भी जरूरी होता है, एक कोने में लटका था. इसलिए किराए का भावताव तय कर के सब औटो में बैठ गए.

शोभा वहां पहुंच कर जल्दी से टिकट काउंटर पर जा कर लाइन में लग गईं. जैसे ही उन का नंबर आया तो उन्होंने अंदर बैठे व्यक्ति को झट से 3 उंगलियां दिखाते हुए कहा, ‘3 टिकट.’ अंदर बैठे व्यक्ति ने भी बिना गरदन ऊपर किए, नीचे पड़े कांच में उन उंगलियों की छाया देख कर उतनी ही तीव्रता से जवाब दिया, ‘1200 रुपए.’ शायद शोभा को अपने कानों पर विश्वास नहीं होता यदि वे साथ में उस व्यक्ति के होंठों को 1,200 रुपए बोलने वाली मुद्रा में हिलते हुए न देखतीं. फिर भी मन की तसल्ली के लिए एक बार और पूछ लिया, ‘कितने?’ इस बार अंदर बैठे व्यक्ति ने सच में उन की आवाज नहीं सुनी पर चेहरे के भाव पढ़ गया. उस ने जोर से कहा, ‘1200…’ शोभा की अन्य भावनाओं की तरह उन की आउटिंग की इच्छा भी मोरनी की तरह निकली जो दिखने में तो सुंदर थी पर ज्यादा ऊपर उड़ नहीं सकी और धम्म… से जमीन पर आ गई. पर फिर एक बार दिल कड़ा कर के उन्होंने अपने परों में हवा भरी और उड़ीं, मतलब 1,200 रुपए उस व्यक्ति के हाथ में थमा दिए और टिकट ले कर थिएटर की ओर बढ़ गईं.

10 मिनट पहले दरवाजा खुला. हौल में अंदर जाने वालों में शोभा बेटियों के साथ सब से आगे थीं. अपनीअपनी सीट ढूंढ़ कर सब यथास्थान बैठ गए. विभिन्न विज्ञापनों को झलने के बाद, मुकेश और सुनीता के कैंसर के किस्से सुन कर, साथ ही उन के वीभत्स चेहरे देख कर तो शोभा का पारा इतना ऊपर चढ़ गया कि यदि गलती से भी उन्हें अभी कोई खैनी, गुटखा या सिगरेट पीते दिख जाता तो 2-4 थप्पड़ उसे वहीं जड़ देतीं और कहतीं कि मजे तुम करो और हम अपने पैसे लगा कर यहां तुम्हारा कटाफटा लटका थोबड़ा देखें. पर शुक्र है वहां धूम्रपान की अनुमति नहीं थी. लगभग आधे मिनट की शांति के बाद सभी खड़े हो गए. राष्ट्रगान चल रहा था.

साल में 2-3 बार ही एक गृहिणी के हिस्से में अपने देश के प्रति प्रेम दिखाने का अवसर प्राप्त होता है और जिस प्रेम को जताने के अवसर कम प्राप्त होते हैं उसे जब अवसर मिले तो वह हमेशा आंखों से ही फूटता है. वैसे, देशप्रेम तो सभी में समान ही होता है चाहे सरहद पर खड़ा सिपाही हो या एक गृहिणी, बस, किसी को दिखाने का अवसर मिलता है किसी को नहीं. इस समय शोभा वीररस में इतनी डूबी हुई थीं कि उन को एहसास ही नहीं हुआ कि सब लोग बैठ चुके हैं और वे ही अकेली खड़ी हैं, तो बेटी ने उन को हाथ पकड़ कर बैठने को कहा. अब फिल्म शुरू हो गई. शोभा कलाकारों की अदायगी के साथ भिन्नभिन्न भावनाओं के रोलर कोस्टर से होते हुए इंटरवल तक पहुंचीं.

चूंकि, सभी घर से सिर्फ नाश्ता कर के निकले थे तो इंटरवल तक सब को भूख लग चुकी थी. क्याक्या खाना है, उस की लंबी लिस्ट बेटियों ने तैयार कर के शोभा को थमा दी. शोभा एक बार फिर लाइन में खड़ी थीं. उन के पास बेटियों द्वारा दी गई खाने की लंबी लिस्ट थी तो सामने खड़े लोगों की लाइन भी लंबी थी. जब शोभा के आगे लगभग 3-4 लोग बचे होंगे तब उन की नजर ऊपर लिखे मैन्यू पर पड़ी, जिस में खाने की चीजों के साथसाथ उन के दाम भी थे. उन के दिमाग में जोरदार बिजली कौंध गई और अगले ही पल बिना कुछ समय गंवाए वे लाइन से बाहर थीं. 400 रुपए के सिर्फ पौपकौर्न, समोसा 80 रुपए का एक सैंडविच 120 रुपए की एक और कोल्डड्रिंक 150 रुपए की एक. एक गृहिणी, जिस ने अपनी शादीशुदा जिंदगी ज्यादातर रसोई में ही गुजारी हो, को एक टब पौपकौर्न की कीमत दुकानदार 400 रुपए बता रहे थे. शोभा के लिए यह वही बात थी कि कोई सूई की कीमत 100 रुपए बताए और उसे खरीदने को कहे. उन्हें कीमत देख कर चक्कर आने लगे.

मन ही मन उन्होंने मोटामोटा हिसाब लगाया तो लिस्ट के खाने का खर्च, आउटिंग के खर्च की तय सीमा से पैर पसार कर पर्स के दूसरे पौकेट में रखे बचत के पैसों, जो कि मुसीबत के लिए रखे थे, तक पहुंच गया था. उन्हें एक तरफ बेटियों का चेहरा दिख रहा था तो दूसरी तरफ पैसे. इस बार शोभा अपने मन के मोर को ज्यादा उड़ा न पाईं और आनंद के आकाश को नीचा करते हुए लिस्ट में से सामान आधा कर दिया. जाहिर था, कम हुआ हिस्सा मां अपने हिस्से ही लेती है. अब शोभा को एक बार फिर लाइन में लगना पड़ा. सामान ले कर जब वे अंदर पहुंचीं तो फिल्म शुरू हो चुकी थी. कहते हैं कि यदि फिल्म अच्छी होती है तो वह आप को अपने साथ समेट लेती है. ऐसा लगता है मानो आप भी उसी का हिस्सा हों. और शोभा के साथ हुआ भी वही. बाकी की दुनिया और खाना सब भूल कर शोभा फिल्म में बहती गईं और तभी वापस आईं जब फिल्म समाप्त हो गई. वे जब अपनी दुनिया में वापस आईं तो उन्हें भूख सताने लगी. थिएटर से बाहर निकलीं तो थोड़ी ही दूरी पर उन्हें एक छोटी सी चाटभंडार की दुकान दिखाई दी और सामने ही अपना गोलगोल मुंह फुलाए गोलगप्पे नजर आए. गोलगप्पे की खासीयत होती है कि उन से कम पैसों में ज्यादा स्वाद मिल जाता है और उस के पानी से पेट भर जाता है.

सिर्फ 60 रुपए में तीनों ने पेटभर गोलगप्पे खा लिए. घर वापस पहुंचने की कोई जल्दी नहीं थी, तो शोभा ने अपनी बेटियों के साथ पूरे शहर का चक्कर लगाते हुए घूम कर जाने वाली बस पकड़ी. बस में बैठीबैठी शोभा के दिमाग में बहुत सारी बातें चल रही थीं. कभी वे औटो के ज्यादा लगे पैसों के बारे में सोचतीं तो कभी फिल्म के किसी सीन के बारे में सोच कर हंस पड़तीं, कभी महंगे पौपकौर्न के बारे में सोचतीं तो कभी महीनों या सालों बाद उमड़ी देशभक्ति के बारे में सोच कर रोमांचित हो उठतीं. उन का मन बहुत भ्रमित था कि क्या यही वह ‘चेंज’ है जो वे चाहतीं थीं? वे सोच रही थीं कि क्या सच में वे ऐसा ही दिन बिताना चाहती थीं जिस में दिन खत्म होने पर उन के दिल में खुशी के साथ कसक भी रह जाए? तभी छोटी बेटी ने हाथ हिलाते हुए अपनी मां से पूछा, ‘‘मम्मी, अगले संडे हम कहां चलेंगे?’’ अब शोभा को ‘चाहत और जरूरत’ में से किसी एक को चुनना था. उन्होंने सब की जरूरतों का खयाल रखते हुए,

साथ ही अपनी चाहत का भी तिरस्कार न करते हुए, कहा, ‘‘आज के जैसे बस से पूरा शहर देखते हुए बीच चलेंगे और सनसैट देखेंगे.’’ शोभा सोचने लगीं कि अच्छा हुआ जो प्रकृति अपना सौंदर्य दिखाने के पैसे नहीं लेती और प्रकृति से बेहतर चेंज कहीं और से मिल सकता है भला? शोभा को प्रकृति के साथसाथ अपना घर भी बेहद सुंदर नजर आने लगा था. उस का अपना घर, जहां उस के सपने हैं, अपने हैं और सब का साथ भी तो. Social Story In Hindi

Social Story In Hindi: संकट की घड़ी- डॉक्टरों की परेशानियां कौन समझेगा?

Social Story In Hindi: उस ने घड़ी देखी. 7 बजने को थे. मतलब, वह पूरे 12 घंटों से यहां लगा हुआ था. परिस्थिति ही कुछ ऐसी बन गई थी कि उसे कुछ सोचनेसमझने का अवसर ही नहीं मिला था.

जब से वह यहां इस अस्पताल में है, मरीज और उस के परिजनों से घिरा शोरगुल सुनता रहा है. किसी को बेड नहीं मिल रहा, तो किसी को दवा नहीं मिल रही. औक्सीजन का अलग अकाल है. बात तो सही है. जिस के परिजन यहां हैं या जिस मरीज को जो तकलीफ होगी, यहां नहीं बोलेगा, तो कहां बोलेगा. मगर वह भी किस को देखे, किस को न देखे. यहां किसी को अनदेखा भी तो नहीं किया जा सकता. बस किसी तरह अपनी झल्लाहट को दबा सभी को आश्वासन देना होता है. किसी को यह समझने की फुरसत नहीं कि यहां पीपीई किट पहने किस नरक से गुजरना होता है. इसे पहने पंखे के नीचे खड़े रहो, तो पता ही नहीं चलता कि पंखा चल भी रहा है या नहीं. और यहां सभी को अपनीअपनी ही पड़ी है.

ठीक है कि सरकारी अस्पताल है और यहां मुसीबत में हारीबीमारी के वक्त ही लोग आते हैं. मगर इस कोरोना के चक्कर में तो जैसे मरीजों की बाढ़ आई है. और यहां न फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर है और न ह्यूमन रिसोर्सेज हैं. सप्लाई चेन औफ मेडिसिन का कहना ही क्या! किसी को कहो कि मरीज के लिए दवा बाहर से खरीदनी होगी या औक्सीजन का इंतजाम करना होगा, तो वह पहली नजर में ऐसे देखता है, मानो उसी ने अस्पताल से दवाएं या औक्सीजन गायब करवा दिया हो या वही उस की ब्लैक मार्केटिंग करवा रहा हो.

ऐसी खबरें अखबारों और सोशल मीडिया में तैर भी रही हैं. मगर फिर भी ऐसे में एक डाक्टर करे तो क्या. उस का काम मरीजों का इलाज करना है, न कि ब्लैक मार्केटियरों को पकड़ना या सुव्यवस्था कायम करना है. आखिर किस समाज में अच्छेबुरे लोग नहीं होते. फिर भी दवाएंऔक्सीजन आदि की व्यवस्था करा भी दें, तो ऐसे देखेंगे, मानो उसी पर अहसान कर रहा हो.

सैकंड शिफ्ट में आई नर्स मीना के साथ वह वार्ड का एक चक्कर लगा वापस लौटा. थोड़ी देर बाद उस ने उस से पूछा, “डाक्टर भानु आए कि नहीं?” “सर, उन्होंने फोन किया था कि थोड़ी देर में बस पहुंचने ही वाले हैं.”

“देखो, मैं अभी निकल रहा हूं. 10 घंटे से यहां लगा हुआ हूं. अगर और रुका, तो मैं कहीं बेहोश ना हो जाऊं, ऐसा मुझे लग रहा है.”

“ठीक है सर, मैं आप की हालत देख रही हूं. आप घर जाइए.” उस ने सावधानी से पहले पीपीई किट्स को और उस के बाद अपने गाउन और दस्ताने को खोला. इन्हें खोलते हुए उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया से बाहर निकला हो. इस के बाद उस ने स्वयं को सैनिटाइज करना शुरू किया. वहां से बाहर निकल कर अपनी कार के पास आया. वहां थोड़ी भीड़ कम थी. फिर भी उस ने मास्क हटा जोर से सांस खींच फेफड़ों में हवा भरी.

विगत समय के डाक्टर यही तो गलती करते थे कि अपने कमरे में जा कर गाउन, दस्ताने के साथ मास्क को भी हटा लेते थे. जबकि वहां के वातावरण में वायरस तो होता ही था, जो उन्हें अपनी चपेट में ले लेता था.

कार को सावधानी के साथ चलाते हुए वह मुख्य मार्ग पर आया. हालांकि शाम 7 बजे से लौकडाउन है. फिर भी कुछ दुकानें खुली हैं और लोग चहलकदमी करते नजर आ रहे हैं. ‘कब समझेंगे ये लोग कि वे किस खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं ’ वह बुदबुदाया, ‘भयावह हो रहे हालात, प्रशासन की चेतावनी और सख्ती के बावजूद परिस्थितियों को समझ नहीं रहे हैं ये लोग.’

अपने घर के पास पहुंच कर उस ने चैन की सांस ली. उस ने हार्न बजा कर ही अपने आने की सूचना दी.  घर का दरवाजा खुला था और ढाई वर्ष का बेटा नीरज बरामदे में ही खेल रहा था. “पापा आ गए मम्मी,” कहते हुए वह दौड़ कर गेट तक आ गया था. मीरा घर से बाहर निकली और गेट को पूरी तरह से खोल दिया था. उस ने सावधानी से कार को घर के सामने पार्क किया. तब तक नीरज कार के चारों ओर चक्कर लगाता रहा. उस के कार के उतरते ही वह उस से चिपट पड़ा, तो उस ने उसे जोर से ढकेला और चिल्लाने लगा, “मीरा, तुम्हें अक्ल नहीं है, जो बच्चे को इस तरह खुले में छोड़ दिया.

“मैं अस्पताल से आ रहा हूं और यह मुझ से चिपक रहा है. दिनभर घर में टैलीविजन पर सीरियल देखती रहती हो. तुम्हें क्या पता कि वहां क्या चल रहा है. हमेशा जान जोखिम में डाल कर काम करना होता है वहां. संभालो नीरज को. और बाथरूम में गीजर औन किया है कि नहीं. कि मुझे ही वहां जा कर उसे औन करना होगा.”

“कहां का गुस्सा कहां उतारते हो,” धक्का खा कर गिरे बेटे को उठाते हुए मीरा बोली, “यह बच्चा क्या समझेगा कि बाहर क्या चल रहा है. प्ले स्कूल भी बंद है. घर में बंदबंद बच्चा आखिर करे क्या?” बाथरूम में जा कर उस ने अपने सारे कपड़े उतार कर एक टब में छोड़ दिए. फिर इस गरमी में भी पानी के गरम फव्वारे से साबुन लगा स्नान करने लगा.

नहाधो कर जब वह बाहर आया, तो उसे कुछ चैन मिला. एक कोने में उस की नजर पड़ी तो देखा कि नीरज अभी तक सुबक रहा था. वह उस की उपेक्षा कर अपने कमरे में चला तो गया, मगर उसे ग्लानि सी महसूस हो रही थी. बच्चे को उसे इस तरह ढकेलना नहीं चाहिए था.

मगर, क्या उस ने गलत किया. अस्पताल के परिसर में दिनभर कार खड़ी थी. वह खुद कोरोना पेशेंटों से जूझ कर आया था. कितनी भी सावधानी रख लो, इस वायरस का क्या ठिकाना कि कहां छुप कर चिपका बैठा हो. वह तो उस ने उसी के भले के लिए उसे किनारे किया था. नहींनहीं, किनारे नहीं किया था, बल्कि उसे ढकेल दिया था.

जो भी हो, उस ने उस के भले के लिए ही तो ऐसा किया था. अस्पताल से आने के बाद उस का दिमाग कहां सही रहता है. कोई बात नहीं, वह उसे मना लेगा. बच्चा है, मान जाएगा.  इसी प्रकार के तर्कवितर्क उस के दिमाग में चलते रहे .वह ड्राइंगरूम में आया. मीरा उस के लिए ड्राइंगरूम में चायनाश्ता रख गई.

12 साला बेटी मीनू उसे आ कर बस देख कर चली गई. और वह वहां अकेला ही बैठा रहा. फिर वह उठा और नीरज को गोद में उठा लाया.  पहले तो वह रोयामचला और उस की गिरफ्त से भाग छूटने की कोशिश करने लगा. अंततः वह उस की बांहों में मुंह छुपा कर रोने लगा. मीरा उसे चुपचाप देखती रही. उस का मुंह सूजा हुआ था. रोज की तो यही हालत है. वह क्या करे, कहां जाए. उस की इसी तुनकमिजाजी की वजह से उस ने अपनी स्कूल की लगीलगाई नौकरी छोड़ दी थी. और इन्हें लगता है कि मैं घर में बैठी मटरगश्ती करती हूं.

उस ने मीरा को आवाज दी, तो वह आ कर दूसरे कोने में बैठ गई.“तुम मुझे समझने की कोशिश करो,” उसी ने चुप्पी तोड़ी, “बाहर का वातावरण इतना जहरीला है, तो अस्पताल का कैसा होगा, इस पर विचार करो. वहां से कब बुलावा आ जाए, कौन जानता है.” “दूसरे लोग भी नौकरी करते हैं, बिजनेस करते हैं,” मीरा बोली, “मगर, वे अपने बच्चों को नहीं मारते… और न ही घर में उलटीसीधी बातें करते हैं.”

“अब मुझे माफ भी कर दो बाबा,” वह बोला, “अभी अस्पताल की क्या स्थिति है, तुम क्या जानो. रोज लोगों को अपने सामने दवा या औक्सीजन की कमी में मरते देखता हूं. मैं भी इनसान हूं. उन रोतेबिलखते, छटपटाते परिजनों को देख मेरी क्या हालत होती है, इसे समझने का प्रयास करो. और ऐसे में जब तुम लोगों का ध्यान आता है, तो घबरा जाता हूं.”

“मैं ने कब कहा कि आप परेशान नहीं हैं. तभी तो इस घर को संभाले यहां पड़ी रहती हूं. फिर भी आप को खुद पर नियंत्रण रखना चाहिए. ऐसा क्या कि नन्हे बच्चे पर गुस्सा उतारने लगे.” मीरा वहां से उठी और एक बड़ा सा चौकलेट ला कर उसे छिपा कर देती हुई बोली, “ये लीजिए और नीरज को यह कहते हुए दीजिए कि आप खास उस के लिए ही लाए हैं. बच्चा है, खुश हो जाएगा.”

मीरा की तरकीब काम कर गई थी. उस के हाथ से चौकलेट ले कर नीरज बहल गया था. पहले उस ने चौकलेट के टुकड़े किए. एकएक टुकड़ा पापामम्मी के मुंह में डाला. फिर एक टुकड़ा बहन को देने चला गया.  फिर पापा के पास आ कर उस की बालसुलभ बातें शुरू हो गईं. वह उसे ‘हांहूं’ में जवाब देता रहा. उस ने घड़ी देखी, 9 बज रहे थे. और उस पर थकान और नींद हावी हो रही थी. अचानक नीरज ने उसे हिलाया और कहने लगा, “अरे, आप तो सो रहे हैं. मम्मीमम्मी, पापा सो रहे हैं.”

मीरा किचन से निकल कर उस के पास आई और बोली, “आप बुरी तरह थके हैं शायद. इसीलिए आप को नींद आ रही है. मैं खाना निकालती हूं. आप खाना खा कर सो जाइए.” डाइनिंग टेबल तक वह किसी प्रकार गया. मीरा ने खाना निकाल दिया था. किसी प्रकार उस ने खाना खत्म किया और वापस कमरे में आ कर अपने बेड पर पड़ रहा. नीरज उस के पीछेपीछे आ गया था. उसे मीरा यह कहते हुए अपने साथ ले गई कि पापा काफी थके हैं. उन्हें सोने दो.

सचमुच थकान तो थी ही, मगर अब चारों तरफ शांति है, तो उसे नींद क्यों नहीं आ रही. वह उसी अस्पताल में क्यों घूम रहा है, जहां हाहाकार मचा है. कोई दवा मांग रहा है, तो किसी को औक्सीजन की कमी हो रही है. बाहर किसी जरूरतमंद मरीज के लिए उस के परिवार वाले एक अदद बेड के लिए गुहार लगा रहे हैं, घिघिया रहे हैं. और वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो विवश सा खड़ा है.

दृश्य बदलता है, तो बाहर कोई सरकार को, तो कोई व्यवस्था को कोस रहा है. कैसेकैसे बोल हैं इन के, ‘ये लालची डाक्टर, इन का कभी भला नहीं होगा… इस अस्पताल के बेड के लिए भी पैसा मांगते हैं… सारी दवाएं बाजार में बेच कर कहते हैं कि बाजार से खरीद लाओ… और औक्सीजन सिलिंडर के लिए भी बाजार में दौड़ो… क्या करेंगे, इतना पैसा कमा कर? मरने के बाद ऊपर ले जाएंगे क्या? इन के बच्चे कैसे अच्छे होंगे, जब ये कुकर्म कर रहे हैं?’

“नीरज… नीरज, मीनू कहां हो… कहां हो तुम,” वह चिल्लाया, तो मीरा भागीभागी आई, “क्या हुआ जी…? क्यों घबराए हुए हो…? कोई बुरा सपना देखा क्या…?”वह बुरी तरह पसीने से भीगा थरथर कांप रहा था. मीनू और नीरज भयभीत नजरों से उसे देख रहे थे. वह नीरज को गोद में भींच कर रोने लगा था. बेटी मीनू का हाथ उस के हाथ में था. मीरा उसे सांत्वना दे रही थी, “चिंता मत कीजिए. यह संकट की घड़ी भी टल जाएगी. सब ठीक हो जाएगा.” Social Story In Hindi.

Social Story In Hindi: न्याय- बेकसूर को न्याय दिलाने वाले व्यक्ति की दिलचस्प कहानी

Social Story In Hindi: पिछले वर्ष अपनी पत्नी शुभलक्ष्मी के कहने पर वे दोनों दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे. जब चेन्नई पहुंचे तो कन्याकुमारी जाने का भी मन बन गया. विवेकानंद स्मारक तक कई पर्यटक जाते थे और अब तो यह एक तरह का तीर्थस्थान हो गया था. घंटों तक ऊंची चट्टान पर बैठे लहरों का आनंद लेते रहे ेऔर आंतरिक शांति की प्रेरणा पाते रहे. इस तीर्थस्थल पर जब तक बैठे रहो एक सुखद आनंद का अनुभव होता है जो कई महीने तक साथ रहता है.

आने वाले तूफान से अनभिज्ञ दोनों पत्थर की एक शिला पर एकदूसरे से सट कर बैठे थे. ऊंची उठती लहरों से आई ठंडी हवा जब उन्हें स्पर्श करती थी तो वे सिहर कर और पास हो जाते थे. एक ऐसा वातावरण और इतना अलौकिक कि किसी भी भाषा में वर्णन करना असंभव है.

तभी उन्हें लगा कि एक डौलफिन मछली हवा में लगभग 20 मीटर ऊपर उछली और उन्हें अपने आगोश में समा कर वापस समुद्र में चली गई.

यह डौलफिन नहीं सुनामी था. एक प्राणलेवा कहर. इस मुसीबत में उन्हें कोई होश नहीं रहा. कब कहां बह गए, पता नहीं. जो हाथ इतनी देर से एकदूसरे को पकड़े थे अब सहारा खो बैठे थे. न चीख सके न चिल्ला पाए. जब होश ही नहीं तो मदद किस से मांगते?

जब उन्हें होश आया तो किनारे से दूर अपने को धरती पर पड़े पाया.

‘शुभलक्ष्मी,’ सदानंद के मुंह से कांपते स्वर में निकला, ‘यह क्या हो रहा है?’

एक अर्द्धनग्न युवक पास खड़ा था. कुछ दूर पर कुछ शरीर बिखरे पड़े थे. युवक ने उधर इशारा किया और लड़खड़ाते सदानंद को सहारा दिया. उन लोगों में सदानंद ने अपनी पत्नी शुभलक्ष्मी को पहचान लिया. मौत इतनी भयानक होगी, इस का उसे कोई अनुमान नहीं था. डरतेडरते पत्नी के पास गया. एक आशा की किरण जागी. सांस चल रही थी. उस युवक व अन्य स्वयंसेवकों की सहायता से वह उसे अपने होटल के कमरे में ले गए जो सौभाग्य से सुरक्षित था.

डाक्टरी सुविधा भी मिली और कुछ ही घंटों की चिंता के बाद शुभलक्ष्मी को होश आ गया. आंखें खुलने पर इतने सारे अजनबियों को देख कर शुभलक्ष्मी घबरा गई, परंतु फिर सदानंद को सामने खड़ा पा कर आश्वस्त हुई.

‘यह सब क्या हो गया?’ पत्नी के स्वर में कंपन था.

धीरेधीरे सदानंद ने शुभलक्ष्मी को सुनामी के तांडवनृत्य के बारे में बताया.

‘कितना सौभाग्य है हमारा, जो हम बच गए,’ सदानंद ने कहा.

‘हजारोंलाखों लोगों का जीवन एकदम तहसनहस हो गया है.’

‘न मैं ने कहा होता, न हम यहां आते,’ शुभलक्ष्मी के स्वर में अपराधबोध की भावना थी.

‘नहीं, तुम्हारा ऐसा सोचना गलत है. हादसा तो कहीं भी किसी तरह का हो सकता है,’ सदानंद ने पत्नी का हाथ अपने हाथों में ले कर समझाया, ‘घर बैठे भूकंप आ जाता, जमीन खिसक जाती, सड़क पर दुर्घटना हो जाती.’

‘बसबस, मुझे डर लग रहा है,’ शुभलक्ष्मी ने पूछा, ‘बच्चों को बताया?’

‘सब को बता दिया और कह दिया कि हम सकुशल व आनंदपूर्वक हैं,’ सदानंद ने मीठे व्यंग्य से कहा.

‘सब अब निश्चिंत हैं. यातायात ठीक होने पर आ भी सकते हैं. वैसे मैं ने मना कर दिया है.’

‘ठीक किया,’ शुभलक्ष्मी ने उदास हो कर कहा.

‘जानती हो, लक्ष्मी, जब मुझे होश आया तो मैं ने सब से पहले क्या पूछा?’ सदानंद ने माहौल हलका करने के लिए कहा.

‘मेरे बारे में पूछा होगा और क्या?’ शुभलक्ष्मी मुसकराई.

‘नहीं,’ सदानंद ने हंस कर कहा, ‘मैं ने पूछा मेरा चश्मा कहां गया?’

‘छि: तुम और तुम्हारा चश्मा.’ शुभलक्ष्मी हंस पड़ी. अचानक याद आया, ‘पर हम बचे कैसे?’

‘वसीम ने बचाया,’ सदानंद ने कहा.

‘वसीम? यह कौन है?’ शुभलक्ष्मी ने आश्चर्य से पूछा.

‘वैसे तो कोई नहीं, लेकिन हमारे लिए तो मसीहा है,’ सदानंद ने बाहर खड़े वसीम को अंदर बुलाया और कहा, ‘यह वसीम है.’

जबसुनामी ने उन्हें समुद्र में खींच लिया था तब अनेक लोग फंसे हुए थे. लहरें कभी नीचे ले जाती थीं

तो कभी ऊपर उछाल देती थीं. वसीम अच्छा तैराक भी था

जो इस हादसे

के समय कहीं आसपास घूम रहा था. अपनी जान की परवा न कर उस ने कई लोगों को खींच कर तट पर पहुंचाया था. कोई बचा, तो कोई नहीं. बचने वालों में सदानंद और उस की पत्नी भी थे.

‘थैंक यू.’ शुभलक्ष्मी ने कहा.

वसीम की मुसकान में एक अनोखापन था.

‘हिंदी कम जानता है,’ सदानंद ने कहा.

कृतज्ञता दिखाते हुए शुभलक्ष्मी

ने पूछा, ‘बेचारे को कोई इनाम दिया?’

‘लेता ही नहीं,’ सदानंद ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘मैं ने तो सारा पर्स इसे दे दिया था लेकिन इस ने सिर हिला दिया. मेरी जिंदगी में तो ऐसा इनसान पहली बार आया है.’

‘सब तुम्हारी तरह के थोड़े होते हैं,’ शुभलक्ष्मी ने कटाक्ष किया, ‘सिर्फ सजा देना जानते हो.’

आज वही वसीम सदानंद के सामने खड़ा था. सिर झुकाए एक अपराधी के कठघरे में.

चेन्नई से मुंबई काम की खोज में आया था. 2 महीने हो चुके थे लेकिन ऐसे ही छुटपुट काम के अलावा कुछ नहीं. एक झोंपड़ी में एक आदमी ने एक कोना सोने भर को दे दिया था. पड़ोस में एक दूसरा आदमी रहता था जो काम तो करता नहीं था, बस अपनी पत्नी से काम करवाता था और उस की कमाई शराब में उड़ा देता था. ऐसी बातें आम होती हैं और कोई भी अधिक ध्यान नहीं देता.

देर रात झगड़ा और चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर वसीम बाहर आ गया. सारे पड़ोसी तो जानते थे इसलिए कोई बाहर नहीं आया. वह आदमी अपनी पत्नी व 6-7 साल के बच्चे को बुरी तरह पीट रहा था. दोनों के ही खून निकल रहा था. औरत चीख रही थी और बच्चा रो रहा था.

क्रोध में आ कर उस आदमी ने पास पड़ा एक पत्थर उठा लिया.

बच्चे के सिर पर पटकने ही वाला था कि वसीम का सब्र टूट गया. उस ने पत्थर छीन लिया. दोनों में हाथापाई

होने लगी. अपने बचाव के लिए वसीम ने उसे धक्का दिया तो वह पीछे गिर पड़ा. एक नुकीला पत्थर उस आदमी

के सिर में घुस गया और खून बहने लगा. वसीम की समझ में कुछ न आया कि वह क्या करे?

तब तक कुछ तमाशबीन इकट्ठे हो गए थे. औरत छाती पीटपीट कर रो रही थी. डाक्टरी सहायता के अभाव में जब तक उसे अस्पताल पहुंचाया गया, उस की मौत हो गई थी.

पुलिस वसीम को पकड़ कर ले गई. अदालत में पड़ोसियों ने ही नहीं बल्कि मृत आदमी की पत्नी ने भी वसीम के विरुद्ध गवाही दी. इस तरह निचली अदालत ने उसे कातिल करार दिया. आज सदानंद की अदालत में उस की अपील की सुनवाई थी.

सदानंद सोच रहे थे कि जो आदमी अपनी जान की परवा न कर के दूसरों की जान बचा सकता है, क्या वह किसी का कत्ल भी कर सकता था? पड़ोसियों की और मृतक की पत्नी की गवाही पर सारा मामला टिका था. वसीम की बात पर कोई विश्वास नहीं कर रहा था कि वह तो केवल बच्चे की जान बचा रहा था. हाथापाई में वह आदमी मर गया. न तो उसे मारने की कोई इच्छा थी और न ही कारण.

अब सदानंद क्या करें?

पड़ोसियों से पूछा कि क्या वे चश्मदीद गवाह थे? सब लोग तो बाद में रोनापीटना सुन कर बाहर आए थे. इसलिए उन की गवाही अविश्वसनीय थी.

मृतक की पत्नी से पूछा, ‘‘क्या मुलजिम की तुम्हारे पति से कोई दुश्मनी थी?’’

‘‘नहीं,’’ पत्नी का उत्तर था.

‘‘मुलजिम ने तुम्हारे पति को क्या मारा?’’ सदानंद ने पूछा.

पत्नी चुप रही. कोई उत्तर नहीं दिया.

‘‘तुम्हारा पति क्या शराब के नशे में बच्चे को मारने जा रहा था?’’ सदानंद ने पूछा.

पत्नी फिर भी चुप रही. दूसरी बार पूछने पर उस ने अनिच्छा से स्वीकार किया.

‘‘मुलजिम ने तुम्हारे बच्चे को बचाने के लिए हाथापाई की, यह सच है?’’ सदानंद ने पूछा.

2-3 बार पूछने पर पत्नी ने स्वीकार किया.

सदानंद ने अधिक प्रश्न नहीं किए. उन की दृष्टि में मामला स्पष्ट था. यह एक ऐसी दुर्घटना थी जिस के लिए वसीम जिम्मेदार नहीं था. पूरी तरह निर्दोष बता कर उसे बाइज्जत रिहा कर दिया गया.

घर पर जब शुभलक्ष्मी को यह बताया तो उसे बहुत अच्छा लगा.

‘‘बेचारा, उस का पता मालूम है?’’ शुभलक्ष्मी ने कहा, ‘‘उसे कोई काम दिला सकते हो?’’

‘‘कोशिश करूंगा,’’ सदानंद ने कहा.

‘‘उसे बुलाने के लिए एक आदमी को भेजा है.’’ Social Story In Hindi

Hindi Social Story: घोंसला- वृद्धावस्था के संवेगों को उकेरती मर्मस्पर्शी कहानी

Hindi Social Story: सुबह होतेहोते महल्ले में खबर फैल  गई थी कि कोने के मकान में  रहने वाले कपिल कुमार संसार छोड़ कर चले गए. सभी हैरान थे. सुबह से ही उन के घर से रोने की आवाजें आ रही थीं. पड़ोस में रहने वाले उन के हमउम्र दोस्त बहुत दुखी थे. वास्तव में वे मन से भयभीत थे.

उम्र के इस पड़ाव में जैसेतैसे दिन कट रहे थे. सब दोस्तों की मंडली कपिल कुमार के आंगन में सुबहशाम जमती थी. कपिल कुमार को चलनेफिरने में दिक्कत थी, इसलिए सब यारदोस्त उन के यहां ही एकत्रित हो जाते और फिर कभी कोई ताश की बाजी चलती तो कभी लूडो खेला जाता. कपिल कुमार की आवाज में खासा रोब था. ऊपर से जिंदादिली ऐसी कि रोते हुए को वे हंसा देते.

विनोद साहब तो उन की खबर सुन कर सुन्न रह गए. बिलकुल बगल वाला घर उन का ही था. इसलिए सब से पहले खबर उन्हें ही मिली. विनोद साहब अपनी पत्नी के साथ अकेले रहते थे. उन के दोनों बेटे अमेरिका में सैटल थे. कभीकभी मौत का ध्यान कर वे डर जाया करते थे कि अगर वे पहले चले गए तो उन की पत्नी अकेली रह जाएगी, तब उन की भोली पत्नी कैसे पैंशन और बैंक आदि के काम कर पाएगी. दोनों बेटे अपनीअपनी नौकरी में इतने मस्त थे कि वे कभी एक हफ्ते से ज्यादा इंडिया आए ही नहीं.

विनोद साहब काफी ईमानदार व मिलनसार व्यक्ति थे. वे कपिल कुमार से 3 साल बड़े थे. उन्हें मन ही मन काफी विश्वास था कि आगे उन्हें कुछ होगा तो वे उन की पत्नी की जरूर मदद कर देंगे. परंतु कपिल कुमार की अकस्मात मौत की खबर ने उन की चिंता बढ़ा दी थी.

चाय का ठेला लगाने वाला नानका सुबह उन के घर आ कर खबर पक्की कर गया था. वह सुबकसुबक कर रो रहा था. कपिल कुमार अकसर उसे छेड़ा करते थे. उस की शादी नहीं हुई थी. पर अपना घर बसाने का उस के मन में बहुत चाव था. वह पंजाब के होशियारपुर का रहने वाला था. उस के मातापिता बचपन में ही गुजर गए थे. उसे विधवा मौसी ने पाला था. फिर वह भी कैंसर से बीमार हो कर ऊपर वाले को प्यारी हो गई थी. उस का मन संसार से विरक्त हो गया था.

वह घरबार छोड़ कर इधरउधर घूमता रहा. एक दिन विनोद साहब को ट्रेन में मिला था. उस के बारे में जान कर वह उसे सम झाबु झा कर साथ ले आए थे. उन्होंने अपनी मंडली की मदद से उस को चाय का ठेला लगवा दिया था. दिनभर उस के ठेले पर अच्छा जमघट लगा रहता. उस की मीठी बोली का रस लोगों के दिलों तक पहुंच जाता था और सब उस के कायल हो जाते थे. सारा दिन मंडली का चायनाश्ता उस की जिम्मेदारी थी. वे लोग भी उस का खूब खयाल रखते. कभी उस को बड़ा और्डर मिल जाता तो वे सब उस की मदद करने बैठ जाते. उन से उस का कुछ बंधा हुआ नहीं था. जब जिस का मन होता वह उसे पकड़ा देता और उस ने भी उन के साथ कुछ हिसाबकिताब नहीं रखा था. नानका के लिए वे सभी लोग खून से बड़े रिश्ते वाले थे.

उन लोगों के दिए प्यार और अपनेपन ने उस के शुष्क मन में हरियाली भर दी. आज कपिल कुमार के जाते ही उस को लगा कि उस का अपना उसे छोड़ कर चला गया. उन की मंडली के खन्ना साहब को भी जब से खबर मिली थी तब से वे भी काफी उदास थे. मन ही मन सोच रहे थे कि उन सब का घोंसला टूट गया. दिल चाह रहा था कि दौड़ कर कपिल कुमार के घर पहुंच जाएं पर पांव थे कि साथ नहीं दे रहे थे. शायद मन ही मन अपना भविष्य वे कपिल कुमार में देख कर डर गए थे.

उन के बेटे ने जब से खबर सुनाई थी, वे सोच में डूबे थे. पता नहीं जिंदगी का मोह था या सचाई से सामना करने का डर जो उन्हें अपने जिगरी यार के घर जाने से रोक रहा था. उन के कानों में कपिल कुमार के जोरदार ठहाकों की आवाज गूंज रही थी. कल शाम ही लूडो खेलते हुए वे जब बाजी जीत गए तो बोले थे, ‘मु झ से कोई जीत नहीं सकता.’

सरदार इंदरपाल का भी यही हाल था. वे कपिल कुमार के घर सुबह ही पहुंच गए थे. उन की बौडी के पास बैठे वे पथरा से गए थे. परिवार के रोने की आवाजें रहरह कर उन के कानों में गूंज रही थीं. ‘पापाजी की तसवीरों में से अच्छी सी तसवीर निकालो…’, ‘बेटे को खबर कर दी…’,  ‘अच्छा दोपहर तक पहुंचेगा…’ ‘बेटी आ गई…’ अचानक रोने की आवाज तेज हो गई. उन के भाईबहन पहुंच गए थे. सरदार इंद्रपाल को मालूम था कि कपिल कुमार के अपने भाई से रिश्ते कुछ खास अच्छे नहीं थे पर अंतिम यात्रा में सब को शामिल होना था.

सरदार इंद्रपाल अपने ही विचारों में खो गए. उन का एक ही बेटा था. अपना सबकुछ लगा कर उसे पढ़ायालिखाया. अमेरिका में एक बड़ी कंपनी में काम करता था. डौलरों में तनख्वाह मिलती थी, खूब पैसा भेजता था. शुरू में तो हमेशा कहता था, ‘कुछ साल का अनुभव लेने के बाद वापस आ जाएगा, तब अपने देश में उसे अच्छी नौकरी मिल जाएगी.’ धीरेधीरे उसे अपने भविष्य के आगे बेटे का भविष्य दिखाई देने लगा. इंद्रपाल पत्नी के साथ अपने पुश्तैनी मकान में रह गए और फिर एक दिन पत्नी भी छोड़ कर चली गई. अब तो ये यारदोस्त की मंडली ही उन के लिए सबकुछ थी.

आज उन में भी एक विकेट गिर गया. कपिल कुमार के घर से बाहर आ कर उन का दिल बहुत भावुक हो गया. उन्होंने बेटे को फोन मिलाया. ‘‘क्या हुआ पापाजी, सब ठीक है न?’’ उस की आवाज की घबराहट सुन कर सरदार इंद्रपाल को अपनी गलती का एहसास हुआ. वहां इस समय मध्यरात्रि थी.

अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए बोले, ‘‘हां पुत्तर, सब ठीक है. रात को बुरा सपना आया था, सो तुम सब की खैरियत जानने के लिए फोन किया था. टाइम का खयाल ही दिमाग से निकल गया.’’

बेटे के दिल तक पिता की व्याकुलता पहुंच चुकी थी. उस ने धीरे से कहा, ‘‘पापाजी, क्या हुआ है?’’‘‘मेरा यार कपिल सानू छड के चला गया,’’ कहतेकहते वे बच्चों की तरह बिलख कर रोने लगे. बेटे ने कई तरह से उन को दिलासा दिया और जल्दी ही आने का वादा कर के उन्हें शांत किया.

इधर बंगाली बाबू का भी घर पर यही हाल था. जब से कपिल कुमार की डैथ का उन्हें पता चला, तब से वे न जाने कितनी बार टौयलेट जा कर आए थे. वे शुरू से कम बोलते थे, पर मितभाषी होने पर भी कुदरत ने इमोशंस उन को भी कम नहीं दिए थे. वे अच्छे सरकारी ओहदे से रिटायर्ड थे. बहुत से लोगों से उन की जानपहचान थी. परंतु रिटायरमैंट के बाद संयोग से जिस भी दोस्त को फोन किया, तो पता चला कि वह इस लोक को छोड़ गया. तब से उन के मन में वहम हो गया, इसलिए उन्होंने फोन करना ही छोड़ दिया.

सब उन का मजाक उड़ाते कि उन के फोन करने और न करने से कुछ बदलने वाला नहीं है. पर वे मुसकरा कर कहते ‘फोन न करने से मेरे मोबाइल में उन का नंबर बना रहता और दिल को तसल्ली रहती है कि मेरे पास अभी भी इतने सारे दोस्त हैं,’ उन की पत्नी कब से पैरों में चप्पल डाले तैयार खड़ी थी पर बंगाली बाबू के पेट में बारबार मरोड़ उठने लगते थे. आखिर हिम्मत कर के वे अपने यार के अंतिम दर्शन के लिए निकल पड़े. रितेश साहब इन सब से कुछ विपरीत थे. वे सुबह ही कपिल

कुमार के घर पर आ कर पूरा इंतजाम संभाल रहे थे. शादीब्याह हो या किसी का मरना, वे इसी तरह अपनी फ्री सेवा प्रदान करते हैं. किसी के बिना कुछ कहे सब इंतजाम वे अपने से कर लेते थे, फिर कपिल तो उन का यार था. इस में कैसे वे पीछे रह जाते. बाहर तंबू लगवाते वे सोच रहे थे कि बाकी दोस्त कहां रह गए. सब की मनोदशा का उन को कुछकुछ अंदाजा था. नानका वहां पहले से पहुंचा हुआ था. घर के बाहर लगे लैटर बौक्स से पानी का बिल हाथ में लिए आया और फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘हर बार साहब मु झे पहले जा कर बिल भरने की हिदायत देते थे और सब के बिल इकट्ठे कर के देते थे. अब मु झे कौन…’’ रितेश साहब ने उसे अपने कंधे से लगा लिया और उसे चुप कराने लगे. नानका सब का दुलारा था. पानी का बिल हो या किसी बीमार रिश्तेदार को देखने जाना हो, सब का यह मुंहबोला बेटा हमेशा उन के साथ जाता था. वह कब उन के दुखसुख का साथी बन गया था, यह किसी को नहीं पता था.

दोपहर तक कपिल कुमार का बेटा परिवार सहित आ गया. सभी रिश्तेदार भी धीरेधीरे जमने शुरू हो गए. कपिल कुमार की मित्रमंडली भी उन के घर के आगे जमा हो गई. आती भी कैसे नहीं, यार को अंतिम यात्रा में कंधा देना था. अर्थी के उठाते ही एक बार फिर रुदन का स्वर ऊंचा हो गया. महल्ले के कोने में खड़ा नानका चाय वाले की आंखें नम हो आई थीं. इस मित्रमंडली की वजह से उस का मनोरंजन होता रहता था, वरना आजकल तो सब लोग घर में ही घुसे रहते हैं, कोई किसी से बात कर के राजी ही नहीं है.

शाम होतेहोते सबकुछ खत्म हो गया. जिस आदमी के ठहाकों से पूरी गली गूंजती थी, वहां आज मातम छाया था. सब अपने घरों में जा कर दुबक गए.

रितेश साहब ने हिम्मत की और कपिल कुमार के घर के आंगन में पहुंच गए. घरपरिवार के लोग अंदर थे. बाहर मित्रमंडली की कुरसियां तितरबितर थीं. धीरेधीरे उन्होंने कुरसियों को सहेजना शुरू किया और बड़े जतन से उसे सटाने लगे. वे बीच में कोई जगह खाली नहीं छोड़ना चाहते थे, शायद ऐसा करने से तथाकथित यमराज उन दोस्तों तक न पहुंच पाए. बाहर हलचल की आवाज सुन कर कपिल कुमार का बेटा बाहर आ गया.

उन्हें कुरसी लगाते देख कर बोला, ‘‘अंकल, कोई आने वाले हैं?’’ ‘‘हां बेटा, हम सब की मजलिस का समय हो गया है,’’ कहतेकहते फफक कर रोने लगे. उन्हें किसी तरह चुप करवा कर कपिल कुमार का बेटा उन्हें उन के घर छोड़ कर आया.

3-4 दिनों में ही सब क्रियाकर्मों के साथ उस ने सामान का निबटारा शुरू कर दिया. सब सामान पुराना था, इसलिए बेहतर यही सम झा गया कि आसपड़ोस वालों को या गरीबों को दे दिया जाए. कपिल कुमार की मित्रमंडली का मन था कि सभी कुरसियां वह ज्यों की त्यों छोड़ दे पर सकुचाहट की वजह से प्रकट में कोई नहीं बोला.  शायद, दोबारा अपनी मंडली को एकसाथ एकत्रित करने का साहस बटोर रहे थे.

चौथे के अगले दिन उन्हें पता चला कि सब सामान इधरउधर दे कर मकान का भी सौदा हो गया है. मानवीय संवेदनाओं को दरकिनार कर व्यावहारिक होने में अब कम ही समय लगता है. नम आंखों के साथ कपिल कुमार का बेटा सब से विदाई ले कर चला गया.

उस के जाते ही सारे दोस्त अपनेअपने घरों से निकल आए जैसे उस के जाने का इंतजार कर रहे हों. कपिल कुमार के घर के बाहर एक कोने में टैंट वाले की दरी अभी भी पड़ी थी. चुपचाप सारे दोस्त असहज हो कर भी उसी दरी पर बैठने की कोशिश करने लगे. उम्र के इस मोड़ पर चौकड़ी मार कर बैठना मुश्किल था, सब निशब्द थे पर उन के मौन में भी एक प्रश्न था कि कल से कहां बैठने का इंतजाम करना है.

महल्ले के कोने में खड़ा चायवाला नानका अचानक से हाथ जोड़े उन के सामने आ कर खड़ा हो गया.  ‘‘साहब, कपिल कुमार के बेटे ने सारी कुरसियां मु झे दे दी हैं. आप सब से विनती है कि आप चल कर मेरी दुकान पर बैठें. आप सब हैं, तो इस महल्ले में रौनक है, वरना आजकल कौन किसी से बात करता है.’’

कुछ ही देर में चाय वाले के यहां उन सब का नया घोंसला तैयार था और वे सब बैठे लूडो खेलने की तैयारी में लगे थे. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: मजबूत औरत- आत्मसम्मान के साथ जीती एक मां की कहानी

Hindi Social Story: ऊषा ने जैसे ही बस में चढ़ कर अपनी सीट पर बैग रखा, मुश्किल से एकदो मिनट लगे और बस रवाना हो गई. चालक के ठीक पीछे वाली सीट पर ऊषा बैठी थी. यह मजेदार खिड़की वाली सीट, अकेली ऊषा और पीहर जाने वाली बस. यों तो इतना ही बहुत था कि उस का मन आनंदित होता रहता पर अचानक उस की गोद मे एक फूल आ कर गिरा. खिड़की से फूल यहां कैसे आया, वह इतना सोचती या न सोचती, उस ने गौर से फूल देखा तो बुदबुदाई, ‘ओह, चंपा का फूल’.

उस के पीहर का आंगन और उस में चंपा के पौधे. यह मौसम चंपा का ही है, उसे खयाल आया. तभी, यों ही पीछे मुड़ी तो देखती है कि चंपा की डाली कंधे पर ले कर एक सवारी खड़ी है. ‘ओह, यह फूल यहीं से आ कर गिरा होगा.’ ऊषा ने उस फूल को अपनी हथेली पर ऐसे हिलाया मानो वह चंपा का फूल कोई शिशु है और उस की हथेली के पालने में नवजात झूला झूल रहा है.

ऊषा का एक साल बडा भाई और पड़ोस के बच्चे मिल कर चंपा के फूल जमा करते और मटकी में भर देते. अब मटकी का पानी ऐसा खुशबूदार हो जाता कि अगले दिन उस पानी को आपस मे बांट कर वे सब खुशबूदार पानी से नहा लेते थे. मां उस की शरारत देख कर उसे न कभी मारती, न कभी फटकारती. जबकि ऊषा की क्लास में कितनी ही लड़कियां बातबेबात पर अपनीअपनी मां की मार खाती थीं. एक ममता थी, वह हमेशा यही कहती कि उस की मां तो उसे लानतें भेजती रहती है. कभी कहती है, ‘ममता, तू इतनी सांवली है कि तेरी तो किसी हलवाई से भी शादी न होगी.’ कभी कहती, ‘ममता, तुझे पढ़ाने में पैसा बरबाद होता है.’ ममता की बातें सुन कर ऊषा को अपनी मां और भी प्यारी लगती थी.

‘ओह, मेरी मां कैसी होगी?’ उस का मन फूल से हो कर अब सीधा मां के पास चला गया था. ऊषा को पीहर जाने के नाम पर मां का चेहरा ही देखना था. उस के पिता को गुजरे 3 बरस हो गए थे और तब से वह अब मां से मिलने जा रही थी. दरअसल, ऊषा को दोनों बच्चों के 10वां और 12वां की परीक्षाओं के कारण पीहर आने का समय न मिला था. बस, 2 घंटे का ही सफर था.

पीहर पहुंच कर ‘ओ मां’ कह कर उस ने मां को गले लगा लिया था. “कल आप का 72वां जन्मदिन है.”

“हमें पता है,” कह कर मां ने लंबी सांस ली.

“तो, इसीलिए तो आई आप के पास. यह लो आप के लिए साडी और अंगूठी है.”

“ओह, अच्छा,” कह कर मां ने रख लिया. लेकिन ऊषा ने गौर किया कि वह खुश बिलकुल भी नहीं हुई. अगले ही पल वह बोली, “ऊषा, अगर पैसे देती तो मेरे काम आते, बेटी.”

“ओह मां, यह क्या कह रही हो?”

“सही कह रही हूं, बेटी.” मां ने ऊषा के सामने दिल खोल दिया, “बेटी, जब तक पिता जीवित थे, वे रोज ही साझेदारी वाले दवाखाने में जाते थे और रोज ही सौदोसौ रुपए ला कर मुझे देते थे. बेटी, 3 साल से मेरी दशा खराब हो रही है, पता है. अब मैं पाईपाई को तरस गई हूं.”

“ओह,” कह कर ऊषा ने उन का हाथ थाम लिया, “तो आप कभी फोन पर तो मुझे बता देतीं?” “बेटी, दीवार के भी कान होते हैं. और तुम कोई खाली बैठी हो जो हर पल अपना ही दुखड़ा बताती रहूं. अगर तुम आज मेरे पास न आतीं तो आज भी न बताती, चुपचाप सह लेती, बेटी. हर रोज सुबह पार्क जाती हूं, ऊषा. मेरा मन होता है कि रास्ते पर मिलने वाले कुत्तों को बिस्कुट खरीद कर खिलाऊं पर मेरा बटुआ खाली,” मां ने फिर गहरी सांस भरी.

“तो भैयाभाभी कुछ नहीं देते?” ऊषा का मन भारी हो रहा था.

वह बोली, “हां, देते हैं, बेटी. पर उतना ही जितने में मेरा काम चल जाए, बस.”

“अच्छा,” ऊषा हैरान थी.

“बेटी, मुझ से मिलने पड़ोसी बेटियां आती हैं. सारे घर के लिए मिठाई लाती हैं. मेरा मन होता है, कुछ नकद उन के हाथ में रखूं. पर मेरा तो हाथ…”

“ओह मां,” ऊषा ने अफ़सोस जाहिर किया.

“मैं अपनी कोई साड़ी या स्वेटर दे देती हूं, खुशीखुशी वे ले जाती हैं. अब मेरी एक सहेली बीमार थी. मैं उसे देखने अस्पताल गई. मगर इतने पैसे नहीं थे कि कोई फल ले जाती. बस, दुआ दे कर आ गई,” कह कर मां खामोश हो गई.

“अच्छा, पर भैयाभाभी इतने कठोर हो गए.”

“हां बेटी, वे कहते हैं कि आप ने तो एक मकान तक नहीं बनाया. आप ने कुछ किया ही नहीं, तो आप का क्या एहसान है, भला.”

“बेटी, तुम जानती हो, वह किराए का घर, वह आंगन, वे पड़ोसी. मैं तो कभी किसी की चोट, तो किसी की बीमारी या किसी की बेटी की शादी…बस ऐसी सहायता में ही रह गई. मैं तो आज की जैसी अपनी खराब दशा की कभी सोच तक नहीं सकती थी,” मां बोलतेबोलते रुक गई.

“ओह, ये लो मां, ये 10 हजार रुपए रख लो.”

“नहीं ऊषा.”

“अरे मां, ये मेरे फालतू के हैं. मतलब यह कि 2 दिनों पहले ही मेहंदी लगाने का नेग मिला है. मां, रख लो न आप ये, रखो.” ऊषा ने जिद की.

“अरे, अच्छा,” कह कर मां ने अपने बक्स से सोने के गहने निकाल कर ऊषा को दिए. “ऊषा, ये ले लो.”

“हैं, ये, ये गहने, नहीं मां,” ऊषा डर गई कि कहीं भाईभाभी इस कमरे मे आ गए तो…

“कोई है ही नहीं घर पर. कोई नहीं आने वाला.”

“अरे, कहां गए?” ऊषा ने पूछ लिया.

मां बोली, “दोनों मेरे जन्मदिन की खरीदारी करने गए हैं. कल 20 परिवारों को खाने पर बुला रखे हैं. समाज का दिखावा तो खूब करना आता है.”

“अच्छा, चलो कोई नहीं. आप भी खुश हो लेना, मां. पर ये गहने रहने दो न, मां,” वह मना करने लगी.

मा बोली, “सुनो ऊषा बेटी, डरो मत. इन का किसी को पता नहीं. और ये बस मेरे हैं. अभी जो खजाना तुम ने दिया, तुम जानती नहीं ऊषा. उन के बदले ये कुछ नहीं हैं, बेटी.”

“ओह, मां ऐसा न कहो,” ऊषा के नयन नम हो गए थे. पर मां ने तो जिद कर के सोने के कंगन और झुमके ऊषा के बैग में रख ही दिए.

अगले दिन मां के जन्मदिन का जश्न देख कर, भाईभाभी का दिखावा, आडंबर आदि देख कर ऊषा को हैरत थी.

“अच्छा मां,” विदा ले कर गले दिन ऊषा वापस लौटी तो घर आ कर अमन को सब सच बता दिया.

“अरे, ये कंगन और झुमके तो 2 लाख रुपए से अधिक की कीमत के हैं, ऊषा. तुम यह कीमत हौलेहौले अदा कर दो.” ऐसा कह कर अमन ने एक अच्छा सुझाव दिया और यह सुन कर ऊषा को अमन पर बहुत गर्व हुआ.

3 महीने बाद ऊषा फिर पीहर आई. भैयाभाभी हैरत में पर उस ने आते ही कहा, “आप दोनों के लिए ये उपहार और आप को शुभ विवाह वर्षगांठ.”

यह सुन कर भैयाभाभी खुश. और उस के बाद वह मां से जा कर खुल कर मिली. खूब बातें हुईं. इस बार मां खुश थी, बताती रही कि पड़ोस में इसे बीमारी में यह दे आई, उस को मकान के गृह प्रवेश में यह भेंट किया वगैरहवगैरह.

मां का चहकना ऊषा को आनंद से भर गया. सारी बात सुनी. जब मां चुप हुई तो ऊषा ने उन को फिर से सौंप दिए 10 हजार रुपए.

“ये क्या, ये, बस, दानपुण्य के लिए आप को दिए हैं, मां,” कह कर ऊषा ने उन का बटुआ भर दिया.

अगले महीने ऊषा फिर आई. भाभी को जन्मदिन की बधाई देने के बहाने मां का बटुआ भर गई. भाईभाभी बहुत खुश, वे तो ऐसा ही दिखावा पसंद करते थे. और उधर, मां को भी हैरत, ये ऊषा को हो क्या रहा. ऊषा कहती, ‘अमन ने कहा है’ और मां को चुप कर देती.

अब यह सिलसिला चल पड़ा था. ऊषा हर तीसरे महीने जरूर आती और माता का बटुआ भर जाती. इसी तरह समय बीता और एक साल बाद मां का जन्मदिन फिर से आया.

ऊषा ने इस बार भैयाभाभी को भ्रम में रखने के लिए एक साड़ी भेंट की मगर रुपयों से मां का बटुआ फिर से भर दिया था. मगर, अब मां उसे आशीष ही देती. अब कुछ साड़ी, रूमाल और शौल के सिवा मां के बक्स में कुछ भी न बचा था.

मगर ऊषा तो मां को नहीं, उन के दानपुण्य के स्वभाव के लिए यह रुपया देती थी. ऊषा जानती थी, इसी से मां निरोगी है, खुश है, ताकत से भरी है.

अब ऊषा हर तीसरे महीने जब पीहर की बस में बैठा करती तबतब यही सोचा करती कि, यही मां, एक समय में कितनी मजबूत हुआ करती थी. जब कालेज के समय खुद ऊषा का एक गहरा ही प्रेम प्रसंग चल रहा था और नादानी कर के ऊषा के गर्भ तक ठहर गया था. तब रोती हुई ऊषा को मां ने चुप कराया, उसे सहज होने को कहा और चिकित्सक ने जांच कर के बताया कि केवल 4 सप्ताह का गर्भ है, इसलिए आराम से सब साफ हो जाएगा. रोती हुई ऊषा को, तब भी, मां ही चुपचाप ले गई थी अस्पताल और उस को इस अनचाहे भार से आजाद किया था.

मां ने एक बार फिर से उसे जीवनदान दिया था. ऊषा का मन दुख से ऐसा भरा था कि उस समय तो वह मर ही जाना चाहती थी. मगर मां ने उसे न मारा, न फटकारा.

मां ने, बस, इतना पूछा कि आगे, तुम दोनों विवाह करोगे, साथ रहोगे. ऊषा ने फूटफूट कर रोते हुए बताया कि गर्भ ठहरने की बात पता लगने के समय से ही उस ने कन्नी काट ली है, वह क्या विवाह करेगा.

‘ओह,’ बस इतना ही कहा था मां ने. उस समय वह मां का लौह महिला का रूप देखती रह गई थी. उस घटना के 2 वर्षों बाद जब ऊषा सामान्य हो गई तब मौका पा कर फिर मां ने ही ऊषा को अमन के बारे में बताया था और अमन से उस की दूसरी पत्नी बनने का सुझाव दिया.

अमन के 2 बच्चे थे. ऊषा को उस समय मां से बहुत खीझ हुई पर जब मां ने कहा, ‘जोरजबरदसती नहीं है, एक बार मिल कर गपशप कर लो. फिर जो चाहो.’

तब वह शांत हुई और उसी शाम अमन घर पर आए थे. ऊषा ने पहली मुलाकात में ही अमन की दूसरी पत्नी बनना सहर्ष स्वीकार कर लिया. अमन की पहली पत्नी फेफड़े की बीमारी से चल बसी थी. अमन एक सुलझे हुए इंसान थे और औरत को बहुत सम्मान देते थे.

विवाह के दिन से ले कर आज तक ऊषा अमन के साथ बहुत खुश थी. अमन के दोनों बच्चे उसे मां ही मानते थे. इस समय भी, बस में, ऊषा को मजबूत मां बहुत याद आ रही थी. और भी बहुत यादे थीं. मां ने विवाह के पहले साल उस को बहुत मानसिक संबल दिया था.

ऊषा को तो काम करने की जिम्मेदारी उठाने की कोई आदत नहीं थी. यों तो, अमन के घर पर एक सहायिका थी मगर 2 बच्चों की मां और अमन की पत्नी बन कर सहज होने में ऊषा को समय लगा. तब मां ने ही उसे ताकत दी थी. यों अमन के प्रेम मे कभी कमी नहीं आई और आज तक नहीं.

फिर, 3 साल बाद भैया का विवाह हुआ. मां ने भाभी को भी आजाद और मस्त रहने दिया. मां को तो सब को हंसता देखना पसंद था. भैयाभाभी का वैवाहिक जीवन बहुत खुशहाल था. ऊषा यही सोचती रहती कि अब मां के राज करने के दिन आ गए हैं. मगर, फिर, एक दिन अचानक ही पिता चल बसे. एकदम से सब बदलता गया.

और आज की तारीख में सब सही दिखाई दे रहा था लेकिन मां केवल बटुआ खाली होने से भीतर ही भीतर कितनी कमजोर पड़ गई थी.

यही सबकुछ सोचती हुई ऊषा पीहर पहुंची. मां दिखाई दे गई, वह अपनी छड़ी के सहारे कहीं से लौट रही थी. ऊषा ने मौका देख कर उन के बटुए में रुपए रखे. तभी भाभी 2 कप चाय ले कर आ गई. ऊषा और मां गपशप तथा चाय में व्यस्त हो गईं.

भाभी जैसे ही उन के पास से गई, मां ने हंसते हुए ऊषा को नकदी लौटा दी.

“अरेअरे, यह क्या मां, ये आप के हैं,” वह चौंक गई.

मां बोली, “अरेअरे, यह देख.” मां ने बटुआ खोला और नोट दिखाए.

“ओह, आप ने ये पहले वाले खर्च नहीं किए. तो अब दानपुणय का काम बंद,” ऊषा मां को गौर से देख रही थी.

“ऐसा तो हो ही नहीं सकता, यह मेरी एक महीने की कमाई,” वह चहक कर बोली.

ऊषा के माथे पर बल पड़ गए, “हैं, कमाई, नौकरी, यह कब हुआ. 3 महीने पहले तो तुम नौकरी नहीं करती थीं.”

“अरे रे, सुन तो सही. हुआ क्या, अपना सुमित है न, मेरी दिवंगत सहेली का छोटा बेटा.”

“हांहां, मां. मुझे याद है,” ऊषा ने किसी चेहरे की कलपना करते हुए जवाब दिया.

“तो, उस के जुडवां बेटे हुए. कुछ परेशानी के कारण अस्पताल में 16 दिन रहना था. पुरुष को इजाजत नहीं थी. और सुमित को रात को रुकने वाला कोई न मिला. मैं ने कहा, ‘मैं रुक जाती हू.’ बस, रात को सोना ही तो था. मैं करीब 16 रात सोने चली गई. अब वह कल आया. मिठाई, फल लाया और 8 हजार रुपए दे गया. मैं ने मना किया तो बोला कि आप ने वैसे ही 20 हजार रुपए की बचत करा दी है. अगर ये न रखे तो आप की बहू मुझ से बात न करेगी.” पूरी बात बता कर मां ने सांस ली.

ऊषा बोली, “ओह, अच्छा. पर ये तो जल्द खत्म हो जाएंगे. तुम अगले महीने के लिए रख लो.” ऊषा ने जिद की तो वापस लौटाते हुए मां बोली, “अरे, आगे तो सुन, पड़ोस में एक टिफिन सैंटर है. रोज के 200 टिफिन जाते हैं नर्सिंग होम में. तो मुझे वहां नौकरी मिल गई है.”

“तो मां, इस उम्र में खाना पकाओगी?” अब ऊषा को कुछ गुस्सा आ गया था.

“अरे, पकाना नहीं है. बस, रोज सुबह और शाम जा कर चखना है, कमी बतानी है और इस के 10 हजार रुपए हर महीने मिल रहे हैं,” कह कर मां हंसने लगी.

“अच्छा, मेरी मजबूत मां.” इस बार जब ऊषा लौटी तो उसे अपनी मजबूत मां का पुनर्जन्म देख कर आनंद आया. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: माई दादू- बड़ों की सूझबूझ कैसे आती है लोगों के काम?

Hindi Social Story: ‘‘हाय माई स्वीटी, दादू! आज आप इतना डल कैसे दिख रही हो? मैं तो मूड बना कर आया था आप के साथ बैडमिंटन खेलूंगा, लेकिन आप तो कुछ परेशान दिख रही हो.’’

‘‘अरे बेटा, कुश, बस तेरी इस लाड़ली बहन कुहु की फिक्र हो रही है. ये कुहु अंशुल के साथ अपने रिश्ते में इतना आगे बढ़ चुकी है पर अंशुल के पेरैंट्स इस रिश्ते से खुश नहीं. अब जब तक लड़के के मांबाप खुशीखुशी बहू को अपनाने के लिए राजी नहीं होते तो भला कोई रिश्ता अंजाम तक कैसे पहुंचेगा. मुझे तो बस यही फिक्र खाए जा रही है. मेरी तो कल्पना से परे है कि आज के जमाने में भी किसी की इतनी पिछड़ी सोच हो सकती है. आजकल जाति में ऊंचनीच भला कौन सोचता है. वे ऊंचे गोत्र वाले ब्राह्मण हैं तो हम भी कोई नीची जात के तो नहीं.’’

‘‘अरे दादू, इकलौते बेटे को नाराज कर वे कहां जाएंगे, मान जाएंगे देरसवेर. आप टैंशन मत लो, वरना नाहक आप का बीपी बढ़ जाएगा. चलो थोड़ी देर बैडमिंटन खेलते हैं, मेरी अच्छी दादू.’’

बैडमिंटन खेलतेखेलते भी पोती की चिंता ने आभाजी का पीछा नहीं छोड़ा. आभाजी ने इस साल ही 69वीं वर्षगांठ मनाई है. चुस्तीफुरती अभी भी बरकरार रखी है. कालोनी में फेमस हैं. सब की मदद को तैयार रहती हैं.

करीबन आधे घंटे खेल कर, तरोताजा हो कर उन्होंने अंशुल को घर बुला कर उस से उस की शादी के मुद्दे पर गंभीर चर्चा की.

‘‘अंशुल, तुम्हारा क्या फैसला है? मैं तो हर तरह से तुम्हारे पेरैंट्स को समझ कर हार गई. अब तो बस एक ही रास्ता बचता है. अगर तुम कुहु के साथ कोर्ट मैरिज कर के उन के सामने जाओ तो उन्हें मजबूरन तुम्हारी शादी के लिए तैयार होना ही होगा. मुझे तो इस के अलावा कोई और विकल्प नजर नहीं आ रहा.’’

‘‘दादी, इस की जरूरत नहीं पड़ेगी. अगर मैं बस उन से यह कह दूं कि मैं कुहू के साथ कोर्ट मैरिज करने के लिए कोर्ट में अर्जी दे रहा हूं तो उन के पास हमारी शादी के लिए हामी भरने के अलावा कोई चारा न बचेगा.’’

‘‘ठीक है, बेटा. जैसा तुम चाहो.’’

अंशुल ने उसी दिन अपने पेरैंट्स को कोर्ट मैरिज की धमकी दी और उस की सोच के मुताबिक कुहु के साथ उस के विवाह के लिए उन का प्रतिरोध ताश के पत्तों के महल की भांति ढह गया.

आज आभाजी बेहद खुश थीं. आज ही तो कुहु के होने वाले सासससुर अपने बेटे के साथ खुशीखुशी रोके की तिथि निश्चित कर के अभीअभी गए थे.

‘‘दादू, दादू, अब तो खुश? अब तो आप की समस्या हल हो गई न?’’

‘‘हां बेटा. आज मैं बहुत खुश हूं. आज कुहु की शादी की मेरी बरसों पुरानी साध पूरी हुई.’’

‘‘हां दादू, मैं भी बहुत खुश हूं. आप तो वाकई में अमेजिंग हो. आप के पास हर समस्या का तोड़ है,’’ पोते ने लडि़याते हुए उन की गोद में लेटते हुए कहा.

तभी उन की एक पड़ोसिन वंदिता का फोन उन के पास आया.

‘‘हैलो दीदी, प्रणाम.’’

‘‘प्रणाम वंदिता. कहो, कैसे याद किया?’’

‘‘दीदी, रुझान को ले कर मन में कुछ उलझन थी तो मैं उसी बाबत आप से सलाह लेना चाह रही थी.’’

‘‘हांहां, बोलो. निस्संकोच बोलो.’’

‘‘दीदी, रुझान को घर आए 3 महीने हो चले, लेकिन वह ससुराल जाने का नाम ही नहीं लेती. जब भी मैं कहती हूं, बेटा, दामादजी को तुम्हारे बिना परेशानी हो रही होगी, वह कह देती है, ‘अरे मां, आप के दामादजी के पास उन की मां और बहनें हैं न. वे मुझ से ज्यादा उन के साथ खुश रहते हैं. मेरा फिलहाल उन के पास जाने का मन नहीं.’

‘‘अब आप ही बताओ दीदी, शादी के बाद लड़की का इतने इतने दिन मायके में रहना क्या सही है?’’

‘‘हूं, तो यह बात है. चलो, शाम को बिटिया को ले कर घर आ जाओ. मैं उसे समझाती हूं.’’

शाम को वंदिता रुनझुन को ले कर आभाजी के घर पहुंच गईं. आभाजी ने रुझान को समझाया, ‘‘बेटा, शादी एक बेहद जिम्मेदारीभरा रिश्ता है, जिसे बेहद समझदारी और धैर्य से निभाना पड़ता है. तुम्हें ससुराल या दामादजी से क्या परेशानी है?’’

‘‘ताईजी, ससुराल में मुझे बहुत घुटन महसूस होती है. सुबह 7 प्राणियों का खाना बना कर जाओ और रात को फिर वही रूटीन. आजकल मेरे औफिस में बेहद व्यस्त दिनचर्या चल रही है. वर्षांत होने की वजह से औडिटिंग के सिलसिले में दसदस घंटों की ड्यूटी देनी पड़ रही है तो सुबह 9 बजे की निकलीनिकली रात के 7 बजे ही घर लौट पाती हूं. अब आप ही बताइए, मैं रसोई का काम कैसे करूं? इतना लेट आने पर सासुजी कलह करती हैं. मुझे नौकरी छोड़ने के लिए धमकाती हैं इसलिए मैं अभी वापस नहीं जा रही.’’

‘‘बेटा, बुरा मत मानना. शादी के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना क्या सही है? औफिस के काम की आड़ ले कर अगर तुम मायके से ससुराल जाना ही नहीं चाहो तो यह तो अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना हुआ

न बेटा?’’

‘‘आंटीजी, मैं आप की बात से पूरी तरह सहमत हूं. आप ही बताइए, बारहबारह घंटे घर से बाहर बिता कर मैं रसोई का काम कैसे करूं. मैं अपनी यह इतनी अच्छी नौकरी छोड़ने वाली तो बिलकुल नहीं हूं.’’

रुझान की ये बातें सुन अम्माजी ने वंदिता से उस के दामाद अमेय से मिलने की इच्छा जाहिर की.

अगले दिन दामाद अमेय के अपने घर आने पर आभाजी ने औपचारिक कुशलक्षेम के बाद उस से कहा, ‘‘अमेयजी, हमारी बिटिया की जिम्मेदारी पूरी तरह से आप के ऊपर है. इसे बस यह गिला है कि 12 घंटे घर से बाहर रहने के बाद उस में दोनों वक्त की रसोई निबटाने की हिम्मत नहीं बचती. अब आप ही बताइए, वह पूरी तरह से गलत तो नहीं?’’

‘‘आंटीजी, घर के काम की वजह से मायके आ कर बैठ जाना क्या सही है? मैं तो इसे समझसमझ कर हार गया. लेकिन यह घर चलने को तैयार ही नहीं होती.’’

इस पर आभाजी ने उसे समझाया कि वह खाना बनाने के लिए एक सहायिका का इंतजाम करे.

घर पहुंच कर अमेय ने यह बात मां के समक्ष रखी. सब की सहमति से यह फैसला हुआ कि एक सहायिका खाना बनाने में रुझान की मदद करने के लिए

रखी जाएगी.

इस निर्णय को अमेय के मुंह से सुनने के बाद वंदिता ने आभाजी का लाखलाख शुक्रिया अदा किया कि उन के मशवरे से उन की बेटी का घर उजड़ने से बच गया.

आभाजी वंदिता के घर से लौट कर अपने कमरे में आराम ही कर रही थीं कि तभी उन का बेटा घर में घुसा.

‘‘क्या हुआ बेटा, बेहद थके थके नजर आ रहे हो?’’

‘‘अरे मां, औफिस में अकाउंट में भारी गड़बड़ी नजर आ रही है. लेकिन अकाउंटैंट उसे ठीक तरह से समझ नहीं पा रहे. मैं भी सुबह से वही गड़बड़ पकड़ने की कोशिश में लगा हुआ था, लेकिन पकड़ नहीं पाया.’’

‘‘ओ बेटा, तू ने मुझे क्यों नहीं बुलवा लिया औफिस? तुझे तो पता है, ऐसी गड़बड़ी ढूंढ़ने में मैं माहिर हूं. आखिर मेरी एमकौम की डिग्री कब काम आएगी?’’

‘‘मां, अब बारबार आप को औफिस के कामों में उलझाने का मन नहीं करता.’’

‘‘अरे बेटा, तू नाहक ही परेशान होता रहता है. चल, अभी अपने लैपटौप पर तेरा अकाउंट चैक करती हूं.’’

आभाजी ने पूरे दिन लग कर अकाउंट की बारीकी से जांच कर उस में की गई भयंकर हेराफेरी पकड़ ली.

अकाउंट की गहन छानबीन से पता चला कि उन के नए मैनेजर ने बेहद चतुराई से एक बड़ी रकम का गबन किया था.

अम्माजी ने फौरन ही बेईमान अकाउंटैंट को नौकरी से हटा दिया और एक नया ईमानदार अकाउंटैंट को नियुक्त कर दिया.

पूरे दिन अकाउंट की जांच करतेकरते अम्माजी पस्त हो आराम कर रही थीं कि तभी उन की बहू की चचेरी बहन की बिन मांबाप की बेटी सलोनी यह कहते हुए उन के पास आई, ‘‘दादू, दादू, यह देखो मेरा नीट का रिजल्ट आ गया. मुझे पूरे स्टेट में 5वीं पोजीशन मिली है.’’ इस बिन मांबाप की बच्ची को उन्होंने बचपन में ही गोद ले कर पाला था.

‘‘ओह, इतनी बढि़या पोजीशन! सब तेरी कड़ी मेहनत का नतीजा है मेरी लाडो. आज तेरी इस शानदार सफलता का जश्न मनाने वृद्धाश्रम चलेंगे. अरे कुश, ओ कुश बेटा, 5 किलो मिठाई ले आना बाजार से. सलोनी की यह सफलता कोई मामूली नहीं. पूरे पड़ोस में मिठाई बंटवाऊंगी. ले, ये रुपए ले और जा कर झटपट मिठाई ले आ.’’

‘‘हां दादू, हां दादू, तनिक ठंड रखो. अभी बाजार जा कर लाता हूं. यह चुहिया अब डाक्टर बनेगी! न बाबा न, मैं तो कभी अपना इलाज इस से नहीं करवाने वाला. इस नीमहकीम की दवाई से कहीं अपना पत्ता ही साफ हो गया तो, हो गया अपना बेड़ा गर्क,’’ कुश ने सलोनी को खिलखिलाते हुए छेड़ा.

‘‘दादू, देखो, यह शैतान क्या कह रहा है? बेटू 5वीं पोजीशन आई है मेरी पूरे स्टेट में. कोई छोटीमोटी बात नहीं है यह. मैं तो हार्ट सर्जन बनूंगी.’’

‘‘हा…हा…हा…, हार्ट सर्जन! हार्ट खोल कर सिलना भूल जाएगी तो मरीज की तो हो गई छुट्टी!’’ कुश ने सलोनी को फिर से चिढ़ाया और वह उसे एक धौल जमाने के लिए उस के पीछेपीछे भागी.

कुछ ही देर में सलोनी नम आंखों से दादी के पास आ कर बैठ गई और उस ने झाक कर उन के चरण स्पर्श कर लिए. ‘‘दादू, अगर आप मुझ अनाथ को अपने घर में ला कर सहारा न देतीं तो मेरा कुछ न होता.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते, बेटा.’’ यह कह कर आभाजी ने सलोनी को गले से लगा लिया.

तभी कुश का कोई फोन आया और वह आभाजी से यह कहते हुए घर से भाग छूटा, ‘‘दादू, बहुत जरूरी काम है. मुझे अभी जाना पड़ेगा. लौट कर आते हुए मिठाई लेता आऊंगा.’’

‘‘अरे बेटा, यह तो बता दे जा कहां रहा है इतनी जल्दबाजी मैं?’’

‘‘आता हूं, दादू. फिर आप को बताता हूं.’’

10 बजे घर से गया कुश दोपहर के 3 बजे हैरानपरेशान घर लौटा.

उस का तनावग्रस्त चेहरा देख आभाजी ने उस से पूछा, ‘‘क्या बात है, बेटा? इतने टैंशन में क्यों दिख रहा है?’’

‘‘कुछ नहीं, दादू. बस, ऐसे ही,’’ उस ने बात टालते हुए कहा.

‘‘अपनी दादू को नहीं बताएगा? कोई प्रौब्लम तो जरूर है जो तू इतना टैंशन में दिख रहा है.’’

‘‘अरे दादू, वह मेरी फास्ट फ्रैंड रितुपर्णा है न, उस की कुछ प्रौब्लम है. अब मेरी समझ में नहीं आ रहा इसे सौल्व करूं तो कैसे करूं?’’

‘‘अरे बेटा, मुझे बता तो सही, तेरी क्या परेशानी है?’’

बेहद सकुचातेझिकते कुश ने आभाजी को बताया, ‘‘यह रितुपर्णा वैसे तो बहुत अच्छी है, मेरी उस की बहुत पटती है. बस दादू, वह खर्चीली बहुत है. होस्टल में रहती है न. घर से पैसे आते ही वह पहले तो उन्हें नईनई ड्रैसेस व महंगेमहंगे कौस्मेटिक में उड़ा देती है. फिर पैसे खत्म होने पर मुझे से मांगती है. मेरे उस पर नहींनहीं करतेकरते 12 हजार रुपए उधार हो गए हैं. अब आप ही बताओ, दादू, पापा मुझे बेहिसाब पैसे तो देते नहीं. वह तो हर महीने अपने रुपए महीने की शुरुआत में ही खर्च कर लेती है. आज भी वह मुझ से जिद कर रही थी कि मैं उस के अगले माह के कालेज ऐक्सकर्शन के लिए रुपए जमा कर दूं. जब मैं ने इस के लिए हामी नहीं भरी तो उस ने मुझे दस बातें सुना दीं. खूब लड़ीझगड़ी मुझ से.’’

‘‘क्या? रुपए न देने की वजह से लड़ीझगड़ी? बातें सुनाईं? अरे फिर तो वह सही लड़की नहीं, बेटा. उस से दोस्ती रखना ठीक नहीं. उस से धीरेधीरे दोस्ती तोड़ दे.’’

‘‘अरे दादू, उस से दोस्ती तोड़ना आसान नहीं,’’ कुश ने बेहद मायूसी से कहा.

‘‘क्यों भई? किसी से फ्रैंडशिप रखने की जबरदस्ती थोड़े ही है?’’

‘‘अरे दादू, आप समझ नहीं रहीं. वह मेरी खास फ्रैंड है,’’ इस बार वह तनिक हिचकतेअटकते बोला.

‘‘खास फ्रैंड क्या? तेरा उस से कहीं प्यारव्यार का कोई चक्कर तो नहीं चल रहा?’’

‘‘हां दादू. कुछ ऐसा ही समझा लो. पहले तो मुझे उस पर भयंकर क्रश आया हुआ था, लेकिन अब जब से वह मुझ से हर महीने रुपए मांगने लगी है और नहीं देने पर मुझ से झगड़ने लगी है तो मेरे प्यार का बुखार उतरने लगा है.’’

‘‘वह तो उतरेगा ही, बेटा. हां, एक बात बताओ, तुम मानते हो न कि हर प्यार का अंजाम शादी होना चाहिए?’’

‘‘हां दादू, औब्वियसली.’’

‘‘साथ ही तुम यह भी मानते हो कि आप को शादी का रिश्ता ऐसे शख्स से जोड़ना चाहिए जिस का वैल्यू सिस्टम पुख्ता हो?’’

‘‘यसयस दादू. विदाउट फेल.’’

‘‘तुम्हारी इस रितुपर्णा का वैल्यू सिस्टम मुझे बहुत खोखला नजर आ रहा है. जो लड़की बातबात पर अपने बौयफ्रैंड से रुपए मांगती हो. नहीं मिलने पर बुरी तरह से लड़तीझगड़ती हो, उस की वैल्यू में कोई दम नहीं, बेटा. अभी तो तुम्हारी शादी भी नहीं हुई तो वह किस हक से तुम से रुपए मांगती है और लड़तीझगड़ती है? यह तो उस की बेहद गैरजिम्मेदाराना हरकत है. समझ रहे हो न बेटा, मैं क्या कहना चाह रही हूं?’’

‘‘जी दादू. बिलकुल समझ रहा हूं.’’

‘‘उस से तू ब्रेकअप कर ले, बेटा. नहीं तो उस से तेरा रिश्ता तुझे जिंदगीभर नासूर की तरह दुख देगा.’’

‘‘हां दादू. सोच तो मैं भी यही रहा हूं पर मैं उस से अपने रिश्ते में इतना आगे बढ़ चुका हूं कि अब पीछे कैसे लौटूं, समझ नहीं पा रहा.’’

‘‘तुझे कुछ नहीं करना, बेटा. बस, तू उस से  साफसाफ कह दे कि मैं तुम जैसी उड़ाऊ, गैरजिम्मेदार और झगड़ालू लड़की से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता.’’

‘‘अरे दादू. यह इतना आसान नहीं.’’

‘‘मुश्किल भी नहीं. बस, तुझे यह कहना होगा कि अगर तुम ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा तो मेरी दादी तुम्हारे पेरैंट्स को तुम्हारे ऊपर मेरे 12 हजार रुपए की बकाया रकम के बारे में बता देंगी. बस, तेरा इतना कहते ही वह तेरी जिंदगी से दुम दबा कर नौदोग्यारह हो जाएगी.’’

इस पर कुश ने आभाजी के हाथ चूमते हुए कहा, ‘‘वाह दादू. मान गया मैं आप को. कितना धांसू आइडिया दिया है आप ने. लव यू, दादू. मैं कल ही उसे साफसाफ लफ्जों में यही कहता हूं और उस से अपनी जान छुड़ाता हूं.’’

लाडले पोते की यह बात सुन कर आभाजी की आंखें चमक उठीं और उन्होंने राहत की सांस ली.

तभी उन की एक सहेली दीपा का फोन आ गया.

‘‘अरे आभाजी, आज कालोनी के मंदिर में कीर्तनभजन का कार्यक्रम रखा है. आप तो कभी इन धर्म के कामों में कोई रुचि ही नहीं लेती हो. घर ही घर में घुसी रहती हो. ऐसी भी क्या व्यस्तता भई, जो बुढ़ापे में परलोक सुधारने की भी सुध न रहे.’’

‘‘अरे दीपाजी, परलोक किस ने देखा है? मैं तो अपना यही लोक सुधारने की जुगत भिड़ाने में लगी रहती हूं. घरपरिवार में आएदिन कोई न कोई मसला होता ही रहता है. अब घर की बड़ीबुजुर्ग होने के नाते मेरा ही तो फर्ज है न, उन की उलझनों को सुलझाने का. मुेझे तो भई माफ करो. मेरे अपने ही काम बहुत हैं. मेरे पास इन फालतू की चीजों के लिए बिलकुल वक्त नहीं.

तभी कुश बाहर से आया और दादी से बोला, ‘‘दादू, आप का फार्मूला तो वाकई हिट रहा. मैं ने जैसे ही उधारी की बात उस के पेरैंट्स को बताने की धमकी दी, वह भीगी बिल्ली बन गई. मैं ने उस से कह दिया, ‘‘मैं तुम्हारा नंबर ब्लौक कर रहा हूं. अब कभी मुझे कौंटैक्ट करने की कोशिश मत करना.’’

‘‘ओ दादू, लव यू. आप तो वाकई में लाजवाब हो.’’

इन्हें आजमाइए

हमारी उम्र के साथ हमारा लक्ष्य भी बदला जा सकता है. इसलिए देखें कि पहले जो लक्ष्य था क्या अब भी महत्त्वपूर्ण है. ऐसे लक्ष्य को छोड़ दें जो अब आप के काम का नहीं है.

अगर आप लंबे वक्त से मैटल और इमोशनल चैलेंजेस से गुजर रहे हैं तो मनोचिकित्सक और प्रोफैशनल्स की मदद लें. कभीकभी खुद को दूसरों के नजरिए से देखना भी मददगार होता है.

किसी भी फंक्शन या पार्टी में अकेले शामिल होने की जगह अपने पार्टनर को भी साथ ले जाएं. अपने जानकारों से उसे मिलाएं. इस से वह अच्छा महसूस करेगा और उसे एहसास होगा कि वह आप के जीवन में कितनी अहमियत रखता है.

हमेशा शांत मन से बच्चे से बात करें. इस से वह चिड़चिड़ा नहीं होगा. बातबात में बच्चे पर चिल्लाना बंद करें. जब तक उस से कोई बड़ी गलती न हो उस से तेज आवाज में बात न करें.

सुख और दुख दोनों के संतुलन का नाम ही जीवन है. इसलिए सुखों के साथ दुखों को सहने की भी आदत डाल लें. सुख में सुखी हो तो दुख का भी इजहार करो. अप्रसन्नता की भावना को स्वीकार करो. Hindi Social Story.

Hindi Family Story: पति नहीं सिर्फ दोस्त- स्वाति का क्यों नहीं आया था फोन?

Hindi Family Story: 3 दिन हो गए स्वाति का फोन नहीं आया तो मैं घबरा उठी. मन आशंकाओं से घिरने लगा. वह प्रतिदिन तो नहीं मगर हर दूसरे दिन फोन जरूर करती थी. मैं उसे फोन नहीं करती थी यह सोच कर कि शायद वह बिजी हो. कोई जरूरत होती तो मैसेज कर देती थी. मगर आज मुझ से नहीं रहा गया और शाम होतेहोते मैं ने स्वाति का नंबर डायल कर दिया. उधर से एक पुरुष स्वर सुन कर मैं चौंक गई. हालांकि फोन तुरंत स्वाति ने ले लिया मगर मैं उस से सवाल किए बिना नहीं रह सकी.

‘‘फोन किस ने उठाया था स्वाति?’’

‘‘मां, वह रोहन था… मेरा दोस्त’’, स्वाति ने बेहिचक जवाब दिया.

‘‘मगर तुम तो महिला छात्रावास में रहती हो ना. क्या वहां पुरुष मित्रों को भी आने की इजाजत है? वह भी इस वक्त?’’  मैं ने थोड़ा कड़े लहजे में पूछा.

‘‘मां अब मैं होस्टल में नहीं रहती. मैं रोहन के साथ रह रही हूं उस के फ्लैट में. रोहन मेरे साथ ही कालेज में पढ़ता है.’’

‘‘क्या? कहीं तुम ने हमें बताए बिना शादी तो नहीं कर ली?’’

‘‘नहीं मां, हम लिवइन रिलेशनशिप में रह रहे हैं.’’

‘‘स्वाति, तुम्हें पता है तुम क्या कर रही हो? अभी तुम्हारी उम्र अपना कैरियर बनाने की है. और तुम्हारी ही उम्र का रोहन…वह क्या तुम्हारे प्रति अपनी जिम्मेदारी समझता है?’’

‘‘मां, हम दोनों सिर्फ दोस्त हैं.’’

‘‘लड़कालड़की दोस्त होने से पहले एक लड़की और लड़का होते हैं. कुछ नहीं तो कम से कम अपने और परिवार की मर्यादा का तो खयाल रखा होता. हम ने तुझे आधुनिक बनाया है, इस का मतलब यह तो नहीं कि तू हमें यह दिन दिखाए. लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे?’’ मैं पूरी तरह से तिलमिला गई थी.

‘‘मां, समाज और बिरादरी की बात न ही करो तो अच्छा है. वैसे भी आप की दी गई शिक्षा ने मुझे अच्छेबुरे का फर्क तो समझा ही दिया है.

‘‘रोहन उन छिछोरे लड़कों की तरह नहीं है जो सिर्फ मौजमस्ती के लिए लिवइन में रहते हैं और न ही मैं वैसी हूं. हम दोनों एकदूसरे की पढ़ाई में भी मदद करते हैं और कैरियर के प्रति भी हम पूरी तरह से जिम्मेदार हैं.’’

‘‘लेकिन बेटा, कल को अगर रोहन ने तुम्हें छोड़ दिया तो…तुम्हारी मानसिक स्थिति…’’ मैं अपनी बेटी के भविष्य को ले कर कोई सवाल नहीं छोड़ना चाहती थी.

‘‘मां, हम दोनों पतिपत्नी नहीं हैं, इसलिए ‘छोड़ने’ जैसा तो सवाल ही नहीं उठता. और अगर कभी हमारे बीच में कोई प्रौब्लम होगी तो हम एकदूसरे के साथ नहीं रहेंगे और उस के लिए हम दोनों मानसिक रूप से तैयार हैं,’’ स्वाति पूरे आत्मविश्वास से बोल रही थी.

‘‘और यदि तुम दोनों के बीच बने दैहिक संबंधों के कारण…’’ मैं ने हिचकते हुए सब से मुख्य सवाल भी पूछ ही लिया.

‘‘यह महानगर है, मां, तुम चिंता मत करो. मैं ने इस के लिए भी डाक्टर और काउंसलर दोनों से बात कर ली है.’’

‘‘अच्छा, तभी इतनी समझदारी की बात कर रही हो. ठीक है मैं भी जल्दी ही आती हूं तुम्हारे रोहन से मिलने.’’

‘‘सब से बड़ी समझदारी तो आप के संस्कारों और मेरे प्रति आप के विश्वास ने दी है मगर एक बात आप लोग भी याद रखिएगा, मां…कि आप उस से सिर्फ मेरा दोस्त समझ कर मिलिएगा, मेरा पति समझ कर नहीं.’’

स्वाति से बात कर मैं सोफे पर बैठ गई. स्वाति की बातें सुन यह महसूस हो रहा था कि बचपन से ही बच्चों की जड़ों में सुसंस्कारों और मर्यादित आचरण

का खादपानी देना हम मातापिता की जिम्मेदारी है. इन्हीं आदर्शों को स्वयं

में संचित कर ये बच्चे जब अपनी सोचसमझ से कोई निर्णय या अपनी इच्छा के अनुरूप चलना चाहते हैं, तब मातापिता का उन्हें अपना सहयोग देना समझदारी है.

स्वाति के चेहरे पर अब निश्चिंतता के भाव थे. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: हमें दान चाहिए- अध्यात्म की अनुभूति आश्रम में ही खत्म क्यों हो गई?

Hindi Social Story: डियो और काना हर समय साथसाथ ही दिखाई देते थे. डियो जरमनी से थी और काना जापान से. दोनों बेंगलुरु के एक आश्रम में मिले थे. इंग्लिश दोनों को आती थी. आज आश्रम का आखिरी दिन था. काना ने डियो को बताया था कि आश्रम का एक सहयोगी उस पर आश्रम को अनुदान देने का अनुचित दबाव बना रहा है.

वहीं, डियो कुछ भारतीय परिधान खरीदने के लिए जाना चाहती थी. अभी कल ही काना ने डियो को एक साथी भारतीय योगी को बेइज्जत करते देखा था. किसी की पर्सनल बात पूछना वैसे भी उस की आदत या जापानी संस्कारों के खिलाफ था. एक योगिनी राधिका ने बीचबचाव करवाया था.

शांत होने पर राधिका ने डियो को भारतीय परिधान पहनने की भी सलाह दे दी थी. डियो इस के बाद जयपुर, अजमेर और पुष्कर घूमने जाना चाहती थी. काना दक्षिण भारत में कुछ दिन और रुकना चाहती थी. रात को खाना खा कर आश्रम में बनी एक दुकान पर दोनों रुक गईं. अचानक, डियो एक डीवीडी कैसेट उठा कर देखने लगी. यह देख कर दुकानदार ने हंसते हुए एक दूसरी डीवीडी थमा दी. यह इंग्लिश में थी. उत्सुकतावश, दोनों कमरे में आ कर देखने लगीं. आश्रम के संचालक अलगअलग तरह से विदेशियों से चंदे के लिए अपील कर रहे थे. गरीब बच्चों, असहाय महिलाओं, इलाज की प्रतीक्षा कर रहे मरीज, सभी तो थे डीवीडी में. काना को कहीं न कहीं ग्लानि का अनुभव हो रहा था. ‘‘शायद ये सब विदेशियों को अमीर मानते हैं. और अमीर लोगों से लोग अपेक्षा करते ही हैं कि वे गरीबों की मदद करें,’’ काना ने दुखी स्वर में कहा.

‘‘हां, पर हम लोग तो खुद ही अभी पढ़ रहे हैं. कोई हाईप्रोफाइल लोग नहीं हैं. मैं पार्टटाइम जौब कर के अपनी पढ़ाई का खर्र्च खुद ही निकालती हूं. साउथ एशिया घूमने इसलिए आई हूं कि कम खर्च में घूमनाफिरना हो जाएगा,’’ डियो का कहना था.

डियो और काना दोनों ही अपनेअपने देशों में मैडिसिन की पढ़ाई कर रही थी. शायद, इसीलिए दोनों की खास जमती थी.

काना अपनी दादी की दुकान में काम करती थी. वह वीकैंड पर टैक्सी चलाती थी. उच्च शिक्षा के लिए उस ने जीतोड़ मेहनत की थी. लगातार 3 साल टैक्सी चला कर पैसे बचाए थे. तब जा कर मैडिसिन पढ़ रही थी. बेहद मेहनती काना ने आश्रम में भी कुछ कार्य करने की संभावना तलाश की थी.

आश्रम के संचालक ने उसे फंड इकट्ठा करने की जिम्मेदारी देना स्वीकार भी किया था. परंतु इस से पहले वह काना से भरपूर चंदा लेना चाहता था. दरअसल, विदेशियों की वजह से ही आश्रम में सभी ऐश्वर्य के साधन उपलब्ध थे.

आश्रम छोड़ते समय विदेशियों को रोका गया. उन से आश्रम के बारे में, गुरुजी के बारे में कुछ बोलने को कहा गया.

स्वाभाविक तौर पर, विदेशी पराए देश में कुछ बुरा क्यों बोलते. अनुभव कैसा भी रहा हो, सभी ने लाइफचेंजिंग बताया. फिर, एक अन्य बिल आया. डियो और काना समेत सभी बेहद हैरान हुए. क्योंकि अपनी समझ से वे सभी बिलों का भुगतान कर चुके थे. उस के बाद अनुदान राशि के लिए प्रार्थनापत्र, काना और डियो को दिया गया. सिर्फ यही 2 विदेशी ऐसे थे जिन्होंने अभी तक आश्रम संचालक को कुछ नहीं दिया था.

न चाहते हुए भी दोनों ने सौ डौलर के चैक दे दिए. राशि देख कर चैक लेने वाले व्यक्ति ने बुरा सा मुंह बनाया और आश्रम के संचालक के कान में फुसफुसाने लगा. इस के बाद डियो और काना को रुखाई से विदा कर दिया गया.

दोनों ने तय किया कि साथ में मैसूर घूमने जाया जाए. डियो के पास 2 दिन शेष थे. उस के बाद राजस्थान घूमने जाना चाहती थी. एकदो अन्य पर्यटक भी उन के साथ शामिल हो गए. डियो ने रास्ते में आश्रम में हुई घटना के बारे में विस्तार से बताया, ‘‘वह तथाकथित गुरुजी का सहायक है. उस ने मुझ से कई बार अपने कक्ष में आने को कहा. एक बार मैं अकेली शाम को लौंग वौक के लिए निकली थी. पता नहीं कहां से आ गया. उस ने मुझे बताया कि उसे गुरुजी ने बताया था कि जरमनी से आई युवती ही मेरा उद्धार करेगी. इतना कह कर वह मुझे गले लगाने लगा.

‘‘मैं उस से पीछा छुड़ा कर भागी. अगले दिन वह मुझे छोटे कपड़ों को ले कर सब के सामने जलील करने लगा. उस ने कहा कि मैं आश्रम की सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ कपड़े पहन रही हूं.’’

‘‘परंतु सिर्फ हमीं लोगों को इस तरह क्यों प्रताडि़त किया. तुम्हें उसी समय उस सहायक की शिकायत करनी चाहिए थी,’’ काना ने रोष से कहा.

‘‘करना तो चाहती थी परंतु उस ने अगले दिन सुबह खुद ही ड्रामा शुरू कर दिया,’’ डियो ने सोचते हुए कहा.

‘‘तुम जानती हो जब मैं ने चंदा देने से मना किया तो मुझे भी गलत इशारे किए गए. इन भारतीयों को ऐसा क्यों लगता है कि हम विदेशी किसी के साथ भी बैड शेयर कर सकते हैं,’’ काना ने दुख से कहा.

‘‘खैर, कुछ भी हो, पर तुम मेल जरूर करना आश्रम को इन सभी के बारे में. मैं भी शिकायती मेल जरूर डालूंगी,’’ काना ने डियो को समझाया.

दोनों ने हैरानी से एकदूसरे की तरफ देखा. अध्यात्म की अनुभूति तो आश्रम में ही खत्म हो चुकी थी. अब घूमनेफिरने का उत्साह भी ठंडा हो गया था. तभी एक वृद्धा उन के पास आ कर हालचाल पूछने लगी. फर्राटेदार इंग्लिश बोलती वृद्ध महिला बैंक में औफिसर रह चुकी थी.

‘‘नैक्स्ट टाइम, कम एटलीस्ट विद वन मेल फ्रैंड,’’ वृद्धा ने बिना मांगी सलाह देना जारी रखा, ‘‘ऐंड वियर इंडियन वियर औल द टाइम.’’

‘‘अब मुझे अच्छी तरह समझ में आ गया कि इंडिया में पर्यटक इतने कम क्यों आते हैं. मैं दूसरी बार नहीं आना चाहती, इसलिए राजस्थान घूमने जरूर जाऊंगी,’’ डियो ने काना के कान में फुसफुसाते हुए कहा.

‘‘हां, मैं भी केरल घूम कर वापस जाऊंगी. सोचती हूं, वियतनाम घूम आती हूं,’’ काना ने अपनी योजना बताई.

दोनों ने एक नेक काम जरूर किया, वह था अपने बैंक में फोन कर के चैक की स्टौप पेमैंट कराना. Hindi Social Story.

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