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Hindi Kahani : एक झूठ – धोखे से की गई शादी का क्या होता है अंजाम ?

Hindi Kahani : इकबाल जल्दीजल्दी निभा के लिए केक बना रहा था. दरअसल, आज निभा का बर्थडे था. इकबाल ने अपने औफिस से छुट्टी ले ली थी. वह निभा को सरप्राइज देना चाहता था.

उस ने निभा की पसंद का खाना बनाया था, पूरा घर सजाया था और निभा के लिए एक खूबसूरत सी ड्रैस भी खरीदी थी. आज की शाम वह निभा के लिए यादगार बना देना चाहता था.

शाम में जब निभा घर लौटी तो इकबाल ने दरवाजा खोला. निभा के अंदर कदम रखते ही इकबाल ने पंखा चला दिया और रंगबिरंगे फूल निभा के ऊपर गिरने लगे. निभा को बांहों में भर कर इकबाल ने धीरे से कहा,”जन्मदिन मुबारक हो मेरी जान.”

इकबाल का हाथ थाम कर निभा ने कहा,”सच इकबाल, तुम मेरी जिंदगी की सच्ची खुशी हो. कितना प्यार करते हो मुझे. ख्वाहिशों का आसमान छू लिया है मैं ने तुम्हारे दम पर… अब तमन्ना यही है मेरा दम निकले तुम्हारे दर पर…”

इकबाल ने उस के होंठों पर उंगली रख दी,”दम निकलने की बात दोबारा मत करना निभा. तुम ने मेरी जिंदगी हो. तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूं.”

केक काट कर और गिफ्ट दे कर जब इकबाल ने अपने हाथों से तैयार किया हुआ खाना डाइनिंग टेबल फर सजाया तो निभा की आंखों में आंसू आ गए,”इतना प्यार मत करो मुझ से इकबाल. हम लिवइन में रहते हैं मगर तुम तो मुझे पत्नी से ज्यादा मान देते हो. हमारा धर्म एक नहीं पर तुम ने प्यार को ही धर्म बना दिया. मेरे त्योहार तुम मनाते हो. मेरे रिवाज तुम निभाते हो. मेरा दिल हर बार तुम चुराते हो. कब तक चलेगा ऐसा?”

“जब तक धरती पर मैं हूं और आसमान में चांद है…”

दोनों एकदूसरे की बांहों में खो गए थे. धर्म, जाति, ऊंचनीच, भाषा, संस्कृति जैसे हर बंधन से आजाद उन का प्यार पिछले 5 सालों से परवान चढ़ रहा था.

5 साल पहले एक कौमन फ्रैंड की पार्टी में दोनों मिले थे. उस वक्त दोनों ही दिल्ली में नए थे और जौब भी नईनई थी. समय के साथसाथ दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई. एकदूसरे के विचार और व्यवहार से प्रभावित इकबाल और निभा धीरेधीरे करीब आने लगे थे. दोनों के बीच दूरियां सिमटने लगीं और फिर दोनों अलगअलग घर छोड़ कर एक ही घर में शिफ्ट हो गए. किराया तो बचा ही जीवन को नई खुशियां भी मिलीं.

जल्दी ही दोनों ने मिल कर एक फ्लैट किस्तों पर ले लिया. दोनों मिल कर मकान की किस्त भी देते और घर के दूसरे खर्चे भी करते. दोनों के बीच प्यार गहरा होता गया. रिश्ता गहरा हुआ तो दोनों ने घर वालों को बताने की सोची.

इकबाल के घर वालों में केवल मां थीं जो बहुत सीधी थीं. वह तुरंत मान गई थीं. मगर निभा के यहां स्थिति विपरीत थी. उस के पिता इलाहाबाद के जानेमाने उद्योगपति थे. शहर में अपनी कोठी थी. 3-4 फैक्ट्रियां थीं. 100 से ज्यादा मजदूर काम करते थे. उन की शानोशौकत ही अलग थी. पैसों की कोई कमी नहीं थी पर पतिपत्नी दोनों ही अव्वल दरजे के धार्मिक और कट्टरमिजाज थे. मां अकसर ही धार्मिक कार्यक्रमों में शरीक हुआ करती थीं.

धर्म की तो बात ही अलग है. यहां तो जाति के साथसाथ गोत्र, वर्ण, कुंडली सब कुछ देखा जाता था. ऐसे में निभा को हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वह घर वालों से कुछ कहे.

एक बार दीवाली की छुट्टियों में जब वह घर गई तो उसे शादी के लिए योग्य लड़कों की तसवीरें दिखाई गईं. निभा ने तब पिता से सवाल किया,”पापा क्या मैं अपनी पसंद के लड़के से शादी नहीं कर सकती?”

पापा ने गुस्से से उस की तरफ देखा. तब तक मां ने उन्हें चुप रहने का इशारा किया और बोलीं,” देख बेटा, तू अपनी पसंद की शादी करने को तो कर सकती है, पर इतना ध्यान रखना कि लड़का अपने धर्म, अपनी जाति और अपनी हैसियत का होना चाहिए. थोड़ा भी इधरउधर हम स्वीकार नहीं करेंगे. इसलिए प्यार करना भी है तो आंखें खोल कर. वरना तू तो जानती ही है गोलियां चल जाएंगी.”

“जी मां,” कह कर निभा खामोश हो गई.

उसे पता था कि इकबाल के बारे में बता कर वह खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी दे मारेगी. इसलिए उस ने रिश्ते का सच छिपाए रखना ही उचित समझा. वक्त इसी तरह बीतता रहा.

एक दिन सुबह निभा बड़ी परेशान सी बालकनी में खड़ी थी. इकबाल ने पीछे से उसे बांहों में भरते हुए पूछा,”हमारी बेगम के चेहरे पर उदासी के बादल क्यों छाए हुए हैं?”

निभा ने खुद को छुड़ाते हुए परेशान स्वर में कहा,”क्योंकि आप के शहजादे दुनिया में आने के लिए निकल चुके हैं.”

“क्या?”

“हां इकबाल. मैं मां बनने वाली हूं और यह जिम्मेदारी मैं अभी उठा नहीं सकती. एक तरफ घर वालों को कुछ पता नहीं और दूसरी तरफ मेरा कैरियर भी पीक पर है. मैं यह रिस्क अभी नहीं ले सकती.”

“तो ठीक है निभा गर्भपात करा लो. मुझे भी यही सही लग रहा है.”

“पर क्या यह इतना आसान होगा?”

“आसान तो नहीं होगा बट डोंट वरी, हम पतिपत्नी की तरह व्यवहार करेंगे और कहेंगे कि एक बच्चा पहले से है और इसलिए अभी दूसरा बच्चा इतनी जल्दी नहीं चाहते.”

“देखो क्या होता है. शाम को आ जाना मेरे औफिस में. वहीं से लैडी डाक्टर के पास चलेंगे. ”

और फिर निभा ने वह बच्चा गिरा दिया. इस के 5-6 महीने बाद एक बार फिर गर्भपात कराना पड़ा. निभा को काफी अपराधबोध हो रहा था. शरीर भी कमजोर हो गया था. पर वह करती क्या…. उसे कोई और रास्ता ही समझ नहीं आया था. पर अब इस बात को ले कर वह काफी सतर्क हो गई थी और जरूरी ऐहतियात भी लेने लगी थी.

एक दिन औफिस में ही उस के पास खबर आई कि उस के पिता का ऐक्सीडैंट हो गया है और वे काफी गंभीर अवस्था में हैं. निभा एकदम बदहवाश सी घर लौटी और जरूरी सामान बैग में डाल कर निकल पड़ी. अगली सुबह वह हौस्पिटल में थी. उस के पापा आखिरी सांसें ले रहे थे.

उसे देखते ही पापा ने कुछ बोलने की कोशिश की तो वह करीब खिसक आई और हाथ पकड़ कर कहने लगी,” बोलो पापा, आप क्या कहना चाहते हैं?”

“बेटा मैं चाहता हूं कि मेरा सारा काम तुम्हारा चचेरा भाई नहीं बल्कि तुम संभालो. वादा कर बेटा…”

निभा ने उन के हाथों पर अपना हाथ रख कर वादा किया. फिर कुछ ही देर बाद उन का देहांत हो गया. अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया कर वह 14 दिनों बाद दिल्ली लौटी. इकबाल भी औफिस से जल्दी आ गया था. निभा उस के गले लग कर बहुत रोई और फिर अपना सामान पैक करने लगी.

इकबाल चौंकता हुआ बोला,”यह क्या कर रही हो निभा?”

“मुझे हमेशा के लिए घर लौटना पड़ेगा इकबाल. पापा ने वादा लिया है मुझ से. उन का सारा कारोबार मुझे संभालना है.”

“वह तो ठीक है मगर एक बार मेरी तरफ भी तो देखो. मैं यहां अकेला तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा? मकान की किस्तें, अकेलापन और तुम्हारे बिना जीने का दर्द कैसे उठा पाऊंगा? नहीं निभा नहीं. मैं नहीं रह पाऊंगा ऐसे…”

“रहना तो पड़ेगा ही इकबाल. अब मैं क्या करूं?”

“मत जाओ निभा. यहीं से संभालो अपना काम. कोई मैनेजर नियुक्त कर लो जो तुम्हें जरूरी जानकारी देता रहेगा.”

“इकबाल लाखोंकरोड़ों का कारोबार ऐसे नहीं संभलता. पापा अपने कारोबार के प्रति बहुत जनूनी थे. उन्होंने कोई भी काम मातहतों पर नहीं छोड़ा. हर काम में खुद आगे रहते थे. तभी आज इस मुकाम तक पहुंचे. उन्हें मेरे चचेरे भाई पर भी यकीन नहीं. मेरे भरोसे छोड़ कर गए हैं सब कुछ और मैं उन को दिया गया अंतिम वचन कभी तोड़ नहीं सकती.”

“और मुझ से किए गए प्यार के वादे? उन का क्या? उन्हें ऐसे ही तोड़ दोगी? नहीं निभा, तुम्हारे बिना मैं यहां 2 दिन भी नहीं रह सकता.”

“तो फिर चले आओ न…” आंखों में चमक लिए निभा ने कहा.

“मतलब?”

“देखो इकबाल, तुम एक बार मेरे पास इलाहाबाद आ जाओ. हमें एकदूसरे की कंपनी मिल जाएगी और फिर देखेंगे…कोई न कोई रास्ता भी निकाल ही लेंगे.”

फिर क्या था 10 दिन के अंदर ही इकबाल इलाहाबाद पहुंच गया. दोनों ने एक होटल में मुलाकात कर आगे की योजना तैयार की.

अगली सुबह इकबाल मैनेजर बन कर निभा के घर में खड़ा था. निभा ने अपनी मां से इकबाल का परिचय कराया,” मां यह बाला हैं. हमारे नए मैनेजर.”

इकबाल ने बढ़ कर मां के पैर छू लिए तो मां एकदम से अलग होती हुई बोलीं,”अरे नहीं बेटा. तुम मैनेजर हो. मेरे पैर क्यों छू रहे हो?”

“क्योंकि बड़ों के आशीर्वाद से ही सफलता के रास्ते खुलते हैं मां.”

“बेटा अब तुम ने मुझे मां कहा है तो यही आशीष देती हूं कि तुम्हारी हर इच्छा पूरी हो.”

बाला यानी इकबाल ने हाथ जोड़ कर आशीर्वाद लिया और अपने काम में लग गया. निभा ने मां को बताया, “मां, दरअसल बाला कालेज में मेरा क्लासमैट था. इस ने एमबीए की पढ़ाई की हुई है. पढ़ाई के बाद कुछ समय से दिल्ली में काम कर रहा था. यहां मुझे अकेले इतना बड़ा कारोबार संभालना था तो मेरी हैल्प के लिए आया है. वैसे इस का घर तो जमशेदपुर में है. यहां बिलकुल अकेला है यह. मां, क्या हम इसे अपने बड़े से घर में रहने के लिए एक छोटा सा कमरा दे सकते हैं?”

“क्यों नहीं बेटा? इसे गैस्टरूम में ठहरा दो. कुछ दिनों में यह खुद अपने लिए कोई घर ढूंढ़ लेगा.”

“जी मां…” कह कर निभा अपने कैबिन में चली गई. योजना का पहला चरण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ था. इकबाल घर में आ भी गया था और मां को कोई शक भी नहीं हुआ था. मैनेजर के रूप इकबाल बाला बन कर निभा के साथ काम करने लगा.

धीरेधीरे समय बीतने लगा. इकबाल और निभा ने मिल कर कारोबार अच्छी तरह संभाल लिया था. मां भी खुश रहने लगी थीं. इकबाल समय के साथ मां के संग काफी घुलमिल गया. वह मां की हरसंभव सहायता करता. हर मुश्किल का हल निकालता. बेटे की तरह अपनी जिम्मेदारियां निभाता. यही नहीं, कई बार उस ने अपने हाथों से बना कर मां को स्वादिष्ठ खाना भी खिलाया. उस के बातव्यवहार से मां बहुत खुश रहती थीं.

इस बीच दीवाली आई तो इकबाल ने उन के साथ मिल कर त्योहार मनाया. किसी को कभी एहसास ही नहीं हुआ कि वह हिंदू नहीं है.

एक बार कारोबार के किसी काम के सिलसिले में निभा को दिल्ली जाना था. इकबाल भी साथ जा रहा था. तभी मां ने कहा कि वे भी दिल्ली घूमना चाहती हैं. बस फिर क्या था, तीनों ने काम के साथसाथ घूमने का भी कार्यक्रम बना लिया.

तीनों अपनी गाड़ी से दिल्ली के लिए निकले. लेकिन नोएडा के पास हाईवे पर अचानक निभा की गाड़ी का ऐक्सीडैंट हो गया. उस वक्त निभा गाड़ी चला रही थी और मां बगल में बैठी थीं. ऐक्सीडैंट इतना भयंकर हुआ कि गाड़ी पूरी तरह डैमेज हो गई. निभा को गहरी चोटें लगीं पर उतनी नहीं जितनी मां को लगीं. मां के सिर में कांच घुस गए थे और खून बह रहा था. वह बीचबीच में होश में आ रही थीं और फिर बेहोश हो जा रही थीं.

करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर एक बड़ा अस्पताल था. निभा ने मां को वहीं ऐडमिट करने का फैसला लिया.

रात का समय था. हाईवे का वह इलाका थोड़ा सुनसान था. हाथ देने पर भी कोई भी गाड़ी रुकने का नाम नहीं ले रही थी. कोई और उपाय न देख कर इकबाल ने मां को गोद में उठाया और तेजी से अस्पताल की तरफ भागा. पीछेपीछे निभा भी भाग रही थी.

निभा ने ऐंबुलैंस वाले को काल किया मगर ऐंबुलैंस को आने में वक्त लग रहा था. इतनी देर में इकबाल खुद ही मां को गोद में उठाए अस्पताल पहुंच गया.

मां को तुरंत आईसीयू में ऐडमिट किया गया. उन्हें खून की जरूरत थी. संयोग था कि इकबाल का ब्लड ग्रुप ओ पौजिटिव था. उस ने मां को अपना खून दे दिया. मां को बचा लिया गया था. इस दौरान इकबाल लगातार दौड़धूप करता रहा.

इस घटना ने मां के दिल में इकबाल की जगह बहुत ऊंची कर दी थी. वापस घर लौट कर एक दिन मां ने इकबाल को सामने बैठाया और प्यार से उस के बारे में सब कुछ पूछने लगीं. पास ही निभा भी बैठी हुई थी.

निभा ने मां का हाथ पकड़ कर कहा,”मां मैं आज आप से एक हकीकत बताना चाहती हूं.”

“वह क्या बेटा?”

“मां यह बाला नहीं इकबाल है. हम ने झूठ कहा था आप से.”

इतना कह कर वह खामोश हो गई और मां की तरफ देखने लगी. मां ने गौर से इकबाल की तरफ देखा और वहां से उठ कर अपने कमरे में चली गईं. दरवाजा बंद कर लिया. निभा और इकबाल का चेहरा फक्क पड़ गया. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब इस परिस्थिति से कैसे निबटें.

अगले दिन तक मां ने दरवाजा नहीं खोला तो निभा को बहुत चिंता हुई. वह दरवाजा पीटती हुई रोतीरोती बोली,”मां, माफ कर दो हमें. तुम नहीं चाहती हो तो मैं इकबाल को वापस भेज दूंगी. गलती मैं ने की है इकबाल ने नहीं. मैं ने ही उसे बाला बन कर आने को कहा था. प्लीज मां, माफ कर दो.”

मां ने दरवाजा खोल दिया और मुंह घुमा कर बोलीं,”गलती तुम्हारी नहीं. गलती बाला की भी नहीं. गलती तो मेरी है जो मैं उसे पहचान न सकी.”

निभा और इकबाल परेशान से एकदूसरे की तरफ देखने लगे. तभी पलटते हुए मां ने हंस कर कहा,”बेटा, मैं ही पहचान न सकी कि तुम दोनों के बीच कितना गहरा प्यार है. इकबाल कितना अच्छा इंसान है. धर्म या जाति से क्या होता है? यदि सोचो तो समझ आएगा. बेटा, पलभर में मेरा धर्म भी तो बदल गया न जब इकबाल ने मुझे अपना खून दिया. मेरे शरीर में उसी का खून तो बह रहा है. फिर क्या अंतर है हम में या उस में. इतने दिनों में जितना मैं ने समझा है इकबाल मुझे एक शरीफ, ईमानदार और साथ निभाने वाले लड़का लगा है. इस से बेहतर जीवनसाथी तुम्हें और कौन मिलेगा?”

“सच मां, आप मान गईं…” कह कर खुशी से निभा मां के गले लग गई. आज उसे जिंदगी की सब से बड़ी खुशी मिल गई थी. पास ही इकबाल भी मुसकराता हुआ अपने आंसू पोंछ रहा था

Best Hindi Story : अपनी जमीं अपना आसमां – क्या रश्मि अपने पति को बचा पाई ?

Best Hindi Story : सत्यकांत के अपने दोस्त की बीवी पूजा से अनैतिक संबंध होने को ले कर पत्नी रश्मि बेटी पाहुनी को ले कर मायके आ तो गई पर वहां भी परेशानियां कम न थीं. क्या रश्मि इस का समाधान खोज पाई? रश्मि आज फिर अपनी बेटी पाहुनी के साथ परेशान सी घर आई थी. रश्मि के विवाह को 12 वर्ष हो गए थे, मगर सत्यकांत के व्यवहार में जरा भी बदलाव नहीं आया था. वह पैसे को पानी की तरह बहाता था.

आज फिर रश्मि को कहीं से पता चला कि वह अपना पैसा अपने दोस्त विराज की पत्नी, जिस का नाम पूजा है, के साथ औनलाइन बिजनैस में लगा रहा है. रश्मि ने पूजा को पहले भी देख रखा था. गहरे मेकअप की परतें और भड़कीले कपड़ों में पूजा एक आइटम गर्ल अधिक, पढ़ीलिखी सभ्य महिला कम लगती थी. रश्मि को अच्छे से पता था कि पूजा वे सारे हथकंडे अपनाती थी जिन से वह सत्यकांत जैसे बेवकूफ पुरुष को काबू में रख सके. रातदिन ‘सत्यजी, सत्यजी’ कह कर वह सत्य की झठी तारीफ करती थी. सत्य बेवकूफ की तरह पूजा की थीसिस भी लिख रहा था और अपने निजी फायदे के लिए पूजा का पति विराज मुंह में दही जमा कर बैठा हुआ था. आज रश्मि के सिर के ऊपर से पानी गुजर गया था.

इसलिए वह सलाह लेने अपने घर आ गई थी. छोटी बहन अंशु बोली, ‘‘आप पढ़ीलिखी हो, खुद कमाती हो, क्यों उस गलीच इंसान के साथ अपनी और पाहुनी की जिंदगी बरबाद कर रही हो?’’ भैया बोले, ‘‘अरे, तेरा कमरा अभी भी खाली पड़ा है.’’ वहीं भाभी बोलीं, ‘‘डाइवोर्स का केस फाइल करना बच्चू पर और जब एलिमोनी देनी पड़ेगी, दिन में तारे नजर आ जाएंगे.’’ रश्मि ने पाहुनी के मुरझए चेहरे की तरफ देखा. पाहुनी सुबकते हुए कह रही थी, ‘‘पापा उतने भी बुरे नहीं हैं जैसा आप सब बोल रहे हो.’’ तभी रश्मि की मम्मी सुधा बोलीं, ‘‘बेटा, तेरे पापा ने तो हमारी बेटी की जिंदगी बरबाद कर दी है. 38 साल की उम्र में ही बूढ़ी लगने लगी है. मेरी बेटी महीने में लाख रुपए कमाती है. क्यों वह किसी आवारा के पीछे जिंदगी खराब करे?’’ रश्मि ने घर आ कर बहुत देर तक घर छोड़ने के फैसले के बारे में सोचा. उसे लगा कि अगर आज वह पाहुनी के आंसू से पिघल जाएगी तो कभी भी इस दलदल से बाहर नहीं निकल पाएगी.

सत्यकांत रातदिन झठ बोलता था. वह इतना झठ बोलता था कि उसे खुद याद नहीं रहता था. रात को सत्यकांत 11 बजे आया था. रश्मि ने सत्यकांत को अपने फैसले से अवगत करा दिया था. सत्यकांत ने बस इतना ही कहा, ‘‘सोचसमझ कर फैसला लेना. ऐसा न हो कि कुएं से खाई में गिर जाओ. तुम्हारे घर वाले तुम्हारे पैसों के कारण रातदिन मेरे खिलाफ कान भरते हैं, मगर एक बात याद रखना कि यह केवल तुम्हारी गलतफहमी है कि मेरे और पूजा के बीच कुछ है. रश्मि सत्यकांत के इन झठे वादों से तंग आ चुकी थी. उस ने अपना और पाहुनी का सामान पैक कर लिया था. उसे लग रहा था कि कम से कम अपने घर में वह तनावमुक्त तो रह पाएगी. जब रश्मि पाहुनी के साथ अपने घर पहुंची तो सब लोगों ने उस का खुलेदिल से स्वागत किया.

अपनी छोटी बहन अंशु और भाभी मंशा की मदद से वह अपने कपड़े और छोटेमोटे सामान कमरे में जमाने लगी. रश्मि ने देखा कि उस के कमरे में एक अलमारी पुरानी चादरों से अटी पड़ी है. ठंडी सांस भरते हुए रश्मि ने सोचा कि अभी भी घर का वह ही हाल है. सबकुछ अस्तव्यस्त. मंशा भाभी भी घर के रंग में ही रंग गई थीं. मंशा भाभी बोलीं, ‘‘अरे दीदी, आप इस के ऊपर अपने महंगे कभीकभार पहनने वाले कपड़े रख दो. जल्द ही मैं ये सामान हटवा दूंगी.’’ तभी अंशु बोली, ‘‘अरे, मेरे कमरे में एक अलमारी पूरी खाली है. आप के कपड़े वहां रख देते हैं.’’ रश्मि के सारे महंगे सूट और साडि़यां अंशु अपने कमरे में ले गई थी. रश्मि पाहुनी के साथ उस कमरे को अपना घर बनाने की कोशिश कर रही थी कि तभी रश्मि को बाहर शोर सुनाई दिया.

जब रश्मि बाहर निकली तो देखा कि अंशु उस की कांजीवरम सिल्क की साड़ी पहन कर मौडलिंग कर रही है. रश्मि को देख कर अंशु बोली, ‘‘दीदी, इस बार औफिस में ट्रैडिशनल डे पर ये ही पहनूंगी.’’ तभी भैया के छोटे बेटे भव्य से उस साड़ी के ऊपर पानी गिर गया. रश्मि को ऐसा लगा मानो साड़ी पर उकेरे हुए मोर को किसी ने जबरदस्ती नहला दिया हो. अंशु बोली, ‘‘सौरी दीदी, मैं इसे ड्राईक्लीन करवा दूंगी.’’ तभी रश्मि की मम्मी बोलीं, ‘‘अरे, मैं घर पर ही धो दूंगी.’’ रश्मि को अंदर ही अंदर झंझलाहट तो हुई मगर वह चुप ही रही. रात में जब रश्मि और पाहुनी डिनर के लिए बाहर आए तो डाइनिंग टेबल पर सजी क्रौकरी देख कर रश्मि की भूख ही मर गई थी. क्रौकरी का रंग पीला पड़ गया था और खाना भी बेहद बदमजा बना हुआ था. रश्मि ने देखा कि पाहुनी बस खाने से खेल रही थी.

रात में रश्मि पाहुनी से बहुत देर तक बात करती रही थी. फिर तकरीबन 10 बजे रश्मि उठ कर रसोई में गई. वह पाहुनी को दूध देना चाहती थी. फ्रिज खोल कर देखा तो एक गिलास ही दूध था. मम्मी रश्मि से बोलीं, ‘‘अरे रश्मि, तेरा भाई तो अकेला कमाने वाला है. अब तू आ गई है तो थोड़ा उसे भी चैन मिल जाएगा.’’ रश्मि मम्मी की बात सुन कर थोड़ी अचकचा गई थी, क्या सत्यकांत वास्तव में उस के परिवार के बारे में सही बोल रहा था? अगले दिन रश्मि सवेरे 5 बजे उठ कर नहा ली थी और अपने कपड़े भी धो कर डाल दिए थे. अब समस्या थी पाहुनी की, वह बिना दूध के आंख नहीं खोलती है. रश्मि ने फिर खुद अपने पैसों से 4 लिटर दूध खरीद लिया. पाहुनी को दूध देने के बाद जब वह तैयार होने लगी तो मम्मी बोलीं, ‘‘रश्मि, आज बहुत बरसों बाद गाढ़े दूध की चाय नसीब होगी.’’

रश्मि जब नाश्ता ले कर अंदर आई तो पाहुनी अभी भी रात के कपड़ों में ही बैठी थी. रश्मि ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम अब तक नहाई क्यों नहीं?’’ पाहुनी रोंआसी सी बोली, ‘‘कोई बाथरूम खाली नहीं है.’’ रश्मि ने प्यार से पाहुनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘चलो, फिर छुट्टी कर लेते हैं.’’ पाहुनी बिदकते हुए बोली, ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं.’’ फिर पाहुनी मुंहहाथ धो कर ही स्कूल के लिए तैयार हो गई थी. टिफिन में भी रश्मि बस ब्रैडजैम ही रख पाई थी. दफ्तर में रश्मि दिनभर सोचती रही थी कि वह क्या करे. पाहुनी को वह ऐसे नहीं देख सकती थी. वापसी में रश्मि ने पाहुनी की पसंद के स्नैक्स, ड्राईफ्रूट्स और भी न जाने कितना सामान ले लिया था.

मगर जब रश्मि घर पहुंची तो शर्म के कारण उस ने पूरा सामान मम्मी के हाथों में पकड़ा दिया था. मम्मी गर्व से बोलीं, ‘‘ऐसी बेटी क्या कभी मायके पर बोझ होती है?’’ भैया और भाभी के लिए रश्मि अब एक कमाई का जरिया थी. मम्मी संकेत में बहुत बार रश्मि को यह समझ चुकी थीं कि छोटी बहन अंशु की शादी उस की और भैया की संयुक्त जिम्मेदारी है. आज जैसे ही रश्मि औफिस से आई तो उस ने देखा कि अंशु उस का सिल्क का सूट लथेड़ते हुए आ रही है. रश्मि एकाएक चिल्ला कर बोली, ‘‘अंशु, किस से पूछ कर तुम यह सूट पहन कर गई थी?’’ अंशु खिसियाती हुई बोली, ‘‘दीदी, आज औफिस में पार्टी थी. मैं ड्राईक्लीन करवा दूंगी.’’ तभी मम्मी तपाक से बोलीं, ‘‘अरे, जब 38 साल की उम्र में तुम्हें ही इतना शौक है तो वह तो बस अभी 24 साल की है. इस घर में मेरा और तेरा नहीं होता.

यह हमारा घर है, रश्मि. अब इस घर की जिम्मेदारी भी तेरी है.’’ इसी तरह मन को समझते हुए, समझते करते हुए और घर की जिम्मेदारी उठाते हुए एक माह बीत गया था. रश्मि ने एकाध बार सत्यकांत से बात करने की कोशिश की, मगर सत्यकांत को शायद यह अरेंजमैंट पसंद आ गया था. जब रश्मि अपने बड़े भाई सुशांत के साथ वकील के यहां गई तो वकील ने कहा कि तुम्हारे पति के खिलाफ डोमैस्टिक वौयलैंस का केस कर सकते हैं, क्योंकि पैसे न कमाना, बाहर गर्लफ्रैंड होना, ऐसी बातों से कुछ नहीं होगा. रश्मि बोली, ‘‘वकील साहब, शादी को 12 साल हो गए हैं. अब भी डोमैस्टिक वौयलैंस का केस बन सकता है?’’ वकील बोला, ‘‘क्यों नहीं. एक ऐसा रामबाण है मेरे पास जो कभी खाली नहीं जाता है. बस, तुम्हें थोड़ी हिम्मत रखनी पड़ेगी.’’ फिर वकील ने जो बताया, उसे सुन कर रश्मि का दिल कांप गया. वकील के अनुसार, रश्मि बेटी पाहुनी के साथ वापस अपने घर जाए और जब सत्यकांत घर आए, उस की उपस्थिति में ही खुद को नुकसान पहुंचाए. तभी डोमैस्टिक वौयलैंस का पक्का केस बनेगा.

पूरा एक हफ्ता एलिमोनी की रकम तय करने में निकल गया था. मम्मी को एक करोड़ रुपए की रकम भी कम लग रही थी तो अंशु और मंशा भाभी 60 लाख रुपए में समझता करना चाहते थे. रश्मि थोड़ा ?िझकती हुई बोली, ‘‘भैया, क्या सत्यकांत से ऐसे पैसे लेना ठीक रहेगा?’’ मम्मी तपाक से बोलीं, ‘‘हमें उस बात से कोई मतलब नहीं है. तेरी जिंदगी बरबाद कर दी है उस ने. उन पैसों को तेरे भैया के बिजनैस में लगा देंगे, अंशु की शादी भी थोड़ी ठीक से हो जाएगी.’’ रश्मि रोज इसी उधेड़बुन में लगी रहती थी. क्या हिंदू शादी में सिंदूर की कीमत वाकई इतनी महंगी है? क्या अपने घर आ कर उसे कोई चैन मिला था? यहां पर भी सब को बस उस के पैसों से मतलब था. एक हफ्ता इसी कशमकश में बीत गया. पाहुनी रोज अपने मामा, मामी और बाकी घर वालों के मुंह से सत्यकांत को फंसाने के नएनए आइडियाज सुनती थी और अपने ही आप में सिमट जाती थी. रात में कभी भी उठ कर पाहुनी डर के कारण चिल्लाने लगी थी. पाहुनी अब रश्मि से खिंचीखिंची सी रहती थी. एक रात जब रश्मि ने पूछा तो पाहुनी गुस्से में बोली, ‘‘मम्मी, तुम गंदी हो.’’ रश्मि फिर उस रात के बाद से पाहुनी से नजर नहीं मिला पाई.

फिर 15 दिनों बाद सुशांत ही बोला, ‘‘रश्मि, पाहुनी को ले कर कब अपने घर जा रही हो. वकील साहब कह रहे हैं, जितना देर करोगी उतनी ही दिक्कत होगी.’’ रश्मि ने कहा, ‘‘भैया, कोई और उपाय नहीं है. पाहुनी बहुत डरी हुई है.’’ मंशा भाभी आंखें तरेरती हुई बोलीं, ‘‘और कोई उपाय होता तो आप के भैया थोड़े ही न आप से कहते और फिर ये पैसे हम सब के, आप के और पाहुनी के ही काम आएंगे.’’ रश्मि धीमे स्वर में बोली, ‘‘भाभी, आप ठीक कह रही हैं, मगर फिर भी मेरा मन नहीं मान रहा है.’’ मम्मी रुखाई से बोलीं, ‘‘तुम्हारे मन के कारण ही तुम आज यहां खड़ी हो.’’ उस रात बहुत देर तक रश्मि अपने कमरे में बिना लाइट जलाए बैठी रही, तभी मम्मी के मोबाइल की घंटी से रश्मि की तंद्रा टूटी. मम्मी किसी को अपने घुटने के औपरेशन का खर्चा बता रही थीं, ‘‘अरे, पूरे 6 लाख रुपए का खर्च है.

अगर सत्यकांत ने 15 लाख रुपए भी दिए तो भी मैं करा लूंगी. ‘‘रश्मि को धीरेधीरे सुशांत लौटा देगा, फिर कौन अपनी शादीशुदा बेटी को ऐसे सपोर्ट करता है जैसे हम कर रहे हैं. अंशु के लिए रिश्ता भी देख रहे हैं. अब तो रश्मि और सुशांत मिल कर सब देख लेंगे. ‘‘अब देखो, रश्मि के पास पाहुनी है. सो, उस की दूसरी शादी कैसे हो सकती है, हम लोगों के साथ रहेगी तो उस की जिंदगी भी कट जाएगी.’’ रश्मि को लगा जैसे पहले सत्यकांत उस के साथ छल कर रहा था और अब उस के खुद के घर वाले उस के टूटे रिश्ते पर अपनी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं. रात में जब रश्मि ने अपनी मम्मी को खिचड़ी दी तो संयत स्वर में कहा, ‘‘मम्मी, अगले हफ्ते तक मैं और पाहुनी अपने घर चले जाएंगे.’’ मम्मी ने खिले स्वर में कहा, ‘‘यह हुई न मेरी बेटी वाली बात.’’ शनिवार की शाम को रश्मि ने अपना सामान फिर पैक कर लिया था. सुशांत बोला, ‘‘चल, मैं तुझे छोड़ आता हूं.’’ रश्मि बोली, ‘‘भैया, यह सफर मेरा है तो रास्ता भी मुझे तय करने दीजिए.’’ रश्मि का औटो जब एक छोटे से मकान के आगे रुका तो पाहुनी बोली, ‘‘मम्मी, यह किस का घर है?’’ रश्मि बोली, ‘‘यह हमारा घर है. यहां की हर ईंट में बस प्यार और अपनापन होगा. घर क्या था एक छोटी सी बरसाती थी, साथ में अटैच्ड टौयलेट और रसोई भी थी. नीचे रश्मि की दोस्त निधि भी रहती थी और उस की बेटी ऊर्जा, पाहुनी की हमउम्र थी. निधि ने रश्मि की समस्या सुन कर उसे बहुत कम किराए पर यह बरसाती दिलवा दी थी.

सुरक्षा की दृष्टि से व हवाधूप के हिसाब से यह काफी अच्छा औप्शन था. रश्मि ने वकील को फोन लगाया और कहा, ‘‘वकील साहब, मुझे बिना किसी झठ के अपना केस लड़ना है. क्या आप लड़ पाएंगे?’’ वकील बोला, ‘‘क्यों नहीं, मगर समय लगेगा. और बस, वाजिब रकम ही मिल पाएगी.’’ रश्मि हंसती हुई बोली, ‘‘बस, वाजिब ही चाहिए.’’ नीचे से पाहुनी की खुल कर हंसने की आवाज आ रही थी. रश्मि को ऐसा लगा, जैसे बहुत दिनों बाद उस ने खुल कर हवा में सांस ली हो, जहां पर थोड़ी सी जमीं उस की है और थोड़ा सा आसमां भी उस का ही है. वह अपनी जमीं पर पांव रख कर अपने सपनों को अपने ही आसमां में बुनने के लिए तैयार है. नई जिंदगी के लिए अब शायद रश्मि तैयार थी.

Supreme Court : एनवायरमैंट और व्हीकल्स

Supreme Court : प्रदूषण फैलाने वाले कमर्शियल व्हीकल्स बौर्डरों से दिल्ली में घुसे ही नहीं कि इस के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बिना किसी और कानूनी अधिकार के कई वर्ष पहले एक स्पैशल टैक्स ठोंक दिया था. उस टैक्स को वसूलने का अधिकार म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन को दिया गया.

अब उस टैक्स को कई साल हो गए हैं पर फिर भी वह खत्म नहीं किया जा रहा. जिन कमर्शियल व्हीकल्स को दिल्ली में आना होता है वे इस, लगभग नाइंसाफी वाले, टैक्स को भर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट में आम कमर्शियल व्हीकल्स वाला तो जा नहीं सकता क्योंकि वहां वकीलों पर खर्च लाखों में होता है. यह भी पक्का नहीं मालूम कि अगर सुप्रीम कोर्ट अपने 2015 के इस निरर्थक फैसले को बदल भी दे तो सरकार अपनी ओर से कहीं कोई और टैक्स न ठोंक दे.

एनवायरमैंट कंपनसेशन चार्ज. इसी नाम से यह टैक्स दिल्ली के 153 एंट्री पौइंट्स पर वसूला जा रहा है और जो ठेकेदार इस टैक्स को वसूल रहा है वह वसूली का खर्च इस में से काटता है. कौर्पोरेशन को 800-900 करोड़ रुपए मिल रहे हैं और कहा जाता है कि इस टैक्स को क्लीयर करने में धांधली किए जाने के बाद भी यह रकम इतनी बड़ी बन गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में सोचा था कि इस टैक्स को लगाने से दिल्ली में वाहन आएंगे ही नहीं और दिल्ली वालों को राहत मिलेगी. वर्ष 2015 के बाद से अब तक 10 साल हो गए हैं. कौर्पोरेशन का खजाना जनता की पीठ पर छुरा रख कर भरा जा रहा है पर किसी भी सूरत में ऐसा नहीं लग रहा कि जिन वाहनों को दिल्ली में कुछ काम नहीं, वे दिल्ली से होते हुए न जा कर कहीं और से जाएंगे.

ऐतिहासिक तौर पर बड़ा शहर होने के कारण आसपास की सड़कें और उन के किनारे के शहर इस तरह बसे हैं कि सारी सड़कें दिल्ली में पहुंचती हैं. पूर्व से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण जाना हो तो चाहे कितना दावा किया जाए, अभी भी दिल्ली से होते हुए जाना व्हीकल्स के लिए आसान भी है और जरूरी भी.

सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं सोचा कि दिल्ली की भीड़भाड़ का सामना कोई कमर्शियल व्हीकल किसी भी हालत में नहीं करना चाहता. उस ने म्यूनिसिपल कौर्पोरेशन के हाथों लहरें गिनने का काम दे दिया और 10 साल हो गए, कभी यह परखने की कोशिश नहीं की कि क्या उस का यह फैसला केवल वसूली का जरिया बन जाएगा ?

Politics : राइटिज्म के पंजे में दुनिया

Politics : जब देशों में कट्टरवाद की लहरें उठनी शुरू होती हैं तो वे एक से दूसरे देश में कोराना वायरस की तरह फैलती हैं. एक समय बराबरी और सब को अवसर के नारों से डैमोक्रेसी ने अपना झंडा फहराया था पर मुसलिम देशों से शुरू हुआ धार्मिक कट्टरवाद अब अमीर, डैमोक्रेटिक देशों में फैल रहा है. इटली, आस्ट्रिया, जरमनी, पोलैंड, फ्रांस, अमेरिका अब एक अजीब से डैमोके्रसी विरोधी, विदेशी रंग के विरोधी दलों की गिरफ्त में आते जा रहे हैं.

समाजशास्त्री इस का चाहे जो विश्लेषण करें, यह बदलाव बेहद खतरनाक है और 200 सालों की जनचेतना व स्वतंत्रताओं के निगलने को तैयार बैठा है. अमेरिका इस का सिरमौर है. भारत पहले से ही शिकार हो चुका है. बंगलादेश में अति कट्टरवाद फैल रहा है. सब जगह नाजी खून के बुलबुले उठ रहे हैं कि हम श्रेष्ठ हैं. बाहरी लोग हमारे कल्चर और फैब्रिक को खराब कर रहे हैं.

जो हिंदूमुसलिम भारत में हो रहा है वह अमेरिका में गोरों, लेटिनों और कालों में हो रहा है, यूरोप में गोरों और मुसलिम शरणार्थियों में हो रहा है, पाकिस्तान में अफगानों को ले कर हो रहा है. इन सब देशों में पुलिस और सेना के अफसरों के चेहरों पर भारी मुसकान है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि अब असल ताकत उन के पास आने वाली है.

भारत में जो बुलडोजरी राज चल रहा है, वैसा ही अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप उन 14 लाख अवैध घुसपैठियों पर लागू करने की धमकी दे रहे हैं, वही आस्ट्रिया में फ्रीडम पार्टी कह रही है. वैसा ही कुछ इटली की जौर्जिया मैलोनी कह रही हैं जो ट्रंप और मोदी को इसीलिए पसंद करती हैं. रूस में पुतिन को कोई हिला नहीं पा रहा है. वे पूरे यूरोप पर सैनिक कब्जा करने का सपना पाले हुए हैं. और फार राइट कट्टरवादी पार्टियां उन से फिर भी कोई ज्यादा नाराज नहीं हैं.

यह राइटिस्ट, दक्षिणपंथी राजनीति न केवल इन देशों को महंगी पड़ेगी बल्कि यह आम लोगों के लिए कहर भी लाएगी. डैमोक्रेसी में जियो और जीने दो का सिद्धांत चलता है पर ये राइटिस्ट यह विश्वास करते हैं कि उन के हिसाब से जियो वरना जियो या न जियो. जो हम से अलग दिखता है, अलग धर्म का है, अलग बोली बोलता है, वह पराया है और उसे साथ रहने का हक नहीं है.

दुनिया ने जो सहयोग का माहौल बनाया था वह विवादों में बदल रहा है, कुछ देशों में अपने ही लोगों के गुटों में तो कहीं दूसरे देशों के साथ. रूस, यूक्रेन, इजराइल, फिलिस्तीन, तुर्किए, सीरिया ऐसे पटाखे हैं जो रोज फट रहे हैं. अब ये हर जगह फटते दिखने लगें, तो आश्चर्य नहीं क्योंकि राइटिस्ट केवल हिंसा, जिद, कट्टरता की भाषा समझते हैं.

दुनिया में फैली राइटिज्म की बीमारी कोविड की तरह की छूत की हो सकती है और जरमनी के 1940-1945 के दिनों को वापस ला सकती है. अब कल पर भरोसा थोड़ा कम हो गया है.

Central Government : हैल्थ पर टैक्स

Central Government : केंद्र सरकार के आर्थिक सर्वे ने बहुत सी मतलब की और बहुत सी बेमतलब की बातों में स्वास्थ्य सुधारने का दावा करने वाले हैल्थ फूड्स की बढ़ती बिक्री पर चिंता जाहिर की है और उन्हें कीमती कर के उन की खपत कम करने की सिफारिश की है. यह संभव है कि विज्ञापनों के बल पर इन हैल्थ फूड्स में बहुत सी चीनी, प्रिजर्वेटिव, अनावश्यक मैटल व कैमिकल डाले जा रहे हों पर उन्हें टैक्स लगा कर महंगा करना गलत होगा.

अगर ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं तो इन्हें प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए और इन को बनाने वालों से पूछताछ की जानी चाहिए. वहीं यह भी देखना चाहिए कि आखिर लोग क्यों कमजोरी महसूस करते हैं और क्यों एडवरटाइज किए गए हैल्थफूड लेते हैं? क्या इसलिए कि उन्हें इन का पर्याय नहीं मालूम?

हमारे देश में स्वास्थ्य के जोखिम तो गंदी हवा, गंदा पानी, गंदगीभरी सड़कें, गंदगी में लिपटा स्ट्रीट फूड, गंदे बरतनों में बनाया गया खाना है. हर शहर की हर सड़क पर 10-20 खोमचे खाना बेचते नजर आ जाएंगे और वह खाना कैसी गंदगी में बनता है और कैसे परोसा जाता है, यह साफ दिखता है.

हमारे यहां दूध देने वाली गाय-भैंसों को कैसे रखा जाता है, इस के लिए सर्वे की जरूरत नहीं है. मीट प्रोडक्ट्स को किस तरह हैंडल किया जाता है, यह साफ दिखता है. गंदे पानी से सब्जियां धोई जाती हैं, यह भी दिखता है और कीटाणु इन सब में अंदर तक चले जाते हैं, यह कोई बताने की बात नहीं.

हैल्थ फूड्स को बलि का बकरा सिर्फ टैक्स इकट्ठा करने के लिए बनाया जा रहा है. सरकार तो शराब, भांग पर भी टैक्स लेने से परहेज नहीं करती और देशभर की सरकारें इन्हें पिलाखिला कर खरबों रुपए कमा रही हैं.

हैल्थ फूड्स की बिक्री 13.7 फीसदी सालाना बढ़ रही है और घरों में 10-11 फीसदी का खर्च हैल्थ फूड्स पर हो रहा है. ये आंकड़े सिर्फ टैक्स जमा करने की बुरी नीयत से दिए जा रहे हैं.

अगर सरकार जागरूक होती तो दिल्ली चुनावों में यमुना के पानी को ले कर महासंग्राम न छिड़ता कि वह प्रदूषित ही नहीं, विषैला भी है. हमारी सारी नदियां गंदे पानी से भरी हैं और नलों में आने वाला पानी पीने लायक न हो, ऐसी साजिश सरकार ने कर रखी है ताकि बौटल वाले पानी का व्यापार जम कर हो. मीठे ड्रिंक भी इसीलिए बिकते हैं कि अच्छा पानी म्युनिसिपल कमेटियां कहीं भी उपलब्ध करा ही नहीं सकतीं.

हैल्थ फूड काम के हैं या नहीं, यह बहस अलग है. असली बात तो यह है कि इन पर टैक्स की बात क्यों की जाए? सरकार सेहत के नाम पर अपनी जेब क्यों भरे?

Delhi Transport Corporation : सीएजी और भाजपा सरकार

Delhi Transport Corporation : वर्ष 2012-13 में कंट्रोलर औडिटर जनरल (सीएजी) का औफिस सरकारी खातों की जांच की रिपोर्टों में अपने खास लोगों के पक्ष की बात करने में माहिर हो गया था जब तब के सीएजी विनोद राय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के विरुद्ध एक के बाद एक रिपोर्टें जारी की थीं. मनमोहन सरकार पर लाखोंकरोड़ों की बेईमानी के आरोप लगे थे और 2014 में हुई कांग्रेस की हार के पीछे एक यह भी बड़ा कारण था.

इन 12-13 सालों में एक भी मंत्री पूरी तरह, तब की औडिट रिपोर्टों के आधार पर, अपराधी साबित नहीं हो पाया है जबकि उन्हीं रिपोर्टों के चलते कितनों का राजनीतिक कैरियर बरबाद हो गया. हां, विनोद राय का कैरियर बन गया और वे भारतीय जनता पार्टी से राज्यसभा के सदस्य बन गए.

अब इसी सीएजी ने आरोप लगाया है कि पिछले 6 सालों में दिल्ली ट्रांसपोर्ट कौर्पोरेशन को 35,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है क्योंकि वर्ष 2009 से किराए नहीं बढ़ाए गए. औडिटर के औफिस को जनता की या सत्य की चिंता न 2013-14 में थी, न आज है. यह रिपोर्ट तब तैयार की गई थी जब भाजपा की जघन्य दुश्मन आम आदमी पार्टी की सरकार थी, लेकिन वह जारी अब की गई है.

सीएजी ने यह निर्णय कहीं नहीं लिया कि सस्ते किराए की वजह से दिल्ली चल रही है. जो लोग अपना वाहन नहीं खरीद सकते या जिन के घरों से मैट्रो बहुत दूर है या महंगी है वे डीटीसी पर पूरी तरह निर्भर हैं. औडिटर को सोशल प्रौफिट की बात भी खातों के नुकसान के साथ करनी चाहिए थी पर वह रिपोर्ट केंद्र सरकार को पसंद न आती. आज की केंद्र सरकार कोई मनमोहन सिंह सरकार थोड़ी है जो अपने नियुक्त अफसरों को पूरी स्वतंत्रता देती हो.

सस्ती बस सेवा एक तरह की रेवड़ी है जो अब नरेंद्र मोदी की पार्टी भी भरभर कर हर राज्य में दे रही है. डीटीसी का नुकसान अगर राज्य सरकार भर रही है तो हर्ज क्या है. रिपोर्ट के जो अंश प्रकाशित हुए हैं उन में औडिटर्स ने कहीं भी कर्मचारियों की चोरी, जैसे हाजिरी लगा कर ऐबसेंट होने, अफसरों की रूट डिसाइड करने की मनमानी, का जिक्र नहीं किया क्योंकि ऐसा करने से डीटीसी कर्मचारी भड़क जाते. औडिटर्स का काम अब शायद विरोधी पार्टी की सरकार की खामियां निकालना भर रह गया है. वे केंद्र की भाजपा सरकार के मंत्रालयों या भाजपा शासित राज्य सरकारों के बारे में कोई चुभने वाली रिपोर्ट नहीं निकालते.

अब दिल्ली में सरकार भाजपा की बन गई है. क्या 35,000 करोड़ रुपए का नुकसान भरने के लिए किराए में दोगुनीतीनगुनी वृद्धि करना उस के लिए संभव है? अब चुप्पी रहेगी क्योंकि रिपोर्ट मानने का मतलब है किराए को बढ़ाना जो भाजपा के लिए संभव नहीं है.

Relatioship Problem : पत्नी का शादी से पहले अफेयर था, अब मैं क्या करूं?

Relatioship Problem : मेरी शादी हुए अभी एक महीना ही हुआ है. एक दिन मोबाइल पर एक अननोन नंबर से मैसेज आया कि मेरी पत्नी का शादी से पहले अफेयर था. पत्नी से पूछा तो उस ने कुबूल कर लिया लेकिन कहती है कि मैं ने सब भूल कर आप से शादी की है. मैं अच्छी पत्नी बन कर रहूंगी. अब सिर्फ मुझ से प्यार करती है. तब से मैं बेचैन हूं. पत्नी को माफ कर दूं या सब भुला कर क्या पत्नी के साथ सुख से रहूं?

जवाब : आप के लिए यह स्थिति बहुत जटिल है, क्योंकि आप की पत्नी ने जो कुछ पहले किया, उस से आप को दर्द हुआ होगा. जब किसी को प्यार करते हैं तो उस के साथ सच्चाई और विश्वास भी जरूरी होता है.

आप की पत्नी ने जो कहा, उस से लगता है कि वह अपने पिछले गलत फैसलों से सीख चुकी है और अब वह अपनी शादी में अपना सबकुछ देने को तैयार है. आप को यह सोचने की जरूरत है कि क्या आप उस की माफी को अपने दिल से स्वीकार कर सकते हैं और अगर आप उसे माफ करते हैं तो क्या आप उस के साथ अपनी जिंदगी फिर से शुरू कर सकते हैं बिना पुरानी बातों को अपने दिमाग में लाए.

यह फैसला आप को अपने दिल की सुन कर लेना होगा. अगर आप को लगता है कि आप अपनी पत्नी को सच में प्यार करते हैं और उस की गलतियों को माफ कर के एक नई शुरुआत करना चाहते हैं तो आप उसे माफ कर दें. लेकिन अगर आप को लगता है कि ये बातें आप के दिल को पूरी तरह से सुकून नहीं दे सकतीं और आप उस पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं तो अपनेआप को इस रिश्ते से निकालना भी एक विकल्प हो सकता है.

आप को यह समझना होगा कि हर रिश्ते में समझ, भरोसा, और इज्जत सब से ज्यादा जरूरी है. अगर आप दोनों अपनी पुरानी बातें भूल कर एकसाथ आगे बढ़ना चाहते हैं तो आप को अपने दिल से यह फैसला लेना होगा. अगर आप किसी भी स्थिति में अपनेआप को खुश नहीं रख पा रहे तो अपने लिए सही फैसला लेना जरूरी है. आप अपनी फीलिंग्स पर ध्यान दें, पत्नी से भी खुल कर बात करें और सोचसमझ कर फैसला लें.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Short Trip करना चाहती हूं मगर मैं कैसे मैनेज करूं?

Short Trip : अब बच्चे भी बड़े हो चुके हैं. हसबैंड जब थे तब हम सब खूब घूमतेफिरते थे. बच्चे छोटे थे, तब भी ट्रिप प्लान करते, लाइफ एंजौय करते थे. लेकिन हसबैंड की डैथ के बाद लाइफ जैसे ठहर सी गई. बस, रूटीन लाइफ रह गई, सोचती हूं, क्यों न फिर से लाइफ एंजौय की जाए. ट्रिप पर बच्चों के साथ जाऊं लेकिन अकेले सब मैनेज करना मुश्किल लग रहा है. कैसे क्या करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा?

जवाब : यह जरूरी है कि आप अपनी जिंदगी में खुशी के लमहे दोबारा से ढूंढें, खासतौर पर जब पति के देहांत के बाद इतने साल गुजर चुके हैं. घूमने जाना, परिवार के साथ समय बिताना और नए एक्सपीरियंस लेना सभी के लिए जरूरी होते हैं. यह आप के लिए भी मुमकिन है.

आप के लिए कुछ सुझाव हैं. बच्चों के साथ बैठ कर प्लान बनाइए. सब से पहले आप अपने दोनों बच्चों के साथ बैठ कर डिस्कस कीजिए कि उन्हें कहां जाना पसंद होगा. अगर आप के बच्चे बड़े हैं तो उन की पसंद को समझ कर आप ट्रिप प्लान कर सकती हैं. आप उन से यह भी पूछ सकती हैं कि उन्हें किस टाइप की ट्रिप ज्यादा पसंद आएगी. क्या वे हिल स्टेशन पसंद करेंगे या कोई ऐतिहासिक जगह विजिट करना चाहेंगे.

आप एक या दो दिन का ट्रिप प्लान कर सकती हैं, जिसे आप अच्छे से और्गनाइज कर सकें. दिल्ली के आसपास काफी अच्छे हिल स्टेशंस हैं जो वीकैंड के लिए परफैक्ट हैं, जैसे नैनीताल, मसूरी, शिमला आदि.

आप को अपने ट्रिप का बजट भी ध्यान में रखना होगा. अगर आप छोटा ट्रिप प्लान कर रही हैं तो ट्रैवल एक्सपैंस और स्टे के लिए बजट सैट कर लीजिए. आप औनलाइन ट्रैवल एजेंसियों या बुकिंग वैबसाइट्स, जैसे मेक माई ट्रिप, अगोडा, ट्रिवागो पर बजट होटल्स और ट्रांसपोर्टेशन औप्शंस देख सकती हैं.

जब ट्रिप का डैस्टिनेशन डिसाइड हो जाए, तब आप रहने की जगह की बुकिंग कर सकती हैं. आजकल काफी अच्छे बजट होटल्स और रिजौर्ट्स होते हैं जो परिवार के लिए कंफर्टेबल होते हैं. अगर आप का बजट थोड़ा फ्लैक्सिबल हो तो आप एक अच्छा रिजौर्ट या गेस्टहाउस चूज कर सकती हैं.

ट्रिप के लिए एक छोटी सी लिस्ट बनाइए जिस में आप डिसाइड करें कि किस दिन आप किस जगह जाना चाहेंगी और किस टाइम पर कहां पर रुकना है. यदि आप हिल स्टेशन जा रही हैं तो आप को ट्रैकिंग, साइट सीइंग और लोकल फूड का एक्सपीरियंस लेना मजेदार होगा.

अगर आप अपने वाहन से जाने का प्लान कर रही हैं तो यह सुनिश्चित करें कि वाहन पूरी तरह से चैक हो. अगर आप ट्रेन या बस से जाना चाहती हैं तो टिकट पहले से बुक कर लीजिए ताकि कोई लास्ट मिनट की टैंशन न हो. पैकिंग करते वक्त मौसम के हिसाब से सामान रखें. अगर आप हिल स्टेशन जा रही हैं तो थोड़ा गरम कपड़े, शूज, और बेसिक टौयलेटरीज जरूर रखें.

ये सब प्लानिंग करने से आप को अपने ट्रिप का सफर आसान हो जाएगा. आप खुद भी फील करेंगी कि आप ने अपनी जिंदगी में एक नई शुरुआत की है और आप अपने बच्चों के साथ कुछ खूबसूरत पल बिता पाई हैं.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Online Hindi Story : शादी क्यों करें – क्या शकुंतला और कमलेश की शादी हुई?

Online Hindi Story : सालों से एकसाथ रहते थे कमलेश और शकुंतला. उन्होंने शादी भले न की थी मगर उन दोनों के बीच गजब की कैमिस्ट्री थी. अचानक एक दिन कमलेश ने शकुंतला के सामने विवाह का प्रस्ताव रख दिया.

रविवार का दिन था. शकुंतला और कमलेश डाइनिंग टेबल पर बैठ कर नाश्ता कर रहे थे.

‘‘शकुंतला, क्यों न हम शादी कर लें?’’  कमलेश ने कहा.

चौंक गई शकुंतला. आज 20 सालों से वह कमलेश के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही है. आज तक शादी की बात उस ने सोची नहीं, फिर आज ऐसा क्या हो गया? पहली बार कमलेश से जब वह मिली थी तो 32 साल की थी. कमलेश उस समय 40 का रहा होगा. परिस्थितियां कुछ ऐसी थीं कि दोनों अकेले थे.

‘‘क्यों, ऐसा क्या हुआ कि तुम शादी की सोचने लगे? पिछले 20 सालों से हम बगैर शादी किए रह रहे हैं और बहुत ही इत्मीनान से रह रहे हैं. कभी कोई समस्या नहीं आई. अगर आई भी तो हम ने मिलजुल कर उस का समाधान कर लिया. फिर आज ऐसी क्या बात हो गई?’’ कुछ देर सोचने के बाद शकुंतला ने कहा.

‘‘ऐसा है शकुंतला, दरअसल हमारी उम्र हो चुकी है. मैं 60 का हो गया और तुम 52 की. यह बात सही है कि हम बिना शादी किए भी बहुत मजे में बड़ी सम?ादारी और तालमेल के साथ जिंदगी जी रहे हैं पर मैं कानूनी दृष्टिकोण से सोच रहा हूं. अगर हम दोनों में से किसी को कुछ हो गया तो हमें कानूनन पतिपत्नी होने पर विधिक दृष्टि से लाभ होगा. बस, यही सोच कर मैं ऐसा कह रहा हूं. मुझ पर किसी प्रकार का शक न करो,’’ कमलेश ने कहा.

‘‘शक नहीं कर रही, कमलेश. तुम मेरे हमसफर रहे हो पिछले 20 सालों से और मैं गर्व के साथ कह सकती हूं कि तुम से ज्यादा प्यारा कोई नहीं मेरी जिंदगी में. बस, मैं यही सोच रही हूं कि जब सबकुछ सही चल रहा है तो क्यों न हम कुछ नया करने की सोचें. हम दोनों ने जो बीमा पौलिसी ली है उस में एकदूसरे को नौमिनी बनाया है. हमारे बैंक खातों में भी हम एकदूसरे के नौमिनी हैं. फिर और क्या आवश्यकता है ऐसा सोचने की पर तुम ने कुछ सोच कर ही ऐसा कहा होगा.

‘‘ऐसा करते हैं, 1-2 दिनों के बाद इस पर विचार करते हैं. पहले मुझे इस नए प्रस्ताव के बारे में सोच लेने दो,’’ शकुंतला ने कहा.

‘‘बिलकुल, आराम से सोच लो. जो भी होगा तुम्हारी सहमति से ही होगा,’’ कमलेश ने मुसकरा कर कहा.

फुरसत में बैठने पर शकुंतला सोचने लगी थी कि जब पहली बार वह कमलेश से मिली थी. दोनों अलगअलग कंपनियों में काम करते थे. कमलेश जिस कंपनी में काम करता था उस कंपनी से शकुंतला की कंपनी का व्यावसायिक संबंध था. इस नाते दोनों की अकसर मुलाकातें होती रहती थीं. पहले परिचय हुआ, फिर दोस्ती. शकुंतला की शादी बचपन में ही हो गई थी और पति से मिलने से पहले ही वह विधवा भी हो गई थी.

उन दिनों विधवा विवाह को सही निगाहों से नहीं देखा जाता था और यही कारण था कि उस का विवाह नहीं हो पाया था. आज भी विधवा विवाह कम ही होते हैं. कमलेश को न जाने क्यों विवाह संस्था में विश्वास नहीं था और शुरुआती दौर में उस ने शादी के लिए मना कर दिया था. बाद में जब 35 वर्ष से ऊपर का हो गया था तो रिश्ते आने भी बंद हो गए. थकहार कर घर वालों ने भी दबाव देना बंद कर दिया था और कमलेश अकेला रह गया.

दोनों की जिंदगी में कोई नहीं था. दोनों के विचार इतने मिलते थे और दोनों एकदूसरे के लिए इतना खयाल रखते थे कि दिल ही दिल में कब एकदूसरे के हो गए, पता ही नहीं चला. शकुंतला जिस किराए के फ्लैट में रहती थी उस का मालिक उसे बेचने वाला था और खरीदने वाले को खुद फ्लैट में रहना था. इसलिए शकुंतला को कहीं और फ्लैट की आवश्यकता थी. जब उस ने कमलेश को इस बारे में बताया तो उस ने कहा कि उस के पास 2 कमरों का फ्लैट है. वह चाहे तो एक कमरे में रह सकती है. हौल और किचन सा?ा प्रयोग किया जाएगा. थोड़ी झिझकी थी शकुंतला. अकेले परपुरुष के साथ रहना क्या ठीक रहेगा पर कमलेश ने आश्वस्त किया कि वह पूरी सुरक्षा और अधिकार के साथ उस के साथ रह सकती है तो वह मान गई थी.

एकदूसरे को दोनों पसंद तो करते ही थे, साथसाथ रहने से और भी नजदीकियां बढ़ गईं और शादीशुदा न होने के बावजूद पतिपत्नी की तरह ही दोनों रहने लगे. आसपास के लोग उन्हें पतिपत्नी के रूप में ही जानते थे. इस लिवइन रिलेशन से दोनों खुश थे. दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे. कभी किसी प्रकार की समस्या नहीं आई थी अभी तक.

और इतने सालों के बाद कमलेश ने शादी का प्रस्ताव रख दिया था. शकुंतला के मन में कई बातें उभरने लगीं. क्या इस से मेरा व्यक्तिगत जीवन प्रभावित नहीं होगा? क्या शादी करने के बाद हमारे संबंध वैसे ही रह पाएंगे जैसे अभी हैं? क्या शादी के लिए स्पष्ट रूप से नियम और शर्तें निर्धारित कर ली जाएं? शकुंतला का एक मन तो कह रहा था कि जिस प्रकार वे रह रहे हैं उसी प्रकार रहें. आखिर जब सबकुछ सही चल रहा है तो नए प्रयोग क्यों किए जाएं भला? पर दूसरा मन कह रहा था कि कमलेश के साथ वह इतने सालों से है और वह हमेशा दोनों के हित की बात ही करता था. कभी उस ने सिर्फ अपने स्वार्थ की बात नहीं की. इतने दिनों से वह उसी के फ्लैट में रह रही है. उस का व्यवहार हमेशा एक हितैषी सा रहा है. उस ने जो कहा है वह भी सही हो सकता है. उस से विस्तार से बात करने की आवश्यकता है. आखिर हम 20 सालों से रह रहे हैं और एकदूसरे के साथ खुशीखुशी रह रहे हैं. हम एकदूसरे के साथ खुल कर अपनी बात साझा भी कर सकते हैं.

इसी प्रकार 6-7 दिन बीत गए. इस बारे में न तो कमलेश ने कुछ कहा न शकुंतला ने. कमलेश के दिल की बात तो शकुंतला नहीं जानती थी पर वह हमेशा इस बात पर विचार करती थी. हो सकता है कि कमलेश भी इस बात पर विचार करता होगा पर उस ने दोबारा कभी इस विषय को नहीं उठाया. शायद वह शकुंतला पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाना चाहता था.

आज फिर दोनों की कंपनी में अवकाश का दिन था. आज शकुंतला ने डाइनिंग टेबल पर उस विषय को उठाया, ‘‘कमलेश, मैं ने तुम्हारे प्रस्ताव पर विचार किया पर मु?ो लगता है, हम जैसे हैं वैसे ही रहें. शादी का सर्टिफिकेट एक कागज का टुकड़ा ही तो होगा. बगैर सर्टिफिकेट के हम आदर्श जोड़े की तरह रह रहे हैं. मेरे विचार से शादी करने की कोई आवश्यकता नहीं है.’’

‘‘मैं हमारी स्थायी संपत्ति के बारे में सोच रहा था. मान लो मेरी मृत्यु हो जाए तो मेरे नजदीक दूर के रिश्तेदार इस फ्लैट पर दावा करेंगे. ऐसे में तुम्हें परेशानी होगी. इसी तरह की बातों को ध्यान में रख कर मैं अपने संबंध को एक कानूनी जामा पहनाना चाह रहा था,’’ कमलेश बोला.

‘‘कमलेश, तुम मेरा कितना खयाल रखते हो पर यह काम तो हम वसीयत बना कर भी कर सकते हैं. हम दोनों एकदूसरे के नाम वसीयत बना दें तो कोई तीसरा इस प्रकार का दावा नहीं कर पाएगा. हम क्यों शादी की अनावश्यक रस्म निभाएं?’’

‘‘देखो शकुंतला, शादी से कई कानूनी और सामाजिक हक मिल जाते हैं पतिपत्नी को. उदाहरण के लिए पत्नी पति की संपत्ति में बराबर हिस्सा पाने की हकदार होती है. साथ ही, पति की पैतृक संपत्ति पर भी पत्नी का अधिकार होता है और कोई भी पत्नी से इस अधिकार को छीन नहीं पाएगा. तुम जानती हो कि मेरी पैतृक संपत्ति काफी मूल्यवान है. कुदरत न करे यदि किसी कारण से हम अलगअलग रहने की योजना बना लें तो शादीशुदा होने की स्थिति में पत्नी को गुजाराभत्ता लेने का अधिकार होता है. फिर संयुक्त संपत्ति में भी पत्नी का अधिकार होता है. यह अधिकार लिवइन रिलेशन में उपलब्ध नहीं है.’’

‘‘मैं तुम्हारी सभी बातों से सहमत हूं, पर मुझे इस उम्र में जितनी संपत्ति की आवश्यकता है उतनी है मेरे पास और मुझे नहीं लगता इतने सालों के बाद हम अलग होंगे. इसलिए मेरी सलाह तो यही है कि अब शादी करने की कोई आवश्यकता नहीं है. हां, हम यह वादा करें एकदूसरे से कि जैसे अभी तक साथसाथ रहते आए हैं वैसे ही साथसाथ रहते रहें,’’ शकुंतला ने कहा.

‘‘चलो, यह भी सही है,’’ कमलेश ने अपनी सहमति दी.

Hindi Kahani : आकाश में मचान – आखिर क्यों नहीं उसने दूसरी शादी की ?

Hindi Kahani : भाभी ने रुपयों का बटुआ गायब कर के हमें दोराहे पर ला खड़ा किया. भाई के संरक्षण में धोखा मेरे पति को पच नहीं रहा था. पर भला हो संतोषजी का जिन्होंने न केवल हमें मुसीबत से उबार लिया, बल्कि अनजान संबंधों को रिश्ते का नाम भी दिया.

सबकुछ हंसीखुशी चल रहा था. लेकिन एक दिन डा. अनिल ने मेरे पति के गंभीर रोग के बारे में बताते हुए इन्हें शहर के किसी अच्छे डाक्टर को दिखाने की सलाह दी. मेरी सहूलियत के लिए उन्होंने किसी डाक्टर शेखर के नाम एक पत्र भी लिख कर दिया था.

बड़े भैया दिल्ली में रहते हैं. उन से फोन पर बात कर के पूछा तो कहने लगे, ‘‘अपना घर है, तुम ने पूछा है, इस का मतलब हम लोग गैर हो गए,’’ और न जाने कितना कुछ कहा था. इस के बाद ही हम लोगों ने दिल्ली जाने का कार्यक्रम बनाया. यद्यपि मैं जेठानीजी को सही रूप से पहचानती थी, पर ये तो कहते नहीं थकते थे कि दिल्ली वाली भाभी बिलकुल मां जैसी हैं, तुम तो बेवजह उन पर शक करती हो. फिर भी मैं अपनी तरफ से पूरी तरह तैयार हो कर आईर् थी कि जो भी कुछ होगा उस का सामना करूंगी.

हम दोनों लगभग 2 बजे दिन में दिल्ली पहुंच गए. स्टेशन से घर पहुंचने में कोई परेशानी नहीं हुई. नहाधो कर खाना खाने के बाद ये आराम करतेकरते सो गए और मैं बरतन, झाड़ू में व्यस्त हो गई. यद्यपि सफर की थकान से सिरदर्द हो रहा था, फिर भी रसोई में लग गई, ताकि भाभी को कुछ कहने का मौका न मिले.

शाम को 7 बजे अस्पताल जा कर चैकअप कराना है. यह बात मेरे दिमाग में घूम रही थी. मैं ने एक घंटा पहले ही जरूरी कागजों तथा डा. अनिल के लिखे पत्र को सहेज कर रख लिया था. चूंकि पहला दिन था और कनाट प्लेस जाना था, इसलिए एक घंटा पहले ही घर से निकली थी.

हमें डा. शेखर का क्लीनिक आसानी से मिल गया था. मैं ने दवाई का पुराना परचा और चिट्ठी पकड़ा दी, जिसे देख कर उन्होंने कहा था, ‘‘ ज्यादा चिंता की बात नहीं है. 15-20 दिनों के इलाज से देखेंगे, संभावना है, ठीक हो जाएंगे, वरना इन का औपरेशन करना पड़ेगा. परंतु डरने की कोई बात नहीं. सुबहशाम सैर करें और नियमित यहां से इलाज कराएं.’’

हम लोग उन की बातों से आश्वस्त हो कर पूछतेपूछते बसस्टौप तक आए. वहां से घर तक के लिए बस मिल गई थी.

एक दुकान से केक, बिस्कुट और कुछ फल खरीदे तथा घर के लिए चल दिए. मेरे हाथों में इतना सारा सामान देख कर जेठानीजी बोली थीं, ‘‘इस तरह फुजूलखर्ची मत करो, घर के घी से बने बेसन के लड्डू तो लाई हो, गुझियां भी हैं, फिर इन्हें खरीदने की जरूरत क्या…’’ उन की बात काटते हुए मैं ने कहा, ‘‘शहर के बच्चे हैं, घर में बनी मिठाई तो खाएंगे नहीं, इसलिए केक, बिस्कुट ले लिए हैं.’’

‘‘ठीक है’’, कह कर उन्होंने एक लंबी सांस भरी.

भैया औफिस से आ गए थे. हम लोगों को देख कर भैया और बच्चे खिल से गए. हम लोगों ने भैया के पैर छुए और बच्चों ने हम लोगों के. भाभी बैठेबैठे पालक काट रही थीं.

मैं बहुत थकान महसूस कर रही थी, थोड़ा आराम करना चाहती थी, पर तभी पता चला कि भाभी की तबीयत ठीक नहीं है. मैं ने भाभी से कहा, ‘‘आप आराम कर लीजिए, रसोई मैं बना लूंगी.’’

दूसरे दिन सुबह सूरज निकलने से पहले इन्हें सैर कराने ले गई. जैसा भैया ने बताया था, लेन पार करते ही पार्क दिखाई दिया. यहां यह देख कर बहुत अच्छा लगा कि इधरउधर घास पर लोग चहलकदमी कर रहे थे.

हम दोनों एक बैंच पर बैठे ही थे कि एक सज्जन ने इन्हें उठाया और बोले, ‘‘चलिए, उठिए, आप घूमने आए हैं या बैठने.’’ हम लोग उन के साथ थोड़ी देर तक घूमफिर कर वापस उसी बैंच पर आ कर बैठ गए. फिर हम लोगों ने एकदूसरे का परिचय लिया. उन्होंने अपना नाम संतोष बताया. उन की बेटी राधिका 9वीं कक्षा में पढ़ रही है तथा उन की पत्नी ने आत्महत्या की थी.

यह पूछने पर कि दूसरा विवाह क्यों नहीं किया. वे बोले, ‘‘दूसरे विवाह के लिए कोई उपयुक्त साथी नहीं मिला.’’ उन का दुख एक मौनदुख था, क्योंकि पत्नी की आत्महत्या से रिश्तेदार व अन्य लोग उन्हें शक की नजर से देखते थे. वे अपनेआप को अस्तित्वहीन सा समझ रहे थे. मेरे पति ने उन्हें समझाया, ‘‘देखिए संतोषजी, आप की बेटी ही आप की खुशी है. वही आप के अंधेरे जीवन में खुशी के दीप जलाएगी.’’

हम लोग घर वापस आए तो भाभी अभी अपने कमरे से बाहर नहीं निकली थीं. भैया उस समय मंजन कर रहे थे. मैं फौरन चाय बनाने रसोई में चली गई. चाय बनाने के बाद मैं उपमा बनाने की तैयारी करने लगी. बच्चे कह रहे थे, ‘‘चाची आ गईं और मम्मी का ब्लडप्रैशर बढ़ गया.’’

मैं उन की बातें सुन कर मुसकराई और भाभी का हालचाल लेने उन के कमरे में चली गई. भाभी उस समय पत्रिका पढ़ रही थीं. मुझे देखते ही थोड़ी संकुचित सी हो गई, बोलीं, ‘‘आओआओ, जरा शरीर भारी हो रहा है, डाक्टर ने आराम करने के लिए कहा है. बीपी बढ़ा है.’’

‘‘अरे भाभी, आप भी कैसा संकोच कर रही हैं, मैं हूं न, निश्चिंत रहिए’’, मैं ने शब्दों को भारी कर कहा, जैसे कह रही हूं, आप का ब्लडप्रैशर हमेशा बढ़ा रहे.

अब मैं थकती नहीं हूं. सबकुछ दिनचर्या में शामिल हो गया है. डा. शेखर के क्लीनिक जाना और लौटते समय सब्जी, फल, दूध, ब्रैड आदि लाना. उन सब में खर्च इलाज से भी ज्यादा हो रहा है. मुझे चिंता इस बात की है कि अब पैसे भी गिन कर ही बचे हैं और दवाखाने का बिल चुकाना बाकी है.

इन्हीं तनावों से घिरी होने के कारण आज मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था, क्योंकि कपड़े बदलते समय रुपयों का पुलिंदा वहीं कमरे में ही छूट गया था और जो छूट गया सो गया. बस, गलती यह  हुई कि चाय बनाने की जल्दी में वह रुपयों का पुलिंदा उठाना भूल गई. यद्यपि मुझे याद आया, मैं वह पुलिंदा लेने भागी, मेरे कपड़े तो वैसे ही पडे़ थे पर वह पुलिंदा नहीं था. मुझे काटो तो खून नहीं. मुझे ऐसा लगा जैसे मैं चक्कर खा कर गिर जाऊंगी. ये ड्राइंगरूम में बैठे टैलीविजन देख रहे थे, पर उस समय मैं ने इन से कुछ नहीं कहा.

टहलने के लिए जब बाहर निकले तो मुझे गुमसुम देख कर इन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है?’’ मैं चुप रही. कैसे कहूं. समझ में नहीं आ रहा था. मैं चक्कर खा कर गिरने ही वाली थी कि इन्होंने संभाल लिया और समझाने के लहजे से कहा, ‘‘देखो, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, घर में आराम करो, मैं घूमफिर कर आ जाऊंगा.’’

इस बात से इन्हें भी तो धक्का लगेगा, यह सोच कर मेरी आंखों में आंसू आ गए.

‘‘अरे, क्या हुआ, सचमुच तुम बहुत थक गई हो, मेरी देखभाल के साथ घर का सारा काम तुम्हें ही करना पड़ रहा है.’’

‘‘नहीं, यह बात नहीं है.’’

‘‘तो क्या बात है?’’

‘‘चलो, वहीं पार्क में बैठ कर बताती हूं.’’

फिर सारी बात मैं ने इन्हें बता दी. ये बोले, ‘‘चिंता मत करो, जो नहीं होना था वह हो गया. अब समस्या यह है कि आगे क्या करें और कैसे करें. भैया से उधार मांगने पर पूछेंगे कि तुम तैयारी से क्यों नहीं आए? यदि सही बात बताई तो बात का बतंगड़ बनेगा.’’

फिर ये चुप हो गए. गहरी चिंता की रेखाएं इन के चेहरे से साफ झलक रही थीं. मुझे धैर्य तो दिया पर स्वयं विचलित हो गए.

संतोषजी भी हर दिन की तरह चेहरे पर मुसकान लिए अपने समय पर आ गए. हम लोगों ने झिझकते हुए उन्हें अपनी समस्या बताई तथा मदद करने के लिए कहा.

वे कुछ देर खामोश सोचते रहे, फिर बोले, ‘‘मैं मदद करने को तैयार हूं, आप परदेसी हैं, इसलिए एकदम से भरोसा भी तो नहीं कर सकता. आप अपनी कोईर् चीज गिरवी रख दें. जब 3 माह बाद आप लोग यहां दोबारा दिखाने के लिए आएंगे, तब पैसे दे कर अपनी चीज ले जाना. हां, इन पैसों का मैं कोई ब्याज नहीं लूंगा.’’

मरता क्या न करता. हम लोग तैयार हो गए. मेरे गले में डेढ़ तोले की चेन थी, उसे दे कर रुपया उधार लेना तय हो गया.

संतोषजी अपने घर गए और 5 हजार रुपए ला कर इन की हथेली पर रख दिए. मैं ने उन का उपकार माना और सोने की चेन उन्हें दे दी.

इस घटना के बाद इन की आंखों में उदासीनता गहरा गई. मुझे भलाबुरा कहते, डांटते. मेरी इस लापरवाही के लिए आगबबूला होते तो शायद इन का मन हलका हो जाता, पर भाई के संरक्षण में यह धोखा इन्हें पच नहीं रहा था. संतोषजी दुनियादारी की बातें, रिश्तेनातों के खट्टेमीठे अनुभव सुनाते रहे, समझाते रहे पर इन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा.

घर जा कर मैं ने रात में इन को समझाया, ‘‘समझ लो चेन कहीं गिर गई या रुपयों का पुलिंदा ही कहीं बाहर गिर गया. इस तरह मन उदास करोगे तो इलाज ठीक से नहीं हो पाएगा. तनाव मत लो, बेकार अपनेआप को परेशान कर रहे हो. अब यह गलती मुझ से हुई है, मुझे ही भुगतना पड़ेगा.’’

कुछ दिन और बीत गए. संतोषजी उसी तरह मिलते, बातें करते, हंसतेहंसाते रहे. बातोंबातों में मैं ने उन्हें बताया कि कल डाक्टर ने एक्सरे लेने को कहा है. रिपोर्ट ठीक रही तो 5वें दिन छुट्टी कर देंगे. संतोषजी को अचानक जैसे कुछ याद आ गया, बोले, ‘‘आज से 5वें दिन तो मेरा जन्मदिन

है. जन्मदिन, भाभी, जन्मदिन.’’ उन का इस तरह चहकना मुझे बहुत अच्छा लगा.

‘‘उस दिन 16 तारीख है न, आप लोगों को मेरे घर भोजन करना पड़ेगा,’’ फिर गंभीरता से इन का हाथ अपने हाथ में ले कर बोले, ‘‘पत्नी की मृत्यु के बाद पहली बार मेरे मुंह से जन्मदिन की तारीख निकली है.’’

16 तारीख, यह जान कर मैं भी चौंक पड़ी, ‘‘अरे, उस दिन तो हमारी शादी की सालगिरह है.’’

‘‘अरे वाह, कितना अच्छा संयोग है. संतोषजी, उस दिन यदि रिपोर्ट अच्छी रही तो आप और आप की बेटी हमारे साथ बाहर किसी अच्छे रैस्टोरैंट में खाना खाएंगे,’’ हंसते हुए इन्होंने कहा.

‘‘मेरा मन कहता है कि आप की रिपोर्ट अच्छी ही आएगी, पर भोजन तो आप लोगों को मेरे घर पर ही करना पड़ेगा. इसी बहाने आप लोग हमारे घर तो आएंगे.’’

मैं ने इन की ओर देखा, तो ये बोले, ‘‘ठीक है’’, फिर बात तय हो गई. संतोषजी खिल उठे. अब तक की मुलाकातों से उन के प्रति एक अपनापन जाग उठा था. अच्छा संबंध बने तो मनुष्य अपने दुख भूलने लगता है. हम लोग भी खुश थे.

समय बीता. एक्सरे की रिपोर्ट के अनुसार हड्डी में पहले जितना झुकाव था, उस से अब कम था. डाक्टर का कहना था कि ऐसी ही प्रगति रही तो औपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी. नियमित व्यायाम और संतुलित भोजन जरूरी है. इन्हीं 2 उपायों से अपनेआप को ठीक से दुरुस्त करना होगा. मुझे अंदर ही अंदर बड़ी खुशी हुई. औपरेशन का बड़ा संकट जो टला था. डाक्टर ने दवाइयां लिख दी थीं, 3 माह बाद एक्सरे द्वारा जांच करानी पड़ेगी. डाक्टर का कहना था, हड्डी को झुकने से बचाना है. मैं ने बिल चुकाया और डाक्टर को धन्यवाद दिया.

कुछ दवाइयां खरीदीं और फिर वहीं एक नजदीकी दुकान से संतोषजी को जन्मदिन का उपहार देने के लिए कुरतापाजामा और मिठाई का डब्बा खरीदा. फिर हमेशा की तरह सब्जी वगैरह ले कर हम घर आ गए.

इन्होंने भाभी से रिपोर्ट के बारे में बताया और कल सुबह लौटने की बात कही. भाभी पहले तो तटस्थ बैठी थीं, फिर चौंक कर बोलीं, ‘‘अरे, चले जाना, 2-4 दिन और रह लो’’, फिर अफसोस जाहिर करती हुई बोलीं, ‘‘इस बार तो सब तुम्हें ही करना पड़ा. तुम न होतीं तो पता नहीं कैसे चलता. ऐसे समय नौकरानी भी छुट्टी ले कर चली गई. कहते हैं न, मुसीबत चौतरफा आती है.’’

‘‘अरे भाभी, किया तो क्या हुआ, अपने ही घर में किया’’, मेरी आवाज में कुछ चिढ़ने का लहजा आ गया था.

शाम को हम लोग संतोषजी के घर गए. साफसुथरा, सजा हुआ प्यारा सा घर. फिल्मी हीरोइन जैसी सुंदर बेटी राधिका. देखते ही उस ने हाथ जोड़ कर हम लोगों से नमस्ते किया.

मैं ने तो उसे अपने गले से लगा लिया और एक चुंबन उस के माथे पर जड़ दिया. इन्होंने उस के सिर पर हाथ फिराते हुए आशीर्वाद दिया.

मैं अपनी नजरों को चारों ओर दौड़ा रही थी, तभी संतोषजी की आवाज गूंज उठी और सब ने एकदूसरे को बधाइयां दीं. मैं ने मिठाई का डब्बा राधिका के हाथ में और कुरतापाजामा का पैकेट संतोषजी के हाथ में थमा दिया.

भोजन टेबल पर लगा था. हंसते, मजाक करते हम लोग भोजन का आनंद ले रहे थे. हर चीज स्वादिष्ठ बनी थी. हम लोग सारी औपचारिकताएं भूल कर आप से तुम पर आ गए थे.

संतोषजी कह रहे थे कि 3 माह बाद जब दोबारा आना, तब यहीं ठहरना. देखो भाई, संकोच मत करना. और एक पैकेट हमारे हाथ में थमा दिया.

‘‘जरूरजरूर आएंगे. आप के रुपए देने तो जरूर आएंगे. कोशिश करेंगे, अगली बार ही रुपए वापस कर दें, और यदि नहीं हुआ तो क्षमा करना, भाई,’’ इन्होंने बड़े प्रेम से कहा तो संतोषजी ने इन के हाथों को अपने हाथों में ले लिया और बोले, ‘‘कैसी बातें करते हैं. दोस्ती की है तो इसे निभाऊंगा भी, चाहो तो आजमा के देख लेना.’’

तब तक मैं ने पैकेट खोल लिया था. एक सुनहरी डब्बी में मेरी वाली सोने की चेन रखी थी. एक पल आंख मुंदी और सारी स्थिति समझ में आ गई.

मेरी आंखों में आंसू आ गए. कितने महान हैं वे – संकट से उबारा भी और रिश्ते के बंधन में भी बांधा. मैं उन के चरणों में झुकी ही थी कि उन्होंने मुझे बीच में ही रोक लिया और बोले, ‘‘नहीं बहन, नहीं’’, संतोषजी की आंखें सजल हो गईं. उन के मुंह से आगे कुछ न निकल सका.

राधिका अपने पापा से लिपट गई. ‘‘पापा, आप कितने अच्छे हैं.’’ फिर हम लोगों के पास आ कर वह खड़ी हो गई. ऐसा लगा जैसे समुद्र के तट पर फैले बैंगनी रंग ने जीवन के आकाश में मचान बना दी हो.

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