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Hindi Story : टूटी चप्पल – शादी में क्या हुआ अंजलि के साथ

Hindi Story : खूबसूरत जौर्जेट की हलके वर्क की यलो साड़ी पर मैं ने मैचिंग ऐक्सैसरीज पहन खुद को आईने में देख गर्वीली मुसकान छोड़ी. फिर बालों से निकली लट को हलके से घुमाते हुए मन ही मन सब के चेहरे शिखा, नेहा, रूपा, आशा, अंजलि, प्रिया, लीना याद किए कि आज तो सब की सब जल मरेंगी.

मन ही मन सुकून, गर्व और संतुष्टि की सांस लेते हुए मैं आखिरी लुक ले रही थी कि तभी आवाज आई, ‘‘ओ ऐश्वर्या राय, अब बख्शो इस आईने को और चलो. हम रिसैप्शन में ही जा रहे हैं किसी फैशन परेड में नहीं.’’

‘‘उफ्फ,’’ गुस्से से मेरी मुट्ठियां भिंच गईं कि जरा सा सजनासंवरना नहीं सुहाता इन्हें. मेरे चुप रहने का तो सवाल ही नहीं था अत: बोली, ‘‘रिसैप्शन में भी जाएंगे तो ढंग से ही तो जाएंगे न… आप के जैसे फटीचरों की तरह तो नहीं… समाज में सहेलियों में इज्जत है मेरी… समझे?’’

इन्होंने भी क्यों चुप रहना था. अत: बोले, ‘‘इज्जत मेरी वजह से है तुम्हारे मेकअप की वजह से नहीं. कमाता हूं… 4 पैसे लाता हूं… समाज में 2 पैसे लगाता हूं, तो तुम्हारी इज्जत बढ़ती है… आई बड़ी इज्जत वाली.’’

मैं ने पलटवार किया, ‘‘हां तो यही समझ लो. आप की, अपने घर की इज्जत बनाए रखने, स्टेटस बचाए रखने के लिए ही तो तैयार हो कर जाती हूं.’’

‘‘तुम्हारे इस तरह बननेसंवरने के चक्कर में रिसैप्शन की पार्टी खत्म न हो जाए.’’

मैं भी तुनक कर बोली, ‘‘जब देखो तब जल्दीजल्दी… खुद को करना क्या पड़ता है… बस शर्ट डाली, पैंट चढ़ाई और हो गए तैयार… सिर पर इतने बाल भी नहीं हैं, जो उन्हीं को सैट करने में टाइम लगे.’’

ये चिढ़ गए. बोले, ‘‘तुम से तो बात करना ही बेकार है. चलना है तो चलो वरना रहने दो… ऐसे मूड में जाने से तो अच्छा है न ही जाएं.’’

मैं डर गई कि अगर नहीं गए तो सहेलियों के उतरे, जले मुंह कैसे देखूंगी. अपनी शान कैसे मारूंगी, ‘‘नहींनहीं, चलना तो है ही,’’ मैं ने फटाफट चप्पलें पहनते हुए कहा.

रिसैप्शन लौन के बाहर ही रूपा मिल गई. बोली, ‘‘हाय रिया, आ

गई? मुझे तो लगा कहीं मैं ही तो लेट नहीं हो गई. पर अच्छा हुआ तू मिल गई… और सब आ गए?’’

मैं हंस दी, ‘‘अरे, मुझे क्या पता आए कि नहीं. मैं तो अभी तेरे सामने ही आई हूं.’’

वह मुसकराई पर कुछ बोली नहीं. इधरउधर नजरें घुमाते हुए उस ने मुझ पर तिरछी नजर डाली.

मैं मन ही मन इतराई, ‘‘देख ले बेटा, अच्छे से देख और जल… जल रही है तभी तो कुछ बोल नहीं रही और बोले भी तो क्या. अब यहीं खड़ी रहेगी या अंदर भी चलेगी. चल जरा देखें अंदर कौनकौन आया है.’’

‘‘हांहां चल.’’

हम गेट पर स्वागत के लिए खड़े मेजबानों का अभिवादन स्वीकार कर अंदर गए. मंच पर सजेधजे खड़े दूल्हादुलहन को लिफाफा दिया. फिर चले खानेपीने के स्टाल की तरफ. वहां सब दिखीं. देखते ही सब हमारे पास लपकी आईं. ये अपने दोस्तों में बिजी हो गए और मैं अपनी सहेलियों में.

शिखा देखते ही बोली, ‘‘हाय. नीलम सैट तो बड़ा प्यारा लग रहा है. असली है?’’

मैं दर्प से बोली, ‘‘अरे, और नहीं तो क्या? तुझे तो पता ही है नकली चीज मुझे पसंद ही नहीं.’’

आशा ने व्यंग्य किया, ‘‘तो इस साड़ी पर वर्क भी असली है क्या?’’

मैं ने भी करारा जवाब दिया, ‘‘नहीं पर जौर्जेट असली है.’’

नेहा ने चूडि़यों पर हाथ घुमाया, ‘‘ये बड़ी प्यारी लग रही हैं. ये भी असली हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘पूरे क्वढाई लाख की हैं. अब तू ही सोच ले असली हैं या नकली.’’

निशी बोली, ‘‘अरे, अभी मेरी मौसी ने ली हैं. पूरे क्व4 लाख की हीरे की चूडि़यां… इतनी खूबसूरत डिजाइन है कि बस देखो तो देखते ही रह जाओ.’’

मैं ने अपनी चिढ़ दबाई, ‘‘पर हीरे की चूडि़यों में वह बात नहीं जो इस महीन नक्काशी में होती है. फिर आजकल हीरा पहनो तो पता ही नहीं चलता कि असली है या नकली. बाजार में डायमंड के ऐसेऐसे आर्टिफिशियल सैट्स मिल रहे हैं कि खराखोटा सब एक जैसे दिखते हैं. इसीलिए मैं तो डायमंड की ज्वैलरी लेती ही नहीं.’’

लीना बोली, ‘‘पर जो भी हो डायमंड तो डायमंड ही है. भले किसी को पता चले न चले पर खुद को तो सैटिस्फैक्शन रहती ही है कि अपने पास हीरा है.’’

मैं ने मुंह बनाया, ‘‘हुंह ऐसे हीरे का क्या फायदा जिस का बस खुद को ही पता हो. अरे चीज की असली कीमत तो तब वसूल होती है जब 4 लोग सराहें वरना क्या… खुद ही लाए, खुद ही पहना, खुद ही देखा और लौकर में रख दिया.’’

अंजली ने नेहा को देखा, ‘‘हां, सही तो है. चीज खरीदने का मजा तो

तभी है जब 4 लोग उसे देखें वरना क्या मतलब चीज लेने का… अब अगर आज रिया ये सब नहीं पहनती तो हमें क्या पता चलता इस के पास हैं कि नहीं.’’

नेहा बोली, ‘‘छोड़ो न, चलो देखते हैं खानेपीने में क्या है. सोनेहीरे की बातों से तो पेट नहीं भरेगा न.’’

‘‘हांहां चलो. देखें क्याक्या है,’’ कहती हुई सब की सब स्टाल की तरफ लपकीं. तभी किसी का पैर मेरी चप्पल पर पड़ा. चप्पल खिंची तो पटा टूट गया. अब चलूं कैसे? मैं रोंआसी हो गई कि अब तो इन सब को मजा आ जाएगा. उफ, क्या करूं कैसे इन की नजरों से बचाऊं. फिर सोचा यहीं खड़ी रहूं. पर तभी शिखा ने मुझे खींचा, ‘‘चल न खड़ी क्यों है?’’

मैं चलने लगी पर लंगड़ा गई, ‘‘कुछ नहीं, कुछ नहीं,’’ कह कर मैं थोड़ा और आगे बढ़ी पर फिर लंगड़ा गई.

अब सभी मुझे घेर कर खड़ी हो गईं, ‘‘अरे, क्या हुआ? कैसे हुआ? क्या टूटा? पैर में लगी क्या? चक्कर आया क्या?’’

अब उन्हें क्या बताती कि मेरी चप्पल टूट गई. बड़ी अजीब सी हालत हो गई.

शिखा बोली, ‘‘चप्पलें असली नहीं थीं क्या? ऐसे कैसे टूट गई?’’

मैं झल्ला कर बोली, ‘‘सोना नहीं मढ़वाया था इन में… चमड़े का ही सोल था निकल गया.’’

शिखा ने मंचूरियन मुंह में डाला, ‘‘अरे चिढ़ मत, मैं ने तो इसलिए पूछा कि तू कभी कोई चीज नकली पहनती जो नहीं.’’

अंजली ने हंसते हुए उस के हाथ पर ताली मारी, ‘‘अब तू एक काम कर, चप्पल कहीं कोने में उतार दे और ऐसे ही घूमफिर. कौन देखने वाला है कि तू ने पैर में चप्पलें पहनी हैं या नहीं.’’

सब हंसने लगीं. इच्छा तो हुई कि इन जलकुकडि़यों के मुंह पर 1-1 जमा दूं, पर मनमसोस कर रह गई.

अब न खाने में मन था न रिसैप्शन में रुकने का. मैं इन्हें ढूंढ़ने लगी. मोबाइल कर इन्हें बुलाया. ये आए.

इन्हें एक तरफ ले जा कर मैं ऐसे फटी जैसे बादल, ‘‘देखा… देखा आप ने… आप के जल्दीजल्दी के चक्कर में मेरी कितनी बेइज्जती हो गई… जरा 2 मिनट और मुझे ढंग से देख लेने देते तो जरा अच्छी चप्पलें निकाल कर पहन लेती. पर नहीं, मेरी इज्जत का जनाजा निकले तो आप को तो मजा ही आएगा न… अब हो लो खुश… करो ऐंजौय मेरी बेइज्जती को.’’

इन्होंने देखा. चप्पल को मेरे पैर सहित रूमाल से बांधा तो मैं थोड़ा चलने लायक हुई. पर अब वहां रुकने का तो सवाल ही नहीं था. मैं ने इन की बांह पकड़ी और घर की राह ली. पर सहेलियों की हंसती, व्यंग्य करती खिलखिलाहट मेरा पीछा कर रही थी.

मैं इन पर बरस रही थी, ‘‘घर से निकलते समय टोकना या झगड़ा करना आप की हमेशा की आदत है. इसी वजह से आज मेरी इतनी बेइज्जती हुई. जरा शांति से काम लेते तो मैं भी ढंग की चप्पलें पहन लेती.’’

मेरी आंखें बरस रही थीं, ‘‘अब अगली बार इन सहेलियों को क्या मुंह दिखाऊंगी और दिखाऊंगी तो मुंहतोड़ जवाब देना भी जरूरी है. मगर यह तभी संभव होगा जब ढाईतीन हजार की चप्पलें मेरे पैरों में आएंगी. समझे?’’

इन का जवाब सुने बिना मैं ने जोर से दरवाजा बंद किया और सोचने लगी, ‘कल ही सब से महंगे शोरूम में जा कर चप्पलें खरीदूंगी, पर इन लोगों को कैसे बताऊंगी, यह सोचविचार भी जारी है…’

Love Story : फौजी का प्यार

Love Story : मैं नहीं जानता कि यह मन की प्रवंचना थी. पर रज्जो इसे प्रवंचना ही कहती है. प्रवंचना का दूसरा नाम छिपाव है.’आप ने मुझे ब्याह से पहले अपने बारे में क्यों कुछ नहीं बताया? मुझे यह बताया गया था कि आप दिल्ली में स्टोर में हैं. मैं ने सोचा था, चलो, हम सारी उम्र दिल्ली में रहेंगे. मुझे नहीं पता था कि आप फौजी हैं और आप की बदली होती रहती है.’

‘‘मैं तुम्हें बताना चाहता था. पर मन के भीतर डर था कि फौजी जान कर तुम मना न कर दो. यह डर हर फौजी के मन में है. अस्थिर जीवन की वजह से अच्छी लड़कियां उन्हें पसंद नहीं करती हैं. तुम सुंदर और अच्छी लड़की हो. समझदार हो. तुम मेरी बात जल्दी समझ जाओगी. जल्दी समझ सकती हो.

“मैं मानता हूं कि मैं फौज में हूं, लेकिन लड़ाकू फौज में नहीं हूं. मुझे हैंड टू हैंड लड़ना नहीं पड़ता है. मैं स्टोर में रहूंगा. लड़ाई होगी तो भी स्टोर में रह कर काम करूंगा. लड़ने वाले जवानों को सामान देता रहूंगा.’’‘बस डर यही है कि फौजी बेमौत मारे जाते हैं.’

‘‘यह तुम्हारा वहम है. जिस की आई होती है, उसी की मौत होती है. क्या सिविल में लोग नहीं मरते हैं? दूसरी बात यह है कि मैं तम्हें यहां घर में रहने नहीं दूंगा. जब तक मैं छुट्ठी पर हूं, हम यहां रहेंगे. मैं ने क्वार्टर के लिए लिखा है. उम्मीद है कि छुट्टी खत्म होने से पहले ही क्वार्टर मिल जाएगा.’’‘उस के लिए पहले से ही टिकट बुक करवानी होेगी. पैसे हैं आप के पास, नहीं तो मैं बैंक से निकलवा लेती हूं.’

‘‘नहीं, उस की जरूरत नहीं है. क्वार्टर अलौटमेंट लैटर के साथ तुम्हारे लिए फ्री रेलवे वारंट आएगा. मेरा वापस जाने का फ्री वारंट है ही. हमारी रिजर्वेशन मिलिटरी कोटे से होगी. रेलवे स्टेशन के एक नंबर प्लेटफार्म पर एमसीओ औफिस है यानी मूवमेंट कंट्रोल औफिस. वह हमारी रिजर्वेशन करेगा. कोई बात नहीं. वारंट आने दो, मैं सब कर लूंगा.’’‘सच, हमारा कोई पैसा नहीं लगेगा?’

‘‘ नहीं. बिलकुल नहीं लगेगा. यही नहीं, जो 2 रूम सेट का क्वार्टर मिलेगा, उस में भी कोई किराया नहीं लगेगा. बिजलीपानी भी फ्री होगी.’’‘अच्छा, यह तो बहुत ही अच्छा है.’‘‘तुम चलो तो सही. और भी बहुत सारी सुविधाएं मिलेंगी वहां पर.‘अच्छाजी, मेरी एक बात मानेंगे?’ रज्जो ने बड़े प्यार से कहा. सारा प्यार उस की खूबसूरत आंखों में उतर आया था.

‘‘कहो,’’ मैं ने भी उसी मूड में जवाब दिया.‘आज हम यहीं मम्मीपापा के पास रह जाएं?’‘‘अच्छा, मैं भाई को फोन कर देता हूं. तुम्हें भी मेरी एक बात माननी पड़ेगी.’’‘क्या?’‘‘कान इधर करो, कान में कहूंगा. प्राइवेट है.’’मैं ने कान में जोकुछ कहा, उस का चेहरा लाल हो गया था. मैं ने कहा, ‘‘हूं?’’उस ने सिर झुका कर ‘हां’ में सिर हिला दिया था. मैं ने खुश हो कर कहा, ‘‘चलो, इसी बात पर कंपनी बाग में जा कर टिक्कियां खाते हैं.’’

‘ठीक है, साथ में शन्नो और पिंकी को साथ ले लें? वे भी खुश हो जाएंगी.’’‘‘ले लेते हैं.’’शन्नो रज्जो की सहेली थी, जिस ने मेरा रिश्ता करवाया था. पिंकी रज्जो की छोटी बहन थी. टिक्कियां खा कर हम लौटे तो रात के 10 बजने वाले थे. मम्मीपापा जल्दी खाना खा कर सो जाते थे.

शन्नो पिंकी के कमरे जा कर सो गई. रात को रज्जो ने अपना वादा निभाया. रातभर हम स्वर्ग में डूबते, उतरते रहे. प्यार करते रहे. पता ही नहीं चला कि कब सुबह के 4 बज गए. तब सोए. जीवन का यह सुख असीम था. सुबह उठने में देर हो गई.

रज्जो नहाधो कर जब बाहर निकली जो बहुत ही खिलीखिली थी. शरीर और मन से तृप्त थी. तृप्ति के बाद इतना सुख मिलता है, पहली बार अनुभव किया. मैं भी काफी खुश था.

इतने में बाहर से किसी ने मुझे पुकारा. देखा, डाकिया था. मैं ने लिफाफा ले कर खोला तो रज्जो का रेलवे वारंट था. साथ ही, एक लैटर भी था, जिस में सूचना थी कि मुझे बी-50/3 क्वार्टर अलौट किया गया है.रज्जो ने पूछा, ‘क्या लिखा है?’

उस ने पढ़ा और मुझे तुरंत कमरे में ले गई और एक लंबा आलिंगन लिया. वह चुम्बन लेना चाहती थी, लेकिन किसी के आने के डर से मैं ने रोक दिया. मेरा पूरा शरीर सिहर उठा था.मैं ने पुचकार कर कहा कि मैं रेलवे स्टेशन रिजर्वेशन के लिए जा रहा हूं.‘नाश्ता तो करते जाओ,’ रज्जो ने कहा.‘‘ठीक है, जल्दी से दे दो.’’दूसरी क्लास की एसी में बर्थ रिजर्वेशन हो गई थी. एक सप्ताह पहले जाने की रिजर्वेशन करवाई गई थी. हमें वहां सैटल होने में मदद मिलेगी. मां और भाई को अच्छा नहीं लगा. मां ने कहा, ‘घर का खर्चा कैसे चलेगा.’

‘‘मैं आप का अकेला बेटा नहीं हूं. मैं ने अपना दिमाग इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. मेरा ब्याह हो चुका है. मेरी पत्नी मेरे साथ जाएगी, साथ रहेगी.”मैं रज्जो के यहां से आई पेटियों को ताला लगाने लगा, तो भाई ने कहा, ‘तुम्हारा और रज्जो का काई सामान यहां नहीं रहेगा.’

“मैं आप से ऐसे ही जवाब की आशा कर रहा था. क्यों मां, आप का भी यही जवाब है?” मैं ने भाई और मां दोनों से कहा. पर वे दोनों चुप रहे.मुझे समझने में देर नहीं लगी. वैसे भी बहन और उस का पति सबकुछ लूट कर ले गए थे. मैं ने शन्नो से बात की. उस का भाई रेलवे में था. थोड़ी देर बाद शन्नो के भाई का फोन आया, ‘जीजू, आप कौन सी गाड़ी से दिल्ली जा रहे हैं?’

‘‘कल रात की फ्रंटियर मेल से.’’‘ठीक है जीजू, कल मैं अपने साथ कारपेंटर ले कर आ रहा हूं. वह सारा सामान पैक कर देगा. फ्रंटियर मेल ट्रेन की पारसल वैन में सामान चढ़़ा भी दिया जाएगा.’

‘‘थैंक्स राजू. मेरी सारी चिंता दूर हो गई.’’मेरे मामूजी के लड़के हमारी यूनिट में ही डिप्टी कमांडैंट थे, कर्नल दीपक साहब. मैं ने उन से बात की. सारी स्थिति बताई. उन्होंने कहा, ‘अच्छा हुआ, मांबहन, भाइयों के प्रति तुम्हारा मोह भंग हो गया. मैं ने तुम्हें समझाया भी था. तुम ने बेकार 12 साल घर में पैसा दिया. खैर, देर आए, दुरुस्त आए. तुम चिंता मत करो. मैं गाड़ी और 4 मजदूर समय पर भेज दूंगा. मैं ने तुम्हारे क्वार्टर को डिस्टैंपर करवा कर साफ करवा दिया है.’

‘‘थैक्स, सर.’’‘थैंक्स नहीं, भाई हूं तुम्हारा. बड़े दिनों बाद हम एक ही यूनिट में पोस्ट हुए हैं. कुछ मत सोचो. बस आ जाओ, सारे इंतजाम हो जाएंगे.’‘‘ठीक है, भाई साहब.’’मेरी सारी चिंताएं दूर हो चुकी थीं. राजू ने कारपेंटर भेज कर सारा सामान पैक करवा दिया था. गाड़ी चलने के 2 घंटे पहले स्टेशन पर बुलाया गया था. सामान की बुकिंग आराम से हो गई. मेरे और रज्जो के वारंट पर जितने किलो वेट लिखा था, सामान उस से कम निकला. राजू ने सामान पार्सल बोगी में चढ़ाने के लिए वहां के मजदूरों से पहले ही सैटिंग कर ली थी. फौजी था, वे रम की बोतल मुझ से चाहते थे. रम मैं हमेशा अपने पास रखता था. बोतल राजू को दे दी. उस ने कहा, ‘जीजू, आप चलें. गाड़ी प्लेटफार्म पर लग चुकी है. मैं सामान चढ़वा कर आता हूं.’

मैं प्लेटफार्म पर आया तो रज्जो, उस के मम्मीपापा, शन्नो, पिंकी डब्बे के सामने खड़े थे. मेरे घर से कोई नहीं आया था. जब तक पैसा देता रहा, उन के लिए सबकुछ था, पर अब कुछ नहीं. यह बात मुझे कचोटती रहेगी.‘सारा सामान चढ़ गया?’ रज्जो ने पूछा.‘‘चढ़ाने के लिए ले गए हैं. मजदूरों को रम की बोतल चाहिए थी. वह दे दी है. मैं ले कर गया था. जानता था, ऐसे कामों में यह बहुत काम आती है.”

इतने राजू आ गया और बोला, ‘जीजू, सारा सामान चढ़ा दिया है. गार्ड को बोल दिया है कि अंबाला से वे अगले गार्ड को बोल दें. सामान बिलकुल ठीक जाएगा. दिल्ली में मैं ने अपने दोस्त को कह दिया है कि वह आप की मदद करे. आप ने सामान पार्सल औफिस से लेना है, प्लेटफार्म से नहीं. मेरा दोस्त पार्सल औफिस में मिलेगा. उस का नाम अशोक है.’

‘‘थैक्स, राजू.’’‘क्या कहते हैं, जीजू. यह मेरे घर का काम था.’गाड़ी चली तो मैं और रज्जो सभी से विदा ले कर अपनी बर्थ पर आ गए. दोनों नीचे की बर्थें थीं.मैं मन से संतुष्ट था. रज्जो भी खुश थी. उस के मन में बहुत सी बातें थीं. दूसरी बर्थ पर मैं ने उस का बिस्तर लगा दिया था. वह मेरी बर्थ पर मेरे कंबल में आ कर बैठ गई. रज्जो अभी बात शुरू करने वाली थी कि टीटी आ गया.

टीटी के जाने के बाद रज्जो ने कहा, ‘अब रातदिन हमारे होंगे. किसी के आने का डर नहीं रहेगा.’‘‘हां, जब तक छुट्टी रहेगी, दिनरात हमारे होंगे. फिर दिन में डयूटी, रात में प्यार. है न?’’उस ने हां में सिर हिला दिया. वह फिर से लाल हो उठी थी. रज्जो की यह अदा हमेशा मुझे रोमांचित कर देती थी. मैं थोड़ा आगे बढ़ने लगा तो उस ने इशारों से मना कर दिया कि ट्रेन है, कोई भी आ सकता है. मैं ने प्यार से दोनों हाथ सहला दिए.

जालंधर आया तो हमारे ऊपर की बर्थों पर 2 लड़कियां आ गईं. वे भी दिल्ली जा रही थीं. मम्मी ने रास्ते के लिए खाना दिया था. भूख भी लग रही थी. दोनों ने खाना खाया और अपनीअपनी बर्थ पर लेट गए. दोनों की आंखों में नींद नहीं थी. हम प्यार करना चाहते थे, पर हालात ऐसे थे कि यह संभव नहीं था. दोनों मन मार कर रह गए.

रात को कब नींद आई, पता नहीं चला. सुबह 4 बजे नींद खुली. वासना जोर मार रही थी. साइड की दोनों बर्थें खाली थीं. ऊपर दोनों लड़कियों के खर्राटों की आवाज आ रही थी. मैं वाशरूम गया. सभी गहरी नींद सो रहे थे. टीटी भी वाशरूम के पास सीट पर ऊंघ रहा था. लौटा तो रज्जो उलटा लेटी हुई थी. मन में आया कि अभी प्यार करूं, लेकिन मैं किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहता था. इसलिए थोड़ा प्यार किया. गाल पर किस किया और अपनी बर्थ पर आ गया.

रज्जो की नींद खुल गई थी. शायद उसे मेरे किस लेने का एहसास हो गया था. पूछा, ‘दिल्ली आ गया क्या?’‘नहीं, दिल्ली आने में समय है. रज्जो वाशरूम गई. लौटी तो मेरे कंबल में आ गई. भविष्य की बातें करते रहे. जहां तक हो सका, ऊपरऊपर से प्यार भी किया.

सुबह 5 बजे पैंट्री वाला चाय ले कर आया. दोनों ने चाय ली. सर्दी में गरमागरम चाय बहुत अच्छी लगती है. मैं कप ले कर बाहर फैंकने लगा, तो अचानक मेरा हाथ खूबसूरत गोलाइयों पर लग गया. मैं सिहर उठा. उस ने कुछ नहीं पहना था. मैं ने पूछा, तो उस ने कहा, ‘‘रात को वह ऐसे ही सोती है. पहनने से नींद नहीं आती है.”यह सुन कर मैं मुसकरा दिया. मेरी आंखों में प्यार के साथ शरारत थी. रज्जो ने पूछा, ‘आप मुसकरा क्यों रहे हैं?’

मैं ने कहा, ‘‘जान कर अच्छा लगा. मजा आया करेगा.’’ऐसा सुन वह भी मुसकरा दी और खिड़की के बाहर जाने कहां खो गई. बाहर अभी अंधेरा ही था. सर्दीे में कहीं 7 बजे तक दिन चढ़ता है. गाड़ी आधा घंटा लेट थी. जब दिल्ली पहुंची तो 9 बज चुके थे. आगे कर्नल दीपक साहब का हेल्पर 4 मजदूर ले कर आया हुआ था.

रज्जो को एक मजदूर गाड़ी में बैठा कर पार्सल औफिस आ गया. सारा सामान लेने में एक घंटा लग गया. सामान सुरक्षित था. क्वार्टर पहुंचने में 12 बज गए. चारों मजदूर तब तक नहीं गए, जब तक सारा सामान सैट नहीं हो गया.कर्नल साहब ने दोपहर का खाना भिजवा दिया. खाना खा कर रज्जो सो गई. मैं ने जा कर गैस बुक कर दी और साथ में सिलेंडर भी ले आया. किचन सैट हो गया.

शाम 5 बजे कर्नल साहब ने गाड़ी भेज दी. मैं और रज्जो जा कर राशन और घर का सारा जरूरी सामान ले आए.कर्नल साहब भाभीजी के साथ शाम 7 बजे घर आए. घर सैट हो गया था. रज्जो ने अच्छी सी चाय बनाई. चाय पी कर कर्नल साहब और भाभीजी खुश हो कर गए. शाम का खाना भिजवाने की बात कर रहे थे, लेकिन रज्जो ने मना कर दिया.

उन के जाने के बाद हम दोनों अकेले थे. मैं ने कुंडी लगाई और दोनों एकदूसरे की बांहों में समा गए. रज्जो ने कहा, ‘पहले नहा लेते हैं.’मैं ने कहा, ‘‘प्यार करते हैं, फिर इकट्ठे नहाएंगे.’’इस तरह एकदूसरे में समा गए, जैसे युगयुग से बिछड़े हों. अलग होने का नाम ही नहीं ले रहे थे. काफी देर बाद अलग हुए. रज्जो वाशरूम में घुसी तो मैं भी साथ घुस गया. खूब नहाया. दोनों वहां भी एकदूसरे को छेड़ते रहे. खूब संतुष्ट हो कर निकले.

रज्जो ने कहा, ‘कुछ रात के लिए भी रहने दो.’मैं मुसकरा कर बाहर निकल आया. थोड़ी देर बाद रज्जो भी बाहर आ गई. खिलीखिली मस्त. यह मस्ती, यह नशा बन गई और दिनरात चलती रही. जीवनभर.रज्जो ने वह किया, जो मैं कहता था. मैं ने वह किया, जो रज्जो चाहती थी. यह प्रवंचना नहीं प्यार है. सिर्फ प्यार.

Hindi Story : लौटते कदम – जीने का मौका

Hindi Story : जीवन में सुनहरे पल कब बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता है. वक्त तो वही याद रहता है जो बोझिल हो जाता है. वही काटे नहीं कटता, उस के पंख जो नहीं होते हैं. दर्द पंखों को काट देता है. शादी के बाद पति का प्यार, बेटे की पढ़ाई, घर की जिम्मेदारियों के बीच कब वैवाहिक जीवन के 35 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला.

आंख तो तब खुली जब अचानक पति की मृत्यु हो गई. मेरा जीवन, जो उन के आसपास घूमता था, अब अपनी ही छाया से बात करता है. पति कहते थे, ‘सविता, तुम ने अपना पूरा वक्त घर को दे दिया, तुम्हारा अपना कुछ भी नहीं है. कल यदि अकेली हो गई तो क्या करोगी? कैसे काटोगी वो खाली वक्त?’

मैं ने हंसते हुए कहा था, ‘मैं तो सुहागिन ही मरूंगी. आप को रहना होगा मेरे बगैर. आप सोच लीजिए कि कैसे रहेंगे अकेले?’ किसे पता था कि उन की बात सच हो जाएगी. बेटा सौरभ, बहू रिया और पोते अवि के साथ जी ही लूंगी, यही सोचती थी. जिंदगी ऐसे रंग बदलेगी, इस का अंदाजा नहीं था.

बहू के साथ घर का काम करती तो वह या तो अंगरेजी गाने सुनती या कान में लीड लगा कर बातें करती रहती. मेरे साथ, मुझ से बात करने का तो जैसे समय ही खत्म हो गया था. कभी मैं ही कहती, ‘रिया, चल आज थोड़ा घूम आएं. कुछ बाजार से सामान भी लेना है और छुट्टी का दिन भी है.’

उस ने मेरे साथ बाहर न जाने की जैसे ठान ली थी. वह कहती, ‘मां, एक ही दिन तो मिलता है, बहुत सारे काम हैं, फिर शाम को बौस के घर या कहीं और जाना है.’ बेटे के पास बैठती तो ऐसा लगता जैसे बात करने को कुछ बचा ही नहीं है. एक बार उस से कहा भी था, ‘सौरभ, बहुत खालीपन लगता है. बेटा, मेरा मन नहीं लगता है,’ कहतेकहते आंखों में आंसू भी आ गए पर उन सब से अनजान वह बोला, ‘‘अभी पापा को गए 6 महीने ही तो हुए हैं न मां, धीरेधीरे आदत पड़ जाएगी. तुम घर के आसपास के पार्क क्यों नहीं जातीं. थोड़ा बाहर जाओगी, तो नए दोस्त बनेंगे, तुम को अच्छा भी लगेगा.’’

सौरभ का कहना मान कर घर से बाहर निकलने लगी. पर घर आ कर वही खालीपन. सब अपनेअपने कमरे में. किसी के पास मेरे लिए वक्त नहीं. जहां प्यार होता है वहां खुद को सुधारने की या बदलने की बात भी खयाल में नहीं आती. पर जब किसी का प्यार या साथ पाना हो तो खुद को बेहतर बनाने की सोच साथ चलती है. आज पास्ता बनाया सब के लिए. सोचा, सब खुश हो जाएंगे. पर हुआ उलटा ही. बहू बोली, ‘‘मां, यह तो नहीं खाया जाएगा.’’

यह वही बहू है, जिसे खाना बनाना तो दूर, बेलन पकड़ना भी मैं ने सिखाया. इस के हाथ की सब्जी सौरभ और उस के पिता तो खा भी नहीं पाते थे. सौरभ कहता, ‘‘मां, यह सब्जी नहीं खाई जाती है. खाना तुम ही बनाया करो. रिया के हाथ का यह खाना है या सजा?’’

जब रिया के पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी तब उसे दर्द से संभलने में मैं ने उस का कितना साथ दिया था. तब मैं अपने पति से कहती, ‘रिया का ध्यान रखा करो. पिता को यों अचानक खो देना उस के लिए बहुत दर्दनाक है. अब आप ही उस के पिता हैं.’

मेरे पति भी रिया का ध्यान रखते. वे बारबार अपनी मां से मिलने जाती, तो पोते को मैं संभाल लेती. उस की पढ़ाई का भी तो ध्यान रखना था न. इतना कदम से कदम मिला कर चलने के बाद भी आज यह सूनापन…

एक दिन बहू से कहा, ‘‘रिया, कालोनी की औरतें एकदूसरे के घर इकट्ठी होती हैं. चायनाश्ता भी हो जाता है. पिछले महीने मिसेज श्वेता की बहू ने अच्छा इंतजाम किया था. इस बार हम अपने घर सब को बुला लें क्या?’’ सुनते ही रिया बोली, ‘‘मां, अब यह झमेला कौन करेगा? रहने दो न, ये सब. मैं औफिस के बाद बहुत थक जाती हूं.’’

मैं ने कहा, ‘‘आजकल तो सब की बहुएं बाहर काम पर जाती हैं, पर उन्होंने भी तो किया था न. चलो, हम नहीं बुलाते किसी को, मैं मना कर देती हूं.’’ उस दिन से मैं ने उन लोगों के बीच जाना छोड़ दिया. कल मिसेज श्वेता मिल गईं तो मैं ने उन से कहा, ‘‘मुझे वृद्धाश्रम जाना है, अब इस घर में नहीं रहा जाता है. अभी पोते के इम्तिहान चल रहे हैं, इस महीने के आखिर तक मैं चली जाऊंगी.’’

यह सुन कर मिसेज श्वेता कुछ भी नहीं कह पाई थीं. बस, मेरे हाथ को अपने हाथ में ले लिया था. कहतीं भी क्या? सबकुछ तय कर लिया था. फिर भी जाते समय हमारे बच्चे को हम से कोई तकलीफ न हो, हम यही सोचते रहे. वक्त भी बड़े खेल खेलता है. वृद्धाश्रम का फौर्म ला कर रख दिया था. सोचा, जाने से पहले बता दूंगी.

आज दोपहर को दरवाजे की घंटी बजी. ‘इस समय कौन होगा?’ सोचते हुए मैं ने दरवाजा खोला तो सामने बहू खड़ी थी. मुझे देखते ही बोली, ‘‘मां, मेरी मां को दिल का दौरा पड़ा है. वे अस्पताल में हैं. मुझे उन के पास जाना है. सौरभ पुणे में है, अवि की परीक्षा है, मां, क्या करूं?’’ कहतेकहते रिया रो पड़ी. ‘‘तू चिंता मत कर. अवि को मैं पढ़ा दूंगी. छोटी कक्षा ही तो है. सौरभ से बात कर ले वह भी वहीं आ जाएगा.’’

4 दिनों बाद जब रिया घर आई तो आते ही उस ने मुझे बांहों में भर लिया. ‘‘क्या हो गया रिया, तुम्हारी मां अब कैसी है?’’ उस के इस व्यवहार के लिए मैं कतई तैयार नहीं थी. ‘‘मां अब ठीक हैं. बस, आराम की जरूरत है. अब मां ने आप को अपने पास बुलाया है. भाभी ने कहा है, ‘‘आप दोनों साथ रहेंगी तो मां को भी अच्छा लगेगा. वे आप को बहुत याद कर रही थीं.’’

रिया ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘मां, इस घर को आप ने ही संभाला है. आप के बिना ये सब असंभव था. यदि आप सबकुछ नहीं संभालतीं तो अवि के एक साल का नुकसान होता या मैं अपनी मां के पास नहीं जा पाती.’’ ‘‘अपने बच्चों का साथ नहीं दिया तो यह जीवन किस काम का. चल, अब थोड़ा आराम कर, फिर बातें करेंगे.’’

अगले दिन सुबह जब रिया मेरे साथ रसोई में काम कर रही थी, तो हम दोनों बातें कर रहे थे. दोपहर में तो घर सूना होता है पर आज हर तरफ रौनक लग रही थी. सोचा, चलो, मिसेज श्वेता से मिल कर आती हूं. उन के घर गई तो उन्होंने बड़े प्यार से पास बिठाया और बोलीं, ‘‘कल रात को रिया हमारे घर आई थी. मुझ से और मेरी बहू से पूछ रही थी कि हम ने अपने घर कितने लोगों को बुलाया और पार्टी का कैसा इंतजाम किया. इस बार तुम्हारे घर सब का मिलना तय कर के गई है. तुम्हें सरप्राइज देगी. तुम्हारे दिल का हाल जानती हूं, इसलिए तुम्हें बता दिया. बच्चे अपनी गलती समझ लें, यही काफी है. हम इन के बगैर नहीं

जी पाएंगे.’’ ‘‘यह तो सच है, हम सब को एकदूसरे की जरूरत है. सब अपनाअपना काम करें, थोड़ा वक्त प्रेम को दे दें, तो जीवन आसान लगने लगता है.’’

मिसेज श्वेता के घर से वापस आते समय मुझे धूप बहुत सुनहरी लग रही थी. लगा कि आज फिर वक्त के पंख लग गए हैं.

Love Story : तुम्हारी रोजी – क्यों पति को छोड़कर अमेरिका लौट गई वो?

Love Story : उस का नाम रोजी था. लंबा शरीर, नीली आंखें और सांचे में ढला हुआ शरीर. चेहरे का रंग तो ऐसा जैसे मैदे में सिंदूर मिला दिया गया हो.

रोजी को भारत की संस्कृति से बहुत प्यार था और इसलिए उस ने अमेरिका में रहते हुए भी हिंदी भाषा की पढ़ाई की थी और हिंदी बोलना भी सीखा.

उस ने किताबों में भारत के लोगों की शौर्यगाथाएं खूब सुनी थीं और इसलिए भारत को और नजदीक से जानने के लिए वह राजस्थान के एक छोटे से गांव में घूमने आई थी.

अभी उस की यात्रा ठीक से शुरू भी नहीं हो पाई थी कि कुछ लोगों ने एक विदेशी महिला को देख कर आदतानुसार अपनी लार गिरानी शुरू कर दी और रोजी को पकड़ कर उस का बलात्कार करने की कोशिश की. पर इस से पहले कि वे अपने इस मकसद में कामयाब हो पाते, एक सजीले से युवक रूप ने रोजी को उन लड़कों से बचाया और उस के तन को ढंकने के लिए अपनी शर्ट उतार कर दे दी.

रूप की मर्दानगी और उदारता से रोजी इतना मोहित हुई कि उस ने रूप से चंद मुलाकातों के बाद ही शादी का प्रस्ताव रख दिया.

रोजी पढ़ीलिखी थी व सुंदर युवती थी. पैसेवाली भी थी इसलिए रूप को उस से शादी करने के लिए हां कहने मे कोई परेशानी नहीं हुई पर थोड़ाबहुत प्रतिरोध आया भी तो वह रूप के रिश्तेदारों की तरफ से कि एक विदेशी क्रिस्चियन लड़की से शादी कैसे होगी? न जात की न पात की और न देशकोस की…इस से कैसे निभ पाएगी?

पर रूप अपना दिल और जबान तो रोजी को दे ही चुका था इसलिए उस की ठान को काटने की हिम्मत किसी में नहीं हुई पर पीठ पीछे सब ने बातें जरूर बनाईं.

अंगरेजन बहू की पूरे गांव में चर्चा थी.

“भाई देखने में तो सुंदर है. पतली नाक और लंबा शरीर,” एक ने कहा.

“पर भाई, दोनों लोगों में संबंध भारतीय तरीके से बनते होंगे या फिर अंगरेजी तरीके से? या फिर दोनों लोग इशारोंइशारों मे ही सब काम करते होंगे,” दूसरे ने चुटकी ली.

“कुछ भी कहो, यार पर मुझे तो सारी अंगरेजन लड़कियों को देख कर तो बस एक ही फीलिंग आती है कि ये सब वैसी वाली फिल्मों की ही हीरोइनें हैं.”

इस पर सभी जोर के ठहाके लगाते हुए हंसते.

उधर औरतों की जमात में भी आजकल बातचीत का मुद्दा रोजी ही थी.

“सुना है रूप की बहू मुंह उघाड़ कर घूमती है,” पहली औरत बोली.

“न जी न कोई झूठ न बुलवाए. अभी कल ही उस से मिल कर आई हूं, बड़ी गुणवान सी लगी मुझे और कल तो उस ने घाघराचोली पहना था और अपने सिर को भी ढंकने की कोशिश कर रही थी पर अभी नईनई है न इसलिए पल्लू बारबार खिसक जा रहा था,”दूसरी औरत ने कहा.

“पर जरा यह तो बताओ कि दोनों में बातचीत किस भाषा में होती होगी ? रूप इंग्लिश सीखे या फिर अंगरेजन बहू को हिंदी सीखनी पड़ेगी,” तीसरी औरत ने कहा.

और उन की बात सच ही साबित हुई. रोजी को नया काम सीखने का इतना चाव था कि काफी हद तक घर का कामकाज भी सीखने लगी थी.

रोजी के गांव में आने से जवान तो जवान बल्कि बूढ़े भी उस की खूबसूरती के दीवाने हो गए थे और आहें भरा करते थे. कुछ युवक तो रोजी की एक झलक पाने के लिए रूप से बहाने से मिलने भी आ धमकते.

गांव के पुरुषों को लगता था कि एक विलायती बहू के लिए तो किसी से भी शारीरिक संबंध बना लेना बहुत ही सहज होता है.

रोजी के सासससुर को शुरुआत में तो अपनी विलायती बहू के साथ आंकड़ा बैठाने में समस्या हुई पर मन से न सही ऊपर मन से ही सास रोजी को मानने का नाटक करने ही लगी थीं.
दूसरों की क्या कही जाए रूप का चचेरा भाई शेरू भी अपनी रिश्ते की भाभी पर बुरी नजर लगाए हुए था.

रूप और शेरू का घर एकदूसरे से कुछ ही दूरी पर था इसलिए शेरू दिन में कई बार आता और बहाने से रोजी के आसपास मंडराता. ऐसा करने के पीछे भी उस की यही मानसिकता थी कि अंगरेजन तो कई मर्दों से संबंध  बना लेती हैं और इन के लिए
पति बदलना माने चादर बदलना होता है.

क्या पता कब दांव लग जाए और अपने पति की गैरमौजूदगी में कब रोजी का मूड बन जाए और शेरू को उस के साथ अपने जिस्म की आग निकालने का मौका मिल जाए.

पर रोजी बेचारी इन सब बातों से अनजान भारत में ही रह कर यहां के लोगों को समझ रही थी और रीतिरिवाज सीख रही थी.

इस सीखने में एक बड़ी बाधा तब आई जब रोजी को शादी के बाद माहवारीचक्र से गुजरना था. रोजी ने पढ़ रखा था कि इन दिनों में गांव में बहुत ही नियमों का पालन किया जाता है इसलिए उस ने इस बारे में अपनी सास को बता दिया.

रोजी की सास ने उसे कुछ नसीहतें दीं और यह भी बताया कि अभी वे लोग पास के गांव में एक समारोह में जा रहे हैं और चूंकि उसे अभी किचन में प्रवेश नहीं करना है इसलिए सासूमां ने उसे बाहर ही नाश्ता भी दे दिया और घर के लोग चले गए.

रोजी घर में अकेली रह गई. उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. नाश्ता शुरू करने से पहले रोजी की चाय ठंडी हो गई थी और चाय को गरम करने के लिए उसे किचन में जाना था.

‘सासूमां तो किचन में जाने को मना कर गई हैं. कोई बात नहीं बाहर से किसी बच्चे को बुला कर उसे किचन में भेज कर चाय गरम करवा लेती हूं,’ ऐसा सोच कर रोजी ने दरवाजा खोल कर बाहर की ओर झांका तो सामने ही आसपड़ोस के कुछ किशोर लड़के बैठेबैठे गाना सुन रहे थे.

“भैयाजी, जरा इधर आना तो… मेरा एक छोटा सा काम कर देना,” रोजी ने एक लड़के को उंगली से इशारा कर के बुलाया और खुद अंदर चली गई.

रोजी घर में अकेली है, यह उन बाहर बैठे हुए लड़कों को पता था हालांकि रोजी की नजर में वे लड़के अभी बच्चे ही थे पर उसे क्या पता कि ये बच्चे उस के बारे में क्या सोचे बैठे हैं…

“अबे भाई तेरी तो लौटरी लग गई. विलायती माल घर में अकेली है और तुझे इशारे से बुला रही है. जा मजे लूट.”

“हां, एक काम जरूर करना दोस्त, उस की वीडियो जरूर बना लेना,” एक ने कहा.

मन में ढेर सारी कामुक कल्पनाएं ले कर वह किशोर लड़का अंदर आया तो रोजी ने निश्छल भाव से उस से चाय गरम कर देने को कहा.

लड़का मन ही मन खुश हुआ और उस ने सोचा कि य. तो हंसीनाओं के अंदाज होते हैं. उस ने चाय गरम कर के रोजी को प्याली पकड़ाई और उस की उंगलियों को छूने का उपक्रम करते हुए उस के सीने को जोर से भींच लिया.

इस बदतमीजी से रोजी चौंक उठी और गुस्से में भर उठी. एक जोरदार तमाचा उस ने उस लड़के के गाल पर रसीद दिए. गाल सहलाता रह गया वह लड़का मगर फिर भी रोजी से जबरदस्ती करने लगा. रोजी ने उसे
धक्का दे दिया. तभी इतने में रूप खेतों पर से वापस आ गया. रोजी जा कर उस से लिपट गई और कहने लगी कि यह लड़का उसे छेड़ रहा है.

इस से पहले कि सारा माजरा रूप की समझ में आ पाता नीचे गिरा हुआ लड़का जोर से रोजी की तरफ मुंह कर के चिल्लाने लगा,”पहले तो इशारे से बुलवाती हो और जब कोई पीछे से आ जाता है तो छेड़ने का आरोप लगाती हो. अरे वाह रे त्रियाचरित्र…” वह लड़का चीखते हुए बोला.

“रूप इस का भरोसा नहीं करना. यह गंदी नीयत डाल रहा था मुझ पर. मेरा भरोसा करो.”

रोजी की बात पर रूप को पूरा भरोसा था इसलिए उस ने तुरंत ही उस लड़के के कालर पकङे और धक्का देते हुए दरवाजे तक ले आया.

तब घर के बाहर उस के पड़ोसियों की भीड़ जमा होते देख कर उस ने खुद ही मामला रफादफा कर दिया और उस लड़के को डांट कर भगा दिया.

उस दिन की घटना के बारे में भले ही लोग पीठ पीछे बातें करते रहे पर सामने कोई कुछ नहीं कह सका.

यह पहली दफा था जब रोजी को गांव में शादी कर के आना खटक रहा था. वह इस घटना से अंदर तक हिल गई थी पर जब रात को रूप ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और जीभर कर प्यार किया तो उस के मन का भारीपन थोड़ा कम हुआ.

एक दिन की बात है. रूप किसी काम से शहर गया हुआ था तब मौका देखकर शेरू रोजी की सास के पास आया और आवाज में लाचारी भर कर बोला,”ताईजी, दरअसल बात यह है कि आप की बहू की तबीयत अचानक खराब हो गई है और मुझे शाम होने से पहले शहर
जा कर दवाई लानी है और अब आनेजाने का कोई साधन नहीं है, जो मुझे शाम से पहले शहर पहुंचा दे.”

“हां तो उस में क्या है शेरू, तू रूप की गाड़ी ले कर चला जा. खाली ही तो खड़ी है,”रोज़ी की सासूमां ने कहा.

“हां सो तो है ताईजी, पर आप तो जानती हो कि मैं गाड़ी चलाना नहीं जानता. अगर आप इजाजत दो तो मैं भाभी को अपने साथ लिए जाऊं? वे तो विदेशी हैं और गाड़ी तो चला ही लेती हैं. हम बस यों जाएंगे और बस यों आएंगे.”

शेरू की बात सुन कर रोजी की सास हिचकी, पर उस ने इतनी लाचारी से यह बात कही थी कि वे चाह कर भी मना नहीं कर पाईं.

“अरे बहू, जरा गाड़ी निकाल कर शेरू के साथ चली जा. शहर से कोई दवा लानी है इसे,” रोजी की सास ने कहा.

“जी मांजी, चली जाती हूं.”

“और सुन, जरा धीरे गाड़ी चलाना. यह गांव है हमारा, तेरा विदेश नहीं,” सासूमां ने मुस्कराते हुए कहा.

रोजी को क्या पता था कि शेरू की नीयत में ही खोट है. उस ने गाड़ी निकाली और शेरू कृतज्ञता से हाथ जोड़ कर बैठ गया. रोजी ने गाड़ी बढ़ा दी.

गांव से कुछ दूर निकल आने के बाद एक सुनसान जगह पर शेरू दांत चियारते हुए बोला,”भाभी, थोडा गाड़ी रोको… जरा पेशाब कर आएं.”

गाड़ी रुकी तो शेरू झाड़ियों के पीछे चल गया और उस के जाते ही शेरू के 3 दोस्त कहीं से आ गए और शेरू से बातचीत करने लगे और बातें करतेकरते गाड़ी मैं बैठ गए.

इससे पहले कि रोजी कुछ समझ पाती शेरू ने उस का मुंह तेजी से दबा दिया और एक दोस्त ने रोजी के हाथों को रस्सी से बांध दिया और शेरू गाड़ी के अंदर ही रोजी के कपड़े फाड़ने लगा.

रोजी अब तक उन लोगों की गंदी नीयत समझ गई थी. उस के हाथ जरूर बंधे हुए थे पर पैर अभी मुक्त थे. उस ने एक जोर की लात शेरू के मरदाना अंग पर मारी.

दर्द से बिलबिला उठा था शेरू. अपना अंग अपने हाथों से पकड़ कर वहीं जमीन पर लौटने लगा.

इस दौरान उस के एक दोस्त ने रोजी के पैरों को भी रस्सी से बांध दिया और रोजी के नाजुक अंगों से खेलने लगा.

“रुक जाओ, पहले इस विदेशी कुतिया को मैं नोचूंगा. कमीनी ने बहुत तेज मार दिया है. अब इसे मैं बताता हूं कि दर्द क्या होता है.”

एक दरिंदा की तरह वह टूट पङा रोजी पर. रिश्ते की मर्यादा को भी उस ने तारतार कर दिया था. उस के बाद उस के तीनों दोस्तों ने रोजी के साथ बलात्कार किया. चीख भी नहीं सकी थी वह.

बलात्कार करने के बाद उस के हाथपैरों को खोल दिया उन लोगों ने.
जब रोजी की चेतना लौटी तो पोरपोर दर्द कर रहा था. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? पुलिस में रिपोर्ट करे या अपना जीवन ही खत्म कर दे?

पर भला वह जीवन को क्यों खत्म करे? आखिर उस ने क्या गलत क्या किया है? बस इतना कि किसी झूठ बोल कर सहायता मांगने वाले की सहायता की है और फिर किसी के चेहरे को देख कर उस की
नीयत का अंदाजा तो नहीं लगाया जा सकता है न…

‘अगर मैं इसी तरह मर गई तो रूप क्या सोचेगा?’ परेशान रोजी ने पहले यह बात रूप को बताने के लिए सोची और उस के बाद ही कोई फैसला लेने का मन बनाया.

रोजी किसी तरह घर वापस पहुंची तो रूप वहां पहले से ही बैठा हुआ उस की राह देख रहा था. रोजी रूप से लिपट गई और रोने लगी.

“क्या हुआ रोजी? तुम्हारे बदन पर इतने निशान कैसे आए? क्या कोई दुर्घटना हुई है तुम्हारे साथ?” रूप ने रोजी के हाथों और चेहरे को देखते हुए कहा.

“हां, दुर्घटना ही तो हुई है. ऐसी दुर्घटना जिस के घाव मेरे जिस्म पर ही नहीं आत्मा पर भी पहुंचे हैं…”

“पर हुआ क्या है?” सब्र का बाँध टूट रहा था रूप का.

“शेरू ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर मेरे साथ बलात्कार किया है…” फफक पङी थी रोजी.

“क्या… उस ने तुम्हारे साथ ऐसा किया? मैं शेरू को ऐसी सजा दूंगा कि उस की पुश्तें भी कांप उठेंगी. मैं उस को जिंदा नहीं छोडूंगा.”

रूप ने रिवाल्वर पर मुट्ठी कसी, कुछ कदम तेजी से बढ़ाए और फिर अचानक रोजी की तरफ पलटा और बोला,”वैसे, एक बात मुझे समझ नहीं आती कि जब से मैं ने तुम्हें जाना है तब से तुम्हारे साथ कोई न कोई छेड़छाड़ होती ही रहती है. कहीं कोई तुम्हें देख कर घर में घुसता है और कहीं कोई तुम्हारे साथ गैंगरेप करता है. आखिर अपनी गाड़ी चला कर तुम
क्यों गई थीं शेरू को ले कर? सवाल तो तुम पर भी उठ सकते हैं न?”

शेरू के मुंह से निकले ये शब्द उसे बाणों की तरह लग रहे थे. कुछ भी न कह सकी रोजी. आंसुओं में टूट गई थी वह और अपने कमरे की तरफ भाग गई थी.

अगले दिन रोजी पूरे घर में कहीं नहीं थी. अलबत्ता, उस के बिस्तर पर एक कागज रखा जरूर मिला.

कागज में लिखा था-

मेरे रूप,

मैं जब से भारत आई, सब ने मेरी देह को ही देखा और सब ने मेरी देह को ही भोगना चाहा. कहीं किसी ने कुहनी मारी तो किसी ने पीछे से धक्का मारा. तुम्हारी आंखों में पहली बार मुझे सच्चा प्रेम दिखा तो मैं ने तुम से ब्याह रचाया पर अब मुझ पर तुम्हारा विश्वास भी डगमगा रहा है.

माना कि मैं यहां के लिए विदेशी हूं, मगर इस का मतलब यह तो नहीं कि मैं सब के साथ सो सकती हूं. क्या सब लोग मुझे एक वेश्या भर समझते हैं?

मेरे जाने के बाद मुझे ढूंढ़ने की कोशिश मत करना, क्योंकि मैं अपने घर वापस जा रही हूं. मैं तो यहां की संस्कृति के बारे में जानने और समझने आई थी, पर अब मन भर गया है. अफसोस यह वह भारत नहीं जिस के बारे में मैं ने किताबों में पढ़ा था…

UPSC : टौपर तो बन रहीं पर टौप पोस्ट तक नहीं पंहुच रहीं लड़कियां

UPSC : आज जमाना मसल्स का नहीं माइंड का है. देश की सब से कठिन परीक्षा में महिलाओं ने अपना दमखम दिखा दिया है. उन का दावा भी टौप पोस्ट पर मजबूती के साथ देखना चाहिए.

यूपीएससी ने सिविल सेवा परीक्षा 2024 का अंतिम परिणाम घोषित कर दिया. इस में शक्ति दुबे ने टौप किया है. दूसरे स्थान पर भी लड़की का ही नाम है. हर्षिता गोयल ने दूसरे स्थान पर अपनी जगह बनाई है. टौप 25 में 11 लड़कियां हैं. पिछले 11 सालों के आंकडे देखें तो यह साफ हो जाता है कि 6 साल लड़कियां टौप पर रही हैं. 2014 में इरा सिंघल, 2015 में टीना डाबी, 2016 में नंदिनी के.आर, 2021 में श्रुति किशोर, 2022 में इशिता किशोर और 2024 में शक्ति दुबे ने टौप पोजीशन हासिल की है.

सिविल सेवा परीक्षा 2024 में टौप 5 में जिन लड़कियों ने जगह बनाई उन्होंने पूरी मेहनत और संघर्ष से इस मुकाम को हासिल किया है. शक्ति दुबे मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज की रहने वाली हैं. उन की स्कूलिंग होम टाउन प्रयागराज से ही हुई है. उन की पढ़ाई बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हुई है. शक्ति बताती है कि उन का ग्रेजुएशन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से हुआ है. ग्रेजुएशन के बाद शक्ति दुबे बनारस आ गईं. साल 2018 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बायोकैमिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है.

दूसरे स्थान पर रहने वाली हर्षिता गोयल हरियाणा की रहने वाली है. पिछले कई वर्षों से वह गुजरात के वडोदरा में रह रही हैं. हर्षिता एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और उन्होंने समाज सेवा के लिए अपनी फाइनैंस की दुनिया को छोड़ दिया. वह थैलेसीमिया और कैंसर से जूझ रहे बच्चों की मदद करने वाले एनजीओ के साथ जुडी थी. हर्षिता की सफलता सामाजिक समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है.

चौथे स्थान पर रहने वाली मार्गी चिराग शाह गुजरात के अहमदाबाद की रहने वाली है. गुजरात टैक्नोलौजिकल यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर इंजीनियरिंग करने वाली मार्गी ने समाजशास्त्र को वैकल्पिक विशय के रूप में चुना और आल इंडिया चौथा स्थान हासिल किया. टैक्निकल बैकग्राउंड के बावजूद समाज से जुड़ाव ने उन्हें इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा दी.

कोमल पूनिया उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की रहने वाली है. उन्होंने दूसरे प्रयास में यूपीएससी क्लियर कर जिले का नाम रोशन किया है. कोमल की मेहनत और जज्बे ने यह दिखा दिया कि लगन और निरंतर प्रयास से कोई भी मंजिल पाई जा सकती है. मध्य प्रदेश के ग्वालियर की रहने वाली आयुषी बंसल ने 2022 में 188वीं और 2023 में 97वीं रैंक हासिल की थी. आयुषी के जीवन में पिता का साया बचपन में ही उठ गया था, लेकिन मां की प्रेरणा और अपनी मेहनत से उन्होंने यह कठिन परीक्षा पास की. कोचिंग की तैयारी के लिए पहले दिल्ली आईं. फिर मैकेंजी जैसी बड़ी कंपनी में जौब की और आखिरकार अपनी राह चुनी.

गाजियाबाद की आशी शर्मा को रैंक 12 प्राप्त हुआ है. आशी का यह दूसरा अटेम्प्ट था. उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की रहने वाली सौम्या मिश्रा को यूपीएससी में रैंक 18 प्राप्त हुआ है. सौम्या के पिता राघवेंद्र कुमार मिश्र पेशे से शिक्षक हैं. पीसीएस 2021 की परीक्षा में सौम्या मिश्रा ने टौप किया था. इस बार सौम्या के साथ उन की बहन सुमेघा मिश्रा ने 53 वीं रैंक हासिल कर परीक्षा क्रैक की है.

उत्तर प्रदेश की शक्ति दुबे के साथ कोमल पुनिया, आशी शर्मा, सौम्या मिश्रा, मुस्कान श्रीवास्तव, शोभिका पाठक और अवधिजा गुप्ता ने टौप 20 में जगह बनाने में सफलता हासिल की. देश की सब से कठिन परीक्षाओं में यूपीएससी का नाम आता है. इस को क्रैक करना बहुत कठिन होता है. अब लड़कियों ने इस परीक्षा की टौप लिस्ट में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है. इस परीक्षा को क्रैक करने के लिए कैंडिडेट्स दिन रात एक कर देते हैं. अब लड़कियों ने भी अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी है. यूपीएससी सिविल सर्विस 2024 की फाइनल लिस्ट में उत्तर प्रदेश की लड़कियों का दबदबा रहा है. टौप 20 में यूपी की 4 लड़कियों का नाम है. यूपीएससी सिविल सर्विस में इस साल कुल 1090 कैंडिडेट्स को सफलता हासिल हुई है.

बड़ा सवाल यह है कि आईएएस और आईपीएस में टौप करने वाली यह लड़कियां जब नौकरी करती हैं तो इन को टौप पोस्ट पर काम करने का मौका नहीं दिया मिलता है. आज का दौर बदल रहा है. अब जमाना मसल्स का नहीं माइंड का है. यूपीएससी परीक्षाओं में टौप पर रहकर लड़कियों ने दिखा दिया कि उन में कितना दम है. अब उन को टौप पोस्ट संभालने के लिए दी जा सकती है. आईएएस बनने वाली महिला औफिसरों को जिलो में डीएम की पोस्ट दी जानी चाहिए. आईपीएस बनने वाल महिला औफिसरों को जिले में एसपी, एसएसपी और पुलिस कमिश्नर बनने का मौका देना चाहिए.

टौप ब्यूरोक्रेसी में भी महिलाओं को मुख्य सचिव के पद कम मिलते हैं. पीएमओ और रक्षा विभागों में अफसर के रूप में काम करने के मौके महिलाओं को कम दिए जाते हैं. महिलाएं परीक्षा पास कर के अपनी क्षमता के बारे में बता रही हैं. वे यह हक भी मांग रही हैं कि उन को भी पुरूषों के बराबर काबिल समझ कर टौप पोस्ट दिए जाने चाहिए. महिला पुरूष को बराबरी का हक नहीं दिया जाता है. उत्तर प्रदेश में नीरा यादव के बाद कोई महिला मुख्य सचिव नहीं बनी है. अभी भी महिला डीजीपी नहीं बनी है.

भले ही परीक्षाओं में महिलाएं टौप कर रही हों लेकिन लीडरशिप यानि अगुवाई और निर्णय लेने वाले पदों में पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या में अंतर है. जरूरत है कि इस अंतर को दूर किया जाए. जो लड़कियां परीक्षाओं में टौप कर रही हैं और यहां वह लड़कों की संख्या से कम नहीं हैं उन को लीडरशिप वाले पद जैसे डीएम, एसपी और विभागों में प्रमुख पद दिए जाए. विभागों में भी महिलाओं के साथ संस्कृति और शिक्षा विभाग जैसे पदों की जिम्मेदारी दी जाती है. जब तक यह भेदभाव खत्म नहीं होगा तब तक यूपीएससी परीक्षा में बराबरी करना बेमकसद सा हो जाता है.

Hindi kavita : इन दिनों नदियां थोड़ी सिमट जाती हैं

Hindi kavita : इन दिनों नदियां थोड़ी सिमट जाती हैं
पानी थोड़ा और धरती के नीचे चला जाता!
दोपहर आलस में डूबा रहता
हमने चैत्र मास को कुछ ऐसे देखा..

ताड़/खजूर के पेड़ों पर
मिट्टी के लटकते बर्तनों में
टपकते रस को देखा,
ताड़ी पीकर जवान-बूढों को
बेसुध होते देखा,
फिर कैसे कहे,
चैत्र तुम्हारे हिस्से कुछ नहीं आया…!

महुआ के मादक गंध से सराबोर
खेत पर
महुआ चुनती स्त्रियाँ,
किसी उत्सव की तैयारी में
मगन सी दिखती…!

आंगन,छत,बरामदे में
बड़ी,पापड़,चिप्स,अचार
सूखते दिखते,,,
गृहणियां सहेज लेती है
इन दिनों मसाले व अनाज
पूरे साल भर के लिए….
फिर कैसे कह दूं
चैत्र के हिस्से कुछ नहीं आया…

अप्रैल के महीने को
छुट्टियों के महीने के नाम से जाना पर,
जब चैत्र को जाना…
तो जाना सूखती नदियों को….
ताड़ी पीकर सो रहें कुछ आबादी को….
जाना कितनी मसक्कत करनी पड़ती है
स्त्रियों को…

चैत्र के हिस्से आया है,
पूरे साल भर की रखवाली करने का,
कि यह दिन सूखने का होता है…
कि चैत्र सारी ऊष्मा को सुखाकर
उन्हें सुरक्षित कर देता….

तो सुनों चैत्र!!
तुम जैसे दिखते हो,
वैसे तो बिल्कुल नहीं हो….!!!

लेखिका : प्रतिभा

Hindi Poetry : हमारे लिए नहीं खरीदा गया कभी कोई टेडी-बियर

Hindi Poetry : हमारे लिए नहीं खरीदा गया
कभी कोई टेडी-बियर
ना सिखाया गया,
अंग्रेजी वाली वो कविता
जिसके बोल, टेडी बियर, टेडी बियर
टर्न अबाउट….!!!

टेडी बियर तो क्या
हमारे लिए नीली आँखों व सुनहरे बालों वाली
गुड़िया भी नहीं खरीदी गई…
कि हमारी अम्मा ही बना देती
नये-पुराने कपड़ों से गुड्डा-गुड़िया
और कुम्हारन बना लाती थी
मिट्टी के बर्तन

भाई बना देता था, सुंदर सा घरौंदा
और फिर….होती थी
गुड्डे संग गुड़िया की शादी!
बस यही खेल,खेलते-खेलते
हम बड़े हो रहे थे…!

ऐसा नहीं था कि हमारे बचपन में
मैग्गी, कॉम्प्लान, व होर्लिक्स
जैसा कोई चीज नहीं था
पर ऐसी चीजें घर पर नहीं आता
हमारे भोजन का विकल्प नपा-तुला ही रहा

कभी कभार यूँ भी होता रहा,
के अम्मा रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े कर
फिर हमारे मनपसंद की चीजों का नाम
ले-लेकर खिलाती रही…
कितने वेवकूफ थे हम
हम उन टुकड़ो को हँसते-हँसते खाते
अम्मा बहुत होशियार होती
हर बार हमें बहला-फुसला ही लेती

अब सोचती हूं
इतनी होशियार महिला
उम्र ढलने के साथ इतनी असहज कैसे हो जाती है,
कि अब वो हम पर
अपना अधिकार जताना भी छोड़ चुकी

हमारे लिए बेशक नहीं खरीदा गया
गुड्डा/गुड़िया या खेल खिलौना
पर हमें याद रखना होगा
के हमें तैयार किया गया
ऐसे कि हम हर माहौल में खुश
व एडजस्ट हो सके

हमें सिखाते सिखाते
वो खुद को ही भूल गई
कि अब कहती हूँ
अम्मा अब तुम अपने लिए जिओ
अपने पसन्द की चीजें खरीदो
मां अब तुम छोटी हो जाओ
कि तुम्हारी बेटी बड़ी हो गई है!!!

लेखिका : प्रतिभा 

Trending Debate : नफरती ताकतों पर लगाम कब

Trending Debate : भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पहले सुप्रीम कोर्ट के जज का नाम ले कर उन्हें गृहयुद्ध का जिम्मेदार ठहरा दिया और उस के बाद वे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी पर पिल पड़े. कुरैशी को उन्होंने ”मुसलिम आयुक्त” बता दिया. भले भाजपा ने इस बयान से पल्ला झाड़ा हो मगर भीतरखाने समर्थन करते दिखी.

कई बार ऐसे लोग सत्ता शीर्ष पर पहुंच जाते हैं, जो उस जगह के लायक नहीं होते. वे अपने पद की गरिमा और मर्यादा को भी नहीं समझते हैं. उन्हें क्या बोलना है, कितना बोलना है, कैसे बोलना है, इस का भी कोई भान उन्हें नहीं होता है. ऐसे लोग समझ ही नहीं पाते हैं कि वे वहां क्यों हैं और उन्हें क्या करना है. कई बार वे किसी अन्य के हाथ की कठपुतली बन कर ही काम करते हैं. क्योंकि समझ व ज्ञान के अभाव के बावजूद वे जिस पोजीशन में पहुंच गए हैं, वहां वे कुछ भी कर पाने में असमर्थ एवं अक्षम होते हैं.

हालांकि बौद्धिक वर्ग एवं मीडिया का यह दायित्व है कि वह ऐसे लोगों को मर्यादित रखने का कार्य करें और उन के गलत कृत्यों की खुल कर आलोचना करें, ताकि उन के कार्य और उन की जुबान काबू में रहे, मगर दुर्भाग्यवश आजकल मीडिया सरकार की जी हुजूरी में लगा है और बौद्धिक वर्ग इस डर से खामोश है कि कहीं कुछ बोलने पर उस के खिलाफ ईडी, सीबीआई या आयकर की कार्रवाई न शुरू हो जाए. कहीं उस के घर पर बुलडोजर न चढ़ जाय. कहीं उसे उठवा न लिया जाए. कहीं मरवा न दिया जाए.

पिछले कुछ दिनों से देश में सत्ता और सुप्रीम कोर्ट के बीच काफी खींचतान देखी जा रही है. देश के उपराष्ट्रपति से ले कर भारतीय जनता पार्टी के हिंदुत्व के ध्वजवाहक बने मंत्री-विधायक तक सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम ले कर खरीखोटी सुनाने पर उतारू हैं.

केंद्रीय सत्ता सुप्रीम कोर्ट से काफी समय से नाराज चल रही है. भाजपा द्वारा चुनाव के वक्त इलैक्टोरल बांड की कमाई पर सुप्रीम खुलासा होने से ले कर मुसलिम वक्फ बोर्ड में भगवा गैंग की घुसपैठ बनाने तक के मामलों में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा सरकार को नंगा किया, लताड़ा और सरकार के फैसलों पर रोक लगाई है, उस से सरकार बौखलाई हुई है. उसे यह लगने लगा है कि सत्ता की मनमर्जी में सब से बड़ी बाधा सुप्रीम कोर्ट ही है जो समयसमय पर क़ानून का चाबुक फटकार रही है.

हाल ही में तमिलनाडु के गवर्नर के कारण राष्ट्रपति तक के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक समय सीमा तय कर दी जिस के बाद तो भाजपाई खेमे के लोग सुप्रीम कोर्ट के औचित्य तक पर सवाल खड़े करने लग गए. भाजपा सांसद मीडिया से बोले, ”अगर सुप्रीम कोर्ट को ही कानून बनाने हैं तो संसद और विधानसभा को बंद कर देना चाहिए.” दुबे ने सीजेआई का नाम ले कर कहा, “देश में गृहयुद्ध के लिए चीफ जस्टिस औफ इंडिया संजीव खन्ना जिम्मेदार हैं.”

दरअसल तमिलनाडु सरकार के कई विधेयक वहां के राज्यपाल आर. एन. रवि सालों से दबाये बैठे थे और उन्हें लागू नहीं होने दे रहे थे. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने राष्ट्रपति तक के लिए समय सीमा निर्धारित कर दी क्योंकि राज्यपाल ने उन विधेयकों को यह कह कर रोक रखा था कि इन पर राष्ट्रपति की सहमति ली जाएगी.

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि को 10 विधेयकों को रोक कर रखने के लिए फटकार भी लगाई. कोर्ट ने कहा कि यह संविधान के उल्ट, गैरकानूनी और मनमानी कार्रवाई है, इसलिए रद्द की जाती है. कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के कर्तव्यों के निर्वहन के लिए स्पष्ट समय सीमा तय नहीं है, फिर भी इसे इस प्रकार नहीं पढ़ा जा सकता कि राज्यपाल बिल पर कार्रवाई ही न करें और राज्य में कानून बनाने की प्रक्रिया बाधित कर दें. उन के पास विवेकाधिकार नहीं होता. उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करना होता है. कोर्ट ने नसीहत दी कि राज्यपाल को एक दोस्त, दार्शनिक और राह दिखाने वाला होना चाहिए. जो राजनीति से प्रेरित न हो. राज्यपाल को उत्प्रेरक बनना चाहिए, अवरोधक नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को राजनीतिक विचारधाराओं से प्रभावित नहीं होना चाहिए. संघर्ष के समय में, उन्हें सहमति और समाधान का अग्रदूत होना चाहिए, राज्य मशीनरी के कामकाज को अपनी बुद्धिमत्ता और विवेक से सहज बनाना चाहिए, न कि उसे ठप कर देना चाहिए. राज्यपाल को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे जनता की चुनी हुई विधानसभा को बाधित न करें. विधायकों को जनता ने चुना है और वे राज्य की भलाई सुनिश्चित करने के लिए अधिक उपयुक्त हैं. संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को संविधान के मूल्यों द्वारा ही निर्देशित होना चाहिए जो वर्षों के संघर्ष और बलिदान से अर्जित हुए हैं.

फिर क्या था पूरा भगवा गैंग देश की इस सर्वोच्च संस्था के जैसे खिलाफ हो गया. जिन राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें हैं, वहां सरकार के कामकाज में दखल देने के लिए भाजपाई राज्यपालों की नियुक्तियां तो इसी मकसद से की गई थीं कि वे लगातार सरकार के काम में बाधा पैदा करते रहें ताकि सरकार जनता के हित से जुड़े कार्यों को कर के लोकप्रिय न हो जाए. लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि राज्यपाल या राष्ट्रपति 3 माह के भीतर फैसले लें और विधेयकों को पारित होने दें, तो भाजपाई खेमे में हलचल मच गई. उन की तो विरोधियों को परेशान करने की सारी योजना ही खटाई में पड़ गई.

राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं, यदि अनुच्छेद 200 के तहत कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है, तो इस का यह अर्थ नहीं कि राज्यपाल या राष्ट्रपति, अनिश्चितकाल तक कोई निर्णय न लें. जब किसी प्राधिकारी को कोई कार्य करना होता है, तो यह अपेक्षित है कि वह निष्पक्ष एवं कानून व संविधान के अनुरूप कार्य करेगा. यह भी अपेक्षित है कि वह कार्य यथाशीघ्र और एक उचित समय के भीतर किया जाए. केवल इसलिए कि कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, कोई प्राधिकारी संविधान के साथ धोखा नहीं कर सकता.

गौरतलब है कि यदि कोई सार्वजनिक प्राधिकारी शीघ्रता से कार्य नहीं करता, तो सर्वोच्च न्यायालय, विवाद का निर्णय करते समय, एक समय सीमा निर्धारित कर सकता है. जब कोई कानून पूर्ण न्याय करने के लिए उपलब्ध नहीं होता, तब अनुच्छेद 142 लागू होता है. यह अनुच्छेद विशेष रूप से ऐसे ही परिस्थितियों के लिए बनाया गया है. इस के अलावा, गृह मंत्रालय ने स्वयं एक औफिस मेमोरेंडम के माध्यम से, राष्ट्रपति को संदर्भित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए 3 महीने की समय सीमा तय की है. सर्वोच्च न्यायालय ने इस ज्ञापन का उल्लेख करते हुए उस का अंश भी उद्धृत किया. सर्वोच्च न्यायालय को यह समय सीमा उचित प्रतीत हुई इसलिए उस ने 3 माह की सीमा तय कर दी.

कोर्ट के आदेश के बाद सारे विधेयक बिना राष्ट्रपति की सहमति के पारित हो गए. इस से बौखलाई सरकार के उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ बयानबाजी की. उस के बाद भाजपा संसद निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा भी सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम ले कर बयानबाजियां करने लगे. हालांकि वरिष्ठतम राजनैतिक पद धारकों को राष्ट्र की संस्थाओं के विरुद्ध नहीं बोलना चाहिए मगर उप राष्ट्रपति महोदय जगदीप धनखड़ ने दिल्ली के वाइस प्रेसिडैंट एनक्लेव में राज्यसभा के प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए कहा, ”लोकतंत्र में जनता की चुनी हुई सरकार सब से अहम होती है. हर संस्था को अपनी सीमा में रह कर काम करना चाहिए. कोई भी संस्थान संविधान से ऊपर नहीं है. अदालतें राष्ट्रपति को कैसे आदेश दे सकती हैं. संविधान के आर्टिकल 142 का मतलब ये नहीं होता कि आप राष्ट्रपति को भी आदेश दे सकते हैं. भारत के राष्ट्रपति का पद काफी ऊंचा है. आख़िर हम कहां जा रहे हैं. देश में हो क्या रहा है?”

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पहले सुप्रीम कोर्ट के जज का नाम ले कर उन्हें गृहयुद्ध का जिम्मेदार ठहरा दिया और उस के बाद वे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी पर पिल पड़े. कुरैशी को उन्होंने ”मुसलिम आयुक्त” बता दिया.

निशिकांत ने जब सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अभद्रतापूर्ण वक्तव्य दिया था तो भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने उन्हें सचेत भी किया था और उन के बयान से पार्टी को अलग बताया था. मगर निशिकांत पर भाजपा अध्यक्ष की बात का कुछ असर नहीं हुआ और अगले ही दिन उन्होंने कुरैश के ऊपर अभद्र टिप्पणी कर दी. इस से दो बातें समझ में आती हैं. या तो जे. पी. नड्डा ऊपरी ऊपरी चेतावनी दे रहे हैं और भीतर भीतर निशिकांत की पीठ थपथपाई जा रही है. या फिर जे. पी. नड्डा को अब भाजपाई सांसद कोई भाव नहीं देते. एक बात और हो सकती है. निशिकांत दुबे को कोई और बड़ी हस्ती संरक्षण दे रही हो. यह भी हो सकता है कि नड्डा और दुबे दोनों ही उस सुपर पावर से निर्देशित हो रहे हों. खैर जो भी है, भाजपाइयों के ऐसे वक्तव्य देश की एकता और अखंडता तथा सामाजिक समरसता के लिए बहुत घातक हैं.

पिछले दो हजार साल का इतिहास, स्पष्ट रूप से बताता है कि देश में ऐसी नफरती ताकतें समयसमय पर समाज को छिन्नभिन्न करने का काम करती रही हैं. इसी कमजोरी के कारण देश कभी विदेशी आक्रांताओं का मुकाबला नहीं कर सका और अधिकतर समय में राजनैतिक रूप से एक इकाई नहीं बन सका. ये नफरती तत्व यह नहीं जानते हैं कि वे कितना बड़ा राष्ट्र विरोधी और मानवता विरोधी कार्य कर रहे हैं. इन का सिर्फ एक ही मकसद है कि येनकेनप्रकारेण बस सत्ता में बने रहें. राष्ट्र गर्त में जाता है तो जाए. आम जनता दंगे-फसाद में मारी जाए तो इन को मतलब नहीं.

ऐसी परिस्थितियों में न्याय संस्थानों, बुद्धिजीवी वर्ग और आम जागरूक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी हरकतों का यथा परिस्थिति, विरोध करते रहें. खामोशी एवं तटस्थता भी गंभीर अपराध है. रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था –
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध ।
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उन का भी अपराध ।।

Hindi Story : अठारह साल का चाँद

Hindi Story : जब श्रावणी घर से निकली तो सुबह के आठ बज रहे थे। साढ़े आठ बजे की ट्रेन थी। ट्रेन समय पर आने से, वह कक्षा शुरू होने से दस मिनट पहले कॉलेज पहुँच गई। डी.डी. की कक्षा के बाद, श्रावणी, पल्लवी और अनुरूप कैंटीन में जाकर बैठ गईं। अगली कक्षा मैडम की थी। मैडम तो छुट्टी पर थीं। मैडम को बच्चा होने वाला था। कक्षा रद्द नहीं होगी, वैकल्पिक रूप से एक अंशकालिक शिक्षक थे। डी.एम.। दीपक मंडल। कई लड़कियाँ उन्हें पीठ पीछे अंडा भी कहती थीं। वे तीनों यह कक्षा नहीं करती थीं।

दरअसल, उन्हें अच्छा नहीं लगता था। सवाल पूछने पर जवाब नहीं देते थे। पढ़ाने का तरीका भी नीरस था। इसलिए बस!
पल्लवी कैंटीन की रूपामसी से बोली:
-मासी, क्या सब्जी गरम होगी?
मासी हँसकर बोलीं- अभी तो उतरी है। कितने दूँ, बच्ची?
-दो-दो दे दो। सॉस और सलाद थोड़ा ज्यादा। पाँच नंबर टेबल पर।
-तीन तो हो।
-हाँ।
-तुम ले जाओ, बच्ची। काम करने वाला लड़का कुछ दिनों से नहीं आ रहा है। आज दोपहर को जाकर देखूँगी। बुखार-वखार तो नहीं हो गया।

खाते-खाते श्रावणी बोली- अगली कक्षा के.पी. की है। आज सब मिलकर पकड़ेंगे। समझी! नोट्स नहीं मिले तो दिक्कत होगी। केमिस्ट्री के पासिंग के लिए विस्तृत पढ़ाई की जरूरत नहीं है, सर के नोट्स रट लो, हो जाएगा।

अनुरूप भड़क उठी- श्रावणी, तू क्या है? कैंटीन में भी पढ़ाई की बातें। यहाँ सिर्फ खाना और प्रेम की बातें होंगी। समझी।

छह नंबर टेबल की दो लड़कियाँ उनकी बातें ध्यान से सुन रही थीं। वे धीरे से हँसीं। श्रावणी उठ गई। उन दोनों लड़कियों के सामने जाकर खड़ी हो गई। धीरे से हँसकर बोली- कौन से साल में हो?

-पहले साल में। उनमें से एक ने कहा।
-ओह! कौन से विषय?
दूसरी ने कहा- वह रेशमी है, उसकी बंगाली है। मैं रितु हूँ, मेरी हिस्ट्री है।
-मैं भी पहले साल में हूँ। फिजिक्स। ये मेरी सहेलियाँ हैं। पल्लवी और अनुरूप। हाथ बढ़ाकर दिखाया। वे भी फिजिक्स हैं। इतना कहकर श्रावणी ने हाथ आगे बढ़ाया।
-आज से हम दोस्त हैं, ठीक है!
वे फिर शरद ऋतु की नदी की तरह हँसीं।

तीन महीने कक्षाएँ हो गईं। श्रावणी को बहुत अच्छा लग रहा था। हर दिन कितने दोस्त बन रहे थे। ऑनर्स की पढ़ाई वैसे भी थोड़ी कठिन होती है। पढ़ाई पर थोड़ा और जोर देना होगा। कम से कम फर्स्ट डिवीजन तो चाहिए ही। वरना यूनिवर्सिटी कैसे जाऊँगी।

कॉलेज के बाद एक ट्यूशन है। वह स्टेशन के पास ही है। अयन चटर्जी। ऑनर्स की ट्यूशन। सप्ताह में तीन दिन। महीने में आठ सौ रुपये दक्षिणा। छोटे-छोटे बैचों में पढ़ाते हैं। पाँच-पाँच के बैच। उन्होंने अभी तक शादी नहीं की है।

अनुरूप फिर दूसरी बात कहती है, शादी नहीं की है, ऐसा नहीं है। पत्नी पागल है। इसलिए मायके में है।

वह गप्प मारने में माहिर है, लेकिन लड़की मिलनसार है। बातों में तेज है। ट्यूशन शुरू हुए एक सप्ताह भी नहीं हुआ था। अचानक बोल पड़ी- सर, आपने शादी नहीं की?

-नहीं। अचानक इस विषय में जिज्ञासा!
-नहीं, बस ऐसे ही!
-ओह, तो यह बात है।
-खाना खुद बनाते हैं?
-खाना बनाना आता तो अच्छा होता।
-किसी तरह होटल में काम चला लेता हूँ।
-रसोईया भी रख सकते हैं।
-रख सकता हूँ, लेकिन उन झंझटों से दूर रहना ही अच्छा है।
-दिक्कत नहीं होती?
-शुरुआत में होती थी, अब नहीं होती।
पल्लवी इशारे से कहने की कोशिश कर रही थी, अनुरूप, यह क्या हो रहा है? अनुरूप को कोई परवाह नहीं थी।
-आपकी उम्र बहुत कम है। शादी कर लीजिए।
-सोच तो रहा हूँ। लेकिन! सर हँसे।
-लेकिन क्या! जल्दी कीजिए। हमें भी एक पार्टी मिल जाएगी।
-इस जन्म में तो नहीं हो रहा है। अगले जन्म में कोशिश करके देखूँगा।
सभी लोग हँस पड़े। बाहर आकर अनुरूप ने कहा, समझी श्रावणी, मैं सर को फँसा लूँगी, देखना। जाल तो डाल दिया है।
-तू कर सकती है।
-कर सकती हूँ, इसलिए तो कह रही हूँ। तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा?
पल्लवी ने कहा, बुरा तो थोड़ा लगेगा ही, लेकिन क्या कर सकते हैं।

ट्यूशन खत्म होते ही काफी देर हो गई। दरअसल, थर्मोडायनामिक्स के नोट्स खत्म होते ही साढ़े पाँच बज गए। स्टेशन पहुँचने में पाँच मिनट लगते हैं। प्लेटफॉर्म पर पहुँचते ही ट्रेन छूट गई। यही शाम की ट्रेन थी। इसके बाद आखिरी ट्रेन साढ़े सात बजे है। कभी-कभी देर भी हो जाती है। लगभग दो घंटे इंतजार करना होगा। भूख भी लग रही थी। स्टेशन की कैंटीन में जाकर बैठी। एग टोस्ट और चाय। सिर हल्का लग रहा था। बाजार से स्टेशन की कैंटीन का खाना थोड़ा महंगा है। कैंटीन के लड़के से बोतल में पानी भरवाकर बाहर आ गई। मैगजीन के स्टॉल से एक साइंस मैगजीन खरीदी। छह बजकर दस मिनट। घर पर फोन करना होगा। टेलीफोन बूथ में गई। बूथ के लड़के ने पूछा- लोकल कॉल या एस.टी.डी.!

-हाँ। लोकल।
-सामने वाले में जाइए।
-हेलो, माँ, मैं श्रावणी बोल रही हूँ।
-हाँ, बोलो।
-शाम की ट्रेन छूट गई।
-क्यों?
-ट्यूशन में देर हो गई।
-ओह, अच्छा, कुछ खाया है?
-हाँ। अगली ट्रेन से आ रही हूँ, नौ बजे तक पहुँच जाऊँगी।
-अच्छा ठीक है। सावधानी से आना।
वेटिंग रूम में बैठते ही आठ-दस साल का एक लड़का हाथ फैलाने आया।
-खुल्ले नहीं हैं, जाओ। किसी और दिन दूँगा।

लड़का खड़ा रहा। सामने बैठी एक महिला ने बैग से खुल्ले निकालकर एक रुपया दिया, तो लड़का दौड़कर चला गया। श्रावणी देखती रही। लाइन के उस पार जाकर लड़का रुक गया।

कुछ देर बाद एक छोटी बच्ची, उससे भी छोटी बच्ची को गोद में लेकर महिला के पास आकर खड़ी हो गई। उन्होंने दोनों को दो-दो रुपये दिए, तो वे चली गईं। कुछ दूर जाकर पहले वाला लड़का आकर रास्ता रोककर खड़ा हो गया। देखना चाहता था कितने हैं? हाथ खोलकर दिखाते ही रुपये छीनकर भाग गया। और बच्ची खड़ी-खड़ी रोने लगी। इस तरह के दृश्य श्रावणी अक्सर देखती है। उन्हें देखकर ही पता चलता है कि कितने दिनों से नहाए नहीं हैं। खाना शायद मिल जाता है। शिक्षा! स्वास्थ्य! इसी तरह वे बड़े होते हैं। फिर…

मैगजीन के पन्ने पलट रहे थे। अब पढ़ने का मन नहीं कर रहा था। बैग में रख लिया। टॉयलेट से होकर आना होगा। टॉयलेट से बाहर आते ही घोषणा सुनाई दी, ट्रेन तीन नंबर प्लेटफॉर्म पर आ रही है।

ट्रेन से उतरते ही घड़ी देखी, आठ बजकर पच्चीस मिनट। रिमझिम बारिश हो रही थी। छाता भी नहीं लाई थी। ऊपर से बिजली भी नहीं थी। प्लेटफॉर्म से निकलते ही रिक्शा लेने का फैसला किया।

-दादा, रवींद्रपल्ली जाओगे?
-रिक्शावाले ने कहा, बीस रुपये लगेंगे।
-दिन में तो दस रुपये देती हूँ।
-वह भड़क गया।
-दस में नहीं होगा। दूसरा देख लो।
-सामने वाले रिक्शावाले ने बुलाया, बैठो, बैठो। दस में ले चलूँगा।
-श्रावणी बैठ गई। चौक बाजार आते ही, उसने पान की दुकान से बीड़ी और माचिस खरीदी। कुछ दूर जाते ही लगा कि रिक्शा दूसरी तरफ जा रहा है।
श्रावणी ने कहा, दादा, रास्ता तो जानते हो?
-जानता हूँ, जानता हूँ। बहुत जानता हूँ। चुपचाप बैठी रहो।

बारिश अभी भी नहीं रुकी थी। बीच-बीच में बिजली चमक रही थी। बिजली की चमक में देखा कि रिक्शा कच्चे रास्ते पर चल रहा है। श्रावणी चिल्ला पड़ी- रिक्शा घुमाओ। मुझे रवींद्रपल्ली जाना है।

रिक्शा रुक गया। वह उसकी तरफ बढ़ रहा था। अलकतरा जैसा गहरा अंधेरा। रिमझिम बारिश और झींगुरों और मेंढकों की आवाज। डर से गले से आवाज नहीं निकल रही थी।

तभी, दूर से एक रोशनी चमकी, और उसने अयन सर का चेहरा देखा। वह उसे ढूँढते हुए आए थे। उनकी आँखों में चिंता और प्यार का मिश्रण था। उन्होंने उसे रिक्शावाले के चंगुल से बचाया और सुरक्षित घर पहुँचाया।

घर पहुंचकर, श्रावणी ने महसूस किया कि अयन सर का साथ उसके लिए कितना महत्वपूर्ण है। उनकी देखभाल और प्यार ने उसके दिल में एक नई उम्मीद जगाई। अगली सुबह, अयन सर उसे कॉलेज लेने आए, और उन्होंने एक साथ दिन बिताया। उन्होंने एक-दूसरे के साथ अपने सपने और आशाएँ साझा कीं।

श्रावणी ने महसूस किया कि अयन सर के साथ, उसका जीवन एक नया मोड़ ले रहा है। उनकी दोस्ती प्यार में बदल गई, और उन्होंने एक साथ एक सुंदर भविष्य की कल्पना की। अठारह साल के चाँद की तरह, उनका प्यार भी चमक रहा था।

उस रात, वे एक-दूसरे की बाहों में खो गए, उनके शरीर गर्मी और प्यार में मिल गए। जैसे अठारह साल का चाँद उनके प्यार की बाढ़ में पिघल रहा था। यहाँ कोई मंदी नहीं है। कोई अशांति नहीं है। दो शरीर अनंत प्रेम के वातावरण में एक साथ विलीन हो गए हैं। मानो चाँद पर चाँद लगा हो।

लेखक : बिस्वजीत लायेक

Emotional Story : अब समय आ गया है  

Emotional Story : ‘‘मेरे पूरे जिस्म में दर्द हो रहा है. पूरा जिस्म अकड़ रहा है. आह, कम से कम अब तो मुक्ति मिल जाए. कोई तो बुलाओ डाक्टर को,’’ पुष्पा कराहते हुए बोल रही थी.

‘‘शांत हो जाओ, मां. लो, मुंह खोलो, दवा पिलानी है,’’ मंजू बोली.

‘‘मेरी बच्ची, अब समय आ गया, मैं नहीं बचूंगी,’’ कहते हुए पुष्पा ने गिलास लगभग छीनते हुए पकड़ा और दवा एकदम गटक ली.

मंजू को लगा कि मां के जिस्म में चेतना आ रही है और वे सही हो जाएंगी. वैसे भी, पहले भी कई बार ऐसा ही कुछ हुआ था. अभी वह सोच ही रही थी कि गिलास के गिरने की आवाज आई और उस की मां पुष्पा का शरीर एक ओर लुढ़क गया.

‘‘मां, मां, उठो, बात करो मु झ से. आंखें खोलो न.’’ पर मां तो जा चुकी थीं, दूर, बहुत दूर.

कमरे में सन्नाटा छा गया था. अगर कोई विलाप कर रहा था तो वह थी मंजू. रोते हुए उस ने अपने पति को सूचना दी और वहीं बैठ गई. वह मां के पार्थिव शरीर को पत्थर बनी ताकती रही.

‘‘रात के डेढ़ बजे हैं, सब काम सुबह होंगे,’’ कह कर भाईभाभी अपने कमरे की तरफ चल दिए. वह बारबार मां को छू कर देखती, उम्मीद लिए कि शायद वापस आ जाएंगी वे. फिर सब की शिकायत करेंगी उस से.

कितना दुखी जीवन था उस की मां पुष्पा का. मंजू ने जब से होश संभाला हमेशा मां को रोते ही देखा…एक जल्लाद पति, बृजेश, हमेशा नशे में धुत. कहने को तो स्कूल अध्यापक था, पर ताश खेलना और शराब पीना, बस, यही उस की दिनचर्या थी. जब देखो तब वह पुष्पा को जलील करता, नशे में मारता, गालियां देता. कई बार उस ने पुष्पा को जान से मारने की भी कोशिश की थी. लेकिन आदमी जो ठहरा, रात में अपने शरीर की पिपासा बु झाने से भी वह बाज न आता.

सबकुछ सह रही थी पुष्पा. सिर्फ और सिर्फ अपने 3 छोटे बच्चों के लिए. कहां जाती वरना. न तो सासससुर का साया था और न ही मातापिता का. नाम का भाई था जो कभीकभी पत्नी से छिप कर मिलने आ जाता था और चुपचाप कुछ रुपए उस के हाथ में रख जाता.

बृजेश की आधी से ज्यादा कमाई ऐयाशी में उड़ जाती. जैसेतैसे घर की गाड़ी चल रही थी, बच्चों के साथ परेशानियां भी बड़ी होने लगीं.

बृजेश के काले मन को पुष्पा भांप गई थी, इसलिए साए के जैसे वह मंजू के साथ रहती. एक दिन पड़ोस में गमी में जाना पड़ गया, तो वह मंजू की जिम्मेदारी अपने बड़े बेटे पर सौंप कर चली गईं. बृजेश को जैसे भनक लग गई थी, उस ने अपने बेटे को किसी काम से बाजार भेज दिया और मंजू को अपनी बांहों में दबोच लिया. वह अपने को छुड़ाने के लिए छटपटा रही थी पर बृजेश पर तो शैतान हावी था.

अचानक पुष्पा आ गई. यह देखते ही वह गुस्से से पागल हो गई. वहीं एक बांस रखा था, आव देखा न ताव, वह बृजेश को पीटने लगी, ‘कमीने, बेशर्म, चला जा यहां से. बाप के नाम पर धब्बा है तू. कभी सूरत मत दिखाना. मैं नहीं चाहती तेरा साया भी पड़े मेरे बच्चों पर.’ मंजू सहमी सी खड़ी देख रही थी यह सब. धमकी दे कर बृजेश वहां से चला गया.

अब पुष्पा सिलाई और बिंदी बनाने का काम करने लगी. उसी से घरखर्च चल रहा था. बड़े बेटे ने पढ़ाई छोड़ दी. उसे शराब और सट्टेबाजी की लत लग गई. अकसर नशे में वह मां को कोसता और गाली देता. वह बाप के जाने का दोषी मां को ठहराता था.

पुष्पा खून के आंसू पी कर रह जाती. पुष्पा को अब बड़े होते बच्चों की चिंता सताने लगी थी. सो, म झले बेटे को उस के मामा के घर भेज दिया आगे पढ़ने के लिए. इंटर पूरा करते ही मंजू के हाथ पीले कर दिए. म झले बेटे की पढ़ाई पूरी होते ही नौकरी लग गई बैंक में. पुष्पा ने उस का भी विवाह कर दिया. जबकि बड़ा अभी कुंआरा था.

आशा के विपरीत म झले बेटे की बहू ने सब की जिम्मेदारी से बचने के लिए अलग घर बसाने की पेशकश की और शहर से बाहर चली गई. फिर कभी नहीं आई. कितनी बार पुष्पा ने उसे बुलाना चाहा पर उसे नहीं आना था सो नहीं आई. टूट चुकी थी पुष्पा. अब बड़े बेटे की जिम्मेदारी से निबटने के लिए उस का भी विवाह कर दिया.

इसी बीच, बृजेश को कैंसर हो गया. दरदर भटकते अब उसे घर की याद आई थी. पुष्पा को याद करता हुआ किसी तरह पहुंच ही गया उस के पास. अपने आखिरी दिनों में उस ने अपने किए की कई बार पुष्पा से क्षमा मांगी. पुष्पा ने उसे घर में रुकने की इजाजत तो दे दी पर दिल से माफ नहीं कर पाई. अब घर एक जंग का मैदान हो गया था.

पुष्पा कुछ भी कहती, बहू दानापानी ले कर चढ़ जाती. आखिरकार एक दिन बृजेश ने इस दुनिया से विदा ली. धीरेधीरे गमों को पीते हुए पुष्पा भी बिस्तर से लग गई, उस के पैर बेकार हो चुके थे. बहू उस की कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती थी, उलटा आएदिन अपना हिस्सा मांगती. पुष्पा के पास अगर कुछ था तो यही एक मकान, जहां अब वह जिंदगी के बाकी बचे दिन काट रही थी. सब की नजर उस मकान पर थी. शायद पुष्पा की आंख बंद होने का इंतजार था.

पुष्पा ने एक आया सुनीता लगा ली थी. वही उस के सब काम नहलानाधुलाना आदि करती थी. आएदिन पुष्पा मंजू को फोन कर के उस से घर के सदस्यों की शिकायत करती. मंजू जब भी भाभी को सम झाना चाहती, वह टका सा जवाब देती. हार कर फिर वह मां को ही सम झाती. पुष्पा अकसर मंजू से बोलती, ‘लल्ली, तू नहीं सम झेगी, मेरे जाने के बाद पता चलेगा. सारा जीवन दे दिया पर कोई अपना नहीं हुआ. यह दुनिया पैसे की है. मु झे कोई नहीं पूछता, सारे दिन गफलत में पड़ी रहती हूं. जिस दिन कुछ खाने को मांग लिया उसी दिन तूफान.’

‘‘जीजी, जीजी,’’ सुनीता की आवाज से मंजू चौंकी. ‘‘जीजाजी आ गए. पति को देखते ही उस के सब्र का बांध टूट गया. वह खूब रोई. इतने में सुनीता ने एक पत्र उस के पति को देते हुए कहा, ‘‘अम्मा लिख गई हैं, कह रही थीं, मेरे बाद मंजू को देना.’’ शायद, पुष्पा को अपने आखिरी समय का एहसास हो गया था.

मंजू ने पत्र पति के हाथ से ले लिया. आंसू पोंछते हुए पत्र पढ़ने लगी.

‘मंजू बेटी, तू दुनिया की सब से अच्छी बेटी है. तू ने मेरी बहुत सेवा की. मेरी एक विनती है कि मेरे बाद मेरा क्रियाकर्म संबंधी काम एक दिन में ही पूरा कर देना, जिन बहूबेटों के पास जीतेजी मेरे लिए समय नहीं था उन को बाद में भी परेशान होने की जरूरत नहीं.

‘पिछले महीने ही तू मेरे लिए कपड़े लाई थी, वे सब बांट देना. मेरी रोटी के लिए जिन के पास रुपए नहीं थे वे मेरे बाद मु झ पर खर्च न करें. दामादजी, आप इस घर का सौदा कर दें. उस सौदे से मिलने वाली रकम के 3 हिस्से करना. एक हिस्सा इन दोनों लड़कों का और दो हिस्से में से एक सुनीता को दे देना. बेचारी ने बहुत ध्यान रखा मेरा. अगले महीने उस की लड़की की शादी है. एक हिस्सा मेरी नातिन का है. मंजू बेटी, तू मेरा बेटा भी थी. मेरी हर छोटी से छोटी जरूरत और इच्छा का खयाल रखा तू ने. शायद मैं जिंदा ही तेरी वजह से थी. कर्जदार हूं मैं तेरी. सदा खुश रहो. सब को तेरी जैसी बेटी मिले.’

‘‘मां.’’

सब की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे. मां के कहेनुसार एक ही दिन में सब कार्य कर मंजू अपने पति के साथ भारी मन से वापस अपने घर चली गई.

मां के साथ ही उस के दुखों का अंत हो गया था. बड़ी दुखदायी, एक कहानी का अंत हो गया था. बड़ा लंबा वनवास था यह. 70 साल का सफर कम नहीं होता, जो पुष्पा ने अकेले ही तय किया था. जीवन जिया तो था उस ने लेकिन सुख के दिन क्या होते हैं, कभी नहीं देख सकी.

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