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छोटा भीम कुंगफू धमाकाः हौलीवुड स्तर का एनीमेशन

रेटिंग: साढ़े तीन स्टार

निर्देशक : राजीव चिलाका

 

छोटा भीम और छुटकी, राजू, कालिया आदि के रोमांचक कारनामों को देखने की चाह रखने वालों के लिए राजीव चिलाका एक बार फिर उसकी अगली कड़ी एनीमेशन फिल्म ‘‘छोटा भीम कुंगफू धमाका’’ लेकर आ गए हैं. पहली बार इसे ‘टू डी’ की बजाय ‘थ्री डी’ में बनाने का सफल प्रयास किया है.

भारत में ढोलकपुर निवासी छोटा भीम और उसके छुटकी, राजू, जग्गू, कालिया व अन्य दोस्तों की यह कहानी इस बार चाइना पहुंच गयी है. भीम अपने सभी दोस्तों के साथ चाइनीज दोस्त मिक के निमंत्रण पर चाइना के कुंगफू टुर्नामेंट में हिस्सा लेने पहुंचता है. इसका आयोजन चाइना के महाराजा ने अपनी बेटी और प्रिंसेस किआ के जन्मदिन के अवसर पर रखा है. यहीं पर पता चलता है कि चीन के पूर्वज ड्रैगन किंग की कृपा है और ड्रैगन किंग ने किआ के पहले जन्मदिन पर आकर किआ के हाथ पर एक सुरक्षा कवच का चिन्ह अंकित किया था. यह भी पता चलता है कि मिक, प्रिंसेस का मंगेतर है. प्रतियोगिता शुरू होती है, इस प्रतियोगिता के पहले दौर में अलग अलग प्रतिस्पर्धियों के साथ राजू, छुटकी आदि लड़ते हैं. सबसे अंत में महाबली आता है. यह कई वर्षों से लगातार चैंम्पियन ट्रौफी लेकर जाता आ रहा है. इससे लड़ने के लिए कोई तैयार नहीं होता, तब भीम आगे बढ़ता है. पहले दो राउंड में तो भीम हार जाता है. पर फिर भीम को याद आता है कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती. इस बार भीम दोगुने जोश व नई उर्जा के साथ लड़ता है और उसे दो के मुकाबले तीन अंक से हरा देता है. अंततः भीम को उस दिन विजयी घोषित किया जाता है. पर टुर्नामेंट अभी खत्म नहीं हुआ है. अभी दूसरे दिन दूसरे दौर की प्रतियोगिता होनी है ,जिसमें पहले दौर के विजेता का मुकाबला अन्य कुंगफू में माहिर प्रतिस्पर्धियों से होना है. उससे पहले मिक शाम को भीम व उनके साथियों को लेकर राज महल जाता है. जहां प्रिंसेस किआ इनसे बातें करती है और भीम के सभी साथियों के साथ प्रिंसेस किआ की दोस्ती हो जाती है. दूसरे दिन प्रतियोगिता शुरू होती है, पर तभी वहां पर महाराज का भतीजा और प्रिंसेस का चचेरा भाई जुहू पहुंच जाता है और वह प्रिंसेस किआ को अपने साथ लेकर गायब हो जाता है. पता चलता है कि कुछ साल पहले जुहू को चीन के महाराजा ने देश निकाला दे दिया था, इसलिए अब ताकत व कुछ जादुई/तिलस्मी शक्तियां हासिल करने बाद वह बदला लेने आया है. उसका मकसद पूरे चीन को खत्म करना है. इसीलिए वह किआ के माध्यम से ड्रैगन किंग को बुलाकर उनसे ज्वालांश हासिल करना चाहता है. जुहु को पता है कि इस विश्व में ज्वालांश सिर्फ एक ही इंसान के पास हो सकती है, जिसके पास ज्वालांश होगी, वही अपराजित होगा.

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महाराज अपनी बेटी किआ को वापस लाने वाले को देश की आधी संपत्ति इनाम में देने की घोणणा करते हैं. कुछ वीर योद्धा जुहू के पीछे भागते हैं. भीम व उसके साथियों को लगता है कि उनकी दोस्त प्रिंसेस किआ मुसीबत में है, तो उसकी मदद की जानी चाहिए. इसलिए भीम व उनके साथी भी जुहु के ठिकाने की तरफ बढ़ते हैं. पर जुहु के किले के अंदर प्रवेश करना नामुमकीन है, तभी एक सर्कस टीम को महल की तरफ जाने से रोककर भीम सभी को मौत देकर वह और उसके साथी सर्कस वालों की वेशभूषा पहनकर किले के अंदर किआ तक पहुंच जाते हैं. जहां जुहु से युद्ध होता है. जुहु अपनी जादुई शक्ति के बल पर भीम व उनके साथियों को अधमरा कर नदी में फेंक देता है. जुहु को लगता है कि यह सभी नदी में डूबकर मर जाएंगे. भीम को भी अहसास हो जाता है कि जुहु से लड़ना बहुत मुश्किल है, क्योंकि उसके पास तो जादुई शक्तियां है. किसी तरह यह सभी नदी में डूबने से बच जाते हैं. एक बाबा इन सभी को अपने आश्रम लाकर इनका इलाज करता है, उसके पोते को भी जुहु ने बंदी बना रखा है. यह बाबा ही भीम व उसके साथियों को मार्शल आर्ट व कुंगफू के नए दांव तथा भीम को खास तरह की ट्रेनिंग व शिक्षा देता है.

उधर प्रिंसेस किआ के जन्मदिन पर एक आयोजन जुहु करता है. जहां प्रिंसेस किया ड्रैगन किंग को बुलाकर रोते हुए उनसे ज्वालांश लेकर जुहु को देती है, पर तभी भीम अपने साथियों के साथ पहुंच जाता है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः भीम, किआ को छुड़ाकर चाइना के राजा को सौंपता है. और कुंगफू टुर्नामेंट की ट्रौफी भी हासिल करता है.

पटकथा लेखक ने कहानी को बहुत ही सरल अंदाज में बयां करने का प्रयास किया है. बहुत कुछ तयषुदा पद्धति से ही आगे बढ़ता है. कहानी व पटकथा दर्शकों को एक सकारात्मक सीख देती है. एनीमेटेड किरदारों के साथ लोग रिलेट करते हैं. एनीमेशन क्रिएटर ने रंगो का चयन भी बहुत ही बेहतरीन किया है.

कुंगफू की तकनिक की बारीकियों पर बहुत ज्यादा जोर न दिए जाने के बावजूद तमाम दृष्य बहुत अच्छे ढंग से डिजाइन किए गए हैं. हर फ्रेम रंगीन और आकर्षक है. जिन कलाकारों ने डबिंग की है, उनकी आवाज चरित्रों के एक्षन के साथ एकदम मेल खाती है. एनीमेशन के साथ थ्री डी का प्रभाव अति उत्तम है.

सबसे बड़ा सच यह है कि हौलीवुड या पश्चिमी देशों की एनीमेशन फिल्मों के प्रशंसक भी ‘‘छोटा भीम कुंगफू धमाका’’के एनीमेशन को कमतर नही आक सकते. इस फिल्म का एनीमेशन हौलीवुड फिल्मों के स्तर का ही है. किंतु ‘छोटा भीम’ की पिछली फिल्मों के मुकाबले इस बार रोमांच के तत्व कुछ कम हैं. इसके अलावा फिल्म कुछ लंबी हो गयी है. इंटरवल के बाद फिल्म पर से निर्देशक व लेखक की पकड़ कमजोर नजर आती है.

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मगर कुछ कमियों के बावजूद फिल्म भावनामक स्तर पर बांधकर रखती है.फिल्म के दो संदेश बच्चों को याद रह जाते हैं. पहला प्यार व दोस्ती बिना शर्त और निःस्वार्थ भाव की बुनियाद पर होनी चाहिए. हमेशा दोस्त के साथ खड़े रहना चाहिए. दूसरा संदेश कि कोशिश ही सफलता का पहला कदम है.

फिल्म के पाष्र्व संगीत की भी तारीफ की जानी चाहिए. फिल्म के अंत में बौलीवुड स्टाइल के गाने को लेकर एक नया प्रेयोग जरुर किया गया है, मगर यह अनावश्यक लगता है.

एक घंटे 43 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘छोटा भीम:कुंग फू धमाका’’ के लेखक, निर्माता, निर्देशक और क्रिएटर राजीव चिलाका हैं.

सोशल मीडिया नहीं जमीन पर मिल रहा जवाब

सोशल मीडिया पर भले ही ‘भक्त’ कहे जाने वाले लोग ‘मोदी सरकार’ के खिलाफ कोई बात सुनने को तैयार ना हो. मोदी सरकार के खिलाफ बात करने पर गाली सुनने को मिलती हो. पर गांव देहात में मोदी सरकार के ‘कामकाज’ से लेकर उनके ‘चाय पकौड़ा‘  बिजनेस तक की खूब खिल्ली उड़ रही है. ये भी बात हो रही है कि चुनाव खत्म होने के बाद अगर मोदी सरकार बन गई तो सड़क किनारे रेहड़ी, दुकान, लगाने वालों से और ज्यादा पैसे वसूल किये जाने लगेंगे.

इनको सोशल मीडिया पर ‘ट्रोल’ होने का खतरा नहीं है. शहर में बस अड्डे के पास चुनावी चर्चा में भाजपा का प्रचार करने वाले जब वहां से आगे बढ़े तो भीड़ के रूप में खड़े लोगों ने चर्चा शुरू कर दी. ये लोग आपस में बात कर रहे थे कि ‘दाल रोटी खाने को मिल नहीं रहे. रोजी रोजगार छिन गये है.

ये लोग कहते हैं मोदी का ढोल पीटो’. जौनपुर के करीब के गांव के रहने वाले लोग मजदूरी करने शहर आते हैं. दिन में यहां काम करके बस स्टेशन के पास सोते हैं. चाय की दुकान पर चाय पीते समय लोग आपस में एक दूसरे के इलाके के हालत पता करते हैं. केराकत के रहने वाले युवक ने कहा ‘हमारे यहां सपा-बसपा और कांग्रेस की लहर सही चल रही हैं. मोदी जी के साथ तो केवल बाबू साहब लोग ही हैं’.

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इनमें से एक युवक ने कहा ‘भईया रेडियो पर तो हम हर गाने के बाद मोदी जी का प्रचार सुन रहे हैं. मोदी है तो मुमकिन है.’ दूसरा युवक थोड़ा गुस्से में बोला ‘रेडियो वाले पइसा लेते हैं. इसलिए मोदी है तो मुमकिन है का टोन बजा रहे हैं. हमारी तो दाल रोटी दिन पर दिन महंगी होती जा रही और मजदूरी घटती जा रही. इससे अच्छा तो पहले रहा कम से कम मनरेगा में गांव में ही काम तो मिल जाता था. घर पर खाना सोना मिल रहा था.

यहां तो काम के साथ लाला की गाली सुनों और सडक पर पड़े रहो सडक पर खाना बना के खा लो. हमका भी सेना में भर्ती कर ले मोदी जी तो जानें कुछ कर रहें.’

इनकी चर्चा को सुनने के लिये जरूरी था कि बीच में कोई टिप्पणी ना की जाये. ये लोग आदमी के सामने उसकी बातचीत के हिसाब से बोलने लगते थे. मोदी सरकार का प्रचार करने उनकी टीम से कुछ लोग फिर आ जाते हैं. ये लोग उनकी हां में हां मिलाने लगते हैं.

इसलिए केजरीवाल के साथ नहीं अग्रवाल समाज

एक नेता जी ने तो इनके साथ वहां चाय पी रहे 20-25 लोगों की चाय का पैसा खुद ही दे दिये. चाय पीने के बाद लोग फिर कहते है ‘भइया बहुत मौज हो गई. चुनाव खत्म होते है फिर से महंगाई बढ़ जायेगी.‘ एक युवक सड़क किनारे समतल पड़ी जमीन पर अपना बिस्तर लगाते कहता है ‘एक बात जान लो अगर मोदी जी फिर से आ गयें तो यह सड़क किनारे सोने को भी मिल रहा नहीं मिलेगा. यहां भी सोने का पैसा वसूल होने लगेगा’.

नीचता की पराकाष्ठा छू रही है राजनीति

पहली बार देश ऐसे चुनावी दौर से गुजर रहा है, जिसमें जनता से जुड़े तमाम गम्भीर मुद्दे सिरे से गायब हैं. जनता के हित की, उनके विकास की, उनके उद्धार की कोई बात नहीं हो रही है. न किसानों-मजदूरों की समस्याओं के समाधान की बात कहीं हो रही है, न देश के पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं को नौकरी देने की. न महिलाओं की सुरक्षा की बात हो रही है, न ही कुपोषित और भूख से मरते बच्चों की. न बिजली, पानी, सड़कों की बात हो रही है और न ही शिक्षा, स्वास्थ और पीने के स्वच्छ पानी की. वर्ष 2014 के आम चुनाव के वक्त विकास के ढोल पीटने वाले, दो करोड़ नौकरियां हर साल देने का दावा करने वाले, राम मन्दिर बनाने का सपना दिखाने वाले, गंगा को स्वच्छ और निर्मल करने का वादा करने वाले, विदेशों में जमा कालाधन देश में वापस लाने की बातें करने वाले और मंहगाई कम करने का दावा करने वाले लोगों के मुंह से इस बार इन मुद्दों पर भूल से भी कोई बात नहीं निकल रही है. उनके सुर इस महाचुनाव में बिल्कुल बदले हुए हैं. देश गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण, भ्रष्टाचार, अशिक्षा और बीमारियों से जूझ रहा है और तमाम नेता अपने चुनावी भाषणों में सिर्फ व्यक्तिगत छींटाकशी और गालीगलौच में लिप्त हैं. दूसरे राजनेताओं की बात तो छोड़िये, खुद देश का प्रधानमंत्री अपने पद की गरिमा को ताक पर रख कर एक ‘परिवार-विशेष’ के पीछे पड़ा हुआ है और एक दिवंगत प्रधानमंत्री के चरित्रहनन की निर्लज्ज कोशिशें कर रहा है. उस दिवंगत प्रधानमंत्री की, जिसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सुशोभित किया जा चुका है. किसी भी व्यक्ति को मृत्योपरान्त अपशब्द कहना भारत की संस्कृति कभी नहीं रही है. यह नीचता की पराकाष्ठा है. यह आज की राजनीति का बदरंग चेहरा है. यह भाजपा-मुखिया की हताशा और डर का सबूत है.

प्रतापगढ़ की रैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का नाम लिये बिना कहा, ‘आपके (राहुल गांधी) पिताजी को आपके राज दरबारियों ने गाजे-बाजे के साथ मिस्टर क्लीन बना दिया था. देखते ही देखते भ्रष्टाचारी नम्बर वन के रूप में उनका जीवनकाल समाप्त हो गया. नामदार यह अहंकार आपको खा जाएगा.’ देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति से कोई यह अपेक्षा नहीं कर सकता कि वह देश के एक पूर्व और स्वर्गवासी प्रधानमंत्री की निन्दा करके उसके बेटे और उसके परिवार को आघात पहुंचाये. मोदी की यह हरकत एक शहीद और एक देश-रत्न के सम्मान में बट्टा लगाने की ओछी कोशिश ही कही जाएगी. क्या मोदी चुनाव मैदान में कांग्रेस के उठते परचम से घबराये हुए हैं? क्या उन्हें अपनी हार का डर खाये जा रहा है?

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गौरतलब है कि राफेल मुद्दे पर बुरी तरह घिरे मोदी का यह वक्तव्य उस बोफोर्स घोटाले की ओर इशारा था, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में दिल्ली हाईकोर्ट ने स्व. राजीव गांधी को ससम्मान बरी कर दिया था और तब की सरकार ने भी इस फैसले के खिलाफ अपील नहीं करने का निर्णय लिया था. हां, जब मोदी सत्ता में आये तो बोफोर्स मामला फिर कुनमुनाने लगा, सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर जाने वाले वकील और भाजपा नेता अजय अग्रवाल ने फिर पुरानी फाइल से धूल झाड़ी और मोदी की नजरें-इनायत पाने की चाह में अदालत पहुंच गये, मगर सुप्रीम कोर्ट से उन्हें अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं मिली और कोर्ट ने उनकी अपील पर सुनवायी से ही मना कर दिया.

ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को ‘भ्रष्टाचारी नंबर वन’ कहना न सिर्फ गलत है, बल्कि उनका वक्तव्य बेहद निन्दनीय और भर्त्सना करने योग्य है. यह सिर्फ स्व. गांधी के परिवार को आहत करने की नीयत से कही गयी बात है, जिसको बकौल मोदी ‘फैक्ट’ कहा जा रहा है. इन्हीं ‘फैक्ट्स’ में मोदी अब गांधी परिवार के निजी पलों को भी गिना रहे हैं. मसलन गांधी परिवार अपने हौलीडेज पर कहां जाता था. उनके साथ हौलीडे टूर पर कौन-कौन दोस्त होते थे. वे क्या खाते थे, क्या पहनते थे, कहां घूमते थे, आदि.

हैरत है कि लोकतन्त्र में जनता से जुड़े सवाल, उनके मुद्दे, उनकी समस्याओं को दरकिनार करके देश का प्रधानमंत्री एक पूर्व प्रधानमंत्री, जो उनकी बात का खंडन करने के लिए इस दुनिया में भी नहीं है, उनके निजी जीवन को ‘पब्लिक’ करने में मशगूल है, आखिर क्यों? देश में चारों ओर समस्याओं का अम्बार लगा है, नक्सली समस्या मुंह बाये खड़ी है, आये-दिन सेना के जवानों की टोलियां नक्सली हमलों में मारी जा रही हैं, देश भर में किसान आत्महत्या कर रहा है, लोग पीने के पानी के लिए त्राहिमाम कर रहे हैं, महिलाओं पर हिंसा और बलात्कार हो रहे हैं, गरीबी और भुखमरी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि खुद प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक मजबूर बाप दीपक गुप्ता ने 8 मई को अपनी तीन मासूम बच्चियों के साथ जहर खाकर आत्महत्या कर ली, और मोदी इन मुद्दों पर कोई बात ही नहीं कर रहे हैं! आखिर 19 मई को किस मुंह से वाराणसी जाएंगे प्रधानमंत्री?

2014 में सत्ता में आने की लालसा के चलते नरेन्द्र मोदी ने जनता से बड़े-बड़े वादे किये थे, मगर पांच साल गुजर गये, उनका कोई वादा वफा नहीं हुआ. ‘विकास’ और ‘अच्छे दिन’ की सारी बातें हवा हो गयीं. भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने की बातें करने वाली मोदी-सरकार खुद राफेल घोटाले में फंस गयी है, जिसमें करोड़ों रुपयों की हेरफेर सामने है और जिससे बचने के लिए मोदी तमाम जतन कर रहे हैं. राफेल मामला सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में है और आने वाले वक्त में मोदी और उनके करीबी अनिल अम्बानी के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है. चुनावी दौर में राफेल मामले की सुनवाई किसी न किसी तरह लटकायी जा सके, इसी साजिश के चलते तमाम खेल हो रहे हैं. चीफ जस्टिस औफ इंडिया पर एक महिला द्वारा यौन शोषण का आरोप लगाना, राफेल मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने वाले वरिष्ठ वकीलों के खिलाफ याचिकाएं दाखिल करवाना, कोर्ट और्डर्स में निचले अधिकारियों की मिलीभगत से फेरबदल करवा देना, इन सबके पीछे सत्ता-स्तर पर रची जा रही साजिशें काम कर रही हैं, ताकि राफेल मामले की सुनवाई किसी तरह लटकी रहे. भाजपा नहीं चाहती कि राफेल मामला चुनावी दौर में जनता के बीच मुद्दा बन जाए. वह चाहती है कि राफेल पर सुनवाई से पहले ही चुनाव निपट जाए और इसीलिए जनता का ध्यान बंटाने की गरज से मोदी तीस साल पीछे जाकर राजीव गांधी और उनके परिवार की बातें खोद-खोद कर नमक-मिर्च लगाकर परोस रहे हैं. मंशा यह कि अगर किसी तरह येन-केन-प्रकारेण भाजपा की सत्ता में वापसी हो जाए तो एक बार फिर तमाम जांच और न्याय संस्थाओं की नकेल उनके हाथ में आ जाएगी और राफेल मामला भी ठंडे बस्ते में चला जाएगा.

भाजपा को सबसे ज्यादा खतरा कांग्रेस से है क्योंकि प्रियंका गांधी वाड्रा की अगुआई में चल रहे कांग्रेस के चुनाव प्रचार ने मोदी सरकार के झूठ के पुलिन्दे की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी है और यही वजह है कि नरेन्द्र मोदी कांग्रेस पर हमलावार हैं और अपने पद की गरिमा का ख्याल किये बिना सड़कछाप भाषणबाजी पर उतर आये हैं. मोदी की बौखलाहट की दूसरी वजह यह है कि इस बार सत्ता वापसी की पूर्ण आशा खुद भाजपा नेताओं को भी नहीं है. भाजपा के वरिष्ठ नेता – सुब्रह्मणयम स्वामी और राम माधव ने तो इस पर संदेह भी जता दिया है. दरअसल अबकी बार मोदी-लहर कहीं दिखायी नहीं दे रही है. सुगबुगाहट यह है कि अगर नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा जीत के जादुई आंकड़े 271 को नहीं छू पाती है, और जोड़-तोड़ के बाद यदि सरकार बनती, तो फिर प्रधानमंत्री पद पर नितिन गडकरी बैठेंगे. ऐसे में मोदी की बौखलाहट बढ़ना लाजिमी है. वह घबराये हुए हैं. नये वादे भी नहीं सूझ रहे हैं. जनता के आगे क्या झुनझुना बजाएं? 2014 में जनता से किये वादे अगर पूरे किये होते, या उनमें से कुछेक ही पूरे कर देते, तो शायद उनकी लहर चल रही होती.

बीते पांच सालों में गौरक्षा के नाम पर कथित गौरक्षकों ने जिस तरह देश के अंदर हिंसा का तांडव किया और सैकड़ों मुसलमानों का सरेआम कत्ल किया, लव जिहाद के नाम पर जिस तरह भाजपा समर्थकों ने युवाओं का खून बहाया, जिस तरह मोदी-काल में न्याय करने वाले जजों और सच लिखने वाले पत्रकारों की हत्याएं हुर्इं, यह तमाम दाग भाजपा और मोदी के ललाट पर चमक रहे हैं. ऐसे में पढ़े-लिखे युवाओं, पिछड़ों और मुसलमानों का भाजपा से मोहभंग होना स्वाभाविक है. कांग्रेस की छवि सेक्युलर है, मगर अभी तक सिर्फ राहुल गांधी के सहारे जहां वह घुटने-घुटने चल रही थी, वहीं प्रियंका गांधी वाड्रा के सक्रिय होने के बाद वह दौड़ने के काबिल हो गयी है. प्रियंका के ‘चार्म’ ने मोदी की नींद उड़ा रखी है. यही वजह है कि जिस दिन से प्रियंका को कांगे्रस का महासचिव बनाये जाने का ऐलान हुआ, बस उसी दिन से केन्द्र सरकार के इशारों पर काम करने वाली तमाम केन्द्रीय जांच एजेंसियां सक्रिय हो गयीं.

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प्रियंका गांधी वाड्रा के कांग्रेस महासचिव की गद्दी संभाले ही उनके पति राबर्ट वाड्रा के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की जांच शुरू हो गयी. पांच साल से सो रही जांच एजेंसी को अचानक वाड्रा की जमीनें याद आ गयीं. दरअसल वाड्रा को परेशान करके भाजपा चाहती थी कि वह किसी तरह प्रियंका गांधी को डरा सके, उनके आत्मबल को कमजोर कर सके. मगर प्रियंका न डरी, न रुकी. चुनाव का परचम हाथ में लेकर वह परिवार और पार्टी दोनों ही मोर्चों पर कमर कस कर खड़ी हो गयीं. राबर्ट को जांच एजेंसी ने अलग-अलग जगहों पर बुला कर हफ्तों लम्बी-लम्बी पूछताछ की गयी. कभी दिल्ली कार्यालय में सुबह से शाम तक बैठाये रखा गया, कभी जयपुर तलब किया गया. मगर इस लम्बी पूछताछ का नतीजा क्या निकला, यह आज तक सामने नहीं आया. शायद सिफर ही रहा हो क्योंकि ऐसी जांचें सत्ता के इशारे पर सिर्फ ‘समय-विशेष’ में विरोधियों को परेशान करने की नीयत से अंजाम दी जाती हैं.

इसी बीच पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर हमला हुआ. हमले के बाद मोदी ने जगह-जगह उत्तेजक बयान दिये – ‘घुस का मारेंगे’ जैसी बातों से अपनी छवि एक वीर और जांबाज नेता की बनाने की कोशिश की, ताकि युवाओं के मुख से ‘हर-हर मोदी’ के स्वर एक बार फिर सुन सकें. मगर पुलवामा हमला संदेह और सवालों में घिर गया. इंटेलिजेंस एजेंसियों की नाकामी पर सवाल उठने शुरू हो गये. मारे गये जवानों के परिजनों ने पूछ लिया कि एक कार में इतना विस्फोटक लेकर आतंकी अगर सीआरपीएफ की बस के साथ चल रहा था, तो स्थानीय पुलिस और खुफिया विभाग क्या कर रहे थे? फिर पुलवामा का बदला लेने के लिए बालाकोट में एयर स्ट्राइक हुई और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बोले – हमने तीन सौ (यह संख्या भी भाजपा के अलग-अलग नेताओं ने अलग-अलग बतायी) आतंकियों को मार गिराया. इस पर भी सवाल उठ खड़े हुए. विदेशी एजेंसियों ने कह दिया कि बालाकोट में कोई आतंकी नहीं मारा गया. इस बीच देश के अन्दर कई जगहों पर पुलवामा के शहीदों के चित्रों के साथ मोदी चुनावी भाषण देते हुए नजर आये. जवानों की शहादत को वोट के लिए भुनाने की नीच हरकत पर वह फिर घेरे गये, निन्दा के पात्र बने. उधर अति उत्साह में उत्तर प्रदेश के अति ज्ञानी चीफ मिनिस्टर मिस्टर योगी ने गाजियाबाद में भाषण के दौरान भारतीय फौज को ‘मोदी की सेना’ बता दिया. जिस पर भाजपा की खूब लानत-मलामत हुई. योगी आदित्यनाथ की जुबान फिर भी न रुकी. सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी शफीकुर रहमान बर्क को उन्होंने बाबर का वंशज करार दे दिया. योगी के बिगड़े बोलों की वजह से चुनाव आयोग को उनके चुनाव प्रचार पर 72 घंटे का विराम तक लगाना पड़ा. यानि कुल मिला कर चुनावी मैदान मारने की भाजपा की हर जुगत फेल हुई जा रही है. हर दांव उलटा पड़ रहा है. उधर प्रियंका गांधी की चुनावी रैलियों में भीड़ उमड़ी पड़ रही है. उनके प्रति लोगों का आकर्षण, जनता से उनके सहज सवाल और उनके भाषणों का असर देख कर भाजपाईयों के सीने पर सांप लोट रहे हैं. जीत की आशा लगातार क्षीण होती जा रही है. यही वजह है कि सत्ता में वापसी की बौखलाहट में सत्ताशीर्ष से लेकर नये-नये उम्मीदवार बने भाजपाईयों तक को भी अपनी जुबान पर काबू नहीं रह गया है. क्रिया की प्रतिक्रिया भी हो रही है क्योंकि यह तो नियम है.
प्रधानमंत्री जब ‘चायवाले’ से ‘चौकीदार’ बने तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’ के नारे लगवा दिये. चौकीदार की चोरियां भी गिना दीं. चौकीदार को गुस्सा आया उसने पलटवार किया और राहुल गांधी के पिता को ‘भ्रष्टाचारी नम्बर वन’ करार दे दिया. उसके बाद बवंडर उठ खड़ा हुआ और अब हर नेता अपमानजनक टिप्पणियों के साथ विरोधी पर पिला पड़ रहा है.

पिता पर अपमानजनक टिप्पणी से आहत प्रियंका गांधी ने भी पलटवार किया. कहा, ‘चुनाव प्रचार में बीजेपी के नेता कभी ये नहीं कहते कि उन्होंने जो वादे किये थे, वे पूरे किये या नहीं. कभी शहीदों के नाम पर वोट मांगते हैं, तो कभी मेरे परिवार के शहीद सदस्यों का अपमान करते हैं. उन्होंने मेरे शहीद पिता का अपमान किया है. यह चुनाव किसी एक परिवार के बारे में नहीं है, ये उन सभी परिवारों के बारे में हैं जिनकी उम्मीदें और आशाएं इस प्रधानमंत्री ने पूरी तरह तोड़ दी है. देश का ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन देश ने कभी अहंकार करने वाले को माफ नहीं किया है. इतिहास इसका गवाह है, महाभारत में भी जब श्रीकृष्ण दुर्योधन को समझाने गये थे तो दुर्योधन ने उन्हें ही बंदी बनाने की कोशिश की थी.’ प्रियंका ने इसी पर कविवर रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता सुनायी, ‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है, हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान कुपित होकर बोले – जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हां, हां दुर्योधन! बांध मुझे.’
वहीं राहुल गांधी ने भी ट्वीट करके मोदी को ललकारा – ‘मोदीजी, लड़ाई खत्म हो चुकी है. आपके कर्म आपका इंतजार कर रहे हैं. खुद के बारे में अपनी आंतरिक सोच को मेरे पिता पर थोपना भी आपको नहीं बचा पाएगा. सप्रेम और झप्पी के साथ – राहुल.’

उधर बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी तो मोदी से इतनी खार खाये बैठी हैं कि उन्होंने प्रियंका को सलाह देते हुए कह दिया कि मोदी को ‘दुर्योधन’ नहीं बल्कि ‘जल्लाद’ कहा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘पीएम मोदी को प्रियंका गांधी ने दुर्योधन बताकर गलत किया है, उन्हें तो मोदी को जल्लाद कहना चाहिए था. वे सब जल्लाद हैं, जल्लाद. जो जज को और पत्रकार को मरवा देता है, उठवा लेता है. ऐसे आदमी का मन और विचार कैसा होगा? खूंखार होगा.’

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देश में किसी प्रधानमंत्री की इतनी बेइज्जती इससे पहले शायद ही किसी की हुई हो. अब तो मोदी कहने लगे हैं कि अपमान पीने की मुझे अब आदत हो गयी है. ममता बैनर्जी को संदेश दे रहे हैं कि – दीदी आपका थप्पड़ भी मेरे लिए आशीर्वाद जैसा है. कोई पूछे कि मोदी जी, जनता के हित में पांच साल कुछ काम कर लिया होता तो यह अपमान आखिर क्यों झेलना पड़ता?
भ्रष्टाचारी नम्बर वन, बाबर के वंशज, पप्पू की पप्पी, दुर्योधन, दुशासन, जल्लाद, निकम्मा, नामर्द, हिटलर, तुलगक, नमक हराम, औरंगजेब, अनपढ़, स्टूपिड, आतंकवादी, गधा, मौत का सौदागर, जहर की खेती, सांप, बिच्छू… इस बार के चुनाव में नेताओं के मुख से बस ऐसे ही अपशब्द फूट रहे हैं. जनता सकते में है कि यह चुनाव हो रहा है या मदारियों के बीच गालियों का कॉम्पटीशन? लोकतन्त्र का इतना बदरंग चेहरा इससे पहले इस देश ने नहीं देखा था.

घर पर ऐसे बनाएं रोस्टेड बैंगन

रोस्टेड बैंगन की रेसिपी बहुत आसान है और इसे बनाने में भी आपके ज्यादा समय नहीं लगेगा. तो चलिए झट से जानते हैं इसकी रेसिपी.

सामग्री

1 प्याज  (बारीक कटा हुआ)

3 लहसुन की कलियां ( बारीक कटा हुआ)

1 हरी मिर्च (बारीक कटा हुआ)

जैतून का तेल

1 बैंगन (रोस्टेड)

साबुत धनिया (1 टी स्पून)

लाल मिर्च पाउडर (1 टी स्पून)

नींबू (1)

हरा धनिया ( टुकड़ों में कटा हुआ)

दही (100 ग्राम)

खीरा (1)

नमक (स्वादानुसार)

कालीमिर्च (आवश्यकतानुसार)

जानें कैसे बनाएं तंदूरी आलू

बनाने की वि​धि

एक पैन को गर्म करें, इसमें 6 छोटे चम्मच जैतून का तेल, लहसुन, प्याज और हरी मिर्च डालें और इसी के साथ इसमें नमक छिड़कें.

एक रोस्टेड बैंगन लें और इसके अंदर से थोड़ा निकाल लें और इसका छिड़का उतार लें और इसे काट लें.

इस बैंगन को अब पैन में डालें और इसमें नमक और साबुत धनिया डालें.

इसे फौर्क काटे से मैश करें.

इसमें लाल मिर्च डालें और कुछ देर के लिए पकाएं.

इसमें आधा नींबू का रस डालें और इसे ठंडा होने दें.

अब एक बाउल में हरा धनिया और दही लेकर अच्छे से मिक्स करें.

इसमें अब बैंगन का मिश्रण डालकर अच्छे से मिलाएं.

एक खीरे को ​छीलकर इसके बीज निकाल लें.

खीरे की इस बोट में बैंगन की डिप भरें.

आलू कुर्मा रेसिपी

धराशायी होते पुल : क्या लोगों की जान इतनी सस्ती?

घर से निकलते वक्त अकसर मन में रहता है कि कहीं कोई दुर्घटना न हो जाए. दुर्घटना से मतलब चोरीचकारी या छोटेमोटे हादसे से होता है. परंतु कोई सपने में भी नहीं सोच सकता कि उन के पैरोंतले की जमीन फट जाएगी या सिर के ऊपर की छत उन पर ढह जाएगी.

ऐसे कितने ही लोग हैं जिन्होंने 2-2 सैकंड के अंतराल में जिंदगी और मौत को करीब से देखा है. ऐसे कितने ही लोग हैं जिन के स्कूल के लिए निकले बच्चे घर वापस आए ही नहीं. कुसूर किस का है? वाहन चलाने वालों को नहीं पता होता कि जिस पर वे गाड़ी चलाने वाले हैं वह ही धराशायी हो जाएगा और न ही उन सवारियों को, जो सैकंड्स में मौत के मुंह में चले जाते है.

सार्वजनिक जगहों पर गिरने वाले पुल व फ्लाईओवर बड़ी मात्रा में लोगों की मौत का कारण बनते हैं. इन में घायल होने वालों की संख्या भी कुछ कम नहीं होती. किसी का हाथ नहीं रहता तो किसी का पैर, किसी की रीढ़ की हड्डी टूट जाती है तो किसी को महीनों अस्पताल के बैड पर काटने पड़ते हैं.

पिछले 2 सालों में भारत में केवल पुलों और फ्लाईओवरों के गिरने से 93 मौतें हुई हैं जबकि घायलों की संख्या अनगिनत है. मुंबईगोवा हाईवे पुल, मजेरहाट पुल, कोलकाता विवेकानंद फ्लाईओवर, भुवनेश्वर फ्लाईओवर और अब मुंबई ओवरब्रिज कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं जिन के असमय गिरने से ढेरों मासूमों ने अपनी जान गंवाई. इन पुलों का इस तरह गिरना कोई आम बात नहीं है, यह प्रशासन, संबंधित विभाग, बीएमसी, भ्रष्टाचार और राजनीति का परिणाम है जिस में आम जनता बुरी तरह पिस रही है.

मुंबईगोवा हाईवे पुल

मुंबईगोवा हाईवे पर बना पुल 2 अगस्त, 2016 की रात पानी में बह गया. पुल सावित्री नदी पर स्थित था, जिस पर वाहनों का आनाजाना आम था. पुल 100 वर्र्ष पुराना था और अंगरेजों के शासन के दौरान बनाया गया था. पुल के साथ ही एक और पुल था जो अधिक पुराना नहीं था और वह टस से मस तक नहीं हुआ. यह पुल पुराना जरूर था पर एक महीने पहले जांच के बाद इसे पूरी तरह से सुरक्षित बताया गया था. पुल के ढहने से उस पर चल रहीं 2 बसें भी नदी के बहाव में बह गईं. और लगभग 22 यात्री लापता हो गए.

पुल के बहने पर उप मुख्यमंत्री अजीत पवार ने कहा, ‘पुल ब्रिटिश राज में बना था जिस का अर्थ है कि 100 सालों से अधिक पुराना था, इस के बावजूद एक अफसर ने मई में यह प्रमाणित किया था कि पुल ट्रैफिक के लिए बिलकुल ठीक है. उस अफसर के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के तहत केस

दर्ज होना चाहिए, साथ ही, पीडब्लूडी मिनिस्टर चंद्रकांत पाटिल के खिलाफ भी केस दर्ज होना चाहिए.’

एक एनसीपी कार्यकर्ता का कहना था कि मौसम विभाग की चेतावनी के बाद भी कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया, राज्य सरकार ही इस त्रासदी की जिम्मेदार है. मामले पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने पुल के बह जाने का कारण महाभूलेश्वर में हुई बारिश से सावित्री नदी का बढ़ा जलस्तर बताया.

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कोलकाता मजेरहाट पुल

कोलकाता में 6 वर्षों के भीतर धराशायी होने वाला यह तीसरा पुल था. पुल 50 साल पुराना था. इस की मरम्मत का काम चल रहा था. पिछले वर्ष 4 सितंबर की शाम 4 बजे गिरे इस पुल के नीचे दब कर 3 लोगों की जान गई और 25 घायल हुए. दुर्घटना के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चीफ सैक्रेटरी मोलोए कुमार डे को एक इंवैस्टिगेशन कमेटी बनाने का फरमान दिया. मरम्मत का काम लापरवाही से हो रहा था, तारकोल की भारी परतें बिछाई जा रही थीं जिस से पुल पर वजन बढ़ गया और  पुल धराशायी हो गया. इंवैस्टिगेशन से पता चला कि पुल के गिरने का कारण उस पर पड़ा भारी मलबा और उस की बुरी देखरेख थी.

अंधेरी पुल

भारी बारिश और तूफान ने 1971 के बने अंधेरी गोखले ओवरब्रिज को धराशायी कर दिया. आश्चर्य की बात तो यह थी कि इस ब्रिज के गिरने से एक महीने पहले ही उस का सरकारी औडिट पास किया गया था. ब्रिज का एक भाग, जो एसवी रोड पर बना था व अंधेरी ईस्ट और अंधेरी वैस्ट को आपस में जोड़ता था, टूट कर जमीन पर गिर गया. हादसा 3 जुलाई, 2018 को सुबह 7:30 बजे हुआ और उस समय कोई ट्रेन उस के नीचे से नहीं गुजर रही थी. हादसे से अनगिनत बिजली और नैटवर्क की तारें चकनाचूर हो गईं और लोगों को दूसरे नुकसान भी झेलने पड़े.

हादसे में 5 लोग घायल हुए और उन में से 2 लोगों की हालत अत्यधिक गंभीर थी. महाराष्ट्र सरकार की ओर से मृतकों को 5 लाख रुपए और घायलों को 50 हजार रुपए का मुआवजा दिया गया.

दुर्घटना के बाद दोषारोपण शुरू हुआ और बीएमसी, रेल मंत्रालय और मुंबई रेलवे विभाग घेरे में आए.

विवेकानंद अंडरकंस्ट्रक्शन फ्लाईओवर

31 मार्च, 2016 के दिन 150 मीटर पर बन रहा विवेकानंद रोड फ्लाईओवर, जोकि कोलकाता के गिरीश पार्क के करीब बन रहा था, टूट कर नीचे गिर गया. पुल के नीचे मरने वालों की संख्या 50 से ऊपर थी और घायलों की

संख्या 80. पुल को बनाने का काम आईवीआरसीएल नामक कंस्ट्रक्शन फर्म को मिला था. फ्लाईओवर निर्माण का कार्य 2008 में शुरू होना था, परंतु काम टलतेटलते 2016 आ गया. फ्लाईओवर गिरने से एक दिन पहले ही उस पर कंकड़ों की परत बिछाई गईर् थी जिस पर काम कर रहे मजदूरों ने यह कहा था कि उन परतों में से आवाजें आ रही थीं.

12:40 बजे ब्रिज का स्टील स्पैन टूट कर नीचे गिर गया जिस के नीचे पैदल यात्री और कई वाहन कुचल गए. फ्लाईओवर के मलबे से 90 से ज्यादा लोगों को बाहर निकाला गया. किसी का पैर कुचल गया तो कहीं से पानी के लिए कोई हाथ नजर आ रहा था. कंपनी आईवीआरसीएल पर धारा 302 के तहत कत्ल का मुकदमा दर्ज कराया गया. कंपनी द्वारा इस हादसे को ऐक्सिडैंट बताया जा रहा था.

अनुभवी कंस्ट्रकशन प्रोफैशनल बिरांची नारायण आचार्य के अनुसार, ब्रिज के गिरने का प्रमुख कारण सपोर्ट स्पैन का अनस्टैबल होना था.

मुंबई फुट ओवरब्रिज

मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के पास बने फुट ओवरब्रिज के अचानक गिरने से 6 लोगों की मौत और लगभग 34 लोग घायल हुए. इस हादसे ने प्रशासन की लापरवाही को एक बार फिर उजागर कर दिया. फुट ओवरब्रिज 14 मार्च, 2019 की शाम गिरा जब पीक आवर होने के कारण भीड़ ज्यादा थी. ब्रिज बहुत ही पुराना नहीं था और कुछ दिनों पहले ही इस की मरम्मत की गईर् थी.

रेलवे के डीआरएम डी के शर्मा के अनुसार, ‘‘फुट ओवरब्रिज की देखरेख का काम बीएमसी का था तथा उसी की लापरवाही का परिणाम है कि ब्रिज टूट गया.’’ बीएमसी अधिकारियों के खिलाफ धारा 304 ( लापरवाही से मौत) के तहत मामला दर्ज किया गया है.

प्रशासन और पुल

मुंबई ओवरब्रिज का गिरना प्रशासन और कौंट्रैक्टरों के बीच होने वाली घूसखोरी का ताजा उदाहरण है. इन पुलों के गिरने में सरकारी दफ्तरों में रोटी तोड़ने वाले अफसरों का भी बहुत बड़ा हाथ है, साथ ही, कलैक्टर और जांच अधिकारी भी इन पुलों के धराशायी होने के जिम्मेदार हैं.

किसी भी नए फ्लाईओवर या पुल के निर्माण का जिम्मा कौंटै्रक्टर पर होता है. सब से पहले उसे राज्यमंत्री की मंजूरी की आवश्यकता होती है. राज्यमंत्री किसी अयोग्य को भी पैसे ले कर कौन्ट्रैक्ट दे दें तो किसी को कानोंकान खबर नहीं होती. कौंटै्रक्टर उस के बाद प्रोजैक्ट कार्य शुरू करता है और उस के लिए बताए जाने वाले दाम से कम की सामग्री खरीदता है. लोकल सामग्री का अर्थ है बेकार क्वालिटी. और बेकार क्वालिटी ही इन पुलों की मरम्मत का कारण बनती है. एक के बाद एक मरम्मत से पीडब्लूडी, आईएएस और विभिन्न स्तरों पर विराजमान अफसरों की जेबें भरती रहती हैं. इन सभी की लापरवाही और भ्रष्टाचार ही है जो लोगों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ करता है.

सत्ताधारियों की बात करें तो कोलकाता में पिछले 6 सालों में 3 पुल गिरे हैं और इन तीनों पुलों के टूटने के समय तृणमूल कांग्रेस की सरकार थी. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा विवेकानंद फ्लाईओवर के गिरने के बाद भी यही कहा गया था कि जांच अच्छी तरह की जाएगी और गुनाहगारों को सजा दी जाएगी. कौंट्रेक्टर कंपनी आईवीआरसीएल के कई अफसरों को जेल भी भेजा गया. परंतु ममता बनर्जी ने खुद को इस का जिम्मेदार नहीं ठहराया, जबकि उन्होंने ही सालों से अटके फ्लाईओवर निर्माण को 18 महीने में खत्म करने के निर्देश दिए थे. 165 करोड़ रुपए के बजट में बन रहा यह फ्लाईओवर पूरा होने से पहले ही धराशायी हो गया. बावजूद इस के कि नया फ्लाईओवर बनने से पहले गिर गया, दूसरे पुलों के विषय में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए. परिणामस्वरूप, 2 वर्षों बाद ही मजेरहाट पुल भी धराशायी हो गया.

अब मुंबई में गिरे फुट ओवरब्रिज को ले कर भी इसी तरह के दोषारोपण शुरू हो गए हैं. जहां एक तरफ दोष भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना को दिया जा रहा है वहीं राजनेता इस का दोष इंजीनियर पर थोप रहे हैं. विपक्ष का कहना तो यह भी है कि यदि सरकार 600 करोड़ में सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा बना सकती है तो क्या पुलों की ठीक तरह से मरम्मत नहीं करा सकती.

लोगों की प्रतिक्रिया

जहां एक तरफ पुलवामा अटैक पर लोगों ने रैलियां निकालीं, ट्विटर और फेसबुक पर पोस्ट कर के हैशटैग पुलवामा ट्रैंडिंग कर दिया, वहीं दूसरी तरफ ये त्रासदियां नजरअंदाज क्यों? देश के जवान शहीद हुए जिस का दुख सभी को है और रहेगा मगर क्या आम लोगों की जान जान नहीं है? सरकार और प्रशासन विदेश से तो अच्छी मुठभेड़ कर रहे हैं मगर अपने ही गृहयुद्धों से निबटने का कार्य क्यों नहीं? भ्रष्टाचार धीरेधीरे देश को छलनी

कर रहा है और यह सरकार कुछ अधिकारियों को ही सलाखों के पीछे कर रही है, उन से पैसे खाने वालों को नहीं. कहां 400 साल पुरानी इमारतें आज भी सिर उठा कर खड़ी हुई हैं और कहां ये पुल और फ्लाईओवर हैं जो एकएक कर मिट्टी में मिलते जा रहे हैं. न देश के पास पत्थर और सीमेंट की कमी है और न ही इंजीनियरों की. कमी है तो सजगता और जिम्मेदारी की.

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अगर हमारे देश की सरकार गुहार लगाने पर ही जागती है, अगर सरकार की आंखें मोमबत्ती जलाने पर ही देख सकती हैं तो इन त्रासदियों में लोग ऐसा करने से पीछे कैसे रह जाते हैं? शहीदों की मौत पर बच्चाबच्चा शोक मना रहा था पर इन मासूमों के लिए क्या केवल मुआवजा ही काफी है?

देश में हर दिन लोग एक जगह से दूसरी जगह सफर करते हैं, कभी पुलों के ऊपर से तो कभी नीचे से, यदि सरकार से उठने की गुहार नहीं लगाई गई तो शायद कुछ महीनों के अंतराल में फिर किसी त्रासदी की खबर सुनने को मिले.

आसमान की ओर

आहिस्ताआहिस्ता हमारा खून निकालने वालों का कद बढ़ता जा रहा था और हम छोटे होते जा रहे थे. हमारी अवस्था गुलामों जैसी होती जा रही थी, फिर भी उम्मीद की एक किरण हमें जिंदा रखे हुई थी.

मेरी यात्रा लगातार जारी है. मैं शायद किसी बस में हूं. मुझे यों प्रतीत हो रहा है. बस के भीतर बैठने की सीटें नहीं हैं. सब लोग नीचे ही बस के तले पर बैठे हैं. कुछ लोग इसी तल पर लेटे हैं. बस से बाहर जाने का कोई भी मार्ग अभी तक मुझे दिखाई नहीं दिया है और न ही किसी और कोे.

बस की दीवारों में छोटेछोटे छेद हैं, जिन में से रोशनी कभीकभी छन कर भीतर आ जाती है. जब रोशनी उन छिद्रों से बस के भीतर आती है तो उस से रोशनी की लंबीलंबी लकीरें बन जाती हैं. मेरे सहित सब लोग उसे पकड़ने की भरसक कोशिश करते हैं, लेकिन नाकाम हो जाते हैं. कोईर् भी उन को पकड़ नहीं पाया है. बहुत देर से कई लोग इस तरह की कोशिश कर चुके हैं.

बस को कौन चला रहा है, इस बात का भी अभी तक किसी को पता नहीं है. मैं कभीकभार बस के भीतर घूम लेता हूं, लेकिन यह खत्म होने को ही नहीं आती है. शायद यह बहुत लंबी है. मैं थकहार कर फिर वहीं आ बैठता हूं जहां से मैं उठ कर गया था. मेरी तरह और भी बहुत सारे लोग इस बस में घूमघूम कर फिर से वहीं आ बैठते हैं जहां से वे उठ कर जाते हैं.

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यह एक बस है और यह कई सदियों से ऐसे ही चल रही है. सच बताऊं तो, पता मुझे भी पूरी तरह से नहीं है. मैं कई बार यह समझने की कोशिश करता हूं कि यह बस है या फिर कुछ और. लेकिन सच का पता नहीं चल रहा है. अजीब किस्म का रहस्य है, जिस का पता नहीं चल रहा है.

कभीकभार कुछ लोग आते हैं और हमारा खून निकाल कर ले जाते हैं. पूछने पर कुछ नहीं बताते. जब कभी गुस्सा कर लें, तो फिर बहुत एहसान से बताते हैं कि वे लोग इस बस को चला रहे हैं. इस बस को चलाने के लिए उन को कितनी मेहनत करनी पड़ती है, इस का तो उन लोगों को ही पता है. पूछें तो कहते हैं कि यह बस उन के अपने खून से चल रही है.

‘‘लेकिन खून तो आप लोग हमारा ले रहे हो?’’ हम में से कोई बोलता है.

‘‘तुम्हारा खून तो हम कभीकभार लेते हैं, बस तो हम अपने खून से ही चलाते हैं.’’

फिर जब हम अपनी ओर देखते हैं तो हम तो नुचेसिकुड़े से कमजोर से हैं और वे हट्टेकट्टे, हृष्टपुष्ट जवान. समझ कुछ भी नहीं आता है. हर समय हम लोग परेशान रहते हैं. उन की पूंछें सदैव ऊपर आसमान की तरफ तनी हुई रहती हैं और हमारी जमीन पर लटकी रहती हैं, जैसे कि इन में हड्डी ही न हो. खून लेने आने वाले लोग कुछ देर बाद बदल जाते हैं. बहुत ही एहसान से वे हमारा खून ले कर जाते हैं जैसे कि वे लोग हम पर बहुत दया कर रहे हों. हम भी इस डर से खून दे देते हैं कि कहीं हमारी बस रुक ही न जाए. पसोपेश वाली स्थिति है कि यह बस है या फिर कुछ और, और यह हमें कहां ले जा रही है.

बस चलाने वाले पूछने पर गुस्सा करते हैं, कहते हैं, ‘‘आप लोग चुप रहो, आराम से बैठो, आप को कुछ नहीं पता है. आप, बस, हमें अपना खून दो.’’

कुछ देर बाद खून लेने वाले फिर बदल जाते हैं. यह भी समझ नहीं आता कि पहले वाले लोग कहां गए. पूछने पर कोई जवाब नहीं देते हैं. बारबार पूछने पर कहते हैं, ‘‘वे पहले वाले लोग सारा का सारा खून खुद ही डकार गए हैं, खून वाली सारी टंकी खाली है. अब हम क्या करें, हमें खून चाहिए, वरना बस नहीं चलेगी.’’

हम फिर अपना हाथ खून देने के लिए उन के आगे कर देते हैं. फिर बस चलती रहती है. फिर बस की दीवारों के छेदों से रोशनी की लकीरें अंदर तक पहुंचती हैं. फिर से हम लोग उन को पकड़ने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन वे किसी के भी हाथ नहीं आतीं. सब थकहार कर फिर वहीं बैठ जाते हैं. कुछ दिनों पहले उड़ती हुई एक अफवाह आईर् थी कि बस को चलाने वाले कुछ लोग हमारे से लिए खून में से ज्यादा खून तो खुद ही पी जाते हैं और बाकी जो बच जाता है उसे बस की टंकी में डाल देते हैं. और कई बार तो वे लोग बस के पुर्जे तक खा जाते हैं.

यह तो गनीमत है कि बस के जो पुर्जे कम हो जाते हैं, वे कुछ दिनों बाद खुदबखुद ही पनप उठते हैं. बस में सफर करने वाले सब लोग भोलेभाले, ईमानदार और साफ दिल के हैं. कभीकभी वे लोग इस तरह की बातें सुन कर निराश हो जाते हैं. लेकिन कुछ समय बाद वे लोग फिर अपनेआप ही ठीक हो जाते हैं. यही आम आदमी की विशेषता है. वैसे इस के अलावा उन के पास और कोई चारा भी नहीं है. और फिर जब उन का खून ले लिया जाता है तो वे फिर अपनेआप शांत हो जाते हैं.

बस बहुत समय से ऐसे ही चल रही है. कहां जा रही है, क्यों जा रही है, यह रहस्य है जो किसी को पता नही है. कभीकभार खून लेने वाले ही कह जाते हैं कि –

‘‘बस स्वर्ग जा रही है’’

‘‘परंतु इतनी देर…’’ हम में से कोई कहता है.

‘‘धैर्य रखो, रास्ता बहुत लंबा और मुश्किल है, समय तो लगता ही है,’’ वे कहते हैं.

हम लोग फिर उन की बातें सुन कर चुप हो जाते हैं. हम यह सोचते हैं कि ये चालाक व समझदार लोग हैं, ठीक ही कहते होंगे. देखेंभालें तो न बस का चालक दिखता है, न ही कोई इंजन और न ही कोई टैंक. खून किस टंकी में पड़ता है, कहां जाता है, यह भी पता नहीं चलता है. सभी रहस्यमयी विचारों में उलझे रहते हैं.

अभी कुछ दिनों पहले की बात है. कुछ लोग हमारा खून लेने के लिए आए थे. वे लोग नएनए ही लग रहे थे. वे बहुत जोशीले थे. वे बहुत ही चालाकी से बातें कर रहे थे. वे पूरे वातावरण में एक अलग तरह का उत्साह भर रहे थे. वे बहुत प्यार से हमारा खून ले रहे थे. सब ने उन की बातें सुन कर उन को बहुत ही प्यार व सम्मान सहित अपना खून दिया.

वे लोग सब को यह भरोसा दिला रहे थे कि हम लोग बहुत जल्दी स्वर्ग पहुंच जाएंगे. सब उन की बातें सुनसुन कर बहुत खुश हो रहे थे. कितनी देर से दबेकुचले हम लोग भी आखिरकार स्वर्ग को जा रहे हैं, यह सोचसोच कर बहुत खुशी हो रही थी. सब लोग मारे खुशी के उन की जयजयकार कर रहे थे.

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कुछ दिनों बाद फिर वे लोग हमारा खून लेने के लिए आए. ये पहले से कुछ जल्दी आ गए थे. उन्होंने फिर हमारे भीतर जोश भरा. हमें फिर सब्जबाग दिखाए. हमारी बांछें खिल उठीं. हम फिर मुसकराए. उन की बातों में बहुत उत्साह व जोश था. उन की बातें सुनसुन कर हमारे भीतर भी जोश आ गया. चारों ओर फिर उन की जयजयकार होने लगी. जोश ही जोश में उन्होंने हमारा खून निकालने वाले टीके निकाल लिए और हमारा खून निकालना शुरू कर दिया.

सब ने बहुत खुशीखुशी अपना खून दिया. परंतु इस बार हमारा खून निकालने वाले टीके पहले से कुछ बड़े थे. लेकिन हमारे भीतर जोश इतना भर गया था कि हमें सब पता होते हुए भी बुरा न लगा. कुछ अजीब तो लगा परंतु ज्यादा बुरा न लगा. थोड़ा सा बुरा लगा लेकिन यह तो होना ही है, ठीक है, अब बस को चलाने के लिए हमें भी तो कुछ करना ही है. सब की आस्था बस के ठीक रहने और उस के स्वर्ग तक पहुंचने की है. बस, इसी जोश और जज्बे के चलते हर कोई अपना सबकुछ न्योछावर करने को तैयार बैठा है.

अजीब बात तब हुई जब वे लोग फिर हमारे पास आए और हम से हमारी थोड़ीथोड़ी टांगों की मांग करने लगे. मतलब कि उन को हमारी टांगों के छोटेछोटे टुकड़े चाहिए थे. सब ने उन की इस मांग पर आपत्ति की. कोई भी उन को अपनी टांगें देने को तैयार नहीं था. उन को हमारी टांगें क्यों चाहिए, इस बात का किसी के पास कोई जवाब न था.

आखिर उन में से एक ने बताया कि वे लोग हमारी टांगों के छोटेछोटे टुकड़े ले कर बस में लगाएंगे ताकि बस तेजी से स्वर्ग की ओर जा सके. मेरे साथसाथ सब को बहुत बुरा लगा. सब ने फिर विरोध किया. कोई अपनी टांगों के टुकड़े देने को तैयार न था. आखिर वे लोग जोरजबरदस्ती पर उतर आए और हमारी टांगों के छोटेछोट टुकड़े उतार कर ले गए. हमारे सब के कद छोटे हो गए. आहिस्ताआहिस्ता यह परंपरा बन गई.

अब जब वे लोग हमारा खून लेने के लिए आते हैं तो वे हमारी टांगों के छोटेछोटे टुकड़े भी उतार कर ले जाते हैं. पूछने पर कहते कि बस को बहुत सारी टांगों की जरूरत है. उस में लगा रहे हैं. परंतु अजीब बात तो यह है कि हम बस में लगी अपनी टांगें देख नहीं पाते हैं क्योंकि बस में से बाहर जाने को हमारे लिए कोईर् रास्ता ही नहीं है. बस को चलाने वाले कैसे बाहर जाते हैं, हमें इस का भी कोई पता नहीं है.

हमें कभीकभी अपनी अवस्था गुलामों जैसी लगती है. लेकिन जब हम उन खून लेने वाले लोगों की बातें सुनते हैं तो हमें लगता है कि हम लोग ही सबकुछ हैं, लेकिन कई बार लगता है कि हम लोग कुछ भी नहीं है. यह भी बहुत अजीब तरह का एहसास है.

एक और अजीब बात है कि हमारे कद तो छोटे होते जा रहे हैं और हमारा खून लेने वालों के कद बड़े. हम लोग सूखते जा रहे हैं और वे लोग ताकतवर होते जा रहे हैं. हमारी पूंछें तो जमीन पर लटकती जा रही हैं और उन की तनती जा रही हैं.

अजीब बात है कि हम लोगों को लगता है कि हमारी पूंछ में कोई हड्डी ही नहीं. बस चलाने वाले अकसर यह कहते है कि वे लोग बस में हमारी टांगें लगा कर उस को रेलगाड़ी बना देंगे और अगर आप का ऐसा ही सहयोग रहा तो एक दिन रेलगाड़ी को हवाईजहाज बना देंगे. उन की बातों में बहुत ही जोश है और बहुत ही उत्साह. सब लोग उन की ऐसी बातें सुन कर बहुत ही उत्साह में आ जाते हैं. सब को उन की बातें सुन कर ऐसा लगता है कि ये लोग एक न एक दिन उन को स्वर्ग जरूर पहुंचा देंगे. हमारी बस को रेलगाड़ी और रेलगाड़ी को एक न एक दिन हवाईजहाज जरूर बना देंगे.

इसी विश्वास के साथ हम लोग हर बार उन की मांग के अनुसार उन को खून देने के लिए अपनेआप को उन के सम्मुख कर देते हैं. अपनी टांगों के छोटेछोटे टुकड़े भी उतार कर दे देते हैं, चाहे आहिस्ताआहिस्ता हमारा खून निकालने वाले टीकों के आकार बढ़ते जा रहे हों. हमारे कद छोटे होते जा रहे हैं और उन के बड़े. उन की पूंछें आसमान की ओर तनी जा रही हैं और हमारी जमीन पर लटकती जा रही हैं. लेकिन हम तो यही सोच कर अपना सबकुछ समर्पित करते जा रहे हैं कि एक न एक दिन ये लोग हमें स्वर्ग जरूर पहुंचा देंगे. लेकिन हमारे नौजवान उन की आसमान की ओर तनी पूछें देख कर अकसर दांत पीसते नजर आते हैं.   यह भी खूब रही राम अपने कंजूस दोस्त श्याम को कथा सुनाने ले गया. दोनों जब वहां पहुंचे तो देखा कि चारों तरफ पंडाल रंगबिरंगे कपड़ों से सजा हुआ था. फूलमाला पहने कथावाचक लोगों को दानपुण्य की महिमा बता रहे थे. कहने का मतलब पूरी कथा में दानपुण्य की महिमा बताई गई थी. वापस आने के बाद राम ने पूछा, ‘‘अब तुम्हारा क्या विचार है दान देने के बारे में?’’

श्याम ने कहा, ‘‘भाई, मैं तो धन्य हो गया आज की कथा सुन कर. सोच रहा हूं, मैं भी दान मांगना शुरू कर दूं.’’ यह सुनते ही राम की बोलती बंद हो गई.

मेरा बेटा 9 महीने का था. दिसंबर का महीना होने की वजह से कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. एक दिन रात को करीब 3 बजे मेरे बेटे ने सोते समय पोटी कर दी. दांत निकल रहे थे, इसलिए पोटी पतली होने की वजह से उस के पैर भी गंदे हो गए थे.

पानी एकदम बर्फ की तरह ठंडा होेने की वजह से मैं ने बराबर में दूसरे बिस्तर पर सो रहे अपने पति को उठाया कि थोड़ा पानी गरम कर दें. जिस से मैं बेटे की पोटी साफ कर सकूं और उसे ठंड न लगे. किंतु मेरी बहुत कोशिश के बावजूद मेरे पति उठने को तैयार नहीं हुए. करवट बदल कर दूसरी तरफ मुंह कर के लिहाफ में दुबक कर सो गए.

मजबूर हो कर मैं ने बर्फ जैसे पानी से ही अपने बेटे की पोटी को साफ किया. पानी इतना ठंडा था कि मेरा बेटा बुरी तरह रो रहा था. मेरी भी उंगलियां ठंडे पानी की वजह से गली जा रही थीं. किंतु मेरे पतिदेव अब भी लिहाफ से मुंह ढक कर सो रहे थे. मैं ने जैसेतैसे बेटे को कपड़े से पोंछ कर सुखाया और लिहाफ में गरम कर के सुला दिया.

किंतु मेरी आंखों में नींद बिलकुल नहीं थी. मुझे पति पर गुस्सा आ रहा था कि उन के पानी न गरम करने की वजह से मुझे अपने बेटे को ठंडे पानी से साफ करना पड़ा और उसे परेशानी हुई.

अचानक मैं उठी और वही बर्फ जैसा पानी बालटी में ले आई. फिर गहरी नींद में सो रहे अपने पति के ऊपर उलट दिया. अब गुस्सा होने की बारी उन की थी. उन्होंने उठ कर एक जोर का चांटा मेरे गाल पर जड़ दिया. किंतु, फिर भी मैं उन को गीला करने के बाद अपने लिहाफ में चैन से सो गई.

आज उस घटना को 18 वर्ष बीत चुके, किंतु अब भी उस घटना को याद कर के हम लोग हंस पड़ते हैं.

खुशियों के पल- भाग 2

अजनबी होते हुए भी कभीकभी किसी के साथ ऐसी आत्मीयता बढ़ जाती है मानो बरसों से जानते हैं. विशाल और नीरजा कुछ इसी तरह मिले और साथ बढ़ता गया.

वे अब 5-7 दिनों पर लाइब्रेरी जाते. उन का लाइब्रेरी जाने का समय साढ़े 4 बजे होता. किताब जमा करते व नई किताब लेते 5 बज जाते.

5 बजे नीरजा अपना सामान समेट लेती. फिर वे अकसर ही बाहर कौफी पीने चले जाते. अब नीरजा उन से खूब खुल कर बात करती थी. वे भी उसे चिढ़ा देते थे. जब वे चिढ़ाते तो वह झूठे गुस्से में मुंह फुला लेती. फिर वे उसे मनाते. उस की सुंदरता के पुल बांधते. वह खिलखिला कर हंस देती. वह उन्हें अपना स्मार्ट बौयफ्रैंड कहती. वे अकसर कहते, उन की उम्र उस के बौयफ्रैंड बनने की नहीं है, तब वह नाराज हो जाती. वह कहती, यह बात दोबारा नहीं कहना. उम्र से क्या होता है. उस के स्मार्ट बौयफ्रैंड जैसा स्मार्ट कोई और हो तो बताएं.

उस ने कई बार साफ कहा था कि वे उसे बहुत अच्छे लगते हैं. वह अकसर ही उन के कंधे पर अपना सिर टिका कर आंखें मूंद लेती थी. वे मना करते, कहते, ‘लोग देख रहे हैं.’ तो वह कहती, ‘देखने दो. मुझे अच्छा लगता है.’

वे एक हाथ से ड्राइविंग करते व दूसरे हाथ से उस के बालों को हलकेहलके सहलाते रहते. उन्होंने एकाध बार उसे कोई गिफ्ट दिलाने की कोशिश की थी, पर उस ने सख्ती से मना कर दिया था. वह कहती थी, ‘‘कौफी, पैस्ट्री पकौड़ा तक ठीक है पर गिफ्ट वगैरह नो, बिग नो.’’

उन को भी शिद्दत से लगता था कि वे नीरजा के प्यार में आकंठ डूब चुके थे. जब भी उस से मिल कर आते, बेचैन हो जाते. 5-7 दिनों का इंतजार उन के लिए मुश्किल हो जाता था. पर रोज तो वे जा नहीं सकते थे. पर

यह कैसा प्यार था. अगर यह लगाव था तो यह कैसा लगाव था, भई. उन की उम्र 24 साल की लड़की से प्यार करने की नहीं थी. पत्नी थी, बेटे थे, बहुएं थीं, पोती भी थी.

प्यार तो कोई बंधन नहीं मानता. उम्र का भी नहीं शायद. पर समाज तो था. सामाजिक स्थिति तो थी. उन का एक कदम उन की सामाजिक स्थिति को खत्म कर सकता था. वे परिपक्व थे, जानते थे.

देखतेदेखते 3 महीने और गुजर गए. लाइब्रेरी का इंटरव्यू हो गया. अभिमन्यू ने इंटरव्यू संभाल लिया था. पर अपौइंटमैंट फंस गया. किसी ने कोर्ट केस कर दिया था. नीरजा के साथसाथ वे भी बहुत दुखी हुए. पर क्या किया जा सकता था. इंतजार करना था.

उस दिन वे कई दिनों बाद लाइब्रेरी गए थे. शायद 15 दिनों बाद. नीरजा इश्यू व डिपौजिट काउंटर पर बैठी थी. पर शायद उस की तबीयत ठीक नहीं थी, चेहरा कुम्हलाया हुआ था. अपना काम खत्म करतेकरते भी उसे 6 बज गए थे. वे कुरसी पर बैठे किताब पढ़ते रहे. 6 बजे वह अपना बैग ले करआ गई. उन्होंने सवालिया निगाहों से उसे देखा.

‘‘काम अधिक था,’’ उस ने धीरेधीरे कहा, ‘‘तबीयत भी ठीक नहीं लग रही थी. इसीलिए देरी हो गई, चलिए.’’

दोनों बाहर आ गए.‘‘चलो, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं.’’

‘‘नहीं, मुझे कौफी पीनी है.’’

‘‘श्योर, आर यू औलराइट?’’

‘‘बिलकुल. गाड़ी बढ़ाओ मिस्टर विशाल, लोग देख रहे हैं.’’

रास्तेभर वह अपना सिर उन के कंधों पर टिकाए आंखें मूंदे चुपचाप बैठी रही. हां, हूं के अलावा कोई बात नहीं की. अंबर कैफे आ गया. वेटर आ गया. तब उस ने सिर उठाया व आंखें खोलीं.

‘‘क्या लोगी, कोल्ड या हौट कौफी?’’

‘‘हौट कौफी, तुम्हारे जैसी हौट.’’

उन्होंने हौट कौफी व प्याज के पकौड़ों का और्डर दिया.‘‘अगली बार हम यहां नहीं आएंगे,’’ नीरजा ने कहा.

‘‘हां, अगली बार हम एल चाइको में चलेंगे. आराम से बैठ कर चाइनीज खाएंगे.’’

‘‘तुम अपनी बीवी से डरते हो न?’’ अचानक उस ने कहा.

‘‘वैसे तो कौन नहीं डरता. पर, मेरी बीवी ऐसी नहीं है.’’

‘‘वो तो मैं जानती हूं. वह तुम्हें खूब खुश रखती होगी. अच्छा एक बात बताओ, अगर तुम 20 साल बाद पैदा हुए होते तो?’’

‘‘तो मेरी उम्र 90 साल होती अगर मैं जिंदा होता तो.’’

‘‘नहींनहीं, अगर मैं 20 साल पहले पैदा हुई होती तो?’’

‘‘तो तुम्हारी उम्र 54 साल की होती.’’

‘‘अरे नहीं यार, उम्र का सही कौम्बिनेशन मिलाओ न.’’

‘‘मतलब, अगर हम दोनों एकाध साल के अंतर से पैदा हुए होते तो क्या होेता, यही न?’’

‘‘हां, हां. मेरा यही मतलब था. तो क्या होता?’’

‘‘होता क्या, तब हमारी मुलाकात लाइब्रेरी में नहीं होती. शायद हौस्पिटल में हो जाती.’’

वह खिलखिला कर हंस पड़ी, पर हंस न पाई. उस ने अपना पेट कस कर पकड़ लिया जैसे दर्द हो रहा हो.

‘‘तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, तुम्हें क्या हुआ है नीरजा?’’

‘‘कुछ नहीं. थोड़ा फीवर है. कमजोरी लग रही है?’’

‘‘चलो, आज मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं,’’ उन्होंने इशारे से वेटर को बुलाया. आज नीरजा कौफी भी आधा कप ही पी पाई थी. पकौड़े तो छुए भी न थे. लड़का बरतन ले गया.

‘‘नहीं, मैं आप को घर नहीं ले जा सकती,’’ उस ने सख्ती से कहा, ‘‘आगे ले लीजिए, अगले चौराहे से मैं औटो ले लूंगी.’’

उन्होंने बहस नहीं की व गाड़ी आगे बढ़ा ली. आगे एक पार्क का पिछला हिस्सा था जो ऊंची बाउंड्री से घिरा हुआ था. वहां कुछ अंधेरा था.

‘‘उस पेड़ के पास गाड़ी रोकिए न, प्लीज.’’

उन्होंने पार्क के पीछे स्थित पेड़ के पास गाड़ी रोक दी. वह एकटक उन के चेहरे की तरफ देख रही थी.

‘‘क्या हुआ,’’ उन्होंने धीरे से पूछा.

वह कुछ न बोली. सिर्फ उन के चेहरे पर देखती रही.

‘‘आर यू औलराइट, तुम ठीक तो हो न.’’

‘‘यू वांट टू किस मी,’’ उस ने अचानक कहा.

‘‘व्हाट?’’ उन का चेहरा भक से उड़ गया, ‘‘व्हाट रबिश यू आर टौकिंग?’’

‘‘आई नो. यू वांट टू. क्या मुझे किस करना चाहते हो?’’

‘‘नो, नैवर, हाऊ कैन यू…’’

‘‘बट, आईर् वांट टू,’’ उस ने घूम कर अपनी दोनों बांहें उन के गले में डाल दीं व अपने होंठ उन के होंठों पर रख दिए.

‘‘किस मी, किस मी, प्लीज, होल्ड मी.’’

उस ने उन्हें जोर से पकड़ रखा था. उन के हाथ अपनेआप उस की पीठ पर पहुंच गए. नीरजा ने उन का एक लंबा सा किस लिया. गाड़ी के अंदर अंधेरा था पर इंजन स्टार्ट था.

गाड़ी के बैक पर ठकठक खटखटाने की आवाज आई.

‘‘कौन है अंदर, बाहर निकलो.’’

नीरजा छिटक कर उन से अलग हो गई. उन्होंने घूम कर पीछे देखा. एक पुलिसवाला अपने डंडे से बैक पोर्शन खटखटा रहा था, ‘‘बाहर निकलो.’’

उन्होंने तुरंत गाड़ी बढ़ा दी व स्पीड ले ली. पुलिसवाला पीछे चिल्लाता ही रह गया. चौराहा पार हो गया.

‘‘यह तुम ने क्या किया?’’ आगे आ कर उन्होंने कहा, ‘‘अभी तो हम शायद बच गए. पर कितनी बड़ी मुसीबत हो जाती हम दोनों के लिए.’’

‘‘आप मैनेज कर लेते. आप पावरफुल हैं. पर आप को अच्छा नहीं लगा क्या. मुझे तो बड़ा अच्छा लगा.’’

‘‘मुझे भी अच्छा लगा, नीरजा,’’ वे यह कहने से अपने को न रोक सके, ‘‘यू आर रियली ब्यूटीफुल.’’

नीरजा के चेहरे पर बड़ी प्यारी सी मुसकराहट आई.‘‘बस, इस चौराहे पर रोक लीजिए. मैं यहीं से औटो कर लूंगी.’’

‘‘पर…’’

‘‘रोकिए न प्लीज.’’

उन्होंने गाड़ी रोक ली. नीरजा तुरंत उतर गई. ‘‘फिर मिलते हैं,’’ कहते हुए उस ने दरवाजा बंद किया व सामने ही खड़े औटो में जा बैठी. औटो आगे बढ़ गया. उन्होंने भी गाड़ी घर की तरफ घुमा ली.

अगले 10 दिनों तक उन की लाइब्रेरी जाने की हिम्मत नहीं हुई. फिर उन का एक बाहर का प्रोग्राम बन गया. उन के कार्यकाल के समय में हुई 2 अनियमितताओं की जांच चल रही थी. यह जांच उन के खिलाफ नहीं थी पर जांच अधिकारी ने उन्हें विटनैस बनाया था. जांच का कार्य मुंबई में हो रहा था. सो, उन्हें 15 दिनों के लिए मुंबई जाना था. जाने से पहले उन्हें एक बार लाइब्रेरी जाना था. किताबें वापस करनी थीं वरना देर हो जाती.

वे लाइब्रेरी पहुंचे पर नीरजा नहीं आई थी. वे निराश हो गए व किताबें वापस कर के चले आए. फिर वे मुंबई चले गए. दोनों जांच कमेटियों में अपना विटनैस का काम खत्म करने में उन्हें 20 दिन लग गए. आने के दूसरे दिन ही शाम को 4 बजे लाइब्रेरी पहुंचे.

आज भी नीरजा वहां नहीं थी. वे परेशान हो गए. उस दिन ही उस की तबीयत ठीक नहीं थी. दोएक लोगों से पूछताछ की, पर कुछ पता न चला. तब वे सीधे लाइब्रेरियन के पास पहुंच गए.

‘‘एक्सक्यूज मी,’’ उन्होंने पूछा, ‘‘मुझे आप की नीरजा नाम की ट्रेनी से कुछ काम था. मुझे पता चला है कि वह आज नहीं आई है, वह छुट्टी पर है. क्या आप बता सकती हैं कि वह कब तक छुट्टी पर है?’’

लाइब्रेरियन ने उन्हें ध्यान से देखा, ‘‘आप नीरजा के क्या लगते हैं? किस रिलेशन में हैं?’’

‘‘नहीं, रिलेशन में तो नहीं हूं पर दे आर वेल नोन टू मी.’’

‘‘आप कैसे परिचित हैं, आप को नीरजा से क्या काम है?’’

‘‘दरअसल, नीरजा ने ही अपने एक पर्सनल काम के लिए मुझ से कहा था. उसी की जानकारी उसे देनी है. नीरजा कहां है और कैसी है, मैडम?’’

‘‘नीरजा इज नौट वैल. वह बीमार है. करीब 20 दिनों से वह छुट्टी पर है. उस की एप्लीकेशन आई थी.’’

‘‘क्या, 20 दिनों से छुट्टी पर है. तब तो सीरियस बात लगती है. क्या आप ने उसे देखा है?’’

‘‘नहीं, मैं तो नहीं गई थी. पर स्टाफ  के लोग गए थे. शी इज रियली सीरियसली सिक.’’

‘‘क्या आप मुझे उस के घर का ऐड्रैस दे सकती हैं, प्लीज,’’ वे बेचैन हो गए.

‘‘मुझे मालूम नहीं है. आप औफिस से ले लें. मैं स्लिप लिख देती हूं.’’

उन्होंने स्लिप लिख कर दे दी. उन का धन्यवाद कर के वे औफिस में गए व नीरजा का पता ले लिया. हाउस नंबर 144, मीरापट्टी रोड. उन्होंने बाहर आ कर गाड़ी दौड़ा दी. मीरापट्टी रोड ज्यादा दूर नहीं थी. वे एड्रैस पर पहुंच गए. उसी के बगल में पार्किंग की जगह मिल गई. उन्होंने गाड़ी वहीं खड़ी कर दी. घर ढूंढ़ते हुए 2-3 लोगों से पूछना पड़ा. आखिरकार वे पहुंच गए. वह एक मंजिला मकान था. मकान साधारण था. उन्होंने कुंडी खटखटाई.

एक उम्रदराज महिला ने दरवाजा खोला.

‘‘कहिए?’’ उन्होंने पूछा, ‘‘किस से मिलना है?’’

‘‘जी, क्या नीरजाजी का यही मकान है?’’

‘‘जी हां, यही मकान है, कहिए?’’

‘‘दरअसल मुझे उन से मिलना है.’’

‘‘उस की तबीयत ठीक नहीं है. आप कौन हैं?’’

‘‘जी, मैं लाइब्रेरी से आया हूं. उन की तबीयत के बारे में ही जानने आया हूं.’’

‘‘आइए, अंदर आ जाइए.’’

अंदर का कमरा ड्राइंगरूम था. कमरा बड़ा नहीं था. फर्नीचर थोड़े से ही थे पर ढंग से लगे थे. वे एक कुरसी पर बैठ गए. महिला को चलने में परेशानी हो रही थी. उन महिला ने दरवाजा खुला रहने दिया, पर परदा खींच दिया. फिर आ कर दूसरी कुरसी पर बैठ गईं.

‘‘मैं नीरजा की मां हूं. नीरजा का भाई दवा लाने गया है.’’

‘‘अब कैसा हाल है नीरजा का?’’

‘‘हालत ठीक नहीं है. लाइब्रेरी से सुमनजी आईर् थीं. तब तो नीरजा ने उन से बात भी की थी. अब वह सो रही है. सुमन ने तो उस के बारे में बताया ही होगा.’’

‘‘मैं बाहर गया हुआ था. आज ही लौटा, तो लाइब्रेरियन मैडम ने नीरजा के बारे में बताया. मैं ने सोचा, मैं भी नीरजा को देख आऊं. क्या हुआ है नीरजा को?’’

‘‘नीरजा को कैंसर है, ब्लडकैंसर.’’

‘‘क्या?’’ उन का सिर घूम गया. उन्हें लगा कि जैसे पूरा कमरा घूम रहा है, ‘‘पा…पानी…पानी मिलेगा क्या?’’

नीरजा की मां ने उन्हें पानी दिया. पानी पी कर वे जरा संभले.

‘‘क्या कह रही हैं आप, कैंसर क्या ऐसे होता है. अभी कुछ दिनों पहले ही तो मैं उन से मिला था. एकदम ठीकठाक थीं. कहीं कोई गलती तो नहीं हुई है?’’

‘‘गलती कैसी साहब. इस का पता तो 6 महीने पहले ही चल गया था. कितना रुपया इस के इलाज में खर्चा हो गया. अब तो यही लगता है कि किसी तरह से इसे आराम मिले. बड़ी तकलीफ है इसे. नींद की गोली दे कर सुलाया जाता है,’’ वे रो पड़ीं.

‘‘डाक्टर क्या कह रहा है?’’

‘‘अब डाक्टर कुछ नहीं कह रहे हैं. कहते हैं कभी भी कुछ भी हो सकता है.’’

‘पर इस में तो बोनमैरो वगैरह…

‘‘हो चुका है. 2 बार हुआ है. तभी तो लाइब्रेरी वालों ने मदद की थी. अब नहीं हो सकता है.’’

नीरजा की मां चुप हो गईं. वे भी चुप रहे. उन की समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या कहें. आखिर वे बोले, ‘‘क्या मैं एक बार नीरजा को देख सकता हूं? मैं उसे बिलकुल भी डिस्टर्ब नहीं करूंगा.’’

2 लमहे वे उन्हें देखती रहीं, फिर बोलीं, ‘‘आइए.’’

वे उन्हें ले कर अंदर के कमरे में गईं. उन का जी धक से रह गया. सीने तक चादर ओढ़े नीरजा सो रही थी. पर यह जैसे वह वाली नीरजा नहीं थी. उस का गोरा गुलाबी चेहरा सांवला लग रहा था. चादर से निकले उस के हाथ स्किनी लग रहे थे. माथा उभरा हुआ व काफी चौड़ा लग रहा था.

‘‘बहुत कमजोर हो गई है साहब.’’ उस की मां ने फुसफुसा कर कहा. वे ज्यादा देर तक खड़े न रह सके, बाहर आ गए. पर्स निकाल कर देखा. करीब 10 हजार रुपए थे. निकाल कर नीरजा की मां की तरफ बढ़ाए. उन्होंने सवालिया निगाहों से उन्हें देखा.

‘‘लाइब्रेरी से हैं. मैं कल सुबह फिर आऊंगा. तब और रुपयों का इंतजाम हो जाएगा. सरकारी मदद है. उस का अच्छे से अच्छा इलाज होगा. वह बच जाएगी. अब मैं चलता हूं, कल फिर आऊंगा,’’ वे किसी तरह से अपनेआप को जब्त किए रहे.

बाहर निकल कर किस तरह से वे अपनी कार तक पहुंचे, उन्हें नहीं मालूम. कार में बैठते ही स्टियरिंग पर सिर टिका कर वे बेआवाज फफक पड़े. उन की नीरजा खो गई थी. इन बीते दिनों की उन की गैरहाजिरी ने उन से उन की नीरजा छीन ली थी. पर वे ऐसे हार नहीं मानेंगे. शहर के बड़े से बड़े डाक्टर को ला कर खड़ा कर देंगे. वे नीरजा को ऐसे नहीं मरने देंगे. डाक्टर मित्रा शहर के सब से बड़े कैंसर स्पैशलिस्ट हैं. उन को ले कर आएंगे. कोई तो रास्ता होगा, कोई तो रास्ता निकलेगा.

उन्होंने झटके से सिर उठाया व आंसुओं को पोंछ डाला. दूसरे दिन वे पहले बैंक गए, 50 हजार रुपए निकाले. फिर वे डाक्टर मित्रा के पास खुद गए. उन्होंने दिन में एक बजे विजिट का वादा किया. उस के बाद वे 144, मीरा?पट्टी रोड चले गए.

घर पर ताला लटक रहा था. वे सन्न रह गए. अगलबगल से पता करने पर पता चला कि सब नीरजा को ले कर ज्यूड हौस्पिटल गए हुए हैं. वे बदहवास गाड़ी चला कर ज्यूड हौस्पिटल पहुंचे. काउंटर पर पता चला नीरजा आईसीयू में है. आईसीयू के बाहर ही नीरजा की मां बैठी धीरेधीरे रो रही थीं. उन की बगल में ही एक 13-14 वर्ष का नीरजा की शक्ल जैसा लड़का बैठा था. वह नीरजा का भाई होगा. वे जा कर नीरजा की मां की बगल में खड़े हो गए. उन्हें देखते ही नीरजा की मां जोर से रो पड़ीं.

‘‘आप के जाने के बाद जब नीरजा जागी तो मैं ने उसे बताया कि विशाल आए थे. आप का नाम सुनते ही जैसे वह खिल गई, मुसकराई भी थी. मुझे लगा कि वह कुछ ठीक हो रही है. पर उस के बाद उस की तबीयत बिगड़ गई. थोड़ीथोड़ी देर में 2 उलटियां हुईं. उलटी में खून था साहब. बगल के डाक्टर प्रकाश को मेरा बेटा बुला लाया. नीरजा बेहोश हो गई थी. उन्होंने उसे तुरंत अस्पताल ले जाने को कहा. उन्होंने ही एंबुलैंस भी बुला दिया. यहां डाक्टरों ने जवाब दे दिया है.’’

तभी अंदर से नर्स आई, ‘‘यहां मिस्टर विशाल कौन हैं?’’

‘‘जी, मैं हूं,’’ उन्होंने कहा.

‘‘पेशेंट को होश आ गया है. बट शी इज वैरी क्रिटिकल ऐंड वीक. कई बार आप का नाम ले चुकी है. आइए, पर ज्यादा बात नहीं कीजिएगा. शी विल नौट होल्ड. आइए, इधर से आ जाइए.’’

वे आईसीयू के अंदर आ गए. नर्स उन्हें नीरजा के बैड तक ले गई. नीरजा गले तक सफेद चादर ओढ़े लेटी थी. उस की हिरनी जैसी बड़ीबड़ी आंखें पूरी खुली थीं. उन्हें देखते ही उस के होंठों पर मुसकराइट व आंखों में चमक आ गई. नर्स ने अपने होेंठों पर उंगली रख कर उन्हें इशारा किया.

‘‘हैलो स्मार्टी,’’ उस ने चादर से अपना हाथ निकाल कर उन का हाथ पकड़ लिया. उस की आवाज साफ थी, ‘‘बड़ी देर कर दी आतेआते?’’

वे खड़े, उसे चुपचाप देखते रहे.

‘‘मुझ से बेहद नाराज हैं न मेरे दोस्त. इसीलिए न कि मैं ने पहले क्यों नहीं बताया. पर अगर मैं पहले बता देती तो मुझे मेरा स्मार्टी बौयफ्रैंड शायद नहीं मिलता. सही है न.’’

इतना बोलने में ही उस के माथे पर पसीने की एकदो बूंदें आ गईं. उन्होंने पास पड़ा स्टूल खींच लिया व उस के पास ही बैठ गए, जिस से उसे बोलने में जोर न लगाना पड़े.

‘‘नहीं,’’ मैं तुम से नाराज नहीं हूं,’’ उन्होंने धीरे से कहा, ‘‘पर मैं तुम से बहुतबहुत नाराज हूं. अगर तुम समय से मुझे बता देतीं तो मैं हिंदुस्तान के बडे़ से बड़े डाक्टर से तुम्हारा इलाज करा कर तुम्हें बचा लेता.’’

‘‘नहीं विशाल, मैं जानती थी इस का कोई इलाज नहीं था. आप नाराज मत होइए, मैं जानती हूं मैं आप को

मना लूंगी माई डियर फ्रैंड. पर मुझे आप से माफी मांगनी है, मुझे माफ कर दीजिए प्लीज.’’

‘‘पर किसलिए? तुम किसलिए माफी मांग रही हो नीरजा?’’

‘‘मैं जीना चाहती थी. इसलिए मेरे पास जितना भी वक्त था मैं उसे जीना चाहती थी. खुशीखुशी जीना चाहतीथी. इसीलिए मैं ने आप का कुछ चुरा लिया था.’’

‘‘चुरा लिया था, पर तुम ने मेरा क्या चुरा लिया था?’’

‘‘मैं ने आप के शांत जीवन से अपने लिए कुछ खुशियों के पल चुरा लिए थे, मिस्टर विशाल. आप के पूरे जीवन के लिए एक बड़ा सा शून्य छोड़ दिया है. आई एम सौरी सर. मुझे माफ कर दीजिए सर.’’

‘‘माफी की कोई बात है ही नहीं नीरजा, क्योंकि मैं कभी भी तुम से नाराज हो ही नहीं सकता. अब मैं समझ गया. मेरी नीरजा बहुतबहुत बहादुर है, वैरी ब्रेव.’’

‘‘इसीलिए मैं आप को अपने घर नहीं ले जा सकती थी. अगर आप मम्मी से मिलते, तो मम्मी आप को सबकुछ सचसच बता देतीं. अच्छा, एक बात बताइए?’’

‘‘पूछो नीरजा, कुछ भी पूछो?’’

‘‘मैं ने बीसियों बार आप को माई स्मार्ट बौयफ्रैंड कहा है. कहा है न, बताइए?’’

‘‘बिलकुल कहा है.’’

‘‘पर आप ने एक बार भी मुझे माई गर्लफ्रैंड नहीं कहा है. कहा है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो कहिए न प्लीज. मैं सुन रही हूं. मैं इस पल को भी जीना चाहती हूं.’’

उन्होंने उस की हथेली अपने हाथों में ले ली व भरे गले से कहा, ‘‘दिस इज फैक्ट नीरजा. यू आर माई

स्वीट लिटिल गर्लफ्रैंड ऐंड आई लव यू वैरीवैरी मच.’’उस ने उन की हथेली को चूम लिया.

नीरजा की आंखें मुंदने लगीं. जबान लड़खड़ाने लगी. नर्स जो नर्सिंग काउंटर से देख रही थी, तुरंत आई.‘‘आप प्लीज तुरंत बाहर जाइए. सिस्टर डाक्टर को कौल करो, अर्जेंट.’’

वे धीरेधीरे बाहर आ कर किनारे पड़ी बैंच पर बैठ गए.

डाक्टर मित्रा के आने की नौबत नहीं आने पाई. उस के पहले ही नीरजा ने आखिरी सांस ले ली.

नीरजा का जिस्म पहले घर लाया गया. वे अंतिम संस्कार तक रुके. गाड़ी घर की तरफ मोड़ते समय उन के कानों में नीरजा के आखिरी शब्द गूंजते रहे, ‘मैं ने आप के शांत जीवन से अपने लिए खुशियों के कुछ पल चुरा लिए हैं.’

‘तुम ने मेरे जीवन में शून्य नहीं छोड़ा है नीरजा,’ वे बुदबुदा पड़े, ‘मेरे जीवन के किसी खाली कोने में अपनी मुसकराहटों व खिलखिलाहटों के रंग भी भरे हैं. मैं तुम्हें माफ नहीं कर सकता, कभी नहीं.

5 टिप्स:  होममेड ब्लीच से पाएं सौफ्ट एंड ग्लोइंग स्किन

स्किन को ब्यूटीफुल और ग्लोइंग बनाने के लिए न जाने हम कितने प्रौडक्ट और पार्लर पर पैसा खर्च करते हैं. पर फिर भी हम नेचुरल ग्लोइंग स्किन नहीं पा पाते. हर कोई चाहता है कि घर बैठ हुए और बिना पैसे खर्च किए हमारी स्किन सुंदर हो लेकिन ऐसा नही होता. पर आज हम आपको यह बताएंगे कि नेचुरल टिप्स से कैसे घर बैठे ब्लीच करके स्किन को ग्लोइंग बनाएं. आइए जानते है ब्लीच की कुछ होममेड टिप्स के बारे में…

1. संतरे का छिलका है फायदेमंद

orange peel

संतरे के छिलकों में पाए जाने वाले साइट्रिक एसिड के कारण इसमें नेचुरल ब्लीच के गुण होते हैं. संतरों के छिलकों को धूप सुखाकर पाउडर बनाएं. इसके बाद पाउडर में एक चम्मच दूध, शहद, संतरे का रस मिलाकर चेहरे पर लगाएं.

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2. टमाटर के गूदे का करें इस्तेमाल

eatables for prevention from cancer

टमाटर का गूदा निकालें और एक चम्मच नींबू के रस और गुलाब जल में मिलाएं. इसके बाद चेहरे पर लगाकर सूखने तक रुकें. इसके सूखने के बाद चेहरा धो लें.

3. खीरे और नींबू का रस होगा फायदेमंद

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खीरे और नींबू से आप घर में ब्लीच तैयार कर सकते हैं. एक चम्मच खीरे के रस और एक चम्मच नींबू के रस को मिलाएं. इसके बाद चेहरे पर लगाएं.

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4. नेचुरल ब्लीच है आलू का रस

vegetables to avoid in acidity

आलू के रस को आप नेचुरल ब्लीच के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं. आलू के रस को चेहरे पर लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें और फिर ठंडे पानी से चेहरा धो लें.

5. स्किन के लिए अच्छा है पपीता

 

papaya

पपीते से बना ब्लीच चेहरे के लिए बहुत अच्छा होता है. आप एक चौथाई कप पके पपीते के गूदे को निकालकर इसमें एक चम्मच नींबू का रस मिलाएं. इस पेस्ट को चेहरे पर लगाएं और सूखने पर चेहरा धो लें.

6. नेचुरल ब्लीच का काम करता है दही

easy tongue cleaning tips

दही आपकी स्किन के लिए नेचुरल ब्लीच का काम करता है. दही के ब्लीच के लिए कुछ करना नहीं पड़ता है. इसके लिए आप चेहरे पर दही लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दे और इसके बाद पानी से धो लें.

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कोशिश ही कामयाबी की पहली सीढ़ी है : राजीव चिलाका

कार्टून सीरियल/एनीमेशन  सीरियल ‘‘छोटा भीम’’ हो या ‘छोटा भीम’ फ्रेंचाइजी की फिल्में हो, ये सब राजीव चिलाका के दिमाग की ही उपज है. वही इसके क्रिएटिव डायरेक्टर व क्रिएटर हैं. पूर्व राष्ट्रपति व वैज्ञानिक स्व.अब्दुल कलाम आजाद के साथ काम कर चुके मशहूर वैज्ञानिक मधुसूदन राव के बेटे राजीव चिलाका के दिमाग में बचपन से ही  उनके पिता ने जो एनीमेशन का कीड़ा भरा था. उसी का परिणाम है कि राजीव चिलाका ने ‘मास्टर इन कम्प्यूटर साइंस’ की डिग्री लेने के बाद अमेरिका में एनीमेशन बनाना सीखा और फिर भारत आकर इस इंडस्ट्री को खड़ा करने का काम किया. ‘टर्नर’ चैनल पर एनीमेशन सीरियल ‘‘छोटा भीम’’ के सफल होने के कई वर्ष बाद 2012 में राजीव चिलाका ने पहली एनीमेशन फिल्म ‘छोटा भीम’ बनायी थीं. अब इस फ्रेंचाइजी की छठी फिल्म ‘‘छोटा भीमः कुंगफू धमाका’ लेकर आए हैं. दस मई को थिएटरों में पहुंची यह पहली भारतीय थ्री डी एनीमेशन फिल्म है.

‘‘छोटा भीम’’ सीरियल की सफलता ने आपकी उम्मीदों को पर लगा दिए?

मैं स्पष्ट कर दूं कि टीवी सीरियल के रूप में जब ‘छोटा भीम’ टीवी पर आया तो रातों रात कोई हंगामा नहीं हुआ. धीरे धीरे इसके दर्शक बढ़े थे. धीरे धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ी थी. पहले सिर्फ 13 एपीसोड ही आए थे, जब लोगों ने इसे पसंद किया, तो अगले 13 एपीसोड बने. फिर एक वक्त वह आया, जब हमें लगा कि ‘छोटा भीम’ तो बहुत लोकप्रिय हो गया है, हमें इस पर फिल्म बनानी चाहिए.तब 2012 में हमने इस पर फिल्म ‘‘छोटा भीम’’ बनायी थी. अब हम इस फ्रेंचाइजी की छठी फिल्म ‘‘छोटा भीम कुंगफू धमाका’’ लेकर आए हैं.

यह ऐसा कोई मूवमेंट नहीं था कि रातों रात हमें सफलता मिल गयी हो. हमने धीरे धीरे स्थायी मजबूत प्रगति की. सच कहूं तो हमें उम्मीद नही थी कि हमारे इस एनीमेशन सीरीज या फिल्म को लोग इतना पसंद करेंगे. अमूमन हमने देखा हैं कि एनीमेशन सीरियल शुरु होता है, 3 से 4 चार साल बाद बंद हो जाता है. पूरे विश्व में यदि हम देखें, तो बामुश्किल दस ऐसे एनीमेशन सीरियल मिलेंगे, जो दस साल से अधिक समय प्रसारित हुए होंगे. जिस सीरियल ने दस साल पार कर लिया, वह तो पूरी जिंदगी के लिए हो जाता है. अब हमें यकीन हैं कि हमारा भीम आजीवन चलेगा.

जल्द ही वापसी करेंगी दया बेन

फिल्म ‘छोटा भीम कुंगफू धमाका’’ थ्री डी फिल्म है. तो भीम को ‘ टू डी’ से ‘थ्री डी’ करते समय क्या बदलाव करने पड़े?

जब भीम ‘2 डी’ से ‘3 डी’ में आएगा,  तो कैसे इक्जक्यूट होगा? हमारे लिए यह सोचने का विषय था. ‘3 डी’ में यदि भीम किक मारेगा, तो धोती में कैसे मारेगा? काफी सोचने के बाद दिमाग में आया कि भीम के कौस्ट्यूम में बदलाव किया जाए. तो उसके कौस्ट्यूम को बदला. किक मारते समय उसके छोटे कद के पैर धोती में छिप जाते थे, तो थ्रीडी में उसका प्रभाव नहीं आ रहा था. तब हमने उसकी उम्र और उसके पैरों की लंबाई बढ़ायी. अब थ्री डी में भीम लड़ाई करते समय विश्वसनीय लगता है. मेरे हिसाब से हमारी पहली थ्री डी फिल्म‘ ‘छोटा भीम कुंगफू धमाका’’ बहुत सही समय पर सिनेमाघरों में आ रही है.

फिल्म का नाम ‘‘छोटा भीम कुंगफू धमाका’’ क्यों? क्या मार्शल आर्ट का मसला है?

आपने एकदम सही पकड़ा. हमें लगा कि ‘कुंगफू मार्शल आर्ट’ बच्चों को बहुत अच्छा लगता है, इसलिए हमने इस फिल्म को कुंगफू मार्शल आर्ट पर गढ़ा है. हमें लगा कि कुंगफू के साथ कुछ अच्छा सा नाम देना चाहिए. काफी सोचने के बाद हमें युनिवर्सल नाम मिला ‘धमाका’. इसलिए इसका नाम रखा ‘कुंगफू धमाका. ’हमारी फिल्म की कहानी में बच्चे कुंगफू टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए चीन जाते हैं, तो कहानी वहां से शुरु होती है.

फिल्म की कहानी क्या है?

कहानी में बच्चे कुंगफू टुर्नामेंट में हिस्सा लेने चाइना जाते हैं पर टूर्नामेंट खत्म होने से पहले ही चाइना की प्रिंसेस का अपहरण हो जाता है. पर तब तक भीम की पूरी टीम से उसकी दोस्ती हो चुकी होती है, इसलिए भीम की पूरी टीम उस प्रिंसेंस को बचाने के लिए चली जाती है. वह उस प्रिंसेस को छुड़ाकर लाते हैं. तो इसमें टूर्नामेंट खत्म होने की बजाए उस बच्ची की जान बचाने की जो यात्रा है, वह महत्वपूर्ण है.

इस फिल्म में एक्शन बहुत होगा?

इसमें एक्शन, इमोशन, कौमेडी और एंडवेचर्स भी है.

क्या एक्शन प्रधान फिल्म होने की वजह से आपने इसे थ्री डी में बनाना ज्यादा उपयुक्त समझा?

कुछ हद तक असली वजह तो दर्शकों को कुछ नया देने का प्रयास है. इन दिनों बच्चें होम थिएटर या मोबाइल या टीवी पर फिल्में देखते रहते हैं. उन्हें थिएटर तक लाने के लिए भी तो कुछ नया करने के हिसाब से इसे ‘थ्री डी’ में बनाया.

फिल्म ‘‘छोटा भीम कुंगफू धमाका’’ मनोरंजन के अलावा बच्चों को कोई सीख देगी?

इसमें हमने हर सीख बहुत साधारण तरीके से दी है. पहली सीख यह है कि हर बच्चे को अपने दोस्त के साथ हमेशा खड़े रहना चाहिए. दूसरी सीख है कि एकता में ही ताकत है. हम एकजुट होकर हर संकट का मुकाबला कर सफलता पूर्वक जीत हासिल कर सकते हैं. तीसरी सीख है कि आपको हमेशा अपनी फ्रेंडशिप के लिए लड़ना चाहिए. चौथी सीख है कि कामयाबी के लिए कोशिश करना बहुत जरूरी है. जब तक आप प्रयास नहीं करेंगे, एक कदम आगे नहीं बढाएंगे, तब तक कामयाबी कैसे मिलेगी. हमारी फिल्म हर बच्चे से यही कहती है कि आप कोशिश करो, सफलता मिलेगी. यूं कहें कि कोशिश ही कामयाबी की पहली सीढ़ी है.

फिल्म में कितने गाने हैं?

फिल्म में तीन गाने हैं. एक गाना ‘दलेर मेंहदी’ ने गाया हैं जो कि बौलीवुड स्टाइल का है. इसे हमने फिल्म के अंत में रखा है. दूसरे  गाने को सुनिधि चैहान ने गाया हैं. तीसरे गाने को एनेमेटेड करेक्टर के साथ दलेर मेंहदी ने गाया है. ऐसा प्रयोग पहली बार हमने भारत में किया है.

कार्टून फिल्मों के लिए भी इमोशन जरूरी होते हैं, उसके लिए क्या करते हैं?

देखिए, कहानी में इमोशन पर कहानी लिखते समय से ही काम शुरू हो जाता है. स्क्रिप्ट के समय भी उसमें इमोशन डालने होते हैं. फिर एनीमेशन यानीकि विज्युलाइज करते समय इमोशन डाल देते हैं.जब हम कोई किरदार विकसित करते हैं या उसका एनीमेशन तैयार करते हैं, तो हम यह देखते हैं कि हम उसके साथ जुड़ रहे हैं या नहीं. यदि परदे पर भीम हार रहा है, तो दर्शकों को लगना चाहिए कि क्यों जीत रहा है और हार रहा है, तो भी लगना चाहिए क्यों हार रहा है. इन सारे इमोशन के साथ बच्चों का जुड़ाव जरूरी है. तभी वह एनीमेशन वास्तविक होती है. आखिरकार हमारे किरदार तो मानवीय होते हैं. वह गिरेंगे, तो उन्हें दर्द होगा. यह सब हमारे एनेमेटेड किरदार में रखते हैं. हमारे किरादारों की एक यात्रा होती है. हमारा भीम हर बार जीतता ही नही है, कई बार हारता भी है. इसके अलावा यदि भीम ने लड़ाई लड़ी और जीत गया, तो उसके दोस्तों का क्या होगा? किसी ने भीम को मारा, तो उसके दोस्तों का रिएक्शन क्या होगा? यह सब कुछ आपको बहुत नैच्युरल नजर आएगा.

एनीमेशन फिल्म में संगीत की कितनी उपयोगिता है?

बहुत ज्यादा जरूरी है. एनीमेशन फिल्मों में संगीत के माध्यम से ही हम इमोशन पैदा करते हैं. जो फीलिंग मिसिंग होती है, वह भीसंगीत से उभर कर आ जाती है. फिर डबिंग आर्टिस्ट इन किरदारों को अपनी आवाज देकर खुशी, गम आदि के इमोशन भरते हैं.

सुष्मिता सेन के घर गूंजेगी शहनाई

आपका दावा है कि आपने काफी रिसर्च किया. पर रिसर्च के दौरान आपने बच्चों से बात की?

बच्चों से बातचीत के बिना रिसर्च अधूरा रहता. हमारी लंबी चौड़ी टीम ने रिसर्च किया. मैंने अपने स्तर पर किया. मैं आपको एक वाकया बताता हूं. मैंने ‘छोटा भीम’ का एक एपीसोड बनाया और अपनी कौलोनी के सारे बच्चों को इकट्ठा करके दिखाया. मैंने देखा कि सारे लड़के बहुत खुश थे कि भीम ने क्या कमाल किया है. पर लड़कियां नाराज थीं. उनमें मेरी भतीजी भी थी. मैंने अपनी भतीजी से पूछा क्या माजरा है? तो पता चला कि लड़कियों को यह नागवार लगा कि सब कुछ भीम कर रहा है,छुटकी नहीं. मेरी भतीजी ने कहा, ‘आपने यह कैसे सोच लिया कि छुटकी भीम से कमजोर है? क्या मैं किसी लड़के से कम हूं?’ तो मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ. फिर मैने सभी लड़कियों से राय ली. एक ने कहा कि छुटकी को लड़कों के साथ खेलना चाहिए. दूसरी ने कहा कि छुटकी को कालिया को पीटना चाहिए. एक ने कहा कि छुटकी को स्किीपिंग करना चाहिए. एक ने कहा कि भीम ताकत लगाए, सब कुछ करें, लेकिन आइडिया छुटकी की होनी चाहिए. मैंने इन सारी बातों को दिमाग में रखा और धीरे धीरे इन सारी बातों को ‘छोटा भीम’ के अगले एपहसोड में पिरोया. अब छोटा भीम सीरियल हो या फिल्म भीम के बाद छुटकी ही सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण किरदार है. भीम की ही तरह छुटकी भी बच्चों में लोकप्रिय है.

भाजपा के पूर्वांचल फतह में कितना सहायक होंगे राजन तिवारी

राजनीति से अपराधी करण को खत्म करने का दावा करने वाली भाजपा ने पूर्वांचल में माफिया राजन तिवारी को चुनाव के बीच पार्टी में शामिल करके अपने ही दावे पर सवालिया निशान लगा दिया है. राजन तिवारी को भाजपा में शामिल होने से पार्टी की अंदरूनी राजनीति भी प्रभावित होगी.

भाजपा के लिये पूर्वांचल की राह सबसे कठिन है. लोकसभा चुनाव में छठे और सातवें चरण के चुनाव में 27 सीटों पर चुनाव है. यहां वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गोरखपुर की प्रतिष्ठित सीट है. जहां से भोजपुरी अभिनेता रवि किशन प्रत्याशी हैं. भाजपा को अपना जनाधार बचाने के लिये माफिया राजन तिवारी को चुनाव के बीच भाजपा में शामिल करना पड़ा. पूर्वांचल में ठाकुर और ब्राहमण माफियाओं के बीच दुश्मनी पुरानी कहानी है. राजन तिवारी के शामिल होने से एक बार फिर से राजनीति के अपराधीकरण की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है.

चुनाव ने खोली शौचालय की पोल

90 के दशक में अपराध की दुनिया में श्रीप्रकाश शुक्ल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं था. यूपी पुलिस को सिर्फ इस माफिया गैंग से निपटने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स यानि एसटीएफ बनानी पड़ी थी. इस गैंग पर उस समय के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सुपारी लेने का आरोप लगा था. इस श्री प्रकाश के गैंग में राजन तिवारी नाम का एक सदस्य भी था. श्रीप्रकाश  गैंग के करीब करीब सभी बदमाश एकएक कर के पुलिस मुठभेड़ में मारे गए लेकिन राजन तिवारी खुद को बचाकर अपना राजनीतिक सफर शुरू किया. राजन ने बिहार विधान सभा चुनावों से अपना सफर तय किया.

अपराध से राजनीति:

2019 के लोकसभा चुनाव में राजन तिवारी भाजपा में शामिल हो गए हैं. उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री गोपाल जी टंडन ने उनको भाजपा में शमिल करा लिया. गोपाल टंडन के पिता लाल जी टंडन बिहार के राज्यपाल हैं. राजन तिवारी के भाजपा में शामिल होने का बहुत प्रचार नहीं किया गया. इसकी वजह भाजपा की आंतरिक और जातीय राजनीति को माना जा रहा है. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में माफियाओं के बीच भी जातीय द्वंद लंबे समय से चलता रहा है. ठाकुर और ब्राहमण वर्ग में आपसी टकराव माफियाओं में भी चलता रहता है.

नक्सलवाद की पृष्ठभूमि

वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी के बीच यह लंबा सघर्ष चला था. वीरेन्द्र की हत्या के बाद श्रीप्रकाश शुक्ला गैंग यहा प्रभावी रहा. उस समय भाजपा के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी की चर्चा आने के बाद श्रीप्रकाश शुक्ला को मारने के लिये उत्तर प्रदेश सरकार को एसटीएसफ बनानी पडी. श्रीप्रकाश के मारे जाने के बाद भी माफियों के बीच जातीय संघर्ष चलता रहा. गोरखपुर में गोरखनाथ पीठ के प्रभावी होने के बाद इस परंपरा पर रोक लगी. अब जबकि गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री है तब श्रीप्रकाश गैंग के राजन तिवारी को भाजपा में शामिल किया जाना बड़ी घटना मानी जा रही है.

श्री प्रकाश गैंग चर्चा में:

राजन तिवारी का नाम पहली बार चर्चा में तब आया था जब गोरखपुर के बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही पर श्रीप्रकाश ने जानलेवा हमला किया था. 4 अक्टूबर 1996 को शाही जब अपने कार्यालय से घर जा रहे थे तब कैंट इलाके में उनकी कार पर बदमाशों ने जमकर फायरिंग की थी. इस हमले में शाही की जांघ में गोली भी लगी थी. गनर मारा गया लेकिन शाही बच गए थे.  इस हमले में श्री प्रकाश के साथ राजन तिवारी को भी अभियुक्त बनाया गया.

इसके बाद तो राजन और श्रीप्रकाश का नाम कई बड़ी वारदातों में सामने आया. यूपी में एके 47 राइफल और 9 एम् एम् पिस्टल का चलन भी इसी गैंग की देन थी. राजन तिवारी पर सबसे बड़ा आरोप तब लगा जब बिहार के बाहुबली नेता बृज बिहारी प्रसाद पर पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में जानलेवा हमला हुआ. बृज बिहारी पर हमला बिहार के ही दूसरे बाहुबली भुटकुन शुक्ल के इशारे पर हुआ था.

बृज बिहारी की हत्या में श्रीप्रकाश शुक्ल, राजन तिवारी, मुन्ना शुक्ला, सूरजभान, मंटू तिवारी का नाम आया. बिहार के माफिया सूरजभान ने ही श्रीप्रकाश और राजन तिवारी की मुलाकात करवाई थी. भुटकन तब अपने भाई की हत्या का बदला बृज बिहारी से लेना चाहता था. मगर बृज बिहारी के खौफ की वजह से उसे बिहार में शूटर नहीं मिल रहे थे. ऐसे में श्रीप्रकाश ने बृज बिहारी की सुपारी ली और इस घटना को अंजाम दिया. गोरखपुर में रेलवे के ठेके पर कब्जे को ले कर हुए विवेक सिंह हत्याकांड में ही श्रीप्रकाश और सूरजभान एक गुट में शामिल थे. इस केस में सीबीआई कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा तो हुयी मगर 2014 में बिहार हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया. इसी साल वीरेंद्र शाही की हत्या के आरोप में भी राजन बरी हो गए.

इसलिए केजरीवाल के साथ नहीं अग्रवाल समाज

कैसे खत्म होगा राजनीति से अपराधीकरण:

बृजबिहारी प्रसाद की हत्या में जेल जाने से पहले ही राजन ने राजनीति का रास्ता चुन लिया. उस वक्त बिहार की राजनीति में बाहुबलियों का बोलबाला बढ़ा हुआ था. बिहार में राजन दो बार विधायक भी रहे. राजन को उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक पकड बनानी थी. इस वजह से वह उत्तर प्रदेश में अपना सियासी रास्ता बनाने की कोशिश में लग गए. भाजपा की सदस्यता लेने वाले राजन तिवारी मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के सोहगौरा गांव के रहने वाले हैं. उनका बचपन इसी गांव में बीता मगर पढ़ाई गोरखपुर शहर में हुई. पूर्वी उत्तर प्रदेश में किसी मजबूत ब्राह्मण नेता की तलाश में जुटी भाजपा ने फिलहाल राजन तिवारी पर अपनी उम्मीदें टिका दी हैं. भाजपा ने लोकसभा चुनाव में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिये राजन तिवारी को बीच चुनाव में पार्टी में शामिल किया गया.

राजन तिवारी की रणनीति उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. भाजपा इस बहाने पूर्वांचल की राजनीति में ब्राहमण को महत्व देकर अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है. राजन तिवारी के भाजपा में शामिल होने के बाद एक सवाल उठ रहा है कि योगी आदित्यनाथ और राजन तिवारी को एक ही पार्टी में रहना बताता है कि भाजपा में आपसी सियासत गरम हो रही है.

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