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जानें कैसे बनाएं तंदूरी आलू

आज हम आपको तंदूरी आलू की रेसिपी बताने जा रहे हैं, जिसमें मसालें डालकर शैलो फ्राई किया जाता है. इसे बनाना बेहद आसान है, आलू की इस बेहतरीन रेसिपी को आप प्याज और सौंठ की चटनी के साथ सर्व कर सकती हैं.

सामग्री

आलू(1 किग्रा)

देसी घी (आवश्यकतानुसार)

आमचुर (1/2 टी स्पून)

काला नमक (1/2 टी स्पून)

लाल मिर्च पाउडर (1/2 टी स्पून)

नमक (1 टी स्पून)

पीली मिर्च पाउडर (1 टी स्पून)

आलू कुर्मा रेसिपी

चाट मसाला (1 टी स्पून)

सौंठ चटनी (4 टेबल स्पून)

टमाटर (150 ग्राम)

प्याज (150 ग्राम)

मिर्च (30 ग्राम)

धनिया (30 ग्राम)

बनाने की वि​धि

आलुओं को छिलके सहित आधा पकने तक उबाल लें.

आलुओं का छिलका उतार लें.

आलुओं को सीख में लगाकर तेल लगा लें.

इन्हें तंदूर में हल्के ब्राउन होने तक पकाएं.

आलुओं को ठंडा होने दें और इन्हें हथेलियों के बीच में रख कर दबाएं, इसे फ्लैटन कर लें, क्रश न करें.

पालक की भुर्जी रेसिपी

एक पैन में घी गर्म करें और आलुओ को ​क्रिस्पी और गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई करें.

आमचुर, नमक, काला नमक, लाल मिर्च पाउडर और पीली मिर्च पाउडर मिलाकर एक मिक्सचर बना लें.

ड्राई मसाला डालकर आलुओं को भून लें और इसे प्लेट में लगा लें.

आलुओं को सौंठ की चटनी, कटा प्याज, टमाटर, हरी मिर्च और हरा धनिया डालें और इसे गर्मागर्म सर्व करें.

बालू पर पड़ी लकीर

पंडित ओंकारनाथ और मौलाना करीमुद्दीन जब भी आमनेसामने होते तो एकदूसरे पर कटाक्ष करने से बाज न आते पर हालात ने एक दिन कुछ ऐसा कर दिखाया कि वे सारे गिलेशिकवे भूल कर एकदूसरे के गले लग गए. पढि़ए रेणुका पालित की एक हृदयस्पर्शी कहानी.

मैं अपने घर  के बरामदे में बैठा पढ़ने का मन बना रहा था, पर वहां शांति कहां थी. हमेशा की तरह हमारे पड़ोसी पंडित ओंकारनाथ और मौलाना करीमुद्दीन की जोरजोर से झगड़ने की आवाजें आ रही थीं. वह उन का तकरीबन रोज का नियम था. दोनों छोटी से छोटी बात पर भी लड़तेझगड़ते रहते थे, ‘‘देखो, मियां करीम, मैं तुम्हें आखिरी बार मना करता हूं, खबरदार जो मेरी कुरसी पर बैठे.’’

‘‘अमां पंडित, बैठने भर से क्या तुम्हारी कुरसी गल गई. बड़े आए मुझे धमकी देने, हूं.’’

‘नहाते तो हैं नहीं महीनों से और चले आते हैं कुरसी पर बैठने,’ पंडितजी ने बड़बड़ाते हुए अपनी कुरसी उठाई और अंदर रखने चले गए.

मुझे यह देख कर आश्चर्य होता था कि मौलाना और पंडित में हमेशा खींचातानी होती रहती थी, पर उन की बेगमों की उन में कोई भागीदारी नहीं थी. मानो दोनों अपनेअपने शौहरों को खब्ती या सनकी समझती थीं. अचार, मंगोड़ी से ले कर कसीदा, कढ़ाई तक में दोनों बेगमों का साझा था.

पंडित की बेटी गीता जब ससुराल से आती, तब सामान दहलीज पर रखते ही झट मौलाना की बेटी शाहिदा और बेटे रागिब से मिलने चली जाती. मौलाना भी गीता को देख कर बेहद खुश होते. घंटों पास बैठा कर ससुराल के हालचाल पूछते रहते. उन्हें चिढ़ थी तो सिर्फ  पंडित से.

कटाक्षों का सिलसिला यों ही अनवरत जारी रहता. पिछले दिन ही मौलाना का लड़का रागिब जब सब्जियां लाने बाजार जा रहा था, तब पंडिताइन ने पुकार कर कहा, ‘‘बेटे रागिब, बाजार जा रहा है न. जरा मेरा भी थैला लेता जा. दोचार गोभियां और एक पाव टमाटर लेते आना.’’

‘‘अच्छा चचीजान, जल्दी से पैसे दे दीजिए.’’

पंडित और मौलाना अपनेअपने बरामदे में कुरसियां डाले बैठे थे. भला ऐसे सुनहरे मौके पर मौलाना कटाक्ष करने से क्यों चूकते. छूटते ही उन्होंने व्यंग्यबाण चलाए, ‘‘बेटे रागिब, दोनों थैले अलग- अलग हाथों में पकड़ कर लाना, नहीं तो पंडित की सब्जियां नापाक हो जाएंगी.’’

मुसकराते हुए उन्होंने कनखियों से पंडित की ओर देखा और पान की एक गिलौरी गाल में दबा ली.

जब पंडित ने इत्मीनान कर लिया कि रागिब थोड़ी दूर निकल गया है, तब ताव दिखाते हुए बोले, ‘‘अरे, रख दे मेरे थैले. मेरे हाथपांव अभी सलामत हैं. मुझे किसी का एहसान नहीं लेना. पंडिताइन की बुद्धि जाने कहां घास चरने चली गई है. खुद चली जाती या मुझे ही कह देती.’’

भुनभुनाते हुए पंडित दूसरी ओर मुंह फेर कर बैठ जाते.

यों ही नोकझोंक चलती रहती पर एक दिन ऐसी गरम हवा चली कि सारी नोकझोंक गंभीरता में तबदील हो गई.

शहर शांत था, पर वह शांति किसी तूफान के आने से पूर्व जैसी भयानक थी. अब न पंडिताइन रागिब को सब्जियां लाने को आवाज देती, न ही मौलाना आ कर पंडित की कुरसी पर बैठते. एक अदृश्य दीवार दोनों घरों के मध्य उठ गई थी, जिस पर दहशत और अविश्वास का प्लास्टर दोनों ओर के लोग थोपते जा रहे थे. रिश्तेदार अपनी ‘बहुमूल्य राय’ दे जाते, ‘‘देखो मियां, माहौल ठीक नहीं है. यह महल्ला छोड़ कर कुछ दिन हमारे साथ रहो.’’

परंतु कुछ ऐसे भी घर थे जहां अविश्वास की परत अभी उतनी मोटी नहीं थी. इन दोनों परिवारों को भी अपना घर छोड़ना मंजूर नहीं था.

‘‘गीता के बापू, सो गए क्या?’’

‘‘नहीं सोया हूं,’’ पंडित खाट पर करवट बदलते हुए बोले.

‘‘मेरे मन में बड़ी चिंता होती है.’’

‘‘तुम क्यों चिंता में प्राण दिए दे रही हो. ख्वाहमख्वाह नींद खराब कर दी, हूंहं,’’ और पंडित बड़बड़ाते हुए बेफिक्री से करवट बदल कर सो गए.

पर एक रात ऐसा ही हुआ जिस की आशंका मन के किसी कोने में दबी हुई थी. दंगाई (जिन की न कोई जाति होती है, न धर्म) जोरजोर से पंडित का दरवाजा खटखटा रहे थे, ‘‘पंडितजी, बाहर आइए.’’

पंडित के दरवाजा खोलते ही लोग चीखते हुए पूछने लगे, ‘‘कहां छिपाया है आप ने मौलाना के परिवार को?’’

‘‘मैं…मैं ने छिपाया है, मौलाना को? अरे, मेरा तो उन से रोज ही झगड़ा होता है. नहीं विश्वास हो तो देख लो मेरा घर,’’ पंडित ने दरवाजे से हटते हुए कहा.

अभी दंगाइयों में इस बात पर बहस चल ही रही थी कि पंडित के घर की तलाशी ली जाए या नहीं कि शहर के दूसरे छोर से बच्चों और स्त्रियों की चीखपुकार सुनाई पड़ी. रात के सन्नाटे में वह हंगामा और भी भयावह प्रतीत हो रहा था. दरिंदे अपना खतरनाक खेल खेलने में मशगूल थे. बलवाइयों ने पंडित के घर की चिंता छोड़ दी और वे दूसरे दंगाइयों से निबटने के लिए नारे लगाते हुए तेजी से कोलाहल की दिशा की ओर झपट पड़े.

दंगाइयों के जाते ही पंडित ने दरवाजा बंद किया. तेजी से सीटी बजाते हुए एक ओर चले. वह कमरा जिसे पंडिताइन फालतू सामान और लकडि़यां रखने के काम में लाती थी, अब मौलाना के परिवार के लिए शरणस्थली था. सभी भयभीत कबूतरों जैसे सिमटे थे. बस, सुनाई पड़ रही थी तो अपनी सांसों की आवाजें.

पंडित ने कमरे में पहुंचते ही मौलाना को जोर से अंक में भींच कर गले लगा लिया. आंखों से अविरल बह रहे आंसुओं ने खामोशी के बावजूद सबकुछ कह दिया. मौलाना स्वयं भी हिचकियां लेते जाते और पंडित के गले लगे हुए सिर्फ ‘भाईजान, भाईजान’ कहते जा रहे थे.

गरम हवा शांत हो कर फिर बयार बहने लगी थी. सबकुछ सामान्य हो चला था. न तो किसी को किसी से कोई गिला था, न शिकवा. एक संतुष्टि मुझे भी हुई, अब मेरा महल्ला शांत रहेगा. पढ़ने के उपयुक्त वातावरण पर मेरा यह चिंतन मिथ्या ही साबित हुआ.

सुबह होते ही पंडित और मौलाना ने अखाड़े में अपनी जोरआजमाइश शुरू कर दी थी.

‘‘तुम ने मेरे दरवाजे की पीठ पर फिर थूक दिया, मौलाना, ’’ पंडित गरज रहे थे.

‘‘अरे, मैं क्यों थूकने लगा. तुझे तो लड़ने का बहाना चाहिए.’’

‘‘क्या कहा, मैं झगड़ालू हूं.’’

‘‘मैं तो गीता बिटिया के कारण तेरे घर आता हूं, वरना तेरीमेरी कैसी दोस्ती.’’

शिकायतों और इलजामों का कथोपकथन तब तक जारी रहा जब तक दोनों थक नहीं गए.

मैं ने सोचा, ‘यह समुद्र की लहरों द्वारा बालू पर खींची गई वह लकीर है, जो क्षण भर में ही मिट जाती है. समुद्र के किनारों ने लहरों के अनेक थपेड़ों को झेला है पर आखिर में तो वे समतल ही हो जाते हैं.’

सलाहकार

बचपन से ही शुचिता के मन में अंधविश्वास की जड़ें जमा दी थीं उस की दादी ने और युवा होतेहोते ये जड़ें और गहरी हो गई थीं, जिस का फायदा उठाया उस के अपनों ने. पढि़ए कुमुद भटनागर की दिल को झकझोरती कहानी.

छा त्रछात्राओं का प्रिय शगल हर एक अध्यापक- अध्यापिका को कोई नाम देना होता है और चाहे अध्यापक हों या प्राध्यापक, सब जानबूझ कर इस तथ्य से अनजान बने रहते हैं, शायद इसलिए कि अपने जमाने में उन्होंने भी अपने गुरुजनों को अनेक हास्यास्पद नामों से अलंकृत किया होगा.

ऋतिका इस का अपवाद थीं. वह अंगरेजी साहित्य की प्रवक्ता ही नहीं होस्टल की वार्डन भी थीं, लेकिन न तो लड़कियों ने खुद उन्हें कोई नाम दिया और न ही किसी को उन के खिलाफ बोलने देती थीं. मिलनसार, आधुनिक और संवेदनशील ऋतिका का लड़कियों से कहना था :

‘‘देखो भई, होस्टल के कायदे- कानून मैं ने नहीं बनाए हैं, लेकिन मुझे इस होस्टल में रह कर पीएच.डी. करने की सुविधा इसलिए मिली है कि मैं किसी को उन नियमों का उल्लंघन न करने दूं. मैं नहीं समझती कि आप में से कोई भी लड़की होस्टल के कायदेकानून तोड़ कर मुझे इस सुविधा से वंचित करेगी.’’

इस आत्मीयता भरी चेतावनी के बाद भला कौन लड़की मैडम को परेशान करती?  वैसे लड़कियों की किसी भी उचित मांग का ऋतिका विरोध नहीं करती थीं. खाना बेस्वाद होने पर वह स्वयं कह देती थीं, ‘‘काश, मुझ में होस्टल की मैनेजिंग कमेटी के सदस्यों को दावत पर बुला कर यह खाना खिलाने की हिम्मत होती.’’

लड़कियां शिकायत करने के बजाय हंसने लगतीं.

ऋतिका मैडम का व्यवहार सभी लड़कियों के साथ सहृदय था. किसी के बीमार होने पर वह रात भर जाग कर उस की देखभाल करती थीं. पढ़ाई में कोई दिक्कत होने पर अपना विषय न होते हुए भी वह यथासंभव सहायता कर देती थीं, लेकिन अगर कभी कोई लड़की व्यक्तिगत समस्या ले कर उन के पास जाती थी तो बजाय समस्या सुनने या कोई हल सुझाने के वह बड़ी बेरुखी से मना कर देती थीं. लड़कियों को उन की बेरुखी उन के स्वभाव के अनुरूप तो नहीं लगती थी फिर भी किसी ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया.

मनोविज्ञान की छात्रा श्रेया ने कुछ दिनों में ही यह अटकल लगा ली कि ऊपर से सामान्य लगने वाली ऋतिका मैम, भीतर से बुरी तरह घायल थीं और जिंदगी को सजा समझ कर जी रही थीं. मगर उन से पूछने का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि अगर उस का प्रश्न सुन कर ऋतिका मैडम जरा सी भी उदास हो गईं तो सब लड़कियां उन का होस्टल में रहना मुश्किल कर देंगी.

एम.ए. की छात्रा होने के कारण श्रेया अन्य लड़कियों से उम्र में बड़ी और ऋतिका मैडम से कुछ ही छोटी थी, सो प्राय: हमउम्र होने के कारण दोनों में दोस्ती हो गई और दोनों एक ही कमरे में रहने लगीं.

एक दिन एक पत्रिका द्वारा आयोजित निबंध लेखन प्रतियोगिता में भाग ले रही छात्रा रश्मि उन के कमरे में आई.

‘‘मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं हिंदी में निबंध लिखूं या अंगरेजी में?’’

‘‘लिखना तो उसी भाषा में चाहिए जिस में तुम सुंदरता से अपने भाव व्यक्त कर सको,’’ श्रेया बोली.

‘‘दोनों में ही कर सकती हूं.’’

‘‘इस की दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ है,’’ ऋतिका मैडम के स्वर में सराहना थी जिसे सुन कर रश्मि का उत्साहित होना स्वाभाविक ही था.

‘‘इस प्रतियोगिता में मैं प्रथम पुरस्कार जीतना चाहती हूं, सो आप सलाह दें मैडम, कौन सी भाषा में लिखना अधिक प्रभावशाली रहेगा?’’ रश्मि ने ऋतिका से मनुहार की.

‘‘तुम्हारी शिक्षिका होने के नाते बस, इतना ही कह सकती हूं कि तुम अच्छी अंगरेजी लिखती हो और सलाह तो मैं किसी को देती नहीं,’’ ऋतिका मैडम ने इतनी रुखाई से कहा कि रश्मि सहम कर चली गई.

‘‘जब आप को पता है कि उस की अंगरेजी औसत से बेहतर है, तो उसे उसी भाषा में लिखने को कहना था क्योंकि अंगरेजी में जीत की संभावना अधिक है,’’ श्रेया बोली.

‘‘इतनी समझ रश्मि को भी है.’’

‘‘फिर भी बेचारी आश्वस्त होने आप के पास आई थी और आप ने दुत्कार दिया,’’ श्रेया के स्वर में भर्त्सना थी, ‘‘मैडम, आप से सलाह मांगना तो सांड को लाल कपड़ा दिखाना है.’’

ऋतिका ने अपनी हंसी रोकने का असफल प्रयास किया, जिस से प्रभावित हो कर श्रेया पूछे बगैर न रह सकी :

‘‘आखिर आप सलाह देने से इतना चिढ़ती क्यों हैं?’’

‘‘चिढ़ती नहीं श्रेया, डरती हूं,’’ ऋतिका मैडम आह भर कर बोलीं, ‘‘मेरी सलाह से एकसाथ कई जीवन बरबाद हो चुके हैं.’’

‘‘किसी आतंकवादी गिरोह की आप सदस्या रह चुकी हैं?’’ श्रेया ने उन की ओर कृत्रिम अविश्वास से देखा.

ऋतिका ने गहरी सांस ली, ‘‘असामाजिक तत्त्व ही नहीं शुभचिंतक भी जिंदगियां तबाह कर सकते हैं, श्रेया.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘बड़ी लंबी कहानी है.’’

‘‘मैडम, आज पढ़ाई यहीं बंद करते हैं. कल रविवार को कहीं घूमने न जा कर पढ़ाई कर लेंगे,’’ कह कर श्रेया उठी और उस ने कमरे का दरवाजा बंद किया, बत्ती बुझा कर बोली, ‘‘अब आप शुरू हो जाओ. कहानी सुनाने से आप का दिल हलका हो जाएगा और मेरी जिज्ञासा शांत.’’

‘‘मेरा दिल तो कभी हलका नहीं होगा मगर चलो, तुम्हारी जिज्ञासा शांत कर देती हूं.

‘‘शुचिता मेरी स्कूल की सहपाठी थी. जब वह 7वीं में पढ़ती थी तो उस के डाक्टर मातापिता उसे दादी के पास छोड़ कर मस्कट चले गए थे. जब भी वह उन्हें याद करती, दादी प्रार्थना करने को कहतीं या उसे दिलासा देने को राह चलते ज्योतिषियों से कहलवा देती थीं कि उस के मातापिता जल्दी आएंगे.

‘‘मस्कट कोई खास दूर तो था नहीं, सो दादी से शुचि की उदासी के बारे में सुन कर अकसर उस के मातापिता में से कोई न कोई बेटी से मिलने आता रहता था. इस तरह शुचि भाग्य और भविष्यवक्ताओं पर विश्वास करने लगी. विदेश से लौटने पर उस के आधुनिक मातापिता ने शुचि को बहुत समझाया मगर उस की अंधविश्वास के प्रति आस्था नहीं डिगी.

‘‘रजत शुचि का पड़ोसी और मेरे पापा के दोस्त का बेटा था, सो एकदूसरे के घर आतेजाते मालूम नहीं कब हमें प्यार हो गया, लेकिन यह हम दोनों को अच्छी तरह मालूम था कि सही समय पर हमारे मातापिता सहर्ष हमारी शादी कर देंगे, मगर अभी से इश्क में पड़ना गवारा नहीं करेंगे. लेकिन मिले बगैर भी नहीं रहा जाता था, सो मैं पढ़ने के बहाने शुचि के घर जाने लगी. शुचि के मातापिता नर्सिंग होम में व्यस्त रहते थे इसलिए रजत बेखटके वहां आ जाता था. जिंदगी मजे में गुजर रही थी. मैं शुचि से कहा करती थी कि प्यार जिंदगी की अनमोल शै है और उसे भी प्यार करना चाहिए. तब उस का जवाब होता था, ‘करूंगी मगर शादी के बाद.’

‘‘ ‘उस में वह मजा नहीं आएगा जो छिपछिप कर प्यार करने में आता है.’

‘‘‘न आए, मगर जब मैं अपने मम्मीपापा को यह वचन दे चुकी हूं कि मैं शादी उन की पसंद के डाक्टर लड़के से करूंगी, जो उन का नर्सिंग होम संभाल सके तो फिर मैं किसी और से प्यार कैसे कर सकती हूं?’

‘‘असल में शुचि के मातापिता उसे डाक्टर बनाना चाहते थे लेकिन शुचि की रुचि संगीत साधना में थी, सो दामाद डाक्टर पर समझौता हुआ था. हम सब बी.ए. फाइनल में थे कि रजत का चचेरा भाई जतिन एम.बी.ए. करने वहां आया और रजत के घर पर ही रहने लगा.

‘‘एक रोज शुचिता पर नजर पड़ते ही जतिन उस पर मोहित हो गया और रजत के पीछे पड़ गया कि वह उस की दोस्ती शुचिता से करवाए. रजत के असलियत बताने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. मालूम नहीं जतिन को कैसे पता चल गया कि रजत मुझ से मिलने शुचिता के घर आता है. उस ने रजत को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया कि या तो वह उस की दोस्ती शुचिता के साथ करवाए नहीं तो वह हमारे मातापिता को सब बता देगा.

‘‘इस से बचने की मुझे एक तरकीब समझ में आई कि शुचिता के अंधविश्वास का फायदा उठा कर उस का चक्कर जतिन के साथ चला दिया जाए. रजत के रंगकर्मी दोस्त सुधाकर को मैं ने अपने और शुचिता के बारे में सबकुछ अच्छी तरह समझा दिया. एक रोज जब मैं और शुचिता कालिज से घर लौट रहे थे तो साधु के वेष में सुधाकर हम से टकरा गया और मेरी ओर देख कर बोला कि मैं चोरी से अपने प्रेमी से मिलने जा रही हूं. उस के बाद उस ने मेरे और रजत के बारे में वह सब कहना शुरू कर दिया जो हम दोनों के अलावा शुचिता को ही मालूम था, सो शुचिता का प्रभावित होना स्वाभाविक ही था.

‘‘शुचिता ने साधु बाबा से अपने घर चलने को कहा. वहां जा कर सुधाकर ने भविष्यवाणी कर दी कि शीघ्र ही शुचिता के जीवन में भी उस के सपनों का राजकुमार प्रवेश करेगा. सुधाकर ने शुचिता को आश्वस्त कर दिया कि वह कितना भी चाहे प्रेमपाश से बच नहीं सकेगी क्योंकि यह तो उस के माथे पर लिखा है. उस ने यह भी बताया कि वह कहां और कैसे अपने प्रेमी से मिलेगी.

‘‘शुचिता के यह पूछने पर कि उस की शादी उस व्यक्ति से होगी या नहीं, सुधाकर सिटपिटा गया, क्योंकि इस बारे में तो हम ने उसे कुछ बताया ही नहीं था, सो टालने के लिए बोला कि फिलहाल उस की क्षमता केवल शुचिता के जीवन में प्यार की बहार देखने तक ही सीमित है. वैसे जब प्यार होगा तो विवाह भी होगा ही. सच्चे प्यार के आगे मांबाप को झुकना ही पड़ता है.

‘‘उस के बाद जैसे सुधाकर ने बताया था उसी तरह जतिन धीरेधीरे उस के जीवन में आ गया. शुचिता का खयाल था कि जब साधु बाबा की कही सभी बातें सही निकली हैं तो मांबाप के मानने वाली बात भी ठीक ही निकलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जतिन ने यहां तक कहा कि उसे उन का एक भी पैसा नहीं चाहिए…वे लोग चाहें तो किसी गरीब बच्चे को गोद ले कर उसे डाक्टर बना कर अपना नर्सिंग होम उसे दे दें. शुचिता ने भी जतिन की बात का अनुमोदन किया. शुचिता के मातापिता को मेरी और अपनी बेटी की गहरी दोस्ती के बारे में मालूम था, सो एक रोज वह दोनों हमारे घर आए.

‘‘‘देखो ऋतिका, शुचि हमारी इकलौती बेटी है. हम ने रातदिन मेहनत कर के जो इतना बढि़या नर्सिंग होम बनाया है या दौलत कमाई है इसीलिए कि हमारी बेटी हमेशा राजकुमारियों की तरह रहे. जतिन अच्छा लड़का है लेकिन उस की एक बंधीबधाई तनख्वाह रहेगी. वह एक डाक्टर जितना पैसा कभी नहीं कमा पाएगा और फिर हमारे इतनी लगन से बनाए नर्सिंग होम का क्या होगा? अपनी बेटी के रहते हम किसी दूसरे को कैसे गोद ले कर उसे सब सौंप दें? हम ने शुचि के लिए डाक्टर लड़का देखा हुआ है जो हर तरह से उस के उपयुक्त है और उस के साथ वह बहुत खुश रहेगी. तुम भी उसे जानती हो.’

‘‘ ‘कौन है, अंकल?’

‘‘‘तुम्हारा भाई कुणाल. उस के अमेरिका से एम.एस. कर के लौटते ही दोनों की शादी कर देंगे.’

‘‘ ‘मैं ठगी सी रह गई. शुचिता मेरी भाभी बन कर हमेशा मेरे पास रहे इस से अच्छा और क्या होगा? जतिन तो आस्ट्रेलिया जाने को कटिबद्ध था.

‘‘ ‘आप ने यह बात छिपाई क्यों?’ मैं ने पूछा, ‘क्या पता भैया ने वहीं कोई और पसंद कर ली हो.’

‘‘ ‘उसे वहां इतनी फुरसत ही कहां है? और फिर मैं ने कुणाल और तुम्हारे मम्मीपापा को साफ बता दिया था कि मैं कुणाल को अमेरिका जाने में जो इतनी मदद कर रहा हूं उस की वजह क्या है. उन सब ने तभी रिश्ता मंजूर कर लिया था. तुम्हें बता कर क्या ढिंढोरा पीटना था?’

‘‘अब मैं उन्हें कैसे बताती कि मुझे न बताने से क्या अनर्थ हुआ है. तभी मेरे दिमाग में बिजली सी कौंधी. शुचिता के जिस अंधविश्वास का सहारा ले कर मैं ने उस का और जतिन का चक्कर चलवाया था, एक बार फिर उसी अंधविश्वास का सहारा ले कर उस चक्कर को खत्म भी कर सकती थी लेकिन अब यह इतना आसान नहीं था. रजत कभी भी मेरी मदद करने को तैयार नहीं होता और अकेली मैं कहां साधु बाबा को खोजती फिरती? मैं ने शुचिता की मम्मी को सलाह दी कि वह शुचि के अंधविश्वास का फायदा क्यों नहीं उठातीं? उन्हें सलाह पसंद आई. कुछ रोज के बाद उन्होंने शुचिता से कहा कि वह उस की और जतिन की शादी करने को तैयार हैं मगर पहले दोनों की जन्मपत्री मिलवानी होगी. अगर कुछ गड़बड़ हुई तो ग्रह शांति की पूजा करा देंगे.

‘‘अंधविश्वासी शुचिता तुरंत मान गई. उस ने जबरदस्ती जतिन से उस की जन्मपत्री मंगवाई. मातापिता ने एक जानेमाने पंडित को शुचिता के सामने ही दोनों कुंडलियां दिखाईं. पंडितजी देखते ही ‘त्राहिमाम् त्राहिमाम्’ करने लगे.

‘‘‘इस कन्या से विवाह करने के कुछ ही समय बाद वर की मृत्यु हो जाएगी. कन्या के ग्रह वर पर भारी पड़ रहे हैं.’

‘‘ ‘उन्हें हलके यानी शांत करने का कोई उपाय जरूर होगा पंडितजी. वह बताइए न,’ शुचिता की मम्मी ने कहा.

‘‘ ‘ऐसे दुर्लभ उपाय जबानी तो याद होते नहीं, कई पोथियां देखनी होंगी.’

‘‘‘तो देखिए न, पंडितजी, और खर्च की कोई फिक्र मत कीजिए. अपनी बिटिया की खुशी के लिए आप जो पूजा या दान कहेंगे हम करेंगे.’

‘‘‘मगर पूजा से अमंगल टल जाएगा न पंडितजी?’ शुचिता ने पूछा.

‘‘‘शास्त्रों में तो यही लिखा है. नियति में लिखा बदलने का दावा मैं नहीं करता,’ पंडितजी टालने के स्वर में बोले.

‘‘ ‘ऐसा है बेटी. जैसे डाक्टर अपने इलाज की शतप्रतिशत गारंटी नहीं लेते वैसे ही यह पंडित लोग अपनी पूजा की गारंटी लेने से हिचकते हैं,’ शुचिता के पापा हंसे.

‘‘उस के बाद शुचिता ने कुछ और नहीं पूछा. अगली सुबह उस के कमरे से उस की लाश मिली. शुचिता ने अपनी कलाई की नस काट ली थी. उस ने अपने अंतिम पत्र में लिखा था कि पंडितजी की बात से साफ जाहिर है कि उस की जिंदगी में जतिन का साथ नहीं लिखा है, वह जतिन से बेहद प्यार करती है. उस के बगैर जीने की कल्पना नहीं कर सकती और न ही उस का अहित चाहती है, सो आत्महत्या के सिवा उस के पास कोई और विकल्प नहीं है.

‘‘शुचिता की आत्महत्या के लिए उस के मातापिता स्वयं को अपराधी मानते हैं, मगर असली दोषी तो मैं हूं जिस की सलाह पर पहले एक नकली ज्योतिषी ने शुचिता का जतिन से प्रेम करवाया और मेरी सलाह से ही उस प्रेम संबंध को तोड़ने के लिए फिर एक झूठे ज्योतिषी का सहारा लिया गया.

‘‘शुचिता के मातापिता और उस से अथाह प्यार करने वाला जतिन तो जिंदा लाश बन ही चुके हैं. मगर मेरे कुणाल भैया, जो बचपन से शुचिता से मूक प्यार करते थे और जिस के कारण ही वह बजाय इंजीनियर बनने के डाक्टर बने थे, बुरी तरह टूट गए हैं और भारत लौटने से कतरा रहे हैं इसलिए मेरे मातापिता भी बहुत मायूस हैं. यही नहीं मेरे इस तरह क्षुब्ध रहने से रजत भी बेहद दुखी हैं. तुम ही बताओ श्रेया, इतना अनर्थ कर के, इतने लोगों को संत्रास दे कर मैं कैसे खुश रह सकती हूं या सलाहकार बनने की जुर्रत कर सकती हूं?’’

सबक के बाद

प्रयाग को अपनी निजी जिंदगी में किसी का दखल पसंद नहीं था. यहां तक कि पत्नी तक उस की किसी गैरजिम्मेदाराना हरकत पर आपत्ति नहीं कर सकती थी.

मे  ज पर फाइलें बिखरी पड़ी थीं और वह सामने लगे शीशे को देख रहे थे. आने वाले समय की तसवीरें एकएक कर उन के आगे साकार होने लगीं. झुकी हुई कमर, कांपते हुए हाथपांव. वह जहां भी जाते हैं, उपेक्षा के ही शिकार होते हैं. हर कोई उन की ओर से मुंह फेर लेता है. ऐसे में उन्हें नानी के कहे शब्द याद आ गए, ‘अरे पगले, यों आकाश में नहीं उड़ा करते. पखेरू भी तो अपना घोंसला धरती पर ही बनाया करते हैं.’

तनाव से उन का माथा फटा जा रहा था. उसी मनोदशा में वह सीट से उठे और सोफे पर जा धंसे. दोनों हाथों से माथा पकड़े हुए वह चिंतन में डूबने लगे. उन के आगे सचाई परत दर परत खुलने लगी. उन्होंने कभी भी तो अपने से बड़ों की बातें नहीं मानी. उन के आगे वह अपनी ही गाते रहे. सिर उठा कर उन्होंने घड़ी की ओर देखा तो 1 बज रहा था. चपरासी ने अंदर आ कर पूछा, ‘‘सर, लंच में आप क्या लेंगे?’’

‘‘आज रहने दो,’’ उन्होंने मना करते हुए कहा, ‘‘बस, एक कौफी ला दो.’’

‘‘जी, सर,’’ चपरासी बाहर चल दिया.

लोगों की झोली खुशियों से कैसे भरती है? वह इसी पर सोचने लगे. परसों ही तो उन के पास छगनलाल एक फाइल ले कर आए थे. उन्होंने पूछा था, ‘‘कहिए छगन बाबू, कैसे हैं?’’

‘‘बस, साहब,’’ छगनलाल हंस दिए थे, ‘‘आप की दुआ से सब ठीकठाक है. मैं तो जीतेजी जीवन का सही आनंद ले रहा हूं. चहकते हुए परिवार में रह रहा हूं. बहूबेटा दोनों ही घरगृहस्थी की गाड़ी खींच रहे हैं. वे तो मुझे तिनका तक नहीं तोड़ने देते. अब वही तो मेरे बुढ़ापे की लाठी हैं.’’

‘‘बहुत तकदीर वाले हो भई,’’ यह कहते हुए उन्होंने फाइल पर हस्ताक्षर कर छगनलाल को लौटा दी थी.

चपरासी सेंटर टेबल पर कौफी का मग रख गया. उसे पीते हुए वह उसी प्रकार आत्ममंथन करने लगे.

उन के सिर पर से मांबाप का साया बचपन में ही उठ गया था. वह दोनों एक सड़क दुर्घटना में मारे गए थे. तब नानाजी उन्हें अपने घर ले आए थे. उन का लालनपालन ननिहाल में ही हुआ था. उन की बड़ी बहन का विवाह भी नानाजी ने ही किया था.

नानानानी के प्यार ने उन्हें बचपन से ही उद्दंड बना दिया था. स्कूलकालिज के दिनों से ही उन के पांव खुलने लगे थे. पर उन का एक गुण, तीक्ष्ण बुद्धि का होना उन के अवगुणों पर पानी फेर देता था.

राज्य लोक सेवा आयोग में पहली ही बार में उन का चयन हो गया तो वह सचिवालय में काम करने लगे थे. अब उन के मित्रों का दायरा बढ़ने लगा था. दोस्तों के बीच रह कर भी वह अपने को अकेला ही महसूस किया करते. वह धीरेधीरे अलग ही मनोग्रंथि के शिकार होने लगे. घरबाहर हर कहीं अपनी ही जिद पर अड़े रहते.

उन के भविष्य को ले कर नानाजी चिंतित रहा करते थे. उन के लिए रिश्ते भी आने लगे थे लेकिन वह उन्हें टाल देते. एक दिन अपनी नानी के बहुत समझाने पर ही वह विवाह के लिए राजी हुए थे.

3 साल पहले वे नानानानी के साथ एक संभ्रांत परिवार की लड़की देखने गए थे. उन लोगों ने सभी का हृदय से स्वागत किया था. चायनाश्ते के समय उन्होंने लड़की की झलक देख ली थी. वह लड़की उन्हें पसंद आ गई और बहुत देर तक उन में इधरउधर की बातें होती रही थीं. उन की बड़ी बहन भी साथ थी. उस ने उन के कंधे पर हाथ रख कर पूछा था, ‘क्यों भैया, लड़की पसंद आई?’

इस पर वे मुसकरा दिए थे. वहीं बैठी लड़की की मां ने आंखें नचा कर कहा था, ‘अरे, भई, अभी दोनों का आमना- सामना ही कहां हुआ है. पसंदनापसंद की बात तो दोनों के मिलबैठ कर ही होगी न.’

इस पर वहां हंसी के ठहाके गूंज उठे थे.

ड्राइंगरूम में सभी चहक रहे थे. किचेन में भांतिभांति के व्यंजन बन रहे थे. प्रीति की मां ने वहां आ कर निवेदन किया था, ‘आप सब लोग चलिए, लंच लगा दिया गया है.’

वहां से उठ कर सभी लोग डाइनिंग रूम में चल दिए थे. वहां प्रीति और भी सजसंवर कर आई थी. प्रीति का वह रूप उन के दिल में ही उतरता चला गया था. सभी भोजन करने लगे थे. नानाजी ने उन की ओर घूम कर पूछा था, ‘क्यों रे, लड़की पसंद आई?’

‘जी, नानाजी,’ वह बोले थे, पर…

‘पर क्या?’ प्रीति के पापा चौंके थे.

‘पर लड़की को मेरे निजी जीवन में किसी प्रकार का दखल नहीं देना होगा,’ उन्होंने कहा, ‘मेरी यही एक शर्त है.’

‘प्रयाग’, नानाजी उन की ओर आंखें तरेरने लगे थे, ‘तुम्हारा इतना साहस कि बड़ों के आगे जबान खोलो. क्या हम ने तुम में यही संस्कार भरे हैं?’

नानाजी की उस प्रताड़ना पर उन्होंने गरदन झुका ली थी. प्रीति की मां ने यह कह कर वातावरण को सहज बनाने का प्रयत्न किया था कि अच्छा ही हुआ जो लड़के ने पहले ही अपने मन की बात कह डाली.

‘वैसे प्रयागजी’, प्रीति के पापा सिर खुजलाने लगे थे, ‘मैं आप के निजी जीवन की थ्योरी नहीं समझ पाया.’

‘मैं घर से बाहर क्या करूं, क्या न करूं,’ उन्होंने स्पष्ट किया था, ‘यह इस पर किसी भी प्रकार की टोकाटाकी नहीं करेंगी.’

‘अरे,’ प्रीति के पापा ने जोर का ठहाका लगाया था, ‘लो भई, आप की यह निजता बनी रहेगी.’

रिश्ता पक्का हो चला था. 6 महीने बाद धूमधाम से उन का विवाह हो गया था. विवाह के तुरंत बाद ही वे दोनों नैनीताल हनीमून पर चल दिए थे. सप्ताह भर वे वहां खूब सैरसपाटा करते रहे थे. दोनों ही तो एकदूसरे में डूबते चले गए थे. वहां उन्होंने नैनी झील में जी भर कर बोटिंग की थी.

‘क्योंजी,’ बोटिंग करते हुए प्रीति ने उन से पूछा था, ‘उस दिन मैं आप की फिलौस्फी नहीं समझ पाई थी. जब आप मुझे देखने आए थे तो अपने निजी जीवन की बात कही थी न.’

‘हां,’ उन्होंने कहा था, ‘मैं कहां जाऊंगा, क्या करूंगा, इस पर तुम्हारी ओर से किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं होगी. मैं औरतमर्द में अंतर माना करता हूं.’

‘अरे,’ प्रीति भौचक रह गई थी. वह गला साफ  करते हुए बोली, ‘आज के युग में जहां नरनारी की समता की दुहाई दी जाती है, वहां आप के ये दकियानूसी विचार…’

‘मैं ने कहा न,’ उन्होंने पत्नी की बात बीच में काट दी थी, ‘तुम किसी भी रूप में मेरे साथ वैचारिक बलात्कार नहीं करोगी और न ही मैं तुम्हें अपने ऊपर हावी होने दूंगा.’

तभी फोन की घंटी बजी और उन्होंने आ कर रिसीवर उठा लिया, ‘‘यस.’’

‘‘सर, लंच के बाद आप डिक्टेशन देने की बात कह रहे थे,’’ उधर से उन की पी.ए. कनु ने उन्हें याद दिलाया.

‘‘अरे हां,’’ वह घड़ी देखने लगे. 2 बज चुके थे. अगले ही क्षण उन्होंने कहा, ‘‘चली आओ, मुझे एक जरूरी डिक्टेशन देना है.’’

इतना कह कर वह कल्पना के संसार में विचरने लगे कि उन की पी.ए. कनुप्रिया कमरे में आएगी. उस के शरीर की गंध से कमरा महक उठेगा. ऐसे में वह सुलगने लगेंगे…तभी चौखट पर कनु आ खड़ी हुई. वह मुसकरा दिए, ‘‘आओ, चली आओ.’’

कनु सामने की कुरसी पर बैठ गई. वह उस के आगे चारा डालने लगे, ‘‘कनु, आज तुम सच में एक संपूर्ण नारी लग रही हो.’’

कनु हतप्रभ रह गई. बौस के मुंह से वह अपनी तारीफ सुन कर अंदर ही अंदर घबरा उठी. उस ने नोट बुक खोल ली और नोटबुक पर नजर गड़ाए हुए बोली, ‘‘मैं समझी नहीं, सर.’’

‘‘अरे भई, कालिज के दिनों में मैं ने काव्यशास्त्र के पीरियड में नायिका भेद के लक्षण पढे़ थे. तुम्हें देख कर वे सारे लक्षण आज मुझे याद आ रहे हैं. तुम पद्मिनी हो…तुम्हारे आने से मेरा यह कमरा ही नहीं, दिल भी महकने लगा है.’’

‘‘काम की बात कीजिए न सर,’’ कनु गंभीर हो आई. उस ने कहा, ‘‘आप मुझे एक जरूरी डिक्टेशन देने जा रहे थे.’’

‘‘सौरी कनु, मुझे पता न था कि तुम… मैं तो सचाई उगल रहा था.’’

‘‘आप को सब पता है, सर,’’ कनु कहती ही गई, ‘‘आप अपनी आदत से बाज आ जाइए. प्रीति मैडम में ऐसी क्या कमी थी, जो आप ने उन्हें निर्वासित जीवन जीने के लिए विवश किया?’’

अपनी स्टेनो के मुंह से पत्नी का नाम सुन कर प्रयाग को जबरदस्त मानसिक झटका लगा. कनु तो उन्हें नंगा ही कर डालेगी. उन की सारी प्राइवेसी न जाने कब से दफ्तर में लीक होती आ रही है…यानी सभी जानते हैं कि उन के अत्याचारों से तंग आ कर ही उन की पत्नी मायके में बैठी हुई है. कनु के प्रश्न से निरुत्तर हो वह अपने गरीबान में झांकने लगे, तो अतीत फिर उन के सामने साकार होने लगा.

नैनीताल से आ कर वह नानाजी से अलग एक किराए का फ्लैट ले कर रहने लगे थे. नानाजी ने उन्हें बहुत समझाया था लेकिन उन्होंने उन की एक भी नहीं सुनी थी. फ्लैट में आ कर वह अपने आदेशनिर्देशों से प्रीति का जीना ही हराम करने लगे थे.

‘रात की रोटियां क्यों बच गईं?’

‘तुम तार पर कपडे़ डालती हुई इधरउधर क्यों झांकती हो?’

‘तुम्हें लोग क्यों देखते हैं?’

आएदिन वह पत्नी पर इस तरह के प्रश्नों की झड़ी सी लगा दिया करते थे.

उस फ्लैट में प्रीति उन के साथ भीगी बिल्ली बन कर रहने लगी थी. जबतब उसे उन की शर्त याद आ जाया करती. पति के उन अत्याचारों से आहत हो वह आत्मघाती प्रवृत्ति की ओर बढ़ने लगी थी. एक बार तो वह मरतीमरती ही बची थी.

उन की आवारगी अब और भी जलवे दिखलाने लगी थी. एक दिन वह किसी युवती को फ्लैट में ले आए थे. प्रीति कसमसा कर ही रह गई थी. उन्होंने उस युवती का परिचय दिया था, ‘यह सुनंदा है. हम लोग कभी एक साथ ही पढ़ा करते थे.’

विवाह के दूसरे साल उन के यहां एक बच्चा आ गया था लेकिन वे वैसे ही रूखे बने रहे. बच्चे के आगमन पर उन्हें कोई भी खुशी नहीं हुई थी. प्रीति उन के अत्याचारों के नीचे दबती ही गई.

‘देखिएजी,’ एक दिन प्रीति ने अपना मुंह खोल ही दिया, ‘मुझे आप प्रतिबंधों के शिंकजे से मुक्त कीजिए… नहीं तो…’

‘नहीं तो तुम मेरा क्या कर लोगी?’ उन्होंने तमक कर पूछा था.

‘अब हमारे बीच नन्हा भी आ गया है. प्रीति उन्हें समझाने लगी थी, ‘हम 2 से 3 हो आए हैं. मुझे इस गुलामी की जंजीर से मुक्त कर दें.’

‘नहीं,’ वे गुर्राए, ‘मैं अपने निश्चय से टस से मस नहीं हो सकता. मैं हमेशा अपने ही मन की करता रहूंगा.’

‘ठीक है,’ प्रीति का भी स्वाभिमान जाग गया था. उस ने कहा, ‘फिर मैं भी अपनी मनमरजी पर उतरने लगूंगी.’ प्रीति के अनुनयविनय का प्रयाग पर कुछ भी असर नहीं पड़ा तो एक दिन नन्हे को ले कर मायके चली गई. रोरो कर उस ने मां को सारी बातें बतला दीं. मां उस का सिर सहलाने लगीं, ‘धीरज रख, सब ठीक हो जाएगा बेटी.’

तब से प्रीति मायके में ही रह कर अपने लिए नौकरी ढूंढ़ने लगी थी. उन्होंने कभी भी उस की खोजखबर नहीं ली. उन का बेटा नन्हा भी उन्हें नहीं पिघला पाया था. उन के दोस्तों में इजाफा होता गया. बदनाम गलियों में भी वह मुंह मारने लगे थे.

एक दिन बूढ़ी हो आई नानी उन के यहां चली आई थीं. ‘क्यों रे, तेरा यह मनमौजीपन कब छूटेगा?’

‘छोड़ो भी नानी मां,’ उन्होंने बात टाल दी थी, ‘मेरे संस्कार ही ऐसे हैं. जो होगा उसे मैं झेल लूंगा.’

‘संस्कार बदले भी तो जा सकते हैं न,’ नानी का हाथ उन के कंधे पर आ गया था, ‘तू अब भी मान जा. जा कर बहू को लिवा ला. इसी में तेरा भला है.’

वह नहीं समझ पाते कि उन के साथ ऐसा क्यों हो रहा है. आज उन की पी.ए. कनु तक ने उन्हें नंगा कर देना चाहा था. ठुड्डी पर हाथ रखे हुए वह प्रीति के बारे में सोचने लगे कि उस में कोई कमी नहीं है. उन्हीं के अत्याचारों से उस बेचारी को आज निर्वासित जीवन जीना पड़ रहा है.

दफ्तर से प्रयाग सीधे ही घर चले आए. उन के पीछेपीछे दोचार उन के मित्र भी चले आए. कुछ देर तक खानेपीने का दौर चला फिर मित्र चले गए तो वह फिर से तन्हा हो गए. उस से नजात पाने के लिए उन्होंने 2-3 बडे़बडे़ पैग लिए और बिस्तर पर जा धंसे.

सुबह हुई, देर से सो कर उठे तो नहा धो कर सीधे आफिस चल दिए. दरवाजे पर खडे़ चपरासी ने निवेदन किया, ‘‘साहब, आप को मैडम याद कर रही हैं.’’

‘‘मुझे?’’ वह चौंके.

‘‘जी,’’ चपरासी बोला, ‘‘मैडम बोली थीं कि आते ही उन्हें मेरे पास भेज दे.’’

वह आशंकित होने लगे. महा- निदेशक ने उन्हें न जाने क्यों बुलवाया है? किसी प्रकार शंकित मन से वह मिसेज रूंगटा के चैंबर में चल दिए. मैडम ने तो उन्हें देखते ही उन की ओर जैसे तोप दाग दी, ‘‘क्यों, मिस्टर, आप को अपने कैरियर का खयाल नहीं है क्या?’’

‘‘ऐसी क्या बात हो आई, मैडम?’’ उन्होंने कुछ सहम कर पूछा.

‘‘यह क्या है, देखिए,’’ मिसेज रूंगटा ने उन्हें कनुप्रिया की शिकायत थमा दी, ‘‘हाथ कंगन को आरसी क्या? आप तो छिपेरुस्तम निकले.’’

शिकायत देख कर उन को सारा कमरा घूमता हुआ सा लगा. वह होंठों पर जीभ फिरा कर बोले, ‘‘माफ करना मैडम, यह लड़की दुश्चरित्र है.’’

‘‘दुश्चरित्र आप हैं,’’ मिसेज रूंगटा ने आंखें तरेर कर कहा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आ पा रहा है कि आप जैसे लंपट व्यक्ति इस पद पर कैसे बने हुए हैं? सुना है, आप का अपनी पत्नी के साथ भी…’’

उन की तो बोलती ही बंद हो आई. उन्होंने अपराधभाव से गरदन झुका ली. मिसेज रूंगटा ने उन्हें चेतावनी दे डाली, ‘‘आइंदा ध्यान रखें. अब आप जा सकते हैं.’’

वह उठे और चुपचाप महानिदेशक के चैंबर से निकल कर अपनी सीट पर आ कर बैठ गए. तभी उन के कमरे में कनुप्रिया चली आई और बोली,  ‘‘सर, मेरी यहां से बदली हो गई है.’’

वह कुछ बोले नहीं बल्कि चुपचाप फाइलें देखते रहे. आज वह अपने को हारे हुए जुआरी सा महसूस कर रहे थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है. तभी उन के पास बाबू छगनलाल चले आए. उन्होंने कहा, ‘‘माफ करना साहब, आज आप कुछ उदास से हैं.’’

‘‘बैठिए छगन बाबू,’’ वह सामान्य हो गए.

छगनलाल कुरसी पर बैठ कर बोले,  ‘‘वैसे हम लोग आफतें खुद ही मोल लिया करते हैं. लगता है कि आप भी किसी आफत में फंसे हैं?’’

‘‘आप ठीक कहते हैं,’’ वह बोले, ‘‘मेरी पी.ए. कनु ने महानिदेशक से मेरी बदसलूकी की शिकायत की है.’’

‘‘वही तो,’’ छगनलाल ने कहा, ‘‘सारे निदेशालय में यही सुगबुगाहट चल रही है.’’

‘‘अब ऐसा नहीं होगा, छगन बाबू,’’ वह बोले, ‘‘अब मैं सावधानी से रहा करूंगा.’’

‘‘रहना भी चाहिए, साहब,’’ छगनलाल बोले, ‘‘आदमी को हमेशा ही सतर्क रहना चाहिए.’’

उन्हें जीवन में पहली बार सबक मिला था. अब वह ध्यानपूर्वक अपना काम करने लगे. वह नानाजी को फोन मिलाने लगे. मिलने पर वे बोले, ‘‘नानाजी, मैं प्रयाग बोल रहा हूं.’’

‘‘बोलो बेटे,’’ उधर से कहा गया.

‘‘मैं आप के पास ही रहना चाहता हूं,’’ उन्होंने अपनी दिली इच्छा प्रकट की.

‘‘स्वागत है,’’ नानाजी ने पूछा, ‘‘कब आ रहे हो?’’

‘‘एकदो दिन में प्रीति को भी साथ ले कर आ रहा हूं.’’

‘‘फिर तो यह सोने पर सुहागा वाली बात होगी,’’ नानाजी ने चहक कर कहा, ‘‘यह तो तुम्हें बहुत पहले ही कर लेना चाहिए था.’’

‘‘सौरी नानाजी,’’ प्रयाग क्षमा मांगने लगे, ‘‘अब तक मैं भटकने की राह पर था.’’

शाम को वह दफ्तर से सीधे ही ससुराल चले गए. आंगन में नन्हा खेल रहा था, उसे उन्होंने गोद में उठाया और प्यार करने लगे. कोने में खड़ी प्रीति उन्हें देखती ही रह गई. वह मुसकरा दिए, ‘‘प्रीति, आज मैं तुम्हें लेने आया हूं.’’

‘‘वह तो आप को आना ही था,’’ प्रीति हंस दी.

वह सासससुर के आगे अपने किए पर प्रायश्चित्त करने लगे. ससुर ने उन का कंधा थपथपा दिया, ‘‘कोई बात नहीं बेटा, आदमी ठोकर खा कर ही तो संभलता है.’’

सुबह उन की नींद खुली तो उन्होंने अपने को तनावमुक्त पाया. प्रीति भी खुश नजर आ रही थी. चायनाश्ते के बाद उन्होंने एक टैक्सी बुला ली. प्रीति और नन्हे को बिठा कर खुद भी उन की बगल में बैठ गए. टैक्सी नानाजी के घर की ओर सड़क पर दौड़ने

चुनाव ने खोली शौचालय की पोल

केन्द्र सरकार ने पिछले 5 साल में जो सबसे बड़ा काम किया वह स्वच्छता अभियान और पूरे देश में शौचालय बनाने का कहा. गांव से लेकर शहर तक शौचालय निर्माण को केन्द्र की मोदी सरकार की सबसे बडी उपलब्धि माना गया. 2019 के लोकसभा चुनाव में वोट डालने के लिये मतदान केन्द्र बनाये गये स्कूलों में बने शौचालयों ने इसकी पोल खोल दी. शहरों में सरकारी स्कूलों की खराब हालत को देखते हुये निजी स्कूलों को मतदान केन्द्र बनाया गया. निजी स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूलों की हालत सबसे अधिक खराब पाई गई. पुराने सरकारी स्कूलों में बने शौचालय बेहद छोटे और पुराने किस्म के थे. शौचालय की कमरे सीलन नुमा था. यहां के शौचालयों में केवल मतदान करने वाले ही नहीं मतदान डयूटी पर गये कर्मचारियों का बोझ भी था. ऐसे में कुछ ही समय में यह शौचालय गंदगी से भर गये.

सबसे खराब हालत गांव में बने शौचालयों की थी. गांव के सरकारी स्कूलों में शौचालय बनाये जाने के बाद भी बेहद कम प्रयोग किये जाते है. लड़कियों के लिये बने शौचालय भी कम ही प्रयोग होते है. यह कम समय में ही गंदगी से भर गये. उन महिलाओं के लिये तो कुछ आराम था जो अपनी गाड़ियों से चुनावी डयूटी में गई थी. जो सरकारी बसों से लंबा समय तय करके डयूटी करने गई उनको स्कूल के ही शौचालय प्रयोग करने पड़े. सबसे मजेदार बात यह थी कि सरकारी कर्मचारियों को किसी भी तरह की शिकायत करने का भी डर था. वह खुलकर अपनी बात कह भी नहीं पा रहे थें. ऐसे में बहुत सारी महिला कर्मचारियों को आस-पास के घरों में बने शौचालय का प्रयोग करना पड़ा.

लोकसभा चुनाव:- “बेहाल कर रही चुनावी ड्यूटी”

गरमी के दिनों में चुनाव होने के कारण पानी की प्यास भी ज्यादा लगती हैं और शौचालयों का प्रयोग ज्यादा करना पड़ता है. स्कूलों में बने शौचालय बाहर से तो बहुत खूबसूरत नजर आते हैं पर अंदर वह दिखावा भर ही होते हैं. जिन स्कूलों में शौचालय है तो भी वहां पर गंदगी साफ करने वाले सफाई कर्मचारी नहीं है. ऐसे में गंदगी से भरे होने के बाद भी लोगों को उन शौचालय का प्रयोग ही करना पड़ा. चुनाव मतदान केन्द्र बनाते समय जिला प्रशासन ने इन बातों को ध्यान में नहीं रखा. कई महिला कर्मचारियों ने इस बात की शिकायत भी दबी आवाज में की. कई स्कूलों में टीन से घेर का अस्थाई शौचालय भी बनाये गये.

जिस केन्द्र सरकार ने अपने कार्यकाल में पूरे देश में बनाये गये शौचालय के आंकड़े जारी करके अपने काम को गिनाया. उसी केन्द्र सरकार के चुनाव में शौचालय की समस्या ने पूरे मतदान कर्मचारियों को परेशान कर दिया. शौचालय की परेशानी ने केन्द्र सरकार के स्वच्छता अभियान दावे के सच को भी परखा है. देखा जाये तो चुनाव में शौचालय की पोल खुल गई है. शहरो में सरकारी स्कूलों के मुकाबले निजी स्कूलों को प्राथमिकता दिये जाने के पीछे यही प्रमुख वजहें थी. सरकारी स्कूलों की जर्जर व्यवस्था अब मतदान केन्द्र बनाने लायक नहीं बची है. शौचालय ही नहीं पूरे स्कूल की दशा बदहाल हो रही है. जिससे निजी स्कूल मतदान केन्द्र बन रहे हैं.

सांसत में छोटे भाजपा नेता

जल्द ही वापसी करेंगी दया बेन

टीवी एक्ट्रेस दिशा वकानी यानी दया बेन अब तक ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ को अलविद कह चुकी हैं. ऐसे में  इश शो के मेकर्स एक नए चेहरे की तलाश में जुटे हुए हैं. इस खबर से ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ के फैंस काफी निराश थे.

अब दया बेन का किरदार है ही ऐसा कि उनके बिना तो ये शो अधूरा-अधूरा सा लगता है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार दिशा ने नीला फिल्म्स टीम से बातचीत की हैं. इस खास बातचीत के दौरान दिशा ने यह साफ कर दिया है कि उन्होंने अभी सीरियल तारक मेहता का उल्टा चश्मा को छोड़ने का फैसला नहीं किया हैं.

सुष्मिता सेन के घर गूंजेगी शहनाई

आपको बता दें, दिशा 18 मई तक सीरियल में वापसी कर सकती हैं. अगर दिशा वकानी की दोबारा एंट्री होती है तो एक बार फिर से दर्शकों को दया बेन की चटपटी और मजेदार बातें देखने को मिलेगी. यह दिशा का अंदाज ही है जिसकी वजह से फैंस उनको शो में काफी मिस कर रहे हैं.

गौरतलब है कि दिशा ने अपनी प्रेग्नेंसी के चलते इस शो से कुछ समय के लिए ब्रेक लिया था. इसके बाद जब उनके वापस आने का समय आया तो खबरें आने लगी कि वो शो में लौटने के लिए आनाकानी कर रही हैं. इतना ही नहीं उन्होंने मेकर्स के सामने कुछ शर्तें भी रख दी थीं. इस सब ड्रामे के बाद मेकर्स ने दिशा को अल्टीमेटम दिया था कि अगर वो वापस नहीं आई तो शो के लिए नए चेहरे की तलाश शुरू कर दी जाएगी.

2 साल में ही टूट गई इस एक्ट्रेस की दूसरी शादी, जानें वजह

नक्सलवाद की पृष्ठभूमि

कब तक जवानों की आहुति देते रहेंगे हम?

अब आगे पढ़े-

सामाजिक जीवन में हर इंसान सुकून भरी जिन्दगी जीना चाहता है, मगर उन लोगों की जिन्दगी कैसी होती होगी, जो हर पल डर, भूख,जिल्लत, उत्पीड़न, बलात्कार और गोलियों का सामना करते गुजारते हैं. उनकी पीड़ा का अन्दाजा हम शहर में सुकून की जिन्दगी बसर कर रहे लोग कभी लगा ही नहीं सकते. असमानता और दमन से विद्रोह पैदा होता है और नक्सलवाद भी इसी दमन और असमानता का नतीजा है. भारत के एक फीसद लोगों ने देश के 73 फीसदी धन पर कब्जा किया हुआ है. यकीनन इस तरह की असमानताओं में हमेशा असंतोष के बीज होते हैं, जिनमें विद्रोह पैदा करने की क्षमता होती है.

‘नक्सलवादी विचारधारा’ एक आंदोलन से जुड़ी हुई है. 1960 के दशक में कम्युनिस्टों यानी साम्यवादी विचारों के समर्थकों ने इस आंदोलन का आरम्भ किया था. इस आंदोलन की शुरुआत पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के गांव नक्सलबाड़ी से हुई थी, इसलिए यह नक्सलवादी आंदोलन के रूप में चर्चित हो गया. इस आंदोलन में शामिल लोगों को कभी-कभी माओवादी भी कहते हैं. नक्सलवादी और माओवादी दोनों ही आंदोलन हिंसा पर आधारित हैं. लेकिन, दोनों में फर्क यह है कि नक्सलवाद बंगाल के नक्सलबाड़ी में विकास के अभाव और गरीबी का नतीजा है, जबकि चीनी नेता माओत्से तुंग की राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित मुहिम को माओवाद का नाम दिया गया. दोनों ही आंदोलनों के समर्थक भुखमरी, गरीबी, अत्याचार, सामंतवादिता और बेरोजगारी से आजादी की मांग करते रहे हैं और सत्ता के खिलाफ हथियार उठाते रहे हैं.

किसानों पर जमींदारों द्वारा अत्याचार और उनके अधिकारों को छीनना एक पुरानी प्रथा रही है और देश भर में इसके हजारों साक्ष्य मौजूद हैं. लिहाजा, नक्सलबाड़ी के तत्कालीन किसान भी इसी समस्या का सामना कर रहे थे. आजादी के बाद भूमि सुधार की पहलें जरूर हुईं थीं, लेकिन, ये पूरी तरह कामयाब नहीं रहीं. नक्सलबाड़ी किसानों पर जमींदारों का अत्याचार बढ़ता चला गया और इसी के मद्देनजर किसान और जमींदारों के बीच जमीन विवाद पैदा हो गया. लिहाजा, 1967 में कम्युनिस्टों ने सत्ता के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की जो नक्सली हिंसा के रूप में आज तक जारी है.

इसलिए केजरीवाल के साथ नहीं अग्रवाल समाज

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारु मजूमदार ने कानू सान्याल और जंगल संथाल के साथ मिलकर सत्ता के खिलाफ एक किसान विद्रोह किया. 60 के दशक के आखिर और 70 के दशक के शुरुआती दौर में, नक्सलबाड़ी विद्रोह ने शहरी युवाओं और ग्रामीण लोगों दोनों के दिलों में आग लगा दी. देखते ही देखते, इस तरह का आंदोलन बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में आम हो गया और धीरे-धीरे यह ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र तक फैल गया. आजाद भारत में पहली बार किसी आंदोलन ने गरीब और भूमिहीन किसानों की मांगों को मजबूती दी, जिसने तत्कालीन भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल कर रख दी. अन्याय और गैर बराबरी से पैदा हुआ यह आंदोलन आज देश और समाज के लिए नासूर बन गया है. लेकिन, चिंता का विषय है कि हमारी सरकारें अभी तक इसकी काट नहीं ढूंढ सकी हैं. इच्छाशक्ति की कमी, राजनीतिक लोलुपता और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे नेताओं ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को अपना‘चुनावी तवा’ बना रखा है, जिस पर वे समय-समय पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते रहते हैं.

बन्दूक के जोर पर खत्म नहीं होगा नक्सलवाद

बात चाहे छत्तीसगढ़ के बस्तर की हो, सुकमा की या ओडिशा के मलकानगिरी अथवा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की हो, ये तमाम जिले सदियों से गरीबी, भुखमरी और कुपोषण से जूझ रहे हैं. अन्याय और गैर बराबरी के कारण ही यहां नक्सलवाद अपनी जड़ें जमा कर बैठा है. सामाजिक और आर्थिक विषमता का नतीजा बर्बरता के रूप में सामने आता है. गरीबी और बेरोजगारी के कारण निचले स्तर की जीवनशैली और स्वास्थ्य-सुविधाओं के अभाव में गंभीर बीमारियों से जूझते इन क्षेत्रों में असामयिक मौत कोई आश्चर्य नहीं है. ऐसे में जब वे खुद बेमौत मर रहे हैं तो फिर मारने में भी संकोच नहीं करते हैं.

वहीं देश का एक तबका अच्छी सुख-सुविधाओं से लैस है. सच तो यह है कि भारत ब्रिटिश राज से अरबपति राज तक का सफर तय कर रहा है. विश्व असमानता रिपोर्ट के अनुसार, भारत की राष्ट्रीय आय का 22 फीसदी भाग सिर्फ एक फीसद लोगों के हाथों में पहुंचता है और यह असमानता मोदी राज में और ज्यादा तेजी से बढ़ी है. देश में भ्रष्टाचार की जड़ें और ज्यादा गहरी हुई हैं. यही भ्रष्टाचार सारी समस्याओं की जड़ है. यही असंतोष का कारण है. इसी के चलते हमने नासिक से मुम्बई तक और देश भर से राजधानी दिल्ली तक लम्बी-लम्बी किसान यात्राएं और आन्दोलन देखे हैं. मंदसौर में पुलिस की गोलियों से मरते हुए किसानों को देखा है. गरीबों और वंचितों में असंतोष बढ़ता ही जा रहा है, मगर अम्बानी-अडानी की जेबें भरने में लगी मोदी सरकार नक्सलवाद की गम्भीर चेतावनी को समझने के लिए तैयार ही नहीं है. वह नक्सलवाद के मूल कारण तक पहुंचना ही नहीं चाहती. ग्रामीणों के अधिकारों और उनकी समस्याओं को प्रकाश में लाने की कोई कोशिश नहीं करती. वह गरीबी, भुखमरी, असमानता और बेरोजगारी से देश को निजात दिलाने के लिए सिर्फ दिखावा करती है. वह भूख को गोली से मारना चाहती है. वह बेरोजगारी को बारूद से समाप्त करना चाहती है. चार नक्सलियों के पीछे चालीस जवान भेज कर बदले में चार सौ नक्सली पैदा कर रही है.

लोकसभा चुनाव:- “बेहाल कर रही चुनावी ड्यूटी”

नक्सलवाद की बड़ी घटनाएं

2007 – छत्तीसगढ़ के बस्तर में 300 से ज्यादा नक्सलियों ने 55 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया.

2008 – ओडिशा के नयागढ़ में नक्सलियों ने 14 पुलिसकर्मियों और एक नागरिक की हत्या कर दी.

2009 – महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में हुए बड़े नक्सली हमले में 15 सीआरपीएफ जवानों की मौत हो गयी.

2010 – नक्सलवादियों ने कोलकाता-मुंबई ट्रेन में 150 यात्रियों की हत्या कर दी.

2010 – पश्चिम बंगाल के सिल्दा कैम्प में घुसकर नक्सलियों ने अर्द्धसैनिक बल के 24 जवानों को मार गिराया.

2011 – छत्तीसगढ के दंतेवाड़ा में हुए बड़े नक्सलवादी हमले में कुल 76 जवानों की मौत हुई, जिसमें सीआरपीएफ जवानों के साथ कई पुलिसकर्मी भी शामिल थे.

2012 – झारखंड के गढ़वा जिले के पास बरिगंवा जंगल में 13 पुलिसर्मियों को नक्सलियों ने मार दिया.

2013 – छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों ने कांग्रेस के नेता समेत 27 व्यक्तियों को मार गिराया.

2019 – महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में सी-60 कमांडो दस्ते को निशाना बनाया, जिसमें 15 जवान शहीद हो गये.

आलू कुर्मा रेसिपी

आलू कुर्मा एक बेहतरीन रेसिपी है जिसमें भूनकर काजू, मसाले और दही के साथ ग्रेवी तैयार की जाती है. डिनर या पार्टी के लिए यह एक अच्छा औप्शन है.

सामग्री

आलू (8 मीडियम)

दही का मिश्रण बनाने के लिए:

अदरक पेस्ट (10 ग्राम)

लहसुन पेस्ट (20 ग्राम)

लाल मिर्च पाउडर (3 ग्राम)

धनिया पाउडर (6 ग्राम)

आलू और कमल ककड़ी की सब्जी

दही (125 ग्राम)

देसी घी (90 ग्राम)

हरी इलाइची (4)

काजू ( रोस्टेड)

नमक (स्वादानुसार)

हरी इलाइची पाउडर (1 टी स्पून)

कालीमिर्च पाउडर (1.5 ग्राम)

जायफल पाउडर (एक चुटकी)

नींबू का रस (1 टी स्पून)

डेयरी क्रीम (3 टेबल स्पून)

हरा धनिया (20 ग्राम)

बनाने की वि​धि

ग्रीन सैलेड विद फेटा

आलूओं को धोकर, छील लें और आधा काट लें.

इन्हें फ्राई करने के लिए एक पैन में तेल गर्म करें और जब आलू सूख जाएं तो इन्हें गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई करें.

दही का मिश्रण बनाने के लिए सभी सामग्री को एक साथ मिला लें और एक तरफ कर दें.

एक पैन में देसी घी डालकर मीडियम आंच पर रख दें, इसमें हरी इलाइची डालें और इसका रंग बदलने चलाएं.

अब इसमें कटा हुआ प्याज डालें और गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई करें और इसमें एक कप पानी डालें और इसे लगातार चलाते रहे ताकि इसका पानी सूख जाए और तेल अलग हो जाए.

इसमें दही का मिश्रण डालें, इसे चलाएं और तेल अलग होने तक इसे भूनें.

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इसके बाद इसमें काजू का पेस्ट डाले और लगातार भूनें.

अब इसमें आलू डालें, इसी के साथ नमक, एक कप पानी, इलाइची, कालीमिर्च और जायफल पाउडर डालें और ढककर धीमी आंच पर 4 से 5 मिनट तक पक पकाएं या फिर जब आलू पानी सोख न लें.

इसका ढक्कन हटाएं, इसमें नींबू का रस डालकर एक मिनट के लिए पकाएं, इसमें क्रीम डालकर आंच से हटा लें और बाउल में निकाल और हरे धनिये से गार्निश करके सर्व करें.

सिरदर्द से छुटकारा पाने के लिए बेहद फायदेमंद हैं ये 5 उपाय

अक्सर लोग सिरदर्द को हल्के में लेते हैं . लेकिन, सरदर्द को इतना हल्के में लेना आपके लिए भारी पड़ सकता है. बार-बार सरदर्द होना आपके लिए किसी घातक बीमारी का संकेत होता है. लेकिन यह भी जरूरी नहीं कि हर सिरदर्द किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो. कई बार बहुत ज्यादा शोरगुल वाली जगहों पर होने से, ज्यादा तनाव लेने से, या देर तक कंप्यूटर स्क्रीन पर काम करने की वजह से भी सिरदर्द होने लगता है. अधिकांश लोग ऐसे सिरदर्द से निपटने के लिए पेन किलर्स का इस्तेमाल करते हैं. यह साइड इफेक्ट्स से भरपूर होते हैं. ऐसे में इनका सेवन आपकी सेहत के साथ खिलवाड़  है. जो सिरदर्द से निजात दिलाने में काफी प्रभावी होते हैं.

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  1. ब्राह्मी : ब्राह्मी स्ट्रेस और डिप्रेशन का बेहतरीन इलाज है. नासिका छिद्र में ब्राह्मी और घी की कुछ बूंदे डाल देने से सिरदर्द से आराम मिलता है.

2. चंदन : आधा चम्मच चंदन पाउडर को पानी के साथ मिलाकर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को माथे पर लगाएं और बीस मिनट तक रहने दें. सिरदर्द से राहत मिल जाएगी.

3. छोटी इलायची : छोटी इलायची को चबाने से भी सिरदर्द से राहत मिलती है.

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4. काला नमक : गर्म पानी में एक चुटकी काला नमक मिलाकर पीने से सिरदर्द से आराम मिलता है. इसके अलावा साधारण नमक की जगह पर काले नमक का सेवन भी आपको सिरदर्द से राहत दिलाता है.

5. तगर : तगर एक वनस्पति औषधि है. यह सरदर्द की परंपरागत औषधि है. आप इसके तेल से मसाज कर सिरदर्द से राहत पा सकते हैं. या फिर आप तगर की पत्तियों की चाय बनाकर भी पी सकते हैं.

बदलती दिशा

आधुनिक खयालों वाली जया की दुनिया सीमित थी तो अपनी नौकरी और परिवार तक. बड़े अरमानों से सजाई थी उस ने अपनी गृहस्थी. लेकिन जया ने घड़ी देखी और ब्रश पकड़े हाथों की गति बढ़ा दी. आज उठने में देर हो गई है. असल में पिं्रस की छुट्टी है तो उस ने अलार्म नहीं लगाया था. यही कारण है कि 7 बजे तक वह सोती रह गई. प्रिंस तो अभी भी सो रहा है.

कल रात जया सो नहीं पाई थी, भोर में सोई तो उठने का समय गड़बड़ा गया. वैसे आज प्रिंस को तैयार करने का झमेला नहीं है. बस, उसे ही दफ्तर के लिए तैयार होना है.

अम्मां ने चलते समय उसे टिफिन पकड़ाया और बोलीं, ‘‘परांठा आमलेट है, बीबी. याद से खा लेना. लौटा कर मत लाना. सुबह नाश्ता नहीं किया…चाय भी आधी छोड़ दी.’’

अम्मां कितना ध्यान रखती हैं, यह सोच कर जया की आंखों में आंसू झिलमिला उठे. यह कहावत कितनी सही है कि अपनों से पराए भले. अपने तो पलट कर भी नहीं देखते लेकिन 700 रुपए और रोटीकपड़े पर काम करने वाली इस अम्मां का कितना ध्यान है उस के प्रति. आज जया उसे हटा दे तो वह चली जाएगी, यह वह भी जानती है फिर भी कितना स्नेह…कैसी ममता है.

ढलती उमर में यह औरत पराए घर काम कर के जी रही है. भोर में आ कर शाम को जाती है फिर भी जया के प्रति उस के मन में कितना लगावजुड़ाव है. और पति रमन…उस के साथ तो जन्मजन्मांतर के लिए वह बंधी है. तब भी कभी नहीं पूछता कि कैसी हो. इतना स्वार्थी है रमन कि किसी से कोई मतलब नहीं. बस, घर में सबकुछ उस के मन जैसा होना चाहिए. उस के सुखआराम की पूरी व्यवस्था होनी चाहिए. वह अपने को घर का मालिक समझता है जबकि तनख्वाह जया उस से डबल पाती है और घर चलाती है.

अच्छे संस्कारों में पलीबढ़ी जया मांदादी के आदर्शों पर चलती है…उच्च पद पर नौकरी करते हुए भी उग्र- आधुनिकता नहीं है उस के अंदर. पति, घर, बच्चा उस के प्राण हैं और उन के प्रति वह समर्पित है. उसे बेटे प्रिंस से, पति रमन से और अपने हाथों सजाई अपनी गृहस्थी से बहुत प्यार है.

बचपन से ही जया भावुक, कोमल और संवेदनशील स्वभाव की है. पति उस को ऐसा मिला है, जो बस, अपना ही स्वार्थ देखता है, पत्नी बच्चे के प्रति कोई प्यारममता उस में नहीं है.  जया तो उस के लिए विलास की एक वस्तु मात्र है.

जया घर से निकली तो देर हो गई थी. यह इत्तेफाक ही था कि घर से निकलते ही उसे आटो मिल गया और वह ठीक समय पर दफ्तर पहुंच गई.

कुरसी खींच कर जया सीट पर बैठी ही थी कि चपरासी ने आकर कहा, ‘‘मैडम, बौस ने आप को बुलाया है.’’

जया घबराई…डरतेडरते उन के कमरे में गई. वह बड़े अच्छे मूड में थे. उसे देखते ही बोले, ‘‘जया, मिठाई खिलाओ.’’

‘‘किस बात की, सर?’’ अवाक् जया पूछ बैठी.

‘‘तुम्हारी सी.आर. बहुत अच्छी गई थी…तुम को प्रमोशन मिल गया है.’’

धन्यवाद दे कर जया बाहर आई, फिर ऐसे काम में जुट गई कि सिर उठाने का भी समय नहीं मिला.

दफ्तर से छुट्टी के बाद वह घर आ कर सीधी लेट गई. प्रिंस भी आ कर उस से लिपट गया. अम्मां चाय लाईं.

‘‘टिफन खाया?’’

‘‘अरे, अम्मां…आज भी लंच करना ध्यान नहीं रहा. अम्मां, ऐसा करो, ओवन में गरम कर उसे ही दे दो.’’

‘‘रहने दो, मैं गरमगरम नमक- अजवाइन की पूरी बना देती हूं…पर बीबी, देह तुम्हारी अपनी है, बच्चे को पालना है. ऐसा करोगी तो…’’

बड़बड़ाती अम्मां रसोई में पूरी बनाने चली गईं. जया कृतज्ञ नजरों से उन को जाते हुए देखती रही. थोड़ी ही देर में अचार के साथ पूरी ले कर अम्मां आईं.

‘‘रात को क्या खाओगी?’’

‘‘अभी भर पेट खा कर रात को क्या खाऊंगी?’’

‘‘प्रिंस की खिचड़ी रखी है,’’ यह बोल कर अम्मां दो पल खड़ी रहीं फिर बोलीं, ‘‘साहब कब आएंगे?’’

‘‘काम से गए हैं, जब काम खत्म होगा तब आएंगे.’’

रात देर तक जया को नींद नहीं आई. अपने पति रमन के बारे में सोचती रही कि वह अब कुछ ज्यादा ही बाहर जाने लगे हैं. घर में जब रहते हैं तो बातबात पर झुंझला पड़ते हैं. उन के हावभाव से तो यही लगता है कि आफिस में शायद काम का दबाव है या किसी प्रकार का मनमुटाव चल रहा है. सब से बड़ी चिंता की बात यह है कि वह पिछले 4 महीने से घर में खर्च भी नहीं दे रहे हैं. पूछो तो कहते हैं कि गलती से एक वाउचर पर उन से ओवर पेमेंट हो गई थी और अब वह रिफंड हो रही है. अब इस के आगे जया क्या कहती…ऐसी गलती होती तो नहीं पर इनसान से भूल हो भी सकती है…रमन पर वह अपने से ज्यादा भरोसा करती है. थोड़ा सख्त मिजाज तो हैं पर कपटी नहीं हैं. सोचतेसोचते पता नहीं कब उसे नींद आ गई.

अगले दिन दफ्तर में उस के प्रमोशन की बात पता चलते ही सब ने उसे बधाई दी और पार्टी की मांग की.

लंच के बाद जम कर पार्टी हुई. सब ने मिल कर उसे फूलों का गुलदस्ता उपहार में दिया. जया मन में खुशी की बाढ़ ले कर घर लौटी पर घर आ कर उसे रोना आया कि ऐसे खुशी के अवसर पर रमन घर में नहीं हैं.

अम्मां के घर मेहमान आने वाले हैं इसलिए वह जल्दी घर चली गईं. ड्राइंगरूम में कार्पेट पर बैठी वह प्रिंस के साथ ब्लाक से रेलगाड़ी बना रही थी कि रमन का पुराना दोस्त रंजीत आया.

रंजीत को देखते ही जया हंस कर बोली, ‘‘आप…मैं गलत तो नहीं देख रही?’’

‘‘नहीं, तुम सही देख रही हो. मैं रंजीत ही हूं.’’

‘‘बैठिए, वीना भाभी को क्यों नहीं लाए?’’

‘‘वीना क ा अब शाम को निकलना कठिन हो गया है. दोनों बच्चों को होमवर्क कराती है…रमन आफिस से लौटा नहीं है क्या?’’

‘‘वह यहां कहां हैं. आफिस के काम से बंगलौर गए हैं.’’

रंजीत और भी गंभीर हो गया.

‘‘जया, पता नहीं कि तुम मेरी बातों पर विश्वास करोगी या नहीं पर मैं तुम को अपनी छोटी बहन मानता हूं इसलिए तुम को बता देना उचित समझता हूं…और वीना की भी यही राय है कि पत्नी को ही सब से पीछे इन सब बातों का पता चलता है.’’

जया घबराई सी बोली, ‘‘रंजीत भैया, बात क्या है?’’

‘‘रमन कहीं नहीं गया है. वह यहीं दिल्ली में है.’’

चौंकी जया. यह रंजीत कह रहा है, जो उन का सब से बड़ा शुभचिंतक और मित्र है. ऐसा मित्र, जो आज तक हर दुखसुख को साथ मिल कर बांटता आया है.

‘‘जया, तुम्हारे मन की दशा मैं समझ रहा हूं. पहले मैं ने सोचा था कि तुम को नहीं बताऊंगा पर वीना ने कहा कि तुम को पता होना चाहिए, जिस से कि तुम सावधान हो जाओ.’’

‘‘पर रंजीत भैया, यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘सुनो, कल मैं और वीना एक बीमार दोस्त को देखने गांधीनगर गए थे. वीना ने ही पहले देखा कि रमन आटो से उतरा तो उस के हाथ में मून रेस्तरां के 2 बड़ेबड़े पोलीबैग थे. उन को ले वह सामने वाली गली के अंदर चला गया. मैं बुलाने जा रहा था पर वीना ने  रोक दिया.’’

जया की सांस रुक गई. एक पल को लगा कि चारों ओर अंधेरा छा गया है फिर भी अपने को संभाल कर बोली, ‘‘कोई गलती तो…मतलब डीलडौल में रमन जैसा कोई दूसरा आदमी…’’

‘‘रमन मेरे बचपन का साथी है. उस को पहचानने में मैं कोई भूल कर ही नहीं सकता.’’

‘‘पर भैया, उन्होंने आज सुबह ही बंगलौर से फोन किया था. रोज ही करते हैं.’’

‘‘उस का मोबाइल और तुम्हारा लैंडलाइन, तुम को क्या पता कहां से बोल रहा है?’’

जया स्तब्ध रह गईर्. रमन निर्मोही है यह तो वह समझ गई थी पर धोखा भी दे सकता है ऐसा तो सपने में भी नहीं सोचा था.

रंजीत गंभीर और चिंतित था. बोला, ‘‘तुम्हारे पारिवारिक मामलों में मेरा दखल ठीक नहीं है फिर भी पूछ रहा हूं. रमन तुम को अपनी तनख्वाह ला कर देता है या नहीं?’’

‘‘तनख्वाह तो कभी नहीं दी…हां, घरखर्च देते थे पर 4 महीने से एक पैसा नहीं दिया है. कह रहे थे कि गलती से ओवर पेमेंट हो गई, सो वह रिफंड हो रही है. उस में आधी तनख्वाह कट जाती है.’’

‘‘जया, तुम पढ़ीलिखी हो, समझदार हो, अच्छे पद पर नौकरी कर रही हो, घर के बाहर का संसार देख रही हो फिर भी रमन ने तुम्हें मूर्ख बनाया और तुम बन गईं. यह कैसा अंधा विश्वास है तुम्हारा पति पर. सुनो, अपना भला और बच्चे का भविष्य ठीक रखना चाहती हो तो रमन पर लगाम कसो. अपने पैसे संभालो.’’

जया की नींद उड़ गई. चिंता से सिर बोझिल हो गया. वह खिड़की के सहारे बिछी आरामकुरसी पर चुपचाप बैठी रमन के बारे में मां की नसीहतों को याद करने लगी.

संपन्न मातापिता की बड़ी लाड़ली बेटी जया, रमन के लिए उन को भी त्याग आई थी.

रमन का हावभाव और उस के बात करने का ढंग कुछ इस तरह का रूखा था जो किसी संस्कारी व्यक्ति को पसंद नहीं आता था. इस के लिए जया, रमन को दोषी नहीं मानती थी क्योंकि उसे संस्कारवान बनाने वाला कोई था ही नहीं. जिस  समय रमन का उस के परिवार में आनाजाना था तब वह मामूली नौकरी करता था और जया ने लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर के अधिकारी के पद पर काम शुरू किया था. लेकिन तब जया, रमन के प्रेम में एकदम पागल हो गई थी.

मां ने समझाया भी था कि इतने अच्छेअच्छे घरों से रिश्ते आ रहे हैं और तू ने किसे पसंद किया. यह अच्छा लड़का नहीं है, इस के चेहरे से चालाकी और दिखावा टपकता है. तू क्यों नहीं समझ पा रही है कि यह तुझ से प्यार नहीं करता बल्कि तेरे पैसे से प्यार करता है.

जया तो रमन के कामदेव जैसे रूप पर मर मिटी थी, सो एक दिन घर में बिना बताए उस ने चुपचाप रमन के साथ कोर्ट मैरिज कर ली और दोनों पतिपत्नी बन गए. तब से मांबाप से उस का कोई संबंध ही नहीं रहा. अब इस शहर में उस का ऐसा कोई नहीं है जिस के सामने वह रो कर जी हलका कर सके. कोई विपदा आई तो कौन सहारा देगा उसे?

मां के कहे शब्द और रमन  के आचरण की तुलना करने लगी तो पाया कि जब से विवाह हुआ है तब से ले कर अब तक कभी रमन ने उस की इच्छाओं को मान्यता नहीं दी. कभी उसे खुश करने का प्रयास नहीं किया और वह इन सब बातों को नजरअंदाज करती रही, सोचती रही कि रमन का पारिवारिक जीवन कुछ नहीं था इसलिए यह सब सीख नहीं पाया.

शादी के बाद 2 बार घूमने गई थी पर दोनों बार रमन ने अपनी ही इच्छा पूरी की. पहली बार जया ‘गोआ’ जाना चाहती थी और रमन उसे ले कर ‘जयपुर’ चला गया. दूसरी बार वह ‘शिमला’ जाना चाहती थी तो जिद कर रमन उसे ‘केरल’ के कोच्चि शहर ले गया था.

प्रिंस के होने के बाद तो उस ने घूमने जाने का नाम ही नहीं लिया. मजे की बात यह कि दोनों यात्रा का पूरा पैसा रमन ने उस से कैश ले लिया. आश्चर्य यह कि रमन के ऐसे व्यवहार से भी जया के मन में उस के प्रति कोई विरूप भाव नहीं जागा.

अभी तक रमन पर जया को इतना विश्वास था कि पति पास रहे या दूर उस का सुरक्षा कवच था, ढाल था पर अब विश्वास टुकड़ेटुकड़े हो कर बिखर गया…कहीं भी कुछ नहीं बचा. अब अपनी और बच्चे की रक्षा उस को ही करनी होगी.

रमन लौटा, एकदम टे्रन के निश्चित समय पर. जया ने उसे गौर से देखा तो उस के चेहरे पर कहीं भी सफर की थकान के चिह्न नहीं थे.

‘‘जया, जल्दी से नाश्ता लगवा दो. आफिस के लिए निकलना है.’’

अम्मां ने परांठासब्जी प्लेट में रख खाना लगा दिया. खाना खातेखाते रमन बोला, ‘‘200 रुपए मेरे पर्स में रख दो, स्कूटर में तेल डलवाना है. मेरा पर्स खाली है.’’

पहले कहते ही निहाल हो कर जया पैसे रख देती थी पर इस बार अभी से समेटना शुरू हो गया.

‘‘मेरे पास पैसे नहीं हैं. मेरी तनख्वाह एक हफ्ते बाद मिलेगी.’’

‘‘तो क्या मैं बस में जाऊं या पैदल?’’

‘‘वह समस्या तुम्हारी है मेरी नहीं.’’

रमन अवाक् सा उस का मुंह देखने लगा. जया  नहाने चली गई. नहा कर बाहर आई तो रमन तैयार हो रहा था.

‘‘सुनो, मुझे कुछ कहना है.’’

‘‘हां, कहो…सुन रहा हूं.’’

‘‘घर का पूरा खर्च मैं चला रही हूं… तुम देना तो दूर उलटे लेते हो. अगले महीने से ऐसा नहीं होगा. तुम को घरखर्च देना पड़ेगा.’’

‘‘पर मेरा रिफंड…’’

‘‘वह तो जीवन भर चलता रहेगा. ओवर पेमेंट का इतना सारा पैसा गया कहां? देखो, जैसे भी हो, घर का खर्च तुम को देना पड़ेगा.’’

‘‘कहां से दूंगा? मेरे भी 10 खर्चे हैं.’’

‘‘घर चलाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है मेरी नहीं.’’

रमन खीसें निकाल कर बोला, ‘‘डार्लिंग, नौकरी वाली लड़की से शादी घर चलाने के लिए ही की थी, समझीं.’’

जया को लगा उस के सामने एक धूर्त इनसान बैठा है.

‘‘और सुनो, रात को खाने में कीमा और परांठा बनवाना.’’

‘‘डेढ़ सौ रुपए गिन कर रख जाओ कीमा और घी के लिए, तब बनेगा.’’

‘‘रहने दो, मैं सब्जीरोटी खा लूंगा.’’

उस दिन जया दफ्तर में बैठी काम कर रही थी कि उस के ताऊ की बेटी दया का फोन आया. घबराई सी थी. दया से उसे बहुत लगाव है. उस के साथ जया जबतब फोन पर बात करती रहती है.

‘‘जया, मैं तेरे पास आ रही हूं.’’

‘‘बात क्या है? कुशल तो है न?’’

‘‘मैं आ कर बताऊंगी.’’

आधा घंटा भी नहीं लगा कि दया चली आई. वास्तव मेें ही वह परेशान और घबराई हुई थी.

‘‘पहले बैठ, पानी पी…फिर बता हुआ क्या?’’

‘‘मेरी छोटी ननद का रिश्ता पक्का हो गया है, पर महज 50 हजार के लिए बात अटक गई. लड़का बहुत अच्छा है पर 50 हजार का जुगाड़ 2 दिन में नहीं हो पाया तो रिश्ता हाथ से निकल जाएगा. सब जगह देख लिया…अब बस, तेरा ही भरोसा है.’’

‘‘परेशान मत हो. मेरे पास 80 हजार रुपए पड़े हैं. तू चल मेरे साथ, मैं पैसे दे देती हूं.’’

दया को साथ ले कर जया घर आई. अलमारी का लौकर खोला तो वह एकदम खाली पड़ा था. जया को चक्कर आ गए. दया उस का चेहरा देख चौंकी और समझ गई कि कुछ गड़बड़ है. बोली, ‘‘क्या हुआ, जया?’’

‘‘40 हजार के विकासपत्र थे. पिछले महीने मेच्योर हो कर 80 हजार हो गए थे. सोच रही थी कि उठा कर उन्हें डबल कर दूंगी पर…’’

तभी अम्मां पानी ले कर आईं और बोलीं, ‘‘बीबीजी, एक दिन दोपहर में आ कर साहब अलमारी से कुछ कागज निकाल कर ले गए थे.’’

‘‘कब?’’

‘‘पिछली बार दौरे पर जाने से पहले.’’

जया सिर थाम कर बिस्तर पर बैठ गई. दया ने ढाढ़स बंधाया.

‘‘जाने दे, जया, तू परेशान न हो. कहीं न कहीं से पैसे का जुगाड़ हो ही जाएगा.’’

‘‘एक बार डाकघर चल तो मेरे साथ.’’

दोनों डाकघर आईं और बड़े बाबू से बात की तो उन्होंने कहा, ‘‘आप के पति 10-12 दिन पहले कैश करा कर रकम ले गए थे. आप को पता नहीं क्या?’’

दोनों चुपचाप डाकघर से निकल आईं. घर आ कर रो पड़ी जया.

‘‘धैर्य रख, जया,’’ दया बोली, ‘‘अब तू भी सावधान हो जा. जो गया सो गया पर अब और नुकसान न होने पाए. इस का ध्यान रख.’’

थोड़ी देर बाद वह फिर बोली, ‘‘जया, एक बात बता…तेरा प्यार अंधा है या तू रमन से डरती है.’’

‘‘अब तक मैं प्यार में अंधी ही थी पर अब मेरी आंख खुल गई है.’’

‘‘ऐसा है तो थोड़ा साहस बटोर. तू तो जो है सो है, प्रिंस के भविष्य को अंधेरे में मत डुबा दे. उसे एक स्वस्थ जीवन दे. अकेले उसे पालने की सामर्थ्य है तुझ में.

‘‘जया, मैं तुझे एक बात बताना चाहती थी, पर तुझे मानसिक कष्ट होगा यह सोच कर आज तक नहीं बोली थी. मेरी भानजी नैना को तो तू जानती है. पिछले माह उस की शादी हुई तो वह पति के साथ हनीमून पर शिमला गई थी. वहां रमन एक युवती को ले कर जिस होटल में ठहरा था उसी में नैना भी रुकी हुई थी.  नैना जब तक शिमला में रही रमन की नजरों से बचती रही पर लौट कर उस ने मुझे यह बात बताई थी.’’

अब सबकुछ साफ हो गया था. जया ने गहरी सांस ली.

‘‘हां, तू ठीक कह रही है…बदलाव से डर कर चुप बैठी रही तो मेरे साथ मेरे बच्चे का भी सर्वनाश होगा, मम्मी भी पिछले रविवार को आ कर यही कह रही थीं. कुछ करूंगी.’’

2 दिन बाद रमन लौटा. प्रिंस को बुखार था इसलिए जया उसे गोद में ले कर बैठी थी. रमन ने उस का हाल भी नहीं पूछा, आदत के मुताबिक आते ही बोला, ‘‘अम्मां से कहो, बढि़या पत्ती की एक कप चाय बना दें.’’

‘‘पहले बाजार जा कर तुम दूध का पैकेट ले आओ तब चाय बनेगी.’’

रमन हैरान हो जया का मुंह देखने लगा.

‘‘मैं… मैं दूध लेने जाऊं?’’

‘‘क्यों नहीं? सभी लाते हैं.’’

जया ने इतनी रुखाई से कभी बात नहीं की थी. रमन कुछ समझ नहीं पा रहा था.

‘‘अम्मां को भेज दो.’’

‘‘अम्मां के पास और भी काम हैं.’’

‘‘ठीक है, मैं ही लाता हूं, पैसे दे दो.’’

‘‘अपने पैसों से लाओ और घर का भी कुछ सामान लाना है…लिस्ट दे रही हूं, लेते आना.’’

‘‘रहने दो, चाय नहीं पीनी.’’

रमन बैठ गया. प्रिंस सो गया तो जया अखबार ले कर पढ़ने लगी. रमन तैयार होते हुए बोला, ‘‘100 रुपए दे देना, पर्स एकदम खाली है.’’

‘‘मैं एक पैसा भी तुम्हें नहीं दे सकती, 100 रुपए तो बड़ी बात है… और तुम बैठो, मुझे तुम से कुछ कहना है.’’

रमन बैठ गया.

‘‘विकासपत्र के 80 हजार रुपए निकालते समय मुझ से पूछने की जरूरत नहीं समझी?’’

‘‘पूछना क्या? जरूरत थी, ले लिए.’’

‘‘अपनी जरूरत के लिए तुम खुद पैसों का इंतजाम करते, मेरे रुपए क्यों लिए और वह भी बिना पूछे?’’

‘‘तुम्हारे कहां से हो गए…शादी में दहेज था. दहेज में जो आता है उस पर लड़की का कोई अधिकार नहीं होता.’’

‘‘कौन सा कानून पढ़ कर आए हो? उस में दहेज लेना अपराध नहीं होता है क्या? आज 5 महीने से पूरा घर मैं चला रही हूं, तुम्हारा पैसा कहां जाता है?’’

‘‘मैं कितने दिन खाता हूं तुम्हारा, दौरे पर ही तो रहता हूं.’’

‘‘कहां का दौरा? शिमला का या गांधीनगर का?’’

तिलमिला उठा रमन, ‘‘मैं कहीं भी जाता हूं…तुम जासूसी करोगी मेरी?’’

‘‘मुझे कुछ करने की जरूरत नहीं. इतने दिन मूर्ख बनाते रहे…अब मेरी एक सीधी बात सुन लो. यह मेरा घर है…मेरे नाम से है…मैं किस्त भर रही हूं…तुम्हारे जैसे लंपट की मेरे घर में कोई जगह नहीं. मुझे पिं्रस को इनसान बनाना है, तुम्हारे जैसा लंपट नहीं. इसलिए चाहती हूं कि तुम्हारी छाया भी मेरे बच्चे पर न पडे़. तुम आज ही अपना ठिकाना खोज कर यहां से दफा हो जाओ.’’

‘‘मुझे घर से निकाल रही हो?’’

‘‘तुम्हें 420 के अपराध में पुलिस के हाथों भी दे सकती थी पर नहीं. वैसे हिसाब थोड़ा उलटा पड़ गया है न.  आज तक तो औरतों को ही धक्के मारमार कर घर से निकाला जाता था…यहां पत्नी पति को निकाल रही है.’’

रमन बुझ सा गया, फिर कुछ सोच कर बोला, ‘‘मैं तुम्हारी शर्तों पर समझौता करने को तैयार हूं.’’

‘‘मुझे कोई समझौता नहीं चाहिए. तुम जैसे धूर्त व मक्कार पति की छाया से भी मैं अपने को दूर रखना चाहती हूं.’’

‘‘तुम घर तोड़ रही हो.’’

‘‘यह घर नहीं शोषण की सूली थी जिस पर मैं तिलतिल कर के मरने के लिए टंगी थी पर अब मुझे जीवन चाहिए, अपने बच्चे के लिए जीना है मुझे.’’

बात बढ़ाए बिना रमन ने अपने कपड़े समेटे और चला गया.

जया ने मां को फोन किया :

‘‘मम्मी, आप की सीता ने निरपराधी हो कर भी बिना विरोध किए अग्निपरीक्षा दी थी और मैं एक छलांग में आग का दरिया पार कर आई. रमन को घर से भगा दिया.’’

‘‘सच, कह रही है तू?’’

‘‘एकदम सच, मम्मी. मां के सामने जब बच्चे के भविष्य का सवाल आ कर खड़ा होता है तो वह संसार की हर कठिनाई से टक्कर लेने के लिए खड़ी हो जाती है.’’

‘‘तू मेरे पास चली आ. यहां ऊपर का हिस्सा खाली पड़ा है.’’

‘‘नहीं, मम्मी, अपने घर में रह कर ही मेरा प्रिंस बड़ा होगा. अम्मां अब मेरे साथ ही रहेंगी, घर नहीं जाएंगी.’’

‘‘जैसी तेरी इच्छा, बेटी,’’ कह कर जया की मां ने फोन रख दिया.

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