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‘टाइम’ मैगजीन ने मोदी को बताया : इंडियाज डिवाइडर-इन-चीफ

अमेरिका की प्रतिष्ठित ‘टाइम’ मैगजीन, जिसने वर्ष 2014 में भारत के प्रधानमंत्री पद पर काबिज हुए नरेन्द्र दामोदरदास मोदी को एक उभरते हुए ‘वर्ल्ड-लीडर’ के तौर पर पेश किया था और पत्रिका के कवर पर उनकी फोटो के साथ लिखा था – ‘मोदी मीन्स बिजनेस’, वही ‘टाइम’ मैगजीन अगर पांच साल बाद मोदी को ‘इंडियाज डिवाइडर-इन-चीफ’ बता रही है, तो यह मोदी और उनकी पार्टी के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के लिए भी बेहद लज्जाजनक बात है. बकौल पत्रिका, मोदी की छवि जो वर्ष 2014 में ‘विकास पुरुष’ के रूप में निर्मित हो रही थी, आज ‘लोगों को बांटने और लड़ाने वाले एक चतुर राजनेता’ की बन चुकी है. पांच साल दुनियाभर के देशों का दौरा करके भारत को दुनिया के मंचों पर रिप्रेजेंट करने वाले मोदी की इस छवि ने नि:संदेह अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को धूमिल किया है.

भारत में ‘डिवाइड एंड रूल’ की पौलिसी अपना कर हुकूमत करने की तोहमत अंग्रेजों पर लगी थी और आजादी के सात दशक बाद वह ‘काला ताज’ आज मोदी के सिर पर है. ‘टाइम’ ने मोदी के बीते पांच साल के कार्यकाल का पूरा कच्चा-चिट्ठा उकेरते हुए उन्हें स्पष्ट तौर पर भारत को बांटने वाला प्रमुख व्यक्ति बताया है. लोकसभा चुनाव के बीच पत्रिका ने बेहद हताशा से भरा यह सवाल भी उठाया है कि – क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र मोदी सरकार को फिर पांच साल के लिए भुगतेगा?

गौरतलब है कि अन्तरराष्ट्रीय मैगजीन ‘टाइम’ ने वर्ष 2012 में भी नरेन्द्र मोदी को एक विवादास्पद, अति महत्वाकांक्षी और एक चतुर राजनेता बताया था, जो अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, मगर 2014 में मोदी के विकास के वादों और भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के दावों ने जनता में एक उम्मीद की अलख जगायी और मोदी की छवि को बदला. वर्ष 2014 में मोदी विकास पुरुष के रूप में उभरे, तो साल 2014-15 में ‘टाइम’ ने भी मोदी को दुनिया के 100 प्रभावशाली व्यक्तियों की सूची में शामिल किया, मगर बीते पांच साल में सारा पानी उतर गया. सारे मुखौटे उतर गये और मोदी का असली चेहरा एक बार फिर दुनिया के सामने है.

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पत्रिका लिखती है कि 2014 में डा. मनमोहन सिंह जैसे ‘खामोश प्रधानमंत्री’ के सामने जब एक ‘दहाड़ता प्रधानमंत्री’आया, तो लोगों का उत्साह चरम पर पहुंच गया. यूपीए सरकार में हुए भ्रष्टाचार के कारण लोगों के बीच उस वक्त जो गुस्सा था, नरेंद्र मोदी ने उस गुस्से को आर्थिक वायदे में बदला. उन्होंने युवाओं को नौकरी देने और देश के विकास की बातें कीं, लेकिन अब ये विश्वास करना मुश्किल लगता है कि 2014 का चुनाव उम्मीदों का चुनाव था. मोदी द्वारा आर्थिक चमत्कार लाने के तमाम वादे फेल हो गये. लोगों को एक बेहतर भारत की उम्मीद थी, लेकिन मोदी के कार्यकाल में अविश्वास का दौर शुरू हुआ. मोदी ने मासूम और समस्याओं से घिरी जनता की समस्याओं को दूर करने के बजाये उनके बीच धार्मिक उन्माद पैदा करके उनके दिलों में एकदूसरे के प्रति जहर भर दिया. उन्होंने देश भर में धार्मिक राष्ट्रवाद का तनावपूर्ण माहौल पैदा कर दिया. बीते पांच सालों में हिन्दू-मुसलमानों के बीच तेजी से सौहार्द कम हुआ है. पत्रिका लिखती है कि मोदी ने कभी भी शान्ति और एकता की बात नहीं की. उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम तनाव को बढ़ावा दिया है और पांच साल में भारत ऐसी अत्यधिक ज्वलनशील जगह बन गया है, जहां कुछ लोग हाथ में मशाल लेकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं. पत्रिका ने 2002 के गुजरात दंगे को रेखांकित करते हुए नरेन्द्र मोदी पर ‘दंगाइयों के लिए दोस्त’ साबित होने की बात कहते हुए देश में दंगों और धार्मिक उन्माद के वक्त उनकी ‘चुप्पी साधने’ पर भी सवाल उठाया है. ‘टाइम’ के इस लेख में 1984 के सिख दंगों और 2002 के गुजरात दंगों का हवाला दिया गया है. लेख में कहा गया है कि हालांकि कांग्रेस नेतृत्व भी 1984 के दंगों को लेकर आरोप मुक्त नहीं है, लेकिन फिर भी उसने दंगों के दौरान उन्मादी भीड़ को खुद से अलग रखा, लेकिन नरेंद्र मोदी 2002 के दंगों के दौरान अपनी चुप्पी से ‘दंगाइयों के लिए दोस्त’ साबित हुए. पत्रिका आगे लिखती है कि बीते पांच साल में देश के प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के शासनकाल में देश भर में गुजरात दंगों जैसी ही हिंसा की पुनरावृत्ति हुई. ‘गौरक्षा’की आड़ में हुए मौब लीचिंग में एक धर्म विशेष का उत्पीड़न करने का आरोप लगाते हुए पत्रिका लिखती है कि भारत में गाय को लेकर मुसलमानों पर बार-बार हमले हुए और उनके कत्ल हुए. एक भी ऐसा महीना नहीं गुजरा, जब लोगों के स्मार्टफोन पर वो तस्वीरें न आयीं, जिसमें गुस्साई हिन्दू भीड़ मुस्लिम को पीट न रही हो. गाय के नाम पर सरेआम मुसलमानों को काटा गया. सबसे अहम यह कि सरकार ने इस पर कोई ठोस कदम उठाने की बजाए चुप रहना ही बेहतर समझा.

पत्रिका ने स्पष्ट तौर पर मोदी की अगुवाई वाली भाजपा को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया है. उसने लिखा है कि भारत में मोदी की नीतियों के कारण लोगों के बीच साम्प्रदायिक खाई के साथ जातिवादी खाई तेजी से बढ़ती जा रही है. वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश में जब भाजपा ने विधानसभा चुनाव जीता तो भगवा पहनने वाले और नफरत फैलाने वाले एक महंत को सीएम बना दिया गया, जो सीधे तौर पर हिन्दू-मुस्लिम के बीच विभाजन की बात करता है.

पत्रिका लिखती है कि भाजपा की प्रतिद्वंद्वी पार्टी कांग्रेस चाहे कितनी ही दकियानूसी और भ्रष्ट क्यों न हो, लेकिन वह मासूम लोगों को एक-दूसरे से लड़ाती नहीं है. राहुल गांधी चाहे वंशानुगत राजनीति के नुमाइंदे हों, लेकिन उन्होंने कांग्रेस को आधुनिक बनाया है. गौरतलब है कि राहुल गांधी और कांग्रेस के समर्थन में यह ब्रिटिश पत्रिका पहली बार नहीं लिख रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में भी इसने नरेन्द्र मोदी की तुलना में राहुल गांधी को ज्यादा समर्थ और धर्मनिरपेक्षता के पैमाने पर खरा बताया था.
‘टाइम’ देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षता के विचार और मोदी के शासनकाल में प्रचलित सामाजिक तनाव की तुलना भी करती है. मैगजीन लिखती है कि 1947 में ब्रिटिश इंडिया दो हिस्सों में बंटा और पाकिस्तान का जन्म हुआ, लेकिन कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़े भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने फैसला किया कि भारत सिर्फ हिन्दुओं का घर नहीं होगा, बल्कि हर धर्म के लोगों के लिए यहां जगह होगी. नेहरू की विचारधारा सेक्युलर थी, जहां सभी धर्मों की समान रूप से इज्जत थी. भारतीय मुसलमानों को शरिया पर आधारित फैमिली लौ मानने का अधिकार दिया गया, जिसमें तलाक देने का उनका तरीका तीन बार तलाक बोलकर तलाक लेना भी शामिल था, जिसे नरेन्द्र मोदी ने 2018 में एक आदेश जारी करके कानूनी अपराध करार दे दिया. किसी धर्म-विशेष के पर्सनल लॉ में बदलाव का यह तरीका बेहद गलत और दुर्भावना से भरा हुआ था. तीन तलाक को खत्म करके उन्होंने मुस्लिम महिलाओं का मसीहा बनने की कोशिश तो की, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि महिलाओं की सुरक्षा के मामले में भारत आज सबसे निचले पायदानों में से एक पर है. ‘टाइम’ अपने लेख में मोदी-शासन की आलोचना करते हुए लिखती है कि आजाद भारत की धर्मनिरपेक्षता, उदारवाद और स्वतन्त्र प्रेस जैसी उपलब्धियां ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे किसी षड्यन्त्र का हिस्सा हों.
मोदी के पांच साल के ‘काले-शासन’ को देख कर पत्रिका मोदी पर आक्रामक है. वह पांच साल में ‘वर्ल्ड-लीडर’ से ‘नेशन डिवाइडिंग कैटलिस्ट’ के रूप में चर्चित हो चुके मोदी पर आरोप लगाती है कि उन्होंने भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति के कारण वोटरों के धु्रवीकरण के लिए नितान्त गलत और निन्दनीय तरीके इस्तेमाल किये हैं. नरेंद्र मोदी ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ाने के लिए कभी कोई मंशा या इच्छा नहीं जाहिर की. दुनियाभर के मंचों पर आकर वह भारत की जिस कथित उदार संस्कृति की चर्चा करते थे, दरअसल उसके उलट वहां धार्मिक राष्ट्रवाद, मुसलमानों के खिलाफ भावनाएं और जातिगत कट्टरता ही पनप रही थी.

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मैगजीन का मानना है कि 2014 में लोगों को आर्थिक सुधार के बड़े-बड़े सपने दिखाने वाले मोदी अब इस बारे में बात भी नहीं करना चाहते. अब उनका सारा जोर हर नाकामी के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराकर लोगों के बीच राष्ट्रवाद की भावना का संचार करना है. अपनी नाकामियों के लिए अक्सर कांग्रेस के पुरोधाओं को निशाना बनाने वाले मोदी जनता की नब्ज को बेहतर समझते हैं. यही वजह है कि जब भी फंसा महसूस करते हैं तो खुद को गरीब का बेटा बताने से नहीं चूकते. मोदी ने हमेशा राजनीति को अपने इर्द-गिर्द घुमाने की कोशिश की है. तभी उनकी पार्टी के एक युवा नेता तेजस्वी सूर्या कहते हैं कि अगर आप मोदी के साथ नहीं हैं तो आप देश के साथ भी नहीं हैं. मोदी को लगता है कि सत्ता में बने रहने के लिए राष्ट्रवाद ही सबसे बेहतर विकल्प है. अपने ‘छद्म राष्ट्रवाद’ की आड़ में वह भारत-पाक के बीच चल रहे तनाव का फायदा लेने से भी नहीं चूकते हैं. उन्हें जोड़-तोड़ करके किसी तरह सत्ता में वापसी चाहिए और इसलिए आर्थिक विकास पर वह राष्ट्रवाद को तरजीह दे रहे हैं. मोदी ने लगभग हर क्षेत्र में अपने मन मुताबिक फैसले लिए. हिन्दुत्व के प्रबल समर्थक स्वामीनाथन गुरुमूर्ति को रिजर्व बैंक औफ इंडिया के बोर्ड में शामिल किया. उनके बारे में कोलम्बिया के अर्थशास्त्री ने कहा था – अगर वह अर्थशास्त्री हैं तो मैं भरतनाट्यम डांसर. मैगजीन का कहना है कि गुरुमूर्ति ने ही कालेधन से लड़ने के लिए नोटबंदी का सुझाव दिया था. इसकी मार से भारत आज भी नहीं उबर सका है.

मैगजीन का कहना है कि बेशक मोदी फिर से चुनाव जीतकर सरकार बना सकते हैं, लेकिन अब उनमें 2014 वाला करिश्मा नहीं है. तब वे मसीहा थे. लोगों की उम्मीदों के केन्द्र में थे. एक तरफ उन्हें हिन्दुओं का सबसे बड़ा प्रतिनिधि माना जाता था, तो दूसरी तरफ लोग उनसे साउथ कोरिया जैसे विकास की उम्मीद कर रहे थे. इससे उलट अब वे सिर्फ एक राजनीतिज्ञ हैं, जो अपने तमाम वायदों को पूरा करने में नाकाम रहा है.

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पत्रिका कहती है कि भाजपा की तुलना में कांग्रेस भारतीयों के वोट पाने की ज्यादा हकदार है. गौरतलब है कि वर्ष 2014 में भी ‘टाइम’ ने मोदी की तुलना में राहुल गांधी को ज्यादा समर्थ और धर्मनिरपेक्षता के पैमाने पर खरा बताया था, मगर उस वक्त यूपीए पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लग चुके थे. उस वक्त मनमोहन सिंह जैसे ‘चुप्प’ प्रधानमंत्री के आगे ‘बड़बोले’ मोदी लोगों के दिलों पर छा गये थे. मगर पांच साल में मोदी का असली रूप देश ने भी देख लिया और ‘टाइम’ के जरिये दुनिया भी देख रही है. भारत में लोकसभा चुनाव के दौरान ‘टाइम’ की इस रिपोर्ट से राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है. कांग्रेसियों के ट्विटर अकाउंट्स, फेसबुक, वेबसाइट्स, वाट्सएप ग्रुपों पर पत्रिका का कवर ट्रेंड कर रहा है. चुनावी माहौल में एक तरफ प्रधानमंत्री देशभक्ति के नाम पर चुनावी-भाषणबाजी में जुटे हैं और दूसरी तरफ दुनिया की मशहूर पत्रिका के कवर पेज पर उन्हें भारत को बांटने वाला शख्स कहा जा रहा है, वह भी उनके ‘क्रूर’ चेहरे वाली तस्वीर के साथ !

 

संस्कार शिविरों में

संस्कार शिविर तेजी से फलताफूलता धार्मिक व्यवसाय है जिस के बारे में यह गलतफहमी पसरी है कि इन शिविरों में जा कर बच्चों की जिंदगी संवर जाती है, पर हकीकत में ऐसा है नहीं. वहां तो अपराधी तैयार हो रहे हैं.

चिंताजनक मामला महाराष्ट्र के पुणे का है. जहां के हडपसर और मुंढवा इलाकों में लगातार चोरी की वारदातें बढ़ती जा रही थीं. पुलिस की लाख कोशिशों के बाद भी चोर पकड़ में नहीं आ रहे थे, जिस से महकमे की खासी छीछालेदर हो रही थी.

हालांकि पुलिस को 2 किशोरों पर शक था क्योंकि अकसर उन की मौजदूगी हर उस जगह पाई जाती थी जहां चोरी हुई होती थी. इन किशोरों पर हाथ डालने में पुलिस महज इसलिए हिचक रही थी क्योंकि वे पुणे के एक प्रतिष्ठित संस्कार शिविर के छात्र थे. शक होते ही पुलिस ने इन के बारे में जानकारियां हासिल कीं, तो पता चला कि वे तो बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के हैं.

सागर भोलेराव और स्वप्निल गिरमे नाम के ये प्रशिक्षु संस्कारी किशोर शिविर में दिनभर भक्ति में लीन रहते थे. वे नियम से सुबहशाम भजन, कीर्तन करते थे, ध्यान लगाते थे, योग करते थे, पूजापाठ और यज्ञहवन वगैरह भी करते थे.

अब इतने धार्मिक प्रवृत्ति के छात्र चोरी जैसी घटिया और निकृष्ट हरकत भी कर सकते हैं, यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. मानो दुनियाभर के चोर, उचक्के, जेबकतरे, डाकू और दूसरे अपराधी ये सब ढकोसले न करते हों. हां, इतना जरूर है कि वे यह सब किसी नामी शिविर में रह कर नहीं करते या सीखते.

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शक चूंकि लगभग यकीन में बदल चुका था, इसलिए पुलिस वालों ने बाकायदा योजना बनाई और सागर और स्वप्रिल पर नजर रखने के लिए कुछ पुलिस वालों को संस्कार शिविर में दाखिल करा दिया गया. इन पुलिस वालों ने जासूसों वाली स्टाइल में लगातार

2 हफ्ते इन दोनों की निगरानी की, तब जा कर ये पकड़ में आए.

निगरानी कर रहे पुलिस वालों ने पाया कि ये दोनों बाकायदा पूरी श्रद्धा और नियमधरम से शिविर के नियमों व अनुशासन का तो पालन करते हैं लेकिन रात में दबेपांव बाहर निकल जाते हैं.

6 फरवरी को भी दोनों यों ही बाहर निकले, तो पुलिस वालों ने उन का पीछा किया.

जब खुली पोल दोनों मुंढवा इलाके में चोरी करते रंगेहाथों धरे गए. सो, पता चला कि संस्कार शिविर में ये दोनों किस तरह के संस्कार ग्रहण कर रहे थे. पकड़े जाने पर सागर और स्वप्निल दोनों ने पूरी सज्जनता से संस्कार निभाते स्वीकार किया कि वे रात को चोरी करते थे. इन दोनों के पास से 5 बाइक, 26 हजार रुपए नकद, 150 ग्राम सोने के जेवर और कैमरा व मोबाइल सहित तकरीबन 20 लाख रुपए कीमत का चोरी का सामान बरामद हुआ.

पूछताछ में पता चला कि दोनों चोरी करने जाने से पहले ध्यान जरूर लगाते थे. इस तरह संस्कार शिविर में रहते इन दोनों ने खूब माल बनाया. रात को कोई अनावश्यक पूछताछ न करे, इसलिए ये दोनों संस्कार शिविर का पहचानपत्र जरूर साथ में रखते थे.

डेढ़ साल से इन दोनों इलाकों में सफलतापूर्वक चोरी कर रहे इन संस्कारियों की हकीकत का खुलासा करते हुए पुणे के डीएसपी प्रकाश गायकवाड़ ने बताया, ‘‘इन के अभिभावकों ने इन्हें संस्कार शिविर में इसलिए भरती करवाया था कि ये बुरी आदतों का त्याग कर दें. स्वप्निल के पिता बस कंडक्टर हैं और उन के यहां का माहौल बेहद धार्मिक है. सागर के पिता की कुछ दिनों पहले मौत हो चुकी है और उस की मां हाउसकीपिंग का काम करती है. चोरी का माल ये दोनों सागर की मां को सौंप देते थे.’’

साफ दिख रहा है कि इन दोनों को संस्कार शिविर किसी सुधार के लिए नहीं भेजा गया था, बल्कि ये शक के दायरे में न आ कर कामयाबी से चोरी कर सकें, इसलिए इन्हें संस्कार शिविर में दाखिल कराया गया था, जहां का धर्म, कर्म, प्रवचन और उपदेश वगैरह इन्हें सुधारने में सफल नहीं हो पाए. इस का सीधा सा मतलब यह भी निकलता है कि धार्मिक ढकोसले महज दिखावे की चीज होते हैं, इन से किसी का हृदय परिवर्तन नहीं होता.

बिगड़ैल, उद्दंड, अपराधी प्रवृत्ति के और बदतमीज बच्चों को संस्कार शिविरों में भेजे जाने से कोई फायदा होता है, ऐसा इस मामले को देख लगता नहीं. उलटे, शक इस बात पर किया जा सकता है कि संस्कार शिविरों का औचित्य क्या है और इन के आयोजन से किसे फायदा होता है.

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फलताफूलता धंधा

इन दिनों देशभर में हर कहीं धड़ल्ले से संस्कार शिविर आयोजित होने लगे हैं जिन के आयोजक अकसर धार्मिक व सामाजिक संगठनों के कर्ताधर्ता होते हैं. इन की गाढ़ी कमाई का जरिया ये शिविर होते हैं जिन में कहींकहीं ऐंट्री या रजिस्ट्रेशन फीस भी ली जाती है और चंदा उगाही भी की जाती है, ठीक वैसे ही जैसे झांकियों और भंडारों के लिए की जाती है. गरमी की छुट्टियों में तो संस्कार शिविर कुकुरमुत्ते की तरह उगते हैं.

संस्कार शिविरों के बारे में दावा किया जाता है कि इन में बच्चों को ऐसे संस्कार दिए जाते हैं जिन से वे सही अर्थों में मानव बन सकें. हकीकत में बच्चों को अच्छा इंसान बनाने के नाम पर धर्म और धार्मिक बातें उन पर थोप कर धर्म के धंधे के नए ग्राहक ही इन शिविरों में तैयार किए जाते हैं.

जिस उम्र में बच्चों को काउंसलिंग की जरूरत होती है उस उम्र में उन्हें भागवत, रामायण और गीता सुना कर कथित सही रास्ते पर ला कर अच्छा इंसान बनाने का दावा अकसर खोखला साबित होता है. इन चीजों या तरीकों से कोई अच्छा यानी धार्मिक इंसान बनता होता, तो देश में अपराध होने ही नहीं चाहिए.

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परिवार में जब कोई कटने लगे

डिप्रैशन ऐसी समस्या है जिस के बारे में कोई बात नहीं करता और यही इस के समाधान में सब से बड़ी बाधा है. जबकि इस के कुछ लक्षण यदि खुद डिप्रैशन से गुजर रहा व्यक्ति समझ जाए, तो इलाज संभव है.

गिरीश का काम अच्छा नहीं चल रहा था. यह उस की पत्नी विभा और दोनों बच्चे जानते थे. नएनए बिजनैस को जमने में समय लगता ही है, विभा यह गिरीश को बारबार समझा तो रही थी पर गिरीश की निराशा कम ही नहीं हो रही थी. यह परिवार मुंबई में नयानया आया था. गांव से काफी जमापूंजी ले कर आया था गिरीश. उस ने बड़े जोश से नया काम शुरू किया था. पर महानगर की परेशानियां, बढ़ते खर्चे, बिजनैस में घाटा गिरीश को अंदर ही अंदर तोड़ते जा रहे थे.

उस ने धीरेधीरे लोगों से मिलनाजुलना कम कर दिया था. वह दुकान पर जाता तो, लेकिन वहां से लंचबौक्स अनछुआ वापस आता. विभा कहीं किसी परिचित के यहां चलने को कहती, तो वह चिढ़ जाता, मना कर देता. खाली समय जहां पहले पत्नी और बच्चों के साथ बिताता था, अब वह अकेला चुपचाप बैठा रहता.

विभा यह सोच रही थी कि कुछ समय लगेगा, सब ठीक हो जाएगा. गिरीश को चुप बैठा देख वह यह सोच कर कि गिरीश चिढ़ न जाए, अपने काम में लगी रहती. कई दिनों से यह सिलसिला चलता रहा. पर एक दिन वह हो गया जो विभा ने सपने में भी नहीं सोचा था. विभा घर का सामान लेने जाने लगी, बच्चे खेलने गए हुए थे, गिरीश ने उसे गंभीरतापूर्वक घर व दुकान के कुछ कागजात समझाए. विभा ने इसे सामान्य समझा.

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गिरीश की बात सुन कर विभा बाजार चली गई. लौटी तो अनर्थ हो चुका था. गिरीश ने पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली थी. नोट लिख दिया था कि ‘मैं तनाव में हूं, कई दिनों से डिप्रैशन में रहने के कारण मैं आत्महत्या कर रहा हूं. मैं अपने काम में असफल रहा हूं, निराश हूं.’

विभा और बच्चे रोते रह गए. जाने वाला जा चुका था. विभा अब तक पछताती है कि गिरीश की डिप्रैशन की हालत पर उस ने समय रहते गंभीरतापूर्वक ध्यान क्यों नहीं दिया. डिप्रैशन इतनी आम समस्या हो गई है कि अब इसे ‘कौमन कोल्ड औफ मैंटल इल्नैस’ भी कहा जाने लगा है.

मामला डिप्रैशन का जीवन में कभीकभी लो फील करना आम बात है, पर जब यह एहसास बहुत लंबे समय तक बना रहे तो यह डिप्रैशन हो सकता है. ऐसे में जीवन बड़ा निरर्थक सा लगने लगता है. सकारात्मक बातें भी नकारात्मक लगने लगती हैं.

डिप्रैशन आम दुख से अलग होता है. यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिस में व्यक्ति को उदासी, अकेलापन, निराशा, आत्मसम्मान में कमी महसूस होती है. वह समाज से कटने लगता है. उस की भूख और नींद में कमी आ जाती है.

जब व्यक्ति धीरेधीरे सब से कटने लगे, तो उस के आसपास के लोगों को सचेत हो जाना चाहिए. अवसाद में रहने वाला व्यक्ति सुसाइड के बारे में सोच सकता है. बिना देरी किए ऐक्सपर्ट की सलाह लें. छिपाएं नहीं, लोगों को बताएं

यदि आप सब से कटने लगे हैं, डिप्रैशन महसूस हो रहा है तो इस स्थिति को छिपाएं नहीं, अपने घरपरिवार, दोस्तों से सलाह लें. उन से बात करें. लाइफस्टाइल सुधारें. रिश्तों पर भरोसा रखें. उन्हें सुधारें. व्यायाम करें, पौष्टिक आहार लें. सकारात्मक सोच रखें. स्ट्रैस मैनेजमैंट से संबंधित कोई शौर्टटर्म कोर्स कर लें.

बारबार यह न सोचें, न कहें कि आप का किसी से मिलने का मन नहीं करता, डिप्रैशन हो रहा है. डिप्रैशन शब्द का प्रयोग कम से कम करें. छोटीमोटी परेशानियों को डिप्रैशन का नाम न दें. ऐसी सामग्री पढ़ें जो सकारात्मकता बढ़ाए. नैगेटिव लोगों से दूर रहें.

मनुष्य प्रकृति की बनाई सर्वश्रेष्ठ कृति है. इस बात को समझें कि जीवन में जब तक असफलता नहीं होगी, तब तक सफलता का मोल भी समझ नहीं आएगा. इसलिए, असफलता को हर एक चीज का अंत न समझें. धीरेधीरे सब से कट कर, सब से दूर हो जाने से निराशा, अवसाद की स्थिति ही उत्पन्न होगी. सो, इस से बचें.  बात ऐसे बनी.

मेरी शादी हुए 25 दिन बीते थे. ससुराल में बहुत सारे नियमकानूनों का पालन करना पड़ता था. ससुरजी के कथनानुसार, नई बहू को हमेशा गहने, कपड़ों से सजधज कर रहना चाहिए ताकि मालूम पड़े कि घर में नई बहू आई है. सासुमां के हिसाब से नई बहू को बड़े सवेरे फ्रैश हो कर अपने कामकाज में जुट जाना चाहिए.

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एक दिन मैं जैसे ही टौयलेट गई, मेरे कंगन का पेंच खुल गया. देखते ही देखते कंगन कमोड सीट के अंदर चला गया. मैं सन्न रह गई. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं? कमोड सीट के अंदर हाथ डालते मुझे डर लग रहा था. घर में सभी लोग सो रहे थे. मैं परेशान खड़ी सोच रही थी कि क्या करूं. इतने में मुझे बाहर किसी के बोलने की आवाज आई.

पीछे का दरवाजा खोल कर देखा, माली का 10-12 वर्ष का बेटा, सब्जी की क्यारी में पानी डाल रहा था. मैं ने उसे इशारे से बुलाया और कहा, ‘‘सरजू, कमोड सीट के अंदर 2 हजार रुपए का नोट गिर गया है. निकाल लो, अपने लिए कपड़ा वगैरह सिला लेना.’’ छोटा बच्चा लालच में आ गया और कमोड सीट में तुरंत हाथ डाल दिया.

एक मिनट बाद उस ने कहा, ‘‘भाभीजी, एक मोटी चूड़ी है, रुपया

तो नहीं है.’’ मैं ने झट से कहा,

‘‘सरजू, चूड़ी निकाल लो, रुपया भी

मिल जाएगा.’’ उस ने तुरंत कंगन

निकाल दिया.

मैं खुशी से उछल पड़ी, किंतु खुशी छिपाते हुए बोली, ‘‘सरजू, लगता है रुपया बह गया. तुम हाथ निकाल लो, मैं तुझे रुपए दूंगी, मिठाई, खिलौने आदि खरीद लेना और किसी से कहना नहीं.’’ रुपए पा कर सरजू खुशी से चला गया.

पुष्पा श्रीवास्तव

मुझ में और मेरे भैया में बचपन से ही बहुत प्यार है, पर हम झगड़ते भी बहुत हैं. कुछ दिनों पहले की बात है जब मैं कालेज से घर वापस आ रही थी. मेरे मैट्रो कार्ड में पैसे नहीं थे तो मैं ने भैया को फोन किया कि कार्ड रिचार्ज करा दें. उन्होंने फोन उठाते ही मुझे गुस्से से डांट दिया.

यह सुन कर मैं ने तय कर लिया कि आज के बाद भैया से कभी बात नहीं करूंगी. आधे घंटे बाद भैया का फोन आया और उन्होंने कहा, ‘‘सौरी, मैं गुस्से में था.’’ यह सुन कर मेरा सारा गुस्सा पानी हो गया.

लोकसभा चुनाव 2019: अपने ही बिछाए जाल में फंस रहे सटोरिये

ऐसा शायद सट्टे के ज्ञात इतिहास में पहली बार हो रहा है कि खाईबाजों की नींद उडी हुई है. यहां बात चुनावी सट्टे की जा रही है जिसमें सटोरिये गच्चा खा गए हैं और जैसे-तैसे संभावित नुकसान की भरपाई करने चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस बात पर पैसा लगाएं कि इस बार भी भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें मिल रही हैं और एनडीए आखिरकार फिर से सरकार बना ले जाएगा. इस बाबत सट्टा सिटी के नाम से मशहूर इंदौर सहित पूरे देश भर के सटोरिये जी जान से जुटे हुये भी हैं.

गड़बड़झाला समझने के लिए साल की शुरुआत पर नजर डाला जाना जरूरी है, जब हर कोई यह मान कर चल रहा था कि भाजपा इस बार भी बहुमत में आ जाएगी तब इक्का दुक्का लोग ही चुनाव पर सट्टा लगा रहे थे क्योंकि चुनावी परिदृश्य लगभग स्पष्ट था, लेकिन जैसे ही चुनाव की तारीखों का ऐलान हुआ तो सट्टा बाजार भी गुलजार हो उठा. सबसे ज्यादा दांव भाजपा और एनडीए के बहुमत पर ही लगे जिसका भाव तब सबसे कम था. चुनावी सट्टे में जिसका भाव सबसे कम होता है उसके जीतने के चांस उतने ही ज्यादा होते हैं. पहले दौर की वोटिंग होते होते अच्छी खासी रकम भाजपा की जीत पर लग चुकी थी.

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लेकिन तीसरे दौर की वोटिंग आते आते अचानक बाजी पलटी और चुनावी माहौल और मतदाताओं का मूड देख कर लोग भाजपा की कम सीटों पर दांव लगाने लगे. अब चूंकि बात बहुमत से हटकर भाजपा को मिलने बाली सीटों की संख्या पर आ गई थी इसलिए खाइबाज सावधान होने लगे क्योंकि वे लंबी रकम भाजपा की बहुमत बाली सरकार के नाम पर ले चुके थे और ऐसे में अगर भाजपा उम्मीद से कम सीटों पर सिमट कर रह जाती है और एनडीए भी बहुमत नहीं ला पाये तो उन्हें करोड़ों का नुकसान होना तय था. जिस भाजपा को शुरू में सट्टा बाजार आसानी से 280 सीटें देता नजर आ रहा था अब वह 180 देने में भी हिचक रहा है.

आदर्श आचार संहिता के चलते न्यूज़ चेनल्स और दूसरी एजेंसियों के चुनावी सर्वेक्षणों पर रोक लगी हुई है और अधिकांश मीडिया रिपोर्ट्स और विश्लेषण भाजपा के पक्ष में जा रहे थे इसलिए सटोरियों ने उसके नाम पर खूब पैसा बटोरा पर जैसे ही त्रिशंकु लोकसभा की सुगबुगाहट शुरू हुई तो नजारा एकदम बदल गया. हाल अब यह है कि ज़्यादातर लोग इसी बात पर दांव लगा रहे हैं कि लोकसभा त्रिशंकु होगी और एनडीए आसानी तो क्या मुश्किल से भी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है.

इस बात की पुष्टि जब खुद भाजपा नेता राम माधव और फिर शिवसेना के संजय राऊत ने कर दी तो एकदम से त्रिशंकु लोकसभा पर दांव लगना शुरू हो गए. सटोरियों को भी यह एहसास है कि इस बार का घमासान आसान नहीं है तो वे घबरा उठे क्योंकि जितना दांव त्रिशंकु लोकसभा पर लग रहा है उसी अनुपात में उनका नुकसान हो रहा है. भोपाल के एक बुकी यानि खाईबाज की मानें तो एक महीने पहले तक सौ में से नव्वे लोग भाजपा पर दांव लगा रहे थे, लेकिन अब सौ में से दस लोग भी भाजपा को बहुमत में आना नहीं मान रहे. ऐसे में भाजपा पर पहले लगाया गया पैसा तो हम हजम कर जाएंगे, लेकिन नई दिक्कत यह है कि अब हर कोई उस पर दांव नहीं लगा रहा अधिकांश लोग त्रिशंकु लोकसभा पर ही पैसा लगा रहे हैं.

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अब अगर लोकसभा त्रिशंकु आई तो सटोरियों को बड़ा भुगतान करना पड़ेगा. इंदौर के एक नामी सटोरिये ने बताया कि दिक्कत यह है कि अभी भी सट्टा बाजार में भाजपा का भाव सबसे कम है यानि उसके बहुमत में आने की संभावनाएं सबसे ज्यादा हैं तब भी लोग उस पर दांव नहीं लगा रहे, इससे हम खुद को गहरे गड्ढे में गिरता महसूस कर रहे हैं. अब होगा यह कि हमें बड़ा भुगतान उन लोगों को करना पड़ेगा जो त्रिशंकु लोकसभा और भाजपा की 200 से कम सीटों पर दांव लगा रहे हैं.

इन सटोरियों का अंदाजा लगाने का अपना एक अलग गणित होता है. मसलन प्रमुख और नामी नेताओं की रैलियों में उमड़ती भीड़, मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया के अलावा आम लोगों में हो रही चर्चा. सट्टे का भाव अब हर घंटे घट और बढ़ रहा है इसे दिलचस्प तरीके से समझने कांग्रेसी नेता सेम पित्रोदा का दिया वह बयान काफी है जिसमें उन्होने 1984 के दंगों पर कहा था कि जो हो गया सो हो गया. इस पर जैसे ही भाजपा और प्रधानमंत्री ने आक्रामक तेवर दिखाये तो भाजपा का भाव 32 पैसे  से गिरकर 28 पर आ गया. फिर जैसे ही कांग्रेस ने अपनी सफाई दी और खुद सेम पित्रोदा ने अपनी मंशा बताई तो चार घंटों में भाव फिर यथावत हो गया मानो कुछ हुआ ही न हो, लेकिन असल दिक्कत ये तात्कालिक बातें या हालात नहीं बल्कि त्रिशंकु लोकसभा की आशंका है, यह सटोरिया बताता है कि खाइबाजों को मुनाफा तभी होगा जब ज़्यादातर लोग भाजपा की बढ़ी सीटों पर दांव लगाएंगे, जो अब न के बराबर हो रहा है. इन सटोरियों ने आकर्षक छूट की तर्ज पर भाजपा का भाव गिराकर रखा है जिससे ज़्यादातर लोग उस पर पैसा लगाएं.

आमतौर पर मीडिया सटोरियों के अंदाजे और आंकड़े लेता रहा है पर पहली बार गंगा उल्टी बह रही है कि सटोरिये मीडिया से आस लगा रहे हैं और इस बाबत ख़ासी रकम भी खर्च कर रहे हैं कि वह बढ़ चढ़ कर भाजपा को आगे बताए. भोपाल का एक सटोरिया बताता है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इस बयान से भाजपा का भाव बढ़ा ही है कि उनकी पार्टी की सीटों में इस बार 55 सीटों का इजाफा हो रहा है.

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सटोरियों के मुताबिक नरेंद्र मोदी के भी चुनावी मुद्दों से हटकर बोलने से भाजपा का भाव बढ़ता है और लोग उस पर कम दांव लगाना शुरू कर देते हैं. सबसे ज्यादा दांव लोग उत्तरप्रदेश की सीटों की संख्या पर लगा रहे हैं. इंदोर के ही एक सटोरिये के मुताबिक अब कोई भी इस पर पैसा नहीं लगा रहा कि भाजपा वहां 25 से ज्यादा सीटें ले जाएगी जबकि मार्च में लोग मान रहे थे कि भाजपा 45 से 50 सीटें ले जाएगी. अब आम लोगों की नजर में सपा बसपा मिलकर 50 सीटें ले जा रहे हैं बाकी 40 में से 12- 15 कांग्रेस ले जा सकती है.

त्रिशंकु लोकसभा पर बढ़ते दांव की एक बड़ी वजह उत्तरप्रदेश भी है जिसने सटोरियों को भी मोदी और भाजपा का भजन कीर्तन करने मजबूर कर दिया है बावजूद यह जानने समझने के कि अब यह मुमकिन नहीं. सटोरिये दरअसल में अपने ही बिछाए जाल में फंसते जा रहे हैं जिन्होंने आंख बंद कर यह मान लिया था कि इस बार भाजपा और एनडीए के नाम पर तबियत से चांदी काटेंगे, लेकिन बिसात उलटती नजर आ रही है तो वे घबराए हुये भी हैं अब वे भाजपा का भाव और कम करेंगे तो भी खाई में गिरेंगे और अगर बढ़ाएंगे तो त्रिशंकु लोकसभा पर दांव खेलने बालों की तादाद बढ़ेगी जिसके भाव इन्होने पहले से ही बढ़ा रखे हैं.

Edited by- Rosy           

तनाव में होती हैं ये 6 परेशानियां

तनाव या कहें तो स्ट्रेस आज लोगों के बीच आम हो चुका है. अगर समय रहते इस समस्या को काबू नहीं किया गया तो इसके नतीजे बुरे हो सकते हैं. स्ट्रेस के कारण ना सिर्फ मानसिक अशांति होती है, बल्कि भूख, और नींद पर भी इसका असर होता है. इस खबर में हम आपको उन संकेतों के बारे में बताएंगे जिनसे आप स्ट्रेस के बारे में समझ पाएंगे.

आइए जाने उन संकेतों के बारे में…

  1. नींद ना आना

जब आप तनाव में होते हैं, नींद नहीं आती. कई बार आप सोना चाहते हैं पर आपको नींद नहीं आती. रातभर जागना, मोबाइल फोन का अत्यधिक इस्तेमाल की वजह से लोग पूरी नींद नहीं ले पाते है और इसका असर शरीर पर दिखता है.

2. चिड़चिड़ाहट

तनाव में चिड़चिड़ाहट बेहद आम है. मरीज को छोटी छोटी बातों से काफी उलझन होती है. किसी से सही तरीके से बात नहीं करते है और हर छोटी सी बात पर परेशान हो जाते हैं. अगर लंबे समय तक आपको ऐसी परेशानी हो रही है तो सतर्क हो जाइए.

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3. गैरजरूरी बातों को सोचते रहना

अगर आप लगातार गैर जरूरी बातों को सोचते रहते हैं, तो समझ जाइए कि आप तनाव में हैं. ऐसा इस लिए होता है क्योंकि इस दौरान आप बहुत ज्यादा सोचने लगते हैं, आप चीजों पर फोकस नहीं कर पातें, जिसके बाद आपके दिमाग में गैरजरूरी बातें आने लगती हैं, आपका कौंफिडेंस भी कम होने लगता है.

4. वजन का बढ़ना

जब आप ज्यादा तनाव में होते हैं, आपके हार्मोंस पर असर पड़ता है. इसका ये नतीजा ये होता है कि वजन बढ़ने लगता है.

5. सख्त होने लगते हैं मसल्स और ज्वाइंट्स

अक्सर ज्यादा स्ट्रेस लेने से कंधों में, जोड़ो में परेशानी होने लगती है. कभी कभी सर से ले कर पांव में एंठन होती है. ये सब ज्यादा तनाव के कारण होता है.

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6. पेट में दर्द और जलन

अगर आप ज्यादा बाथरूम जाते हैं. चिंता और तनाव की वजह से होता है कि आपको बार बार बाथरुम का चक्‍कर लगाना पड़ता है. पेट में दर्द होना और हार्ट बर्न होना भी इसकी समस्‍या है.

हर घंटे दिलचस्प हो रही भोपाल की जंग

भोपाल लोकसभा सीट भाजपा का कितना बड़ा गढ़ है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है  कि 2014 के लोकसभा चुनाव में अंजान से आलोक संजर भी मोदी लहर पर सवार होकर दिल्ली पहुंच गए थे. तब उन्होने कांग्रेसी दिग्गज पीसी शर्मा को कोई पौने चार लाख वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी थी. इस चुनाव में लड़ाई पहले की तरह एकतरफा नहीं रह गई है क्योंकि कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पर दांव खेला है जिनके सामने भाजपा की तरफ से मालेगांव बम ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा भारती हैं. इन दोनों की जंग ने भोपाल सीट को देश भर की टौप 5 हौट सीटों में शुमार कर दिया है .

यह सोचना बेमानी है कि भोपाल में चुनाव किन्हीं राष्ट्रीय या स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जा रहा है. शायद ही नहीं बल्कि तय है कि चुनाव शुद्ध धर्म और असली नकली हिन्दुत्व के आधार पर लड़ा जा रहा है. चुनाव प्रचार थमने के पहले तक भोपाल में साधु संतों का जमावड़ा  देख लोग हैरान थे. नजारा किसी मिनी कुम्भ से कम नजर नहीं आ रहा था. दिग्विजय सिंह की तरफ से हजारों अधनंगे साधु संत धुनी रमाए उन्हें जिताने न केवल हठ योग कर रहे थे बल्कि उनके समर्थन में उन्होने रोड शो भी किया. प्रज्ञा भारती भला क्यों ढोंग पाखंडों की इस नुमाइश में पीछे रहतीं लिहाजा उन्होने भी भंडारे और साधु संतों के साथ सुंदर कांड के आयोजन कर डाले.

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दोनों ही उम्मीदवार धार्मिक तौर पर एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में इस तरह जुटे हैं मानो सांसद नहीं बल्कि महामंडलेश्वर या शंकराचार्य बनने जा रहे हों. ये दोनों चुनाव प्रचार और जन संपर्क के दौरान जहां भी मंदिर दिख जाता है वहीं दंडवत हो जाते हैं तो पहले तो लोगों को हंसी आती है फिर तरस आता है और फिर कोफ्त होने लगती है कि जब इन्हीं में से किसी को चुनना है तो इससे तो बेहतर है कि भोपाल सांसद विहीन ही रह जाये.

कट्टर हिन्दुत्व की पैरोकार प्रज्ञा भारती कितनी मुंहफट हैं यह तो उनकी उम्मीदवारी के साथ ही उजागर हो गया था जब उन्होने शहीद हेमंत करकरे की मौत पर विवादित बयान दे डाला था.  उलट इसके दिग्विजय सिंह संभल कर बोल और चल रहे हैं लेकिन धार्मिक दिखावे से खुद को रोक नहीं पा रहे हैं और घर घर नर्मदा नदी का जल भिजवा रहे हैं. चूंकि उनकी उम्मीदवारी की घोषणा एक महीने पहले हो गई थी इसलिए चुनाव प्रचार में जरूर प्रज्ञा भारती और भाजपा पिछड़ गए हैं लेकिन इससे कोई खास फर्क धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक समीकरणों पर नहीं पड़ा है सिवाय इसके कि कांग्रेस लड़ाई में बराबरी से दिखने लगी है.

चुनाव प्रचार में भाजपा दिग्विजय सिंह को हिन्दुत्व का दुश्मन बता रही है तो दिग्विजय खुद को सनातनी हिन्दू कह रहे हैं और खुद को सच्चा हिन्दू दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं. भाजपा प्रज्ञा भारती की हिरासत के दौरान उन्हें दी गई कथित प्रताड़नाओ का भी जिम्मेदार दिग्विजय सिंह ठहराते यह प्रचार भी कर रही है कि हिन्दू और भगवा आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने बाले दिग्विजय सिंह दरअसल में शैतान हैं और अब साध्वी का न्याय भोपाल की जनता को करना है.

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दिग्विजय सिंह निश्चित ही खुद को हिन्दू प्रदर्शित करने के चक्कर में गड़बड़ा गए हैं जो उन्होने हजारों साधु संतों और विवादित और चर्चित कंप्यूटर बाबा का सहारा लिया जो कभी पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के उतने ही खासमखास हुआ करते थे जितना अब दिग्विजय सिंह के हैं . विधानसभा चुनाव में उन्होने भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार भी किया था और अब भी कर रहे हैं. जहर से जहर उतारने की कहावत पर अमल कर रहे दिग्विजय सिंह को साधुओं द्वारा किया जा रहा चुनाव प्रचार महंगा भी पड़ सकता है क्योंकि इस बेवजह की नुमाइश से मुस्लिम और दलित मतदाता नाखुश है. दिग्विजय सिंह की मंशा दरअसल में ऊंची जाति बाले हिंदुओं को गांठने की थी जिनकी तादाद तकरीवन 8 लाख है इनमें भी ब्राह्मण और कायस्थ ज्यादा हैं जो भाजपा का परम्परागत वोट बैंक है.

इस बैंक में अधनंगे फक्कड़ से दिखने बाले बाबाओं के जरिये वे डाका डालना तो दूर की बात है. सेंधमारी भी कर पाएंगे ऐसा लग नहीं रहा, क्योंकि ऊंची जाति बाले हिंदुओं की निगाह में असली बाबा या साधु संत वही होता है जो वेद पुराण बांचे, गेरुए कपड़े पहने और आलीशान मठों में रहे. दिग्विजय सिंह को हालांकि शंकराचार्य स्वरूपानन्द का समर्थन और खुला आशीर्वाद मिला हुआ है लेकिन उनकी गिनती कांग्रेसी खेमे में होती है और भोपाल में वे बहुत ज्यादा प्रभावी भी नहीं हैं.

दिग्विजय सिंह क्यों हिन्दू होने का दिखावा अतिशयोक्ति की हद से भी परे कर रहे हैं इस सवाल का सीधा जबाब यह है कि यह वोटों का गणित है. भोपाल के लगभग साढ़े उन्नीस लाख वोटर्स में से मुस्लिम वोटरों की तादाद लगभग साढ़े चार लाख है जिनका थोक में कांग्रेस के खाते में जाना हर कोई तय मान रहा है. अनुभवी दिग्विजय सिंह की कोशिश यह है कि बचे 15 लाख हिन्दू वोटर्स में से अगर 3-4 लाख भी वे ले जा पाएं तो जीत उनकी झोली में होगी.

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पूरा प्रचार इसी समीकरण के इर्द गिर्द सिमट कर रह जाना भले ही लोकतन्त्र के लिहाज से दुर्भाग्य की बात हो लेकिन तय यह भी है कि अब मतदान प्रतिशत ही तय करेगा कि इन दोनों के देवी देवताओं ने किस पर कृपा बरसाई. भोपाल ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश और देश भर के राजनैतिक विश्लेषकों सहित सटोरियों की निगाहें भी कल होने बाले मतदान प्रतिशत पर टिकी हैं. माना यह जा रहा कि पौने चार लाख मुस्लिम वोट करने घरों से निकलेंगे यानि दिलचस्पी सिर्फ इस बात में आखिरी क्षणों में रह गई है  कि कितने हिन्दू वोट देने चिलचिलाती गर्मी में बूथ तक पहुंचेगे. अगर मुस्लिम वोट रमजान के महीने के चलते 3 लाख के लगभग पड़ा तो कोई भगवान दिग्विजय सिंह के लिए कुछ नहीं कर पाएगा. भाजपा और आरएसएस पूरी कोशिश कर रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा हिन्दू वोट करें जिससे प्रज्ञा भारती की जीत सुनिश्चित हो. भाजपा खेमे का आकलन है कि कम से कम 11 लाख हिन्दू वोट देने जाएंगे इनमें से अगर 8 लाख भी उसे मिले तो दिग्विजय सिंह 7 लाख के लगभग सिमट कर रह जाएंगे और प्रज्ञा भारती मामूली अंतर से ही सही जीत जाएंगी. यानि हिन्दू वोटों का जितना ज्यादा और  कुल मत प्रतिशत 60 से जितना ज्यादा रहेगा उतना ही उसे फायदा होगा.

अब देखना दिलचस्प होगा कि भोपाल में कितने फीसदी वोटिंग होगी. खुद को मजबूत करने भाजपा दिग्विजय सिंह के कार्यकाल की नाकामियां भी गिना रही है कि उस दौरान कर्मचारियों के साथ उन्होने ज़्यादतियां की थीं और एक वक्त में यह तक कह दिया था कि उन्हें सवर्ण वोट नहीं चाहिए. इसमें कोई शक नहीं कि दिग्विजय सिंह के रहते मध्यप्रदेश कराह उठा था जिसके चलते कांग्रेस बमुश्किल 2018 में सत्ता में वापसी कर पाई. उनकी बिगड़ी इमेज के चलते ही राहुल गांधी ने उन्हें विधानसभा चुनाव प्रचार से दूर रखा था और चुनावी कमान दो दिग्गजों कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंप दी थी जिसका फायदा भी कांग्रेस को मिला था. इस चुनाव में राहुल गांधी भोपाल प्रचार के लिए नहीं आए और सिंधिया – नाथ खेमे भी दूरी बनाए हुये हैं तो इसे दिग्विजय सिंह का राजनतिक केरियर खत्म करने की चाल के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि उनका गुट तितर बितर होने के बाद भी सबसे मजबूत है.

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उधर भाजपाई भी प्रज्ञा भारती के प्रचार में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं इस स्थिति को संभालने अमित शाह ने रोड शो किया था जिसका रिस्पांस देख भाजपा खेमे में थोड़ा ही सही उत्साह तो है. दिग्विजय सिंह का प्रचार करने देश भर से कांग्रेसी दिग्गज आए जरूर लेकिन वे ज्यादा प्रभावी नहीं रहे और उन्हें कांग्रेस की मीडिया प्रभारी शोभा ओझा घेरे रहीं जो राहुल गांधी की खासमखास हैं. तमाम बाधाओं और अड़ंगों की बाद भी दिग्विजय सिर्फ अपनी मेहनत और दम पर मुक़ाबले को लगभग बराबरी पर ले तो आए हैं लेकिन इसमें वे कितने सफल हुये यह तो 23 मई को पता चलेगा लेकिन इसकी झलक कल मतदान के प्रतिशत से भी समझ आएगी.

Edited By – Neelesh Singh Sisodia 

ऐसे बनाएं स्‍वादिष्‍ट पनीर का भरवां पराठा

सामग्री :

– गेहूं का आटा (300 ग्राम)

– पनीर (200 ग्राम)

– हरी मिर्च ( बारीक कतरी हुई)

– हरा धनिया  (बारीक कतरा हुआ)

– अदरक (कद्दूकस किया हुआ)

– धनिया पाउडर (01 छोटा चम्मच)

– लाल मिर्च पाउड (1/4 छोटा चम्मच)

– घी (तलने के लिए)

– नमक ( स्वादानुसार)

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पनीर पराठा बनाने की विधि :

– सबसे पहले आटे को एक बड़े बर्तन में छान लें.

– अब आटा में 2 छोटे चम्मच तेल और आधा छोटा चम्मच नमक डालें.

– फिर इसे गुनगुने पानी से गूथ लें.

– गुथा हुआ आटा थोड़ा नरम रहना चाहिए.

– अब पनीर को कद्दूकस कर लें.

– इसके बाद पनीर में कटी हुई हरी मिर्च, हरी धनिया, कद्दूकस की हुई अदरक, धनिया पाउडर, लाल मिर्च   पाउडर और नमक मिला लें और इसे अच्छी तरह से मिक्स कर लें.

– अब पराठे की भरावन तैयार है.

– गैस पर तवे  को गरम करें.

– जब तक तवा गरम हो रहा है, थोड़ा सा आटा लेकर उसकी लोई बना लें.

– फिर लोई को चपटा करके उसके ऊपर दो चम्मच भरावन रखें और भरावन को बंद करके लोई को पराठे   के आकार में बेल लें.

– तवा गरम होने पर पराठे को तवे पर डालें और उलट-पलट कर हल्का-हल्का सेंक लें.

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– इसके बाद पराठे के दोनों ओर घी लगायें और उलट-पलट कर सुनहरा भूरा होने तक सेंक लें.

– पराठे को सेंकने के बाद नैपकिन पेपर पर रख दें. इसी तरह से सारे पराठे सेंक लें.

– अब आपका स्‍वादिष्‍ट पनीर का भरवां पराठा तैयार है.

परवरिश

दबंग स्वभाव की वजह से मानसी ने अपने बेटे अक्षत पर बचपन से ही कड़ा नियंत्रण रखा. जबकि सुजाता ने अपने बेटे राहुल को अनुशासन में रखा लेकिन किसी बंधन में नहीं बांधा.

मानसी दीदी की चिट्ठी मिलते ही मैं एक ही सांस में पूरी चिट्ठी पढ़ गई. चिट्ठी पढ़ कर दो बूंद आंसू मेरे गालों पर लुढ़क गए. मानसी दीदी के हिस्से में भी कभी सुख नहीं रहा. कुछ दुख उन्हें उन के हिस्से के मिले, कुछ कर्मों से और कुछ स्वभाव से. इन तीनों में से कुछ भी यदि उन का ठीक होता तो शायद उन्हें इतने दुख नहीं भुगतने पड़ते. दीदी के बारे में सोचती मैं अतीत में खो सी गई.

हम दोनों बहनें मातापिता की लाड़ली थीं. पिता ने हमें ही बेटा मान हमारे लालनपालन व शिक्षादीक्षा में कोई कमी नहीं रखी. दीदी सुंदरता में मां पर व स्वभाव से पापा पर गई थीं. वह दबंग व उग्र स्वभाव की थीं. वह दूसरे के अनुसार ढलने के बजाय दूसरे को अपने अनुसार ढालने में विश्वास रखती थीं. परिस्थितियों के अनुसार ढलने के बजाय परिस्थितियों को अपने अनुसार ढाल लेती थीं. यह उन का स्वभाव भी था और इस की उन में क्षमता भी थी.

इस के विपरीत मेरा स्वभाव मां पर व शक्लसूरत पापा पर गई थी. मैं देखने में ठीकठाक थी. शालीन व लुभावना सा व्यक्तित्व था. हर एक के साथ समझौता करने वाला लगभग शांत स्वभाव था. जब तक बहुत परेशानी न हो तब तक मैं खुश ही रहती थी. हर तरह की परिस्थिति के साथ समझौता करना जानती थी. मेरे स्वभाव में दबंगता तो नहीं थी पर मैं दब्बू स्वभाव की भी नहीं थी.

दीदी का दबंग स्वभाव सब को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता. जो करे उन की मन की करे. जो उन को ठीक लगे वह करे. विवाह के बाद भी पति व बच्चों पर उन का ही शासन रहा. यहां तक कि सासससुर ने भी उन की ही सुनी. किसी की क्या मजाल कि कोई उन की इच्छा के विपरीत घर में कुछ कर दे.

‘दीदी, इतना मत दबाया करो सब को, बच्चों पर इतनी अधिक बंदिश रखना ठीक नहीं है…’ मैं अकसर दीदी को समझाने का प्रयास करती.

‘तू अपनी समझ अपने पास रख…जैसे तू ने खुल्ला छोड़ा हुआ है बच्चों को…मेरे दोनों बच्चे, मजाल है मेरे सामने जोर से हंस भी दें…कितने आज्ञाकारी बच्चे हैं…मेरे ही नियंत्रण का फल है…वरना इन के पापा तो इन को बिगाड़ कर रख देते,’ दीदी बडे़ गर्व से कहतीं.

‘दीदी, आप के बच्चे आज्ञाकारी नहीं बल्कि डरते हैं आप से. आज्ञा प्यार से मानें बच्चे, तब तो ठीक लेकिन यदि वे डर कर मानें, तो जिस दिन वे आत्मनिर्भर हो जाएंगे आप की सुनेंगे भी नहीं,’ मैं दलील देती तो दीदी मुझे जोर से झिड़क देतीं.

दीदी के इस दबंग रूप को अगर सकारात्मक पहलू से देखा जाए तो पूरी गृहस्थी का भार उन के ही कंधों पर था. जीजाजी अकसर बीमार रहते थे. उन्हें दिल की बीमारी थी. किसी तरह वह नौकरी कर लेते थे बस, बाकी समस्याएं दीदी के जिम्मे थीं.

दीदी हिम्मत वाली थीं. हर मुश्किल का सामना वह किसी तरह कर लेती थीं. इसीलिए जीजाजी बीमार होने के बावजूद थोड़ा जी गए, लेकिन बीमार दिल के साथ आखिर वह कितने दिन जी पाते. एक दिन परिवार को आधाअधूरा छोड़ वह इस दुनिया से कूच कर गए. दीदी की हिम्मत ने परिवार की पतवार फिर से चलानी शुरू कर दी. उन्होंने बेटी की पढ़ाई छुड़वा कर उस के लिए लड़का देखना शुरू कर दिया.

‘दीदी, आमना पढ़ने में तेज है, उस की इतनी जल्दी शादी क्यों कर रही हो…उसे पढ़ने दो,’ मैं बोली.

‘तू अपनी गृहस्थी के बारे में सोच, सुजाता. मेरी बेटी मेरी जिम्मेदारी है,’ उन्होंने मुझे दोटूक जवाब दे दिया. दीदी न किसी की सुनती थीं, न किसी की मानती थीं. आमना भी बहुत रोई, गिड़गिड़ाई, बेटे ने भी बहुत कहा पर दीदी ने बी.काम. खत्म करते ही उस का विवाह कर दिया.

अपनी सफलता पर दीदी बहुत खुश थीं कि उन्होंने अकेले होते हुए भी बेटी का विवाह कर दिया और बेटी ने चूं भी नहीं की. आमना को खुश देख कर मैं ने भी अपने दिल को समझा लिया. हालांकि उस के सपनों की कोंपलों को झुलसते हुए मैं ने साफ महसूस किया था.

दीदी कभीकभी बच्चों के साथ हमारे घर रहने आ जाती थीं. उन का बेटा अक्षत इतना आज्ञाकारी था कि उन दिनों मुझे अपना राहुल कुछ ज्यादा ही बिगड़ा हुआ और उद्दंड दिखाई देता. उन दोनों मांबेटे में मैंने कभी बहस होते नहीं देखी. मांबेटे के बीच झगड़ा तो दूर की बात थी, जबकि मेरे और मेरे बेटे के बीच बिना कारण हमेशा ठनी ही रहती. मेरे बेटे को मुझ में कमी ही कमी दिखाई देती.

दीदी अकसर मुझे टोकतीं, ‘तू राहुल पर थोड़ी सख्ती रखा कर सुजाता, अभी से ऐसा लड़ता है तुझ से तो बड़ा हो कर क्या करेगा? तेरी जगह पर मैं होती तो थप्पड़ लगा देती.’

‘इतने बड़े बच्चे थप्पड़ से कहां काबू होते हैं, दीदी…किशोरावस्था से गुजर रहे हैं बच्चे इस समय, थोड़ीबहुत समस्याएं तो होती ही हैं उन के साथ इस दौर में,’ मैं दीदी से बात करते हुए बीच का रास्ता अपनाती.

‘नहीं, जैसे हम तो इस दौर से कभी गुजरे ही नहीं थे,’ दीदी तुनक कर कहतीं. मैं कैसे कहती कि मैं ने तो मां के साथ झगड़ा नहीं भी किया होगा पर तुम तो हमेशा झगड़ती थीं.

दीदी के बेटे अक्षत ने इंजीनियरिंग के बाद एम.बी.ए. किया और प्रतिष्ठित कंपनी में उसे जौब मिल गई. दीदी बहुत खुश थीं. उन को देख कर हम सभी खुश थे. अक्षत को देख कर दिल खुश हो जाता. अक्षत खूबसूरत, स्मार्ट, आज्ञाकारी, नम्र स्वभाव का प्रतिष्ठित कंपनी में कार्यरत युवक था. उसे देख कर कोई भी रश्क कर सकता था. एक से एक लड़कियों के रिश्ते उस के लिए आते. दीदी खुद ही सब जगह बात करतीं.

दीदी से कई बार कहा भी मैं ने, ‘दीदी हर किसी पर अंधा भरोसा मत किया करो…जिस ने भी रिश्ता बताया, आप सोचती हो अक्षत पसंद कर ले…बस, हां बोल दे.’

‘तो और क्या देखना है, सबकुछ तो बायोडाटा में लिखा रहता है. शक्ल अक्षत देख ही लेता है, मैं अधिक प्रपंच में नहीं पड़ती.’

आखिर दीदी ने अक्षत का रिश्ता तय कर ही दिया. अक्षत के विवाह की तैयारियां होने लगीं. विवाह हुआ, सुंदर, सलोनी सी बहू घर आई तो सभी खुश थे कि आखिर दीदी ने अपने बच्चों की लाइफ सेटल कर ही दी.

मेरा राहुल, अक्षत से डेढ़ साल ही छोटा है. उस के नौकरी पर लगते ही मैं ने भी शादी के लिए उस के दिमाग के पेंच कसने शुरू कर दिए, ‘अभी कैसे शादी कर सकता हूं मम्मी…पैसे भी तो चाहिए, इतने कम में कैसे गुजारा होगा.’ उस का जवाब सुन कर  मैं हतप्रभ रह गई. आखिर प्रतिष्ठित कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत मेरे बेटे के पास गृहस्थी बसाने के लिए पैसे कब होंगे?

नौकरी पर लग जाने के बाद भी मेरे बेटे व मुझ में किसी न किसी बात पर ठन ही जाती. जब घर आता तब आने के कुछ दिन तक और जाने के कुछ दिन पहले तक हमारे बीच में कुछ ठीक रहता. बाकी दिन किसी न किसी कारण से हम मांबेटे के बीच अनबन चलती रहती. शादी के लिए हां बोलने में भी उस ने मुझे बहुत परेशान किया.

उस के पापा ने एक दिन उसे खूब जोर की डांट लगा दी, ‘राहुल, यदि तुम अभी शादी के लिए हां नहीं बोलोगे तो तुम्हारी शादी करने की हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं, तब तुम खुद ही कर लेना…बच्चों की शादी करना मातापिता की जिम्मेदारी है और हम तुम्हारी शादी कर के अपनी जिम्मेदारी से फारिग होना चाहते हैं.’

तब जा कर उस ने मौन स्वीकृति दी और रहस्योद्घाटन किया कि उसे एक लड़की पसंद है और वह उसी से शादी करेगा. उस के रहस्योद्घाटन से बचीखुची आशा भी टूट गई. ऐसे लगा जैसे बेटे ने हम से मांबाप होने का हक भी छीन लिया. मैं ने कुछ समय तक बेटे से बात भी नहीं की. किसी तरह मौन रह कर मैं अपने दुख पीती रही और खुद को आने वाली परिस्थितियों के लिए तैयार करती रही.

दीदी की बहू को देखती तो दिल में एक हूक सी उठती. काश, राहुल ने भी लड़की ढूंढ़ने का काम मुझ पर छोड़ा होता. छांट कर खानदानी बहू ढूंढ़ती. आखिर रिश्तेदारी भी कोई चीज होती है. संबंधी भी तो अच्छे होने चाहिए. मातापिता अच्छे होते हैं तभी तो लड़की में अच्छे संस्कार आते हैं.

लेकिन जब राहुल से कहा तो तुरंत  जवाब मिल गया, ‘ये पुराने जमाने की घिसीपिटी बातें मत करो मुझ से. जिस लड़की से हम थोड़ी देर के लिए मिलते हैं उस के बारे में हम क्या जानते हैं और जिस को मैं ने पसंद किया है उसे मैं पिछले 4 साल से जानता हूं. नियोनिका अच्छी लड़की है मां और वैसे भी, परिवार और बीवी में संतुलन रखने का काम तो लड़के का है, और वह मुझे अच्छी तरह से आता है.’

दिल किया कि कहूं, तू तो मां और अपने बीच ही संतुलन नहीं रख पाया, कितनी लड़ाई करता है. अब बीवी और परिवार के बीच तू क्या संतुलन रखेगा? फिर भी उस तुनकमिजाज लड़के से ऐसी गंभीर बात सुन कर कुछ अच्छा सा लगा.

उधर, बहू के आने के बाद दीदी व्यस्त हो गईं. उन के उत्साह की कोई सीमा नहीं थी. हम सभी खुश थे. जीजाजी के जाने के बाद उदासी व गम में डूबी दीदी को जिंदगी जीने का खूबसूरत बहाना मिल गया था. लेकिन कुछ समय बाद ही उन का उत्साह कुछ कम होने लगा. फोन पर भी उन की बातें गमगीन होने लगीं. उत्साह की जगह चुप्पी व उच्छ्वासों ने ले ली. मैं बहू के बारे में कोई बात करती तो अकसर टाल जातीं. जिस बेटे की तारीफ करते दीदी की जबान नहीं थकती थी, उस के बारे में बात करने पर दीदी अकसर टाल जातीं.

मुझे कारण समझ में नहीं आ रहा था. बेटा तो दीदी का हमेशा से ही आज्ञाकारी था. बहू भी ठीक ही लगती थी. मिलना ही कितना होता था उस से. फिर भी जितना देखा चुलबुली सी लगी थी. पता नहीं दीदी को क्या दुख खाए जा रहा है. जीजाजी के जाने का दुख तो खैर अपनी जगह पर है ही. पर 2 साल हो गए हैं उन को गए हुए. दीदी कभी इतनी गमगीन नहीं दिखीं.

इन से कहा तो बोले, ‘तुम दीदी को उन के हाल पर छोड़ दो, उन का अब एक परिवार है, तुम बेकार बात में अपनी टांग मत अड़ाओ. दीदी को हमेशा अपनी मर्जी की आदत रही है. अब बहू आ गई है, बेटेबहू की अपनी जिंदगी है, हो सकता है अब उन्हें अकेलापन महसूस हो रहा हो?’

हो सकता है यही कारण हो. मैं ने अपने मन को समझा लिया, हो सकता है बहू के आने से थोड़ाबहुत अनदेखा महसूस कर रही हों. मेरे बेटे ने तो लड़की पसंद कर ही ली थी, ना की गुंजाइश ही कहां थी. मैं भी अपना मन पक्का कर शादी की तैयारियों में जुट गई. शादी की तैयारी करतेकरते उदासी का स्थान आखिर उत्साह ने ले ही लिया, मैं भी भूल गई कि बेटा अपनी मर्जी से ब्याह कर रहा है.

शादी में दीदी भी परिवार सहित आईं. दीदी की बहू में अब नई बहू का सा छुईमुईपन नहीं था. आखिर वह भी अब 1 साल के बेटे की मां बन चुकी थी. अक्षत भी पहले की तरह मां की हां में हां मिलाते नहीं दिखा, बल्कि मां से बातबात पर टोकाटाकी करता व तिरस्कार करता सा दिखा. मुझे आश्चर्य व दुख हुआ, जब बेटा ही मां से इस भाषा में बात करता है, मां की कमियां गिनाता रहता है तो बहू से क्या उम्मीद कर सकते हैं.

मुझे अपनी भी चिंता हो आई. मेरा बेटा तो हमेशा लड़ाई में ही बात करता है. अब बहू के सामने भी ऐसे ही बोलेगा तो दूसरी जाति की वह अनजानी लड़की, जिस का मैं ने इस घर में आने का विरोध भी किया था, मेरी क्या इज्जत करेगी? सासससुर को क्या मानेगी?

खैर, विवाह संपन्न हुआ और मेरे बेटेबहू हनीमून पर चले गए. दीदी 1-2 दिन रुकना भी चाह रही थीं पर अक्षत बिलकुल नहीं माना, शायद उस को अपने 1 साल के बच्चे की देखभाल की चिंता थी. मैं ने भी बहुत कहा पर अक्षत का रवैया तो हमारे प्रति भी पराया सा हो गया था.

‘दीदी, राहुल और नियोनिका हनीमून से लौट आएं तब मैं आऊंगी इस बार आप के पास…’

‘अच्छा…’ दीदी खास उत्साहित नहीं दिखीं. मेरे कुछ दिन शादी के बाद के कार्य निबटाने में बीत गए. लगभग 10 दिन बाद राहुल और नियोनिका वापस आ गए. घर आ कर भी वे अत्यधिक व्यस्त थे. आएदिन कोई न कोई उन को डिनर और लंच पर बुला लेता. उस के बाद थोडे़ दिन के लिए नियोनिका मायके चली गई और राहुल को भी मैं ने ठेलठाल कर उस के साथ भेज दिया. यही सही समय था. मैं ने इन को मुश्किल से मनाया और 2-4 दिन के लिए दीदी के पास चली गई.

अक्षत और उस की पत्नी ने मुझे खास तवज्जो नहीं दी. लगता था जैसे पहले वाला अक्षत कहीं खो गया है. दीदी अलबत्ता खुश हो गईं. इस बार मैं ने दीदी को पकड़ ही लिया.

‘दीदी, मुझे सच बताओ…क्या गम खाए जा रहा है आप को, आधी भी नहीं रह गई हो. चेहरा तो देखो अपना,’ मैं बोली.

‘कुछ नहीं…’ दीदी की आंखें भर आईं.

‘कुछ तो है, दीदी, मुझे भी नहीं बताओगी तो किसे बताओगी?’ दीदी चुप आंसू पोंछती  रहीं. मैं उन का हाथ सहलाने लगी, ‘बोलो न, दीदी.’

‘पता नहीं सुजाता, अक्षत को क्या हो गया है. बातबात पर मुझे टोकता है, मुझ पर चिल्लाता है. यों तो बात ही नहीं करता और जब बात करता है तो कड़वा ही बोलता है. बहू तो तीखी है ही, पलट कर जवाब देना उस का स्वभाव ही है…पर अक्षत भी हमेशा उस का साथ देता है. उसे मुझ में कमियां दिखाई देती हैं. कैसे दिन बिताऊं इन दोनों के साथ? मेरे सामने जोर से भी न हंसने वाला मेरा बेटा, जिस ने कभी मुझ से अलग जाने की हिम्मत नहीं की थी, आज मुझ पर अपनी बीवी के सामने इतनी जोर से चिल्लाता है कि सहन नहीं होता,’ दीदी फफकफफक कर रोने लगीं.

‘पर ऐसा क्यों करता है अक्षत?’

‘पता नहीं, पुरानीपुरानी बातें याद करकर के मुझ पर दहाड़ता रहता है. पढ़ने वाले बच्चों पर तो बंधन सभी लगाते हैं सुजाता, मैं ने क्या गलत किया?’

अक्षत का आचरण समझ में नहीं आ रहा था. बहू आखिर कितनी भी खराब क्यों न हो, तब भी क्या अक्षत का उसे समझाना जरूरी नहीं. और कम से कम अगर उस की बीवी पर नहीं चलती तो वह अपना व्यवहार तो ठीक रख सकता है मां के साथ? दीदी जो कुछ बातें बता रही थीं, लग रहा था जैसे मेरा किशोरावस्था का राहुल मेरे सामने आ खड़ा है. तब दीदी कहती थीं, ‘मैं तेरी जगह होती तो थप्पड़ लगा देती.’ क्या अब अक्षत को थप्पड़ लगा सकती हैं दीदी? क्या बहू को चुप करवा सकती हैं?

दीदी की समस्या अपनों से थी जिस में मैं कुछ नहीं कर सकती थी. अक्षत मेरी सुनने वाला भी नहीं था. फिर भी मैं ने एक बार अक्षत से बात करने की सोची. मैं   2-4 दिन वहां रही. मेरे सामने सबकुछ ठीक ही रहा. लेकिन छोटीछोटी बातों में भी मैं ने बहुत कुछ महसूस कर लिया. कच्चे पड़ते रिश्तों के धागों की तिड़कन, रिश्तों में आता ठंडापन, बहुत कुछ.

एक दिन मैं ने अक्षत को मौका देख कर पास बुलाया, ‘कुछ कहना चाहती हूं अक्षत तुम से.’

‘कहिए, मौसी…’ अक्षत ने बिना किसी लागलपेट के नितांत लापरवाही से कहा.

‘कुछ निजी सवाल करूंगी…बुरा तो नहीं मानोगे?’ मैं अंदर से थोड़ा घबरा भी रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि होम करते हाथ जल जाएं.

‘क्या…’ अक्षत की प्रश्न भरी नजरें मेरे चेहरे पर टिक गईं. मेरी समझ में नहीं आया, कहां से बात शुरू करूं, ‘क्या कुछ ठीक नहीं चल रहा है घर में?’ मेरे मुंह से फिसल गया.

‘क्या ठीक नहीं चल रहा है…’ अक्षत की त्यौरियां चढ़ गईं.

‘अपनी मां को नहीं जानते, अक्षत, दीदी अपने जीवन की कमियों के बारे में बात भी करती हैं कभी, वह तो हमेशा ही अपनेआप को संपूर्ण दिखाना चाहती हैं.’

‘हां, चाहे उस के लिए घर वालों को कितनी भी घुटन क्यों न हो?’

‘कैसी बात करते हो अक्षत…तुम अपनी मां के बारे में बात कर रहे हो…’

‘जानता हूं, मौसी…जीवन भर मां सब पर हुक्म चलाती रहीं…अब मां चाहती हैं कि बहूबेटे की गृहस्थी भी उन के अनुसार ही चले, बहू को भी वह वैसे ही अंकुश में रखें जैसे हम सब को रखती थीं…उन की किसी के साथ बन ही नहीं सकती,’ अक्षत गुस्से में बोला.

‘अक्षत, क्या मैं दीदी को नहीं जानती, कितना संघर्ष किया है उन्होेंने जीवन में, सभी नातेरिश्ते भी निभाए, तुम्हारे पापा को भी देखा, तुम्हें उन के संघर्ष  को समझना चाहिए. यह नहीं कि बीवी ने कुछ बोला और तुम ने आंख मूंद कर विश्वास कर लिया,’ मैं हिम्मत कर के कह गई.

‘मैं इस बारे में अधिक बहस नहीं करना चाहता, मौसी, और मैं आंख मूंद कर क्यों विश्वास करूंगा? क्या मैं मां का स्वभाव नहीं जानता…’ कह कर अक्षत उठ गया.

अक्षत चला गया लेकिन मेरे दिल में एक सूनापन छोड़ गया. अक्षत का व्यवहार देख कर मैं ने राहुल और नियोनिका की तरफ से अपना मन और भी मजबूत कर लिया. कैसा बदल जाता है बेटा शादी के बाद…और मेरा बेटा तो पहले से ही बदला बदलाया है. बस, अंतर इतना है कि दीदी के साथ जीजाजी का साथ नहीं है.

‘दीदी, कुछ दिन मेरे पास रहने आ जाओ…’ मैं ने आते समय दीदी को गले लगा कर सांत्वना दी. उन के घाव पर तो मरहम भी काम नहीं कर रहा था, क्योंकि घाव अपनों ने दिए थे. परायों का मरहम क्या काम करता.

घर पहुंची तो 2 दिन घर ठीकठाक करने में लग गए. अगले दिन राहुल व नियोनिका वापस लौट आए. मैं अनायास ही राहुल के व्यवहार में अक्षत को ढूंढ़ने लग गई, लेकिन अभी तो राहुल ही बदला हुआ नजर आ रहा था. पता नहीं कितने दिन का है यह बदलाव.

मुझ से हर बात पर लड़ने और विद्रोह करने वाला राहुल, बीवी के सामने अचानक इतना आज्ञाकारी कैसे हो गया. राहुल मुझ से और अपने पापा से प्यार और इज्जत से बात करता. नियोनिका नई लड़की थी, जैसा राहुल को देखती वैसा ही करती.

मैं शाम की चाय बना रही थी. राहुल और नियोनिका लान में बैठे थे. तब तक उस के पापा लान में चले गए. एक कुर्सी खाली पड़ी थी फिर भी राहुल ने उठ कर पापा की तरफ अपनी कुर्सी बढ़ा दी. मैं अंदर से देख रही थी. चाय की ट्रे ले कर मैं बाहर आ गई. राहुल की ही तरह नियोनिका ने भी उठ कर मेरी तरफ अपनी कुर्सी बढ़ा दी. राहुल ने उठ कर मेरे हाथ से चाय की ट्रे ले ली.

कहीं अंदर तक मन भीग गया. बात बड़ी छोटी सी थी पर अपने राहुल से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं की थी. नौकरी के बाद उस में थोड़ाबहुत बदलाव आया तो था लेकिन विवाह के बाद? दीदी कहती हैं, अक्षत अब वह अक्षत नहीं रहा और इधर राहुल भी वह राहुल नहीं रहा है. बदलाव तो दोनों में आया पर एकदूसरे के विपरीत, ऐसा क्यों? तभी राहुल मुझे कंधों से पकड़ कर बिठाता हुआ बोला.

‘बहुत कर लिया मम्मी, आप ने काम…अब अपनी जिम्मेदारी नियोनिका को दो और आप तो बस, इस की मदद करो. और बैठ कर राज करो. पापा के साथ ज्यादा वक्त बिताओ, घूमने जाओ. एक समय होता है जब मातापिता बच्चों के लिए करते हैं…फिर एक समय आता है जब बच्चे मातापिता के लिए करते हैं. आप दोनों ने बहुत किया, अब हमारा समय है,’ मैं अपलक राहुल का चेहरा देखती रह गई.

राहुल ने मुझे कुर्सी पर बिठा दिया. नियोनिका ने अपने पापा और मुझे चाय का कप पकड़ा दिया. सभी बातें करते हुए चाय पी रहे थे और मैं अपनेआप में गुम सोच रही थी कि किशोरावस्था में आवश्यकता से अधिक नियंत्रण ने शायद अक्षत की आक्रामकता को, गुस्से को, मातापिता के अनुशासन के प्रति उस उम्र के स्वाभाविक विद्रोह को बाहर नहीं निकलने दिया, यहां तक कि जीजाजी भी दीदी से दबते रहे. अक्षत को दीदी से शिकायत भी हुई तो उस ने अपने अंदर दबा ली. चिंगारी अंदर दबी रही और बहू की शिकायतों ने उसे शोलों में बदल दिया और किशोरावस्था की उन मासूम सी शिकायतों को इतना कठोर रूप दे दिया.

कितना कहती थी मैं दीदी से तब कि बच्चों पर आवश्यकता से अधिक नियंत्रण ठीक नहीं है. बंधन और अनुशासन में फर्क होता है पर दीदी किसी की कहां सुनती थीं. बचपन बुनियाद है और किशोरावस्था दीवारें, जिस पर युवावस्था की छत पड़ती है और शेष जीवन जिस में इनसान हंसता या रोता है. यही कारण था शायद अक्षत के आज के इस व्यवहार का, जबकि राहुल ने उस उम्र की सारी भड़ास उसी उम्र में निकाल दी, जिस से उस के दिलोदिमाग में मातापिता के लिए कोई ग्रंथि नहीं पनपने पाई बल्कि उस ने मातापिता के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा और शायद कहीं पर अपनी गलतियों को भी.

‘‘मम्मी, क्या सोच रही हैं…’’ राहुल ने मुझे हिलाया तो मेरी तंद्रा टूटी. मैं अतीत से निकल कर वर्तमान में आ गई, ‘‘चलिए, हम सब रात का शो देखते हैं… और बाहर ही डिनर करेंगे,’’ नियोनिका को सब का एकसाथ जाना पसंद हो न हो पर राहुल ने यह बात पूरे आत्मविश्वास से कही. मैं ने खुशी से उस का गाल थपथपा दिया.

‘‘अरे, हम तो अपने जमाने में खूब गए पिक्चर देखने…अब तुम्हारा समय है…जाओ…मैं भी तो देखूं, कितने प्यारे लगते हैं मेरे बच्चे साथसाथ चलते हुए,’’ कह कर मैं ने उन दोनों को जबरन उठा दिया. हमारे बच्चे कार में बैठ रहे थे और हम दोनों उन को ममता भरी निगाहों से निहार रहे थे.

‘‘अपना राहुल कितना बदल गया है, है न?’’ मैं इन के पास खिंच आई.

‘‘हां…’’ यह मेरा गाल थपक कर बोले, ‘‘मैं तो तुम से पहले ही कहता था कि तुम किशोरावस्था में उस का व्यवहार देख कर भविष्य की बात मत सोचो. हमारा पालनपोषण का तरीका, हमारे दिए संस्कार उस के भविष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करेंगे. अब देखो, राहुल का अपना आत्मविश्वास ही है जिस से वह अपने तरीके से व्यवहार करता है. वह किसी दबाव में न आ कर स्वाभाविक तरीके से रहता है.

मातापिता की इज्जत करता है, इसीलिए नियोनिका को कुछ समझाना नहीं पड़ता. राहुल उस से कोई जबरदस्ती नहीं करता, लेकिन जैसा वह करता है वैसा ही नियोनिका भी करने की कोशिश करती है, वरना जब तुम्हारा बेटा ही तुम्हें आदर नहीं देगा, तुम्हारे वजूद को महत्त्व नहीं देगा तो बहू से कैसे उम्मीद कर सकते हैं. और इस की बुनियाद बहुत पहले किशोरावस्था में ही पड़ चुकी होती है. यदि उस उम्र में मातापिता की बच्चों के साथ संवाद- हीनता की स्थिति रहती है तो वही स्थिति बाद में विकट हो जाती है.’’ यह बोले तो इन की बात का विश्वास मुझे अंदर ही अंदर हो रहा था.

समस्या का अंत

अंबर प्रमोशन ले कर इंदौर चला गया. लेकिन वहां पहुंच कर उस की परेशानियां बढ़ती ही चली गईं. एक ओर बिन्नी दीदी के ससुराल से उस की बदसूरत ननद लाली से शादी का बढ़ता दबाव तो दूसरी ओर प्रेमिका रूपाली से मिलती शादी की चेतावनियां. बेचारा अंबर, करे तो क्या  करे?

तबादला हो कर इंदौर आने के बाद अंबर ने कई बार हफ्ते भर की छुट्टी लेने का प्रयास किया पर छुट्टी नहीं मिली. इस बार उस के बौस ने छुट्टी मांगते ही दे दी तो अंबर जैसे हवा में उड़ता हुआ इंदौर से ग्वालियर पहुंचा था. सुबह नाश्ता कर अंबर अपने स्कूटर पर मित्रों से भेंट करने निकल पड़ा तो पीछे से मां चिल्ला कर बोली थीं, ‘‘अरे, जल्दी लौटना. तेरी पसंद का खाना बनाऊंगी.’’

अंबर की मित्रमंडली बहुत बड़ी है और उस के सभी दोस्त उसे बहुत पसंद करते हैं. उसे देखते ही सब उछल पडे़. मित्रों ने ऐसा घेरा कि उसे रूपाली को फोन करने का भी मौका नहीं मिला. बड़ी मुश्किल से समय निकाल पाया और फिर एकांत में जा कर रूपाली को फोन किया. उस का फोन पाते ही वह भी उछल पड़ी.

‘‘अरे, अंबर तुम? इंदौर से कब आए?’’

‘‘आज सुबह ही. सुनो, तुम बैंक से छुट्टी ले लो और अपनी पुरानी जगह पर आ जाओ, वहीं बैठते हैं.’’

‘‘ठीक है, तुम पहुंचो, मैं आती हूं.’’

अंबर रेस्तरां की पार्किंग में अपना स्कूटर लौक क र जैसे ही गेट पर पहुंचा उस ने देखा रूपाली आटो से उतर रही है. दूर से ही हाथ हिलाती रूपाली पास आई तो दोनों रेस्तरां के एक केबिन में जा बैठे. बैठते ही रूपाली ने प्रश्न किया, ‘‘और सुनाओ, कितनी गर्लफ्रेंड बनीं?’’

‘‘मान गए तुम को…जवाब नहीं तुम्हारा. इतने दिन कैसे रहा, तबीयत कैसी थी, मन लगा कि नहीं? यह सबकुछ पूछने के बजाय मुंह खुला भी तो गर्लफ्रेंड की खोजखबर करने के लिए. निहाल हो गया मैं तो…’’

रूपाली भी गुस्से में थी.

‘‘मैं ही कौन अच्छी थी यहां,’’ गुस्से में तमक कर रूपाली बोली, ‘‘तुम ने कितनी बार पूछा?’’

‘‘अब तुम्हें कैसे समझाऊं कि इंदौर में जिम्मेदारियों के साथसाथ काम भी बहुत है.’’

‘‘प्रमोशन पर गए हो तो दायित्व ज्यादा होगा ही. वैसे अंबर, तुम्हारे जाने के बाद अब मुझे उस शहर में सबकुछ सूनासूना लगता है.’’

‘‘मुझे भी वहां बहुत अकेलापन महसूस होता है. क्या तुम्हारा ट्रांसफर वहां नहीं हो सकता?’’

‘‘मैं कोशिश कर रही हूं. फिर भी काम बनतेबनते 3-4 महीने तो लग ही जाएंगे,’’ अचानक गंभीर हो कर रूपाली बोली.

‘‘अंबर, हंसबोल कर बहुत समय गुजार लिया. अब कहो, तुम अपनी मां से हमारी शादी के बारे में खुल कर बात करोगे या नहीं?’’

‘‘घुमाफिरा कर मैं कई बार मां से कह चुका हूं पर तुम तो जानती हो कि वह कितनी रूढि़वादी हैं. जातिपांति की बेडि़यां तोड़ने को वह कतई तैयार नहीं हैं.’’

‘‘देखो, अगर तुम अम्मां की आज्ञा न ले पाए तो मेरे लिए बस, 2 ही रास्ते हैं कि या तो सब को ठेंगा दिखा कर मैं तुम को घसीट कर अदालत ले जाऊं और वहीं शादी कर लूं, नहीं तो मेरे घर वाले जिस को भी चुनें उस के साथ फेरे ले लूं.’’

‘‘पर डार्लिंग, संतोष का फल मीठा होता है. अभी ऐसा कुछ मत करो, मैं देखता हूं. मुझे कुछ दिनों की मोहलत और दे दो.’’

‘‘तुम को तो 2 वर्ष हो गए पर आज तक देख ही नहीं पाए कुछ.’’

घूमतेफिरते 7 दिन बीत गए पर चाहते हुए भी अंबर मां से अपनी शादी की बात नहीं कर पाया. उस ने भाभी से बात भी की तो भाभी ने यह कह कर रोक दिया कि तुम्हारे  तबादले से अम्मां का मिजाज बिगड़ा बैठा है. वह फौरन समझेंगी कि ठाकुर की बेटी ने योजना बना कर तुम्हें यहां से हटाया है. इस से रहीसही उम्मीद भी हाथ से जाती रहेगी. 3-4 महीने और गुजरने दो, तब बात करेंगे. वैसे भी देवरजी, प्रेम के मजबूत बंधन इतनी जल्दी नहीं टूटते.

अंबर इंदौर लौट आया. यहां वह अपनी दीदी के घर रहता है पर दीदी की दशा देख कर उसे बड़ी दया आती है. असल में बिन्नी दीदी से उस का लगाव बचपन से है. वह अम्मां की चहेती भतीजी महीनों अपनी बूआ के पास आ कर रहती थी. बड़ा हो कर अंबर जब भी अपने मामा के घर जाता, बिन्नी दीदी उस का खूब ध्यान रखती थीं.

जीजाजी तो बहुत ही अच्छे हैं. दीदी का खयाल भी खूब रखते हैं पर उन की बस, यही कमजोरी है कि अपनी मां व बहन के सामने कुछ बोल नहीं पाते, चाहे वे उन की पत्नी पर कितना भी अत्याचार क्यों न करें.

जीजाजी के 2 भाई और भी हैं. दोनों संपन्न हैं. बडे़बड़े घर हैं दोनों के पास पर उन की पत्नियां बिन्नी दीदी की तरह मुंह बंद कर के सारे अत्याचार नहीं सहतीं. मांबेटी के मुंह खोलते ही उन को उन के स्थान पर खड़ा कर देती हैं. चूंकि बिन्नी दीदी सीधी हैं, रोतीबिलखती हैं, सब सह लेती हैं और जीजाजी भी कुछ नहीं कहते, सो दोनों मांबेटी यहीं डेरा डाले रहती हैं.

मामा ने खाली हाथ बिन्नी का ब्याह नहीं किया था. मोटा दहेज दिया था फिर भी उठतेबैठते उसे ताने और गालियां ही मिलती हैं. दोनों मांबेटी दिन भर बैठी, लेटी टीवी देखती हैं, एक गिलास पानी भी खुद ले कर नहीं पीतीं. बेचारी बिन्नी दीदी काम करतेकरते बेहाल हो जाती हैं. उस पर भी दोनों के हुक्म चलते ही रहते हैं.

बिन्नी दीदी पर अंबर जान छिड़कता है. उन की यह दशा देख वह बौखला उठता है. तब दीदी ही झगड़े के भय से उसे शांत करती हैं. दीदी पर भी उसे गुस्सा आता है कि वह बिना विरोध के सारे अत्याचार क्यों सहन करती हैं. एक दिन सिर उठा दें तो मांबेटी को अपनी जगह का पता चल जाएगा पर दीदी घर में क्लेश के भय से चुप ही रहती हैं.

दीदी की ननद अभी तक कुंआरी बैठी है. एक तो कुरूप उस पर से बनावशृंगार  में सलीके का अभाव, चटकीले कपडे़ और चेहरे की रंगाईपुताई कर के तो वह एकदम चुडै़ल ही लगती है. मोटी, नाटी, स्याह काला रंग. अंबर तो देखते ही जलभुन जाता है.

अचानक अंबर ने महसूस किया कि चुडै़ल अब कुछ ज्यादा ही उस का खयाल रखने लगी है. शाम को काम से लौटते ही चायनाश्ते के साथ खुद भी सजधज कर तैयार मिलती है. अंबर आतंकित हो उठा है क्योंकि इन सब बातों का साफ मतलब है कि वह चुडै़ल अंबर को फंसाना चाहती है.

दीदी की सास भी अपनी कर्कश आवाज को नरम कर के  ‘बेटा, बेटा’ करने लगी हैं. अंबर को खतरे की घंटी सुनाई दी. उस रात सब खाने बैठे. पनीर कोफ्ता मुंह में रखते ही जीजाजी चौंके.

‘‘वाह, यह तो तुम्हारे हाथ के कोफ्ते हैं. मां तुम रसोई में कैसे पहुंच गईं?’’

दीदी की सास ने मुंह बनाया और बोलीं, ‘‘चल हट, मैं तो कमर दर्द में पड़ी हूं. लाली ने बनाए हैं कोफ्ते.’’

‘‘अच्छा, लाली को पता है कि रसोई का दरवाजा किधर खुलता है.’’

लाली ने अदा के साथ कंधे झटके और बोली, ‘‘ओह, भइया…’’

‘‘तू क्या जानता है,’’ दीदी की सास बोलीं, ‘‘मुझ से अच्छा खाना मेरी बेटी बनाती है. इस ने तो मन लगा कर पकवान, मिठाई बनाना भी मुझ से सीखा है,’’ फिर अंबर की तरफ मुड़ कर बोलीं, ‘‘अंबर बेटा, मैं इतना काम करती थी कि सब देख कर हैरान होते थे. मेरी सास कहती थीं कि अरी, थोड़ा आराम कर ले, मरेगी क्या काम करतेकरते. अब तो कमर दर्द ने अपाहिज बना दिया है. और अपनी दीदी को देखो, इतनी सुस्त कि 10 मिनट के काम में 2 घंटे लगा देगी.’’

यह सुन कर अंबर की आत्मा जल उठी, स्वादिष्ठ कोफ्ता कड़वा हो गया.

2 दिन के लिए अंबर फिर घर गया, तो रूपाली का गुस्सा और भी बढ़ा हुआ पाया. भाभी से रूठते हुए बोला,  ‘‘भाभी, तुम कुछ नहीं कर रही हो. मां को समझाओ.’’

‘‘मांजी टेढ़ी खीर हैं भैया, फिरभी देखती हूं, बर्फ को थोड़ाथोड़ा कर के ही पिघलाना होगा. देखती हूं कब तक सफलता मिलती है.’’

अंबर खाली हाथ लौट आया था. इधर घर में दीदी की सासननदों की खातिरदारी का आतंक. वह आराम से अपने गेस्ट हाउस में रह सकता है पर मां की डांट, दीदी के आंसू, जीजाजी का आग्रह, जाए तो कैसे?

कभीकभी अंबर को लगता है कि वह यहां से भाग जाए. उस दिन ऐसे ही भारी मन से आफिस में बैठा काम कर रहा था कि मोबाइल बज उठा :

‘‘क्या कर रहे हो?’’

‘‘इस समय और क्या करूंगा, काम कर रहा हूं.’’

‘‘लंच में निकल पाओगे?’’

‘‘निकल लूंगा पर जाऊंगा कहां?’’

‘‘तुम्हारे दफ्तर के सामने, रेस्तरां है, उस में आ जाओे. मैं वहीं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

‘‘रूपाली, तुम यहां… इंदौर में… कैसे?’’

‘‘मैं ने भी अपना ट्रांसफर करवा लिया है जनाब, और पिछले 1 सप्ताह से मैं यहीं हूं.’’

‘‘और मुझे नहीं बताया.’’

‘‘बता तो दिया, बाकी बातें मिलने के बाद,’’ इतना कह कर रूपाली ने फोन रख दिया.

अंबर का समय मानो काटे नहीं कट रहा था. लंच के समय उस ने आधे दिन की छुट्टी ले ली और महक रेस्तरां पहुंच गया. रूपाली दरवाजे पर खड़ी थी. दोनों कोने की एक सीट पर जा बैठे. बैरा पानी रख गया तो रूपाली ने गिलास उठाया. पानी का घूंट गले के नीचे उतार कर बोली, ‘‘और सुनाओ, क्या हाल है जनाब का.’’

‘‘अभी तक तो बेहाल था पर अब तुम्हारे आने से हाल सुधर जाएगा.’’

‘‘अंबर, तुम ने मुझे क्या समझ रखा है? मैं तमाम उम्र कुंआरी रह कर तुम को इसी तरह रिझाती रहूंगी. अब मैं अपने घर वालों को ज्यादा दिन रोक नहीं पाऊंगी. तुम हमारी शादी को गंभीरता से लो और कुछ करो.’’

‘‘रूपाली, विश्वास करो मेरा, मैं जल्दी ही कुछ करूंगा.’’

‘‘मैं तुम पर पूरा विश्वास करती हूं लेकिन मुझे लगता है तुम पर विश्वास रख कर मुझे कुंआरी ही बूढ़ी होना पड़ेगा.’’

यह सुन कर अंबर का मुंह उतर गया.

‘‘छोड़ो इन बातों को, यह बताओ, बिन्नी दीदी, बच्चे व जीजाजी कैसे हैं?’’

‘‘दीदी पर तरस आता है. सासननद ने मिल कर उन के जीवन को नरक बना दिया है. जीजाजी दुखी तो होते हैं पर बोल कुछ नहीं पाते.’’

इतने में बैरा आया और चाय के साथ पकौड़ों का आर्डर ले गया.

‘‘कुछ दिनों से घर में बड़ी अजीब सी बात हो रही है. मैं परेशान हूं.’’

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘रूपाली, जब मैं यहां आया था तो दीदी के साथसाथ मुझे भी उस की सास के ताने मिलते थे पर अब, अचानक ही दीदी की सास मुझ पर जान छिड़कने लगी हैं.’’

‘‘समझ गई,’’ रूपाली बोली, ‘‘अरे, वह बुढि़या तुम को अपना दामाद बनाना चाहती है.’’

‘‘क्या वो भैंस…असंभव. रूपाली, मुझे तो लगता है कि मुसीबत के साथ मेरा गठबंधन हो गया है.’’

‘‘इतने परेशान क्यों हो रहे हो?’’

‘‘और क्या करूं. कितनी बार तुम को समझाया कि चलो, कोर्ट मैरिज कर लें पर तुम भी सब की आज्ञा, आशीर्वाद ले पारंपरिक विवाह कीजिद पर अड़ी हो. अभी भी मान जाओ तो मैं कल ही अर्जी लगा दूं.’’

‘‘नहीं, कागज की पत्नी बनना मुझे पसंद नहीं. पारंपरिक ढंग से विवाह, हंसीठिठोली, आशीर्वाद, इन सब का मेरे लिए बहुत मूल्य है. भले ही ऊपर से बहुत आधुनिक दिखती हूं.’’

‘‘तब मुझ से अब एक शब्द भी मत कहना. बैठी रहो मेरे इंतजार में या अपने घर वालों की पसंद से कहीं और शादी कर लो.’’

‘‘शांति…शांति…मैं ने तुम को इतना समय दिया, अब तुम भी मुझे थोड़ा समय दो.’’

अंबर घर लौटा तो उसे लगा कहीं कुछ गड़बड़ है. आज जीजाजी की तबीयत ठीक नहीं थी इसलिए वह घर में ही थे. दीदी की सास का कमरा भी उसे बंद दिखा. आज दीदी ही चायनाश्ता लाई थीं. आंखें सूजी देख कर अंबर को लगा कि वह खूब रोई हैं.

‘‘मुन्ना, चाय ले.’’

‘‘दीदी, कुछ हुआ है क्या?’’

दीदी के मुंह खोलने से पहले ही उन की सास आ गईं.

‘‘बहू, अपने भाई से बात की…’’

आज पहली बार देखा कि मां की बात को बीच में काटते हुए जीजाजी ने पत्नी की तरफ मुंह खोला था, ‘‘काम से थक कर लौटा है. दम तो लेने दो.’’

‘‘इसे कौन से पहाड़ ढोने पड़ते हैं. चाय पीतेपीते बात कर लो.’’

‘‘देखो मां, मैं पहले भी कह चुका हूं, फिर कह रहा हूं कि जिस घर से बेटी लाए हैं वहां अपनी बेटी नहीं देंगे.’’

‘‘वह सब परंपरा अब नहीं मानी जाती. फिर कौन सा यह सगा भाई है.’’

‘‘इस के घर में कोई तैयार न हुआ तो?’’

‘‘तेरी सास इस की सगी बूआ है, रिश्ते के लिए उन से दबाव डलवा.’’

जीजाजी भड़के, ‘‘बेटी के लिए मतलब? ब्याह नहीं हुआ तो क्या बिन्नी को मार डालोगी?’’

बिन्नी ने डरतेडरते कहा, ‘‘बूआ को ढेर सारा दहेज चाहिए.’’

‘‘हम से दहेज मांगा तो भतीजी मरी.’’

‘‘होश में तो हो? बिन्नी को कुछ भी हुआ तो मैं ही सब से पहले पुलिस बुलाऊंगा, उस का भाई भी यहां है.’’

मां पैर पटकती, धमकी देती अपने कमरे में चली गईं तो जीजाजी चिंतित से बोले, ‘‘अंबर, मान ही जाओ…दोनों मिल कर बिन्नी का जीवन नरक बना देंगी.’’

बिन्नी दीदी झल्ला कर बोलीं, ‘‘हरगिज नहीं, अगर लाली के साथ मेरे भाई का ब्याह हुआ तो उस का जीवन नरक बन जाएगा. मैं अपने भाई के जीवन को ऐसे बरबाद नहीं होने दूंगी. चाहे मैं मर ही क्यों न जाऊं. आप अपनी बहन को नहीं जानते हैं क्या?’’

दूसरे दिन छुट्टी के बाद अंबर फिर रूपाली से मिला और उसे पूरी बात बताई. थोड़ी देर बाद रूपाली बोली, ‘‘यार, तुम्हारी समस्या वास्तव में गंभीर हो गई है. अच्छा, तुम्हारे जीजाजी काम क्या करते हैं?’’

‘‘स्टार इंडिया में यूनिट इंचार्ज हैं.’’

‘‘वहां के जनरल मैनेजर तो मेरे जीजाजी के दोस्त हैं.’’

‘‘तो क्या हुआ?’’

‘‘हुआ कुछ नहीं, पर अब होगा. रोज का उन के घर आनाजाना  है. रास्ता मिल गया, अब तुम देखते जाओ.’’

अंबर, रूपाली से मिल कर घर पहुंचा तो पूरे मेकअप के साथ इठलाती, बलखाती लाली चाय, नमकीन सजा कर ले आई.

‘‘चाय लीजिए, साहब.’’

‘‘नहीं चाहिए, अभी बाहर से पी कर आ रहा हूं.’’

‘‘तो क्या हुआ? अब यहां एक प्याली मेरे हाथ की भी पी लीजिए.’’

‘‘नहीं, और नहीं चलेगी,’’ इतना कह कर वह अपने कमरे में जा कर आगे के बारे में योजना बनाने लगा.

2-3 दिन और बीत गए. इधर घर में वही तनाव, उधर रूपाली का मुंह बंद. अंबर को लगा वह पागल हो जाएगा. चौथे दिन जब घर लौटा तो फिर सन्नाटा ही मिला. दीदी का बुरा हाल था. बिस्तर में पड़ी रो रही थीं. जीजाजी सिर थामे बैठे थे, मांबेटी की कोई आवाज नहीं आ रही थी. कमरे का परदा पड़ा था. उसे देख दीदी आंसू पोंछ उठ बैठीं.

‘‘मुन्ना, फ्रेश हो ले. मैं चाय लाती हूं.’’

‘‘नहीं, दीदी, पहले बताओ क्या हुआ, जो घर में सन्नाटा पसरा है?’’

‘‘साले बाबू, भारी परेशानी आ पड़ी है. तुम तो जानते ही हो कि हमारी बिल्ंिडग निर्माण की कंपनी है. बिलासपुर के बहुत अंदर जंगली इलाके में एक नई यूनिट कंपनी ने खोली है, वहां मुझे प्रमोशन पर भेजा जा रहा है.’’

‘‘जीजाजी, प्रमोशन के साथ… यह तो खुशी की बात है. तो दीदी रो क्यों रही हैं. आप का भी चेहरा उतरा हुआ है.’’

‘‘तुम समझ नहीं रहे हो साले बाबू, वह घनघोर जंगल है. वहां शायद टेंट में रहना पडे़गा…बच्चों का स्कूल छुड़ाना पड़ेगा, नहीं तो उन को होस्टल में छोड़ना पडे़गा. तुम्हारी बिन्नी दीदी ने जिद पकड़ ली है कि मेरे पीछे वह मां व लाली के साथ अकेली नहीं रहेंगी, अब मैं क्या करूं, बताओ?’’

‘‘इतनी परेशानी है तो आप जाने से ही मना कर दें.’’

‘‘तुम उस श्रीवास्तव के बच्चे को नहीं जानते. प्रमोशन तो रोकेगा ही, हो सकता है कि डिमोशन भी कर दे, मेरा जूनियर तो जाने के लिए बिस्तर बांधे तैयार बैठा है. और ऐसा हुआ तो वह आफिसर की नजरों में आ जाएगा.’’

‘‘तो फिर आप क्या चाहते हैं?’’

‘‘मैं बिन्नी से कह रहा था कि यहां जैसा है वैसा चलता रहे और मैं अकेला ही चला जाऊं.’’

‘‘जीजाजी, आप के और भी तो 2 भाई हैं, उन के पास भी ये दोनों रह सकती हैं.’’

‘‘कौन रखेगा इन को? यह तो मैं ही हूं जो इन के अत्याचार को सहन करती हूं,’’ बिन्नी का स्वर उभरा.

‘‘न, अब मैं ने भी फैसला ले लिया है कि इन को 4-4 महीने के हिसाब से तीनों के पास रहना होगा.’’

‘‘ठीक है, पर अब क्या होगा?’’

‘‘मैं साथ चलूंगी,’’ बिन्नी दीदी बोलीं, ‘‘तंबू क्या, मैं तो इन के साथ जंगल में भी रह लूंगी.’’

रात को खाने की मेज पर दीदी की सास बड़बड़ाईं, ‘‘यह सब इस करमजली की वजह से हो रहा है. जब से इस घर में आई है नुकसान और क्लेश…चैन तो कभी मिला ही नहीं.’’

लेकिन जीजाजी ने दीदी का समर्थन किया, ‘‘मां, अब तुम बारीबारी से अपने तीनों बेटों के पास रहोगी. मेरे पास 12 महीने नहीं. बिन्नी को भी थोड़ा आराम चाहिए.’’

‘‘ठीक है, मथुरा, हरिद्वार कहीं भी जा कर रह लूंगी पर लाली का ब्याह पहले अंबर से करा दे.’’

‘‘अंबर को लाली पसंद नहीं तो कैसे करा दूं.’’

इतना सुनते ही सास ने जो तांडव करना शुरू किया तो वह आधी रात तक चलता रहा था.

दूसरे दिन मिलते ही रूपाली हंसी.

‘‘हाल कैसा है जनाब का?’’

‘‘अरे, यह क्या कर डाला तुम ने?’’

‘‘जो करना चाहिए, घर बसाना है मुझे अपना.’’

‘‘दीदी का घर उजाड़ कर?’’

‘‘उस बेचारी का घर बसा ही कब था पर अब बस जाएगा…आइसक्रीम मंगाओ.’’

‘‘जीजाजी को जाना ही पडे़गा, ऐसे में दीदी का क्या हाल करेंगी ये लोग, समझ रही हो.’’

‘‘आराम से आइसक्रीम खाओ. आज जब घर जाओगे तब सारा क्लेश ही कट चुका होगा.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘यह तो मैं नहीं जानती कि वह कैसे क्या करेंगे, पर इतना जानती हूं कि ऐसा कुछ करेंगे कि उस से हम सब का भला होगा.’’

अंबर चिढ़ कर बोला, ‘‘मुझे तो समझना पडे़गा ही क्योंकि समस्या मेरी है.’’

‘‘थोड़ा धैर्य तो रखो. मैदान में उतरते ही क्या जीत हाथ में आ जाएगी,’’ रूपाली अंबर को शांत करते हुए बोली.

घर पहुंच कर अंबर थोड़ा हैरान हुआ. वातावरण बदलाबदला सा लगा. दीदी खुश नजर आ रही थीं, तो जीजाजी बच्चों के साथ बच्चा बने ऊधम मचा रहे थे. मुंहहाथ धो कर वह निकला भी नहीं कि गरम समोसों के साथ दीदी चाय ले कर आईं.

‘‘मुन्ना, चाय ले. तेरी पसंद के काजू वाले समोसे.’’

‘‘अरे, दीदी, यह तो चौक वाली दुकान के हैं.’’

‘‘तेरे जीजाजी ले कर आए हैं तेरे लिए.’’

अंबर बात समझ नहीं पा रहा था. जीजाजी भी आ कर बैठे, उधर दीदी की सास कमरे में बड़बड़ा रही थीं.

‘‘जीजाजी, आप की ट्रांसफर वाली समस्या हल हो गई क्या?’’

‘‘समस्या तो अभी बनी हुई है पर उस का समाधान तुम्हारे हाथ में है.’’

‘‘मेरे हाथ में, वह कैसे?’’

‘‘तुम सहायता करो तो यह संकट टले.’’

‘‘ऐसी बात है तो मैं वचन देता हूं, मुझ से जो होगा मैं करूंगा.’’

‘‘पहले सुन तो लो, पहले ही वचन मत दो.’’

‘‘कहिए, मुझे क्या करना होगा?’’

‘‘ज्यादा कुछ नहीं…ब्याह करना होगा.’’

‘‘ब्याह…किस से?’’

‘‘हमारे बौस की एक मुंहबोली बहन है, वह चाहते हैं कि तुम्हारा रिश्ता उस के साथ हो जाए.’’

‘‘मैं…मेरे साथ…पर…न देखी…न भाली.’’

‘‘लड़की देखने में सुंदर है. बैंक में अच्छे पद पर है, यहां अपने जीजा के साथ रहती है. ग्वालियर से ही ट्रांसफर हो कर आई है.’’

अंबर ने चैन की सांस ली पर ऊपर से तनाव बनाए रखा.

‘‘आप के भले के लिए मैं जान भी दे सकता हूं पर जातपांत सब ठीक है न? मतलब आप अम्मां को तो जानते ही हैं न. पंडित की बेटी ही चाहिए उन को.’’

‘‘ठाकुर है.’’

‘‘तब तो…’’

‘‘तू उस की चिंता मत कर मुन्ना. तू बस, अपनी बात कह. बूआ को मैं मना लूंगी.’’

‘‘तुम्हारा भला हो तो मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.’’

‘‘तब तो समस्या का समाधान हो ही गया.’’

‘‘पर, आप की मां तो…’’

‘‘मेरा ट्रांसफर रुका, यही बड़ी बात है. अब परसों ही भाई के घर पहुंचा रहा हूं दोनों को. 4-4 महीने तीनों के पास रहना पड़ेगा…बिन्नी ने बहुत सह लिया.’’

दूसरे दिन रूपाली से मिलते ही अंबर ने कहा, ‘‘मान गए तुम को गुरु. आज जो चाहे आर्डर दो.’’

‘‘चलो, माने तो. अपना कल्याण तो हो गया.’’

‘‘साथ ही साथ दीदी का भी भला हो गया. नरक से मुक्ति मिली, बेचारी को. 4-4 महीने के हिसाब से तीनों के पास रहेंगी उस की सासननद.’’

बालों के साथ-साथ स्किन के लिए भी फायदेमंद है आंवला

आपने सुना होगा कि आंवला हमारी हेल्थ के लिए फायदेमंद होता है. जैसे कैंसर, अल्सर और सबसे बड़ा काम वजन को कम करने में सबसे फायदेमंद होता है, लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि आंवला हमारी स्किन के लिए कैसे फायदेमंद है. जिस तरह आंवले को बालों में लगाने से बाल, काले और शाइनी हो जाते हैं, उसी तरह इसका पैक बनाकर लगाने चेहरे में निखार आ जाता है. आज हम आपको आंवले को फेस मास्क के रूप में इस्तेमाल करके आप कैसे ग्लोइंग स्किन पा सकते हैं…

1. आंवला और एवोकैडो कौम्बिनेशन करें इस्तेमाल

avocado

आंवला पाउडर को गर्म पानी में हल्‍का गाढ़ा सा घोल लें. ज्‍यादा गर्म पानी का इस्‍तेमाल न करें. इसके बाद इसमें एक एवोकैडो को मसलकर डाल दें. बाद में अच्‍छी तरह फेंट लें. इस पेस्‍ट को चेहरे पर लगाएं और 30 मिनट के बाद धो लें.

2. आंवला और पार्सेले-शहद मास्‍क करें इस्तेमाल

parsley

पार्सेले को बारीक काट लें और इसे पीसकर इसका जूस निकाल लें. इस जूस को आंवला पाउडर में मिलाकर पेस्‍ट बना लें. इस पेस्‍ट को चेहरे पर लगाएं और बाद में गुनगुने पानी से धो लें.

3. आंवला और दही का मास्‍क करें इस्तेमाल

amla and curd

आंवला का पाउडर लें और उसमें दही को मिलाकर अच्‍छे से फेंट लें. यह पेस्‍ट आपके चेहरे पर जादुई तरीके से काम करेगा. अगर आप इसमें गुलाबजल मिला देंगी तो यह टोनर की तरह काम करेगा.

4. आंवला और पपीता मास्‍क करें इस्तेमाल

papaya

पपीता, त्‍वचा को साफ रखता है, अगर आप इसे आंवला के पाउडर में मिलाकर एक पेस्‍ट तैयार कर लें और चेहरे पर 15 मिनट के लिए सप्‍ताह में दो बार लगाएं, तो चेहरे में चमक आ जाएगी.

5. आंवला और टीपैक का करें इस्तेमाल

tea pack

आंवला पाउडर को चाय की पत्‍ती के उबले पानी में घोलें और इस पेस्‍ट को अपने चेहरे पर लगाएं. इसे 15 से 20 तक लगाएं, बाद में हल्‍के गुनगुने पानी से चेहरा धो लें.

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