यह थप्पड़ भी जानबूझकर सार्वजनिक रूप से मारा इसीलिए गया था कि इसकी गूंज दूर दूर तक सुनाई दे और समझने वाले यह समझ लें कि जो भी अपनी दम पर लोकप्रिय और कामयाब नेता बनेगा. उसे हतोत्साहित करने ऐसा भविष्य में भी किया जाता रहेगा. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को मारे गए नए थप्पड़ में यह मैसेज भी चस्पा है कि यह सभ्यों और शिक्षितों का नहीं, बल्कि गंवारों और जाहिलों का समाज है. जिसमें लात घूंसे थप्पड़ जूतें और कड़वे बोल बेहद आम हैं और यही हमारी असल संस्कृति है.

अरविंद केजरीवाल अग्रवाल वैश्य समाज से आते हैं जो मूलत व्यापारी हैं. यह समुदाय आमतौर पर शांत स्वभाव का है और बेहद संगठित भी है, सामूहिक उन्नति पर इसका हमेशा ही जोर रहा है. इसमें भी कोई शक नहीं कि शांत होने के चलते इन्हें डरपोक बनिया भी कहा जाता है क्योंकि यह हिंसा से यथासंभव दूर रहने में ही यकीन करते हैं. कहने को अग्रवालों के कई बड़े बड़े राष्ट्रीय संगठन हैं जिनके सम्मेलनों की भव्यता देखते ही बनती है.  लेकिन यह बात समझ से परे है कि सम्पूर्ण वैश्य समाज अरविंद केजरीवाल के अपमान पर खामोश क्यों रहता है जबकि उन्होंने दिल्ली का मुख्यमंत्री बनकर समाज का गौरव बढ़ाया ही हैं.

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दरअसल ये वैश्य या बनिए हमेशा से ही ब्राह्मणों के इशारों पर नाचते रहे हैं जिन्हें पंडितों ने अपने मकड़जाल और पोंगा पंथ में बुरी तरह उलझा रखा है. सियासी तौर पर इन बनियों की गिनती भाजपा समर्थक जाति में होती है और खुले तौर पर वैश्य समुदाय मनुवादी व्यवस्था को मंजूरी देता है. ब्राह्मण बनिया गठजोड़ जो पूरे देश भर में फैला है, एक दूसरे का कारोबार चमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ता  .

अरविंद केजरीवाल की किसी भी बेइज्जती पर अग्रवाल समुदाय के आका कभी एतराज जताना तो दूर की बात है कोई नोटिस भी नहीं लेते हैं. ऐसे में ताजे-ताजे थप्पड़ पर आम आदमी पार्टी के पदाधिकारियों का यह आरोप एकदम नजरंदाज भी नहीं किया सकता कि उनके सार्वजनिक अपमान के पीछे हाथ भाजपा का है. खासतौर से उस वक्त जब कुछ ही दिन पहले अरविंद केजरीवाल ने मोदीशाह की जोड़ी को हराने किसी से भी हाथ मिलाने की बात कही थी. इस बात पर गंभिरता पूर्वक सोचा जाना जरूरी है कि क्या ऐसे वक्तव्यों के जवाब में हर बार उन्हें थप्पड़ खाना पड़ेगा और क्या बात कभी थप्पड़ से आगे नहीं बढ़ेगी.

चुनाव प्रचार अब देश भर में हिंदूवाद और गैर हिंदूवाद के बीच सिमट कर रह गया है बाकी सब मुद्दे हवा हो चुके हैं. अरविंद केजरीवाल खुलेतौर पर हिंदूवादी राजनीति के विरोधी हैं जो शायद उन्हीं की जाति के लोगों को भी रास नहीं आ रहा है. कोई भी समाज या जाति कम से कम ज्यादती या गलत बात पर तो अपनों के साथ खड़ा नजर आता है, जो कुछ और दें न दे पर एक, साथ और सुरक्षा का आश्वासन तो होता है.

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अग्रवाल समाज अगर निरपेक्ष होता और वर्ण व्यवस्था का पालक पोषक न होता तो उसकी चुप्पी के माने समझ भी आते कि चूंकि वह जातिगत विचारधारा को नहीं मानता इसलिए कोई बात नहीं. लेकिन, अपने ही समाज के एक लोकप्रिय, सफल और स्व निर्मित नेता की बेइज्जती पर वह दोषियों की निंदा करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाता तो उसकी बुझदिली पर तरस आना भी स्व्भाविक बात है. अपने ब्राह्मण आकाओं को खुश रखने या नाराज न करने की शर्त अगर अपने ही समाज के एक होनहार नेता को चुपचाप पिटते देखते रहना है. तो उसे स्वाभिमान का मिथ्या दंभ नहीं भरना चाहिए और न ही अग्रसेन जयंती जैसे पर्वों पर एकता वगैरह का राग समारोहपूर्वक अलापना चाहिए.

रही बात अरविंद केजरीवाल की तो लगता नहीं कि ऐसे थप्पड़ कभी उनका मनोबल गिरा पाएंगे उनसे बेहतर कोई समझ भी नहीं सकता कि देश को खतरा किन लोगों से है. और इनसे कैसे निपटना है. धार्मिक कट्टरता का मुकाबला विकास कार्यों से कर रहे इस नेता को इकलौता अफसोस बस इसी बात का हो सकता है, कि उन्हीं के समाज के लोग थप्पड़ मारने वालों का अप्रत्यक्ष साथ दे रहे हैं.

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