आहिस्ताआहिस्ता हमारा खून निकालने वालों का कद बढ़ता जा रहा था और हम छोटे होते जा रहे थे. हमारी अवस्था गुलामों जैसी होती जा रही थी, फिर भी उम्मीद की एक किरण हमें जिंदा रखे हुई थी.

मेरी यात्रा लगातार जारी है. मैं शायद किसी बस में हूं. मुझे यों प्रतीत हो रहा है. बस के भीतर बैठने की सीटें नहीं हैं. सब लोग नीचे ही बस के तले पर बैठे हैं. कुछ लोग इसी तल पर लेटे हैं. बस से बाहर जाने का कोई भी मार्ग अभी तक मुझे दिखाई नहीं दिया है और न ही किसी और कोे.

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