Download App

आयुष्मान खुराना पर‌ लगा कहानी चुराने का आरोप

आयुष्मान खुराना पर फिल्म मेकर कमल चंद्रा ने अपनी कहानी चुराने का आरोप लगाया हैं. आई पी सी की धारा 420 और 406 के  तहत इनके खिलाफ 29 मई को ‘काशी मीरा पुलिस स्टेशन’  में लिखित शिकायत दर्ज कराई हैं. यह ‘ठाणे ग्रामीण पुलिस’ के अंतर्गत आता है. इनके साथ-साथ के साथ उन्होंने ‘बाला’ के निर्देशक अमर कौशिक और निर्माता दिनेश विजन के खिलाफ भी शिकायत की हैं. दरअसल ये मामला पहले से ही मुंबई हाई कोर्ट में चल रहा है.

दरअसल मुंबई हाई कोर्ट में इसकी सुनवाई पिछली बार 19 अप्रैल 2019 को हुई.उस वक्त ‘बाला’के निर्माताओं ने कहा था कि अभी फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है.आयुष्मान खुराना और फिल्म ‘‘बाला’’का निर्माण कर रही कंपनी ‘‘मैडााक फिल्मस’’के प्रतिनिधि के अनुसार अदालत ने फिल्म की शूटिंग न करने या स्टे आर्डर का कोई आधिकारिक आदेश नहीं दिया है. इसलिए फिल्म से जुड़ी टीम अपना काम कर रही है.

doc

ये भी पढ़ें- ‘बोले चूड़ियां’ से क्यों बाहर हुईं मौनी रौय?

कमल चंद्रा ने कहा कि 2017 में मैंने एक डेढ़ पन्ने की फिल्म की कहानी आयुष्मान खुराना‌ को वाट्सऐप की थी जो उन्हें काफी पसंद आयी थी. ऐसे में उसी साल सितंबर महीने में एक दिन उन्होंने मुझे यशराज स्टूडियो में मिलने‌ के लिए बुलाया. ऐसे में जब मैं वहां पहुंचने ही वाला था कि उनका मैसेज आया कि आज वो नहीं मिल सकते हैं. तब से लेकर लगभग डेढ़ साल तक मैंने उनसे फौलो अब करने की कोशिश की, मगर उन्होंने कभी भी मेरे मेसैज का जवाब नहीं दिया और फिर एक दिन पता चला कि मेरी मूल कहानी पर ही ‘बाला’ बन रही है.”

ये भी पढ़ें- जानें क्यों वायरल हो रही हैं, शाहरुख खान की बेटी सुहाना की तस्वीरें

थोड़ा सेल्फिश होना भी जरूरी है

हो सकता है मेरी इस बात से आप सहमत न हों लेकिन जरा सोच कर देखें, सेल्फिश का मतलब सिर्फ धोखा देना ही नहीं होता. आज तक आप ने उन सेल्फिश लोगों को देखा होगा जो अपने फायदे के लिए दूसरों को बेवकूफ बनाते हैं, धोखा देते हैं.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि अगर एक सही तरीके से स्वार्थी या सेल्फिश बना जाए तो इस से हम अपनी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं, वह भी बिना किसी को धोखा दिए, किसी का नुकसान किए बिना.

सेल्फिशनैस हमारे अंदर किस हद तक होनी चाहिए? कहीं आप हमेशा अच्छा बनने की कोशिश में तो नहीं लगी रहतीं?

अगर ऐसा है तो यह कोशिश आज ही छोड़ दीजिए. इस से आप को हासिल तो कुछ नहीं होगा, आप की परेशानियां जरूर बढ़ेंगी, क्योंकि आप के आसपास के लोग आप का फायदा उठाएंगे, आप का इस्तेमाल करेंगे.

इतनी अच्छी भी मत बनिए

रीना एक अच्छी बहू, पत्नी व मां थी. सब उस की प्रशंसा करते नहीं थकते थे. विवाह से पहले वह मायके व स्कूल में सब की चहेती थी. शांत स्वभाव की रीना को चाहने वालों की कमी नहीं थी. लेकिन ‘ना’ न कह पाने की वजह से अकसर परेशान हो जाती थी. धीरेधीरे रीना को भीतर ही भीतर अजीब सा खालीपन लगने लगा था. उसे डिप्रैशन ने घेर लिया.

ना कहना सीखें

एक दिन रीना की सहेली उस से मिलने आई. वह प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक थी. रीना की बातों से वह समझ गई परेशानी कहां है. सारी बातें सुनने के बाद वह बोली, ‘‘रीना, तू प्रतिभासंपन्न व कुशल गृहिणी है और हमेशा दूसरों की खुशी का ध्यान रखती है. क्या तूने कभी अपने लिए भी जी कर देखा है? तुझे न कहना नहीं आता है. बस, यही तेरी समस्या है. इस घेरे से बाहर निकल, न कहना भी सीख. थोड़ा अपनी इच्छानुरूप भी जी कर देख.’’

ये भी पढ़ें- 7 जरूरी गुण, जो सिखाएं सब के साथ मिल कर रहना

उसे अपनी सहेली की बातें सही लगीं. इतने सालों से वह दूसरों की खुशियों तले अपनी इच्छाएंआकांक्षाएं सभी तो खत्म कर रही थी. उस ने अपने लिए जीने का फैसला कर लिया और धीरेधीरे ‘न’ कहना भी सीख लिया. सब लोग रीना में आए इस आकस्मिक परिवर्तन को देख कर हैरान थे. आज वह समझ चुकी थी कि हां कहना बुरा नहीं, लेकिन अपने सपनों के दांव पर तो नहीं. जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए न कहने की कला का आना भी जरूरी है.

अपने वजूद को पहचानें

कुछ लोगों में आदत होती है कि वे नकारात्मक छवि से घबराते हैं और सब के सामने सकारात्मक छवि बनाए रखना चाहते हैं, चाहे वे इस चाहत के चक्कर में अंदर ही अंदर खुद कितने ही परेशान हो जाएं.

आखिर ‘न’ कहने में इतनी हिचकिचाहट क्यों? आप कोई रोबोट नहीं जो हर काम अपने सिर ले लें. हर काम कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं. हां कहने के बाद काम को आधेअधूरे मन से करना या न कर पाना अधिक हानिकारक है.

जब किसी काम को नहीं कर पाएंगे तब ज्यादा छवि खराब होगी. मेरा मानना है कि एक बार बुरा बनना बारबार बुरा बनने से ज्यादा अच्छा है. मनोचिकित्सक के अनुसार, ‘‘ना कहना एक कला है. ‘हां’ कह कर लोगों की भीड़ में न शामिल हों. अगर न कहोगे तो एक अलग पहचान मिलेगी.’’ सो, प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यकता पड़ने पर न कहने की कला भी आनी चाहिए.

खुद से बातें करें

इतना तनाव, इतनी उलझन क्यों है? स्वभाव चिड़चिड़ा क्यों है? क्या कारण है कि कभीकभी किसी से बात करने का मन नहीं करता? फुरसत में बैठ कर खुद से सवाल करें. जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करें.

खुद का नुकसान न करें

हर बार आप ही क्यों? हैल्प करें पर दूसरे को अपना फायदा न उठाने दें. अकसर अच्छे बनने के चक्कर में, किसी को बुरा न लगे, हम बहुत सारी ऐसी चीजों के लिए भी हां बोल देते हैं जिन से हमारा खुद का नुकसान होता है. यह नुकसान किसी भी रूप में हो सकता है, जैसे टाइम, पैसे, खुशहाली या परिवार. इतनी बड़ी कीमत? विचार करें, जब जिंदगी अपनी है तो मरजी भी हमेशा अपनी ही होनी चाहिए.

नजरिया अपना हो

आंखों से चश्मा हटाएं. दुनिया को अपनी नजर से देखने की आदत डालें. किसी दूसरे की राय को अपनी राय न बनाएं. जरूरी नहीं जो दूसरे के लिए गलत है वह आप के लिए भी गलत हो. फैसला अपने अनुभव के आधार पर करना सही है. आप का अनुभव सामने वाले के अनुभव से अलग हो सकता है.

खुद को चाह कर तो देखो

हैल्दी और पौष्टिक खाएं, ऐक्सरसाइज करें, और हर वह चीज करें जिस से आप के मन और शरीर को अच्छा महसूस हो. अपनी जरूरतों को नजरअंदाज न करें.

यह आप को खुद के प्रति प्यार की कमी को दर्शाता है. अपना और अपने शरीर का ध्यान रखने का अर्थ सेल्फिश होना कतई नहीं. रोज के 24 घंटे में से कुछ अपने लिए समय जरूर निकालें.

ये भी पढ़ें- परिवार: घर से भागे बच्चों की मंजिल कहां

क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019: पाकिस्तान की हुई करारी हार

इस वर्ल्ड कप का दूसरा मैच पाकिस्तान और वेस्टइंडीज के बीच 31 मई को खेला गया. ट्रेंट ब्रिज के मैदान पर वेस्टइंडीज ने टौस जीत कर पाकिस्तान को पहले बल्लेबाजी करने का न्यौता दिया और जिस रणनीति के तहत यह फैसला लिया गया था, वह जल्दी ही कामयाब होती भी दिखाई दी.

पाकिस्तान के बल्लेबाज ‘तू चल मैं आया’ की तर्ज पर क्रीज से ज्यादा पवेलियन में दिखे. वर्ल्ड कप में इतनी शर्मनाक शुरुआत तो पूरे पाकिस्तान में किसी ने सपने में भी नहीं सोची होगी. बल्लेबाजी में हुई खराब शुरुआत आखिर तक खराब ही रही. ऐसा लग रहा था जैसे पाकिस्तानी बल्लेबाज ट्वेंटी20 मैचों का वर्ल्ड कप खेलने के लिए आए हैं.

वेस्टइंडीज की सधी हुई गेंदबाजी के चलते पाकिस्तान की पूरी टीम 105 रनों पर सिमट गई. जबकि अभी तकरीबन 28 ओवरों का खेल बाकी था. बस 4 बल्लेबाज ही दहाई रनों का आंकड़ा पार कर पाए बाकी 7 बल्लेबाजों का मिलाजुला स्कोर 23 रन था.

ये भी पढ़ें- क्या बेन स्टोक्स बन पाएंगे 2011 के युवराज सिंह?

कप्तान सरफराज अहमद की टीम ने पूरे पाकिस्तानी दर्शकों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. रही-सही कसर बाद में बल्लेबाजी करने आए वेस्टइंडीज के ओपनर बल्लेबाज क्रिस गेल ने पूरी कर दी. उन्होंने इस टूर्नामेंट में अपने पहले ही मैच में फिफ्टी लगा कर अपने इरादे जाहिर कर दिए. उन्होंने 6 चौकों और 3 छक्कों की मदद से महज 34 गेंदों पर 50 रन बटोरे और इस टीम ने 3 विकेट खो कर 14 से भी कम ओवर में जीत हासिल कर ली.

वेस्टइंडीज को आसानी से मिली इस जीत का फायदा आने वाले मैचों में मिल सकता है और वैसे भी उस के विस्फोटक बल्लेबाज आंद्रे रसल तो चाहते भी हैं कि उन की टीम अपनी बल्लेबाजी के दम पर इस वर्ल्ड कप को उठा कर चूम ले.

दूसरी तरफ इस हार से पाकिस्तान की टीम के हौसले पस्त हो गए होंगे. वैसे, इससे पहले कप्तान सरफराज अहमद जब 30 मई को दूसरी टीमों के कप्तानों के साथ ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ से मिलने गए थे तब वे अपनी राष्ट्रीय पोशाक सलवार-कमीज में दिखाई दिए थे. उन्होंने कमीज पर टीम का ब्लेजर पहना हुआ था, जबकि दूसरी टीम के कप्तान ब्लेजर और सूट पहने हुए थे. जब यह फोटो सब के सामने आया तो लोगों ने उन की खूब खिल्ली उड़ाई. हालांकि अपनी राष्ट्रीय पोशाक को पहनने में कोई बुराई नहीं थी लेकिन उस के बाद अपने पहले मैच में इस तरह बच्चों सा हारना पाकिस्तानी दर्शकों को खल गया और उन्होंने सोशल मीडिया पर पूरी पाकिस्तानी टीम को घेर लिया.

ये भी पढ़ें- गूगल ने डूडल बनाकर किया World Cup-2019 को सलाम…

पाकिस्तान के एक मानवाधिकार कार्यकर्ता कपिल देव ने अपनी भड़ास निकालते हुए ट्विटर पर लिखा, ‘इमरान खान ने कहा था अपना 100 फीसदी दें, लेकिन उन्होंने तो 105 दे दिया.’ इसी तरह एक पाकिस्तानी पत्रकार जाहिद हुसैन ने कहा, ‘विश्व कप में पाकिस्तान की आपदाकारी शुरुआत.’ अल जजीरा के संवाददाता असद हाशिम ने लिखा, ‘साफतौर पर पाकिस्तान से किसी ने नहीं बताया होगा कि वौर्मअप मैच खत्म हो गए हैं, टूर्नामेंट शुरू हो चुका है. क्या सीन है?’

पर अभी तो यह पहला ही मैच था, इसलिए पाकिस्तान को ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है लेकिन उसे अगले मैचों को हलके में नहीं लेना होगा क्योंकि यह क्रिकेट का सब से बड़ा मंच है और हर कोई यहां अपना शानदार प्रदर्शन करने के लिए कमर कस कर आया है.

‘बोले चूड़ियां’ से क्यों बाहर हुईं मौनी रौय?

अभिनेत्री मौनी रौय ‘बोले चूड़ियां’ से बाहर हो गई हैं. दरअसल इस फिल्म के मेकर्स ने इन पर अनप्रोफेशनल होने का आरोप लगाया है. मेकर्स का कहना है कि मौनी रौय  समय से रीडिंग सेशन में नहीं पहुंचती थीं. इस कारण इन्हें फिल्म से निकाल दिया है.

Nawazudin-Mouni

बता दें कि कुछ दिन पहले ही इस फिल्म की घोषणा हुई थी. इसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ मौनी रौय को साइन किया गया था. लेकिन अब ‘बोले चूड़ियां’ के मेकर्स का कहना है मौनी रौय अनप्रोफेशनल हैं. इस फिल्म के प्रोड्यूसर ने कहा कि हममें से किसी ने भी मौनी के साथ गलत बर्ताव नहीं किया है.

ये भी पढ़ें- जानें क्यों वायरल हो रही हैं, शाहरुख खान की बेटी सुहाना की तस्वीरें

 

View this post on Instagram

 

A post shared by mon (@imouniroy) on

मौनी रौय के प्रवक्ता ने बयान जारी करते हुए कहा, ” उन्होंने इससे पहले कई फिल्में की हैं और लोगों ने उनके प्रोफेशनल व्यवहार को सराहा है. आपको बता दें कि फिल्म ‘मेड इन चाइना’ में मौनी रौय का अहम किरदार हैं. इस फिल्म में उनके साथ राजकुमार राव हैं. ये फिल्म 30 अगस्त को रिलीज होगी.

ये भी पढ़ें- नक्काश: इंसान में फर्क न करने का संदेश देने वाली बेहतरीन फिल्म…

 

View this post on Instagram

 

A post shared by mon (@imouniroy) on


इसके अलावा मौनी ‘ब्रहमास्त्र’ में  भी नजर आने वाली हैं. इस फिल्म में रणबीर कपूर और आलिया भट्ट भी हैं. ये फिल्म इसी साल 20 दिसंबर को रिलीज होगी.

मोदी सरकार ने यूं ठगा बेरोजगारों को

यही रिपोर्ट और उसके आंकड़े अगर तयशुदा वक्त यानि दिसंबर 2018 में जारी कर दिये जाते तो लोकसभा चुनाव नतीजों की तस्वीर कुछ और होती. लेकिन नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीयत का खोट अब उजागर होने लगा है. कैसे उन्होंने बेरोजगारी जैसे अहम और संवेदनशील मुद्दे पर बेरोजगारों को गुमराह कर उनके वोट राष्ट्रवाद के नाम पर झटके. खुद सरकार द्वारा ही जारी रिपोर्ट में बड़ी मासूमियत से यह सच स्वीकार लिया है कि हां देश में बेरोजगारी की दर 6.1 फीसदी है, और यह पिछले 45 साल में सबसे ज्यादा है .

गौरतलब है कि ये आंकड़े श्रम मंत्रालय द्वारा जारी किए गए हैं . चुनाव के ठीक पहले यह भयावह आंकड़ा नेशनल सैंपल सर्वे औफिस यानि एनएसएसओ की एक रिपोर्ट में लीक हुआ था. जिस पर खासा हल्ला मचा था और सरकार द्वारा इन आंकड़ों को जारी न करने के विरोध में राष्ट्रीय संखियिकी आयोग के कार्यकारी अध्यक्ष सहित दो और सदस्यों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन सत्ता लोलुप सरकार के कानों पर तब भी आज की तरह जूं नहीं रेंगी थी.

ये भी पढ़ें- विपक्ष कैसे देगा नरेन्द्र मोदी को कड़ी चुनौती

इस सर्वे की एक और दिलचस्प लेकिन चिंतनीय बात या तथ्य यह है कि यह जुलाई 2017 से लेकर जून 2018 के बीच हुआ था यानि नोटबंदी के बाद, बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी. नोटबंदी को लेकर सरकार के तमाम दावे भोंथरे साबित हो चुके हैं मसलन न कालाधन वापस आया और न ही आतंकवाद खत्म हुआ. इस पर कई विशेषज्ञ भी वक्त-वक्त पर  हैरानी जाहिर कर चुके हैं कि आखिर नोटबंदी से किसे क्या हासिल हुआ और इसको लेकर सरकार के दावे कहां हवा हो गए.

कुछ हुआ न हुआ हो लेकिन नोटबंदी का फायदा भाजपा को उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में मिला था. क्योंकि सपा और बसपा पैसों की तंगी के चलते अपना प्रचार ढंग से नहीं कर पाये थे. बेरोजगारी के आंकड़े छिपाने का फायदा भी उसे ही लोकसभा चुनाव में मिला. सरकार ने सरासर यह रिपोर्ट दवा ली नहीं तो चुनाव में उसे वह कामयाबी नहीं मिल पाती जो कि मिली. इस रिपोर्ट ने पुलवामा हादसे और बालाकोट एयर स्ट्राइक को भी कटघरे में ला खड़ा कर दिया है. जिनके सबूत मांगने बालों को राष्ट्र द्रोही करार दे दिया जाता है यानि सरकार जो कह दे उसे सर झुकाकर सच मान लो नहीं तो पाकिस्तान चले जाओ. यानि मोदी सरकार अपने सियासी फायदे और खुद्गर्जी के लिए कुछ भी छिपा सकती है और कुछ भी उल्टा सीधा गिना सकती है . उसे बेरोजगारों और युवाओं के भविष्य से कोई लेना देना नहीं है.

ये भी पढ़ें-राजनीति में युवा हैं कहां

इस मसले पर सरकार से ज्यादा धन्य तो वे भारतीय युवा हैं जो चुनाव प्रचार के दौरान राष्ट्रवाद का खंबा और झण्डा उठाए जय जय श्री राम का नारा बुलंद करते अपना गला यह सोचते फाड़ते रहे कि रोजगार से ज्यादा अहम देश और हिंदुत्व है रोजगार तो बाद की बात है. अब इन युवाओं के पास दो ही रास्ते हैं पहला तो यह कि वे अब भी नारे लगाते अपनी जवानी देश पर कुर्बान कर दें या फिर रिपोर्ट को गौर से पढ़कर अपना माथा फोड़ें. उम्मीद है उन्माद में डूबे युवा पहले रास्ते पर ही कायम रहेंगे क्योंकि मोदी है तो सब मुमकिन है.

क्या आप जानते हैं कंप्यूटर विजन सिंड्रोम के बारे में?अगर नहीं..तो पढ़ें

आज के हाईटैक जमाने में कंप्यूटर निजी, प्रोफैशनल और सोशल लाइफ का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. कार्यक्षमता बढ़ाने वाला अनेक सुविधाओं से युक्त कंप्यूटर का आप की सेहत पर बुरा असर न पड़े, इस के लिए किन बातों का रखें ध्यान, बता रहे हैं डा. महिपाल सचदेव.

कंप्यूटर पर काम करते समय सिरदर्द, फोकस की कमी, आंखों में जलन, सूखापन या थकान, कमजोर या धुंधली दृष्टि, गले व कंधे में दर्द होना आम बात है. इस के अलावा और भी कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं. चिकित्सा विज्ञान में इसे कंप्यूटर विजन सिंड्रोम यानी सीवीएस कहा जाता है. बच्चे भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं. कंप्यूटर स्क्रीन के सामने घंटों बैठे रहने की वजह से बच्चे की आंखों में तनाव पैदा होता है क्योंकि कंप्यूटर बच्चे की दृष्टि प्रक्रिया को फोकस करने के लिए मजबूर करता है जिस से किसी और काम के मुकाबले आंखों में अधिक तनाव होता है.

कारण

दृष्टि : जिन लोगों को दूर या पास की चीजों को साफसाफ देखने में परेशानी होती है या फिर जो एस्टीगमैटिज्म से पीडि़त हैं उन्हें सीवीएस का खतरा बहुत अधिक रहता है. मल्टीफोकल लैंस इसे और कठिन बना देता है क्योंकि स्क्रीन ऊंची होती है और दूर या नजदीक के लिए बने हुए क्षेत्रों से और दूर होती है.

रोशनी : आसपास जलते लैंप तथा बिजली की वजह से भी आंखों में खिंचाव या तनाव हो सकता है.

कंप्यूटर टेबल का डिजाइन : अधिकांश स्थितियों में कंप्यूटर का मौनिटर बहुत ऊंचाई पर रखा रहता है. जबकि स्क्रीन का ऊपरी सिरा आंखों के समानांतर होना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि देखने का आदर्श कोण आंखों के नीचे 10 से ले कर 20 डिगरी तक होता है. अगर स्क्रीन बहुत ऊंचाई पर है तो आप को आंखें झपकाने का अपेक्षाकृत कम अवसर मिलता है जिस से उन में सूखापन या जलन पैदा हो जाती है. इस वजह से सिर में दर्द, गरदन में दर्द तथा पीठ के ऊपरी भाग में दर्द होता है क्योंकि देखने के लिए सिर को पीछे की तरफ झुकाना पड़ता है.

ये भी पढ़ें- छोटे बच्चों को सुलाने के ये 4 आसान तरीके…

शुष्क वातावरण एवं डिहाइड्रेशन : बहुत सारे कार्यालयों में वायु का स्तर बहुत बुरा होता है. बहुत अधिक तल्लीनता के साथ कंप्यूटर पर काम करने की वजह से कई बार आप कुछ पीना भूल जाते हैं जोकि स्थिति को और बिगाड़ सकता है. या कभीकभी आप उठने की जरूरत महसूस नहीं करते. कार्यस्थल या घर के साथ जुड़ी इन 2 समस्याओं की वजह से आंखों की जलन एवं उन की शुष्कता और अधिक बढ़ जाती है.

अनजानी सामग्रियों को पढ़ना : अगर आप अनजानी सूचनाओं को समझने की कोशिश करते हैं और वह भी बहुत छोटी समयसीमा के अंदर तो ऐसी स्थिति में आप का मस्तिष्क तनावग्रस्त व उत्तेजित हो जाता है. और जब मानसिक तनाव या उत्तेजना पैदा हो तो उस का असर बांहों, कंधों, गरदन, सिर सहित शरीर के समूचे ऊपरी हिस्से पर होता है. यही वजह है कि कार्यस्थल पर पढ़ना बहुत थकाने वाला होता है.

निवारण

पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था : अकसर बाहर से आने वाली तेज रोशनी तथा भीतर की जरूरत से ज्यादा तेज रोशनी आंखों में तनाव पैदा करती है. जब आप कंप्यूटर का इस्तेमाल कर रहे हों तो वहां अधिकतर कार्यालयों में रहने वाली रोशनी की आधी रोशनी ही रहनी चाहिए. बाहर से आने वाली रोशनी को बंद कर देना चाहिए. आंतरिक रोशनी को भी कम कर देनी चाहिए या फिर कम पावर के बल्बों व ट्यूबों का इस्तेमाल करना चाहिए. अपने मौनिटर को इस तरह से रखिए कि खिड़कियां, उस के सामने या पीछे रहने के बजाय अगलबगल में रहें.

ये भी पढ़ें- Periods में ना करें ये 6 गलतियां…

कम से कम चकाचौंध : दीवारों या सतह की चकाचौंध के साथसाथ कंप्यूटर स्क्रीन पर होने वाला परावर्तन भी आंखों में तनाव पैदा करता है. आप अपने मौनिटर पर चमकविहीन स्क्रीन (एंटीग्लेयर) लगा सकते हैं. फिर जब बाहरी रोशनी कम नहीं की जा सकती हो तो कंप्यूटर हुड का इस्तेमाल कीजिए. खिड़कियों के शीशों पर परावर्तन रोकने वाली कोटिंग लगवाएं. ऐसा करने से आप के लैंस के पिछले हिस्से से चमक और प्रतिबिंब आप की आंखों तक नहीं पहुंच पाएंगे.

स्क्रीन की चमक को एडजस्ट करें : मौनिटर के बटनों के इस्तेमाल द्वारा कंप्यूटर स्क्रीन की चमक को आसपास के वातावरण की चमक के अनुरूप बनाएं. इस के अलावा मौनिटर को एडजस्ट करते हुए ऐसी व्यवस्था करें कि स्क्रीन की पृष्ठभूमि तथा स्क्रीन पर दिखाई दे रहे शब्दों या तसवीरों के बीच कंट्रास्ट हाई रहे. साथसाथ अपने डैस्क लैंप को इस तरह से रखें कि वह न तो कंप्यूटर स्क्रीन पर चमके न ही आप की आंखों पर.

पलकें अधिक झपकाएं : कंप्यूटर पर काम करते हुए पलकें झपकाना बहुत जरूरी है क्योंकि इस से आंखों में शुष्कता तथा जलन पैदा नहीं होती और पानी आता रहता है. अध्ययनों के अनुसार, सामान्य स्थितियों के मुकाबले कंप्यूटर पर काम करते हुए लोग पलकों को पांचगुना कम झपकाते हैं. पलकें नहीं झपकाने की वजह से आंसू नहीं आते जिस से आंखें तेजी से शुष्क हो जाती हैं. कार्यालयों में जो शुष्क वातावरण होता है उस की वजह से भी आंखों में कम आंसू आते हैं. इस व्यायाम को आजमाएं और हर आधे घंटे में 10 बार आंखों को इस तरह से धीरेधीरे झपकाएं जैसे सो रहे हों.

आंखों को फैलाएं : हर आधे घंटे बाद कंप्यूटर स्क्रीन से नजरें हटाएं और दूरी पर रखी हुई किसी चीज पर 5-10 सैकंड के लिए नजरें डालें. अपने फोकस को फिर से एडजस्ट करने के लिए पहले दूर रखी चीज पर 10-15 सैकंड तक नजरें टिकाए रखें और उस के बाद फिर पास की चीज पर 10-15 सैकंड तक फोकस करें.

10 बार ऐसा ही करें. इन दोनों व्यायामों से आप की दृष्टि तनावग्रस्त नहीं होगी और आप की आंखों की फोकस करने वाली मांसपेशियों में भी फैलाव होगा. इस के अलावा हर 20 मिनट बाद 20 सैकंड का ब्रेक लें.

ये भी पढ़ें- हेल्थ टिप्स: जाने क्यों हंसना जरूरी हैं

कार्यस्थल को बेहतर बनाएं : अगर आप को कंप्यूटर स्क्रीन और पेज को बारीबारी स??े देखना पड़ता है तो उस से आंखों में तनाव पैदा होता है. इस समस्या से बचने के लिए मौनिटर से सटे हुए कौपी स्टैंड पर लिखे हुए पेपर को रखें. अपने कार्य स्टेशन तथा कुरसी को सही ऊंचाई पर स्थापित करें. ऐसा फर्नीचर खरीदें जिस से कंप्यूटर स्क्रीन सही जगह पर रखी जा सके.

बहरहाल, जो लोग बैठ कर काम करते हों, विशेष रूप से जो कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें समयसमय पर खड़े होना चाहिए, टहलना चाहिए या बांहों, पैरों, पीठ, गले तथा कंधे का व्यायाम करना चाहिए.

हालांकि ये सारे उपाय बहुत से मामलों में समस्याएं खत्म कर सकते हैं लेकिन इस बात का भी ध्यान रखें कि जब कभी भी कंप्यूटर विजन सिंड्रोम के लक्षण नजर आएं, आंखों के डाक्टर के पास जा कर सलाह अवश्य लें.

क्या वैक्स कराने के बाद आपको भी होती हैं ये 4 प्रौब्लम्स

अनचाहे बालों को दूर करने के लिए आप वैक्स कराती हैं. लेकिन कई बार वैक्स कराने के बाद आपके स्क‍ि‍न पर दाने निकल आते हैं. कई बार रैशेज की समस्या हो जाती है.

इन दानों में दर्द तो नहीं होता लेकिन इनमें खुजली जरूर होती है. साथ ही त्वचा भी स्मूद नजर नहीं आती. ये समस्या खासतौर पर पीठ और बांह के ऊपरी हिस्से में होती है. लेकिन अगर समस्या बहुत गंभीर नहीं है तो इन उपायों को अपनाकर आप इन दानों और रैशेज से आराम पा सकती हैं

ये भी पढ़ें- 6 टिप्स: ऐसे पाएं नेचुरल ब्यूटी

अगर दाने हो गए हैं तो ये उपाय आपके लिए फायदेमंद रहेंगे:

  1. अगर वैक्स कराना बहुत जरूरी नहीं हो तो पीरियड्स के दिनों में वैक्स कराने से बचें. इन दिनों में हमारा शरीर हार्मोनल बदलाव के चलते बहुत सेंसटिव हो जाता है. जिससे किसी भी तरह के इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है.

2. वैक्स कराने के दौरान ढीले और कौटन के कपड़े ही पहनें. बहुत टाइट कपड़े पहनने से रैशेज और दानों की प्रौब्लम बढ़ जाएगी.

3. अगर वैक्स कराने के बाद आपको दाने हो गए हैं तो इन जगहों पर एंटी-बायोटिक क्रीम या लोशन का इस्तेमाल करें. इससे खुजली नहीं होगी.

4. प्रभावित जगह पर बर्फ का इस्तेमाल करें. इससे दानें दब जाएंगे और खुजली भी कम होगी. बर्फ लगाने के बाद मौइश्चराइजर लगाना न भूलें.

ये भी पढ़ें- छोटे बच्चों को सुलाने के ये 4 आसान तरीके…

पेट के कैंसर में फायदेमंद है हल्दी, जानें कैसे

पेट के कैंसर के लक्षणों के बारे में बात करें तो शुरुआत में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होता है. आप जो खाते हैं उसका सीधा असर आपके शरीर पर होता है. गलत खाना जहां आपको बीमार कर सकता है वहीं सही और सेहतमंद आहार कई रोगों को दूर कर सकता है.

हल्दी के पौधे की जड़ों से निकले करक्यूमिन को पेट का कैंसर रोकने या उससे राहत दिलाने में मददगार है. फेडरल यूनिवर्सिटी आफ साओ पाउलो (यूनिफैस्प) और फेडरल यूनिवर्सिटी आफ पारा (उफ्पा) के शोधकतार्ओं ने ब्राजील में यह जानकारी दी.

ये भी पढ़ें- आलू खाने से हो सकते हैं ये 4 नुकसान

करक्यूमिन के अलावा, हिस्टोन गतिविधि को संशोधित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अन्य यौगिकों में कोलकेल्सीफेरोल, रेस्वेराट्रोल, क्वेरसेटिन, गार्सिनौल और सोडियम ब्यूटाइरेट (आहार फाइबर के फरमेंटेशन के बाद आंत के बैक्टीरिया द्वारा उत्पादित) प्रमुख थे.

वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड इंटरनेशनल के पेट के कैंसर संबंधी आंकड़ों के अनुसार, विश्व स्तर पर, प्रत्येक वर्ष गैस्ट्रिक कैंसर के अनुमानित 9,52,000 नए मामले सामने आते हैं, जिसमें लगभग 7,23,000 लोगों की जान चली जाती है (यानी 72 प्रतिशत मृत्यु दर). भारत में, पेट के कैंसर के लगभग 62,000 मामलों का प्रतिवर्ष निदान किया जाता है (अनुमानित 80 फीसदी मृत्यु दर के साथ).

ये भी पढ़ें- कही आप भी तो नहीं हैं पीसीओडी की शिकार, ऐसे करें पहचान…

पेट के कैंसर के कारण  

भारत में कई जगहों पर, आहार में फाइबर सामग्री कम रहती है. अधिक मसालेदार और मांसाहारी भोजन के कारण पेट की परत में सूजन हो सकती है, जिसे अगर छोड़ दिया जाए तो कैंसर हो सकता है.

ये भी पढ़ें- जानें, खुश और जवान रहने के लिए कुत्ता पालना क्यों है जरूरी

5 टिप्स: नेल आर्ट के लिए इन बातों का रखें ध्यान

आजकल यंगस्टर्स में फैशन को लेकर बहुत क्रेज हैं फिर बात चाहे ड्रैस की हो या मेकअप की. यंग गर्ल्स में नेल आर्ट का फैशन भी जोरों पर है. यह आपके हाथों को एक अलग लुक देने के साथ-साथ आपको एक स्टाइलिश लुक भी देता है. अगर आप भी इस गरमी कुछ नया और अच्छा ट्राई करना चाहती हैं तो यह आपके नेल आर्ट आपके लिए एक अच्छा औप्शन है.

स्क्वायर शेप्ड नेल्स नेल्स का करें इस्तेमाल

पहले ओवल शेप्ड नेल्स रखने का चलन था लेकिन जबसे नेलआर्ट का फैशन आया है तब से गर्ल्स स्क्वायर शेप्ड नेल्स ज्यादा रखने लगी हैं. उन्हें लगता है कि ऐसे शेप पर नेलआर्ट ज्यादा बेहतर लगती है.

ये भी पढ़ें- 5 टिप्स: गरमी में सही शैम्पू का इस्तेमाल है जरूरी

मार्केट में हैं नेलआर्ट के कईं औप्शन

मार्केट में आप को ग्लिटर, स्माइली, स्टार आदि डिजाइंस की नेलआर्ट आसानी से मिल जाएंगी. यहां तक कि अब दोनों हाथों की एक फिंगर पर गोल्डन कलर और बाकी पर डिफरैंट शेड्स का फैशन से नेल्स को भी स्टाइलिश लुक मिलता है.

आर्टीफिशल नेल्स पर भी कर सकती हैं नेल आर्ट

नेलआर्ट का फैशन आने से अब आप को नेल्स के टूटने पर भी टैंशन नहीं होगी, क्योंकि आप आर्टिफिशियल नेल्स लगा कर उनकी खूबसूरती को बरकरार रख सकती हैं.

डार्क और लाइट कलर का रखें औप्शन

ध्यान रखना होगा कि अगर आप 2 कलर्स से नेलआर्ट कर रही हैं तो दोनों ही डार्क या फिर दोनों ही लाइट न हों और साथ ही नेलआर्ट ज्यादा समय तक टिकी रहे, इस के लिए उन पर अपर कोट अप्लाई करना न भूलें, क्योंकि इस से नेल्स पर शाइनिंग आती है.

ये भी पढ़ें- घर पर ऐसे बनाएं स्ट्रौबेरी बौडी वाश

नेलआर्ट किट का कर सकते हैं इस्तेमाल

इस बात को लेकर भी परेशान न हों कि आप को नेलआर्ट करने में दिक्कत होगी. बाजार में आप को नेलआर्ट किट मिल जाएगी या फिर आप घर पर ही 3-4 नेलपेंट्स को मिला कर नेलआर्ट कर सकती हैं. तो फिर हो जाइए तैयार अपनी फिंगर्स को ब्यूटीफुल लुक देने के लिए.

कानूनी बीड़ी का बंडल

मुकदमा साधारण था मगर कचहरी के चक्कर लगातेलगाते सोमेश को महीनों हो चले थे. उस के पिताजी भी कई पेशियों मेें साथ गए थे. मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात. विरोधी पक्ष वाले चंटचालाक थे. हर बार जोड़तोड़ कर या तो तारीख डलवा लेते या फिर कोई नया पेंच फंसा देते थे. लिहाजा, साधारण सा दिखने वाला मुकदमा खासा लंबा समय ले गया था.

शहर में सोमेश के दादा लाहौरी राम के कई मकान और दुकानें थीं. वे पटवारी के पद पर तैनात हो कर कानूनगो के पद से रिटायर हुए थे. ऊपरी कमाई से खासी बरकत थी. सस्ते जमाने में जमीनजायदाद खासी सस्ती थी. आजकल के जमाने के मुकाबले तब आम लोगों की कमाई काफी कम थी. मकान, दुकान खरीदने, बनाने का रुझान लोगों में कम ही था.

अनेक मकानों, दुकानों से किराया आ रहा था.

कभीकभार मकान या दुकान खाली करवाने या किराया वसूलने के लिए मुकदमा डालना पड़ता था.

मगर अब धीरेधीरे उन की सक्रियता कम हो चली थी. उन्होंने सब लेनदेन अपने बेटे संतराम और जवान होते पोते सोमेश को संभलवा दिया था.

संतराम भी सरकारी मुलाजिम था मगर उस में अपने रिटायर्ड कानूनगो बाप जितनी जोड़तोड़ की प्रतिभा और चालाकी न थी.

लाहौरी राम ने गरीबी और अभाव के दिनों में मेहनतमशक्कत की थी जिस से उन में स्वाभाविक तौर पर दृढ़ इच्छाशक्ति, हर स्थितिपरिस्थिति से निबटने की क्षमता विकसित हो गई थी.

वहीं संतराम जैसे मुंह में चांदी का चम्मच ले कर पैदा हुआ था. इसलिए उस मेें अपने पिता समान दृढ़ता और मजबूती न थी.

तीसरी पीढ़ी के सोमेश में हालांकि आज के जमाने का चुस्त दिमाग था. वह एम.ए. तक पढ़ा था. एक कंपनी में कनिष्ठ प्रबंधक था मगर उस में भी अपने दादा की तरह बुद्धि का कौशल दिखाने की प्रतिभा न थी.

ये भी पढ़ें- उपाध्यक्ष महोदय

विरोधी पक्ष यानी किराएदार पहले के किराएदारों की तुलना में चंटचालाक था.

उस की तुलना में सोमेश और उस के पिता एक तरह से अनाड़ी थे.

‘‘क्यों सोमेश, क्या हुआ मकान वाले मुकदमे में?’’ एक सुबह दादाजी ने नाश्ता करते हुए पूछा.

‘‘जी, हर पेशी पर वह तारीख बढ़वा लेता है.’’

‘‘वह किस तरह? अपना वकील क्या करता है?’’

‘‘दादाजी, पुराने वकील तो रहे नहीं. उन का लड़का इतना ध्यान नहीं देता.’’

लाहौरी राम सोचने लगे. समय सचमुच बदल गया है. उन के हमउम्र ज्यादातर तो गुजर चुके थे या फिर उन के समान रिटायर हो एकाकी जीवन बिता रहे थे.

‘‘अगली पेशी कब की है?’’

‘‘इसी महीने 19 तारीख की है.’’

‘‘ठीक है, इस पेशी पर मैं चलूंगा तेरे साथ.’’

पेशी वाले दिन दादाजी ने अपना स्थायी पहरावा सफेद धोतीकुरता पहना और सिर पर साफा बांध लिया. कलाई पर पुराने समय की आयातित घड़ी बांध ली और अपना पढ़ने का चश्मा जेब में डाल लिया.

सोमेश की मां को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘संते की बहू, जरा छोटेबड़े कुछ नोट देना, कचहरी में चायपानी देना पड़ता है.’’

‘‘दादाजी, मेरे पर्स में हैं.’’

‘‘तू अपना पर्स अपने पास रख.’’

सोमेश की मां ने 5-10 के नोटोें का एक छोटा सा पुलिंदा अपने ससुर को थमा दिया. दादाजी सारी उम्र कोर्टकचहरी आतेजाते रहे थे. वे सभी सरकारी मुलाजिमों की मानसिकता से परिचित थे. बिना चायपानी दिए कहीं कोई काम नहीं होता था. इसलिए छुट्टा रुपया जेब में रखना पड़ता था. बड़े नोट का ‘खुल्ला’ कचहरी में कभी नहीं मिलता था.

सोमेश पार्किंग में अपनी कार खड़ी कर आया. दादाजी अपने पुराने वकील शंभू दयाल का तख्त ढूंढ़ने लगे.

वरिष्ठ वकील शंभू दयाल अब रिटायर हो कर घर पर आराम करते थे. उन का लड़का अवतार शरण ही अब वकालत करता था.

‘‘नमस्ते, लाहौरी रामजी, सुनाइए क्या हालचाल हैं?’’ अवतार शरण ने व्यवसायसुलभ स्वर में कहा.

‘‘सब ठीक है. बड़े बाबूजी कहां हैं?’’

‘‘वे इन दिनों घर पर आराम करते हैं जी.’’

‘‘हमारे मुकदमे की क्या पोजीशन है?’’

‘‘ठीक है, जी.’’

‘‘पेशियां बहुत पड़ चुकी हैं.’’

‘‘ऐसा है जी, पहले के मुकाबले अब मुकदमे काफी ज्यादा हैं, जज साहब हर मुकदमा लंबी पेशी पर ही डालते हैं.’’

लाला लाहौरी राम खामोश हो सब सुन रहे थे. पुराने वकील शंभू दयाल कभी इस तरह की टालने की बात नहीं करते थे. कचहरी का समय हो चला था. दादाजी अपने पोते के साथ नियत कोर्ट रूम के बाहर बरामदे में बनी बैंच पर जा बैठे.

ये भी पढ़ें- सजा

दादाजी ने अपने कुरते की जेब से एक बीड़ी का बंडल निकाला. उन को बीड़ी का बंडल निकालते देख सोमेश बोलने को हुआ कि दादाजी, अब सार्वजनिक स्थान पर बीड़ी पीना जुर्म है, मगर जब और कई लोगों को बीड़ी पीते देखा तो चुप रह गया.

दादाजी ने एक नजर चारों तरफ घुमाई. उन की अनुभवी निगाहों ने आसपास बैठे लोगों को ताड़ा. उन में से कई ऐसे थे जिन का कोर्टकचहरी में कोई मुकदमा न था, मगर उन का रोजाना आना पक्का था.

ऐसे लोगोें में अभीलाल नाम का एक आदमी भी था जो एक पेशेवर गवाह था. ऐसे पेशेवर गवाह तो हर जगह खासकर थाना, तहसील, सरकारी दफ्तर, खजाना या कचहरी में आम मिलते थे. इन का काम अपनी फीस या चायपानी ले गवाही देना होता था.

इन की जेब में बीड़ी का बंडल तो नहीं मगर माचिस जरूर मिलती थी. किसी आसामी के मांगने पर तपाक से माचिस पेश कर देते थे. माचिस के एहसान के बदले में बीड़ी का आफर मिलना स्वाभाविक था जिसे सहर्ष कबूल कर लेते थे. कभीकभी तो बढि़या सिगरेट भी मिल जाती थी. मगर ज्यादातर व्यवहार बीड़ी के बंडल का था.

‘‘क्यों जी, माचिस है क्या?’’

अभीलाल जैसे उसी पुकार की इंतजार में था. उस ने झट से माचिस जेब से निकाली और डबिया खिसका तीली निकाली और जलाने को हुआ.

दादाजी ने बंडल से 2 बीडि़यां निकालीं. एक अपनी उंगलियों में दबाई और दूसरी अभीलाल को थमा दी. अभीलाल ने तीली जलाई और पहले दादाजी की बीड़ी सुलगाई और फिर तीली बुझा कर फर्श पर डाल दी.

मामूली बातों से आरंभ कर दादाजी ने बात का रुख वर्तमान की स्थिति पर मोड़ दिया.

‘‘आजकल लोकअदालत का बड़ा शोर है, यह क्या है?’’

‘‘लालाजी, नए जमाने का चलन है, जहां दोनों पार्टियों को राजी कर मुकदमा जल्दी खत्म किया जाता है.’’

‘‘इस मामले से सारे मुकदमे खत्म हो जाएंगे तब तेरे जैसे गवाहों की रोजीरोटी का क्या होगा?’’

इस पर अभीलाल हंसने लगा. आसपास बैठे सभी लोग भी हंसने लगे. हंसने का कारण समझ आने पर दादाजी हंसने लगे. कितना भी परिवर्तन किया जाए, कितने ही सुधार किए जाएं, क्या कभी मुकदमे, लड़ाईझगड़े समाप्त हो सकते हैं?

‘‘अपना नंबर कब आएगा?’’ दादाजी ने सोमेश से पूछा.

‘‘पिछली बार तो दोपहर बाद आवाज पड़ी थी.’’

‘‘ठीक है, तब तक मैं जरा टहल आऊं.’’

‘‘आओ भई, एकएक कप चाय हो जाए,’’ दादाजी के साथ अभीलाल भी उठ खड़ा हुआ.

चायसमोसे के दौरान दादाजी ने अभीलाल से अपनी वांछित जानकारी ले ली. मसलन, जज कैसा है? लेता है तो कितनी रिश्वत लेता है? उस का संपर्क सूत्र कौन है? आदि.

उस दिन भी तारीख पड़ गई थी मगर उस से अविचलित दादाजी अपनी हासिल जानकारी पर अमल करने में जुट गए थे. संपर्क सूत्र के जरिए जज साहब से मामला तय हो गया था. किसी को फल, किसी को ड्राईफ्रूट का टोकरा, किसी को शराब की पेटी पहुंच गई थी.

अगली 3 पेशियों के बाद मुकदमे का फैसला दादाजी के हक में हो गया था. एम.ए. तक पढ़े बापबेटा पुराने मिडल पास कानूनगो की बुद्धि की चतुराई को नहीं छू पाए थे.

ये भी पढ़ें- यही सच है

 – नरेंद्र कुमार टंडन

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें