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कर लो दुनिया मुट्ठी में

गुरुदेव ने रात को भास्करानंद को एक लंबा भाषण पिला दिया था.‘‘नहीं, भास्कर नहीं, तुम संन्यासी हो, युवाचार्य हो, यह तुम्हें क्या हो गया है. तुम संध्या को भी आरती के समय नहीं थे. रात को ध्यान कक्ष में भी नहीं आए? आखिर कहां रहे? आगे आश्रम का सारा कार्यभार तुम्हें ही संभालना है.’’

भास्करानंद बस चुप रह गए.

रात को लेटते ही श्यामली का चेहरा उन की आंखों के सामने आ गया तो वे बेचैन हो उठे.

आंख बंद किए स्वामी भास्करानंद सोने का अथक प्रयास करते रहे पर आंखों में बराबर श्यामली का चेहरा उभर आता.

खीझ कर भास्करानंद बिस्तर से उठ खड़े हुए. दवा के डब्बे से नींद की गोली निकाली. पानी के साथ निगली और लेट गए. नींद कब आई पता नहीं. जब आश्रम के घंटेघडि़याल बज उठे, तब चौंक कर उठे.

‘लगता है आज फिर देर हो गई है,’ वे बड़- बड़ाए.

पूजा के समय भास्करानंद मंदिर में पहुंचे तो गुरुदेव मुक्तानंद की तेज आंखें उन के ऊपर ठहर गईं, ‘‘क्यों, रात सो नहीं पाए?’’

भास्करानंद चुप थे.

‘‘रात को भोजन कम किया करो,’’ गुरुदेव बोले, ‘‘संन्यासी को चाहिए कि सोते समय वह टीवी से दूर रहे. तुम रात को भी उधर अतिथिगृह में घूमते रहते हो, क्यों?’’

भास्करानंद चुप रहे. वे गुरुदेव को क्या बताते कि श्यामली का रूपसौंदर्य उन्हें इतना विचलित किए हुए है कि उन्हें नींद ही नहीं आती.

गुरुदेव से बिना कुछ कहे भास्करानंद मंदिर से बाहर आ गए.

तभी उन्हें आश्रम में श्यामली आती हुई दिखाई दी. उस की थाली में गुड़हल के लाल फूल रखे थे. उस ने अपने घने काले बालों को जूड़े में बांध कर चमेली की माला के साथ गूंथा था. एक भीनीभीनी खुशबू उन के पास से होती हुई चली जा रही थी. उन्हें लगा कि वे अभी, यहीं बेसुध हो जाएंगे.

‘‘स्वामीजी प्रणाम,’’ श्यामली ने भास्करानंद के चरणों में झुक कर प्रणाम किया तो उस के वक्ष पर आया उभार अचानक भास्करानंद की आंखों को स्फरित करता चला गया और वे आंखें फाड़ कर उसे देखते रह गए.

श्यामली तो प्रणाम कर चली गई लेकिन भास्करानंद सर्प में रस्सी को या रस्सी में सर्प के आभास की गुत्थी में उलझे रहे.

विवेक चूड़ामणि समझाते हुए गुरुदेव कह रहे थे कि यह संसार मात्र मिथ्या है, निरंतर परिवर्तनशील, मात्र दुख ही दुख है. विवेक, वैराग्य और अभ्यास, यही साधन है. इस विष से बचने में ही कल्याण है.

पर भास्करानंद का चित्त अशांत ही रहा.

उस रात भास्करानंद ने गुरुजी से अचानक पूछा था.

‘‘गुरुजी, आचार्य कहते हैं, यह संसार विवर्त है, जो है ही नहीं. पर व्यवहार में तो मच्छर भी काट लेता है, तो तकलीफ होती है.’’

‘‘हूं,’’ गुरुजी चुप थे. फिर वे बोले, ‘‘सुनो भास्कर, तुम विवेकानंद को पढ़ो, वे तुम्हारी ही आयु के थे जब शिकागो गए थे. गुरु के प्रति उन जैसी निष्ठा ही अपरिहार्य है.’’

‘‘जी,’’ कह कर भास्कर चुप हो गए.

घर याद आया. जहां खानेपीने का अभाव था. भास्कर आगे पढ़ना चाह रहा था, पर कहीं कोई सुविधा नहीं. तभी गांव में गुरुजी का आना हुआ. उन से भास्कर की मुलाकात हुई. उन्होेंने भास्कर को अपनी किताब पढ़ने को दी. उस के आगे पढ़ने की इच्छा जान कर, उसे आश्रम में बुला लिया. अब वह ब्रह्मचारी हो गया था.

भास्कर का कसा हुआ बदन व गोरा रंग, आश्रम के सुस्वादु भोजन व फलाहार से उस की देह भी भरने लग गई.

एक दिन गुरुजी ने कहा, ‘‘देखो भास्कर, यह इतना बड़ा आश्रम है, इस के नाम खेती की जमीन भी है. यहां मंत्री भी आते हैं, संतरी भी. यह सब इस आश्रम की देन है. यह समाज अनुकरण पर खड़ा है. मैं आज पैंटशर्ट पहन कर सड़क पर चलूं तो कोई मुझे नमस्ते भी नहीं करेगा. यहां भेष पूजा जाता है.’’

भास्कर चुप रह जाता. वेदांत सूत्र पढ़ने लगता. वह लघु सिद्धांत कौमुदी तो बहुत जल्दी पढ़ गया. संस्कृत के अध्यापक कहते कि अच्छे संन्यासी के लिए अच्छा वक्ता होना आवश्यक है और अच्छे वक्ता के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है.

कर्नाटक की तेलंगपीठ के स्वामी दिव्यानंद भी आए थे. वे कह रहे थे, ‘‘तुम अंगरेजी का ज्ञान भी लो. दुनिया में नाम कमाना है तो अंगरेजी व संस्कृत दोनों का ज्ञान आवश्यक है. धाराप्रवाह बोलना सीखो. यहां भी ब्रांड ही बिकता है. जो बड़े सपने देखते हैं वे ही बड़े होते हैं.’’

भास्कर अवाक् था. स्वामीजी की बड़ी इनोवा गाड़ी पर लाल बत्ती लगी हुई थी. पुलिस की गाड़ी भी साथ थी. उन्होंने बहुत पहले अपने ऊपर हमला करवा लिया था, जिस में उन की पुरानी एंबैसेडर टूट गई थी. सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया था. उन के भक्तों ने सरकार पर दबाव बनाया, उन्हें सुरक्षा मिल गई थी. इस से 2 लाभ, आगे पुलिस की गाड़ी चलती थी तो रास्ते में रुकावट नहीं, दूसरे, इस से आमजन पर प्रभाव पड़ता है. भेंट जो 100 रुपए देते थे, वे 500 देने लग गए.

भास्कर समझ रहा था, जितना सीखना चाहता था, उतना ही उलझता जाता था. स्वामीजी के हाथ में हमेशा अंगरेजी के उपन्यास रहते या मोटीमोटी किताबें. वे पढ़ते तो कम थे पर रखते हमेशा साथ थे.

उस दिन उन से पूछा तो बोले, ‘‘बेटा, ये सरकारी अफसर, कालेज के प्रोफेसर, सब इसी अंगरेजी भाषा को जानते हैं. जो संन्यासी अंगरेजी जानता है उस के ये तुरंत गुलाम बन जाते हैं. समझो, विवेकानंद अगर बंगला भाषा बोलते और अमेरिका जाते तो चार आदमी भी उन्हें नहीं मिलते. अंगरेजी भाषा ने ही उन्हें दुनिया में पूजनीय बनाया. तुम्हारे ओशो भी इन्हीं भक्तों की कृपा से दुनिया में पहुंचे. योग साधना से नहीं. किताबें तो वे पतंजलि पर भी लिख गए. खूब बोले भी पर खुद दुनिया भर की सारी बीमारियों से मरे. कभी किसी ने उन से पूछा कि आप ने जिस योग साधना की बातें बताईं, उन्हें आप ने क्यों नहीं अपनाया और आप का शरीर स्वस्थ क्यों नहीं रहा?

‘‘बातें हमेशा बात करने के लिए होती हैं. दूसरों को चलाओ, तुम चलने लगे तो तकलीफ होगी. इस जनता पर अंगरेजी का प्रभाव पड़ता है. तुम सीखो, तुम्हारी उम्र है.’’

भास्कर पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गांव से आया था. गुरुजी उसे योग विद्या सिखा रहे थे. ब्रह्मसूत्र पढ़वा रहे थे. स्वामी दिव्यानंद उसे अंगरेजी भाषा में दक्ष करना चाह रहे थे.

बनारस में उस के मित्र जो देहात से आए थे उन्होंने एम.बी.ए. में दाखिला लिया था. दाखिला लेते ही रात को सोते समय भी वे मुश्किल से टाई उतारते थे. वे कहते थे, हमारी पहचान ड्रेसकोड से होती है.

स्वामीजी कह रहे थे, ‘‘संन्यासी की पहचान उस की मुद्रा है. उस का ड्रेसकोड है. उत्तरीय कैसे डाला जाए, सीखो. शाल कैसे ओढ़ते हैं, सीखो. रहस्य ही संन्यासी का धन है. जो भी मिलने आए उसे बाहर बैठाओ. जब पूरी तरह व्यवस्थित हो जाओ तब उसे पास बुलाओ. उसे लगे कि तुम गहरे ध्यान में थे, व्यस्त थे. उसे बस देखो, उसे बोलने दो, वह बोलताबोलता अपनी समस्या पर आ जाएगा. उसे वहीं पकड़ लो. देखो, हर व्यक्ति सफलता चाहता है. उसी के लिए उस का सबकुछ दांव पर लगा होता है. तुम्हें क्या करना है, उस से अच्छा- अच्छा बोलो. यहां 10 आते हैं, 5 का सोचा हो जाता है. 5 का नहीं होता. जिन 5 का हो जाता है, वे अगले 25 से कहते हैं. फिर यहां 30 आते हैं. जिन का नहीं हुआ वे नहीं आएं तो क्या फर्क पड़ता है. सफलता की बात याद रखो, बाकी भूल जाओ.’’

भास्कर यह सब सुन कर अवाक् था.

स्वामी विद्यानंद यहां आए थे. गुरुजी ने उन के प्रवचन करवाए. शहर में बड़ेबड़े विज्ञापनों के बैनर लगे. उन के कटआउट लगे. काफी भक्तजन आए. भास्कर का काम था कि वह सब से पहले 100 व 500 रुपए के कुछ नोट उन के सामने चुपचाप रख आता था. वहां इतने रुपयों को देख कर, जो भी उन से मिलने आता, वह भी 100 व 500 रुपए से कम भेंट नहीं देता था.

भास्कर समझ गया था कि ग्लैमर और करिश्मा क्या होता है. ‘ग्लैमर’ दूसरे की आंख में आकर्षण पैदा करना है. स्वामीजी के कासमैटिक बौक्स में तरहतरह की क्रीम रखी थीं. वे खुशबू भी पसंद करते थे. दक्षिणी सिल्क का परिधान था. आने वाला उन के सामने झुक जाता था.

पर भास्कर का मन स्वामी दिव्यानंद समझ नहीं पाए.

श्यामली के सामने आते ही भास्कर ब्रह्मसूत्र भूल जाता. वह शंकराचार्य के स्थान पर वात्स्यायन को याद करने लग जाता.

‘नहीं, भास्कर नहीं,’ वह अपने को समझाता. क्या मिलेगा वहां. समाज की गालियां अलग. कोई नमस्कार भी नहीं करेगा. 4-5 हजार की नौकरी. तब क्या श्यामली इस तरह झुक कर प्रणाम करेगी. इसीलिए भास्कर श्यामली को देखते ही आश्रम के पिछवाड़े के बगीचे में चला जाता. वह श्यामली की छाया से भी बचना चाह रहा था.

श्यामली अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. संस्कृत में उस ने एम.ए. किया था. रामानुजाचार्य के श्रीभाष्य पर उस ने पीएच.डी. की है तथा शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापिका थी. मातापिता दोनों शिक्षण जगत में रहे थे. धन की कोई कमी नहीं. पिता ने आश्रम के पास के गांव में 20 बीघा कृषि योग्य भूमि ले रखी थी. वहां वे अपने फार्म पर रहा करते थे. श्यामली के विवाह को ले कर मां चिंतित थीं. न जाने कितने प्रस्ताव वे लातीं, पर श्यामली सब को मना कर देती. श्यामली तो भास्कर को ही अपने समीप पाती थी.

भास्कर मानो सूर्य हो, जिस का सान्निध्य पाते ही श्यामली कुमुदिनी सी खिल जाती थी. मां ने बहुत समझाया पर श्यामली तो मानो जिद पर अड़ी थी. वह दिन में एक बार आश्रम जरूर जाती थी.

उस दिन भास्कर दिन भर बगीचे में रहा था. वह मंदिर न जा कर पंचवटी के नीचे दरी बिछा कर पढ़ता रहा. ध्यान की अवस्था में भास्कर को लगा कि उस के पास कोई बैठा है.

‘‘कौन?’’ वह बोला.

पहले कोई आवाज नहीं, फिर अचानक तेज हंसी की बौछार के साथ श्यामली बोली, ‘‘मुझ से बच कर यहां आ गए हो संन्यासी?’’

‘‘श्यामली, मैं संन्यासी हूं.’’

‘‘मैं ने कब कहा, नहीं हो. पर मैंने श्रीभाष्य पर पीएच.डी. की है. रामानुजाचार्य गृहस्थ थे. वल्लभाचार्य भी गृहस्थ थे. उन के 7 पुत्र थे. उन की पीढ़ी में आज भी सभी महंत हैं. कहीं कोई कमी नहीं है. पुजापा पाते हैं. कोठियां हैं, जो महल कहलाती हैं. क्या वे संत नहीं हैं?’’

‘‘तुम चाहती क्या हो?’’

‘‘तुम्हें,’’ श्यामली बोली, ‘‘भास्कर, तुम मेरे लिए ही यहां आए हो. तुम जिस परंपरा में जा रहे हो वहां वीतरागता है, पलायन है. देखो, अध्यात्म का संन्यास से कोई संबंध नहीं है. यह पतंजलि की बनाई हुई रूढि़ है, जिसे बहुत पहले इसलाम ने तोड़ दिया था. हमारे यहां रामानुज और वल्लभाचार्य तोड़ चुके थे. गृहस्थ भी संन्यासी है अगर वह दूसरे पर आश्रित नहीं है. अध्यात्म अपने को समझने का मार्ग है. आज का मनोविज्ञान भी यही कहता है पर तुम्हारे जैसे संन्यासी तो पहले दिन से ही दूसरे पर आश्रित होते हैं.’’

‘‘तुम चाहती क्या हो?’’

‘‘जो तुम चाहते हो पर कह नहीं पाते हो, तभी तो मना कर रहे हो. यहां छिप कर बैठे हो?’’

भास्कर चुप सोचता रहा कि गुरुजी कह रहे थे कि इस साधना पथ पर विकारों को प्रश्रय नहीं देना है.

‘‘मैं तुम्हें किसी दूसरे की नौकरी नहीं करने दूंगी,’’ श्यामली बोली, ‘‘हमारा 20 बीघे का फार्म है. वहां योगपीठ बनेगा. तुम प्रवचन दो, किताबें लिखो, जड़ीबूटी का पार्क बनेगा. वृद्धाश्रम भी होगा, मंदिर भी होगा, एक अच्छा स्कूल भी होगा. हमारी परंपरा होगी. एक सुखी, स्वस्थ परिवार.

‘‘भास्कर, रामानुज कहते हैं चित, अचित, ब्रह्म तीनों ही सत्य हैं, फिर पलायन क्यों? हम दोनों मिल कर जो काम करेंगे, वह यह मठ नहीं कर सकता. यहां बंधन है. हर संन्यासी के बारे में सहीगलत सुना जाता है. तुम खुद जानते हो. भास्कर, मैं तुम से प्यार करती हूं. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. मैं तुम्हारा बंधन नहीं बनूंगी. तुम्हें ऊंचे आकाश में जहां तक उड़ सको, उड़ने की स्वतंत्रता दूंगी,’’ इतना कह श्यामली भास्कर से लिपट गई थी. वृक्ष और लता दोनों परस्पर एक हो गए थे. उस पंचवटी के घने वृक्षों की छाया में, जैसे समय भी आ कर ठहर गया हो. श्यामली ने भास्करानंद को अपनी बांहों के घेरे में ले लिया था.

दोनों की सांसें टकराईं तो भास्कर सोचने लगा कि स्त्री के बिना पुरुष अधूरा है.

पंचवटी के घने वृक्षों की छाया में दोनों शरीर सुख के अलौकिक आनंद से सराबोर हो रहे थे. गहरी सांसों के साथ वे हर बार एक नई ऊर्जा में तरंगित हो रहे थे.

थोड़ी देर बाद श्यामली बोली, ‘‘भास्कर, तुम नहीं जानते, इस मठ के पूर्व गुरु की प्रेमिका की बेटी ही करुणामयी मां हैं?’’

‘‘नहीं?’’

‘‘यही सच है.’’

‘‘नहीं, यह सुनीसुनाई बात है.’’

‘‘तभी तो पूर्व महंतजी ने गद्दी छोड़ी थी और अपनी संपत्ति इन को दे गए, अपनी बेटी को…’’

भास्कर चुप रह गया था. यह उस के सामने नया ज्ञान था. क्या श्यामली सही कह रही है?

‘‘भास्कर, यह हमारी जमीन है, हम यहां पांचसितारा आश्रम बनाएंगे. जानते हो मेरी दादी कहा करती थीं, ‘रोटी खानी शक्कर से, दुनिया ठगनी मक्कर से’ दुनिया तो नाचने को तैयार बैठी है, इसे नचाने वाला चाहिए. आश्रम ऐसा हो जहां युवक आने को तरसें और बूढ़े जिन के पास पैसा है वे यहां आ कर बस जाएं. मैं जानती हूं कि सारी उम्र प्राध्यापकी करने से कितना मिलेगा? तुम योग सिखाना, वेदांत पर प्रवचन देना, लोगों की कुंडलिनी जगाना, मैं आश्रम का कार्यभार संभाल लूंगी, हम दोनों मिल कर जो दुनिया बसाएंगे, उसे पाने के लिए बड़ेबड़े महंत भी तरसेंगे.’’

श्यामली की गोद में सिर रख कर भास्कर उन सपनों में खो गया था जो आने वाले कल की वास्तविकता थी.

मानव अंगों का कालाबजार

मनुष्य के किडनी और लीवर जैसे अंग कई कारणों से खराब हो जाते हैं. ये ऐसे अंग हैं, जिन के बिना जिंदगी की कल्पना नहीं की जा सकती.

संगीता मूलरूप से बांदा जिले के तिंदवारी कस्बे से सटे गांव बड़ी पिपराही की रहने वाली थी.

कानपुर शहर में वह अपने पति राजेश कश्यप के साथ साकेत नगर स्थित प्लास्टिक गोदाम में रहती थी. राजेश कश्यप इलैक्ट्रीशियन था. वह किदवई नगर में बिजली की एक दुकान में काम करता था. इस काम से होने वाली आय से वह परिवार का खर्च चलाता था.

राजेश कश्यप का एक दोस्त श्याम तिवारी उर्फ श्यामू था. पेशे से ड्राइवर श्यामू जूहीलाल कालोनी में रहता था. दोस्त होने की वजह से श्यामू का उस के घर आनाजाना बना रहता था. एक दिन श्याम तिवारी एक व्यक्ति के साथ उस के यहां आया. श्यामू ने उस का परिचय अपने दोस्त मोहित निगम के रूप में दिया और बताया, ‘‘यह नौबस्ता के हनुमंत विहार में रहता है. इस के घर पर बिजली का कुछ काम होना है, तुम कर देना.’’

राजेश कश्यप हंस कर बोला, ‘‘श्यामू भाई, मोहित तुम्हारा दोस्त तो मेरा भी दोस्त है. बिजली का जो भी काम होगा, मैं कर दूंगा.’’

राजेश ने उन दोनों की खातिरदारी की. इतना ही नहीं, राजेश की पत्नी संगीता ने उन्हें बिना खाना खाए नहीं जाने दिया. खाना खाने के बाद श्यामू और मोहित ने संगीता के बनाए खाने की बहुत तारीफ की. दूसरे दिन राजेश मोहित निगम के घर गया और बिजली का काम कर आया. इस के बाद मोहित का भी राजेश के यहां आनाजाना होने लगा.

एक दिन मोहित घर आया तो उस समय संगीता घर में अकेली थी. उस ने इधरउधर नजर दौड़ाई फिर बोला, ‘‘भाभी, आप खाना बहुत स्वादिष्ट बनाती हैं. आप की जो पाक कला है, इस से अच्छाखासा पैसा कमा सकती हैं.’’

‘‘वह कैसे?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘भाभी, बड़े घरों में खाना पका कर. दिल्ली जैसे बड़े शहर में आप को आसानी से नौकरी मिल जाएगी और रहने के लिए आवास भी मिल जाएगा. आप जहां नौकरी करोगी, वहीं रहने और खानेपीने का बंदोबस्त हो जाएगा. इस से आप की पूरी तनख्वाह बच जाया करेगी.’’

‘‘पर वहां मेरी नौकरी लगवाएगा कौन?  मैं तो किसी को जानती तक नहीं हूं.’’ संगीता ने सवाल किया.

‘‘भाभी, मेरा एक दोस्त है जुनैद. उस की दिल्ली में बड़े घरानों में पहुंच है. वह आप की नौकरी आसानी से लगवा सकता है. बस आप नौकरी के लिए राजेश को तैयार करो.’’

इस के बाद श्याम, मोहित और संगीता ने राजेश पर दबाव डाला तो राजेश ने संगीता को नौकरी करने की इजाजत दे दी. फिर मोहित निगम ने राजेश व उस की पत्नी संगीता को जुनैद से मिलवाया. जुनैद ने संगीता को नौकरी दिलाने का भरोसा दिया.

25 नवंबर, 2018 को जुनैद संगीता व उस के पति राजेश को कानपुर से गाजियाबाद लाया और दोनों को एक होटल में ठहरा दिया. जुनैद खुद भी उसी होटल में रुका. दूसरे दिन जुनैद संगीता को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल ले गया और उस की कई छोटीबड़ी शारीरिक जांच करवाईं.

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इन जांचों से संगीता का माथा ठनका. उस ने जांच के संबंध में जुनैद से पूछा तो वह बोला, ‘‘भाभी, काम देने वाले बड़े लोग हैं. जांच करवा कर वह आश्वस्त होना चाहते हैं कि तुम शारीरिक रूप से फिट हो और तुम्हें कोई रोग नहीं है.’’ संगीता उस की बात से संतुष्ट हो गई.

राजेश्य कश्यप को जुनैद ने एक तरह से कैद कर लिया था. वह उसे होटल के कमरे से बाहर नहीं जाने देता था. तीसरे दिन जुनैद, संगीता को आधार कार्ड में नाम बदलवाने के लिए एक दुकान पर ले गया. वहां उस ने आधार में संगीता का नाम सकीना करा दिया. नाम बदलने को ले कर संगीता का दुकान पर ही झगड़ा होने लगा.

तब जुनैद ने संगीता को समझाया कि दरअसल नौकरी देने वाला मुसलिम परिवार है. वह किसी मुसलिम औरत को ही नौकरी पर रखना चाहता है, इसलिए नाम बदलवाया है. संगीता ने इस बात पर विरोध जताया और कहा कि वह धर्म बदल कर नौकरी नहीं करना चाहती. उसे नौकरी नहीं चाहिए, वह वापस कानपुर जाना चाहती है. वहां से संगीता जुनैद के साथ होटल में अपने कमरे पर पहुंच गई.

उसी रात संगीता ने जुनैद को फोन पर बतियाते सुना तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह किसी से किडनी के बारे में बात कर रहा था. इस से संगीता समझ गई कि वह मानव अंग तस्कर गिरोह के जाल में फंस गई है. उस ने यह बात अपने पति राजेश को बताई तो वह भी घबरा गया. इस के बाद संगीता ने वापस कानपुर जाने का फैसला कर लिया.

डरीसहमी संगीता ने किसी तरह जुनैद के बैग से अपना असली व फरजी आधार कार्ड तथा अन्य कागजात निकाल कर अपने पास रख लिए. फिर 28 नवंबर, 2018 की शाम को वह अपने पति राजेश के साथ वापस कानपुर लौट आई.

एक महीने तक जुनैद ने संगीता से संपर्क नहीं किया. उस के बाद जुनैद ने संगीता से कहा कि वह अपनी किडनी ट्रांसप्लांट करा ले तो उस के एवज में उसे 5 लाख रुपए मिल जाएंगे. लेकिन संगीता रुपयों के लालच में नहीं आई, उस ने साफ मना कर दिया.

संगीता ने मना किया तो जुनैद ने फोन पर उस से कहा, ‘‘अस्पताल की जांच और होटल का खर्च 50 हजार रुपया बना है. यह रुपया देना पड़ेगा.’’

संगीता के पास रुपया कहां था. इसलिए उस ने कह दिया कि वह रुपए नहीं दे सकती. इस के बाद जुनैद तथा उस के साथी करन व राजकुमार उर्फ राजू संगीता को धमकी देने लगे कि या तो किडनी ट्रांसप्लांट करा लो या फिर रुपया दो. वरना तुम्हें या तुम्हारे पति को जान गंवानी पड़ सकती है. तुम घर से भले ही न निकलो, लेकिन तुम्हारा पति तो घर से निकलता है.

संगिता जुनैद व उस के साथियों की धमकी से डर गई. अब वह रातदिन परेशान रहने लगी. आखिर उस ने इस धमकी की बाबत पति राजेश से विचारविमर्श किया. दोनों ने फैसला किया कि इस तरह डर कर कब तक रहा जाएगा. लिहाजा उन्होंने धमकी देने वालों के विरुद्ध थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने का फैसला लिया.

पहली फरवरी, 2019 को संगीता अपने पति राजेश कुमार कश्यप के साथ थाना बर्रा जा पहुंची. थाने पर उस समय थानाप्रभारी अतुल कुमार श्रीवास्तव मौजूद थे. संगीता ने उन्हें आपबीती सुनाई. थानाप्रभारी समझ गए कि मामला गंभीर है इसलिए संगीता की तहरीर पर उन्होंने जुनैद, मोहित निगम, श्याम तिवारी उर्फ श्यामू, राजकुमार राव उर्फ राजू तथा करन के विरुद्ध ह्यूमन आर्गन ट्रांसप्लांटेशन एक्ट 1994 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी अतुल कुमार श्रीवास्तव ने एसपी (साउथ) रवीना त्यागी को इस की जानकारी दे दी. एसपी रवीना त्यागी ने संगीता को बुला कर उस से विस्तृत जानकारी हासिल की. संगीता की जानकारी से उन्हें लगा कि कोई बड़ा गिरोह है, जो मानव अंगों का अवैध कारोबार कर रहा है.

एसआई विशेष कुमार ने एजेंट की तलाश शुरू की तो पनकी निवासी राजेश से उन का संपर्क हो गया. उन्होंने खुद को किडनी डोनर बता कर बात की तो राजेश उन के झांसे में आ गया. राजेश किडनी डोनर एजेंट था और सीनियर सदस्य गौरव मिश्रा के लिए काम करता था.

विशेष कुमार राजेश से मिले और पैसों की बेहद जरूरत बताई. विशेष कुमार ने किडनी बेचने के लिए 5 लाख रुपए मांगे लेकिन सौदा 3 लाख में तय हो गया.

9 फरवरी को एजेंट राजेश दरोगा विशेष कुमार को दिल्ली ले गया और पहाड़गंज के एक होटल में ठहराया. दरोगा के साथ 2 पुलिसकर्मी अमित चौहान व कमल भी थे. विशेष कुमार को एजेंट ने एक दिन के लिए होटल में ठहराया और इस दौरान अन्य साथियों की मदद से तैयारियां पूरी कर लीं.

11 फरवरी को दिल्ली के पहाड़गंज स्थित डा. लाल पैथ लैब्स से उन की प्राथमिक जांच यानी ब्लड गु्रप, लीवर ऐंड किडनी पैनल, सीरम, सीबीसी आदि की जांच कराईं. इस की रिपोर्ट मिलने पर एजेंट राजेश ने फोटो खींच कर गौरव मिश्रा को भेजी.

गौरव मिश्रा ने विशेष कुमार को मिलने के लिए एजेंट के साथ साकेत मैट्रो स्टेशन बुलाया. वहां सभी ने एक घंटे तक इंतजार किया लेकिन गौरव नहीं आया. गौरव शातिर था. उस ने स्टेशन पहुंच कर सामने आने के बजाय दरोगा विशेष कुमार व एजेंट के क्रियाकलाप देखे.

उस के बाद गौरव ने राजेश को फोन कर मुलाकात और अन्य काररवाई आगे बढ़ाने की बात की. इस के बाद एजेंट व दरोगा विशेष कुमार अपने सहयोगी पुलिसकर्मियों के साथ कानपुर वापस आ गए. विशेष कुमार ने इस औपरेशन की जानकारी एसपी रवीना त्यागी को दे दी.

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16 फरवरी, 2019 को गौरव मिश्रा व राजकुमार राव उर्फ राजू पैसे के लेनदेन के अलावा मोटीवेशन के लिए कानपुर आए. दोनों राजेश के माध्यम से दरोगा विशेष कुमार से मिले. तभी विशेष कुमार ने अपना असली रूप दिखाते हुए दोनों को गिरफ्तार कर लिया.

एसपी रवीना त्यागी ने थाना नौबस्ता पहुंच कर पूछताछ की तो दोनों टूट गए. उन्होंने कानपुर क्षेत्र में सक्रिय गिरोह के अन्य सदस्यों के नाम बता दिए. इस के बाद रवीना त्यागी ने नौबस्ता, बर्रा व गोविंद नगर थाना पुलिस को सतर्क कर दबिश के लिए 2 और टीमें बनाईं.

इन टीमों ने ताबड़तोड़ छापे मार कर गिरोह के 4 अन्य सदस्यों को नीलम गेस्टहाउस, बर्रा से गिरफ्तार कर लिया. सभी को थाना बर्रा लाया गया. गिरोह के पास से पुलिस टीम को दरजनों फरजी कागजात बरामद हुए.

पुलिस ने गिरोह के सरगना सहित 6 सदस्यों को तो पकड़ लिया था. लेकिन नामजद आरोपी श्याम तिवारी उर्फ श्यामू, मोहित निगम, जुनैद तथा करन अभी पकड़ में नहीं आए थे. पुलिस टीम उन्हें पकड़ने के लिए छापेमारी कर रही थी. सूचना मिलने पर एसपी (साउथ) थाना बर्रा पहुंचीं और पकड़े गए गिरोह के सदस्यों से पूछताछ की.

पुलिस ने जिन आरोपियों को पकड़ा था, उन में टी. राजकुमार राव उर्फ राजू गिरोह का सरगना था. वह कोलकाता के राजाराट थाना अंतर्गत शिपतला का रहने वाला था. गौरव मिश्रा उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के मैगलगंज शिवपुरी का रहने वाला था.

शैलेश सक्सेना दिल्ली के जैतपुर एक्सटेंशन पार्ट-1 का निवासी था. सबूर अहमद लखनऊ के प्रेम नगर का रहने वाला था. शमशाद अली लखनऊ के गली साधड़ा विक्टोरिया चौक का निवासी था. विक्की सिंह कानपुर के पनकी गंगागंज भाग-2 में रहता था.

गिरोह के पास से पुलिस को 3 खाली पासबुक, डीएम, एडीएम, एसडीएम, थाना, बैंक व अस्पतालों की फरजी मोहरें, विवाह प्रमाण पत्र की फरजी मोहरें, 9 एटीएम कार्ड, 14 आधार कार्ड, 8 निर्वाचन पहचान पत्र, 5 पैन कार्ड, कई मार्कशीट, 8 स्मार्टफोन, मरीज और डोनर के साथ ही उन लोगों के परिजनों के फरजी शपथ पत्र, पीएसआरआई (पुष्पावती सिंघानिया रिसर्च इंस्टीट्यूट) से संबंधित मरीज व डोनर से जुड़े गोपनीय दस्तावेज बरामद हुए. इन सभी को पुलिस ने जांच हेतु काररवाई में शामिल कर लिया.

पकड़े गए गिरोह के सदस्यों ने बताया कि गिरोह के हर सदस्य का काम अलगअलग बंटा हुआ था. गिरोह का सरगना टी. राजकुमार उर्फ राजू डोनर मरीज को अस्पताल ले जा कर कोऔर्डिनेटर से मुलाकात कराता था, जबकि गौरव मिश्रा डोनर व मरीज को तैयार कर उन की मुलाकात गिरोह के सरगना टी. राजकुमार राव से कराता था.

शैलेश सक्सेना डोनर व मरीज से मिल कर फरजी दस्तावेज तैयार कराता था. सबूर अहमद लखनऊ से डोनर व मरीज को तैयार कर गौरव व टी. राजकुमार राव के पास ले जाता था. इन लोगों ने अपनेअपने क्षेत्र में दरजनों एजेंट बना रखे थे, जो झुग्गीझोपडि़यों, शराब के ठेकों व मलिन बस्तियों में पैसों का लालच दे कर डोनर खोजते थे.

गिरफ्तार आरोपियों ने कुछ डोनरों की भी जानकारी दी थी. पुलिस ने ऐसे 4 किडनी डोनरों शोएब, वरदान चंद, अजय व ऋषभ को हिरासत में लिया. इन डोनरों ने अभियुक्तों की पहचान की तथा अपने छले जाने की भी व्यथा बताई. पुलिस ने इन डोनरों की कांशीराम ट्रामा सैंटर में जांच कराई तो किडनी निकाले जाने की पुष्टि हुई. इन को पुलिस ने अपना सरकारी गवाह बना लिया.

चूंकि पकड़े गए गिरोह के सदस्यों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थाना बर्रा पुलिस ने गौरव मिश्रा, टी. राजकुमार राव, विक्की सिंह, शैलेश सक्सेना, शमशाद अली तथा सबूर अहमद के खिलाफ ह्यूमन आर्गन ट्रांसप्लांटेशन एक्ट 1994 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

चूंकि इन आरोपियों के पास से पुलिस को फरजी दस्तावेज भी बरामद हुए थे, इसलिए इन के खिलाफ एक अन्य मुकदमा भादंवि की धारा 420, 467, 468, 471 के तहत भी दर्ज किया.

किडनी व लीवर ट्रांसप्लांट गैंग के सदस्यों के पकड़े जाने की खबर जब एसएसपी अनंत देव को लगी तो उन्होंने इसे बेहद गंभीरता से लिया.

उच्चस्तरीय जांच के लिए उन्होंने स्पैशल इनवैस्टीगेशन टीम का गठन किया. इस टीम में सीओ (गोविंद नगर) आर.के. चतुर्वेदी, सीओ (अनवरगंज) शफीफुर्रहमान, थानाप्रभारी (बर्रा) अतुल कुमार श्रीवास्तव, क्राइम ब्रांच प्रभारी गंगा सिंह, सर्विलांस प्रभारी अजय अवस्थी, थानाप्रभारी (नौबस्ता) समर बहादुर सिंह के अलावा एक दरजन तेजतर्रार सबइंसपेक्टर व सिपाहियों को शामिल किया गया. इस टीम को एसपी (साउथ) रवीना त्यागी के निर्देशन में काम करना था.

एसआईटी ने किडनी, लीवर ट्रांसप्लांट गिरोह के पकड़े गए सदस्यों से पूछताछ की तो चौंकाने वाली जानकारियां मिलीं. पूछताछ से पता चला कि गिरोह का जाल देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों तक फैला है.

गिरोह के सदस्य मरीज से किडनी का सौदा 20 से 25 लाख में तय करते थे, जबकि डोनर को मात्र 3 से 5 लाख देते थे. उस में भी ये लोग घपला कर लेते थे. ये लोग झुग्गीझोपडि़यों, मजदूर वर्ग, शराब के ठेकों, ढाबों आदि पर डोनरों की तलाश करते थे.

गिरोह के मुखिया टी. राजकुमार राव उर्फ राजू ने बताया कि वह दिल्ली के 3 बड़े अस्पतालों के संपर्क में रहता था. वहां के कुछ लोगों से उसे काम की जानकारियां मिलती रहती थीं. इस के बाद वह आगे की तैयारी करता था.

टी. राजकुमार राव ने यह भी बताया कि वह दिल्ली के एक बड़े डाक्टर के संपर्क में रहता था. वह दिल्ली में कहां रहता है, इस का उसे पता नहीं था, लेकिन मानव अंगों का सौदा करने वाले इस डाक्टर का जाल नेपाल, टर्की और श्रीलंका तक फैला था.

विदेशों में वह मरीज से किडनी का सौदा 70 लाख से 1 करोड़ रुपए में तय करता है. जरूरत पड़ने पर वह उसे बाजार, रेस्टोरेंट, मौल या फिर मैट्रो स्टेशन पर बुलाता था. महंगी कार रखना उस का शौक है. डोनर की काउंसलिंग वह स्वयं करता था. डोनर को विदेश भेजने की सारी व्यवस्था भी वही करता था.

आरोपी शैलेश सक्सेना तथा गौरव मिश्रा ने भी जांच टीम को अहम जानकारियां दीं. शैलेश सक्सेना फरजी कागजात तैयार कराता था. यह काम वह दिल्ली के मयूर विहार के रहने वाले संजय पांडेय व उस के सहयोगी आसिम की मदद से करता था. शैलेश सक्सेना ने एक पद्मविभूषित डाक्टर का नाम भी बताया, जो इस रैकेट से जुड़ा था.

जांचपड़ताल से पता चला कि किडनी और लीवर ट्रांसप्लांट के नियम काफी सख्त हैं. नियम के मुताबिक 2 स्थितियों में किडनी ट्रांसप्लांट की जा सकती है. पहली स्थिति खून का रिश्ता. अगर बेटा, मांबाप और बहन में से कोई किसी को किडनी डोनेट करता है तो सब से पहले रिसीवर और डोनर का डीएनए और एचएलए मिलान कराया जाता है.

इस के बाद अस्पताल डायरेक्टर समेत 20 सदस्यीय डाक्टरों की टीम डोनर से राजी होने के बाद पूछताछ करती है. पूरी संतुष्टि के बाद किडनी ट्रांसप्लांट की जाती है.

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दूसरी स्थिति रिश्तेदार से रिश्तेदार के लिए लागू होती है. इस में भी डोनर तथा रिसीवर का डीएनए और एचएलए मिलान कराया जाता है. अस्पताल की 20 सदस्यीय टीम के साथ डीएम की संतुष्टि के बाद ही किडनी ट्रांसप्लांट हो सकती है.

लेकिन किडनी रैकेट के लोग इन सारे नियमों को धता बता कर अस्पताल के कोऔर्डिनेटरों की मदद से किडनी ट्रांसप्लांट करा देते थे. दरअसल गिरोह के सदस्य डोनर को फरजी दस्तावेज के आधार पर रिसीवर के परिवार का सदस्य (बेटा, भाई, मां, बाप, बहन) बताते थे.

इस के बाद किसी बड़े अस्पताल में डोनर का मैडिकल होता था. वहां डीएनए मिलान के लिए जांच रिपोर्ट बदल दी जाती थी. डोनर की जगह रिसीवर के परिजन की रिपोर्ट कमेटी के पास जाती थी, जिस से सब सही पाया जाता था.

जांच से यह बात भी सामने आई कि पकड़े गए सभी आरोपियों ने पहले खुद किडनी डोनेट की थी, उस के बाद वे गिरोह के सदस्य बने थे. एसआईटी ने रिपोर्टकर्ता से भी पूछताछ की तथा कुछ की शिनाख्त भी कराई. आरोपियों ने एसआईटी के समक्ष कुछ ऐसे नामों का भी खुलासा किया जो प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में उन की मदद करते थे. पुलिस टीम ने ऐसे 16 आरोपियों की लिस्ट तैयार की.

इन में कानपुर निवासी श्याम तिवारी, श्याम दूबे उर्फ भूरा (खाडेपुर योगेंद्र विहार), मोहित निगम (हनुमंत विहार, नौबस्ता), संजय पाल (कर्रही चौराहा नौबस्ता), जुनैद (पुलिस लाइंस लखनऊ), राजा व रामू पांडेय, आनंद (लखनऊ), सिप्पू राय (आजमगढ़), करन (चंडीगढ़), संजय पांडेय और आसिम सिकंदर वगैरह शामिल थे.

एसआईटी की पूछताछ के बाद बर्रा थानाप्रभारी अतुल कुमार श्रीवास्तव ने पकड़े गए आरोपी टी. राजकुमार राव उर्फ राजू, गौरव मिश्रा, शैलेश सक्सेना, सबूर अहमद, शमशाद अली तथा विक्की सिंह को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

किडनी कांड की गहनता से जांच कर रही एसआईटी की लिस्ट में दिल्ली के कई नाम शामिल थे. इन सभी से पूछताछ करने के लिए टीम ने दिल्ली में डेरा डाल दिया. यहां टीम ने कुछ डाक्टरों और उन के सहयोगियों से कई राउंड पूछताछ की तथा अस्पतालों के रिकौर्ड खंगाले, जिन में ये कार्यरत थे.

टीम ने अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट कराने वाले डोनर व मरीजों से भी पूछताछ की तथा उन के बयान दर्ज किए. टीम ने कई नामचीन डाक्टरों से भी पूछताछ की. पुलिस टीम ने अस्पताल की 13 फाइलों का निरीक्षण किया तथा 26 लोगों के बयान दर्ज किए.

टीम ने दिल्ली के मयूर विहार निवासी संजय पांडेय व उस के सहयोगी आसिम सिकंदर को पकड़ने के लिए जाल बिछाया लेकिन वे पकड़ में नहीं आ सके. ये दोनों गिरोह के लिए फरजी कागजात तैयार करते थे. पुलिस की पकड़ में न आने पर टीम ने उस का दुकान पर छापा मार कर दरजनों फरजी कागजात बरामद किए, जहां फरजी कागजात तैयार किए जाते थे.

दिल्ली में पुलिस टीम कई दिनों तक डेरा डाले रही लेकिन कोई आरोपी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा, तब पुलिस टीम वापस कानपुर लौट आई. दरअसल पुलिस अपनी फजीहत नहीं कराना चाहती थी क्योंकि गिरफ्तारी बड़े लोगों की होनी थी.

पुलिस अधिकारी चाहते थे कि जिन बड़े लोगों के इस केस में नाम आ रहे हैं, पुलिस पहले उन के खिलाफ मजबूत सबूत हासिल कर ले ताकि कोर्ट में किसी तरह से केस कमजोर न पड़े.

दिल्ली से लौटने के बाद एसआईटी ने कानपुर, लखनऊ व आजमगढ़ के आरोपियों को पकड़ने के लिए शिकंजा कसा और ताबड़तोड़ छापे मार कर लखनऊ से राजू पांडेय तथा कानपुर से श्याम तिवारी व राजा को पकड़ लिया.

श्याम तिवारी को उस के घर जूहीलाल कालोनी से तथा राजा को किदवई नगर चौराहे से पकड़ा गया. श्याम तिवारी ने ही इस केस की वादी संगीता को अपने दोस्त मोहित निगम व जुनैद को मिलवाया था. पूछताछ के बाद तीनों को कानपुर कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया गया.

किडनी रैकेट का सरगना टी. राजकुमार राव उर्फ राजू मूलरूप से आंध्र प्रदेश का रहने वाला है, लेकिन वह कोलकाता शहर में थाना राजाराट के अंतर्गत शिपतला में रहता था. वह पढ़ालिखा तथा तेज दिमाग था. हिंदी, अंगरेजी तथा बांग्ला भाषा पर उस की अच्छी पकड़ थी. उस ने अपना कैरियर मैडिकल में एमआर बन कर शुरू किया था, लेकिन यह काम उसे पसंद नहीं आया.

इस के बाद वह दिल्ली आ गया. यहां उस ने रेडीमेड कपड़ों का व्यवसाय शुरू किया, लेकिन अनुभव न होने के कारण उसे व्यापार में घाटा हो गया. रकम डूब जाने से वह परेशान रहने लगा.

इसी दौरान उस की मुलाकात किडनी रैकेट के एक सदस्य से हो गई. उस के मार्फत टी. राजकुमार राव ने चेन्नै के अस्पताल में 80 हजार रुपए में अपनी किडनी बेच दी. किडनी उस ने बोकारो की शालिनी उर्फ ज्योति को डोनेट की थी. यह बात सन 2006 की है.

इस के बाद वह खुद भी किडनी और लीवर का दलाल बन गया. धीरेधीरे उस ने अपना जाल कई राज्यों में फैला लिया. शातिर दिमाग टी. राजकुमार राव गूगल पर सर्च कर यह पता लगाता था कि देश के किन अस्पतालों में किडनी व लीवर का प्रत्योरोपण होता है. इस के बाद वह मरीज व डोनर की तलाश करता था. डोनर बिचौलियों की मदद से मिल जाते थे.

लखीमपुर खीरी का गौरव मिश्रा, लखनऊ का जुनैद, कानपुर का सत्यप्रकाश उर्फ आशू, संजय पाल, मोहित निगम, श्याम तिवारी उर्फ श्यामू, भूरा आदि उस के सक्रिय सदस्य थे, जो उसे डोनर मुहैया कराते थे. सन 2016 में अपोलो किडनी कांड में भी वह पकड़ा गया था, जमानत मिलने के बाद वह फिर से इसी धंधे में सक्रिय हो गया.

टी. राजकुमार राव का दाहिना हाथ गौरव मिश्रा साधारण परिवार से है. उस के पिता बृजकिशोर मिश्रा किसान हैं. गौरव शादीशुदा हैं. उस की 2 बेटियां हैं. वह गांव में मातापिता से अलग रहता था. गौरव की संदिग्ध गतिविधियों के चलते उस के मातापिता ने उसे अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिया था.

गौरव मिश्रा लखनऊ मैडिकल कालेज में नौकरी करता था. नौकरी के दौरान वह अंग प्रत्यारोपण गिरोह के संपर्क में आ गया था. वह पहले डोनर प्रोवाइड करता था. पूरा कारोबार समझने के बाद उस ने बड़े अस्पतालों में पैठ बनाई, जिस के बाद वह डोनर और मरीज को कोऔर्डिनेटर से मिलाने का काम करने लगा.

उस ने दिल्ली में भी अस्थाई निवास बना लिया था. सन 2006 में वह अपोलो किडनी रैकेट में भी पकड़ा गया था. जमानत मिलने पर उस ने नौकरी छोड़ दी और टी. राजकुमार राव के साथ जुड़ गया था. वह डोनर व मरीज के परिजनों के फरजी कागजात बनवाता था. यह काम वह संजय पांडेय व आसिम सिकंदर के सहयोग से करता था.

लखनऊ निवासी सबूर अहमद व शमशाद अली पहले खून बेचने के काले धंधे से जुड़े थे. बाद में वे जुनैद व गौरव के संपर्क में आ गए. दोनों किडनी डोनर की तलाश में रहने लगे.

ये दोनों डोनर को वे जुनैद के संपर्क में लाते थे. जुनैद उन्हें दिल्ली ले जा कर गौरव से मिलवाता था. सबूर अहमद स्वयं भी अपनी किडनी डोनेट कर चुका था. उस ने बिहार के नागेंद्र यादव का सगा भाई सोनू यादव बन कर किडनी डोनेट की थी.

पनकी गंगागंज निवासी विक्की सिंह ने सन 2014 में अपनी किडनी 4 लाख रुपए में डोनेट की थी. उस के बाद वह गिरोह का सक्रिय सदस्य बन गया था. विक्की सिंह डोनर तलाशने के बाद उसे जुनैद को सौंप देता था. जुनैद डोनर को गौरव के पास ले जाता था.

जुनैद, गौरव मिश्रा का विश्वासपात्र सदस्य था. वह मूलरूप से हमीरपुर का रहने वाला था. उस के पिता शोएब लखनऊ में एचसीपी थे और वह पुलिस लाइंस में रहते थे. जुनैद ने अपना ठिकाना लखनऊ व कानपुर में बना रखा था.

सन 2015 में किडनी कांड में उसे जालंधर सिटी थाने की पुलिस ने पकड़ा था. जमानत पर आने के बाद उस ने तेजी से डोनर तलाशे. जुनैद का कानपुर में अच्छा नेटवर्क था.

कानपुर में उस के श्याम तिवारी, मोहित निगम, संजय पाल, श्याम सिंह जैसे दरजनों लोग थे, जो उस के लिए काम करते थे. श्यामू और मोहित निगम की मार्फत ही जुनैद संगीता को गाजियाबाद ले गया था.

सरकारी गवाह बने कुछ किडनी डोनरों ने भी अपनी दर्दभरी व्यथा बताई. लखनऊ के सदर बाजार निवासी वरदान चंद ने बताया कि उस की बेटी पीहू के दिल में छेद था और जन्म से एक वौल्व भी नहीं था.

तबीयत खराब रहने के चलते उसे एम्स में भरती कराया गया तो डाक्टरों ने औपरेशन कर छेद बंद करने तथा वौल्व डालने का खर्च ढाई लाख बताया. इलाज की रकम जुटाने के लिए उस ने सबूर अहमद से चर्चा की तो उस ने किडनी डोनेट करने का सुझाव दिया.

सबूर अहमद किडनी रैकेट से जुड़ा था. मजबूर वरदान चंद बेटी की जिंदगी बचाने को राजी हो गया. सौदा 4 लाख रुपए में तय हुआ, लेकिन उसे 2 लाख 30 हजार ही दिए गए.

इस के बाद वरदान चंद ने मधुकर गोयल को उस का फूफा बन कर किडनी डोनेट कर दी. लेकिन अस्पताल में ही गिरोह के सदस्यों ने उस के सारे पैसे पार कर दिए.

इलाज के लिए उसे कर्ज लेना पड़ा. फिर भी वह बेटी को बचा नहीं पाया. कर्ज का रुपया वापस करने के लिए उस ने पत्नी तनु की किडनी बेचने का फैसला किया. सभी तैयारियां हो चुकी थीं, लेकिन उस के पहले ही भांडा फूट गया.

लखनऊ का ही रहने वाला 18 वर्षीय शोएब होटल में काम करता था, सबूर अहमद वहां खाना खाने आता था. आर्थिक मदद का भरोसा दिला कर सबूर ने दिसंबर 2018 में उस की किडनी बुलंदशहर के 65 वर्षीय मरीज अनिल अग्रवाल को डोनेट करा दी.

इस के लिए अनिल के भतीजे संस्कार अग्रवाल के नाम से फरजी कागजात तैयार कराए गए. सौदा 4 लाख रुपए में तय हुआ था, लेकिन दिए गए 2 लाख 40 हजार.

बहरहाल, एसआईटी कथा संकलन तक जुनैद, मोहित निगम, संजय पाल, श्याम दूबे उर्फ भूरे (सभी कानपुर) दिल्ली निवासी संजय पांडेय, आसिम सिकंदर तथा चंडीगढ़ निवासी करन को गिरफ्तार नहीं कर सकी.

यह तो समय ही बताएगा कि पुलिस इन्हें गिरफ्तार कर पाएगी या ये कोर्ट में सरेंडर करेंगे. दूसरी बात यह भी देखनी है कि एसआईटी अस्पतालों के कोऔर्डिनेटर्स व संदेह के घेरे में आए कुछ अन्य डाक्टरों को गिरफ्तार करने की हिम्मत जुटा भी पाती है या नहीं.

(कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां)

नमस्ते जी

हम दोनों पतिपत्नी सुबह बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजने के बाद सैर करने की नीयत से जैसे ही कोठी के बाहर निकले कि पति की निगाहें गली में खड़ी धोबी की लड़की पर जा कर ठहर गईं. वह लड़की अकसर इस्तरी के लिए आसपास की कोठियों से कपड़े लेने आती थी. उसे देख कर नितिन का अंदाज बड़ा ही रोमांटिक हो आया.

नितिन की बाछें खिल उठीं. मानो कोई अप्सरा स्वर्ग से उतर कर उस के सामने खड़ी, उस का अभिनंदन कर रही हो. नितिन के कदम कुछ क्षणों के लिए ठहर से गए. बदले में उस ने भी मुसकराहट के साथ उस का अभिवादन स्वीकार करते हुए पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

वह शोख अंदाज में फिर मुसकराई और धीरे से बोली, ‘‘ठीक हूं.’’

मुझे यह सब ठीक नहीं लगा तो थोड़ा आगे चलने के बाद मैं ने नितिन को टोक दिया.

‘‘तुम एक फैक्टरी के मालिक और एक हैसियतदार आदमी हो. तुम्हारा बस नमस्ते कहना ही काफी था. मगर गाना गाना, हंसना और ज्यादा मुंह लगाना ठीक नहीं. खासकर इस तरह की लड़कियों को. देखो, धोबी की लड़की है. इस्तरी के लिए घरघर कपड़े मांग रही है और हाथ में 8-10 हजार का मोबाइल लिए है…उसे देख कर कौन कहेगा कि यह धोबी की लड़की है.’’

‘‘तुम तो बस किसी के भी पीछे पड़ जाती हो. अरे, तुम्हारे जैसी किसी ‘मेम’ ने पुराना सूट दे दिया होगा और फिर फैशन करना कौन सी बुरी बात है? यह मोबाइल तो अब  आम हो गया है.’’

नितिन ने उस के पक्ष में यह सब कहा तो मुझे 3-4 दिन पहले का वह वाकया याद हो आया जब नितिन ने मुझे बालकनी में बुला कर कहा था.

‘देख निक्की, इस धोबी की लड़की को. यह जब हंसती है तो इस के दोनों गालों पर पड़ते हुए डिंपल कितने प्यारे लगते हैं? कितनी अच्छी ‘हाइट’ है इस की, उस पर छरहरा बदन कितनी सैक्सी लगती है यह?’ मेरे दिमाग में फिर एक और दास्तान ताजा हो आई थी.

अभी बच्चों की गरमियों की छुट्टियों में  मैं 15-16 दिन गांव में रह कर आई थी. पीछे से नितिन अकेले ही रहे थे. मैं जब गांव से वापस आई तो देखा कि साहब ने ढेर सारे कपड़े इस्तरी करा रखे थे. यहां तक कि जिन कपड़ोें को पहनना छोड़ रखा था, वे भी धुल कर इस्तरी हो चुके थे.

मैं ने चकित भाव से नितिन से पूछा, ‘‘ये इतने कपड़े क्यों इस्तरी करा रखे हैं? इन कपड़ों को दे कर तो मुझे बरतन लेने थे और तुम ने इन को धुलवा कर इस्तरी करवा दिया. और तो और जो पहनने…’’

मेरी बात को बीच में ही काट कर नितिन ने झट से कहा, ‘‘वह सब छोड़ो, एक बात याद रखना कि मेरे कपड़े इस्तरी करने के लिए उस लड़के को मत देना. वह ठीक से इस्तरी नहीं करता. वह जो सांवली लड़की कपड़े लेने के लिए आती है, उसे दिया करो. वह इस्तरी भी बढि़या करती है और समय पर वापस भी दे जाती है.’’

मैं कुछ परेशान सी यह सब अपने मन में याद करती हुई चली जा रही थी कि अचानक मेरी नजर नितिन के चेहरे पर पड़ी तो देखा कि वह मंदमंद मुसकरा रहे हैं. मैं ने टोक दिया, ‘‘क्या बात है, बड़े मुसकरा रहे हो. मेरी बात पर गौर नहीं किया क्या?’’

‘‘कौन सी बात?’’

‘‘यही कि थोड़ा रौब से रहा करो.’’

बात पूरी होने से पहले ही नितिन बोल पड़े, ‘‘निक्की, अगर तुम बुरा न मानो तो एक बात कहूं. तुम थोड़ी मोटी हो गई हो और वह धोबी की लड़की सैक्सी लगती है, शायद इसलिए.’’

यह सुन कर मेरा मूड खराब हो गया. मैं वापस घर चली आई. ऐसे ही दिन गुजर गया, रात हो आई. न मैं ने बात की न ही नितिन ने.

2 दिन बाद शाम को जालंधर से इन की किसी परिचित का फोन आ गया. नितिन व उस के बीच लगभग 6 मिनट फोन पर बातचीत चली थी. बातों को सुन कर पता चला कि किसी की बेटी का पी.जी. के तौर पर गर्ल्स हास्टल में रहने का प्रबंध कराना था. जब मैं ने पूछा कि कौन थी? किसे पी.जी. रखवाने की बात हो रही थी? तो नितिन टाल गए. मैं ने भी बात को अधिक बढ़ाना उचित नहीं समझा और घर के काम में लग गई.

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नितिन कभी जूते पालिश नहीं करते. हमेशा मैं ही करती हूं लेकिन अगले दिन सुबह उठ कर खुद उन को जूते चमकाते देखा तो अचरज सा हुआ. मैं ने पूछा, ‘‘आज शूज बड़े चमकाए जा रहे हैं, क्या बात है?’’

‘‘गर्ल्स हास्टल का पता करने कई जगह जाना है.’’

यह सुन कर मैं ने अपनी मंशा जाहिर करते हुए कहा, ‘‘कहो तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूं, एक से भले दो.’’

‘‘रहने दो, तुम नाहक ही थक जाओगी, फिर आजकल धूप भी तेज होती है.’’

‘‘हां, भई हां, मेरा तो रंग काला पड़ जाएगा. मैं छुईमुई की तरह हूं जो मुरझा जाऊंगी. साफसाफ यह क्यों नहीं कहते कि मुझे अकेले जाना है. मैं सब जानती हूं लेकिन पिछली बार जब मेरी सहेली ने अपनी बेटी को पी.जी. रखवाने के लिए फोन किया था तो तुम उन्हें ले कर अकेले ही गए थे. अब की बार मैं तुम्हारे साथ चलूंगी. मुझे अच्छा नहीं लगता, तुम्हारा जवान लड़कियों के ‘हास्टल’ में जा कर पूछताछ करना. मैं औरत हूं, मेरा पूछना हमारी सभ्यता के लिहाज से ठीक है.’’

‘‘नहीं…नहीं, मैं अकेला ही पता कर के आऊंगा,’’ यह कह कर नितिन गाना गाने लगे, ‘‘अभी तो मैं जवान हूं…अभी तो मैं…’’

नितिन को चिढ़ाने के अंदाज में मैं ने कहा, ‘‘अगर आज तुम अकेले गए तो मैं भी तुम्हारे पीछेपीछे आऊंगी और तुम यह मत सोचना कि मैं तुम्हें अब गुलछर्रे उड़ाने का मौका आसानी से दे दूंगी.’’

यह सुन कर नितिन एकदम गंभीर हो गए और सख्त लहजे में बोले, ‘‘बस निक्की, अब तुम आगे एक भी शब्द नहीं बोलोगी. अगर कुछ उलटा बोला तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

‘‘हां…हां, जानती हूं, और तुम कर भी क्या सकते हो, मुझ कमजोर को पीटने के अलावा. मगर आज मैं तुम्हें अकेले पी.जी. के बारे में पता करने नहीं जाने दूंगी, चाहे कुछ भी हो जाए. तुम जरा अकेले जा कर तो देखो?’’

एकदो भद्दी गाली देने के साथ दोचार थप्पड़ मार कर नितिन ने मुझे घसीटते हुए ला कर बिस्तर पर पटक दिया और दरवाजे को जोर से बंद करते हुए घर से बाहर निकल गए.

बौखलाहट में मुझ पर न जाने कहां से पागलपन सा सवार हो गया. मैं ने उठ कर अपनी व नितिन की फ्रेमजडि़त तसवीर ली और फर्श पर दे मारी तथा साथ में रखा हुआ गुलदान दीवार पर और गुस्से में शादी वाली सोने की अंगूठी उतार कर दूर फेंकते हुए बैड पर धड़ाम से गिर पड़ी. फिर न जाने कब मैं अतीत की स्मृतियों के गहरे सागर में डूबती चली गई.

धीरेधीरे मुझे वे दिन याद आने लगे जब मात्र डेढ़ साल के अंतराल में मैं दूसरी बार मां बनी थी और मैं ने फूल सी कोमल नन्ही गुडि़या को जन्म दिया था. मेरी ननद 10 दिन से अधिक नहीं रुक पाई थीं. वैसे भी उन से जच्चा का काम नहीं होता था. अंकुर व अंकिता, दोनों को एकसाथ संभालना मेरे वश से बाहर था.

मैं ने अपने लिए किसी काम वाली को रखने की बात नितिन से कही तो उन्होंने पड़ोसियों के यहां काम करने वाली निर्मला की 12-13 साल की बेटी प्रीति को घर में मेरी मदद करने के लिए रख लिया था. धीरेधीरे बेटी गोद को समझने लगी थी. दिन छिपने के बाद वह तब तक चुप नहीं होती थी जब तक उसे कोई उठा कर छाती से न लगा ले. प्रीति के साथ वह हिलमिल गई थी. उस का स्पर्श पाते ही अंकिता एकदम चुप हो जाती थी जैसे कि उसे उस की मां ही मिल गई हो.

एक दिन दोपहर में लगभग ढाई बजे के आसपास जब मैं अंकिता को दूध पिला रही थी तो प्रीति मेरे पास कमरे में आई. वैसे तो यह समय उस का आराम करने का होता था. उस की सांस कुछ फूली हुई सी थी और उस के सिर के बाल बेतरतीब से फैले हुए थे. मैं ने उस को नीचे से ऊपर तक निहारा तो लगा कि उस के साथ कुछ हुआ है. मैं ने पूछा था, ‘प्रीति, तुम इतनी घबराई हुई सी क्यों लग रही हो? क्या बात है?’

‘मेमसाहिब, आप कोई और काम करने वाली ढूंढ़ लो. मैं अब आप के घर काम नहीं कर सकती.’

‘क्यों प्रीति, ऐसा क्या हुआ जो तुम अचानक इस तरह दोपहर में काम छोड़ कर जा रही हो? तुम्हारे साथ हम सब अच्छे से बरताव करते हैं. तुम्हें यहां किसी तरह की कोई रोकटोक भी नहीं है. अपनी इच्छा से काम करती हो. जब मन में आता है तब घर घूम आती हो. फिर आज अचानक ऐसा क्यों…’

प्रीति तब कुछ नहीं बोल पाई थी. बस, वापस मुड़ कर अपनी चुनरी के एक कोने को मुंह में दबाए भाग ली थी वह. मैं कुछ भी नहीं समझ पाई थी. अंकिता को सोता छोड़ कर मैं दूसरे कमरे में आ गई थी जहां नितिन सोए थे. मैं ने उन्हें जगाया तो आंख भींचते हुए बोले, ‘क्या बात है छुट्टी वाले दिन तो आराम कर लेने दिया करो?’

मैं ने सारा वृतांत उन्हें सुनाते हुए पूछा, ‘तुम्हें कुछ समझ में आ रहा है कि प्रीति ऐसे अचानक क्यों भाग गई?’

‘प्रीति अपने घर चली गई? मैं आराम करने के लिए जब कमरे में आया था तब तो वह बरामदे में लेटी हुई थी. हो सकता है सोते हुए उस ने कोई बुरा स्वप्न देख लिया हो. शायद डर गई हो, बेचारी. कहीं तुम ने या मां ने तो कुछ नहीं कह दिया? काम करते वक्त उसे कुछ कह तो नहीं दिया आज सुबह या कल शाम को?’

‘नहीं तो, इतने दिन हो गए भला आज तक कुछ कहा है, जो आज. हां, हो सकता है सोते हुए उस ने कोई बुरा स्वप्न देखा हो. खैर, चलो छोड़ो, मैं शाम को उस के घर हो आऊंगी.’

यह कह कर मैं अपने कमरे में आ तो गई लेकिन मुझे चैन नहीं पड़ा रहा था. मैं बैड पर लेटेलेटे सोचती रही कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा जो वह भरी दोपहर में घर वापस जाने को मजबूर हो गई? मांजी से पूछा तो उन्होंने कह दिया कि उन की तो आज प्रीति से कोई बात ही नहीं हुई.

मुझे जब असमंजस में और अधिक नहीं रहा गया तो मैं प्रीति के घर पहुंच गई थी. प्रीति एक कोने में अलग सी बैठी थी. मुझे दहलीज पर देख कर भी कुछ नहीं बोली, वैसे ही बैठी रही थी, वरना तो उठ कर मेरा स्वागत करती थी. मैं ने जब काम छोड़ने के बारे में जानना चाहा तो उस की मां ने इतना ही कहा था, ‘मेमसाहिब, अब प्रीति तुम्हारे घर काम नहीं करेगी. अब यह गांव जाएगी इस की वहां शादी तय हो गई है.’

‘ऐसे अचानक, कैसे?’

‘बस, मेमसाहिब, हम गरीब लोगों के साथ कब, कैसे, क्या गुजर जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. आप ठहरे बड़े आदमी, हम छोटे लोग भला क्या कह सकते हैं? बाकी अब प्रीति आप के घर नहीं जाएगी.’

मेरी लाख कोशिशों के बावजूद प्रीति ने काम छोड़ने का कारण नहीं बतलाया और मैं अपना सा मुंह ले कर वापस घर आ गई थी. घर आ कर मैं कुछ देर तक सोचती रही थी.

‘आखिर ऐसा क्या हुआ होगा जो प्रीति यों काम छोड़ कर चली गई और अब उस की शादी करने की बातें हो रही हैं. जिस के लिए उसे गांव भेजा जा रहा है. अभी तो प्रीति की उम्र 13 वर्ष की ही होगी, फिर इतनी जल्दी वह भी एकाएक.’

जब समझ में कुछ नहीं आया तो मैं नितिन के पास आ गई और उन से किसी दूसरी काम वाली लड़की का इंतजाम करने को कहा.

अनमने मन से नितिन ने कहा, ‘हां, देखता हूं. इतनी जल्दी थोड़ी ही काम वाली लड़कियां मिलती हैं, वह भी तुम्हारी पसंद की.’

तब मैं ने कहा था, ‘कोई बात नहीं. कैसी भी ले आओ, चलेगी. बच्चों का ध्यान कैसे रखना है, वह सबकुछ मैं समझा दूंगी.’

अगले ही दिन नितिन ने अपनी जानकारी में कइयों को काम वाली के बारे में कह दिया था. उस के 4-5 दिन के बाद शर्माजी के यहां काम करने वाली बाई ने ‘डोर बेल’ बजाई तो सास ने उस के पास जा कर पूछा था, ‘हां रमा, क्या बात है. कैसे आई हो?’

‘बीबीजी को एक लड़की चाहिए न बच्चों की देखभाल के लिए, सो उसी की खातिर आई थी.’

मैं ने घर के अंदर से ही कह दिया था. ‘हां रमा, चाहिए. लेकिन कौन है?’

‘मेमसाहिब, मेरी बड़ी लड़की 14-15 साल की है मगर…’

‘मगर क्या?’ सास ने पूछा था.

‘जी वह पैर से थोड़ी अपाहिज है. लेकिन घर का सारा काम कर लेती है. मेरी 4 लड़कियां उस से छोटी हैं. वही मेरे पीछे से घर का सारा काम करती है और अपनी छोटी बहनों की देखभाल भी. अब खर्चा बढ़ गया है न. शर्माजी की बीवी ने कहा था कि आप को तो सिर्फ काम वाली 2 घंटे सुबह और 2 घंटे शाम को चाहिए तो वह इतना वक्त निकाल लेगी.’

तब तक मैं भी अपनी सास के पास आ कर खड़ी हो गई थी. मैं ने उस से पूछा था कि महीने के हिसाब से कितने पैसे लोगी? हम उसे दोनों समय खाना तो देंगे ही साथ में कपड़े भी दे देंगे.

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उस ने कहा था कि जो मरजी दे देना मांजी. वैसे मैं एक घर में बरतन करने का 300 रुपए लेती हूं.

मैं ने तपाक से कहा था, ‘अच्छा चल, कुल मिला कर महीने के 500 रुपए दे देंगे. अगर ठीक है तो आज शाम से ही भेज दो.’

500 रुपए सुन कर उस ने झट से हां की और हमारा अभिवादन कर के चली गई.

शाम को उस ने अपनी बड़ी लड़की को हमारे यहां काम के लिए भेज दिया था. लड़की का हुलिया दयनीय था. मोटेमोटे काले होंठ, उभरे हुए दांत जिन पर गंदगी साफ देखी जा सकती थी, मैलेकुचैले कपड़े. छाती पर इतना ही उभार था कि बस यह महसूस किया जा सके कि लड़की है. मेरे नाम पूछने पर उस ने अपना नाम आयशा बतलाया था. उसे देख कर मैं मन ही मन सोचने लगी कि ‘यह क्या काम करेगी? पहले तो मुझे ही इस के लिए कुछ करना पड़ेगा.’

मैं ने तब नहाने का साबुन व बदलने के लिए दूसरे कपड़े देते हुए उसे ताकीद की थी कि पहले तुम अच्छे से नहा कर आओ और दांत साफ करना मत भूलना. उस ने मुझ से कपड़े और साबुन लिए और पूछा, ‘आंटीजी, बाथरूम किस तरफ है?’

मैं चौंक गई थी. ‘अरे, तुम अपने घर जा कर नहा कर आओ.’

तब उस ने कहा था कि आंटी, हमारे घर बाथरूम कहां. मैं तो अंधेरा होने पर ही घर के आंगन में नहा लेती हूं या फिर सूरज निकलने से पहले.

मैं सोच में पड़ गई थी कि क्या करूं, क्या न करूं? यह कैसी मुसीबत आ गई. मांजी को पता चल गया तो. खैर, उसे चुपचाप बाथरूम में भेज मैं आंगन में बिछी चारपाई पर अंकिता को ले कर बैठ गई थी. वह थोड़ी ही देर में नहा कर बाहर आ गई थी. मैं ने उसे उस का सारा काम समझाते हुए उस से पहले बाथरूम की जम कर सफाई करवाई थी.

आयशा मेरी सोच से अधिक समझदार निकली. जो भी कहती वह उसे आगे से आगे, बिना ज्यादा बुलवाए, पूरा कर देती थी. जब भी उस को समय मिलता तो वह अंकिता को ले मेरे पास आ बैठती और कहती थी, ‘आंटी आप कितनी सुंदर हैं. आप क्या लगाती हैं अपने मुंह पर? कौन सी क्रीम लगाती हैं? कौन सा तेल इस्तेमाल करती हैं? आप के बालों से बहुत अच्छी महक आती रहती है.’

पुलिस वैरीफिकेशन का चक्कर

किसी भी अच्छे काम को अंजाम देने में तमाम कठिनाइयां तो आती ही हैं. मानवाधिकारों के लिए बेचारे अमेरिका ने किसकिस से बैर नहीं ले डाला? हमारा मुल्क इसीलिए भेडि़याधसान कहलाता है क्योंकि हम दूसरों के कहे में जल्दी आ जाते हैं, अपना दिमाग खर्च ही नहीं करना चाहते. हमारे यहां गांव से ले कर कसबों तक, शहरों से ले कर संसद तक तमाम बड़ेबड़े कांड हो रहे हैं पर हर विफलता के लिए कोई न कोई बढि़या सा बहाना गढ़ कर मामला रफादफा कर दिया जाता है.

नक्सलवाद की समस्या पर एक माननीय महोदय का कहना था कि उस से प्रभावित क्षेत्रों में लोग तीरकमान चलाने में बहुत अच्छे हैं लिहाजा, वे इस समस्या से निबटने के लिए खुद ही काफी हैं. एक अन्य ने वहां विकास योजनाओं पर जोर देने की बात कही है.

देश के तमाम हिस्सों में होने वाले अन्य अपराधों में सफलता भले ही न मिले पर एक नया नुक्ता उछाल दिया जाता है कि अमुक संस्था ने अपने कर्मचारियों का पुलिस वैरीफिकेशन नहीं कराया था. मकानमालिकों को किराएदारों के लिए उन के स्थायी पते पर जा कर पुलिस वैरीफिकेशन कराए जाने के निर्देश हैं. अगर आप कोई घरेलू नौकर रखना चाहते हैं तो पहले उस का पुलिस वैरीफिकेशन कराइए.

अमेरिका इतना अच्छा देश है कि हर संदर्भ वहां एक आदर्श उदाहरण पेश करता हुआ मिलता है. अब इस वैरीफिकेशन को ही ले लीजिए. हमारा कोई भी नागरिक, भले ही वह कोई बड़े नाम वाला मंत्री या अभिनेता ही क्यों न हो, जैसे ही उन के देश की सीमा में प्रवेश करता है, पुलिस वैरीफिकेशन शुरू हो जाता है और वह इतनी ईमानदारी से होता है कि कभीकभी हमारा मीडिया काफी दिन तक तिलमिलाया रहता है. अगर उसे शक हो जाए तो वे हमारा ऐक्सरे करवाने में भी नहीं हिचकेंगे.

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हम न तो अपनों से ईमानदारी बरतते हैं और न ही बाहर वालों से. हम किसी भी विदेशी हस्ती के आने की खबर से ही इतना अभिभूत हो जाते हैं कि उस का वैरीफिकेशन करने के बजाय यह सोचने लगते हैं कि भेंट में उस से क्या मिल सकता है. किस मद में कितना लोन या दान मिल सकता है. ऐसे में ईमानदारी से उस की जांच का प्रश्न ही कहां रह पाता है.

उन की ईमानदारी का दायरा देखिए कि उन का राष्ट्रपति हमारे यहां महात्मा गांधी की समाधि पर अगर फूल भी चढ़ाना चाहे तो उन के कुत्ते पहले कई बार चक्कर लगा कर मुतमईन हो लेते हैं कि कहीं उस समाधि में उन के साथ ही उन की लाठी न दबी रह गई हो. वे कतई नहीं चाहते कि उन के अलावा कोई भी मानव विनाशकारी हथियार रखे. आखिर यह हक तो केवल मानव अधिकार के पोषक के पास ही रहना चाहिए न.

अपने यहां किसी होटल में कोई हत्या या चोरी हो जाए तो मुख्य मुद्दा यह हो जाता है कि यहां ठहरने वालों के पते का वैरीफिकेशन करवाया गया था या नहीं. अब सोचिए कि कोई दिल्ली से लुधियाना जाए और अगली यात्रा के लिए उसे वहां 8-10 घंटे रुकना ही पड़ जाए तो पहले अपने पते का सुबूत पेश करे. अगर आप किसी स्कूटर स्टैंड पर अपना स्कूटर खड़ा करें तो अपने पते का सुबूत दिखाएं क्योंकि वह मामला भी एक तरह से किराएदारी का ही हो जाता है.

मेरे शहर में मात्र 9 दिन में बड़ीबड़ी दुकानों में चोरी की 7 वारदातें हो गईं तो एक बात खुल कर सामने आई कि उन के मालिकों ने अपने नौकरों का पुलिस वैरीफिकेशन नहीं करवाया था जबकि सभी चोरियों में उन के नौकरों का हाथ ही पाया गया था. अब बेचारे दुकानमालिकों का ध्यान बजाय अपने नुकसान के इस कानूनी दांवपेंच में उलझ कर रह गया.

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इसी तरह होटलों में होने वाले कांडों पर अंकुश के लिए उन को ताकीद की गई कि वे बिना वैरीफिकेशन के किसी को भी अपने होटल में न ठहरने दें. इन सब के चलते जब एक बहुत बूढ़े जोड़े ने बजाय होटल के रेलवे स्टेशन पर ही रात बिताने की सोची तो वहां जी.आर.पी. वाले उन से वैरीफिकेशन के नाम पर अच्छीखासी रकम की उगाही कर ले गए. जब अपनी पत्नी को बाहर खड़ा कर उस के पति पास के सुलभ शौचालय में शौच के लिए जाने लगे तो वहां तैनात कर्मचारी ने उन को बाहर ले जा कर उन का वैरीफिकेशन करना चाहा. वे बेचारे कहते रहे कि बहुत जोर से लगी है, पर वह कर्मचारी फिर भी नहीं पिघला और सख्त लहजे में बोला, ‘‘बिना पुलिस वैरीफिकेशन आप शौच के लिए नहीं जा सकेंगे.’’

संयोग ही था कि इतने में एक सज्जन जो शौच से निवृत्त हो कर निकले थे, इस तकरार को देख कर ठिठक से गए. उन्होंने उन वृद्ध महोदय को अपने द्वारा खाली किए गए लैट्रिन बौक्स में जबरदस्ती प्रवेश करवा दिया. पर अब वह आफत उस सज्जन के सिर आ गई. वह कर्मचारी उन से भिड़ गया तो वे बोले, ‘‘मैं यहीं बैठा हूं, यह मेरा पता है. जाओ, करा लाओ पुलिस वैरीफिकेशन.’’

इस पर वह कर्मचारी बोला, ‘‘पुलिस वैरीफिकेशन कराने में तो 500 रुपए लगते हैं, वह कौन देगा?’’

‘‘जिस को गरज होगी या जिस को शक होगा,?’’ उन सज्जन ने पलट कर जवाब दिया.

इतनी देर में वृद्ध महोदय बाहर आ चुके थे, उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि इस को 50 रुपए दे दो. उन की पत्नी ने 50 रुपए का नोट उस कर्मचारी के हवाले किया.

50 के नोट पर गांधीजी को हंसता देख कर कर्मचारी की वैरीफिकेशन की जरूरत पूरी हो चुकी थी. वह बस, मुसकरा दिया. इसे कहते हैं वैरीफाइड मुसकान.

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महिलाएं भी दिखा सकती हैं बिजनेस में दम

आज नौकरी के अवसरों की कमी है और निजी क्षेत्रों में नौकरी को लेकर हमेशा एक अनिश्चितता बनी रहती है. इसलिए पिछले कुछ वर्षों में स्टार्टअप का चलन तेजी से बढ़ा है. स्वरोजगार के लिए नएनए आइडियाज उभर कर आएं हैं. एक तो इन में पूंजी कम लगती है और दूसरा कम जोखिम में सफल होने की संभावना अधिक होती है.महिलाएं भी बिज़नेस में बढ़चढ़ कर अपना हाथ आजमा रही है.

महिलाओं की योग्यता और बिज़नेस स्किल्स का लोहा पूरी दुनिया मानती है. अब महिलाएं केवल डिजाइनिंग, फैशन और हैंडीक्रौफ्ट इंड्स्ट्री में ही नहीं हैं बल्कि उन क्षेत्रों में भी कदम रख रही हैं जहां पहले काम करने में वे झिझकती थीं. मिनिस्ट्री औफ स्टेटिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन के अनुसार आज हमारे देश में कुल व्यवसाइयों में से 14 प्रतिशत महिलाएं हैं. शहरी ही नहीं गांव की महिलाएं भी अपने हैंडी ग्राफ्ट्स और एथनिक जूलरी के व्यवसाय बखूबी चला रही हैं. महिलाएं और भी कई तरह के बिज़नेस में हाथ आजमा सकती हैं.

रूचि का खयाल रखें

अगर आप कोई व्यवसाय शुरू करने का सोच रही हैं तो सब से पहले आप को अपनी रूचि का ख़याल रखना चाहिए वही काम करें जो करने में आप को मजा आता है. अब यह तय कीजिये कि उस काम की शुरूआत किस स्तर पर करना चाहती हैं. आप इस व्यवसाय को फुलटाइम रखना चाहती हैं या पार्ट टाइम. इस स्टार्टअप को शुरू करने में कितनी पूंजी की जरूरत पड़ेगी.

फंड का इंतजाम

सामान्यता छोटेमोटे स्टार्टअप की शुरुआत के लिए बहुत ज्यादा पूंजी की आवश्यकता नहीं होती है.  आप इसे अपनी निजी बचत या परिवार के सहयोग से शुरू कर सकती हैं. बैंक और दूसरी वित्तीय संस्थाएं भी महिलाओं को लोन दे रही हैं. माइक्रो फायनेंस सेक्टर स्टार्टअप के लिए बहुत अच्छा काम कर रहा है. नैसकॉम के अनुसार 2018 में स्टार्टअप की फंडिंग में 108 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.,

इस बारे में स्टार्टअप कंसलटेंट यागवेन्द्र सिंह कुम्पावत कहते हैं की महिलाओं के लिए ऐसे कई स्टार्टअप बिजनेस आइडियाज़ हैं जिन्हे वे अपनी सुविधा और रूचि अनुसार अपना सकती हैं;

  1. ब्लौगिंग

ब्लॉगिंग का काम आप बहुत ही कम निवेश पर शुरू कर सकती हैं. इसे 10 हजार से भी कम की पूंजी पर शुरू किया जा सकता है. अगर आप की लेखन क्षमता अच्छी है तो आप ब्लौगिंग के द्वारा अच्छी कमाई कर सकती हैं. ब्लौगर के तौर पर काम करने के लिए आप को एक डोमेन नेम और होस्टिंग स्पेस लेना होता है. इंडीब्लौगर 2007 में स्टार्टअप के रूप में प्रारंभ हुआ था और आज ब्लौगिंग की दुनियां में यह एक बड़ा नाम है.

  1. इवेंट और्गेनाइजर

अगर आप के भीतर नेटवर्किंग बिल्ड करने और टीम को मैनेज करने की क्षमता है तो यह बिजनेस भी काफी मुनाफा देने वाला है. आज इवेंट और्गेनाइज़र्स के लिए मार्केट में अच्छा स्पेस है. इवेंट और्गेनाइज़र को इवेंट मैनेजर भी कहा जाता है. एक इवेंट मैनेज़र का काम किसी भी कार्यक्रम या समारोह को सफलतापूर्वक आयोजित करना है. इस में समारोह स्थान का चयन, विभिन्न कार्यक्रमों का शेड्यूल तैयार करना, औडियो-विडियो की व्यवस्था देखना, खानेपीने का प्रबंध और अगर कार्यक्रम बड़े स्तर पर है तो स्पांसर्स ढूंढना सम्मिलित हैं. इस काम में सफलता प्राप्त करने के लिए आप को थोड़ा धैर्य रखना पड़ता है क्यों कि मार्केट में अपना स्थान बनाने में समय लग सकता है.

  1. कंसल्टेंसी सर्विसेस

शिक्षा के प्रसार और आर्थिक प्रगति के कारण पिछले कुछ वर्षों में कंसल्टेंसी सर्विसेस के क्षेत्र में अवसर काफी बढ़े हैं. आप इसे निजी स्तर पर भी चला सकते हैं या विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को अपने साथ ले कर थोड़े बड़े स्तर पर भी कर काम सकते हैं. इस में निवेश और जोखिम दोनों कम होते हैं.

  1. ब्रेकफास्ट प्वाइंट

हमारे देश में खानेपीने का बड़ा क्रेज है. आप अक्सर देखेंगे कि खानेपीने की छोटीछोटी दुकानों पर भी भीड़ लगी रहती है. वैसे भी भोजन मनुष्य की अधारभूत आवश्यकता है. हर इंसान कम कीमत में लाजवाब और तरहतरह की चीज़ें खाने की इच्छा रखता है. इसीलिए खानपान से जुड़े व्यवसाय मार्किट का बहुत बड़ा हिस्सा शेयर करते हैं. आप एक दुकान किराए पर ले कर उस में सेकंडहैंड टेबलकुर्सी लगा कर भी अपना काम शुरू कर सकती हैं. बर्तन और किराने का सामान भी कम कीमत पर आसानी से मिल जाता है.

  1. यूट्यूब चैनल

यूट्यूब रचनात्मक और प्रतिभाशाली लोगों को एक अच्छा प्लेटफार्म देता है. इस में निवेश बहुत कम है लेकिन रिटर्न काफी अच्छे मिलते हैं. यूट्यूब इनडिपेंडेंट चैनल (निजी चैनल) खोलने की सुविधा भी देता है और इस पर विडियो अपलोड करने का कोई शुल्क भी नहीं वसूला जाता है. बल्कि यह कुछ युट्युबर्स को जिन के चैनल काफी लोकप्रिय हैं भुगतान भी करता है.

  1. बुटिक

आज सेल्फमेड डिजाइन का बड़ा चलन है. आप एक छोटी सी दुकान किराए पर ले कर या अपने घर से ही यह काम शुरू कर सकती हैं. आप इसे एक सिलाई मशीन के साथ अकेले शुरू कर सकती हैं. आप का बजट अधिक हो तो एकदो कारीगर भी रख सकती हैं. आप अपना एक ब्रांड भी शुरू कर सकती हैं. ऑनलाइन बिक्री के लिए आजकल बहुत सारे प्लेटफार्म उपलब्ध हैं. एक बार आप का ब्रांड मार्केट में स्थापित हो जाए तो आप के लिए संभावनाएं बहुत होती हैं.

  1. स्क्रिप्ट राइटिंग

आजकल कई सारे चैनल्स आने से स्क्रिप्ट राइटिंग (पटकथा लेखन) का काम बहुत फलफूल रहा है. इस काम को शुरू करने के लिए कुछ भी निवेश नहीं करना पड़ता है. मुबंई में स्वतंत्र पटकथा लेखकों के लिए बहुत काम है. उन्हें विभिन्न प्रोजेक्ट्स पर काम मिल जाता है जिसे वे कहीं से भी और कभी भी कर सकते हैं. अगर आप एक कुशल पटकथा लेखक हैं तो आप के लिए अवसरों की कोई कमी नहीं है.

  1. वेबसाइट डिवेलपर

आज हम डिजिटल वर्ल्ड में रह रहे हैं, ऐसे में हर कोई चाहता है कि उसकी अपनी निजी वेबसाइट हो जिस पर वह अपने काम को प्रदर्शित कर सके. वेबसाइट के द्वारा न केवल आप अपने काम को डिसप्ले कर सकती हैं बल्कि यूजर्स तक अपने काम को आसानी से पहुंचा भी सकती हैं. आप किसी संस्था से जुड़ कर भी वेबसाइट डिवेलपर का काम कर सकती हैं. अगर आप निजी तौर पर करना चाहती हैं तो आप को वेबसाइट डिवेलपर का कोर्स करना पड़ेगा. इस में आप को वेबसाइट डिवेलप करने की बारीकियां सिखाई जाती हैं.

  1. फिटनेस ट्रेनर

यदि आप को स्वस्थ रहने की आदत है और इसलिए आप हर दिन योग एवं व्यायाम करती हैं तो आप इस कला को दूसरों को भी सिखा सकती हैं और इसे एक व्यवसाय के रूप में अपना सकती हैं. फिटनेस ट्रेनर का व्यवसाय आज कल काफी फलफूल रहा है. वैसे भी ऐसी बहुत सारी महिलाएँ हैं जो अपने जीवन में इतनी व्यस्त हैं कि अपनी शारीरिक फिटनेस पर ध्यान नहीं दे पाती हैं. आप उन्हें व्यायाम सिखा सकती है फिटनेस टिप्स दे सकती हैं. यह एक अच्छा बिज़नेस साबित हो सकता है .

  1. फ्रीलांस राइटिंग

महिलाओं के लिए एक व्यवसाय जो बहुत तेजी से उभर रहा है वह है फ्रीलांस लेखन जिस की डिमांड मार्किट मैं लगातार बढ़ती जा रही है. इसे शुरू करना बहुत आसान है. अगर आप में अपने विचारों को सशक्त तरीके से पेश करने की क्षमता है, भाषा पर अच्छी पकड़ है और लेखन कला जानती हैं  तो आप अच्छी लेखिका साबित हो सकती हैं.

इसे शुरू करने के लिए निवेश भी अधिक नहीं करना पड़ता है. आपको एक कम्प्युटर, इंटरनेट और प्रिंटर की आवश्यकता पड़ती है. अगर आप अच्छा लिखती हैं और आपका नेटवर्क अच्छा है तो आप के लिए काम की कमी महीं है. इस में कमाई के साथसाथ आप को प्रसिद्धि भी मिलती है. अगर आप ने एक कुशल लेखक के रूप में अपनी जगह बना ली है तो आप कुछ अच्छे विषय चुन कर उन पर किताबें भी लिख सकती हैं.

  1. टिफिन सेवा

यदि आप एक ऐसी महिला हैं जिसे खाना बनाना पसंद है तो आप को व्यवसायी बनने से कोई नहीं रोक सकता. आज कल की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में लोगो के पास अच्छा खाना बनाने और खाने का समय नहीं रहता है. मगर हर कोई घर का बना ताजा और हाईजेनिक खाना पसंद करते हैं. ऐसे में टिफिन सेवा व्यवसाय आप के लिए एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है. आप को घर बैठे कमाने और अपनी हॉबी को सही जगह इस्तेमाल करना का मौका मिलता है.

  1. सौंदर्य उत्पाद निर्माण

और्गेनिक और हर्बल उत्पादों के प्रति लोगों की दीवानगी और रुझान देखते हुए आप घर पर सौंदर्य उत्पाद बनाने का व्यवसाय शुरू कर सकती हैं. साबुन, बाथ औइल, फेस वाश कैंडल्स जैसी कितनी ही चीज़ें हैं जिन्हे बना कर आप अपना हुनर दिखने के साथसाथ अच्छीखासी कमाई भी कर सकती हैं.

  1. ग्राफिक्स डिजाइनिंग बिजनेस आइडियाज

यदि आप के पास रचनात्मक दिमाग और व्यवसाय के नएनए आइडियाज हैं तो आप ग्राफिक डिजाइनिंग की दुनिया में उतर सकती हैं और इसे अपने स्वयं के व्यवसाय में बदल सकती हैं. एक बार जब आप अपना पोर्टफोलियो बना लेती हैं और खुद को रिपीट करने वाले व्यक्ति के रूप में स्थापित कर लेती हैं तो आप के पास ऑफर आने शुरू हो जाएंगे. अपने रचनात्मक दिमाग और कौशल के जरिये आप घर पर एक अच्छा व्यवसाय शुरू कर सकती हैं.

  1. इमेज कंसल्टेंट्स

इस तेजतर्रार और प्रतिस्पर्धी दुनिया में आप खुद को कैसे पेश करती हैं यह बहुत मायने रखता है. आप एक पुरुष हैं या महिला हैं इस से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. क्यों कि इमेज कंसल्टेंसी का व्यवसाय तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. हम में से हर एक में सुधार की गुंजाइश  हमेशा रहती है और अगर आप को लगता है कि आप के पास किसी के व्यक्तित्व को विकसित करने और उन में कुछ आत्मविश्वास पैदा करने में मदद करने की क्षमता है तो आप खुद को एक सफल इमेज कंसलटेंट के रूप में स्थापित कर सकती हैं.

  1. वित्तीय सलाहकार

यदि आप ने अपने परिवार के लिए अच्छे वित्तीय निर्णय लिए हैं और आप की सलाह ने आप के दोस्तों और परिचितों की मदद की है तो आप वित्तीय सलाहकार बनने पर विचार कर सकती हैं. अपने ग्राहकों के लिए घर पर बैठकें आयोजित करें. कुछ व्यवसायी कार्ड बनाएं और काम शुरू करें.

  1. भाषा शिक्षण

यदि आप विभिन्न भाषाओं या यहां तक कि एक विदेशी भाषा जानती हैं तो आप युवा पेशेवरों के लिए भाषा कक्षाएं शुरू कर सकती हैं. घर पर अपना करिकुलम बनाएँ और काम शुरू करें. आप के पास अपना खुद का शेड्यूल सेट करने का लचीलापन भी होगा.
यदि आप पहले से ही आर्थिक रूप से मजबूत हैं तो आप एक छोटी सी जगह किराए पर ले सकती हैं और कक्षाएं संचालित कर सकती हैं. आप आनलाइन भी अपना व्यवसाय बढ़ा सकती हैं. इस से आप को अपना घर भी नहीं छोड़ना पड़ेगा .

17.फिजियोथेरेपी व्यवसाय

यदि आप के पास प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र हैं तो फिजियोथेरेपी एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है. आप घर पर फिजियोथेरेपी सत्र आयोजित कर सकती हैं या वरिष्ठ नागरिकों जो बाहर जाने में असक्षम है के लिए घर पर ही यह सुविधा प्रदान कर सकती हैं.
कई महिलाएं एक महिला फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा अपनी फिजियोथेरेपी करवाना पसंद करती हैं. यहाँ आप मोनोपोली का मजा ले सकती है.

  1. संगीत हो सकता है एक बेस्ट व्यवसाय

आप लोगों को गिटार, वायलिन , कीबोर्ड, सेलो या कोई और म्यूजिकल इंस्टूमेंट्स सिखा सकती हैं. आप अपने घर पर, अपने बच्चे के स्कूल में या कॉलेजों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर काम पा सकती हैं. संगीत का शौक सब को होता है. इसे आप अपनी जीविका का साधन भी बना सकती हैं.

19.यात्रा ब्लौगिंग

यदि आप यात्रा करना पसंद करती हैं और अपने अनुभव लोगों के साथ साझा करना चाहती हैं तो आप ब्लॉगिंग का व्यवसाय शुरू कर सकती हैं. आप लोगों से रहने के लिए बेहतर स्थानों पर सुझाव साझा कर सकती हैं और खानेपीने के लिए अच्छे स्थानीय मार्केट्स की जानकारी दे सकती हैं. आप अपनी सेवाओं की पेशकश करने वाली यात्रा वेबसाइटों पर लिख सकती हैं और अपनी मेहनत की अच्छी कीमत भी पा सकती हैं.

  1. लाइफ कोच

अगर आपको जिंदगी और मानव स्वभाव की अच्छी समझ है तो आप लाइफ कोच भी बन सकती हैं. आज भागदौड़ भरी जिंदगी में कईं लोगों का जीवन दिशाहीन हो जाता है. उन्हें समझ में नहीं आता कि अपने जीवन को दोबारा पटरी पर कैसे लाया जाए. वे बहुत तनावग्रस्त रहने लगते हैं और कईं तो अवसाद में चले जाते हैं. ऐसे में लाइफ कोच उन के जीवन को एक दिशा देने का काम करता है. इस प्रोफेशन की सब से अच्छी बात यह है कि कमाई के साथसाथ यह आप को मानसिक संतुष्टि भी देता है. इसे शुरू करने के लिए निवेश भी अधिक नहीं करना पड़ता है. आप एक आफिस किराए पर ले सकती हैं, थोड़ा इंटीरियर पर खर्च करने के अलावा आप को अपने क्लाइंट्स का रिकार्ड रखने के लिए एक कम्प्युटर की जरूरत होगी.

नक्काश: इंसान में फर्क न करने का संदेश देने वाली बेहतरीन फिल्म…

रेटिंग: तीन स्टार

निर्माताः पवन तिवारी,जैगम इमाम व गोविंद गोयल

एसोसिएट निर्माता व प्रस्तुतकर्ता: पियूश सिंह

लेखक व निर्देशक: जैगम इमाम

संगीतकार: अमन पंत

कैमरामैन: असित विश्वास

कलाकार: इनामुलहक, शारीब हाशमी, कुमुद मिश्रा, राजेश शर्मा, पवन तिवारी, गुलकी जोशी,  हरमिंदर सिंह अन्य.

वाराणसी में ही पले बढ़े और पत्रकार से फिल्मकार बने जैगम इमाम धार्मिक कट्टरता के खिलाफ लड़ने  की  बात करने वाली ‘दोजख:इन सर्च औफ हैवन’ और ‘अलिफ’ जैसी दो फिल्में दे चुके हैं. अब वह तीसरी फिल्म ‘‘नक्काश’’लेकर आए हैं. उनकी इन तीनों ही फिल्मों में बनारस, गंगा, मंदिर व मस्जिद, हिंदू व मुस्लिम के साथ ही धार्मिक कट्टरता के खिलाफ लड़ाई व छटपटाहट मौजूद है. मगर जैगम इमाम ने इस बार फिल्म ‘‘नक्काश’’ में धर्म के नाम पर समाज में विभाजन करने वाली राजनीति को जोड़ा है. और यहीं पर वह थोड़ा सा मात खा गए. परिणामतः उनकी यह अति जरुरी फिल्म उनकी पिछली फिल्मों के मुकाबले कथानक व पटकथा के स्तर कुछ कमजोर नजर आती है.

फिल्मकार के तौर पर जैगम इमाम की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि वह समाज के दर्पण की तरह ‘नक्काश’ लेकर आए हैं. भारत में कभी भी धार्मिक कट्टरता हावी नही रही है. हमेशा धार्मिक सद्भाव व भाईचारा रहा है. पर कुछ समय से यह लुप्त हो रहा है, उसे ही लोगों के सामने रखने के साथ इंसान को सोचने पर मजबूर करने का काम फिल्म ‘‘नक्काश’’ करती है.

कहानीः

‘नक्काश’की कहानी अल्ला रक्खा सिद्दिकी (इनामुल हक) नामक एक मुस्लिम कलाकार की है, वाराणसी में मंदिर में नक्काश और भगवान के गर्भ ग्रृह में नक्काशी का काम करते हैं. अल्ला रक्खा की पत्नी का देहांत हो चुका है और उनका एक छोटा बेटा मोहम्मद (हरमिंदर सिंह) है. अल्ला रक्खा हर दिन गंगा नदी में ही वुजू करते हैं और गंगा घाट पर ही नमाज अदा करते हैं. अल्ला रक्खा के पुरखे भी मंदिर में नक्काशी का काम करते रहे हैं. बनारस के बहुत बड़े व भव्य मंदिर के मुख्य पुजारी वेदांती (कुमुद मिश्रा) की नजरों में अल्ला रक्खा से बेहतरीन कोई कारीगर नही. वेदांती सदैव अल्ला रक्खा का समर्थन करते हैं. क्योंकि वह उनकी कला और रचनात्मकता का सम्मान करते हैं, जो उन्हें भगवान द्वारा दिया गया है. वेदांती सभी धर्मो का सम्मान करते हैं. मगर माहौल बिगड़ा हुआ है, इसलिए वेदांती की सलाह पर अल्ला रक्खा हर दिन शर्ट पैंट पहने और माथे पर टीका लगाकर ही मंदिर आता है. वेदांती का बेटा मुन्ना भाई (पवन तिवारी) तो धर्म की राजनीति करते हुए इस बार चुनाव में टिकट पाने की जुगाड़ में है. उसे एक विधर्मी अल्ला रक्खा का मंदिर में नक्काशी का काम करना पसंद नही, पर पिता वेदांती के सामने वह चुप रहता है. उधर कोतवाली के पुलिस इंस्पेक्टर (राजेश शर्मा) को भी मंदिर में मुस्लिम का काम करना पसंद नहीं.

इतना ही नहीं मंदिर मे काम करने की वजह से अल्ला रक्खा सिद्दिकी को उसके अपने समुदाय के लोग उपेक्षित नजरों से देखते हैं. अल्ला रक्खा का इकलौटा बेटा मोहम्मद पढ़ना चाहता है. लेकिन कोई भी मौलवी साहब मदरसे में उसे प्रवेश नहीं देते. क्योंकि उसके पिता हिंदुओं और उनके भगवान की सेवा करते हैं. एक दिन अल्ल रक्खा अपने बेटे मोहम्मद को मंदिर में उस जगह ले जाते हैं, जहां वह भगवान को सजाने का काम करते हैं, तो भगवान की मूर्ति देखकर जब बेटा मोहम्मद सवाल करता है कि यह कौन है? तब अल्ला रक्खा कहते हैं-‘‘अल्लाह के भाई भगवान हैं. अल्लाह और भगवान इंसान के बीच फर्क नहीं करते. इंसान के बीच फर्क करता है इंसान. तुम कभी मत करना.’’

Inaamulhaq.

अल्ला रक्खा का दोस्त व औटो रिक्षा चलाने वाला समद (शारिब हाशमी) हमेशा अल्ला रक्खा का साथ देता है. समद का जीवन में मूल उद्देश्य अपने पिता को हज पर भेजना है.

इसी बीच अल्ला रक्खा सबीहा (गुलकी जोशी) से दूसरी शादी करने के लिए जाता है. तभी समद, अल्ला रक्खा के घर मंदिर के सोने के जेवर चुराकर पिता को हज पर भेजने के लिए पैसे का इंतजाम करने जाता है, पर पुलिस द्वारा पकड़ा जाता है. शादी करके घर वापस लौटने पर समद के रोने पर अल्ला रक्खा मंदिर से जेवर चुराने का आरोप अपने उपर ले लेता है, जिससे समद अपने पिता को हज पर भेज सके. पर वेदांती का मानना है कि अल्ला रक्खा मंदिर के जेवर नही चुरा सकता. वेदांती के कहने पर पुलिस अल्ला रक्खा व उसके बेटे को लेकर मंदिर के गभरा गृह में पहुंचती है. जहां अल्ला रक्खा सच बयां कर देते हैं. पुलिस फिर से समद को गिरफ्तार कर लेती है. समद के पिता की मौत हो जाती है. जेल से निकलने के बाद समद मुस्लिम धर्म की सेवा में लग जाता है और वह अल्ला रक्खा से दूरी बना लेते हैं.

अल्ला रक्खा अपनी कला के लिए एक अखबार के साक्षात्कार से लोकप्रियता हासिल करता है. पर इसी के चलते वेदांती के बेटे मुन्ना भाई को चुनाव का टिकट नही मिल पाता. तब मुन्ना भाई, समद की मदद से अपनी राजनीतिक रोटी को सेंकने में कामयाब होते हुए अल्ला रक्खा को मौत की नींद सुला देते हैं. अंत में मोहम्मद अपने घर में भगवान की मूर्ति बनाते व नक्काशी करता नजर आता है.

पटकथाः

जैगम इमाम ने अपनी लेखनी के माध्यम से हर धार्मिक कट्टरता को बेबाकी के साथ चित्रित किया है. उन्होंने वर्तमान समय में धार्मिक घृणा के चलते विभाजित हो रहे समाज को लेकर अच्छी नीयत के साथ फिल्म बनायी है. फिर भी कमजोर पटकथा के चलते कुछ हिस्सों में फिल्म की गति धीमी है. जैगम इमाम ने इस फिल्म में दोस्ती पर धर्म व राजनीति को हावी होते दिखाया है. यानी कि रिश्तों पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है. इस बात से निजी स्तर पर में सहमत नही हो सकता. क्योंकि मेरे अनुभव कहते है कि भारत में आज भी दोस्ती की राह में धर्म नहीं आता. पर फिल्मकार का दावा है कि उनकी यह फिल्म गहन शोध पर आधारित है. फिल्म का क्लायमेक्स भी कमजोर है.

फिल्म के कुछ संवाद बहुत बेहतर बन पड़े हैं. अपनी पिछली दोनों फिल्मों की ही तरह इस फिल्म में भी जैगम ने मासूम बालक के माध्यम से कुछ सवाल उठाए हैं, जो कि हर दर्शक को सोचने पर मजबूर करते हैं.

निर्देशनः

इस फिल्म से भी जैगम इमाम कुशल निर्देशक के रूप में उभरते हैं. फिल्म में उन्होंने गंगा जमुना तहजीब और बनारस को बड़ी खूबसूरती के साथ चित्रित किया है. यदि उन्होंने फिल्म के अंत को बेहतर बनाने के साथ ही कहानी में राजनीति को थोड़ा बेहतर ढंग से पिरोया होता, तो यह फिल्म और बेहतर हो सकती थी.

FILM-Nakkash

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अल्ला रक्खा सिद्दिकी के किरदार में इनामुलहक ने शानदार अभिनय किया है. अल्ला रक्खा की समझदारी, उसका गम, गुस्सा, हताषा, दोस्त के लिए चोरी का झूठा इल्जाम भी अपने सिर पर लेने के सारे भाव इनामुलहक के चेहरे पर महसूस किए जा सकते हैं. भोल भाले मासूम रिक्षाचालक से कट्टर वादी मुस्लिम बन जाने वाले समद के किरदार में शारीब हाशमी का अभिनय काफी सहज है. हर धर्म को एक समान मानने वाले वेदांती के किरदार में कुमुद मिश्रा प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहते हैं. राजेश शर्मा और गुलकी जोशी के हिस्से करने को कुछ खास है ही नही. बाल कलाकार हरमिंदर सिंह हर दर्शक के दिलों तक पहुंच जाता है.

जानें क्यों वायरल हो रही हैं, शाहरुख खान की बेटी सुहाना की तस्वीरें

बौलिवुड बादशाह शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान ट्रेडिशनल अंदाज में नजर आईं. इस दौरान सुहाना बेहद खूबसूरत लग रहीं थीं. दरअसल सुहाना की ये तस्वीरें फैमिली वेडिंग की हैं.

 

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हल्के हरे रंग की सलवार कमीज पहने और हाथों में मेंहदी लगाए सुहाना का यह शानदार लुक देखते ही बनता है. सुहाना की यह तस्वीर इंटरनेट पर आते ही छा गई.

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इस तस्वीर में सुहाना मुस्कुराकराते हुए पोज दे रही हैं. वें दुपट्टे को कंधे पर लटकाए हुए थीं और खुले बालों में काफी खूबसूरत लग रही थी.

 

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आपको बता दें कि पिछले साल सुहाना ने वोग मौग्जीन के लिए कवर फोटोशूट कराया.मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक सुहाना बौलीवुड में डेब्यु करने वाली हैं.

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हालांकि सुहाना, शाहरुख खान या गौरी खान की साइड से डेब्यु के लिए कोई भी औफिशियल अनाउंसमेंट नहीं किया गया है. आए दिन सुहाना की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल होते रहती हैं.

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क्या बेन स्टोक्स बन पाएंगे 2011 के युवराज सिंह?

इस टूर्नामेंट को जीतने की प्रबल दावेदार टीम इंगलैंड ने दक्षिण अफ्रीका को चारों खाने चित करते हुए उस पर एक बड़ी जीत दर्ज की. ओवल के खूबसूरत मैदान पर पहले बल्लेबाजी करते हुए इंगलैंड ने तय 50 ओवर में अपने 8 विकेट खो कर 311 रन बनाए थे. देखने में यह विशाल स्कोर लग रहा था लेकिन जब से ट्वेंटी20 ने जोर पकड़ा है और उस में ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करते हुए टीमें बड़ेबड़े स्कोर बना देती हैं, तो यह कहा जा सकता था कि अगर दक्षिण अफ्रीका की टीम सब्र से काम लेगी और अपनी विकेटों को बचाए रखेगी, तो मैच निकाल ले जाएगी.

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पर ऐसा हो न सका. इंगलैंड ने अपनी सधी गेंदबाजी और शानदार फील्डिंग से आसानी से यह मैच जीत लिया. दक्षिण अफ्रीका की टीम महज 207 रन ही बना पाई जबकि अभी 9 ओवर फेंके जाने बाकी थे.
इंगलैंड की इस जीत के हीरो बेन स्टोक्स रहे जिन्होंने आलराउंड खेल दिखा कर सब का दिल जीत लिया. उन्होंने पहले तो उम्दा बल्लेबाजी करते हुए 79 गेंदों पर 89 रन बनाए और बाद में अपनी गेंदबाजी से भी मेहमान टीम को परेशान किया. उन्होंने 2.5 ओवर में 12 रन दे कर 2 विकेट हासिल किए. इतना ही नहीं, उन्होंने 2 कैच भी लपके थे और एक खिलाड़ी को रन आउट करने में अपना योगदान भी दिया था.

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उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के एनडिल फेहलुकवायो के शॉट को हवा में उछल कर एक हाथ से लपक लिया था जो इस मैच का यादगार कैच बन गया था.
बेन स्टोक्स का यह हरफनमौला खेल उस युवराज सिंह की याद दिला गया जिन्होंने साल 2011 में भारत में हुए वर्ल्ड कप में अपने आल राउंड खेल से विरोधियों के छक्के छुड़ा दिए थे. तो क्या यह समझ लिया जाए इस बार यह कारनामा बेन स्टोक्स कर पाएंगे?

Edited by – Neelesh Singh Sisodia 

रूढ़ियों को तोड़तीं स्मौल टाउन गर्ल्स

कुछ दिनों पहले सुनीता मुंबई में अपनी एक सहेली सारिका के यहां उस की 16 वर्षीया बेटी की बर्थडे पार्टी में गई. उस की बेटी बेहद स्मार्ट और आत्मविश्वास से भरपूर किशोरी थी. आधुनिक लिबास और टै्रंडी हेयर स्टाइल में वह किसी मौडल से कम नहीं लग रही थी. सुनीता ने उसे बर्थडे विश किया और उस से थोड़ी कैजुअल बातें की. वह उस के कम्युनिकेशन स्किल और इंग्लिश ऐक्सैंट की कायल हो गई. वैसे वहां पार्टी में आईर् हुई सभी लड़कियों की ऐसी ही पर्सनैलिटी थी.

तभी उस की नजर पार्टी हौल के कोने में बैठी एक लड़की पर पड़ी. वह दिखने में बिलकुल साधारण सी थी. सिंपल कपड़े, लंबी चोटी, छोटे शहर की आम लड़की जैसा दबाढका सा व्यक्तित्व. सारिका से पूछने पर पता चला कि वह उस की भतीजी शालिनी है जो कल ही उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कसबे खतौली से आई है.

यह सुन कर सुनीता मन ही मन सहेली की बेटी और भतीजी में तुलना करने लगी. कहां यह मुंबई की स्मार्ट हाईफाई लड़की और कहां ये बेचारी कोने में दुबकी बैठी छोटे शहर की लड़की. सच ही है, व्यक्तित्व और सोच पर जगह का कितना असर पड़ता है. मैट्रो शहरों में रहने वाली लड़कियों की पर्सनैलिटी हाय ऐक्स्पोजर और आजादी की वजह से कितनी निखरी हुई होती है. ऐसी लड़कियों के सामने छोटे शहरों की लड़कियां कितनी दब्बू, कितनी साधारण लगती हैं.

सुनीता यों ही शालिनी से बातचीत करने लगी, ‘बेटा, सभी लड़कियां डांस कर रही हैं, आप नहीं कर रही हो?’ उस ने जवाब दिया, ‘‘नहीं आंटीजी, मुझे डांस करना पसंद नहीं.’’ उस की बोलचाल भी आम उत्तर भारतीय कसबाई लड़कियों जैसी थी. सुनीता ने आगे पूछा, ‘‘तुम मुंबई घूमने आई हो या बूआ से मिलने?’’

वह बोली, ‘‘आंटीजी, दरअसल मैं यहां एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का एंटै्रंस एग्जाम देने आई हूं.’’ यह सुन कर सुनीता को झटका लगा, ‘‘ये एयरोस्पेस कौन सा फील्ड है, इसे कर के तुम क्या बनोगी?’’ इस पर शालिनी बोली, ‘‘मुझे ऐस्ट्रोनौट बनना है और उस की शुरुआत इसी इंजीनियरिंग कोर्स से होती है.’’

यह सुन कर सुनीता तो जैसे धम्म से जमीन पर आ गिरी. अब उस की जिज्ञासा बढ़ चली थी, उस ने आगे पूछा, ‘तो क्या तुम ने इस के लिए कोई विशेष कोचिंग ली है, क्या तुम्हारे कसबे में ऐसी कोचिंग होती है? शालिनी ने जवाब दिया, ‘‘नहीं आंटीजी, मेरे कसबे में तो नहीं, लेकिन वहां से 20-25 किलोमीटर दूर दूसरी जगह पर होती है.’’

सुनीता को हैरानी हुई क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माहौल के बारे में जैसा उस ने सुना था, वहां क्राइम रेट बहुत ज्यादा है, लड़कियों का अकेले आनाजाना सुरक्षित नहीं है, इसलिए उस ने पूछा, ‘‘इतनी दूर कैसे जाती हो, पापा या भाई छोड़ते होंगे?’’ यह सुन कर शालिनी पूरे आत्मविश्वास से बोली, ‘‘नहीं, मैं अकेली ही जाती हूं, स्कूटी से,’’ उस की बात सुन कर सुनीता सोच में पड़ गई, ‘‘तुम्हें इतनी दूर अकेले जाते हुए डर नहीं लगता?’’ इस पर वह हंसते हुए बोली, ‘‘नहीं आंटी, मैं कराटे में ब्लैक बैल्ट हूं, मैं अपनी रक्षा करना जानती हूं.’’

अब तो सुनीता के ऊपर जैसे घड़ों पानी पड़ गया. जिसे वह छोटे शहर की साधारण लड़की समझ रही थी, वह कल्पना चावला की तरह अंतरिक्ष में उड़ान भरने की चाहत और हिम्मत रखती थी. वह अपने सपनों को दिशा देना भी जानती थी. वह होनहार थी, निडर थी और अपनी सुरक्षा करना भी जानती थी. सुनीता को अब वह स्मौल टाउन गर्ल पार्टी में नाच रही बाकी मुंबईया लड़कियों से कहीं भी कमतर नहीं लग रही थी.

समय बदल गया है

उस पार्टी से सुनीता एक बहुत बड़ा सबक ले कर लौटी थी, वह यह कि छोटी जगह से आने का अर्थ यह नहीं कि लड़की साधारण हो, उस की सोच छोटी और दबी हुई हो, वह बहुत स्ट्रौंग और क्लीयर माइंड भी हो सकती है. वे जमाने गए जब छोटे शहर की लड़कियां पढ़ाई पूरी कर घर में बैठ, कढ़ाईबुनाई में लग कर दहेज इकट्ठा किया करती थीं. उन की क्लासेज भी कुकिंग, बेकरी, स्टीचिंग, पेंटिंग तक ही सीमित हुआ करती थी.

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घरवाले उन्हें ऐसे संभाल कर रखते थे जैसे वे कोई भेड़बकरी हैं और खुला छोड़ने पर कहीं भाग जाएंगी. पिता जल्द से जल्द उस के हाथ पीले करने की कोशिश में लग जाते ताकि वे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकें. जब कोई लड़की घर से बाहर निकलती थी तो उस के साथ उस के भाई या पापा हुआ करते थे क्योंकि अकेली लड़की का घर से निकलना ठीक नहीं माना जाता था. लड़कियों का घर से दूर रह कर पढ़ना या नौकरी करना तो समाज में बिलकुल अस्वीकार्य था.

आजकल छोटे शहर की लड़कियां इन सब दकियानूसी बातों से बाहर आ चुकी हैं. वे दकियानूसी माहौल के बीच भी ऐसी खिल रही हैं जैसे कीचड़ में कमल खिलता है. सारी सामाजिक बंदिशों और रूढि़यों के पिंजरो को अपने परों की ताकत से तोड़ कर खुले आकाश में ऊंची उड़ान भर रही हैं.

अच्छी बात यह है कि अब उन के मातापिता भी उन की उड़ान को परवान देने के लिए समाज से लड़ने को तैयार हैं. लेकिन जहां मातापिता तैयार नहीं हैं वहां भी लड़कियों के हौसलों पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा है. वे अपना संघर्ष कर रही हैं और उस में सफल भी हो रही हैं.

जब हौसले हों बुलंद

हरियाणा के एक छोटे दकियानूसी गांव से निकली ‘दंगल’ फिल्म की रीयल लाइफ हिराइन फोगाट बहनों को कौन नहीं जानता. छोटे शहर से आई तीन मोहन बहनों शक्ति, नीति, और मुक्ति ने नृत्य, गायन, और अभिनय के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई हैं.

आजकल डांस प्लस रियलिटी शो में आ रहीं वर्तिका उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर सोनभद्र से आई है. उस का पावरफुल पौपिंग डांस बड़ेबड़े डांसर को हैरत में डाल रहा है. अब तो उस का चयन एक फिल्म के लिए भी हो चुका है. सब से बड़ी बात उस ने इस डांस को किसी क्लास में नहीं सीखा है बल्कि खुद ही वीडियोज देखदेख कर उस ने डांस में महारत हासिल की है. इसी तरह एयर इंडिया में बतौर पायलट चयनित हो कर एक छोटे से शहर शिवपुरी की रहने वाली श्रुति छोटे शहरों की लाखों लड़कियों की आइडियल बन गई.

इन सभी केस में लड़कियों को उन के मातापिता का पूरा सहयोग मिला. दकियानूसी समाज का सामना करने की जिम्मेदारी उन्होंने ले ली थी. मगर एक छोटी पहाड़ी जगह धर्मशाला से आई राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कंगना रनौत और वर्ल्ड चैंपियन बौक्सर मैरी कौम इतनी भाग्यशाली नहीं रही. उन्हें अपने परिवार का सपोर्ट नहीं मिला फिर भी उन की अभूतपूर्व सफलता आप के सामने है. इन

दोनों ने ही पुरुष प्रधान समाज की रूढि़यों को तोड़ा है.सोशल मीडिया से एक्सपोजर यह सच है कि छोटे शहरों की लड़कियों को सामाजिक दबाव और रूढि़वादिता झेलनी पड़ती है लेकिन आजकल उन्हें इंटरनैट, सोशल मीडिया और टीवी के माध्यम से हर तरह का एक्सपोजर मिल रहा है जिस से उन का दृष्टिकोण बदल रहा है. उन का विजन यानी दूरदर्शिता बढ़ रही है. याद है न, कुछ साल पहले जब टीवी पर एक महिला पुलिस औफिसर के संघर्ष पर आधारित सीरियल ‘उड़ान’ आया करता था, उसे देख कितनी लड़कियों की आंखों में पुलिस औफिसर बनने के सपने पले थे जो हकीकत में भी बदले.

आजकल लगभग हर गांवशहर में नैटवर्क कनैक्शन आ चुका है. भारत में सभी तरह की कैरियर कोचिंग क्लासेस और कोर्स मैटीरियल औनलाइन उपलब्ध हो चुके हैं. यानी यदि कोई दिल से चाहे तो कुछ भी और कहीं भी सीख सकता है. छोटे शहरों में बड़े शहरों जितना ऐक्सपोजर भले न मिले मगर वह कमी अपनी मेहनत से पूरी की जा सकती है.

वैसे भी ज्यादातर कैरियर में पर्सनेलिटी नहीं बल्कि क्लासिफिकेशन और नौलेज देखी जाती है.

शालिनी ने भी कल्पना चावला के बारे में सोशल मीडिया पर पढ़ा था. उस ने इंटरनैट पर सर्च कर के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के बारे में सारी जानकारी घर बैठे ही इकट्ठी कर ली है. उस के लिए फौर्म भरना, डिमांड ड्राफ्ट बनवाना जैसे काम उस ने बिना पिता या भाई की सहायता के स्वयं से ही किए थे.

हम में है हीरो

तो ये है आज की हकीकत. स्मौल टाउन गर्ल अपनी रूढि़यां और गंवार होने की छवि तोड़ कर आगे बढ़ रही हैं. वे हर वो काम कर रही हैं जिसे करने की उन्हें सदियों से इजाजत नहीं थी. बूंदी, राजस्थान की रहने वाली मीना रेगर ने जब अपने पिता के अंतिम संस्कार करने की ठानी तो इस के लिए उन्हें समाज से बेदखल होना पड़ा. उस मुश्किल घड़ी में उन के रिश्तेदार भी उन्हें अकेला छोड़ कर चले गए मगर वे अपने निश्चय से नहीं हटी और पिता को मुखाग्नि दी.

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बिहार के एक छोटे से कसबे मधवापुर में रहने वाली संध्या अकेली अपनी होने वाली ससुराल गई और बड़े दबंग तरीके से अपना रिश्ता तोड़ कर आ गईर् क्योंकि लड़के वाले आएदिन कोई न कोई नई मांग खड़ी कर रहे थे.

छोटे शहरों की लड़कियां पुरुष प्रधान क्षेत्रों में पुरुषों से कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं. आज वे इंजीनियर हैं, मैकेनिक हैं, पायलट हैं, ट्रैफिक हवलदार हैं, फायर फाइटर हैं, औटो और बस ड्राइवर भी हैं, आज वे बौक्सर हैं, पहलवान हैं और बांउसर भी हैं. भारत के लिए अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में मैडल लाने वाली ज्यादातर महिला खिलाड़ी छोटे शहरों से ही ताल्लुक रखती हैं.

न सुविधाएं, न सपोर्ट ऊपर से टांग खींचने वाला, डरानेधमकाने वाला समाज अलग, तो सवाल यह है कि उन में इतना हौंसला आया कहा से? दरअसल, शुरू से ही छोटे शहरों में लड़कियों पर रूढियों को निभाने का बहुत ज्यादा सामाजिक और पारिवारिक दबाव रहता आया है, और जब भी कोई दबाव हद से ज्यादा बढ़ जाए तो फिर विस्फोट होता है. छोटे शहरों में यह विस्फोट हो चुका है.

जब वे टीवी इंटरनैट के माध्यम से दुनिया की बाकी लड़कियों को आगे बढ़ता देखती हैं, उन के संघर्षों से परिचित होती हैं तो उन के भीतर भी संकल्पों की ज्वाला धधकती है, जब लड़की हो कर यह ऐसा कर सकती है, तो मैं क्यों नहीं. बस इसी संकल्प और हौंसले की ज्वाला से वे सारे दबावों और अभावों को विस्फोट कर उड़ा चुकी हैं और किसी भी शहरी लड़की से किसी बात में पीछे नहीं हैं.

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घर पर बनाएं प्रौन पोटैटो रेसिपी

सीफूड के शौकीन लोगों को यह रेसिपी काफी पसंद आएगा. प्रौन्स, आलू, प्याज, दूध और अंडे डालकर इस स्वादिष्ट सूप को तैयार किया जाता है. तो आइए जानते है इस सूप की रेसिपी.

सामग्री

टुकड़ों में कटा हुआ (2 प्याज)

आलू (1)

प्रौन्स (6-7)

अंडे (2)

दूध (1 कप)

मक्खन (40 ग्राम)

हरा धनिया (बारीक कटा हुआ)

नमक (स्वादानुसार)

पानी (आवश्यकतानुसार)

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बनाने की वि​धि

आलूओं को छीलकर बड़े टुकड़ों में काट लें.

आलू और प्याज को उबाल कर प्यूरी बना लें.

प्रौन्स को छीलकर साफ कर लें और धोकर छोटे टुकड़ों में काट लें.

अंडे के सफेद भाग और पीले भाग को अलग कर लें.

पीले भाग को दूध के साथ फेंट लें.

एक पैन में मक्खन को गर्म कर लें,  इसमें प्रौन्स डालकर पकाएं.

जब यह थोड़े चमकदार हो जाए तो इसमें प्याज और आलू की प्यूरी डालें.

इसके बाद अंडे और दूध का मिश्रण डालें और इसे थोड़ी देर पकाएं.

जैसे ही सूप गाढ़ा होने लगे तो इसमें पानी, नमक और हरा धनिया डालें.

इसे थोड़ी देर के लिए और पकाएं.

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