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रितिक की बहन आई कंगना के सपोर्ट में

पिछले एक साल से बौलिवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत और एक्टर रितिक रोशन के बीच आरोप-प्रत्यारोप के दौर चल रहे हैं. हालांकि रितिक ज्यादातर इस मुद्दे पर चुप रहते हैं  लेकिन कंगना रनौत और उनकी बहन रंगोली चंदेल लगातार रितिक पर हमला करती आ रही हैं.

हाल ही में रंगोली ने ट्वीट कर यह आरोप लगाया था कि रितिक की बहन सुनैना रोशन ने, जो कुछ भी हुआ उसके लिए कंगना रनौत से फोन कर माफी मांगी थी. अब इस कहानी में एक और ट्विस्ट आ गया है. रंगोली ने ट्वीट कर बताया कि रितिक की बहन सुनैना एक मुस्लिम युवक से प्रेम करती हैं और उनके परिवार को यह रिश्ता मंजूर नहीं है.’

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इस संबंध से नाराज परिवार सुनैना के साथ मारपीट भी करता है. रंगोली ने अपने ट्विटर पर यह दावा किया था कि रितिक रोशन की फैमिली सुनैना को टार्चर कर रही है और सुनैना इस मामले में कंगना से मदद मांग रही हैं. पिछले हफ्ते एक महिला पुलिसकर्मी ने उन्हें थप्पड़ मारा, उनके पिता ने भी उन्हें मारा और उनका भाई उन्हें बंद करके रखना चाहते हैं.

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रंगोली ने आगे लिखा, ‘मुझे डर है कि उनका खतरनाक परिवार उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है. हमने इस बात को सार्वजनिक इसलिए किया है क्योंकि सुनैना हमेशा कंगना को काल कर रोती रहती हैं. कंगना को नहीं पता कि वह उनकी मदद कैसे करें इसलिए उन्होंने सुनैना का नंबर ब्लौक कर दिया है, लेकिन हम उनकी सेफ्टी के लिए चिंतित हैं. मुझे उम्मीद है,  इससे रोशन फैमिली को डर लगेगा और वह अपनी हरकतें रोक देंगे.

‘संवैधानिक पदों’ पर हावी हो रहा संगठन

लोकसभा अध्यक्ष के रूप में ओम बिड़ला को चुने जाने से यह साफ हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी ने भले ही चुनावी मैदान पर बाहरी लोगों को महत्व दें पर सरकार चलाने के लिये बने संवैधानिक पदों पर संगठन के लोगों को ही तवज्जों देती है.

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के बाद लोकसभा अध्यक्ष के रूप में ओम बिड़ला ऐसा नाम है जिसके बारे में किसी को कोई अंदाजा नहीं  था. इसी तरह जब भाजपा ने जब रामनाथ कोविंद का नाम सामने लाया था तब हर किसी को आश्चर्य हुआ था. ओम बिड़ला को लोकसभा अध्यक्ष बनाया जा सकता है यह किसी को उम्मीद भी नहीं थी.

संगठन में भी ऐसे नेताओं का चुनाव होता है जिनकों सगठन के साथ ही साथ जनता के बीच काम करने का अनुभव होता है. ओम बिड़ला भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा में 6 साल तक पदाधिकारी रहे. इसके बाद राजस्थान के कोटा से 3 बार विधायक और 2 बार सांसद चुने गये.राजनीति के साथ वह समाजसेवा में भी काम करते रहे. पर्यावरण के मुददे पर काम करने के लिये उनके पास लंबा अनुभव है. आम नेताओं के मुकाबले वे बहुत मधुर बोलने वाले में से है. लोकसभा अध्यक्ष के रूप में ऐसे लोग ज्यादा सफल होते हैं.

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भाजपा और आरएसएस यानि राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की कार्यप्रणाली की समझ रखने वाले लोग मानते  हैं कि सत्ता के महत्वपूर्ण पदों पर संगठन और विचारधारा से जुड़े लोगों को महत्व दिया जाता है. इसका लाभ यह होता है कि पार्टी और संगठन की विचारधारा के बारे में उसको पहले से पता होता है. किसी तरह के विवाद की गुजाइंश खत्म हो जाती है. विचारधारा में आपसी टकराव होने से सरकार की इमेज अच्छी नहीं होती है.

ओम बिड़ला का स्वभाव मूलतः बहुत मृदुभाषी और छवि साफसुथरी है. संगठन, सरकार और जनता के बीच काम करने का लंबा अनुभव है. ऐसे में वह लोकसभा अध्यक्ष के रूप में अच्छा काम कर सकते हैं. लोकसभा अध्यक्ष विपक्ष को ऐसे अवसर नहीं देता कि वह सदन का बहिष्कार करने का बहाना तलाश सके. विपक्ष मौके तलाश करता रहता है कि हल्ला करके सदन का बहिष्कार कर सके. ऐसे में ओम बिड़ला  काफी सफल साबित हो सकते हैं.

‘लीची‘ बदनाम हुई कुपोषण तेरे लिये

बिहार के मुजफ्फरपुर लीची खाने से बच्चों की मौत के मामले में लीची को खलनायक बना दिया गया है. असल में मरने वाले बच्चे कुपोषण का शिकार थे. कुपोषण के शिकार बच्चे प्रशासन की व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं. ग्रामीण स्तर पर बच्चों के कुपोषण को दूर करने के लिये आंगनबाड़ी और मिडडे मील जैसी योजनायें भी चल रही है. इसके बाद भी बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं. पूरे बिहार में 300 से अधिक बच्चो की जान गई है.

चर्चा केवल मुजफ्फरपुर में मरने वाले बच्चों की ज्यादा हो रही है. इस वजह से सरकार का भी ध्यान वहीं पर ज्यादा केन्द्रित हो रहा है. बड़ी चतुराई से पूरे मामले में लीची को खलनायक बनाने का काम किया गया. लीची पर केन्द्रित इस प्रचार से ऐसा लग रहा है जैसे बच्चों की मौत की वजह लीची खाना ही है. जबकि मरने वाले बच्चों के परिजनो में से बहुत बड़े हिस्से ने यह माना है कि उनके बच्चे ने लीची नहीं खाई थी.

बदनाम हो रही लीची:

मुजफ्फरपुर लीची की खेती का सबसे बड़ा केंद्र है. यह बहुत से किसानों की रोजीरोटी का जरिया है. बच्चों की मौत से लीची को जोडने से लोग लीची खाने से लोग परहेज करेंगे और किसान इसकी खेती से दूर हो जायेंगे. मुजफ्फरपुर की लीची अपनी मिठास के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. एक छोटी सी लापरवाही ने लीची को मुजफ्फरपुर में 114 बच्चो की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया है. जिससे अब लोग लीची खाने से बचने लगे हैं. लीची ‘खलनायक‘ बन गई है.

असल में जिम्मेदारी लीची की नही लचर व्यवस्था की है. लीची की खेती में काम करने वाले मजदूरों के बच्चे भी लीची तोड़ने का काम करते हैं. यह बच्चे कुपोषण का शिकार पहले से होते है. ऐसे में कई बार खाली पेट कच्ची लीची खाना से बच्चों की जिंदगी पर भारी पड़ता है.

जरूरत यह है कि लीची को खलनायक मत बनाये. नासमझी और खराब व्यवस्था को ही जिम्मेदार बनाये.

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‘चमकी बुखार‘ क्या है ?

‘चमकी बुखार‘ का सबसे प्रमुख कारण कुपोषित बच्चों के द्वारा अधपकी लीची का ज्यादा सेवन करना है. दरअसल लीची में प्राकृतिक रूप से हाइपोग्लाइसिन ए एवं मिथाइल साइक्लोप्रोपाइल ग्लाइसिन टौक्सिन पाया जाता है. अधपकी लीची में ये टौक्सिन अपेक्षाकृत काफी अधिक मात्रा में मौजूद रहते हैं. ये टौक्सिन शरीर में बीटा औक्सीडेशन को रोक देते हैं और हाइपोग्लाइसीमिया (रक्त में ग्लूकोज का कम हो जाना) हो जाता है एवं रक्त में फैटी एसिड्स की मात्रा भी बढ़ जाती है. चूंकि बच्चों के लिवर में ग्लूकोज स्टोरेज कम रहता है, जिससे पर्याप्त ग्लूकोज रक्त के द्वारा मस्तिष्क में नहीं पहुंच पाता और मस्तिष्क गंभीर रूप से प्रभावित हो जाता है.

चमकी बुखार से बचाव के उपाय

बुखार से बचाव के लिये बच्चों को रात में अच्छी तरह से खाना खिलाकर सुलाएं. खाना पौष्टिक होना चाहिए. बच्चों को खाली पेट लीची न खाने दें. अधपकी लीची का सेवन कदापि न करने दें. जैसे ही चमकी बुखार के लक्षण दिखाई पड़ें वैसे ही बच्चे को मीठी चीजें खाने को देनी चाहिए.

अगर संभव हो तो ग्लूकोज पाउडर या चीनी को पानी में घोलकर दें. जिससे कि रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ सके और मस्तिष्क को प्रभावित होने से बचाया जा सके. इसके बाद तुरंत अस्पताल ले जाएं.

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एडवेंचर टूरिज्म के लिए ऐसे करें अपना बैग पैक

नई मंजिल से मुलाकात करने, सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां…

ख्वाजा मीर दर्द के इस शेर का हिंदी के महान लेखक राहुल सांकृत्यायन पर इतना गहरा असर पड़ा था कि उन्होंने ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ नाम की एक ऐसी किताब लिख डाली जिस में उन्होंने घुमक्कड़ प्रेमियों को घर से निकल कर अपनी मंजिल तक पहुंचने के सारे गुर समझा दिए थे.

आज के एडवैंचर ट्रिप को हम घुमक्कड़ी के दायरे में रख सकते हैं. ये ट्रिप कई तरह के हो सकते हैं, जैसे जंगल में ट्रैकिंग, माउंटेन क्लाइंबिंग, बाइकिंग, नदी में राफ्टिंग, समुद्र में सर्फिंग, बर्फ में स्कीइंग, रेत पर, ऊंट पर या जीप में सफारी और भी न जाने क्याक्या…

लेकिन आप किसी भी तरह के एडवैंचर ट्रिप पर क्यों न चले जाएं, वहां आप का साथी वह बैग होता है जिस में आप अपनी जरूरत का सामान रखते हैं. जरूरत का सामान क्यों कहा है, इस बात को भी अच्छे से समझ लेना चाहिए क्योंकि आप अपने हनीमून ट्रिप या किसी ऐसे फैमिली ट्रिप पर नहीं जा रहे हैं जहां जो मन में आया वह सामान अपने साथ लाद लिया. लेकिन बहुत से लोग ऐसी गलती कर देते हैं.

दिल्ली के रहने वाले वैटेरिनरी डाक्टर अरविंद गौतम को पहाड़ों पर जा कर ट्रैकिंग करने का नशा रहा है. वे समय मिलते ही हिमालय की बर्फ की चोटियों से रूबरू होने चल देते हैं.

बैग की अहमियत को ले कर उन्होंने अपना एक मजेदार किस्सा सुनाया कि जब कालेज के दिनों में वे एक गु्रप के साथ ऐसे ही एडवैंचर ट्रिप पर गए थे तो वहां कैंप तक पहुंचने का रास्ता ट्रैकिंग का था. सब के बैग अपनेअपने कंधे पर लदे थे, पर एक लड़के का बैग बहुत भारी था जिसे उस के दोस्तों ने थोड़ीथोड़ी दूर तक ढोया था. उन्होंने उस लड़के से पूछा भी था कि अगर कोई फालतू का सामान है तो उसे होटल में ही छोड़ दे, पर वह बोला कि सारा जरूरी सामान है.

शाम होतेहोते वे सब कैंप में पहुंचे तो उस लड़के ने अपने उस भारीभरकम बैग में से एक सिलवट पड़ा थ्रीपीस सूट निकाला और उसे पहन कर फोटो खिंचवाने लगा. यह देख कर बाकी लोगों को बहुत गुस्सा आया कि ट्रैकिंग कैंप में सूट का क्या काम.

डाक्टर अरविंद गौतम ने आगे बताया कि किसी भी एडवैंचर ट्रिप को खूबसूरती से अंजाम देने का सब से बढि़या तरीका पैदल चल कर ही उस जगह को देखना होता है.

चूंकि पहाड़ों में एडवैंचर ट्रिप अमूमन किसी बस्ती या गांव से भी दूर कैंप लगा कर किए जाते हैं इसलिए आप घर से ही यह मन बना कर चलें कि उस बस्ती या गांव तक तो आप यातायात के किसी भी साधन से पहुंच जाएंगे पर आगे के लिए आप को अपने पैरों पर ही चलना होगा और सामान भी खुद ही ढोना होगा. लेकिन यह भी जरूरी है कि आप को वहां के मौसम, खानपान और लोकल लोगों की भी थोड़ीबहुत जानकारी हो.

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बैग के बारे में डाक्टर अरविंद गौतम ने बताया-

सब से पहले तो आप का बैग मजबूत होना चाहिए. पिट्ठू बैग हो तो सब से अच्छा रहेगा. उस में सामान रखने के लिए कई सारी जेबें होनी चाहिए. इस से सामान ढूंढ़ने में आप का समय बरबाद नहीं होगा. अगर बैग में व्हील यानी पहिए लगे होंगे तो जरूरत पड़ने पर आप उसे समतल जमीन पर आसानी से ढकेल भी सकेंगे. एडवैंचर ट्रिप पर ऐसे बैग बहुत काम आते हैं.

एडवैंचर ट्रिप में लोग आमतौर पर ऐसी जगहों पर जाते हैं जहां मौसम का मिजाज बदलने में देर नहीं लगती, इसलिए बैग वाटरप्रूफ होना चाहिए. आप के बैग में मौसम के अनुकूल ही कपड़े होने चाहिए. अगर ठंड है और बारिश का मौसम भी है तो ऐसे कपड़े होने चाहिए जो आप को ठंड से तो बचाएं, साथ ही, वे भीगने पर जल्दी से सूख भी जाएं. कितने दिनों का ट्रिप है, इस लिहाज से ही कपड़े रखें. ऐसे कपड़े साथ रखें जिन से आप का शरीर पूरा ढक जाए. ऐसे कपड़े रात को मच्छरों के कहर से भी बचाते हैं.

कपड़े ऐसे हों जिन में ज्यादा से ज्यादा जेबें हों ताकि जरूरत का सारा सामान हमेशा आप के पास रहे. कपड़ों को बैग में भरते समय उन्हें पौलिथीन में रखें. नए कपड़े ले जाने से बचें. चटक रंग के कपड़े हों तो बहुत अच्छा रहता है.

बैल्ट भी मजबूत रखें. अपनी एक फोटो आइडैंटिटी भी बैग में रखें, ताकि बैग खोने पर मिलने वाले को पता चल सके कि बैग किस का है.

हलका सामान बैग में पहले रखें और भारी सामान उस के ऊपर रखें. इस से बैग को पीठ पर लादते समय बैलेंस बना रहेगा और भारी सामान नीचे की ओर नहीं जा पाएगा. बैग के स्ट्रैप बराबर रखें ताकि उठाते समय कंधों को बराबर बोझ महसूस हो.

धूप से बचने के लिए सनग्लासेज रखें और तेज किरणों से बचने के लिए सनस्क्रीन लोशन और टोपी भी आप के बैग में जरूर होनी चाहिए.

बड़े पिट्ठू बैग के अलावा आप के पास एक बैल्ट बैग भी होना चाहिए जिस में बहुत जरूरी सामान ही रखा जाए. मान लो आप का पिट्ठू बैग कहीं खो गया है तो आप एकदम से बेबस न हो जाएं. पैसों को 2-3 जगह रखें. प्लास्टिक मनी को बैल्ट बैग में रखें.

बैग में एक छोटा सी मैडिकल किट भी जरूर रखें जिस में बुखार, सिरदर्द, उलटी वगैरह से बचाव की दवाएं हों. कौटन, पट्टी, चोट लगने की दवा, बैंडेड भी जरूर होनी चाहिए. चाकू, सूईधागा, फैवीक्विक जैसी चीजें भी बैग में होनी चाहिए. आग जलाने के लिए लाइटर भी साथ रखें.

जूते स्लीपरी यानी फिसलने वाले नहीं होने चाहिए. उन का सोल मजबूत हो और वे पहनने में आरामदायक भी हों.

खाने की कुछ ऐसी चीजें जैसे पैक्ड नूडल्स, पोहा बैग में जरूर रखें. वे बनाने में आसान रहते हैं. वैसे तो ऐसी जगहों पर फ्रैश चीजों को ही खाना चाहिए. चावल के साथ दाल खानी हो तो जल्दी गलने वाली दालें ही ले जाएं. आलू का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. ये सब सामान वहां के कसबे या शहर की दुकान से पहले ही खरीद लें.

पानी की कम से कम 2 बोतलें जरूर रखें. उन्हें बैग के साइड की जेब में रखें. टूथब्रश, साबुन, रेजर भी ले जाएं. लड़कियों को अपने सैनेटरी पैड्स साथ जरूर ले जाने चाहिए.

अच्छी क्वालिटी की बैटरी वाला कैमरा जरूर रखें. मोबाइल फोन से फोटो खींचने हों तो अपना चार्जर ले जाएं. पर कई जगह बिजली नहीं होती तो चार्जर भी काम के नहीं रहते हैं.

जहां भी मौका मिले अपने घरवालों को अपनी जानकारी जरूर दें. अपने किसी खास का फोन नंबर अपने बैल्ट बैग और पिट्ठू बैग में जरूर रखें.

इसी तरह भारतीय अल्ट्रा रनर निश्चिंत कटोच, जिन्होंने थोड़े समय पहले ही लद्दाख के विपरीत हालात में 222  किलोमीटर की लंबी दौड़ में हिस्सा ले कर भारतीय धावकों में पहला स्थान हासिल किया था, ने बताया कि अगर आप किसी एडवैंचर ट्रिप पर हैं और वहां रात को आग का इंतजाम नहीं है तो आप के पास रोशनी के लिए ऐक्स्ट्रा बैटरी के साथ फ्लैशलाइट होनी चाहिए. आप के बैग में नैपकिन और शैंपू के छोटे पैकेट भी जरूर होने चाहिए. बारिश से बचने के लिए रेनप्रूफ जैकेट भी ले जाएं. हो सके तो स्लीपिंग बैग भी रखें.

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सोशल मीडिया की दहशत का शिकार राजनेता !

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के सम्बन्ध में एक पत्रकार ने मजाकिया अंदाज में सोशल मीडिया पर एक अदद टिप्पणी क्या कर दी, साहब का दिमाग ही भन्ना गया. आनन-फानन में पत्रकार को उठा कर कालकोठरी में डलवा दिया. यह तो शुक्र है कि देश में अभी भी कानून का राज कायम है, तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार खाकर यूपी पुलिस ने उसको छोड़ दिया, वरना 14 दिन में तो सत्ता के इशारे पर बेचारे का भुरकस निकल जाता. इस घटना के बाद से ही सोशल मीडिया के नफे-नुकसान पर बहस का दौर जारी है.

यह सोशल मीडिया का कमाल है कि उसने रातों-रात एक अनाम से पत्रकार को मशहूर कर दिया, और यह सोशल मीडिया का भय है जिसने यूपी की सत्ता के सबसे ताकतवर इंसान को ऐसा डरा दिया कि बेचारे गफलत में नियम-कानून ही भुला बैठे. जैसी टिप्पणी उक्त पत्रकार ने की थी, ऐसी, और इससे भी भद्दी टिप्पणियां सार्वजनिक जीवन में आये लोगों पर आये-दिन होती रहती हैं. उन पर अखबारों-पत्रिकाओं में कार्टून बनते हैं. टीका-टिप्पणियां होती हैं. कभी-कभी तो कार्टून के साथ की गयी टिप्पणियां काफी तीखी भी होती हैं, मगर यह बातें आयी-गयी हो जाती हैं. जनता भी जानती है कि हकीकत क्या है, और हंसी-मजाक क्या, इसलिए ऐसी टिप्पणियों पर कोई ज्यादा ध्यान भी नहीं देता है. मगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी तो इतना घबरा गये कि उन्होंने टिप्पणी करने वाले के पीछे पुलिस छोड़ दी. दरअसल सारा मामला एक महिला के वीडियो से जुड़ा हुआ था. इसी वीडियो को देखने के बाद पत्रकार महाशय ने मुख्यमंत्री पर मजाकिया टिप्पणी की थी. सोशल मीडिया पर उनकी टिप्पणी पर दो-चार लोगों ने कमेंट भी दे मारे थे. बस, मुख्यमंत्री साहब तो डर गये. बात जहां एकाध दिन में आयी-गयी हो जाती, वहीं पत्रकार की गिरफ्तारी और फिर सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार पड़ने के बाद यह घटना राष्ट्रीय स्तर के मीडिया में छा गयी. बस फिर क्या था, कौतूहलवश देश के लगभग शत-प्रतिशत जागरूक लोगों ने उस महिला का वीडिया देखा और जो लोग हिन्दी बोलना-समझना नहीं जानते थे, उनके लिए वीडियो को अनूदित भी किया गया. इस घटनाक्रम के बाद जहां एक गुमनाम से पत्रकार साहब रातों-रात फेमस हो गये, वहीं मुख्यमंत्री साहब को क्या मिला सिवाय नुकसान के?

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अब सोशल मीडिया के डर का दूसरा उदाहरण देखिए. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ थाना अंतर्गत ग्राम मुसरा निवासी मांगेलाल अग्रवाल ने अपने क्षेत्र में बिजली कटौती को लेकर सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया. बेचारे उमस भरी गर्मी में बिजली कटौती से परेशान थे, तो दिल का दर्द सोशल मीडिया पर जाहिर कर दिया. वहीं महासमुंद के दिलीप शर्मा ने अपने वेब मोर्चा पोर्टल पर 50 गांवों में 48 घंटे बिजली बंद होने की खबर चला दी. इस पर बिजली के मुद्दे पर नाकाम सरकार ने बौखलाहट में भर कर घोर अलोकतांत्रिक कदम उठा लिया. इन दोनों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज हो गया. बिजली कम्पनी के डीई एसके साहू की शिकायत पर 12 जून की रात 11 बजे पुलिस ने दिलीप शर्मा को उनके घर से बनियान-टॉवेल में ही उठा लिया. बेचारे को कपड़े तक नहीं पहनने दिये. सत्ता में बैठे लोगों पर सोशल मीडिया का भय इस तरह तारी है कि आम जनता का इस पर अपनी परेशानियां शेयर करना ही गुनाह हो गया है और चैनलों पर सच दिखाना तो कब का बंद हो चुका है. कोई गलती से सच दिखा देता है तो उसका वही हाल होता है जो दिलीप शर्मा का हुआ. खैर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठा तो यहां भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बैकफुट पर आ गये. मजबूरीवश उन्हें दोनों मामले वापस लेने पड़े. उनको यह भी कहना पड़ा कि उनकी सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रबल पक्षधर है. खैर दोनों गिरफ्तार प्राणियों को जमानत मिली, मगर मुकदमा अभी जारी है. विद्वेष फैलाने का आरोप अभी दोनों पर है, पुलिस ने सिर्फ राजद्रोह की धारा हटायी है.

मजेदार बात यह है कि सोशल मीडिया से डरे राजनेता अपनी पार्टी के लोगों को भी नहीं बख्श रहे हैं. असम के मोरीगांव जिले में भाजपा आईटी सेल के सदस्य नीतू बोरा को उनके ही मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने गिरफ्तार करवा दिया. नीतू बोरा पर आरोप है कि उन्होंने अपने निजी सोशल मीडिया हैंडल से एक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने लिखा कि भाजपा सरकार प्रवासी मुस्लिम से स्थानीय असमियों की रक्षा करने में नाकाम रही है. उन्होंने यह भी लिखा कि इस स्थिति के लिए मुख्यमंत्री सोनोवाल जिम्मेदार हैं. बस फिर क्या था. नीतू बोरा को साम्प्रदायिकता फैलाने की कोशिश और मुख्यमंत्री के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. हालांकि बाद में बोरा को भी जमानत मिली, मगर मुकदमा कायम है.

पिछले कुछ समय से देशभर में सोशल मीडिया पर राजनेताओं के खिलाफ टिप्पणी करने वालों की गिरफ्तारी के मामले बढ़े हैं. सत्ता के इशारे पर पुलिस ऐसे लोगों से अपराधियों जैसा सलूक करने लगी है जबकि सोशल मीडिया पर विवादित टिप्पणी के लिए आईपीसी व अन्य कानूनों के तहत प्रावधान मौजूद हैं. सुप्रीम कोर्ट वर्ष 2015 में ही आईटी एक्ट की धारा 66-ए को असंवैधानिक करार देकर रद्द कर चुका है. यह धारा सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वालों को गिरफ्तार करने की शक्ति देती थी. जाहिर है, अब इस मामले में सामान्यत: किसी को अरेस्ट नहीं किया जा सकता है. मगर सत्ता मद में चूर लोग संविधान और कानून की धज्जियां उड़ाने से बाज नहीं आते. अब आलोचना को सुनने-सहने और उस पर चिन्तन करने का दौर नहीं है. आलोचना करने वाले की जुबां काट लेने का दौर है. अपना दर्द कहने वाले को मौत की नींद सुला देने का दौर है. सोशल मीडिया पर ‘मी टू कैम्पेन’ चलने के बाद से तो हर रसूखदार और तथाकथित ‘क्लीन कौलर आदमी’ दहशत में है.

भारत में सोशल मीडिया का अनुभव ज्यादा पुराना नहीं है. अन्य देशों के समाज ने जहां इसके साथ स्वाभाविक सम्बन्ध बना लिये हैं और इसके लिए जरूरी सहिष्णुता भी विकसित कर ली है, वहीं भारत में सोशल मीडिया वाक्-युद्ध के अखाड़े के रूप में विकसित हुआ है. इस क्रम में यहां तमाम शिष्टता और शालीनता की धज्जियां उड़ रही हैं. सोशल मीडिया पर विरोधियों को गंदी गालियां देना, उनकी इमेज या उनके धर्म को टारगेट करना, उनके निजी जीवन पर हमला करना और यहां तक कि उनके चेहरे, शरीर, पहनावे, हेयर स्टाइल तक पर कमेंट करना आम चलन हो गया है. सोशल मीडिया पर खुद को अभिव्यक्त करने की आजादी का संयमित इस्तेमाल लोगों को नहीं आता है. उन्हें नहीं पता कि विरोध की भी एक गरिमा होती है. हाल के दिनों में जिस तरह पॉलिटिकल पार्टियों और नेताओं पर अपमानजनक टिप्पणियां देखने को मिल रही हैं, उसके जिम्मेदार खुद राजनेता ही हैं, जिन्होंने पहले अपने फायदे के लिए सोशल मीडिया को राजनीति का मैदान बनाया और अब जब क्रिया की प्रतिक्रिया हो रही है तो वे उस प्रतिक्रिया को दबाने के लिए गैरकानूनी रास्ते इख्तियार कर रहे हैं. पिछले कुछ समय से सियासी कटुता बहुत बढ़ी है. इस माहौल का दबाव पुलिस-प्रशासन पर भी काफी है. वह सत्ता पक्ष से जुड़ी किसी भी तरह की आलोचना के खिलाफ सख्त कदम उठाकर अपनी तत्परता दिखाना चाहता है. उपरोक्त सभी घटनाएं इसी का उदाहरण हैं. आज सोशल मीडिया पर अपने विरोध को सहजता से लेने के बजाय राजनेता ही नहीं, उनके तमाम समर्थक भी विरोधी पक्ष को मुंहतोड़ जवाब देने पर आमादा हुए जाते हैं.

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बीजेपी और कांग्रेस का चुनावी गणित

चुनावों के परिणामों के बाद भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी और कांग्रेस के राहुल गांधी दोनों ने पार्टी के सदस्यों का सामना किया. एक ने अभूतपूर्व विजय के बाद चुनावी मतभेदों को भुला कर, बड़बोलापन कम करने और सारे देश को एकसाथ ले चलने की सलाह दी जबकि दूसरे ने बुरी तरह जख्मी अपने शरीर को सहलाते हुए अपने वरिष्ठ नेताओं को लताड़ा जिन्होंने पार्टी के लिए कम, अपने लिए ज्यादा काम किया. एक तालियों से गद्गद था तो दूसरे को गालियां सी मिल रही थीं.

देश में विपक्ष की जगह है, इस में शक नहीं. कांग्रेस आज भी सब से बड़ी विपक्षी पार्टी है. कांग्रेस की हार की बहुत सी वजहें हैं पर उन में से एक है कि कांग्रेस ने भाजपा के धार्मिक एजेंडों की काट हलकी धार्मिक नौटंकी से करनी चाही. कांग्रेस की वरिष्ठ लीडरशिप असल में ऊंची जातियों के हाथों में है.  इन ऊंची जातियों के नेता सवर्णवाद को तो चाहते हैं पर भाजपा के मेहनतकश, समर्पित, धर्म के अनुयायियों के मुकाबले 5 फीसदी भी तेज नहीं हैं.

कांग्रेस का साथ उत्तर प्रदेश के महागठबंधन ने नहीं दिया क्योंकि कांग्रेस एक मामले में भाजपा की तरह ही सोच रखती है कि शूद्र व अछूत 4 हाथ दूर रखने लायक होते हैं. भाजपा ने पिछले दशकों में इन वर्गों को अपने देवीदेवता दे कर एक धर्मनिष्ठ कैडर बना डाला है पर कांग्रेस ने उन गरीबों, जिन्हें इंदिरा गांधी 1967 से 1971 तक अपने साथ लाई थीं, का साथ देने के लिए कोई सहायक संगठन खड़ा नहीं किया. जहां भाजपा की समर्थक सैकड़ों संस्थाएं, मंदिर समितियां, शिक्षा संस्थाएं, व्यापार मंडल हैं वहीं कांग्रेस जमीनी समस्याओं से भागती रही.

राहुल गांधी अभी भी अनुभवहीन हैं. उन्हें पार्टी चलाने को तो दे दी गई पर उन्हें पार्टी बनाने का अनुभव नहीं है. नरेंद्र मोदी और उन से पहले के नेताओं ने (चाहे हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर अपने कई आर्थिक हितों के लिए या जातीय व्यवस्था बनाए रखने के लिए) धूपपानी में गलीगली में जा कर काम किया. नरेंद्र मोदी ने भाजपा के नए सांसदों को यही संदेश दिया, जबकि राहुल गांधी अपनी चोटें दिखाते रह गए.

कांग्रेस में अगर जान है तो इसलिए कि बहुत से लोग पीढि़यों से उस से जुड़े हैं पर जब राजनीतिक अस्तित्व की बारबार बात की जाने लगे तो पारिवारिक यादों को दरकिनार कर दिया जाता है. राहुल गांधी को कांग्रेस को बचाना है तो उन्हें लालू प्रसाद यादव, मायावती, ममता बनर्जी, स्टालिन, कम्युनिस्टों के नीचे रह कर काम करना सीखना होगा. वे उन पर अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन न करें, बल्कि उन्हें मना कर केवल चुनावों के लिए नहीं, हमेशा के लिए अपने साथ जोड़ लें. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो देश भाजपारूपी एक पार्टी साम्राज्य से नहीं बच सकता.

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कांग्रेस की हार

कांग्रेस में हताशा और छटपटाहट होनी स्वाभाविक है. आम चुनावों में राहुल गांधी ने मंचों से नरेंद्र मोदी का जिस तरह खुल कर मुकाबला किया था उस की उम्मीद कम ही थी. कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों को जीतने के बाद कांग्रेस का विश्वास बढ़ गया था. अब हुई अप्रत्याशित व भयंकर हार पर चिंतित होना कांग्रेस के लिए स्वाभाविक ही है.

जले पर नमक छिड़कने के लिए भाजपासमर्थक कांग्रेसी और भाजपासमर्थक मीडिया कुछ दबे शब्दों में, तो कुछ खुले शब्दों में कहने लगे हैं कि कांग्रेस को गांधी परिवार से बाहर का नेता चाहिए. यह कदम पलायन का होगा. हार के बाद जिम्मेदारी का मतलब त्यागपत्र देना नहीं होता, उस गलती को ठीक करना होता है.

1984 में केवल 2 सीटें आने पर भारतीय जनता पाटी के वरिष्ठ नेताओं ने कभी त्यागपत्र नहीं दिया था. 1989 में, 1991 में और 2004 में हारने के बावजूद भाजपा का नेतृत्व वहीं का वहीं रहा. नाम के लिए कभीकभार भाजपा का अध्यक्ष पद औरों को मिला. ऐसा कांग्रेस में भी होता रहा है. अध्यक्ष पद कइयों के पास रहा है.

कांग्रेस यदि कुछ समझ नहीं पाई तो वह है मीडिया और सोशल मीडिया की ताकत. पिं्रट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया ने कांग्रेस को बड़ी बेशर्मी से सरका दिया. सोशल मीडिया पर लाखों की तादाद में भाजपासमर्थक ट्विटर, फेसबुक व व्हाट्सऐप पर घंटों लगातार भाजपा का प्रचार कर रहे थे.

कांग्रेस के उठाए हर सवाल का जवाब उन्होंने देशभक्ति के नारों से दिया. देश की पूजापाठी जनता को लगा कि मुक्ति का द्वार नरेंद्र मोदी के पास है, राहुल गांधी के पास नहीं. आखिर यही भक्त हैं जो मंदिरों, कुंभों, आश्रमों, तीर्थों में लाइनें लगाते हैं. कांग्रेस को इन की ताकत का अंदाजा न था. कांग्रेसी खुद इन लाइनों में लगने लगे जबकि उन्हें इन्हें अवैज्ञानिक कह कर इन से खुल्लमखुल्ला लोहा लेना था. शायद राहुल गांधी अपनी इटैलियन मूल की मां के कारण ऐसा न कर पाए.

अब राजनीति धार्मिक प्लेटफौर्म पर चलेगी, यह पक्का है. धार्मिक प्लेटफौर्म पर भाजपा का एकाधिकार है. उस में जगह निकालना राहुल गांधी के लिए आसान नहीं. वहीं, न कांग्रेस में और न किसी दूसरी पार्टी में इतना दम है कि वह अलग प्लेटफौर्म बना कर देश की गाड़ी को ही वहां ले आए. राहुल ऐसा कर सकेंगे, पता नहीं, पर और कोई तो नहीं ही कर सकता.

कैडर का टोटा

कांग्रेस, गठबंधन और लालू प्रसाद यादव की हार व भारतीय जनता पार्टी की जीत का बड़ा कारण उन के कैडर हैं. पहले तीनों के कैडर अब समाप्त से हो गए हैं.

कांग्रेस ने जिस तरह से बदलबदल कर विपक्षी दलों से समझौता किया उस से कैडर का दिल अपनी पार्टी से टूट गया. कांग्रेस के कैडर में ज्यादातर ऊंची जातियों के अवसरवादी लोग ही थे जो सिद्धांत के लिए नहीं, पैसे और पावर के लिए जमीनी काम करते थे. जब नेताओं ने एयरकंडीशंड मकानों में रहना शुरू किया तो कैडर अपनेअपने तौर पर ‘कुछ’ बनाने में जुट गया, करने में नहीं.

समाजवादी पार्टी का कैडर शुरुआत में सदियों से चले आ रहे ऊंची जातियों के कैडर का मुकाबला करने के लिए खड़ा किया गया था. पर बाद में मुलायम सिंह परिवार ने पार्टी को अपने सुखों का धंधा बना लिया. ऐसे में समर्थक बिदकने लगे हैं. वे वैसे भी किसी और के साथ, खासतौर से कल तक के अछूतों के, काम करने को तैयार न थे.

लालू यादव के साथ भी मुलायम वाला हाल हुआ. चारा घोटाला में अपनेआप को बचा न पाने पर लालू की कमजोरी साबित हो गई. यदि उन का नेता पुलिसकचहरी से खुद को नहीं बचा सकता तो वह कैडर के किस काम आएगा. दोनों घरों में जो आपसी लड़ाई हुई उस से लगने लगा कि यादवों और पिछड़ों के हित दोयम हैं, प्रमुख तो उन के अपने राजपाट हैं. बनियों में जब व्यापार में मालिक पुश्तैनी पैसे को ले कर लड़ने लगते हैं तो ऐसा ही होता है. ग्राहक और कर्मचारियों का टैलेंट गायब हो जाता है.

इस के उलट भारतीय जनता पार्टी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कूटनीति ने अद्भुत कैडर दिया है. यह कैडर है उन 30-40 लाख पंडितों, आश्रम संचालकों, मंदिरों के पुजारियों, मंदिरों के पास धंधे करने वालों, ज्योतिषियों, प्रवचनकर्ताओं, अध्यापकों आदि का जो मुफ्त के चढ़ावे के पैसे पर फलफूल रहा है. इस में अब हर जाति के लोग शामिल हो रहे हैं क्योंकि आरएसएस ने हर जाति को छोटेमोटे देवता दे कर उन को लूटने का अच्छाखासा मौका दे दिया है. ऐसे में वे भाजपा के साथ नहीं जाएंगे, तो कहां जाएंगे?

द्रविड़ मुनेत्र कषगम, कम्युनिस्ट पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना के अपने कैडर हैं क्योंकि या तो उन्हें ऊंची जातियों के कहर का डर है या उन्हें छोटीमोटी चौधराहट मिल रही है. कांग्रेस कैडरविहीन हो गई है क्योंकि सोनिया गांधी ने 10 सालों में कैडर पर काम न कर सारा ध्यान सरकार चलाने पर रखा. कांग्रेस का कैडर बंट गया. उस का ऊंची जातियों वाला हिस्सा भाजपा में चला गया, पिछड़ी जातियों वाला अपनी जातियों में और दलित कैडर मायावती के साथ.

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राहुल गांधी अब कांग्रेस अध्यक्ष रहें या न रहें, फर्क नहीं पड़ता. जब पार्टी ही न हो, तो आप अध्यक्ष किस के? ठाटबाटी कांग्रेसी नेताओं के बस की जमीनी मेहनत करने की नहीं है. उन के पास मुद्दा भी नहीं. वे तो वैयक्तिक स्वतंत्रताओं के रक्षक खान मार्केट गैंग को भी अपने पल्लू में संरक्षण नहीं दे रहे जो उन्हें शिक्षित कैडर दे सकता है. कांगे्रस को भाजपाई सद्बुद्धि कब आएगी, कहा नहीं जा सकता.

रिश्ते को बेहतर बनाने के लिए अपनाएं ये 10 उपाय

रिश्तों को बेहतर बनाने के कुछ ऐसे उपाय आपको बताने जा रहे हैं, जिसे आप अपनाकर  अपने पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में मिठास भर कर उन्हें और भी सुखद बना सकते हैं.

पारिवारिक रिश्ते

सब से पहले बात करते हैं पारिवारिक रिश्तों की जो हमें विरासत में मिलते हैं और किसी पूंजी से कम नहीं होते. चलिए हम आप को बताते हैं वे 5 तरीके जिन से आप बना सकते हैं अपने पारिवारिक रिश्तों को मजबूत:

प्रपंच छोड़ें: प्रपंच बड़ा चटपटा शब्द है. लोग इसे चटखारे ले ले कर इस्तेमाल करते हैं. मसलन, बहू के भाई ने इंटरकास्ट मैरिज कर ली. बस फिर तो बहू का ससुराल के लोगों से नजरें मिलाना मुश्किल हो गया. सासूमां अपने दिए संस्कारों की मिसाल देदे कर बहू के मायके के लोगों की धज्जियां उड़ाने में मशगूल हो गईं.

क्यों, भई इसे प्रपंच का मुद्दा बनाने की क्या जरूरत है? इंटरकास्ट मैरिज कोई गुनाह तो नहीं है. हां, यह बात अलग है कि आप के समाज वाले इसे पचा नहीं सकते. लेकिन बहू तो आप के ही घर की है. उस के सुखदुख में शरीक होना आप का कर्तव्य है, जिस को आप प्रपंच में उड़ा रही हैं. आप को क्या लगता है, प्रपंच करने से आप खुद को दूसरों की नजर में महान बना लेते हैं और सामने वाले को दूसरों की नजरों से गिरा देते हैं. नहीं इस से आप की ही साख पर असर पड़ता है. आप के ही परिवार का मजाक बनता है, जिस में आप खुद भी शामिल होते हैं.

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अपना उत्तरदायित्व समझें: उत्तरदायित्व का मतलब सिर्फ मातापिता की सेवा करना ही नहीं, बल्कि अपने बच्चों के प्रति भी आप के कुछ उत्तरदायित्व होते हैं. आजकल के मातापिता आधुनिकता की चादर में लिपटे हुए हैं. बच्चों को पैदा करने और उन्हें सुखसुविधा देने को ही वे अपनी जिम्मेदारी मानते हैं. लेकिन इस से ज्यादा वे अपनी पर्सनल लाइफ को ही महत्त्व देते हैं. इस स्थिति में यही कहा जाएगा कि आप एक आदर्श मातापिता नहीं हैं. लेकिन इस नए वर्ष में आप भी आदर्श होने का तमगा पा सकते हैं यदि आप अपने उत्तरदायित्वों को पूरी शिद्दत से निभाएं.

झूठ का न लें सहारा: अकसर देखा गया है कि अपनी जिम्मेदारियों से बचने, अपनी साख बढ़ाने या फिर अपनी गलती छिपाने के लिए लोग झूठ का सहारा लेते हैं. संयुक्त परिवार में झूठ की दरारें ज्यादा देखने को मिलती हैं, क्योंकि एकदूसरे से खुद को बेहतर साबित करने की प्रतिस्पर्धा में लोगों से गलतियां भी होती हैं. लेकिन इन्हें नकारात्मक रूप से लेने की जगह सकारात्मक रूप से लेना चाहिए. जब आप ऐसी सोच रखेंगे तो झूठ बोलने का सवाल ही नहीं उठता. इस वर्ष सोच में सकारात्मकता ले कर आएं. इस से पारिवारिक रिश्तों के साथ आप का व्यक्तित्व भी सुधर जाएगा.

आर्थिक मनमुटाव से बचें: आधुनिकता के जमाने में लोगों ने रिश्तों को भी पैसों से तराजू में तोलना शुरू कर दिया है. रिश्तेदारियों में अकसर समारोह के नाम पर धन लूटने का रिवाज है. शादी जैसे समारोह को ही ले लीजिए. यहां शगुन के रूप में लिफाफे देने और लेने का रिवाज है. इन लिफाफों में पैसे रख कर रिश्तेदारों को दिए जाते हैं. जो जितने पैसे देता है उसे भी उतने ही पैसे लौटा कर व्यवहार पूरा किया जाता है. लेकिन ऐसे रिश्तों का कोई फायदा नहीं जो पैसों के आधार पर बनतेबिगड़ते हैं. इस वर्ष तय कीजिए कि रिश्तों में आर्थिक मनमुटाव की स्थिति से बचेंगे, रिश्तों को भावनाओं से मजबूत बनाएंगे.

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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लेख हमारे देश के संविधान में भी किया गया है, लेकिन परिवार के संविधान में यह हक कुछ लोगों को ही हासिल होता है, जो बेहद गलत है. अपनी बात कहने का हक हर किसी को देना चाहिए. कई बार हम सामने वाले की बात नहीं सुनते या उसे दबाने की कोशिश करते हैं अपने सीधेपन के कारण वह दब भी जाता है, लेकिन नुकसान किस का होता है? आप का, वह ऐसे कि यदि वह आप को सही सलाह भी दे रहा होता है, तो आप उस की नहीं सुनते और अपना ही राग अलापते रहते हैं. ऐसे में सही और गलत का अंतर आप कभी नहीं समझ सकते. इसलिए इस वर्ष से तय करें कि घर में पुरुष हो या महिला, छोटा हो या बड़ा हर किसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी जाएगी.

सामाजिक रिश्ते

संतुलित और सुखद जिंदगी जीने के लिए पारिवारिक रिश्तों के साथसाथ सामाजिक रिश्तों को भी  मजबूत बनाना जरूरी है. आइए हम आप को बताते हैं सामाजिक रिश्तों को बेहतर बनाने के 5 तरीके:

ईगो का करें त्याग: ईगो बेहद छोटा लेकिन बेहद खतरनाक शब्द है. ईगो मनुष्य पर तब हावी होता है जब वह अपने आगे सामने वाले को कुछ भी नहीं समझना चाहता. उसे दुख पहुंचाना चाहता हो या फिर उस का आत्मविश्वास कम करने की इच्छा रखता हो. अकसर दफ्तरों में साथ काम करने वाले साथियों के बीच ईगो की दीवार तनी रहती है. इस चक्कर में कई बार वे ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो उन के व्यक्तित्व पर दाग लगा देते हैं या कई बार वे सामने वाले को काफी हद तक नुकसान पहुंचाने में कामयाब हो जाते हैं. लेकिन क्या ईगो आप को किसी भी स्तर पर ऊंचा उठा सकता है? शायद नहीं यह हमेशा आप से गलत काम ही करवाता है. आप को खराब मनुष्य की श्रेणी में लाता है, तो फिर ऐसे ईगो का क्या लाभ जो आप को फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचाता हो? इस वर्ष ठान लीजिए की ईगो का नामोनिशान अपने व्यक्तित्व पर से मिटा देंगे और दूसरों का बुरा करने की जगह अपने व्यक्तित्व को निखारने में समय खर्च करेंगे.

मददगार बनें: मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और हमेशा से समूह में रहता चला आया है. इस समूह में कई लोग उस के जानकार होते हैं तो कई अनजान भी. लेकिन मदद एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है. किसी की तकलीफ में उस का साथ देना या उस की हर संभव मदद करना एक मनुष्य होने के नाते आप का कर्तव्य है.

पुण्य नहीं कर्तव्य समझें: धार्मिक ग्रंथों में पुण्य कमाने का बड़ा व्याख्यान है. लोग किसी की मदद सिर्फ इस लालच में करते हैं कि उन्हें इस के बदले में पुण्य कमाने का मौका मिलेगा. लेकिन जहां उन्हें पुण्य कमाने का जरीया नजर नहीं आता वहां वे घास भी नहीं डालते. कहते हैं भूखे और प्यासे आदमी को खाना खिलाने से पुण्य की प्राप्ति होती है. इसे कमाने के लिए लाखों रुपए उड़ा कर लोग भंडारों का आयोजन करते हैं. लेकिन दूसरी तरफ ऐसे ही लोग राह में मिलने वाले गरीब भूखे बच्चे को 2 रोटी देने की जगह दुतकार देते हैं. जबकि किसी भूखेप्यासे को खिलाना पुण्य नहीं बल्कि आप का कर्तव्य है. इस तरह धर्म के नाम पर या उस का सहारा ले कर किसी विशेष दिन का इंतजार कर के कोई कार्य करने की जगह जरूरतमंदों को देखते ही उन्हें सहारा दें और इसे अपना कर्तव्य समझें. तो इस वर्ष प्रतिज्ञा लें कि काम को पुण्य नहीं, बल्कि कर्तव्य समझ कर करेंगे.

खुल कर सोचें बड़ा सोचें: इस वर्ष अपनी सोच का विस्तार करें. ऐसा करने पर आप पाएंगे कि आप से ज्यादा संतुष्ट और चिंतामुक्त मनुष्य और कोई नहीं है. ऐसे कई लोग आप को अपने आसपास मिल जाएंगे जो अपना वक्त सिर्फ दूसरों के बारे में सोचने में जाया कर देते हैं. उन्हें हर वक्त यही लगता है कि उन के लिए कोई गलत कर रहा है या कह रहा है. लेकिन जरा सोचें, क्या इस भागतीदौड़ती दुनिया में किसी के पास दूसरे के लिए सोचनेसमझने का समय है? नहीं है. इसलिए आप भी अपने बारे में सोचें और किसी का नुकसान न करते हुए अपने फायदे का काम करें.

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सम्मान करें और सम्मान पाएं: कई लोग जब किसी बड़े स्तर पर पहुंच जाते हैं तो वे हमेशा अपने से छोटे स्तर पर खड़े लोगों को हिकारत की नजर से देखने लगते हैं. अकसर दफ्तरों में ऐसा होता है कि खुद को सीनियर कहलवाने की जिद में लोग अपने से नीचे ओहदे वालों का शोषण और अपमान करना शुरू कर देते हैं. लेकिन आप ने यह कहावत तो सुनी ही होगी कि कीचड़ पर पत्थर फेंको तो खुद पर भी कीचड़ उछल कर आता है. उसी तरह अपमान करने वाले को भी अपमान ही मिलता है. इसलिए इस वर्ष तय कर लीजिए कि हर स्थिति व परिस्थिति में आप सभी से सम्मानपूर्वक ही पेश आएंगे.

जानें, क्या होता है चमकी बुखार

बिहार के मुजप्फरपुर जिले में चमकी बुखार के कारण ही लगातार बच्चों की मौतों हो रही है. मौत का आंकड़ा 100 से भी पार हो चुका है. इस बुखार को AES (अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) भी कहा जाता है. तो चलिए बताते हैं इस बीमारी के बारे में.

अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम क्या है?

अक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES ) बौडी के नर्वस सिस्टम यानी तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है और वह भी खासतौर पर बच्चों में.

चमकी बुखार के लक्षण

  • तेज बुखार होना है.
  • घबराहट महसूस होती है.
  • शरीर में ऐंठन महसूस होती है.
  • मानसिक भटकाव महसूस होता है.
  • दौरे पड़ने लगते हैं.
  • बेहोश हो जाना.

इसके बाद शरीर के तंत्रिका संबंधी कार्यों में रुकावट आने लगती है.

अगर समय पर  इस बीमारी का इलाज न मिले तो पीड़ित की मौत भी  हो जाती है. आमतौर पर यह बीमारी जून से अक्टूबर के बीच देखने को मिलती है.

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कारण

आपको बता दें, डाक्टर्स इस बुखार की ठीक-ठीक वजह का पता अब भी नहीं लगा पाए हैं. इसे लेकर  अनुमान लगाए जा रहे हैं.

क्या करें

ऐसे में जब चमकी बुखार के कारणों का ही ठीक से पता नहीं है, तो इससे बचाव के लिए  कुछ सावधानियां जरूर बरती जा सकती है.

खाली पेट लीची बिल्कुल न खाएं. अगर सुबह उठकर बच्चे को चक्कर आएं या कमजोरी महसूस हो तो उसे तुरंत ग्लूकोज या चीनी घोलकर पिला दें.

किसी भी तरह के बुखार या अन्य बीमारी को नजरअंदाज न करें. बुखार आने पर तुरंत डाक्टर से सम्पर्क करें.

बच्चे को धूप और गर्मी से बचाकर रखें.  शरीर में पानी की कमी न होने दें और पोषक तत्व वाले आहार खिलाएं.

अगर यह समस्या शुगर लो होने की वजह से हुई होगी तो ग्लूकोज पीने से ठीक हो सकती है.

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सनस्क्रीन के इस्तेमाल से स्किन हो जाए लाल तो अपनाएं ये 3 टिप्स

अगर आप सनस्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं और इसे लगाने के बाद आपकी स्किन लाल हो जाती है तो सबसे पहले उसका इस्तेमाल करना बंद कर दें. मार्केट से ऐसा सनस्क्रीन लें, जिसमें केमिकल्स न हों. बेहतर होगा कि  किसी डर्मेटौलजिस्ट से मिलकर अपनी समस्या बताएं और उससे पूछकर सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें.

कोई भी सनस्क्रीन इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट कर लें. धूप से बचाव करने के लिए चेहरे पर स्टोल, फुल स्लीव्स के कपड़े और हैट वगैरह का भी इस्तेमाल कर सकते है.

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अगर हो जाए एलर्जी

जब तक ऐलर्जी है तब तक धूप में बाहर जानें से बचें, पूरी तरह से ठीक होने में कुछ वक्त लग सकता है.

ऐलर्जी होने पर खुद से कोई एक्सपेरिमेंट न करें.

ज्यादातर केसेज में ऐलर्जी अपने आप ही ठीक हो जाती है, अगर ज्यादा दिक्कत हो तो तुरंत डाक्टर से मिलें.

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20 साल की बैले डांसर का नृत्य संदेश

  जिन के मन में लगन हो, क्रिएटीविटी भी और कुछ नया करने की इच्छा भी, वे किसी न किसी माध्यम से देश दुनिया के लोगों तक अपनी बात पहुंचा ही देते हैं. स्विएडा, सीरिया की रहने वाली 20 वर्षीय बैले डांसर और जिमनास्ट यारा खुदैर ऐसे ही लोगों में हैं. 7 साल पहले जब सीरिया में हर जगह तबाही के मंजर नजर आते थे, तब यारा 13 साल की थी. कह सकते हैं कि यारा खुदैर तबाही के मंजर देखतेदेखते किशोरावस्था से जवान हुईं. इसी बीच उन्होंने बैले डांस और जिमनास्टिक सीखा.

यारा खुदैर सीरिया में आतंकी हमलों से तबाह हुए स्कूलों, प्राचीन जगहों और ऐतिहासिक थिएटर में बैले डांस कर के लोगों को फिट और खुश रहने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं. अपने ढंग से शांति का संदेश देने वाली इस बाला का मकसद तबाह हुए सीरिया की संस्कृति को बचाना है.

कलारिपयट्टू: 3 हजार साल पुरानी युद्धकला

सीरिया को ले कर दुनिया भर के लोगों में निगेटिवटी फैली है, हमारी पीढ़ी को उस निगेटिविटी को खत्म करना है. यारा जब किसी स्कूल में अपनी कला का प्रदर्शन करती हैं तो बच्चों को बहुत अच्छा लगता है और वे बहुत खुश होते हैं. वे भी डांस सीखना चाहते हैं. सारा का मकसद भी यही है, क्योंकि डांस की ज्यादातर विधाओं की नींव खुशी और उत्साह दर्शाने के लिए ही रखी गई है.

सारा कहती हैं, ‘मैं चाहती हूं कि बच्चे और किशोर कला से जुड़ें, उन में आत्मविश्वास पैदा हो ताकि वे सीरिया को फिर से खड़ा कर सकें.’ यारा को आतंकवादियों की धमकी मिलती रहती थीं, लेकिन वह इस से नहीं डरती थीं.

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अब सीरिया आईएस से मुक्त हो चुका है. आईएस के आखिरी 2500 लड़कों ने भी सरेंडर कर दिया है, इसलिए यारा को अब कोई डर नहीं.

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