दरअसल में सारा दोष उस भारी भरकम बहुमत का है जो भाजपा से संभाले नहीं संभल रहा है. रेल मंत्री भी इससे अछूते नहीं हैं, जिन्हें मालूम है कि देश के बेरोजगार युवाओं ने बड़ी उम्मीद से दोबारा कमल का फूल यह सोचते खिलाया हैं कि अच्छे दिन मानसून की तरह कहीं अटक गए होंगे. इसमें बेचारे मोदी जी या उनकी सरकार का क्या कुसूर जो पूरे पांच साल काम धाम छोड़ पूजा पाठ में लगे रहे. ऊपर वाले से गुहार लगाते रहे कि प्रभु हमारी तो वोटों से भर दी. अब इन बेरोजगारों की झोली भी रोजगार से भर दो क्योंकि हम घंटे घड़ियाल तो बजा सकते हैं लेकिन पिचके गालों वाले इन नौजवानों का पेट भरने का इंतजाम नहीं कर सकते .

तो ईश्वरीय प्रेरणा से रेल मंत्री जी के दिल में खयाल आया कि क्यों न चलती ट्रेन में मालिश का इंतजाम किया जाये. आइडिया धांसू था कि जिससे एक जाति विशेष जिसे प्यार से नाई या हजाम कहा जाता है. करोड़ों नहीं तो लाखों नौजवानों को काम मिल जाता और दूसरी जाति विशेष जिसे फख्र से सवर्ण कहा जाता है कि बदन मजबूत रहती. जो लोग यह कहते भाजपा को खा-म-खा बदनाम करते हैं कि वह दलित विरोधी पार्टी है. उन्हें रेल मंत्री की भावनाओं पर गौर करना चाहिए कि उन्हें इस जाति के लोगों का इतना ख्याल था या है कि वे रोजगार का परंपरागत तरीका जिंदा करने की बात कर रहे थे.

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इधर पिछले कुछ सालों से शहरों में जगह-जगह मसाज पार्लर उग गए हैं जिनमें मालिश के साथ साथ एक्स्ट्रा सर्विस के नाम पर और भी बहुत कुछ ऐसा उल्टा सीधा प्रोवाइड कराया जाता है जो गौरवशाली भारतीय संस्कृति के प्रतिकूल है क्योंकि वह छिपाए नहीं छुपता. ऐसा इसलिए हुआ कि मालिश की जिम्मेदारी खूबसूरत कमसिन कन्याओं ने संभाल ली. वे गली गली चिल्लाकर आवाज नहीं लगातीं कि मालिश चंपी करा लो यह नजारा तो अस्सी के दशक में ही दम तोड़ चुका था जब पाश्चत्य संस्कृति ने हमारी गौरवशाली संस्कृति को निगलना शुरू किया था. मालिश का पुश्तैनी काम भी नाइयों से छिन गया तो वे बेचारे फुटपाथ पर आ गए .

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