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सड़क सुरक्षा सप्ताह महज फकत तमाशाई है…

हेल्मेट ना पहनने वाले दो पहिया वाहनों और सीट बेल्ट ना लगाने वाले चार पहिया वाहनों पर जुर्माना करके सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने का दावा किया जा रहा है. राजधानी लखनऊ के गंवई इलाके में सड़क सुरक्षा सप्ताह एक मजाक बन कर रह गया है. राजधानी से 35 किलोमीटर दूर नगराम थाना क्षेत्र में पटवाखेडा गांव में एक पिकअप वाहन जो माल वाहक गाड़ी होती है. 32 लोगों को शादी के समारोह में बाराबंकी जिले से लेकर नगराम गई थी. सुबह उसे माल की ढुलाई करने जाना था.

ऐसे में उसने सभी लोगों को रात में वापस चलने के लिये विवश किया. रात डेढ़ बजे वह लोग घर से निकले और नहर की पटरी के रास्ते सड़क तक पहुंचने लगे. ऐसे में पिकअप नहर में गिर गई और उसके सवार सभी लोग नहर में डूब गये. बड़े लोग तो किसी तरह से पानी में बहने से बच गये पर 7 बच्चे पानी में बह गये, जिनमें से 3 के शव निकाल लिये गये. बाकी के बच्चों का पता नहीं चल सका. दुर्घटना के बाद प्रशासन और सरकार तेजी में आये और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पीड़ित परिवारों की मदद का दावा किया. इस हादसे के जिम्मेदार वह लोग तो थे ही जिन्होंने ढुलाई के वाहन से यात्रा की. उससे अधिक दोषी सरकार और प्रशासन की है. जिसकी खुली छूट के चलते माल की ढुलाई करने वाले वाहन सवारी ढोने काकाम करते है.

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पूरे प्रदेश की सड़कों पर माल की ढुलाई करने वाले ऐसे तमाम वाहन दिखाई पड़ते है, जो सवारी बैठाने का काम भी करते है. ग्रामीण इलाकों में शादी-विवाह, मेला-ठेला और दूसरे तमाम अवसरों पर ऐसे वाहन खुब सवारी ढ़ोते है. ऐसे वाहनों के चालक ज्यादातर नशा करते है. इसके साथ ही साथ यह लोग प्रशिक्षित ड्राइवर नहीं होते है. ऐसे में दुर्घटना की संभावना अधिक होती है.

नगराम में 7 बच्चों के साथ हादसे में ऐसी वजहें प्रमुख कारण है. जब तक सड़क सुरक्षा सप्ताह के नाम पर केवल तमाशा होगा तब तक ऐसे हादसे रोके नहीं जा सकते. सड़क सुरक्षा सप्ताह में सवारी ढोने वाली माल गाडियों पर रोक लगाना जरूरी है. इसके साथ ही साथ नशे में चालक गाड़ी ना चलाये यह रोकथाम जरूरी है. माल की ढुलाई करने वाली गाडियों के ड्राइवर प्रशिक्षित है या नहीं यह देखना परिवहन विभाग का काम है. गाड़ी की फिटनेस और खराब हालत पर नजर रखना भी सड़क सुरक्षा में ही आता है. केवल सीट बेल्ट और हेलमेट से ही सड़क सुरक्षा सप्ताह पूरा नहीं होगा. सड़क पर हादसों को रोकना है तो पूरे साल सुरक्षा कानूनों का पालन करना होगा.

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धार्मिक नारों से गूंजी संसद !

18 जून 2019 को संसद भवन सत्रहवीं लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्यों की हरकतों को देखकर स्तब्ध था. वह सांसदों के धार्मिक नारों से थरथरा रहा था. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के नवनिर्वाचित सांसद संसद भवन में भारतीय संविधान के प्रति पूरी सच्चाई और निष्ठा रखने की शपथ ले रहे थे – ‘मैं (सांसद का नाम) जो लोकसभा का सदस्य निर्वाचित हुआ हूं, ईश्वर की शपथ लेता हूं कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा. मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूंगा तथा जिस पद को मैं ग्रहण करने वाला हूं, उसके कर्तव्यों का श्रद्धा पूर्वक निर्वहन करूंगा.’ यह शपथ लेने के बाद वे अपने-अपने धर्म से जुड़े जयकारे लगा रहे थे. देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद का निचला सदन सांसदों के शपथ ग्रहण के दौरान धर्म की पहचान बताने का अखाड़ा बन गया था. ज्यादातर सांसदों ने शपथ लेने के बाद नियमों के विरुद्घ धार्मिक पहचान से जुड़े नारे पुरजोर आवाज में लगाये. मेजें बजा-बजा कर लगाये. कोई जय श्रीराम का उद्घोष कर रहा था, कोई बिस्मिल्लाहहिर्ररहमाने रहीम, अल्लाह हो अकबर कहता था, किसी ने जय दुर्गा, जय काली का उग्र-घोष किया, किसी ने जय भीम, किसी ने हर-हर महादेव कहा, किसी ने वन्दे मातरम् तो किसी ने राधे-राधे कहा. लोकसभा के इतिहास का यह सम्भवत: पहला मौका था जब शपथ लेने के बाद इतनी बड़ी संख्या में सांसद धार्मिक नारे लगाते दिखे. नई लोकसभा में जो हो रहा है वो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं हुआ. 17वीं लोकसभा की कार्यवाही के पहले दो दिनों में जो हुआ, उसे देख डर लगता है. इन दो दिनों में नये सांसदों ने संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा और श्रद्धा रखने की शपथ ली, लेकिन इसी शपथ के दौरान बार-बार संविधान की बेकद्री हुई. जिस संविधान में राष्ट्र को एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र घोषित किया गया है, उसी संविधान की शपथ लेते हुए क्या धार्मिक नारे लगाना सही था? संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को एक मौलिक अधिकार बताया गया है. तो फिर किसी और की शपथ के समय ‘जय श्री राम’ या ‘अल्लाह हो अकबर’ के नारे लगाकार ये सांसद संविधान का पालन कर रहे थे या तोड़ रहे थे? जय श्री राम और अल्लाह हो अकबर के नारे संसद में? लोकतंत्र के सबसे पवित्र मंदिर में? आखिर हो क्या रहा था? 17वीं लोकसभा का आगाज ऐसा है तो इसका अंजाम क्या होगा?

पिछली बार संसद की सीढ़ी पर शीश नवाने वाले, और इस बार संविधान के आगे नतमस्तक हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद भवन का नजारा देख कर पूरे वक्त मंद-मंद मुस्कुराते रहे. स्पीकर साहब भी बड़े धीरे शब्दों में बस इतना ही कह पाये कि यह बात रिकौर्ड में नहीं ली जाएगी. जबकि उनको सख्ती बरतते हुए इन हरकतों से सांसदों को रोकना चाहिए था. मगर उन्होंने भी सांसदों की हरकतों पर लगाम लगाने की जरूरत नहीं समझी. वे लगाम तो तब लगाते जब देश के संविधान को पढ़ा और माना होता. संविधान के आगे नतमस्तक हुए प्रधानमंत्री उठ कर एक बार कह देते कि संसद के अन्दर जय श्रीराम, जय दुर्गा या अल्लाह हो अकबर नहीं होना चाहिए क्योंकि यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है, तो लगता कि देश के संविधान की इज्जत और गरिमा उनके हाथों में महफूज है. स्पीकर साहब एक बार कह देते कि संसद किसी भी तरह के नारे लगाने के लिए नहीं है. नारे सड़कों पर, रैलियों में, विरोध प्रदर्शनों में लगाये जाते हैं, तो लगता कि उन्होंने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की लाज बचा ली. मगर न प्रधानमंत्री बोले ने स्पीकर और संसद भवन अपने भीतर अपने संविधान को धज्जी-धज्जी होते देखता रहा.

यह धार्मिक नारे अगर शालीनता के दायरे में रह कर लगाये जा रहे होते तो भी आपत्ति न होती, सांसदों द्वारा संविधान की शपथ उठाने के बाद अपने ईष्ट को याद करने में कोई बुराई नहीं थी, मगर यह नारे तो सामूहिक रूप से लग रहे थे. यह नारे चिल्ला-चिल्ला कर लगाये जा रहे थे. विरोधियों को उत्तेजित करने और चिढ़ाने के इरादे से लगाये जा रहे थे. यह नारे अपना वर्चस्व जाहिर करने के लिए लगाये जा रहे थे. जय श्रीराम का नारा संसद भवन में पुरजोर तरीके से उस वक्त गूंजा जब मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के सांसद असुददि्न ओवैसी शपथ लेने के लिए आये. यह नारा तब भी बड़ी जोर से गूंजा जब तृणमूल कांग्रेस के नेत्री शपथ लेने वेल में आयीं. आखिर अपने पूज्य मर्यादा पुरुषोततम का नाम किसी को चिढ़ाने के लिए लेने वाले भला किस तरह के रामभक्त हो सकते हैं? दरअसल मकसद भगवान श्रीराम को याद करना नहीं था, मकसद था मुसलमानों को हिन्दुत्व की ताकत दिखाना और मोदी की सत्ता को चुनौती देने वाली तृणमूल कांग्रेस को चिढ़ाना.

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इस मामले में सांसद असदउद्दीन ओवैसी भी पीछे नहीं रहे. उन्होंने हाथ उठा-उठा कर नारे लगाने वालों को उत्तेजित किया, कहा और लगाओ, और लगाओ, फिर खुद भी उन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ लेने के बाद बुलंद आवाज में ‘अल्लाह हो अकबर’ का नारा लगाया. ओवैसी को कानून का बेहतर जानकार माना जाता है, मगर अफसोस कि ओवैसी साहब भी हवा के बहाव में बह गये. एक बार यह नहीं कह सके कि संसद भवन के अन्दर संविधान की गरिमा को बनाये रखना हम सांसदों का फर्ज़ है, इसलिए यहां धार्मिक नारों से बाज आया जाए. चाहते तो कह सकते थे कि संसद में जय श्रीराम और अल्लाह-हो-अकबर दोनों ही नहीं होने चाहिए. यहां सिर्फ जनता और देश के हित की बातें होनी चाहिए. चाहते तो कह सकते थे कि संसद बहस के लिए है, कानून बनाने के लिए है, देश की दिशा तय करने के लिए है, बजट पास कराने के लिए है, सत्ता पक्ष की नीतियों को चुनौती देने के लिए है, न कि धार्मिक उन्माद फैलाने के लिए.

जब संसद के पहले ही सत्र में यह हाल है तो आने वाले पांच सालों में संसद भवन क्या-क्या नजारे देखने वाला है, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है. लोकसभा चुनाव परिणामों को मोदी का करिश्मा और उग्र हिन्दुत्व की जीत के तौर पर देखने वाली भाजपा के पास तो कोई कारण नहीं है कि वह जय श्रीराम के नारे को बुलंद न करे. इस नारे के उसे दो फायदे हैं. एक तो इससे हिन्दुत्व की राजनीति पर भाजपा का दावा मजबूत होता है और दूसरा अगर किसी ने इसका विरोध किया, या इस पर एतराज जताया तो उसे हिन्दू विरोधी ठहरा कर देशद्रोही करार दिया जा सकता है. महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में कुछ समय बाद ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. उन चुनावों में चर्चा विकास और विश्वास की होगी, लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा हिन्दू-मुसलमान ही होगा क्योंकि फार्मूले की कामयाबी साबित हो चुकी है. तो आने वाले वक्त में संसद के भीतर जय श्रीराम का उद्घोष और पुरजोर तरीके से होगा, इसमें कोई दोराय नहीं है. गौरतलब है कि भाजपा के लौहपुरुष कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में शुरू हुए अयोध्या आंदोलन के दौरान ‘जय श्रीराम’ पहली बार एक नारे के रूप में सामने आया था. उससे पहले जय रामजी की, जय सिया राम और राम-राम कह कर लोग अपने ईष्ट को याद करते थे और एक दूसरे को सम्बोधित करते थे. अटल-आडवाणी के दौर में ‘जय श्रीराम’ एक युद्धघोष की तरह सामने आया और आज भी उसी आक्रामकता के साथ गूंजता है. उसमें प्रेम, भक्ति, श्रद्धा या समर्पण का भाव नहीं है, बल्कि युद्ध की चेतावनी है. आडवाणी कहते हैं कि अयोध्या में राममंदिर निर्माण का आंदोलन एक राजनीतिक आंदोलन था. इस तरह ‘जय श्रीराम’ एक राजनीतिक नारा है, धार्मिक जयकारा नहीं है. लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश की संसद में धार्मिक नारा लगाना एक गम्भीर बात हो सकती है, लेकिन यह नारा धार्मिक नहीं, पूरी तरह राजनीतिक है, इसलिए इस पर एतराज नहीं होना चाहिए. अब यह बात और है कि पूरी राजनीति ही धर्म के नाम पर हो रही है. भाजपा की मूल भावना और संविधान की मूल भावना में ही जमीन-आसमान का अंतर है. ऐसे में जब वे संसद के भीतर नारे लगाएंगे और उकसाएंगे तो विपक्षी पार्टियां भी चुप नहीं बैठेंगी. मतलब साफ है कि आने वाले समय में संसद भवन धर्म का अखाड़ा बनने वाला है.

ओवैसी जैसे लोग, जिनकी पूरी राजनीति मुसलमानों की असुरक्षा पर केन्द्रित है, उन्होंने संसद में अल्लाह-हो-अकबर का नारा लगाकर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर ही दी है. ओवैसी का अल्लाह-हो-अकबर अल्पसंख्यकों की ओर दिया गया जवाब बन गया है. ओवैसी ने जय श्रीराम के नारे का जवाब अल्लाह-हो-अकबर से देकर इसे बराबरी का मुकाबला बनाने की कोशिश की है. अब हिन्दुत्व का जोर जितना बढ़ेगा मुस्लिम बहुल आबादी से आने वाले ओवैसी और आजम खान जैसे नेताओं की सियासत भी चमकेगी और इन नारों-प्रतिनारों के बीच अल्पसंख्यकों, दलितो, आदिवासियों, पिछड़ों की समस्याएं और उनसे जुड़े गम्भीर मुद्दे ढंके के ढंके रह जाएंगे. मौजूदा समय में, भारत में धार्मिक तौर पर अल्पसंख्यकों की आबादी 20 फीसदी के आसपास है. इनमें मुसलमान 14.2 फीसद हैं. कुछ अनुमानों के मुताबिक आने वाले समय में, यह 25 फीसदी के आसपास स्थिर हो सकता है. जिसमें मुस्लिमों की आबादी 20 फीसदी के करीब होगी. कोई भी समाज अपनी एक चौथाई आबादी की उपेक्षा करके, उसे उसके हक से वंचित करके और अवांछित मानकर न तो सम्पन्न बन सकता है, न विकास कर सकता है और न ही शांति से रह सकता है. संविधान कहता है कि धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ अलग-अलग बर्ताव नहीं हो सकता. लेकिन 17वीं लोकसभा का आगाज जिस तरह हुआ है, एक धर्मनिरपेक्ष गणतन्त्र के लिए यह संकेत कतई ठीक नहीं हैं. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी भी डर पैदा करती है. कोर्ट ने इस बारे में कहा था, ‘भारत अब तक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन हम ये नहीं जानते हैं कि यह कितने लम्बे समय तक धर्मनिरपेक्ष देश बना रहेगा.’

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अगर दिल्ली में हैं तो जरूर देखें ये 5 टूरिस्ट प्लेस….

दिलवालों की कही जाने वाली दिल्ली सिर्फ दिल वालों की ही नहीं बल्कि सभ्यता की, संस्कृति की, कला, वास्तुकला और मोहित कर देने वाली खूबसूरत मीनारों, बागों, झीलों और तालाबों की दिल्ली है. लोग दिल्ली में घूमने तो आते हैं पर उन के साथ घूमती हैं ढेरों कहानियां भी. पर कहानियां सिर्फ वही क्यों हो, जो सब ने सुनी हुई हैं, क्यों न ऐसी कहानियों की तलाशीं जाएं जो बाकि सभी से अलग हो. तो आइए जानते हैं ये कौन-सी जगह है?

  1. मजनू का टीला

यमुना नदी से सटा लिटिल तिब्बत कहा जाने वाला मजनू का टीला 1960 से तिब्बती शरणार्थियों के रहने का स्थान है. मजनू का टीला दिल्ली में बसी एक कालोनी है जिस के मेन एट्रक्शंस वहां का खाना, हैंडीक्राफ्ट्स, अक्सेसरीज़ और फैशन है. यहां की मोनास्ट्री बेहद खूबसूरत है, यहां एक से बढ़कर एक कैफ़े हैं, फैशनेबुल बैग्स, पाउचेस, टिंकलेट्स, कलरफुल शूज इत्यादि मन मोह लेते हैं और सबसे बढ़कर यहां की रंगबिरंगी गलियां और उन गलियों से आती खुशबु है. तिब्बती क्वीसीन और मोमोस मस्ट हेव फ़ूड है. सेल्फी फ्रीक्स के लिए मजनू का टीला वाइब्रेंट कलर्स और अमेजिंग बैकग्राउंडस का पॉइंट है.

नियरेस्ट मेट्रो स्टेशन-  विधान सभा मेट्रो स्टेशन, येलो लाइन .

2. संजयवन

दिल्ली के मेहरौली और वसंतकुंज के बीच स्थित यह जंगल 780 एकड़ से ज्यादा दूरी तक फैला हुआ है. यह पेड़ पोधौं से घिरा जंगल है जिसमे थोड़ी थोड़ी दूरी पर प्राचीन सूफी संतों के किले बने हुए हैं. वाइल्ड लाइफ और पक्षी प्रेमी यहां आकर पर्यावरण का मजा उठा सकते हैं. शहर की भागदौड़ से दूर एकांत में कुछ समय बिताने के लिए यह परफेक्ट प्लेस है . यहां का एम्बिएंस दिल को सुकून देता है तो खूबसूरती आँखों को. पर इन सब से अलग यहां कुछ लोगों के हौंटेड अनुभव भी रहे हैं जिन के चलते लोग यहां आने से डरते हैं. अगर आप डरकर बैठने वालों में से नहीं हैं तो दिल्ली में स्थित इस सुंदर स्थान का मजा लीजिये.

नियरेस्ट मेट्रो स्टेशन – छतरपुर, येलो लाइन.

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3. सतपुला ब्रिज

हिंदी और उर्दू में अनुवादित ‘सात ब्रिज,’ सतपुला ब्रिज दिल्ली के सबसे रिमार्केबल हिडन जेम्स में से एक है. मेन प्रेस एन्क्लेव रोड पर स्थित सतपुला ब्रिज 1323 में मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा बनाया गया था. उस समय में इसका निर्माण सात अलग अलग स्थानों तक पानी पहुंचाने के लिए किया जाता था जिसका अंदाजा आप इस ब्रिज को देखकर लगा सकते हैं. ठंडी हवाओं के बीच एक ऐसे समय की यादें महसूस करना जिसे आपने कभी जिया तक नहीं, एक अलग तरह का एहसास है. अपने बिजी जीवन से थोड़ा समय निकालिए और दिल्ली के इस हिडन ट्रेजर का मजा लीजिये.

नियरेस्ट मेट्रो स्टेशन – मालवीय नगर, येलो लाइन.

4. मिर्जा गालिब की हवेली

कविताओं और ग़जलों को सुना हो न हो लेकिन मिर्जा गालिब का नाम तो सभी ने सुना है. पर्शियन और उर्दू कवि मिर्ज़ा ग़ालिब की याद में बनाई गयी यह हवेली दिल्ली के दिल यानि चांदनी चौक में स्थित है. 150 साल पुरानी यह हवेली चांदनी चौक की तंग गलियों में गालिब की यादें समेटे हुए है. इस हवेली को अब एक म्यूजियम बना दिया गया है जो ग़ालिब की कृतियों की पेशकश करता है. पोएट्री लवर्स और ग़ालिब एडमायरर्स के लिए शाम-ए- रुक्सत जैसी है. इस म्यूजियम में ग़ालिब की फेमस ग़ज़ल, कविताएं, कोट्स, पेंटिंग्स, फोटोग्राफ्स और अन्य औब्जेक्ट्स को रखा गया है.

नियरेस्ट मेट्रो स्टेशन – चावड़ी बाजार, येलो लाइन.

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5. भूली भटियारी का महल

फिरोज शाह तुग़लक़ द्वारा बनाया गया यह महल दिल्ली के स्पूकीएस्ट डेस्टिनेशंस में से एक है. भूली भटियारी रीजनल पार्क से कुछ कदम की दूरी पर ही यह लोंग लोस्ट जेम है. हालांकि यह बेहद ही खूसूरत और लुभावनी जगह है परंतु दिल्ली के हौंटेड प्लेसेस में भी गिना जाता है. यहां मेटल का कोई दरवाजा नहीं है, पूरा स्ट्रक्चर पत्थरों, पेड़पौधों और झाड़ियों से घिरा हुआ है. टूरिस्ट एक ध्यान यहां जाने से पहले ही एक बोर्ड अपनी ओर खींचता है जिस पर स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि यहां सूर्यास्त के बाद आना मना है. यदि आप में गट्स हैं तो इस हौंटेड लेकिन खूबसूरत जगह पर जाइए और तस्वीरें लीजिए, घूमिये फिरिए.

नियरेस्ट मेट्रो स्टेशन – झंडेवालान, ब्लू लाइन.

पार्ट-2: सोशल मीडिया की दहशत का शिकार राजनेता

सोशल मीडिया की दहशत का शिकार राजनेता !

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मी टू कैम्पेन ने बढ़ाया डर

सोशल मीडिया पर टिप्पणियों को लेकर नेताओं और साफ कौलर आदमी में डर का माहौल ‘मी टू कैम्पेन’ के बाद से दिखना शुरू हुआ है. इस कैम्पेन के तहत एक के बाद एक कई फिल्मी हस्तियों, राजनेताओं, मीडियाकर्मियों पर महिलाओं ने यौन शोषण का आरोप लगाया, जिसका परिणाम यह निकला कि आरोपितों की इज्जत तो सरे-बाजार उछली ही, उनके पद और सम्मान भी छिन गये, साथ ही उनका सामाजिक बहिष्कार हुआ. इस क्रम में कई फिल्मी हस्तियों के हाथ से उनके करोड़ों के प्रोजेक्ट निकल गये और कई राजनेताओं की कुर्सियां छिन गयीं. उन्हें घृणा और मजाक का पात्र बनना पड़ा. यौन-उत्पीड़न का दंश झेलने वाली महिलाओं के लिए जहां सोशल मीडिया अपना दर्द सुनाने का बढ़िया प्लेटफौर्म बना तो वहीं मर्दों में यह डर पैदा हो गया कि पता नहीं अगला नाम किसका सामने आ जाए. हालांकि सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती कहने वाली सभी महिलाएं सच्ची हैं, यह कहना भी ठीक नहीं होगा. कइयों ने अपनी खुंदस या भड़ास निकालने के लिए पुरुष को बदनाम करने की नीयत से भी सोशल मीडिया का मिसयूज किया.

इसी के साथ जब 2019 के आम चुनाव का वक्त करीब आया तो राजनीतिक पार्टियों ने अपने विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए सोशल मीडिया का जम कर दुरुपयोग किया. सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें बहुत सस्ते में और आसानी से अपना प्रचार करने का और विरोधियों पर प्रहार करने का मौका मिला. सोशल मीडिया ने उन्हें अपनी बात कहने का बड़ा मंच दिया, मगर इस साधन का लोगों ने जी भर कर दुरुपयोग किया. आज सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियों और उनके समर्थकों द्वारा ही हो रहा है, मगर जिस तरह से हो रहा है वह वाकई चिंता का विषय है. सोशल मीडिया पर राजनेता ही नहीं, बल्कि उनके समर्थक भी शालीनता की सारी हदें पार करते नजर आते हैं. किसी के निजी जीवन के साथ उनके परिवार को भी इसमें घसीट लेना आम चलन हो गया है. मां, बहन, बेटी को गाली देना, गलत अफवाहें उड़ाना, अश्लील और भद्दी बातें करना, फोटो एडिट करके कुछ का कुछ दिखा देना आज आम बात हो चुकी है. इसी सोशल मीडिया पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को गरबा करते भी पेश किया जा चुका है. सोशल मीडिया पर जिस तरह विरोधियों को आहत करने के लिए निजी हमले किये जा रहे हैं, उनके निजी जीवन में घुसपैठ की कोशिशें हो रही हैं, यह समाज के लिए बेहद सोचनीय अवस्था है. अपनी भड़ास निकालने के लिए मर्यादा का उल्लंघन करते वक्त लोग यह भी भूल जाते हैं कि इससे खुद को कुछ मिलना भी नहीं है, वहीं आप इन मामलों में जिनका कोई लेना देना नहीं है उसे भी घसीट रहे हैं. शायद यह समाज को विचार शून्यता की ओर ले जाने का प्रतीक है. यह समाज और राजनीति के गिरते स्तर का प्रतीक है.

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सोशल मीडिया से हुए बड़े काम

आज के दौर में सोशल मीडिया जिन्दगी का अहम हिस्सा है, जिसके बहुत सारे फीचर हैं, जैसे कि सूचनाएं प्रदान करना, मनोरंजन करना और शिक्षित करना. सोशल मीडिया एक अपरम्परागत मीडिया है. हम इंटरनेट के माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने तक अपनी पहुंच बना सकते हैं. सोशल मीडिया एक विशाल नेटवर्क है, जो कि सारे संसार को जोड़े हुए है. यह संचार का एक बहुत अच्छा माध्यम है, जो द्रुत गति से सूचनाओं का आदान-प्रदान करता है. सोशल मीडिया के ठीक उपयोग से किसी भी व्यक्ति, संस्था, समूह और देश को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से समृद्ध किया जा सकता है. सोशल मीडिया के जरिए ऐसे कई विकासात्मक कार्य हुए हैं जिसने लोकतंत्र को समृद्ध बनाने का काम किया है. सोशल मीडिया को एक गम्भीर प्लैटफौर्म के रूप में विकसित करने की जिम्मेदारी समाज के हर वर्ग की है. याद रखना होगा कि इसी सोशल मीडिया के माध्यम से इस देश में वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ महाअभियान चला था, जिसके कारण विशाल जनसमूह समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़ा और उसे प्रभावशाली बनाया था.

2012 में सोशल मीडिया के माध्यम से ही ‘निर्भया’ को न्याय दिलाने का संदेश प्रसारित हुआ था और उसके लिए विशाल संख्या में युवा सड़कों पर उतरे थे. इससे सरकार पर भी दबाव बना और इस दबाव की वजह से ही लड़कियों की सुरक्षा देने के लिए एक नया और ज्यादा प्रभावशाली कानून बन सका था. वर्ष 2014 के आम चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों ने सोशल मीडिया का जम कर उपयोग किया और जनता को वोट डालने के लिए जागरूक किया. 2014 के आम चुनाव में सोशल मीडिया के जरिये युवाओं को उत्साहित किया गया जिसके चलते वोटिंग प्रतिशत में जबरदस्त उछाल आया था.

अन्ना के आन्दोलन से उभरे और सामाजिक कार्यकर्ता से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के चुनाव में भारी सफलता मिली तो इसका श्रेय फेसबुक को जाता है. लोकसभा चुनाव के दौरान भी फेसबुक के जरिये खूब प्रचार हुआ. पिछले एक दशक में कई बड़ी खबरें सोशल मीडिया के जरिये ही लाइमलाइट में आयीं. आम आदमी को सोशल मीडिया के रूप में ऐसा टूल मिल गया है जिसके जरिये वे अपनी बात एक बड़ी आबादी तक पहुंचा सकते हैं. आम आदमी के साथ राजनेता भी फेसबुक, ट्वीटर पर आ गये हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व वित्तमंत्री अरुण जेटली, पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह समेत तमाम नेताओं ने फेसबुक और ट्वीटर पर अपने अकाउंट्स बना लिये हैं ताकि वे सीधे आम लोगों के साथ संपर्क साध सकें. लोकसभा चुनाव से पहले राजद सुप्रीमो और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी ट्वीटर पर आने की घोषणा की थी. यहां तक की सोशल मीडिया से हमेशा दूरी बनाये रखने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती तक ने सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दर्ज करायी. सोशल साइट्स की लोकप्रियता ही है कि कभी कम्प्यूटर का भारी विरोध करने वाले वामपंथी नेताओं को भी लोकसभा चुनाव के दौरान फेसबुक पर आना पड़ा. माकपा नेता और सांसद मो. सलीम मानते हैं कि लोगों के संवाद करने के लिए सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण माध्यम है. उनका कहना है, सोशल मीडिया आज बहुत ही जरूरी माध्यम हो गया है. इस माध्यम के जरिये एक बड़ी आबादी से अपने विचार साझा किये जा सकते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो सभी मंत्रालयों और मंत्रियों को सोशल मीडिया पर आने को कहा है ताकि मंत्रालय के कामकाज के बारे में लोग जान सकें और काम में भी पारदर्शिता बनी रहे. फेसबुक ने लम्बे अरसे से बिछड़े पिता-बेटी, भाई-बहन और दोस्तों को मिलवाने का भी काम किया है.

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आज सोशल मीडिया संदेश के प्रसार के लिए एक बेहतरीन प्लेटफौर्म है, जहां व्यक्ति स्वयं को अथवा अपने किसी उत्पाद को ज्यादा से ज्यादा लोकप्रिय बना सकता है. फिल्मों के ट्रेलर, टीवी प्रोग्राम का प्रसारण भी सोशल मीडिया के माध्यम से किया जा रहा है. वीडियो तथा औडियो चैट भी सोशल मीडिया के माध्यम से सुगम हुआ है, जिनमें फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम जैसे कुछ प्रमुख प्लेटफॉर्म हैं. अब लोग सूचना पाने के लिए अखबार, रेडिया या टीवी चैनलों के भरोसे नहीं बैठे रहते. आज सेकेंड से भी कम वक्त में सूचनाएं आपके सामने होती हैं.

तकनीक जब बन जाए अभिशाप

सोशल मीडिया जहां सकारात्मक भूमिका अदा करता है, वहीं लोग इसका गलत इस्तेमाल भी खूब करते हैं. सोशल मीडिया पर गलत खबरों के द्वारा दुर्भावनाएं फैलाकर लोगों को बांटने की कोशिश करते हैं. सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रामक और नकारात्मक जानकारी साझा की जाती हैं, जिससे जनमानस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. साम्प्रदायिक उन्माद और माब लीचिंग की कितनी घटनाएं सोशल मीडिया के कारण हुर्इं. चंद मिनटों में घृणित और साम्प्रदायिक संदेशों को फैलाकर आम लोगों को किसी धर्म विशेष के खिलाफ उकसाने और दंगा भड़काने का काम बीते पांच सालों में सोशल मीडिया के माध्यम से कई मर्तबा किया गया है. कई बार तो बात इतनी बढ़ गयी कि सरकार को सोशल मीडिया पर बैन तक लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा. जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में दंगा भड़कने पर सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा, तो वहीं मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में हुए किसान आंदोलन के दौरान भी स्थिति बेकाबू होने पर सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया गया ताकि असामाजिक तत्व किसान आंदोलन की आड़ में किसी बड़ी घटना को अंजाम न दे पाएं.

2012 में, सोशल मीडिया के दुरुपयोग के शुरुआती मामलों में से एक मामला सरकार के सामने तब आया था, जब भूकम्प पीड़ितों की तस्वीरों और वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल करना शुरू किया गया था. अराजक तत्वों ने इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर फैलाया और यह दिखाया कि ये असम और बर्मा के सामूहिक दंगों के पीड़ित मुस्लिम थे. इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर निजी स्वार्थों के लिए और दंगा को भड़काने के लिए किया गया था और इसके कारण कई जगहों पर प्रतिक्रिया देखने को मिली थी.
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया के जरिये आपराधिक गतिविधियों में तेजी से इजाफा हुआ है. आपराधिक प्रवृत्ति के लोग येन-केन-प्रकारेण दूसरों के अकाउंट्स को हैक कर आपत्तिजनक तस्वीरें और अन्य सामग्रियां डालकर दुश्मनी निकाल रहे हैं. कम उम्र के बच्चों ने भी फेसबुक का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है जिसका उन पर नकारात्मक असर पड़ रहा है. पिछले दिनों ऐसोचैम की ओर से किये गये एक सर्वेक्षण के मुताबिक, जितने बच्चे फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं उनमें से 73 प्रतिशत बच्चों की उम्र 8 से 13 साल (13 साल से कम उम्र के बच्चों पर फेसबुक अकाउंट खोलने पर प्रतिबंध है) के बीच है. सर्वे में कहा गया है कि अधिकांश बच्चों के परिजन नौकरीपेशा हैं और वे अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं, लिहाजा ये बच्चे फेसबुक और अन्य सोशल साइट्स पर मशगूल रहने लगे हैं क्योंकि सोशल मीडिया उन्हें एक ऐसा समाज देता है जिससे वे अपनी बातें शेयर कर सकते हैं. अनेक खतरनाक साइट्स में फंस कर कितने ही बच्चे अपनी जानें गवां चुके हैं.

जब किसी भी चीज का दुरुपयोग होने लगता है तो वो वरदान नहीं अभिशाप बन जाता है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि सोशल मीडिया आज लोगों के लिए बहुत ही आवश्यक है, लेकिन इसका जो दूसरा पहलू है उससे बचने की जरूरत है. सोशल मीडिया ने पहचान की चोरी, विवरण की चोरी, साइबर धोखाधड़ी, हैकिंग और वायरस के हमलों की सम्भावना को बढ़ावा दिया है. यदि आप ने अपना पता, फोन नम्बर, कार्यस्थल, अपने परिवार की जानकारी या फोटोज किसी भी सोशल मीडिया की साइट पर अपडेट किया है, तो आपने अपनी गोपनीयता को खो दिया है. आमतौर पर हम फेसबुक पर दिन-प्रतिदिन की नई-नई तस्वीरें डालते रहते हैं. ऐसा करते समय बहुत सतर्क रहना चाहिये, क्योंकि चित्र और अन्य जानकारियों का समाज में बुरे तत्वों द्वारा दुरुपयोग किया जा सकता है. इसलिए सोशल मीडिया की कार्यपद्धति और इसके इस्तेमाल करने के तरीके को समझना जरूरी है. सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग भारी मुसीबत ला सकता है.

6 टिप्स: ऐसे सजाएं बच्चों का कमरा

आप पूरे घर को किस तरह सजाएं, कुछ ही देर में सोच सकती हैं लेकिन बच्‍चे का कमरा किस तरह डेकोरेट करें, इसमें बहुत दिमाग लगाना पड़ता है. हर बच्‍चे की आदत बिल्‍कुल अलग होती है और उसका कमरा भी इन्‍हीं आदतों के अनुसार होना चाहिए. हालांकि, आप खुद से सोच-समझ कर बच्‍चों के कमरे को रोचक और आरामदायक बना सकती हैं. इसके लिए आपको कई बातों का ध्‍यान रखना चाहिए, जैसे- बच्‍चे के सोने की जगह ठीक हो और कमरे में बाहर की खुली हवा भी आ सकें.

कमरे में ही बच्‍चा, छोटे-छोटे खेलों को खेल पाएं, इतनी जगह अवश्‍य होनी चाहिए. बेड ज्‍यादा ऊंचाई पर न हो, वरना उससे गिरकर उसे चोट लग सकती है. कमरे को डिजाइन करते समय बच्‍चे की उम्र, बच्‍चों की संख्‍या और बेटा व बेटी या का भी ध्‍यान रखें. आइए जानते हैं बच्‍चे के कमरे को डिजाइन करते समय और किन बातों का ध्‍यान रखना चाहिए.

रंग-बिरंगा रखें

आप पूरे घर को डीसेंट रखिए, लेकिन बच्‍चों के कमरे को सुंदर और चार्मिंग बनाएं. उसे खूब रंग-बिरंगा रखें. इससे बच्‍चों को अच्‍छा लगेगा और वो अच्‍छा वक्‍त कमरे में व्‍यतीत करेंगे.

पर्याप्‍त स्‍थान

बच्‍चों के कमरे में ज्‍यादा सामान न रखें, पर्याप्‍त स्‍थान रहने दें. ताकि बच्‍चे कमरे में ही खिलौने और किताबों को आराम से फैलाकर खेल सकें. इससे उन्‍हें चोट लगने का डर भी नहीं रहेगा.

डिजाइनर बेड

इन दिनों, मार्केट में बच्‍चों के लिए कई तरह के बेड उपलब्‍ध हैं. अगर आपके घर में बच्‍चों वाले कमरे में कम जगह है तो उस हिसाब से भी अच्‍छे बेड मिल जाते हैं. कमरे के क्षेत्रफल के हिसाब से भी आप बेड का चयन करें, ताकि उसे वहां फिट करवाने में दिक्‍कत न आएं. बंक बेड भी अच्‍छा विकल्‍प है.

मिनी आर्ट गैलरी बनाएं

बच्‍चे को कमरे को सजाने का सबसे अच्‍छा तरीका, वहां आर्ट गैलरी बनाना भी हो सकता है. इससे बच्‍चे को कला में रूचि आएगी या आप कई तस्‍वीरों को भी लगा सकते हैं जो उसके साथ हों.

वालपेपर

बच्‍चे के कमरे को वालपेपर से भी सजाया जा सकता है. यह सबसे सरल विकल्‍प है जिसके लिए बहुत मेहनत करने की आवश्‍यकता भी नहीं पड़ती है और बच्‍चे को बोरिंग भी महसूस नहीं होगा. 2 से 3 सालों के बाद आप चाहें तो वॉलपेपर बदल भी सकते हैं.

खेलने की जगह

बच्‍चे के कमरे को सजाने से पहले उसके खेलने का विशेष ध्‍यान रखें. कमरे में पर्याप्‍त स्‍थान रखें, सभी खिलौने ऐसे रखें जो उसकी पहुँच में हों और उसके कुछ दोस्‍त भी आकर खेल लें.

हंसना क्यों है जरूरी, यहां जानें

सयुंक्त राष्ट्र की ओर से जारी विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2019 में भारत का स्थान 140 वां है जब कि पिछले साल यह 133 वें स्थान पर था. पाकिस्तान और बांगला देश समेत हमारे कई पड़ोसी राज्यों के लोग हम से ज्यादा खुश रहते हैं. फ़िनलैंड को लगातार दूसरे साल सब से खुशहाल देश का तमगा मिला. इस के बाद नार्वे और डेनमार्क का नाम है.

इस खुशहाली और प्रसन्नता का राज क्या है? क्या हम सच में हंसना मुस्कुराना और खुश रहना भूलने लगे हैं? क्या हमें खुश रहने की आदत नहीं है या हम स्ट्रेस ज्यादा लेने लगे हैं? क्या आप को याद है कि आप आखिर बार कब खुल कर हंसे थे? ऐसी हंसी जिस से आप के पेट में हंसतेहंसते दर्द हो गया हो या फिर हंसी रूकने का नाम ही नहीं ले रही हो.

वस्तुतः आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में किसी के पास इतना समय ही नहीं होता की वे खुद के लिए 2 मिनट भी निकाल सकें. जब कि हंसना एक ऐसी आदत है जो आप को हर तरह की बीमारियों से बचाने के साथ ही बर्दाश्त करने की क्षमता को भी बढ़ाता है. जीवन जीने का असली आनंद देता है.

हंसी के अंदर छिपे सेहत के इस राज ने ही तो हंसी को एक चिकित्सा का रूप दिया है. यदि आप तनाव या अवसाद से परेशान रहते है तो यह हंसी आप के हर गम का इलाज है.

इस सन्दर्भ में तुलसी हेल्थ केयर के डा.. गौरव गुप्ता बताते है कि हंसना हमारी सेहत के लिए कई तरह से लाभकारी है;

हमारे शरीर में कुछ स्ट्रेस हार्मोन होते हैं जैसे कि कौर्टिसोल, एड्रेनलिन आदि. जब कभी हम तनाव में होते हैं, तो ये हार्मोन शरीर में सक्रिय हो जाते हैं. इन का लेवल बढ़ने पर घबराहट होती है. ज्यादा घबराहट होने पर सिर दर्द, सर्वाइकल, माइग्रेन, कब्ज हो सकती है और शुगर लेवल बढ़ सकता है.

हंसने से कौर्टिसोल व एड्रेनलिन जैसे स्ट्रेस हार्मोन कम होते हैं और एंडौर्फिन, फिरौटिनिन जैसे फीलगुड हामोर्न बढ़ जाते हैं. इस से मन उल्लास और उमंग से भर जाता है. दर्द और एंग्जाइटी भी कम हो जाती है. इम्युन सिस्टम मजबूत होता है. जितनी देर तक हम जोरजोर से हंसते हैं उतनी देर तक हम एक तरह से लगातार प्राणायाम करते हैं क्यों कि हंसते हुए हमारा पेट अंदर की तरफ चला जाता है. साथ ही हम लगातार सांस छोड़ते रहते हैं यानी शरीर से कार्बन डाइऔक्साइड बाहर निकलती रहती है. इस से पेट में औक्सिजन के लिए ज्यादा जगह बनती है.

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दिमाग को ढंग से काम करने के लिए 20 फीसदी ज्यादा औक्सिजन की जरूरत होती है. खांसी, नजला, जुकाम, स्किन प्रौब्लम जैसी एलर्जी औक्सिजन की कमी से बढ़ जाती हैं. हंसी इन बीमारियों को कंट्रोल करने में मदद करती है. जब हम जोरजोर से हंसते हैं तो झटके से सांस छोड़ते हैं. इस से फेफड़ों में फंसी हवा बाहर निकल आती है और फेफड़े ज्यादा साफ हो जाते हैं. लाइफ में दिनरात, सुबहशाम सुख और दुख लगे रहते हैं. जिस से बचा नहीं जा सकता. लेकिन अगर हम लगातार बुरा और नेगेटिव सोचते हैं तो दिमाग सही फैसला नहीं कर पाता और परेशानियां बढ़ जाती हैं. हंसने पर दिमाग पूरा काम करता है और हम सही फैसले ले पाते हैं.

हंसने से शरीर के अंदरूनी हिस्सों को मसाज मिलती है जिसे इंटरनल जॉगिंग भी कहा जा सकता है. हंसी कार्डियो एक्सरसाइज है. हंसने पर चेहरे, हाथ, पैर, और पेट की मसल्स व गले, रेस्पिरेटरी सिस्टम की हल्की-फुल्की कसरत हो जाती है. 10 मिनट की जोरदार हंसी इतनी ही देर के हल्की कसरत के बराबर असर करती है. इससे ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है और मसल्स रिलैक्स होती हैं. जब हम हंसते हैं तो कोई भी तकलीफ या बीमारी कम महसूस होती है क्यों कि जिस तरह के विचार मन में आते हैं हमारा शरीर वैसे ही रिएक्ट करता है. हंसने से हम लगभग शून्य की स्थिति में आ जाते हैं यानी सब भूल जाते हैं.

सेहत के लिए अच्छा है हंसना

  1. हंसी पेट, चेहरे, पैर और कमर की मांसपेशियों के लिए अच्छा वर्कआउट है. हंसना रक्तदाब को कम करता है. साथ ही हंसी ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है. हंसी शरीर में ऑक्सिजन की मात्रा बढ़ाती है.
  2. हंसी से टेंशन और डिप्रेशन कम होता है. हंसने से स्ट्रेस हार्मोन्स जैसे कार्टिसोल और एड्रीनलीन का स्तर कम होता है. यह आत्मविश्वास और पॉजिटिव नजरिए में इजाफा करती है.
  3. हंसी ट्यूमर और अन्य बीमारियों से लड़ने वाली कोशिकाओं जैसे गामा इंटरफेरन और टी-सेल की क्षमता बढ़ाती है.
  4. याददाश्त दुरुस्त रखती है और सीखने की क्षमता बढ़ाती है. शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाती है.
  5. हंसने से दर्द कम होता है. हंसी मांसपेशियों को आराम पहुंचाती है.यह नेचरल पेनकिलर का काम करती है.
  6. दिल की बीमारियों से बचाने के साथ ही उत्तेजना और भय से बचाती है. मूड भी दुरुस्त रखती है और रोगों से लड़ने का सामर्थ्य बढ़ातीहै.
  7. शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में बढ़ोतरी करती है. इस से काम करने की क्षमता बढ़ती है
  8. इसे नेचरल कौस्मेटिक भी कह सकते हैं क्यों कि इस से चेहरा खूबसूरत बनता है.

हंसे और हंसाए

कई लोग शर्मीले स्वभाव के होते है. इस कारण वे समूह में जाना नजरअंदाज करते है.यदि आप के साथ भी ऐसा है तो निराश न हों. आप अकेले में घर के अंदर भी हंसी की प्रैक्टिस कर सकते हैं. रोजाना 15 मिनट के लिए शीशे के सामने खड़े हो जाएं और बिना वजह जोरजोर से हंसें.

हंसी का असली फायदा तभी है जब आप कुछ देर तक लगातार हंसें. इस के अलावा बच्चों और दोस्तों के साथ वक्त गुजारना भी हंसने का अच्छा बहाना हो सकता है. कई बार डॉक्टर भी अपने मरीजों को लाफ्टर थेरपी की सलाह देते हैं. इस में सबसे पहले खुद के चेहरे पर मुस्कान लाने को कहा जाता है. हंसतेमुस्कुराते चेहरे वाले लोग अधिक स्वस्थ भी होते हैं.

जब आप हंसते है जो शरीर में अच्छे हारमोन्स उत्पन्न होते है जो आप को अच्छा महसूस कराते है. यहीं कारण है कि लोग कॉमेडी शो या मूवी देखना पसंद करते है. इस से उन्हे रिलैक्स मिलता है. इस के अलावा हंसने से मन को अच्छा लगता है जिस से स्थिरता आती है. हंसने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है और व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से स्ट्रांग हो जाता है. हंसने से आप सभी चिंताएं भूल जाते है और समस्याओं का हल आसानी से खोज लेते है. जब आप किसी बात पर गुस्सा हों या किसी बात पर बहुत खीज आ रही हो, तो हंसे, खिलखिलाएं और अच्छे पलों को याद करें. हंसने से आप का तनाव और चिड़चिड़ाहट दूर होगी और बॉडी व मांइड रिलैक्स हो जाएगा.

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अकेले हंसने के बजाय समूह हंसी अधिक फायदेमंद होती है. साथ में हंसने के अवसर ऐसे ढूंढ़िएः-

  • कोई मजेदार फिल्म या टीवी शो देखिए.
  • लाफ्टर क्लब की सदस्यता ले लीजिए.
  • हंसमुख लोगों से मिलिए.
  • पालतू जानवरों के साथ खेलिए.
  • बच्चों के साथ समय बिताइए.
  • चुटकुले पढ़िए, सुनिए और सुनाइए.
  • अच्छा खाइये और सदा मुस्कुराते रहिये.
  • किसी कौमेडी क्लब में जाए.
  • हास्य पुस्तकें पढ़िए .
  • कभी कभी कुछ मूर्खतापूर्ण भी करें और सबों के साथ खुद को हसने का मौका दें.

खास टिप्स

  1. हंसते समय सांस की गति पर भी ध्यान रखें. साँस की क्रिया सही न होने पर हंसी से शरीर को लाभ नहीं मिलेगा.
  2. फुर्सत के क्षणों में हल्केफुल्के चुटकुले, अनुभव, रोचक संस्मरण याद कर खुल कर हंस सकते हैं.
  3. किसी बीमारी से पीड़ित होने पर ह्यूमर थैरेपी लेने के पहले ह्यूमर थेरेपिस्ट से यह जानकारी जरूर ले लें कि आप के लिए कौन-सी हंसी कितनी देर के लिए ठीक रहेगी.
  4. इस से बीमारी दूर नहीं होती. हँसी बीमारी का अहसास दूर करने व उस के प्रति पॉजिटिव सोच उत्पन्न करने का काम करती है. ह्यूमर थेरेपी के साथसाथ दवा लेना चालू रखें.

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लड़कों में क्या खोजती हैं लड़कियां?

सामान्य रूप से माना जाता है कि लड़के जब पहली दफा लड़कियों से मिलते हैं तो वे कई बातों पर गौर करते हैं. इस का मतलब यह नहीं कि लड़कियां लड़कों पर गौर नहीं करती. भले ही लड़के और लड़कियों के बीच स्वाभाविक आकर्षण होता है मगर जब बात शादी या रिश्ते की हो तो कुछ खूबियां हैं जिन्हें लड़की अपने होने वाले प्रेमी या जीवनसाथी में देखना चाहती हैं. आइये जानते हैं कि लड़कियां अपने दोस्त या संभावित पति में क्या खोजती हैं-

सपाट पेट फिट शरीर– साइंटिफिक जरनल सेक्सि‍योलौजी में प्रकाशित एक अध्ययन की रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि लड़कियां बाइसेप्स से पहले पेट पर नजर डालती हैं. अगर आप का पेट निकला हुआ नहीं है, आप फिट और स्मार्ट हैं तो लड़कियां आप के साथ जुड़ना चाहेंगी. वजह साफ़ है जो इंसान अपने शरीर की तंदुरुस्ती और सेहत का ख़याल नहीं रख सकता वह रिश्तों को ही कितना संभाल पायेगा. बढ़ा हुआ पेट कहीं न कहीं आप के आलसी स्वभाव, ढीले रवैये और अधिक खाने की आदत का परिचायक होता है. इस लिए किसी खास को पाना चाहते हैं सब से पहले अपने पेट पर काम करना शुरू करें.

लंबे पैर– यूनिवर्सिटी औफ क्रैंबिज में हुई एक स्टडी में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि महिलाओं और लड़कियों को पुरुषों के लंबे पैर आकर्षित करते हैं. इस आनलाइन सर्वे में पाया गया कि अमेरिका की 800 महिलाओं ने ऐसे मेल फिगर्स को तरजीह दी जिन के पैर औसत से थोड़े ज्यादा लंबे थे.

सफाई और व्यवस्थित जीवनशैली – लड़कियों की नजरों में आने के लिए पर्सनल हाइजीन का खास खयाल रखना जरुरी है. लड़की की नजर सब से पहले पुरुषों के बाल और दाढ़ी की ओर जाती है. लड़कियों को लड़कों के उलझे ,बेतरतीब और गंदे बाल बिल्कुल पसंद नहीं होते. अगर वे रोजाना ढंग से सेविंग नहीं करते, कोई हेयरस्टाइल मेंटेन नहीं रखते तो भी लड़कियों की नजरों में उन का आकर्षण घट जाता है. यही नहीं पहली बार किसी लड़की से मिलने जा रहे हैं तो अपने नाखूनों पर भी नजर डालना न भूलें. लड़कियों को गंदे नाखून बिलकुल पसंद नहीं आते. लड़कियां यह भी जरूर देखती हैं कि आप ने जो कपड़े पहने हैं वे साफ हैं या नहीं, कपड़े प्रेस कर के पहने हैं या नहीं.

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बौडी लैंग्वेज– कोई भी लड़की इस बात पर जरूर ध्यान देती है कि आप खड़े कैसे होते हैं, आप का उठना-बैठना कैसा है,  दूसरों से बातचीत करते वक्त आप के बोलने का टोन कैसा होता है,  आप की चाल कैसी है, आप सीधा, कंधो को उठा कर, कौन्फिडेंट के साथ चलते हो या नहीं, दूसरों के प्रति आप का व्यवहार कैसा है वगैरह. इस लिए किसी लड़की से मिलने जाना हो तो अपनी बौडी लैंग्वेज पर जरूर ध्यान दें. लड़कियों को वे लड़के भी बिल्कुल पसंद नहीं आते जिन के शरीर से दुर्गंध आती है.

सेंस औफ ह्यूमर- लड़कियों को वे लड़के ज्यादा पसंद आते हैं जिन का सेंस औफ ह्यूमर अच्छा होता है. अगर आप बोर किस्म के इंसान है तो लड़कियां आप से दूर भागेंगी. इस लिए अपने स्वभाव को ऐसा बनाने का प्रयास करें कि आप गंभीर माहौल को भी हल्काफुल्का कर पाने में समर्थ हो सकें.

पीछे पड़ने वाला न हो – लड़कियों को हर वक्त पीछे पड़े रहने वाले मजनू जैसे लड़कों के बजाय थोड़े रिजर्व और हलके ऐटिटूड वाले लड़के पसंद आते हैं. जो लड़के बारबार अप्रोच करने और ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करते रहते हैं उन्हें ज्यादातर लड़कियां हलके में लेने लगती हैं. जरुरी है कि आप धैर्य रखना सीखें वरना बनती बात बिगड़ सकती है. किसी भी बात को ले कर अपनी पार्टनर के साथ जबरदस्ती न करें और उन्हें तनाव में न आने दें.

प्यार जाहिर करने की अदा– यदि आप किसी लड़की को प्यार करते हैं और उस की तरफ से भी स्वीकृति है तो आप को उसे स्पेशल फील कराने का प्रयास करना होगा. अपने रिलेशनशिप को मजबूत बनाने और उस लड़की के दिल में बने रहने के लिए अपने प्यार का अहसास कराते रहे. पर इस का मतलब यह नहीं कि आप पूरी दुनिया में इस बात का ढिंढोरा पीटें. लड़कियां आप का समय चाहती हैं. आप साथ हो तो पूरी दुनिया से उन्हें कोई वास्ता नहीं होता. उसे दीवानों की तरह प्यार करें फिर देखें कैसे वह सिर्फ आप की बन कर रहेगी.

सम्मान की चाह – हर लड़की चाहती है कि उस का प्रेमी या होने वाला जीवनसाथी उस की परवाह करे, उसे इज्जत दे , उस के घर वालों के साथ प्यार से पेश आये. वह जब भी आप की आंखों में देखे तब उसे इन में अपने लिए इज्जत महसूस हो. ऐसे में उसे अहसास होता है कि आप उन्हें दिल से प्यार करते हैं और यही आप को उस की नजर में खास बनाता है.

रियल पर्सनालिटी – कुछ लड़कों की आदत होती है कि बातबेबात वे लड़कियों के आगे अपनी शेखी बघारने लगते हैं. अपनी नौलेज, इनकम या लुक से सम्बंधित बातें बढ़ाचढ़ा कर बोलते हैं. ताकि लड़कियां इम्प्रेस हो जाएं पर होता इस का उल्टा है. बनावटी लड़के कभी भी लड़कियों को पसंद नहीं आते. उन्हें हर समय रियल रहने वाले लड़के ही पसंद आते हैं.

मैच्योरिटी – लड़कियां सदैव समझदार और मैच्योर व्यवहार वाले लड़कों को ही चुनती हैं. छिछोरी या बचकानी हरकत वालों से दूर भागती हैं. इसलिए जरुरी है कि आप अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखें. बहुत ज्यादा बोलने वाले लड़के भी लड़कियों को पसंद नहीं आते.

हर समय जल्दी में रहने वाले और बिना सोचेसमझे फैसले लेने वाले लड़के लड़कियों को पसंद नहीं आते. छोटी सी बात पर अपना आप खो देने वाले लड़को से लड़कियां दूरी बढ़ती हैं. क्यों कि ऐसे लड़कों के साथ कभी भी रिश्ता लम्बा नहीं खिंच पाता. लड़कियां वैसे लड़कों को पसंद करती हैं जिन पर वे आंख मूंद कर भरोसा कर सके.

बात करने का सलीका– आप के बात करने का तरीका कहीं न कहीं आप के व्यक्तित्व की पहचान होती है. आप दूसरों से कितने सलीके और कायदें से बात करते हैं उस आधार पर लड़कियां आप को परखती हैं. इस के विपरीत बातबात पर गालियां देने, लड़ने-झगड़ने वाले लड़कों से लड़कियां दूर भागती हैं.

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दोस्ताना व्यवहार– अकड़ू और घमंडी लड़के कभी भी लड़कियों के फेवरेट लिस्ट में नहीं होते. लड़कियां कैसे लड़कों को ही पसंद करती हैं जो उन से फ्रेंडली बिहेवियर करते हैं और जिन के साथ वे कंफर्टेबल फील करती है. संकोची या बहुत कम बात करने वाले लड़कों से भी वे दूर भागती हैं. सकारात्मक सोच और अच्छे सेंस औफ ह्यूमर वाले लड़के लड़कियों की पहली पसंद होते हैं. तनाव भरे माहौल को भी खुशनुमा बना देने की आदत रखने वाले लड़के लड़कियां को बहुत पसंद आते हैं.

अजब गजब: किक बौक्सर ने 7 करोड़ दिए नशेड़ियों के लिए 

किक बौक्सिंग कहने को तो खेल है, लेकिन इस की गिनती खतरनाक खेलों में होती है. चूंकि यह खतरनाक गेम है इसलिए इस में पैसा भी खूब है. ब्रिटिश किक बौक्सर टायसन फ्यूरी दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं. उन्हें एकएक शो में कईकई करोड़ रुपए मिलते हैं. टायसन फ्यूरी तब सुर्खियों में आए जब उन्होंने एक मुकाबले में मिली 7 करोड़ रुपए की इनामी धनराशि दान कर दी.

उन्होंने यह रकम उन समाजसेवी संगठनों को दी जो नशामुक्ति केंद्र चलाते हैं. उन का उद्देश्य था नशे की गिरफ्त में आए लोगों को नशे से मुक्ति दिलाना और उन का पुनर्वास.

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दरअसल ‘द जिप्सी किंग’ के नाम से मशहूर टायसन फ्यूरी अब भले ही हैवी वेट चैंपियन हैं, लेकिन वह खुद कई सालों तक ड्रग एडिक्शन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों से जूझते रहे थे. पिछले दिनों उन का मुकाबला देओंती वाइल्डर के साथ हुआ था. इस मुकाबले में फ्यूरी को करीब साढ़े 3 करोड़ रुपए मिलने थे, लेकिन ‘पे पर व्यू’ की वजह से उन की कमाई 7 करोड़ तक पहुंच गई. हालांकि यह मुकाबला विवादास्पद रहा और ड्रा पर खत्म हो गया था.

उस वक्त फ्यूरी ने लौस एंजिल्स में बातचीत के दौरान पत्रकारों से कहा था कि इस रकम को वह सड़कों पर रहने वाले बेघर लोगों के कल्याण के लिए देंगे. लेकिन बाद में पता चला कि 7 करोड़ रुपए की धनराशि उन्होंने नशेडि़यों के नशामुक्त कराने और उन के लिए आश्रय घर बनाने के लिए इस काम में एक्सपर्ट रहे 2 सामाजिक संगठनों को दी है. फ्यूरी का कहना है कि ऐसा कर के वह वाहवाही लूटना नहीं चाहते, उन की तो बस इतनी चाह है कि लोग उन्हें अच्छा काम करने वाला समझें.

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बेमानी प्यार का यही नतीजा होता है…

मौत कभीकभी बिन बुलाए मेहमान की तरह चुपके से आती है और चील की तरह झपट्टा मार कर किसी को भी साथ ले जाती है. ऐसा नहीं है कि मौत आने से पहले दस्तक नहीं देती. असल में मौत दस्तक तो देती है, पर लोग उस पर ध्यान नहीं देते. कोई नहीं जानता कि वक्त कब करवट लेगा और खुशियां गम में बदल जाएंगी. ऐसा ही कुछ योगेश के साथ भी हुआ था.

आगरा के थाना सिकंदरा क्षेत्र में एकगांव है अटूस. राजन अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस का गांव में ही दूध का व्यवसाय था. वह बाहर से तो दूध खरीदता ही था, उस की अपनी भी कई दुधारू भैंसे थीं. राजन गांव का खातापीता व्यक्ति था. वह अपने बच्चों को खूब पढ़ाना चाहता था.

उस का बड़ा बेटा पढ़ाई में काफी तेज था. इसलिए परिवार को उस से काफी उम्मीदें थीं. राजन के घर से कुछ ही दूरी पर रिटायर्ड फौजी नरेंद्र का घर था. एक ही गांव के होने की वजह से दोनों परिवार के लोगों में आतेजाते दुआसलाम तो हो जाती थी, पर ज्यादा नजदीकियां नहीं थीं. दोनों परिवारों के बच्चे गांव के दूसरे बच्चों की तरह साथसाथ खेल कर बड़े हुए थे. वक्त के साथ फौजी नरेंद्र की बेटी अनमोल जवान हुई तो मांबाप ने उसे समझाने की कोशिश की कि वह लड़की है और लड़की को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए.

दरअसल, फौजी की बेटी अनमोल और राजन का बेटा योगेश एक ही कालेज में पढ़ते थे. आए दिन होने वाली मुलाकातों की वजह से दोनों एकदूसरे के करीब आने लगे थे. धीरेधीरे दोनों में दोस्ती हो गई और उन्हें लगने लगा कि उन के मन में एकदूसरे के लिए कोमल भावनाएं विकसित हो रही हैं.

दोनों बीए में में पढ़ रहे थे. एक दिन अनमोल जब आगरा जाने के लिए सड़क पर किसी वाहन का इंतजार कर रही थी तो योगेश अपनी बुलेट पर वहां आ गया. वह बाइक रोक कर अनमोल से बोला, ‘‘आओ बैठो.’’

‘‘नहीं तुम जाओ, मैं औटो से जाऊंगी.’’ जवाब में अनमोल ने कहा.

‘‘छोड़ो यार, ये क्या बात हुई. मैं भी तो कालेज ही जा रहा हूं.’’ कहते हुए योगेश बेतकल्लुफ हो गया और अनमोल का हाथ पकड़ते हुए बोला, ‘‘बैठो.’’

अनमोल उस के साथ बुलेट पर बैठ गई. उस के लिए यह एक नया अनुभव था, फिर भी वह यह सोच कर डरी हुई थी कि किसी ने देख लिया तो खबर घर तक पहुंच जाएगी. अनमोल इसी सोच में डूबी थी कि योगेश ने काफी शौप के सामने बाइक रोक दी.

‘‘बाइक क्यों रोक दी. कालेज चलने का इरादा नहीं है क्या?’’

‘‘कालेज भी चलेंगे, पहले एकएक कप कौफी पी लें.’’ कहते हुए वह अनमोल को कौफी शौप में ले गया. कौफी पीने के दौरान दोनों के बीच खामोशी छाई रही. अनमोल जहां डरी हुई थी वहीं योगेश उस से वह सब कहना चाहता था, जो काफी दिनों से उस के दिल में था.

अचानक उस ने अनमोल का हाथ पकड़ा तो वह कांप उठी. उस ने गहरी नजरों से योगेश को देखा और अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने लगी. योगेश थोड़ा गंभीर हो कर बोला, ‘‘अनमोल मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. तुम्हें हर वक्त आंखों के सामने रखना चाहता हूं.’’

अनमोल खिलखिला कर हंसते हुए बोली, ‘‘लगता है, तुम्हारी शामत आने वाली है. जानते हो मेरे पिता फौजी हैं. उन्हें पता चला तो…’’

‘‘जानता हूं, उन्हें छोड़ो तुम्हें तो पता चल गया न, तुम बताओ क्या करने वाली हो?’’

‘‘मैं क्या करूंगी, तुम तो जानते हो कि लड़कियां अपने दिल की बात आसानी से नहीं कह पातीं.’’ कहते हुए अनमोल मुसकराई तो योगेश के दिल की धड़कनें तेज हो गईं.

उस ने कहा, ‘‘मुझे तुम्हारा जवाब चाहिए था, तुम्हें मेरी मोहब्बत कुबूल है न?’’

अनमोल को योगेश अच्छा लगता था. उस ने सहजभाव से योगेश की मोहब्बत कुबूल कर ली. उस दिन के बाद तो जैसे दोनों की दुनिया ही बदल गई.

एक दिन अनमोल और योगेश ताजमहल देखने गए, जहां उन्हें देर तक पासपास बैठने का मौका मिला. उस दिन दोनों ने एकदूसरे से खुल कर बातें कीं. उस दिन के बाद धीरेधीरे दोनों की मोहब्बत परवान चढ़ने लगी.

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दोनों समाज की नजरों से छिप कर मिलने लगे. साथसाथ जीनेमरने की कसमें खा कर दोनों ने तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए दोनों शादी करेंगे और अपनी अलग दुनिया बसाएंगे.

हालांकि अनमोल जानती थी कि उस का फौजी पिता किसी भी सूरत में उन की मोहब्बत को मंजिल तक नहीं पहुंचने देगा. लेकिन अनमोल और योगेश ने तय कर लिया कि जमाना लाख विरोध करे, लेकिन वे अपनी मोहब्बत के रास्ते पर चल कर अपने परिजनों को यह मानने के लिए मजबूर कर देंगे कि वे एकदूसरे के लिए ही बने हैं.

प्यार में बदली दोस्ती

यह प्रेमी युगल की सोच थी लेकिन मोहब्बत की इस राह पर इतने कांटे थे कि उन के लिए मंजिल तक पहुंचना आसान नहीं था. अनमोल के पिता के भाई गांव के पूर्व प्रधान थे. इस नाते इस परिवार का इलाके में काफी दबदबा था. लेकिन उन दोनों की आशिकी को इस से कोई फर्क नहीं पड़ा था.

उन का मिलनाजुलना चलता रहा. एक दिन किसी ने नरेंद्र को बताया कि उस ने उस की बेटी को राजन के बेटे से बातचीत करते देखा है. यह सुनते ही नरेंद्र का खून गर्म हो गया. वह गुस्से में घर पहुंचा और अपनी पत्नी सरोज से अनमोल के बारे में पूछा कि वह कहां है. पत्नी ने बताया कि अनमोल अभी कालेज से नहीं लौटी है.

‘‘पता है तुम्हारी बेटी कालेज जाने के बहाने क्या गुल खिला रही है?’’ नरेंद्र ने सरोज से कहा, तो वह बोली, ‘‘क्या बात है, अनमोल ने कुछ किया है क्या? वह तो सीधीसादी लड़की है, अपनी पढ़ाई पर ध्यान देती है.’’

‘‘जानता हूं, पर आज पता चला है कि वह राजन के बेटे से दोस्ती बढ़ाए हुए है, जानता हूं कालेज में बच्चे एकदूसरे से बातें करते हैं, लेकिन सोचो बात इस से आगे बढ़ गई तो क्या करेंगे?’’

‘‘कुछ नहीं होगा. तुम चाय पियो वह आती ही होगी. पूछ लेना.’’ कह कर सरोज ने चाय का प्याला नरेंद्र के आगे रख दिया. थोड़ी देर में अनमोल आ गई. पिता को देख कर वह अपने कमरे में जाने लगी तो नरेंद्र ने टोका, ‘‘कहां से आ रही हो?’’

‘‘कालेज से.’’ अनमोल ने जवाब दिया.

‘‘ये योगेश कौन है?’’ नरेंद्र ने पूछा तो अनमोल चौंकने वाले अंदाज में बोली, ‘‘कौन योगेश?’’ अनमोल ने कहा, ‘‘पापा, कालेज में तो कई लड़के पढ़ते हें, मुझे हर किसी का नाम थोड़े ही पता है.’’

नरेंद्र समझ गया कि लड़की उतनी भी सीधी नहीं है, जितनी उसे समझा जाता है. लड़की पर ध्यान देना जरूरी है.

अपने कमरे में जा कर अनमोल ने किताबें मेज पर पटकीं और सोचने लगी कि जरूर पिता को शक हो गया है. अब सतर्क रहना होगा. वह काफी तनाव में आ गई.

अनमोल जानती थी कि जाति एक होने के बावजूद उस के मांबाप योगेश को कभी नहीं अपनाएंगे. वजह यह कि हैसियत में उस का परिवार योगेश के परिवार के मुकाबले काफी संपन्न था. देर रात फोन कर के उस ने यह बात योगेश को बता दी. योगेश ने कहा, ‘‘ठीक है, आगे क्या करना है देखेंगे.’’

निगाह रखी जाने लगी अनमोल पर दूसरी ओर नरेंद्र निश्चिंत नहीं था. अगले कुछ दिनों में उसे पता चल गया कि लड़की गलत राह पर जा रही है. इसी के मद्देनजर उस ने सरोज से कहा, ‘‘अनमोल अब घर रह कर ही पढ़ाई करेगी. इम्तिहान आएंगे तो देखेंगे क्या करना है.’’

अनमोल ने पिता की बात का विरोध करते हुए कहा, ‘‘लेकिन मैं ने किया क्या है पापा?’’

‘‘तुम अच्छी तरह जानती हो कि तुम ने क्या किया है. इस से पहले कि तुम समाज में हमारा सिर नीचा करो, मैं तुम्हारे लिए रिश्ता देख कर तुम्हारी शादी कर दूंगा.’’

लेकिन इस से पहले कि नरेंद्र अपने सिर से बोझ उतार पाता, अनमोल और योगेश ने घर मे भाग कर अपनी अलग दुनिया बसाने का फैसला कर लिया. एक दिन रात में जब सब सो रहे थे, अनमोल ने घर छोड़ दिया और योगेश के साथ चली गई. सुबह घर वालों ने देखा तो सन्न रह गए. बाहर वाला दरवाजा खुला था और अनमोल घर से लापता थी.

इस के बाद तमाम जगहों पर फोन किए गए लेकिन अनमोल का कहीं पता नहीं चला. कोई रास्ता न देख नरेंद्र अपने घर वालों के साथ योगेश के पिता राजन से मिला. उन की बात सुन कर राजन हैरान रह गया उसे कुछ भी पता नहीं था. राजन ने विश्वास दिलाया कि वह उन की बेटी को सही सलामत वापस लाएगा.

राजन जानता था कि बेटे की ये हरकत उस के परिवार को मुसीबत में डाल सकती है. उस ने अपनी रिश्तेदारियों में फोन मिलाए तो पता चला कि योगेश और अनमोल उस के एक करीबी रिश्तेदार के घर पर मौजूद हैं. उस ने अपने उस रिश्तेदार को सारी बात बता कर कहा कि वह तुरंत दोनों को साथ ले कर अटूस आ जाए.

ऐसा ही हुआ. अनमोल अपने मांबाप के घर आ गई. वह समझ गई थी कि योगेश के साथ अपनी दुनिया बसाने का सपना अब कभी पूरा नहीं होगा. अब उस पर बंदिशें भी बढ़ गईं. साथ ही नरेंद्र अनमोल के लिए लड़का भी तलाशने लगा. आखिर एक रिश्ता मिल ही गया. अनमोल का रिश्ता गाजियाबाद के भोपुरा निवासी नेत्रपाल से तय कर दिया गया.

नेत्रपाल एक दवा कंपनी का प्रतिनिधि था. 4 साल पहले अनमोल की शादी नेत्रपाल के साथ हो गई. वह रोतीबिलखती खाक हुए अपने प्यार के सपनों की राख समेटे सुसराल चली गई.

अनमोल नहीं भूली अपने प्यार को

मांबाप ने सोचा कि चलो सब कुछ ठीक हो गया. लेकिन यह उन की भूल थी. 3 साल के प्रेमसंबंधों को भला प्रेमी प्रेमिका कैसे भूल सकते थे. समाज ने उन्हें जबरन अलग किया था. सीधीसादी दिखने वाली अनमोल अब विद्रोही हो गई थी. ससुराल में उस का मन नहीं लगता था. उसे अपनी स्थिति एक कैदी जैसी लगती थी. मौका पा कर वह योगेश से फोन पर बात कर लेती थी.

अपने काम में व्यस्त रहने वाला नेत्रपाल इस सब से बेखबर था. इसी बीच अनमोल गर्भवती हो गई, लेकिन वह अपने पति के बच्चे को जन्म देने के लिए तैयार नहीं थी. उस ने एक दिन नेत्रपाल से कहा कि अभी वह बच्चे को जन्म देने की स्थिति में नहीं है. पत्नी बच्चे को जन्म देने की इच्छुक नहीं थी. न चाहते हुए भी नेत्रपाल मान गया. उस ने पत्नी का गर्भपात करा दिया.

अनमोल की शादी के बाद घर वालों के दबाव में योगेश भी एक अन्य लड़की से शादी करने को तैयार हो गया. उस की शादी वंदना के साथ हो गई. वंदना को इस बात की भनक तक नहीं थी कि उस का पति किसी दूसरी लड़की से प्यार करता था और उसे ले कर भाग भी गया था. वह खामोशी के साथ पत्नी धर्म निभाती रही. बाद में वह एक बच्चे की मां भी बनी.

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इसी बीच कंपनी ने नेत्रपाल को आगरा क्षेत्र का काम सौंप दिया. नेत्रपाल ने थाना सिकंदरा क्षेत्र की कालोनी शास्त्रीपुरम में किराए का मकान ले लिया और वहीं रहते दवा कंपनी का काम करने लगा. वह सुबह घर से निकलता और शाम को लौटता. अपनी पत्नी के प्यार से वह बेखबर था. उसे नहीं मालूम था कि पत्नी शादी से पहले किसी से प्यार करती थी.

शादी के बाद अनमोल जब तब पति के साथ मायके आती और उस के साथ ही वापस चली जाती. योगेश से मिलने का मौका ही नहीं मिलता था. लेकिन अब शास्त्रीपुरम में पति के काम पर चले जाने के बाद वह घर में अकेली रह जाती थी.

उस का अकेलापन एक ऐसे गुनाह को जन्म देगा, जिस में पूरा परिवार तबाह हो जाएगा, यह अनमोल नहीं समझ पाई. उस ने आगरा आ जाने की खबर अपने प्रेमी योगेश को फोन पर दे दी और अपना पता भी बता दिया. उस ने योगेश से मिलने की इच्छा भी व्यक्त की.

प्रेमिका के आमंत्रण ने योगेश में जोश भर दिया. वह भूल गया कि अब उस की भी शादी हो चुकी है और वह एक बच्ची का पिता है. उस ने तय कर लिया कि वह अपनी प्रेमिका से जरूर मिलेगा.

नरेंद्र ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि बेटी फिर से कोई गुल खिलाने वाली है. बेटा जूनियर डाक्टर था और बेटी की उस ने एक अच्छे परिवार में शादी कर दी थी. जबकि अनमोल इसी सब का फायदा उठाना चाहती थी. एक दिन दोपहर को योगेश अनमोल के पास जा पहुंचा.

दोनों ने आगापीछा नहीं सोचा. लंबे अलगाव के बाद अनमोल उस के आगोश में सिमट गई. योगेश ने अनमोल को समझाने की कोशिश की कि अब कुछ नहीं हो सकता. वह एक जिम्मेदार पिता और पति बनना चाहता है. उस ने यह बात कही जरूर लेकिन चाहता वह भी वही था जो अनमोल चाहती थी. नतीजा यह हुआ कि दोनों समाज की आंखों में धूल झोंक कर एक ऐसे रिश्ते को निभाने लगे जिस के कुछ मायने नहीं थे.

अनमोल और योगेश जिस रास्ते पर चल पड़े थे, वह फिसलन भरा था, जो धीरेधीरे दलदल बन गया. ऐसी दलदल जहां से निकल पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव था. अनमोल का दिल दिमाग बेकाबू था. वह चाहती थी कि वह नेत्रपाल के साथ वैवाहिक बंधन से मुक्त हो कर एक बार फिर आजाद जिंदगी जिए और योगेश के साथ अपनी दुनिया बसाए.

यह अलग बात थी कि योगेश के पास अपनी निजी आय का कोई साधन नहीं था और न ही वह अपनी पत्नी और बेटी की जिम्मेदारियों से मुक्त हो सकता था. योगेश जानता था कि वह अपनी बेटी और पत्नी का गुनहगार है, लेकिन यह नहीं जानता था कि यह गुनाह उस की जिंदगी ही छीन लेगा.

18 अगस्त, 2018 की रात करीब साढ़े 8 बजे एक युवती बदहवास सी थाना सिकंदरा पहुंची. उस से थानाप्रभारी अजय कौशल से कहा, ‘‘सर, जल्दी चलिए, वो लोग उसे कार में कहीं ले गए हैं और उसे मार डालेंगे.’’ युवती थाना इंचार्ज को समझा नहीं पा रही थी कि कौन किसे मार डालेगा. अजय कौशल ने संतरी को पानी लाने को कहा. युवती ने पानी पी लिया तो अजय कौशल ने पूछा, ‘‘हां, अब बताओ क्या बात है?’’

इस के बाद युवती ने जो कुछ बताया उसे सुन कर थानाप्रभारी के होश उड़ गए. उन्होंने ड्राइवर से तुरंत गाड़ी तैयार करने को कहा और पुलिस टीम के साथ उस युवती को ले कर शास्त्रीपुरम पहुंचे. तब तक रात के साढ़े 9 बज चुके थे. इलाके में गहरा सन्नाटा था. आसपास के मकानों के दरवाजे बंद थे.

अनमोल ने दरवाजा खोला तो अजय कौशल ने अंदर जा कर देखा. कमरे का फर्श गीला था. अनमोल ने बताया कि फर्श का खून उसी ने साफ किया है. अब तक वह सामान्य हो चुकी थी.

उस ने थानाप्रभारी को फिर पूरी कहानी सुनाई कि कालेज के समय से वह योगेश से प्यार करती थी. दोनों शादी भी करना चाहते थे, लेकिन समाज के आगे उन की एक नहीं चली.

योगेश की भी शादी हो चुकी थी. दोनों का मिलनाजुलना मुश्किल हो गया था, पर जब नेत्रपाल का तबादला आगरा हो गया तो हम ने शास्त्रीपुरम में किराए का मकान ले लिया. यहां आ कर योगेश से मिलने का रास्ता भी साफ हो गया था. जब भी मौका मिलता हम मिल लेते थे. नेत्रपाल दोपहर में कम ही आता था. जब उसे आना होता था तो वह फोन करता था.

आगे की पूछताछ में जो बातें पता चलीं, उन के अनुसार, 19 अगस्त, 2018 को अनमोल ने योगेश के वाट्सऐप पर मैसेज भेजा कि वह आ जाए. योगेश अपने लिए नौकरी ढूंढ रहा था. नौकरी के लिए उस ने कई फार्म भी भरे थे. वह दोपहर को घर से यह कह कर निकला कि फार्म भरने आगरा जा रहा है. लेकिन वह गया तो वापस नहीं लौटा उस के घर वाले परेशान थे. बहरहाल, अनमोल ने पुलिस को पूरी बात बता दी. उसी के आधार पर पुलिस ने छानबीन की.

आशिक की मौत

हालांकि अनमोल के अनुसार उस ने फर्श से खून साफ कर दिया था, लेकिन दीवारों पर खून के धब्बे थे. पुलिस की क्राइम टीम ने उन धब्बों को उठा लिया.

अनमोल ने आगे जो बताया उस के अनुसार क्राइम की तसवीर कुछ इस तरह बनी.अनमोल ने योगेश को घर बुला लिया था. जब दोनों प्यार के क्षणों में डूबे थे, तभी नेत्रपाल आ गया. दरअसल उसे पिछले कुछ दिनों से पत्नी पर शक हो गया था. पति को आया देख अनमोल घबरा गई. उस ने योगेश को स्टोररूम में छिपा दिया. नेत्रपाल ने कई बार घंटी बजाई, लेकिन अनमोल ने दरवाजा नहीं खोला. वह काफी घबराई हुई थी, कपड़े अस्तव्यस्त थे.

कुछ देर बाद दरवाजा खुला तो नेत्रपाल ने पूछा, ‘‘दरवाजा खोलने में देर क्यों हुई?’’

‘‘मैं नहा रही थी.’’ अनमोल ने कहा.

‘‘ऐसा लग तो नहीं रहा.’’ नेत्रपाल ने कहा. तभी उस की नजर स्टोर के अधखुले दरवाजे पर पड़ी तो उस का शक बढ़ गया. उस ने स्टोर का दरवाजा खोलने की कोशिश की तो अंदर से जोर लगा कर किसी ने दरवाजा खोलने नहीं दिया. नेत्रपाल समझ गया कि उस का शक सही है.

तभी अनमोल ने कहा, ‘‘उसे छोड़ दो प्लीज, उसे जाने दो वह निर्दोष है. मैं ने ही उसे बुलाया था.’’ गुस्से में भरे नेत्रपाल ने अपने ससुर नरेंद्र को फोन पर सारी बात बताई. कुछ ही देर में नरेंद्र और उस के भाई का बेटा वहां पहुंच गए. इस के बाद योगेश को स्टोर से बाहर निकाला गया. तीनों सरिया और लोहे की रौड से योगेश पर टूट पड़े. अनमोल ने उसे बचाने की कोशिश की तो उस की भी पिटाई की गई. तीनों ने पिटाई से खूनोंखून हुए योगेश को देखा तो उन के होश उड़ गए. वह बेहोश हो गया था. इस बीच अनमोल को एक कमरे में बंद कर दिया गया था. उसे यह पता नहीं था कि योगेश मर गया था या जिंदा था.

8 बजे के करीब तीनों ने जब योगेश को कमरे में डाला तब वह मर चुका था. अब उन्हें पुलिस का डर सताने लगा था. कमरे का दरवाजा खोल कर अनमोल को बाहर निकाला और उस से चुप रहने को कहा गया. फिर वे चले गए. अनमोल ने कमरे से बाहर आ कर खून सना फर्श साफ किया और थाना सिकंदरा पहुंच गई.

उधर राजन और उस का बेटा शिशुपाल योगेश की तलाश कर रहे थे. दूसरी ओर पुलिस को योगेश की बुलेट मोटरसाइकिल पड़ोस के एक घर के सामने मिल गई. रात भर पुलिस तीनों को आगरा की सड़कों पर तलाशती रही. आखिर अगले दिन दोपहर को पुलिस ने एक मुखबिर की सूचना पर नेत्रपाल और नरेंद्र को दबोच लिया. पुलिस ने राजन को भी घटना को सूचना दे दी थी.

आरोपियों ने बताया कि उन्होंने योगेश को मारापीटा और बेहोशी की हालत में उसे जऊपुरा के जंगल में फेंक आए. उन की निशानदेही पर पुलिस ने योगेश का शव जऊपुरा के जंगल से बरामद कर लिया. आरोपियों ने कत्ल में इस्तेमाल सरिया और लोहे की रौड भी बरामद करा दी.

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पुलिस ने तीसरे अभियुक्त अनमोल के चचेरे भाई को भी गिरफ्तार कर लिया. बाद में तीनों को अदालत में पेश किया गया. उन के साथ अनमोल को भी अदालत में पेश किया. उस पर सबूत नष्ट करने का आरोप था. इन सभी के खिलाफ राजन ने भादंवि की धारा 302, 201, 364, 34 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करा दिया था. अदालत ने आरोपियों को जेल भेज दिया.

अपनेअपने जीवनसाथियों से असंतुष्ट योगेश और अनमोल ने विवाह के बाद भी टूटे सपनों को फिर से संजोने का प्रयास किया, जो गलत था. इस का नतीजा भी गलत ही निकला. इस चक्कर में कई जिंदगियां बरबाद हो गई.

 -कथा में सरोज नाम बदला हुआ है

(कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां)

सही समय पर करें काम अच्छा पैदा हो धान

सही तकनीक का इस्तेमाल कर के किसान न केवल इस तरह की समस्याओं से बच सकते हैं, बल्कि ज्यादा उपज भी ले सकते हैं.यहां हम बासमती धान की खेती कलैंडर पर रोशनी डाल रहे?हैं, ताकि किसान अपने कामों को समय पर अंजाम दें और अच्छी उपज पाएं.

1 से 15 जून

बीज भरोसेमंद जगह से ही खरीदें. बीजोपचार जरूर करें. 5 किलो बीज के लिए 5 ग्राम एमीसान व एक ग्राम स्ट्रैप्टोसायक्लीन का 10 लिटर पानी में?घोल बनाएं. 24 घंटे तक बीज को उस में डुबोएं. टब एल्यूमिनियम का न हो. थोड़ा बीज का नमूना और थैला सुरक्षित रखें.

16 से 30 जून

अगर पौध पीली पड़ती दिखाई दे तो 3 फीसदी फेरस सल्फेट का छिड़काव करें. पौध उखाड़ने के एक हफ्ते पहले एक बार किसी फफूंदीनाशक का छिड़काव करें. पौधशाला में सिंचाई शाम के समय में करें.

1 से 15 जुलाई

जिन किसानों की धान की पौध 20-25 दिन की हो गई हो, वे सिंचाई करें और सावधानी से पौध उखाड़ कर उस की रोपाई करें. रोपाई के समय 4-5 सैंटीमीटर से ज्यादा पानी न रखें. एक वर्गमीटर में 25-30 पौधे लगाएं. रोपाई 15 जुलाई से पहले खत्म कर लें. पूसा बासमती-1509 की रोपाई 15 जुलाई के बाद ही करें.

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16 से 31 जुलाई

सिंचाई व खरपतवार का ध्यान रखें. नाइट्रोजन की पहली खुराक का बुरकाव करें. जहां पौध मर गए हैं, वहां नई पौध लगा दें. खेत की मेंड़ को साफ रखें. अच्छा रहेगा कि फफूंदीनाशक का छिड़काव मेंड़ पर भी कर दें.

1 से 15 अगस्त

इस समय धान की फसल पर तना छेदक, पत्ती मोड़क, हरा तेला, सफेद पीठ वाला तेला कीट का हमला हो सकता?है इसलिए किसान खेत की लगातार जांच करें. फैरोमौन प्रपंच यानी ट्रैप फसल के बीचोंबीच लगा सकते हैं ताकि पीला तना छेदक नर पतंगे खत्म हो जाएं. कीटों के पाए जाने पर ट्राइकोग्रामा कार्ड 1-3 प्रति एकड़ की दर से लगा सकते हैं. दवा का छिड़काव तभी करें, जब उन की तादाद ज्यादा हो.

16 से 31 अगस्त

खरपतवार की समय से पहले रोकथाम करें और नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा डालें. मेंड़ को साफ रखें व एक बार फिर किसी फफूंदीनाशक का छिड़काव करें.

इस दौरान धान में पत्ती लपेटक कीट का हमला देखा जाता है. अगर हमला ज्यादा हो तो कार्बोफ्यूरान 3जी/6 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बुरकाव करें.

1 से 30 सितंबर

धान में पत्ती लपेटक कीट की जांच करें. इस समय धान की फसल को चौपट करने वाले ब्राउन प्लांट होपर यानी भूरा फुदका का हमला शुरू हो सकता?है.

किसान खेत के अंदर जा कर पौधों के तनों के निचले भाग पर मच्छर जैसे कीट की जांच करें.

धान में ब्लास्टर यानी बदरा बीमारी का हमला होने की निगरानी भी हर 2-3 दिन के अंतर पर करें. शुरू में पत्तियों पर सूई की नोक के बराबर गोल तांबे के रंग के धब्बे बनना इस बीमारी की निशानी है. 2-3 दिन के अंदर ये धब्बे लंबाई में बढ़ कर आंख के आकार के हो जाते हैं.

अगर इस कीट की समय पर रोकथाम न की जाए तो बाली के नीचे के हिस्से पर इस का असर पड़ता है. इसे आम भाषा में गरदन तोड़ कहते हैं.

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इस की रोकथाम के लिए बाविस्टीन

2 ग्राम प्रति लिटर की दर से 3 बार छिड़काव करें. पहली बार रोपाई के 30-40 दिन बाद, दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव से 20-25 दिन बाद और तीसरा, दूसरे छिड़काव से 20-25 दिन बाद करने से बीमारियों की रोकथाम की जा सकेगी. जैसे ही बीमारी का लक्षण दिखाई दे, तुरंत छिड़काव करें.

इस समय धान में आभासी कंड यानी हलदी बीमारी आने की काफी संभावना है. इस बीमारी के आने से धान के दाने फूल जाते हैं और पीले रंग के हो जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए ब्लाइटौक्स-50 की 500 ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा को पानी में मिला कर 10 दिन के अंतर पर 2 बार बालियां आने से पहले छिड़काव करें. खेत में पानी जमा न होने दें.

इसी समय ब्राउन प्लांट होपर यानी भूरा फुदका का हमला शुरू हो सकता है. किसान खेत की नियमित निगरानी करते रहें और कीटों की ज्यादा तादाद होने पर मोनोक्रोटोफास

2 एमएल प्रति लिटर पानी की दर से जहां कीट हो, वहां छिड़काव करें.

1 से 30 अक्तूबर

दाना पकने पर खेत में दूसरी किस्मों के पौधे दिखाई दें तो उन्हें निकाल दें. अगर फसल में दूसरी जाति के दाने होते?हैं तो भाव कम कर दिया जाता है.

पछेते धान में इस मौसम में एक सिंचाई जरूर करें. मौसम को ध्यान में रखते हुए किसानों को यह सलाह है कि धान की पकने वाली फसल को कटाई से 2 हफ्ते पहले सिंचाई लगाना बंद कर दें. फसल कटाई के बाद फसल को 2-3 दिन खेत में सुखा कर गहाई कर लें. उस के बाद दानों को अच्छी तरह से सुखा कर ही मंडी ले जाएं या स्टोर करें.

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