मौत कभीकभी बिन बुलाए मेहमान की तरह चुपके से आती है और चील की तरह झपट्टा मार कर किसी को भी साथ ले जाती है. ऐसा नहीं है कि मौत आने से पहले दस्तक नहीं देती. असल में मौत दस्तक तो देती है, पर लोग उस पर ध्यान नहीं देते. कोई नहीं जानता कि वक्त कब करवट लेगा और खुशियां गम में बदल जाएंगी. ऐसा ही कुछ योगेश के साथ भी हुआ था.

आगरा के थाना सिकंदरा क्षेत्र में एकगांव है अटूस. राजन अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस का गांव में ही दूध का व्यवसाय था. वह बाहर से तो दूध खरीदता ही था, उस की अपनी भी कई दुधारू भैंसे थीं. राजन गांव का खातापीता व्यक्ति था. वह अपने बच्चों को खूब पढ़ाना चाहता था.

उस का बड़ा बेटा पढ़ाई में काफी तेज था. इसलिए परिवार को उस से काफी उम्मीदें थीं. राजन के घर से कुछ ही दूरी पर रिटायर्ड फौजी नरेंद्र का घर था. एक ही गांव के होने की वजह से दोनों परिवार के लोगों में आतेजाते दुआसलाम तो हो जाती थी, पर ज्यादा नजदीकियां नहीं थीं. दोनों परिवारों के बच्चे गांव के दूसरे बच्चों की तरह साथसाथ खेल कर बड़े हुए थे. वक्त के साथ फौजी नरेंद्र की बेटी अनमोल जवान हुई तो मांबाप ने उसे समझाने की कोशिश की कि वह लड़की है और लड़की को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए.

दरअसल, फौजी की बेटी अनमोल और राजन का बेटा योगेश एक ही कालेज में पढ़ते थे. आए दिन होने वाली मुलाकातों की वजह से दोनों एकदूसरे के करीब आने लगे थे. धीरेधीरे दोनों में दोस्ती हो गई और उन्हें लगने लगा कि उन के मन में एकदूसरे के लिए कोमल भावनाएं विकसित हो रही हैं.

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