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गठिया के दर्द से राहत दिलाएंगे ये 5 होममेड टिप्स

आजकल कम उम्र के बच्चे और युवा भी गठिया का शिकार हो रहे हैं. गठिया में काफी तेज दर्द होता है और सूजन भी रहती है. ये सूजन जोड़ों में यूरिक एसिड के जमने के कारण होती है. अगर आप इस दर्द और सूजन से तुरंत राहत पाना चाहते हैं, तो इन आसान घरेलू उपायों को अपना सकते हैं.

गर्म पानी और हल्दी

गठिया के दर्द को दूर करने के लिए आप घर पर ही कुछ नुस्खें अपना सकते हैं. इसे बनाने के लिए गर्म पानी, नींबू का रस, एप्पल साइडर विनेगर और हल्दी की आवश्यकता है.

इसे बनाने के लिए सबसे पहले एक ग्लास गुनगुने पानी में एक नींबू का रस मिलाएं. अब इसमें 1 चम्मच एप्पल साइडर विनेगर और 1 छोटा चम्मच हल्दी मिलाएं. इस ड्रिंक को दिन में 2 बार पिएं. और आपको गठिया के दर्द से राहत मिलेगा.

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बर्फ से करें सिंकाई

गठिया के दर्द और सूजन को तुरंत कम करने के लिए आप बर्फ की सिंकाई कर सकते हैं. इसके लिए एक कपड़े में बर्फ के टुकड़ों को रखें और फिर इसकी पोटली बना लें. अब सूजन वाली जगह पर इस पोटली से 10-15 तक सिंकाई करें. दर्द से तुरंत राहत मिलेगी.

ज्यादा से ज्यादा पानी और हर्बल टी पिएं

ज्यादा पानी पीकर भी गठिया के दर्द को कम किया जा सकता है. ज्यादा पानी पीने से यूरिन के साथ आपके शरीर में मौजूद टौक्सिन्स भी बाहर निकल जाते हैं. यूरिक एसिड भी शरीर के लिए टौक्सिन जैसा है. जब आप भरपूर पानी पिएंगे, तो आपकी किडनियां ज्यादा मात्रा में यूरिक एसिड को बाहर निकाल पाएंगी. इसके अलावा आप हर्बल टी भी पी सकते हैं.

सूजन या दर्द वाले हिस्से को ऊपर उठाएं

आमतौर पर गठिया का दर्द हाथ, पैर, घुटनों और टखनों में होता है. इस दर्द और सूजन को कम करने के लिए एक आसान तरीका यह है कि आप उस अंग को ऊपर उठा लें, जिस अंग में दर्द हो रहा है. अंगों को ऊपर की तरफ उठाने से उस अंग में पानी और दूसरे फ्लुइड्स का बहाव कम हो जाता है और हृदय की तरफ बहाव बढ़ने लगता है. इससे दर्द कुछ हद तक कम हो सकता है.

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12 साल के लियोनार्डो ने खोला अपना स्कूल

अर्जेटीना के शहर लास पाइड्रिटस के एक 12 वर्षीय छात्र लियोनार्डो निकानोर किंतेरोस ने 12 साल की कच्ची उम्र में शिक्षा की अलख जगाने के लिए अपना खुद का प्राइवेट स्कूल खोला है. 40 स्टूडेंट वाला यह स्कूल अपने छात्रों को मुफ्त शिक्षा देता है. मुफ्त शिक्षा की वजह से यहां कई वयस्क भी पढ़ने आने लगे हैं. लियोनार्डो को पढ़ाई लिखाई का बहुत शौक है. वह दूसरे बच्चों को भी इस शौक से जोड़ना चाहते हैं.

लियोनार्डो के मन में स्कूल खोलने की बात एक साल पहले तब आई जब कुछ बच्चे अपने परिवार की आर्थिक तंगी की वजह से स्कूल छोड़ कर जाने लगे. लियोनार्डो को यह अच्छा नहीं लगा तो उस ने इस दिशा में कुछ करने की सोची.

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सोचविचार कर लियो ने अपनी दादी रामोना से कहा कि वह ऐसा स्कूल खोलना चाहता है, जहां गरीब और सड़क पर खेलने वाले बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जा सके. दादी को अपने मासूम पोते की सोच पर गर्व हुआ. उन्होंने लियो की मदद करने का फैसला कर लिया.

दादी की मदद से लियोनार्डो ने अपना सपना पूरा कर लिया. बिना पैसे के शिक्षा देने वाले उन के इस स्कूल में धीरेधीरे 40 बच्चे पढ़ने आने लगे. इन बच्चों में 36 बच्चे लियोनार्डो से छोटे हैं. इस स्कूल के टीचर और प्रिंसिपल लियोनार्डो ही हैं. यह स्कूल आम स्कूलों से छोटा जरूर है, लेकिन लियो की लगन और इच्छाएं इसे जरूर बड़ा बना देंगी.

लियोनार्डो के इस स्कूल में ब्लैक बोर्ड, बेंच, स्टूडेंट के लिए लौकर और छोटी सी लाइब्रेरी भी है. छुट्टी की घोषणा के लिए घंटी और प्रार्थना के लिए साउंड सिस्टम भी है, जिस पर रोजाना अर्जेंटीना का राष्ट्रगीत बजाया जाता है.

लियोनार्डो हर दिन सुबह पहले पढ़ाई करने पहले अपने स्कूल जाते हैं, फिर फ्री एजूकेशन देने के लिए 20 मिनट साइकिल चला कर अपने इस स्कूल पहुंचते हैं. वह बच्चों को मैथ्स, ग्रामर और सभी जरूरी सब्जेक्ट पढ़ाते हैं.

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लियो की दादी रामोना बताती हैं, ‘मेरा पोता बहुत लगनशील है. बारिश हो या सर्दी, वह कभी स्कूल मिस नहीं करता. हर दिन अपनी पढ़ाई पूरी कर के दूसरों को पढ़ाने जाता है. कभी देर हो जाती है तो रात को भी क्लासेज लेता है ताकि स्टूडेंट की पढ़ाई न छूटे.’

हिमशैल

‘‘अजय, अब केवल तुम्हारे लिए हम चाचाजी के परिवार को तो छोड़ नहीं सकते. उन्हें तो अपनी बेटी नेहा के विवाह में बुलाएंगे ही.’’

बड़े भाई विजय के पिघलते शीशे से ये शब्द अजय के कानों से होते हुए सीधे दिलोदिमाग तक पहुंच कर सारी कोमल भावनाओं को पत्थर सा जमाते चले गए थे, जो आज कई महीने बाद भी उन के पारिवारिक सौहार्द को पुनर्जीवित करने के प्रयास में शिलाखंड से राह रोके पड़ेथे.

आपसी भावनाओं के सम्मान से ही रिश्तों को जीवित रखा जा सकता है पर जब दूसरे का मान नगण्य और अपना हित ही सर्वोपरि हो जाए तो रिश्तों को बिखरते देर नहीं लगती. अजय ने अपने स्वाभिमान को दांव पर लगाने के बजाय संयुक्त परिवार से निर्वासन स्वीकार कर लिया था.

धीरेधीरे नेहा की गोदभराई की तिथि नजदीक आती जा रही थी पर दोनों भाइयों के बीच की स्थिति ज्यों की त्यों थी और जब आज सुबह से ही विजय के घर में लाउडस्पीकर पर ढोलक की थापों की आवाज रहरह कर कानों में गूंजने लगी तो अजय की पत्नी आरती न चाहते हुए भी पुरानी यादों में खो सी गई.

वक्त कितनी जल्दी बीत जाता है पता ही नहीं चलता. पता तब चलता है जब वह अपने पूरे वजूद के साथ सामने आता है. कल तक छोटी सी नेहा उस के आगेपीछे चाचीचाची कह कर भागती रहती थी. उस का कोई काम चाची के बिना पूरा ही नहीं होता था और आज वह एक नई जिंदगी शुरू करने जा रही है तो एक बार भी उसे अपनी चाची की याद नहीं आई. शायद अब भी उस की मां ने उसे रोक लिया हो पर एक फोन तो कर ही सकती थी…ऊंह, जब उन लोगों को ही उस की याद नहीं आती तो वह क्यों परेशान हो. उस ने सिर झटक कर पुरानी यादों को दूर करना चाहा, पर वे किसी हठी बालक की तरह आसपास ही मंडराती रहीं. उस ने ध्यान हटाने के लिए खुद को व्यस्त रखना चाहा पर वे शरारती बच्चे की तरह उंगली पकड़ कर उसे फिर अतीत में खींच ले गईं.

तीनों भाइयों, विजय, अजय व कमल में कितना प्यार था. उस के ससुर रायबहादुर पत्नी के न होने की कमी महसूस करते हुए भी उन के द्वारा लगाई फुलवारी को फलताफूलता देख खुशी से भर उठते थे. उच्चपदासीन बेटे, आज्ञाकारी बहुएं व पोतेपोतियों से भरेपूरे परिवार के मुखिया अपने छोटे भाई के परिवार को भी कम मान व प्यार नहीं देते थे. जो उसी शहर में कुछ ही दूरी पर रहते थे.

हर तीजत्योहार पर दोनों परिवार जब एकसाथ मिल कर खुशियां मनाते तो घर की रौनक ही अलग होती थी. उन के खानदानी आपसी प्यार का शहर के लोग उदाहरण दिया करते थे पर न तो समय सदैव एक सा रहता है और न ही एक हाथ की पांचों उंगलियां बराबर होती हैं.

रायबहादुर के छोटे भाई भी उन्हीं की तरह सज्जन थे परंतु कलेक्टर पति के पद के मद में डूबी उन की पत्नी जानेअनजाने अपने बच्चों में भी अहंकार भर बैठी थीं. पिता के पद का दुरुपयोग उन्हें घर में विलासिता व कालिज में यूनियन का नेता तो बना गया पर न तो पढ़ाई में अव्वल बना सका और न ही मानवीय मूल्यों की इज्जत करने वाला संस्कारशील स्वभाव दे सका. जीवन में आगे बढ़ने के अवसर, व्यर्थ के कामों में समय गंवा कर वे खुद ही अपना रास्ता अवरुद्ध करते गए. बीता समय तो लौट कर आता नहीं, आखिर मन मार कर उन्हें साधारण नौकरियों पर ही संतोष करना पड़ा.

संतान ही मांबाप का सिर गर्व से ऊंचा कराती है. जब कलेक्टर की बीवी अपने जेठ रायबहादुर के परिवार पर निगाह डालतीं तो अपने बच्चों के साधारण भविष्य का एहसास उन्हें मन ही मन कुंठित कर देता पर उन्होंने इसे कभी जाहिर नहीं होने दिया था. उन जैसे लोग अपने सुख से इतना सुखी नहीं होते जितना कि दूसरे के सुख से दुखी. उन के अंदर के ईर्ष्यालु भाव से अनजान रायबहादुर की दोनों बहुएं आरती व भारती, जो देवरानीजेठानी कम, बहनें ज्यादा लगती थीं, अपनी सास की कमी चचिया सास की निकटता पा कर भूल जाती थीं. यद्यपि विवाह के कुछ वर्ष बाद ही आरती को चचिया सास का वैमनस्य से भरा व्यवहार उलझन में डालने लगा था. चाचीजी अकसर उस के कामों में कोई न कोई कमी निकाल कर उसे शर्म्ंिदा करने का बहाना ढूंढ़ती रहती थीं और हर झिड़की के साथ वह यह जरूर कहती थीं, ‘अजय अपनी पसंद की लड़की ब्याह तो लाया है, देखते हैं कितना निभाती है. इतनी अच्छी लड़की बताई थी पर जरा कान नहीं दिया.’

अपनी बात न रखे जाने का मलाल वाणी से स्पष्ट झलकता था. शायद इसीलिए वह चाची की आंख में सदैव कांटा सी खटकती रही. चोट खाए अहं के कारण ही शायद चाची कभी किसी बात के लिए उस की प्रशंसा न कर सकीं. घर में शांति बनाए रखने के लिए व्यर्थ के वादविवाद में न पड़ कर, छोटीछोटी बातों को नजरअंदाज कर के वह उन के मनमुताबिक ही कर देती.

आरती जितनी झुकती गई उतना ही वे अजय व आरती के खिलाफ जहर घोलते हुए एक कूटनीति के तहत विजय व भारती के प्रति प्रेमप्रदर्शन करती गईं. दूध चाहे कितना ही शुद्ध क्यों न हो, विष की एक बूंद ही उसे विषैला बनाने के लिए काफी होती है. शुरू में तो भारती व आरती एकदूसरे का सुखदुख बांट लेती थीं पर विजय व भारती का चाची के परिवार के प्रति बढ़ता झुकाव, साथ ही अपने सगे भाई अजय व पिता की उपेक्षा से उन के आपसी रिश्तों में दूरियां आने लगीं.

अच्छाई से अधिक बुराई अपना असर जल्दी दिखाती है. उन के इस पक्षपातपूर्ण रवैए का असर घर के निर्मल वातावरण को भी दूषित करने लगा था. आपसी प्यार का स्थान प्रतिस्पर्धा ने ले लिया. चचिया सास के प्रपंच से अनजान उन की आंखों का तारा बनी भारती को भी अब अजय व आरती की हर बात में स्वार्थ ही नजर आता. उन के भले के लिए कही गई सही बात भी गलत लगती.

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कई कलाओं की जानकार आरती के पास जब जेठानी के बच्चे नेहा, नीतू व शिशिर अपने स्कूल की हस्तकला प्रतियोगिता के लिए वस्तुएं बनाना सीख रहे होते तो खुद को उपेक्षित समझ भारती इसे अपना अपमान समझती. अपने बच्चों का उन लोगों के प्रति स्नेह भी उसे आरती का षड्यंत्र ही लगता.

‘अब तो हर चीज बाजार में मिलती है, खरीद कर दे देना. समय क्यों खराब कर रहे हो तुम लोग, उठो यहां से और पढ़ने जाओ,’ कहती हुई भारती बच्चों को स्वयं कुछ करने या सीखने की प्रेरणा से विलग करती जा रही थी.

रायबहादुर घर में आए इस बदलाव को महसूस तो कर रहे थे पर कारण समझने में असमर्थ थे इसलिए केवल मूकदर्शक ही बन कर रह गए थे. इनसान बाहर के दुश्मनों से तो लड़ सकता है किंतु जब घर में ही कोई विभीषण हो तो कोई क्या करे. अपनों से धोखा खाना बेहद सरल है. कहते हैं कि औरत ही घर बनाती है और वही बिगाड़ती भी है. यदि परिवार में एक भी स्त्री गलत मंतव्य की आ जाए तो विनाश अवश्यंभावी है.

उम्र बढ़ने के साथसाथ आरती की चचिया सास के निरंकुश शासन का साम्राज्य भी बढ़ता रहा. इस बात का तकलीफदेह अनुभव तब हुआ जब चाचीजी के सौतेले भाई ने अपने बेटे के विवाह में बहन की नाराजगी के डर से अजय व रायबहादुर को विवाह का आमंत्रणपत्र ही नहीं भेजा. लोगों द्वारा उन के न आने का कारण पूछने पर उन का पैसों का अहंकार प्रचारित कर दिया गया. हालांकि चाचाजी ने इस का विरोध किया था किंतु तेजतर्रार चाची के सामने उन की आवाज नक्कारखाने में तूती बन कर रह गई थी.

मृतप्राय रिश्तों के ताबूत में आखिरी कील उन्होंने तब ठोंक दी जब अजय के बेटे अंशुल के जन्मदिन की पार्टी में रायबहादुर द्वारा सानुरोध सपरिवार आमंत्रित होेने के बाद भी केवल चाचाजी थोड़ी देर के लिए आ कर रस्म अदायगी कर गए. केवल लोकलाज के लिए रिश्तों को ढोते रहने का कोई अर्थ नहीं रह गया था. इसीलिए सगी भतीजी नेहा के विवाह आमंत्रण पर अजय ने साफ कह दिया कि यदि चाचाजी के परिवार को बुलाया गया तो हमारा परिवार नहीं जाएगा.

हमेशा की तरह बिना कारण पूछे विजय छूटते ही बोला, ‘अजय, तुम तो लड़ने का बहाना ढूंढ़ते रहते हो, इसीलिए सब तुम से दूर होते जा रहे हैं.’

‘अपने दूर क्यों हो रहे हैं, यह आप नहीं समझ सकते क्योंकि समझना ही नहीं चाहते. मैं न किसी से लड़ने जाता हूं और न अहंकारी हूं. हां, साफ कहने का माद्दा रखता हूं और गलत बात बरदाश्त नहीं करता. मुझे तो भाई आश्चर्य इस बात का है कि जब वे आप को गलत नहीं लगे तो मैं क्यों लग रहा हूं या तो आप को पूरी बातें पता ही नहीं हैं या मेरी इज्जत आप के लिए कोई माने नहीं रखती है. कोई हो या न हो पर पिताजी मेरे साथ हैं और यही मेरे लिए काफी है,’ अजय एक सांस में बोल गया.

‘तुम्हीं लोगों को शिकायतें रहती हैं. पिताजी तो मेरे यहां हर फंक्शन पर आते हैं और चाचाजी व अन्य सब से ठीक से बोलते भी हैं.’

‘संतान का मोह ही उन्हें खींच कर ले जाता है. संतान चाहे कितना भी दुख दे मांबाप का प्यार तो निस्वार्थ होता है. आप ने कभी उन का दर्द महसूस ही नहीं किया. रही बात चाचाजी से पिताजी के बोलने की, तो हम लोग उस स्तर तक असभ्य नहीं हो सकते कि कोई बात करे तो जवाब न दें या अपने घर फंक्शन पर बुला कर खाने तक के लिए न पूछें. क्या आप के लिए चाचाजी, सगे भाई व पिता की खुशी से भी ज्यादा बढ़ कर हैं?’

‘जो भी हो…पर अजय…अब केवल तुम्हारे लिए मैं चाचाजी के पूरे परिवार को तो नहीं छोड़ सकता. उन्हें तो अपनी बेटी नेहा के विवाह में बुलाऊंगा ही,’ विजय जैसे कुछ सुननेसमझने को तैयार ही न था.

‘तो ठीक है, हमें ही छोड़ दीजिए,’ भारी मन से कह अजय सब के बीच से उठ कर चला गया था. पर इस एक पल में अंदर कितना कुछ टूट गया, कौन जान सका. एक क्षण को विजय अपने ही शब्दों की चुभन से आहत हो उठा था. किंतु बंदूक से निकली गोली और मुंह से निकली बोली तो वापस नहीं हो सकती.

उस दिन का व्याप्त सन्नाटा आज तक नहीं टूट पाया था. तभी महरी की आवाज से आरती की तंद्रा भंग हो गई.

‘‘बीबीजी, आप नहीं जाएंगी नेहा बिटिया की गोदभराई पर?’’ आंखों में कुटिल भाव लिए पल्लू से हाथ पोंछती महरी ने पूछा था.

‘‘तुम्हें इस से क्या मतलब है…जाओ, अपना काम करो,’’ उस की चुगलखोरी की आदत से अच्छी तरह परिचित आरती ने उसे झिड़क दिया. वह मुंह बनाती हुई चली गई. आरती ने जा कर दरवाजा बंद कर लिया. मन की थकान से तन भी क्लांत हो उठा था. वह कुरसी पर अधलेटी सी आंखें बंद कर बैठ गई.

घर में फैले तनाव को भांप कर दोनों बच्चे अंशुल व आकांक्षा स्कूल से आ कर चुपचाप खाना खा कर अपने कमरे में पढ़ने का उपक्रम कर रहे थे. अजय के आने में देर थी. विजय का बेटा शिशिर जब बुलाने आया तो पिताजी न चाहते हुए भी उस के साथ नेहा की गोदभराई में चले गए थे. घर के एकांत में लाउडस्पीकर पर गानों की आवाज से ज्यादा पुरानी यादों की गूंज थीं.

आपसी रिश्तों में ख्ंिचाव व नया मकान बन जाने पर अजय अपने परिवार व पिता के साथ पुश्तैनी मकान, जिस में विजय का परिवार भी रहता था, छोड़ कर पास ही बने अपने नए बंगले में शिफ्ट हो गया था. दिलों में एकदूसरे के प्रति प्यार होते हुए भी न जाने कौन सी अदृश्य शक्ति उन के संबंधों को पुन: मधुर बनने से रोकती रही. स्थान की दूरी तो इनसान तय कर सकता है पर दिलों के फासले दूर करना इतना आसान नहीं है.

तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. अन्यमनस्क सी आरती ने उठ कर द्वार खोला तो सगे देवर कमल व उस की पत्नी पूजा को आया देख सुखद आश्चर्य से भर उठीं.

‘‘आइए, अंदर आइए, कमल भैया. पूजा…कब आए लंदन से?’’ अपनों से मिलने की प्रसन्नता आंखें नम कर गई.

‘‘भाभी, बस, अभी 2 घंटे पहले ही पहुंचे हैं. पर यह सब हम क्या सुन रहे हैं. आप लोग सगाई में शरीक नहीं होंगे?’’

अंदर आ कर कमल और पूजा ने आरती को पेर छूते हुए पूछा तो अनायास ही उस की आंखें भर आईं. पूजा को उठा कर गले से लगाती हुई बोली, ‘‘लोग तो अपने देश में रह कर भी आपसी सभ्यता व संस्कार याद नहीं रखते. तुम लोग विदेश जा कर भी भूले नहीं हो.’’

‘‘हां, भाभी, विदेश में सबकुछ मिलता है. हर चीज पैसों से खरीदी जा सकती है पर बड़ों का आशीर्वाद और प्यार बाजार में नहीं बिकता. सच, आप सब की वहां बहुत याद आती है. चलिए, तैयार हो जाइए. ऐसा भी कहीं हो सकता है, घर में शादी है और आप लोग यहां अकेले बैठे हैं,’’ पूजा मनुहार करती सी बोली.

आरती के चेहरे पर कई रंग आ कर चले गए. तभी अजय भी आ गए. बरसों बाद मिले सब एकदूसरे का सुखदुख बांटते रहे. आखिर, कमल के बहुत पूछने पर अजय ने उन को अपने न जाने की वजह बता दी.

‘‘यहां इतना कुछ हो गया और आप लोगों ने हमें कुछ बताया ही नहीं. उन सब की ज्यादतियों का हिसाब तो हम लोग ले ही लेंगे पर अभी तो आप लोग चलिए वरना हम भी नहीं जाएंगे और आप खुद को अकेला न समझें भैया. मैं हूं न आप के साथ,’’ कमल उत्तेजित हो कर बोला.

‘‘जहां इज्जत न हो वहां न जाना ही बेहतर है. यह हमारा अहंकार या जिद नहीं स्वाभिमान है. हद तो यह है कि चाचीजी के भाई सौतेले हो कर भी उन की गलत बात मान लेते हैं और हम अपने सगे भाइयों से सही बात मानने की आशा न रखें. वे मुझे ही गलत समझते हैं. और तो और पिताजी की इच्छा का भी उन के लिए कोई महत्त्व नहीं है,’’ उदासी अजय की आवाज से साफ झलक उठी थी. एक नजर सब पर डाल वह फिर कहने लगे, ‘‘इस निर्णय तक मुझे पहुंचने में तकलीफ तो बहुत हुई पर अब कोई दुख नहीं है. इसी बहाने मुझे अपने और बेगानों की पहचान तो हो गई.’’

‘‘हम लोगों के जाने न जाने से वहां किसी को क्या फर्क पड़ रहा है? एक बार भी किसी को इस परिवार की याद आई?’’ आरती कह ही रही थी कि…उस के कानों में नेहा के ये शब्द पड़े, ‘‘चाचीजी मुझे तो आप की बहुत याद आ रही थी…आना तो मैं बहुत पहले ही चाहती थी पर…बस…सोचती ही रह गई…अब तो जल्द ही मैं यह घर छोड़ कर चली जाऊंगी. मुझ से कैसी शिकायत?’’ नेहा की आवाज सुन कर सब चौंक कर दरवाजे की तरफदेखने लगे.

सितारों जड़ी गुलाबी साड़ी में सजी नेहा बेहद सुंदर लग रही थी. अचानक उसे यों अपनी छोटी बहन के साथ आया देख सब हतप्रभ रह गए थे.

‘‘पगली…तुझ से कैसी शिकायत. तुम तो हमारी बच्ची ही हो. पर तुम इस समय यहां…घर में तुम्हारी ससुराल वाले आते ही होंगे,’’ आरती ने प्यार से नेहा को अंदर ला कर सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

‘‘नहीं, चाचीजी, उन को बता कर आई हूं, सब आप लोगों का ही इंतजार कर रहे हैं. पापा अपने चाचाचाची को नहीं छोड़ सकते तो मैं भी अपने चाचाचाची को नहीं छोड़ सकती. जब तक आप लोग नहीं आएंगे, मैं भी गोदभराई पर नहीं बैठूंगी,’’ नेहा ने अपना निर्णय सुनाते हुए पास ही खड़े छोटे चचेरे भाईबहन को गले से लगा लिया, ‘‘और तुम भी तैयार हो जाओ. फेरों पर जीजाजी के जूते नहीं चुराओगी?’’

आकांक्षा व अंशुल आशा भरी नजरों से अजय व आरती को देखने लगे जो असमंजस में थे. तभी कमल उत्साहित हो कर बोल उठा, ‘‘ये हुई न बात. अब तो भैया आप को चलना ही होगा.’’

नेहा के प्यार व अपनत्व ने सब के दिलों को झकझोर दिया था. एकाएक नेहा कितनी समझदार व बड़ी लगने लगी थी. उस के आत्मविश्वास व प्यार भरे अधिकार ने एकबारगी सब को अभिभूत कर दिया था, कोई भी नफरत की दीवार अपनों के रिश्तों के प्यार से ज्यादा मजबूत नहीं होती, ढह ही जाती है. जरूरत केवल समय पर एक ईमानदार प्रयास करने की होती है. वर्षों तक हिमाच्छादित हिमखंड के अंदर बहते निर्मल जल के सोते जैसे अचानक राह मिलते ही बह निकलते हैं, यत्नपूर्वक अब तक रोके गए बहते आंसू ही उन के प्यार की अभिव्यक्ति बन गए थे.

‘‘हां, तुम लोगों को आना ही

होगा,’’ तभी दरवाजे से अंदर आते चाचाजी का स्वर सुनाई दिया, ‘‘जाने- अनजाने तुम लोगों के साथ बहुत अन्याय हुआ है. मुझे इस का दुख है. खैर, अब दिल में कुछ न रखो. यह सबकुछ ठीक नहीं हो रहा है. याद रखो. बंद मुट्ठी ही सवा लाख की होती है.’’

‘‘मुझे माफ कर दो, बहू,’’ चचिया सास पश्चात्ताप भरे स्वर में कह रही थीं, ‘‘नेहा ने मेरी आंखें खोल दी हैं. ईर्ष्या ने मुझे विवेकहीन बना दिया था…कहो तो मैं तुम दोनों के पैर भी…’’

सकपका कर आरती पीछे हट गई, ‘‘अरे, अरे, आप यह क्या कर रही हैं. आप तो हमारी बड़ी हैं.’’

‘‘हां, बड़ी तो हैं पर इन्हें बड़ों के फर्ज नहीं केवल अधिकार ही याद रहे,’’ पहली बार सब ने चाचाजी को गरजते सुना, ‘‘बड़प्पन बनाए रखने के लिए आचरण भी तो मर्यादित होना चाहिए.’’

चाचाजी के और अधिक उग्र क्रोध का लक्ष्य बनने से चाचीजी को बचाते हुए अजय बोला, ‘‘अब छोडि़ए भी, चाचाजी. पश्चात्ताप का एक आंसू ही सारे गिलेशिकवे दूर कर देता है. अपनी गलती का एहसास कर के क्षमाप्रार्थी होना ही सब से बड़ा बड़प्पन है. आप लोगों ने मेरे लिए इतना सोच लिया यही पर्याप्त है.’’

शाम का अंधेरा घिर आया था. कुरसी से जल्दी उठ कर उस ने स्विच आन किया तो कमरा दूधिया प्रकाश से नहा उठा. रात्रि के 9 बज रहे थे. बाहर शाम से चीख रहे लाउडस्पीकर शांत हो चुके थे. सपनों की दुनिया से यथार्थ के धरातल पर आने में उसे कुछ ही पल लगे थे. तब तक टेलीविजन देख रहे बच्चों ने दरवाजा खोल दिया था. अजय अंदर आते हुए उसे उनींदा सा देख पूछ रहे थे, ‘‘क्या हुआ…सो रही थीं?’’

‘‘हां…शायद झपकी सी आ गई थी…पर अब जाग गई हूं. आइए, खाना लगाती हूं.’’

रसोई की तरफ बढ़ती आरती सोच रही थी कि अवचेतन ने स्वप्न में उन की आशाओं को मूर्तरूप तो दे दिया था पर यथार्थ कितने कठोर होते हैं…बिलकुल हिमशैल की तरह जिस का केवल एकचौथाई भाग ही नजर आता है, शेष जलमग्न रहता है. जिंदगी स्लेट पर लिखी इबारत तो नहीं जिसे पसंद न आने पर मिटा कर पुन: लिख दें. यह तो अमिट शिलालेख है, जिसे चाहते न चाहते हुए भी हमें पढ़ना ही है.

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‘गुलाबो सिताबो’ में इस लुक में नजर आएंगे अमिताभ बच्चन

लखनऊ के महमूदाबाद हाउस में फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ की शूटिंग चल रही है. फिल्म की शूटिंग के लिये अभिनेता अमिताभ बच्चन अपने प्राइवेट प्लेन से लखनऊ आये हैं. 40 दिनो की फिल्म शूटिंग के लिये महमूदाबाद हाउस को बुक कराया गया है. महमूदाबाद हाउस राजधानी लखनऊ के कैसरबाग इलाके में है. जूही चतुर्वेदी की लिखी और शूजित सरकार के निर्देशन में बन रही फिल्म में अमिताभ बच्चन के साथ आयुष्मान खुराना भी फिल्म में है. इसके अलावा लखनऊ के कलाकारों को भी फिल्म में मौका दिया गया है.

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शूटिंग को पूरी तरह से गोपनीय रखने के लिये मीडिया को तो दूर रखा ही गया है और कलाकारों के मोबाइल फोन भी शूटिंग से पहले जमा करा लिये जाते हैं. जिससे शूटिंग के फोटो वायरल न हो सके. फिल्म अमिताभ बच्चन का किरदार बूढ़े आदमी का है. इस लुक की फोटो जब सोशल मीडिया पर वायरल हुई तो किरादार पर चर्चा होना शुरू हो गया. ऐसे किरदार के मेकअप के लिये विदेशों से मेकअप आर्टिस्ट भी बुलाये गये हैं.

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महमूदाबाद हाउस के अलावा फिल्म की शूटिंग अमीनाबाद, चैक, सिटी स्टेशन और हजरतगंज सहित पुराने लखनऊ के इलाके में होगी. फिल्म का ज्यादातर हिस्सा लखनऊ में ही शूट होगा. महमूदाबाद हाउस में इधर से उधर जाने के लिये अमिताभ बच्चन बैट्री रिक्शा का उपयोग करते हैं. इस फिल्म की कहानी लखनऊ में रहने वाले एक परिवार की कहानी है.

68 वर्ष की उम्र में अनुपम खेर सीख रहे हैं बौक्सिंग

फिल्म ‘‘सारांश’’ में 28 वर्ष की उम्र में 60 वर्ष के बूढ़े का किरदार निभाकर पहला फिल्मफेयर पुरस्कार  जीत लेने वाले अनुपम खेर अपने अब तक के 35 वर्ष के करियर में 515 बौलीवुड फिल्मों के अलावा कई  हौलीवुड फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुके हैं.

पद्मश्री व पद्मभूषण से सम्मानित अनुपम खेर इन दिनों अमरीकन सीरीज ‘‘न्यू अम्सर्टडम’’में भारतीय न्यूरोलौजिस्ट डाक्टर का किरदार निभाकर काफी चर्चा बटोर रहे हैं, तो दूसरी तरफ वें 68 वर्ष की उम्र में भी जितना चुस्त दुस्त नजर आते हैं. लोग उनकी भी प्रशंसा करते हैं. मगर हकीकत यह है कि बीच में अनुपम खेर थोड़े मोटे हो गए थे.

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मगर दो साल पहले उन्होंने अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देकर 14 किलो वजन घटाया. खुद अनुपम खेर बताते हैं- ‘‘मैंने पिछले दो वर्ष से अपने स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया है. मैं अब तांबे के बरतन में भरकर रखा गया पानी भी पीता हूं. एक्सरसाइज करता हूं, बौक्सिंग सीखा रहा हूं. मैंने दो वर्ष में अपना 14 किलो वजन कम किया है. मैं तो उन लोगों से प्रेरणा लेता हूं, जो कि दिव्यांग होते हुए भी एवरेस्ट फतह के लिए निकलते हैं.’’

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बजट फ्रेंडली शौपिंग के लिए परफेक्ट है दिल्ली की ये 5 जगहें

दिल्ली में एक से बढ़कर एक मार्केट्स हैं जो हर लड़की के लिए गो-टू-शौपिंग स्पोट्स हैं. यह मार्केट सस्ते होने के साथसाथ लेटेस्ट ट्रेंडी क्लोथ्स, फुटवियर, ज्वेलरी और हैंडीक्राफ्ट्स का अड्डा हैं. यहां शहर में रहने वाली लड़कियां ही नहीं बल्कि दूर देश से आये टूरिस्ट्स भी शौपिंग का मजा उठाते हैं. तो चलिए, जानें ऐसी ही कुछ बजट फ्रेंडली मार्केट्स के बारे में.

सरोजिनी नगर

दिल्ली के सबसे बड़े और सस्ते मार्केट्स में से एक सरोजिनी नगर में बड़े बड़े ब्रांड्स के कपड़े भी 100 और 200 रूपये में मिलते हैं. यहां हर दिन लोगों का जमावड़ा लगा रहता है. दुकानों और सड़कों पर लगे कपड़ो, जूतों, बैग्स, ज्वेलरी इत्यादि के ढेर किसी हाथ लगे खजाने से कम नहीं हैं.

लोकेशन – सरोजिनी नगर मेट्रो स्टेशन

ओपन – सोमवार को छोड़कर हर दिन

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जनपथ

खूबसूरत साजसज्जा के सामान और ट्रेंडी फैशनेबल चीज़ों से भरा यह मार्केट दिल्ली का पौपुलर मार्केट है. यहां स्कार्फ़, टौप्स, इयररिंग और बैग्स हर लड़की का ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं. हालाँकि, यहां सस्ती शौपिंग करने के लिए आप की बार्गेनिंग स्किल्स का अच्छा होना बेहद जरूरी है.

लोकेशन – जनपथ मेट्रो स्टेशन

ओपन – हर दिन.

पालिका बाजार

कनाट प्लेस में स्थित यह एक फुल्ली एयरकंडीशनर अंडरग्राउंड मार्केट है. यहां कपड़े, जूते, घड़ी, ज्वेलरी और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की भरमार है. इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स जैसे फ़ोन, वीडियो गेम्स, सौफ्टवेयर इत्यादि सस्ते दामों में मिल जाते हैं. वीडियो गेम लवर्स के लिए तो यह मस्ट विजिट स्पौट है.

लोकेशन – राजीव चौक मेट्रो स्टेशन

ओपन – हर दिन

चांदनी चौक

चांदनी चौक में शौपिंग करने का मजा ही कुछ और है. चांदनी चौक दिल्ली के सबसे भीड़भाड़ वाला और सबसे पुराना मार्केट है. शादी के कपड़े और एक्सेसरीज खरीदने के लिए यह मार्केट बेस्ट है. यहां बौलीवुड के हू ब हू लहंगे सस्ते दामों में मिल जाते हैं. छोटी छोटी तंग गलियों में बनी दुकाने एक से एक डिज़ाइनर क्लोथिंग का भण्डार हैं.

लोकेशन – चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन

ओपन – रविवार छोड़कर हर दिन खुला

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लाजपत नगर

सेंट्रल मार्केट जिसे लाजपत नगर मार्केट भी कहते हैं बजट फ्रेंडली मार्केट है. यहां छोटी दुकानें और स्टाल्स स्टाइलिश कुर्ते , टौप्स, बुक्स, वाल हैंगिंग्स आदि से लबालब रहते हैं. अगर आपकी बार्गेनिंग स्किल्स अच्छी हो तो आप 1000 रूपये में दो तीन थैले भरकर तो शौपिंग कर ही लेंगे.

लोकेशन – लाजपत नगर मेट्रो स्टेशन

ओपन – सोमवार छोड़कर कर हर दिन

अमृतसरी छोले रेसिपी

सामग्री

छोले (500 ग्राम, भिगोकर रखे)

4 प्याज (बारीक कटा हुआ)

काली इलायची (10)

सूखा आम पाउडर (2 चम्मच)

लहसुन का पेस्ट (3 चम्मच)

नमक (स्वादानुसार)

हरा धनिया (बारिक कटी हुई)

पिसा हुआ जीरा (3 चम्मच)

गरम मसाला पाउडर (2 टेबल स्पून)

धनिया पाउडर (4 बड़ा चम्मच)

टी बैग (6)

कटा हुआ टमाटर

अनार के दाने (4 चम्मच)

अदरक का पेस्ट (3 चम्मच)

हरी मिर्च (6)

घी (4 चम्मच)

लाल मिर्च (2 बड़े चम्मच)

पिसी हुई हल्दी (2 चम्मच)

तेज पत्ता (4)

पानी (6 कप)

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बनाने की वि​धि

सबसे पहले भिगोए हुए छोले को पानी से निकाल लें, अब एक गहरे पैन में छोले डालें. इसमें पानी, टी बैग और इलायची को डालें.

अब इसे मध्यम आंच पर रखें और 30 से 40 मिनट तक उबालें. इसे तब तक पकाएं जब तक कि यह छोले नरम न हो जाएं.

छोले को पानी से बाहर निकाल लें. टी बैग्स और इलायची को पानी में ही रहने दें.

आम के पाउडर, अदरक लहसुन के पेस्ट, हरी मिर्च, नमक, धनिया पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, हल्दी पाउडर और गरम मसाला पाउडर को एक ब्लेंडर में मिलाएं.

इन सभी सामग्रियों लगभग 1 से 1/2 कप पानी डालें और एक चिकना पेस्ट बना लें.

फिर मध्यम आंच पर एक पैन गर्म करें. इसमें छोले और पिसा हुआ पेस्ट को डालें और अच्छी तरह मिलाएं और अब इसे एक तरफ रख दें.

एक छोटे फ्राइंग पैन में घी गरम करें, प्याज और तेज पत्त को डालकर कुछ देर पकाएं. अब इसमें टमाटर डालकर अच्छे से भूनें और थोड़ा पानी डालकर इसमें छोले को डाल दें.

छोले की ग्रेवी में कम पानी होने तक पकाएं. थोड़ा कटा हुआ प्याज और धनिया पत्ती से गार्निश करें और चावल, रोटी या नान के साथ गर्मा गर्म सर्व करें.

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अपनी स्किन के हिसाब से ऐसे चुनें सही क्रीम

डर्मेटोलौजिस्ट स्किनकेयर स्पेशलिस्ट की एक शोध से यह पता चला है कि 88 फीसदी महिलाओं को पता नहीं होता कि उनकी स्किन के लिए कौन सा प्रौडक्ट सही है और कौन सा गलत. अधिकतर महिलाएं कोई भी क्रीम खरीदकर उसे यूज करने लगती हैं. तो आइए जानते है, सही क्रीम का चुनाव कैसे करें.

BB क्रीम को ब्यूटी बाम या ब्लेमिश बाम कहा जाता है. चेहरे के दाग-धब्बे छिपाने का काम यह काफी अच्छे से करती है. ब्यूटी एक्सपर्ट कहते हैं कि बीबी क्रीम स्किन को कई तरह से फायदा देती है. ये केवल आपकी स्किन को सौफ्ट ही नहीं बनाती,  बल्कि स्किन के मौइश्चराइजर और शाइनिंग को बरकरार रखते हुए धूप से आपकी स्किन को सेफ रखती है. बीबी क्रीम में मौइश्चराइजर और फाउंडेशन के दोनों फायदे होते हैं.

जब आप इसे लगाकर मेकअप करती हैं, तो फेस पर शाइनिंग तो आती ही है, वहीं यह मेकअप लंबे समय तक चेहरे पर टिका भी रहता है. वह बताती हैं कि यह क्रीम प्राइमर, मौइश्चराइजर, फाउंडेशन, स्कीन ट्रीटमेंट, कंसीलर और सनस्क्रीन का काम एक साथ करती है. बीबी क्रीम में सिलिकन और सिलिका होती है, जिससे आपकी स्किन सौफ्ट और स्पौट फ्री रहती है. अगर आप चाहती हैं कि आपकी क्रीम लंबे समय तक टिकी रहे तो सेटिंग पाउडर लगाएं. अगर आपकी स्किन पर काफी कील-मुंहासे हैं या आपकी औइली स्किन है, तो बीबी क्रीम का इस्तेमाल न करें.

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एक स्टडी के मुताबिक, बीबी क्रीम विटामिन सी, ई, ए और पेप्टाइड्स एंटी एजिंग का काम करती है. इसमें मल्टीपल न्यूट्रिशंस होते हैं, जिससे आपकी स्किन को कई तरह से फायदे मिलते हैं.

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सीसी क्रीम को बीबी क्रीम का लाइट वर्जन कहा जाता है. सीसी क्रीम आपके कलर को फेयर करती है. सीसी क्रीम में बीबी क्रीम के सारे गुण होते हैं. सीसी क्रीम की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि यह कलर करैक्टर होती है. यह आपकी स्किन टोन को निखारती है. सीसी क्रीम आपके चेहरे की इस समस्या को दूर करते हुए चेहरे की रंगत को एक समान बनाने का काम करती है. यह क्रीम चेहरे की लालिमा को भी छुपा लेती है.

कील-मुंहासे हैं तो न लगाएं सीसी क्रीम

अगर आपके चेहरे पर काफी कील-मुंहासे हैं, तो सीसी क्रीम आपके लिए बेस्ट है. स्टडी की मानें, तो ड्राई, रेड या चेहरे पर डार्क स्पौट हैं, तो सीसी क्रीम आपके लिए बेहद फायदेमंद है. आप सीसी या बीबी क्रीम में से सिर्फ एक ही क्रीम का इस्तेमाल करें. ऐसा बिल्कुल न करें कि पहले बीबी क्रीम लगा लें और उसके बाद सीसी क्रीम. अगर आपकी काफी ड्राई स्किन है तो ये क्रीम लगाने से पहले मौश्चराइजर जरूर लगा लें.

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करियर और प्यार के बीच कैसे बिठाएं तालमेल, जानें यहां

जीवन में खुश रहने के लिए जितना करियर जरूरी है उतना ही प्यार. अगर आप करियर में सफल है तो प्यार के बिना आप अधूरा महसूस करते हैं. और आप प्यार में हैं तो बिना करियर के आप परफेक्ट नहीं है. जीवन में दोनो का काफी महत्व है. पर कई बार आपके लिए प्‍यार और करियर में तालमेल बिठाना बेहद मुश्किल लगता है. और कभी आपके सामने ऐसी स्थिती आती है, जिसमें आपको प्यार और करियर दोनो में से कोई एक चुनना पड़ता है. ऐसे में आपके रिश्ते में दरार भी पड़ सकती  है. तो आइए जानते हैं, इस परेशानी का समाधान कैसे करें.

बात करने का समय निकालें

आप जब भी कहीं बाहर या औफिस में होते हैं, तो अपने पार्टनर को 2 मिनट के लिए ही सही लेकिन फोन या मैसेज करके बात जरूर करें कई दफा आप काम के दबाव या किसी अन्‍य कारण अपने पार्टनर को इग्‍नोर कर देते हैं. ऐसा करने से भी रिश्‍ते में दूरियां आ सकती हैं. इससे दोनों को एक दूसरे के बारे में जानकारी होगी और मन में ऐसा एहसास होगा कि आपके पार्टनर को या उनको आपकी फिक्र है.

एक-दूसरे के दोस्‍त बनें

रिश्‍ते में प्‍यार और मिठास के लिए जरूरी है अच्‍छी बौडिंग. यदि आप दोनों के बीच अच्‍छी दोस्‍ती है और आप एक-दूसरे के अच्‍छे दोस्‍त बनने व पार्टनर को समझने की कोशिश करते हैं, तो आपका रिश्‍ता मजबूत होता है. आप अपने पार्टनर से औफिस के काम के बोझ से लेकर हंसी मजाक तक की बातों को भी साझा करें. इससे आपके पार्टनर आपको समझेगा और सर्पोट करेगा.

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काम में मदद करें

यदि कभी आपके पार्टनर पर काम का बोझ ज्‍यादा है, तो आप उनकी मदद करें. यदि आपके पार्टनर के पास समय नहीं है या वो व्‍यस्‍त हैं और आप उनकी मदद करते हैं, तो इससे उनके मन में आपके प्रति सम्‍मान और अधिक बढ़ जाता है. ऐसा करने से आपके प्‍यार और करियर दोनों चीजों के बीच तालमेल बना रहेगा. आपका काम आपके रिश्‍ते और रिश्‍ता काम के बीच आड़े नहीं आएगा.

अपनी बातें जबदस्‍ती मनवाने की कोशिश न करें

रिश्‍ते में सबसे जरूरी बात है कि आप अपने पार्टनर को स्‍वतंत्रता दें. यानि अपने पार्टनर को उसके मन का काम करने दें, उन पर कभी भी जबरदस्‍ती कोई बात न थोपें. ऐसा करने से आपके रिश्‍ते में कड़वाहट और दूरी पैदा होती है.

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फंसते फंसाते: कमजोर पटकथा व निर्देशन

रेटिंग: दो स्टार

निर्माताः चारू सुमित गर्ग और अमित अग्रवाल

निर्देशकः अमित अग्रवाल

कलाकारः  अर्पित चैधरी, कश्मिा शर्मा, नचिकेत नार्वेकर, अमिताभ श्रीवास्तव, राजेश जैस, वी एम वडोला, नीता मोहिंद्रा, शारीब हाशमी, तरनजीत कौर, आशु शर्मा व अन्य.

हास्य प्रधान फिल्म में एक परंपरागत परिवार का बेटा लंदन से आयी लड़की के प्रेम जाल में फंसकर उसके साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रहा है. आधुनिकता के रंग रंगा बेटा अपने माता पिता से सच नहीं बोलता. धीरे धीरे वह अपने इस झूठ में फंसता चला जाता है. पहली बार निर्देशक बने अमित अग्रवाल ने आधुनिकता की अंधी दौड़ में भाग रहे युवा पीढ़ी से जुड़े एक बेहतरीन विषय को उठाया, मगर वह विषयवस्तु के साथ न्याय कर पाने में बुरी तरह से असफल रहे हैं.

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कहानीः

फिल्म की कहानी आकाश (अप्रित चैधरी) और उसके परिवार के इर्द गिर्द घूमती है. दिवाली के दिन आकाश का पूरा परिवार उसका इंतजार कर रहा है कि आकाश आए और पूजा शुरू हो. पर उस वक्त आकाश अपनी दोस्त अनीशा (करिश्मा शर्मा), जिसके साथ बिना परिवार वालों को बताए वह ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रह रहा है, इसके साथ रंग रेलियां मना रहा होता है. इधर पारिवारिक पंडित(वी एम वडोला) आकाश की कुंडली देखकर कह देते हैं कि आकाश की शादी दो माह के अंदर होनी अनिवार्य है. इधर आकाश के माता पिता चाहते हैं कि आकाश जल्दी से जल्दी शादी कर ले. पर आकाश तो अनीशा के साथ जिंदगी के मजे ले रहा है. उसने अनीशा का साथ पाने के लिए अनीशा से झूठा बोला है कि वह अनाथ है. दोनों खुश हैं. किसी का किसी के साथ कोई कमिटमेंट नहीं है. परिवार की तरफ से दबाव बढ़ने पर आकाश सोचता है कि किसी अंजान लड़की से शादी करके जिंदगी बिताना मुश्किल हो सकता है. कम से कम अनीशा को जानता हूं, तो अनीशा से शादी कर लेता हूं. पर अनीशा तो एकदम मौर्डन लड़की है.वह स्वतंत्र जिंदगी जीना चाहती है.लेकिन वह चरित्रहीन नही है. जब आकाश उसके सामने षादी का प्रस्ताव रखता है, पर अनीशा शादी करने की बजाय जैसी स्वछंद जिंदगी चल रही है, उसी में खुश रहना चाहती है. इससे आकाश परेशान हो जाता है.

Arpit-Chaudhary

तभी कहानी में जबरदस्त मोड़ आता है. अनीषा किराए का मकान खोजते हुए आकाश को अपना पति बताकर आकाश के माता पिता के ही घर में किराएदार बन जाती है. अब आकाशा लंदन में रह रहे अपने दोस्त देव (नचिकेत नार्वेकर) से मदद मांगता है. देव गाजियाबाद आता है और अनीशा का पति आकाश और उसका दोस्त बनकर आकाश के माता पिता से मिलता है. उसके बाद एक नया ड्रामा खड़ा हो जाता है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः अनीशा व आकाश की शादी हो जाती है.

लेखन व निर्देशनः

साफ सुथरी पारिवारिक हास्य फिल्म होते हुए भी कमजोर पटकथा व निर्देान के चलते फिल्म पूरे समय तक बांधकर नहीं रह पाती. मगर फिल्म बीच बीच में दर्शकों का मनोरंजन करती है. यानी कि यह फिल्म सीरियल की तरह है, जिसके कुछ एपीसोड/दृश्य अच्छे बन पड़े हैं. फिल्म का क्लायमेक्स फिल्म का बंटाधार कर देता है. क्लायमेक्स पर मेहनत करने की जरुरत थी. फिल्मकार ने ‘लिव इन रिलेषनशिप’ का मुद्दा उठाया, पर बहुत ही सतही रहा.

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अभिनयः

अर्पित चैधरी ,करिश्मा शर्मा और मशहूर निर्देशक एन चंद्रा के बेटे नचिकेत नार्वेकर अपने अभिनय से बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं जगाते हैं. शारीब हाशमी की प्रतिभा को जाया किया गया है.

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