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मानसून में ऐसा हो आपका वेडिंग मेकअप

हर दुलहन की चाहत होती है कि शादी के दिन वह किसी अप्सरा की तरह सुंदर दिखे ताकि पति की नजर उस के चेहरे से हट ही न पाए. आखिर यही तो वह दिन है जिस के लिए हर लड़की बड़े अरमानों से सपने बुनती है. मगर इस दिन वह कितनी गौरजियस लगेगी, यह डिपैंड करता है मेक अप पर. ब्राइडल मेकअप के लिए पहले से ही तैयारी शुरू हो जाती है. शादी वाले दिन कैमरा टिका होता है, तो बस दुलहन पर.

इस दिन लड़की का ऐसा मेकअप होता है, जैसा उस ने अपने अविवाहित जीवन में कभी नहीं किया होता. इसलिए ब्राइडल मेकअप बहुत खास होता है. दुलहन के रूप में कोई कैसी दिखेगी, इस का बहुत क्रेज होता है. लेकिन यह जरूरी है कि मेकअप ऐसा हो, जो दुलहन के रूप में चार चांद लगा दे और यह तभी संभव हो पाएगा, जब मेकअप होगा मौसम के अनुसार.

दरअसल, हमारी त्वचा मौसम के अनुसार देखभाल मांगती है, जैसे सर्दियों में कोल्डक्रीम लगाई जाती है, तो गरमियों में सनस्क्रीन लोशन. जब रोजमर्रा की चीजों में बदलाव लाया जाता है, तो ऐसे में ब्राइडल मेकअप का बदलते मौसम के अनुसार होना बहुत माने रखता है. थोड़ी सी लापरवाही से जिंदगी का यह सब से हसीन दिन अधूरापन छोड़ जाता है.

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मानसून की दुलहन

अनीशा अपना अनुभव बताती हुई कहती है, ‘‘मेरी शादी 20 जुलाई को थी और उस दिन सुबह से ही बरसात शुरू हो गई थी. मानसून के चलते हम ने वैन्यू तो कवर्ड एरिया में ही बुक करवाया था, पर मेरा मूड सुबह से ही खराब हो गया था. मुझे चिंता अपने लुक की थी. मैं ने अपने पार्लर में बातचीत की तो उन्होंने कहा कि तुम बिलकुल चिंता मत करो, हम तुम्हारा मेकअप बारिश की परेशानियों को ध्यान में रख कर ही करेंगे, जो कंफर्टेबल रहेगा. मेरा वाटरप्रूफ मेकअप किया गया, जिस से मैं परेशानी से बच गई. यहां तक कि विदाई में रोते समय भी मेरा मेकअप बरकरार रहा.’’ वहीं दीपिका का अनुभव इस मामले में बहुत बुरा रहा. उस की शादी भी जुलाई माह की थी और वह तैयार हो कर जैसे ही मंडप में पहुंची, कुछ देर बाद बरसात शुरू हो गई और धीरेधीरे उस के चेहरे की क ांति जाने लगी. लिपस्टिक, आईलाइनर फैलने लगे. इसे बारबार ठीक करना आसान नहीं था. जैसेजैसे समय बीतता गया मेकअप हटता गया, जिस के कारण तसवीरें भी अच्छी नहीं आईं. इस खास दिन के लिए उस के ढेरों अरमान थे. इतने पैसे भी खर्च किए, लेकिन क्या फायदा? पूरा ओकेजन ऐसे ही खराब हो गया. मानसून में चाहे आप की शादी वाले दिन कैसा भी मौसम हो, लेकिन मेकअप मानसून के अनुसार ही करवाएं, क्योंकि ऐसे समय में बारिश कभी भी हो सकती है.

वाटरप्रूफ मेकअप

ब्यूटी ऐक्स्पर्ट आशमीन मुंजाल बताती हैं कि मानसून में बारिश और उमस से बचने के लिए नौर्मल मेकअप ठीक नहीं रहता. मानसून में अकसर बारिश की संभावना रहती है. ऐसे में जरूरी है कि मेकअप वाटरप्रूफ हो. वाटरप्रूफ मेकअप बारिश के मौसम में भी खराब नहीं होता. बाजार में वाटरप्रूफ प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं, जो इस मौसम में पानी के साथ बहते नहीं, जैसे वाटरप्रूफ मसकारा, वाटरप्रूफ आईलाइनर, वाटर रैजिस्टैंट लिपस्टिक व वाटरप्रूफ फाउंडेशन. अत: इन का ही प्रयोग करें.

सिलिकन मेकअप

सिलिकन बेस मेकअप खास मानसून के लिए लाभकारी रहता है. यह त्वचा में पूरी तरह समा कर उस पर एक परत बना लेता है, जिस से मेकअप लौक हो जाता है. प्राइमर के तौर पर सिलिकन बेस्ड फाउंडेशन का प्रयोग करना चाहिए.

एअरब्रश मेकअप

यह मेकअप की आधुनिक तकनीक है, जिसे एअरब्रश तकनीक से किया जाता है. लाइटवेट होने के कारण यह मेकअप सुविधाजनक है और त्वचा को मानसून में होने वाली नमी से बचाता है. इस मौसम में यह अच्छा मेकअप माना जाता है.

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मिनरल मेकअप

इस मेकअप की खास बात यह है कि यह पूरी तरह वाटरप्रूफ तो होता ही है, त्वचा पर मेकअप को लौक भी कर देता है और त्वचा के लिए हैल्दी भी होता है. इस से त्वचा फ्रैश और खिलीखिली दिखती है. फिल्मों में बीच पर की जाने वाली शूटिंग के दौरान यही मेकअप किया जाता है, जो पानी के बीच में रहने पर भी बरकरार रहता है. इसे जब तक स्वयं रिमूव न किया जाए, यह ज्यों का त्यों रहता है.

मानसून कलर कौंबिनेशन

आशमीन मुंजाल सुझाव देती हैं कि मानसून ब्राइडल मेकअप में खिलेखिले रंगों का इस्तेमाल करना चाहिए, जो हैपी और फ्रैश लुक दें. रात की वैडिंग हो तो लिपस्टिक के लिए रूबी रैड, मजेंटा कलर फबता है, तो दिन के समय बार्बी पिंक, मौव कलर. वहीं आईशैडो के लिए सी ग्रीन के साथ गोल्ड और रस्ट कलर का कौंबिनेशन और ब्राइट औरेंज या पिंक कलर भी इस मौसम में अच्छी लगती है. पीकौक कलर तो मानसून के मौसम में खासतौर से इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि वह देखने में फ्रैश लगता है.

जानकारी: सूंघने की क्षमता का कमाल

पर्किंसन एक गंभीर बीमारी है और इसका सटीक इलाज भी नहीं है. पर्किंसन में इंसान अपनी याद्दाश्त खो देता है और खुद को या दूसरों को पहचानने की क्षमता भी. लेकिन स्कौटलैंड के पर्थ की रहने वाली एक महिला जूली ने अपनी सूंघने की विशेष क्षमता से वैज्ञानिकों को पर्किंसन रोग का पता लगाने और इलाज करने के लिए एक नया टूल दे दिया है. 68 साल की जूली रिटायर्ड नर्स हैं. उन के पति 45 साल की उम्र में पर्किंसन का शिकार हो गए थे. तब जूली ने पति के शरीर से आने वाली एक खास गंध को महसूस किया था.

पति की मृत्यु के 12 साल बाद तक जूली को पता ही नहीं था कि उस में पर्किंसन को सूंघने की क्षमता है. लेकिन कुछ साल पहले वह पर्किंसन से पीडि़त लोगों के एक ग्रुप से मिलीं.  इन सभी में उन्होंने वह खास गंध महसूस की, जिसे वह पति के शरीर में महसूस करती थीं.

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जूली ने इस संबंध में पर्किंसन पर शोध कर रहे लोगों से चर्चा की तो उन्होंने जूली की इस क्षमता को जांचने का फैसला किया. इस के लिए उन्होंने दर्जनों पर्किंसन पीडि़त और सामान्य लोगों की शर्टों को सूंघने के लिए जूली को दिया.

शोधकर्ता तब हैरान रह गए जब जूली ने पर्किंसन पीडि़त और सामान्य लोगों की शर्टें अलगअलग कर दीं. उन में एक शर्ट सामान्य युवक की थी, जिसे जूली ने पर्किंसन पीडि़त बताया था. इस के 8 महीने बाद जांच में पता चला कि वह युवक पर्किंसन से पीडि़त है.

रिसर्च में पता चला कि जूली मरीज के सीबम को सूंघने की क्षमता रखती हैं, जो एक तरह से मोम जैसा पदार्थ होता है. यह त्वचा को नम रखने के साथसाथ उस का बचाव भी करता है. विशेषकर माथे और कमर के ऊपरी हिस्से में. इस का अत्यधिक मात्रा में निकलना पर्किंसन का लक्षण है. शोधकर्ताओं ने जूली की मदद से उस खास बायोमार्कर को पहचान लिया.

यूके में पर्किंसन अनुसंधान केंद्र के उपनिदेशक प्रोफेसर डेविड डेक्सटर का कहना है कि जूली की इस शानदार क्षमता से पर्किंसन पीडि़तों के इलाज के लिए एक क्रांतिकारी आविष्कार किया जा रहा है.

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समाजवादियों को बेचैन कर रही अखिलेश की चुप्पी

सपा-बसपा गठबंधन को लेकर मायावती पूरी तरह से मुखर हैं और लगातार हमले कर लोकसभा चुनाव में हार के लिये सपा को जिम्मेदार ठहरा रही है. दूसरी तरफ सपा नेता अखिलेश यादव पूरी तरह से चुप्पी साधे हैं. अखिलेश की चुप्पी समाजवादी पार्टी और नेताओं पर भारी पड़ रही है. उनको यह समझ नही आ रहा कि बसपा के साथ संबंधों को लेकर जमीनी स्तर पर कैसे निपटे. बसपा के साथ ऊहापोह की यह हालत अखिलेश यादव के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगा रही है.

बसपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में मायावती ने अपने कार्यकर्ताओं को सपा के संबंध में साफ जानकारी दे दी है. मायावती ने यह साफ कर दिया है कि बसपा आने वाले समय में सारे चुनाव अकेले लड़ेगी. मायावती ने यह भी बता दिया है कि सपा के गठबंधन से बसपा को लोकसभा चुनाव में कोई लाभ नहीं हुआ. मायावती ने इसके पूरे तर्क भी दिये हैं. मायावती ने कहा कि भाजपा को हराने के लिये बसपा ने सपा के साथ तमाम पुराने विवाद भुलाकर गठबंधन किया.

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मायावती ने तर्क दिया कि 2012 में सपा सरकार के समय बसपा विरोधी, दलित विरोधी काम किये. प्रमोशन में आरक्षण बड़ा कारण था. इसके अलावा दलितों के साथ वैमनस्य पूर्ण कार्य हुये. इसके बाद भी बसपा ने अपने विरोध को दरकिनार करके देश हित में सपा के साथ मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा.

मायावती ने सपा-बसपा संबंधों के खत्म होने का जिम्मेदार भी सपा को ही ठहराया. मायावती ने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद सपा का व्यवहार बदला हुआ है. सपा के इस व्यवहार से साफ है कि इस तरह के काम से भाजपा को हरा पाना संभव नहीं है. इसलिए पार्टी और मूवमेंट के हित में बसपा आगे होने वाले सभी छोटे-बड़े चुनाव अपने बलबूते पर लड़ेगी.

मायावती ने अपनी तरफ से सपा-बसपा गठबंधन को लेकर हालत साफ कर दी है पर अखिलेश यादव की तरफ से इस बारे में अपनी पार्टी के लोगों को कोई संदेश नहीं दिया जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि लोकसभा चुनाव में हार के बाद सपा में अखिलेश विरोधी खेमा फिर से सक्रिय है. जो बारबार यह दवाब बना रहा है कि सपा से अलग हुए समाजवादी नेताओं को पार्टी में वापस लाया जाये. अखिलेश अभी कोई भी फैसला नहीं ले पाये हैं.

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लंच डेट अपनी गर्लफ्रेंड के साथ पहुंचे वरूण धवन

बौलीवुड अभिनेता वरुण धवन अपनी गर्लफ्रेंड नताशा दलाल के साथ मुंबई में लंच डेट पर गए, इस दौरान पैपराजी फोटो के लिए चिल्लाते रहे, लेकिन वरुण वहां से चुपचाप निकल गए. इस दौरान उनकी गर्लफ्रेंड नताशा दलाल भी उनके साथ थीं.

वरुण एक काले रंग के ट्रैक पैंट और एक हरे रंग की टी-शर्ट जिसके पीछे ‘पारडन माई फ्रेंच’ स्लोगन लिखा हुआ था और एक कैप में नजर आए, जबकि नताशा स्कर्ट और सफेद टी-शर्ट और खुले बालों में नजर आईं.

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पिछले कुछ समय से वरुण नताशा के साथ रिलेशनशिप में हैं, लेकिन अपनी निजी जिंदगी को वह अकसर छिपाकर रखते हैं. हाल ही में उन्होंने नताशा संग अपने रिश्ते के बारे में बात की थी. इन दोनों को अकसर ही साथ में देखा जाता है और दोनों सोशल मीडिया पर भी एक-दूसरे से प्यार जताते हुए देखे जाते हैं. नताशा और वरुण अक्सर लंच डेट और पार्टियों में साथ नजर आते रहते हैं.

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‘कसौटी जिंदगी के’ में जल्द नहीं लौटेंगी कोमोलिका…

स्टार प्लस के सीरियल ‘कसौटी जिंदगी के’ में इन दिनों भंयकर ड्रामा चल रहा है. मिस्टर बजाज की एंट्री के साथ ही इस सीरियल में इसी हफ्ते कई धमाकेदार ट्विस्ट आ चुका है. मिस्टर बजाज का नाम सुनते ही अनुराग को किसी ना किसी अनहोनी के होने की आशंका रहती है.

वहीं खबर ये आ रही थी कि हिना खान भी जल्द ही इस सीरियल में वापसी कर सकती है. कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हिना इस सीरियल की शूटिंग जुलाई महीने से शुरु कर देंगी.

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पर खबर अब ये है कि हिना इस सीरियल में पांच महीने तक नहीं ही लौटने वाली है. ये खुलासा खुद हिना ने किया हैं. हाल ही में हिना ने ट्विटर पर #AskHina सेशन के दौरान अपने फैंस के साथ खूब बातें की. इस दौरान हिना ने अपने अपकमिंग प्रोजेक्ट्स से लेकर अपनी जिंदगी से जुड़ी तमाम चीजों के बारे में फैंस को जानकारी दी.

जब एक फैन ने हिना से पूछा कि वह कसौटी जिंदगी के में कब लौट रही हैं तो हिना ने चौंकाने वाला जवाब दिया. हिना का कहना था कि अभी के लिए मैं अपने कमिटमेंट्स में काफी व्यस्त हूं. अभी तो कुछ भी कह पाना मुश्किल है. मैं नवम्बर तक व्यस्त हूं.

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आपको बता दें, हिना जल्द ही बड़े पर्दे पर एंट्री करने वाली है,  जिस वजह से उन्होंने एकता की परमिशन पर कसौटी से कुछ महीनों का ब्रेक ले लिया है. हाल ही में हिना ने अपनी दो फिल्मों की शूटिंग पूरी की. इसी बीच ये भी खबर आ रही है कि वह नागिन के चौथे सीजन में भी नजर आ सकती हैं.

बसपा चली परिवारवाद की ओर…

असमंजस में किया गया कोई भी फैसला राजनीति में सही परिणाम नहीं देता है. बसपा के लिये मायावती के फैसले असमंजस भरे है. पार्टी में परिवारवाद का विरोध करते करते मायावती ने पार्टी को परिवारवाद के हवाले कर दिया हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि बसपा में अब भरोसेमंद नेताओं की पीढ़ी खत्म हो गई है.

बाहरी नेताओं पर मायावती को भरोसा नहीं है. मायावती को इस बात का डर है कि कहीं बाहरी नेता पार्टी पर कब्जा ना कर लें. ऐसे में परिवार पर भरोसा करना मायावती की मजबूरी हो गई है. बसपा के राष्ट्रीय सम्मेलन में एक बात यह भी साफ हो गई कि मायावती का यह असमंजस सपा के साथ गठबंधन को लेकर भी बना है. पार्टी में मुस्लिम बिरादरी के प्रतिनिधित्व को लेकर भी मायावती असमंजस में है. मायावती सवर्ण और पिछड़े वर्ग के वोटबैंक को लेकर भी असमंजस में है. मायावती को लगता है कि वह बसपा को भाजपा के मुकाबले खड़ा कर लेगी तो विधानसभा चुनाव में बसपा को सबसे ज्यादा लाभ होगा.

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बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो बनने के बाद मायावती ने पार्टी में नम्बर दो की कुर्सी खत्म कर दी थी. रैली और सभाओं में भी मंच पर एक ही कुर्सी रखी जाती थी. जिस पर मायावती खुद बैठती थी. 2007 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी के अंदर सक्रिय किया. आनंद कुमार नोएडा में रहते थे. पेशे से कर्लक थे. पार्टी में आनंद कुमार का राजनीति से सीधा सरोकार भले ही नहीं था पर उनको मायावती का दाहिना हाथ माना जाता था.

मायावती के सत्ता से हटने के बाद आनंद कुमार पर बेहिसाब पैसा कमाने के आरोप भी लगे. आनंद कुमार का पार्टी के अंदर दखल बना रहा. 2017 में पहली बार मायावती ने आनंद कुमार को बसपा उपाध्यक्ष बनाया. एक साल ही वे इस पद पर रह सके. 2018 में आंनद कुमार को इस पद से हटा दिया गया. उस समय मायावती ने तर्क दिया कि वह बसपा में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसा परिवारवाद नहीं चाहती है.

2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के बल पर लोकसभा की 10 सीटें जीतने के बाद मायावती ने पार्टी को पूरी तरह से परिवारवाद के हवाले कर दिया है.  उन्होंने भाई आंनद कुमार को दूसरी बार पार्टी का उपाध्यक्ष और भतीजे आकाश आनंद को नेशनल कोआर्डिनेटर बना दिया हैं. बसपा के संगठन में अध्यक्ष के बाद उपाध्यक्ष ही सबसे ताकतवर माना जाता है. मायावती खुद भी अध्यक्ष बनने से पहले पार्टी की उपाध्यक्ष थी. इसके बाद वह पार्टी सुप्रीमो बन गईं.

मायावती बसपा को परिवारवाद की पार्टी नहीं बनाना चाहती थी. अब पार्टी में भरोसेमंद लोगों की कमी के चलते परिवार के लोगों को पार्टी में लाना मजबूरी हो गया है.

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भारत के इस गांव में खेती सीखने के लिए आते हैं विदेशी

घूमने-फिरने के शौकीन लोगों में से किसी को पहाड़ पसंद है तो किसी को नदियां, झरने और तालाब. अपनी पसंद के हिसाब से ही लोग अपनी ट्रिप प्लान करते हैं.

लेकिन अगर कोई आपसे ये कहे कि एक ऐसी अनोखी जगह है, जहां पर हरियाली और पहाड़ों को करीब से जानने का मौका मिलेगा, तो शायद ही आप उस जगह पर जाने के लिए खुद को रोक पाएं. देहरादून में एक ऐसी ही जगह है, जहां पर देश-विदेश से टूरिस्ट और्गेनिक फार्मिंग (जैविक खेती) करने के लिए आते हैं. आइए, हम आपको बताते हैं इस दिलचस्प जगह के बारे में.

देहरादून का छोटा-सा गांव रामगढ़

देहरादून का छोटा सा गांव रामगढ़, जहां किसी जमाने में पलायन करने वालों की तादाद इतनी ज्यादा बढ़ गई थी, कि ये गांव खाली हो चुका था.

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लेकिन समय के साथ यहां पर जैविक खेती पर काम किया जाना शुरु हो गया. इस खेती की सबसे खास बात ये थी कि यहां टूरिस्ट सिर्फ घूमने फिरने नहीं बल्कि खेती के नए-नए गुण सीखने के लिए आते हैं. हर साल देश के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही जापान, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, आस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि देशों से दो हजार से अधिक छात्र और किसान जैविक खेती के गुर सीखने दून के इस छोटे से गांव में पहुंच रहे हैं.

टूरिस्ट घूमने ही नहीं बल्कि सीखने आते हैं खेती

देश-विदेश से आए ये टूरिस्ट यहां घूमने-फिरने के अलावा यहां ठहरकर खेती को न सिर्फ करीब से देखते हैं बल्कि खुद भी जैविक खेती में हाथ बटाते हैं.

यहां टूरिस्ट के रुकने के लिए खास इंतजाम किए जाते हैं. कैम्प में रहकर टूरिस्ट मिल जुलकर खाना बनाते हैं. जो उनके लिए किसी एडवेंचर से कम नहीं है.

तो, अगर आप भी पहाड़ और हरियाली दोनों को एक साथ करीब से देखना चाहते हैं, तो एक बार देहरादून रामगढ़ जरुर जाएं, हो सकता है सैर-सपाटे के साथ आपको यहां कोई बिजनेस आईडिया भी मिल जाए.

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कोर्ट का भ्रामक निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक और भ्रामक  निर्णय में कहा है कि इनहाउस जांच कमेटियों में बुलाए गए व्यक्ति को अपने साथ वकील रखने की अनुमति नहीं होनी चाहिए. एक तरह से यह तर्क सही हो सकता है क्योंकि यदि हर तरह की जांच में अदालतों वाला माहौल होना जरूरी हो जाए तो किसी बात की कभी जांच हो ही नहीं सकती.

दफ्तरों में बेईमानी, चोरी, हुक्मउदूली, दुर्व्यवहार के मामले होते रहते हैं और मैनेजर या मालिक सभी संबंधित लोगों को बुला कर पूछताछ करे और फैसला दे, इस में वकील की क्या जरूरत है. अगर इस बात को लिख भी लिया जाए तो भी वकील की जरूरत नहीं होनी चाहिए.

यह मामला, जिस में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया, अलग है. मामले में बैंक ने एक कर्जदार को बुला कर इनहाउस जांच की और ढूंढ़ने की कोशिश की कि कर्जदार ने बैंक से कर्ज ले कर पैसा वापस न करने की जगह कहीं और तो नहीं लगा दिया या उस की हैसियत लौटाने की है या नहीं. यह मामला आंतरिक है ही नहीं. यह कानूनी है और कानून के अनुसार हर व्यक्ति को अपनी सफाई देने का हक है.

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हर व्यक्ति अपनी सफाई सही शब्दों में देने लायक हो, जरूरी नहीं. बोलने की हिम्मत और पूछे गए सवाल का सही शब्दों में उत्तर देना एक कला है. एक वाचाल व्यक्ति सवाल का जवाब सवाल से दे सकता है. एक खामोश सा व्यक्ति सवाल पर जवाब देने लायक शब्द ही नहीं ढूंढ़ पाता.

इस निर्णय के देने का समय भी थोड़ा चौंकाने वाला है. इन्हीं दिनों अपने मुख्य न्यायाधीश पर लगाए गए यौन प्रताड़ना के एक महिला कर्मचारी के आरोपों की जांच सुप्रीम कोर्ट कर चुकी है. इस में 3 कानूनविद जजों ने एक 35 वर्षीया, लगभग गांव की पृष्ठभूमि से आई, महिला को जांच के दौरान सवालों के घेरे में घेरा था. महिला ने मांग की थी कि उसे एक वकील करने का मौका मिलना चाहिए जिसे जांच कमेटी ने ठुकरा दिया और आरोपों को निराधार घोषित कर दिया.

यह निर्णय उस प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगाता है. आम समय में चाहे इस निर्णय का स्वागत होता, लेकिन वर्तमान में इसे संदेह की दृष्टि से ही देखा जाएगा.

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जानें, क्यों पिछड़ रही है आधी आबादी

लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद शिवसेना की उपनेता और पूर्व कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी ने ट्वीट किया ,” 17 वीं लोकसभा में सब से अधिक 14.4 प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व होगा. इस चुनाव ने यह मिथक भी तोड़ दिया है कि महिलाओं के जीतने के कम चांस होते हैं. उन के जीतने का स्ट्राइक रेट पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है. राजतिलक की करो तैयारी आगे बढ़ रही है महिलाएं हमारी”

दरअसल इस बार लोकसभा में सर्वाधिक 78 महिला सांसदों की मौजूदगी ने एक नया रिकौर्ड बनाया है. इस से पहले 2014 में महिला सांसदों की संख्या 61 थी जो बाद के उपचुनाव के चलते 65 हो गई. जब कि महिला सांसदों की संख्या 2009 में 59 थी 2004 में 45 थी.

सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि पिछले 50 सालों में हर क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं. चाहे वह लड़ाकू जेट उड़ाने की बात हो, किसी कंपनी के सीईओ होने की बात हो, कारोबार चलना हो या फिर नेता बन कर देश चलाने की बात, महिलाएं आज हर जगह अपनी काबिलियत का लोहा मनवा रही हैं. वे कैरियर के उस मुकाम को पाने के लिए प्रयत्नशील है जहाँ पहुँच कर ज्यादा आजादी और संतुष्टि महसूस करें.

हालांकि कई बार वे पुरूषों से आगे निकल जाती हैं और कभीकभी उन्हें मात भी दे देती हैं फिर भी उन्हें कार्य से जुड़ी कई समस्याओं और पेशेवर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

महिलाओं द्वारा कार्यस्थल पर सामना किए जाने वाले कुछ मुद्दे

चयन में लिंगभेद

भले ही देश की आबादी सवा सौ करोड़ हो और इस में महिलाओं को आधी आबादी कहा जाता हो पर अफसोस की बात यह है कि महिलाएं अब भी आर्थिक रुतबे और ऊंचे पदों के मामले में काफी पीछे हैं. विश्वबैंक की एक रिपोर्ट पर नजर डालें तो भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या लगातार कम हो रही है. कार्यक्षेत्र में हिस्सेदारी के मामले में भारत की महिलाएं 131 देशों में 121वें स्थान पर हैं

2004-05 में देश में लगभग 43 फीसदी महिलाएं कामकाजी थीं. कुछ ऐसा ही आंकड़ा 1993-94 में भी था. लेकिन आज 2016-17 में जब देश नए कीर्तिमान रच रहा है कामकाजी महिलाओं का आंकड़ा 27 प्रतिशत से भी कम होता जा रहा है. हमारे देश से अच्छी  स्थिति नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों की हैं.

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विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 2011-12 के बीच विभिन्न कारणों से 1.97 करोड़ महिलाओं ने नौकरी छोड़ दी. यह बात अलग है कि जो महिलाएं काम कर रही हैं वे अपनी काबिलियत के झंडे गाढ़ रही हैं. मगर यह संख्या संतोषजनक नहीं है.

ग्लोबल जेंडर 2015-16 की रिपोर्ट के मुताबिक 144 देशों में किए गए सर्वे में भारत 136 वें नंबर पर है. खास तौर पर गांव में कामकाजी महिलाओं की स्थिति दिनबदिन खराब होती जा रही है. भारत में महिला कार्यबल की भागीदारी महज 27 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत के मुकाबले 23 प्रतिशत कम है.

वर्ल्ड इकोनौमिक फोरम द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर पांच में से चार कंपनियों में 10 प्रतिशत से भी कम महिला कर्मचारियों की भागीदारी है. भारत की ज्यादातर कंपनियां महिलाओं की तुलना में पुरुष कर्मचारियों को भर्ती करना पसंद करती है. रिपोर्ट के मुताबिक लिंगभेद को ध्यान में रखकर नौकरी देनेवाले कंपनी की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है. रिपोर्ट पर अगर गौर करें, तो बैंकिंग सेक्टर में 61 प्रतिशत महिला कर्मचारी, टेक्सटाइल सेक्टर में 64 प्रतिशत महिला कर्मचारी अपना योगदान दे पाती हैं. वहीं रिटेल सेक्टर में 79 प्रतिशत कंपनियों में 10 प्रतिशत महिला कर्मचारी, ट्रांसपोर्ट एवं लौजिस्टिक्स सेक्टर की 77 प्रतिशत कंपनियों में 10 प्रतिशत महिला कर्मचारी हैं.

चयन में लिंगभेद की वजह से नौकरियों का लाभ महिलाओं से अधिक पुरुषों को मिलता है. रिपोर्ट में बताया गया है कि तीन में से एक कंपनी पुरुष कर्मचारियों को प्राथमिकता देती हैं. 10 में से एक कंपनी महिला कर्मचारियों को प्राथमिकता देती हैं.  770 भारतीय कंपनियों पर किये गए इस सर्वे के मुताबिक़ 770 में से उन कंपनियों की संख्या जहां 50 प्रतिशत या अधिक महिला कर्मचारी हैं, मात्र 10 है. 546 वे कंपनियां हैं जहां 10 प्रतिशत से भी कम महिला कर्मचारी हैं. इस के साथ ही 172 कंपनियों में 5 फीसद महिला कर्मचारी काम करती हैं. 164 कंपनियों में कोई महिला कर्मचारी काम ही नहीं करती हैं.

यौन उत्पीड़न

महिलाओं द्वारा सामना किये जाने वाले सब से निराशाजनक मुद्दो में से एक यौन उत्पीड़न है. यह मौखिक भी हो सकता है और शारीरिक भी. इस में जरूरी नहीं है कि शरीर के किसी अंग या अंगो को छूआ गया हो. पर इस में आपत्तिजनक टिप्पणी करना, वेतन बढ़ोतरी या पदोन्नति के लिए सेक्सुअल फेवर मांगना , मारपीट करना, सीटी बजाना और अश्लील चुटकुले सुनाना आदि भी इस में शामिल है. किसी भी प्रकार का यौन उत्पीड़न एक महिला के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल सकता है.

गर्भावस्था के दौरान भेदभाव

प्रसव को एक महिला के जीवन का सब से सुंदर समय माना जाता है. पर अफ़सोस कार्यस्थल पर महिलाओं द्वारा इस वजह से अक्सर भेदभाव किया जाता है. वैसे महिलाओं को नौकरी पर रखने, पद से हटाने, महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स में शामिल न करने या उन की कोख में पल रहे बच्चे के आधार पर उन से लिंगजनित भेदभाव नहीं किया जा सकता. पर बहुत कम कंपनियों में ही इस बात पर अमल किया जाता है.

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लैंगिक वेतन असमानता यानी काम ज्यादा दाम कम

समान योग्यता और ज्ञान रखने वाले एक पुरुष और महिला के बीच पारिश्रमिक का अंतर बहुत बड़ा होता है. महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन दिया जाता है.

वर्ल्ड इकनोमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक़ महिलाएं पुरुषों के मुकाबले रोजाना 50 मिनट ज्यादा काम करती हैं. जिन कामो के बदले महिलाओं को कोई पैसा नहीं मिलता है, उन की सूची बढ़ रही है. महिला और पुरुष के बीच असामनता दूर करने के लिए जिस रफ्तार से कोशिश हो रही है, उस से इस काम में 170 साल लग सकते हैं.

देश में महिलाओं और पुरुषों के बीच सैलरी के मामले में भेदभाव काफी ज्यादा है. लेटेस्ट मॉनस्टर सैलरी इंडेक्स (MSI) के मुताबिक, देश में मौजूदा जेंडर पे गैप यानी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को 19 फीसदी कम वेतन मिलता है. पुरुष महिलाओं की तुलना में हर घंटे 46 रुपये 19 पैसे ज्यादा पाते हैं.

2018 में देश में पुरुषों की औसत सैलरी हर घंटे 242.49 रुपये थी वहीं महिलाओं को हर घंटे सिर्फ 196.3 रुपये ही मिल रहे हैं. सर्वे के मुताबिक बहुत सी महत्वपूर्ण इंडस्ट्रीज में यह भेदभाव काफी ज्यादा है. आई टी सर्विसेज में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को 26 फीसदी कम वेतन जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में महिलाओं को 24 फीसदी कम वेतन मिल रहा है.

चौंकाने वाली बात है कि सर्वे के मुताबिक, हेल्थकेयर, केयरिंग सर्विसेज और सोशल वर्क जैसे सेक्टरों में भी पुरुष, महिलाओं से 21 फीसदी ज्यादा वेतन पा रहे हैं. बता दें कि इन सेक्टरों में आमतौर पर महिलाओं का दबदबा माना जाता है. 2017 में महिला और पुरुष में सैलरी के भेदभाव का यह अंतर 20 प्रतिशत था जब कि 2018 में यह अंतर 1 प्रतिशत ही कम हुआ.

हाल ही में आईसीआईसीआई लोम्बार्ड के द्वारा 22 से 55 साल की महिलाओं पर किये गए सर्वेक्षण पाया गया कि करीब 62 फीसदी युवतियों का मानना है कि उन के पास जो नौकरी है और उन्होंने जिस नौकरी की कल्पना की थी उस में कोई समानता नहीं है. जब कार्य स्थल पर पुरुषों के समान वेतन की बात होती है तो इस में भी लैंगिक भेदभाव की बात सामने आती है. इस से महिलाओं में हताशा का भाव आता है और उन का प्रदर्शन प्रभावित होता है.

53 फीसदी महिलाएं मानती हैं कि उन का कार्यस्थल अभी भी पुरुष प्रधान है. 22 से 33 साल की युवतियां और 33 से 44 वर्ष की महिलाएं मानती हैं कि पुरुष प्रधान कार्यस्थल में उनकी पदोन्नति का अवसर भी प्रभावित होता है.

इन मुद्दों से निपटने और मानसिक रूप से फिट होने के लिए एमपावर – द फाउंडेशन की मनोवैज्ञानिक और आउटरीच एसोसिएट मानसी ठक्कर के अनुसार ;

  1. वास्तविकता को स्वीकार करें और अपनाएं:

वास्तविकता स्वीकारना जरुरी है पर यहाँ स्वीकृति का मतलब असहाय होना नहीं है. हम में से कोई भी इन में से किसी भी समस्या से नहीं गुजरना चाहता है. पर हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि वे निश्चित रूप से हो सकते हैं.

ट्रैफिक में फंसे होने की कल्पना करें. कोई वाहन चालक अपने आप को यह कह कर गुस्सा कर सकता है कि ‘‘यह तो बिल्कुल भी ठीक नहीं है. ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?’’ ऐसे में वह और भी ज्यादा क्रोधित हो कर सड़क पर दूसरे वाहन चालकों से गालीगलौच कर सकता है.

मगर दूसरी तरफ उसी ट्रैफिक जाम की परिस्थिति में एक अन्य वाहन चालक शांत रह सकता है और कह सकता है कि ‘‘यह तो ट्रैफिक है. हर किसी के साथ लगभग रोज ही ऐसा होता है. भला परेशान हो कर मुझे क्या मिलेगा?’ ऐसे में वह चुपचाप कार में बैठ कर गानों का आनंद ले सकता है और कोई दूसरा रास्ता भी निकाल सकता  है . समस्याओं को स्वीकार करने से आप तर्कसंगत तरीके से सोचते हैं और समस्याओं का समाधान निकालने के लिए उचित कदम उठा पाते हैं.

2. अपनी सोच बदलें

कठिनाइयों का सामना करते समय निराशा, असहजता और अपनी क्षमताओं तथा कार्यों पर संदेह करने जैसी भावनाएं पैदा हो सकती हैं.

यदि आप उन सभी पर विश्वास करना शुरू कर दें तो यह केवल आप की प्रगति में बाधक ही बनेंगे. ऐसे सोचना कि ‘मैं इसे करने में उतना अच्छा नहीं हूँ’, ‘मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता जिससे जो हो रहा है वो बदल जाएगा’, ये सभी केवल आपको आपके लक्ष्यों तक पहुंचने से रोकेंगे.

किसी हितैषी या ऐसे व्यक्ति से बात करें जिस पर आप भरोसा करती हों, जो आप को चीजों को देखने के लिए एक यथार्थवादी दृष्टिकोण प्रदान करता हो और आप को अपनी चुनौतियों से निपटने की ताकत देता हो.

3. उच्चाधिकारियों से बात करें

अपने साथ हो रहे अन्याय को सुलझाने की कोशिश करना बहुत ही जरूरी है. आप को भेदभाव करने वाले का सामना करने का मन बनाना होगा. अपने उपर के अधिकारी या सब से शीर्ष अधिकारी से संपर्क करें और अपने साथ हो रहे भेदभाव के बारे में उन्हें बताएं. लगातार उन चीजों को पाने का प्रयास करती रहें जिन की आप हकदार हैं.

4. निडर रहें और बातचीत करें

बात करें. कई शोधों से पता चलता है कि लैंगिक वेतन असमानता का सब से बड़ा कारण यह है कि जब बात वेतन और पदोन्नति/वेतन बढ़ोतरी की आती है तो महिलाएं बात करने में विफल रहती हैं. उस समर्पण और कड़ी मेहनत के लिए बातचीत करना हमेशा याद रखें जो आप अपने कार्य में लगाती हैं.

5. याद रखें कि आप खास हैं

याद रखें कि अन्य आप के मूल्य का निर्धारण दूसरे नहीं कर सकते हैं. आप का मूल्य पूरी तरह से आप के खुद पर निर्भर है. दूसरों को खुद पर संदेह न करने दें. आप मूल्यवान हैं और उन सभी चीज़ों के लिए लड़ें जो आप के लिए सब से ज्यादा मायने रखती है.

न तो स्त्रियां काम के मामले में पीछे रहती हैं और न ही मानसिक नजरिये से ही वे किसी भी तरह कम हैं. वे पुरुषों के देखे कही ज्यादा ध्यान एकाग्र कर बेहतर काम कर सकती हैं. हाल ही में हुए एक ताजा अध्ययन में यह बात सामने आई है कि महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा अधिक दिमाग पाया जाता है. महिलाओं का दिमाग ज्यादा सक्रिय होता है. पुरुषों और महिलाओं के मस्तिष्क की आपसी तुलना के बाद यह बात सामने आई है कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में सहानुभूति, सहयोग, आत्मनिर्भरता, चीजों को कंट्रोल करना, मुसीबत में धैर्य रखना जैसे गुण पुरुषों की अपेक्षा अधिक होते हैं. इस विषय पर यह अब तक की सब से बड़ी स्टडी मानी जा रही है. यह सारा परीक्षण स्पेक्ट तकनीक से किया गया. रिसर्च में 46,034 मस्तिष्कों का अध्ययन किया गया.  जर्नल आफ अल्जाइमर डिजीज में प्रकाशित इस अध्ययन के लेखक डेनियल जी अमेन हैं.

समय आ गया है जब हम पुरानी सोच और मान्यताओं से परे अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करें और रूढ़ियों और परम्पराओं के पीछे लीक पीटते रहने के बजाय महिलाओं को भी एक खुला आसमान दें. नई पीढ़ी को स्त्रीपुरुष विभेद के बजाये सामान अधिकार का पाठ पढ़ाएं.

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झटपट घर साफ करने के लिए अपनाएं ये 8 टिप्स

घर के कामों को लेकर अक्सर आपकी यहीं शिकायत होती है कि पूरा दिन निकल जाता है, लेकिन घर का सारा काम खत्म नहीं होता. पर कुछ कामों को अगर आप स्मार्ट तरीके से करेंगी तो घंटों का काम मिनटों में निपटा सकती है. इसके लिए आज हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ खास टिप्स.

झटपट काम निपटाने के आसान टिप्स

  1. लिंट रोलर अगर घर में है तो हर छोटी जगह की साफ-सफाई इससे ही करें. इसकी मदद से आपका काम झटपट हो जाएगा.

2. कार्पेट, गद्दे लगे फर्नीचर और मैट्रेस पर बेकिंग सोडा छिड़क कर 15 मिनट के लिए छोड़ दें. इसके बाद वैक्युम क्लीनर चला लें.

3. घर के डिश वाशर में बर्तन धोने के साथ ही बच्चों के खिलौने और दूसरी प्लास्ट‍िक के सामान को भी धो लें. इससे दूसरी चीजों में धुलाई के कामों में लगने वाला वक्त बचेगा.

4. डैशबोर्ड में गंदे धब्बों को मिटाने के लिए एक पुरानी जुराब में कोई क्लीनिंग सौल्युशन डालें और चलाएं. देखिए बिना किसी मेहनत के कैसे चमकने लगेगा आपको वार्डरोब.

5. अगर घर में जानवर हैं तो उसके बालों की सफाई का सबसे अच्छा तरीका है कि एक गीले रबर ब्रश को हर उस जगह चला लें जहां उसके बाल झड़ते हों.

6. घर की साफ-सफाई में अपने गैजेट्स की सफाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. आपके फोन में शायद टौयलेट सीट से भी ज्यादा किटाणु होते हैं और हम इसकी कभी सफाई भी नहीं करते हैं. मोबाइल, रिमोट को साफ करने का सबसे अच्छा तरीका है कि एल्कोहल वाइप्स लें और उससे इन्हें साफ करें.

7. घर के साथ ही आप अपने पर्स की भी सफाई करें. पर्स का इस्तेमाल तो रोजाना होता है, लेकिन इसकी सफाई की ओर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो. आप के बैग में अकसर फेकल बैक्टीरिया हो जाते हैं. ऐसे में बहुत जरूरी है कि डिसइंफेक्टेंट वाइप्स से बैग को पांच मिनट देकर साफ करें.

8. अपने किचन के डस्टबिन को नींबू के छिलकों से साफ करें, इसकी सफाई भी अच्छे से होगी और बदबू भी कम होगी.

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