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स्वर कोकिला की हालत गंभीर

जादुई आवाज की मल्लिका स्वर कोकिला लता मंगेशकर को लेकर खबर आई है कि वो अस्पताल में भर्ती हैं. रविवार को देर रात 2 बजे उन्हें सांस लेने में दिक्कत थी. जिसके बाद उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया.

आपको बता दें, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर जी को सीने में वायरल इंफ़ेक्शन की प्रौब्लम थी. इसलिए उन्हें ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था. रिपोर्टस मुताबिक़, ”उन्हें सोमवार तड़के दो बजे के क़रीब अस्पताल लाया गया था. उनकी हालत गंभीर है और वो इस वक़्त आईसीयू में हैं.”

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सिंगिंग कैरियर

आपको बता दें, लता मंगेशकर ने 28 सितंबर को अपना 90वां जन्मदिन मनाया था. लता जी अपने सिंगिंग करियर में करीब 1000 से ज्यादा गाने गा चुकी हैं. साल 2001 में उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिया गया था. उन्होंने 36 भारतीय भाषाओं में गाने रिकार्ड किए हैं.

ड्रीम गर्ल ने किया ट्वीट

ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी ने लता मंगेशकर की सलामती के लिए किया ट्वीट किया और दुआ मांगी. हेमा मालिनी ने लिखा है- लता मंगेशकर जी के लिए प्रार्थना, जो अस्पताल में भर्ती हैं और खबर है कि उनकी हालत गंभीर है . भगवान उन्हें इस संकट से बाहर निकलने की शक्ति दें जिससे वो हमारे बीच बनी रहें. राष्ट्र की भारत रत्न, भारत की कोकिला लता जी के लिए दुआ करती हूं.

आपको बता दें, लता मंगेशकर ने 28 सितंबर को अपना 90वां जन्मदिन मनाया था. बात अगर उनके सिंगिंग करियर की करें तो वो करीब 1000 से ज्यादा गाने गा चुकी हैं. साल 2001 में उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिया गया था. उन्होंने 36 भारतीय भाषाओं में गाने रिकार्ड किए है गायकी के लिए लता जी को 1969 में पद्म भूषण अवार्ड से और 1990 में दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजा जा चुका है.

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ये रिश्ता क्या कहलाता है: क्या कायरव के सामने हो जाएगा कार्तिक का पर्दाफाश

स्टार प्लस का मशहूर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’  में आए दिन लगातार दर्शकों को महाट्विस्ट देखने को मिल रहे हैं. जिससे दर्शक इस शो को काफी पसंद कर रहे हैं. तो चलिए आपको इस शो के धमाकेदार ट्विस्ट एंड टर्न के बारे में बताते हैं.

हाल ही में आपने देखा कि कार्तिक सरदार जौली सिंह के गेटअप में है. जिससे कायरव को खुश कर सके. इसी बीच नायरा पूल में गिर जाती है. तभी कार्तिक नायरा को बचाने के लिए पूल में कूदता है और उसका सरदार वाला गेटअप उतर जाता है. इससे पहले नायरा को ऐसे अजीब से ख्याल आते हैं. उसे लगता है कि पूल में कोई गिर रहा है. नायरा बेहद परेशान हो जाती है. नायरा को ऐसे परेशान देखकर कार्तिक उसकी परेशानी की वजह पूछता है.

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नायरा उससे बताती है कि उसे पूल में कुछ अजीब सा दिखा, ऐसा लगा कि रस्सी में कोई बंधा है. कार्तिक उससे कहता है, तुम्हे पहले बता देना चाहिए, हम कहीं और बुकिंग करा लेते.

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पिछले एपिसोड में आपने देखा कि नायरा ने बौस्केटबौल खेल का आयोजन किया था, जिससे कायरव खुश हो जाए. लेकिन कायरव तो अपने पापा कार्तिक से नाराज है क्योंकि कायरव को लगता है कि कार्तिक नायरा से हमेशा लड़ता है. कायरव ने तो औनलाइन पापा के लिए भी डिमांड कर दी है.

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पत्नी के जाल में हलाल हुआ पति: भाग 2

पत्नी के जाल में हलाल हुआ पति: भाग 1

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एक रोज रानी की नजर बबलू से टकरा गई. बबलू गांव का दबंग युवक था और अपराधी भी. उस पर एक दरजन से अधिक मुकदमे दर्ज थे. उस की तलाश में अकसर पुलिस गांव में आती रहती थी. लेकिन उस के खौफ से कोई गांव वाला जुबान नहीं खोलता था.

उस दिन बबलू आया तो था प्रवीण से मिलने, लेकिन उस का सामना हो गया उस की खूबसूरत बीवी रानी से. पहली ही नजर में रानी बबलू के मन में रच बस गई. बबलू को देख कर रानी के मन में भी उथलपुथल होने लगी.

रानी की खूबसूरती ने बबलू को बेचैन किया तो वह उस से नजदीकियां बनाने के उपाय खोजने लगा. उस ने प्रवीण से दोस्ती कर ली. उस से मिलने उस के घर आने लगा. इतना ही नहीं, उस ने प्रवीण को शराब की लत भी लगा दी तथ उस की आर्थिक मदद भी करने लगा. प्रवीण, बबलू के अहसानों तले इतना दब गया कि उस का प्रवीण के घर बेरोकटोक आनाजाना होने लगा. कभीकभी पुलिस उस के पीछे पड़ती तो वह प्रवीण के घर में छिप भी जाता था.

घर आतेजाते बबलू अकसर रानी के हुस्न की तारीफ करता तो रानी फूल कर गदगद हो जाती. बबलू रानी से छोटा था, इसलिए वह उसे भाभी कहता था. इस नाते वह उस से हंसीमजाक करता था. रानी को यह सब अच्छा लगता था. वह भी बबलू से खुल कर हंसीमजाक कर लेती थी. कभीकभी तो दोनों की हंसीमजाक सामाजिक मर्यादा तोड़ने पर उतारू हो जाती थी.

इस के बाद बबलू ने प्रवीण की गैरमौजूदगी में भी उस के यहां जाना शुरू कर दिया. एक दिन बातों ही बातों में रानी ने जैसे ही अपने पति की बेरुखी का बखान किया, वैसे ही बबलू ने उस का हाथ थामते हुए कहा, ‘‘भाभी, तुम क्यों चिंता करती हो, मैं तुम्हारा खयाल रखूंगा. आज से तुम्हारे सारे दुख मेरे हैं और मेरी सारी खुशियां तुम्हारी.’’

‘‘सच बबलू…’’ रानी ने मुसकरा कर पूछा.

‘‘हां भाभी, बिलकुल सच. कभी मुझे सेवा का मौका तो दो.’’ वह बोला.

‘‘तो कल शाम ढलते ही आ जाना. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’ रानी मुसकरा कर बोली.

रानी की बात सुन कर बबलू बहुत खुश हुआ. उस दिन वह अपने घर न जा कर डकोर चला गया. वहां उस का एक अपराधी साथी लाखन रहता था. वह रात उस ने लाखन के घर पर करवटें बदलते गुजारी.

रात भर वह रानी के खयालों में डूबा रहा. सुबह वह देर से जागा. दोपहर बाद उस ने लाखन के साथ होटल में खाना खाया फिर शाम को रानी के घर जा पहुंचा. रानी उसी का इंतजार कर रही थी. बबलू ने पहुंचते ही रानी को अपनी बांहों में समेट लिया, ‘‘आज तो तुम हुस्न की परी लग रही हो, जी चाहता है कि…’’

‘‘मैं भी तुम्हारे इंतजार में पलकें बिछाए बैठी थी.’’ रानी बोली.

इस के बाद दोनों ने इत्मीनान से हसरतें पूरी कीं.

अवैध रिश्तों का यह सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर इस ने रुकने का नाम नहीं लिया. जब भी दोनों को मौका मिलता, एकदूसरे की बांहों में सिमट जाते. चूंकि बबलू अपराधी था और रात को ही आता था, अत: दोनों के संबंधों की भनक किसी को नहीं लग पाती थी.

प्रवीण ने अपना बसेरा खेतों पर बना लिया था. दरअसल, आवारा जानवर तथा नीलगाय खड़ी फसल को रात में रौंद डालते थे. इसलिए फसल की रखवाली के लिए वह रात में खेत पर चला जाता था. खेत के किनारे उस ने छप्पर डाल रखा था. चारपाई व बिस्तर लगाकर वह छप्पर के नीचे सोता था.

दिन में तो वह कुछ समय के लिए घर पर रहता था, लेकिन शाम ढलते ही खाना खा कर खेत पर चला जाता था. प्रवीण को वैसे भी सैक्स में रुचि नहीं रह गई थी. अत: वह पत्नी के प्रति लापरवाह हो गया था.

प्रवीण की इसी लापरवाही का बबलू और रानी भरपूर फायदा उठाते थे. दोनों एकदूसरे के इस कदर दीवाने बन गए थे कि उन्हें बिना मिले चैन नहीं मिलता था. दोनों बेहद सतर्कता बरतते थे, पर इस के बावजूद एक रोज उन का भांडा फूट गया.

उस रोज शाम को प्रवीण खाना खा कर घर से निकला तो कुछ देर बाद बबलू आ गया. आते ही बबलू ने रानी को बांहों में भरा और बिस्तर पर ले गया. उसी समय प्रवीण घर आ गया. उस ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया. दरअसल प्रवीण अपनी तंबाकू चूने वाली चुनौटी घर में भूल गया था. उसे लेने ही वह घर आया था. लापरवाही में रानी दरवाजा बंद करना भूल गई थी.

रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद बबलू तो चला गया लेकिन रानी कहां जाती. उस ने रानी की जम कर धुनाई कर डाली फिर बड़बड़ाता हुआ खेत पर चला गया. इस के बाद जब भी प्रवीण को शक होता, वह रानी को रूई की तरह धुन देता. कभीकभी तो बातबेबात भी पीट कर अपना गुस्सा उतार देता.

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विषम स्थिति तो उस दिन बन जाती, जिस दिन वह शराब ज्यादा पी लेता था. उस दिन वह हैवान ही बन जाता. रानी को वह इतना पीटता कि उस का शरीर ही काला कर देता.

दरअसल, बबलू दबंग व अपराधी था. प्रवीण उस का सामना नहीं कर सकता था. अत: वह सारा गुस्सा पत्नी पर ही उतारता था. रानी पति के जुल्मों से परेशान हो चुकी थी.

एक रात जब बबलू रानी से मिलने आया तो रानी ने उस से कहा, ‘‘तुम तो यहां से चले जाते हो. पर मुझ पर क्या बीतती है, यह मैं ही जानती हूं. मेरा पति मुझे मारमार कर मेरा शरीर काला कर देता है. मैं कमरे में पड़ी आंसू बहाती रहती हूं. तुम्हें मेरी फिक्र है ही नहीं. अब मैं तुम से तभी बात करूंगी, जब उस हैवान को मिटा दोगे.’’

‘‘ठीक है रानी. मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है.’’ बबलू ने रानी को भरोसा दिया.

बबलू का एक अपराधी दोस्त था लाखन. वह मूलरूप से कानपुर देहात जिले के शिवली कस्बे का रहने वाला था. कानपुर देहात पुलिस ने उस पर शिकंजा कसा तो वह जालौन आ गया था. यहां उस ने उरई तथा डकोर में अपना ठिकाना बना लिया था.

वह बबलू के साथ मिल कर अपराध करता था. बबलू ने अपनी समस्या लाखन को बताई तो वह उस का साथ देने को तैयार हो गया.

9 जुलाई, 2019 की रात 10 बजे लाखन और बबलू ट्रैक्टर ट्रौली ले कर चिली गांव हो कर प्रवीण के खेत के पास पहुंचे. वे ट्रैक्टर ट्रौली लाखन के दोस्त की थी जो उस में गांव से अनाज भर कर उरई मंडी लाता था. उस दिन वह अपनी ट्रैक्टर ट्रौली लाखन के पास छोड़ गया था.

ट्रैक्टर को उन्होंने सड़क किनारे खड़ा कर दिया, फिर हाथ में शराब की 2 बोतलें ले कर प्रवीण के पास पहुंचे. प्रवीण उस समय चारपाई पर लेटा था. बबलू को देख कर वह चारपाई से उठा और बोला, ‘‘बबलू, तुम इस वक्त? क्या पुलिस तुम्हारा पीछा कर रही है?’’

‘‘नहीं प्रवीण भाई, पुलिस पीछा नहीं कर रही. मैं अपने साथी लाखन के साथ इधर से गुजर रहा था, सो तुम्हारी याद आ गई. दवाई साथ में है, सोचा कि तुम्हें भी पिलाता चलूं.’’ बबलू ने शराब की बोतलों की तरफ इशारा करते हुए कहा.

शराब की बोतल देख कर प्रवीण के मुंह में पानी आ गया. वह बोला, ‘‘बबलू, तुम ने यह अच्छा किया, जो यहां आ गए. पैसे न होने की वजह से मैं ने कई दिनों से नहीं पी थी.’’

इस के बाद महफिल जमी और तीनों ने शराब पी. शराब पी कर प्रवीण कुमार जब मदहोश हो गया, तब बबलू ने इशारा कर के लाखन से ट्रैक्टर ट्रौली में रखी कुल्हाड़ी मंगा ली. इस के बाद लाखन ने प्रवीण को जमीन से उठा कर चारपाई पर पटक दिया और बबलू ने कुल्हाड़ी से सिर व चेहरे पर वार कर प्रवीण को मौत के घाट उतार दिया.

सबूत मिटाने के लिए बबलू और लाखन ने प्रवीण का शव बिस्तर सहित चारपाई को ट्रौली पर रखा और कुछ दूर जा कर एक खेत के किनारे आम के पेड़ के नीचे उस की लाश फेंक दी.

इस के बाद मलीहा गांव से पहले एक सूखे कुएं में बिस्तर व चारपाई डाल दी. इस के बाद लाखन ट्रैक्टर ट्रौली ले कर डकोर चला गया और बबलू रात के अंधेरे में रानी के पास.

उस ने रानी को बता दिया कि उस ने शर्त पूरी कर दी है. रास्ते का कांटा हमेशा के लिए निकाल दिया. पति की हत्या की बात सुन कर रानी बहुत खुश हुई.

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अगले दिन 10 जुलाई की सुबह चिली गांव के लोगों ने प्रवीण की लाश देखी. इस के बाद की गई पुलिस काररवाई में केस का परदाफाश हुआ और कातिल पकड़े गए.

14 जुलाई, 2019 को थाना डकोर पुलिस ने अभियुक्त बबलू, लाखन तथा रानी को जालौन की उरई कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया.

  —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

महाराष्ट्र: तो क्या उद्धव ठाकरे खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं?

बौलीवुड की ही तरह राजनीति में भी कोई स्थायी दोस्त व दुश्मन नहीं होता. इसी के चलते महाराष्ट्र राज्य में राजनीतिक समीकरण हर घंटे बदलते हुए नजर आ रहे हैं. यूं तो इस बार ‘महाराष्ट्र राज्य’ का विधानसभा चुनाव भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना दोनों ने मिलकर लड़ा था. 24 अक्टूबर को जब चुनाव के परिणाम आए, तो महाराष्ट्र की जनता ने भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना के गठबंधन को 161 सीटों (भारतीय जनता पार्टी 105 और शिवसेना 56) के साथ पूर्ण बहुमत भी दे दिया. मगर आज लगभग 18 दिन हो गए हैं, पुरानी सरकार का कार्यकाल भी नौ नवंबर को खत्म हो गया. मगर अब तक महाराष्ट्र में सरकार का गठन नहीं हो पाया है.

वास्तव में चुनाव परिणाम वाले दिन से ही शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद पर शिवसेना का दावा ठोंकना शुरू कर दिया था. तो वहीं भारतीय जनता पार्टी के निवर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ऐलान कर दिया था कि मुख्यमंत्री तो भारतीय जनता पार्टी का होगा और वही मुख्यमंत्री होगे. उस दिन से दोनों राजनीतिक दल एक दूसरे पर राजनीतिक दबाव बनाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाते रहे. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के घर मातोश्री के सामने बड़ा पोस्टर लग गया कि ‘‘आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाया जाए. ज्ञातव्य है कि उद्धव ठाकरे के बेटे है आदित्य ठाकरे, जो कि पहली बार वरली सीट से चुनाव जीतकर विधायक बने हैं.

पर आठ नवंबर को मुख्यमंत्री पद से देवेंद्र फड़नवीस के त्यागपत्र के साथ ही लगभग यह तय हो गया था कि अब भारतीय जनता पार्टी महाराष्ट्र में सरकार नही बनाने जा रही है. मगर डरकर शिवसेना ने अपने चुने हुए विधायकों को मुंबई में ही मड आयलैंड के होटल ‘‘रिट्रीट’’ में एक साथ बंधक सा बनाकर रख दिया. तो वहीं कांग्रेस ने अपने सभी चुने हुए विधायकों को जयपुर के होटल में भेज दिया.

दिन भर राजनीतिक गहमा गहमी और बैठकों का दौर शनिवार नौ नवंबर को महाराष्ट्र’ के राज्यपाल ने सबसे बड़े दल के रूप में भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए न्यौता दिया. उसके बाद शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस पार्टी की तरफ से कई तरह के बयान जारी हुए. रविवार, दस नवंबर को मुंबई में जबरदस्त राजनीतिक गहमा गहमी रही. भारतीय जनता पार्टी की कोर ग्रुप की बैठक दो बार संपन्न हुई. उसके बाद शाम को भारतीय जनता पार्टी के कुछ विधायकों के साथ चंद्रकांत पाटिल व देवेंद्र फड़नवीस ने राज्यपाल से मिलकर स्पष्ट कर दिया कि उनके पास सरकार बनाने के लिए बहुमत नही है. उन्हें जनता ने शिवसेना के साथ सरकार बनाने के लिए जनादेश दिया था, मगर अब जनादेश का अपमान करते हुए शिवसेना उनके साथ सरकार नहीं बनाना चाहती.

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आदित्य नहीं उद्धव बनेंगे मुख्यमंत्री
इधर रविवार को दिन भर उद्धव ठाकरे व शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत बैठकें करते रहे. सूत्रों के अनुसार एनसीपी के साथ बैठकों के बाद एक बात निकलकर आई कि एनसीपी आदित्य ठाकरे के मुख्यमंत्री पद को समर्थन नहीं दे सकती.

इसलिए उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री के लिए आगे आना होगा. एनसीपी से इस तरह का संकेत मिलते ही ‘मातोश्री’ के सामने लगा ‘आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने’’ का पोस्टर हट गया और वहां पर एक नया पोस्टर‘‘ उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने.’’ लग गया.

फिर दोपहर में उद्धव ठाकरे अपनी पत्नी के साथ स्वयं कार चलाते हुए ‘रिट्रीट’ होटल पहुंचे और शिवसेना के विधायकों के साथ गहन मंत्रणा करने के बाद ऐलान कर दिया कि मुख्यमंत्री तो शिवसेना का ही बनेगा.

भाजपा ने सरकार न बनाने की बात कही देर शाम तक भारतीय जनता पार्टी द्वारा राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने से इंकार किए जाने के बाद राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार बनाने का निमंत्रण भेज दिया. अब ग्यारह नवंबर को शाम साढ़े सात बजे तक शिवसेना को राज्यपाल के सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करनी है.

ब्लैमेलिंग करते करते फंस गयी शिवसेना

भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले आधे विधायकों की संख्या के बावजूद शिवसेना हमेशा की तरह भारतीय जनता पार्टी को ब्लैकमेल करके मुख्यमंत्री का पद हथियाना चाहती थी. मगर उद्धव ठाकरे का अड़ियलपना काम न आया और अब शिवसेना खुद ही अपने जाल में बुरी तरह से फंसती हुई नजर आ रही है. क्योकि शिवसेना को सरकार बनाने के लिए एनसीपवी और कांग्रेस के समर्थन की जरुरत है. कांग्रेस के विधायक दो खेमों में बंटे हुए हैं. जबकि एनसीपी ने कई शर्ते उद्धव के सामने रख दी हैं.

कांग्रेस दुविधा में
जयपुर में ठहराए गए कांग्रेस के विधायकों से बात करने के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा- ‘‘जनता ने हमें विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है. हम विपक्ष में बैठना चाहेंगे. हम विधायकों की राय से हाईकमान को अवगत कराएंगे. अंतिम निर्णय तो हाईकमान का होगा. ’’जबकि मुंबई में पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहाण व अशोक चौहाण ने कहा- ‘हम राज्य में राष्ट्रपति शासन नहीं चाहते’. जबकि संजय निरूपम ने कहा- ‘‘यदि कांग्रेस शिवसेना का सरकार बनाने में समर्थन करती है, तो यह कांग्रेस के लिए विनाशकारी कदम होगा.’’

एनसीपी की शर्ते
एनसीपी ने एक तरफ अपने विधायकों की बैठक 12 नवंबर को बुलायी है. तो दूसरी तरफ एनसीपी नेता नवाब मलिक ने शिवसेना के सामने कुछ शर्तें रख दी हैं.

नवाब मलिक ने कहा है- ‘‘मुख्यमंत्री के नाम का निर्णय एकतरफा नही हो सकता. शिवसेना को एनडीए से अलग होना पड़ेगा. शिवसेना के मंत्री अरविंद सावंत को केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देना पड़ेगा.’’

अरविंद सावंत का त्यागपत्र
देर रात तक शिवसेना में मंथन होता रहा और अंततः आज सुबह सुबह अरविंद सावंत ने मराठी भाषा में ट्वीट करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने का ऐलान कर दिया. इससे यह साफ हो रहा है कि मुख्यमंत्री पद पाने के लिए शिवसेना, एनसीपी की हर शर्त मानने को तैयार है. पर यह इतना आसान नही है. शिवसेना को एनडीए से अलग होना पड़ेगा. इससे केंद्र में मोदी सरकार पर असर नहीं पडे़गा. पर शिवसेना को मुंबई महानगर पालिका में भी भाजपा से अलग होना पड़ेगा.

तो अजित पवार होंगे मुख्यमंत्री
इसी बीच सूत्र दावा कर रहे हैं कि शिवसेना व एनसीपी के बीच जो बातचीत में तय हुआ है, उसके अनुसार उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री, एनसीपी नेता अजीत पवार उपमुख्यमंत्री, एनसीपी नेता जयंत पाटिल गृहमंत्री और विधानसभा में अध्यक्ष पद कांग्रेस को मिलेगा.

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शिवसेना एनसीपी व कांग्रेस की सरकार बनने के दूरगामी परिणाम होंगे
यदि शिवसेना ने एनसीपी की सभी शर्तें मान ली और शिवसेना की सरकार बन गयी. तो इसके कई दूरगामी परिणाम होंगे. क्या स्व. बाल ठाकरे के समर्पित लोग यह हजम कर लेंगे कि जिसने उनके नेता को जेल भिजवाया था, उसी के साथ अब सरकार बनाएं.

ज्ञातव्य है कि 2000 में कांग्रेस व एनसीपी गठबंधन की सरकार थी और कभी शिवसेना में रहे छगन भुजबल शिवसेना छोड़कर एनसीपी व कांग्रेस सरकार में गृहमंत्री बने थे, तब बाल ठाकरे को शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ मे छपे एक लेख के चलते गिरफ्तार किया गया था. बाल ठाकर को गिरफ्तार करने का श्रेय छगन भुजबल को गया था. उसके बाद दशहरा रैली में बाल ठाकरे ने ऐलान किया था कि वह देश से ‘पंचक’ को खत्म कर देंगे. उस वक्त उनका इशारा शरद पवार, छगन भुजबल, सोनिया गांधी वगैरह की तरफ था. अब छगन भुजबल एनसीपी की टिकट पर विधायक चुने गए हैं. इसी वजह से सूत्र दावा कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री बनने के लिए उद्धव ठाकरे यदि एनसीपी व कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनाते हैं, तो यह शिवसेना के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है.

प्रफुल पटेल का बयान
एक तरफ शिवसेना ,एनसीपी की हर षर्त आंखमूंदकर मानती जा रही है,तो दूसरी तरफ एनसीपी नेता प्रफुल पटेल ने बयान दिया है कि उनकी पार्टी हर फैसला गंभीरता से सोच समझकर लेगी.

शरद पवार का बयान
उधर अरविंद सावंत द्वारा त्यागपत्र दिए जो कि ट्वीट के बाद शरद पवार ने कहा- ‘‘हमने किसी से भी त्यागपत्र देने के लिए नहीं कहा. मैं आज कांग्रेस से बात करुंगा, उसके बाद ही कोई फैसला लूंगा..’’ कुल मिलाकर शरद पवार व प्रफुल पटेल के बयान से शिवसेना की सरकार को लेकर रहस्य गहरा गया है.

शरद पवार के बयान के बाद संजय राउत बोले
शरद पवार का बयान आने के बाद शिवसेना नेता संजय राउत ने उन्हे उकसाते हुए बयान दिया है- ‘‘महाराष्ट्र के दो अहम पक्ष, कांग्रेस और एनसीपी, बीजेपी की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे थे. मैं दोनों पक्षों से आह्वान करता हूं कि आपके लिए यह परीक्षा की घड़ी है. अगर आपको लगता है कि बीजेपी अच्छा काम नहीं कर रही थी तो अब आप सरकार बना सकते हैं.’’

शिवसेना सांसद संजय राउत ने भाजपा हमला करते हुए कहा- ‘‘अगर दोनों में जो बातचीत हुई थी, उसको माना जाता, तो यह स्थिति नहीं बनती. शिवसेना को मुख्यमंत्री पद नहीं देना है, 50-50 के फौर्म्यूले पर अमल नहीं करना है, चाहे विपक्ष में ही क्यों न बैठना पड़े, बीजेपी के इस अहंकार को मैं महाराष्ट्र की जनता का अपमान मानता हूं.‘’

कर्नाटक की राह पर महाराष्ट्र राजनीति के कई जानकार मानते हैं कि शिवसेना सरकार बना ले, पर टिकेगी नही. यहां भी वही कर्नाटक वाला इतिहास दोहराया जाएगा. संजय निरूपम भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं.

संजय निरूपम का ट्वीट
जबकि कांग्रेस नेता संजय निरूपम ने ट्वीट किया है- ‘चाहे कोई भी, कैसे भी सरकार बनाए लेकिन महाराष्ट्र में बनी राजनीतिक अस्थिरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जल्दी चुनावों के लिए तैयार हो जाइए. चुनाव 2020 में भी हो सकते हैं. क्या हम चुनावों में शिवसेना के पार्टनर के तौर पर जा सकते हैं?‘’

उद्धव ठाकरे ज्योतिष की सलाह पर अड़ गए हैं
ज्योतिष की सलाह पर उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनने का निर्णय लिया शिवसेना और एनसीपी के से जुड़े कुछ सूत्र दावा कर रहे हैं कि वास्तव में जब महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव घेरते हुए उसी वक्त गुजरात के एक ज्योतिष रूपेन आर शाह की सलाह पर यह कदम उठाया. रूपेन आर शाह ने भविष्यवाणी की थी कि उद्धव ठाकरे की कुंडली में इस वक्त प्रबल राज योग है और यदि वह मुख्यमंत्री बनने के लिए जिद कर लेंगे, तो इस बार उन्हे मुख्यमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता. रूपेन आर शाह ने ही भविष्यवाणी की थी कि किसी भी दल को बहुमत नही मिलेगा. चुनाव नतीजे चौंकाने वाले होंगे.

चुनाव के ऐलान के साथ ही शिवसेना ने बढ़ाई थी एनसीपी से नजदीकी
सूत्र बता रहे हैं कि रूपेन आर शाह की इस भविष्यवाणी को सच मानकर उद्धव ठाकरे ने उसी वक्त से अपने सिपहसलाहकारों को काम पर लगा दिया था. एक तरफ वह भाजपा के साथ जुडे़ हुए थे, तो दूसरी तरफ वह एनसीपी के संपर्क में थे. इसी वजह से 11 अक्टूबर को अचानक एनसीपी नेता व शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने कहा था कि बाल ठाकरे को गिरफ्तार करना भूल थी. सूत्रों की माने तो चुनाव की घोषणा के साथ ही शिवसेना व एनसीपी के बीच बंद दरवाजों के अंदर खिचड़ी पकने लगी थी.

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गेहूं की उन्नत खेती कैसे करें

धान्य फसलों में गेहूं की फसल काफी महत्त्वपूर्ण है. भारत में इस का भूसा पशुओं को खिलाते हैं. गेहूं के आटे में खमीर पैदा कर के इस का इस्तेमाल डबलरोटी, बिसकुट वगैरह तैयार करने के लिए किया जाता है. गेहूं प्रोटीन का मुख्य स्रोत है, जिस में औसतन 14.7 फीसदी प्रोटीन पाया जाता है.

भारत में गेहूं का ज्यादातर क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, मध्य प्रदेश वगैरह राज्यों में है. उत्तर प्रदेश देश का सर्वाधिक क्षेत्र 82.19 लाख हेक्टेयर में गेहूं पैदा करने वाला राज्य है. उत्तर प्रदेश गेहूं का सालाना उत्पादन 152.85 लाख टन करता है.

फसल की पूरी अवधि के लिए 10-15 सैंटीमीटर बारिश (पानी) और 25-26 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान सही है.

गेहूं को बलुई दोमट, बलुई, भारी दोमट या चिकनी मिट्टी वगैरह में उगा सकते हैं, लेकिन इन सभी मिट्टी में दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है. जमीन का पीएच मान 5.0 से 7.5 तक मुफीद होता है.

खेत की तैयारी

* बोआई के समय जमीन में 16 फीसदी नमी हो.

* खेत खरपतवाररहित हो.

* 21-22 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान हो, इस से कम या ज्यादा तापमान बीजों के अंकुरण के लिए सही नहीं होता है. खेत की अच्छी तैयारी के लिए खेत को एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए और 3-4 जुताई देशी हल, हैरो या कल्टीवेटर से करनी चाहिए.

* जमीन में नमी बनाए रखने के लिए हर जुताई के बाद पाटा चलाना चाहिए. गेहूं के लिए खेत तब तैयार मानना चाहिए, जब खेत में गीली मिट्टी का लड्डू बना कर ऊपर से छोड़ा जाए तो वह टूटे नहीं.

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* छत्तीसगढ़ राज्य के लिए गेहूं की संस्तुति किस्में सुजाता, संगम, राजकंचन डब्लूएच 147, सी 306 वगैरह हैं.

बोआई का सही समय

गेहूं की बोआई का सही समय 15-30 नवंबर?है, लेकिन इस के बाद बोआई की जाए तो उपज में भारी कमी आने लगती?है. बोआई में देरी होने पर सामान्य अरहर और गेहूं फसल चक्र अपनाना सही होता है.

बीज दर : यह बोने की विधि और समय पर निर्भर है. आमतौर पर 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर सही होता है.

बीजोपचार : बीजों को 2.5 ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित कर लेना चाहिए. इस से फसलों को बीजजनित रोगों से बचाया जा सकता है.

बोआई की गहराई : गेहूं के बीज की बोआई के लिए 5 सैंटीमीटर गहराई सही मानी जाती है. इस से ज्यादा गहराई में बीजों का अंकुरण ठीक से नहीं हो पाता है.

सीड ड्रिल से अच्छी बोआई

गेहूं की बोआई आमतौर पर छिटकवां विधि से, हल के पीछे कूंड़ में, सीड ड्रिल द्वारा या हल के पीछे नाई बांध कर डिब्बर विधियों द्वारा की जाती है. इन सभी विधियों में सीड ड्रिल द्वारा बोआई सब से अच्छी विधि मानी जाती है.

खाद और उर्वरक : मिट्टी जांच के बाद ही खाद की जरूरत का निर्धारण किया जाना चाहिए.

गेहूं की फसल में आमतौर पर 100-200 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40-50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर दिया जाना चाहिए. पोषक तत्त्वों को निम्न ढंग से दिया जाना चाहिए:

* आधा नाइट्रोजन और पूरी फास्फोरस व पोटाश बोआई के समय छिड़काव के रूप में.

* एकचौथाई भाग नाइट्रोजन पहली सिंचाई के बाद (25-30 दिन की अवस्था पर) टौप ड्रैसिंग के दौरान.

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* बाकी एकचौथाई भाग नाइट्रोजन पर्णीय छिड़काव के समय.

जल प्रबंधन : साधारण गेहूं की फसल में 5-6 बार सिंचाई की जरूरत होती है.

* क्राउन रूट इनिटिएशन पर -बोआई के 20-25 दिन बाद.

* कल्ले फूटने पर – बोआई के 40-50 दिन बाद.

* गांठ बनने की अवस्था पर – बोआई के 60-65 दिन बाद.

* फूल आने के समय – बोआई के 90-95 दिन बाद.

* दानों में दूध पड़ने पर – 110-115 दिन बाद.

* दाना कड़ा होने पर – बोआई के 120-125 दिन बाद.

फसल सुरक्षा

खरपतवार पर नियंत्रण : गेहूं की खरपतवार मुख्य रूप से पोआ घास, जंगली जई, कृष्णनील, हिरनखुटी, गेहूं का मामा (गुल्लीडंडा, बंदराबंदरी) वगैरह पाए जाते हैं. इन की रोकथाम खुरपी से की जा सकती है, इन खरपतवारों को रासायनिक विधि से खत्म करने के लिए भी खरपतवानाशी का उपयोग किया जाता है. कम चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों जैसे गेहूं का मामा व जंगली जई के लिए आइसोप्रोट्यूरौन की 0.75 से 1.0 किलोग्राम दवा को 800-1000 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से अंकुरण से पहले या बाद में 30-35 दिन की अवस्था में करना सही होता है.

रोग नियंत्रण : गेहूं में मुख्य रूप से गेरूई और कंडुआ रोग का प्रकोप अधिक होता है.

गेरूई: इसे रतुआ रोग भी कहते?हैं. इस रोग में पत्तियों पर जंग लगा हुआ जैसा लवण दिखाई देता?है, इस की रोधक किस्में हैं:

* एचडी 2009 (अर्जुन), यूपी 262, सोनालिका.

* इस की रोकथाम डाइथेन एम 45 या डाइथेन जैड 78 की दवा को 0.2 फीसदी के हिसाब से पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

कंडुआ रोग : इस रोग में बालियों पर काला चूर्ण बन जाता है, जिस से पूरी बाली खराब हो जाती है. इस की रोकथाम के लिए केवल प्रमाणित बीज ही बोएं.

बीजोपचार के लिए 0.25 फीसदी की दर से थीरम या बीटावैक्स का इस्तेमाल करना चाहिए.

कीट नियंत्रण

गेहूं का एफिड : यह कीट पौधों में दाना पड़ने की अवस्था में लगता?है, जो बालियों में पड़े दानों का रस चूसता है. इस की रोकथाम बीएचसी या 0.2 फीसदी फौलीडौल के छिड़काव से की जाती?है.

दीमक : इस कीट की रोकथाम के लिए एल्ड्रिन की 5 फीसदी धूल 20-30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से करनी चाहिए.

कटाई : फसल पकने पर पत्तियां व बालियां सूख जाती हैं और बालियां मुड़ कर झुक जाती हैं. ऐसी अवस्था में फसल की कटाई की जानी चाहिए.

उपज : बौनी किस्मों में 40-50 क्विंटल दाना प्रति हेक्टेयर और 60-65 क्विंटल भूसा हासिल किया जा सकता है. देशी किस्मों से 25-30 क्विंटल दाना ही मिल पाता है.

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पत्नी के जाल में हलाल हुआ पति: भाग 1

10जुलाई, 2019 का सवेरा था. उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के चिली गांव के कुछ लोग खेतों की तरफ जा रहे थे. जैसे ही वे लोग राजवीर शर्मा के बाग की पगडंडी पर पहुंचे तो

उन में शामिल रामप्रसाद की नजर आम के एक पेड़ के नीचे पड़ी लाश पर गई.

रामप्रसाद ने अपने साथ वाले लोगों को इस बारे में बताया तो सभी उत्सुकतावश लाश के नजदीक पहुंच गए. लाश को देख कर वे सभी चौंक गए. क्योंकि लाश उसी गांव के रहने वाले प्रवीण कुमार की थी.

लाश की खबर मिलते ही उधर से गुजरने वाले लोग भी वहां जमा होने लगे. सभी इस बात पर अचरज में थे कि इतने भले इंसान की पता नहीं किस ने हत्या कर दी. कुछ ही देर में गांव में खबर फैली तो लोगों का वहां मजमा लगना शुरू हो गया.

उसी दौरान किसी ने मृतक के छोटे भाई नवीन तथा मृतक की पत्नी रानी को उस के कत्ल की जानकारी दे दी. पति की हत्या की खबर सुनते ही रानी छाती पीटपीट कर रोने लगी. नवीन ने उसे समझायाबुझाया. वह देवर के साथ बिलखती हुई उस जगह पहुंची जहां पति की रक्तरंजित लाश पड़ी थी.

उसी दौरान किसी ने इस की सूचना फोन कर के थाना डकोर को दे दी. थोड़ी देर में थानाप्रभारी विनोद मिश्रा, एसआई त्रिलोकी नाथ और 4 सिपाहियों के साथ वहां पहुंच गए.

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घटनास्थल पर पहुंच कर विनोद मिश्रा और त्रिलोकी नाथ मौकामुआयना करने में लग गए. प्रवीण का शव खेत के किनारे आम के पेड़ के नीचे पड़ा था. उस के चेहरे और गरदन पर कटने के गहरे घाव थे. लगता था उस पर किसी धारदार हथियार से वार किया गया था.

प्रवीण की उम्र यही कोई 50 वर्ष के आसपास थी, वह शरीर से हृष्टपुष्ट था. देखने से ऐसा लगता था कि उस की हत्या कहीं और कर के शव वहां फेंका गया था.

थानाप्रभारी विनोद मिश्रा ने मृतक के भाई नवीन से पूछताछ की तो उस ने बताया कि प्रवीण ज्यादातर खेत पर ही सोता था. वहां उस ने छप्पर डाल रखा था. उसी के नीचे चारपाई डाल कर सोता था. वह नशे का आदी था. प्रवीण की लाश जहां पड़ी थी, उस से 10 खेत दूर ही उस का खेत था.

थानाप्रभारी वहां पहुंचे तो यह देख कर दंग रह गए कि वहां न प्रवीण की चारपाई थी और न ही बिस्तर. यहां, शराब की 2 खाली बोतलें तथा डिसपोजेबल गिलास जरूर पड़े थे. छप्पर के नीचे जमीन पर खून भी पड़ा था.

यह देख कर थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि प्रवीण की हत्या इसी स्थान पर की गई थी और शव वहां ले जा कर फेंक दिया. सबूत मिटाने के लिए हत्यारों ने मृतक की चारपाई तथा बिस्तर भी गायब कर दिया था. उन्होंने यह भी अनुमान लगाया कि हत्यारे प्रवीण के परिचित ही होंगे क्योंकि उस ने उन के साथ शराब पी होगी. पुलिस ने वहां मिले सबूत जब्त कर लिए.

थानाप्रभारी ने गांव वालों से पूछताछ की तो पता चला प्रवीण कुमार निहायत शरीफ और नेक चालचलन का था. गांव में या बाहर उस की किसी से रंजिश या दुश्मनी नहीं थी. कुछ सालों से उस में एक बुराई घर कर गई थी कि वह शराब पीने लगा था. इसी वजह से उस का पत्नी से विवाद रहता था, जिस से वह खेतों पर सोने लगा था.

इसी बीच सूचना मिलने पर एसपी स्वामी प्रसाद  एएसपी अवधेश सिंह और डीएसपी संतोष कुमार भी वहां आ गए. इन पुलिस अधिकारियों ने भी मौकामुआयना किया. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया.

मामले की जांच का भार विनोद मिश्रा ने अपने ही हाथों में रखा. उन्होंने मृतक प्रवीण कुमार की पत्नी रानी से बात की. प्रवीण के भाई नवीन ने उस के कुशल व्यवहार की तो तारीफ की लेकिन शराब की लत को बुरा बताया. उस ने यह भी बताया कि प्रवीण भैया कुछ समय से किसी बात को ले कर परेशान रहते थे. परेशानी की वजह क्या थी, यह उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया था.

पत्नी रानी ने बताया कि नीलगाय वगैरह फसल को नुकसान पहुंचाती थीं, इसलिए उन्होंने खेत पर छप्पर डाल लिया था. वह रात को वहीं सोते थे. कभीकभी जब वह यारदोस्तों के साथ ज्यादा शराब पी लेते थे तो घर पर भी नहीं आते थे. कल रात भी वह खाना खाने नहीं आए थे. देवरभाभी दोनों से पूछताछ करने के बाद पुलिस को ऐसा कोई क्लू नहीं मिला, जिस से जांच आगे बढ़ाई जा सके.

पुलिस को मृतक की पत्नी रानी और भाई नवीन पर शक हो रहा था. लिहाजा थानाप्रभारी ने मुखबिरों को लगा दिया. 13 जुलाई, 2019 को एक मुखबिर ने थानाप्रभारी को बताया कि मृतक की पत्नी रानी और बबलू के बीच चक्कर चल रहा था और 9 जुलाई की रात को बबलू रानी के घर आया था. कुछ देर वहां रुकने के बाद वह चला गया था.

बबलू का नाम सुनते ही थानाप्रभारी विनोद मिश्रा चौंके. क्योंकि बबलू पेशेवर अपराधी था. थाना डकोर के अलावा भी उस के खिलाफ कई थानों में मुकदमे दर्ज थे. मामले की तह में जाने के लिए थानाप्रभारी ने उसी दिन दोपहर के समय रानी को पूछताछ के लिए थाने बुलवाया.

रानी ने थाने में पहले वाला बयान ही दोहरा दिया. उन्होंने उस से 2 घंटे तक पूछताछ की लेकिन वह टस से मस नहीं हुई. तब उन्होंने 2 महिला कांस्टेबलों को बुला लिया. महिला पुलिस ने रानी से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने सच उगल दिया. उस ने स्वीकार किया कि उस ने ही प्रेमी से पति की हत्या बबलू व उस के साथी लाखन की मदद से कराई थी.

रानी द्वारा पति की हत्या का जुर्म कबूल करने के बाद थानाप्रभारी विनोद मिश्रा ने बबलू तथा उस के साथी लाखन को डकोर बस स्टैंड से गिरफ्तार कर लिया. दोनों कहीं फरार होने के लिए बस का इंतजार कर रहे थे.

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थाने में जब उन से प्रवीण की हत्या के संबंध में पूछा गया तो दोनों साफ मुकर गए. लेकिन जब थाने में उन का सामना रानी से कराया तो लाखन और बबलू का चेहरा लटक गया. फिर उन दोनों ने भी सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया.

उन की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी बरामद कर ली. वह उन्होंने कुल्हाड़ी एक सूखे कुएं में फेंक दी थी. उसी कुएं से पुलिस ने मृतक की चारपाई तथा खून सना बिस्तर भी बरामद कर लिया. यही नहीं, कातिलों ने वह ट्रैक्टर ट्रौली भी बरामद करा दी, जिस पर रख कर वह लाश, बिस्तर व चारपाई लाद कर ले गए थे.

हत्यारोपियों के गिरफ्तार होने के बाद पुलिस ने उन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. केस का खुलासा व अभियुक्तों को गिरफ्तार करने की जानकारी थानाप्रभारी ने एसपी स्वामी प्रसाद को दे दी थी.

एसपी ने पुलिस सभागार में प्रैसवार्ता कर के अभियुक्तों को मीडिया के समक्ष पेश कर घटना का खुलासा कर दिया. पुलिस पूछताछ में एक ऐसी औरत की कहानी प्रकाश में आई, जिस ने जिस्म की भूख के लिए अपना सुहाग मिटा दिया.

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले का एक बड़ा कस्बा उरई है. यहां बड़े पैमाने पर गल्ले का व्यापार होता है. जालौन में आवागमन के साधन कम होने से सभी सरकारी काम उरई में ही संपन्न होते हैं. यहां तक कि जिला न्यायालय भी उरई में ही है. अत: यहां हर रोज चहलपहल रहती है. इसी उरई कस्बे में स्टेशन रोड पर अरविंद कुमार अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रामवती के अलावा 3 बेटियां थीं, जिस में रानी तीसरे नंबर की थी. अरविंद कुमार की स्टेशन रोड पर चाय की दुकान थी.

रानी अपनी अन्य बहनों से ज्यादा खूबसूरत थी. उस का स्वभाव भी चंचल था. 20 साल की उम्र पार करते ही अरविंद कुमार ने रानी का विवाह जालौन के डकोर थाना क्षेत्र के गांव चिली निवासी बिंदा प्रसाद के बड़े बेटे प्रवीण कुमार के साथ कर दिया. प्रवीण कुमार पिता के साथ खेतीकिसानी करता था. उस का छोटा भाई नवीन पढ़ रहा था. घर में संपन्नता थी.

रानी जब अपनी ससुराल पहुंची तो उस का वहां मन नहीं लगा. क्योंकि वह शहर में पलीबढ़ी थी, इसलिए उसे गांव का माहौल पसंद नहीं आया. उस ने पति पर दबाव डाला कि वह गांव छोड़ कर शहर चले. वहां कोई नौकरी या व्यवसाय करे. लेकिन प्रवीण ने पत्नी के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और शहर जाने से साफ मना कर दिया. उस के बाद रानी मन मार कर रह गई.

रानी गांव में रह तो गई लेकिन उस ने धीरेधीरे पति को अपनी अंगुलियों पर नचाना शुरू कर दिया था. प्रवीण रानी को खुश रखने के लिए हरसंभव प्रयास करता था लेकिन तुनकमिजाज रानी खुश नहीं रहती थी. कभी वह खर्चा न मिलने का रोना रोती तो कभी अपने भाग्य को कोसती.

समय बीतते परिवार का खर्च बढ़ा और खेती की उपज से दोनों भाइयों का गुजारा होना मुश्किल हो गया. घर में कलह शुरू हो गई. रानी वैसे भी सासससुर और देवर को पसंद नहीं करती थी. वह उन से झगड़ा करती रहती थी. अत: बिंदा प्रसाद ने दोनों बेटों का  बंटवारा कर दिया.

बंटवारे के बाद प्रवीण रानी के साथ अलग मकान में रहने लगा. अलग रहने पर रानी स्वच्छंद हो गई. जब उस का मन करता, मायके चली जाती और जब मन करता वापस आ जाती. उसे रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था.

कालांतर में रानी 2 बच्चों एक बेटे और एक बेटी की मां बनी. बच्चों के बाद घर में खुशियां बढ़ गईं. वे दोनों बच्चों को बेहद प्यार करते थे और उन्हें खुश रखने का हर प्रयास करते थे. रानी खुद तो ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी लेकिन वह बच्चों को खूब पढ़ाना चाहती थी.

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गांव में प्राथमिक शिक्षा के बाद रानी ने दोनों बच्चों को अपने मायके उरई भेज दिया. प्रवीण बच्चों को अपने से दूर नहीं भेजना चाहता था, लेकिन पत्नी के आगे उस की एक न चली. लिहाजा बच्चे ननिहाल में रह कर पढ़ने लगे.

प्रवीण की जैसेजैसे उम्र बढ़ती जा रही थी, वह पत्नी से दूर होता जा रहा था. अब वह पत्नी का उतना ध्यान नहीं रखता था, जिस से रानी के पैर देहरी लांघने के लिए उतारू हो गए.

क्रमश:

  —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

इन खास टिप्सों को अपनाकर बनाएं रिश्तों में ताजगी

शादी के कई साल बाद भी एकदूसरे की बातें, स्पर्श और शरारतें उत्साहित करती रहें और साथ गुजारे पल की खूबसूरत यादें व रोमांटिक पल बासी न होने पाएं, इस के लिए आप को इन्हें सहेजना होगा ताकि रिश्तों में मिठास बनी रहे.

आप की शादी के कुछ साल हो गए. अब आप दिन में कितनी बार एकदूसरे का हाथ थामते हैं? आंखों से कितनी बार एकदूसरे को मौन निमंत्रण देते हैं? कितनी बार एकदूसरे को गले लगाते हैं? अगर आप का जवाब नकारात्मक है, तो संभल जाएं क्योंकि यह आप के रिश्तों की मिठास को कड़वाहट में बदलने की शुरुआत है. वैसे घबराने की कोई बात नहीं है, क्योंकि रिश्तों की ताजगी कहीं जाती नहीं. बस, भीड़ भरे रास्तों पर गुम हो जाती है. इसे ढूंढ़ने के लिए यहां दी गई बातों पर अमल करेंगे, तो बदलाव खुद ब खुद महसूस करेंगे.

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करें कुछ नया

कहा जाता है कि प्यार एक एहसास है, लेकिन सच तो यह है कि शादी के बाद प्यार सिर्फ एक एहसास नहीं होता. बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में जिन बातों को अपनाने से हमारे जीवनसाथी को खुशी, संतुष्टि, नयापन मिलता हो, वही प्यार है. पति को गिफ्ट देना, मदद करना, लैटर लिखना आम बातें हैं. अब यह परिपाटी बहुत पुरानी हो चुकी है.

आप कुछ ऐसा अलग हट कर करें, जिस में नयापन हो. जैसे, विशेष अवसरों पर अपने पति को गिफ्ट तो सभी देते हैं, लेकिन शौपिंग कांपलैक्स में जब आप उन की पसंद की चीज उन्हें रोमांटिक अंदाज में देंगी, तो उपहार का मजा दोगुना हो जाएगा.

बीती बातों को याद करें

रोजरोज की जाने वाली एक जैसी बातों से अकसर बोरियत होने लगती है. ऐसे में कुछ अलग हट कर करें. जैसे, अगर आप की लव मैरिज है तो पति से सवाल करें कि अगर घर वाले आसानी से शादी के लिए न माने होते, तो? अगर हमारी शादी न हुई होती, तब तुम क्या करते? क्या तुम मेरे बिना रह पाते? ऐसे सवाल करने पर वे सोच में पड़ जाएंगे, पर बातों के जवाब अच्छे मिलेंगे, जो आप की बातचीत को एक नयापन देंगे. इसी तरह दोनों एकदूसरे को अपने कुछ अच्छे पलों को याद दिलाएं. यदि आप दोनों कामकाजी हैं, तो दफ्तर में फुरसत पाते ही मौका ढूंढ़ कर एकदूसरे को फोन करें. वह भी उसी शिद्दत के साथ, जैसे शादी के शुरुआती दिनों में आप किया करते थे.

हमेशा की तरह फाइव स्टार होटल में कैंडल लाइट डिनर करने के बजाय किसी छोटे से पुराने रेस्तरां में सरप्राइज डिनर पर जाएं, जहां आप शादी से पहले भी जाया करते थे. आप दोनों कालेज के उन पुराने दोस्तों को बुला कर, जिन्होंने आप का हर पल साथ दिया हो, छोटी सी पार्टी दें. ऐसा करने से आप की पुरानी यादें ताजा होंगी. कभीकभी पति के लिए भी तैयार हो जाएं. यकीन मानिए, वे खुश हो जाएंगे आप का यह रूप देख कर.

छेड़छाड़ का सहारा लें

इस के साथ ही आप छोटीमोटी चुहलबाजी और छेड़खानी करना शुरू कर दें. पति से फ्लर्ट करने पर जो मजा आएगा, वह कभी कालेज में लड़कों को छेड़ने पर भी नहीं आया होगा. पति को कोई अजनबी लड़का समझ छेड़ें और परेशान करें. कभी उन के औफिस बैग में बेनाम लव लैटर और कार्ड रख दें, तो कभी एक दिन में कई बार उन के फोन पर अननोन नंबर से मिस्ड कौल दें. फिर देखिएगा, यह पता लगते ही कि यह शरारत करने वाली आप थीं, वे कैसे आप से मिलने के लिए बेचैन हो उठते हैं.

सजना के लिए सजना

पार्टी या शादी में जाने के लिए तो सभी सजते हैं, लेकिन क्या कभी ऐसा हुआ है कि आप अपने पति के लिए तैयार हुई हों. इसे बेकार की झंझट मत समझिए. जब आप बिना किसी मौके के उन के मनपसंद रंग में सज कर उन के पास जाएंगी, जो सिर्फ उन के लिए होगा, तो यकीनन उन की नजरें आप पर से हटेंगी नहीं.

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इन्हें नजरअंदाज न करें

– वे जोड़े ज्यादा खुश रहते हैं, जो शाम को अपनी शिकायतों का पिटारा नहीं खोलते. शिकायत करने पर पतिपत्नी एकदूसरे से बचने के बहाने ढूंढ़ने लगते हैं.

– वे पतिपत्नी ज्यादा खुश रहते हैं जिन का कम से कम एक शौक आपस में मिलता हो. ऐसी रुचियां उन्हें आपस में बांधे रखती हैं तथा रिश्तों में प्रगाढ़ता लाती हैं.

– कुछ शब्दों को बारबार कहना और सुनना अच्छा लगता है. जैसे, ‘आई लव यू’, ‘आई एम औलवेज विद यू’ आदि. इस से पार्टनर को एहसास होता है कि आप कितने लविंग और केयरिंग हैं.

– कुछ शारीरिक स्पर्श ऐसे होते हैं, जो पार्टनर को आप की भावना समझने में मदद करते हैं. जैसे, जातेजाते कंधा टकराते जाना, पार्टनर का हाथ दबाना या छू लेना और खाना खाते समय टेबल के नीचे से पैरों का स्पर्श या हाथ पकड़ लेना.

इस दिशा में बहती है यह नदी

देश की अधिकतर नदियां एक ही दिशा में बहती हैं. यह दिशा है पश्चिम से पूर्व. सारी नदियों का बहाव पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर ही है. पर क्या आप जानते हैं कि देश में एक ऐसी भी नदी  है, जो पश्चिम से पूर्व नही बहती है.  आपको बता दें, यह नदी पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर बहती है. विपरीत दिशा में बहने वाली उस नदी का नाम है नर्मदा.

नर्मदा नदी का एक अन्य नाम रेवा भी है.गंगा सहित अन्य नदियां जहां पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं, वहीं नर्मदा नदी बंगाल की खाड़ी की बजाय अरब सागर में जाकर मिलती है.

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नर्मदा नदी भारत के मध्य भाग में पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली मध्य प्रदेश और गुजरात की एक मुख्य नदी है, जो मैखल पर्वत के अमरकंटक शिखर से निकलती है. इस नदी के उल्टा बहने का भौगोलिक कारण इसका रिफ्ट वैली में होना है, जिसकी ढाल विपरीत दिशा में होती है. इसलिए इस नदी का बहाव पूर्व से पश्चिम की ओर है.

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वो लौट कर आएगा : भाग 2

नीलमणि तब ग्रेजुएशन के द्वितीय वर्ष में थी. पढ़ाई में तो तेज थी ही, सुन्दरता में भी किसी रूपसी राजकुमारी से कम नहीं लगती थी. गोरी रंगत, लम्बे रेशमी बाल, ऊंचा कद, छरहरा बदन और सबसे खूबसूरत थीं उसकी आंखें. उसकी नीली-हरी आंखों के कारण ही मां-बाप ने उसका नाम नीलमणि रखा था. विजय सिंह और उनकी पत्नी शारदा की इकलौती संतान थी नीलमणि. पूरे लाड-प्यार में पली बच्ची. गांव में विजय सिंह के पास काफी खेतीबाड़ी थी. बड़ा नाम-सम्मान भी था. चाहते तो ठाठ से गांव वाली हवेली में रहते, मगर बीए की डिग्री प्राप्त विजय सिंह को जब इलाहाबाद की एक इन्शोरेंस कम्पनी से नौकरी का ऑफर आया तो गांव वाली जमीनें और हवेली छोटे भाई के हवाले कर पत्नी सहित इलाहाबाद चले आये. यहां उन्होंने चार कमरों का बड़ा मकान ले लिया. दोनों पति-पत्नी आराम से रहने लगे. पैसे की तंगी कभी रही नहीं, मगर एक कमी थी जो दूर नहीं हो रही थी. उनके घर का आंगन बच्चे की किलकारी के बिना सूना-सूना सा था.

आखिर शादी के बारह बरस बाद जब बड़ी मिन्नत-आरजू और दवा-दारू के बाद विजय सिंह और शारदा को नीलमणि के रूप में कन्या-रत्न की प्राप्ति हुई तो दोनों की खुशियों का तो जैसे कोई ठिकाना ही न रहा. पूरे मोहल्ले में देसी घी की मिठाईयां बंटवायीं गयीं. खूब गाना-बजाना हुआ. किन्नरों की टोलियों को मुट्ठी भर-भर के रुपये बांटे थे विजय सिंह ने और खूब दुआएं ली थीं. उनके घर में तो जैसे साक्षात लक्ष्मी आयी थी. इतनी सुन्दर कन्या पाकर विजय सिंह निहाल हुए जाते थे. दूध सी गोरी, रेशम सी कोमल और नीलम सी नीली-नीली आंखों वाली बच्ची को देखते ही उन्होंने उसका नाम नीलमणि रख दिया था. विजय और शारदा के दिन-रात अपनी बच्ची को पालने-पोसने में गुजरने लगे. नीलमणि को प्यार से घर में सब नीलू कहकर पुकारते थे. नीलू पापा की बड़ी दुलारी थी. उसकी अच्छी-बुुरी, सही-गलत सारी मांगें वह हंस-हंसकर पूरी करते थे. अपनी लाडली बेटी की आंखों में आंसू का एक कतरा भी विजय सिंह बर्दाश्त नहीं कर पाते थे. उनकी बड़ी इच्छा थी कि वह अपनी बेटी को खूब पढ़ाएं और किसी डॉक्टर या इंजीनियर से उसका ब्याह कराएं. नीलमणि पढ़ाई में बहुत अच्छी थी. हर कक्षा में अव्वल. हाईस्कूल और इंटरमीडियट की परीक्षाएं भी उसने बहुत अच्छे अंकों में पास कीं. कॉलेज में आने के बाद जहां उसकी सहेलियां फैशनपरस्ती की चपेट में आकर पढ़ाई में पिछड़ रही थीं, वहीं नीलमणि पर कॉलेज के खुले-खुले वातावरण का कोई गलत प्रभाव नहीं पड़ा था. पढ़ाई के प्रति उसका जुनून पहले जैसा ही था, बस जरा अंग्रेजी विषय में उसे थोड़ी परेशानी थी. अंग्रेजी के बड़े साहित्यकारों के लेख, कविताएं और कहानियां समझने में थोड़ी परेशानी होती थी, पर उसने भी जिद पकड़ ली थी कि ग्रेजुएशन की पढ़ाई वह अंग्रेजी विषय लेकर ही करेगी.

उन्हीं दिनों की बात है जब एक दिन शरद किराये का कमरा ढूंढते-ढूंढते उसके घर आया था. मोहल्ले में किसी ने उसको बताया था कि विजय सिंह के मकान में ऊपर वाला कमरा खाली पड़ा है. किराया भी कम है. सो शरद पूछते हुए चला आया था. लम्बी देह, गोरी रंगत, गोल चेहरे पर पतली-पतली मूंछें, कुल मिलाकर एक कड़ियल नौजवान था. पूरा नाम था – शरद सिंह चौहान. रामपुर से आया था. इलाहाबाद की एक प्राइवेट फर्म में सेल्स मैनेजर के पद पर नियुक्ति मिली थी. अकेला था. दो साल पहले मां-बाप की एक ट्रेन दुर्घटना में मौत हो गयी थी. रामपुर में मां-बाप की यादें जीने नहीं देती थीं, तो अपना शहर छोड़ कर यहां नौकरी तलाश ली थी. उसके मुख से उसकी यह करुण कथा सुनकर विजय सिंह का हृदय पसीज गया. उन्होंने अपनी पत्नी शारदा से ऊपर वाले कमरे की चाबी मंगवा कर उसके हाथ पर रख दी. पहले एक परिवार उस कमरे में किराये पर रहता था. उनके जाने के बाद से ही वह कमरा खाली पड़ा था. थोड़ी झाड़पोछ की जरूरत थी, जिसके लिए उन्होंने शारदा को बोल दिया था. विजय सिंह को शरद बहुत ही संस्कारी और सलीकेदार लड़का लगा था. फिर उसकी नौकरी भी अच्छी थी. मैनेजर के पद पर कार्यरत था. लम्बे समय तक इलाहाबाद में रहने वाला था. उसने किराये में भी किसी तरह की कटौती की बात नहीं की थी, वरना किरायेदार तो किराया सुनते ही मोलभाव करने लगते हैं. विजय सिंह के मन में भी लालच था, उनका भी रिटायरमेंट करीब था, चलो इसी बहाने किराये के दस हजार रुपये हर महीने मिलते रहेंगे, फिर अपनी ही जात-धर्म का लड़का है, पढ़ा-लिखा और बातचीत में सभ्य-सुशील है. शरद के पास ज्यादा सामान भी नहीं था. एक बैग और एक बड़ा सूटकेस ही था. दस हजार किराया और दस हजार रुपये सिक्योरिटी के देकर उसने चाबी ले ली.

शाम को नीलू कौलेज से लौटी तो आंगन में पिता के साथ बैठे आगन्तुक को देखकर सकुचा गयी. शरद को धीरे से नमस्ते करके वह अपने कमरे की तरफ मुड़ी ही थी कि पिता ने उसको रोक कर शरद से उसका परिचय करवाया. नीलमणि को पहली ही नजर में शरद की पर्सनैलिटी भा गयी थी. उसके चेहरे की मासूमियत और झुकी-झुकी नजरें उसे बहुत भली लगी थी. वरना कॉलेज में तो नीलू को देखकर लड़के अपनी पलकें झपकाना भूल जाते थे. मां से नीलू को पता चला कि शरद ऊपर वाले कमरे में रहेगा. वह कमरा नीलू के कमरे के ठीक ऊपर था और सीढ़ियां उसके कमरे के बगल से होकर जाती थीं.

चार-पांच दिन तक तो शरद के चाय-खाने का इंतजाम नीलू की मां ने ही किया, फिर शरद ने पास के होटल से अपने खाने का बंदोबस्त कर लिया. हां, सुबह की चाय जरूर कभी नीलू की मां तो कभी नीलू उसके कमरे में पहुंचा जाती थीं. नीलू और शरद के बीच काफी समय तक सकुचाहट बनी रही थी. सुबह-सुबह नीलू शरमाई-शरमाई सी उसके कमरे के दरवाजे पर आकर प्याला पकड़ा जाती थी और वह भी नजरें नीचे किये चुपचाप प्याला उसके हाथ से ले लेता था. दोनों के बीच बस हां… हूं… तक ही बात सीमित थी. सुबह का वक्त ही दोनों का आमना-सामना होता था. विजय सिंह के घर में नीचे के आंगन के कोने में ही टायलेट-बाथरूम बना हुआ था. सुबह नीलू को भी कौलेज जाने की जल्दी होती थी और विजय सिंह और शरद को भी निकलना होता था. शुरू के दिनों में जब शरद तौलिया कंधे पर डाले बाथरूम की ओर आता तो पता चलता कि नीलू अन्दर है, कभी नीलू को जल्दी होती तो शरद अन्दर नहा रहा होता. कभी-कभी विजय सिंह भी बाथरूम के आगे लेफ्ट-राइट करते नजर आते, मगर धीरे-धीरे सब एडजस्ट हो गया. नीलू सुबह जल्दी उठने लगी. सात बजे से पहले ही वह नित्यक्रम निपटा कर बाथरूम खाली कर देती थी. इससे विजय सिंह और शरद दोनों को आसानी हो गयी. नीलू के जल्दी उठने से उसकी मां को भी किचेन में थोड़ी मदद मिलने लगी. एक बाहरी व्यक्ति के आ जाने से घर में कुछ-कुछ दूसरे बदलाव भी शुरू हो गये थे. नीलू कॉलेज से लौट कर पूरे घर को थोड़ा टाइडी कर देती थी. सारी चीजें अब जगह पर नजर आती थीं. किसी चीज पर धूल का कण भी नहीं दिखता था. कपड़े-तौलिये पहले आंगन में कपड़े सुखाने की रस्सी पर ही लटके रहते थे, मगर अब नीलू घर आते ही सारे कपड़े तह करके अलमारी में रख देती थी. खाने की मेज पर रखा गुलदान भी अब हमेशा ताजे फूलों से सजा रहता था. नीलू लौटते समय कुछ फूल पार्क से तोड़ लाती थी. नीलू अपना कमरा भी खूब साफ-सुथरा और सजा कर रखने लगी थी. दरअसल शरद के कमरे में जाने के लिए सीढ़ियां नीलू के कमरे के बगल से ही जाती थीं और उसके साथ लगी बड़ी सी खिड़की से नीलू के कमरे का पूरा दृश्य साफ दिखता था. नीलू नहीं चाहती थी कि शरद उसके कमरे को कभी गंदा पड़ा देखे. इसलिए वह हर चीज करीने से सजा कर रखने लगी थी. साफ और सुन्दर-चटक रंगों वाली बेडशीट बिस्तर पर डालने लगी थी. यह बदलाव इस बात का संकेत थे कि नीलू शरद की पर्सनेलिटी से प्रभावित थी.

एक डाली के तीन फूल : भाग 2

‘‘मीना, जिस तरीके से हम दीवाली मनाते हैं उसे दीवाली मनाना नहीं कहते. सब में हम अपने इन रीतिरिवाजों के मामले में इतने संकीर्ण होते जा रहे हैं कि दीवाली जैसे जगमगाते, हर्षोल्लास के त्योहार को भी एकदम बो िझल बना दिया है. न पहले की तरह घरों में पकवानों की तैयारियां होती हैं, न घर की साजसज्जा और न ही नातेरिश्तेदारों से कोई मेलमिलाप. दीवाली से एक दिन पहले तुम थके स्वर में कहती हो, ‘कल दीवाली है, जाओ, मिठाई ले आओ.’ मैं यंत्रवत हलवाई की दुकान से आधा किलो मिठाई ले आता हूं. दीवाली के रोज हम घर के बाहर बिजली के कुछ बल्ब लटका देते हैं. बच्चे हैं कि दीवाली के दिन भी टेलीविजन व इंटरनैट के आगे से हटना पसंद नहीं करते हैं.’’

थोड़ी देर रुक कर मैं ने मीना से कहा, ‘‘वैसे तो कभी हम भाइयों को एकसाथ रहने का मौका मिलता नहीं, त्योहार के बहाने ही सही, हम कुछ दिन एक साथ एक छत के नीचे तो रहेंगे.’’ मेरा स्वर एकदम से आग्रहपूर्ण हो गया, ‘‘मीना, इस बार भाई साहब के पास चलो दीवाली मनाने. देखना, सब इकट्ठे होंगे तो दीवाली का आनंद चौगुना हो जाएगा.’’

मीना भाई साहब के यहां दीवाली मनाने के लिए तैयार हो गई. मैं, मीना, कनक व कुशाग्र धनतेरस वाले दिन देहरादून भाईर् साहब के बंगले पर पहुंच गए. हम सुबह पहुंचे. शाम को गोपाल पहुंच गया अपने परिवार के साथ.

मुझे व गोपाल को अपनेअपने परिवारों सहित देख भाई साहब गद्गद हो गए. गर्वित होते हुए पत्नी से बोले, ‘‘देखो, मेरे दोनों भाई आ गए. तुम मुंह बनाते हुए कहती थीं न कि मैं इन्हें बेकार ही आमंत्रित कर रहा हूं, ये नहीं आएंगे.’’

‘‘तो क्या गलत कहती थी. इस से पहले क्या कभी आए हमारे पास कोई उत्सव, त्योहार मनाने,’’ भाभीजी तुनक कर बोलीं.

‘‘भाभीजी, आप ने इस से पहले कभी बुलाया ही नहीं,’’ गोपाल ने  झट से कहा. सब खिलखिला पड़े.

25 साल के बाद तीनों भाई अपने परिवार सहित एक छत के नीचे दीवाली मनाने इकट्ठे हुए थे. एक सुखद अनुभूति थी. सिर्फ हंसीठिठोली थी. वातावरण में कहकहों व ठहाकों की गूंज थी. भाभीजी, मीना व गोपाल की पत्नी के बीच बातों का वह लंबा सिलसिला शुरू हो गया था, जिस में विराम का कोई भी चिह्न नहीं था. बच्चों के उम्र के अनुरूप अपने अलग गुट बन गए थे. कुशाग्र अपनी पौकेट डायरी में सभी बच्चों से पूछपूछ कर उन के नाम, पते, टैलीफोन नंबर व उन की जन्मतिथि लिख रहा था.

सब से अधिक हैरत मु झे कनक को देख कर हो रही थी. जिस कनक को मु झे मुंबई में अपने पापा के बड़े भाई को इज्जत देने की सीख देनी पड़ रही थी, वह यहां भाई साहब को एक मिनट भी नहीं छोड़ रही थी. उन की पूरी सेवाटहल कर रही थी. कभी वह भाईर् साहब को चाय बना कर पिला रही थी तो कभी उन्हें फल काट कर खिला रही थी. कभी वह भाई साहब की बांह थाम कर खड़ी हो जाती तो कभी उन के कंधों से  झूल जाया करती. भाई साहब मु झ से बोले, ‘‘श्याम, कनक को तो तू मेरे पास ही छोड़ दे. लड़कियां बड़ी स्नेही होती हैं.’’

भाई साहब के इस कथन से मु झे पहली बार ध्यान आया कि भाई साहब की कोई लड़की नहीं है. केवल 2 लड़के ही हैं. मैं खामोश रहा, लेकिन भीतर ही भीतर मैं स्वयं से बोलने लगा, ‘यदि हमारे बच्चे अपने रिश्तों को नहीं पहचानते तो इस में उन से अधिक हम बड़ों का दोष है. कनक वास्तव में नहीं जानती थी कि पापा के बिग ब्रदर को ताऊजी कहा जाता है. जानती भी कैसे, इस से पहले सिर्फ 1-2 बार दूर से उस ने अपने ताऊजी को देखा भर ही था. ताऊजी के स्नेह का हाथ कभी उस के सिर पर नहीं पड़ा था. ये रिश्ते बताए नहीं जाते हैं, एहसास करवाए जाते हैं.’’

दीवाली की संध्या आ गई. भाभीजी, मीना व गोपाल की पत्नी ने विशेष पकवान व विविध व्यंजन बनाए. मैं ने, भाई साहब व गोपाल के घर को सजाने की जिम्मेदारी ली. हम ने छत की मुंडेरों, आंगन की दीवारों, कमरों की सीढि़यों व चौखटों को चिरागों से सजा दिया. बच्चे किस्मकिस्म के पटाखे फोड़ने लगे. फुल झड़ी, अनार, चक्कर घिन्नियों की चिनगारियां उधरउधर तेजी से बिखरने लगीं. बिखरती चिनगारियों से अपने नंगे पैरों को बचाते हुए भाभीजी मिठाई का थाल पकड़े मेरे पास आईं और एक पेड़ा मेरे मुंह में डाल दिया. इस दृश्य को देख भाई साहब व गोपाल मुसकरा पड़े. मीना व गोपाल की पत्नी ताली पीटने लगीं, बच्चे खुश हो कर तरहतरह की आवाजें निकालने लगे.

कुशाग्र मीना से कहने लगा, ‘‘मम्मी, मुंबई में हम अकेले दीवाली मनाते थे तो हमें इस का पता नहीं चलता था. यहां आ कर पता चला कि इस में तो बहुत मजा है.’’

‘‘मजा आ रहा है न दीवाली मनाने में. अगले साल सब हमारे घर मुंबई आएंगे दीवाली मनाने,’’ मीना ने चहकते हुए कहा.

‘‘और उस के अगले साल बेंगलुरु, हमारे यहां,’’ गोपाल की पत्नी तुरंत बोली.

‘‘हां, श्याम और गोपाल, अब से हम बारीबारी से हर एक के घर दीवाली साथ मनाएंगे. तुम्हें याद है, मां ने भी हमें यही प्रतिज्ञा करवाई थी,’’ भाई साहब हमारे करीब आ कर हम दोनों के कंधों पर हाथ रख कर बोले.

हम दोनों ने सहमति में अपनी गर्दन हिलाई. इतने में मेरी नजर छत की ओर जाती सीढि़यों पर बैठी भाभीजी पर पड़ी, जो मिठाइयों से भरा थाल हाथ में थामे मंत्रमुग्ध हम सभी को देख रही थीं. सहसा मु झे भाभीजी की आकृति में मां की छवि नजर आने लगी, जो हम से कह रही थी, ‘तुम एक डाली के 3 फूल हो.’

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