कानूनों की आड़ में आम आदमी की स्वतंत्रता छीनने की आदत सरकार में इतनी बुरी तरह फैली हुई है कि अंगरेजों के समय जो कानून नागरिकों के बचाव के लिए बने थे, उन्हें वह तोड़मरोड़ कर जनता के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है. अंगरेजों से पहले इस देश में जंगलराज था चाहे वह हिंदू राजाओं का समय रहा हो या मुसलिम राजाओं का. कोतवाल जब चाहे, जिसे चाहे बंदी बना सकता था. राजा जब चाहे जिसे चाहे अंधेरी कोठरी में डाल सकता था.

भारतीय दंड विधि और दंड प्रक्रिया संहिता नागरिकों को हक देने के लिए बने कि अगर पुलिस किसी को किसी भी आरोप में गिरफ्तार करे, तो उसे 24 घंटे में शहर के मजिस्ट्रेट के सामने लाए और तब मजिस्ट्रेट तथ्यों की ऊपरी जांचपड़ताल करने के बाद ही कैद में रखने की इजाजत दे. इस नियम का धीरेधीरे जम कर दुरुपयोग होने लगा. प्रशासन, पोलिटिशियन और पुलिस के दबाव में मजिस्ट्रेट आरोपी को जमानत पर छोड़ते ही नहीं हैं.

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ले कर एक औरत के धरने आदि के बनाए गए एक वीडियो पर मानहानि और आईटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. प्रशांत कनौजिया नामक पत्रकार को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और मजिस्ट्रेट ने जमानत नहीं दी कि जांच चल रही है. यह कैसी जांच थी कि आरोपी को जेल में रहना पड़े?

मजिस्ट्रेट न संविधान की भावना सुनते हैं न कानून के शब्दों को देखते हैं. लगभग मशीनी तरह से वे पुलिस का साथ दे कर जेल भेजने में जल्दबाजी दिखाते हैं. कई बार तो बंद आरोपी को वकील का इंतजाम करने का समय तक नहीं मिलता.

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