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भीड़ में अकेली होती औरत

अवंतिका को शुरू से ही नौकरी करने का शौक था. ग्रैजुएशन के बाद ही उस ने एक औफिस में काम शुरू कर दिया था. वह बहुत क्रिएटिव भी थी. पेंटिंग बनाना, डांस, गाना, मिमिक्री, बागबानी करना उस के शौक थे और इन खूबियों के चलते उस का एक बड़ा फ्रैंड्स गु्रप भी था. छुट्टी वाले दिन पूरा ग्रुप कहीं घूमने निकल जाता था. फिल्म देखता, पिकनिक मनाता या किसी एक सहेली के घर इकट्ठा हो कर दुनियाजहान की बातों में मशगूल रहता था.

मगर शादी के 4 साल के अंदर ही अवंतिका बेहद अकेली, उदास और चिड़चिड़ी हो गई है. अब वह सुबह 9 बजे औफिस के लिए निकलती है, शाम को 7 बजे घर पहुंचती है और लौट कर उस के आगे ढेरों काम मुंह बाए खड़े रहते हैं.

अवंतिका के पास समय ही नहीं होता है किसी से कोई बात करने का. अगर होता भी है तो सोचती है कि किस से क्या बोले, क्या बताए? इतने सालों में भी कोई उस को पूरी तरह जान नहीं पाया है. पति भी नहीं.

अवंतिका अपने छोटे से शहर से महानगर में ब्याह कर आई थी. उस का नौकरी करना उस की ससुराल वालों को खूब भाया था, क्योंकि बड़े शहर में पतिपत्नी दोनों कमाएं तभी घरगृहस्थी ठीक से चल पाती है. इसलिए पहली बार में ही रिश्ते के लिए ‘हां’ हो गई थी. वह जिस औफिस में काम करती थी, उस की ब्रांच यहां भी थी, इसलिए उस का ट्रांसफर भी आसानी से हो गया. मगर शादी के बाद उस पर दोहरी जिम्मेदारी आन पड़ी थी. ससुराल में सिर्फ उस की कमाई ही माने रखती थी, उस के गुणों के बारे में तो कभी किसी ने जानने की कोशिश भी नहीं की. यहां आ कर उस की सहेलियां भी छूट गईं. सारे शौक जैसे किसी गहरी कब्र में दफन हो गए.

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घरऔफिस के काम के बीच वह कब चकरघिन्नी बन कर रह गई, पता ही नहीं चला. शादी से पहले हर वक्त हंसतीखिलखिलाती, चहकती रहने वाली अवंतिका अब एक चलतीफिरती लाश बन कर रह गई है. घड़ी की सूईयों पर भागती जिंदगी, अकेली और उदास.

यह कहानी अकेली अवंतिका की नहीं है, यह कहानी देश की उन तमाम महिलाओं की है, जो घरऔफिस की दोहरी जिम्मेदारी उठाते हुए भीड़ के बीच अकेली पड़ गई हैं. मन की बातें किसी से साझा न कर पाने के कारण वे लगातार तनाव में रहती हैं. यही वजह है कि कामकाजी औरतों में स्ट्रैस, हार्ट अटैक, ब्लडप्रैशर, डायबिटीज, थायराइड जैसी बीमारियां उन औरतों के मुकाबले ज्यादा दिख रही हैं, जो अनब्याही हैं, घर पर रहती हैं, जिन के पास अपने शौक पूरे करने के लिए पैसा भी है, समय भी और सहेलियां भी.

दूसरों की कमाई पर नहीं जीना चाहती औरतें ऐसा नहीं है कि औरतें आदमियों की कमाई पर जीना चाहती हैं या उन की कमाई उड़ाने का उन्हें शौक होता है. ऐसा कतई नहीं है. आज ज्यादातर पढ़ीलिखी महिलाएं अपनी शैक्षिक योग्यताओं को बरबाद नहीं होने देना चाहती हैं. वे अच्छी से अच्छी नौकरी पाना चाहती हैं ताकि जहां एक ओर वे अपने ज्ञान और क्षमताओं का उपयोग समाज के हित में कर सकें, वहीं आर्थिक रूप से सक्षम हो कर अपने पारिवारिक स्टेटस में भी बढ़ोतरी करें.

आज कोई भी नौकरीपेशा औरत अपनी नौकरी छोड़ कर घर नहीं बैठना चाहती है. लेकिन नौकरी के साथसाथ घर, बच्चों और परिवार की जिम्मेदारी जो सिर्फ उसी के कंधों पर डाली जाती है, उस ने उसे बिलकुल अकेला कर दिया है. उस से उस का वक्तछीन कर उस की जिंदगी में सूनापन भर दिया है. दोहरी जिम्मेदारी ढोतेढोते वह कब बुढ़ापे की सीढि़यां चढ़ जाती है, उसे पता ही नहीं चलता.

अवंतिका का ही उदाहरण देखें तो औफिस से घर लौटने के बाद वह रिलैक्स होने के बजाय बच्चे की जरूरतें पूरी करने में लग जाती है. पति को समय पर चाय देनी है, सासससुर को खाना देना है, बरतन मांजने हैं, सुबह के लिए कपड़े प्रैस करने हैं, ऐसे न जाने कितने काम वह रात के बारह बजे तक तेजी से निबटाती है और उस के बाद थकान से भरी जब बिस्तर पर जाती है तो पति की शारीरिक जरूरत पूरी करना भी उस की ही जिम्मेदारी है, जिस के लिए वह मना नहीं कर पाती है.

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वहीं उस का पति जो लगभग उसी के साथसाथ घर लौटता है, घर लौट कर रिलैक्स फील करता है, क्योंकि बाथरूम से हाथमुंह धो कर जब बाहर निकलता है तो मेज पर उसे गरमगरम चाय का कप मिलता है और साथ में नाश्ता भी. इस के बाद वह आराम से ड्राइंगरूम में बैठ कर अपने मातापिता के साथ गप्पें मारता है, टीवी देखता है, दोस्तों के साथ फोन पर बातें करता है या अपने बच्चे के साथ खेलता है. यह सब कर के वह अपनी थकान दूर कर रहा होता है. अगले दिन के लिए खुद को तरोताजा कर रहा होता है. उसे बनाबनाया खाना मिलता है. सुबह की बैड टी मिलती है. प्रैस किए कपड़े मिलते हैं. करीने से पैक किया लंच बौक्स मिलता है. इन में से किसी भी काम में उस की कोई भागीदारी नहीं होती.

और अवंतिका? वह घर आ कर रिलैक्स होने के बजाय घर के कामों में खप कर अपनी थकान बढ़ा रही होती है. घरऔफिस की दोहरी भूमिका निभातेनिभाते वह लगातार तनाव में रहती है. यही तनाव और थकान दोनों आगे चल कर गंभीर बीमारियों में बदल जाता है.

घरेलू औरत भी अकेली है

ऐसा नहीं है कि घरऔफिस की दोहरी भूमिका निभाने वाली महिलाएं ही अकेली हैं, घर में रहने वाली महिलाएं भी आज अकेलेपन का दंश झेल रही हैं. पहले संयुक्त परिवार होते थे. घर में सास, ननद, जेठानी, देवरानी और ढेर सारे बच्चों के बीच हंसीठिठोली करते हुए औरतें खुश रहती थीं. घर का काम भी मिलबांट कर हो जाता था. मगर अब ज्यादातर परिवार एकल हो रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा लड़के के मातापिता ही साथ रहते हैं. ऐसे में बूढ़ी होती सास से घर का काम करवाना ज्यादातर बहुओं को ठीक नहीं लगता. वे खुद ही सारा काम निबटा लेती हैं.

मध्यवर्गीय परिवार की बहुओं पर पारिवारिक और सामाजिक बंधन भी खूब होते हैं. ऐसे परिवारों में बहुओं का अकेले घर से बाहर निकलना, पड़ोसियों के साथ हिलनामिलना अथवा सहेलियों के साथ सैरसपाटा निषेध होता है. जिन घरों में सासबहू के संबंध ठीक नहीं होते, वहां तो दोनों ही महिलाएं समस्याएं झेलती हैं. आपसी तनाव के चलते दोनों के बीच बातचीत भी ज्यादातर बंद रहती है. ऐसे घरों में तो सास भी अकेली है और बहू भी अकेली.

कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो लड़की शादी से पहले पूरी आजादी से घूमतीफिरती थी, अपनी सहेलियों में बैठ कर मन की बातें करती थी, वह शादी के बाद चारदीवारी में घिर कर अकेली रह जाती है. पति और सासससुर की सेवा करना ही उस का एकमात्र काम रह जाता है. शादी के बाद लड़कों के दोस्त तो वैसे ही बने रहते हैं. आएदिन घर में भी धमक पड़ते हैं, लेकिन लड़की की सहेलियां छूट जाती हैं. उस की मांबहनें सबकुछ छूट जाता है. सास के साथ तो हिंदुस्तानी बहुओं की बातचीत सिर्फ ‘हां मांजी’ और ‘नहीं मांजी’ तक ही सीमित रहती है, तो फिर कहां और किस से कहे घरेलू औरत भी अपने मन की बात?

अकेलेपन का दंश सहने को क्यों मजबूर

स्त्री शिक्षा में बढ़ोतरी होना और महिलाओं का अपने पैरों पर खड़ा होना किसी भी देश और समाज की प्रगति का सूचक है. मगर इस के साथसाथ परिवार और समाज में कुछ चीजों और नियमों में बदलाव आना भी बहुत जरूरी है, जो भारतीय समाज और परिवारों में कतई नहीं आया है. यही कारण है कि आज पढ़ीलिखी महिला जहां दोहरी भूमिका में पिस रही हैं, वहीं वे दुनिया की इस भीड़ में बिलकुल तनहा भी हो गई हैं.

पश्चिमी देशों में जहां औरतमर्द शिक्षा का स्तर एक है. दोनों ही शिक्षा प्राप्ति के बाद नौकरी करते हैं, वहीं शादी के बाद लड़का और लड़की दोनों ही अपनेअपने मातापिता का घर छोड़ कर अपना अलग घर बसाते हैं, जहां वे दोनों ही घर के समस्त कार्यों में बराबर की भूमिका अदा करते हैं. मगर भारतीय परिवारों में कामकाजी औरत की कमाई तो सब ऐंजौय करते हैं, मगर उस के साथ घर के कामों में हाथ कोई भी नहीं बंटाता. पतियों को तो घर का काम करना जैसे उन की इज्जत गंवाना हो जाता है. हाय, लोग क्या कहेंगे?

सासससुर की मानसिकता भी यही होती है कि औफिस से आ कर किचन में काम करना बहू का काम है, उन के बेटे का नहीं. ऐसे में बहू के अंदर खीज, तनाव और नफरत के भाव ही पैदा हो सकते हैं, खुशी के तो कतई नहीं.

आज जरूरत है लड़कों की परवरिश के तरीके बदलने की और यह काम भी औरत ही कर सकती है. अगर वह चाहती है कि उस की आने वाली पीढि़यां खुश रहें, उस की बेटियांबहुएं खुश रहें तो अपनी बेटियों को किचन का काम सिखाने से पहले अपने बेटों को घर का सारा काम सिखाएं.

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आप की एक छोटी सी पहल आधी आबादी के लिए मुक्ति का द्वार खोलेगी. यही एकमात्र तरीका है जिस से औरत को अकेलेपन के दंश से मुक्ति मिल सकेगी.

एक नई पहल : भाग 2

एक कर्कश सी आवाज तभी मेरे कानों में पड़ी और मेरी तंद्रा भंग हुई. मानो मैं नींद से जागी थी. किसी ने दरवाजे की घंटी बजाई थी. मैं ने कितनी बार अपने पति को कहा है कि इस बेल की आवाज मुझे बिलकुल पसंद नहीं है और जब कोई इसे देर तक बजाता है तो मन करता है बेल उखाड़ कर फेंक दूं.

गुस्से से दरवाजा खोलने गई. बेटी कोचिंग कर के वापस आई थी.

‘‘मिट्ठी, कितनी बार कहा है न कि एक बार बेल बजा कर छोड़ दिया करो. मैं बहरी नहीं हूं. एक बार में ही सुन लेती हूं.’’

‘‘ममा, मैं 10 मिनट से दरवाजे पर खड़ी हूं, पर आप ने घंटी नहीं सुनी और आप जरा अपना फोन देखिए, कितनी मिस काल मैं ने दरवाजे पर खडे़खडे़ दी हैं, आप ने फोन नहीं उठाया और अपने ही किए फोन की घंटी मैं दरवाजे के बाहर खड़ीखड़ी सुनती रही, क्या सो गई थीं आप?’’

अगले दिन बेटी के कोचिंग जाने के बाद मैं ताला लगा कर पार्क की ओर चल दी और अपने बैठने के लिए मैं ने वही बैंच चुनी जिस पर आंटी अकेली बैठी थीं. पसीना पोंछ कर मैं ने उन की ओर देखा तो वह पूछ बैठीं, ‘‘पहली बार सैर करने आई हो शायद.’’

मैं ने ‘हां’ में गर्दन हिला दी.

‘‘2-4 दिन ऐसे ही थकान लगेगी, पसीना आएगा, फिर आदत पड़ जाएगी,’’ आंटी मानो मेरी थकान भरी सांसों को थामने की कोशिश कर रही थीं.

मैं ने भी बात को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से पूछा, ‘‘आप रोज आती हैं?’’

‘‘हां बेटी,’’ उन का छोटा सा उत्तर सुन कर मैं ने कहा, ‘‘मैं तो बहुत कोशिश करती हूं पर आंटी समय नहीं मिलता. आप कैसे नियमित रूप से आ जाती हैं.’’

‘‘तुम्हें समय नहीं मिलता और मेरे पास समय की कमी नहीं,’’ कहते हुए आंटी खिलखिला पड़ीं. तब तक मैं दोबारा सैर करने के लिए तैयार हो चुकी थी. मैं जैसे ही उठी, देखा सामने से अंकल आ रहे थे. यह सोच कर मैं वहां से चल दी कि आज के लिए इतना ही काफी है.

अब मेरा यह नियम ही हो गया था. रोज की मुलाकात व बातचीत में यह पता चला कि आंटी यानी मिसेज सुमेधा कंसल सरकारी स्कूल की रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं. बच्चे अपनीअपनी गृहस्थी में मगन हैं. एक दिन मैं ने पूछा भी था, ‘‘आंटी, जब आप प्रिंसिपल रह चुकी हैं तो आप अपने नातीपोतों को पढ़ा सकती हैं, आप के समय का सदुपयोग भी हो जाएगा.’’

एक फीकी सी हंसी के साथ आंटी बोलीं, ‘‘बेटी दूसरे शहर में रहती है. बेटे के भी एक ही बेटा है और वह देहरादून में पढ़ता है. होस्टल में रहता है. बेटा और बहू दोनों ही मुझे हर सुखसुविधा देते हैं, मानसम्मान भी रखते हैं लेकिन अपने- अपने कैरियर की ऊंचाइयां पाने में व्यस्त हैं. घर पर मैं बस, अकेली…’’

‘‘तो आंटी कोई सोशल सर्विस या अन्य कोई ऐसा काम जो आप को रुचिकर लगे, क्यों नहीं करतीं?’’

‘‘मैं जैसी सोशल सर्विस करना चाहती हूं वह बच्चों को पसंद नहीं है और ऊंची शानशौकत वाली सोशल सर्विस मैं कर नहीं सकती. हां, मुझे कविता और कहानियां लिखना रुचिकर लगता है और वह मैं लिखती हूं. लेकिन यह शाम का समय घर में अकेले नहीं बीतता…कोई तो बात करने के लिए चाहिए…नहीं तो हम बोलना ही भूल जाएंगे और हमारी भाषा समाप्त हो जाएगी. हां, अगर तुम्हारे अंकलजी होते तो…’’

‘‘अभी अंकलजी आप को लेने नहीं आएंगे क्या?’’ मैं ने अनजान बनते हुए पूछा.

‘‘नहीं बेटा, जिन्हें तुम रोज मेरे साथ बात करते देखती हो वह भी मेरी ही तरह अकेले हैं. मेरे पति तो 20 वर्ष पहले ही गुजर चुके हैं. उन के जाने के बाद भी अकेलापन था लेकिन वह वक्त तो बच्चों को पालने और नौकरी करने में जैसेतैसे बीत गया और शर्माजी, जो अभी आने ही वाले होंगे, वह भी अपनी जीवन संगिनी को 7-8 वर्ष पहले खो चुके हैं.

‘‘शर्माजी तो मुझ से ज्यादा अकेले हैं. मेरी बहू जूही मेरे बहुत करीब है, फिर फोन पर हर तीसरे दिन बेटी से भी बात हो जाती है लेकिन वह तो मर्द हैं न, बहुओं से ज्यादा घुलमिल नहीं पाते, बेटों के पास फुर्सत नहीं है. ऐसा नहीं कि बहूबेटे उन का खयाल नहीं रखते लेकिन आज सब अपने में व्यस्त हैं. नौकरीपेशा बहुएं 24 घंटे तो हाथ बांधे नहीं खड़ी रह सकतीं न और नौकरीपेशा ही क्यों, घर में रहने वाली बहुएं भी ऐसा कहां कर सकती हैं…यद्यपि इनसान ऐसा करना चाहता है लेकिन वक्त है कि वह हम सब को अपनी उंगली पर नचाता रहता है.

‘‘जैसे बच्चे, बच्चों की संगत में, जवान, जवानों के साथ, ऐसे ही हम बूढे़ बूढ़ों की संगत में खुश रहते हैं. बच्चों के साथ कभी हमें बच्चा बनना पड़ता है, अच्छा लगता है, लेकिन मन की बात तो किसी हमउम्र से ही शेयर की जा सकती है. बस, शर्माजी हैं, आते हैं…साझा दुख साझा सुख…कुछ इधर की कुछ उधर की…और फिर अगले दिन मिलने की उम्मीद में पूरे 24 घंटे बीत जाते हैं.’’

तभी सामने से शर्माजी आते दिखाई दिए. मैं उठ कर चलने लगी. आज सुमेधाजी ने मुझे रोक लिया.

‘‘इन से मिलिए. ये हैं, मिसेज मालिनी अग्रवाल, यहीं सामने के फ्लैट में रहती हैं और बेटा, ये हैं मि. शर्मा… रिटायर्ड अंडर सेके्रटरी.’’ हम दोनों में नमस्ते का आदानप्रदान हुआ और मैं वहां से चल दी.

अजब गजब: 100 किलोग्राम सोने के सिक्का का बना रहस्य

‘दबिग मैपल लीफ’ नाम का शुद्ध सोने का यह सिक्का दुनिया का सब से बड़ा सिक्का था. 99.999 शुद्धता वाले इस सिक्के को सन 1982 में रौयल कनेडियन मिंट (सिक्के बनाने का कारखाना) ने बनाया था, जिस में क्वीन एलिजाबेथ (द्वितीय) की फोटो उकेरी गई थी. इस सिक्के की वैल्यू 30 करोड़, 38 लाख से भी ज्यादा थी. 53 सेंटीमीटर के इस सिक्के को एक अज्ञात संग्रहकर्ता से ले कर जर्मनी के बोड म्यूजियम में रखा गया था.

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इस सिक्के पर उकेरी गई क्वीन एलिजाबेथ (द्वितीय) की तसवीर कनाडा के आर्टिस्ट सुजाना ब्लंट ने बनाई थी, जबकि दूसरी ओर एक बड़ी मैपल लीफ की फोटो बनी थी. सन 2007 में बिग मैपल लीफ नाम के इस गोल्ड के सिक्के को गिनीज बुक और वर्ल्ड रिकौर्ड में दुनिया के सब से बडे़ सिक्के के रूप में दर्ज किया गया. इस सिक्के को ले कर दुनिया भर के लोगों में काफी कौतूहल रहा. संभवत: इसी वजह से यह चोरों की नजर में आ गया.

जांच के दौरान पुलिस ने चारों अभियुक्तों  को तो गिरफ्तार कर लिया, लेकिन सिक्का नहीं मिल सका.हां, बरामदगी के नाम पर पुलिस को गोल्ड डस्ट जरूर मिली, जिस से अनुमान लगाया गया कि चोरों ने सिक्के को पिघला कर ठिकाने लगाया होगा. सिक्का चुराने वाले चारों का ट्रायल चल रहा है. हाल ही में इस केस की सुनवाई हुई है.

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आटा, डाटा और नाटा

दोस्तो, आज पूंजीपति और सर्वहारा के बीच का संघर्ष गौण हो गया है या कि सर्वहारा वर्ग पूंजीपतियों से लड़तेलड़ते मौन हो गया है. इसीलिए, समाज में समता लाने वाले वादियों ने भी सर्वहारा के लिए लड़ना छोड़ सर्वहारा के चंदे की उगाही से शोषण की समतावादी मिलें स्थापित कर ली हैं.

आज संघर्ष अगर किसी के बीच में है तो बस आटे और डाटे के. अब वे हम से डाटे के हथियार से हमारा आटा छीन रहे हैं. हम से समाज का नाता छीन रहे हैं. हम से हमारा नाता छीन रहे हैं. आज जबजब डाटे का दांव लग रहा है, वह आटे को पछाड़ने में जुटा है. आटे को लताड़ने में जुटा है. और बेचारा आटा, एकबार फिर पूंजीपतियों के हाथों नए तरीके से लुटा है. अपना मुंह ताकता.

मैं अंधी आंखों से भी बिन संजय के देख रहा हूं कि आज डाटा मंदमंद मुसकराते हुए हम से हमारा आटा छीन रहा है. हर वर्ग आटा छोड़ डाटे के पीछे यों भाग रहा है जैसे उस के पांव बहुत पीछे छूट चुके हैं. पर वह फिर भी डाटे के पीछे यों भागे जा रहा है कि…

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मेरी पूछो तो मैं बिन आटे के हफ्तों जी सकता हूं मजे से, पर बिन डाटे के मुझे कोई एक पल भी जीने को कहे तो मेरा जीना दूभर हो जाए.

कल पता नहीं क्या हुआ कि मुझे पता ही न चला कि कब मेरा डाटा खत्म हो गया. मैं परेशान. मैं ने अपनी परेशानी में अपने पुरखे तक परेशान कर डाले. डाटा खत्म होने पर मेरा दिमाग सुन्न हो गया. लगा, ज्यों मेरी रंगों का लहू जम गया हो जैसे. पूरे बदन में एकाएक सुन्नगी छाने लगी. चेहरे पर तो पैदा होते ही मुर्दनी आ डटी थी. आंखों के सामने अंधेरा होने लगा.

मुझे लगा कि अब मेरी अंतिम घड़ी नजदीक आ गई हो जैसे. मैं ने मन ही मन डाटे वाली सब से सस्ती कंपनी का ध्यान किया तो कंपनी की कृपा मुझ पर बरसी और एकाएक कहीं से डाटादान करने वाले सज्जन आ पहुंचे. उन्होंने मुसकराते हुए हौटस्पौट पर अपने डाटे से मुझे जोड़ा, तो मेरी बंद होती सांसें फिर से चलनी शुरू हुईं. कोई माने या न, पर आज की तारीख में नेत्रदान से अधिक महत्त्व डाटादान का है, डाटाप्रेमियो.

जिधर देखो, उधरइच हर नामी कंपनी के आटे पर हर मामूली से मामूली कंपनी का डाटा भारी है. आटा बेचारा भूखे पेटों का मुंह ताक रहा है. बाजार में बोरियों में पड़ापड़ा धूल फांक रहा है. पर सब आटा छोड़, डाटे के पीछे बदहवास दौड़ रहे हैं. जो भी है बस, डाटाडाटा चिल्ला रहा है.

हवा पानी के बदले आज का जीव डाटा पी रहा है, डाटा पहन रहा है, डाटा खा रहा है. वह सुबह उठते डी डाटे से फेसवाश करता है, रात को डाटे को अपने दामन से चिपकाए अपनी आभासी दुनिया में जीभर विचरता है. सुबह उस के पास डाटा बचा हो, तो जीभर खुश होता है. जब डाटा न बचा हो, तो सब के साथ होने के बाद भी अपने को समाज में नितांत अकेला पा दहाड़ें मारमार कर रोता है.

जिधर देखो, डाटा का जादू हर समाज के सिर चढ़ कर बोल रहा है. जिस के पास मोबाइल भी नहीं, वह आटा गूंधने को उस में पानी के बदले डाटा घोल रहा है. डाटे ने हर जीवअजीव को पगला दिया है. वह डाटे के सिवा कोई बात करना ही नहीं चाहता. वह कम पैसे में अधिक डाटा कहां मिलेगा, इस से अधिक कुछ सुनना ही नहीं चाहता. जिन की टांगें जवाब दे चुकी हैं, वे भी डाटे की स्पीड की टांगों पर दौड़ कर भवसागर पार होना चाहते हैं.

आज जीव को जल नहीं चाहिए. क्योंकि आज जल जीवन नहीं, डाटा ही जीवन है. आज के जीव को वायु नहीं चाहिए. क्योंकि आज वायु जीवन नहीं, आज डाटा ही जीवन है. आज के जीव की सांसें वायु पर नहीं, डाटे की स्पीड पर निर्भर करती हैं. आज के जीव को अग्नि नहीं चाहिए. क्योंकि अग्नि में वह तेज नहीं जो डाटे में है. आज के जीव को आकाश नहीं चाहिए. आकाश में वह खुलापन नहीं जो डाटा उसे देता है. आज के जीव को चाहिए तो, बस, डाटा. जो उसे जितना अधिक डाटाडाटा का भगवान मुहैया करवाए, वह उसी का मुरीद हो जाए.

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आज हमें चाहिए तो बस डाटा, डाटा, डाटा. जो हमें जितना अधिक डाटाडाटा का मेहरबान मुहैया करवाए, हर तबका उसी का मुरीद हो जाए.

बेहतर जीवन जीने के लिए आज प्यार गौण हो गया है. बेहतर जीवन के लिए आज मनुहार मौन हो गया है. जिस के पास जितनी हाई स्पीड वाला सिम, वह उतना ही फास्ट. डाटा का न कोई धर्म, डाटा की न कोई कास्ट. जय हो धर्मनिर्पेक्ष डाटा…

क्या करें जब नौबत हो तलाक की

अपने वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट हो कर तलाक ले लेना बेशक उस समय किसी बंधन से मुक्त होना लगे, पर उस के बाद जीवन आसान हो जाएगा या जीवन में फिर से खुशियां लौट आएंगी, ऐसा सोचना भी एक भूल ही है. इसलिए डाइवोर्स लेने का निर्णय लेने से पहले उस के बाद पैदा होने वाली स्थितियों पर विचार करना निहायत आवश्यक है.

अगर आप डाइवोर्स लेने के बारे में सोच रही हैं, तो यह तो तय है कि आप के और आप के साथी के बीच कुछ गलत हुआ है या फिर छोटीछोटी बातें इतनी बड़ी हो गई हैं कि आप को लगने लगा है कि अब साथ रहना मुमकिन नहीं. ये बातें विचारों के बीच टकराव उत्पन्न होने से ले कर विवाहेतर संबंधों तक से जुड़ी हो सकती हैं या फिर बच्चों की परवरिश या आर्थिक परेशानियों से उपजी भी हो सकती हैं. यानी ये छोटेछोटे झगड़े समय के साथ न सिर्फ युगल के बीच फासला बढ़ाते जाते हैं वरन उन्हें अलग हो जाने के लिए भी मजबूर कर देते हैं.

ऐडजस्ट न कर पाने या मानसिक तौर पर डिस्टर्ब फील करने के कारण अलग हो जाना बेशक एक आसान रास्ता लगे, पर उस के लिए जिन कानूनी, सामाजिक और भावनात्मक परेशानियों का सामना करना पड़ता है, वे भी कम दुखदायी नहीं होती हैं. अगर युगल शादी को यातना मानते हैं, तो उस से छुटकारा पाने के लिए भी कम यातनाएं नहीं सहनी पड़तीं.

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मूल्यांकन करें

डाइवोर्स लेने से पहले ये सोचें कि वे कौन सी बातें हैं जो आप को परेशान कर रही हैं. हो सकता है उन्हें सुधारा जा सके. फिर यह निश्चित करें कि क्या वास्तव में आप उन में बदलाव लाना चाहती हैं? अपने विवाह के साथसाथ आप को अपना भी मूल्यांकन करना होगा कि क्या आप इस विवाह को बचाना चाहती हैं? डाइवोर्स की ओर कदम बढ़ाने से पहले खुद से यह अवश्य पूछें कि क्या जो असंतुष्टि की भावना आप के अंदर पल रही है वह कुछ समय के लिए है, जो समय के साथ दूर हो जाएगी? तलाक देने के बाद क्या आप फिर से एक नए संबंध में जुड़ने को तैयार हैं? आप के बच्चे पर इस का क्या असर पड़ेगा और क्या वह इस निर्णय में आप के साथ है?

कुछ लोग इसलिए अलग होते हैं, क्योंकि वे बहुत जल्दी शादी के बंधन में बंध गए थे और बाद में उन्हें एहसास हुआ कि वे एकदूसरे के लिए बने ही नहीं हैं. कुछ दशकों तक साथ रहते हैं और बच्चों के सैटल हो जाने के बाद उन्हें लगता है कि अब साथ रहना कोई मजबूरी नहीं है और वे अलग हो जाते हैं.

सब से अहम कारण होता है साथी को धोखा देना. कुछ युगलों को लगता है कि अब उन के बीच प्यार नहीं रहा है. पैसे और विचारों में मतभेद होने की वजह से हमेशा झगड़ते रहते हैं. कुछ युगलों को लगता है कि उन्हें जीवन से कुछ और चाहिए. वे अब रिश्ते के साथ और समझौता नहीं कर सकते हैं.

सीनियर क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट डा. भावना बर्मी के अनुसार, ‘‘तलाक की बढ़ती दर का मुख्य कारण है प्रोफैशनल स्तर पर औरत और पुरुष दोनों की लगातार बढ़ती महत्त्वाकांक्षाएं, जिन की वजह से उन की प्राथमिकताएं परिवार व संबंधों से हट कर कैरियर पर टिक गई हैं. आपस में बात करने तक का भी उन के पास टाइम नहीं है. वे काम और परिवार के बीच संतुलन नहीं बैठा पा रहे हैं. दोनों की आर्थिक आजादी ने उन की एकदूसरे पर निर्भरता कम कर दी है. सहने की शक्ति कम हो जाना मैट्रो शहरों में बढ़ते तलाक की सब से बड़ी वजह है. तलाक लेते समय यह पता होना चाहिए कि उन की जिंदगी आपस में बंधी है और इस की टूटन दोनों को ही बिखराव की राह पर ला सकती है. सामाजिक अलगाव भी उत्पन्न होने की संभावना इस से बहुत बढ़ जाती है.’’

क्या आप बदलाव के लिए तैयार हैं

आप का डाइवोर्स लेने का कारण, साथ बीता समय, आप की संपत्ति, बच्चे सब चीजें आप के निर्णय के लिए माने रखती हैं. लेकिन सब से अहम है यह समझना कि आप उसे किस तरह हैंडल करेंगी. इस की वजह से जिंदगी में होने वाले बदलावों का सामना करने को क्या आप तैयार हैं? डाइवोर्स जीवन का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ होता है, जिस के बाद आने वाले बदलाव सुखदायी या दुखदायी दोनों ही हो सकते हैं. इसलिए सोचसमझ कर ही इस का फैसला लेना चाहिए. हो सकता है कि मैरिज काउंसलर से मिलने के बाद आप अपना इरादा छोड़ दें.

तलाक का अर्थ ही है बदलाव और यह समझ लें कि किसी भी तरह के बदलाव का सामना करना आसान नहीं होता है. कई बार मन पीछे की तरफ भी देखता है, क्योंकि नए ढंग से जिंदगी की शुरुआत करते समय जब दिक्कतें आती हैं, तो मन बीती जिंदगी को याद कर अपराधबोध से भी भर जाता है. आप को खुद पर भरोसा रखना होगा कि आप किसी भी तरह की मुश्किल का सामना कर लेंगी और आप का निर्णय सही था.

लिस्ट बनाएं

तलाक लेने के कारणों की एक लिस्ट बनाएं. अपने रिश्ते के अच्छे व बुरे दोनों पक्षों के बारे में लिखें. अपने पार्टनर को किसी विलेन के दर्जे में न रखें, क्योंकि कमियां तो आप में भी होंगी. डाइवोर्स लेने के बाद सफल व सुखद जीवन जीने के लिए सोच को पौजिटिव रखना निहायत जरूरी है. यह मान कर चलें कि दोनों की ही गलतियों की वजह से आज अलग हो जाने की नौबत आई है. इसलिए अपने क्रोध और दर्द से एक रचनात्मक ढंग से निबटें.

डाइवोर्स के बाद आप को एक सपोर्ट सिस्टम की जरूरत पड़ेगी, जिस के कंधे पर सिर रख कर आप रो सकें. अपने मित्रों व रिश्तेदारों से सपोर्ट लेने से हिचकिचाएं नहीं. अगर आवश्यकता महसूस करें तो थेरैपिस्ट के पास जाएं और अपने इमोशंस शेयर करें ताकि आप को स्ट्रैस न हो.

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सोच व्यावहारिक रखें

तलाक के बाद सब से बड़ी समस्या फाइनैंस की आती है. अगर आप कमाती हैं, तो भी पैसे से जुड़ी दिक्कतें बनी रहती हैं. अध्ययनों से यह बात सामने आई हैं कि जो औरतें

डाइवोर्स की पीड़ा सहती हैं, उन के जीवनस्तर में 30% गिरावट आ जाती है और पुरुषों के जीवनस्तर में 10%. चाहे औरत इस अलगाव के लिए कितना भी तैयार क्यों न हो, वह आर्थिक स्तर पर अपने को अक्षम ही महसूस करती है.

बेहतर होगा कि अपनी भावनाओं के बस में हो कर डाइवोर्स लेने के बजाय एक व्यावहारिक सोच रखते हुए यह कदम उठाएं. इस से होने वाले लाभ से ज्यादा हानि पर गौर करें. अगर आप आत्मनिर्भर नहीं है तो जाहिर है कि बाद में आप को किसी और पर निर्भर होना पड़ेगा और इस तरह आप के आत्मसम्मान को चोट पहुंचेगी.

डाइवोर्स का बच्चों पर गहरा असर पड़ता है, क्योंकि उन के लिए तो मातापिता दोनों ही महत्त्वपूर्ण होते हैं. अलगाव से उन के विश्वास को चोट पहुंचती है और कभीकभी तो वे भटक भी जाते हैं. अकेला अभिवक अपनी ही परेशानियों में ग्रस्त रहने के कारण उन पर सही ध्यान नहीं दे पाता.

कुछ प्रश्न खुद से पूछें

क्या अपने साथी के प्रति अभी भी आप के मन में भावनाएं हैं? मगर ऐसा है तो एक बार रिश्ते को बचाने की कोशिश की जा सकती है.

क्या आप इसलिए साथ रह रहे हैं, क्योंकि समाज का दबाव है वरना हर समय झगड़ते ही रहते हैं?

आप क्या सचमुच तलाक चाहती हैं या सिर्फ यह धमकी है? केवल क्रोध प्रकट करने या इस तरह साथी को इमोशनली ब्लैकमेल करने के लिए ही तो आप यह कदम उठाना चाहतीं. इस तरह संबंध और बिगड़ेंगे ही.

क्या आप शारीरिक, मानसिक, आर्थिक व भावनात्मक रूप से इस के लिए तैयार हैं? क्या आप ने इस के नकारात्मक परिणामों के बारे में सोच लिया है? तलाक आप के साधनों में कमी कर सकता है, जिस से आप के कई सपने भी टूट सकते हैं.

क्या आप के पास कोई सपोर्ट सिस्टम है? क्या आप बच्चों को समझा पाने व उन की तकलीफ दूर करने में सक्षम हैं?

क्या आप कैरियर और अपनी निजी जिंदगी में बैलेंस कर पाएंगी?

डाइवोर्स लेने के बाद आप को नए अनुभवों, नए रिश्तों व चीजों को नए रूप में लेने के लिए अपने को तैयार करना होगा. अपने जीवन को पुन: गढ़ना होगा. अगर आप यह सोच कर बैठी हैं कि दूसरी शादी करने से आप की सारी परेशानियां दूर हो जाएंगी, आप की समस्याओं का समाधान हो जाएगा तो इस भ्रम से बाहर निकलें, क्योंकि दूसरी शादी सफल हो, इस की क्या गारंटी है. जरूरी नहीं कि इस बार परफैक्ट साथी मिले.

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ऐसे बनाएं वेज पास्ता

मसाला पास्ता आपके हेल्थ के लिए भी अच्छा होता है. आप इसे गर्मा-गरम खाते हैं तो ज्यादा टेस्टी लगता हैं. इसके साथ ही इसे बच्चों को भी आप खाने में दे सकती हैं. तो फिर बिना देरी किए, आप झटपट वेज पास्ता बनाने की रेसिपी नोट करें.

सामग्री :

– पास्ता ( 200 ग्राम)

– शिमला मिर्च (02)

– पास्ता सौस (150 ग्राम)

– ब्रोकली (200 ग्राम)

– मशरूम (200 ग्राम)

– बीन्स ( 50 ग्राम)

– अजीनोमोटो (1/2 छोटा चम्मच)

– ओलिव आइल ( 1/2 बड़ा चम्मच)

– सोया सौस ( 01 छोटा चम्मच)

– आर्गानो पाउडर ( 1/2 छोटा चम्मच)

– चिल्ली फ्लेक्स ( 1/2 छोटा चम्मच)

– नमक ( स्वादानुसार)

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वेज पास्ता बनाने की विधि :

– सबसे पहले बीन्स ब्रोकली को धोकर मीडियम साइज में काट लें.

– और इसमें 2 चुटकी नमक मिलाकर 5 मिनट तक स्टीम कर लें.

– अब मशरूम को धोकर उसके डंठल हटा दें और दो टुकड़ों को काट लें.

– कढ़ाई में जैतून का तेल डालकर गरम करें.

– तेल गरम होने पर उसमें बीन्स डाल दें और एक मिनट तक चलाते हुए भून लें.

– उसके बाद ब्रोकली डालें और उसे भी एक मिनट भून लें.

– इसके बाद मशरूम, अजीनोमोटो, ओरगेनो पाउडर, चिल्ली फ्लेक्स, सोयासास, नमक डालकर, दो मिनट भून लें और ढ़क कर गैस बंद कर दें.

– अब एक बर्तन में पास्ता रखें, फिर उसमें इतना पानी डालें, जिससे वे आसानी से डूब जाएं.

– उसके बाद पानी में आधा छोटा चम्मच नमक और एक छोटा चम्मच तेल डाल दें और मध्यम आंच पर पकाएं.

– लगभग 10 मिनट बाद, जब पास्ता नरम हो जाए, गैस बंद कर दें और बर्तन का पानी छानकर निकाल दें.

– अब शिमला मिर्च धोकर उसके बीज हटा दें और मध्यम आकार के टुकड़े काट लें.

– इसके बाद कढ़ाई में तेल डाल कर उसे गरम करें.

– तेल गरम होने पर उसमें शि‍मला मिर्च डाल दें और 2 मिनट भून लें.

– इसके बाद उबला हुआ पास्ता, पास्ता सौस और अजीनोमोटो डाल दें और 1-2 मिनट चलाते हुए भून लें.

– अब पहले से तैयार की गयी मिक्स वेज पास्ता में मिला दें और अच्छी तरह से चलाकर मिक्स कर लें और गैस बंद कर दें.

– अब आपका मिक्स वेज पास्ता तैयार है और इसे गर्गा-गरम टोमैटो सौस के साथ परोसें.

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नई जिंदगी की शुरुआत : भाग 2

लेखक-अरुणा त्रिपाठी

कहते हैं न कि चोर जब तक पकड़ा नहीं जाता चोर नहीं कहलाता. लोग गलत काम करने से उतना नहीं डरते जितना समाज में होने वाली बदनामी से डरते हैं. समाज के सामने यदि सबकुछ ढकाछिपा है तो सब ठीक. अपनी नजर में अपनी इज्जत की कोई परवा नहीं करता. सुमित्रा अपनी बेटी के दफ्तर व वहां के काम के ढंग से वाकिफ थीं इसलिए उन्होंने निष्कर्ष यही निकाला कि बेटी सयानी है, उस की जितनी जल्दी हो सके शादी कर देनी चाहिए.

सुमित्रा को अब किसी सहारे की जरूरत नहीं थी क्योंकि उन की अपनी दुकान अच्छी चलने लगी थी. बेटी अपने घर चली जाए तो वह एक जिम्मेदारी से छुटकारा पा सकें, यही सोच कर उन्होंने कुछ लोगों से कल्पना के विवाह की चर्चा की. चूंकि घर की आर्थिक स्थिति ठीक होने के बाद वे भी अब सुखदुख के साथी बने खडे़ थे जो तंगी के समय उस के घर की ओर देखते भी नहीं थे. अब खतरा नहीं था कि सुमित्रा अपना दुखड़ा सुना कर उन से अपने लिए कुछ उम्मीद कर सकती हैं. अब कुछ देने की स्थिति में भी वह थीं.

सुमित्रा के बडे़ भाई एक रिश्ता ले कर आए थे. अच्छे खातापीता परिवार था. जमीनजायदाद काफी थी. लड़के के पिता कसबे के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में थे और उन की राजनीतिक पहुंच थी. कल्पना की सुंदरता से प्रभावित हो कर वह यह शादी 1 रुपए में करना चाहते थे. दहेज न ले कर वह चाहते थे लाखों लोगों की वाहवाही व प्रचार, क्योंकि उन की नजर अगले विधानसभा चुनाव पर टिकी थी और सुमित्रा जैसी विधवा दर्जी की सिपाही बेटी के साथ अपने बेरोजगार बेटे का विवाह कर वह न केवल एक विधवा बेसहारा को धन्य कर देना चाहते थे बल्कि उस पूरे इलाके में वाहवाही पाना चाहते थे.

कल्पना का विवाह हो गया. सुमित्रा ने राहत की सांस ली. बेटी के पांव पूज वह अपने को धन्य मान रही थीं. बेटी को विदा करते समय सभी बड़ीबूढ़ी व खुद सुमित्रा उसे समझा रही थीं कि अब वही तुम्हारा घर है. सुख मिले या दुख सब चुपचाप सहना. मां के घर से बेटी की डोली उठती है और पति के घर से अर्थी.

कल्पना की सुहागरात थी. फूलों से महकते कमरे में एक विशेष मादकता बिखरी थी. वह डरीसहमी सेज पर बैठी थी. तमाम कुशंकाओं से उस का जी घबरा रहा था. एक तरफ खुशी तो दूसरी तरफ भय से शरीर में विचित्र संवेदना हो रही थी. नईनवेली दुलहन जैसी उत्तेजना के स्थान पर आशंकित उस का मन उस सेज से उठ कर भाग जाने को कर रहा था. वह अजीब पसोपेश में पड़ी थी कि उस के पति प्रमेश ने कमरे में प्रवेश किया. वह बिस्तर पर सिकुड़ कर बैठ गई और उस का दिल जोर से धड़कने लगा. चेहरे पर रक्तप्रवाह बढ़ जाने से वह रक्तिम हो उठा था. इतने खूबसूरत तराशे चेहरे पर पसीने की बूंदें फफोलों की तरह जान पड़ रही थीं.

प्रमेश ने जैसे ही घूंघट उठाया और दोनों की नजरें मिलीं वह सकते में आ गया. उस का हाथ पीछे हट गया. उस ने कल्पना को परे ढकेलते हुए कहा, ‘‘ऐसा लगता है हम पहले भी कहीं मिल चुके  हैं.’’

‘‘मुझे याद नहीं,’’ कल्पना ने धीमे स्वर में कहा.

क्रोध के मारे प्रमेश की मांसपेशियां तन गईं. उस के माथे पर बल पड़ गए और होंठ व नथुने फड़कने लगे. शरीर कांपने से वह उत्तेजित हो कर बोला, ‘‘तुम झूठ बोल रही हो, तुम्हें सब अच्छी तरह से याद है.’’

कल्पना को जिस बात का भय था वही हुआ. प्रमेश के हावभाव को देखते हुए वह अब अपने को संयत कर चुकी थी. आने वाले आंधी, तूफान व बाढ़ से सामना करने की शक्ति उस में आ गई थी. वह इस सच को जान गई थी कि अब उसे सच के धरातल पर सबकुछ सहना, झेलना व पाना था.

प्रमेश उस के चेहरे को गौर से देखते हुए आगे बोला, ‘‘तुम कालगर्ल हो. स्त्री के नाम पर कलंक. इतना बड़ा धोखा मेरे परिवार के साथ करने की तुम्हारे घर वालों की हिम्मत कैसे हुई? मैं अभी जा कर सब को तुम्हारी असलियत बताता हूं.’’

यह कह कर प्रमेश ने जैसे ही उठने का उपक्रम किया, कल्पना दोनों हाथ बंद दरवाजे पर रख कर सामने खड़ी हो गई और बोली, ‘‘पहले आप मेरी मजबूरी भी सुन लीजिए फिर आप को जो भी फैसला लेना है, लीजिए. मेरा जीवन तो तबाह हो गया जिस की आशंका से मैं कुछ पल पहले तक बहुत विचलित थी. कम से कम अब उस दशा से मुझे मुक्ति मिल गई है. मेरे गले में मेरा अतीत फांस की तरह गड़ रहा था. अफसोस है कि ऐसा कुछ मैं ने शादी की स्वीकृति देने से पहले यदि महसूस किया होता तो आज यह दिन मुझे न देखना पड़ता.

‘‘हर युवा लड़की के दिल में अरमान होते हैं कि उस का एक घर, पति व परिवार हो और यह भावना ही मेरे जीवन की ठोस धरती पर ज्यादा प्रबल हो गई थी, नहीं तो मुझे क्या अधिकार था किसी को धोखा देने का.’’

कल्पना एक पल को रुकी. उस ने प्रमेश को देखा जिस के चेहरे पर पहले जैसी उत्तेजना नहीं थी. वह आगे बोली, ‘‘यह सच है कि मैं कालगर्ल का धंधा करती थी लेकिन यह भी सच है कि मैं कालगर्ल स्वेच्छा से नहीं बनी बल्कि मेरे हालात ने मुझे कालगर्ल बनाया. जब मुझे सिपाही की नौकरी मिली तो मैं बहुत खुश थी. एक दिन मेरे अधिकारी ने मुझे बुलाया और पूछा कि तुम्हारा जाति प्रमाणपत्र कहां है. यदि तुम ने फौरन जाति प्रमाणपत्र नहीं जमा किया तो तुम्हारी नौकरी चली जाएगी. नौकरी जाने का भय मुझ पर इस कदर हावी था कि मैं घबराहट में समझ न सकी कि क्या करूं.

‘‘मेरा जन्म बिहार में हुआ था. वहां आनेजाने में लगभग एक सप्ताह लग जाता. फिर जाते ही प्रमाणपत्र तो नहीं मिल जाता. मेरी आंखों के सामने मेरे छोटे भाईबहन व मां के उम्मीद से भरे चेहरे घूम गए, जिन्हें मेरा ही सहारा था. वैसे भी हम लोग पिता की मृत्यु के बाद घोर गरीबी में दिन गुजार रहे थे. मेरी नौकरी से घर में सूखी रोटी का इंतजाम होता था.

‘‘मैं अपने अधिकारी से बहुत गिड़गिड़ाई कि कम से कम 10 दिन की छुट्टी व कुछ पैसा एडवांस दे दें तो मैं जाति प्रमाणपत्र ला दूंगी किंतु वह टस से मस नहीं हुए. उलटे उन्होंने कहा कि तुम्हारी नई नौकरी है, अभी छुट्टी भी नहीं मिल सकती और न ही एडवांस पैसा.

‘‘यह सुन कर मेरे हाथपैर फूल गए. मैं उन के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाई और शायद यही मेरी सब से बड़ी भूल थी. यदि हड़बड़ाहट के बजाय मैं ने थोड़ा धैर्य से काम लिया होता तो मैं उन के झांसे में आने से शायद बच जाती.

‘‘मैं कुछ भी सोच पाने की स्थिति में न थी और इस का अधिकारी ने पूरापूरा फायदा उठाया और मुझे भरोसा दिया कि यदि मैं उन के आदेशों का पालन करती रही तो मुझे न तो बिहार जाना पडे़गा और न ही एडवांस रुपयों की जरूरत पडे़गी. उन्होंने उस शाम मुझे अपने बताए स्थान पर बुलाया और एक पेय पिलाया जिस से मुझे हलकाहलका नशा छा गया. उस के बाद उन्होंने मेरे शरीर के साथ मनमानी की और मेरे पर्स में कुछ रुपए डाल दिए. इस के बाद तो मैं उन के हाथ की कठपुतली बन गई.

‘‘मैं ने तो अपनी मजबूरी बता दी और आज भी स्वीकारती हूं कि यदि मैं ने धैर्य से काम लिया होता तो इस विनाश से बच जाती पर आप की क्या मजबूरी थी? आप बाहर जा कर अपने रिश्तेदारों के बीच अपनी सफाई में क्या कहेंगे? आप एक कालगर्ल के साथ क्या कर रहे थे, इस का उत्तर आप दे पाएंगे?’’

दरवाजे से अपना हाथ हटाते हुए कल्पना बोली, ‘‘बाहर जाने से पहले मेरा कुसूर बता दीजिए फिर जो सजा आप मुझे देंगे वह मंजूर होगी.’’

प्रमेश अपने सिर को दोनों हाथों में पकडे़ चुपचाप आंखें फाडे़ छत की ओर देख रहा था. कल्पना भी दरवाजा छोड़ कर दीवार से टिक कर जमीन पर बैठ गई. मनमंथन दोनों में चल रहा था. कल्पना आशंकित थी कि समाज में औरत और आदमी के लिए आज भी अलगअलग मापदंड हैं. प्रमेश पुरुष है, घरपरिवार वाले उस का ही साथ देंगे. उस में दोष क्यों देखेंगे? सारी लांछनाकलंक तो उस के हिस्से में आएगा. अब तो मां के यहां भी ठिकाना न रहेगा.

अपने कलंकित जीवन से छुटकारा पाने के लिए उसे यह हक तो कतई न था कि दूसरों को अंधेरे में रखती. यह तो इत्तफाक था कि प्रमेश दूध का धुला नहीं है. आज यदि किसी चरित्रवान युवक के साथ ब्याह दी जाती तो क्या अपने अंत:-करण से कभी सुखशांति पाती. जरूर उस के मन का चोर उसे जबतब घेरता. हमेशा यह भय बना रहता कि कहीं कोई उसे पहचान न ले. इतनी दूर तक सोच कर ही उसे विवाह करना था. क्या पता जीवन के सफर में कोई ऐसा हमराही मिल ही जाता जो सबकुछ जान कर भी उस का हाथ थामने को तैयार हो जाता.

दोनों की आंखों में प्रथम मिलन की खुमारी दूरदूर तक नजर नहीं आ रही थी. फटी आंखों से दोनों सोच में डूबे सुबह होने का इंतजार कर रहे थे. चिडि़यों की चहचहाहट से सुबह होने का आभास होते ही प्रमेश उठा, अपने केशों को हाथ के पोरों से संवार और कमरे से निकलने के पहले कल्पना से बोला, ‘‘देखो, जो हुआ सो हुआ. तुम किसी प्रकार का नाटक नहीं करोगी, समझीं. हमारा परिवार इज्जतदार लोगों का है.’’

यहां जानिए, किचन गार्डन के क्या है फायदे

ऐसा अक्सर देखा गया है कि बागवानी का शौक रखने वाले लोग बहुत खुशनुमा होते हैं, कई लोगों को गार्डनिंग का शौक काफी ज्‍यादा होता है. अगर आपके घर के सामने थोड़ी सी ज़मीन है तो उसे यूं ही खाली न जाने दें और उसका उपयोग करें. आज इस लेख में हम आपको किचेन गार्डन के लाभ बताएंगे.

–  किचेन गार्डन में उगी सब्जियों को बनाने से आपका बजट मेंटेंन रहता है. ये सब्जियां अच्‍छी और सस्‍ती होते हैं. आप अपने मन मुताबिक समय पर उन्‍हे तोड़कर बना सकती हैं.

–  बागवानी करने से तनाव कम होता है. आपका दिमाग उसी में लगा रहता है जिससे आप इधर उधर की बातें सोच नहीं पाती हैं.

–   किचेन गार्डन होने पर आपको मालूम रहता है कि आप क्‍या खा रहे हैं. आजकल बाजार में पेस्टिसाइड पड़ी हुई सब्जियां व साग मिलती है, लेकिन घर पर उगी हुई सब्‍जी, सही होती है.

–   बागवानी करने से आपमें सकारात्‍मक परिवर्तन आ जाता है. आप खुद की केयर करना भी शुरू कर देती हैं. पौधे की देखभाल करने में आपको संतुष्टि मिलती है जिससे आपका स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा हो जाता है.

–   घर में किचेन गार्डन होने से कीट आदि कम पैदा होते हैं क्‍योंकि खाली जगह का सदुपयोग हो जाता है. साथ ही कुछ विशेष प्रकार के पौधे, कीटों को भागने में भी सक्षम होते हैं.

रसीली नहीं थी रशल कंवर: भाग 1

डूंगरदान पत्नी को सुखी और खुश रखने के लिए गांव से शहर ले आया था. वह जितना कमाता था, उतने में गृहस्थी आराम से चल जाती थी, लेकिन दिन भर घर में अकेली रहने वाली पत्नी रसाल कंवर ने अपना सुख खोजा पति के दोस्त मोहन सिंह राव में. इस के चलते कुछ न कुछ तो गलत होना ही था. आखिर…

रविवार 14 जुलाई, 2019 का दिन था. दोपहर का समय था. जालौर के एसपी हिम्मत अभिलाष टाक को फोन पर

सूचना मिली कि बोरटा-लेदरमेर ग्रेवल सड़क के पास वन विभाग की जमीन पर एक व्यक्ति का नग्न अवस्था में शव पड़ा है.

एसपी टाक ने तत्काल भीनमाल के डीएसपी हुकमाराम बिश्नोई को घटना से अवगत कराया और घटनास्थल पर जा कर काररवाई करने के निर्देश दिए. एसपी के निर्देश पर डीएसपी हुकमाराम बिश्नोई तत्काल घटनास्थल की ओर रवाना हो गए, साथ ही उन्होंने थाना रामसीन में भी सूचना दे दी. उस दिन थाना रामसीन के थानाप्रभारी छतरसिंह देवड़ा अवकाश पर थे. इसलिए सूचना मिलते ही मौजूदा थाना इंचार्ज साबिर मोहम्मद पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

घटनास्थल पर आसपास के गांव वालों की भीड़ जमा थी. वहां वन विभाग की खाई में एक आदमी का नग्न शव पड़ा था. आधा शव रेत में दफन था. उस का चेहरा कुचला हुआ था. शव से बदबू आ रही थी, जिस से लग रहा था कि उस की हत्या शायद कई दिन पहले की गई है.

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वहां पड़ा शव सब से पहले एक चरवाहे ने देखा था. वह वहां सड़क किनारे बकरियां चरा रहा था. उसी चरवाहे ने यह खबर आसपास के लोगों को दी थी. कुछ लोग घटनास्थल पर पहुंचे और पुलिस को खबर कर दी.

मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को खाई से बाहर निकाल कर शिनाख्त कराने की कोशिश की, मगर जमा भीड़ में से कोई भी मृतक की शिनाख्त नहीं कर सका. शव से करीब 20 मीटर की दूरी पर किसी चारपहिया वाहन के टायरों के निशान मिले. इस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि हत्यारे शव को किसी गाड़ी में ले कर आए और यहां डाल कर चले गए.

पुलिस ने घटनास्थल से साक्ष्य एकत्र किए. शव के पास ही खून से सनी सीमेंट की टूटी हुई ईंट भी मिली. लग रहा था कि उसी ईंट से उस के चेहरे को कुचला गया था. कुचलते समय वह ईंट भी टूट गई थी.

मौके की सारी काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए राजकीय चिकित्सालय की मोर्चरी भिजवा दिया. डाक्टरों की टीम ने उस का पोस्टमार्टम किया.

जब तक शव की शिनाख्त नहीं हो जाती, तब तक जांच आगे नहीं बढ़ सकती थी. शव की शिनाख्त के लिए पुलिस ने मृतक के फोटो वाट्सऐप पर शेयर कर दिए. साथ ही लाश के फोटो भीनमाल, जालौर और बोरटा में तमाम लोगों को दिखाए. लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका.

सोशल मीडिया पर मृतक का फोटो वायरल हो चुका था. जालौर के थाना सिटी कोतवाली में 2 दिन पहले कालेटी गांव के शैतानदान चारण नाम के एक शख्स ने अपने रिश्तेदार डूंगरदान चारण की गुमशुदगी दर्ज कराई थी.

कोतवाली प्रभारी को जब थाना रामसीन क्षेत्र में एक अज्ञात लाश मिलने की जानकारी मिली तो उन्होंने लाश से संबंधित बातों पर गौर किया. उस लाश का हुलिया लापता डूंगरदान चारण के हुलिए से मिलताजुलता था. कोतवाली प्रभारी बाघ सिंह ने डीएसपी भीनमाल हुकमाराम को सारी बातें बताईं.

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मारा गया व्यक्ति डूंगरदान चारण था

इस के बाद एसपी जालौर ने 2 पुलिस टीमों का गठन किया, इन में एक टीम भीनमाल थाना इंचार्ज साबिर मोहम्मद के नेतृत्व में गठित की गई, जिस में एएसआई रघुनाथ राम, हैडकांस्टेबल शहजाद खान, तेजाराम, संग्राम सिंह, कांस्टेबल विक्रम नैण, मदनलाल, ओमप्रकाश, रामलाल, भागीरथ राम, महिला कांस्टेबल ब्रह्मा शामिल थी.

दूसरी पुलिस टीम में रामसीन थाने के एएसआई विरधाराम, हैडकांस्टेबल प्रेम सिंह, नरेंद्र, कांस्टेबल पारसाराम, राकेश कुमार, गिरधारी लाल, कुंपाराम, मायंगाराम, गोविंद राम और महिला कांस्टेबल धोली, ममता आदि को शामिल किया गया.

डीएसपी हुकमाराम बिश्नोई दोनों पुलिस टीमों का निर्देशन कर रहे थे. जालौर के कोतवाली निरीक्षक बाघ सिंह ने उच्चाधिकारियों के आदेश पर डूंगरदान चारण की गुमशुदगी दर्ज कराने वाले उस के रिश्तेदार शैतानदान को राजदीप चिकित्सालय की मोर्चरी में रखी लाश दिखाई तो उस ने उस की शिनाख्त अपने रिश्तेदार डूंगरदान चारण के रूप में कर दी.

मृतक की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने उस के परिजनों से संपर्क किया तो इस मामले में अहम जानकारी मिली. मृतक की पत्नी रसाल कंवर ने पुलिस को बताया कि उस के पति डूंगरदान 12 जुलाई, 2019 को जालौर के सरकारी अस्पताल में दवा लेने गए थे.

वहां से घर लौटने के बाद पता नहीं वे कहां लापता हो गए, जिस की थाने में सूचना भी दर्ज करा दी थी. रसाल कंवर ने पुलिस को अस्पताल की परची भी दिखाई. पुलिस टीम ने अस्पताल की परची के आधार पर जांच की.

पुलिस ने राजकीय चिकित्सालय जालौर के 12 जुलाई, 2019 के सीसीटीवी फुटेज की जांच की तो पता चला कि डूंगरदान को काले रंग की बोलेरो आरजे14यू बी7612 में अस्पताल तक लाया गया था.

उस समय डूंगरदान के साथ उस की पत्नी रसाल कंवर के अलावा 2 व्यक्ति भी फुटेज में दिखे. उन दोनों की पहचान मोहन सिंह और मांगीलाल निवासी भीनमाल के रूप में हुई. पुलिस जांच सही दिशा में आगे बढ़ रही थी.

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज जांच के बाद गांव के विभिन्न लोगों से पूछताछ की तो सामने आया कि मृतक डूंगरदान चारण की पत्नी रसाल कंवर से मोहन सिंह राव के अवैध संबंध थे. इस जानकारी के बाद पुलिस ने रसाल कंवर और मोहन सिंह को थाने बुला कर सख्ती से पूछताछ की.

मांगीलाल फरार हो गया था. रसाल कंवर और मोहन सिंह राव ने आसानी से डूंगरदान की हत्या करने का जुर्म कबूल कर लिया.

केस का खुलासा होने की जानकारी मिलने पर पुलिस के उच्चाधिकारी भी थाने पहुंच गए. उच्चाधिकारियों के सामने आरोपियों से पूछताछ कर डूंगरदान हत्याकांड से परदा उठ गया.

पुलिस ने 16 जुलाई, 2019 को दोनों आरोपियों मृतक की पत्नी रसाल कंवर एवं उस के प्रेमी मोहन सिंह राव को कोर्ट में पेश कर 2 दिन के रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान उन से विस्तार से पूछताछ की गई तो डूंगरदान चारण की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस तरह थी-

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मृतक डूंगरदान चारण मूलरूप से राजस्थान के जालौर जिले के बागौड़ा थानान्तर्गत गांव कालेटी का निवासी था. उस के पास खेती की थोड़ी सी जमीन थी. वह उस जमीन पर खेती के अलावा दूसरी जगह मेहनतमजदूरी करता था. उस की शादी करीब एक दशक पहले जालौर की ही रसाल कंवर से हुई थी.

करीब एक साल बाद रसाल कंवर एक बेटे की मां बनी तो परिवार में खुशियां बढ़ गईं. बाद में वह एक और बेटी की मां बन गई. जब डूंगरदान के बच्चे बड़े होने लगे तो वह उन के भविष्य को ले कर चिंतित रहने लगा.

गांव में अच्छी पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी, लिहाजा डूंगरदान अपने बीवीबच्चों के साथ गांव कालेटी छोड़ कर भीनमाल चला गया और वहां लक्ष्मीमाता मंदिर के पास किराए का कमरा ले कर रहने लगा. भीनमाल कस्बा है. वहां डूंगरदान को मजदूरी भी मिल जाती थी. जबकि गांव में हफ्तेहफ्ते तक उसे मजदूरी नहीं मिलती थी.

क्रमश: 

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन,  शिवसेना पहुंची सुप्रीम कोर्ट

अंततः 19 दिन बाद भी महाराष्ट्र में किसी भी दल की सरकार न बनते देख महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी है. इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अचानक केंद्रीय कैबिनेट की बैठक बुलाकर इस मसले पर मंत्रणा कर महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन पर मुहर लगा दी. राज्यपाल के अनुसार उन्होंने यह कदम संविधान के अनुसार उठाया गया. क्योंकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी/ एनसीपी को आज शाम साढ़े आठ बजे तक का वक्त दिया गया था, पर सुबह साढ़े ग्यारह बजे एनसीपी ने राज्यपाल से तीन दिन का वक्त मांगा था.

सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में शिवसेनाः

उधर शिवसेना ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गयी है. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने वरिष्ठ वकील व कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल तथा अहमद पटेल से इस मसले पर फोन पर बात की. यूं तो अभी उद्धव ठाकरे ने मीडिया से बात करने से इंकार कर दिया है. मगर सूत्रों के अनुसार शिवसेना सुप्रीम कोर्ट में राज्यपाल को उनकी मांग के अनुरूप तीन दिन का वक्त न दिए जाने पर घेरने वाली है.

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हर तरफ से घिरी शिवसेनाः

इस पूरे राजनीतिक दंगल में यदि किसी को सबसे बड़ा नुकसान होता नजर आ रहा है, तो वह शिवसेना को है. शिवसेना पार्टी बुरी तरह से चारो तरफ से घिर गयी है. मुख्यमंत्री बनने के लालच में एनसीपी के आश्वासन पर शिवसेना के मंत्री अरविंद सावंत ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर एनडीए से नाता तोड़ा और राष्ट्रपति ने उनका त्यागपत्र भी स्वीकार कर लिया. अब शिवसेना पुनः भाजपा के पास जाने की हालत में नहीं रही. उधर कांग्रेस अलग से नौटंकी कर रही है. ऐसे में एनसीपी लोगों के सामने अपनी छवि को सुधारने के लिए कांग्रेस को कटघरे में खड़ी करने लगी है.

कांग्रेस व एनसीपी में दरारः

इससे पहले आज सुबह से ही राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज रही. इस सरगर्मी के बीच कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी/एनसीपी के बीच भी दूरियां साफ तौर पर उभर का आ गयीं. कांग्रेस नेता माणिकराव ठाकरे ने सुबह मीडिया से कहा कि कांग्रेस अपने नेताओं को एनसीपी से बात करने के लिए दो दिन बाद भेजेगी. इस पर आग बबुला होते हुए शरद पवार की बेटी और एनसीपी नेता सुप्रिया सुले ने मीडिया के सामने आकर कहा- ‘‘हम माणिकराव ठाकरे को नही जाते. हम तो कांग्रेस आलाकमान के संग बात कर रहे हैं.’’ इसके तुरंत बाद एनसीपी नेता अजीत पवार मीडिया के सामने आए और कांग्रेस को विलेन बताते हुए कहा- ‘‘हम तो सरकार बनाने के लिए तैयार है. हम शिवसेना को समर्थन पत्र देने का मन बना चुके थे, पर बिना कांग्रेस के पत्र के हमारा पत्र देना ठीक नही था. पर कांग्रेस इसमें देर कर रही है.’’

कांग्रेस को ठाकरे परिवार का मुख्यमंत्री नामंजूर

इसी बीच कांग्रेस की तरफ से कहा गया कि सोनिया गांधी ने अहमद पटेल, के सी वेणुगोपाल और मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र के साथ शरद पवार से विस्तृत बातचीत करने के लिए भेजने का निर्णय किया है. यह लोग शाम छह बजे तक मुंबई पहुंचेंगे और फिर शरद पवार से मिलेंगे. सूत्रों के अनुसार इस तीन पन्ने के समर्थन पत्र के साथ कांग्रेस ने शर्ते लिखी हैं. सूत्रों की माने तो कांग्रेस ने शर्ते इस प्रकार हैं- 1-मिनिमम कौमन प्रोग्राम पर लिखित सहमति हो. 2-मुख्यमंत्री ठाकरे परिवार का नही होगा. 3-विधानसभा अध्यक्ष कांग्रेस का होगा 4-चार विधायक पर एक मंत्रीपद के अनुसार कांग्रेस के कोटे से मंत्री बनाए जाएं.

संजय राउतः हार नही मानेंगे

इसके बाद अस्पताल में भर्ती संजय राउत ने ट्वीट किया- ‘‘कोषिष करने वालों की हार नही होती.’’

कांग्रेस का अंतर्द्वंद

कांग्रेस अपने अंतर्द्वंद ही  का शिकार है. कांग्रेस को डर है कि जो शिवसेना पार्टी उनकी धुआधार विरोधी रही है, जिससे उनके वैचारिक मतभेद काफी गहरे हैं, उसी के साथ सरकार बनाकर कहीं वह महाराष्ट्र के साथ साथ दूसरे राज्यों में भी अपना बचा खुचा जनाधार न खो दे. दूसरा डर यही सता रहा है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने सपा व बसपा के साथ सरकार बनायी, जिसके चलते कांग्रेस का उत्तर प्रदेश से सफाया हो गया और सपा व बसपा बलवान हो गए. इसी तरह कहीं महाराष्ट्र में शिवसेना व एनसीपी को फायदा तथा कांग्रेस का सफाया न हो जाए. तीसरा डर  कांग्रेस को अपने विधायकों से है. जयपुर में एक रिसोर्ट में ठहराए गए कांग्रेस के तमाम विधायक हर हाल में सरकार का हिस्सा बनकर सत्ता सुख का लाभ लेना चाहते हैं. वह बार बार आलाकमान पर दबाव डाल रहे हैं. यह विधायक मुंबई आने के लिए परेशान हैं. ऐसे में सोनिया गांधी की समझ में नही आ रहा है कि वह क्या करें.

सूत्रों के अनुसासर कांग्रेस की एक लौबी का मानना है कि सेक्युलरिज्म की उसकी छवि शिवसेना के साथ जाने से खराब होगी और लंबे समय में उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है.मगर महाराष्ट्र के ज्यादातर नेताओं का कहना है कि यदि राज्य में सरकार में शामिल होते हैं, तो कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ेगा और पार्टी का विस्तार किया जा सकेगा.

शिवसेना पर वारः

उधर कुछ कांग्रेसी यह भी कहते नजर आ रहे हैं कि बाला साहेब ठाकरे ने खुद कभी इंदिरा गांधी से लेकर किसी भी नेता से बात नहीं की. बाला साहेब हर नेता को मातोश्री पर ही मिलने के लिए बुलाते थे.पर अब मुख्यमंत्री बनने के लिए उद्धव ठाकरे ने स्वयं सोनिया गांधी व शरद पवार सहित कई नेताओं को फोन कर रहे हैं. इतना ही नही खुद मातोश्री से निकल कर शरद पवार से बातचीत करने के लिए एक पांच सितारा होटल पहुंच गए.

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संजय निरूपम का ट्वीट

कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने ट्वीट किया-‘कांग्रेस पर महाराष्ट्र में सरकार गठन की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है. हमारे ऊपर कोई भी आरोप लगाया जाना आधारहीन है. यह बीजेपी और शिवसेना की असफलता है, जिन्होंने प्रदेश को राष्ट्रपति शासन की ओर ले जाने का काम किया है.‘

असदुद्दीन भी कूदेः

इसी दंगल में असदुद्दीन भी कूद पड़े. भाजपा व शिवसेना के बहाने उन्होंने कांग्रेस व एनसीपी को लताड़ा और कहा कि कांग्रेस का असली चेहरा सबके सामने आ गया. उन्होंने साफ साफ कहा कि भाजपा व शिवसेना में कोई अंतर नही है. कम से कम वह दोनो को समर्थन नही दे सकते.

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