Download App

आशा का दीप : भाग 2

दोनों जानते थे कि ऐसे हालात में खामोशी ही ठीक है. थोड़ी देर बाद वैभवी ने चप्पू थामे और नाव को किनारे की तरफ धकेलना शुरू कर दिया.

किनारे पर किश्ती लगी. वैभवी उतरी. उस ने एक नजर अपने मंगेतर की तरफ डाली और फिर मुड़ कर स्थिर कदमों से बाहर चली गई.

विनोद उस को जाता देखता रहा. वह थोड़ा हकबकाया सा, थोड़ा लुटालुटा सा था. इस बदले हालात की वह क्या समीक्षा करे, क्या बोले.

यदि वैभवी ने कोई अन्य कारण बता कर शादी से मना कर दिया होता, रिश्ता तोड़ने की बात कही होती तब वह इस आघात को सहजता से  झेल लेता, मगर ऐसी स्थिति…

मात्र 10 दिन विवाह को बचे थे. भावी दुलहन में जानलेवा कैंसर की बीमारी के लक्षण उभर आए थे.

धीमे कदमों से चलता विनोद अपनी कार में बैठा. घर चला आया. अपने मम्मीपापा को क्या बताए? बताए या न बताए?

‘‘विनोद, ज्वैलर का फोन आया था. सारे जेवरात तैयार हैं. थोड़ी देर में उन का आदमी ले कर आने वाला है,’’ सोफे पर चुपचाप बैठे विनोद से उस की मम्मी ने कहा.

ऐसे हालात में विनोद क्या कहे? कैसे कहे? वैभवी उस को अपनी असाध्य सम झी जाने वाली अकस्मात उभरी बीमारी का कारण बता रिश्ता तोड़ने का इशारा कर चुकी है.

खुशी के मौके को सैलिब्रेट करने के लिए दोनों पक्षों से जुड़ी सभी सैरेमनी समयसमय पर की जा रही थीं. पहले रोका सैरेमनी, फिर रिंग सैरेमनी. अब समय था बधाई सैरेमनी और साथ ही लेडीज संगीत सैरेमनी का जो कि विवाह से मात्र 2 दिन पहले तय थी और संयुक्त समारोह था.

ऐसे आघात, जो कि कुदरती था, का आभास न वैभवी को था न विनोद को. वैभवी के परिवार वाले तो आ पड़ी इस आसन्न विपत्ति से आगाह थे मगर विनोद के परिवार वाले अनजान थे.

विनोद का परिवार पूरे उत्साह से शादी की तैयारियों में मग्न था. मगर वैभवी का परिवार असमजंस  में था. क्या करें? क्या न करें?

‘‘विनोद को बताया?’’ मम्मी ने वैभवी से पूछा.

‘‘हां, मैडिकल रिपोर्ट उस को दिखा कर सब बता दिया,’’ ठंडे, स्थिर स्वर में वैभवी ने कहा.

‘‘उस ने क्या कहा?’’

‘‘फिलहाल कुछ नहीं. मामला ही ऐसा है, कोई भी एकदम क्या जवाब दे सकता है.’’

अगले दिन औफिस में सब व्यवस्थित था, सुचारु था. कंपनी के मामलों में मार्केटिंग मैनेजर और सेल्समेन में सामान्य तौर पर डिस्कशन हुआ. भविष्य की योजनाएं बनाई गईं.

शाम को विनोद घर लौटा. उस की मम्मी ने उस को पानी का गिलास थमाते कहा, ‘‘आज हमारी सोसाइटी में रहने वाले 2 परिवारों के सदस्यों के  साथ दुर्घटनाएं हुई हैं.’’

‘‘किस के साथ?’’

‘‘साथ वाले अपार्टमैंट में रहने वाले अमन सीढि़यों से फिसल कर गिरने पर रीढ़ की हड्डी तुड़वा बैठे हैं. जबकि सामने वाले बैरागीजी की पत्नी बस की चपेट में आ कर कुचल गई हैं. दोनों सीरियस हैं.’’

विनोद सोच में पड़ गया. क्या कभी उस ने इस बात पर गौर किया था. उस का अड़ोसीपड़ोसी कौन था?

महानगरीय सभ्यता का अनुकरण करते अब बड़े शहर या मध्यम श्रेणी के महानगर भी अपरिचय की सभ्यता या संस्कृति का अनुकरण कर रहे थे. क्या उस ने कभी अपने साथ वाले फ्लोर में रहने वाले अड़ोसीपड़ोसी से परिचय किया? हालचाल पूछा? क्या उन्होंने भी ऐसा किया?

अगले 2 दिनों में दोनों दुर्घटनाग्रस्त पड़ोसी चल बसे. उन की अंतिम विदाई में विनोद भी शामिल हुआ.

जिस से जानपहचान थी उन से विनोद को पता चला कि हाउसिंग सोसाइटी में रहने वाले कई पड़ोसी तरहतरह की बीमारियों से ग्रस्त थे. मगर अपनी असाध्य बीमारियों को सहजता से अपनी नियति सम झ वे अपना जीवन जी रहे थे.

रिटायर्ड प्रिंसिपल मिस्टर अस्थाना 80 वर्ष के थे. पिछले 50 साल से, कैंसरग्रस्त थे. मगर परहेजभरा जीवन अपना कर सहजता से जी रहे थे.

उन की रिटायर्ड पत्नी भी असाध्य बीमारी से ग्रस्त थी, मगर बीमारी को अपने जीवन का अंग मान कर 70 बरस पार कर अपना जीवन सहजता से जी रही थी.

एक परिवार का बच्चा 5 बरस का था. एक टांग पोलियोग्रस्त थी, मगर वह कृत्रिम टांग से खेलताकूदता था. मग्न रहता था.

एक 12 साल का बच्चा खुद ही मधुमेह के इंजैक्शन लगाता था.

मनुष्य का दिमाग सुख की अवस्था में इतना चैतन्य नहीं होता जितना दुखपरेशानी या विपत्ति पड़ने पर.

अपनी भावी पत्नी पर आ पड़ी आसन्न विपत्ति ने विनोद का मस्तिष्क चैतन्य कर दिया. आसपड़ोस, अनेक मित्रों, संबंधियों पर गौर फरमाने से उस को आभास हुआ, संसार में पूर्ण सुखी कोई नहीं था.

‘‘वैभ,’’ आईपौड की नईर् शैली के सैलफोन पर विनोद का फोन नंबर उभरा.

‘‘कहिए?’’

‘‘शाम को ओपन रैस्टौरैंट में आना है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘तुम्हारी मैडिकल रिपोर्ट का जवाब देना है.’’

‘‘ओके, विनोद, शाम 7 बजे.’’

‘‘विनोद नहीं, विक्की. जरा नई शैली की कोई अट्रैक्टिव ड्रैस डालना,’’ और खट से फोन कट गया.

अनबू झी पहेली के समान हाथ में पकड़े सैलफोन को देखती वैभवी कुछ न सम झ सकी.

‘‘दीदी, जीजाजी से मिलने जा रही हो?’’ बड़ी बहन को ड्रैसिंग टेबल के सामने बैठा देख छोटी बहन अनुष्का ने पूछा.

वैभवी खामोश रही. असाध्य बीमारी का छोटी बहन को पता नहीं था. मम्मी खामोश थीं. वरपक्ष क्या पता कब रिश्ता तोड़ने के लिए फोन कर दे या पर्सनल मैसेज भेज दे.

वही ओपन रैस्टोरैंट, मध्यम रोशनी से आभासित गोल मेज व कुरसियां.

‘‘क्या पियोगी?’’ वैभवी की आंखों में प्यार से  झांकते विनोद ने पूछा.

‘‘प्लीज कम टू द पौइंट,’’ वैभवी ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘अरे भई, ठंडागरम तो पी लो. जब कोई समस्या होती है तब समाधान भी होता है.’’

‘‘मेरी बीमारी लाइलाज है. साधारण समस्या नहीं है.’’

‘‘ठीक है, फर्ज करो, यही ट्रबल मु झे हो जाता तो?’’

‘‘वह सब बाद की बात है. आप क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘कैंसर आजकल के जमाने में लाइलाज नहीं है. धैर्य रख कर इलाज करवाने से कैंसर ठीक हो जाता है,’’ विनोद ने गंभीर स्वर में कहा.

‘‘विनोद, बी प्रैक्टिकल. आप सर्वगुण संपन्न हैं. आप को अनेक रिश्ते मिल जाएंगे.’’

‘‘कल का क्या भरोसा है? किसी और लड़की से शादी करने पर भविष्य में वह भी किसी गंभीर बीमारी की शिकार हो सकती है.’’

‘‘वह सब बाद की बात है.’’

‘‘कैंसर के लक्षण अभी न उभर कर शादी के बाद उभरते तो?’’

इस सवाल पर वैभवी खामोश रही. विनोद उठ कर उस के समीप आया, ‘‘वैभ, प्लीज मेरे पास आओ,’’ उस के कंधों पर हाथ रखते उस ने कहा. स्नेहस्निग्ध, प्रेमभरे स्पर्श से वैभवी की आंखें भर आईं. वह उठ कर अपने मंगेतर के सीने से लग गई. धीमेधीमे सुबकने लगी.

विनोद ने वैभवी को बाहुपाश में भर लिया. वैभवी की आंखों से गिरते आसुंओं से उस की शर्ट भीग गई. भावनाओं का ज्वार मंद पड़ा.

वैभवी ने अपनी पसंद के डिनर का और्डर दिया. एक ही प्लेट में दोनों ने एकदूसरे को खिलाया. वैभवी के साथ विनोद को आया देख वैभवी की मां चौंकी. दोनों के चेहरे से वे सम झ गईं कि रिश्ता टूटने के बजाय और ज्यादा पक्का हो गया लगता है.

अगले दिन विनोद और वैभवी ने अपने औफिस से छुट्टी ले ली. विनोद वैभवी को नगर के बड़े मल्टीस्पैशलिटी अस्पताल में ले गया.

बहुत बड़ा अस्पताल था. सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त था. पूरे देश में इस की कई शाखाएं थीं. इस का संचालन एक बड़ा व्यापारी घराना करता था. चिकित्सा व्यवस्था भी अब बड़े कौर्पाेरेट घराने अपना चुके थे.

एक अस्पताल में मैडिक्लेम के आधार पर भी चिकित्सा प्रदान की जाती थी.

फीस और अन्य औपचारिकताएं पूरी करने के बाद चिकित्सा दल ने सिलसिलेवार वैभवी के कई टैस्ट किए.

‘‘देखिए सर, कैंसर की कई किस्में होती हैं. पहले जमाने में अधिकांश कैंसर लाइलाज थे, मगर मैडिकल सांइस में तरक्की होने से अब अधिकांश कैंसर का इलाज संभव है,’’ वरिष्ठ कैंसर विशेषज्ञ डा अभिनव बनर्जी ने स्थिर स्वर में कहा.

वैभवी और विनोद को आशा का संचार महसूस हुआ.

‘‘बाई द वे, ये आप की क्या हैं?’’ डा. साहब ने पूछा.

‘‘जी, मेरी मंगेतर हैं. हमारी अगले सप्ताह शादी है. बाईचांस वक्षस्थल में तीव्र दर्द उठने से यह स्थिति सामने आ गई,’’ विनोद ने डा. साहब का आशय सम झते कहा.

‘‘मंगेतर…और अगले सप्ताह शादी,’’ डा. साहब ने गौर से सामने बैठे जोड़े की तरफ देखा. दोनों पतिपत्नी होते तो स्थिति सहज थी. मगर मंगेतर…

विनोद और वैभवी डाक्टर साहब के चेहरे के भाव सम झ कर हलके से मुसकराए. डा. साहब के चेहरे पर भी मृदु मुसकान उभर आई. उन्होंने प्रशनात्मक नजरों से विनोद बतरा की तरफ देखा.

विनोद सुंदर, सजीला नौजवान था. सर्वगुण संपन्न था. आम युवक भावी पत्नी के कैंसरयुक्त होने का पता चलने पर तत्काल रिश्ता तोड़ देता.

‘‘मिस्टर, आई विश यू औल द बैस्ट.’’

‘‘आप की भावी पत्नी का इलाज हो जाएगा. थोड़ा धैर्य और हौसला रखना पडे़गा,’’ डा. साहब ने तसल्लीभरे स्वर में कहा.

‘‘कितना खर्चा पड़ सकता है?’’ वैभवी ने पूछा.

‘‘खर्च तो काफी होगा मगर आप पूर्णतया रोगमुक्त हो जाएंगी.’’

‘‘अंदाजन?’’

‘‘देखिए, नई तकनीक की लेजर एवं बर्न सर्जरी द्वारा पहले कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट करना पड़ेगा. फिर दोबारा कैंसर की कोशिकाएं न पनपें, इस के लिए रेडिएशन तकनीक द्वारा तमाम वक्षस्थल की विशेष सर्जरी करनी पड़गी. फिर आप का एक वक्ष निकालना पड़ेगा.’’

‘‘एक वक्ष?’’

‘‘जी हां, कैंसर आप के बाएं वक्ष में है. दूसरा वक्ष निरापद है. निकाले गए वक्ष के स्थान पर स्पैशल पौलिमर और प्लास्टिक सर्जरी द्वारा कृत्रिम वक्ष का निर्माण कर स्थायी तौर पर लगा दिया जाएगा. कृत्रिम वक्ष बिलकुल कुदरती महसूस होगा. बस, आप स्तनपान नहीं करवा सकेंगी. आप का दायां वक्ष पूरी तरह सक्षम है. उस से आप भावी संतान को सहजता से स्तनपान करवा सकेंगी.’’

‘‘अस्पताल में कितना समय लग सकता है?’’

‘‘औपरेशन में 4 से 6 घंटे और रिकवर होने में लगभग 3-4 सप्ताह. रेडिएशन थेरैपी से आप के शरीर के बाल अस्थायी तौर पर  झड़ सकते हैं. दोबारा उगने में कोई दिक्कत नहीं होगी.’’

‘‘और सारा खर्च?’’

‘‘लगभग 20 लाख रुपए.’’

‘‘जी,’’ वैभवी का चेहरा बु झ गया.

‘‘डियर, हैव पेशेंस,’’ विनोद ने आश्वासन देते वैभवी के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘डा. साहब, मैडिक्लेम इंश्योरैंस पौलिसी के आधार पर भी इस इलाज का खर्चा क्लेम हो सकता है?’’ विनोद ने पूछा.

‘‘जी हां, हमारे यहां यह सुविधा भी है. क्या आप के पास मैडिक्लेम बीमा पौलिसी है?’’

‘‘आजकल मल्टीपरपज बीमा पौलिसी का जमाना है. मेरे पास और इन के पास मल्टीपरपज बीमा पौलिसी है. हम दोनों का 30 साल का 50-50 लाख रुपए का बीमा है.’’

‘‘फिर कोई दिक्कत नहीं है,’’ डा. साहब ने हर्षभरे स्वर में कहा. तभी कमरे का दरवाजा खोल कर एक लेडी डाक्टर दाखिल हुईं. उन के गौरवर्ण चेहरे और ललाट पर गहन बुद्धिमता की छाप थी. उन्होंने हलके नीले रंग की साड़ी और मैच करता ब्लाउज पहन रखा था. उन के ऊपर डाक्टरों वाला लंबा सफेद कोट था और दोनों कंधों पर  झूलता स्टैथस्कोप.

‘‘मीट माई वाइफ डा. आभा बनर्जी,’’ लेडी डाक्टर के समीप आ कर साथ रखी खाली कुरसी पर बैठने के बाद डा. साहब ने परिचय कराते कहा, ‘‘ ये हैं मिस्टर विनोद ऐंड मिस वैभवी.’’ और आभा ने बारीबारी से हाथ मिलाया.

‘‘शी इज औल्सो मेलाइन सारकोमा ट्रीटमैंट सर्जरी स्पैशलिस्ट ऐंड मिडीलिशन थेरैपी विशेषज्ञ,’’ डा. साहब ने कहा, फिर अपनी पत्नी से बंगाली भाषा में कुछ कहा.

डा. आभा के चेहरे पर मृदु मुसकान उभरी. उन्होंने विनोद की तरफ प्रशंसात्मक नजरों से देखते कहा, ‘‘विनोद, आई ऐप्रिशिएट यौर जनरस ऐंड काइंड स्पिरिट. नेचर विल शौवर औल ब्लैसिंग्स औन बोथ औफ यू.’’

विनोद बतरा ने मूक अभिवादन की मुद्रा में सिर हिलाया.

डा. साहब ने अपने लैटरहैड पर कुछ दवाएं लिखीं और बताया, ‘‘हर मरीज को औपरेशन से पहले शरीर को औपरेशन के लिए तैयार करने की बाबत कुछ दिन जरूरी दवाएं लेनी पड़ती हैं.’’

डा. दंपती ने स्नेह से भावी कपल की तरफ देखा और गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

विवाह पूरे धूमधाम से हुआ. दोनों हनीमून के लिए चले गए.

दोनों ने एक महीने की छुट्टी ले ली. डाक्टर ने वैभवी का औपरेशन दूसरी शाखा के अस्पताल में किया.

औपरेशन सफल रहा. काटे गए वक्ष की जगह नया कृत्रिम वक्ष भी लग गया. बीमा कंपनी ने सहृदयता दिखाते सारे खर्च का भुगतान किया.

विनोद के मातापिता अपने सुपुत्रकी विशाल सहृदता पर अभिभूत थे. वहीं, वैभवी के मातापिता भी ऐसा दामाद पा कर हर्षमग्न थे.

सालभर बाद वैभवी ने चांद सी सुंदर बच्ची को जन्म दिया, जो अपनी माता के समान सुंदर थी और स्वस्थ भी.

लिपस्टिक लगाते समय रखें इन 4 बातों का ध्यान

लिपस्टिक  महिलाओं की खूबसूरती पर चार चांद लगाने का काम करती है. लेकिन अगर आप गलत तरीके से  लिपस्टिक इस्तेमाल करती हैं तो ये आपके  खूबसूरती को  बिगाड़ भी सकती है.इसलिए लिपस्टिक लगाते समय आपको कुछ सावधानी बरतने की जरूरत है.  तो चलिए जानते हैं, लिपस्टिक लगाते समय आपको किन बातों का ख्याल रखना चाहिए.

  1. लिपस्टिक लगाने से पहले ये जांच लें कि आपके होंठ रूखे या फटे न हों वरना दरारों के बीच स्किन कलर आपकी खूबसूरती बिगाड़ देगा. ऐसे में रूखे होंठों पर पहले लिप बाम या ग्ल‍िसरीन जरूर लगाएं, उसके बाद ही लिपस्टिक इस्तेमाल करें.

2. लिपस्‍टिक लगाने से पहले लिप पेंसिल से गहरे रंग का आउटलाइन या शेड बना लें. इससे होंठों का आकार उभरकर आएगा और फिर आपकी लिपस्टिक ज्यादा आकर्षक दिखेगी.

ये भी पढ़ें- विंटर टिप्स : ड्राई स्किन को ऐसे बनाएं सौफ्ट

3. लिपस्ट‍िक का केवल एक ही कोट लगाएंगे तो वह जल्दी हल्की पड़ जाएगी. लिपस्ट‍िक के कम से कम दो-तीन कोट तो जरूर लगाएं. दूसरा, लिपस्टिक का इस्तेमाल अपनी स्किल के कलर को ध्यान में रखकर करना भी जरूरी है.

4. लिपस्ट‍िक का एक कोट लगाने के बाद होंठों पर उंगलियों से हल्का सा पाउडर लगाएं, ऐसा करने से लिपस्ट‍िक पूरी तरह सेट हो जाएगी. इसके बाद अगर आपको लग रहा हो कि लिपस्ट‍िक हल्की लग गई है, तो एक कोट और लगा सकती हैं.

ये भी पढ़ें- ऐसे करें डैंड्रफ की समस्या का इलाज

#bethebetterguy: यातायात के नियमों का पालन करना है बहुत जरूरी

जिंदगी बहुत छोटी होती है ये कब कहां खतम हो जाए हम नहीं जानते लेकिन खुद से अगर आप सुरक्षित रहना चाहते हैं तो यातायात के नियमों का पालन अवश्य करें. अक्सर लोग सड़क पर वाहन चलाते समय जल्दी के कारण यातायात के नियमों का पालन नहीं करते हैं और परिणाम ये होता है कि सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें यातायात के नियमों की कोई परवाह ही नहीं होती है या फिर वो जान कर भी अंजान बनते हैं.

वैसे तो उन्हें सब पता होता है फिर भी वो नियमों का पालन नहीं करते हैं. ऐसा नहीं है कि ये यातायात नियम ऐसे ही बने हैं या इससे सरकार और ट्रैफिक पुलिस वालों का कोई फायदा है. ये आपकी सेफ्टी के लिए ही बनाए गए हैं ताकि आप सुरक्षित रहें. हमेशा गाड़ी को एक सामान्य गति में चलाना चाहिए क्योंकि आंकड़े बताते हैं की सबसे ज्यादातर सड़क दुर्घटना तेज रफ्तार गाड़ी चलाने आ अनियंत्रित होने की वजह से ही होते हैं.

ये भी पढ़ें- #bethebetterguy: शराब पीकर गाड़ी चलाना हो सकता है खतरनाक

गाड़ी को हमेशा सही रूट पर ही चलाएं कभी भी गलत रास्ते पर उल्टा ना चलाए. अगर रेड सिग्नल है तो गाड़ी को वहीं रोक दें सिग्नल ग्रीन होने पर ही जाएं. यदि आप चार पहिया वाहन चला रहें हैं तो आपके लिए ये जरूरी है कि आप सीट बेल्ट अवश्य लगाएं. कभी भी बड़ी गाड़ियों को ओवरटेक ना करें क्योंकि ऐसे में भी दुर्घटना होने की संभावना होती है.

जब भी ब्रेकर दिखे तो गाड़ी की रफ्तार धीमी करें. जब भी कोई मोड़ आए सड़क पर तो वहां पर भी गाड़ी की रफ्तार को धीमा करके हार्न देने के बाद ही गाड़ी को मोड़े. वरना अक्सर ऐसा होता की है दूसरे साइड से कोई गाड़ी आ रही होती है और अचानक गाड़ी मोड़ने पर दोनों ही गाड़ियों में टक्कर हो जाती है. इसलिए इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है. बाइक चलाते वक्त हेलमेट भी जरूर पहने ताकि यदि कोई दुर्घटना होती है हेलमेट आपको सर पर गंभीर चोट लगने से बचाएगा.

ये भी पढ़ें- सुबह इंसाफ का जश्न मनाया, शाम होते होते उन्नाव की बेटी दुनिया को अलविदा कह गई

ये सभी नियम आपको सुरक्षित रखेंगे और साथ ही साथ दूसरों को भी.


Hyundai रखता है आपकी सभी जरूरतों का ख्याल और करता है आपकी सुरक्षित यात्रा के लिए हर प्रयास. आप भी करें हर ट्रैफिक नियम का पालन और रखें अपना और अपने चाहने वालों का ध्यान.

‘शुभारंभ’: जानें कैसे हैं राजा-रानी और क्यों अलग है इनकी कहानी

जब दो अलग स्वभाव और मिज़ाज के लोग एक साथ आते हैं और एक दूसरे की खूबियों को पहचान लेते हैं तो सफलता उनके कदम चूमती है. अगर किस्मत ऐसे ही दो लोगों को करीब लाती है तो वे मिलकर एक और एक दो नहीं पूरे ग्यारह हो जाते हैं. इसीलिए कलर्स लेकर आ रहा है, राजा और रानी की ऐसी ही साझेदारी की अनोखी कहानी, ‘शुभारंभ’. तो चलिए जानते हैं कि कौन हैं ये राजा-रानी और कैसी है इनकी दुनिया, इनका स्वभाव और इनके सपने.

रानी- हकीकत से लड़ती एक लड़की

रानी, वृंदा और छगन की तीसरी बेटी है. रानी ने बचपन से ही काफी संघर्ष किया है. गरीबी और हालात से लड़ते हुए रानी कम उम्र में ही काफी सशक्त हो गई है और किसी भी परेशानी का समाधान करने में माहिर भी है.

  1. खुद पर निर्भर रहने वाली लड़की है रानी

कम उम्र में ही रानी खुद पर निर्भर रहने वाली लड़की है क्योंकि, उसके पिता तो काम नहीं करते सिर्फ माँ ही अकेले घर चला रही है इसलिए रानी खुद हर काम में माहिर हो गई है.

2. भावुक

भले ही रानी आत्मनिर्भर और सशक्त हो लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि उसे किसी बात से फर्क नहीं पड़ता. रानी काफी भावुक है इसलिए जब भी जिंदगी में कोई दिक्कत होती है तो उसे अपनी माँ और भाई के सहारे की जरूरत होती है.

3. मेहनत करने से पीछे नहीं हटती रानी

जब भी रानी की जिंदगी में कुछ गड़बड़ होती है या वो गुस्सा होती है तो सीधे भगवान से झगड़ा करती है और अपनी भड़ास निकालती है. लेकिन ये गुस्सा उसे बुरा नहीं बल्कि मेहनती बनाता है और वो कड़ी मेहनत करके अपनी जिंदगी बदलना चाहती है.

4. परिवार है सब कुछ

रानी के लिए उसका परिवार ही सब कुछ है वो अपने परिवार से बहुत प्यार करती है. अपने परिवार के लिए वो कुछ भी कर सकती है.

5. प्यार मतलब बराबरी का रिश्ता

प्यार को लेकर रानी की अलग ही सोच है क्योंकि उसने बचपन से अपनी माँ को पति के होते हुए भी अकेले ही हर चीज़ के लिए काम करते देखा है. रानी प्यार में यकीन तो करती है लेकिन उसके लिए प्यार परियों की कहानी नहीं बल्कि बराबरी का रिश्ता है.

राजा- अपने सपनों का राजकुमार

राजा सूरत की मशहूर दुकान ‘राजा सूटिंग और सर्टिंग’ को चलाने वाले परिवार का बेटा है. 7 साल की उम्र में ही राजा के सिर से पिता का साया उठ गया था तब उसकी माँ ने उसे कहा था कि अब उसे अपने पिता की ज़िम्मेदारियाँ उठानी होगी और वो हर काम करना होगा जो उसके ताऊ और ताई जी कहेंगे. इसलिए घर और दुकान का मालिक होते हुए भी राजा सिर्फ एक सहायक बनकर रह गया है हालांकि, उसे खुद इस बात का अहसास नहीं है.

  1. मासूम और साफ दिल

राजा बहुत ही साफ दिल, भोला और मासूम लड़का है. राजा के मन में किसी के लिए कोई शिकायत या नफरत नहीं है. राजा को दुनियादारी की कड़वाहट का कोई अहसास नहीं है.

2. दूसरों को बचाने वाला

अगर राजा के परिवार पर कभी कोई मुसीबत आती है तो वो उसे खुद पर ले लेता है. परिवार के आगे उसके लिए उसका आत्मसम्मान भी कुछ नहीं है. हर किसी के साथ उसका दिल का रिश्ता है. अब कोई इसकी कदर करे या न करे.

3. शर्मीला

राजा हर मामले में बहुत सीधा है. उसकी भोली और अच्छी सूरत की वजह से कई लड़कियां उस पर फिदा है लेकिन राजा, ये सब बातें समझ नहीं पाता और अगर कोई लड़की साफ साफ अपने दिल की बात कह भी दे तो उसका चेहरा शरम से लाल हो जाता है.

4. प्यार- परियों की कहानी

राजा प्यार पर पूरा भरोसा करता है. वो बचपन से ही अपने ताऊ और ताई का एक-दूसरे के लिए प्यार और देखभाल देखता आया है. उसकी प्यार की दुनिया बिल्कुल फिल्मी है परियों की कहानी की तरह. राजा का प्यार जिंदगी की कड़वी सच्चाई से बिल्कुल दूर है.

5. भगवान का भक्त

राजा को भगवान पर पूरा भरोसा है वो हर रोज भगवान को धन्यवाद कहता है और जो भी उसे मिला है उसके लिए भगवान का शुक्रगुजार है.

तो कैसी होगी राजा-रानी की कहानी, जानने के लिए देखिए ‘शुभारंभ’, हर सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे सिर्फ कलर्स पर.

दोमुखी निर्णय

देश को पौराणिक युग में पहुंचाने और पौराणिक परंपराओं के अनुसार चलाने की जिद लिए एक बहुत बड़े वर्ग की इच्छाओं व अंधआस्थाओं का आदर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में अयोध्या की बाबरी मसजिद को नष्ट करने को गैरकानूनी कहने के बावजूद वह जगह उस को नष्ट करने वालों को मंदिर बनाने के लिए दिए जाने का दोमुखी निर्णय सुनाया है. अयोध्या प्रकरण का तो अंत हो गया पर देश की मानसिक बीमारी के कीटाणुओं की बढ़ोतरी का एक नया चैप्टर शुरू हो गया है.

सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या के मामले में निर्णय से साफ है कि एक भीड़ को हक है कि अपनी अंधआस्था को पूरा करने के लिए वह किसी भी कानून, किसी की संपत्ति, किसी दूसरे की अंधआस्था को कुचल दे और यदि सरकार उस का साथ दे, तो उसे सभी संस्थाएं सहयोग देंगी जैसे आपातकाल में 1975 से 1977 के दौरान हुआ था.

बाबरी मसजिद अयोध्या में मुसलमानों की कभी निजामुद्दीन या अजमेर शरीफ की तरह की आस्था नहीं थी. यह किसी भी तरह हिंदुओं पर विजय का प्रतीक नहीं रही थी. फिर भी उसे बलि का बकरा बना कर हिंदू कट्टरवादियों ने पिछले 100-150 सालों से एक हिंदू अस्मिता का निशान बना लिया था मानो भारत का अस्तित्व उसी बाबरी मसजिद में कैद है. 1992 में उसे तोड़ कर देश को जैसे मुक्त कराया गया था और 9 नवंबर, 2019 में उस पर अदालती मुहर लगी है.

ये भी पढ़ें- आर्थिक कदम

यह मामला राजनीति से ओतप्रोत रहा है क्योंकि इस मंदिर की मांग हिंदू साधुसाध्वियां या भक्त नहीं, बल्कि राजनीति में सक्रिय भारतीय जनता पार्टी करती रही है जो अपने को हिंदूवादी पार्टी कहती रही है. वह पौराणिक परंपराओं को ही सर्वाेपरि मानती है.

इस विवाद को अदालतों को सौंप कर एक आसान तरीका अपनाया गया था और जब यह निर्णय आया तो पहले से ही यह स्पष्ट था कि कौन सा पक्ष भारी रहेगा. सरकार ने कोर्ट के इस निर्णय के सुनाए जाने से पहले अदालतों से न उल झने का निर्णय ले लिया था ताकि अदालतों की निष्पक्षता की छवि बनी रहे.

सुप्रीम कोर्ट ने 1,000 से ज्यादा पृष्ठों के एकमत के निर्णय में आखिरकार आस्था, जिसे अंधआस्था कहना गलत न होगा, को ही न्यायिक धरातल माना और उसी आधार पर अपना निर्णय सुनाया कि हिंदुओं की मांग कि राम का जन्मस्थान अयोध्या में वहीं ही है जहां मसजिद के 3 गुंबद बने हुए थे, सही है. हालांकि अदालत यह नहीं बता पाई कि क्या वास्तव में ऐसे सुबूत थे कि किसी मंदिर को तोड़ कर मसजिद बनाई गई, लेकिन फिर भी उस ने सरकार द्वारा मनमाने लोगों को शामिल कर गठित किए जाने वाले ट्रस्ट को मसजिद की भूमि सौंपने का फैसला सुना दिया. यानी, सुबूतों को दरकिनार कर आस्था को विजयी बनादिया.

ये भी पढ़ें- भाजपा को सबक

पर क्या यह जीत उस कलंक को धो पाएगी कि इस देश पर बाहर से आए अहिंदू राजाओं और आक्रांताओं ने मुट्ठीभर सैनिकों के बल पर सदियों राज किया है. क्या सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद हम भूल पाए हैं कि, किंवदंतियों के अनुसार, भारत पर 17 बार हमला करने वाले अफगानी शासक महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को तोड़ा था, लूटा था? क्या लालकिले की प्राचीर पर हर 15 अगस्त को भाषण दे कर प्रधानमंत्री यह भुला पाते हैं कि इसी लालकिले से फरगना वादी से आए मुगलों ने राज किया था?

कोर्ट के फैसले से हिंदू कट्टरवाद की जीत हुई है पर हिंदू की नहीं. यहां हिंदू का अर्थ दक्षिण एशिया का वह इलाका है जो सांस्कृतिक तौर पर एक रहा है यूरोप की तरह, जिस में अलग जातियों, वर्णों, रंगों, भाषाओं, धर्मों के लोग रहते आए हैं. भारत की कल्पना से उन्हें सुरक्षा का एहसास होता था.

एक ऐसा क्षेत्र जहां सभी बिना रोकटोक आजा सकते थे, जहां चाहे बस सकते थे और कहीं भी अपनी मरजी से रह सकते थे. उस क्षेत्र पर एक बार नहीं, कई बार उन लोगों ने आक्रमण किया जो सिर्फ लूटने की इच्छा से आए थे, जो इस क्षेत्र का कल्याण नहीं चाहते थे, इस में रचबस जाने की इच्छा नहीं रखते थे. जिस की जड़ें टूट गईं. वे यहीं के बन कर रह गए और अब उस सोच और उस प्रवाह के साक्षी हो गए हैं जैसे कि एक विशाल समुद्र में छोटीबड़ी नदियां आ कर अपना वजूद खो बैठती हैं.

अब उस समुद्र को एक छोटी  झील में संकुलित कर दिया गया है, इस के चारों ओर की दीवारें ऊंची कर दी गई हैं, उस में आ कर बहने वाली साफ पानी की नदियों को दूसरी ओर मोड़ कर मायेम  झील को सूखने को मजबूर कर दिया गया है. हालांकि, यह  झील अभी भी विशाल है, लोगों को अचंभित करने वाली है पर है जोहड़ के समान, जिस में वर्षा का साफ पानी गंदे नालों के पानी के साथ मिल कर दूषित होता जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय ने इसी पर न्यायिक हस्ताक्षर किए हैं, विशाल  झील की दीवारों को और ऊंचा करने की इच्छा को अनुमति दी है.

ये भी पढ़ें- सरकार का रुख

वहां जल्दी ही भव्य मंदिर बन जाएगा, वैसे ही जैसे देश के अनेक क्षेत्रों में बने हुए हैं. आजकल हर गलीमहल्ले में बनने वाले मंदिर भव्य, संगमरमर से चमचमाते ही बन रहे हैं. नया मंदिर तीर्थयात्राओं का एक नया केंद्र बन जाएगा. उस जगह उद्योग नहीं लगेंगे, नौकरियां नहीं उगेंगी. वहां तो अगले जनम का हिसाब होगा, मन्नते मांगी जाएंगी, पंडों का व्यापार चमकेगा. यह कुछ भारत के भविष्य की छवि होगी. वहां नारे होंगे, जयजयकार होगी. धन और वोटों की वर्षा होगी.

औथैंटिक तरीका अपनाते अली फजल

बौलीवुड में अली फजल ऐसे कलाकार हैं जो अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा भी कर रहे हैं. उन का मानना है कि हर किरदार के लिए पहले से तैयारी करना जरूरी नहीं होता. उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय फिल्म ‘विक्टोरिया ऐंड अब्दुल’ के लिए काफी तैयारी की थी. इसी तरह उन्होंने वैब सीरीज ‘मिर्जापुर’ के लिए गहन तैयारी की थी. लेकिन अब उन्होंने शशांक घोष निर्देशित नैटफ्लिक्स की नई फिल्म ‘हाउस अरैस्ट’ के लिए कोई तैयारी नहीं की.

वे कहते हैं, ‘‘मुझे लगता है कि हर किरदार के लिए पहले से तैयारी करने पर कई बार किरदार औथैंटिक नहीं बन पाता है. मैं ने ‘विक्टोरिया ऐंड अब्दुल’ के लिए तैयारी की थी. इस में ऐतिहासिक तथ्यों के अलावा काल विशेष को ध्यान में रखना था. इसी तरह ‘मिर्जापुर’ के लिए तैयारी की. अपनी बौडी वैसी ही बनानी पड़ी थी. मगर ‘हाउस अरैस्ट’ के लिए कुछ नहीं किया. मैं तो एक अंधे इंसान की तरह सैट पर गया और निर्देशक के विजन के अनुसार काम किया.

ये भी पढ़ें- अब उपासना सिंह के भांजे नील आर्यन ने रखा बौलीवुड में कदम

‘हाउस अरैस्ट’ की कहानी ऐसे इंसान की है जिसे घर से बाहर कदम रखने में डर लगता है. शशांक घोष के काम करने का तरीका अलग है. वे चाहते हैं कि सैट पर कलाकार तुरंत अपने विवेक का इस्तेमाल कर किरदार को औथैंटिक तरीके से निभाए. शशांक का मानना रहा है कि जब कलाकार पहले से गहन तैयारी कर के आता है तो किरदार के लिए आवश्यक स्पौंटेनिटी के साथ सम झौता होता है.’’

ये भी पढ़ें- पहली युद्ध विरोधी फिल्म “बंकर” में रेखा भारद्वाज का ये शानदार गीत “लौट के घर जाना”

अब उपासना सिंह के भांजे नील आर्यन ने रखा बौलीवुड में कदम

एक तरफ कुछ लोग नेपोटिजम का हल्ला मचा रहे हैं, तो वहीं बौलीवुड से जुड़े परिवारों की संताने या उनके रिश्तेदार लगातार बौलीवुड में दस्तक दे रहे हैं और अपनी प्रतिभा को साबित कर रहे हैं. बहरहाल, मशहूर फिल्म व टीवी कलाकार उपासना सिंह के भांजे  नील आर्यन ने भी बतौर अभिनेता बौलीवुड में कदम रख दिया है. नील आर्यन बहुत जल्द ‘प्राइम फ्लिक्स‘  की अमर वत्स निर्देशित वेब सीरीज ‘जहर‘  में नजर आएंगे.

नील आर्यन पहली बार अभिनय कर रहे हों, ऐसा भी नही है. वह इससे पहले ‘आखरी सेल्फी‘  व ‘लव@497‘ जैसी दो लघु फिल्में और दिल्ली में मौडलिंग कर चुके हैं. अब अपनी मामी (उपासना सिंह) की सलाह पर वह मुंबई आकर बौलीवुड में किस्मत आजमा रहे हैं.

Amar-Singh-&-Neil-Aryan-Mr-India-celebration-at-Delhi

ये भी पढ़ें- पहली युद्ध विरोधी फिल्म “बंकर” में रेखा भारद्वाज का ये शानदार गीत “लौट के घर जाना”

बहुमुखी प्रतिभा के धनी नील आर्यन ने गुड़गांव के ‘जी डी गोएंका कौलेज’ से प्रोडक्ट डिजाइनिंग में डिग्री प्राप्त करने के बाद स्कौलरशिप के जरिए मिलान (इटली) के पौलिटेकनिको डी मिलानो से आटोमोबाइल में स्पेशलाइजेशन किया. उसके बाद इटली के मिलान शहर में ‘अल्फा रेमिको’ में काम किया. फिर ‘रेड वैलेंटिनो‘ में काम किया. उसके दिल्ली में मौडलिंग की. दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली ‘डेलीवूड मिस्टर इंडिया‘ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. बिहार का प्रतिनिधित्व करते हुए ‘मिस्टर बिहार‘  का टाइटल जीता और ग्रांडफिनाले में ‘मिस्टर इंडिया‘ का टाइटल जीतकर पूरे देशभर में छा गए.

वेब सीरीज में अभिनय करने के संदर्भ में नील आर्यन कहते है,‘‘ मुझे ‘प्राइम फ्लिक्स‘ की वेब सीरीज ‘जहर‘  में काम करने का अवसर मिला है, जिसकी शूटिंग दिसंबर माह के अंतिम सप्ताह में शुरू होगी. मैं  अच्छा और ढंग का काम करना चाहता हूं, फिर चाहे फिल्म हो, धारावाहिक हो या वेब सीरीज हो. आज भी मुझे बहुत बड़े बड़े कार्यक्रमो में बुलाया जाता है. लेकिन मैं संख्या से ज्यादा गुणवत्ता में विश्वास करता हूं. मेरी मामी (उपासना सिंह) की भी सलाह है कि मुझे जल्दबाजी करने की बजाय सोच समझकर काम करना चाहिए. मेरी मामी कहती हैं कि मुझे अपनी काबीलियत का गलत जगह उपयोग नही करना है. तो मुझे कहीं भी पहुंचने की जल्दी नहीं है. एक फीचर फिल्म भी अनुबंधित की है, लेकिन इस पर अभी बात करना ठीक नही होगा.’’

Neil-Aryan

ये भी पढ़ें- ‘पति पत्नी और वह’ : कलाकारों का शानदार अभिनय

बतौर अभिनेता कैरियर की शुरूआत हो जाने के बावजूद नील आर्यन इन दिनों मुंबई के नरसी मोंजी कॉलेज से मार्केटिंग में एम बी ए की पढ़ाई कर रहे हैं. अभी भी पढ़ाई करने के सवाल पर नील आर्यन ने कहा- ‘‘हम  जीवन में जो कुछ भी सीखते है, वह हमेशा हमारे काम आता है. शिक्षा कभी भी बेकार नहीं जाती है. उच्च शिक्षा हासिल करने से हमारी सोच और हमारे काम करने का दायरा बढ़ता है. इंसान जीवनभर भी सीखे तो भी सबकुछ नहीं सीख सकता है. इंसान को कभी भी खाली नहीं बैठना चाहिए, कुछ ना कुछ करते रहना चाहिए. इसी सोच के साथ मैं पढ़ाई कर रहा हूं.’’

#bethebetterguy: शराब पीकर गाड़ी चलाना हो सकता है खतरनाक

ये समस्या आज पूरे देश में फैली हुई है और सबसे ज्यादा ये समस्या युवाओं-किशोरों के साथ हैं. उन्हें कितना भी समझा लो लेकिन उनके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता है. आजकल के युवा फैशन में पीने में तो आगे हैं और अपना जलवा दिखाने के चक्कर में नशे में गाड़ी चला कर खुद अपनी मौत को न्योता देते हैं.

सरकार इसके खिलाफ कितनी मुहिम चला रही है. लोगों को जागरूक करने के लिए सरकार प्रयास कर रही है लेकिन कोई भी सुनने को तैयार नहीं होता है और यातायात नियमों की भी धज्जियां उड़ा रहें हैं लोग. सराकर के आंकड़े के मुताबिक हर रोज 400-500 लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं इनमें एक सबसे बड़ा कारण है शराब पीकर गाड़ी चलाना और तो और लोग नशा करके सोचते हैं उन्हें सब समझ में आ रहा है लेकिन ऐसे में वो अपने साथ-साथ दूसरों की जान को भी खतरे में डालते हैं.

ये भी पढ़ें- सुबह इंसाफ का जश्न मनाया, शाम होते होते उन्नाव की बेटी दुनिया को अलविदा

खुद तो होश में होते नहीं हैं और दूसरों की जान को भी दाव पर लगा देते है. 2018 में एक खबर आई थी रात के समय कुछ लड़के नशे में थे और गाड़ी चलाते वक्त नियंत्रण बिगड़ गया जिसके कारण उन्होंने गाड़ी सड़क के किनारे सो रहे लोगों पर चढ़ा दी. उन्होंने खुद की जान को तो जोखिम में डाला ही साथ ही उन गरीबों की जान से भी खिलवाड़ कर गए.

अक्सर ऐसा बड़े-बड़े शहरों में सबसे ज्यादा होता है. दिल्ली में एक नियम के मुताबिक यदि आप पहली बार ही नशे में गाड़ी चलाते पाते गए तो आपका ड्राइविंग लाइसेंस भी कैंसिल हो सकता है. तो भला सब कुछ जानकर भी अगर आप नहीं सुधरेंगे और नशे में गाड़ी चलाएंगे तो अपनी जान को ही खतरे में डालेंगे इसलिए सावधान हो जाइए और आगे से कभी भी शराब पीकर नशा करके गाड़ी ना चलाये, क्योंकि आपके पीछे कोई और भी होता है जिसके लिए आपका जीवन अनमोल होता है उनके बारे में सोचिए.

ये भी पढ़ें- जब घर में ही औफिस बनाना हो

Hyundai रखता है आपकी सभी जरूरतों का ख्याल और करता है आपकी सुरक्षित यात्रा के लिए हर प्रयास. आप भी करें हर ट्रैफिक नियम का पालन और रखें अपना और अपने चाहने वालों का ध्यान.

सुबह इंसाफ का जश्न मनाया, शाम होते होते उन्नाव की बेटी दुनिया को अलविदा कह गई

शुक्रवार सुबह जैसे ही लोगों ने अपने टेलीवीजन और मोबाइल पर नजर दौड़ाई खुशी की लहर दौड़ गई. खुशी का कारण था कानून का एनकाउंटर. एक ऐसा एनकाउंटर जिससे भले ही जनता को राहत मिली हो लेकिन उसने कानून की धज्जियां उड़ा दी. भारत के संविधान में शायद यही खूबसूरती है कि यहां आरोपी को भी अपनी बात कहने का पूरा हक है. इस बात से कोई भी तार्रुफ नहीं रखेगा कि दुष्कर्म किसी भी मायने भी संगीन जुर्म नहीं है.  इस जुर्म की सजा ही मौत है. लेकिन कानूनन. शाम होते होते एक और खबर आ गई कि उन्नाव गैंगरेप पीड़िता की सफदरगंज अस्पताल में मौत हो गई. दो दिन तक मौत से लड़ने वाली उन्नाव की बेटी मौत से जंग हार गई.

उन्नाव दुष्कर्म पीड़िता ने 43 घंटे जीवन से संघर्ष किया, मगर वह हार गई. गांव और उसके आस-पास के लोगों में घटना को लेकर गम, गुस्सा और कुछ अनसुलझे सवाल भी हैं. लड़की के घर में पहले से ही मातम पसरा हुआ था, मौत के बाद पूरा गांव गमगीन है. गांव में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात है. मामले के तूल पकड़ते ही बड़ी संख्या में राजनीतिक पार्टियों के लोगों का आना जाना लगा हुआ है. कुल मिलाकर सब यह दिखाने को तैयार हैं कि हम परिवार के साथ सबसे पहले खड़े हैं.

आक्रोश के चलते शुक्रवार को पुलिस ने अरोपियों को छिपाकर पीएचसी से मेडिकल करवाया. फिर कोर्ट में पेश किया। अब सभी आरोपी 14 दिन की न्यायिक हिरासत में हैं. मामले में गांव की प्रधान के पति और बेटे को भी आरोपी बनाया गया है. गांव वालों के अनुसार, दोनों परिवारों में दो साल पहले तक बहुत मधुर संबंध थे. पीड़ित परिवार का संबंध गांव के प्रधान से भी अच्छा था.

ये भी पढ़ें- कौमार्य पर धर्म का पहरा

खुद पीड़ित लड़की के पिता इस बात को बताते हैं कि प्रधान परिवार उनकी काफी मदद करता था और सरकारी योजनाओं का लाभ भी आसानी से मिल जाता था। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबंध खराब हो गए. 18 जनवरी 2018 को रायबरेली कोर्ट में पीड़िता और आरोपित शिवम त्रिवेदी ने शादी के अनुबंध पर हस्ताक्षर किया था.

अनुबंध में लिखा गया था कि शादी के बाद वह लड़की का पूरा ख्याल रखेगा. उसे हर्जा, खर्चा देगा. उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी शिवम की है. अनुबंध के कुछ दिन बाद ही सारी कसमें टूट गई. पीड़िता को अकेला छोड़कर शिवम चला गया. उसके बाद, पीड़िता ने अपना हक मांगा तो उसने धमकी दी गई. गांव में पंचायत हुई तो शिवम के घरवालों ने पीड़िता पर दबाव बनाया कि रुपये ले लो और शिवम को छोड़ दो.

लड़की की भाभी बताती हैं, “दोनों ने कब शादी की थी, इसकी जानकारी उन्हें नहीं थी. हम लोगों को शादी के बारे में तब पता चला, जब लड़के ने यहां पर लड़ाई-झगड़ा किया था. तब लड़की ने बताया कि उसने कोर्ट में शिवम से शादी की है, लेकिन अब वह उसे मानने से इनकार कर रहा है.”

उधर आरोपी शिवम की मां ने कहा, “न मेरे बेटे ने शादी की, न ही इस घटना में शामिल था, उसे तो सिर्फ फंसाया जा रहा है.” इस मामले में गांव की प्रधान शांति देवी ने कहा, “मेरे पति और बेटे को राजनीति के कारण फंसाया जा रहा है. वह निर्दोष हैं. इस मामले की चाहे जो एजेंसी जांच कर ले.”

ये भी पढ़ें- गैंगरेप आखिर कब तक ?

गांव के एक बुजुर्ग ने कहा कि यहां कई दशक में ऐसी घटना नहीं हुई. उन्होंने कहा कि आज के युवाओं को पता नहीं क्या हो गया है. थोड़ी सी बात पर मरने-मारने को तैयार हो जाते हैं. मामला शांति से सुलझाया जा सकता था. आईजी कानून व्यवस्था प्रवीण कुमार ने बताया, “पीड़िता के बयान के आधार पर सभी पांच अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया है. सारे साक्ष्य एकत्र कर लिए गए हैं। हमें जल्द से जल्द वास्तविक दोषियों का पता लगाना है.”

परांठे के साथ परोसे गर्मागर्म आलू गोभी कोफ्ते

अगर आप भी आलू गोभी की सब्जी से बोर हो चुके हैं तो आलू गोभी के टेस्टी कोफ्ते जरूर ट्राई करें. ये बनाने में भी बहुत आसान है और खाने में काफी टेस्टी. तो देर किस बात की आज ही ट्राई करें ये टेस्टी कोफ्ते.

सामग्री

फूलगोभी (150 ग्राम)

आलू  (100 ग्राम)

बेसन (6 बड़े चम्मच)

हरा धनिया (3 से 4 बड़े चम्मच)

टमाटर (300 ग्राम)

जीरा पाउडर (1/2 छोटी चम्मच)

धनिया पाउडर (1.5 छोटा चम्मच)

हल्दी पाउडर (1/2 छोटा चम्मच)

लाल मिर्च पाउडर (1 छोटा चम्मच)

गरम मसाला (1/2 छोटा चम्मच)

मेथी  (1 बड़ी चम्मच)

नमक स्वादानुसार

तेल ( आवश्यकतानुसार)

अदरक 1 इंच

हरी मिर्च  3

ये भी पढ़ें- ऐसे बनाएं अचारी परवल की सब्जी

बनाने की विधि

सबसे पहले गोभी ले कर उसे ग्रेट कर लें.

अब 2 बड़े उबले आलू ले कर उन्हें भी छील कर ग्रेट कर लें.

अब इसमें 4 बड़ी चम्मच बेसन, ½ छोटी चम्मच नमक, ¼ छोटी चम्मच लाल मिर्च पाउडर, ½ छोटी चम्मच धनिया पाउडर,1 बारीक कटी हरी मिर्च,  ½ इंच ग्रेट किया हुआ अदरक और थोड़ा सा बारीक कटा हरा धनिया डाल कर सभी चीजों को मिलाते हुए डो तैयार कर लें.

डो तैयार हो जाने पर हाथ पर हल्का सा तेल लगा लें.

अब थोड़ा सा डो हाथ में ले कर उसे गोल कर के छोटी-छोटी गेंद बना कर एक प्लेट में रख लें.

अब एक कढ़ाई में तेल डाल कर गर्म करने रख दीजिए.

उसमें कोफ्ते के एक तरफ से गोल्डन ब्राउन हो जाने पर उन्हे पलट कर दूसरी ओर से भी गोल्डन ब्राउन होने तक तल लें.

सभी कोफ्ते को चारों ओर से गोल्डन ब्राउन होने तक तलना है.

एक बार के कोफ्ते तलने में 4 से 5 मिनट का समय लग जाता है.

ग्रेवी बनाने के लिए एक पैन में 2 बड़ी चम्मच तेल डाल कर गर्म कर लें.

तेल के गर्म हो जाने पर इसमें ½ छोटी चम्मच जीरा, ½ छोटी चम्मच हल्दी पाउडर, 1 छोटी चम्मच धनिया पाउडर , 4 टमाटर-1 इंच अदरक-2 हरी मिर्च का पेस्ट, ¾ छोटी चम्मच लाल मिर्च पाउडर और 1 बड़ी चम्मच कसूरी मेथी डाल कर चलाते हुए तक तक भून लीजिए जब तक की मसाला अपना तेल ना छोड़ दें.

मसाले का हल्का सा भुन जाने पर इसमें 2 बड़ी चम्मच बेसन डाल कर चलाते हुए भून लें. मसाले के तेल छोड़ देने पर इसमें 2 कप पानी, 1 छोटी चम्मच नमक, ½ छोटी चम्मच गरम मसाला और थोड़ा सा बारीक कटा हरा धनिया डाल कर सभी चीजों को मिला कर ग्रेवी में उबाल आने दीजिए.

ये भी पढ़ें- घर पर बनाएं सोया चिली

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें