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मुमकिन नहीं इन्हें रोक पाना

खेल का मैदान हो या बुलंदियों का मुकाम महिलाएं कहीं पीछे नहीं हैं. जितने समर्पण के साथ वे घर संभालती हैं उतने ही जनून से अपने देश के लिए खेलती भी हैं. क्रिकेट, बैडमिंटन, टेनिस, वौलीबौल से ले कर शूटिंग या फिर कुश्ती हर खेल में लड़कियां अपना जौहर दिखा रही हैं और देश का नाम रोशन कर रही हैं. कठिन से कठिन स्थितियों और संघर्षों के दौर में भी अपने जनून और जज्बे के बल पर उन्होंने कामयाबी की वह मंजिल पाई है जहां पहुंचना हर दिल का सपना होता है. आइए, ऐसी ही कुछ सफल बालाओं के संघर्ष भरे सफर पर एक नजर डालते हैं:

भरतनाट्यम छोड़ थामा बल्ला

मिताली राज भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हैं. भारतीय महिला क्रिकेट की तेंदुलकर के उपनाम से जानी जाने वाली मिताली के नाम भारत की ओर से सब से ज्यादा रन बनाने का रिकौर्ड है. वे सब से ज्यादा रन बनाने के मामले में पूरी दुनिया में दूसरे नंबर पर हैं. इस के साथ ही उन्होंने वनडे मैचों में लगातार 7 अर्ध शतक लगाने का भी वर्ल्ड रिकौर्ड बनाया है.

34 साल की मिताली 5 वर्ल्ड कप खेल चुकी हैं. 2005 के विश्व कप में मिताली ने पहली बार टीम की कप्तानी की थी और भारत उपविजेता रहा था. 3 दिसंबर, 1982 को जन्मी मिताली राज ने यहां तक पहुंचने में कई उतारचढ़ाव देखे हैं.

मिताली राज ने बचपन में ही ‘भरतनाट्यम’ सीखा और कई स्टेज शो भी किए. 10 साल की उम्र में भरतनाट्यम और क्रिकेट में से किसी एक को चुनने की बारी आई तो उन्होंने क्रिकेट ही चुना. वे हमेशा लीक से हट कर कुछ करने में यकीन रखती हैं. शुरुआती दिनों में जब अपनी साथी खिलाड़ी के साथ किट ले कर खेलने जाती थीं तो लोग यही समझते थे कि हौकी प्लेयर हैं. उस वक्त लोग सोच ही नहीं पाते थे कि लड़कियों की भी क्रिकेट टीम होगी.

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मिताली की मां लीला राज एक अधिकारी थीं और पिता डोराई राज बैंक में नौकरी करने से पहले एयर फोर्स में कार्यरत थे. मिताली के पिता ने उन के यात्रा खर्च को उठाने के लिए अपने खर्चों में कटौती की. इसी तरह उन की मां लीला राज ने भी बेटी के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी ताकि जब बेटी प्रैक्टिस से घर लौटे तो वे अपनी बेटी का खयाल रख सकें.

2009 में मिताली ने सोचा था कि वे क्रिकेट से संन्यास ले लेंगी, लेकिन तब उन के मांबाप का संघर्ष उन के सामने आ गया. उन के संघर्ष से प्रेरणा लेते हुए मिताली ने खेलना जारी रखा. आज मिताली का नाम भारत की सब से ज्यादा कमाई करने वाली खिलाडि़यों में शुमार है. साधारण परिवार में जन्मी मिताली ने क्रिकेट में मेहनत और प्रतिभा से जो मुकाम हासिल किया है, वह अन्य महिला खिलाडि़यों के प्रेरणादाई है.

मिताली मैदान के बाहर भी अपने ग्लैमरस लुक, सादगी और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए जानी जाती हैं. उन्हें अपने खेल में बेहतर प्रदर्शन के लिए पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है.

कट्टरपंथियों के निशाने पर रहीं सानिया

भारत की सब से सफल महिला टेनिस खिलाडि़यों में से एक सानिया मिर्जा से शायद ही देश का कोई व्यक्ति अपरिचित होगा. वे प्रोफैशनल टेनिस प्लेयर हैं और ग्रैंड स्लैम टूरनामैंट जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं.

सानिया भारत की सर्वोच्च रैंक हासिल करने वाली खिलाड़ी हैं, जो 2007 के बीच वर्ल्ड रैंकिंग में 27वें नंबर पर पहुंच गई थीं. सानिया 3 मल्टी मेजर इवेंट्स, एशियन गेम्स, कौमनवैल्थ गेम्स और एफ्रोएशियन गेम्स में कुल मिला कर 14 से ज्यादा मैडल जीत चुकी हैं, जिन में 6 गोल्ड मैडल हैं. 2004 में टाइम ने सानिया को 50 हीरोज की लिस्ट में शामिल किया था. 2010 में इकोनौमिक टाइम्स ने सानिया को ‘33 वूमन हू प्राउड नेशन’ की लिस्ट में शामिल किया था.

सानिया को पद्श्री से नवाजा जा चुका है और वे द टाइम्स पत्रिका की 2016 की सूची में दुनिया के 100 सब से प्र्रभावशाली लोगों में भी अपनी जगह बना चुकी है.

सानिया की चर्चा जितनी उन के खेल के लिए होती है उतनी ही उन की खूबसूरती के लिए भी होती है. उन्हें भारतीय खेल जगत की ग्लैमरस डौल भी कहा जा सकता है. वे कई बार धर्मगुरुओं के निशाने पर भी रहीं. अपने खेल के दौरान आए दिन सानिया को कपड़ों को ले कर रूढि़वादियों की बातें सुननी पड़ीं. कितनी ही बार उन के कपड़ों को गैरइस्लामिक कहा गया. कितनी ही बार उन के कपड़ों पर कमैंट किए गए.

सब से पहले 2005 में जब सानिया उभरती खिलाड़ी थीं, एक इसलामी संगठन ने उन की स्कर्ट पर ऐतराज जताया. संगठन ने फतवा जारी किया कि अगर सानिया ढंग के कपड़े पहन कर नहीं खेलीं तो उन्हें टेनिस नहीं खेलने दिया जाएगा. संगठन का कहना था कि सानिया छोटी स्कर्ट और टाइट टौप पहन कर युवाओं को भ्रष्ट कर रही हैं. इसे सपोर्ट करने वाली एक जमात ने यहां तक धमकी दे दी कि अगर सानिया ने फतवे के आदेश पर ध्यान नहीं दिया तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा.

इस के बाद सानिया ने एक प्रैस कौन्फ्रैंस बुला कर अपनी बात रखी थी. उन के शब्दों में, ‘‘महिलाओं का अच्छी तरह ड्रैसअप होना लोगों को कभी पसंद नहीं आता. अच्छी तरह ड्रैसअप करने वाली महिलाएं कभी इतिहास नहीं बनातीं.’’

2010 में सानिया ने पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी कर ली. इसे ले कर भी चरमपंथियों ने काफी बयानबाजी की. अब वे एक बच्चे की मां भी बन चुकी हैं.

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शारापोवा का जनूनी खेल

रूस की स्टार टेनिस खिलाड़ी मारिया शारापोवा ने 35 से ज्यादा डब्लूटीए टाइटल्स जीते हैं जिन में चारों ग्रैंड स्लैम भी शामिल हैं. इस टेनिस सुंदरी का बचपन काफी गरीबी में बीता. उन के पिता की नौकरी छूट जाने के बाद घर में खाने के भी पैसे नहीं थे. पिता ने कई छोटीमोटी नौकरियां कीं. 6 साल की उम्र में मारिया को टेनिस अकादमी जौइन कराने के लिए उन के पिता के पास पूरे रुपए नहीं थे. वैसे भी रूस में टेनिस की ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं. ऐसे में 1993 में शारापोवा का पूरा परिवार बेहतर भविष्य की तलाश में रूस छोड़ कर अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत में चला गया.

मारिया के पिता ने शारापोवा के एडमिशन के लिए फ्लोरिडा की प्रसिद्ध निक बोलेटिएरी ऐकैडमी का दरवाजा खटखटाया, मगर प्रशिक्षकों ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि मारिया खेलती तो अच्छा है, लेकिन इस का एडमिशन नहीं हो सकता, क्योंकि यह उम्र में छोटी है. यूरी ने हौसला नहीं छोड़ा और 2 साल मजदूरी करते हुए मारिया को पब्लिक कोर्ट पर प्रशिक्षण दिलाया. जल्द ही मारिया को बोलेटिएरी ऐकैडमी में प्रवेश मिल गया और स्कौलरशिप भी मिलने लगी. 2001 में शारापोवा ने प्रोफैशनली खेलना शुरू किया. 15 साल की उम्र में औस्ट्रेलिया ओपन जूनियर टूरनामैंट के फाइनल में पहुंचने वाली शारापोवा सब से कम उम्र की खिलाड़ी बनीं.

17 साल की उम्र में 2004 का विंबलडन खिताब जीतते हुए टेनिस जगत में छा जाने वाली शारापोवा ने 2006 में यूएस ओपन जीता और दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बन गईं. बाद में उन की रैंकिंग लुढ़की, लेकिन फिर टेनिस जगत में उन की मौजूदगी हमेशा महसूस की जाती रही.

मारिया शारापोवा का कैरियर अधिकतर उन के चोटग्रस्त होने से जूझता रहा. इस के बावजूद हर साल 2003 से 2015 तक कम से कम एक सिंगल्स टाइटल जीतने का रिकौर्ड बनाया.

खेल के साथ ही ग्लैमरस पर्सनैलिटी के कारण भी शारापोवा सुर्खियों में रहती हैं. वे मौडलिंग भी करती हैं. उन्हें सिंगिंग, डांसिंग, स्विमिंग और फिल्में देखने का शौक है. किताबें भी पढ़ती हैं. शरलौक होम्स की किताबें उन की पसंदीदा हैं. उन का फाउंडेशन बच्चों के लिए काम करता है. वे अन्य टेनिस खिलाडि़यों के साथ चैरिटी मैच भी आयोजित कर चुकी हैं.

मारिया शारापोवा कई प्रमुख कंपनियों के लिए भी काम कर चुकी हैं जैसे कैनन, कोलगेट, लैंड रोवर, नाइक, पिं्रस, सोनी, टैग ह्यूएर और ट्रौपिकाना आदि. उन का पेप्सी का विज्ञापन जापान में प्रसारित होता है. टेनिस और विज्ञापन जगत में राज करने के साथ ही शारापोवा सर्च इंजन पर भी लोकप्रिय हैं.

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बोल्ड अंदाज वाली सेरेना के जलवे

23 बार की ग्रैंड स्लैम चैंपियन अमेरिका की सेरेना विलियम्स भले ही कोर्ट से दूर हों लेकिन सुर्खियों से कभी दूर नहीं रहतीं. खिलाड़ी के तौर पर नई बुलंदियां छूना, कमाई के मामले में नए रिकौर्ड बनाना, नएनए फैशन के जलवे दिखाने के साथसाथ समयसमय पर औरतों के लिए आवाज उठाना जैसे कामों से वे लाइमलाइट में रहती हैं. खाली समय में बोल्ड अदाओं से प्रशंसकों का ध्यान खींचती रहती हैं. वे कभी ट्विटर पर अपनी बिकिनी पिक्स पोस्ट कर सनसनी फैलाती हैं तो कभी अपनी ड्रैसिंग सैंस को ले कर सुर्खियों में आ जाती हैं. हाल ही में एक मैगजीन के लिए अपने अनोखे और खूबसूरत फोटो सैशन से मातृत्व का एक अलग ही अंदाज पेश कर वे प्रैगनैंसी के दौरान भी सोशल नैटवर्किंग साइट पर छा गई थीं.

गर्भवती सेरेना ने अपने मंगेतर एलेक्सिस ओहानियन के पहले बच्चे को जन्म देने से पहले एक न्यूड फोटोशूट कराया, जिस में उन का उभरा पेट दिखाई दे रहा है और अपनी ब्रैस्ट को हाथों से ढका था जबकि कमर पर मात्र एक चेन पहनी हुई थी.

मां बनने के बाद भी सेरेना कामकाजी मांओं के लिए एक आदर्श बन कर उभरी हैं. उन का कहना है कि उन की बेटी ओलिंपिया ने उन की जिंदगी बदल दी है और मां बनना जीवन की सब से बड़ी उपलब्धि है. सितंबर, 2017 में बेटी को जन्म देने के कुछ ही महीनों बाद सेरेना विलियम्स ने प्रोफैशनल टेनिस में शानदार वापसी की. सेरेना ने अपनी 19 महीने की बेटी के साथ हाल ही में एक विज्ञापन शूट किया है.

पिता के जनून ने बनाया टेनिस प्लेयर

सेरेना जमैका विलियम्स का जन्म मिशिगन, अमेरिका में 1981 को हुआ. उन की बड़ी बहन वीनस भी टेनिस चैंपियन हैं. उन के पिता ने सेरेना के जन्म से पहले ही टीवी पर एक टेनिस मैच देखा था, जिस में इस गेम की प्लेयर को जीतने के बाद पुरस्कार में काफी धनराशि और सम्मान मिलता है. पिता ने उसी वक्त यह तय कर लिया कि वे अपनी बेटियों को ऐसा ही कुछ बनाएंगे. इस के बाद पिता ने खुद टेनिस सीख कर बेटियों को टे्रनिंग देनी शुरू की. सेरेना के जन्म के बाद पूरा परिवार लास एंजिल्स शिफ्ट हो गया ताकि टेनिस का सही माहौल मिल सके.

अपने पिता बनाम कोच के संरक्षण में सेरेना ने मात्र 4 साल की उम्र में जूनियर टूरनामैंट में हिस्सा लिया और फिर मुड़ कर नहीं देखा.

हरमनप्रीत कौर की तूफानी बल्लेबाजी

दाएं हाथ की तूफानी बल्लेबाज और भारतीय महिला टीम की उपकप्तान हरमनप्रीत कौर आज किसी पहचान की मुहताज नहीं हैं. एक बेहद साधारण परिवार में जन्मी हरमनप्रीत कौर दुनिया की सब से ज्यादा कमाई करने वाली महिला क्रिकेटरों में शामिल हैं. उन्होंने अपनी बल्लेबाजी क्षमता से खुद की अलग पहचान बनाई है. हालांकि उन का यहां तक का सफर आसान नहीं रहा है.

हरमनप्रीत का जन्म 8 मार्च, 1989 में पंजाब के एक बेहद छोटे गांव मोगा में हुआ. स्पोर्ट्स फैमिली में जन्मी हरमनप्रीत का शुरू से क्रिकेट में लगाव रहा. उन के पिता हरमिंदर सिंह वौलीबौल और बास्केटबाल खिलाड़ी थे.

पढ़ाई के दौरान ही हरमनप्रीत का क्रिकेट के प्रति झुकाव बढ़ता गया. वे स्कूल में पढ़ाई के दौरान अपने घर से 30 किलोमीटर दूर क्रिकेट की ट्रेनिंग के लिए जाती थीं. वर्ष 2009 में महज

20 वर्ष की उम्र में उन्हें पाकिस्तान महिला टीम के विरुद्ध वनडे क्रिकेट से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू करने का मौका मिला. इस मैच में हरमनप्रीत को बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला, मगर गेंदबाजी के दौरान 4 ओवरों में सिर्फ 10 दिन दे कर उन्होंने काफी प्रभावित किया.

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी तूफानी बल्लेबाजी से विरोधी टीमों के गेंदबाजों के छक्के छुड़ाने के बाद बिग बैश महिला के दूसरे सीजन में उन्हें सीडनी सिक्सर्स फ्रैंचाइजी ने अपनी टीम में शामिल किया. इस के साथ ही हरमनप्रीत महिला बिग बैश खेलने वाली पहली महिला बनीं.

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पूरा किया क्रिकेटर बनने का सपना

क्रिकेट के महिला वर्ल्ड कप के दौरान लौर्ड्स के मैदान में इंगलैंड के 228 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत की पूरी टीम 219 पर सिमट गई. मगर पूनम राउत का स्कोर सब से ज्यादा 86 रन रहा जो काफी प्रशंसनीय था. उन्होंने भारत को जीत की आस जगा दी थी.

पूनम के पिता मुंबई में एक प्राइवेट कंपनी में ड्राइवर की नौकरी कर चुके हैं. एक समय था जब मुंबई के प्रभादेवी में उन का परिवार एक चाल में रहता था. उस समय पूनम क्रिकेट खेलना चाहती थीं, लेकिन पैसों की कमी को देखते हुए उन्होंने कभी बड़े सपने नहीं देखे. हालांकि उन के पिता जो कभी क्रिकेटर बनना चाहते थे ने अपनी बेटी के लिए क्रिकेट के लिए जरूरी सामान खरीदा. पूनम का क्रिकेट अकादमी में दाखिला कराया.

टेलैंट के साथ ग्लैमर का तड़का

महिला खिलाड़ी सिर्फ खेल में अपने बेहतरीन प्रदर्शन से ही नहीं जानी जातीं, बल्कि ग्लैमर के जलवों के मामले में भी उन का कोई सानी नहीं. अपनी खूबसूरती और स्टाइल की वजह से भी वे सुर्खियों में रहती हैं. चाहे टेनिस स्टार हो, बैडमिंटन स्टार, उन की बात अलग ही दिखती है.

आइए, एक नजर डालते हैं खेल की दुनिया की कुछ खूबसूरत महिला खिलाडि़यों पर जो अपनी खूबसूरती और ग्लैमर के लिए जानी जाती हैं:

साइना नेहवाल: दुनिया की शीर्ष बैडमिंटन खिलाडि़यों में शामिल साइना नेहवाल भारत की सब से सफल महिला खिलाडि़यों में से एक हैं. वे न केवल खेल, बल्कि फैशन की दुनिया में भी सक्रिय हैं. वे चैरिटी कार्यक्रमों में हिस्सा ले कर रैंप पर भी जलवा दिखा चुकी हैं. अपने बिंदास लुक और प्राकृतिक खूबसूरती से लोगों को दीवाना बनाती रही हैं. साइना देश के लिए कौमनवैल्थ गेम्स में गोल्ड मैडल भी जीत चुकी हैं. उन्हें भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है.

दीपिका पल्लीकल: दीपिका पल्लीकल भारतीय खेलों की दुनिया में उभरता बड़ा नाम है. वे दुनिया की शीर्ष 10 स्क्वैश खिलाडि़यों में भी शामिल रह चुकी हैं. उन्हें खेलों में उल्लेखनीय योगदान के लिए 2012 में अर्जुन अवार्ड और 2014 में पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया जा चुका है. खेल के अलावा ग्लैमर और खूबसूरती में भी दीपिका का कोई जवाब नहीं.

प्राची तहलान: नैटबौल की भारतीय खिलाड़ी प्राची तहलान भी गजब की खूबसूरत हैं. 2010 में दिल्ली कौमनवैल्थ गेम के समय भारतीय टीम की कमान संभालने वाली प्राची तहलान नैटबौल और बौस्केटबाल की प्रोफैशनल प्लेयर हैं. 25 साल की प्राची दिल्ली की जाट फैमिली से ताल्लुक रखती हैं. खेल के साथ ही उन की खूबसूरती और चुलबुलेपन को देख भी लोग उन के दीवाने हो जाते हैं. खूबसूरत प्राची को ‘क्वीन औफ द कोर्ट’ निक नेम भी मिला हुआ है.

ज्वाला गुट्टा: प्रोफैशनल बैडमिंटन प्लेयर ज्वाला गुट्टा ने देश के लिए बहुत मैडल जीते हैं. उन्होंने दिल्ली कौमनवैल्थ गेम्स में भारत के लिए

2 स्वर्ण और 1 रजत पदक जीता था. अपनी खूबसूरती से भी वे लोगों को आकर्षित करती हैं. उन के ग्लैमरस फोटोशूट को भला कौन भूल सकता है.

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ऐलिस पेरी: आस्ट्रेलिया टीम की सब से खूबसूरत और ग्लैमरस खिलाड़ी ऐलिस पेरी अपने खेल के साथसाथ अपनी सुंदरता के लिए भी चर्चा में रहती हैं. ऐलिस पेरी आस्ट्रेलिया की पहली ऐसी महिला खिलाड़ी हैं, जिन्होंने आस्ट्रेलिया के लिए क्रिकेट और फुटबौल दोनों के ही वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया. ऐलिस पेरी अकसर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपनी खूबसूरती के जलवे बिखेरती रहती हैं.

सारा जेन टेलर: इंगलैंड की विकेटकीपर व बल्लेबाज सारा टेलर अपने आक्रामक खेल के साथसाथ अपनी खूबसूरती के लिए भी मशहूर हैं. सारा की गिनती विश्व की सब से खूबसूरत महिला क्रिकेटरों में की जाती है. सारा इंगलैंड के लिए वनडे में सलामी बल्लेबाज का किरदार निभाती हैं. 2013 में उन्हें महिला टी20 के ‘क्रिकेटर औफ द ईयर’ अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था.

हौली फर्लिंग: आस्ट्रेलिया की सब से खूबसूरत महिला क्रिकेटरों में हौली फर्लिंग का भी नाम शामिल है. उन्होंने क्रिकेट में अपने कैरियर की शुरुआत 2003 में पाकिस्तान के खिलाफ वनडे मैच खेल कर की थी. इस मैच में उन्होंने

9 विकेट हासिल कर सब को हैरान कर दिया था. अपने खेल के साथसाथ उन्होंने अपनी सुंदरता से भी लोगों को अपना दीवाना बनाया हुआ है.

महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा और अधिकार न देने वाले रूढि़वादी समाज को आईना दिखाती है इन महिलाओं की सफलता. खेल के क्षेत्र में भी अव्वल साबित हो रही महिलाएं जल्द ही पुरुषों से आगे निकल जाएंगी इस में कोई संशय नहीं.

सब से हसीन वह : भाग 2

रिमझिम, जो उस का प्यार थी, इस की बरात के दिन ही उस ने आत्महत्या कर ली थी. लौटा, तो पता चला. फिर वह भाग खड़ा हुआ था.

लौटने के बाद भी अब परीक्षित या तो घर पर ही गुमसुम पड़ा रहता या फिर कहीं बाहर दिनभर भटकता रहता. फिर जब थकामांदा लौटता तो बगैर कुछ कहेसुने सो पड़ता.

ऐसे में ही उस ने उसे रिमझिम झोड़ कर उठाया और पहली बार अपनी जबान खोली थी. तब उस का स्वर अवसादभरा था, ‘‘मैं पराए घर से आई हूं. ब्याहता हूं आप की. आप ने मु झ से शादी की है, यह तो नहीं भूले होंगे आप?’’

वह निरीह नजरों से उसे देखता रहा था. बोला कुछ भी नहीं. अनुजा को उस की यह चुप्पी चुभ गई. वह फिर से बोली थी, तब उस की आवाज विकृत हो आई थी.

‘‘मैं यहां क्यों हूं? क्या मु झे लौट जाना चाहिए अपने मम्मीपापा के पास? आप ने बड़ा ही घिनौना मजाक किया है मेरे साथ. क्या आप का यह दायित्व नहीं बनता कि सबकुछ सामान्य हो जाए और आप अपना कामकाज संभाल लो. अपने दायित्व को सम झो और इस मनहूसियत को मिटा डालो?’’

चंद लमहों के लिए वह रुकी. खामोशी छाई रही. उस खामोशी को खुद ही भंग करते हुए बोली, ‘‘आप के कारण ही पूरे परिवार का मन मलिन रहा है अब तक. वह भी उस के लिए जो आप की थी भी नहीं. अब मैं हूं और मु झे आप का फैसला जानना है. अभी और अभी. मैं घुटघुट कर जी नहीं सकती. सम झे आप?’’

अनुजा के भीतर का दर्द उस के चेहरे पर था, जो साफ  झलक रहा था. परीक्षित के चेहरे की मायूसी भी वह भलीभांति देख रही थी. दोनों के ही भीतर अलगअलग तरह के  झं झावात थे,  झुं झलाहट थी.

परीक्षित उसे सुनता रहा था. वह उस के चेहरे पर अपनी नजरें जमाए रहा था. वह अपने प्रति उपेक्षा, रिमिझम के प्रति आक्रोश को देख रहा था. जब उस ने चुप्पी साधी, परीक्षित फफक पड़ा था और देररात फफकफफक कर रोता ही रहा था. अश्रु थे जो उस के रोके नहीं रुक रहे थे. तब उस की स्थिति बेहद ही दयनीय दिखी थी उसे.

वह सकपका गई थी. उसे अफसोस हुआ था. अफसोस इतना कि आंखें उस की भी छलक आई थीं, यह सोच कर कि ‘मु झे इस की मनोस्थिति को सम झना चाहिए था. मैं ने जल्दबाजी कर दी. अभी तो इस के क्षतविक्षत मन को राहत मिली भी नहीं और मैं ने इस के घाव फिर से हरे कर दिए.’

उस ने उसे चुप कराना उचित नहीं सम झा. सोचा, ‘मन की भड़ास, आंसुओं के माध्यम से बाहर आ जाए, तो ही अच्छा है. शायद इस से यह संभल ही जाए.’ फिर भी अंतर्मन में शोरगुल था. उस में से एक आवाज अस्फुट सी थी, ‘क्या मैं इतनी निष्ठुर हूं जो इस की वेदना को सम झने का अब तक एक बार भी सोचा नहीं? क्या स्त्री जाति का स्वभाव ही ऐसा होता है जो सिर्फ और सिर्फ अपना खयाल रखती है? दूसरों की परवा करना, दूसरों की पीड़ा क्या उस के आगे कोई महत्त्व नहीं रखती? क्या ऐसी सोच होती है हमारी? अगर ऐसा ही है तो बड़ी ही शर्मनाक बात है यह तो.’

उस की तंद्रा तब भंग हुई थी जब वह बोला, ‘‘शादी हो जाती अगर हमारी तो वह आप के स्थान पर होती आज. प्यार किया था उस से. निभाना भी चाहता था. पर इन बड़ेबुजुर्गों के कारण ही वह चल बसी. मैं कहां जानता था कि वह ऐसा कर डालेगी.’’

‘‘पर मेरा क्या? इस पचड़े में मैं दोषी कैसे? मु झे सजा क्यों मिल रही है? आप कहो तो अभी, इसी क्षण अपना सामान समेट कर निकल जाऊं?’’

‘‘देखिए, मु झे संभलने में जरा वक्त लगेगा. फिर मैं ने कब कहा कि आप यह घर छोड़ कर चली जाओ?’’

तभी अनुजा फिर से बिफर पड़ी, ‘‘वह हमारे वैवाहिक जीवन में जहर घोल गई है. अगर वह भली होती तो ऐसा कहर तो न ढाती? लाज, शर्म, परिवार का मानसम्मान, मर्यादा भी तो कोई चीज होती है जो उस में नहीं थी.’’

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‘‘इतनी कड़वी जबान तो न बोलो उस के विषय में जो रही नहीं. ऊलजलूल बकना क्या ठीक है? फिर उस ने ऐसा क्या कर दिया?’’ वह एकाएक आवेशित हो उठा था.

वह एक बार फिर से सकपका गई थी. उसे, उस से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा तो नहीं थी. फिर वह अब तक यह बात सम झ ही नहीं पाई थी कि गलत कौन है. क्या वह खुद? क्या उस का पति? या फिर वह नासपीटी?

देखतेदेखते चंद दिन और बीत गए. स्थिति ज्यों की त्यों ही बनी रही थी. अब उस ने उसे रोकनाटोकना छोड़ दिया था और समय के भरोसे जी रही थी.

परीक्षित अब भी सोते में, जागते में रोतासिसकता दिखता. कभी उस की नींद उचट जाने पर रात के अंधेरे में ही घर से निकल जाता. घंटों बाद थकाहारा लौटता भी तो सोया पड़ा होता. भूख लगे तो खाता अन्यथा थाली की तरफ निहारता भी नहीं. बड़ी गंभीर स्थिति से गुजर रहा था वह. और अनुजा  झुं झलाती रहती थी.

ऐसे में अनुजा को उस की चिंता सताने भी लगी थी. इतने दिनों में परीक्षित ने उसे छुआ भी नहीं था. न खुद से उस से बात ही की थी उस ने.

उस दिन पलंग के समीप की टेबल पर रखी रिमझिम की तसवीर फ्रेम में जड़ी रखी दिखी तो वह चकित हो उठा. उस ने उस फ्रेम को उठाया, रिमझिम की उस मुसकराती फोटो को देर तक देखता रहा. फिर यथास्थान रख दिया और अनुजा की तरफ देखा. तब अनुजा ने देखा, उस की आंखें नम थीं और उस के चेहरे के भाव देख अनुजा को लगा जैसे उस के मन में उस के लिए कृतज्ञता के भाव थे.

अनुजा सहजभाव से बोली, ‘‘मैं ने अपनी हटा दी. रिमझिम दीदी अब हमारे साथ होंगी, हर पल, हर क्षण. आप को बुरा तो नहीं लगा?’’

उस ने उस वक्त कुछ न कहा. काफी समय बाद उस ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने खाना खाया?’’ फिर तत्काल बोला, ‘‘हम दोनों इकट्ठे खाते हैं. तुम बैठी रहो, मैं ही मांजी से कह आता हूं कि वे हमारी थाली परोस दें.’’

खाना खाने के दौरान वह देर तक रिमझिम के विषय में बताता रहा. आज पहली बार ही उस ने अनुजा को, ‘आप’ और ‘आप ने’ कह कर संबोधित नहीं किया था. और आज पहली बार ही वह उस से खुल कर बातें कर रहा था. आज उस की स्थिति और दिनों की अपेक्षा सामान्य लगी थी उसे. और जब वह सोया पड़ा था, उस रात, एक बार भी न सिसका, न रोया और न ही बड़बड़ाया. यह देख अनुजा ने पहली बार राहत की सांस ली.

मानसिक यातना से नजात पा कर अनुजा आज गहरी नींद में थी. परीक्षित उठ चुका था और उस के उठने के इंतजार में पास पड़े सोफे पर बैठा दिखा. पलंग से नीचे उतरते जब अनुजा की नजर  टेबल पर रखी तसवीर पर पड़ी तो चकित हो उठी. मुसकरा दी. परीक्षित भी मुसकराया था उसे देख तब.

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अब उस फोटोफ्रेम में रिमझिम की जगह अनुजा की तसवीर लगी थी.

‘तुम मेरी रिमझिम हो, तुम ही मेरी पत्नी अनुजा भी. तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल है और तुम ने मेरे कारण ही महीनेभर से बहुत दुख  झेला है, पर अब नहीं. मैं आज ही से दुकान जा रहा हूं.’

और तभी, अनुजा को महसूस हुआ कि उस की मांग का सिंदूर सुर्ख हो चला है और दमक भी उठा है. कुछ अधिक ही सुर्ख, कुछ अधिक ही दमक रहा है.

#bethebetterguy: ड्राइविंग के दौरान है सीट बेल्ट जरूरी

वैसे तो यातायात के सभी नियमों का पालन आपको करना चाहिए उनमें सबसे मुख्य बात यह भी है की यदि आप चार पहिया वाहन का इस्तेमाल कर रहें हैं तो आपको सीट बेल्ट अवश्य लगाना चाहिए ये आपके लिए एक तरह से सुरक्षा कवच है. जरा सोचिए कि आखिर सीट बेल्ट की क्या जरूरत थी इसका आविष्कार ही क्यों किया गया.

दरअसल जब भी चार पहिया वाहन चलाते हैं तो अक्सर ऐसा होता है कि अचानक कोई गाड़ी के सामने आ गया व्यक्ति या कोई जानवर या आगे कोइ गाड़ी ही आ गई तो अचानक से ब्रेक लगाना पड़ता है ऐसे में आप भी आगे की और झुक जाते हैं तब ये सीट बेल्ट ही आपके माथे को गाड़ी में लड़ने से बचाता है. क्योंकि यदि आप आगे की ओर झुकें और आपने सीट बेल्ट नहीं लगा रखी है तो आपको गंभीर चोट लग सकती है सर में. ऐसे में आप बेहोश हो सकते हैं कोमा में जा सकते हैं या आपकी मौत भी हो सकती है. इसलिए ही सीट बेल्ट जैसी चीज का आविष्कार किया गया है.

बिना सीट बेल्ट के गाड़ी चलाने की वजह से भी दुर्घटना आए दिन होती रहती है. जिसमें काफी लोगों को अपनी जान से हांथ धोना पड़ता है. ऐसा नहीं है कि लोगों को इसके बारे में पता नहीं है सभी जानते हैं लेकिन फिर भी इस नियम का पालन नहीं करना चाहते.

हालांकि अब तो ट्रैफिक नियम के मुताबिक सीट बेल्ट ना लगाने पर आपका चालान कटेगा जैसे की अभी बाइक वालों पर हेलमेट ना लगाने पर कट रहा है तो अब इस डर से लोग सीट बेल्ट लगाने लगे हैं. और अच्छा ही है भले डर कर ही सही लोग अपनी जान को जोखिम में नहीं डाल रहें हैं. और यदि आप भी अभी तक इस नियम का पालन नहीं कर रहें हैं तो अब जरूर करिए ये आपकी सुरक्षा के लिए ही है.


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चिन्मयानंद एक और संत

साधुसंतों पर व्यभिचार के आरोपों की बात कोई नई नहीं है. धर्म और राजनीतिक पहुंच के चलते अगर कोई संत मठाधीश बन जाए तो सब से पहले वह अपने लिए सुख वैभव के साधन तैयार करता है, फिर उसे देह सुख भी सामान्य लगने लगता है. स्वामी चिन्मयानंद के साथ भी ऐसा ही कुछ था, जिस की वजह से…

हाल ही में कानून की छात्रा कामिनी द्वारा स्वामी चिन्मयानंद पर लगाया गया यौनशोषण और बलात्कार का आरोप खूब चर्चाओं में रहा. छात्रा द्वारा निर्वस्त्र स्वामी की मसाज करने के वायरल वीडियो ने भी स्वामी की हकीकत खोल कर रख दी. यौनशोषण और बलात्कार की यह कहानी पूरी तरह से फिल्मी सैक्स, सस्पेंस और थ्रिल से भरी हुई है. शाहजहांपुर के सामान्य परिवार की कामिनी स्वामी शुकदेवानंद ला कालेज से एलएलएम यानी मास्टर औफ ला की पढ़ाई कर रही थी.

हौस्टल में रहने के दौरान नहाते समय उस का एक वीडियो तैयार किया गया और उसी वीडियो को आधार बना कर उस का यौनशोषण शुरू हुआ. शोषण से मुक्ति पाने के लिए लड़की ने भी वीडियो का सहारा लिया. लेकिन इस प्रभावशाली संत और पूर्व केंद्रीय मंत्री को कटघरे में खड़ा करना आसान नहीं था. फिर भी लड़की ने हिम्मत से काम लिया और अंत में संत को विलेन साबित कर के ही दम लिया. यह संत थे स्वामी चिन्मयानंद.

अटल सरकार के बाद हाशिए पर चले गए स्वामी चिन्मयानंद 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रयासरत थे. वह राज्यसभा के जरिए संसद में पहुंचना चाहते थे. इस के पहले कि उन के संसद जाने का सफर पूरा होता, उन के ही कालेज में पढ़ने वाली लड़की कामिनी ने उन का चेहरा बेनकाब कर दिया.

कानून की पढ़ाई करने वाली 24 वर्षीया कामिनी ने जब मुमुक्षु आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ यौनशोषण और बलात्कार का आरोप लगाया तो पूरा देश सन्न रह गया.

एक लड़की के लिए ऐसे आरोप लगाना और साबित करना आसान काम नहीं था. इस का कारण यह था कि पूरा प्रशासन स्वामी चिन्मयानंद को बचाने में लगा था. इस के बावजूद पीडि़त लड़की और चिन्मयानंद के बीच शह और मात का खेल चलता रहा.

स्वामी चिन्मयानंद का रसूख लड़की पर भारी पड़ रहा था, जिस के चलते शोषण और बलात्कार का आरोप लगाने वाली लड़की के खिलाफ 5 करोड़ की रंगदारी मांगने का मुकदमा कायम कर के उसे जेल भेज दिया गया.

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लड़की को जेल में और आरोपी को एसी कमरे में रहने को सुख मिला. शोषण और बलात्कार के मुकदमे में हिरासत में लिए गए स्वामी चिन्मयानंद को जेल में 2 रात रखने के बाद सेहत की जांच को ले कर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पीजी अस्पताल भेज दिया गया था.

शह और मात के खेल में बाजी किस के हाथ लगेगी, यह तो अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा. लेकिन धर्म के नाम पर कैसेकैसे खेल खेले जाते हैं, यह समाज ने खुली आंखों से देखा. नग्नावस्था में लड़की से मसाज कराते वीडियो के सामने आने पर खुद स्वामी चिन्मयानंद ने जनता से कहा, ‘वह अपने इस कृत्य पर शर्मिंदा हैं.’

चिन्मयानंद से पहले सन 2015 में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की ही रहने वाली एक लड़की ने भी आसाराम बापू के खिलाफ ऐसे ही आरोप लगाए थे. आसाराम और चिन्मयानंद में केवल इतना ही फर्क है कि आसाराम केवल संत थे, जबकि चिन्मयानंद संत के साथसाथ भाजपा के सांसद और मंत्री भी रह चुके हैं.

चिन्मयानंद के जेल जाने के समय भाजपा के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने कहा कि स्वामी चिन्मयानंद भाजपा के सदस्य नहीं हैं. वह इस बात का जवाब नहीं दे सके कि यदि वह सदस्य नहीं हैं तो उन्हें भाजपा की सदस्यता से कब निकाला गया था.

स्वामी चिन्मयानंद ने धर्म के सहारे अपनी राजनीति शुरू की थी. वह राममंदिर आंदोलन के दौरान देश के उन प्रमुख संतों में थे, जो मंदिर निर्माण की राजनीति कर रहे थे. भाजपा ने स्वामी चिन्मयानंद को 3 बार लोकसभा का टिकट दे कर सांसद बनाया और अटल सरकार में उन्हें मंत्री बनने का मौका भी दिया.

चिन्मयानंद भाजपा में उस समय के नेता हैं, जब संतों को राजनीति में शामिल कर के सत्ता का रास्ता तय किया गया था. उस समय लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, कल्याण सिंह, महंत अवैद्यनाथ जैसे संत और नेताओं का भाजपा में बोलबाला था.

ऐसे कद्दावर स्वामी चिन्मयानंद की सच्चाई तब खुली, जब 24 अगस्त, 2019 को उन के ही स्वामी शुकदेवानंद ला कालेज में एलएलएम में पढ़ने वाली कामिनी ने उन के खिलाफ यौनशोषण और बलात्कार का आरोप लगाते हुए वीडियो जारी किया.

स्वामी शुकदेवानंद ला कालेज मुमुक्षु आश्रम की शिक्षण संस्थाओं में से एक है. इस कालेज की स्थापना शाहजहांपुर और उस के आसपास के इलाकों के छात्रों को कानून की शिक्षा देने के लिए हुई थी.

पीडि़त कामिनी इसी कालेज में एलएलएम की पढ़ाई कर रही थी. वह यहीं के हौस्टल में रहती थी. हौस्टल में रहने के दौरान ही स्वामी चिन्मयानंद की उस पर निगाह पड़ी. फलस्वरूप पढ़ाई के साथसाथ उसे कालेज में ही नौकरी दे दी गई. कामिनी सामान्य कदकाठी वाली गोरे रंग की लड़की थी.

कालेज में पढ़ने वाली दूसरी लड़कियों की तरह उसे भी स्टाइल के साथ सजसंवर कर रहने की आदत थी. चिन्मयानंद ने उस के जन्मदिन की पार्टी में भी हिस्सा लिया और केक काटने में हिस्सेदारी की. वैसे कामिनी और चिन्मयानंद की नजदीकी बढ़ने की अपनी अलग कहानी है.

कामिनी का कहना है कि उसे योजना बना कर फंसाया गया. जब वह हौस्टल में रहने आई तो एक दिन नहाते समय चोरी से उस का वीडियो बना लिया गया. इस के बाद उस वीडियो को वायरल कर के उसे बदनाम करने की धमकी दी गई. फिर स्वामी चिन्मयानंद ने उस के साथ बलात्कार किया. इस बलात्कार की भी उन्होंने वीडियो बनाई. इस के बाद उस के शोषण का सिलसिला चल निकला.

चिन्मयानंद को मसाज कराने का शौक था. मसाज के दौरान ही कभीकभी वह सैक्स भी करते थे. अपने शोषण से परेशान कामिनी ने स्वामी की तर्ज पर उन की मसाज और सैक्स के वीडियो बनाने शुरू कर दिए. वह जान गई थी कि स्वामी चिन्मयानंद के जाल से निकलने के लिए शोषण की कहानी को दुनिया के सामने लाना होगा.

पीडि़त कामिनी ने स्वामी चिन्मयानंद के तमाम वीडियो पुलिस को सौंपे हैं. इन में से 2 वीडियो वायरल भी हो गए. वायरल वीडियो में चिन्मयानंद नग्नावस्था में कामिनी से मसाज करा रहे थे. इस में वह कामिनी से आपसी संबंधों की बातें भी कर रहे थे. उन की आपसी बातचीत से ऐसा लग रहा था, जैसे दोनों के बीच यह सामान्य घटना हो.

इस दौरान कामिनी की तबीयत और नया मोबाइल खरीदने की बात भी हुई. कामिनी ने काले रंग की टीशर्ट पहनी थी. उस ने मसाज वाले दोनों वीडियो अपने चश्मे में लगे खुफिया कैमरे से तैयार किए थे. खुद को फ्रेम में रखने के लिए उस ने अपना चश्मा मेज पर उतार कर रख दिया था, जिस से स्वामी चिन्मयानंद के साथ वह भी कैमरे में दिख सके.

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यह कैमरा कामिनी के नजर वाले चश्मे के फ्रेम में नाक के ठीक ऊपर इस तरह लगा था जैसे कोई चश्मे की डिजाइन हो. कामिनी ने यह चश्मा औनलाइन शौपिंग से मंगवाया था.

मसाज करने के बाद जब कामिनी हाथ धोने बाथरूम में गई तो शीशे में उस का अपना चेहरा भी कैमरे में कैद हो गया था. पूरी तैयारी के बाद उस ने स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. लेकिन उस की तैयारी के मुकाबले स्वामी का प्रभाव भारी पड़ा.

खुद को फंसता देख स्वामी चिन्मयानंद ने कामिनी और उस के 3 दोस्तों पर 5 करोड़ की फिरौती मांगने का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस काम में स्वामी चिन्मयानंद का रसूख काम आया.

कामिनी की कोशिश के बावजूद स्वामी चिन्मयानंद पर उत्तर प्रदेश में मुकदमा दर्ज नहीं हो सका. लेकिन पुलिस ने कामिनी पर फिरौती मांगने का मुकदमा दर्ज कर उस की तलाश शुरू कर दी. कामिनी अपने दोस्त के साथ राजस्थान के दौसा शहर चली गई थी. वहां उस ने सोशल मीडिया पर अपनी दास्तान सुनाई. जनता और सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान लेने के बाद उस का मुकदमा दिल्ली में दर्ज किया गया.

उत्तर प्रदेश सरकार ने आननफानन में स्पैशल जांच टीम बना कर पूरा मामला उस के हवाले कर दिया. भारी दबाव के बाद आखिर चिन्मयानंद को 19 सितंबर, 2019 की सुबह करीब पौने 9 बजे एसआईटी ने गिरफ्तार कर लिया. जिस समय चिन्मयानंद को गिरफ्तार किया गया, उस समय वह अपने आश्रम में ही थे.

शाहजहांपुर के मुमुक्षु आश्रम को मोक्ष प्राप्त करने का स्थान बताया जाता है. शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश के पिछडे़ जिलों में गिना जाता है. करीब 30 लाख की आबादी वाले इस जिले की साक्षरता 59 प्रतिशत है. मुमुक्षु आश्रम भी यहां की धार्मिक आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता था.

शाहजहांपुर बरेली हाइवे पर स्थित यह आश्रम करीब 21 एकड़ जमीन पर बना है. इस के परिसर में ही इंटर कालेज से ले कर डिग्री कालेज तक 5 शिक्षण संस्थाएं हैं. मुमुक्षु आश्रम का दायरा शाहजहांपुर के बाहर दिल्ली, हरिद्वार, बद्रीनाथ और ऋषिकेश तक फैला है.

मुमुक्षु आश्रम की ताकत का लाभ ले कर वर्ष 1985 के बाद स्वामी चिन्मयानंद ने धर्म के साथसाथ अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाई. वह 3 बार सांसद और एक बार केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री बने. दूसरों को मोक्ष देने का दावा करने वाला मुमुक्षु आश्रम स्वामी चिन्मयानंद को मोक्ष की जगह जेल भेजने का जरिया बन गया.

मुमुक्षु आश्रम में संत के रूप में रहने आए चिन्मयानंद मुमुक्षु आश्रम के अधिष्ठाता बन गए थे. अधिष्ठाता बनने के बाद चिन्मयानंद खुद को भगवान समझने लगे. अहंकार का यही भाव उन के पतन का कारण बना.

श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी ने स्वामी चिन्मयानंद को अखाड़ा परिषद से बाहर कर दिया है. अखाड़ा सचिव महंत स्वामी रामसेवक गिरी ने कहा कि चिन्मयानंद के कारण संत समाज की छवि धूमिल हुई है.

मुमुक्षु आश्रम की स्थापना सन 1947 में स्वामी शुकदेवानंद ने की थी. शुकदेवानंद शाहजहांपुर के ही रहने वाले थे. उन की सोच हिंदूवादी थी. उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में ‘गांधी फैज-ए-आजम’ नाम से कालेज की स्थापना हुई थी. शुकदेवानंद को यह कालेज मुसलिमपरस्त लगा.

शुकदेवानंद को लगा कि इस के जवाब में संस्कृत का प्रचार करने के लिए इसी तरह से दूसरे कालेज की स्थापना होनी चाहिए, जिस से हिंदू संस्कृति का प्रचारप्रसार किया जा सके. इस के बाद शुकदेवानंद ने 1947 में श्री दैवी संपदा इंटर कालेज और 1951 में दैवी संपदा संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना की.

स्वामी शुकदेवानंद पोस्ट ग्रैजुएट कालेज की स्थापना सन 1964 में हुई. छात्रों की संस्कृत में विशेष रुचि न होने के कारण यहां पढ़ने वाले छात्रों की संख्या काफी कम थी. पोस्टग्रैजुएट कालेज खुल जाने के बाद यहां के इंटर कालेज और डिग्री कालेज के छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ी, जिस से कालेज में पैसा आने लगा.

देखते ही देखते शुकदेवानंद का प्रभाव बढ़ने लगा. शाहजहांपुर के बाद दिल्ली, हरिद्वार, बद्रीनाथ और ऋषिकेश में शुकदेवानंद आश्रम बन गए. शुकदेवानंद के निधन के बाद उन के नाम पर शुकदेवानंद ट्रस्ट की स्थापना हुई. सभी कालेज और आश्रम इसी के आधीन आ गए.

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शुकदेवानंद के निधन के बाद उन के आश्रम और बाकी काम की जिम्मेदारी स्वामी धर्मानंद ने संभाली. धर्मानंद स्वामी शुकदेवानंद के शिष्य थे और उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के रहने वाले थे. स्वामी धर्मानंद ने भी अपने समय में शिक्षा के माध्यम से हिंदू संस्कृति को ले कर काम किया. बीमार रहने के कारण कुछ सालों बाद उन का भी देहांत हो गया. धर्मानंद के बाद चिन्मयानंद ने गद्दी संभाली.

चिन्मयानंद का जन्म सन 1947 में उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में परसपुर क्षेत्र के त्योरासी गांव में हुआ था. उन का असल नाम कृष्णपाल सिंह है. 1967 में 20 साल की उम्र में संन्यास लेने के बाद वह हरिद्वार पहुंचे, जहां संत समाज ने उन का नाम चिन्मयानंद रखा.

चिन्मयानंद का परिचय भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी से था. राजनीतिक रुचि के कारण चिन्मयानंद उन के करीबी बन गए. इस के बाद चिन्मयानंद उत्तर प्रदेश में प्रमुख संत नेता के रूप में उभरने लगे. इसी के चलते वह विश्व हिंदू परिषद के संपर्क में आए.

यही वह समय था जब विश्व हिंदू परिषद राममंदिर को ले कर उत्तर प्रदेश में आंदोलन चला रहा था. उस के लिए मठ, मंदिर और आश्रम में रहने वाले संत मठाधीश बहुत खास हो गए थे.

विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल ने उत्तर प्रदेश में जिन आश्रम के लोगों को राममंदिर आंदोलन से जोड़ा, उन में गोरखपुर जिले के गोरखनाथ धाम के महंत अवैद्यनाथ, शाहजहांपुर के स्वामी चिन्मयानंद और अयोध्या से महंत परमहंस दास प्रमुख थे.

जब देश में हिंदुत्व की राजनीतिक लहर बनी, तब चिन्मयानंद विश्व हिंदू परिषद के साथसाथ भाजपा के भी कद्दावर नेता बन गए. विश्व हिंदू परिषद ने जब राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति का गठन किया तो स्वामी चिन्मयानंद को उस का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया. राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति का राष्ट्रीय संयोजक बनने के बाद

स्वामी चिन्मयानंद के नेतृत्व में संघर्ष समिति का दायरा बढ़ाने का काम किया गया. इस से उन की पहचान पूरे देश में प्रखर हिंदू वक्ता के रूप में स्थापित हुई.

हिंदुत्व के सहारे देश की सत्ता हासिल करने का सपना देख रही भाजपा ने साधुसंतों को संसद पहुंचाने की योजना बनाई. इसी के चलते चिन्मयानंद को लोकसभा का चुनाव लड़ाने की योजना बनी. सन 1990 में भाजपा ने केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले कर देश को मध्यावधि चुनाव में धकेल दिया तो 1991 में चिन्मयानंद को शरद यादव के खिलाफ बदायूं से टिकट दिया गया.

चुनाव में स्वामी चिन्मयानंद ने शरद यादव को 15 हजार वोटों से पटखनी दे दी. इस के बाद स्वामी चिन्मयानंद ने 1998 में मछलीशहर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की.

इस के बाद स्वामी चिन्मयानंद ने धर्म और सत्ता का तालमेल बैठा कर आगे बढ़ना शुरू किया. सन 1992 में जब बाबरी मसजिद ढहाई गई तब स्वामी चिन्मयानंद भी वहां मौजूद थे. लिब्रहान आयोग ने जिन लोगों को आरोपी माना था, उस में चिन्मयानंद का नाम भी शामिल था.

बाबरी मसजिद ढहाए जाने से 9 दिन पहले चिन्मयानंद ने सुप्रीम कोर्ट के सामने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दायर एफिडेविट में बताया था कि 6 दिसंबर, 1992 को सिर्फ कार सेवा की जाएगी और अयोध्या में इस से कानूनव्यवस्था के लिए किसी तरह का खतरा नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने उन की बातों पर विश्वास भी किया, लेकिन बाबरी मसजिद ढहा दी गई. सन 2009 में लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कार सेवा के बहाने मसजिद गिराने का प्लान पहले से तय था और इस की भूमिका में परमहंस रामचंद्र दास, अशोक सिंघल, विनय कटियार, चंपत राय, आचार्य गिरिराज, वी.पी. सिंघल, एस.सी. दीक्षित और चिन्मयानंद शामिल थे.

1990 के दशक में राजनीतिक रूप से स्वामी चिन्मयानंद अपना रसूख काफी मजबूत कर चुके थे. देश के हिंदुत्व के नायकों में से उन की गिनती होने लगी. 12वीं लोकसभा (1998) में उन्होंने अपने आप को सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता और धार्मिक गुरु बताया था. चिन्मयानंद 30 से अधिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थाओं के साथ जुड़े थे.

चिन्मयानंद और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच गहरा रिश्ता है. 1980 के दशक में राममंदिर आंदोलन के दौरान स्वामी चिन्मयानंद और योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ ने मंदिर निर्माण के लिए कंधे से कंधा मिला कर काम किया था. दोनों ने मिल कर राम जन्मभूमि मुक्ति संघर्ष समिति की स्थापना भी की थी. उन के बीच करीबी रिश्ता था.

अटल सरकार में मंत्री पद से हटने के बाद स्वामी चिन्मयानंद का राजनीतिक रसूख हाशिए पर सिमट गया था. 2017 में जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो स्वामी चिन्मयानंद का रसूख फिर से बढ़ गया. उन का दरबार सजने लगा था. तमाम नेता और अफसर वहां शीश झुकाने जाने लगे. मुमुक्षु आश्रम का दरबार एक तरह से सत्ता का केंद्र बन गया था.

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कामिनी के पिता की तरफ से चिन्मयानंद उर्फ कृष्णपाल सिंह के खिलाफ भादंवि की धारा 376सी, 354बी, 342, 306 के तहत मुकदमा लिखाया गया. दूसरी ओर स्वामी चिन्मयानंद के वकील की तरफ से कामिनी और उस के दोस्तों संजय सिंह, सचिन और विक्रम के खिलाफ भादंवि की धारा 385, 506, 201, 35 और आईटी ऐक्ट 67ए के तहत 5 करोड़ रुपए की रंगदारी मांगने का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

दोनों ही मुकदमों में गिरफ्तारी हो चुकी है. जानकार लोगों का मानना है कि रंगदारी के मुकदमे के सहारे यौनशोषण और बलात्कार के मुकदमे को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है.

पुलिस द्वारा आरोप लगाने वाली कामिनी के ही खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे 24 सितंबर को पकड़ कर जेल भेज दिया गया. इस के बाद विरोधी दलों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर चिन्मयानंद को बचाने के आरोप लगाए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में कामिनी नाम परिवर्तित है.

 

नायरा और कार्तिक की शादी मे बड़ा धमाका करेगी वेदिका, आएगा ये बड़ा ट्विस्ट

स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला मशहूर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’  में दर्शको को लगातार धमाकेदार ट्विस्ट एंड टर्न देखने को मिल रहे हैं. इस शो की कहानी का एंगल नायरा कार्तिक के शादी की इर्द गिर्द घुम रही है. ये एंगल दर्शकों को खुब पसंद आ रहा है. जी हां, दर्शकों को इस ट्रैक का काफी टाइम से इंतजार था. तो आइए जानते हैं इस शो के ट्विस्ट के बारे में.

पिछले एपिसोड में आपने देखा कि वेदिका नायरा और कार्तिक की जिंदगी से जा चुकी है और ऐसे में अब नायरा और कार्तिक फिर से एक दूसरे का हाथ थामकर अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने वाले हैं.

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इस शो के फैंस के लिए ये खबर ट्रिट से कम नहीं थी. लेकिन जल्द ही फैंस को धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिलने वाला है. जी हां, इतनी आसानी से वेदिका हार नहीं मानने वाली है. खबरों के अनुसार वेदिका कार्तिक और नायरा के साथ किए गए वादे से मुकर जाएगी.  दरअसल वेदिका की दोस्त पलल्वी उसे भड़काएगी और सलाह देगी कि वह अपने हक के लिए लड़े. ऐसे में वेदिका को लगने लगेगा कि वह इतनी जल्दी नायरा से हार नहीं मान सकती है.

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एक रिपोर्ट के अनुसार कार्तिक नायरा से शादी करने से पहले वेदिका को तलाक देने का सारा प्रोसीजर पूरा करना चाहता है. कार्तिक और उसका पूरा परिवार कोर्ट भी जाएगा, लेकिन वहां पर वेदिका का नहीं होगी. ऐसे में गोयनका परिवार वेदिका को लेकर काफी परेशान हो जाएगा.

आखिर नायरा और कार्तिक की जिंदगी से वेदिका का चैप्टर को कब खत्म होगा ? बीते कई महीने से दर्शक यही मांग कर रहे थे कि वह वेदिका को जल्द से जल्द नायरा और कार्तिक की जिंदगी से दूर चली जाए,  लेकिन लगता है कि मेकर्स अभी वेदिका के कैरेक्टर को जल्द खत्म नहीं करने वाले हैं. बता दें, वैसे इस शो में कार्तिक और नायरा चौथी बार शादी करेंगे.

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कपिल शर्मा के घर आई नन्ही परी, गिन्नी ने दिया बेटी को जन्म

कौमेडियन कपिल शर्मा के फैंस के लिए बहुत बड़ी खुशखबरी है. जी हां, कपिल शर्मा पापा बन गए हैं. उनके घर खुशियों नें दस्तक दी है. कपिल शर्मा के घर नन्ही परी आई है. पत्नी गिन्नी ने बेटी को जन्म दिया है. बता दें, आज ही कपिल शर्मा की पत्नी ने बेटी को जन्म दिया है.

इसकी जानकारी कपिल शर्मा ने खुद सोशल मीडिया पर अपने फैंस के साथ शेयर किया है.  ट्विटर पर उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा- ‘हमारे घर में बेटी ने जन्म लिया है. आपके आशीर्वाद की बहुत जरूरत है. सबको मेरा बहुत प्यार…

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कपिल शर्मा के इस ट्विट पर उनके फैंस का बहुत सारा प्यार देखने को मिल रहा है.  लगातार उनको बधाई देने की होड़ दिखाई दे रही है. आपको बता दें, गुरु रंधावा और भुवन बाम ने सबसे पहले नंबर लगाते हुए कपिल शर्मा को ‘पापा’ बनने पर बधाई दी है. गुरु रंधावा ने बधाई देते हुए ट्वीट पर लिखा- ‘बहुत बहुत बधाई हो पा जी, अब मैं औफिशियली चाचा बन गया’.

साल 2018 में कपिल शर्मा ने गिन्नी चतरथ से धूमधाम से शादी की थी. इनकी शादी की खबरें काफी चर्चा में रही थी. आपको बता दें, कपिल शर्मा और उनके परिवार वालों को जैसे ही इस बात की खबर लगी कि घर में नया मेहमान आने वाला है उन्होंने ने तैयारियांशुरू कर दी थी.  तो उधर कपिल शर्मा ने परिवार और दोस्तों के लिए बेबी शावर पार्टी का भी आयोजन किया था. इस पार्टी में कई टीवी सेलेब्स भी शामिल हुए थे. इसके अलावा कपिल अपनी पत्नी के साथ बेबी मून मनाने के लिए कनाडा भी गए थे.

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जैनियों में बंदिशों से घट रही आबादी

जैन समुदाय में अब शादियों से पहले होने बाले प्री वेडिंग शूट और महिला संगीत में कोरियोग्राफी प्रतिबंधित रहेगी. भोपाल के जैन समाज ने यह फैसला अपने मुनियों शैल सागर , निकलंक सागर और प्रसाद सागर के आदेश पर लिया है. जैन पंचायत कमेटी के अध्यक्ष प्रमोद हिमांशु के मुताबिक इन मुनियों ने कहा है कि जो इन निर्देशों को न माने उसे समाज में तबज्जो न दी जाये यानि समाज से बहिष्कृत कर दिया जाये.

इस तुगलकी फैसले के बाबत परंपरावादियों के अपने घिसे पिटे तर्क भी हैं कि यह एक नए किस्म की फिजूलखर्ची है और एक नए प्रकार का प्रदूषण भी है. प्री वेडिंग शूट के लिए लड़का लड़की को सगाई के बाद अकेले अपने ही शहर में या फिर किसी पर्यटन स्थल पर जाकर फोटो खिंचाने की इजाजत या छूट दे दी जाती है, वहां इन लोगों के साथ कोई भी अप्रिय घटना हो सकती है. दूसरे समाज के बुजुर्ग उस वक्त नाराजगी जताते हैं जब ये फोटो शादी वाले दिन स्क्रीन पर दिखाये जाते हैं.

बेशक इन दलीलों में कोई दम नहीं है जो युवाओं की इच्छाओ और आजादी पर धर्म और संस्कृति की आड़ में अंकुश लगाने दी जा रही हैं. दरअसल में चूंकि मुनिगण ऐसा नहीं चाहते इसलिए यह सब थोपा जा रहा है, जिसके नतीजे भी जैन समाज को भुगतना होंगे. यह वही जैन समाज है, जो अपनी घटती आबादी को लेकर इतना चिंतित है कि नए जोड़ों को ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील भी वक्त वक्त पर करता रहता है. इसी जैन समाज में हजारों युवा दीन दुनिया से विरक्त होकर सन्यास ले लेते हैं जिसका खूब धूम धड़ाका किया जाता है.

क्या कोई समाज युवाओं की व्यक्तिगत आजादी छीनकर उनसे धर्म के सिद्धान्त मनवा सकता है. इस सवाल का सीधा जवाब है. हरगिज नहीं, उल्टे होता यह है कि कई युवा थोपे गए इस तरह के फरमानों से असहमत होकर अपनी मर्जी से जिंदगी जीने लगते हैं. मुनियों को क्यों प्री वेडिंग शूट और कोरियोग्राफी पर एतराज है यह तो वही जानें लेकिन युवाओं के नजरिए से देखें तो यह ज्यादती है. भोपाल के ही नूतन कालेज में पढ़ रही एक 20 वर्षीय छात्रा का कहना है आजकल प्री वेडिंग शूट और समारोहपूर्वक नाच गाना यानि महिला संगीत शादी की खुशियों में चार चांद लगा देते हैं. हम से बहिष्कार की शर्त और धौंस से यह सब छीना नहीं जाना चाहिए.

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इस छात्रा के मुताबिक हम जैनियों में शादियों में दिखाबे के नाम पर जमकर फिजूलखर्ची होती है और दहेज का चलन भी ज्यादा है फिर फिजूलखर्ची का हवाला उन्हीं कामों पर क्यों जिन्हें हम प्राथमिकता में रखते हैं. किसी को यह हक नहीं होना चाहिए कि वह तरह तरह के नए रस्मों रिवाज हम पर थोपे ये तो आजकल की मांग हैं और जरूरत भी हैं. क्या हमारी इच्छाओं और शौक की कोई कीमत नहीं. हम मुनियों और धर्म का यथासंभव पर्याप्त सम्मान करते हैं अब वे ही यह भाव हमसे छीन रहे हैं तो कोई क्या कर लेगा.

इस युवती और ऐसे युवाओं की मनोदशा पर बारीकी से गौर करें तो एक पूरी पीढ़ी इस असमंजस में है कि धार्मिक निर्देश आदेश अहम हैं या फिर उनकी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता जो आमतौर पर धर्म का उल्लंघन नहीं करती और करे भी तो बात हर्ज की नहीं क्योंकि धर्म कोई भी हो, उसकी पहली कोशिश लोगों की आजादी छीनने की ही होती है जिससे वे धर्म गुरुओं की गुलामी ढोते उनकी जयजयकार करते रहें .

फिर घटती आबादी पर हाय हाय क्यों

इसी साल मार्च के महीने में इंदौर में दिगंबर जैन महासमिति ने एक आयोजन में जैन दंपत्तियों से दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने अपील की थी. जैनियों की इस सर्वोच्च संस्था के अध्यक्ष अशोक बड़जात्या ने कहा था कि ऐसे कई कारण हैं जिनकी वजह से कपल्स एक से ज्यादा बच्चे पैदा नहीं करना चाहते. वित्तीय समस्या इनमें से एक है . एक समुदाय के रूप में हम इसकी जिम्मेदारी ले सकते हैं ताकि वे ज्यादा बच्चे पैदा कर सकें. समुदाय के सदस्य इस मुद्दे पर योजना तैयार करने के लिए जल्द ही साथ आएंगे और धन जमा करेंगे .

आंकड़ों पर गौर करें तो साल 2011 की जनगणना में जैनियों की आबादी महज 44 लाख थी यह बढ़ोत्री 2001 के मुकाबले काफी मामूली है तब जैनियों की तादाद 42 लाख थी. हाल ही में राष्ट्रीय स्वास्थ सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि जैन महिलाओं में प्रजनन दर यानि मां बनाने की औसत उम्र 1.2 फीसदी है जो हिंदुओं और मुसलमानों के मुकाबले आधे से भी कम है.

अब जैन समुदाय अपनी आबादी बढ़ाने हम दो और हमारे तीन का नारा दे रहा है तो उसे सोचना यह चाहिए कि घटती जनसंख्या की एक अहम वजह युवाओं पर थोपे जा रहे धार्मिक फैसले भी हैं और कम आबादी कोई पाप नहीं बल्कि जागरूकता की प्रतीक है जिसमें शिक्षा का रोल अहम है. जैन समुदाय की युवतियां भी अब केरियर को प्राथमिकता देने लगीं हैं शादी और बच्चा उनके लिए बाद की बातें हो चली हैं .

ऐसे में शादियों में जरूरत से ज्यादा गैरजरूरी प्रतिबंध जो युवाओं की खुशियां और अरमान छीनने वाले हों उन्हें या तो बगाबत के लिए उकसाएंगे या फिर विरक्ति की तरफ ले जाएंगे लेकिन अगर जीवन यापन धर्म गुरुओं के दिशा निर्देशों पर ही करने की वाध्यता जैनियों ने नहीं छोड़ी तो उनकी हालत भी पारसियों सरीखी हो सकती है जो खत्म से हो चले हैं.

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चार सुनहरे दिन : भाग 2

रेखा के पिता ने चाय पी कर जम्हाई ली और भीतर चले गए. प्रदीप वहीं बैठा रहा. उस ने चाय पीतेपीते कहा, ‘‘चाय तो पीता ही रहता हूं, लेकिन सच कहूं रेखाजी, ऐसी चाय कभी नहीं पी मैं ने. आप ने ही बनाई होगी?’’

‘‘जी,’’ रेखा लजा गई, ‘‘आप को पसंद आई?’’

‘‘अजी, क्या कहती हैं, आप,’’ प्रदीप उत्साह से बोला, ‘‘काश, ऐसी चाय रोज मिल सकती.’’

रेखा ने साहस कर कहा, ‘‘तो रोज आ कर पी जाया करें. मैं रात को साढ़े 9 बजे लौटती हूं.’’

प्रदीप बोला, ‘‘मौका मिलेगा तो जरूर आऊंगा, मिस रेखा. आप जितनी भली हैं, उतनी ही…मेरा मतलब है कि उतना ही आकर्षण है आप में.’’

रेखा का चेहरा लाल हो गया. किसी ने आज तक उस से ऐसी बात नहीं कही थी, और यह सुंदर युवक.

‘‘आप जरूर आया करें. मैं इंतजार करूंगी.’’

तब से प्रदीप अकसर उस के घर आने लगा. रेखा के बूढ़े पिता और छोटी बहन शोभा से उस ने अच्छी घनिष्ठता बना ली. वह खुशमिजाज और बातचीत में चतुर था. शाम को आता तो साथ में कुछ नमकीन या मीठा लेता आता. 16 साल की शोभा उस के लिए चाय बनाती और वह रेखा के आने तक रुका रहता. रेखा के पिता इस मिलनसार, शरीफ युवक से बहुत खुश थे. रेखा जब आती तो फिर से चाय बनाती थी.

रविवार को रेखा की छुट्टी होती थी. उस दिन मैनेजर जगतियानी खुद रामलाल के साथ जा कर रुपए बैंक में जमा कराता था. रविवार को प्रदीप रेखा को मोटरसाइकिल से घुमाने ले जाता. कभी सिनेमा तो कभी किसी रैस्तरां में भी ले जाता.

प्रदीप रेखा की हर बात की बड़ी तारीफ करता था. कहता, ‘‘रेखा, तुम जैसी सम झदार और अच्छी लड़की मैं ने कहीं नहीं देखी.’’

31वें वर्ष में कदम रख रही रेखा को अपने लिए लड़की शब्द सुन कर गुदगुदी सी होती थी. कहती, ‘‘तुम तो मु झे बना रहे हो.’’

‘‘सच कहता हूं,’’ प्रदीप गंभीर हो जाता, ‘‘तुम हीरा हो. जो तुम्हारा हाथ थामेगा, वह बहुत खुशनसीब होगा.’’

अब तक पुरुषों की प्रशंसात्मक दृष्टि या रोमांस से अपरिचित और उस के लिए तरसती रही रेखा प्रदीप की इन बातों में भूल जाती कि वह बहुत असुंदर है, 30 साल पार चुकी है और प्रदीप उस से उम्र में छोटा और स्मार्ट युवक है. वह उस की बातों पर विश्वास कर लेना चाहती थी. वह और प्रशंसा सुनने के लिए कहती, ‘‘मैं तो इतनी बदसूरत.’’

प्रदीप हंसता, ‘‘खूबसूरती और गोरी चमड़ी को देखने वाले बेवकूफ होते हैं. स्त्री का असली सौंदर्य तो उस के भीतर छिपा रहता है, रेखा. तुम देखने में भले ही बहुत सुंदर न हो लेकिन तुम में एक जबरदस्त आकर्षण और सम्मोहन है. उसे तुम क्या जानो.’’

और, रेखा के ऊपर जैसे नशा छा जाता. घर लौट कर वह आईने में खुद को निहारती रहती. क्या सच में वह आकर्षक है? आईना तो उस का वही पुराना अक्स दिखाता है. किंतु उसे लगता, वह आकर्षक हो गई है.

प्रदीप पिछले रविवार को उसे शहर के बाहर  झील के किनारे बने रैस्तरां ले गया था. वहां  झील के पास  झाड़ीनुमा पेड़ों के बीच बैठने के लिए अलगथलग मेजें लगी हुई थीं. बैरे सामने के होटल से सामान ला कर परोसते. लोग आजादी के मजे लेते हुए खातेपीते, प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते.

प्रदीप ने डोसे, चिप्स और कौफी का और्डर दिया.

‘‘यहां कितना अच्छा लग रहा है,’’ रेखा विभोर थी, ‘‘सच प्रदीप, मैं पहले कभी यहां नहीं आई, बल्कि मैं तो कहीं किसी होटल या रैस्तरां में भी नहीं जाती. अकेली…’’

‘‘छोड़ो, अब तुम अकेली नहीं हो, रेखा,’’ प्रदीप ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘मैं तुम्हारा दोस्त हूं, अब.’’

‘‘मेरी दोस्ती से तुम्हें क्या मिलने वाला है?’’ रेखा ने उसे टटोलना चाहा.

प्रदीप हंसा, ‘‘मु झे तुम्हारा साथ ताजगी से भर देता है. सच मानो, जिंदगी में बहुत सी सुंदर लड़कियां मिलीं, लेकिन किसी से इतना प्रभावित न हुआ जितना तुम से.’’

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‘‘ झूठे…’’ रेखा व्याकुलता से उसे देखने लगी.

‘‘सच, तुम मेरे लिए संसार की सब से सुंदर और योग्य लड़की हो.’’

‘लड़की’ शब्द से रेखा रोमांचित हो उठी. प्रदीप के मुंह से वह बारबार लड़की शब्द सुनना चाहती थी. बोली, ‘‘मैं और लड़की. लड़की तो शोभा है.’’

‘‘शोभा?’’ प्रदीप हंसा, ‘‘वह बच्ची है. उस में वह सुंदर नारीत्व कहां है? छोड़ो रेखा, मैं आज तुम्हारे सिवा और किसी का नाम नहीं लेना चाहता बीच में.’’

‘‘क्या, सच?’’ रेखा कुछ आगे  झुकी, ‘‘सो, क्यों भला?’’

‘‘क्योंकि…बुरा न मानो, तो सच कहूं…’’ प्रदीप ने गंभीरता से कहा, ‘‘मैं तुम्हें प्यार करता हूं.’’

रेखा के कान सनसना उठे. कुछ देर तो जैसे उसे होश ही न रहा. प्रदीप ने उस के हाथों को दबा कर सचेत किया, ‘‘बैरा आ रहा है.’’

बैरा आया, क्या रख गया, रेखा को कुछ होश ही नहीं था. वह तो प्रदीप की बात के नशे में मस्त थी. प्रदीप ने उस का हाथ दबाया, ‘‘खाओ…’’

उस दिन का नाश्ता रेखा को अपने जीवन का सब से स्वादिष्ठ नाश्ता लगा. वह तरंगों में  झूल रही थी. उस ने सोचा भी न था कि उस के जीवन में कभी कोई ऐसा मौका आएगा, जब कोई सुंदर युवक उसे कहेगा, ‘तुम बड़ी सुंदर हो, मैं तुम्हें प्यार करता हूं,’ वही आज अचानक हो गया है.

लौटते समय प्रदीप ने कहा, ‘‘आज तुम मेरे घर चलो तो कैसा रहे?’’

रेखा बोली, ‘‘तुम्हारे घर वाले क्या सोचेंगे?’’

‘‘आज तो घर पर सिर्फ मेरे पिताजी हैं. मां और भाईबहन एक नातेदारी में शादी में गए हुए हैं. तुम्हें अपने पिताजी से मिलाऊं.’’

उस ने रेखा के जवाब का इंतजार किए बिना ही मोटरसाइकिल मोड़ दी. शहर के दूसरे किनारे बसे एक छोटे से साधारण दोमंजिला घर के आगे मोटरसाइकिल खड़ी की, ‘‘मेरा गरीबखाना.’’

रेखा के साथ बरामदे में आ कर उस ने घंटी बजाई. कई बार बटन दबाया, किंतु दरवाजा नहीं खुला. बोला, ‘‘पिताजी जरूर घूमने निकले हैं. 9 बजे रात तक लौटते हैं. खैर, कोई बात नहीं, मेरे पास भी चाबी है.’’

अपनी चाबी से दरवाजा खोल कर वह रेखा को भीतर लाया. साधारण सी बैठक. सोफा, टीवी, दीवान आदि से सजा हुआ. एक तरफ भीतर जाने का दरवाजा.

प्रदीप भीतर देख आया. बोला, ‘‘जरूर वे बाहर हैं. खैर, उन के आने तक बैठते हैं. तुम्हें जल्दी तो नहीं है?’’

रेखा ने कहा कि उसे कोई जल्दी नहीं है.

‘‘तो आज मेरी ही बनाई चाय पियो,’’ प्रदीप हंसा, ‘‘तुम्हारे जैसी तो क्या बनेगी, किंतु…’’

वह भीतर चला गया. रेखा की आंखों के आगे रंगीन सपने तैरते रहे. प्रदीप उसे प्यार करता है? अपने पिता से मिलाने लाया तो है. अगर शादी हुई तो वह इसी घर में आएगी.

प्रदीप चाय ले आया. रेखा को वह मामूली चाय भी अमृत जैसी लगी प्रदीप ने बनाई थी इसलिए. प्रदीप ने उस का हाथ अपनी हथेली में दबा कर कहा, ‘‘रेखा, तुम मु झ से प्यार करती हो?’’

रेखा शरमा गई. उस की आंखें जैसे शराब के नशे में थीं. प्रदीप बोला, ‘‘तुम्हारी आंखें सच बता रही हैं. हम दोनों जल्द शादी करेंगे.’’

‘‘सच?’’ रेखा ने ऐसे कहा जैसे बच्चे को मिठाई देने का वादा किया गया हो और वह उस पर विश्वास नहीं कर पा रहा हो.

प्रदीप बोला, ‘‘बिलकुल सच. मेरे घर वाले मेरी बात नहीं टालेंगे. हां, तुम्हारे पिताजी की राय.’’

‘‘वह तो तुम्हें बहुत अच्छा लड़का सम झते हैं. खुशी से राजी हो जाएंगे. लेकिन प्रदीप, क्या सच कहते हो या यह सब सपना है?’’

‘‘सपना?’’ प्रदीप उस के नजदीक आ गया. उसे आलिंगन में कस कर उस के होंठों पर अपने होंठ रख दिए. चाय पीने के बाद ही से रेखा पर अजीब सी मदहोशी छाने लगी थी. बदन में कामोत्तेजना सनसनाने लगी थी. चाहती थी, प्रदीप उसे आलिंगन में ले कर पीस डाले. 31 साल के एकाकी, शुष्क और पुरुषस्पर्श से वंचित उस के नारीत्व में बाढ़ सी आ गई. वह प्रदीप से लिपट गई. वह कब उसे भीतर के कमरे में ले गया, उसे पता ही न चला.

प्रदीप उसे रात 8 बजे घर पहुंचा गया था. उस समय तक प्रदीप के पिता घूम कर वापस नहीं लौटे थे, इसलिए उन से भेंट न हुई. प्रदीप ने रेखा के पिता के चाय पीने का अनुरोध नम्रतापूर्वक अस्वीकार करते कहा कि आज घूमतेफिरते कई बार चाय पी चुके हैं, सो माफ करें. रेखा ने रात को खाना नहीं खाया. शोभा से कह दिया कि उस ने भारी नाश्ता कर लिया है. असल में उस की आत्मा ऐसी तृप्त हो गई थी कि सिर्फ सो जाने का मन हो रहा था.

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रातभर रेखा के बदन में मीठी टूटनभरी खुमारी छाई रही. पहली बार का यह पुरुष संसर्ग उसे एक ऐसे अद्भुत लोक में ले गया, जहां वसंत के सिवा कुछ नहीं होता. रातभर मीठे सपने आते रहे.

सुबह जागी तो बदन में मीठे दर्द के साथ ताजगी भी थी. नहाधो कर वह कार्यालय पहुंची. दिनभर उस का मन घबराता रहा और सोचती रही कि शायद अब प्रदीप न मिले.

लेकिन प्रदीप मिला. वह रोज की तरह रामलाल के साथ रुपए जमा करा कर साढ़े 9 बजे आई, तो वह चौराहे पर ही खड़ा था.

‘‘रेखा…’’

रेखा चौंक पड़ी. उस का मन खिल उठा. सामने प्रदीप था. वह धीरेधीरे उस के पास आई, तो वह बोला, ‘‘कैसी हो?’’

रेखा उस से आंखें मिलाने में शरमा रही थी. प्रदीप बोला, ‘‘आओ, मोटरसाइकिल पर बैठो.’’

‘‘घर सामने ही तो है,’’ रेखा बोली.

वह धीरे से बोला, ‘‘तुम्हारा असल घर तो वह है जहां हम अभी चलेंगे, रेखा रानी. आओ, बैठो.’’

रेखा रोमांचित हो उठी. मंत्रगुग्ध सी मोटरसाइकिल के पीछे आ बैठी. प्रदीप अपने घर की तरफ चल पड़ा. रेखा का बदन बारबार सिहर रहा था. प्रदीप उसे भीतर के कमरे की ओर ले चला, तो बोली, ‘‘तुम्हारे पिताजी?’’

‘‘आज वे भी शादी में चले गए हैं. सभी लोग 15-20 दिनों बाद लौटेंगे. मेरठ में हैं. हमें बिलकुल आजादी है.’’

रेखा के अंतर्मन में कुछ खटक रहा था. लेकिन वह भी अपने भीतर की प्यास बु झाने का लोभ रोक नहीं पाई. उस दिन भी दोनों पिछले दिन की तरह ही आनंद में डूबते चले गए.

तब से जैसे रोज का यह नियम बन गया. प्रदीप का घर ऐसी जगह पर था जहां आतेजाते पड़ोसियों की नजर नहीं पड़ती थी. रेखा भी अब पुरुष संसर्ग की आदी हो गई थी. वह बहुत संतुष्ट और प्रसन्न थी. एक दिन उस ने कहा, ‘‘प्रदीप, मान लो, कुछ गड़बड़ी हुई तो?’’

प्रदीप ने उसी दिन उसे घर पहुंचाते वक्त दवा की दुकान से गोलियों का एक पैकेट खरीद दिया, और बताया, ‘‘इस में से एक गोली रोज लेनी है, फिर तो निश्चिंत…’’

एक दिन रेखा औफिस जा रही थी कि प्रदीप अपनी मोटरसाइकिल पर तेजी से जाता हुआ दिखा. वह ठिठक गई. प्रदीप के पीछे एक गोरी, सुंदर सी लड़की बैठी हंसहंस कर उस से बातें करती जा रही थी. प्रदीप ने उसे नहीं देखा. मोटरसाइकिल तेजी से आगे बढ़ गई.

उस दिन रेखा से अपने काम में कई बार भूल हुई. मैनेजर जगतियानी ने  झल्ला कर कह दिया, ‘‘तबीयत ठीक नहीं है तो घर जा कर आराम करो.’’

रेखा ने यही उचित सम झा. वह घर आ गई. उस दिन वह जैसे अंगारों पर लोटती रही. शाम को वह चौराहे पर गई जहां बस रुकती थी और जहां उसे प्रदीप मिलता था. आज वह नहीं मिला. रेखा की वह रात जागते बीती. ईर्ष्या से वह जली जा रही थी. प्रदीप उसे धोखा दे रहा है क्या? यह तो रेखा से सच्चे प्रेम की बात कहता है और वह लड़की. कहां वह स्मार्ट, खूबसूरत यौवन से छलकती हुई नवयौवना, और कहां खुद रेखा. सपाट से बदन वाली असुंदर, अधेड़ कुमारी.

अगला दिन भी उसी तरह कांटों पर लोटते बीता. रात में वह घर के पास बस से उतरी, तो प्रदीप खड़ा मिला. रेखा ने तुरंत पूछा, ‘‘कल सवेरे तुम्हारे साथ वह कौन लड़की थी, प्रदीप?’’

‘‘लड़की?’’ प्रदीप ने पलभर सिर खुजलाया. हंस कर बोला, ‘‘ओह…याद आया…ललिता. हां, वह मेरी अपनी चचेरी बहन है, ललिता. मैं ने तुम्हें बताया तो था कि मेरे छोटे चाचाजी का घर यहीं है. कल ललिता का जन्मदिन था. उस ने मु झे भी निमंत्रण दे रखा था. सवेरे ही मेरे घर आई थी और मु झे कुछ खरीदारी के लिए अपने साथ बाजार ले गई थी. वहीं तुम ने देखा होगा. कल शाम को वहीं फंसा रहा था, तभी तो तुम से नहीं मिल पाया. क्या हुआ?’’

‘‘ओह.’’

प्रदीप मुसकराया, ‘‘तुम्हें कुछ गलतफहमी हो गई है क्या?’’

‘‘नहीं तो,’’ रेखा लज्जित हो कर बोली, लेकिन उस की आंखें कुछ और ही कह रही थीं.

प्रदीप हंस पड़ा. बोला, ‘‘रेखा, तुम निश्ंचत रहो. तुम्हारे सिवा मेरे जीवन में और कोई स्त्री न है, न रहेगी.’’

और वह उसे अपने घर ले गया. रेखा अब पुरुष संसर्ग की आदी हो चली थी. अकसर वह पूछती, ‘‘हम शादी कब करेंगे, प्रदीप? बहुत देर हो रही है…’’

प्रदीप कहता, ‘‘डार्लिंग, पिताजी ने पहले एक जगह मेरी शादी की बात चलाई थी. असल में, मेरी बड़ी बहन की शादी के लिए उन्होंने कर्ज लिया था और कर्ज पटाने के लिए उन लोगों की लड़की से मेरी शादी की बात तय कर दी थी. इस तरह वे लोग अपना रुपया छोड़ देते, अलग से दहेज भी दे रहे थे. लेकिन वह लड़की मु झे बिलकुल पसंद नहीं है. मैं ने इनकार कर दिया.’’

अनजाना बोझ : भाग 2

‘क्यों, अपनी बहन की इतनी चिंता हो रही है. अपनी सगी बहन के अलावा दूसरी हर लड़की तुम लड़कों को अपनी इच्छापूर्ति का साधन लगती है और तुम उन्हें छेड़ना शुरू कर देते हो. कितनी गंदी मानसिकता है तुम्हारी. तुम्हारे जैसे आवारा कुछ नहीं कर सकते अपनी जिंदगी में. मैं अभी थाने जा रही हूं तुम्हारी रिपोर्ट करने. तुम्हें तो मैं कहीं का नहीं छोड़ूंगी.’

आंटी के क्रोध से वे बुरी तरह घबरा गए. और जब वे कुछ शांत हुईं तो धीरे से अपना बचाव करते हुए वे बोले, ‘आंटी, मैं आप के हाथ जोड़ता हूं, आप जो चाहे सजा दे लें. आप ही बताइए 2 वर्षों से मैं उसे पढ़ा रहा हूं, कभी ऐसा नहीं हुआ. दरअसल, आज उस ने कुछ अलग, अजीब से कपड़े पहने थे, सो, मैं डिस्ट्रैक्ट हो गया था.’

‘क्या कहा? कपड़े ऐसे पहने थे? तुम्हारा दिमाग खराब है क्या? अब क्या लड़कियां अपनी मरजी के कपड़े भी नहीं पहन सकतीं, क्योंकि उन्हें देख कर लड़के अपनेआप पर काबू नहीं रख पाते. खुद को काबू नहीं कर सकते तो सड़क पर नजरें नीचे कर के चला करो या घर में बैठो. पर मेरी बेटी वही पहनेगी जो उस का दिल करेगा. क्या तुम्हारी बहन तुम से पूछ कर कपड़े पहनती है? क्या अपनी बेटी को भविष्य में तुम ऊपर से नीचे तक तन ढकने वाले कपड़े पहनाओगे?’

आंटी की तर्कयुक्त बातों के आगे उन की तो बोलती ही बंद हो गई. वे दबी आवाज में बोले, ‘नहीं आंटी, ऐसी बात नहीं है. मैं अपनी गलती मानता हूं. मैं बहक गया था. पर मेरा यकीन मानिए मैं ने ऐसावैसा कुछ नहीं किया.’

इतना सुनते ही आंटी फिर भड़क गईं और दहाड़ते हुए बोलीं, ‘और क्या करना चाहते थे मेरी बेटी के साथ? मन तो कर रहा है तुम्हें अभी ही पुलिस के हवाले कर दूं. जेल की सलाखों के पीछे सड़ोगे, तभी सम झ आएगा. मु झे शर्म आती है तुम्हारे मातापिता के संस्कारों पर. यदि उन्हें पता चल जाए तो अपनी परवरिश पर ही शर्म आने लगेगी उन्हें. तुम जानते हो तुम्हारे जैसे सैकड़ों, हजारों युवक बेरोजगार सड़कों पर क्यों घूम रहे हैं, क्योंकि उन के अंदर आत्मबल, आत्मविश्वास और आत्मनियंत्रण ही नहीं है. जिस दिन इन पर विजय पा लोगे, जिंदगी में कुछ बन जाओगे.’ यह कह कर आंटी ने फोन काट दिया.

वे बदहवास से मोबाइल को ही घूरने लगे. उन्हें काटो तो खून नहीं. आंटी ने कुछ ही मिनटों में उन्हें जमीन पर ला पटका था. सच पूछो तो वे घबरा कर रोने लगे थे. ‘क्या करूं, क्या जवाब दूंगा मातापिता को. मु झे क्या हो गया. मेरी एक बेवकूफी ने आज मेरे चरित्र को ही बरबाद कर दिया. यह मैं ने क्या कर दिया,’ सब सोचतेसोचते उन का सिर दर्द करने लगा. तभी बहन ने आवाज लगाई और वे नीचे आ गए.

बहन ने उन के सामने भोजन की थाली लगा दी थी. उन के हलक में तो थूक तक निगलने की गुंजाइश नहीं थी तो खाना कहां नीचे उतरता. सो, ‘भूख नहीं है बाद में खा लूंगा’ कह कर बहन से थाली उठाने को कह दिया. उसी समय उन के फोन की घंटी फिर बजी. फोन आंटी का ही था.

‘तुम्हारी बदतमीजी का फल तुम्हें खुद मिलेगा. मैं क्यों तुम्हारा वह जीवन खराब करूं जिस की अभी शुरुआत ही नहीं हुई है. जाओ, मैं ने तुम्हें अभयदान दिया. पर ध्यान रखना, अपने जीवन में सभी लड़कियों और महिलाओं की उतनी ही इज्जत करना जितनी अपनी मांबहन की करते हो. जीवन में यदि कुछ बन सकोगे तो समाज में इज्जत की दो रोटी खा पाओगे. वरना ऐसे ही सड़क पर चप्पलें चटकाते और लड़कियों को छेड़ते रहोगे,’ यह कह कर आंटी ने फोन काट दिया था.

उस के बाद की कई रातों तक ठीक से सो ही नहीं पाए वे. बारबार आंटी की बातें कानों में गूंजतीं. पर वह घटना उन के जीवन की टर्निंग पौइंट बन गई. उस के बाद के 2 साल तक उन्होंने जम कर मेहनत की. उसी मेहनत के परिणामस्वरूप अपने पहले ही प्रयास में उन्होंने आईपीएस की परीक्षा पास की और एसपी बने. 8 वर्ष पुरानी उस घटना को सोचतेसोचते उन का सिर दर्द से फटने लगा. मन एक बार फिर आत्मग्लानि से भर उठा.

तभी अचानक सृष्टि की आवाज उन के कानों में गूंज उठी.

‘‘क्या हुआ एसपी साहब, आज बड़ी जल्दी घर आ गए. तबीयत तो ठीक है न,’’ कह कर सृष्टि ने उन के माथे पर हाथ रख दिया और घबरा कर बोली, ‘‘अरे, तुम्हें तो तेज बुखार है. क्या हुआ, सुबह तो एकदम ठीक थे. अभी मैं डाक्टर को बुलाती हूं.’’ कह कर वह मोबाइल में नंबर खोजने लगी तो अमित ने उस का हाथ पकड़ लिया और बोले, ‘‘कोई जरूरत नहीं है. चाय पिला कर, बस दवाई दे दो, ठीक हो जाऊंगा.’’

सृष्टि चाय बनाने किचन में चली गई, तो वे फिर बेचैन हो उठे. तभी सृष्टि ने हाथ में चायनाश्ते की ट्रे के साथ कमरे में प्रवेश किया. चाय का कप हाथ में पकड़ाते हुए वह उन के चेहरे की तरफ देखते हुए बोली, ‘‘क्या बात है, कुछ बेचैन और परेशान से लग रहे हो. औफिस की कोई परेशानी है क्या. मु झे बताओ, शायद मैं कोई हल निकाल सकूं.’’

‘‘नहींनहीं, कुछ नहीं. बस, ऐसे ही मन कुछ उदास था. गोलू सो गई क्या? लाओ, उसे मेरे पास सुला दो.’’ कह कर अमित ने बात के रुख को बदलना चाहा. कुछ ही देर में सृष्टि गोलू को अमित की बगल में सुला कर चली गई. जैसे ही उन्होंने बगल में लेटी गोलू की तरफ देखा, तो सोचने लगे, ‘यदि कोई लड़का कभी मेरी गोलू के साथ ऐसी हरकत करेगा तो…तो मैं उसे जान से मार दूंगा. तो क्या मु झे भी उसी समय जान से मार दिया जाना चाहिए था?’ सोचतेसोचते कब आंख लग गई उन्हें भी नहीं पता.

सुबह जब सृष्टि ने उन्हें  झक झोरा, तो उन की आंख खुली. चाय पीतेपीते सृष्टि बोली, ‘‘अमित, तुम कल से कुछ परेशान हो, बताओ तो हुआ क्या है? रात में भी तुम बड़बड़ा रहे थे. ‘नहीं, मु झे माफ कर दो. मैं ऐसा कैसे कर सकता हूं. आंटी, मु झे माफ कर दो.’ प्लीज, मु झे बताओ इस तरह अकेले मत घुटो, हुआ क्या है. मैं साइकोलौजी की प्रोफैसर हूं, अवश्य तुम्हारी कुछ मदद कर पाऊंगी.’’

अमित की आंखें भर आईं और वे दुखी स्वर में बोले, ‘‘सृष्टि मेरे जीवन की एक घटना है जिस ने मेरा जीवन तो बना दिया परंतु वह मेरे अब तक के सफल जीवन का एक काला धब्बा भी है. कल कुछ ऐसा हुआ कि मैं स्वयं की ही नजरों में गिरता जा रहा हूं. पहले तुम मु झ से वादा करो कि तुम मु झे गलत नहीं सम झोगी और मु झे इस  झं झावात से निकलने का कोई उपाय बताओगी.’’

‘‘हां भई, पक्का वादा. अब 3 साल में तुम मु झ पर इतना भरोसा तो कर ही सकते हो न,’’ सृष्टि ने अमित का हाथ अपने हाथ में ले कर उस की आंखों में  झांकते हुए कहा.

सृष्टि की आंखों में अपने लिए विश्वास देख कर अमित ने रुंधे गले से 8 वर्ष पूर्व का पूरा घटनाक्रम जस का तस सृष्टि को सुना दिया. ‘‘इस दौरान मैं उस घटना को भूल सा गया था पर आज स्कूल में उस बच्ची के एक प्रश्न ने मु झे फिर मेरी ही नजरों के कठघरे में ला खड़ा किया है,’’ कहते हुए अमित शांत हो कर सृष्टि के चेहरे के भाव पढ़ने का प्रयास करने लगे.

‘‘अमित, तुम्हें पता है हमारे समाज में हो रहे अपराधों का सब से बड़ा कारण आज के युवा की बेरोजगारी है. घर और मातापिता की जिम्मेदारियों के बीच में जब एक युवाओं अथक प्रयास के बाद भी नौकरी प्राप्त नहीं कर पाता या आर्थिक जिम्मेदारियों को उठाने के लायक नहीं हो जाता, तो वह स्वयं को असहाय सा महसूस करने लगता है. और जब यह काफी समय तक होता है तो वह युवा अवसाद से घिरने लग जाता है और उस की यह फ्रस्टे्रशन ही उसे गलत दिशा में मोड़ देती है.

‘‘मैं तुम्हारे इस व्यवहार को सही तो नहीं कह सकती क्योंकि आप कितने ही परेशान क्यों न हो, गलत मार्ग को अपना कर स्वयं पर से नियंत्रण खो देना तो सरासर गलत ही है. पर हां, अपनी गलती की स्वीकारोक्ति ही व्यक्ति की सब से बड़ी सजा होती है. वह तुम्हारा सैल्फरियलाइजेशन ही था जिस के परिणामस्वरूप तुम आज एक आला दर्जे के अधिकारी बन पाए हो. हां, तुम्हें जो आत्मग्लानि है उस से निकलने का एकमात्र रास्ता है कि तुम जा कर उन आंटी से मिल कर माफी मांग लो और उन्हें बताओ कि उस दिन उन के द्वारा तुम्हें दिया गया अभयदान बेकार नहीं गया.’’

‘‘हां, तुम सही कह रही हो. मैं जब तक उन से मिलूंगा नहीं, चैन से सो नहीं पाऊंगा,’’ कह कर अमित अपनी पुरानी डायरी में आंटी का मोबाइल ढूंढ़ने लगे. उज्जैन से भोपाल की दूरी ही कितनी थी, सो, रविवार के दिन वे भोपाल की अरेरा कालोनी में थे.

‘न जाने वे मु झे माफ करेंगी भी, या नहीं. क्या प्रतिक्रिया होगी उन की मु झे देख कर? पता नहीं उन्हें मैं याद भी होऊंगा या नहीं. परंतु जब तक मैं उन से मिल कर अपने दिल का हाल कह कर माफी नहीं मांग लेता, मेरा प्रायश्चित्त ही नहीं हो पाएगा और मैं ताउम्र तिलतिल कर मरता रहूंगा. एक बार मिलना तो होगा ही. शायद वे मु झे माफ कर सकें,’ सोचतेसोचते वे कब अरेरा कालोनी के ई 7 के कामायनी परिसर में एक एचआईजी मकान के सामने आ कर खड़े हो गए, उन्हें पता ही न चला.

उन्होंने धड़कते दिल से घंटी बजाई. दरवाजा आंटी ने ही खोला. अमित ने  झुक कर उन के पैर छू लिए. वे बोलीं, ‘‘अरे, कौन हो भाई? मैं पहचान नहीं पा रही हूं.’’

‘‘आंटी, मैं, अमित.’’

‘‘ओहो अमित, कुछ बन पाए या आज भी…’’ आंटी अपनी याददाश्त पर कुछ जोर डालते हुए बोलीं.

‘‘आंटी, मैं आईपीएस हो गया हूं. पर यकीन मानिए कि आज मैं जो कुछ भी हूं आप के कारण हूं. पर 8 वर्ष पुरानी उस घटना के लिए मैं आज भी क्षमाप्रार्थी हूं. आप ने उस दिन क्रोध में मु झे मेरी असलियत, कर्तव्य और जीवन के मूल्य सम झाए थे. पर आज आप प्यारभरा आशीष मु झे दीजिए तो मैं सम झूंगा कि आप ने सच्चे मानो में मु झे माफ कर दिया है.’’

‘‘वैल डन, वैल डन. उस दिन तुम्हारी आत्मग्लानि देख कर मु झे सम झ आ गया था कि तुम बहक गए हो. तुम्हें माफ कर के मैं ने तुम्हें तुम्हारे हाल पर छोड़ दिया था कि यदि तुम्हें अपने ऊपर वास्तव में पछतावा होगा तो अवश्य जीवन में कुछ बन सकोगे. दरअसल, कभीकभी सजा से अधिक माफ करना आवश्यक होता है क्योंकि हर अपराधी को सजा से नहीं सुधारा जा सकता और न ही हरेक को माफी से. उस समय मैं ने वही किया जो मु झे ठीक लगा.

‘‘मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है. खूब उन्नति करो. पर महिलाओं का सम्मान करना कभी मत छोड़ना,’’ कह कर आंटी ने खुश हो कर उन के ऊपर अपना वरदहस्त रख दिया.

आंटी का प्यारभरा आशीष पा कर अपनी आंखों की कोरों में आए आंसुओं को सिटी एसपी अमित ने धीरे से पोंछ लिया और एक अनजाने बो झ से मुक्त हो कर खुशीखुशी अपने कर्तव्यस्थल की ओर चल दिए.

अक्षम्य अपराध : भाग 2

नीतू ने जुर्म कबूला तो एसपी (सिटी) प्रबल प्रताप सिंह व सीओ इंद्रप्रभा ने थाना रसूलपुर में संयुक्त प्रैस कौन्फ्रैंस की. पुलिस ने हत्यारोपी नीतू यादव को मीडिया के समक्ष पेश कर मासूम बच्चे लौकिक उर्फ कृष्णा की हत्या का खुलासा कर दिया.

चूंकि नीतू ने लौकिक की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय ने भादंवि की धारा 363, 302, 201 के तहत नीतू यादव के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा दी. पुलिस जांच में विवेकशून्य ताई के अक्षम्य अपराध की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के थाना रसूलपुर के क्षेत्र में एक गांव है बड़ा लालपुर. यादव बाहुल्य इस गांव में महेश कुमार, सत्येंद्र कुमार तथा कुलदीप 3 भाई रहते थे.

भाइयों में सब से बड़ा महेश था. पढ़लिख कर जब वह जवान हुआ तो उस ने घर की माली हालत सुधारने के लिए प्रयास तेज कर दिए. वह तेज दिमाग का था. वह कोई ऐसा धंधा करना चाहता था, जिस में आमदनी अच्छी हो. उस ने इस बारे अपने मित्रों से सलाहमशविरा किया तो उन्होंने शराब ठेका चलाने की सलाह दी.

पर शराब का ठेका मिलना आसान नहीं था. ठेका बोली में अच्छीखासी पूंजी भी लगानी थी. लेकिन महेश ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने ठान लिया कि वह ठेका हासिल कर के ही दम लेगा.

महेश ने एक ओर पूंजी जुटाई तो दूसरी ओर आबकारी विभाग के अधिकारियों से संपर्क बनाया. पूरी गोटियां बिछाने के बाद आखिर नीलामी में उसे शराब का ठेका मिल ही गया.

महेश ने अपने गांव से कुछ दूरी पर जमालपुर में शराब बिक्री का काम शुरू किया. गांव में देशी शराब की बिक्री खूब होती है, अत: महेश के ठेके पर भी खूब बिक्री होने लगी. महेश ने अपने भाई सत्येंद्र व कुलदीप को भी ठेके के काम पर लगा लिया था. सत्येंद्र ठेके पर सेल्समैन के रूप में काम करता था. कुलदीप कभी काउंटर पर बैठता था तो कभी अन्य व्यवस्थाएं देखता था.

शराब ठेके से महेश की आमदनी बढ़ी तो वह ठाठबाट से रहने लगा. उस का विवाह नीतू से हुआ था. शादी के बाद महेश ने दुर्गामाता मंदिर के पास 2 मंजिला मकान बनवा लिया था, जबकि सत्येंद्र व कुलदीप पुराने वाले मकान में रहते थे.

कालांतर में नीतू 2 बेटियों रीतू, गार्गी की मां बनी. नीतू के दोनों बच्चे खूबसूरत थे. महेश व नीतू उन्हें भरपूर प्यार करते थे और किसी भी चीज की कमी का अहसास नहीं होने देते थे.

महेश से छोटा सत्येंद्र था. सत्येंद्र का विवाह शशि के साथ हुआ था. शशि अपनी जेठानी नीतू से भी ज्यादा खूबसूरत थी. वह व्यवहारकुशल तथा घरेलू काम में भी निपुण थी. शादी के 3 साल बाद शशि ने एक खूबसूरत बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने कन्हैया रखा.

कन्हैया के जन्म से सत्येंद्र के घर में खुशियों की बहार आ गई. कन्हैया के जन्म के 2 साल बाद शशि ने एक और बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने लौकिक रखा. प्यार से लौकिक को वह कृष्णा कह कर बुलाती थी. कृष्णा और कन्हैया दोनों ही नटखट और मनमोहक बालक थे.

कृष्णा-कन्हैया का ताऊ महेश भी दोनों को खूब प्यार करता था. महेश भले ही निर्मल मन का था, लेकिन उस की पत्नी नीतू के मन में मैल था. वह दिखावे के तौर पर कृष्णा-कन्हैया से प्यार करती थी, पर अंदर ही अंदर जलती थी. दरअसल, उस के मन में सदैव इस बात की टीस रहती थी कि उस की देवरानी शशि के 2 बेटे हैं, जबकि उस की केवल 2 बेटियां हैं.

नीतू को इस बात का भी मलाल था कि परिवार की बुजुर्ग महिलाएं देवरानी शशि की खूबसूरती और अच्छे बर्ताव का बखान करती हैं, जबकि उसे देख कर मुंह फेर लेती हैं.

नीतू और शशि की आर्थिक स्थिति में जमीनआसमान का अंतर था. नीतू का पति महेश शराब ठेकेदार था. उस की आमदनी अच्छी थी. जबकि शशि का पति सत्येंद्र उस के ठेके पर सेल्समैन था. उसे सीमित पैसा मिलता था. शशि सीमित आमदनी में भी खुश रहती थी, जबकि उस की जेठानी नीतू अच्छी आमदनी के बावजूद परेशान रहती थी.

हालांकि नीतू पैसे के घमंड में शशि पर रौब गांठती रहती थी और यह अहसास दिलाती रहती थी कि उस के पति के रहमोकरम पर ही उस के परिवार का भरणपोषण होता है. नीतू शशि को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं गंवाती थी.

शशि का बड़ा बेटा कन्हैया अब तक 4 साल का तथा छोटा लौकिक उर्फ कृष्णा 2 साल का हो गया था. कृष्णा तेज कदमों से दौड़ने लगा था. बातें भी करने लगा था. अब वह अपनी ताई नीतू के घर भी पहुंचने लगा था.

नीतू की बड़ी बेटी रितु तो हरिद्वार में पढ़ती थी किंतु छोटी बेटी 10 वर्षीय गार्गी कृष्णा को बहुत प्यार करती थी. वह उस से खूब हंसतीबतियाती थी.

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लेकिन 3 सितंबर, 2019 को गार्गी से कृष्णा का साथ सदा के लिए छूट गया. हुआ यह कि गार्गी सुबह 10 बजे घर से कुछ दूर गोबर लेने गई थी. वहां उस की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी. शायद उसे किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया था. गार्गी की मौत से घर में कोहराम मच गया.

गार्गी की मौत को अभी एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि कृष्णा का जन्मदिन आ गया. 10 सितंबर को कृष्णा का जन्मदिन था. शशि हर साल बच्चों का जन्मदिन धूमधाम से मनाती थी.

10 सितंबर को वह कृष्णा का बर्थडे भी धूमधाम से मनाना चाहती थी. इस की जानकारी शशि की जेठानी नीतू को हुई तो उस ने इस बारे में शशि से बात कर के कहा कि इस साल धूमधाम से कृष्णा का जन्मदिन न मनाए. लेकिन शशि नहीं मानी और ताना मारा, ‘‘कोई मरे या जिए, हमें इस से कोई वास्ता नहीं. हम तो अपने कृष्णा का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाएंगे.’’

शशि ने जैसा कहा था, उस ने वैसा ही किया. 10 सितंबर को उस ने कृष्णा का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया. उस ने घरपरिवार के लोगों को खाना खिलाया. लेकिन नीतू कृष्णा के जन्मदिन की खुशी में शामिल नहीं हुई. वह देवरानी शशि के तानों से विचलित हो उठी.

आखिर उस ने निश्चय किया कि वह शशि को ऐसा जख्म देगी, जिस से वह खून के आंसू रोएगी और उस का जख्म जिंदगी भर नहीं भरेगा. शशि को जख्म देने के लिए उस ने जो रास्ता चुना, वह कलेजे को चीर देने वाला था. यह रास्ता था कृष्णा की मौत.

नीतू का पति महेश अपने व्यवसाय में व्यस्त रहता था. इसलिए उसे पता ही नहीं चला कि उस की पत्नी के मन में क्या चल रहा है. वह क्या षडयंत्र रचने वाली है, नीतू ने स्वयं भी पति को अंधेरे में रखा और कुछ नहीं बताया.

16 सितंबर, 2019 की शाम 5 बजे लौकिक उर्फ कृष्णा अपने घर के बाहर खेल रहा था, तभी नीतू की निगाह कृष्णा पर पड़ी.

उस ने इशारे से कृष्णा को बुलाया और फिर घर के अंदर ले गई. इस के बाद नीतू ने मुख्य दरवाजा बंद किया और कृष्णा को दूसरी मंजिल पर स्थित कमरे में ले गई.

वहां उस ने कृष्णा को पटक कर दोनों हाथों से गला दबा कर उसे मार डाला. हत्या के बाद कमरे में ही शव पर पत्थर रख कर दबा दिया और ऊपर से कपड़ा डाल कर ढक दिया. फिर कमरे में ताला लगा कर भूतल पर आ गई.

इधर शशि घरेलू काम में व्यस्त थी. उसे जब फुरसत मिली तो उसे कृष्णा की याद आई. उस ने कृष्णा को घर में खोजा तो वह दिखाई नहीं पड़ा.

इस के बाद शशि ने कृष्णा की तलाश पासपड़ोस में की, लेकिन वह कहीं नहीं दिखा. सभी जगह खोजने के बाद भी जब वह नहीं मिला तो उस ने पति को सूचना दी.

उधर नीतू अपने घर में 2 दिन तक मासूम कृष्णा के शव को दबाए रही. जब शव से बदबू आने लगी तो पकडे़ जाने के डर से उस ने 18 सितंबर की रात 10 बजे कृष्णा के शव को खिड़की से नीचे फेंक दिया.

उस के बाद घर के पिछवाड़े आ कर शव को मिट्टी से ढक दिया. कमरे में फैली दुर्गंध को उस ने खिड़की खोल कर निकालने का प्रयास किया, लेकिन इस काम में वह पूरी तरह से सफल न हो सकी. आखिर पुलिस की खोजी कुतिया ने हत्या का सुराग दे दिया.

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पुलिस ने नीतू से पूछताछ के बाद 20 सितंबर, 2019 को उसे फिरोजाबाद कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. नीतू के इस जघन्य कृत्य से उस का पति महेश बेहद शर्मिंदा है.

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